Thursday, March 01, 2012

'विदेह' १०० म अंक १५ फरबरी २०१२ (वर्ष ५ मास ५० अंक १००)part 3



 १. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल२.वनीता कुमारी ३.अमित मिश्र- गजल -कविता
४.आनन्द झा -गीत- गै माए ५.जगदानंद झा 'मनु' कविता सँ आगु आगु छी



जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल

 गजल १

पढबाक मोन होइए, लिखबाक मोन होइए
किछु ने किछु सदिखन सिखबाक मोन होइए ।

अन्हड जे रातिखन एलै, सब गाछ डोलि गेलै
टिकुला कतेक खसलै, बिछबाक मोन होइए ।

सासुर इनार होइए आ डोल थिकहुं हमहूं
किछु ने किछु एखनहुं झिकबाक मोन होइए ।

अहां आबि जे रहल छी, सुनिकबताह भेलहुं
गोबरसं आइ आंगन निपबाक मोन होइए ।

दुइ ठोर थीक अथवा तिलकोर केर तडुआ
होइत अछि लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए ।

कोनो ऑफिसक चक्कर लगबने पडै ककरो
ई बीया विचार-क्रान्तिक छिटबाक मोन होइए ।

आजादीक लेल एखनहुं संघर्ष अछि जरूरी
व्यर्थ गेल सब मांगब, छिनबाक मोन होइए ।

गजल २

जै खातिर मारा-मारी अछि
भात-दालि-तरकारी अछि ।

छात्र गरीबक धीया-पूता
विद्यालय सरकारी अछि ।

ई जे उल्लू देखि रहल छी
लक्ष्मी मैयाक सबारी अछि ।

सदाचारके शिक्षा सबठां
सबठां चोरबजारी अछि ।

भोज करत रसगुल्लाके
बडका ई भ्रष्टाचारी अछि ।

घूस, दहेजक चस्का बूझू
छूआछूतक बीमारी अछि ।

देश द्रौपदी, हम भीष्म छी
हमरहुँ ई लाचारी अछि ।



वनीता कुमारी
प्रजातंत्रक पुनर्निमाण
प्रजातंत्र पर विचारविमर्श
के भष्ट आ के आदर्श

राजनीति मे आनी सदाचार
मिटाबी सबतरहक भष्टाचार

जागरूक रहय सब जनता
व्यर्थ नहिं होय ककरो नागरिकता

होय परीक्षा राजनेता के योग्यताक
तखने भेटय आज्ञा चुनाव लड़बाक

वैह नागरिक क सकय मतदान
जकरा होय अधिकारक पूर्ण ज्ञान

साक्षरताक प्रसार जहिना आवश्यक
अनिवार्य जानकारी तहिना लोकतंत्रक

किछु आधारभूत पाठ्यक्रम के ईच्छा
ताहिमे होय बढ़िया परीक्षा

बिना उत्तीर्ण भेने नहिं सम्भव
चुनावक उम्मीदवार आ मतदाताक पद


अमित मिश्र
गजल -कविता

गजल
जीवन मे जौँ नै रहबै कने सामने रहू ,
जा धरि चलै छै साँस हम्मर सामने रहू ,

केहनो हो मौसम फुल गमक नै छोड़ै छै ,
प्रेमक गाछ कए फुल छी गमकौने रहू ,

लोग कतबो दुषित करै छै पर्यावरण ,
सुर्य-चान उगबे करतै समझने रहू ,

जौँ हटि जायब प्रियतम अहाँ सामने सँ ,
हमरा संग सिनेह हारत , जीतौने रहू ,

ऐ वालेंटाइन देखा दियौ प्रेमक तागत ,

नभ सँ भू धरि प्रेम जाम छलकौने रहू

काँट इ जमाना छै सिनेह गुलाबक फुल ,
"अमित " नदी कए दुनू कात सम्हारने रहू . . . । ।
                                 

                                                  
होली क एक गजल

चढ़लै फगुआ सुनि लिअ ,
मस्ती चढ़ल छै जानि लिअ ,

जोगीरा संग झुमै जाउ यौ ,
मौसम सँ खुशी छानि लिअ ,

रोक-टोक नै सब पिने छै ,
झुमु-नाचु छाती तानि लिअ ,

लाल पियर गुलाबी कारी ,
सब रंगक गड्ढा खुनि लिअ ,

अबिरक खुशबू गमकै ,
रंगक चादर तानि लिअ ,

रामा छै सासुर मे बैसल ,
सारि कने रंग मानि लिअ ,

अबिर द' ' गोर लागै छी ,
माथ हम्मर ,हाथ आनि लिअ . .
 
