Saturday, April 14, 2012

'विदेह' १०३ म अंक ०१ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०३) PART_ 4


१.जगदीश प्रसाद मण्डgल २.अनिल मल्लिक ३.कुसुम ठाकुर



जगदीश प्रसाद मण्डसलक गीत

गीत-1



मीत यौ, गृहनीक गारि‍‍ सुनै छी

मीत यौ गृहनीक गप सुनै छी।

गाम-गाम आ गृह-गृहमे

गसल गीरह देखै छी

मीत यौ, अहींटा कहै छी

मीत यौ गृहनीक कथा कहै छी।

गीरहक बीच गृही गुहाएल छै

गूह बीच जुट्टी समाएल छै

देखि‍-देखि‍ चटि‍आइ छै,

मीत यौ, देखि‍-देखि‍ चटि‍आइ छी

अहींटा कहै छी, मीत यौ

गृहपति‍ सभ बनए चाहै छै

नै पाबि‍ घुड़-मौड़ करै छै।

घुड़-मौड़सँ घुरि‍या घुरै छै

अहींटा कहै छी, मीत यौ

गृहनीक गारि‍‍ सुनै छी

लाजे-धाक मरै छी, मीत यौ

अहींटा कहै छी।



गीत-2



हे बहि‍ना, हे बहि‍नी

जीवन संग जि‍नगी बदलै छै।

अपने बदलि‍ कि‍छु, कि‍छु बदलैयो पड़ै छै

कि‍छु अपने सुधरि‍, कि‍छु सुधारैयो पड़ै छै।

जीवन संग जि‍नगी बदलै छै। हे बहि‍ना

हे बहि‍नी, जीवन....

संगे-संग मि‍लि‍ खेललौं-धुपलौं

संग-संग रहि‍ संगी कहलौं।

पकड़ि‍ बाँहि‍ बहि‍ना कहेलौं

फूल-प्रीत बनि‍ सासुर बसलौं

हलसि‍-हलसि‍ मन हँसै छै

जीवन संग जि‍नगी बदलै छै

हे बहि‍ना, हे बहि‍नी

एक बहि‍न ओद्रक कहबै छै

सहस्रो समाज गढ़ै छै।

बहि‍नासँ दीदी, दीदीसँ दादी

हँसि‍ हँसि‍ मन तड़पै छै।

हे बहि‍ना, हे दि‍दगर

जीवन संग जि‍नगी चलै छै।

चलि‍-चलि‍ रंग बदलै छै

हे बहि‍ना, हे बहि‍नी

जीवन संग जि‍नगी बदलै छै।



गीत-3



हे बहि‍ना, हे दीदी, हे दादी

सुरति‍ केना बदलतै हे...

प्रीति‍क रीति‍ कुरीत बनल छै

रीति‍-सुरीति‍ केना पेबै

थाल-खि‍चार घर-द्वार बनि‍

फल वृक्ष कल्पि कहि‍या देखबै।

हे बहि‍ना हे संगी, हे प्रेमी

सुरति‍ केना बदलते हे....

जहि‍ना जहर तहि‍ना फुफकार

नाग, गहुमन डॅसैत रहै छै।

करम-भाग मनतर जपि‍-जपि‍

अगुआ-पछुआ धरैत रहै छै।

हे प्रीति‍या हे रीति‍या

नीक फल कहि‍या देखबै

हे नीक फल कहि‍या देखबै।



जगदीश प्रसाद मण्डालक कवि‍ता-



अनेरुआ वन



जुग-जुगसँ जनमैत एलै

जंगल वन लगैत गेलै।

गुण-अवगुण बि‍नु बि‍लगौने

संग-संग सहेजति‍ गेलै।

जे जेना-जेना जगैत उठल

से तेना-तेना जगजि‍आ लगल

जे जेना-जेना पछुआए उठल

से तेना-तेना पछुआए लगल।

मुदा नै, आरो कि‍छु भेल?

आगुओ उगल पछुआए लगल

पाछुओ उगल अगुआए लगल।

ने सबहक कद-काठी समान

ने सुर्जक दि‍न-राति‍क मान।

मान-समान समतल बि‍नु

कि‍छु दबि‍ कि‍छु फुफुआएल।

कान्हर मि‍ला देखि‍-सुनि‍

तरसि‍-तरसि‍ झुझुआए लगल।

तहि‍ना मनुक्खोबक बीच वन

रंग-बि‍रंग चतरल अछि‍।

दुभि‍-लत्ती ऊपर पेड़ पसरि‍

तँ लत्ति‍यो गछाड़ि‍ चतरल अछि‍।



फँसरी



फँसरी लगा धड़ैन‍ लटकलौं

पि‍ताएल मन सभ कि‍छु केलौं।

फँसरी जखन बैसल गरदनि‍

मन पड़ल दोसर मरदनि‍।

सुख-दुख मरदनि‍ जनमाबए

संगे दुनू कात हटाबए।

आद्र एक रहि‍तो दुनू

एक दोसरकेँ दूर भगाबे।

लगल फँसरी जहाँ तनाएल

दम फुलि‍ देहो कठुआएल।

गरदनि‍ पकड़ि‍ पोखरि‍ जहि‍ना

हँसि‍-हँसि‍ हरदा बजबाएल।

जेना-जेना गीरह कसैत गेल

तहि‍ना जि‍नगी मन पड़ैत गेल।

चक्र चलैत देखि‍-देखि‍ जि‍नगी

तड़तड़ा-तड़तड़ा खसैत गेल।

ऐ सँ नीक तँ फाँसी होइ छै

कि‍छु कऽ धऽ कऽ तइपर चढ़ै छै।

घरक फँसरी अॅतरी दुहै छै

हार रस सूधि‍ स्वा न पबै छै।





अनिल मल्लिक

गजल

अहाँ के देखब कोना आब हम, अछि हमर भाग जडल
अहाँ सॉ भेटव कोना आब हम, अछि हमर भाग घटल

सँगे चलबै जीवन भरि बचन इ, जे अहाँ तोडि देलिएै
समेटब कहू कोना आब हम, स्वप्न हमर भाफ बनल

अहाँ लेल खेल छल किछु दिन के, की कोनो मजबूरी छल
सूनलौं ने किया किछु हमर, मोने मे हमर बात रहल

बन्द अछि मुट्ठी मे खुसी हमर, इ केहन भरम मे छलौं
सुखल बालु जकाँ जे ससरल, खाली हमर हाथ रहल

फटैत छाती ल देखैत रहलौं, घुरि कs अहाँ तकलौं कहाँ
देह के राखू कतेक दिन हम, देखू हमर जान चलल

राति जे छत पर छलौं देर तक, कारी असमान तकैत
जेना बादल हम छलौं ठहरल, ओ हमर चान चलल

जागल छी बहुत दिन सॉ आब, सुतितौं हम चिर निद्रा मे
निन्द आबै कहाँ कहियो जेना, आँखि मे हमर काँट गडल -----

(सरल बर्ण २२)



कुसुम ठाकुर

हाइकू


समृद्ध भाषा
मैथिली मिथिलाक
जायत हेरा

लाज होइछ
बाजब कोना भाषा
पढ़ल हम

दोषारोपण
नेता अभिभावक
नहि कर्त्तव्य

देशक नेता
नहि जनता केर
स्वार्थे डूबल

करू ज्यों स्नेह
माँ आ मात्रि भाषा सँ
संकल्प लिय

आबो तs जागू
मिथिला केर लाल
प्रयास करू

अबेर भेल
तैयो विचार करू
अछि सन्देश





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१.चंदन कुमार झा २.पवन कुमार साह





