Sunday, April 29, 2012

'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५) PART I



                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' १०५ म अंक ०१ मइ २०१२ (वर्ष ५ मास ५३ अंक १०५)NEPALINDIA 
                                            
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi

 ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य











३. पद्य









३.७.चंदन कुमार झा

३.८.नवीन कुमार ‘‘आशा’’-गर्भक आवाज 


४. मिथिला कला-संगीत१.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)

 

५. गद्य-पद्य भारती:१.नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली अनुवाद अनुवाद कर्ता आशीष अनचिन्हार २.प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद आशीष अनचिन्हार)३.भरनापर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल) ४.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा-

 

६.बालानां कृते-१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा ने२.चंदन कुमार झा- बाल गजल

 

७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]


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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"

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 ऐ बेर मूल पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?
Thank you for voting!
 श्री राजदेव मण्डलक अम्बरा” (कविता-संग्रह)  13.44%   
 
श्री बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ छीनरदेवी”(दूटा नाटक)  9.84%   
 
श्रीमती आशा मिश्रक उचाट” (उपन्यास)  6.56%   
 
श्रीमती पन्ना झाक अनुभूति” (कथा संग्रह)  5.25%   
 
श्री उदय नारायण सिंह नचिकेतानो एण्ट्री:मा प्रविश (नाटक)  5.9%   
 
श्री सुभाष चन्द्र यादवक बनैत बिगड़ैत” (कथा-संग्रह)  5.25%   
 
श्रीमती वीणा कर्ण- भावनाक अस्थिपंजर (कविता संग्रह)  5.57%   
 
श्रीमती शेफालिका वर्माक किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)  7.87%   
 
श्रीमती विभा रानीक भाग रौ आ बलचन्दा” (दूटा नाटक)  7.21%   
 
श्री महाप्रकाश-संग समय के (कविता संग्रह)  5.9%   
 
श्री तारानन्द वियोगी- प्रलय रहस्य (कविता-संग्रह)  5.57%   
 
श्री महेन्द्र मलंगियाक छुतहा घैल” (नाटक)  7.21%   
 
श्रीमती नीता झाक देश-काल” (कथा-संग्रह)  6.56%   
 
श्री सियाराम झा "सरस"क थोड़े आगि थोड़े पानि (गजल संग्रह)  6.89%   
 
Other:  0.98%   
 


ऐ बेर बाल साहित्य पुरस्कार(२०१२) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन मूल मैथिली पोथी उपयुक्त अछि ?

 श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक तरेगन”(बाल-प्रेरक कथा संग्रह)  50%   
 
श्री जीवकांत - खिखिरक बिअरि  25%   
 
श्री मुरलीधर झाक पिलपिलहा गाछ  23.44%   
 
Other:  1.56%   
 

ऐ बेर युवा पुरस्कार(२०१२)[साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे कोन कोन लेखक उपयुक्त छथि ?

Thank you for voting!
  श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरीक अर्चिस” (कविता संग्रह)  24.04%   
 
श्री विनीत उत्पलक हम पुछैत छी” (कविता संग्रह)  6.73%   
 
श्रीमती कामिनीक समयसँ सम्वाद करैत”, (कविता संग्रह)  6.73%   
 
श्री प्रवीण काश्यपक विषदन्ती वरमाल कालक रति” (कविता संग्रह)  4.81%   
 
श्री आशीष अनचिन्हारक "अनचिन्हार आखर"(गजल संग्रह)  25%   
 
श्री अरुणाभ सौरभक एतबे टा नहि” (कविता संग्रह)  6.73%   
 
श्री दिलीप कुमार झा "लूटन"क जगले रहबै (कविता संग्रह)  6.73%   
 
श्री आदि यायावरक भोथर पेंसिलसँ लिखल” (कथा संग्रह)  4.81%   
 
श्री उमेश मण्डलक निश्तुकी” (कविता संग्रह)  12.5%   
 
Other:  1.92%   
 

 

ऐ बेर अनुवाद पुरस्कार (२०१३) [साहित्य अकादेमी, दिल्ली]क लेल अहाँक नजरिमे के उपयुक्त छथि?

Thank you for voting!
  
 श्री नरेश कुमार विकल "ययाति" (मराठी उपन्यास श्री विष्णु सखाराम खाण्डेकर)  34.52%   
 
श्री महेन्द्र नारायण राम "कार्मेलीन" (कोंकणी उपन्यास श्री दामोदर मावजो)  13.1%   
 
श्री देवेन्द्र झा "अनुभव"(बांग्ला उपन्यास श्री दिव्येन्दु पालित)  11.9%   
 
श्रीमती मेनका मल्लिक "देश आ अन्य कविता सभ" (नेपालीक अनुवाद मूल- रेमिका थापा)  14.29%   
 
श्री कृष्ण कुमार कश्यप आ श्रीमती शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द ( जयदेव संस्कृत)  11.9%   
 
श्री रामनारायण सिंह "मलाहिन" (श्री तकषी शिवशंकर पिल्लैक मलयाली उपन्यास)  13.1%   
 
Other:  1.19%   
 

फेलो पुरस्कार-समग्र योगदान २०१२-१३ : समानान्तर साहित्य अकादेमी, दिल्ली

Thank you for voting!
श्री राजनन्दन लाल दास  54.69%   
 
श्री डॉ. अमरेन्द्र  21.88%   
 
श्री चन्द्रभानु सिंह  21.88%   
 
Other:  1.56%   
 

 

1.संपादकीय

३० अप्रैल २०१२ केँ जानकी नवमीक अवसरपर जनकपुरक रामानन्द चौकपर १५० गोटे जखन मिथिला राज्य लेल धरणापर रहथि, तखने एकटा हाले-फिलहालमे जनमल एकटा मधेशी दल द्वारा कएल बम विस्फोट, जे एकटा क्रिमिनल एक्ट मात्र अछि, मे पाँच गोटे शहीद भऽ गेला आ तीससँ बेशी गोटे घायल छथि। मृतकमे मिथिला नाट्यकला परिषद (मिनाप)क कलाकार ३२ वर्षीया रंजू झा, झगड़ू मण्डल, बिमल चरण, सुरेश उपाध्याय आ दीपेन्द्र दास छथि। जँ हिनकर सभक बलिदानकेँ मोन राखल जाए तखने ओ श्रद्धांजलि भऽ सकत।

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र

आगू-


जगदीश प्रसाद मण्डल पाँच-छह बर्खक रहथि तखनेसँ भाइक संग स्कू‍ल जाए लगला। गामेमे लोअर प्राइमरी स्कूल, दू पाली स्कूल चलैत छल। अखन तँ आठम धरि‍क पढ़ाइ हुअए लागल अछि‍ तहि‍ना एक शि‍क्षकसँ चलैत स्कूल सेहो सतरह शि‍क्षक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍।
 
तँए कि‍ शि‍क्षा अगुआ गेल? जि‍नगीक लेल सर्वांगीन वि‍कास अनि‍वार्य अछि‍ जँ से नै तँ ओ अकलांग-वि‍कलांग भेल पड़ल रहत। सामान्य‍ स्कूल-कओलेज तँ ठाम-ठीम बनल मुदा तकनीकी शि‍क्षाक वि‍कास नै भेल। परि‍णाम बनि‍ गेल अछि‍ जे काजक दि‍शे बदलि‍ गेल अछि‍। खैर जे होउ, मुदा आजादीक पहि‍नौं आ पछाति‍यो बेरमा राजनीति‍क, शैक्षणि‍क दृष्टि‍सँ अगुआएल।
 
आजादीक आन्दोलनमे बचनू मि‍श्र उभड़ला। नवानी वि‍द्यालयमे भनसि‍याक काज करैत रहथि‍। लि‍खनाइ तँ नै सीखि‍ भेलनि‍ मुदा वक्ता भऽ गेलाह। देशक प्रति‍ ओहन समर्पित जे आजादीक दौड़मे तीन मास धरि‍ भट्टे-बैगन बि‍ना नूनक, उसनि‍-उसनि‍ खा दि‍न-राति‍ काज करैत रहलाह, आन्दोलन गाम-गाम पकड़नहि‍ रहए।
काजेसँ इमानदारी सेहो अबै छै। १९३४ ई.क भूमकमक पछाति‍ राशनक जे बँटवारा हुअए लागल, तइमे एतेक इमानदारीक परि‍चय मधेपुर थानामे देलनि‍ जे समाजक सभ हुनका गाँधीजी कहए लगलनि‍। तइ संग आरो-आरो रहथि‍। बेरमा पंचायत बनबैमे हुनकर योगदान बहुत रहलनि‍। जनसंख्याक हि‍साबसँ, ओइ समयक पंचायतक हि‍साबसँ, बेरमा छोट पड़ैत रहए। सामाजि‍क बुनाबटि‍ एहेन जे गाम-गामक बीच अपन-अपन संबंध। तँए के केकरा संग रहत, ई समस्या।
मुदा दीप गामक नेतृत्वोक सहयोगसँ, जे अपन पंचायत काटि‍ पंचायत बनबैमे सहयोग केलथि‍, पंचायत बनल।

पछाति‍ बचनू मि‍श्रक दि‍माग गड़बड़ा गेलनि‍। ओना अस्सीसँ ऊपर बर्खक उमेरमे मुइलाह मुदा प्रभाव कमि‍ गेलनि‍। ब्रेन प्रभावि‍त होइक कारण दूटा भेलनि‍। पहि‍ल पारि‍वारि‍क आर्थिक स्थि‍ति‍ आ दोसर राजनीति‍क क्षेत्रमे इमानदारीक अभाव। मुदा अंत-अंत धरि‍ समाजकेँ जगबैत रहलाह।
जहि‍ना राजनीति‍क दृष्टि‍सँ बेरमा गाम जागल तहि‍ना शैक्षणि‍क दृष्टिस‍सँ सेहो ई गाम अगुआएल रहल अछि‍। गाममे स्कूल कहि‍या बनल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍क जानकारी तँ नै मुदा १९३४ ई. क भूमकममे वि‍द्यालयक भीत खसल, ई जानकारीमे अछि‍। मुदा वि‍द्यालयक जगह बदलि‍ गेल। कि‍एक तँ ओइ जगहकेँ जनमानस अशुभ बुझए लागल। ओना ओ स्थान गामक ब्रह्म स्थान छी, शक्ति्‍शाली जगह। अखन ओइ स्थानमे बाल-बोधक आंगनबारी चलि‍ रहल अछि‍। ओइठामसँ वि‍द्यालय उठि‍ लछमीकान्त, रमाकान्त साहुक कचहरीमे चलि‍ आएल। शुरूमे लकड़ीक खुट्टापर बाँसेक घर रहै, मुदा पछाति‍ कचहरी नि‍च्चा सि‍मटी ईंटा ऊपर खढ़क घर बनौलनि‍। ओइ कचहरीमे १९५२ ई.क पहि‍ल चुनावक केन्द्र सेहो बनल।

अखन वि‍द्यालय तेसर स्थानपर अछि‍। जे जगह सरि‍सव-पाहीक प्रो. हेतुकर झाक छि‍यनि‍। ओना ओ रजस्ट्री करैले तैयार भेल छथि‍ मुदा जमीन्दारीक तेहेन ओझरौठमे पड़ल अछि‍ जे हुनका लि‍खले ने होइ छन्हि‍‍! बुढ़ि‍या गाछीक नाओं जमीनक पड़ि‍ गेल अछि‍। सम्प्रति‍ पंचायत भवन, आठमा धरि‍क स्कूल, खंडहर रूपमे अस्पतालक घर आ भव्य दुर्गास्थान सेहो अछि‍।

अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे एकहरे खड़का मूलक परि‍वारमे पं. कंचन झा आ पं. बबुए झा वैदि‍क भेलाह। ओना ओइ समैमे अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रचार-प्रसार नै भेल छल, मुदा संस्कृत शि‍क्षाक स्वर्णिम युग अवस्स छल। स्वर्णिम ऐ लेल जे सामाजि‍क ढाँचा, कि‍छु बि‍च्छृंखला छोड़ि‍, वैदि‍क पद्धति‍सँ चलैत छल। आस्ते-आस्ते बि‍च्छृंखला बढ़ि‍ते गेल। पछाति‍ अंग्रेजी शि‍क्षाक प्रभाव सेहो खूब पड़ल।
पं. कंचन झाक बालक पं. भुटाइ झा प्रसिद्ध गेठरी झा ख्याति‍ प्राप्त वैदि‍क भेलाह। दरभंगा राजसँ सात सए बीघा जमीन लाखेराज ब्रह्मोत्तर रूपमे भेटल छलनि‍। ओइ समैमे कि‍नको ताधरि‍ पंडि‍तक बीच स्थान नै भेटनि‍ जाधरि‍ ओ काशीसँ पढ़ि‍ नै अबैत छलाह।
पं. चि‍त्रधर ठाकुर हुनके घरक भगि‍नमान परि‍वार। पंडि‍त चि‍त्रधर ठाकुरकेँ तीन बालक, पं. जयनाथ ठाकुर, पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर। तीनू पंडि‍त मुदा जेठका भाय खेती करैत कि‍सान बनि‍ गेलाह आ बाकी दुनू भाँइ पं. तेजनाथ ठाकुर आ पं. खर्गनाथ ठाकुर काशीसँ पढ़ि‍ एलाह। उच्चचकोटि‍क श्रेणीमे गि‍नती छलनि‍। पंडि‍त तेजनाथ ठाकुर जीवन-पर्यन्त लोहना संस्कृत वि‍द्यालयमे सेवा देलनि‍। तेकर पछाति‍ परि‍वारमे पं. गौरीनाथ ठाकुर, अनि‍रूद्ध ठाकुर आ सुन्दर ठाकुर भेलखि‍न। शरीरसँ अबाह रहने पं. सुन्दर ठाकुर वैद्यक रूपमे गामेमे वैद्यगि‍री करैत रहलाह। पं. अनि‍रूद्ध ठाकुर व्याकरणक पंडि‍त। सीतामढ़ी जि‍लाक वि‍द्यालयमे जि‍नगी भरि‍ सेवा देलनि‍।
अखन धरि दुइये परि‍वारक चर्च भेल अछि‍ मुदा एतबे नै अछि‍। पं. कामेश्वर झा, जे खगड़ि‍या वि‍द्यालयक संग दीप महावि‍द्यालयमे सेहो सेवा देलनि‍। वेद-व्याकरणक प्रकाण्ड पंडि‍त छलाह। पंडि‍त चण्डेश्वर झा अरड़ि‍या मध्य वि‍द्यालयक संस्थापि‍त शि‍क्षक बनि‍ अधवयसेमे मरि‍ गेलाह।

पंडि‍त उपेन्द्र मि‍श्र सभसँ भि‍न्न छलाह। एक संग ज्योति‍ष, वेद व्याकरण, साहि‍त्यक वि‍शेष ज्ञाता छलाह। कतेको महावि‍द्यालयमे सेवा दैत शरीर ति‍याग केलनि‍। सभसँ भि‍न्न ओ ऐ अर्थमे छलाह जे कोनो महावि‍द्यालयमे अधि‍क दि‍न नै टि‍क पबैत छलाह। सालक भीतरे कि‍छु ने कि‍छु खटपट भइये जाइत छलनि‍। जखने खटपट होइत छलनि‍, सोझे घरमुँह वि‍दा भऽ जाइत छलाह। मुदा गामो एलापर केकरो कि‍छु कहैत नै छलखि‍न। कि‍यो पुछबो ने करनि‍ जे ओहि‍ना एलौं आकि‍ झगड़ा-दान कऽ कऽ एलौं। अद्भुत गुण छलनि‍ जे अपने-आप वि‍मर्श करैत, समए संग अपन कर्त्तव्यकेँ छुटैत देखि‍ दोसर महावि‍द्यालय दि‍सि‍ वि‍दा होइत छलाह। खराम छोड़ि‍ पएरमे कहि‍यो जूत्ता-चप्पल नै पहिरलनि‍। परोपट्टाक वि‍द्वानक बीच अपन पहि‍चान छलनि‍, जइसँ कोनो वि‍द्यालय, महावि‍द्यालयमे स्वागत रहैत छलनि‍।
पंडि‍त उदि‍त नारायण झा, जे गोल्ड‍सँ सम्मानि‍त छलाह, शि‍क्षण कार्य छोड़ि‍ दोकानदारी व्यववसाय केँ अपन जीवि‍का बनौलनि‍। परि‍वारक स्थिति‍ खराब छलनि‍। बि‍नु उपारजने चलैबला नै छलनि‍। मुदा कि‍छुए दि‍नक मेहनति‍क फल नीक भेटि‍लनि‍। जीवन-यापन करैत बीस बीघा जमीन परि‍वारमे बनौलनि‍।
पं. रामनारायण झा व्याकरणक ज्ञाता छलाह। शरीरसँ पुष्ट‍ रहने शुरूमे पुलि‍सक नोकरी शुरू केलनि‍, मुदा वि‍देशी शासनक उठैत वि‍रोधमे नोकरी छोड़ि‍ शि‍क्षण कार्यमे चलि‍ एलाह। बेसि‍क स्कूल घोघरडि‍हामे प्रवासी जीक संग रहि‍ सेवा देलनि‍।

गामक स्कूलसँ १९५६ ई.मे जगदीश प्रसाद मण्डल नि‍कलला। गामसँ सटले पूब कछुबीमे मि‍ड्ल स्कूल बनि‍ गेल छल। तइसँ पहि‍ने पाँचमा धरि‍क स्कूल छल। मि‍ड्ल स्कूल अलग बनल। ओना अखन दुनू मि‍लि‍ एक भऽ गेल अछि‍ मुदा पहि‍ने दुनू अलग-अलग छल। पाँचमा धरि‍ फीस नै लगैत छल मुदा छठा-सातमामे अढाइ रूपैआ महीना फीस लगैत छल।
१९६० ईं.मे मि‍ड्ल स्कूलसँ नि‍कलि‍ केजरीबाल हाइस्कूल झंझारपुरमे नाओं लि‍खेलनि। बेरमाक वि‍द्यार्थी तमुरि‍यामे हाइ स्कूल आ झंझारपुरो हाइ स्कूलमे साले-साल वि‍भाजित होइत रहैत छल। कारणो रहै। जइ रूपक शि‍क्षकक टीम झंझारपुरमे छल ओइ तरहक टीम तमुरि‍यामे नै छल। तमुरि‍या हाइ स्कूलमे एक-आध शि‍क्षक साले-साल जाइत-अबैत छलाह जखन कि‍ झंझारपुरमे से नै छल, जइसँ झंझारपुरकेँ नीक मानल जाइत छल। जहि‍ना गामक आन-आन वि‍द्यार्थी पएरे जाइत-अबैत छलाह तहि‍ना ईहो जाइत-अबैत छला। कि‍छु गोटे होस्टलोमे रहैत छला। सालो भरि‍ कि‍छु नै कि‍छु असुवि‍धा रहि‍ते छलनि। ओना अखनो कि‍छु-कि‍छु छन्हिये। सालो भरि‍ ऐ तरहेँ रहै छल।