*** गजल ***

चाँन देखलौ त' सितारा की देखब ,
अन्हारक रूप दोबारा की देखब ,

प्रेमक सागर मे बड़ मोन लागै ,
डुब' चाहै छी त' किनारा की देखब ,

एहि ठामक मिठाई सँ बेसी मिठ ,
रूपक छाली सिंगहारा की देखब ,

अपने आप राति रंगीन भ' जाए ,
फेर बोतलक ईशारा की देखब ,

मेघक डरे चान नै बहरायल ,
ओ नै औता त' नजारा की देखब ,

जखन यादिक सहारे जी सकै छी ,
तखन चानक सहारा की देखब . . . । ।

 
 कविता                                
मखानक पात

जहिना मखानक पात नया मे काँट सँ भरल होइ छै ,
आ पुरान भेला पर कोमल भ' जाइ छै ,
एकटा छोट बच्चा एक्के हाथे मसैल सकै छै .
ओहिना मनुष्यक जीवन होइ छै ,

जखन धरि जुआनी तखन धरि बड़ बलगर ,
जखने देह खसल आँखि धसल दाँत बाहर ,
बस लाति-मुक्का सँ स्वागत शुरू भ' जाइ छै ,

जुआनी मे जे पाँच-पाँच सेर दुध पिबै छल ,
आब आधा कप चाह गारिक बिस्कुट संग भेटै छै ,
जीवन भरि जे अपन कपड़ा नै खिचलक ,
पुतहु कए साड़ी चुप-चाप खिच' लागै छै ,
जकर चरणक धुल इलाका कए लोग माथ लगबै छल ,
अपन बेटा कए चरण पकड़ै लए विवश भ' जाइ छै ,


ताहि पर जै कोनो बिमारी भ' जाइ ,
सोचू जौँ लकवा मारि जाइ ,
' केहन हाल हेतै ,
सच मे मनुष्यक जीवन मखानक पात छै ,
कविता -
हरियर गाछ

 बाबा हरियर गाछ होइ छै ,
हुनक बेटा डाढ़ि-पात होइ छै ,
सुरूजक रौद सब पर पड़ै छै ,
फल-फुल पोता-पोती होइ छै ,
तैयो हरियर गाछ काटै छी ,
अपने हाथे बाबा कए मारै छी ,
गाछ काटि प्राणवायु कम करै छी ,
मौसम कए मारि अपने सहै छी ,
बेटा-पोता लए मौत लिखै छी ,
समाजक नाश अपने करै छी ,
" अमित " किय हरियर गाछ काटै छी . . . । ।

आनन्द झा
गीत
गै माए
गै माए कोरामे उठा ले हमरा, ह्रदयसँ लगा ले 
आएल छी तोरा शरणमे चरणसँ लगा ले 
गै माए........................................................

हमहूँ तोरे सखा छी,  भटकि हम गेल छी 
माया आ लोभमे, सहटि हम गेल छी 
गै माए आँचरमे नुका ले हमरा नयनमे समा ले 
गै माए............................................................

माँ नै कुमाता होइ छै, हमहीं कपूत छी 
हमरा बिसर नै एना, हमहूँ तोरे पूत छी
गै माए दया तों देखा दे हमरा डुबैसँ बचा ले 
गै माए............................................................
दस हाथ बाली मैया , कते के बचेलौं 
हमरा बेरमे जननी नजरि फेर लेलौं 
गै माए एक बेर फेर अपना करेजासँ लगा ले 
गै माए.........................................................
डेगे डेगे दुनियां हमरा, ठोकर मारैए
आँखिसँ नोर झहरए, रोकलो नै जाइए 
गै माए टुटल आनंदक तों आस फेर बन्हा दे 
गै माए........................................................