चंदन कुमार झा

सररा, मदनेश्वर स्थान, मधुबनी, बिहार



 हाइकू

चैतक मास
पछबा हन-हन
माल चरैए ।

पड़रु पीठ
बगुला बइसल
ढील फँकैए ।

बूट मटर
ओरहा सोन्हगर
मुँह पकैए ।

आम्र मज्जर
टिकुला लुधकल
लुक्खी खाइए ।

जुड़-शीतल
कटहर के बर
बड़ी पकैए ।

हर्षित मोन
कोइलीक बाजब
गीत लगैए ।



(1.)-भूख

भूख निज-मानक जमाना मे केहन पसरल,

लोक दोसराक सनमान करबहु बिसरल ।।



अनका नीच देखेबा मे बुझय अपन श्रेष्ठता,

सभ सँ श्रेष्ठ अपना के छै सभ बुझि रहल ।



निज-स्वार्थ सधबा मे रहय हरदम लागल ,

घेँट कटलै जँ ककरो त', हमर की बिगड़ल |



 (2)-"बिहाड़ि"

छल दशो दिशा स्तब्ध, शांत,

दम सधने, भयाक्रांत,

गुमकी आ' उमस मेँ,

सुखा रहल छल कंठ,

चित्त भ' गेल छल-

अक्खत तीत्त,

फड़फड़ा रहल छल प्राण ।



पसरल छल वातावरण मे,

सभतरि सन्नाटा ।

मुदा-

पोखरिक मोहार परहुक,

तारक गाछक कतार,

आ' चौबटिया परहक,

विशाल वटवृक्ष मात्र,

करा रहल छल,

अपन श्रेष्ठता एवम्

विशालताक आभास क्रमशः,

जना रहल हो जनु,

अपन साम्राज्यक विस्तार केँ ।

आ'कि-

उठैत अछि प्रबल-प्रचण्ड,

प्रकृति-कोमलांगी के ,

वन-उद्यान के छाती चिड़ैत बिर्ड़ो ।

क्षणहि मे मचि जाइछ प्रलय,

अर्रा-अर्रा खसय लगैछ,

अभिमान सँ उठल तारक मूड़ी,

आ' सीर समेत उपरि,

खसैत अछि वटवृक्षो हारि,

एहने होइछ बिहारि ।





पवन कुमार साह जीक पद्य-



गीत-



अहाँ बि‍नु हम केना रहब

हमरा बता दि‍अ

अहाँ बि‍नु हम जीअब कि‍ मरब

हमरा बता दि‍अ

अहाँ बि‍नु......

अहीं चैन छी हमरा

अहीं तँ नि‍न्नि‍या

सुख-दुख हमर

अहीं तँ सजनि‍याँ

अहीं जीवन हमर

अहीं तँ परनि‍या

सभ कि‍छु छी हमर

अहीं तँ सजनि‍याँ

सजनी बि‍नु हम केना रहब

हमरा बता दि‍अ

अहाँ बि‍नु.........

देखू हमर चेहरा

केहेन भऽ गेलए

मि‍लैक बि‍नु अहाँसँ मुर्झा गेलए

सूरति‍ अहाँक

हमर जीगरमे गड़ि‍ गेलए

मि‍लैक लेल दि‍ल

तड़सि‍ कऽ रहि‍ गेलए

अहाँसँ हम केना मि‍लब

हमरा बता दि‍अ

अहाँ बि‍नु.....।







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१. आनन्द कुमार झा २.निशान्त झा





आनन्द कुमार झा

मैया अहाँ बसै छी

मैया अहाँ बसै छी

मिथिला नगरीक माँटिमे

पुण्यभूमि उच्चैठमे ना



कखनो काली बनि अहाँ एलौं

कखनो दुर्गा अहाँ बनि गेलौं

कखनो सीता बनि कऽ

अहाँ भेटै छिऐ खेतमे

मिथिला नगरीक माँटिमे ना

मैया अहाँ…



मण्डन भारती सेवलनि धाम

रखलिअनि हुनको अहाँ शान

कालिदासक आस पुरेलिअनि

एकहि रातिमे

पुण्यभूमि उच्चैठमे ना

मैया अहाँ…



जे किओ जपलनि अहाँ केर नाम

पुरित कए देलिअनि सभ मांग

एहि बेर बारी अछि

आनन्दक एहि पाँतिमे

पुण्यभूमि उच्चैठमे ना

मैया अहाँ…







निशान्त झा



हमरा संगे छत पर आबू
देखू बहाना नै बनाबू
चान क माथ दुखाइत अछि
हमरा संगे ओकर माथ ससारू
देखू बहन्ना जुनि बनाबू

चान क माथ सेहो हल्लुक होएत
आर हमर आंगुर अहाँक
आंगुर सँ छु जाएत
चान केँ आ हमरा सेहो
नीक नींद आएत
आब चलियो आबू
देखू बहन्ना जुनि बनाबू ..................





कए सालसँ  सुनैत आबि रहल छी,
बेटी तँ पराया धन होइत अछि  ,
जकरा  हम सहेजै छी, सम्हारै छी ,
अपन जान सँ बेसी मानैत छी ,
आ फेर चलि जाइत अछि ओ एक दिन,
अपन तथाकथित स्वामी लग।

मुदा  एक बातक  उत्तर देता कियो हमरा ,
भला  किएक  कियो अपन धन केँ  ,
आपस लैमे सेहो  धन माँगैत अछि ,
वा फेर  अपन धनकेँ  अनैहते ,
जरबैत अछि आकि घरसँ निकलि बाहर करैत अछि |

जँ नै तँ किएक  दहेजक आगिमे,
जरैत अछि हजारो बेटी,
आकि दर दर ठोकर खाइ लेल   मजबूर अछि ,
अपन बाबुक ओ राजदुलारी,
दोष नियतिक अछि आकि अछि समाजक,
की यशोदा सेहो आन बुझलक,
आ देवकी सेहो नै अपनेलक|







ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४

     

   

कोयली कानय भोरहि सँ

(कविता)





