Saturday, April 14, 2012

'विदेह' १०३ म अंक ०१ अप्रैल २०१२ (वर्ष ५ मास ५२ अंक १०३) PART_ 3


३. पद्य
३.१.१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू’’ २.स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर ३.श्यामल सुमन



३.२.१.ओमप्रकाश झा २.कमल मोहन चुन्नू ३.प्रेमचन्द्र पंकज ४.रुबी झा



३.३.१.अमित मिश्र २.मिहिर झा ३.उमेश पासवान



३.४.१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.अनिल मल्लिक ३.कुसुम ठाकुर





३.५.१.चंदन कुमार झा २.पवन कुमार साह



३.६.१. आनन्द कुमार झा २.निशान्त झा





३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर



३.८.१.राम वि‍लास साह २. प्रभात राय भट्ट
१.शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू.’ २.स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर ३.श्यामल सुमन



१.

शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्लू‍’

कवि‍ता-



सगर राति‍ दीप जरय-



राति‍ माने कारी पहर

गत्र-गत्र शांत

जीव अजीव आक्रांत

रजनीक लीलासँ

क्षणि‍क बचबाक लेल

लोक जरबैछ दीप

सभ्यजताक वि‍कासक संग-संग

मनुक्खब चेतनशील होइत गेल

पहि‍ने इजोतक लेल...

खर-पुआर जारनि‍

लत्ता नूआ फट्टा

सूत छोड़ि‍ रूइयाक बाती

ढि‍बड़ीक बदला लेम्पा

बहकैत रोशनीमे गबैत पराती

बुि‍धक वि‍कास भेल...

वि‍द्युत तरंगमे

गैसक उमंगमे

वि‍ज्ञानक जय भऽ गेल...

सभ ठाम इजोत

मुदा! वैदेहीक घर अन्हा.र

मात्र लि‍खते रहब

ककरोसँ नै कहब

के बूझत कथाक वि‍कास

ककरो नै छल आभास

दधीचि‍ बनि‍ साङह लेने

आबि‍ गेलनि‍

मैथि‍ली कथा जगतमे प्रभास

सुरुज दि‍न भरि‍ अपन

करेजकेँ जड़ा कऽ

नै मेटा सकल

ऐ वसुन्धसरापर सँ

वि‍गलि‍त मानुषक प्रवृत्ति

प्रभास दीप बारि‍

अपन करूआरि‍ सम्हाुरि‍

कथा सागरक जमल तरंगमे

दि‍अ लगलनि‍ हि‍लकोर...

समाज जागत- ई छल वि‍श्वास

मुदा नै आदि‍ भेटलनि‍

नै भेटलनि‍ छोर...

कि‍नछेरि‍पर अपस्यिि‍ात

कथाकार लऽ लेलनि‍ ि‍नर्वाण

जागरणक आशामे

कहि‍यो तँ सुखतनि‍

वैदेहीक झहरैत नोर...

चलि‍ गेला अभि‍लाषा लेने

उत्तराधि‍कारी सभ खेलाइत छथि‍

अट्ठा बज्जरर करि‍या-झुम्मूरि‍

उद्यत छथि‍ अधि‍कार हरबाक लेल

पाग पहि‍रबाक लेल

सगर राति‍ दीप जरय...

रमण-वि‍भूति‍ गेरुआ

गर लगौने छथि‍

महेन्द्र  मसनद पजि‍औने छथि‍

समालोचक- उद्घोषक सूतय

मात्र वाचक मंच चि‍करय...

कहैत छथि‍ बुढ़ छी

तखन गोष्ठी मे आबि‍

नाटक करबाक कोन प्रयोजन?

दीप बारि‍ दुआरि‍ नै जराउ

जे जगदीश जागल रहत

ओकर गामक जि‍नगी के सुनत?

ओ अछि‍ समाजक कात

कहि‍यो होमए देब

ओकर साहि‍त्य  साधनाक प्रभात

कि‍एक तँ ओ थि‍क वेमात्र

जइ माटि‍क अन्हाारकेँ

सुरुज नै हटा सकल

ओ केना हटत माटि‍क दीपक बल...?

जौं दृष्टि ‍कोणमे रहत छल

तँ वि‍वेक केना ि‍नर्मल?

ओइ कठकोंकारि‍ सबहक बीच

मैथि‍ली छथि‍ दुबकल

सगर राति‍ दीप जरय

अन्हाार घर संस्कारर सड़य

कथासँ केना पारस ि‍नकसय...?





स्व. लल्लन प्रसाद ठाकुर



"हे रे चन्दा"

हे रे चन्दा लेने जो सनेस पिया परदेश रे.........
.चन्दा....।

तोहें ने उगै छ आन्हर राति
बिसरल रहै छी पिया केर पांति
तोंहे जाँ उगै छ दीया बाती दीया बाती
होइये मोन मे कलेश रे ..........
.चन्दा...... ।

हम्मर दुःख केयो ने बुझैया
कोना ओ रहै छथि केयो ने कहैया
कहियौन्ह विकल छैन्ह हुनकर दासी हुनकर दासी
रुसल किए छथि महेश रे ...........
चन्दा....... ।

पांति हुनके आजु गाबय छी
छवि में हुनके लीन रहय छी
धैर्य नहि आब बसल उदासी बसल उदासी
नहि अछि कोनो उदेश रे..............
.चन्दा रे..........

बहुत जतन सँ ह्रदय के बुझेलहुं
नहि दोसर के हम किछु कहलहुं
आस बनल अछि नहि हम बिसरि नहि हम बिसरि
चाहि एतबहि, नय किछुओ बिशेष रे.......
..चन्दा

जहिया मँगलहुं एतबे मँगलहुं
सँग रही बस एतबे चाहलहुं
जनम भरक दुःख कही केकरा सँ कही केकरा सँ
गेलैथ ओ एहेन बिदेश रे..................
.चन्दा




श्यामल सुमन

गजल



लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ
अप्पन अप्पन काज बिसरलहुँ
सच पूछू तऽ लाज बिसरलहुँ

सिखलहुँ लूरि जीबय के जतय
कियै ओहेन समाज बिसरलहुँ

छूटल अरिपन, सोहर सब किछु
लागल एहेन रिवाज बिसरलहुँ

सासुर मे छल खूब रईसी
घर मे नखरा-नाज बिसरलहुँ

मन गाबय छल गीत मिलन के
सुर के सँग मे साज बिसरलहुँ

संस्कार के बात करी नित
जीबय के अन्दाज बिसरलहुँ

हम छी राजा, बाकी परजा
मुदा सुमन के ताज बिसरलहुँ





ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी
बहुत दूर, पर गाम देखय छी
भेल बहुत बदनाम देखय छी

काली-पूजा, फगुआ छूटल
दारू के परिणाम देखय छी

बापक कान्ह कोदारि सदरिखन
बेटा केर आराम देखय छी

कष्ट झुकय मे नवतुरिया केँ
ठेहुन छुबि प्रणाम देखय छी

अपनापन के बात निपत्ता
घर घर मे संग्राम देखय छी

धन के अर्जन घूसखोरी सँ
हुनके बड़का नाम देखय छी

सुमन सुधारक आशा टूटल
तखनहि केवल राम देखय छी



व्यर्थक बात करय छी

कियै अहाँ कहलहुँ, अहीं लऽ मरय छी।

अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।



आस लगेलहुँ, रूप सजेलहुँ, लेकिन तखनहुँ अहाँ नहि एलेहुँ।

काज करय में दिन कटैया, कुहरि कुहरिकय राति बितेलहुँ।

पेटक कारण, अहाँ बिनु साजन, जहिना तहिना रहय छी।

अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।



सब सखियन के साजन आयल, सभहक घर मे बाजय पायल।

ओढ़ि लेने छी हँसी मुँह पर, लेकिन भीतर सँ छी घायल।

विरहन के दुख, लोक बुझत की, तरे तर जरय छी।

अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।



पीड़ा मन के, बिनु बन्धन के, ककरा कहबय दुख जीवन के।

किछु नय किछु मजबूरी सबके, ताकू अवसर सुमन मिलन के।

आँखिक नोर सूखल पर भीतर नोरक संग बहय छी।

अहाँ, व्यर्थक बात करय छी।।



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.ओमप्रकाश झा २.कमल मोहन चुन्नू ३.प्रेमचन्द्र पंकज ४.रुबी झा

१.