जगदानंद झा 'मनु'

कविता 

सँ आगु आगु छी 

के कहैत अछि निर्धन छी हम 

थाकल हारल मारल छी 

हम छी मैथिलपुत्र 

दुनियाँ मे सँ आगु-आगु छी 

 

देखू श्रृष्टिक   संगे देलौंह 

विदेह, जनक, जानकी हम 

आर्यभट्ट, चाणक्य 

दोसर नहि, बनेलौंह हम 

 

पहिल कवी श्रृष्टिक 

वाल्मीकि बनौलक के

कालिदासक कल-कल वाणी 

छोड़ि मिथिला दोसर देलक के 

 

विद्यापति आ मंडन मिश्र सँ 

छिपल नहि विश्व अछि 

दरभंगा महाराजक नाम 

भारतवर्ष मे  बिख्यात अछि 

 

राष्ट्रवि उपाधि भेटल जिनका 

मैथिलीशरण  मिथलेक छथि 

दिनकरकेँ जनै छथि सब 

यात्री छुपल नहि छथि 

 

कुवर सिंह आ मंगल पाण्डे

फिरंगी सिर झुकौने छथि 

गाँधीजी  असहयोग आन्दोलन 

एहिठाम सँ केने छथि 

 

देशक प्रथम राष्ट्रपति भेटल 

मिथिलाक पानि शुद्धि सँ 

दिल्लीकेँ बसेलक कहू

ए.एन.झाक बुद्धि सँ 

 

आई.आई.टी.मे अधिकार केकर अछि 

मेडिकल हमरे अन्दर अछि 

विश्वास नहि हु तँ आंकड़ा देखू

टा आई..एस हमरे अछि |



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.आशीष अनचिन्हार-दीर्घ कविता-सोझ बाट पर चलैत-चलैत २.नवीन ठाकुर-काल-दिशा

आशीष अनचिन्हार
दीर्घ कविता

सोझ बाट पर चलैत-चलैत

1

सोझ बाट पर चलैत-चलैत
पहुँचि जाइत छी
अक्का दारूण बनमे
अनचिन्हार लक्ष्यक संग
नहि भेटैत अछी अपेक्षित लक्ष्य
बी.बी.सी सुनला उतरो
प्रतियोगिता किरण पठलों सन्ता
नहि भए पबैत छी कोनो सरकारी चपरासी
मानलहुँ
कननाइ कोनो समस्याक समाधान नहि
मुदा हँसनाइए कोन
समस्याक समाधान छैक ?
मजबूरीमे बौक जकाँ चुप्प रहनाइ
नियति बनि गेल छैक लोकक
टाट खरहीक हो की सीसाक
ओ मात्र टाटे होइए
ओकर काजे छैक सीमा निर्धारण
इ गप्प भिन्न जे सीसाक आर-पार देखाएत
इहो गप्प भिन्न जे टाटकेँ काटि हाथ मिला सकैत छी
मुदा
भावनाक आदान-प्रदान केनाइ
ओतबए संभव छैक
जतेक की बड़दक दूधसँ खीर बनेनाइ
देहक हाड़-पाँजर फाटि रहल
बाँसक गीरह जेना
पाकल बाँस भने नहि होइ
मुदा काँचो नहि छी
बेछील्ले बाँस करए बला बेसी अछी
बाँसक अनुपातमे
लोक गनगुआरि वा सहस्त्रबाहु हुअए
की नहि हुअए
मुदा काज सुतारबाक लेल
हजार-हजार टा हाथ-पएर भए जाइत छैक
आ हरेकक आँगुरमे बान्हल रहैत छैक
स्वचालित पिस्तौल
गोली लोक छाती पर नहि
पीठ पर खाइए
सोझ बाट पर चलैत-चलैत