याद  अबैछ  गुरुदेव  रबिन्द्रक, *

कोयली  कानय  भोरहि  सँ ।

मिथिला केर इतिहास लिखायल,

सभदिन  अगबे  नोरहि  सँ ।।





लागल  कोन  कुहेस  हटए  नहि,

सुर्य  अस्त  छथि   भोरहि  सँ ।

मिथिला – मैथिल   केर   दुर्गति,

देखथि  विद्यापति  ओरहि सँ ।।



जन्मभूमि   जननी   ओ   भाषा,

बिसरि गेलह  बढ़ि स्वर्गहु सँ ।

हे  मैथिल !   धिक्कार  थिकह,

जिनगी  बत्तर  छह नर्कहु सँ ।।





लाज होइछ निज जिनगी पर,

हमसभ  बत्तर छी  चोरहि सँ ।

शपथ  लैत  छी,  हम  लड़ब,

जत होयत हमरा जोरहि सँ ।।





तन मन धन जत भाग हमर,

मिथिला - मैथिली लए अर्पित अछि ।

हमर  लेखनीक  हरेक  शब्द,

निज  भाषा  लए संकल्पित अछि ।।





आशीष दियऽ हे माए मैथिली,

पुर्ण करी निज इच्छा  हम ।

तोड़ि सकी  हर एक  व्यूह केँ,

करी शत्रु  केर  चेष्टा भंग ।।







* गुरुदेव रबिन्द्र = मैथिलीक सुप्रशिद्ध कवि व लेखक श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर (नञि कि बाङ्गालक स्व॰ रविन्द्रनाथ टैगोर) । नेनपनहि सँ हमर कान मे जे पहिल मैथिली गीत गूँजल आ हमर स्मृति पटल पर मैथिली साहित्यक प्रति अटूट सिनेह ओ निष्ठा जगओलक से छल श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुर ओ श्री जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’ जीक गीत सभ । ओहि समय मे हिनक गीत सभ ततेक ने प्रशिद्ध छल जे गाम सँ पटना धरि हरेक गोटेक ठोर पर अनायासहि अबैत रहैत छल । मञ्च पर श्री रबिन्द्रजी आ स्व॰ महेन्द्रजीकेँ सुनबाक सौभाग्य बहुत बाद मे पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व समारोह मे भेटल आ भेटैत रहल परञ्च गाम घऽर मे बहुत नेनपनहि सँ हर वयसमूहक लोक सभ सँ सुनल हुनिक गीत सभ हमरा प्रेरित करैत रहल । ताहू मे श्री रबिन्द्रजीक गीत “की थिक मिथिला, के छथि मैथिल” हमर मोन मस्तिष्क केँ हमेशा झकझोड़ैत रहल आ एखनहु झकझोड़ैत रहैत अछि, एहि प्रश्नक सही उत्तर तकबाक लेल बेर – बेर प्रेरित करैत रहैत अछि आ शायद आजीवन करैत रहत । तेँ ओ लोकनि हमर मैथिली साहित्यक क्षेत्र मे गुरु भेलाह ।

ओना तँ हमर ई गीत २५ – ०३ -‍ १९९८ कऽ लिखल गेल छल । पर गुरुदेव श्री रबिन्द्र नाथ ठाकुरजीक हुनक ६७म जन्मदिनक अवसरि पर हुनिका प्रति आदर व्यक्त करैत आइ ई गीत प्रकाशित कए रहल छी ।  हुनिक जन्म ०७ अप्रिल ‍१९३६ ई॰ कऽ पुर्णिञा जिलाक धमदाहा गाँव (दक्षिणबारि टोल) मे भेल छलन्हि ।









तीन तिरहुतिया, तेरह पाक

(गीत)





तीन   तिरहुतिया,  तेरह   पाक ।

अप्पन   ढोलक,  अपनहि  थाप ।

चेतह   आबहु,  नञि   तँ   फेरहु,

होयतह  ओएह,  ढाकक  तीन  पात ।

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।





एक दोसरा सँ छकि कऽ लड़लह,

खूब परस्पर  टाँग तोँ झिकलह ।

सोति असोति आ बड़का छोटका,

जानि ने की की आओरो बँटलह ।

उत्तराहा    दक्षिणाहा    कएलह,

आओर   पुबरिया   पछबरिया ।

जाहि  बाट  पर  रोज चलै छह,

खानि लेलह ओएह पर खधिया ।

कालीदास    सत्तहि      पुरखा,

की काटि रहल छह,  नञि छह भाख ।

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।





अपना  बीच  तेहल्ला  पैसलह,

कमजोरी तोर भाँपि ओ गेलह ।

परिकल भेदिया,  कयल हिसाब,

तेरह,  छब्बीस  हो  बड़ भाग ।

नऽव - नऽव  परिभाषा गढ़लक,

साँच युधिष्ठिर सन ओ बजलक ।

अंग - बज्जि - मिथिला मे भेद,

तिरहुत – कोसी – सीमा   देश ।

कहलक  कान लऽ कौआ भागल,

कान   के  देखए ?   कौआ   ताक !

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।



 मैथिल फोरलक, मिथिला डाहलक,

मैथिलीक सेहो चिता सजओलक ।

भाँग पिया, भकुअओलक सभ केँ,

सभ मैथिल केर बुद्धि हेरओलक ।

अपनहि “ओ” अदृश्य  बनल छल,

मुरूख मैथिलहि ऊक उठओलक ।

भाँग  पीबि  बेमत्त  नचए  छल,

नीक – बेजाए, ने बूझि सकै छल।

एतबा  मे  किछु  मैथिलजन  केँ,

षडयण्त्रक     भेलन्हि      आभास ।*

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।





किछु  मैथिलजन  सजग भेलाह, *

जरबाक गन्ध  चीन्हए लगलाह ।

टीनही  चश्मा  जे  फेकलन्हि तँ,

अपनहि  महल  जरैत  देखलाह ।

मैथिल अपनहि  फानि रहल छल,

अपनहि अपनहि ठानि रहल छल ।

पानि के लाओत, आगि मेझाओत ?

भेदियेक बात  गुदानि रहल छल ।

तइयो   सजग – सचेत – धीरमति, *

मानल   नञि   भेदिया   सँ   हारि ।

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।





अपना  घऽर  मे  शेर  बनथि,

आ  बाहर  डऽरेँ लंक धरथि ।

मैथिल केँ  भेटल  छल  श्राप,

पर कहिया धरि तकर प्रताप ?

हरेक चीज केर होइतछि अन्त,

की एहि श्रापक नञि अवश्रंस ?

बाट ने ताकू - अओताह  राम,

अपनहि हाथ,  अपन सम्मान ।

मुट्ठी भरि ओहि सजग पूत केर, **

व्यर्थ   ने   जायत   अथक  प्रयास ।

तीन    तिरहुतिया,   तेरह    पाक ।।





* मिथिलाक ओ सपूत लोकनि से मिथिला, मैथिली ओ मैथिलक उत्थान हेतु कोनहु प्रकारक सार्थक प्रयास कएलन्हि वा योगदान देलन्हि – चाहे ओ कोनहु जाति, धर्म वा वर्ग विशेषक होथि । संगहि ओहो सपूत लोकनि जे मैथिल नहिञो रहैत मिथिला आ मैथिलीक विकास मे अपन सार्थक योगदान देलन्हि ।

** ओना नाँव लिखल जाए तँ एहि सपूत लोकनिक संख्या बहुत बुझना जायत पर समस्त मैथिलगण केर संख्याक अनुपात मे ई नाँव सभ मात्र “मुट्ठी भरि” गनल जाएत ।







नञि पत्र एकहु टा लीखल

(गीत)





पहु   गेलाह   परदेश  सखी !

दिन - मास  कतेकहु  बीतल ।

नञि  पत्र  एकहु टा लीखल ।*

नञि  पत्र  एकहु टा लीखल ।।





सगर  पहर  हुनिकहि  छवि  मनमे,

हुनिकहि  पर  जी  टाँगल ।

पर नञि सखि  हुनिका सुधि कनिञो,

हम  छी  केहेन  अभागलि ।

विरह  बेदना  केहेन  सखी,

से  हऽम  एही  बेर  सीखल ।

नञि  पत्र  एकहु टा लीखल ।।





दिन  मे  हुनिकहि  याद  अबैतछि,

राति मे  हुनिकहि सपना ।

कौआ   कुचरय   अहल  भोर  सँ,

तदपि ने  आबथि सजना ।

भेल बसन्त  सखी पतझड़,

नित  नैन   रहैतछि  तीतल ।

नञि  पत्र  एकहु टा लीखल ।।





प्रियतम    जञो    दूरहि    रहताह,

की होयत रहि भरि अङ्गना ?