ओमप्रकाश झा




गजल



मोनक आस सदिखन बनि कऽ टूटैत अछि।

किछु एना कऽ जिनगी हमर बीतैत अछि।



मेघक घेर मे भेलै सुरूजो मलिन,

ऐ पर खुश भऽ देखू मेघ गरजैत अछि।



हम कोना कऽ बिसरब मधुर मिलनक घडी,

रहि-रहि यादि आबै, मोन तडपैत अछि।



देखै छी कते प्रलाप बिन मतलबक,

चुप अछि ठोढ, बाजै लेल कुहरैत अछि।



मुट्ठी मे धरै छी आगि दिन-राति हम,

जिद मे अपन, "ओम"क हाथ झरकैत अछि।

(बहरे-कबीर)





जीनाइ भेलै महँग, एतय मरब सस्त छै।

महँगीक चाँगुर गडल, जेबी सभक पस्त छै।



जनता ढुकै भाँड मे, चिन्ता चुनावक बनल,

मुर्दा बनल लोक, नेता सब कते मस्त छै।



किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर,

बेमार छै टोल, लागै पीलिया ग्रस्त छै।



खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाट मे,

आनक कहाँ, लोक अपने सोच मे मस्त छै।



चमकत कपारक सुरूजो, आस पूरत सभक,

चिन्तित किया "ओम" रहतै, भेल नै अस्त छै।

(बहरे-बसीत)







कमल मोहन चुन्नू



गजल



1

कगनीए पर नाह लगैए, बाजू नहि?

आङ-समाङक धाह लगैए, बाजू नहि?



मोसि-कलम-कागत धेने परोपट्टामे,

एक्कहु नहि पुरखाह लगैए, बाजू नहि?



भरल-पुरल दरबज्जा आँगन सबजनियाँ,

दोगे-दोग अबाह लगैए, बाजू नहि?



कोन बसात सिहकलै जनमारा पछबा,

गामक-गाम रोगाह लगैए, बाजू नहि?



जाहि आँखिमे भरि जिनगी बोहियइतहुँ हम,

पेनी तकर अथाह लगैए, बाजू नहि ?



होइत रहत एहिना मरलहबा गुरमिन्टी,

लोके नहि इरखाह लगैए, बाजू नहि?



ठीका-मनखपमे उजमहल धर्मध्वजी,

नेत ओकर मरखाह लगैए, बाजू नहि?



हड्डी-गुद्दा केर हबक्का- सौजनमे,

कुकुरो आइ घबाह लगैए, बाजू नहि?



2



पाछू जँ नहि अंक तँ एसकर सुन्ना की?

कानक बेतरे सोना की झुनझुन्ना की?



जीरा लए जोलहाल जानकीक नैहर केर,

पोखरिए महुराह तँ रोहु की भुन्ना की?



सिरिफ अगौं लए रकटल- लुधकल भगिनमान

तकर जजातक उपजा की मरहन्ना की?



भङघोटनासँ अकछि लोक बन्हलक मुट्ठी

तँ दरबारक कोट-कानूनक जुन्ना की?



पथरौटी डिहवार छातियो पाथर के,

तकर गोहरिया गुम्हरल की अँखिमुन्ना की?



धातुक बासन टुटलोपर बोमियाइत अछि,

मैथिल बासन साबुत की सकचुन्ना की?



डंटी मारए जे बैसल सप्पत खा कऽ

तकरा लए छै गाँधी की आ अन्ना की?



( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक)





प्रेमचन्द्र पंकज

गजल



हम बात अहीं केर मीत कहब, नहि गजल कहब

बरु कहब मीठ नहि, तीत कहब, नहि गजल कहब



चाङुर अपन पसारि रहल अछि माथापर सम्बन्धक बाज

कोन विधि बाँचत प्रीत कहब, नहि गजल कहब



कतबो माँटि सुँघाएब तैओ नहि मानब हम अप्पन हारि

चारु नाल पछाड़ि अपन हम जीत करब नहि गजल कहब



गगनक मुँहकेँ चूमए कतबो ठाढ़ अहाँ केर शीसमहल

बस कखनहुँ बालुक भीत करब नहि गजल कहब



हाथ पसारब रहत पसरले, मुँहे टेढ़ करब तँ की

कनि दूसि मुँह विपरीत चलब, नहि गजल कहब





गजलक बहन्ने हम आंगन- घर- दुआरि लिखब

बाध-बन- कलमबाग-बेख –बसबारि लिखब



साँढ़ छैक छुट्टा आ पाड़ा मरखाह कतैक

बाँचल फसिलकेर सुरजाक रखबारि लिखब



थानामे नाङट भेलि रमियाक हाकरोस-

सुननिहार केओ नहि तकरे पुछारि लिखब



बारल खेलौनासँ, पोथीसँ दूर कएल

जिनगीक बोझ उघैत नेनाक भोकारि लिखब



नाचि रहल लोक आइ असली नचनिञा सभ

नचा रहल परदासँ केओ परतारि लिखब



फाटल अकास छै सीअत के-कते कोना

लिखब जे “पंकज” बेर-बेर विचारि लिखब

( दुनू गजल बिना बहरक अछि-सम्पादक)



 ४

रुबी झा

---गजल---



तरहत्थी दीप जरा हम ठारै छलौं,
अहान्क प्रतिक्षा सदा हम ठारै छलौं ,

अहाँ आएब एहि बाटे फुइसे छलै  ,
लेलों किए हाथो जरा हम ठारै छलौं ,

छी अहाँ कठोर देखल नै आँखि नोर  ,
मुदा कानि आँखि फुला हम ठारे छलौं ,

हमर दर्दक मोल नै जानल अहाँ ,
कनै बुझितहुँ व्यथा हम ठारे छलौं ,

अही केर आशा मे ज्योँ मरब कहियो ,
नै आनब नामो कदा हम ठारे छलौं ,

बेदर्दी अहाँ दर्द बुझब की हमर,
मुदा व्यर्थ पीड़ा बता हम ठारे छलौं|



--- गजल----

जग मे बेटी केँ सम्मान भेटै कहियो,
माइ बापक अभिमान भेटै कहियो,

माँ केर कोइख सँ लेलें दुनु जनम,
मुदा अधिकार समान भेटै कहियो,

भरि देश केँ आइ सम्हारने छै बेटी,
अपन समाजो मे मान भेटै कहियो,

पहुँच गेलै बेटी अंतरिक्ष अखन,
वसुंधरा पर सम्मान भेटै कहियो,

भेल चौपट मिथिला दहेज प्रथा सँ,
दहेज बिनु वरदान भेटै कहियो,

घुटि मरै "रूबी" पुरुखक समाज मे,
एको दिन नारी प्रधान भेटै कहियो..!!!