2

सोझ बाट पर चलबासँ पहिने
कए लिअ अपन टाँगकेँ टेढ़
कारण
सोझ टाँगे सोझ बाट पर चलब
केखनो नीक नहि
ठीक नहि
आ अहाँ जखन देखिए रहल छीऐक जे
नेङरा सभ दौड़मे प्रथम स्थान लेलकै
तखन हमर सलाह पर
आपत्तिक कोनो प्रश्ने नहि
सभ लोक बामने टा
बनबाक जोगारमे
उगह चान की लपकह पूआ
केर जाप करैत हरेक मनुख
जोहि रहल अछी बाट
अर्ध-सत्यक
अधभूखल रहबासँ बेसी दुखदायी अछी
अधनङनटे रहब
दूभि खेनिहार बकरी भोगि रहल अछी जाबी
आ शेर खा रहल
जिंदा मासु
अधपहरा आ अधकपारीक संयोगसँ
जन्मल छी हम
अर्धमनुख
क्षणिक शांति लेल
दीर्घ आशांतिक निर्माण करब
एहिसँ बड़का छल कोनो नहि
भेड़िया-धसाना होइत संसदमे
पूर्वज आ वंशज
इएह दूनू देखाएत
आम कार्यकर्ता आब नहि बनि
पाओत कोनो
मंत्री
प्रधानमंत्री
राष्ट्रपति
टुटलो हथिसार नौ घरक साङह
होइत छैक
हमरा नहि संदेह एहि पर
संदेह तँ अछी हाथीक बल पर
जे आब एक बेरमे
एक टन खाओ लेला पर
एकै मिनटमे हकमि जाइत अछी
ओना हकमैए तँ कूकूरो
मुदा इ ओकर
जन्मजात गुण छैक
आ बड़दक ?
खटनाइ सएह ने
चलू सहमत छी हम अहाँक गप्पसँ
सोझ बाट पर चलैत-चलैत

3

सोझ बाट पर चलैत-चलैत
अहाँ
इ नहि बुझि सकैत छीऐक जे
छोट-छोट गप्प
पैघ कोना भए जाइत छैक
अहाँ
इहो नहि बुझि रहल छीऐक जे
एक किलो तूर कोना बदलि जाइत छैक
पहाड़क रुपेँ
सोझ बाट पर चलैत-चलैत
अहाँ
इहो नहि बुझि पबैत छीऐक जे
कोना लाशक नाम पर
बैंक-बेलैंस
बढ़ि जाइत छैक
जीति जाइत छैक नेता कोना
लाखक-लाख भोटसँ
अहाँकेँ इहो नहि बूझल हएत जे
मनुखक आत्मा
मरलैए नहि
मारल गेलैए
बम आ गोलीक सहारासँ
लोकसँ
धूनि नहि फटि पबैत छैक
मुदा
लोककेँ छाती महँक दूध
फाड़ए अबैत छैक
येन-केन-प्रकारेण अम्मत घोरि कए
एहन परिस्थितिमे जखन की
धनिकक बच्चा बड्ड जल्दी जबान होइत छैक
कामशास्त्र आ कोक शास्त्रक
कतेक महत्व छैक
से नहि बूझि पेबैक
प्रतिघंटामे कतेक बच्चा होइत छैक
तकर आकँड़ा लेब अहाँक लेल
असंभव नहि
मुदा
प्रति सेकेण्डमे कतेक कंडोम
बिकाइत छैक तकर थाह अहाँकेँ नहि लागत
अहाँकेँ इहो थाह नहि लागत जे
खाली समयकेँ कटबाक लेल
कतेक युवा
कतेक मिनटमे
कतेक बेर वीर्यपात करैत छैक
कतेक अभिसारिका
अभिसार करैत छथि
गुरुजनसँ चोरा कए
एकरो थाह नहि लागत अहाँकेँ
सोझ बाट पर चलैत-चलैत