ककरा     लए     शिंगार    करब,

ककरा लए  पहिरब कङ्गना ?

चान  कठोर  रहैछ  मुदा,

लगइत अछि अतिशय शीतल ।

नञि  पत्र  एकहु टा लीखल ।।





* ई गीत आइ सँ ‍१० - ‍१५ साल पहिनुक सन्दर्भ मे लिखल गेल छल, जखन कि पूरा गाँव या परोपट्टा मे कतहु – कतहु कोनो एक गोट टेलीफोन बूथ होइत छलै । आ ओहि टेलीफोन बूथ पर राति मे अमुक समय सँ अमुक समय धरि STD कॉल केर पाइ आधा, अमुक समय सँ अमुक समय धरि तेहाइ आ अमुक समय सँ अमुक समय धरि चौथाइ पाइ लगैत छलै । एहिना स्थिति मे कनिञा – बहुरिया लोकनि केँ परदेश मे काज कएनिहार अपन - अपन प्रियतम सँ सीधा बात करब सम्भव नञि होइत छलन्हि ।

ओना मोबाइल केर चलती सँ बहुधा आब ई स्थिति नञि अछि तथापि मिथिला मे एखनहु एहि गीतक सन्दर्भ किछु हद तक प्रासंगिक अछि ।




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१.राम वि‍लास साह २. प्रभात राय भट्ट

१.