अगहनसँ माघ धरि‍ दि‍नो छोट होइए, मुदा वि‍द्यालयक समए छोट नै होइत छल। काजक अनुकूल समए भेटने दि‍न-राति‍मे अन्तर भलहिं नै बूझि‍ पड़ैत छै, मुदा गाम-घरक लेल तँ ई कठि‍न अछि‍ये। मौसमी छुट्टीक नाओंपर दिसम्बरमे बड़ा दि‍नक छुट्टी आठ-दस दि‍न होइत छल, जे परीक्षापरान्तक आ रि‍जल्टसँ पूर्व होइत छल।

गरमि‍यो मासमे असुवि‍धा तँ तहि‍ना मुदा ओ असुविधा दोसर तरहक होइत छल। ओना एकरा आम खाइक छुट्टी सेहो कहल जाइ छै मुदा ग्रीष्मावकासक नाओं सेहो छै। नमगर छुट्टी, मास दि‍नक होइत छल। नीक परि‍वारक वि‍द्यार्थीकेँ अनुकूल वातावरण रहने दोहरी लाभ होइत छलनि‍, साधारण परि‍वारक वि‍द्यार्थी आम खाइत-खाइत आधा-छि‍धा बि‍सरि‍ जाइत छला। शैक्षणि‍क वातावरण स्पष्ट रूपमे वि‍भाजि‍त भऽ जाइत छल। जहि‍ना जाड़क मास बरेड़ी छुबैत अछि तहि‍ना गरमि‍यो गाछक फुनगी छुबैत अछि‍। जइसँ अप्रील माने चैत सँ ताधरि‍ वि‍द्यालय भि‍नसुरका होइत छल जाधरि‍ गर्मी छुट्टी नै भऽ जाइत छल।
तमुरि‍या हाइ स्कूल आ झंझारपुर हाइ स्कूलमे इहो अंतर छल जे आधा घंटा आगू-पाछू खुजबो करैत छल आ बन्नो होइत छल। कारणो छलैक कमला पछि‍मक गाम मेंहथ, नरूआर आदि‍सँ लऽ कऽ पूबमे बेरमा धरि‍ आ गंगापुर खरबाइरसँ लऽ कऽ अलपुरा-अरड़ि‍या धरि‍क वि‍द्यार्थी झंझारपुरमे पढ़ैत छलाह। नमहर क्षेत्र तँए वि‍लम्बसँ स्कूल खुलैत छल। साढ़े एगारह बजे वि‍द्यालयमे छुट्टी होइत रहए। तखन पान-सात मील पएरे चलब कठि‍न छल। ओना ई बड़ कठि‍न नै कि‍एक तँ बेरमाक वि‍द्यार्थी पएरे चलि‍ लोहनो वि‍द्यालयसँ पढ़ने छलाह। तहि‍ना बर्खा मासमे सेहो होइत छल। कखन पानि‍-वि‍हाड़ि‍ आबि‍ जाए, तेकर कोनो ठीक नै। तहूमे कतेकाल बरि‍सत तेकरो ठेकान नै। खैर जे हो.....।
 
केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे १९६३ ई.मे हायर सेकेण्ड्रीक पढ़ाइ शुरू भेल। मुदा थोड़े पेंच लागि‍ गेलै। कला-विज्ञान आ वाणि‍ज्य तीनूक पढ़ाइ होइत छलैक। कला-वि‍ज्ञानक मंजूरी भेटि‍ गेल, वाणिज्यक भेटबे ने कएल। कते रंगक हवा बहए लागल। ओना शि‍क्षकमे बढ़ोत्तरी पछाति‍ भेल मुदा शुरूमे असुवि‍धा रहल।
 
१९५८ ई.मे जनता कओलेज खुजल। जन-सहयोगसँ कओलेज खुजल। मुदा कओलेजक जे नमगर-चौड़गर घर चाही, जे धड़फड़मे नै भेलै तँए हाइये स्कूलमे साधारण रूपे पढ़ाइ शुरू भेल। कि‍छु गनल चुनल विषयक पढ़ाइ शुरू भेल। खएर जे भेल मुदा शि‍क्षामे नव जागरण क्षेत्रमे आएल। बहुतोक मनक मुराद पूरा होइक संभावना बढ़ल। बी.ए. तकक पढ़ाइ लगमे हएत, तखन पढ़ैबला बच्चा आ पढ़बैबला गारजनक मनमे कि‍अए ने उत्साह जगतनि‍। कि‍छु दि‍नक पछाति‍ कओलेजक अपन कँचका ईंटा आ खपड़ाक मकान बनलै।

जगदीश प्रसाद मण्डल १९६५ ई.मे हायर सेकेण्ड्री पास केलापर बी.ए. पार्ट वनमे नाओं लि‍खेलनि। पहि‍ने दू बर्खक आइ.ए. आ दू बर्खक बी.ए. प्री हुअए लगलैक। दुनू दि‍ससँ वि‍द्यार्थीक प्रवेश हुअए लागल। बी.ए. पार्ट वन केलापर आनर्स पढ़ैक वि‍चार भेलनि। आ आन कओलेजमे आनर्सक पढ़ाइ होइत छल। जनता कओलेजमे नै होइत छल। एक-दू-तीन शि‍क्षकसँ अधि‍क कोनो वि‍षयमे शि‍क्षक नै छल। हि‍न्दी वि‍भागमे सेहो दुइये गोटे छलाह। प्राइवेट रूपमे तैयारी करए लगला। सी.एम. कओलेजक नाओंसँ फार्म भराएल आ परीक्षो भेल।
 
१९५२ ईं.क चुनावक बाद देशक अपन वि‍धि‍वत् सरकार बनल। मुदा एक संग कतेको प्रश्न उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सरकारी कार्यलयमे कर्मचारीक जरूरति‍ भेल। जेकर बहालीमे जाति‍वाद आ पैरवी-पैगाम शुरू भेल। आम जनताक जगाएल सरकार जनतासँ बहुत दूर हटि‍ गेल।
 
ओना जे कोनो नव-स्वतंत्र देशक स्थि‍ति‍ होइए तहि‍ना अपनो ऐठाम रहए। मुदा ओइ लेल जत्ते सकारात्मक सोच आ काजक औसत हेबाक चाहि‍ये से नै भेल। सामंती सोच आ सामंत मजगूत छल, जइसँ आम-अवामक बीच आक्रोश पनपए लगलै। राजा-रजबाड़े जकाँ शासन पद्धति‍ चलए लागल। तही बीच भूदान आन्दोलनक उदय सेहो भेल। ओना तेलांगनासँ शुरू भेल भूमि‍ आन्दोलन देशकेँ डोला देने छल। तइ संग केरल, बंगालक संग छि‍टफुट अनेको राज्यमे भूमि‍ आन्दोलन पकड़ि‍ रहल छल। दरभंगा जि‍लामे सेहो भूमि‍ आन्दोलन शुरू भेल।
 
१९५७ ई.क चुनावमे कांग्रेस सरकारक स्थिति‍ कमजोर भेल। केरलमे वामपंथी सरकार बनि‍ गेल। आजादीक दौड़क जे जागरण छल ओे ताजा छल, जइसँ अखुनका जकाँ नै छल। ऐ बीच गोटि‍-पङरा हाइ स्कूल, कओलेज, प्राइवेट रूपमे बनए लागल छल। मुदा औसत कम रहल। खादी भंडार उद्योगक ह्रास होइत गेल आ होइत-होइत ई मेटा जकाँ गेल। तहि‍ना नगदी पैदावारमे कुशि‍यार सेहो छल, जे उद्योगपति‍क चलैत सेहो मरए लागल।

मि‍थि‍लांचलमे मूलत: जीवि‍काक साधन कृषि‍ छल। ओना सघन रूपमे कृषिक‍ पैघ साधन जीवि‍काक छी, मुदा से नै छल। जेहो छल तहूमे रंग-बि‍रंगक छल-प्रपंच चलि‍ रहल छल। बटाइ खेतीमे अधि‍या उपज उपजौनि‍हारकेँ भेटैत छलैक। जखन कि‍ उपजबैमे, खेती करैमे कि‍छुए अन्नक खेती लाभप्रद छल। उपजाक अनुपातमे लागत खर्च किछुमे कम छल आ कि‍छुमे अधि‍क। जइमे अधि‍क छल ओइमे बटेदारकेँ घाटा लगैत छलैक। तइ संग रौदी-दाहीक प्रभाव ओहन कि‍सानपर सेहो पड़ैत छल जे खेती करैत छलाह। जे बेसी खेतबला छलाह हुनकर खेती अधि‍कतर बटाइक माध्यमसँ चलैत छल। तइ संग अधि‍क अन्न रहने अन्नक महाजनि‍यो चलैत छलनि‍। महाजनि‍योक प्रथा गाम-गामक फुट-फुट कोनो गाममे सवाइ (एक मोनक सवा मोन, एक सीजि‍नक) तँ कोनो गाममे एगारही (आठ पसेरीक मोन, एक मोनक एगारह पसेरी) तँ कोनो गाममे डेढ़ि‍या (एक मोनक बारह पसेरी)। जेकर मतलब भेल जे एक मोनक आधा मोन सूदि‍ये भेल। तइ संग इहो होइत छल जे जँ सालक कर्ज सालमे चुकाएल जाइत छल, आ ने तँ सूदो मूड़े बनि‍ जाइत छलैक। जइसँ दू साल बितैत-बितैत कर्ज दोबरा जाइत छलै। अखुनका जकाँ बि‍आह तँ तते भारी नै छल मुदा माए-बापक सराधमे सामाजि‍क आ जातीय एहेन चाप छल जे खेत-पथार बेचि‍ काज चलैत छल। खेतक हि‍साबसँ चारि‍-पाँच मेलक कि‍सान छलाह। गामक-गाम एक-एक गोटेक छलनि‍। जखने एकठाम जमीन समटाएल रहत तखन दोसर-तेसरक की आ कते हेतनि‍?
खेतमे काज करैबला बोनि‍हारोक स्थिति‍ बदसँ बदतर छल। एक तँ दि‍न भरि‍क बोनि‍ कम तहूमे सालक गनल दि‍न काज होइत। कि‍सानोक बीच खेतीक नव वैज्ञानि‍क खेतीक पद्धति‍क अभाव छलनि‍। अभावोक कारण छल जे ने सरकारक धि‍यान खेती दि‍स छल आ ने खेतीक साधन उपलब्ध छल।
त्रेता युगक जनकक हर जकाँ खेत जोतैक हर होइत छल! जहि‍ना मरि‍आएल बड़द तहि‍ना जोति‍नि‍हार। तइ संग खेत पटबैक पानि‍क कोनो दोसर बेवस्था नै। जहि‍या पानि‍ हएत तहि‍या खेती शुरू हएत। जइसँ बेसमए खेती होइत छल। पोखरि‍-झाँखड़ि‍मे अनेरूआ माछ जे होइ, सएह माछ पोसब कहाइत छल। तहि‍ना तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक हाल छल। मोटा-मोटी कृषि‍क ओहन दशा बनि‍ गेल छल जइपर जीवन यापन करब कठि‍न भऽ गेल छल।

पशुपालनक रूपमे गाए-महींस बकरी पोसब मात्र चलैत छल। गाए-महींस पोसैक बीच, महाजनीक एहेन सूत्र लागल छल जे पोसि‍नि‍हार सिर्फ पोसैत छलाह। एक तँ नस्ल पछुआएल रहने पछुआएल कारोबार दोसर एहेन जालमे ओझराएल जे धीरे-धीरे कमि‍ते गेल जे बढ़ैक कोनो संभावना नै रहल।
नगदी फसि‍लक रूपमे कुशि‍यार आ पटुआक खेती छल। मुदा उद्योगपति‍क कारामातसँ ओहो दुनू कमजोरे होइत गेल। मुदा सरकारक प्रति‍ जन-आक्रोश बढ़ल। गाम-घरक लोक सरकारी लाभक माने बुझैत छल मात्र कोटाक वस्तु धरि‍। सेहो रस्ते-पेरे लुटाइत छल।

१९६७ ई.क चुनाव आएल। जगदीश प्रसाद मण्डल बी.ए.क वि‍द्यार्थी रहथि। आजादीक पछाति‍ पहि‍ल जन-जागरण छल। पढ़लो-लि‍खल आ वि‍द्यार्थियो मैदानमे उतरल।

सन् सैंतालीस...

भारतक स्वतंत्रताक त्रिवार्णिक झण्डा फहरा रहल छल।

मुदा कम्यूनिस्ट पार्टीक माननाइ छल जे भारत स्वतंत्र नै भेल अछि।

असली स्वतंत्रता भेटब बाँकी छै...

मिथिलाक एकटा गाम

जन्म होइत अछि एकटा बच्चाक.. ओही बर्ख ...

ओइ स्वतंत्र वा स्वतंत्र नै भेल भारतमे...

पिताक मृत्यु...गरीबी..

केस मोकदमा...

वंचितक लेल संघर्षमे भेटलै स्वतंत्र भारतक वा स्वतंत्र नै भेल भारतक जेल....

आइ बेरमामे पाँच-दस बीघासँ पैघ जोत ककरो नै..

ओइ गाम मे आइ जीवित अछि आइयो किसानी आत्मनिर्भर संस्कृति...

पुरोहितवादपर ब्राह्मणवादक एकछत्र राज्यक जतऽ भेल समाप्ति..

संघर्षक समाप्तिक बाद जिनकर लेखन मैथिली साहित्यमे आनि देलक पुनर्जागरण...

जगदीश प्रसाद मण्डल- एकटा बायोग्राफी...गजेन्द्र ठाकुर द्वारा ........शीघ्र
जारी.................................

समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग
विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली बला विद्यापतिसँ अछि... जै सम्बन्धमे हम चर्चा केलौं जे हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल... ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति केँ आ गोविन्ददासकेँ अपन बना लेलक आ बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो  मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (!!!) निकालल गेल- रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। किछु गोटे ज्योतिरीश्वरक भातिज कहि विद्यापतिकेँ सम्बोधित करऽ लगलाह!!

मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पज्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए। 

२. अहाँ बंगाल किए जाइ छी, पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै।

३.मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे गेल रहथि, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद प्रभात झा कहि रहल छला, जे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि, प्रभात झा कैंपेनिंग कऽ देलखिन्ह आ एक वोटसँ केण्डीडेट जीति गेलै। हमरा अहाँ सभकेँ ई अनुभव अछि जे कोनो टाइटिल हुअए पहिने, पटनो धरिमे लोक झाजी वा झौआ ओकरा कहि दै छै। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्म्ण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा। 