4

सोझ बाट पर चलैत-चलैत
छटपटाइत अछी
कटल मुर्गी जकाँ
जखन ओकरा बुझाइत छैक जे
हम कोनो राकसक फेरमे छी
छटपटाइत-छटपटाइत
दैए चकभाउर
मोने-मोन जपैए सावित्री मंत्र
पढ़ैए हनुमान चलीसा
मुदा काज नहि अबैत छैक इ सभ
आ बेहोस भए जाइत छैक अंतमे
भोरक पहिल पहरमे निन्न
खुलला पर मोन पड़ैत छैक
जे पीने छलहुँ शराब भ्रमक भरिपोख
आ निकलि पड़ल छलहुँ
बजारमे
उत्तर आधुनिकता आ भूमंडलीकरणक संग
ग्लोबल विलेजक निर्माण करबाक लेल
इ सभ मोन पड़ैत छैक
सोझ बाट पर चलैत-चलैत

5

सुतबाक लेल नहि
जगबाक लेल खाइत छी निन्नक गोली
आ जखन जगले-जागल देखैत छी जे
वास्तवमे
कोनो अंतर नहि होइत छैक
सरकारक कागती विकास आ
साहित्यकारक कागती प्रगतिशीलतामे
तखन
हमर पएर तरसँ
बिला जाइत अछी रमणगर सोझ बाट
मायावी राक्षस जकाँ
आ खसैत छी हम यथार्थक पतालमे
छद्मक घोघ तर
मनुख कतेक सुन्नरि होइत छैक
एकर आकलन कोनो सौंदर्यशास्त्री नहि कए पौताह
मुदा कतेक करूप होइत छैक
मनुख छद्मक आवरणमे
तकर निर्धारण जानवर
तुरंत कए देत
सोझ बाट पर चलैत-चलैत

6
सोझ बाट पर बनल एकटा घरक
हरेक कोड़ो-बातीमे
लटकल छैक
बादुर
सन्हिआएल छैक करैत
घरमे राखल दाना-दाना पर
लिखल छैक
प्रेतक नाम
दाना-दानामे छैक
शोणितक सुआद
ओहि घरमे बसैत छैक
डाइन
जे डनिपन सिखबाक लेल
दए देलकै बलि
अपन पूत-भतार
देआद
सर-समांगकेँ
हरेक अधरतिआमे
नङटे नचैत अछी डनियाँ
हरेक राग-रागिनीक लय ओ ताल पर
केखनो ओ गाबए लगैत अछी
प्रखर सेक्युलर राग
तँ केखनो
अंधराष्ट्रवाद रागिनी
आ नचबाक लेल बाध्य कइए दैत छैक ओ
सभ भूत-प्रेत-बैतालकेँ
एहि राग-रागिनीक लय-ताल पर
नहि समता कए सकताह नटराज
एहि नाचसँ अपन नाचकेँ
उचित छन्हि हुनका जे
ओ छोड़ि देथु अपन पदवी
नटराजक
सोझ बाट पर चलैत-चलैत
7
बाट आ बाट नहि रहल
भने ओ सोझ हुअए की टेढ़
बनि गेलैक ओ राजगद्दी
बटोहिओ आब बटोही नहि रहल
भने ओ अहदी हुअए की कमासुत
बनि गेल ओ राजा
प्रजा नहि छैक
एहि सोझ बाटक नगरीमे
सभहँक पोनमे छैक लस्सा लागल
जाहिमे सटल छैक कुर्सी
मुदा एकटा गप्प बुझबै
हरेक कुर्सीमे
पोसा रहल छैक धामन साँप
बस देरी छैक
मात्र
गुदा मार्ग द्वारा
मगजमे घुसबाक
जे काज गहुमन आ नाग नहि कए सकल
से इ बिखहीन धामन देखाओत
ओना बिखहीन हुअए की बिखाह
साँप अंततः साँपे होइत छैक
से हमरा बुझा रहल अछी
सोझ बाट पर चलैत-चलैत


नवीन ठाकुर
-: काल-दिशा :-

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,

एखनो समय सँ लैर रहल छी
...//
अपनों सँ अल्गेलक हमरा
!
दियादी फैंटी में बैंटि रहल छी
....,
ततेक मोन भट्केल्क हमरा ,

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,

मोन मसोरने हांफी रहल छी
.....//
भैर जिनगी दौरेलक हमरा ,
की पेलहूँ हम की छुटल अछी
....,
सब्किछ ई बिसरेलक हमरा
!