  गजल

गजबे िनशा हुनक आँखिमे
अजबे कथा हुनक आँखिमे

हम बहल जाइ सदिखन
भरल ब्यथा हुनक आँखिमे

िभजल हम आँखिक अलौते
कारी घटा हुनक आँखिमे

समािहत भऽ गेलहुँ कखनो हम
दबल दुिवधा हुनक आँखिमे

कोयला भँ गेलहुँ जरि जरि हम
जरल ज्वाला हुनक आँखिमे

बेहोशे तँ छी अखन धरि हम
अजबे िनशा हुनक आँखिमे



हे यै सोना, अहाँक रुप लगै सोना जेकाँ
गोर गाल पर तील कोनो जादु टोना जेकाँ,

केश मेघो सन कारी गोर गरदन शोभैए,

जुट्टी अएन्चल अहाँक नाग फेना जेकाँ


चितवन चंचल एहन लागैए हिरनी तेहन
ताहु पर काजर मशीह भौं कमाने जेकाँ,

ठोर पातर एहन पानक पोटरिया जेहन
लाली लगबैए छी जखन लगै सुगा जेकाँ,

देह छरहर एहन गाछ कुसियारक तेहन
रस भरल पोरे-पोर चीनी बसना जेकाँ,

अहाँ जखन चली बाट मोन होए उचाट
गाम गाम गमकी एहन फुलक दोना जेकाँ।





सगरो नगरी मे कतेक, शोर भs गेलए
हुनक रुपक इजोत सँ , भोर भs गेलए

यौबन केर रौद चम-चम चमकै एना
नहा इजोरिया,  रसिक चकोर भs गेलए

केखनो गुदरी ज्योँ फाटल, लेलैन्ह  पहीर
देह हुनकर सजल , पटोर भs गेलए

अनुपम सुन्नैर लगैत  जेना ओ  अप्सरा
मेनकाक रुप जेना  कोनो थार भs गेलए

ओ लेलैन अंगराइ, करेज बुढबो पिटै
छौरा  देखैक लेल तहलखोर भs गेलए



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.अमित मिश्र २.मिहिर झा ३.उमेश पासवान



अमित मिश्र

पहिल टिकुला

मज्जरक दिन सँ पसरल सुगंध ,
हर्षित मोन सुंघि मातल गंध ,
फूसिये कहै छी कोयलक गीत सुन' जाइ छलौ ,
सच कहौँ बढ़ैत टिकुलाक दर्शन कर' जाइ छलौँ ,

डाँढ़ि-पात लुबधल हरियर टिकुला ,
पैघ-छोट ,वाह! केहन रूप दैब रचला ,
पहिल टिकुला सँ चटनी थारी सजल ,
साल भरि के बाद मुँहक स्वाद बदलल ,
एखने सँ मीठ राजा लागि रहल ,
बम्बई मालदह छकि क' खेबै आश लागल ,
धन्य भेल जिनगी देख पहिल टिकुला ,
"अमित" रसालक ध्यान मे बनल बगुला . . . । ।




ओकर मूँह लागैए कते म्लान सन ,
कत' गेलै चमक ओ पुनम के चान सन ,

मौलाइल गुलाबक ठोर ओकर किए ,
नोराएल कारी नैन , जे वाण सन ,

केशो नै गुहल पसरल धरा पर किए ,
देने पेटकुनियाँ भेल अपमान सन ,

टोना कोन डाइन केलकै आइ यौ ,
मुस्की गेल हेरा कोयलक गाण सन ,

दिल मे आगि लागल छै विरह के "अमित" ,
परदेशी पिया भेला अपन जान सन . . . । ।

2221-2221-2212

बहरे -कबीर



मिहिर झा

हाइकू

ची ची करैत
बगडा केर बच्चा
ताकय पानि

कारी बिलाड़ि
बीच दुपहरिया
बगडा बच्चा

दाना पानि ने
माय बाप बाहर
नीचा बिलाड़ि

एहि रौद मे
बिन पान्खि, निर्बल
हरि बचाउ





स्वर्गक नाम जपैत सगरे नर्क पसरल छै
साधुक भेष धरि सगरे रावण अभरल छै

सब छे घिचने लक्ष्मण रेखा अपन चारू कात
लंका दहन केर नाम पर सब ससरल छै

रूप गेलै बदलि जमाना संग बानरोक आब
हनुमानक स्थान पर आब मारीच भरल छै

नियमबद्ध होएब लगै आब करैला सों तीत
एहि बात पर सगरे आब आगि धधकल छै





कसीदा - ए - विदेह

जग घूमल सर्वत्र मुदा त्राण पाएल विदेह पर
सब गाम स्वाद चीखि चीखि लोक आएल विदेह पर

गज़ल कता रुबाई हाइकू छन्द कविता वा हौ रोला
मातृभाषा मे लिखल देखि प्राण बाजल विदेह पर

सब जाति धर्म के मैथिल जे एकत्र भेला एक ठाम
अप्पन मोनक भाव कहै धूम जमल विदेह पर

रगडा झगड़ा आदर मान छैक अप्पन लोक जेका
शुभारंभ साहित्य विधा के सौंसे देखल विदेह पर

दुर्लभ छथि जे गुरुजन अन्यथा, ज्ञान भेटैक नहि
पाबि मार्गदर्शन कविगण नित्य बनल विदेह पर

देश विदेश गून्जल गान माय मिथिला भेली प्रसन्न
गूगल नतमस्तक भेल मिथिला सजल विदेह पर

छद्म साहित्य ख़सल पिछडि लोक केलक बहिस्कार
समानांतर अकॅडमी छे शान बनल विदेह पर



कसीदा - ए - वैदेही

मूल्य बुझि माटिक अहां जन्म खेते लेलहु वैदेही
नारी मान बढाबय लेल स्त्री रूप धेलहु वैदेही

धनुष उठा नीपैत पोछैत अहां पूजल भोले के
ओही धनुष ल के अहां स्वयंवर केलहु वैदेही

देश विदेशक राजा आयल देखबै अपन जोर
देखि राम के दूरे से ईश्वर अहां पेलहु वैदेही

कमला कोशी बागमती तजि नेह भेल सरजू सों
आय अयोध्या भेल धन्य एत' अहां एलहु वैदेही

ससुर महात्मा ईश्वर राम सासुर बनल धाम
तीन सासु दियर संग पूर्ण अहां भेलहु वैदेही

पिता वचन के राखि मान देश तजि चलला राम
संस्कार के पाठ गुनैत संगे अहां गेलहु वैदेही

निश्छलता के लाभ उठाय रावण ठकबा आयल
देखि जटायु पंखहीन छुछे नोर देलहु वैदेही

भोर सांझ ल प्रणय निवेदन रावण आबे रोज
पर पुरुख़ बाजू कोना, त्रिन ठोढ धेलहु वैदेही

अग्निपरीक्षा देल तखनो धोबिया भरलक कान
मिथ्या आरोप बुझितो पतिक मान केलहु वैदेही

जीवन छोडि कर्तव्य लेल गेहलौ जंगल कुटिया
सूर्य समान दुहु पूत के कोना पोसलहु वैदेही