४.पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि: १.पनिचोभ सँ विद्यापतिसुत रमापतिक विवाह विद्यापतिक- माता(देवदासी)-दूषण पंजी २.महो केशवो सुत म.म.पाō गोविन्‍द सुता महो लक्ष्‍मीनाथ म.म. विद्यापति म.म. दामोदर ३.महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्‍वर ४.घोसोतसँ म.म. गोविन्‍द सुता म. लक्ष्‍मीधर म.म. विद्यापति ५.राजपण्डित म.म. उ. विद्यापति ६.करमहासँ देवनाथ सुत कवि विद्यापति ७.गुणपति सन्‍तति-पठोङगी)।। विद्यापति-पुडरीक-मछदी। केशव-अमरावती।८.।। सिंहाश्रम सँविद्यापति द्दौo भागीरथ सुतौ कुलेश्‍वर: ९.सिधूक: ए सुता देल्‍हन विश्‍वनाथ श्रीनाथा: सिंहाश्रम सँ विद्यापति दौ।। १०.मिश्र जयदेव (७६/०६) सुता नगवाड़ घोसोत सँ महामहोपाध्‍याय विद्यापति दौ ११.महामहोपाध्‍याय गोविन्‍द सुता महामहो लक्ष्‍मीनाथा परनामक (२०९/०५) ठकरू मo o उपाo विद्यापति १२.द्दौo।। एवम् ठo विद्यापति मातृक चक्रं।।१३.महोमहोपाध्‍याय विद्यापति सुता अनिरूद्ध अनन्‍त अच्‍युता: एकहरा सँ काशी दौ १४.सदुoसुपे सुतौ दामोदर: ए सुतौ डालूक: पवौलीसँ गोढि दौ डालू (३४/०६) सुतो विद्यापति १५.सुता शिरू पदम लाखू गादूका: एकहरा सँ श्री कर सुत चान्‍द दौ खौआल सँ भूले द्दौo मधुसूदन सुता उमापति (८४/०१) विद्यापति १६.मुसै सुता खौआल सँ डालू सुत विद्यापति दौ भण्‍डारिसम सँ शुभे द्दौo o १७.सोदरपुर सँ छोटाई दौ (२८/०८) बसाउन सुता पशुपति विद्यापति १८.कल्‍याण सुता करमहा सँ विद्यापति दौ १९.जालय सँ रामेश्‍वरसुत महिघर दौ यमुगाम सँ गेणाई द्दौo विद्यापति सुतो भगीरथ: २०.हरखू गोविन्‍दा सकo गुणे सुत विद्यापति दौ सुरगन सँ होरे द्दौo २१.कृष्‍णपति सुता मुरारि विद्यापति प्रजापति टकबाल सँ रामकर दौ।।२२.कविन्‍द्र पदांकित मo o o रघुनाथा करमहा सँ विद्यापति दौ २३.सुतो विद्यापति माण्‍डरसँ यग्‍यपति दौ २४.तल्‍हनपुर सँ गढ़वय द्दौ. विद्यापति २५.यशु सुतो रविपति रूद्रपति विद्यापति चन्‍द्रपति २६.नरउन सँ विद्यापति दौ २७.रविपति सुतो कृष्‍णपति विद्यापति घुसौत सँ होरे दौ।। २८.विद्यापति सुता बेलउँच सँराम दौ २९.गुणे सुत गौरीपति विद्यापति लक्ष्‍मीपति कुलपतिय: दरिo दिवाकर दौ ३०.महिपति झाक मातामह कवि कोकिल विद्यापति ठाकर) दामोदर सुतो पाँसदु. हरिदेव: नरउनसँ माङनि दौ ३१.गणपति सुतो कवि कोकिल राजपण्डित मo o उपाo विद्यापति: ए सुतौ हरिपति धनपति।। ३२.महामहोपाध्‍याय विद्यापतिसुता हृषिकेश ३३.हरपति सुता विद्यापति काशी दामोदरा:३४.रतिपति सुता सोदरo विद्यापति दौ ३५.विद्यापति प्रपौत्र पौत्र हरिश्‍वर धनेश्‍वर सुतो गोन्‍दूक पालीसँ ज्ञानदौ।।३६.विद्यापति द्दौ. वेणी सुतो रविनाथ: ३७.सोदरo विद्यापति द्दौo निकार ३८.श्रीपति सुतो विद्यापति परानौ दरिहरा ३९.सोदरo विद्यापति द्दौo मिश्र कमलनयन सुता हरिअम सँ बछाई दौ ४०.रवौआलसँ सोने दौ देवनाथ सुतो कवि विद्यापति पचही सोदरपुरसँ जगन्‍नाथ दौ ४१.गोपी सुतो विद्यापति वाचस्‍पति शीवा हरिअमसँ नारायण दौ।।४२.विद्यापति निधि प्र. धरापतिय: ४३.तरौनी करमहासँ महिधर दौ।।(४६/०३) विद्यापति (१११/०३) सुतो मधुसूदन: ४४.कुलानन्‍द हृदयनन्‍दनो कर. पनाई दौ (१०९//१०६) विद्यापति (३१४/०५) सुता प्रितिनाथ शोभनाथ महिनाथा: ४५.उँमापति सुत विद्यापति सुतो जयपति: ४६.जागू सुता सुरपति हरिपति प्रभापति गिरपति विद्यापतिय: ४७.हचलू सुता हरपति विद्यापति महो ज्ञानपति दिनपति मणिकंठा ४८.कृष्‍ण सुता रमापति श्रीपति रत्‍नपति विद्यापति: बूधवाल सँ धीरू दौ।।४९.दाशे सुता दयोरी खण्‍डबला सँ गोपीनाथ दौ (८५//०२) विद्यापति सुत जीवनाथ ५०.नरउन सँ विद्यापति द्दौo ५१.धर्माधिक रणिक बाटू सुतो विद्यापति ५२.सोदरपुर सँ गयन दौ विद्यापति सुता रमापति होरिल हररवू जिवाईका माण्‍डर सँ सोढू दौ।। ५३.खौआल सँ रघुनाथ दौ (५४//०७) विद्यापति सुत जानू ५४.टकबालसँ विद्यापति द्दौ मतिनाथ ५५.खण्‍डबलासँ विद्यापति सुत जीवनाथ दौ ५६.करमहा सँ विद्यापति द्दौo विश्‍वनाथ ५७.कृष्‍णपति सुतो उँमापति (बo २८/०१) विद्यापति (३०२/०३) पण्‍डुआ सँ पाँ भगीरथ दौ ५८.महो हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ विद्यापति दौ ५९.मधुसूदन सुतो विद्यापति: अलय सँ अनिरूद्ध दौ ६०.माण्‍डर सँ देवशर्म्‍म द्दौo विद्यापति सुता नरउन सँ बदनी दौ ६१.ठo श्‍याम सुतो पुरन्‍दर परमानन्‍दो माण्‍डर सँ विद्यापति दौ ६२.विद्यापति सुता सोदरपुर सँ जयराम ६३.धर्मेश्‍वरौ खौआल सँ हराई सुत मनोहर दौ रूद सुतो राम: गंगोली सँ देवे दौ विस्‍फी सँ कवि कोकिल राज पण्डित मo o पाo विद्यापति द्दौo राम सुतो भिरवूक: फनन्‍दह सँ लोचन दौ पकलिया सँ दिनू द्दौo भिरवू सुतो हराइक: सोदरपुर सँ विर सुत हरिदौ खौआल सँ शुभे द्दौo हराई सुता मोहन मनोहरा कमल नारायणा: सोदरपुर सँ जगन्‍नाथ सुत भवानी दौ भवानी सुतो हरिदेव सदायकौ हरिअम सँ गोविन्‍द सुत श्रीधर दौ सकo जागे द्दौo मनोहर सुता करमहा सँ रतनपति सुत कृष्‍णदाश दौ कृष्‍णदाश सुता सोदरपुर सँ मधुसूदन सुत सुन्‍दर दौ (४७//०५) दरिहरा सँ मुशाई द्दौo हरि सुतो प्राणपति: सोदरपुर सँ नारायण सुत ननू दौ (११०//०१) (१०१//०१) नारायण सुतो ननूक: वुधवाल सँ बहुड़ी दौ (१८०/०४) दामोदर सुतो बहुड़ीक: सोदरपुर सँ परमानन्‍द सुत कांगव दौ परमानन्‍द सुतो कांगव: माण्‍डर सँ हलघर सुत पीताम्‍बर दौ (५८//०५) करमहा सँ श्रीराम द्दौo कांगव सुता करमहा सँ शिवदेव सुत कारम दौ माण्‍डर सँ वावू दौहित्र दौo ६४. वावू दुर्गापति सिंह: सुतो वावू विद्यापति सिंह: करमहा सँ हरिनाथ सुत तारानाथ दौ ६५. खौआल सँ युवराज द्दौo बावू विद्यापति सिंह सुतो वावू गिरिजापति सिंह ६६.वावू गंगापति सिंह सुता भेषपति सिंह विद्यापति सिंह ६७.वावू भेषपति सिंह पत्‍नी अन्‍तर्जातीय ए सुत हंसपति सिंह: वावू विद्यापति सिंह सुतो रमन कुमार सिंह:६८.बाला सुतो भैया कल्‍याणौ खौआल सँ विद्यापति दौ ६९.विश्‍वनाथ काशीनाथा: अलय सँ विद्यापति दौ ७०.पाठक विद्यापति सुतो दुखमंजन कलरौ आसी एकहरा सँ उँमानन्‍द दौ ७१.नरपति सुता कल्‍याणपुर विस्‍फी सँ सुन्‍दर दौ कमलनयन सुत नारायण सुतो सुन्‍दर: करमहा सँ विद्यापति दौ ७२.मुरारि सुता दामोदर विद्यापति महिघर आनन्‍दा:७३.विद्यापति सुता पद्मापति सभापति आदिपति गणपतिय:।। ७४.विद्यापति सुतो छीतू परमानन्‍दो माण्‍डर सँ नरपति दौ बहेराढ़ी सँ गदाधर द्दौo ७५.अलय सँ कमल सुत नकटू दौ. विद्यापति सुत जीवनाथ सुतो परम: दरि. राम दौ।। ७६.करमहा सँ विद्यापति सुत मधुसूदन दौ ७७.मानी सोदरपुर सँ वाचस्‍पति सुत विद्यापति दौ ७८.खण्‍डबला सँ वावू दुर्गापति सिंह सुत वावू विद्यापति सिंह दौ ७९.खौआल सँ विद्यापति दौ ठ. मधुरापति सुतो वाछ शिवानन्‍दनो८०.सोदरपुर सँ बैद्यनाथ द्दौ. हरिकृष्‍ण सुता खौआल सँ मधुसूदनसुत विद्यापति दौ ८१.मधुसूदन सुत विद्यापति दौ ८२.दरिहरा सँ रमापति सुत वेणी दौ अलय सँ कृष्‍णपति सुत विद्यापति द्दौ ८३.अलय सँ विद्यापति द्दौ.॥ ८४.ज्‍यो. शिवनन्‍दन सुतो विद्यापति . ८५.खौआल सँ भवदेव सुत विद्यापति दौ. ८६.पाठक कृष्‍णपति सुतो उषापति विद्यापति . ८७.विद्यापति सुतो दुखभंजन कलरो एकहरा सँ देवानन्‍द सुत उँमानन्‍द दौ ८८.अलय सँ विद्यापति सुत कलरु दौ ८९.कारु सुता पिताम्‍बर विद्यापति देवकीमाना का सोदरपुर सँ वैदयनाथ सुत जयि दौ ९०.सुरोइ प्र. शारदानन्‍द सुता गौरीनन्‍दन वाचस्‍पति प्र. विद्यापति दिवाकर प्र. मन्‍दू रत्‍नाकर प्र.भ्र. भोलन जी का नग. घुसौत सँ दामोदर सुत उग्रमोहन दौ एकहरा सँ शोभानन्‍द द्दौ.९१.खौआल सँ विद्यापति दौ. 



आब आउ मूल मुद्दापर। हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पदावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए।आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) बार्बर कास्टमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कवि आ ओकर कृतिक चर्चा अछि

महादेव मूलतः गएर ब्राह्मणक देवता रहथि, आस्ते-आस्ते ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा अपनाओल गेलाह। विद्यापतिक कोनो पदावलीक रचनामे हुनकर संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै अछि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? उदाहरण देखू। 

विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर

भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पदावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पदावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पदावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण।ताहि आधारपर ई संकल्पित नाटिका प्रस्तुत अछि।विद्यापतिक पिआ देसाँतर दृश्य १स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि । मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोरपर कोतवाल आ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि।धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।हम युवती छी आ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि। 


सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।सास आ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आ ओ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि।


जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आ गाममे बड्ड चोर सभ अछि। 


सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।कोतबाल स्वपनहुमे पहरा नहि दैत अछि आ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि।


नृप इथि काहु करथि नहि साति।पुरख महत सब हमर सजाति॥ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि।


विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि।


विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि। दृश्य २ जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर कातसँ सासु आ ननदिकेँ जएबाक आ क्रेता पथिकक अएबाक संग युवती गेनाइ शुरू करैत छथि आ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि।मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि। हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि।


पथिक हे, एथा लेह बिसराम।हे पथिक! एतय विश्राम करू।जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतए भेटत। सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आ ननदि स्वभावसँ सरल छथि।एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भए जाएब तँ आब हमर सक्क नहि अछि।भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी। दृश्य ३एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबारि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देसाँतर मोन पड़ि जाइत छन्हि। ओ ननदि आ सखीकेँ सम्बोधित कए गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद।धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)- परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही।एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।हे सखी ! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू।भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू।


चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।चरण पखारू, आसन दियौक आ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हु।ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू।दृश्य ४जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबारि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक।कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।हम एकसरि छी आ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि।अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ।


छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।हे पथिक क्षमा करू आ जाऊ आ नगरमे कतहु बास ताकू।


आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही।


मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह।सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल।बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल।


घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू।


भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि। दृश्य ५अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कए आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि।घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि। 


बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।बारहम बरखक रही, तखन ओ गेलाह आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल।


बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।सास आ ननदि क्यो संग नहि छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि।


सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।ओ कामदेव लेल घर सजा कए देशान्तर चलि गेलाह आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल।


पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतए ततए चलि गेलाह।


नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कए लेलन्हि।


मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।दृश्य ६ एहि दृश्यमे सेहो, नहि तँ ननदि छथि, नहिये सासु आ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आ जुवती गबैत छथि।धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल, तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।तखने पथिक अतिथि अएलाह आ बरखा लाधि देलक।


के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि।घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमए लागल।कञोने कहब हमे, के पतिअएत, जगत विदित पँचबाने।हम ककरा कहब आ के पतियायत। कारण कामदेवक ख्याति तँ जगत भरिमे अछि।दृश्य ७मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लए जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँतिमे विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि।नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पदावली-सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीहतैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त,एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि।मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब।पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत।भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कए पथिककेँ कहि रहल छथि।


विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरए लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर!! हँ, आकि नहि!!!


पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि।


पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। 

१.की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि?


२.पदावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पदावलीक विद्यापतिमे नै छन्हि। ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ (पाली ताली नै) ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति बार्बर कास्टक रहबे करथि, वा ब्राह्मण कास्टक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पदावलीक चर्चा करैए ; आ नहिये पदावली पदावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पदावली तँ सर्वहाराक हर्ष ,उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै।आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भए जेतै? की हुनकर सृन्गरिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षड़यंत्र तं नै ? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि?"मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। जँ ओ बार्बर कास्टक रहथि तैयो आ जँ ब्राह्मण रहथि तँ आरो (कारण २१म शताब्दीक ब्राह्मणक कट्टरता तँ देखिये रहल छी आ ई हजार साल पुराण ब्राह्मण जँ पैरेलल परम्पराक रहथि तँ पागरूपी सामन्तवादी अवशेष तांत्रिक धार्मिक कर्ममे मात्र प्रयुक्त हुअए, विद्यापतिक माथपर नै)।

महाकवि विद्यापति
कवीश्वर
 ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत  अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। 
सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। 
समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पदावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि।
विद्यापति ठक्कुरः 1350-1435 विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि।



बोधि कायस्थ
  
विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति(ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पदावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक)विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल।


उगना महादेव
  
महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक अहिठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहैत छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल।

 

 

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

२.गद्य

२.१.जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा- फाँसी-आगाँ
  






जगदीश प्रसार मण्डलक दीर्घकथा-

फाँसी

 
पछि‍लासँ आगू-----------


..................... डकैतीक संग खून सूनि‍ मैनजनक मन ठमकल। अधि‍क दि‍नक संगी हएत। तँए दोसति‍ये करब नीक। पड़ले-पड़ल हुकुम चलौलक-
नवका कैदीकेँ खइयो आ सूतैयो ले दि‍हक।



.........................जहि‍ना जि‍नगीक सुख, खाएब-सूतबमे अबै छै तहि‍ना सूतबक आश देखि‍ बलदेवक मनमे खुशी उपकलै। खुशी उपकि‍ते मन बौआए लगलै। तही बीच मेटक मुँहसँ फुटलै-
तेलक शीशी छेबे करौ, काल्हि‍सँ गोदामे सँ लऽ लऽ अनि‍हेँ।
गोदामक नाओं सुनि‍ते वार्डमे गल-गूल शुरू भेल।
नवका कैदीकेँ गोदाम केना जाए देब। ई अन्‍याय छी।
कि‍ बात छि‍ऐ हौ ठीकेदार भैया? एना कि‍अए हड़बि‍र्ड़ो केने छह?”
तूँ अखन तड़ी-घटी नै बुझबि‍ही।
से कि‍अए हौ भैया, सुनने लोक सुनबो करैए आ नहि‍यो सुनैए। बुझौने लोक बुझबो करैए आ नहि‍यो बुझैए। पहि‍ने बजबहक तब ने?”
रौ बूड़ि‍बक, सभ गप सभठीम बाजब नीक थोड़े होइ छै। नीको अधला भऽ जाइ छै आ अधलो नीक भऽ जाइ छै।
एकबेर अजमा कऽ देखहक। नरकोमे ठेलम-ठेल करै छह। बहरामे लोक कि‍छु करैए तँ भीतर -जहल- अबैए। ऐठामसँ कतए जाएत। बाजह, तोरा कि‍ बूझि‍ पड़ै छह जे हम ओहि‍ना आएल छी। आकि‍ कि‍छु कए कऽ आएल छी।

ठीकेदारक बढ़ैत संगी देखि‍ कठहँसी हँसि‍ मैनजन बाजल-
कि‍ रे ठीकेदरबा, कथीक बमकी धेने छौ। सुन....।
एक दि‍सि‍ ठीकेदारकेँ अपन घटैत आमदनी मनमे नचैत तँ दोसर दि‍सि‍ मैनजनक आदेश। घुसुकि‍ कऽ ठीकेदार लगमे आबि‍ फुसफुसा कऽ बाजल-
मैनजन भैया, अहाँसँ कि‍ कोनो बात छि‍पल रहैए। बुझि‍ते छि‍ऐ जे दू पाइ बचा कऽ गाम पठबै छी।

ठीकेदारक बातसँ मेटक मनक आगि‍ नै ठंढ़ाएल। मुदा हवाक लहकी जकाँ जरूर लागल। मनमे उठलै दस लंठ तखन ने महंथ, जँ से नै तँ असगर वरसपति‍यो फूसि‍। जहि‍ना गुलाबी लाल आल-अड़हूल बनि‍ जाइत, रंग बदलि‍ अपराजि‍त उज्‍जर-कारी बनि‍ जाइत, दि‍न-राति‍क खेलमे पूर्णिमा अमावस्‍या आ अमावस्‍या पूनो बनि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मनमे जि‍नगीक जुआरि‍ उठए लगलै। मुदा बि‍ना जारनक आगि‍ जहि‍ना, पि‍यासल बि‍नु पानि‍ जहि‍ना, खेति‍हर बि‍नु खेत जहि‍ना शक्‍ति‍ रहि‍तो हीनशक्ति‍का बनि‍ जाइत अछि‍ तहि‍ना जि‍नगीकेँ सुता कऽ राखब छी। मुदा प्रश्नो तँ अजनव अछि‍। नीक भोजन, नीक नीन इन्‍द्रासनक मुख्‍य द्वार छी, तखन जि‍नगी....?
जि‍नगीक आवश्‍यक तत्वमे सूतबो -नीन- तँ अनि‍वार्य छी। तखन अधला केना भेल? मुदा जखन दस कोठरी बहारैक, साफ करैक भार रहत तखन एक्के कोठरी बहारबो तँ उचि‍त नै। मैनजनक मन ठमकल। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घूमि‍ ताकब नीक बुझै। मनमे पुन: उठलै, कि‍यो जोग क्रि‍यामे जोगी बनि‍ जोगि‍या जाइत अछि‍, कि‍यो भोगी बनि‍ भोगि‍या जाइत अछि‍ तहि‍ना तँ कि‍यो काजोमे कजि‍या जाइए। मुदा कज्‍जी भेने तँ अबाहो भइये जाइए। जइठाम नि‍रोग वस्‍तुक बलि‍ प्रदान होइत तइठाम अबाहक पूछ केतेक?
सामंजस करैत मैनजन भाव-प्रवीण भऽ बाजल-
बौआ ठीकेदार, ई दुनि‍याँ खेल छी। अपना सभ जहलमे तीत-मीठ करै छी, आ कि‍यो खुलल धरती-अकास बीच खूलि‍ कऽ खेलाइए। तइठाम तोहीं कहह जे कि‍ नीक हेतइ?”