राम वि‍लास साहु जीक दू दर्जन कवि‍ता-



गंजन- 24



बड़-बड़ गुर गंजन सहैए

मि‍श्री नाओं धड़बैए

पीटि‍-पीटि‍ सोना आगि‍ तपि‍

कसौटी रगड़ि‍ चमकैए

चौदह बरख वन घुमैत

वनबासी जि‍नगी बि‍तबैत

पुरुषोत्तम राम कहबैए

केकरा कहबै सुख-दुख

दुखसँ उपजए सुख

दुखि‍याक सारथी भगवान बनैत

सुखि‍या गंजन सहैत

अज्ञात बास काटैत पाण्डैव

नि‍त हरि‍ दर्शन करैत

सुखि‍याक साथी सभ बनैए

दुखि‍याकेँ ने कोइ

दुखक अंत एक दि‍न होइए

सुखसँ संकट बढ़ैए

बड़-बड़ गुर गंजन सहैए

मि‍श्री नाओं धड़बैए।



कर्मक फल- 23



कर्मक फल अवश्यर मि‍लै छै

जानि‍-बूझि‍ जौं करै छै हानि‍

होइ छै धन जन अभि‍मानक हाि‍न

सभ तरफ होइ छै नकि‍हानि‍

काज नै होइ छै छोट-पैघ

कर्मसँ लोक होइ छै छोट-पैघ

जेहेन सोच ओहेन काज होइ छै

भावनाक संग भाव नदी सन बहै छै

सभकेँ सुख मि‍लए, दुखक अंत होइ छै

कर्ता पुरुषक पूजा सभ करै छै

कर्मसँ भाग्य  बदलै छै

कर्म पूजा कर्म महान

जगतमे होइ छै अमर नाम

सूतल जागलमे फर्क होइ छै

सूतलमे भाग्यफक वि‍नाश होइ छै

जागल पुरुषकेँ नाश नै होइ छै

कर्मक फल अवश्यन मि‍लै छै

जानि‍-बूझि‍ जौं करै छै हानि‍।



प्रेमक बान्ह-- 22



आशा-नि‍राशा भेल पि‍आ

कतेक दि‍न रहब अहाँ परदेश

आँखि‍क नोर बहए दि‍न-राति‍

सबूर बान्हिह‍ जी‍बै छी कहुना

दि‍ल धक्-धक् करैए अहि‍ना

धैर्य टूटि‍ गेल हमर करम फूटि‍ गेल

सोगमे रोग बढ़ि‍ रहैए

तन धधकैए मोन बरसैए

आँखि‍-आँखि‍सँ बहैए नि‍रंतर नोर

कि‍एक तरसाबै छी दि‍ल हमर

छन-छन बि‍तैए जि‍नगी अनमोल

कि‍ राखल छै परदेशमे

आउ मि‍लि‍ रहब अपने घरमे

नारी-पुरुष जि‍नगीक दुपहि‍या छी

दुनू मि‍लि‍ गाड़ी समरूप चलै छै

परि‍वार समाजक ि‍नर्माण होइ छै

देशक प्रगति‍ दि‍न-राति‍ होइ छै

जल्दीपसँ लौटो अपन देश

सभ दि‍न काज नै देत परदेश

कतेक सबूर बान्हाब हम

दि‍लक अरमान सभ चूर भल गेल।

बि‍नु प्रेम जि‍नगी बेकार अछि‍

प्रेमक बान्हन सभ बान्ह सँ मजगुत

नै तोड़ि‍ सकै छै कोनो काल

जहि‍या तक संसार रहत

सुरुज-चान गबाह रहत

प्रेम अवि‍नासी अमर रहत।



जीबैत चलू- 21



जीबैत चलू

खाति‍-पि‍ऐत चलैत रहू

सत्यतक राह पकड़ैत चलू

जि‍नगी अमर नै होइ छै

नीक काज करैत चलू

जीबैत चलू।



कर्म अमर होइ छै

जि‍नगी ओहीले मि‍लै छै

सत्य क बाटपर

ठाेकर बड़ लगै छै

गि‍ड़ैत-पड़ैत चलैत रहू

जीबैत चलू।



जाधरि‍ सांस चलैत रहत

संसारक जाल बढ़ैत रहत

माया ममता दूरसँ रहू

अनकर धनसँ परहेज करू

जीबैत चलू।



जि‍नगी जीबाक लेल नै

नीक काज लेल होइ छै

कर्म-सुकर्म संगै जाइ छै

सभ कि‍छु अहीठाम रहि‍ जाइ छै

कर्मक फल बाटैत चलू

सबहक हीत करैत चलू

कि‍छु करैत चलू

जीबैत चलू।



बि‍सरल गीत- 20



कोइली बैसल

आमक डारि‍पर

झूलि‍-झूलि‍ गाबए

बि‍सरल गीत

सूतलमे जगबए नीन

मधूर गीतक स्वीर सुनि‍

मोन भेल वि‍भोर

बेर-बेर कोइली

सुनबए दुख भरल सनेस

बि‍सरल प्रेमक सि‍नेह

दि‍लक दरद रहि‍-रहि‍ जगए

पि‍आसँ कहि‍या हएत भेँट

बि‍सरल गीत

मौलाएल मोन

सुक्खलल तन

जेना उजरल वन

कहि‍या हरि‍अर हएत

ई प्रेमक बंधन

कोइली सुनबए बेर-बेर

बि‍सरल गीत।



जड़ैत दीप-19



आगि‍सँ आगि‍ जड़ैत

पानि‍सँ मेटैत पि‍आस

दीप जड़ैत आगि‍सँ

हवा दइ छै मुझाए

जड़ैत दीप अपन ज्योैति‍सँ

जगमग करैत जगत

घूरक आगि‍ रसे-रसे सुनगि‍

हवासँ नै मुझाए

जौं मुझाबए हवा घूराकेँ

सुनगि‍ जरबए जगत

आगि‍ नै जानए भेद

सभकेँ जरबए एक्के संग

जीनगी अछि‍ दू-चारि‍ दि‍नक

फेर हएत अनहरि‍या राि‍त

कर्त्तव्यन-धर्मक पालन करैत

पथपर चलू दि‍न-राति‍

चलैत रहू जाधरि‍ अछि‍ जि‍नगी

जहि‍ना दीप जड़ै छै

ताधरि‍ तेल रहै छै बाती संग

अपन जि‍नगीक अनहरि‍यामे

दोसरकेँ राखए इजोरि‍यामे

तहि‍ना मानव, मानव लेल

उपकार करैत जड़ैत रहू

जाधरि‍ लहू अछि‍ अहाँ संगे।



गामक नारी-18



मन्द –मन्द  हवा सि‍हकए

फूलक पंखुरी झरि‍-झरि‍ गि‍रए

छने-छन मौसम बदलए

कखनो रौद कखनो छाह पड़ए

बि‍नु वसन्त़ बहार बनए

खेतक आड़ि‍पर गामक नारी

कन्याँड-बहुरि‍आ नवतुरि‍आ

फाँढ़ बान्हिय‍ खेतमे काज करए

भूलल-बि‍सरल सोहर-समदौन

बि‍रहा-वि‍देशि‍या गीत गाबए

बाट-बटोही सुनि‍-सुनि‍

बाट भूलि‍ लजाइ छलै

कहैत बाट चलैत छलै

गामक नारी-

देशक छी हि‍तकारी

देशक ि‍नर्माणमे

करैत अछि‍ साझेदारी।



पि‍यासल धरती-17



पि‍यासल धरती तड़सि‍ रहल अछि‍

काल-कोठरीमे छि‍पल बदरि‍या

धरती सूखि‍ दड़ारि‍ पड़ल अछि‍

सूखि‍ दुबैक कमजोर पड़ल अछि‍

गरमीसँ हाहाकार मचैए

चि‍ड़ै-चुनमुल मुँह खोलि‍ बैसल अछि‍

घास-पात सूखि‍ जड़ैत अछि‍

चास जड़ैक देखि खेति‍हर

माथपर हाथ लऽ सोचि‍ रहल अछि‍

पानि‍-बि‍नु जि‍नगी तड़पि‍ रहल अछि‍

माल-जाल भटकि‍ मरि‍ रहल अछि‍

पोखरि‍-झाखरि‍ डबरा-नदी सूखि‍ रहल अछि‍

नाओं-नि‍शान मि‍ट रहल अछि‍

सूखि‍-सूखि‍ धरती फाटि‍ रहल अछि‍

पि‍आसल धरती तड़सि‍ रहल अछि‍

ि‍नर्दय छल मेघ मुदा दयावान भेल

गरजैत-बरसैत कारीमेघ ऊमरल

पानि‍ बरि‍सल घन-घोर

भाटल दरारि‍सँ-

बेंगक बरि‍याती सजि‍ नि‍कलि‍ पड़ल

सभरंगा गीत उछलि‍-कुदि गाबए लगल

कारी मेघ झुमि‍-झुमि‍ बरसि‍ रहल अछि‍

धरतीक पि‍आस मरि‍ रहल अछि‍

धरतीक पि‍आस मरि‍ रहल अछि‍।



चि‍ंता-चि‍ता-16



आगि‍ जड़ैत सभ देखै छै

दि‍ल जड़ैत ने देखै कोइ

चि‍ंता-चि‍तामे अन्तछर छै

चि‍तापर मरल जड़ै छै

चि‍ंतामे जीवि‍ते जड़ै छै

समुद्र उधि‍याइत सभ देखै छै

दि‍ल उधि‍याइत ने देखै कोइ

लकड़ी जड़ि‍ कोइला बनै छै

कोइलामे हीरा खोजै छै

चि‍ता जड़ि‍ सदगति‍ मि‍लै छै

चि‍ंतामे जड़ि‍ मणी खोजे छै

बि‍नु चि‍ंता नै दुनि‍याँ चलै छै

चि‍ंतामे लोक सभ दि‍न जड़ै छै

चि‍तामे अन्त  होइ छै

चि‍ंता सभ जीबैत करै छै

चि‍तापर मरल चढ़ै छै

आगि‍ जड़ैत सभ देखै छै

दि‍ल जड़ैत ने देखैत कोइ।



मातृभूमि-15



हमर मातृभूमि‍

जानसँ अछि‍ प्याेरी

खूनसँ भीजल धरती

पवि‍त्र भूमि‍ सजल वन

उजाड़ि‍ वॉटै छी क्यासरी

हमर मातृभूमि‍

धन सम्पृति‍सँ भरल-पड़ल

नीत दि‍न सोना उगलैए

खाए-पीब कऽ फूलै-फड़ै छी

हम सभ मि‍लि‍ ओकरे वि‍नास करै छी

हमर मातृभूमि‍

जानसँ अछि प्या री

नि‍वारण नै उजाड़न छी

वि‍नासक कारण हम सभ छी

अपन मातृभूमि‍केँ

अपनेसँ वि‍गाड़ै छी

ि‍नर्मल भूमि‍ हवा-पानि‍

प्रकृति‍क रचनाकेँ बि‍गाड़ै छी

मातृभूमि‍ बचेबाक लेल

अपन भूमि‍केँ रक्षा-सुरक्षाक

नि‍त्यू करू तैयारी बनू पूजारी

हमर मातृभूमि‍

जानसँ अछि‍ प्यायरी।



मि‍थि‍लाक अभि‍नंदन-14



नीत भोरे सुरुज करए

मि‍थि‍लाकेँ अभि‍नंदन

साँझ करै छै तरेगन-चान

भरि‍ राति‍ जगि‍-जगि‍

भगजोगि‍नी करै अभि‍नंदन

मि‍थि‍लाक भूमि‍ महान

माटि‍-पानि‍ अमृत समान

भोरे पूर्बा साँझ पछि‍या

करै छै मि‍थि‍लाक अभि‍नंदन

मिथि‍ला सन पावन धरती

नै छैक दुनि‍यामे आनो ठाम

डेग-डेगपर पानि‍क खान

पोखरि‍-झाखरि‍ नदी छै अम्बानर

कोसी-कमला-ति‍लयुगा

गंडक-बागमती-भूतही-बलान

गाम-गाम अछि‍ दलान

अन्न-जल-फलसँ भरल

घर-घरमे अति‍थि‍ मेहमान

स्वािगत होइ छै देवता समान

तीनू लोकमे होइ छै गुणगान

मि‍थि‍ला अछि‍ महान

रंग-बि‍रंगक फूलपर

भौंरा करै छै गुणगान

बगि‍या-बगि‍या कोइली कुहकैए

मोड़-पपि‍हा-मेना-बुलबुल

कुदकि‍-चहकि‍ सुनबए मि‍ठि‍ बोल

सभ नीत-दि‍न सुति‍-उठि

माथपर लगबैए माटि‍क चंदन

मि‍थि‍लाकेँ करैए वंदन

मि‍थि‍लाकेँ अभि‍नंदन।



ई की केलौं अहाँ-13



ई की केलौं अहाँ?

अपन रहि‍तो वि‍रान भेलौं अहाँ

जीबैत छलौं जि‍नगी जड़ा देलौं अहाँ

ई की केलौं अहाँ?

नामी छलौं वदनाम केलौं अहाँ

गम भुलबै खाति‍र छि‍प-छि‍प मि‍लै छलौं अहाँ

ई की केलौं अहाँ?

ई हालति‍ हमर कि‍अए केलौं अहाँ

जीबतेमे हमरा जड़ा देलौं अहाँ

ई की केलौं अहाँ?