कतेक बर्छा भोंकल करेज और कतेक छै बाकी
पुनर्परीक्षा देखि सोझा धरती पैसलहु वैदेही




उमेश पासवानक 3 दर्जन कवि‍ता-



36 हाल-चाल



बड़ बराब छै हाल

ऐठामक नेता छै माला-माल

रोड-सड़ककेँ देखि‍यौ तँ

कदबा गजार सन छै थाल

ऐ मुँहझौसा नेता सभकेँ

कोइ नै कि‍छु कहै छै

भरि‍ बरसात

साँप-कि‍ड़ाक डरसँ

साँझे घर घड़ै छै

एक-दोसरमे एकता नै छै

यएह छि‍ऐ काल

बड़का नेता-मंत्री छि‍ऐ तँ एकर मतलब की

कतेक बेलना बेलए पड़लै ओकरा

केना कऽ गलतै राजनीति‍क दालि‍

मासुम जनताक संगे

चलै छै चतुर सि‍आरक चालि‍

अाबए दहक समए हौ नेता

भि‍जल बि‍लाइ सन हेतह हाल

अखन तँ खाली पाइये सुझाइ छै

सगरे पि‍टै छै वि‍कासक डंका

मुदा घरक आगाँमे

साँझे बेंग कोकि‍आइ छै

करै छै कोनो काज जेना कछुआक चालि‍

बड़ खराप छै हाल

ऐठामक नेता छै माला-माल

रोड-सड़ककेँ देखि‍यौ

कदबा गजार सन छै थाल

जहि‍ना इण्डिद‍या तहि‍ना नेपाल।



35 पथ ई केहेन



गुज-गुज अनहरि‍यामे

केना हेरा गेल हमर मोन

आब सम्हाारब केना

अप्पमन जीवन

नै पाछाँ छोड़ैए

मद्धपान दारू-शराब

नै पाछाँ छोड़ैए संगतक लक्षण

जेम्हछर जाइ छी सगरे ओनाइ छी

पथ ई केहेन

जइपर चलैत पछताइ छी

आइ मरनासन भऽ गेल हमर अवस्थाओ

कष्टरक मारल छटपटाइ छी

केहेन कठि‍न ई रस्ताइ

अपने प्रश्नसँ हम ओझराइ छी

दोसरकेँ संदेश कि‍ देब

ने जि‍ऐ छी आ ने मरै छी

करनीक फल भोगि‍ रहल छी

अपने सभ करू वि‍चार

नशामुक्तक बनौ देश ओ संसार।



34 गृहस्थब सबहक हाल



सभ कि‍सान

भेल अछि‍ परेशान

समएपर बरखा नै भऽ रहल अछि‍

केना रोपाएल धान

बि‍ति‍ गेल श्रावणक मास

खेतमे गि‍राएल बि‍आ

सुखि‍ कऽ भऽ रहल अछि‍ नाश।



जोतल खेतमे गरदा-धूल उड़ि‍ रहल अछि‍

कि‍सान सभकेँ ऐबेर

खेतीसँ आस टूटि‍ रहल अछि‍

अखन धरि‍ नै भेल पानि‍

सभ गि‍रहत मेघ दि‍स देखि‍ रहल अछि‍

इंद्र भगवान कि‍एक भऽ गेल नराज नै जानि‍।



सभ कि‍सान भेल अछि‍ परेसान

समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि‍

केना रोपाएत धान।



पछि‍ला साल बाढ़ि‍मे नाश भऽ गेल धान

हम कि‍सान खेतीपर ि‍नर्भर छी

ऐबेर सुखार भऽ गेल कि‍सानक जा रहल अछि‍ जान

सभ कि‍सान भेल अछि‍ परेसान

समैपर बर्खा नै भऽ रहल अछि‍

केना रोपाएत धान।



33 मि‍थि‍ला महान



टाटपर

लतरल ति‍लकोर पोखरि‍मे मखान

अखार मासमे

झूमि‍-झूमि कऽ कि‍सान रोपैए धान

जगमे सभसँ सुन्द।र अछि‍ हमर मि‍थि‍ला धाम

भाषा आ संस्कृ्ति‍ देखि‍ लोभाएल श्रीराम

बारीमे भेटैए पान

चूड़ा-दहीक जर-जलपान

मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान

हरक पाछाँ बगुला घुमैए

हरबाहा जोरसँ

बरदकेँ बाबू भैया कहि‍ हँकैए

आरि‍पर बैसल गि‍रहतबा

खुशीसँ दइए मुस्कासन।

हमर सभ सुन्दुर मि‍थि‍ला गाम

मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान।



माता-बहि‍न सभ खेतमे गबैए सोहर-समदौन

घुमरैत मेघ देखि‍ कवि‍केँ हर्षित होइए मोन

हरबाहा जलखैमे खाइए

मरुआ रोटीपर सुक्खएल नून

बहैए पछबा हवा

पानि‍ पड़ैए झम-झम

वर्षाक झटकसँ टुटैए आसमान

सभसँ सुन्दसर हमर मैथि‍ल मि‍थि‍ला महान।



32 हेराएल



जि‍नगीक सफरमे

जि‍नगी जिनाइ

हम बि‍सरि‍ गेलौं

कि‍ हमर हेराएल

कि‍ हमरा भेटल

संघर्षक रास्तािमे

‍बाधासँ लड़नाइ

हम बि‍सरि‍ गेलौं

सही रस्ताँमे छल

काँट भरल

पगडंडीसँ हम

नि‍कलि‍ गेलौं

चुकि‍ गेल सभ ओ बात

सच कहनाइ हम

बि‍सरि‍ गेलौं

मानव भऽ मानवकेँ

धर्म हम नै नि‍भा सकलौं

जाइत धर्म ऊँच-नीचक

बंधनमे हम

जकरि‍ गेलौं

अखन कमी महसुस होइए

ऐ सभ बातक

कि‍ करब आब तँ जि‍नगी

अहि‍ना गुजरि‍ गेल

जि‍नगीक सफरमे

जि‍नगी जि‍नाइ

हम बि‍सरि‍ गेलौं।



31 दुभर



मंहगाइक दानब

आसमान चढ़ि‍ गेल

सभ भाड़

एतए गरीबपर पड़ि‍ गेल

कि‍यो भऽ गेल

अरबपत्ति‍ कि‍यो भऽ गेल खरबपत्ति‍

कि‍यो नून रोटी

लेल मरि‍ गेल

चलैए ई शि‍लशि‍ला

एतए अहि‍ना जहि‍ना तहि‍ना

कि‍यो सासनक गद्दीपर

बैस राज करैए

केकरो बेटा-बेटी

डाक्ट री तँ इंजि‍नि‍यरि‍ंग पढ़ैए

केकरो बेटी

घरेलू नोकर बनि‍ घरक काज करैए

रोज मेहनति‍

मजदुरी करि‍ कऽ

जीवन बि‍तबैए

गरीबक बेटा

हॉस्पीबटलमे रूपैया बि‍नु

इलाजक खाति‍र मरि‍ गेल

महगाइक दानव

आसमान चढ़ि‍ गेल।



30 वि‍डम्‍वना



कतेक लि‍खब

दलि‍तक बेथा

सलहेश गामक संदेश

कतेक लि‍खब

समाजक वि‍डम्व ना

आँखि‍क नोर सुखि‍ गेल

दर्द नै होइए कम

के बुझत कि‍ अछि‍ झूठ

कि‍ अछि‍ साँच

टकमे टि‍क जोरि‍ रहैए

बुझैए अपनाकेँ बड़का

खुद ओ अपने भि‍तरसँ कारी अछि‍

दुश्म न बनल तड़का

बड़-बड़ करैए नाच

दलि‍तक प्रगति‍सँ

जलनक लगैए हि‍नका आॅच

कतेक लि‍खब

दलि‍तक बेथा

सलहेश गामक संदेश।



29 दि‍यादी बॉट



अपनहि‍ घरमे

हेराएल छी हम

भेटैए हि‍स्सा‍

बरोबरि‍ कऽ मुदा बॉटमे

पछुआएल छी हम

लड़ए पड़त अखनो

दि‍यादी बॉटक लेल

नै तँ करत आओर झेल

कऽ रहल अछि‍ ओ

दि‍गभ्रमि‍त हमरा

दलि‍त अक्षोप कहि‍ कऽ

करने अछि‍

एकात हमरा

ओही एकातसँ

चलि‍ कर आएल छी हम

सहलौं सभ कि‍छु

सलहेशक संतान रहि‍तौं

जहि‍या तक चुप रहलौं

आइ आँखि‍

फारि‍ कऽ देखि‍ रहल अछि‍

ओ हमरा

जब अप्पसन हि‍स्सा क

बात कऽ रहल छी हम

अपनहि‍ घरमे

हेराएल छी हम।



28 पूर्णि‍मा



पुर्णिमाक राति‍मे

चाँद केर चुप चाप

घरतीपर

उतरैत देखलौं

घासपर गि‍रल

ओस केर बुन्नमे

अप्पेन चेहरा देखि‍

चाँदकेँ खि‍लखि‍लाएल

हँसैत देखलौं

नव यौवन

कोमल हसीन सुरत

चाँदकेँ पुरा मुखड़ा देखलौं

घरतीपर प्रकृति‍क सृष्टी क

मनमोहन दृश्यत देखि‍

गाछ-वृक्षक संग

चाँदकेँ नचैत देखलौं

चाँदकेँ होइ छल

कि‍छु बात धीरेसँ बाजू

अप्पकन रूप-रंग

घन-सम्पूति‍क भाओ नै तौलू

चाँदकेँ लोकक लेल

यएह संदेश लि‍खि‍ कऽ

जाइत देखलौं

पुर्णिमाक राति‍मे

चाँद केर चुप-चाप...।



27 रि‍श्ता.