जहि‍ना चोरोक भरमार अछि‍, कि‍सि‍म-कि‍सि‍मक चाेर अछि‍, तहि‍ना ने एकरंगाहो चोरक भरमार अछि‍। अमती काँटमे ओझराएल जकाँ ठीकेदार ओझरा गेल। जँ चोर चोरि‍ कए कऽ आनए आ जरूरतमन्‍द लोककेँ दऽ दइ तखन ओकरा की कहब? चोरि‍ तँ ओ ने होइत जे चुपचाप आनि‍ चुपचाप रही। जइसँ कि‍यो बुझबो ने करत आ तरे-तर मखड़ैत रहब। ठीकेदारकेँ गुम देखि‍ मैनजन पुछलक-
गुम कि‍अए छह, ठीकेदार? तोरेपर छोड़ि‍ देलि‍यह जे जे तूँ कहबह सएह करब। जाधरि‍ प्रेम-प्रेमसँ नै मि‍लि‍, आत्‍मा-आत्‍मासँ नै मि‍लि‍, मन-मनसँ मि‍लि‍ कऽ नै चलत ताधरि‍ भरि‍ मन सि‍नेह कतए सि‍ंगार करत।
जबाबक तगेदा सुनि‍ ठीकेदारक मनकेँ नै रहल गेलै बाजल-
मैनजन भाय, जखन किलो-कि‍लो तेल अहाँकेँ पहुँचैबि‍ते छी, तखन नवका कैदीकेँ कि‍अए गोदाम जाइले कहलि‍ऐ?”
बौआ, मालीमे तेल हथुड़ैत देखलि‍ऐ, तँए बजा गेल।
अपन बढ़ैत पक्ष देखि‍ ठीकेदारक मनमे खुशी पनपल। खुशि‍आएल मन बजलै-
जे आदमी आइये जहल आएल अछि‍, ओकरा सोझे गोदाम पठाएब नीक नै। चोर अछि‍ कि‍ छुलाह अछि‍, से अखन लगले केना बूझि‍ जेबै? जखन हमरे हाथमे गोदाम अछि‍ तखन अहाँकेँ अभाव नै हएत सएह ने?”
ठीकेदारक बात सुनि‍ते मैनजनक मन तीआइर जालमे फँसल माछ जकाँ ओझरा गेल। चोर तँ चोर भेल, मुदा छुलाह कि‍ भेल? मुदा मैनजन भऽ पूछबो नीक नै। जेकरे हाथ सभ कि‍छु, सएह नै बुझै, मैनजनक मनकेँ घुरि‍अबए लगल। एते दि‍नसँ जहलमे छी, ठीकेदारक हि‍साबे छुलाहोक संख्‍या कम नै अछि‍, मुदा नै बूझि‍ पेलौं से केहेन भेल?
शब्‍दक मोड़ बदलैत मैनजन पुछलक-
कते रंगक छुलाह जहलमे हेताह ठीकेदार?”
जहि‍ना नारद धरतीक रि‍पोर्ट अकासमे करैत तहि‍ना ठीकेदार अपनाकेँ महसूस करैत बाजल-
भाय सहाएब, तेहन घुरछी लगल सबाल अछि‍ जे धड़फड़मे छूटि‍ जाएत। तँए वि‍हि‍या कऽ देखए पड़त। पान-सात दि‍नमे पूरा-पूरी कहि‍ देब।

बलदेवक मनमे जहलक पहि‍ल दि‍न नचए लगलै। पुन: मनमे उठलै, मात्र कि‍छु घंटाक लेल दुनि‍याँमे छी, तखन एक्के दि‍नक काजमे घेराएल रहब नीक नै। मुदा कहबो केकरा करबै आ सुनबो के करत। आगू बढ़ि‍ते मनमे उठलै, जि‍नगीमे जे कि‍छु जे करैए ओ आन देखौ, बुझौ आकि‍ नै देखौ-बुझौ मुदा केनि‍हार तँ जरूर देखबो करैए आ बुझबो करैए। मनमे ग्‍लानि‍ उठए लगलै। जहि‍ना बर्खाक बहैत बुन्नक बेग, घेरामे घेरा जमा हुअए लगैए तहि‍ना जि‍नगीक चलैत चक्रक चालि‍ बलदेबक मनमे समटाए लगलै। कते भारी अपराधी छी जे धरतीक भार बनि‍ गेल छी, जँ हमरा सन अपराधीकेँ फाँसी नै होइ, सेहो अनुचि‍त हएत। मन असथि‍र भऽ गेलै। मनुखे ने मानवो आ दानवो बनैए। दुनि‍याँक ऐ रंगमंचपर कि‍यो वीर बनि‍ तँ कि‍यो कायर बनि‍, पार्ट अदा करैए। मन ठमकलै। पुन: उठलै, जइ धरतीक भार उठबए आएल छलौं ओइ धरतीक भार बनि‍ गेलौं, एना कि‍अए भेल? की जि‍नगी भरि‍ हाथ-पएर मारि‍ रहलौं, सेहो तँ नै अछि‍। चलबैत अाएल छी। तखन भार कि‍अए बनि‍ गेलौं। मन अँटकि‍ गेलै। आइ जरूर बूझि‍ पड़ैए जे जि‍नगी भरि‍ वि‍परीत -बे-पीरि‍त- दि‍शा चलि‍ कुमार्ग पकड़ि‍ लेलौं मुदा से ओइ दि‍न कहाँ बुझलि‍ऐ जे कुमार्ग छी आकि‍ सुमार्ग। काजोमे कतौ बाधा कहाँ उपस्‍थि‍त भेल? जहि‍ना धारक धारा सि‍रासँ भठ्ठा दि‍सि‍ धड़धड़ाइत चलैए मुदा भठ्ठाकेँ सि‍रा दि‍सि‍ ससरैमे सामना करए पड़ै छै। केना-पानि‍ये पानि‍केँ रोकैत रहैए। मुदा बीचमे एकटा तँ होइ छै सि‍रोक पानि‍ आ भठ्ठोक पानि‍ एक-दोसरसँ रोकाइत, ठाढ़ हुअए लगैत अछि‍। ताधरि‍ ताढ़ होइत जाइत जाधरि‍ धारसँ ऊपर उठि‍ धरतीपर नै छि‍ड़ि‍आए लगैत। मुदा धरति‍योपर तँ दि‍शा अवरूद्ध करि‍ते अछि‍। आइ धरि‍ जे नै बूझि‍ सकलौं ओ अपने केना बूझि‍ पाएब। मुदा नै, जि‍नगीक अंति‍म छोरपर भलहिं सभ बात नै बूझि‍ सकि‍ऐ, मुदा कि‍छु नव तँ जरूर बूझि‍ पाबि‍ रहल छी। जँ से नै, तँ कहि‍यो नै बूझि‍ पेलौं जे फाँसी हएत? हमहीं नै सभ एहने वृत्ति‍ करैए, मुदा सभकेँ फाँसि‍ये कहाँ होइ छै। जइठाम पुरजा-पुरजी मनुखक अंग बनल अछि, सभ अंगमे गुण-दोष छै, तइठाम केना जोड़ि‍ कऽ चलाओल जा सकैए। समए पाबि‍ कि‍यो दौड़ए लगैए आ कुसमए पाबि‍ थकथका जाइए। तइठाम सौंसे मनुख बनब, धीया-पुताक खेलौना नै छी। समए अनुकूल बनए-बनबए पड़ै छै, से नै तँ रग्‍गड़मे लोक रगड़ाए कि‍अए जाइए।

बि‍सरि‍ गेल बलदेव बारह बजेक फाँसी। मन आगू दि‍सि‍ बढ़लै। जइठाम अधि‍कांश फूल ओहन अछि‍ जे अनेको रंगक होइए। गंध, रूप, अाकार समान रहि‍तो एक-दोसराक अनुकूलो‍ आ प्रति‍कूलो अछि‍। तहि‍ना गुलाबी आ लाल आलो-लाल आ गाढ़ो लाल बनैए तहि‍ना तँ अपराजि‍त करि‍यो बनैए आ उजरो। आ जँ उजरोपर करि‍ये रंग चढ़ि‍ जाए, जना एक-दोसरपर चढ़ैए। भलहिं थलकमल उज्‍जरसँ लाल भऽ जाए मुदा सभ तँ थलकमले नै छी।
जहि‍ना फुलवाड़ी फलवाड़ी वा वंशबाड़ी टहललाक उपरान्‍त छाहरि‍मे बैसैक मन होइए तहि‍ना बलदेवकेँ सेहो भेल। दुनि‍याँक दृश्‍य देखि‍ मन हहि‍आए लगलै। ऐठाम के देत? केकरासँ मंगबै? जँ मंगबो करबै तँ जरूरी नै अछि‍ जे नीके देत। अधलोकेँ नीक कहि‍ दैत अछि‍।

जुग-जुगसँ रंग-बि‍रंगक फूल-फलक गाछ रहि‍तो अखनो हराएल अछि‍ आ हराइयो रहल अछि‍। भरि‍सक हराइ-जीताइक खेले ने तँ चलैए। बलदेवकेँ अपने-आपपर शंका उठलै। अखन जहलक सेलमे छी, अकलबेड़ामे फाँसीपर चढ़ब, कहीं बुइधे तँ ने भगंठि‍ रहल अछि‍। भंगठले बुधि‍ ने बताह कहबै छै। मुदा बि‍नु भंगठलोकेँ तँ बताह कहै छै। जहि‍ना धान-रब्‍बीक रग्‍गड़सँ हाँसू मुरछि‍ जाइए तहि‍ना बलदेवक मन मुरछि‍ गेलै। कि‍छु समए नि‍कलि‍ते मनमे उठलै, अझुका बाद के हमरा मन राखत। कोनो कि‍ हम असगरे मृत्‍युदंड पेलौं आकि‍ पबै छी। ि‍कयो गाछपरसँ खसि‍ तँ कि‍यो पानि‍मे डूमि‍, कि‍यो बीखहा दबाइ पीब, तँ कि‍यो वि‍षैला साँपकट्टीसँ....?
मुदा हम तँ ओइ सभसँ भि‍न्न छी? दुनि‍याँक बीच अपराधी छी, ओहन अपराधी जेकरा दुनि‍याँ थूक फेक भगबैए। मनमे हुमड़ैत वायुक दरद बूझि‍ पड़लै। केकरा लेल एते अपराध केलौं? कि‍ अपना ले आकि‍ परि‍वार ले। आइ के हमरा संग फाँसीपर चढ़त? जँ अपना ले केलौं तँ कि‍ हाथ-पएर नै अछि‍। मनमे एकाएक समुद्रक शीतल समीरक झटका लगलै। झटका लगि‍ते मुँहसँ नि‍कलए लगलै- ओ फाँसी केहेन होइए, जे हँसैत अपने हाथे गरदनि‍मे लगबैए। ओहि‍ना हँसैत मुँह लोकक सोझामे हँसैत रहैए। आ ओ फाँसी केहेन जेकरा थूक फेक लोक आँखि‍ मूनि‍ लइए। कि‍यो सपूत बनि‍ फाँसीपर चढ़ि‍ अमर ज्‍योति‍ जरबैत अछि‍ आ कि‍यो करि‍आएल इजोतमे अन्‍हराएल रहैत अछि‍। ऐ धरतीपर ककरो संग कि‍यो नै जाइत अछि‍। सभ अपन-अपन स्‍वार्थक पाछाँ रहैत अछि‍। मन ठमकलै। मनमे उठलै, केना नै जाइत अछि‍। आत्‍माक संग आत्‍मा जरूर जाइत अछि‍। नीकक संग नीक आ अधलाक संग अधला तँ जाइते अछि‍।

राति‍क अंति‍म पहर। एक दि‍सि‍ राति‍ उसरैक बेर तँ दोसर दि‍सि‍ दि‍न चढ़ैक समए। अर्द्धचेत बलदेवक भक्क तखन पुन: खुजल जखन अन्‍हारमे हराएल परुकी संगीक बीच अपन उपस्‍थि‍ति‍ दर्ज करबाक लेल घूटकल, अवाज देलक। अपन-अपन आवेशी अवाजमे गामसँ अान गाम, आ एकसँ अनेक कि‍सि‍मक गाछपर एक जुटताक अवाज देलक। यएह समए छी जे गौतमो ऋृषि‍केँ चन्‍द्रमा धोखा देलकनि‍। सराप चाहे गौतम जे देलखि‍न मुदा एते तँ भेबे केलनि‍ जे आत्‍मासँ खसि‍ देहलोकमे उतरि‍ गेलाह। चन्‍द्रमामे जखन गहन लगि‍ जेतै तखन अन्‍हारमे धरतीपर केकरा के चि‍न्‍हत?
परुकी सबहक अवाज सुनि‍ते बलदेवक मनमे जहि‍ना तरेगन रहि‍तो भुरुकबा तरेगन आल-लाल ज्‍योति‍ धरतीपर हँसैत आबि‍ प्रकाशि‍त करैक परि‍यास करैत, तहि‍ना बलदेवक मनमे सेहो पतराएल प्रकाशक आगमन भेलै। ज्‍योति‍क आगमन होइते उठलै, कोनो कि‍ हमरेटा फाँसी हएत आकि‍ अदौसँ होइते एलै आ भवि‍ष्‍योमे होइत रहतै। मुदा हमरा जि‍नगीमे फाँसी चढ़ैक बाट पकड़ाएल कहि‍या?
बलदेव पाछू उनटि‍ ताकए लागल। हम तँ ओइ दि‍न फाँसीक बाट पकड़ि‍ लेलौं जइ दि‍न डगर छोड़ि‍ डगहर पकड़ि‍ लेलौं। डगरक तँ सीमा-सरहद होइ छै, नि‍श्चि‍त जगहसँ नि‍श्चि‍त जगह पहुँचैए, मुदा डगहर तँ से नै होइत। घुरि‍या-फिड़ि‍या बौअबैत रहैए। मनुष्‍यक तँ डगर होइ छै, डगहर तँ पशु लेल होइ छै जे जंगलमे चरैले जाइत छैक। कि‍ हमहूँ पशुए भऽ गेलौं। मुदा पशुओ तँ जीबे छी आ मनुखो जीबे छी। दुनूक बीच आत्‍माक बास होइ छै। मुदा आत्‍माक बास रहि‍तो पशु कहाँ बूझि‍ पबै छै जे हमरा बीच आत्‍माक बास अछि‍। मुदा मनुष्‍यकेँ तँ से नै होइ छै। मनुष्‍ये नै जीव-जन्‍तुओसँ प्रेम करैत अछि‍ आ प्रेम पबैत अछि‍। सहयोगी बनि‍ जि‍नगीमे सहयोगो करैत अछि‍ आ सहयोगक अपेक्षो रखैत अछि‍। जँ से नै तँ ओ अपन रहैक बेवस्‍था कि‍अए ने कऽ पबैत अछि‍। जेकरा रहैक बेवस्‍था नै हेतै तेकरा जि‍नगीक गारंटी कि‍ भऽ सकै छै। भलहिं बौआ-ढहना घास-पात वा अन्‍य भोज्‍य पदार्थ ताकि‍ पेट भरि‍ लि‍अए मुदा मनुष्‍य जकाँ तँ जि‍नगी जीबैक गारंटी नै कऽ सकैए। मनुष्‍य तँ पातालसँ पानि‍ आनि‍ पीब सकैए, धरतीसँ भोज्‍यपदार्थ उपजा सकैए। फेर मन ठमकलै। सोचती बन्न भेलै! सोचनशक्‍ति‍ रूकलै!

जहि‍ना कटल वा टुटल रास्‍ता देखि‍ राही ठमकि‍ जाइत जे ओइ पार केना जाएब। मुदा कटबो आकि‍ टुटबो तँ रंग-बि‍रंगक होइत अछि‍। एक टुटब ओहन होइत अछि‍ जइमे पानि‍-थाल-कीच होइत अछि‍ आ दोसर ओहन होइत जे सुखले रहैत अछि‍। जइमे सावधानीसँ नि‍च्‍चाँ उतरि‍ पार कएल जाइत अछि‍। तहि‍ना तँ पनि‍आएलो-थलाहमे होइत। कतौ अगम होइत कतौ कम होइत जइठाम कम होइत तइठाम कने कठि‍ने सही मुदा पार तँ कएल जा सकैए। मुदा अगममे तँ डुमबोक आ गड़बोक संभावना बनले रहै छै। फाँसी लगा, गरदनि‍ दाबि‍ हमर प्राण लेत, मुदा फँसरि‍यो लगा तँ लोक मरि‍ते अछि‍। एहेन-एहेन परि‍स्‍थि‍ति‍ पैदा कऽ दैत जे बेवस भऽ लोक अपन गरदनि‍मे फँसरी लगा प्राण गमबैत अछि‍। कि‍ ओ अपराधी छी आकि‍ अपराधीक सजा पबैए। जखन ओ अपराधी नै छी, तखन अपराधीक सजा कि‍अए भेटि‍लै?
वोनक बाघ सि‍ंह कि‍अए दोसराक प्राण लऽ लऽ खून पीबैए? ओकर कि‍ दोख छै? यएह ने जे ओकरा आगू ओ अब्‍बल अछि‍। फेर मन ठमकलै। कि‍यो इनार-पोखरि‍मे डूमि‍ मरैए, कि‍यो आगि‍, पानि‍, पाथर, वि‍र्ड़ोमे मरैए। ततबे नै कि‍यो गाछपर सँ खसि‍ मरैए, तँ कि‍यो गाछपर चढ़ैत-उतरैत काल खसि‍ मरैत अछि‍। प्रकृति‍क तँ अद्भुत लीला अछि‍। क्षण-क्षण पल-पल बाटो पकड़बैत अछि‍ आ धकेल-धकेल नि‍च्‍चाे करैत अछि‍। ऊपर-नि‍च्‍चाक खाड़ी बना जीवन-मृत्‍युक सीमा बनोनै अछि‍। एक तँ ओहि‍ना आगि‍मे अगि‍आएल अछि‍, पानि‍मे पनि‍आएल अछि‍, हवामे हवि‍‍आएल अछि‍, तखन केना परेखि‍ पाएब। परखैले जेहेन आँखि‍क इजोत चाही तेहेन ने करि‍आएल बादलमे अछि‍ जे बर्खासँ सि‍क्‍त करत आ ने डभि‍आएल धरतीमे अछि, जे धरतीक परतकेँ तेना सि‍र गछाड़ने अछि‍ जे शक्‍ति‍हीन बना देने अछि‍। सूखल माइक छातीमे दूध कहाँ अछि‍ जे चाहि‍यो कऽ बेचारी दऽ सकती। अन्‍हारो राति‍मे, जखन हाथ-हाथ नै सुझैत, जखन अपन देहो हरा जाइत, देहक सभ अंग नि‍ष्‍क्रि‍य भऽ जाइत, तखनो तँ कि‍छु रहि‍ते अछि‍ जे हँथोरि‍यो-हँथोरि‍ कि‍छु दूर धरि‍ लइये जाइत अछि‍। मुदा हम तँ सोलहन्नी आन्‍हरा गेलौं। जखन पीबैयो बला पानि‍ बसि‍या गेने फेका जाइत, तहि‍ना आइ दुनि‍याँसँ फेका रहल छी। अपन फेकाइत जि‍नगीपर नजरि‍ पड़ि‍ते बलदेवक मन सहमि‍ गेलै। ने आगूक बाट देखै आ ने पाछू घुसुकि‍ पबैत। जहि‍ना जि‍नगीक ओहि‍ मोड़पर कि‍यो चारू दि‍ससँ दुश्‍मनसँ घेरा, हारि‍-जीतक तारतम्‍य नै कऽ पबैत तहि‍ना बलदेव सेहो घेरा गेल। हारि‍यो मानने दुश्‍मनक हाथे प्राण गमेबे करब, तखन प्राणक मोह राखि‍ हारि‍यो मानब उचि‍त नै। तइसँ नीक जे सामना करैत सामनेमे जत्तेकाल ठाढ़ रहब ओत्तेकालक जि‍नगीक महत तँ आरो कि‍छु हएत।
मुदा ठाढ़ रहि‍ के सकैए? जेकर शरीर टी.बी., केन्‍सर सन रोगसँ जर्जर भऽ खोखला भऽ गेल रहैए ओ ठाढ़ केना रहि‍ सकैए। पएरमे ओ शक्‍ति‍ कहाँ छै जे ठाढ़ रखतै। बलदेवक मन वि‍चलि‍त भऽ गेलै।

कि‍छु क्षण बाद मनमे उठलै, फाँसी तँ पोखरि‍क जाइठ‍ सदृश जि‍नगीक छी। कि‍यो अगम पानि‍मे डुबकुनि‍याँ काटि‍, माटि‍ नि‍कालि‍ जाइठक मुरेड़ापर लगबैए तँ कि‍यो कि‍नछैरे-कि‍नछैरमे पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍, पि‍छड़ैत-पि‍छड़ैत अगम पानि‍मे डूमि‍, सड़ि‍-सड़ि‍ सड़ैनि‍क गंध पसारैत अछि‍। मुदा जि‍नगीक अंति‍म छोड़पर बुझनहि‍ की हुअए? कमसँ कम जँ अपनो लेल केने रहि‍तौं तँ कनैत कि‍अए, हँसैत कि‍अए ने दुनि‍याँ छोड़ि‍तौं। जि‍नगीक अचूक उपाय कहाँ बूझि‍ पेलौं।

जारी........................................