दि‍लक दर्पणमे झाकि‍-झाकि‍ देखू अहाँ

हम कण-कणमे समाएल छी लहू जेना

ई की केलौं अहाँ?

शोक सागरमे डुमल छलौं कहुना

नागीन बनि‍ हमरा कटलौं केना

ई की केलौं अहाँ?

खूब सुरत हसीन पड़ी जेना

मुसुकराइत हँसै छी गुलाबक कली जेना

मुर्दा आँखि‍ खोलि‍ ताकए जकोर जेना

ई की केलौं अहां?



केकरा संग खेलब होरी-12



बाट तकैत भरि‍-भरि‍ राति‍ जगैत

ऑंखि‍या भेल लाले-लाल

कतेक पतझर बीतल

कतेको आएल वसन्तभ-बहार

सभ सखी-सहेली मि‍लि‍

फगुआ गाबए खुशी मनाबए

पि‍आ संग खेलै होरी

हमर पि‍आ परदेसि‍या

केकरा संग खेलब होरी

सभ मि‍लि‍ रंग-अबि‍र उड़ाबए

हमरा कहि‍-कहि‍ लजाबए

केना भीजलो तोहर चोली

ननदि‍-लजाबए देवरा सताबए

केकरा संग खेलब होरी

नैना-भुटुका टोली बनि‍

मि‍ठगर बोलीसँ गाबए होरी

रंगक पि‍चकारीसँ रंग बरसाबए

जहि‍ना खेलैए

राधा-संग अन्हैसया होरी

राम-लखन खेलै

अवधमे होरी

ढोल-मजीरा ढाक डफली

पि‍ट-पि‍ट गाबए होरी

रंग-अबि‍र गुलाल उड़बैत

सभ मि‍ल खेलए होरी

रंग-वरसै मोन तड़सै

ऑंखि‍या भेल लाल-लाल

कहि‍या आएत परदेसि‍या

मि‍लि‍ संगे खेलब होरी

बि‍नु पि‍या तड़सै छी हम

केकरा संग खोलब होरी।



गाए-माए-11



गाएकेँ माय सभ कहै छै

मुदा पोसै छै ने सभ कोइ

जे पोसै छै गाए

हुनके हक छै कहत माय

बि‍नु श्रम कर्म नै होइ छै

ने श्रम कर्मक फल मि‍लै छै

सुनल-सुनाएल सभ कहै छै

जि‍नगीमे गाएक गुण नै जनै छै

मरलामे वेतरनी पार करै छै

गोदानक चर्च पुराणोमे कएल छै

गाए पोसब तखन सुख भेटत

जि‍बैतमे दूध-भात भेटत।

नै पोसब गाए तँ

मरलापर दूध-भात केना भेटत

सभ लोकनि‍ सोचैत रहै छै

बि‍नु धरती महल बनबै छै

गाएकेँ माए सभ नै बुझै छै

मुदा माएकेँ माए सभ कहै छै

गाए नै पोसै छै सभ कोइ।

जि‍नगीक जीवन पथमे

गाएक गुण नै जनै छै

मुदा मरलापर गाए संगे

वेतरनी पार स्वथर्ग पहुँचै छै

जि‍बैतमे गाए-माएकेँ

दूध सभ पि‍ऐ छै

नरकसँ सोझे स्वतर्ग पहुँचै छै

गाएक जरूरी सभ नै बुझै छै

दूधक लेल मारा-मारी करै छै

मरलापर गोदान करै छै।



खेति‍हरक जि‍नगी-10



भुरुकवा ऊगल

सूतल पड़ल छलौं

मोन कछमछाइत छल

उठि‍ मोन मारि‍ कहुना

बाल-बच्चाो मि‍लि‍

खेतपर गेलौं

काज करैत घाम बहए

भूखसँ टौआइत छलौं

खेतक आड़ि‍ बैस‍ मि‍लि‍

सूखल रोटी-नून-तेल

चटनी मि‍रचाइ खेलौं

पानि‍ पीब काजमे भीरलौं

खेतक काज करैत

देहक हड्डी-पसरी धसि‍

सूखि‍ कारी बनि‍ गेल

भरि‍ पेट खेनाइ नै भेल

कतेको पीढ़ि‍ बीति‍ गेल

नीक वस्त्रि नीक घर

कहि‍यो नसीव नै भेल

कहि‍यो रौदी कहि‍यो बाढ़ि‍ भेल

उपजा जरि‍-भसि‍या गेल

खाद-पानि‍ महग भेल

खेतक उपजा जन-मजदूरीमे चलि‍ गेल

सालक भरि‍ बाल-बच्चाल

की खाएत केना जीअत

माथपर हाथ धरि‍

सोक-सागरमे डूमि‍ गेल

बाप-दादा अही सोचमे

कर्जा लादि‍ मरि‍ गेल

दुख दबाइ बेटी बि‍आहमे

कि‍ताक-कि‍ताक खेत बि‍क गेल

माथपर चोट मारैत बाजल-

खेत कि‍ देहक लहू बि‍क गेल

जीब कऽ की करब

केकरा मुँह देखाएब

के सरण-भरण करत

आत्मरदाह करनाइ नीक रहत

खेत उपजा कऽ की करब

नै अनक दाम नै जि‍नगीमे अराम

बजारक समानक दाम

पहुँचि‍ गेल असमान

केना बँचत खेति‍हरक प्राण।



ज्ञानक दीप-9



अन्ह रि‍या राति‍

इजोतक नै कोनो उपाइ

सोचै छलौं केना भागत

ई अन्हलरि‍या राति‍

सोचैत मोनमे फुराएल

एक उपाइ अछि‍ बचल

दीप जरेलौं तखन

कि‍छु अन्हा र भागल-पड़ाएल

मुदा सोचलौं ई अन्हहरि‍या

बेर-बेर होइत रहत

कहि‍यो इजोरि‍या तँ

कहि‍यो अन्हिरि‍या

ऐ दीपसँ

केना हएत मनुक्खअक प्रकाश

मनुखकेँ अछि‍

ज्ञान-रूपी प्रकाशक अभाव

जखन मनुख बनत ज्ञानी

तँ अभि‍मानी अन्हाभर दूर भागत

दीपक अन्हानर भगौलासँ

नै काज चलत दुनि‍याकेँ

ज्ञानरूपी प्रकाश अछि‍ जरूरी

जइसँ दुनि‍या जग-मग हएत

ज्ञानक दीप जरौलासँ

कहि‍यो अन्हिरि‍या नै हएत।



दुखाएल गंगा-8



सभ साधु गंगा नहाइ छै

कतेक पाप जि‍नगीमे केने छै

जखन गंगा

पापीक पाप धोइ छै

सभक तन-मन शुद्ध करै छै

तँ अपने गंगा कि‍एक गंगा रहै छै

गंगा साधुकेँ शुद्ध करै छै

की साधु गंगाकेँ शुद्ध करै छै

की पापी पापकेँ गंगामे धोइ छै

तँ गंगा एतेक पाप कतए रखै छै

स्वगर्गक गंगा धरतीपर बहै छै

पापीक पाप धोइत गंगा

पापक मोटरी कतए रखै छै

गंगा पापीकेँ

तन-कंचन मोन ि‍नर्मल करै छै

सभक कल्याकण उपकार करै छै

उल्टेल सभ गंगाकेँ दुख दइ छै

कि‍एक गंगा एतेक दुख सहै छै

नै कोइ गंगाक हीत सोचै छै

जि‍बैत गंगा मरैत गंगा

पाप उघैत बदनाम होइ छै

पाप नै पापी देखि‍ गंगा

धरती छोड़ि‍ पड़ाएल फि‍ड़ै छै

स्वीर्गसँ धरतीपर आबि‍ गंगा

दुबकि‍ दि‍न-राति‍ पचताइत रहै छै

कतेक पापी धरतीपर बसै छै

असगरे गंगा पाप धोइ छै

पापीक पापीसँ

दबि‍-दबि‍ गंगा मरि‍ रहल छै

गंगाक दुख कोइ नै बूझै छै

अपने दुखसँ दुखाएल गंगा