हँसैत-खेलैत

हमर जि‍नगी छलए

वसंत ऋृतु जकाँ

जाइत छलि‍ऐ अलग

मुदा दोस छलए पक्का

भेदभावो नै

जेना मालामे गाँथल

रंग-बि‍रंगक फूल जकाँ

हुनकर खुशीमे

हँसैत-छलै

दुख:मे कनै छलै

संग-संग

चलै छलै

नदि‍क दुनू कि‍नार जकाँ

दुनू गोटेमे

मि‍त्रता छल

सुदामा और कृष्णत जकाँ

लोक देखि‍ कऽ जड़ै छल

धधकल कुलाह जकाँ

दोस्तीुमे जहर घोरि‍ देलक

दूधमे खटाइ जकाँ

लोक अप्पान रास्ता़क दि‍वार जकाँ

हँसैत खेलैत...।



26 अज्ञानी



कम फुल कि‍चरमे

फुलाइ छै जखन

संग दइ छै पानि‍यो

आँखि‍ मुनि‍ कऽ

कि‍एक बनल छी अज्ञानी यौ

छोट तँ लोक

कर्मसँ होइ छै

मुदा हमर कि‍एक छै

आइ दुख: भरल कहानी यौ

देहसँ देह

केना छुबाइ छै

कि‍एक नै चलैए

हमर छुअल पानि‍ यौ

कोन जुलुमक सजा

हमरा दऽ रहल छी

कि‍अए बुझै छी

हमरा अपमानी यौ

जि‍वन हमर केना

बि‍ततै भेद-भाव

ऊँच-नि‍चक

भावना समाजक

मनसँ कहि‍या मि‍टेतै

केहन अहाँ छी अज्ञानी यौ।



25 कनी देखू



हे बलान माता

कनी देखू

अहाँ हमर ओर

आँखि‍सँ सुखल नोर

भुखसँ सुखल ठोर

घरमे नै अछि‍

िकछु बॉचल

सभ लऽ गेलेँ बाढ़ि‍मे

दहा कऽ दक्षि‍ण अाेर

कनैत-कनैत

करेज फटैए

केना अहाँ देलौं हमरा

झकझोड़ि‍

दाना-दानाक लेल

बि‍लखै छी

बौआ रहल छी हम चारू ओर

वि‍पत्ति‍क बादल

हमरा ऊपर लागल अछि‍ घनघोर

राति‍क नीन नै होइए

जागि‍ कऽ होइए भोर

हे माता दया करू

नै बनु अहाँ नि‍ठारे

अनजानमे जौं

कोनो गलती भेल

तँ माफ करब

हाथ जोड़ि‍ लगै छी गोर

हे बलान माता

कनी देखू...।



24 मास्टऽरक बहाली



देखि‍यौ-देखि‍यौ

भेड़ि‍या-धसान सन भेल

एतए मास्टारक बहाली

कि‍यो नै करैए

एकर रखवाली

स्कूरलमे नैना-भुटुका

करैए हल्लात-गुल्लाट

मास्टहर साहेब दऽ रहल अछि‍ ठहाका

पढ़ाइ-लि‍खाइ

के करबैए

देखि‍यौ केना उठबैए

सरकारी टाका

अखार मासमे बारह बजे

दि‍न तक खेतमे

कदबा-गजार करैए सर

एक बजे स्कूबल अबैए सर

खैनीमे लगबैए चोट

शि‍क्षाकेँ रखने अछि‍ ताखपर

मंगनीमे उठबैए नोट

स्कूीलक मैडमोकेँ देखि‍यो

ओहो कम नै छथि‍

लेक्मी क लि‍पि‍स्टपक लगेने मैडम

बॉबकट केश पहरबैए

इतर छि‍ट कऽ गमकबैए

पर्ससँ नि‍काइल कऽ अइना

रहि‍-रहि‍ मुँह ि‍नङहारैए

मोबाइले करैए हेल्लौल

समए केना बि‍तबैए

देखि‍यो-देखि‍यो

सरकारी पैसा केना उठबैए

कहबी अछि‍, जेहने इमाम सहाब

तेहने ढोलकि‍या

वि‍द्यार्थीक गार्जियन

भरि‍ दि‍न धि‍या-पुतासँ

गाए-महींस चरबबैए

देखि‍ये-देखि‍यो

खि‍चरी खाइ बेरमे

स्‍कूल केना पठबैए।



23 फागुनमे



अइहो

वृजगोपाला

फागुनमे

खेलैले होली

हमरा संगे

तोरा लेल

संजौनी छी

मखन भड़ल थाड़ी

बाट जोहि‍ रहल अछि‍

राधा-सखी केर संग

वसंतक ऋृतु मधुमासक मौसम

फगुनी हवामे

हम उराएब रंग अबि‍र

तोहे प्रेम

सुधा केर

रंग बरसैए

मोहे

रंग दि‍हो अप्प न संगमे

हमर जि‍नगीक मनोरथ

पुरा कहि‍हो

श्या मा अहीबेर

होलीमे

अइहो

वृजगोपाला

फागुनमे।



22 श्या मल मोहे



खोजत हम तोरा

ताही लेल

हेरा गेल हमर

कृष्णग कन्हैीया

बासुरी बजइया

रासी हे कि‍छु

बाजत नै तोर

ओनाएल छी हम

मृगा कस्तुमरी सन

खोजीह देहो

श्याहमल मोहे

चि‍त्तचाेर

सखी हे कि‍छु

बाजत नै तोर

वृन्दाैवन

यमुनातट

पनघटपर कदमुआ पेड़

सुना लागही

प्रेम लि‍खा

करत आब के फेर

सखी हे कि‍छु