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,

भेलहुँ ज्ञानी समय अनुरूपे
......// 
तेहन पाठ पढेलक हमरा ,
भैर दुनियां के ज्ञान बंटई छी
.....,
अपना सँ पिटबेलक हमरा
! 

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,

अंत काल समय फेर भेटल
......// 
काया साथ नै देलक हमरा ,
जै काया लेल समय गवेलहूँ
.....,
समय साथ छोरबेलक हमरा
!

समयक मूल्य हम बहुत चुकेलहूँ
तैयो समय नै भेटल हमरा,

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.अनिल मल्लिक- गीत-गजल

जगदीश प्रसाद मण्‍डलक नौटा कवि‍ता-
घोड़ मन (भाग- 1)

घोड़ मन घोड़छान तोड़ि‍
चौदहो लोक भरमए लगल।
सातो-सोपान पताल टपि‍
सातो अकास उड़ए लगल।

समए संग जहि‍ना बि‍लगैए
मि‍सरी-मक्‍खन ओ ि‍नर्मल जल
हंसा उड़ि‍ परमहंसा बनि‍-बनि‍
तहि‍ना उड़ैत मन देह-स्‍थल।

स्‍थूल-सूक्ष्‍म बॅटि‍-बॅटि‍ जहि‍ना
दृश्‍य-भाव कहबैए।
एक्के आँखि‍ये दुनू देखै छी।
अचेत मन भरमैए।

नि‍कलि‍ देह धारण करैए
आत्‍म-परमात्‍म दर्शन पबैए।
पबि‍ते दर्शन मगन भऽ भऽ
सूर-तान, वीणा धड़ैए।
मथि‍ते मथानी जहि‍ना
घी-पानि‍ बि‍लगए लगैए।
जले बीच दुनू समाएल
उठि‍ एक सि‍र चढ़ए लगैए।
लोहि‍या चढ़ल आगि‍ बीच जहि‍ना
मक्‍खन नचए लगैए।
काह-कूह फेकि‍-फेकि‍
पेनी बीच बैस जमैए।



घोड़ मन (भाग-2)

गोबर घोड़ाइते पानि‍ जहि‍ना
गोबराह रूप धारण करैए
गोबरेक गंध पसारि‍-पसारि‍
गोबरछत्ता बनि‍-बनि‍ छि‍ति‍राइए।
सुवि‍चार कुवि‍चारो तहि‍ना
छने-छन छीन होइत चलैए।
गि‍रगि‍ट रंग पकड़ि‍-पकड़ि‍
गि‍रगि‍टि‍या चालि‍ चलए लगैए।
गि‍रगि‍टि‍या मनुक्‍खो तहि‍ना
दि‍न-राति‍ बदलैत चलैए
गीरगि‍टेक जहर सि‍रजि‍-सि‍रजि‍
बीख उगलैत चलैए।
भेद-कुभेद मर्म बि‍नु बुझने
देखा-देखी ओढ़ैत चलैए
ओढ़ि‍-ओढ़ि‍ ओझरा-पोझरा
डुबकुनि‍या काटि‍ मरैए।
गाछक उपर डारि‍ बीच जहि‍ना
बॉझी अपन बास करैए
झड़मनुखो मनुख बीच तहि‍ना
उपरे-उपर चालि‍ मारैए।
सात समुद्र बीच मनुख
दसो दि‍शाक दर्शन पबैए
चीन्‍हि‍-पहचीन्‍हि‍ केने बि‍ना
जि‍नगीक बाट पकड़ैए।


घोड़ मन (भाग-3)