सागरमे डूमि‍-डूमि‍ मरै छै।



बेंगक बरि‍याती-7



असाढ़क मास

उम्माकस भड़ल दि‍न

अमरस खाए-पीब

खोपड़ीमे सूतल

पसि‍नासँ देह भि‍जल

नि‍न्न टूटि‍ गेल

भंडार कोणसँ

ढनढनाइत मेघ

बि‍जुरी चमकैत

घनघोर बरसैत

जड़ल धरतीकेँ

प्या स मुझबए लगल

अद्रा नक्षत्रमे

खन्ता –डबरा-पोखरि‍

झम-झम बरखासँ

भड़ए लगल

भड़ल पानि‍मे

बेंगक बरि‍याती

सजए लगल

उछलि‍-कूदि

ढौसा चि‍तकबरा

पि‍अरका-मलि‍छाहा

सुरुकुनि‍याँ काटि‍-काटि‍

बरि‍याति‍क भीड़

जुटए लगल‍

घोघ फलकाबैत

एक्के स्वैरमे

टर्टराइत ढोढि‍याइत

हजारक-हजार

अनघौल करैत

कि‍छु गीत गाबए

कि‍छु पानि‍मे डूमि‍

नकसक-नकसक करए

कि‍छु एक-दोसरापर सबार भऽ

ऐपार-सँ-ओइपार करैत

सबल-ि‍नर्वलकेँ

सभ मि‍लि‍ सहयोग करए

बेंगक जाति‍मे

कोनो भेदि‍ नै

अपन संगठनकेँ

मजगूत बनौने

एकताक परि‍चए दैत रहल

बरखाक बुन्न

पड़ैत रहल

शीतल हवा बहति‍ रहल

बेंगक बरि‍याती

सजैत रहल।



बलानक बाढ़ि‍-6



बलानक बाढ़ि‍

ढल-पर-ढल बजरैत

सनसनाइत उधि‍याइत

पसरि‍ गेल बाढ़ि‍क पानि‍

हि‍म्मत हारि‍ लोक

करए लगल गुहारि‍

बलानकेँ नै आएल

कोनो दया-माया

गौरवसँ कहलक

चारि मास तक

रहत हमर राज

नै चलए देब हम

अहाँ सबहक राज-काज

जखन हमर

बाढ़ि‍क भूत सबार रहत

ऐपारक लोक अही पार रहत

ओइपारक लोक ओहीपार रहत

जे हमरा बीच आएत

ओ हमरे पेटमे समाएत

कोस भरि‍क पेट हमर

केना भरत

कलम-गाछी चास-बास

खाएब लेब साँस

पोखरि‍-खत्ता  डबरा

बालुसँ भरि‍ बनाएब हम भीठ

कहबी छै जे आएल बलान तँ

बान्हछलक दलान

गेल बलान तँ उजरल दलान

कहबी साँच-छूठ सेहो होइ छै

मुदा बलान जि‍नगीकेँ

तहस-नहस कऽ दइ छै

उपजाऊ खेतकेँ

बालुसँ भरि‍ भीन्डाै बना दइ छै

अन्नक बदला बलान

बालु फॅकबै छै

बलानक बाढ़ि‍

ठहुनि‍ये पानि‍मे

गरगोटि‍या दइ छै

वि‍कास नै हुअए दइ छै

वि‍नाष करै छै

गाम-घरकेँ उजाड़ि‍

जि‍नगी तबाह करै छै

बलानक बाढ़ि‍।



पानि‍क बून्न-5



बून्न-बून्न पानि‍क

खगता सभकेँ पड़ै छै

बून्न-बून्नसँ घैला भरै छै

पोखरि‍-इनार भरि‍

झील-झरना-नदी भरै छै

धारा मि‍लि‍ समुद्र भरै छै

सबहक पि‍आस मेटाइ छै

दुनि‍याँ जी‍बै छै

सुखाएल धरतीकेँ सि‍ंचै छै

सभ मि‍लि‍ पानि‍क उपयोग करै छै

दुरूपयोग सेहो होइ छै

ओ दि‍न दूर नै छै

पानि‍क बून्न लेल

तरसि‍-तरसि‍ मरैत

धरती धधकि‍ जीव जरि‍ते

दुनि‍याकेँ बचेबाक लेल

बूने-बून पानि‍क करए पड़त

नै तँ जि‍नगी क्षनो भरि‍ नै चलत।



हेराएल भगवान-4



मोन घबराएल छल

चैन छि‍नाएल सन

कच्छछ-मछ करैत

मोनमे फुराएल

सुख-शांति‍ लेल

भगवानसँ मि‍लब

अपन दुखरा सुनाएब

जे सुख-शांति‍ लेल

कोनो उपाय बताएत

जइसँ कल्याबण हएत

मंदि‍रे-मंदि‍र घूमि‍-घूमि

पूजा-वि‍नती बहुत केलौं

मस्जिक‍त-गुरुद्वारामे

माथा टेकि‍लौं

गि‍रजाघरमे प्रार्थना केलौं

मुदा हेराएल भगवान

कतौं नै भेटल

मोनक अशांति‍ नै मेटल

मोनमे वि‍चारि‍

गहबरे-गहबर मंसा केलौं

साधु-संतक सेवा करैत

वन-जंगल घूमि‍-घूमि‍

तीर्थाटन यात्रा केलाैं

तन-मनक सुद्धि‍ लेल

गंगामे नहेलौं

देहक मलि‍ जरूर छुटि‍ गेल

मुदा मोनक मलि‍ नै गेल

बैचैनी बढ़ि‍ गेल

तखन ज्ञान भेल

सबहक दि‍लमे

भगवान बसैए

कण-कणमे रमैए

अपन मोन-मंदि‍रमे ताकि‍ तकलौं

हेराएल भगवानकेँ देखलौं

सुख-शांति‍क वरदान पेलौं।



जीबए लेल-3



जीबए लेल

दुखक नोर

पीबए पड़ै छै

बि‍नु अरमान

जीबए पड़ै छै

दुखक भार

जि‍नगी भरि‍

सहए पड़ै छै

जि‍नगी मि‍लै छै

दुखक सहए लेल

बि‍नु दुख

सुख नै मि‍लै छै

कि‍छु करबाक लेल

जि‍नगी जीबए पड़ै छै

जीबए लेल

दुखक नोर

पीबि‍ कऽ जीबए पड़ै छै

संसार सुन्दलर नै

दुखक सागर छै

अमर नै नाश्व र छै

काँट भरल बाट

मोड़े-मोड़पर

त्रि‍शुल गाड़ल छै

कर्मसँ काँट

फूल बनै छै

सभ दुख

सुख बनि‍ जाइ छै

दुख सहि‍-सहि‍

जहि‍ना कि‍चरमे

कमल फुलै छै

जीबए लेल

कि‍छु करए पड़ै छै

बि‍नु कर्म

जीवन सफल नै होइ छै

जीबए लेल

दुखक नोर पीबि‍-पीबि‍ कऽ

जीबए पड़ै छै।



चैताबर गीत-2



लाले रंग चुनरी

रंगेबै हो रामा

चैतक महि‍नमा ना

गोरे-गोर हाथमे

मेंहदी लगेबै

सजनाकेँ तड़सेबै ना

हो रामा चैतक महि‍नमा ना

लाल रंग फूलसँ

सजि‍या सजेबै

मीठ-मीठ बात सजनासँ कहबै

हो रमा चैतक महि‍नमा ना

आमक बगि‍यामे

बैसल कोयलि‍या

पि‍याकेँ बजबै ना

हमरा तड़साबै ना

हो रामा चैतक महि‍नमा ना

चमेली फुलबासँ गजरा बनेबै

कारी-कारी केसि‍याकेँ सजेबै

पि‍याकेँ ललचेबै ना

हो राम चैतक महि‍नमा ना।



चैती गीत-1



भोर भेलै हे सखी

भि‍नसरबा भेले हे

कनी चलू ने बगि‍या

कोयलि‍या बजै हे

हे सखी चैतक महि‍ना हे

आमक गाछीमे

झुलबा झुलबै

पि‍या केर संगे हे

हे सखी चैतक महि‍ना हे

कारी-कारी केसि‍या

डॉरपर लटकै