बाजत नै तोर

बड़ा नटखट

छैल छबि‍ली

चि‍त्तमन प्रि‍तम केर

केसुआ होबे

घूंघराएल

मोर मकून्दरल सरपे

सखी हे कि‍छु

बाजत नै तोर।

21 जीतक झंडा



जरै जाउ

वतन केर दुश्मीन

आगि‍ सुनगाएल करू

जीत केर झंडा

फहराएल करू

मोनमे राखि‍ कऽ उमंग

गीत देश भक्तिी‍क

गाएल करू

हि‍मालय सन ऊँच

हृदए अछि‍ हमर

प्रेमक फूल खि‍लाएल करू

अछि‍ गाँधीक देश ई

गंगा-यमुना पावन नदि‍

दइए संगमक संदेश जतए

ति‍लक, टैगोर, अम्बेङदकर जतए

वि‍र भगत सि‍ंह

चन्द्रगशेखर, सुभाष वीर पुत्र जतए

भेटए संघर्षक कथा जतए

मातृभूमि अप्पकन

भारत माता केर

गुण गाएल करू

जरै जाउ

वतनक दुश्मरन

आगि‍ सुनगाएल करू।



20 युवा



रहैए युवाकेँ

उमंग मोनमे

जौं

पहाड़सँ लड़ि‍ लेब हम

संघर्षक जीवन

अहि‍ना चलतै

जीवनक अंति‍म

समैमे

कि‍छु कए लेब हम

जोश जतए कम नै हुअए

परि‍स्थिअ‍ति‍ सात समुद्र

पार कऽ लेब हम

हमरा नै रोकू कि‍यो

दलि‍तक दरदकेँ

हर संभव कम कऽ लेब हम‍

लड़ए कि‍एक ने पड़ए हमरा

दुश्मकनक छाती चीर कऽ

देखा देब हम

बहुत सतेने अछि‍

हमरा समाजकेँ

भरि‍ जीवन

बीच अखारामे

पटकि‍ कऽ देखा देब हम

चुप नै रहू

सभ हकक लड़ाइक लेल

आगू बढ़ू

रहैए युवाकेँ

उमंग मोनमे।



19 हम युवा



जाति‍-धर्म

मजहब केर नाओंपर

षडयंत्र रचैए कि‍यो

हमर देशकेँ

भीतर आबि‍ कऽ

आतंकवादक

गाछ रोपैए कि‍यो

भारतवासी शेर छी

शेरकेँ मादमे

आबि‍ कऽ जगबैए कि‍यो

दुश्मँनक थाह नै

ऐ बातक

हम युवा

हर मोड़पर ठार छी

अंत करैले

सदि‍खन ऐ दानवक लेल तैयार छी

हम छी गोली, हम छी बारूद

हमही खंजर तलवार छी

ति‍रंगाक ति‍नू रंग

तीर-कमान छी

जौं दोस्तीतक लेल हाथ बढ़ाएब तँ

हमही फूलक माला

गला केर हार छी

संदेश दइ छी शान्तिक‍ केर

हमहीं महात्माा गाँधी, गौतम बुद्धक

अवतार छी

जौं कहि‍यो एक बुन्न

सोनि‍त गि‍रल ऐ धरतीपर

तँ हमहीं वीर भगत सि‍ंह

चन्द्रीशेखर आजाद छी

जाति‍-धर्म ओ मजहब केर नाओंपर।



18 पथि‍क



हम पथि‍क छी

जीवन केर

जीबि‍ लि‍अ दि‍अ

नि‍हस्वािर्थ रूपसँ

मनुख बनि‍ कऽ

दोख हमरा ऊपर

नै लागए कोनो

नै गलती हुअए फेर

हम पथि‍क छी

जीवनक

मनुखक तन भेटल हमरा

मानव धर्म नि‍भाएब

मानव सेवा करब

जीवन प्रयत्न

चंचल डगर

मोहनी मायाक बसमे

नै ओझराएब फेर

हम पथि‍क छी

जीवनक

गोरि‍ देलौं हम

मन जीतक झंडा

अपना मोनमे

अवि‍रल समस्या

कठि‍न परीक्षा

कि‍एक नै हुअए जीवनमे

पाछू उलटि‍ कऽ

नै देखब फेर

हम पथि‍क छी

जीवन केर।



17 हमहूँ कनै छी



जहि‍यासँ

हम अहाँकेँ नै

देखि‍ रहल छी

साँझ-वि‍हान

एक नोर कनै छी।

कतए चलि‍ गेलैं

अपने छोड़ि‍ कऽ हमरा

एतए असगर

आगूक दुनि‍याँ हम

अन्हादरे देखै छी।

सभ पुछैए अहाँक बारेमे

कि‍यो अाह करैए हे भगवान

केना भऽ गेलै

नीक लोककेँ

कि‍यो करैए अहाँक बराइ

कहू कतए चलि‍ गेलौं

हमरा छोड़ि‍ कऽ आइ

हमहूँ कनै छी

बौओ कनैए

माइक आँखि‍सँ

सदि‍खन नोर झहरैए

जखन कि‍छु

सोचै छी अहींक

यादि‍ अबैए

जहि‍यासँ

हम अहाँकेँ नै

देखि‍ रहल छी।



16 एना कि‍एक



अखनो चलै छै

समाजमे

टंगघि‍च्चा

टंगघि‍च्ची क खेल

ऊपरसँ नूनू बौआ

भि‍तरे-भि‍तर

कहैए बकलेल

बर्षोसँ देखि‍ रहल छी

हर तरहसँ

दलि‍तक उपेक्षा

कएल गेल

कहू कि‍एक

मैथि‍ली छी हम

मि‍थि‍लावासी छी

तइ लेल?