प्रकृतोक तँ प्रकृत गजब छै
सुगंध-कुगंध फूल खि‍लबैए।
सु-पारखी सुरखि‍-परखि‍
कु-पारखी दि‍न-राति‍ मरैए।
परखि‍नि‍हारो परखि‍ कहाँ
परखि‍-परखि‍ बि‍लगा चलैत
धार-मझधार बीच
पि‍छड़ि‍-पि‍छड़ि‍ नहि‍ये खसैत।
बेबस मन बहटि‍-बहटि‍
सीरा-भट्ठा बि‍सरए लगैत
जान बॅचबैक धरानी कोनो
लपकि‍-लपकि‍ पकड़ए चाहैत।
सत्ताक भत्ता छि‍ड़ि‍आएल छै
फानी, फनकी बनि‍ लागल छै।
चि‍ड़चि‍ड़ीक फड़ जकाँ
चूभि पएर टीको‍ नोछड़ै छै।
बि‍नु पाँखि‍क हंसा जहि‍ना
तीनू लोक वि‍चरण करैए।
दि‍न-राति‍क भेद बूझि‍-बूझि‍
अज्ञान-ज्ञान-सज्ञान बनैए।


घोड़ मन (भाग-4)

आँखि‍ मि‍चौनी पाश बैस
ब्रह्म-जीव माया खेलैए।
समए पाबि‍ तहि‍ना ने
अज्ञानो-सज्ञानक चालि‍ चलैए।
होइत आएल आदि‍येसँ
अज्ञान-ज्ञान बीच संघर्ष
ताधरि‍ चलि‍ते रहत
जाधरि‍ अन्‍हार इजोत बनत।
पछुआ छोड़ सम्‍हारि‍-सम्‍हारि‍
अगि‍ला पकड़ैत चलू।
अतीत केर स्‍मृति‍ बना
समद्रष्‍टा बनैत चलू।
एक छोड़क बाट देखि‍
भूत-वर्तमान देखैत चलू।
भवि‍ष्‍य तँ भवि‍ष्‍ये छी
भवि‍ष्‍य-वर्तमान बनबैत चलू।
डेंगी नाह जहि‍ना यात्री
धार पार करैए।
डगमगाइत देह मड़मड़ाइत मन
जीवन धाम पहुँचैए।





अलकक चान

अबि‍ते गाम चमकए लगलै
ताकि‍ तरेगन बि‍छए लगलै।
ज्‍योति‍ मि‍ला परखि‍-परखि‍
अकास सि‍र सजबए लगलै।

रंग-बंरंगक तारा सजल छै
लग-पासक संग सेहो हटल छै।
कोणे-काणी सजि‍-धजि‍
मोती-कंचन माला बनल छै।

धूप-छाँहक पाश पाबि‍-पाबि‍
नब-पुराणक भेद मि‍टल छै।
धाम ज्ञानक चोला पहि‍रि‍-पहि‍रि‍
शब्‍दशब्‍दक जाल पसरल छै।

मुर्ति जखन कागज उतड़ि‍
रूप भगवान धारण करै छै।
झड़ि‍-झड़ि‍ झहड़ि‍ असल
नकल रूप धड़ए लगै छै।

जहि‍ना कार्बन काॅपी होइ छै
नकल कार्बन चढ़ए लगै छै।
तहि‍ना अरूप सरूप संग
चुट्टी चालि‍ चलए लगै छै।

जहि‍ना मुसक चालि‍ पकड़ि‍
मुसरी सेहो घुसकए लगै छै।
जाल-महजाल पकड़ि‍-पकड़ि‍
पकड़ि‍ सुत कॉटए लगै छै।

आदि‍क दुहाइ लगा-लगा
आधि‍-व्‍याधि‍ सि‍रजए लगै छै
मकड़-जालक रूप गढ़ि‍-गढ़ि‍
अपने चालि‍ये फँसए लगै छै।

अकलक चान हाॅसू पकड़ि‍
खल-खल सतमी पार करै छै।
अट्टहास अष्‍टमी केर पबि‍ते
नब-रंग नवमी कहबै छै।

पबि‍ते नौमीक चान अकलक
पूवो दि‍स ससरए लगै छै।
पुवोक परताप पकड़ि‍-पकड़ि‍
पूर-चान कहबए लगै छै।