पूर्वा-पछि‍यामे फुलकै

मीठ-मीठ गीत पि‍याकेँ सुनेबै हे

हे सखी चैतक महि‍ना हे

पि‍अर साड़ी लाल चोली

लाले चुनरि‍या हे

चढ़ल यौवन मसकै चोली

रहि‍-रहि‍ वि‍हुँसै हे

हे सखी चैतक महि‍ना हे।





प्रभात राय भट्ट


परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ
मिथिला के हम बेट्टी छि मैथिलि हमर नाम यौ
जनक हमर पिता छथि जनकपुर हमर गाम यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिला के हम बेट्टा ची मिथिलेश हमर नाम यौ
मिथिला के हम वासी छि जनकपुर हमर गाम यौ
ऋषि महर्षि केर कर्मभूमि अछि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिलाक मैट सं अवतरित भेल्हीं सीता जिनकर नाम यौ
उगना बनी महादेव एलाह पाहून बनी कय राम यौ
धन्य धन्य अछि मिथिलाधाम,मिथिलाधाम जगमे महान यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

हिमगिरी के कोख सं ससरल कमला कोशी बल्हान यौ
मिथिला के शान बढौलन मंडन,कुमारिल,वाचस्पति विद्द्वान यौ
हमर जन्मभूमि कर्मभूमि स्वर्गभूमि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

कपिल कणाद गौतम अछि मिथिलाक शान यौ
विद्यापति के बाते अनमोल ओ छथि मिथिलाक पहिचान यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

२.
प्राचीन मिथिला
मिथिला के मिथिलेश्वर महादेव हम की कहू यौ
स्वम अहाँ छि अन्तरयामी अहाँ सभटा जनैतछी यौ
बसुधाक हृदय छल हमर महान मिथिला
इ हमही नै शाश्त्र पुराण कहैय यौ

मिथिलाक जन जन छलाह जनक एही ठाम
ताहि लेल नाम पडल जनकपुर धाम
राजा जनक छलाह राजर्षि जनकपुरधाम में
सीता अवतरित भेलन्हि मिथिले गाम में

मिथिलाक पाहून बनी ऐलाह चारो भाई राम
विद्यापती के चाकर बनलाह उगना एहि ठाम
चारो दिस अहिं छि महादेव जनकपुर के द्वारपाल
पुव दिस मिथिलेश्वरनाथ पश्चिम जलेश्वरनाथ

उत्तर दिस टूटेश्वरनाथ दक्षिण कलानेश्वरनाथ
किनहू भs सकय मिथिलाक प्राणी अनाथ
इ ध्रुव सत्य अछि प्राचीन मिथिलाक परिभाषा
एखुनो अछि एहन सुन्दर मिथिलाक अभिलाषा


गीत
सुन सुन रे सुन पवन पुरबैया
की लेने चल हमरो अप्पन गाम
हमर जन्मभूमि वहि ठाम
जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२
देश विदेश परदेश घुमलौं
मोन केर भेटल नहीं आराम
साग रोटी खैब रहब अप्पने गाम
जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२
घर घर में छन्हि बहिन सीता
राजर्षि जनक सन पिता
सभ केर पाहून छथि राम
जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२
काशी घुमलौं मथुरा घुमलौं
घुमलौं मका मदीना
सभ सँ पैघ विद्यापति केर गाम
जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२
हिमगिरी कोख सँ बहैय कमला कोशी बल्हान
तिरभुक्ति तिरहुत छै जग में महान
दूधमति सँ दूध बहैय छै वैदेहीक गाम
जतय छै सुन्दर मिथिलाधाम //२


गजल
मिथिलाक पाहून भगवान श्रीराम छै
जग में सब सं सुन्दर मिथिलाधाम छै
मिथिलाक मईट सं अवतरित सीता
जग में सब सं सुन्दर हुनक नाम छै
मिथिलाक शान बढौलन महा विद्द्वान
कवी कोकिल विद्यापति हुनक नाम छै
भS जाएत अछि सम्पूर्ण पाप तिरोहित
मिथिला एकटा पतित पावन धाम छै
भेटत नै एहन अनुपम अनुराग
प्रेम परागक कस्तूरी मिथिलाधाम छै
घुमु अमेरिका अफ्रीका लन्दन जापान
जग में नै कोनो दोसर मिथिलाधाम छै
मिथिला महातम एकबेर पढ़ी जनु
मिथिला सं पैघ नै कोनो दोसर धाम छै
जतय भेटत कमला कोशी बलहान
अयाचिक दलान,वही मिथिलाधाम छै
गौतम कपिल कणाद मंडन महान
प्रखर विद्द्वान सभक मिथिलाधाम छै
ऋषि मुनि तपश्वी तपोभूमि अहिठाम छै
"प्रभात"क गाम महान मिथिलाधाम छै
.............वर्ण:-१५...........

गीत

बसु दरभंगा मधुवनी चाहे जनकपुर
हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर
बसु बिराटनगर राजविराज चाहे लहान
हम सभ मिथिलावासी हमर मिथिला महान

बसु सीतामढ़ी शिवहर चाहे मुजफरपुर
हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर
घर आंगनमे बहैय हमरा कमला कोशी बल्हान
भाईचारा प्रेम देखैला चालू अयाचिक दलान

राजर्षि जनक आँगन अवतरित भेल्हीं जनकदुलारी
मिथिला केर पाहून बनलाह राम लखन धनुषधारी
बसु मलंगवा जलेश्वर चाहे समस्तीपुर
हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर

मिथिलाक गौरव मंडन कपिल कणाद वाचस्पति
जन जन केर आत्मा छथि कवी कोकिल विधापति
बसु अररिया खगड़िया चाहे भागलपुर
हम सभ छि मिथिलावासी रहू जतय दूर

बसु सहरसा सुपौल मधेपुरा चाहे पूर्णिया
सम सभ छि मिथिलावासी जनै समूचा दुनिया
बसु नेपाल बिहार मुंगेर कटिहार चाहे बेगुसराय
हम सभ छि मिथिलावासी कियो नहि पराय


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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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