ऐ तरहक नि‍अम

बनौनि‍हार अपने

जौं हमरोमे

कमी खोजै छी तँ

अपनो समाजक चेहरा देखू

कि‍एक नै

हुनको संग

अहि‍ना कएल गेल

ऐ प्रश्न‍क जबाब दि‍अ

समाजक जाति‍-पाति‍क

नाओंपर बटनि‍हार अहाँकेँ

कहू दलि‍तकेँ

हर तरहसँ उपेक्षि‍त

कि‍एक कएल गेल

काि‍वल नै बुझू अपनाकेँ

अपने छी बकलेल

अखनो चलै छै

समाजमे

टंगघि‍च्चा

टंगघि‍च्ची क खेल।



15 जि‍ति‍या



गे दैया

गि‍ति‍या

माए गेल छौ

पोखरि‍मे नहाइले

पावनि‍ छै जि‍ति‍या

होइ छै बड़ भारी

तीन दि‍न धरि‍

सहल रहए पड़ै छै

अखन छेँ तूँ अनारी

कऽ ले घर-आंगना

साफ सुथरा

चूल्हि‍-चौका नीप पोति‍ ले

देखैमे लगतौ नीमन

आइ बनबि‍हेँ

मरूआक रोटी

माछक तीमन

जि‍ति‍या पावनि‍

सभ मि‍थलानी करै छै

बाल-बच्चा

घर-परि‍वारक

दुख: कलेश दूर होइ छै

बढ़ै छै उमेर

पोखरि‍मे घेराकेँ पातपर

खैर-तेल चढ़ै छै

खुश होइ छै देव पि‍तर भगवान

भोरे सभ खाइ छै

आमक अमोट

चूड़ाक जर जलपान

गे दइया गि‍ति‍या।



14 डगर



जि‍नगीक

ओइ मोड़पर

हम बैसल छी

जतए देखै छी

हरेक तरहक लोकेँ

जे अलग-अलग

डगरपर चलैए

कि‍यो ऊपर चढ़ि‍ गेल

कि‍यो बीच बाटमे

अॅटकि‍ गेल

कि‍यो असफलताक डरसँ

पाछू रहि‍ गेल

शाइद एकर

जि‍नगी कहैत छै

हम अखने धरि‍

असमंजसमे पड़ल छी

कि‍ करू कि‍छु नै फुराइए

तइ लेल एत्तै बैसल छी

बैसल रहब

पछुआ जाएब

हमरो आब एतएसँ

चलए पड़त

कोन डगर चली

केन दि‍शा चली

अप्पदन शक्तील देखि‍

बाट पकड़ए पड़त

जि‍नगीक

ओइ मोड़पर।



13 रमल छी



रामम धूनमे

रमल छी हम

संतक सेवामे

जुटल छी हम

शांति‍क संदेश

बाटैमे लागल छी हम

गाए रक्षा करैक

शपथ खेने छी हम

वेद पुराण

धर्म शास्त्र  पढ़ि‍ कऽ

अप्प न जीवनमे

उतारबाक कोशि‍शमे

लागल छी हम

नीज स्वाहर्थ त्याँगी केर

लोकहि‍त काममे

लागल छी हम

जइ बाटपर

चलल महात्माि गाँधी

महात्मात बुद्ध वएह

बाटपर चलल छी हम

राम केर धूनमे

रमल छी हम।





12 संत



नदि‍मे

भसि‍आएल मुर्दा

शांतचि‍त्त भऽ कऽ

पानि‍पर पड़ल अछि‍

एकर नै नाओं अछि‍

नै कोनो पता

पानि‍क रेतक संगे

अनजान पथपर

चलल अछि‍

कतौ पानि‍क रेत

झकझोरइए तँ कतौ

झारीमे फसि‍ कऽ

नि‍कलैक प्रसास करैए

कतौ नदि‍क कि‍नछरि‍मे

टकरा कऽ चलैए

पानि‍ धार संगे

उथल-पुथल होइए

रौद-बसात सहैए

उगैए तँ डुमैए

सफरक एेकरा कोनो

ठेकान नै

बस पानि‍क संग चलैए

जहि‍ना संत

भक्तिन‍-भावमे डुमल रहैए

भक्तिन‍ मार्गपर चलैए

नदि‍मे

भसि‍आए मुर्दा।



11 बन्हुन



चुप घरक

कि‍छु कहैत छी

ई केहेन अजब सन

टि‍स हमर दि‍लमे होइत अछि‍

जेना लगैए

दुख केर नदि‍सँ बाचि‍ कऽ हम नि‍कलल छी

खुशीसँ चि‍ड़ै जकाँ

उड़ै लेल चाहै छी हम

मुदा पएरमे लागल अछि‍

ई बेरि‍या बन्हँनक

ओकरा खोलैले चाहै छी हम

एगो भूल भऽ गेल हमरा भूलसँ

ओ भूलकेँ भूलैमे

खुद अपनाकेँ भूलि‍ गेल छी हम

आब हमर अपनो छाँह

दोसरकेँ लगैए आ खुदकेँ

खोजैले नि‍कलल छी हम।



10 संघर्ष जारी रखब

समस्या  और

बढ़ि‍ गेल

सफर अधुरा रहि‍ गेल

जीत केर हारि‍

गेलौं हम

हरेक कोशि‍श नाकाम भऽ गेल

तखनो अप्प न हौसला

नै हारने छी हम

हर डेंग संघर्ष जारी रखब

अनजान अनभिज्ञ

ई समए कतै

तक लजाइए हमरा

वि‍रह केर भीरसँ

मुदा एकर डर नै अछि‍

लड़ैत रहब

अप्पतन समाजक

अधि‍कारक लेल

लोग हमर काम देखि‍ हँसैए हमरापर

नेकि‍प कहै डर हम

एहेन जीनगी जि‍नाइसँ

कोन फाइदा जइमे

संघर्ष नै अछि‍

एतए सभ अप्पछना-अप्प ना लेल जि‍बैए

जीने तँ अोकरा

कहल जाइए जे

समाज कल्याेणक

लेल जबैए

मरलाक बादो

सदि‍खन हुनकर

कृति‍ जि‍वि‍त रहैए

अहू ओ अही डगरपर

हमहूँ चलल छी।



9 भरदुति‍या



आइ छि‍ऐ सुकराती

गे मुनि‍या

दि‍आरी डि‍बि‍यामे

कर तँू तेल एम्ह र आउरो मंगला

हुका-बाती खेल

ई पावनि‍ त्यो हार छै

मेल मि‍लाप करैक

सभ संग कऽ ले मेल

प्रेमसँ रहैमे नै

होइ छै कोनो परेशानी

दीप जरा

हुका जरा-बाती खेल

केलह वि‍हाने

दइयाक सासुर जहीमे

भरदुति‍या पावनि‍ छै

न्योंित लि‍हेँ

देतौ हाथमे पान-सुपारी

आसि‍रवाद लि‍हेँ

देखि‍हेँ हुरा-हूरीक पहलमानी

फटाका-फुटुकीक नै कर क्षेल

आइ छि‍ऐ सुकराती

गे मुनि‍या।



8 गवहा संक्राति‍



बड़ अनचि‍त भेल

गृहस्तच सबहक संग

ऐबेर

खेतीमे लगाउ खर्चा

मेहनति‍-मजदुरी

सभ बाढ़ि‍क चपेटि‍मे

चलि‍ गेल

पावनि‍-ति‍हारमे

सेहन्ताा अगलै

रहि‍ गेल

आजुक दि‍न गवहासंक्राति‍ अछि‍

अन्न-धनक घरमे

कमी देखै छी

केना कऽ अहीबेर

खेतक आड़ि‍पर जा कऽ

कहब सेर-बरोबरि‍

उखैर सन बीट

समाठ सन सि‍स