 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
मधुपनाथ झा
बिदापत नाच
विदापत-नाच एहि नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिला मे भेलैक
, एहन अंदाज़ कैल जाति छैक | लेकिन अपने मात्रि -भूमि मे इ कोन तरह के अवस्था मे अछि एकरा कहबाक जरूरत नय बुझैत अछि, परंच उत्तरी बिहार के किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदि के गाम सब मे आइयो एकर 'क़द्र' छैक | ई छोटका लग सब के नाच बनि क रहि गेल अछि | तथाकथित भद्र समाज के लोग एकरा देखबाक मे अपन हेठी बुझैत छथि , लेकिन मुसहर, धाँगड़, दुसाध के ठाम---विवाह, मुंडन संगहि अन्य अवसरो पर एकर धूम मचल रहैत छैक | ऐ नाच मे साथ-आठ टा कलाकार रहैत छैक आ दुइए टा वाद्य यन्त्र-मृदंग और मजीरा रहैत छैक | 

त चलू विदापत-नाच के आनंद उठाबि अपन भद्रता के किछ काल लेल....धृग धा
, धृग धा तिन्ना --बाजि क मृदंग बौक भ गेल.....कुन कुन कुन कुन... मजीर स्वर मे संग देलकय.... गननायं फलदायकं पंडितं पतितं...' अहाँ सब हंसु जुनि इ मंगलाचरण छलैक, शुद्ध संस्कृत मे | 'किनकां, किनकां, किनकां, किनकां मजीर संग देलकय | नाचअ वाला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाज के लोग छल चक्कर देनाइ शुरू केलक | ओकर पाछु एक दोसर नर्तक सेहो घिरनी जकां चक्कर लगा रहल छल आ मुंह के रंग-बिरंग के बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल |

धिरिनांगी
, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी-- मृदंग ताल बदल दोसर सुर निकाल लक... किनकां, किनकां...आब रहअ दिय बड नचौलौं... आब बाद मे नाचक कथा हेतैक |
 
आई अपना सब विदापत-नाच के आगू बढ़ाबय छी
|

नाच करअ वाला एकेटा जगह पर जमा भ झूमअ लागल
| धिरिनागि तनका, तिटक-तिटक ध, तिटकल मदगिन धा' | ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भ गेल आ नाचअ वाला सब घोघ तानि दर्शक मंडली मे जा बैसल | नाच मे विकटा बनल छल ओ नाच करनिहार के ताकअ लागल | धृगा-धृगा'...

'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'-- मृदंग बाजल
 

'हे समाजियों के सुर मे सुर मिलौलक |

'हे लेल परवेश परम सुकुमारि

हंस गमन वृषभान दुलारि....
'

नचनिया सब उठी विकटा लग आबि गेल आ हर्षित भ विकटा ओय ओय ओय ओय केनाई शुरू क देलक
|
 

'धिन-तिनक तिनक धिन-तिनक तिनक '

'हे ! तन मन बदन पापन सहजोर है दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...'
 

नाच अजुका बंद करैत छी फेर आनद उठायल जेतै.....
 
 
 
विदापत-नाच के आब आगूक आनंद उठाऊ... आ प्रितिक्रिया कृपया सेहो व्यक्त अवश्य करू .... जय मिथिला
, जय मैथिल, जय मैथिलि, जय मिथिलांचल, जय मिथिलापन, जय मैथिलियता........

नाच करअ वाला सब घोघ हटा लेलकि आ चंद्रमुख ( घुटल दाढ़ी
, मोंछ आर बेडोल केहने संके मुंह) देख दर्शको सब हँसैत-हँसैत निहाल भ जैत अछि | नचनिया निचाअ दिस ताकि रहल लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुडल नाच क रहल छल वा छली | विकटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करअ के कोशिश क रहल अछि | ' हे विहसि उठलि पिऊ दखि सुहागिनी लाज बदन लेल फेरि..' नचनिया विहंस क मुंह फेर लेलक | हंसअ काल मे तमाकुल सेवन सँ जे दांत सब कारि भेल छलय से चमकि उठल | कृपया अहाँ सब शांत भ जाऊ | जी, जी हं, विद्यापति के पदावली भ सकैत अछि, परंच इ छे 'विदापत नाच' |...... न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्याल की... बक-बक बंद कराय जाऊ | आखिर अलाप शुरू कए देलौं, 'मोरे अंगना मे आये आली, मै चाल चलूँ मतवाली'.... अहाँ सब के कतेक बुझौ जे इ 'विदापत नाच' छय आ वो नाच करअ वाला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल | बाप के काला पानी के सजा भ गेलै.. माय केकरो आन सने चलि गेलै आ इ बच्चे सँ नाचअ लागल | अपन जवानी के दिन मे एकर धूम मचल रहित छलय... धूम मचबय छलय धूम | एकर आवभाव देखि त परबतिया अपन बसल बसायल गृहस्थी छोडि एकरा सने रातिये राति पड़ा आयल | हं त टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे...

अंगना आएत जब रसिया
 

पलट चलब हम इषत हंसिया
 

कान्ह जातां बहु करयिन्ह

लेकिन मोरे अंगना मे आये आली
' से बेचारा की जाने ? धृन्ना धृगा, तिन्ना-तिन्ना -मृदंग आब दोसर ताल बदलि धृन्ना धिग- धृन्ना- धिग- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि...| किन्ना- किन्ना मंजीर सेहो टटल बदलअक | 

'सखि हे...

सखि हे
, कि पूछसि अनुभव मोहे
 

जनम अवधि हम रूप निहारलौं
,

तबहु न तिरपित भेल
|"

आब नाचक दृश्य दोसर सीरीज मे ... जय मिथिलांचल.....
 
 
जय मिथिला
, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मैथिलिपन के हमरा सब के अनुसरण के बीच विदापत-नाच कवि कोकिल विद्यापति के स्मरण मे प्रस्तुत करबाक चाहि....

'अरे ? चुप ! चुप !!'--विकटा खिसिया क चुप करा रहल अछि | एक टा समाजी गमछा के कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक | विकटा कहनाय आरम्भ केलक जे ओकरा पीट क अनेरे समय बर्बाद कैल जा रहल अछि | जमींदार के जूता खाइत -खाइत ओकर पीठ के चमरी मोट भ गेल छय | ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल.. 'कि जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझावल गेलय जे ओकरे रूप, त ख़ुशी भ तुरंत पॉकेट सँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्व सँ अपन मुंह देखअ लागल |

गीत समाप्त भेल
, आब विकटा महादेव के बारी छैन |

'हे नेक जी (नायक जी); |

हूँ
|

'आब हमसे सुनू' |

'बाप रे, |

बाप रे कोन दुर्गति नहिं भेल
|

सात साल हम सूद चुकाओल
,

तबहुं उरनि नहिं भेलौं
|

कोल्हुक बरद सब खटलौं
 

कारज बाढ़त हि गेल
|

बारी बेच पटवारी के देलियेंन्ह
,

लुटा बेच चौकीदारी
| बकरी बेच सिपाही के देलियेंन्ह

'फाटक नाव गिरधारी |' आब आगू वाला सीरीज मे ... जय मिथिलांचल
 
विदापत-नाच के चारिम सीरीज के आगू बढबैत हम अपना के बड आनंदित अनुभव के रहल छी
| हमर अंदाज ठीक अछि से पसंद के क्लिक देखि क बुझ पडैत अछि जे अहुं सब आनंद उठा रहल छी | अस्तु ! नाच शुरू भ गेल अछि किछ बुझलीय अहाँ सब .. अहुं सब पूरा के पूरा फटकनाथ गिरधारी छी | कने दर्शक के देखियोन ने जे ओ सब की बुझलैन जे हँसैत-हँसैत पेट मे दर्द हुअ लगलैन | 

'धृगा-धृगा, धिधिना तिन्ना '....

सखी हे !
 

सखी हे
, 

इ माह भादर
, भरल बादर,

शुन्य मंदिर मोर
|...

सुन्दर ! सुन्दर !!ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल....

अहाँ सब फेर भसिया लगलौं
, अहुं सब विकटा स कम ने छी | कतबो मना कैल जाय ओकरा जकां सब गीत पर किछ ने किछ सुनाबैय लागै छी | इ लिय विकटा महोदय फेर टपकला...

इ माह भादर
, बरिसे बादर,

चुअत छप्पर मोर
|'
 

'हहा-हहा ...!!' दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोत भ रहल अछि | हँ एक टा बात कह्नाय बिसरि गेलौं जे विकटा अपना के कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगहि इहो बात ने बिसरैत अछि जे कि वो कालरू मुसहर अछि,हलहुलिया के रहनिहार आ मनुष्यों रहैत ओ बुझैत छैक जे कोल्हू के बरद सँ बेसी ओकर हैसियत नए छय | नाचअ वाला सब जखन ओकर गर्दन मे बांहि मान- अभिमान सँ प्रेम के प्रदर्शन करैत बुझबैत छय कि ---माधव तजि के चललौं विदेश |' तखनि ओ बिसरि जैत अछि जे वो कृष्ण अछि आ गोकुल सँ मथुरा जा रहल अछि | ओकरा सामने जीवन के विषमता मूर्त रूप भ नाचि उठैत छय आर वो बुझबैत छैक --'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहिं अशरेस,

चारु दिस देखय छी बुढ़िया के केश ....
 

माछ काछू सब गेल पाताल
, 

अब की सखि महा अकाल
, 

दिन भरि खटि के एक सेर धान
, 

एकरा से कैसे बचत परान
, 

छोडि- छोडि सजनि जाइछि विदेश
, फेर दोसरे क्षण जखन दर्शक सब गाबअ लागैत छय तेकर दृश्य आगू..............
 
 
 
पैघ के संझुका चरण स्पर्श आ समवयस्क वा कनि-मनि छोट-पैघ के नमस्कार.............. जय मिथिला
, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मिथिलापन..... विदापत नाच चरम पर पहुँच रहल अछि...सबटा नचनिया इ गीत गेनाय शुरू क देलक.......

'गोद ले बलमा चललि बाजार
 

हटिया के लोग पूछे
, के लागे तोहार |

सासू जी के लड़िका
, ननद के जेठ भाय,

पूर्व के लिखल स्वामी छिक हमार !
'

आब विकटा बच्चा जकां जिलेबी
, बताशा आर खिलौना लेल छिरिया लागल..
 

अखने एकटा नचनिया गीत गेलक--

'राति जखन भिनसरवा रे ,

पहूं (स्वामी) आयल हमार
 

कर कौशल कर कपंइत रे
 

हरवा उर डार

कर पंकज उर थपइत रे
 

मुखचन्द्र निहार
 

विकटा बीचे मे रोकि कअ एकटा समाजी सँ एकर अर्थ बुझबई लेल कहैत छैक आ समाजी खुलि क अय गीत पर टीका करअ लागल
| केना नायिका पुआल पर अपन झोपड़ी मे सुतल छलय आ विकटा आयल छल... 

आब नाचक आ गीतक कथा आगू लिखब आशा अछि जे समापन दिस अग्रसर विदापतक नाच के अहाँ सब पहिने जकां पसिन करब...
 
 
 
विदापत-नाच के आब अंतिम दृश्य---------

चलु दर्शक सब के बीच मे... कारी-कारी मोटगर आ गठ्गर देह वाला नवयौवना मंद-मंद मुसकिके दबा आ एक दोसर के केहुनिया-केहुनिया क कनफुसकी करअ मे आनंदित भ विकटा के दिस एक टक निहार रहल छल
| अधेड़ उम्र के मौगी सब बनावटी तामस व्यक्त क युवती सब के रोकय चाहैत छैक लेकिन दबल हंसी आ गुद्गुदायल ह्रदय कखन मानय छय.. एम्हर नचनिया सब आलाप क उठल------

'चलु मन, चलु मन ... ससुरालि

जइबै हो रामा
,

कि आहो रामा
, नैहरा मे
 

अगिया लगाइब रे कि...

युवती चंचल भ जाइत छय आ युवक लोकनि के नस मे बिजली दौरअ लगलैन
| नाच आब ख़त्म हुअ वाला छैक --

'चलु मन, चलु मन.

धिन.धिनक धिनक
, धिन- धिनक धिनक
 

कि आहो रामा
, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि ...!

डिग डिमिक डिमिक
, डिम डिमिक डिमिक ...

अरे इ की
? ओहो चेत्हरू गुंसाई जी छथि | गुंसाई जी कबीर के भक्त छथि | दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहब के कहला पर ओ झूठ गवाही नय देलकय अय पर जमींदार खिसिया क बेघर गुंसाई जी के कअ देल गेलैन आ तखने सँ 'स=स्ट्रीक बैरागी भ गेला | खंजरी, झोरा और चिमटा, जटा और लम्बा दादी... इ लिय गुंसाई जी खंजरी बजा बजा नचनिया संगे नाच करअ लागल...

'डिग डिमिक डिमिक, डिग डिमिक डिमिक
 

कि आहो रामा. नैहरा मे अगिया..

बात इ छय चेत्हरू गुंसाई जी अय गीत के पूरा निर्गुण मानय छैक
|

अहा ! ओकर धसल आंखि मे नोर चमकि उठय छय आ नाच समाप्त भ गेल.... जय मिथिला
, जय मैथिलि. जय मैथिल, जय मैथिलियता. जय मिथिलापन...

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.वनीता कुमारी- विहनि कथा- पुनर्न्वेषण २.ओमप्रकाश झा- विहनि कथा- कपारक लिखल ३.जगदानन्द झा 'मनु' - ५टा विहनि कथा ४. चन्दन कुमार झा- विहनि कथा
१.
वनीता कुमारी

पुनरन्वेषण

कनिक देर भऽ गेल छल अन्वेषिका (अन्वी ) के काज पर पहुँचय मे असलमे पहिल बेर तऽ बेसिये पहिने आबि गेल छली से भेलैन जे बाहर नास्ता कऽ क आबि जाथि। कॉलेज के पढ़ाई अखन पूरे भेल छलैन से एकटा सांस्कृतिक परिषद् मे स्टीवार्डक काज पकड़ि लेने छली। कस्टमर सर्विस के अनुभवक संगे मंगनी मे मनोरंजन सेहो होयत छलैन। गेट पर बैसर्ल बैसल लोकक गिनती वा टिकट चेक करू. ककरो किछु जानकारी चाही होय तऽ से दियऊ आ कार्यक्रमक आनन्द लीय।कखनो भारतीय संगीत समरोह तऽ कखनो डायमण्ड जुबली मनाबैत जैज बैण्ड के शो. कखनो आइरिस नृत्य तऽ कखनो जाइव. कखनो बच्चा सबहक नाटक मण्डली तऽ कखनो वृद्ध सबलेल पुरान फिल्म। आहि बॉलीवुड नृत्य सिखाबई वला संस्थानके वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह छल।
बाहर सैण्डविच कीनली आ बसे के भोजनालय बूझैत काज दिस भगली तैयो कनी देर भऽ गेलैन।मुदा ई असगर नहिं छली जे देर छली। एकटा आर बालिका जकर पैर में मोच आबि गेल छलै सेहो कातमे बैसल छल।ओ जखन लोक सब अन्दर चलि जैतई तखन गेट लग जाय क बैसतई। अन्वी के मैनेजर ओकरे संगे काज दऽ देलकैन। कार्यक्रम शुरू भेल।मैनेजर कहलकैन जे अहॉं सब बालकोनी के सीट पर बैसू आ लोक सबपर नजरि राखू।अन्वी ओहि रोमन बालिका संगे बालकोनी मे जा कऽ बैसि गेली। ओ बालिका वैशाखी पर छलै।
कनिये देर मे सबटा शान्त भऽ गेल आ कार्यक्रम शुरू भेल।इम्हर अन्वीजी के ओहि शान्त बालिका सऽ बातचीत सेहो शुरू भेल।स्वभाविक छलै जे अन्वीजी अपन बात ओकर पैरक स्थितिक कारण पूछैत केलखिन आ ओ होली जे अखने बीतल छल के विषय मे बात करै लागल।ओकर किछु नब सहेली भारतीय छलै जकरा संगे ओ भारतीय अन्दाज मे बात केनाई सीखने छल।ओ होलीमे अपन मित्र सब संगे खूब होली खेलायल छल।बातचीत सऽ अन्वीजीके ज्ञात भेलैेन जे ओकर चेहरा के उदासी मात्र पैरक दर्द सऽ नहिं आयल छहि वरन् ओकरा अपन पुरूषमित्र सऽ दू सालक गड़बड़ायल दोस्ती के कारण सऽसेहो छल। आ एहन समय मे ओकरा अपन नब संगी सब बड़ सहयोगी लागैत छल।
ओहि बालिका के भारतीय विशेषतः बॉलीवुड संगीत बड़ रूचिगर लागैत छलै।से ओ बहुत आनन्द लऽ रहल छल संगीत के। बीच बीचमे अपन मायके प्रति कृत्रिम रोष सेहो प्रदर्षित कऽ रहल छल आ ओहि सब अदाकारी मे अन्वेषिकाजीके अपन देशक सुगन्ध आबि रहल छलैन।अतेक विविधता सऽ भरल शहरमे सेहो आइ फेर अन्वीजीके अपन जीवनशैली उत्कृष्ट लागि रहल छलैन। जीवन मे ऊँच नीच तऽ होयते रहैत अछि मुदा ओहि के कोन संस्कृतिमे सबसऽ बढ़िया समाधान छहि से ताक अन्वीजीके उड़ानक सीमा फेर छोट कऽ देलकैन।

 
ओमप्रकाश झा
विहनि कथा
कपारक लिखल
शर्माजीक आफिस शनि आओर रवि सप्ताह मे दू दिन बन्न रहै छैन्हि। आइ शनि छल। आफिस बन्न छल आ शर्माजी दरबज्जा पर बैसल छलाह। तावत एकटा भिखमंगा दरबज्जा पर आएल आ बाजल- "मालिक दस टाका दियौ। बड्ड भूख लागलए।" शर्माजी बजलाह- "लाज नै होइ छौ। हाथ पएर दुरूस्त छौ। भीख माँगै छैं। छी छी छी।" भिखमंगा बाजल- "यौ मालिक, पाई नै देबाक हुए तँ नै दियऽ, एना दुर्दशा किएक करै छी। हम जाइ छी।" ओकरा गेलाक बाद शर्माजी खूब बडबडयला। देशक खराप स्थित सँ लऽ कऽ भिखमंगाक अधिकताक कारण आ नै जानि की की, सब विषय पर अपन मुख्य श्रोता कनियाँ केँ सुनबैत रहलाह।
दुपहर मे भोजन कएलाक उपरान्त आराम करै छला की कियो गेट ठकठकाबऽ लगलै। निकलि कऽ देखैत छथि एकटा त्रिपुण्ड धारी बबाजी ठाढ छल। हिनका देखैत ओ बबाजी बाजऽ लागल- "जय हो जजमान। दरिभंगा मे एकटा यज्ञक आयोजन अछि। अपन सहयोगक राशि पाँच सय टाका दऽ दियौक।" शर्माजी- "हम किया देब?" बबाजी- "राम राम एना नै बाजी। पुण्यक भागी बनू। फलाँ बाबू सेहो पाँच सय देलखिन्ह। अहूँ पुण्यक भागी लेल टाका दियौ।" शर्मा जी- "हमरा पुण्य नै चाही। हम नरक जाइ चाहै छी। अहाँ केँ कोनो दिक्कत? बडका ने एला हमरा पुण्य दियाबैबला।" ओ बबाजी बूझि गेल जे किछु नै भेंटत आ ओतय सँ पडा गेल।
साँझ मे शर्माजी लाउन मे टहलै छलाह। सामने सँ तीन टा खद्दरधारी ढुकल आ हुनका प्रणाम कऽ कहलक- "विधान सभाक चुनाव छैक। दिल्ली सँ फलाँ बाबू एकटा रैली निकालबाक लेल आबि रहल छथि। ऐ मे बड्ड खरचा छैक। अपने सँ निवेदन जे दस हजार टाकाक सहयोग करियौक।" शर्माजी बिदकैत बाजलाह- "एहि लाउन मे टाकाक एकटा गाछ छै। अहाँ सब ओहि मे सँ टाका झारि लियऽ।" एकटा खद्दरधारी बाजल- "हम सब मजाक नै कऽ रहल छी आ आइ कोनो बहन्ना नै चलत। टाका दियौ अहाँ। अहाँक बूझल अछि ने जे हमरे सभक पार्टीक सरकार छै। अहाँक बदली तेहन ठाम भऽ जायत जे माथ धुनबाक अलावा कोनो काज नै रहत।" शर्माजी गरमाइत बाजलाह- "ठीक छै हम माथ धुनबा लेल तैयार छी। अहाँ सब जाउ आ बदली करबा दियऽ। निकलै छी की पुलिस बजाबी।" खद्दरधारी सब धमकी दैत ओतय सँ भागि गेल।
रातिक तेसर पहर छल। शर्माजी निसभेर सुतल छलाह। एकाएक हुनकर निन्न ठकठक आवाज पर उचटि गेलैन्हि। कनियाँ केँ उठा कऽ कहलखिन्ह जे कियो दरबज्जाक गेट तोडि रहल अछि। दुनू परानी डरे ओछाओन मे दुबकि गेलैथ। तावत गेट टूटबाक आवाज भेलै आ टूटलहा गेट दऽ कऽ सात टा मोस्चंड शर्माजी केँ गरियाबैत भीतर ढुकि गेलै। सब अपन मूँह गमछी सँ लपेटने छल। एकटाक हाथ मे नलकटुआ सेहो छलै। बाकी दराती, कुरहरि, कचिया आ लाठी रखने छल। एकटा लाठी बला आबि कऽ हुनका जोरगर लाठी पीठ पर दैत कहलकन्हि- "सार, सबटा टाका आ गहना निकालि कऽ सामने राख। नै तँ परान लैत देरी नै लगतौ।" शर्माजी गोंगयाइत बजलाह- "हमरा नै मारै जाउ। हम हार्टक पेशेन्ट छी। इ लियऽ चाबी आ आलमीरा मे सँ सब लऽ जाउ।" ओ सब पूरा घर हसौथि लेलक। पचास हजार टाका आ दस भरि गहना भेंटलै। फेर हिनकर घेंट धरैत डकूबाक सरदार बाजल- "तौं तँ परम कंजूस थीकैं। कतौ खरचो तक नै करै छैं। एतबी टाका छौ। सत बाज, नै तँ नलकटुआ मूँह मे ढुका कऽ फायर कऽ देबौ।" इ कहैत ओ नलकटुआ हुनकर मूँह मे ढुकेलक। ओ थर थर काँपैत बाजऽ लगलाह लैट्रिनक उपरका दूछत्ती मे दू लाख टाका आ बीस भरि गहना राखल छै। लऽ लियऽ आ हमरा छोडि दियऽ। सरदार दू जोरगर थापर दैत कहलकैन्हि आब लैन पर एले ने, आर कतऽ छौ बाज। शर्माजी किरिया खाइत बजलाह आब किछो नै छै बाबू, छोडि दियऽ हमरा। डकैत सब सबटा सामान समटि कऽ विदा भऽ गेल। थोडेक कालक बाद हिम्मति कऽ कऽ ओ चिचियाबऽ लगलाह- "बचाबू, बचाबू डकूबा........।" अडोसी पडोसी दौगल एलथि। कियो पुलिस बजा लेलक। पुलिस खानापूर्ति कऽ कऽ चारि बजे भोरबा मे चलि गेलै। शर्माजी अपन माथ पीटैत बाजै छलाह- "आइ भोरे सँ शनिक कुदृष्टि पडि गेल छल। कतेको सँ लुटाई सँ बचलौं, मुदा कपारक लिखल छल लुटेनाई से लुटाइये गेलौं।"


जगदानन्द झा 'मनु' 
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डिह्टोंल, मधुबनी 

विहनि कथा 

1- बलिक छागर 
बिवाहक मंडप, चारू-कात हँसी- मजाक, हर्ष-उल्लासक वातावरण, मुदा दूल्हा चूप,शांत |
बराती में सँ एक दोस्त दोसर सँ -"बताऊ एतेक खुशिक वातावरण में सब प्रसन्य अछि परञ्च वरक मुँह पर खुसी नहि देखा रहल अछि किएक ?"
दोसर दोस्त भांगक नसा में हिलैत-डूलैत -"भाई बलि सँ पूर्व छागर कएतौ प्रसन्य रहलैए |"  


2-जगह 
महानगरीय जिवन के अव्यवस्थित आ व्यस्त जिवन में समाय के आगु लचार आजुक जिवन शैली |
रामप्रकाश के माय अपन बेटा-पुतौह आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभ में अपन गाम सँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि |
रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकान में रहै छथि | माय कए आगमनक बाद, जगह कें दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनी में एकटा फोल्डिंग खाट पर लगाएल गेल |
राति में एसगर निन्द कें अभाबे करट बदलैत, माय कें मन में ओहि दिनक सुमरण आबि गेलैन्ह, जखन गामक फुश कें एक कोठलीक घर में केना ओ दुनु बियक्ति अपन तिनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आई एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घर में मायक निर्वाह में असमर्थ बालकोनी में ओछैन केलक | 
माय कें आँखि सँ नोरक बूंद  टपकैत, नै जानि केखन  आँखि लाइग गेलैन्ह |

3-खुसी 
कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात  भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचै में व्यस्त तs कियो कीनै में मस्त |
दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटिया में प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहे पर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथ में धनी-पात लेने हल्ला करैत -"एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, एक रुपैया कें दू मुठ्ठी"
मुदा सब कियोक ओकर बातकें अनसुना करैत हाटक भीर में बिलीन भेल जाएत | दीनानाथजी सेहो ओकर बात कें सुनैत हाटक भीर में मिल गेलाह |
दू  घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी पूरा केलाक बाद हाटक मुँह पर वापस  एला तs देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भय ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ -"चलून धनी-पात तs अपने बारी में बड्ड अछि "
दीनानाथजी -"कनी रुकू ", कहैत आगु धनी-पात बाली बच्चिया सँ -"कोना दै छिही बुच्ची"
बुच्ची-" बाबु एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैया कें  तिन मुठ्ठी लय लिय "
दीनानाथजी -"सबटा कतेक छौ"
बुच्ची गनैत -"एक,दू,- - सात, आठ  - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस,  बीस मुठ्ठी बाबूजी "
दीनानाथजी -"सबटा दय दे "
कनियाँ -"हे-हे की करब ?"
दीनानाथजी कनियाँ कए इशारा सँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबी सँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कs बुच्ची कें देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठाम सँ बिदा भय गेला |
घर अबैत, दलान पर बान्हल जोड भैर बरद, हुनक आहटे सँ अपन-अपन कान उठा कय मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगु आबि कs स्नेह सँ दुनु कें माथ सहलाबैत,अपन झोरी सँ धनी-पात निकालि नाईद में दय देलखिन्ह |
कनियाँ-"ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरद कए दय देलियै, एतेक कए घास लैतहुँ तs बरद भैर दिन खैतए "  
दीनानाथजी -"कोनो बात नहि दस रुपैया तs सभ कें देखाई छैक मुदा ओई धनी-पात बाली बच्चिया कें मुँह पर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाब रहैक ओ केकरो नै देखाई | आ देखलीयै बिकेला बादक खुसी, ओई खुसिक मोल कतौ दस रुपैया सँ बेसी हेतैक |"

4- आठलाखक कार
कलुआही  जयनगर राजमार्ग, बरखाक समय, पिचक काते-कात खधिया सब में पानि भडल | दीनानाथजी आ हुनक जिगरी दोस्त रामखेलाबनजी, दुनू गोटा अपन-अपन साईकिल पर उज्जर चमचमाईत धोती-कूर्ता पहिर, पान खाइत, मौसमक आनन्द लैत बतियाइत चैल जाइत रहथि | कि पाछु सँ एकटा नव चमचमाईत बड्डका एसी बुलेरो कार दीनानाथजी कें उज्जर धोती-कूर्ता पर थाल-पानि उड़बैत दनदनाईत आगु निकैल गेल |
दुनु   दोस्तक साईकिल एका-एक रुकल | रामखेलाबनजी हल्ला करैत कारबलाकें गरिएनाई शुरू केलैन्ह |
दीनानाथजी- "रहए दियौ दोस्त किएक अपन मुँह खराप करै छी, एसी कार में बंद कि सुनत, भागि गेल | ओनाहो ओ आठ लाखक कार पर चलैत अछि, हम आठ सय कें साईकिल पर छी तs पानि- थालक छीत्ता तs हमरे परत |" 



5- कुण्ठित मानवता 
घर में मुरारीजिक कनियाँ अपन आठ बर्खक बेटा आ पाञ्च बर्खक बेटी कें कोनोना सम्हारै में लागल, मुदा हुनक मोनक भाव सँ साफ देखा रहल छल जे हुनकर मोन पुर्णतः मुरारीजी पर लागल छलैन, जे की रातिक दस बजला बादो एखन तक नोकरी सँ घर नहि एलथि |
कोनोना दुनु बच्चाकें सुतेलथि | समयक सुई सेहो आगु वरहल | दस सँ एगारह बाजल | हुनक मोन में संका सबहक आक्रमण भेनाई स्वभाबिक छल | इना त एतेक राति पहिले कहियोक नहि भेलै | सहास करैत घर सँ बाहर निकैल, अपन भैंसुरक अंगना पहुँचली | हुनका सब कें कहला बाद शुरू भेल युद्धस्तर पर मुरारीजिक खोज | मुदा सब मेहनत खाली मुरारीजिक कोनो पता नहि | हुनक आडामिल जाहिठाम ओ काज करैत छलथि सँ ज्ञात भेल जे हुनक छुट्टी तs साँझु पहर पाँचे बजए भs गेल रहैन आ ओ अपन साईकिल सँ एहिठाम सँ बिदा सेहो भय गेल रहथि |
तकैत-तकैत भोरे चारि बजे हुनक मृत-देह पिपरा घाटक सतघारा बला धूरि पर भेटल | देखते मातर सबहक हाथ-पएर सुन्न | कनाहोर मचल | बाद में स्थानीय प्रतक्षदर्शी सँ ज्ञात भेल की ओ एहिठाम साँझ कए साते बजे सँ छथि, किछु गोटे
 हुनका हाथ-पएर मारैत देखि बजैत रहेजे -'बेसी शराब पि क' ड्रामा कय रहल अछि |'
मुदा हाय रे कुण्ठित मानवता कियोक हुनक बास्तबीक कारण बुझहक प्रयास नहि कएलक, नहि तs ओ एखन जिबैत रहितथि | हुनका तs एपेडेंसीक दर्दक बेग रहैन आ समय पर उपचार नहि हेबाक कारणे ओ चलि बसला |

४.
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

विहनि-कथा -बुच्चू भइया

करमान लागल लोक..अनघोल भेल सौंसे गाम..जकरे देखू तकरे आँखि मे नोर..सगरो संताप पसरल..नहि रहलथि बुच्चू भैया आब एहि दुनिया मे.पचासी बरखक अवस्था भ गेल रहन्हि तइयो सभ बुच्चू भइये कहैत छलन्हि. नेना-भुटका, जर-जवान, बुढ-पुरान,स्त्री-पुरूख..सभक भैया..बुच्चू भैया छलाह. अनकर कोन कथा अपनो बेटा-पोता सभ त' बुच्चू भइये कहैत छलन्हि.कोनो बेशी पढल-लिखल नहि छलाह मुदा बेबहारिक गेयान सँ परिपूर्ण.समाज मे घुलल-मिलल लोक.ककरो-कहियो कोनोटा खराप नहि सोचलखिन्ह जीवन भरि.सभके हरदम नीके रस्ता देखबैत रहलाह.भरि गाम मे ककरो ओहिठाम कोनो तरहक दसगरदा काज मे बिन-बजौनहु पहुँचि जाइत रहैत.कोनो तरहक राग-द्वेश नहि.एकदम शुद्ध-मना.एही गुण सभ दुआरे तऽ एतेक सम्मान भेटै छलन्हि सभठाँ.अनकर कोन कथा बड़का पण्डिजी सेहो हिनकर मान करै छलखिन्ह.उमेर मे नमहर रहितौ ओहो बुच्चुए भइया कहैत छलखिन्ह.
दलान पर कुरसी लगा बैसल बुच्चू भइया...अबैत जाइत लोक..के छोट..के पैघ..सब बइस रहैत छल  हुनका सँ दू आखर सुनबा लय..... जिनगीक उँच-नीच गुनबा लय.....खिस्सा-पिहानी सुनबा लय.कल्ला तर पान..ठहक्का मारैत बुच्चू भइया नजरि के सोझाँ ओहिना नाचि रहल छथि.आँखि हमरो नोरा गेल.
माँझ अँगना उत्तर मूँहे सूतल छथि बुच्चू भइया.मूँह पर एखनो हँसी पसरल..दिव्य ललाट. गौदान-वैतरनी भ' गेल...बाँसक रथ सवार बुच्चू भइया विदाह भेल छथि अंतिम यात्रा पर...कन्नारोहट उठल सगरो..शांत बुच्चू भइया ..आइ नहि पोछलखिन्ह ककरो नोर.सिरहौना-पोछौना..आमक लकड़ी बोझल गेल..सभ काठी चढौलक श्रद्धांजलि-सवरूप.मुखाग्नि पड़ल..सरर..धुमन..गमकथि बुच्चू भइया.चर्चा-परिचर्चा..केयो बजलइ-"एकबेर बुच्चू भइया के कोनो बात लेल तामश उठि गेलनि.बौसति कियो कहलकन्हि -अहूँ के बड्ड तामश उठैत अछि. हमरा त़ऽ हरदम तामश उठले रहैत अछि, चट्ट दऽ कहने रहथिन्ह बुच्चू भइया"-सभ हँसऽ लागल...धधरा जोर भऽ गेलइ..हँसैत बुच्चू भइया.

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अतुलेश्वर

 
पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति-
असममे एहि बीच चलि रहल बिहू पर्व  कोनो जाति वा धर्मसँ बान्हल नहि अछि। कहि सकैत छी एहि पावनिक अवसर पर सम्पूर्ण असामबासीक मोनमे एकेटा शब्दक संचार होइछ आ से थिक प्रेम। प्रेम छैक प्रकृतिसँ, लोकसँ, सभ जीव-जन्तुसँ। एहिमे ने कतहु कोनो बान्ह छैक आ ने कोनो सीमा। सभगोटए एहि पुनीत अवसर पर अपन निष्ठा आ सिनेहकेँ एहि रूपें उपस्थापित करैछ, जे लोकक मोनमे ई अभिलाषा वर्षोभरि जोर मारैत रहैत छैक जे बिहू कहिआ आओत आ हम सभ फेर एहि पाबनिकेँ प्रेम-भावसँ मनायब। हुनका लोकनिक मोनमे कतहु एहि विषयक चर्चा नहि जे बिहू कतसँ आयल, ई ककर छी, ओ सभ तँ मात्र एतबे जनैत छथि जे ई प्रेमक पाबनि थिक। जापी,गमोछा, बिहू गीत ई किनकर, एहि पर कोनो माथापच्ची नहि, मात्र पावनिक ई सरंजाम असमियाक प्रतीक थिक।
 एहि प्रसंगकेँ एतए उठएबासँ हमर मतलब अछि जे आइ काल्हि, खासकए मिथिलामे, किछु युवा तुर्क लोकनि विषय बिना बुझने अपन ज्ञान झाक उपयोग प्रारम्भ कए दैत छथि। एम्हर देखल गेल अछि जे किछु गोटे पागकेँ एकटा जाति सँ बान्हि मिथिलाक अस्मिता पर चोट क रहल छथि, प्राय: हुनका अस्मिताक महत्ता ज्ञात नहि छनि। किछु दिन पूर्व पागक मादे मनोज कर्ण उर्फ मुन्नाजी कहलनि जे ई ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक उपयोगक छी। मुदा, एतए हमर कहब अछि जे ओ आजुक गुटबाजीसँ प्रभावित भए ई व्यथा व्यक्त कएलनि, हुनका प्राय: खूब नीक जकाँ बूझल हेतनि जे पाग सम्पूर्ण मिथिलाक गौरवक प्रतीक थिक, प्राय: हुनका देखल होएतनि जे मिथिलाक सभ जातिक लोक अपन बिआहमे एकर उपयोग करैत छथि, से चाहे घुनेसक भीतरमे हो वा मौरक। सत्य पूछी तँ एहन-एहन सोचक कारणेँ हमरा कखनो-कखनो डर लगैत अछि जे ई सभ कखनो इहो कहि सकैत छथि जे विद्यापति मात्र जाति विशेषक साहित्यकार  थिकाह, मखान मात्र जाति विशेषक उपयोगक वस्तु थिक, धोती पहिरब तँ जाति विशेष कर्त्तव्य थिक आदि-आदि। 
एहि विषय पर सोचला पर लगैछ जे जखन सामंत अपनहिंमे लड़ि कमजोर हुअए लगैत छथि तँ ओसभ एकटा नव कूटनीतिक चालि  चलि शोषितक नेता बनि  हुनका माध्यमे अपन काज सुतारबाक प्रयास प्रारम्भ कए दैत छथि आ तेँ इहो सोच हमरा जनैत ओही नव धाराक सामंती सोचक उपजा छी। किन्तु हुनका लोकनिकेँ आब सावधान भ जएबाक चाहियैन्ह जे अपने कतबो फुटक राजनीति करब, अपन काज सुतारबाक लेल हाथ-पएर मारब, मुदा कार्यसिद्धि असम्भव। आब मिथिलाक आमजन अपन अधिकार आ अस्मिताक प्रति सचेत-सचेष्ट भए गेल छथि। तैँ ई पाग, मखान, माछ कोनो जाति विशेषक संपत्तिक घोषणा करबासँ पूर्व ई सोचि लेब आवश्यक जे ई मिथिलाक अस्मिता छी आ एहि पर सभ मैथिलक अधिकार छैक। अन्तमे मिथिलामध्य जुड़-शीतल चलि रहल अछि , गाछ-बीरिछ क जड़िमे पानि देल जा रहल अछि, सभ अपन पूर्वज आ अपनासँ छोटकेँ जुड़ा रहल छथि आ एहने समयमे हमरा मोन पड़ैत अछि युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक लिखल ओ आखर 
भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे
तेँ धधकए सभतरि दावानल
जुड़शीतलक जल-थपकीसन
बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल.....।