जेम्हसर देखै छी

खाली खेत खसल अछि‍

चारू दि‍स

प्रश्न कऽ रहल अछि‍ हमरासँ

खेतक आड़ि‍ आ मेर

खेतमे अगबे अछि‍

बालुक ढेर

केना कऽ गुजर चलत

उपजा कऽ कास-पटेर

बड़ अनचि‍त भेल

गृहस्तच सबहक संग

ऐबेर।



7 कि‍मती भोट



हरेक पाँच बर्खपर

जन प्रति‍नि‍धि‍ हम सभ

चुनै छी

राज्यछ सभासँ

संसद धरि‍ पहुँचाबै छी

अपन कि‍मती भोट

दऽ कऽ जि‍ताबै छी

चुनवक भार

हम जनता सभ उठाबै छी

मुदा जीत गेलाक बाद

ई नेता-मंत्री अपनाकेँ

बुझैए महान

कहू वि‍कासशील देशक श्रेणीमे रहल

वि‍कसि‍त कहि‍या बनत हि‍न्दु स्ताबन

लोकतंत्रक हि‍नका

परबाह नै

देशक वि‍कासक हि‍नका चाह नै

सामंतवादी सन

रखैए अपन सोच

मन-मोताबि‍क करैए वि‍कासक

रूपैया केर खर्च

माननीय हि‍नका केना कही

एक नम्महरक अछि‍

ओ चापलूस बेइमान

कहू वि‍कासशील देशक श्रेणीमे रहल

वि‍कासि‍त कहि‍या बनत हि‍न्दु स्ताबन

एक दि‍स वि‍श्व बैंकसँ

कर्जा लऽ रहल अछि‍

दोसर दि‍स धांधलीक रूपैया‍

वि‍देशमे जमा कऽ रहल अछि

देशक कोन तरह

कमजोर बना रहल अछि‍

लोकतंत्रकेँ कऽ रहल अछि‍ अपमान

कहू वि‍कशि‍त देशक श्रेणीमे रहल

वि‍कसि‍त कहिया बनत हि‍न्दु स्तासन।



6 असली-नकली



मोन जौं चोन्हसराएत

तखन की करबै

कलयुग अछि‍ कछु भऽ सकैत अछि‍

असली-नकलीमे फर्क कोन

की झूठ की साँच तर्क कोन

सभ एक्के सि‍रहने पड़ल अछि‍

आइक परि‍स्थिर‍ति‍मे

नीक कही तखनो गेलौं

बेजाए कही तैयो गेलौं

तइ दुआरे हम मुँह लटकेने छी

कखन की भऽ जाएत

से कोनो ठीक नै

सभ कि‍छु देखि‍ कऽ आँखि‍ मूनि‍ लेब

मुदा चुप रहब सेहो ठीक नै

समए सभ दि‍न अहि‍ना थोड़े रहतै

हरेक प्रश्नबक जबाब जरूर भेटतै

मौन जौं चोन्हसराएत

तखन की करबै।



5 कोसी



माइहे कतेक

हम कनलौं-खि‍जलौं

कतेक नोर बहेलौं

सनइ-पटुआ कास-पटेर

अल्हुआ-मरूआ उपजा कऽ

गुजर-बसर हम केलौं

सहलौं बड़-बड़ कष्टा

बाढ़ि‍मे घर-द्वार वि‍हि‍न

चैन-वि‍वेके हम रहलौं

सोचि‍-सोचि‍ कऽ कए परेखि‍

समए बि‍तेलौं व्य्र्थ-फि‍जुल

कऽ देलि‍ऐ मि‍थि‍लाकेँ दु-भागमे

पूबमे सहरसा-सुपौल

पछि‍ममे मधुबनी-दरभंगा

बि‍चमे अगबे बालु आ धूल

कहू आब कतेक चुप रहब

ऐबेर हम बना देलौं पुल

रोजी-रोटीक अवसर भेटल

हँसै छल जे दुनि‍याँ आब हमरा देखत

शि‍क्षाक नव-ज्यो ति‍ जगत

जाएत पढ़ैले बेटा-बेटी कओलेज-स्कू‍ल

माइहे कतेक

हम कनलौं-खि‍जलौं

कतेक नोर बहेलौं।



4 मच्छलर रानी



सूनसान राति‍मे

चुपचाप

नंगे पएर

लग अबैए

भन-भन करैत

छोट-नटखटी सुकुमारी

प्याबरी-दुलारी

मच्छबर रानी

चोंच नोकि‍ला

नयन कटि‍ला

अछि‍ बड़ सि‍यानी

उघार देह देखि‍ कऽ

करैए हमरा संग छेड़खानी

कखनो गाल-चुमैए

कखनो खून चुसैए

प्या स नै लगैए जेना

कहाँ पि‍बैए पानि‍

भरि‍ राति‍ जागि‍ कऽ

हम एकरा संगे

राति‍ बि‍तबै छी

होइए बड़ परेसानी

आब एकरासँ

बचबाक करब उपाइ

रोजे राति‍ कऽ लगाएब मच्छोरदानी

सूनसान राति‍मे

चुप-चाप

नंगे पएर

लग अबैए।



3 हरि‍जन



हि‍न्दु‍ मुसलि‍म

सि‍ख ईसाइ

सभकेँ कहै छी

सभसँ पुछै छी

कि‍एक भेल

दू रंगक मोन

हम दलि‍त छी

मेहनति‍-मजदुरी

कए कऽ बि‍तबै छी

अपन जीवन

तैयो जरैत अछि‍

लोक देखि‍ कऽ

जरै केकरो तन

करै अछि‍

छुआ-छूतक भेद-भाव

मंदि‍र पूजाघर

जेबासँ करैत अछि‍

वंचि‍त एखनो

एकैसम सदीमे

हरि‍जनक संग

कि‍एक कऽ रहल छी

अहाँ सभ अनुचि‍त

हि‍न्दू‍-मुस्लित‍म-सि‍ख ईसाइ।



2 हम छी मैथि‍ली



हम छी मैथि‍ल

जे बजै छी

वएह लि‍खै छी

जे देखै छी

वएह कहै छी

स्वदयं दलि‍त छी

दलि‍तक दरद जनै छी

कि‍छु व्य क्ति ‍क

कि‍रदानीसँ चकि‍त छी

दलि‍त भऽ कऽ ओ

व्यदक्तिक‍ अपनो समाजकेँ

बि‍सरि‍ गेल

अप्पेन भाषा-भेष छोड़ि‍ कऽ

दोसरक रंग-ढ़ंगमे ढलि‍ गेल

नाओं मात्रसँ दलि‍त

कर्मसँ बहूरुपि‍या

बनि‍ गेल

साहि‍त्यि जे समाजक

आइना मानल जाइए

ओहूमे अप्पजन

नामक खाति‍र

अप्प न बोली-भाषा

तक बि‍सरि‍ गेल

तइ दुआरे दलि‍तक स्थिे‍ति‍

जस-के-तस रहि‍ गेल

हम छी मैथि‍ल।



1 बौकी



मांगि‍-चांगि‍ कऽ बौकी

जीवन अपन बि‍तबैए

कोइ दइ बाइस भात-रोटी

कोइ दइ फाटल-पुरान वस्त्र

ओइ फाटल वस्त्रासँ

झाँपने अपन तन

बेइमान भेल अछि‍

लोकक नजरि‍मे

उजरल-पुजरल अछि‍

टुटलघर

बसल अछि‍ ओ गामक कातमे

जि‍नगीक फि‍कि‍र नै

इज्जअति‍क छै डर

पोसने अछि‍ दुगो सुगर

जे भागल फि‍रैए

गाछी-गाछी-बासे-बाँस

चरबै ले जाइए

दि‍न-दुपहर

दुनि‍यासँ अछि‍ ओ बेखबर

मांगि‍-चांगि‍ कऽ बौकी

जीवन अपन बि‍तबैए।



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