(मौर कोढ़िलाक बनैत अछि आ पागसँ फराक अछि। कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कऽ विध होइत अछि, ओहो सभ बियाह करऽ पाग नै मौर पहीरि कऽ जाइत छथि। पूर्णियाँक ब्राह्मणमे नव-विवाहिता बरसाइतमे मौर पहीरि कऽ वटवृक्ष धरि जाइत छथि। पाग मात्र आ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध-बाधक प्रतीक अछि। विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (मध्यकालीन मिथिला पृ.२६) - सम्पादक)


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रवि भूषण पाठक
ओक्‍कर तोहर हम्‍मर सपना-
 जेठक पोखरि सभ प्राय: सूखि जाइत छैक ,मुदा एकदम सूखले बूझि यदि पोखरि कें पार कर लागब ,तखन पएर कनि कनि धस लागत आ एक क्षण रूकि कें अपन दू‍नू हाथ सँ एक कोबा माटि हटा के देखिअओ .....तुरत्‍ते जलक धार अपन उपस्थिति सँ अवगत करा देत..... भिजा के , गरमी सोखि के आ अहांक भ्रांत धारणा मे अपन विनम्र हस्‍तक्षेप करैत ,तें अओ बाबू भैया सत्‍य ओएह नइ थिकइ जे आंखिक समक्ष हो ....सत्‍य कने उद्योगक मांग सेहो करैत छैक ।तें हम अपन गामक परिचय कोना दी ,बड्ड अशौकर्य मे पड़ल छी ।
ई गाम मिथिलाक
,भारतक आ ब्रह्मांडक एकटा सधारण ग्राम .....अपन खेती-बाड़ी ,खान-पान ,गीत-नाद ,बोली-वाणी ,सामूहिकता क विभिन्‍न कसौटी पर ...एकटा सधारण ग्राम ।एकर चर्चा कोना शुरू कएल जाए , टोल सँ ,जाति सँ ,खेत-पथार सँ ,बड़का लोकक स्‍वघोषित महानता वा छोटका लोक पर आरोपित ओछपन सँ...... सब मिलाके एके बात छैक ।पहिले टोल सॅं शुरू कएल जाए ।चारू दिशा क नाम पर चारि टोल ,उत्‍तरवारी ,दक्षिणवारी ,पूवारी ,पछवारी अथवा डीह टोल ।दिशाधारित ऐ विभाजनक अलावे बभनटोली ,गुअरटोली ,चमरटोली ,दुसधटोली आ राजपूतक एकटा अलगे टोल ।दुसाधक तीनटा बिखरल बिखरल टोल ,तहिना चमार सभ सेहो दू ठाम समटल.....।
विभिन्‍न टोलक प्रति आन टोलक नवीन नवीन रूख ,नवीन दृष्टि आ ओकर चर्चा मे एकटा अपमानजनक टोन ।जेना उत्‍तरवारी टोल अपना मूने सबसॅं बेशी सुसभ्‍य ,दक्षिणवारी टोल सबसँ बेशी लंठ ,पूवारी टोल सबसँ बेशी एडवांस आ डीह टोल सबसँ बेशी जेनुइन छलै ओ दोसर टोलक हिसाबें उत्‍तरवारी टोल मे सबसँ बेशी बतहपन ,दछिनवारी टोल मे मूर्खता ,पूवारी टोल मे दिखाबा आ डीह टोल मे उत्थरपन भरल रहै । आ एहिना मूल ,गोत्र आ बैसारी क हिसाबें  सेहो अपना के नीक ,सभ्‍य आ दोसर के ओछ ,असभ्‍य मानबा के बहुत रास घटना ,कहबी ,वृतांत......आ जखन एक जाति मे एते बखरा तखन पूरा गाम मे कतेक .........ओना आपुसी गपशप मे पूरा गाम गामे छलै आ नीक-खराप दूनू साथे चलैत छलै.......


 उमा बाबू भूगोल पढ़ाथिन त टंगड़ी हिलबैत रहथिन आ मोटका करची क सटक्‍की सँ अपन तरवा पर हरदम चलाबैत रहथिन जेना कि केओ मजूर अपन हांसू के पिजबैत छैक  ....ओ कहथिन जे आबादी बसै आ घरक समूहक गठन एकटा खास पैटर्न पर होए छैक आ विश्‍वक विभिन्‍न भागक लोक सब अलग-अलग पैटर्न पर अपन निवास बनबैत छैक ,उमा बाबू ईहो कहथिन जे यदि केवल भारते के देखल जाए त उत्‍तर भारत आ दक्षिण मे असंख्‍य पैटर्न ........गंगा ,गोदावरी ,रावी,गंडक ,कोशी सभक पेट मे अलग अलग श्रृंगार ।केवल मिथिले नइ मिथिलो मे समस्‍तीपुर के देखियौ उत्‍तर मे अलग आ दक्षिण मे अलग ।उत्‍तर मे घर पर घर आ सटल सटल टोल ,जखन कि दक्षिण मे हटल हटल घर ।विशाल खेत आ तखन एकटा दूटा घर ,खूब फैलल गाछी बिरछी तखन किछुए टा घर ।आ घरक अवस्थिति केहन त पोखरि ,रोड वा मंदिरक आस-पास ।अपने गामक विचार करियै त पूरा ब्राह्मणक आबादी नबकी पोखरि ,नौला आ बरी पोखरिक चारू कात वा फेर डीह पर कचहरी ,इसकूलक चारू कात आ रोसड़ा-बहेड़ी मार्ग पर । आ सबसँ उस्‍सर ,बंजर ,सक्‍कत जमीन पर चमार आ दुसाधक आबादी ,एकदम बबूर जँका ,कत्‍तउ जनमि जाइत हो ,खेतक आडि़ पर ,पोखरिक मोहार पर ,गाछीक खत्‍ता मे लोकपरिया पर ,पीचरोडक दूनू कात आ श्‍मशान मे सेहो........ने खाद देबाक काज आ ने पानि देबाक चिंता।मुदा सबसँ सक्‍कत , सूर्य भगवान आ सभ्‍यताक समस्‍त गरमी के सोखैत जहिना के तहिना ......एकदम हरियर पत्‍ती .......बाभनक दांत पर घुस्‍सा मारैत ,भोर सांझ.......आ जखन सभ हरियरका जजाति सूखि जाइत हो तखन बबूरक पत्‍ती आ ओकर फअर सभक जान बचाबैत........तहिना चमार आ दुसाध सेहो अपन छोट दुनिया मे एकदम मस्‍त आ हरियर ।

गामक सब सरल गेन्‍हायल पानि ,गनगी बरसा आ बिना बरसा के पूबरिया ढ़लान होयत चमरटोली दिस चलि जायत ।आ चमरटोली जे गामक पूबरिया सीमान पर बसाएल गेल छलै ,समस्‍त अग्राह्य सेवा क लेल ,जत के लोक सभ के ई कहबाक अधिकार नइ छलै जे अओ बाबू अपन देहक ,घरक ई दुर्गन्‍ध हमरा दिसि किएक बहा रहल छी \ ई आबादी जेकर पेट ,देह आ मोनक चर्चा तक अश्‍पृश्‍य छलै .....देहे नइ मोन तक छुआ जाए वला .....गंगा जल ,नइ गंगो जल नइ पवित्र करत ,हड्डी तक छुआए वला गनगी.........स्‍मृति आ वर्णगत विभिन्‍न श्‍लोक ,कहबी ,हवा-पानि ,भूत-प्रेत पर्यंत तक फैलल......
यद्यपि चमार सब पूरबिये सीमान पर समटि गेल छलै ,मुदा दुसाध सब जीयत रहै ,डीहक सक्‍कत जमीन पर ...आ जेकरा जीन मे घुसल रहै संकट निवारण लेल साहस ,उद्योग ,आ ओ सप्‍पत खेने रहै अपन राजा जी के .....राजा जी हुनकर कुल देवता नइ रहथिन ,ओकर अप्‍पन राजा जी ,हँ मिथिलाक आदिवासी दुसाधक राजा जी .....आ राजा जी पहिले महल ,गद्दी ,दरबार छोड़लखिन आ किताब ,पुरातत्‍व सँ सेहो हुनकर निशानी मिटि जाइत रहल.....मुदा राजा जी बसल रहलखिन दुसाध सभक करेज मे -
कते घोड़ा तोहर राजा
कते दुश्‍मनमा के
धरती चलै अकाश हो........

आ राजा जी आ राजा जी क
· घोड़ा दूनू अपन मूल स्‍वरूप के पानि जँका छोडि़ देने रहै आ राजा जी मने घोड़ा आ घोड़ा मने राजा जी ,तें घोड़ा चढ़एबा क पूजा बेशी धूमधाम सँ होइत छलै आ राजा जी वला उत्‍सव दुसाध सभ मे एकटा खास उत्‍साह,आत्‍मविश्‍वास जनमाबैत छलै ,मुदा राजा जीक मन्दिर कोन ठाम बनै,विद्यालय पर ,आचार्यक डीह पर वा दुसधटोली मे ......ई खिस्‍सा कनेक बाद.........

अपन गामक चर्चा कोना करी ,खूब मीठ प्रशंसा सँ .....जेना कि केवल मीठे-मीठ अनुभव होए ।केवल मीठ अनुभव तखने संभव ,जखन कि एक-दू दिनक लेल पिकनिक पर आयल जाए ,मुदा जखन जिनगीए बिताबै के अछि तखन केवल मैथिली शरण गुप्‍त क भंगिमा ल· के कोना जीयब आ बात बात मे ग्रामीण जीवन ,भारतक प्राचीनता आ महानता क पाठ कोना कएल जाए .....आ मैथिली मे सेहो गुप्‍त जी नइ मैथिली शरण सभक कमी नइ ,जे बात बात मे मिथिलाक महानताक बखान करैत रहता ,हुनकर ग्रामीण जीवन क फॉर्मेट पहिले सँ सुनिश्चित रहै छैक ,केवल विवरण भरबाक काज......छोड़ू ऐ सब कें.......चलू हम अप्‍प्‍न डायरीक ई पाठ अहींक कविता सँ प्रारंभ करैत छी ।

(आगूक तीन-चारि टा पन्‍ना फाटल अछि)
क्रमश:

 
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श्यामसुन्दर शशि
झूमि उठल जनकपुरवासी

युवा नाट्यकला परिषद परवाहा देउरी बिक्रमी शम्वत २०६९के पूर्व सन्ध्यामे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली नाटक महोत्सव आयोजन कएलक जकर उदघाटन गणतन्त्र नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा.रामवरण यादव कएलनि । महोत्सवमे नेपाल आ भारतके आठ गोट नाट्य समूह सहभागी भेल ।

चारि दिवसीय महोत्सवके समापन तथा नयॉ वर्ष २०६९के स्वागतमे मिथिला नाट्य कला परिषद एवं रामानन्द युवा क्लवक कलाकारलोकनि रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम सेहो आयोजन गएने छल । जाहिमे मिनाप अध्यक्ष सुनिल मल्लिक,नेहा,ललित कामत,संगीता देव, नवीन मिश्रआदि गायक गायिकालोकनि अपन स्वरक जादूसदर्शकके मन्त्रमुग्ध कद्र देने छल ।
महोत्सवक अन्तिम दिन मिथिला अनुभूति दरभंगा श्याम भास्कर लिखित तथा निर्देशित हमर गामनामक नाटक मञ्चन कएने छल त रामानन्द युवा क्लव अवधेश पोख्रेल लिखित तथा पि चन्द्रशेखर आ बिएन पटेल निर्देशित मर्जीवानाटक मञ्चन कएने छल । दुनू नाटकमे समाजक भहरैत सामाजिक मूल्य मान्यता आ धनक पाछॉ अपस्यांत लोकक कथा वर्णित छल ।
महोत्सवके तेसर दिन अर्थात वृहस्तपति दिन मञ्चित दू नाटकमे मिथिलाक दूगोट लोकनायकके कथा वर्णित छल । बिराट मैथिली नाट्यकला परिषद विराटनगरद्वारा प्रदर्शित महाकंजुसनामक नाटकमे मिथिलाक लोकनायक गोनू झाक बहुचर्चित हास्य कथा वर्णित छल । एहि नाटकके संकलन आ निर्देशन युवा प्रतिभावान नाटककार रामभजन कामत छलाह त चेतना अभियान जनकपुरद्वारा मञ्चित भैया अएलै अपन सोराजमे मुसहरजातिक लोक नायक दीना आ भद्रीक कथा वर्णित छल । नाटककार रामभरोस कापडि लिखित तथा सुनिल यादव निर्देशित ई नाटक ऐतिहासिक महत्वक छल ।

दोसर दिन प्रतिविम्व नाट्य समूह अवधेश पोख्रेल लिखित कम्मो डार्लिंगएवं सीमावर्ती मधुवनीक मिथिला अनुभूति नाट्य समूह महेन्द्र मलंगिया लिखित ऐतिहासिक नाटक नसवन्दीप्रदर्शन कएने छल । महोत्सवके पहिल दिन भारत सहरसाक पंचकोशी नाट्य समूह हरिमोहन झाक कथापर आधारित पॉचपत्रआ मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर रमेशरंजन झा लिखित तथा अनिलचन्द्र मिश्र निर्देशितबुधियार छौडा आ राक्षसनामक नाटक मञ्चन कएने छल । मिनापके नाटक शिल्प आ अभिनयके दृष्टिसवेजोड छल ।


नाट्य महोत्सवके किछु तस्वीर सेहो
तस्वीर श्यामसुन्दर शशि,कान्तिपुर


 
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१.सुजीत कुमार झा -नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल २.सुमित आनन्द- शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण

सुजीत कुमार झा
नाटकप्रति रंजुमे गजबकेँ समर्पण छल

जनकपुरक रामानन्द चौकक बम विस्फोटक समाचार छायांकन करय जनकपुर अञ्चल अस्पतालमे सोमदिन पहुँचते छी की पत्रकार बटुक नाथ झा कनैत बाजल रंजु दिदी मरि गेलै । अए मिनापक रंजु .........हमरा मुहँ सँ एहि सँ बेसी नहि बहराएल । हमरा फुराइए नहि रहल छल बटुककेँ कोना सान्त्वना देल जाए । खुन सँ लतपत रामानन्द युवा क्लवक पूर्व अध्यक्ष रमेश ठाकुर सेहो रंजुकेँ की भेलैक पुछि रहल छलथि । कल्पनो नहि छल रंगमंचक हस्ती रंजु झा हमरा सभ लग सँ अतेक जल्दी चलि जएती । रंजु संग रंगमंचमे प्रवेश कएलाक किछुए दिनकबाद परिचय भेल छल मुदा व्यक्तिगत रुप सँ हमरा कमे बातचित होइत छल । जहिया कहियो भेटैत छलथि प्रणाम दिदी कहैत छलियन्हि आ रंजु मुसैक कऽ प्रणाम प्रणाम कहि दैत छली । मुदा एहि बेरक नाटक महोत्सवमे एक्के स्थानपर बैस कऽ सभ दिन नाटक देखैत छलहुँ एहि सँ किछु खुलि गेल रही । महोत्सबभरि सभ नाटककेँ हम समीक्षा कएने छलहुँ आ हमर समीक्षाकेँ ओ बहुत बडका प्रशंसक रहथि । सभ दिन नाटक हलमे भेटथि आ हमरा देखिते बाजए लगैथि हम जे सोचने छलहुँ सएह अपन समीक्षामे राखि देलियै ।
रंजुमे नाटककेँ प्रति गजबकेँ समर्पण छल । रंग मंचपर नहियो रहैत छली तैयो एकर खुब आनन्द लैत छली । किछुए दिन पूर्व मिथिला नाट्य कला परिषद जानकी मन्दिरक प्राङ्गणमे बुधियार छौडा आ राक्षस नाटक मञ्चन कएने छल ।
एभि न्यूज टिभीक लेल भिजुअल करय ओतए पहुँचलहुँ तऽ सभ सँ पाछु ठाढ़ भऽ रंजुकेँ नाटक देखैत देखलहुँ ।
रंजु मिनापक सदस्य भेलाक बादो असन्तुष्ट छलथि तैयो नाटक देखब नहि छोडलथि ।
महेन्द्र मलंगियाद्वारा लिखित छुतहा घलि नाटकमे कबुतरी देवीक जिवन्त अभिनय कएने छली । गाम नइ सुतैया
, काठक लोक सहित दर्जन सँ बेसी नाटकमे ओ अभिनय कएने छली । हुनक अभिनयकेँ सभ नाटकमे सराहल गेल अछि ।
दिल्लीक मेलोरंग संस्था सँ किछुए दिन पूर्व सम्मानित रंजु मिनाप संग असन्तुष्टीक बाद ओतके मंचपर नहि देखाइत छली । रंजु संग नाटक महोत्सवक क्रममे एक दिन पुछने छलहुँ नाटक नहि करैत छी तऽ टाइम पास कोना होइत अछि एहिपर ओ चौकाबए बला बात कहलन्हि एखन खाली गीत लिखैत छी । ओ जानकारी देलन्हि जे एखनधरि मैथिली भाषामे ५० टा सँ बेसी गीत भऽ गेल अछि । हम फेर सँ रंजु कोना रंग मञ्चपर आबैथ एहिकेँ लऽ कऽ बहुत चिन्तित छलहुँ । रविराति मात्रे दाङ्ग जिल्ला सँ जनकपुर अबैतकाल रामानन्द युवा क्लवक अध्यक्ष नविन कुमार मिश्र संग रंजुक विषयमे बातचित कएने छलहुँ । जनकपुर अबिते मिनाप संग सम्झौता कराएब एक प्रकार सँ सप्पथ खएने छलहुँ मुदा ओ सप्पथ हमरा सभकेँ पुरा नहि भऽ सकल । मुदा रंजु मिथिला राज्यक लेल जे सपथ खएने छलथि लगैत अछि ओकरे पुरा कराबएमे सभकेँ उर्जा लगाबए पडत ।

          २.
सुमित आनन्द

शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण

मिथिलाक उत्थानक हेतु शोधकार्य अत्यन्त आवश्यक अछि’-ई गप्प ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक कुलपति डॉ. एस. पी. सिंह दिनांक 21.04.2012 केँ विश्व्वविद्यालय मैथिली विभागमे शोध-पत्रिका मैथिली एवं मैथिली काव्यमे अलंकारक लोकार्पण कयलाक पश्चात् कहलनि। ओ कहलनि जे शोधकार्य शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु आवश्यक अछि। शोधक दृष्टिएँ विश्व्वविद्यालयकेँ आओरो आगू बढय पड़तैक। ओ बजलाह जे एतय प्रतिभावान शिक्षकक अभाव नहि अछि किन्तु दृढ आत्मविश्वास एवं पवित्र उद्देश्यक आवश्यकता अछि। ओ ईहो जनौलनि जे विश्वविद्यालयकेँ विकासक शिखरपर पहुँचयबाक हेतु शिक्षक, छात्र,  कर्मी एवं सरकारक समवेत प्रयासक आवश्यकता अछि। कुलपति डॉ. सिंह एहि विभागक प्राचार्य डॉ. रमण झाकेँ मैथिली काव्यमे अलंकारक प्रकाशनक हेतु साधुवाद देलनि तथा एहिना शोध कार्यमे अग्रसर होइत रहबाक हेतु प्रेरित कयलनि।

एहि अवसरपर विश्व्वविद्यालयक वित्तीय परामर्शी सी. आर. डीगवाल सेहो शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे मैथिली भाषामे अपन विचार रखलनि जकर लोक करतल ध्वनिसँ स्वागत कयलक। विभागाध्यक्षा डॉ. बीणा ठाकुर आगत अतिथिक स्वागत करैत बजलीह जे ओ पत्रिकाक स्तरकेँ ऊपर उठयबाक हेतु कोनहुटा प्रयास बाँकी नहि रखतीह संगहि एकर चयनित रचनासँ पुस्तकक प्रकाशन सेहो करतीह। साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित मैथिली साहित्यक मूर्धन्य विद्वान डॉ. भीमनाथ झा शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथक तुलना करैत बजलाह जे शोधग्रंथ ग्रंथक संग राखल जाइत अछि आ शोधपत्रिका पत्रिकाक संग। तेँ शोधग्रंथ विशेष महत्वक थिक । ओ ईहो कहलनि जे डॉ. रमण झाक शोधग्रंथ मैथिली काव्यमे अलंकार शिक्षक एवं छात्र दुनूक हेतु महत्वपूर्ण अछि।
एहि अवसरपर डॉ. सुरेश्व्वर झा
, डॉ. बैद्यनाथ चौधरी बैजू’, डॉ. धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. कृष्णचन्द्र झा मयंकप्रभृति विद्वान लोकनि शोधपत्रिका एवं शोधग्रंथ दुनूक संबंधमे अपन अपन विचार रखलनि। दस अध्यायमे विभक्त मैथिली काव्यमे अलंकारकेँ सभक्यो उपयोगी मानलनि।
कार्यक्रमक शुभारम्भ शीतल कुमारी
, पुष्पलता कुमारी, सुनीता कुमारी एवं सोनी कुमारीक मंगलाचरणसँ भेल । सोसाइटी टुडेक मैनेजिंग एडीटर सुमित आनन्द स्वागत गानसँ आगत अतिथिक स्वागत कयलनि। मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रमण झा कयलनि। डॉ. झा पहिल बेरि शोधपत्रिकाक प्रकाशनमे विश्व्वविद्यालयक सहयोगक प्रति आभार ज्ञापित कयलनि। एहि अवसरपर डॉ. अरुण कुमार झा, डॉ. टुनटुन झा, डॉ. उषा चौधरी, डॉ. रमेश झा, डॉ. विभूति चन्द्र झा, डॉ. अशोक कुमार मेहता, डॉ. फूलचन्द्र झा प्रवीणश्री अमलेंन्दु शेखर पाठक, सोनू कुमार , आलोक, अमृता, किरण, अर्चना, श्यामानन्द, सुरेन्द्र आदि अनेक षिक्षक, शोधकर्त्ता एवं छात्र छात्रागण उपस्थित छलथि।


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
सुजीत कुमार झा
नव व्यापार
 
साँझक सात बाजि गेल छल । साधना एखनधरि नहि आएल छलीह । नेहा वरण्डापर उदास बैसल मम्मीके प्रतीक्षा कऽ रहल छल ।
जीतेन्द्र प्रसाद भितर रुममे दर्दसँ परेशान छलाह । यद्यपि दर्द आइ किछु कम छल मुदा, ओ भितरकँे कछमछीसँ तनावमे छलाह । साँझक चारि बजे चाह पिलाक बादसँ ओ आ नेहा साधनाक प्रतीक्षाकऽ रहल रहैथि । चारि बजे पंकज ब्याटबल खेलऽ चलि गेल छल । रीना सङीसँ भेट करऽ गेल छल । रहि गेल छला जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा ।
साधना भोरे जलपानकऽ कऽ घरसँ निकलल छलीह, ई कहिकऽ जे बेरियाधरि चलि आएब । बहुत रास काज अछि कहि गेल छलीह, कपड़ा बेचबाक अछि, मिश्राजीके घर भेट करबाक लेल जएबाक अछि, महिला क्लवमे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक कार्यक्रममे जएबाक अछि आ बजारसँ दोकानक लेल समान किनवाक अछि, बेरियाधरि आबि जाएब ।
जीतेन्द्र प्रसाद सोचि रहल छलैथि, ‘की भऽ रहल अछि ? साधना हरदम घरसँ बाहर रहऽ लागल छथि । की भऽ गेल छैन्हि हुनका ? पता नहि कपड़ाक व्यपार आ दोकानकँे की भऽगेल अछि ? किए आवश्यकता अछि साधनाकेँ एतेक काज उठएबाक ?’ ओ सोचैत जा रहल छलाह, ‘एखन तऽ आजुक दबाइ सेहो बजारसँ लेबाक अछि । पंकज सेहो खेलकऽ नहि आएल अछि । नहि जानि की भऽगेल अछि एहि घरकेँ ?’
नेहाकँे बजाकऽ ओ अपना लग बैसा लेलैन्हि । जीतेन्द्र प्रसाद आ नेहा दुनू उदास रहैथि । प्रसंग बदलैत जीतेन्द्र नेहाकँे चाह बनएबाक लेल कहलैन्हि । बूझल छलैन्हि जे चिनी समाप्त भऽ गेलै मुदा, ककरो अनबाक पलखैत नहि छै, तखने नेहा इहो कहलक जे घरमे चाहपत्ती नहि अछि ।
जीतेन्द्र प्रसाद नेहाक बात सुनलैन्हि । क्षण भरिके लेल ओ किछु विचलित भऽगेला आ फेर शुन्यमे ताकऽ लगलाह ।
जीतेन्द्र प्रसादक मोन विद्रोहकऽ उठल, ‘की एहनो कतहु घर भेलैए, जतऽ कोनो सामञ्जस्यता नहि । एकरा तऽ होटल सेहो नहि कहल जा सकैए, की विमार हएब कोनो अपराध अछि ? ओ जानि बूझिकऽ तऽ विमार नहि पड़ल छथि । डाक्टर तऽ कहैत अछि बहुत बेसी काज कएलासँ बहुत थकावट आबि गेल अछि, शरीरकेँ आराम तथा मस्तिष्ककँे शान्तिक आवश्यकता अछि । मुदा कहाँ अछि शान्ति ?’ ओ सोचैत रहलाह, सोचिते रहला ।
पंकज आबि गेल । रीना सेहो आबि गेल । जीतेन्द्र प्रसाद सभ किछु देखैत रहलाह, हुनका किछु बाजब, नहि बाजब बराबरे छल । एहि घरक सभ सदस्य पूर्ण स्वतन्त्र छल ।
रीना भानस घरकँे एक सर्वेक्षण कएलक, फेर पंकजसँ किछु कहलक, पंकज बजारसँ किछु समान अनलक । भोजन बनल । राति आठसँ उपर बाजि रहल छल, दोकान बन्दकऽ कऽ दीपक सेहो चलि आएल छल । रीना दीपककेँ बजार पठाकऽ जीतेन्द्र प्रसादक लेल दबाइ मगबओलक ।
रातिक दश बाजि गेल अछि । नेहा सूति रहल अछि । रीना आ पंकज अपना रुममे किछु पढ़ि रहल छल । जीतेन्द्र प्रसाद ओछाएनपर पड़लपड़ल किछु सोचि रहल रहैथि एकटा बात छोड़िकऽ दोसर, दोसर छोड़ि कऽ तेसर ।
साधनाकँे केओ स्कुटरसँ छोड़ि गेलैन्हि । स्कुटरक आवाज सूनिकऽ रीना आ पंकज बाहर आएल । साधना अबिते जीतेन्द्र प्रसादके रुममे चलि अएलीह तथा बगलमे सूति रहलीह । रीना आ पंकज ठकुआएल सन किछु देर ठाढ़ रहल आ चुपचाप घूमि गेल ।
जीतेन्द्र प्रसाद देखिते रहलाह, फेर बात चलएबाक हिसाबसँ बजलाह, ‘कहाँ छलहुँ एखनधरि, घरमे नहि चाहपत्ती, नहि चिनी, नहि चाउर, नहि दबाइ । बेरिएमे आएब कहने छलहुँ ?
हँ, मुदा कि कहुँ महिला क्लव चलि गेलहुँ प्रीति पकड़िकऽ लऽगेल । ओतऽ सुषमा भेट गेल । अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवसक बैसार छल मनोरमाक घरपर । निन्न आबि रहल अछि । सूति रहू ?’
किए, की बात अछि ? आँखि अहाँक लाल बुझाइत अछि ।
हँ, कनिमनि लऽ लेने छी, लेडिज ड्रिंक । ओतेक नहि लगैत छैक । क्लवक आइ वर्षगाँठ छल । मधु दिससँ पार्टी छल । अगिला बेर हमरे नम्बर अछि ।साधना कहितेकहिते सूति रहलीह ।
जीतेन्द्र प्रसाद सुनैत रहला आ सोचैत रहलाह, ‘की भऽ गेल अछि हिनका ? की भऽ गेल अछि एहि घरकँे ? केमहर जा रहल अछि साधना ? की हएत आगाँ ? नहि, आब एकर अन्त करहे पड़त । कोना चलत एना ?’ हुनक हृदयक दर्द बढ़ि गेल । ओ हाथसँ छातीकँे दबा करोट फेरैत रहलाह । रुमके बल जरैत रहल, ओ सोचैत रहलाह .....
आइ एहि शहरमे अएला लगभग दश बर्ष भऽ गेल अछि । आएल छला तऽ कनिक तलब छलैन्हि मुदा कतेक शान्त जीवन छल, कतेक सुखद छल ई घर । साँझ पड़िते अफिससँ घर अएबाक मोन करऽ लगैत छल । कतेक मेल छल घरकेँ एकएक प्राणीमे । तहियासँ कतेक अन्तर आबि गेल अछि एखन । तहियासँ तलबमे सेहो दूगुणा बृद्धि भऽगेल अछि । दश वर्षमे एहि शहरकँे कोनाकोना परिचित भऽगेल अछि । शहरक सभा सोसाइटी सँ सम्बन्ध भऽगेल अछि । ई शहर तऽ आब अपने भऽ गेल अछि ।
साधना आब शहरक महिला क्लवमे जाए लागल छथि । महिला क्लव आब तऽ हुनकापर छा गेल छैन्हि । आब साधनाकँे रुपैयाक लोभ भऽगेल अछि । तहिया कतेक नीक छलीह साधना । थोड़बे रुपैयामे घरक खर्च बढियाँ जकाँ चला लैत छलीह । घरके सभ समान ओहीे पैसासँ कीनल गेल अछि आ आइ की भगेल अछि ? साधना दोसरके देखासिखी दोकानो खोलि लेने छथि । ओहूसँ पैसा अबैत अछि मुदा, तैयो घरक खर्च नहि चलैत अछि । कहियो चाहपती नइँ, कहियो चिनी नइँ, कहियो ई नइँ तऽ ओ नइँ ।
कतेक झगड़ा ! हँ, ओ झगड़े तऽ छल दोकान खोलबाक लेल । कतेक सम्झओने छलहुँ साधनाकेँ । हमर असली धन तऽ नेहा, रीना आ पंकज अछि । यदि इएह सभ ठीक जकाँ पढ़िलिख लेत तऽ एहिसँ बड़का धन आओर कि हएत । एकरो सभकँे स्कुलसँ अएलाक बाद ममत्व चाही । एकरो सभक विषयमे पुछऽबला होएबाक चाही । मुदा की साधना कोनो बातके बुझती ? मानलहुँ हम दोकानमे किछु नहि करैत छी, मुदा घर तऽ बिगरल जा रहल अछि । बच्चा की बुझैत हएत ? की बुभैmत साधना ई सभकऽ रहल छथि ? ओह, की भऽ गेल अछि साधनाकेँ ?
कपड़ाक व्यपार ! ओहो एकटा कथे अछि । साधना कहैत छलीह, ‘कपड़ा बढ़ियाँ बिकाएत ।
कतेक बिकाएल कपड़ा ? महिला क्लवक ई दोसर उपहार छल कि महिला क्लवमे लोक कपड़े किनत दैनिक ? के बुझाओत साधनाकेँ ! जयनगर जाउ, सीतामढ़ी जाउ, कपड़ा लाउ, प्रदर्शनी लगाउ तखन जाकऽ थोकमे कपड़ा बिकाइत अछि । की भऽ गेल अछि हमर जीवनकँे ? साँझमे अफिससँ आउ तऽ स्वयं चाह बनाउ । दीपककँे की पड़ल अछि ? आइ हमरा घरमे अछि, काल्हि दोसर घरमे चलि जाएत ।
पैसा कतऽ बँचैत अछि ? हमर तलब अछि, दोकानके पैसा अछि मुदा एकटा छोटको बिमारीमे कर्जा लेवाक अवस्था चलि आएल । लोक ओतबे अछि । इएह पंकज अछि । पहिने क्लासमे प्रथम करैत छल । शिक्षककेँ प्रिय छल । आब फेल होबऽ लागल अछि । कतेक उदास रहैत अछि पता नहि ककरा सभकेँ सङी बना लेने अछि ?
की भऽ गेल अछि एहि दश वर्षमे,’ जीतेन्द्र प्रसाद सोचैत रहलाह, बल्व जरिते रहल । ओ करोट फेरैत रहलाह मुदा, साधना निफिक्किर सूतल रहलीह ।
भोरमे साधना दीपककँे बजार पठाकऽ घरक लेल समान मगबओलैन्हि । घरके ठीक कएलैन्हि । नेहा, रीना, पंकज सभ साधनाक आगाँ कतेको समस्या सुनओलक । साधना किछु देर सुनैत रहलीह, किछु कालक बाद ओकरा सभकेँ किछु कहलीह मुदा, बातक अन्त भेल नेहाक पिटाइसँ ।
आखिर अहाँ कोन तमाशा बना रहल छी ? की भऽगेल अछि ? अहाँ कतऽ अबैत जाइत रहैत छी ? किछु देर घरोमे रहू आ बच्चाक देखभाल करु,’ जीतेन्द्र प्रसादके तामस बढै
Þत जारहल छल ।
तऽ की करु ? ई सभ काज बन्दकऽ दिऔ ? आब जखन बजारमे कपड़ा बिकाए लागल अछि, दोकान चलऽ लागल अछि, तऽ की बन्दकऽ दिअ दोकानकेँ ? घरमे बैसल रहब तऽ सभ काज ठप्प भऽ जाएत ।
मुदा घरो तऽ नहि चलैत अछि । घरमे कम पैसा तऽ नहि अछि । घर चलएबाक लेल बढ़िएँ तलब भेटैत अछि । एहिसँ कम तलब भेटैत छल तहिया ई हाल नहि छल । एतेक मारिपीट, एतेक झगड़ा नहि होइत छल ।
हम तऽ अहाँके किछु करहोके लेल नहि कहैत छी, हम स्वयं कऽ रहल छी । घर बाहर घूमि रहल छी । शुरुमे तऽ अहुँ मदति कएने छलहुँ, बच्चा आब तऽ छोट नहि रहि गेल अछि, अपन काज स्वयं कऽ सकैत अछि । घरमे एकटा नोकरो अछिए । की हम नोकरनीए बनिकऽ रहू सभ दिन ?’
ओह, अहाँ इहो तऽ सोचू जे हम विमार छी । उठिकऽ स्वयं चलि फिर नहि सकैत छी । बजारसँ समान नहि आनि सकैत छी । बच्चाकँे पढाइ सेहो बढियाँसँ नहि चलि रहल अछि । एहिसँ बढिकऽ तऽ पैसा नहि अछि । जखन हमही सभ नहि रहब तऽ की हएत पैसा लऽ कऽ ? लड़का गुण्डाआवारा भऽ जाएत तऽ की हएत ? अहाँकँे बन्द करऽ पड़त ई सभ कारोवार । ई घर अछि कोनो बजार नहि, होटल नहि । याद राखू, घर अछि ।
चाहे जे भऽ जाउ, हम दोकान बन्द नइँ करब । कपड़ाक व्यपार नहि बन्द करब । चाहे बच्चाकँे होस्टलमे पठाउ वा घरमे पढ़ाउ । अहाँकेँ बेमारीएमे कतेक खर्च भेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ? घरक खर्च कतेक बढ़ि गेल अछि, किछु बूझल अछि अहाँकेँ ?’
जीतेन्द्र प्रसाद टूटि सन गेल छलाह, ‘हम की देखू ? बच्चा होस्टल जाएत तऽ खर्चा बढ़त की घटत ? हमरा बिमारीमे पैसा लागल तऽ की हमर पैसा किछु नहि बचल छल ? अहाँ की कहऽ चाहैत छी ? की मतलव अछि अहाँकें ? ’
दुनूके स्वरक आवाज बढै
Þत जा रहल छल । बातचित आब झगड़ाक रुप धारणकऽ लेने छल । तखने रीना चाहक कप लऽकऽ रुममे पहुँचल । चुप्पी ।
साधना चाहक कप जीतेन्दं्र प्रसाद दिस बढ़ा देलीह । किछु देरक शान्ति । दूनु एक दोसरकेँ देखैत रहल मुदा किछु नहि बाजल ।
साधना कपड़ा लऽकऽ बाथरुम चलि गेलीह । जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप पड़ल रहलाह । पाएर लग नेहा बैसल छल । एखनधरि पत्रिका सेहो चलि आएल छल । मोट अक्षरमे महिला दिवस मनएबाक कार्यक्रम छपल छल । शहरक लेडिज क्लवमे महिला वर्ष मनएबाक पुरा कार्यक्रम छल । साधना कार्यक्रमक संयोजक छलीह ।
कलवेल बाजि उठल । नेहा गेट खोललक ।
मम्मी अछि, बौवा ?’
हँ, छैक । अपने के ?’
कहियौन्ह मिश्रा जी आएल छथि ।
मिश्राजीक नाम सुनिते साधना जल्दीजल्दी वाथ रुमसँ निकललीह ।
बेटी, एक कप चाह पियबियौन्ह, कनी जल्दी ।
साधना कपडा बदलि लेलीह । रीना चाहक कप रुममे रखलक साधना सेहो मिश्रा जी सँग चाह पीलैन्हि आ बैग उठा लेलैन्हि । हँ, तऽ हम जा रहल छियौ । जल्दिए अएबाक कोशिस करबौ । रीना, भोजन बनालिहँे । रुपैया अलमारीमे छौ ।जीतेन्द्र प्रसाद चुपचाप सुनैत रहलाह, साधना मिश्राजीक स्कुटरपर बैसि विदा भऽ गेलीह ।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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