एक चान यमुना उतड़ि‍
महल ताज देखए लगै छै।
दोसर चान पून्‍यात्‍मा बनि‍
आत्‍म लोक बि‍चड़ए लगै छै।

डेग-डेग दर्शन पबैत,
डेगे-डेग ससरए लगै छै।
उड़ि‍ अकास धरती पकड़ि‍
चान-सूर्ज कहबए लगै छै।

प्रीत-रीति‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍
अपन-अपन बेथा गबै छै
राग-रागि‍नि‍ राग भरि‍-भरि‍
प्रेमाश्रु धार बहबै छै।

जमुनाक जल बनि‍-बनि‍
नीर सरस्‍वती चढ़बै छै।
गाड़ा-जोड़ी करैत दुनू
गंगा बाट बनै छै।

तीनू मि‍लि‍ तिरवेणी कहबए
सूर-तान-राग भरै छै।
आलाप-परलाप भरैत-करैत
परि‍याण परि‍याग करै छै।





गीत

भाेरे कने जगा देब,
भोरे कने जगा देब,
भाय यौ भोरे कने जगा देब।
जुग-जुगसँ मोटका नीन धेलक
सि‍रमा तरक सभ कि‍छु लेलक।
आबो कने जगा देब,
भाय याै आबो कने जगा देब।
इन्‍दि‍रा अवासमे नाओं लि‍खेतै
सि‍मटी-ईटा केर घरो बनतै।
झाँटक झटकी कि‍छु ने करतै
भोरहरबे कने जगा देब
भाय यौ भोरहरबे कने जगा देब।
सात कोस पएरे जए पड़तै
ब्‍लौकेमे शि‍वि‍र लगतै,
ओतै नाओं लि‍खेतै,
भाय यौ, भोरे कने जगा देब...।


प्रेमी पि‍या

प्रेमी पि‍या, हे प्रेमी पि‍या
पीरि‍ति‍या जोगा-जोगा, हृदए रखि‍यौ जीया
हे यौ प्रेमी पि‍या....
तड़सि‍-तड़सि‍ मन तड़पि‍ रहल अछि‍
आस लगा बाट खोजि‍ रहल अछि‍
नजरि‍ उठा आबो कने, ताकि‍ तकि‍यो हि‍या
हे यौ प्रेमी पि‍या....
चीन्‍हपहचीन्‍ह सभ, सेहो उड़ि‍या गेल
हवा केर झोंक पाबि‍, सभ छि‍ड़ि‍या गेल
आबो कने नजरि‍ उठा, दि‍अ हमरो जीया
हे यौ प्रेमी पि‍या....
सभ दि‍न संगे मि‍लि‍ दुनू रहलौं,
सुख-दुख सेहो संगे मि‍लि‍ कटलौं।
छाती खोलि‍ सहेजि‍-सहेजि‍,
दि‍ल दि‍लेरि‍ घड़ू पीरि‍ति‍या
हे यौ प्रेमी पि‍या...।


शील

द्रवि‍त होइत पानि‍ जहि‍ना
सुख-शील रूप धड़ैए।
तहि‍ना ने गाछो-बि‍रीछ
फल जीवन, मृत्‍यु सुख बॅटैए।

जे सृष्‍टि‍ सि‍रजए वन-सागर
सएह ने सि‍रजैत वन-मनुख।
बनि‍ मनुष्‍य बनबास करए जौं
पबैत राम गुण, शील मनुख।

लस्‍सा-दूध नाम धड़ए एक
दोसर सागर-सरोवर कहबै छै।
लहू कहि‍-कहि‍ जीव धड़ए
वनमानुख खून मनुष्‍य कहबै छै।

सुखा खून अपन अस्‍ति‍त्‍व
शील-सि‍रजक कहबैए।
शीले तँ रूप सु-भावक
बढ़ि‍ रूप गुण पबैए।

पबि‍ते गुण भव-सागरमे
गुणी बनि‍ गुण खि‍ंचैए।
छाती लगा बान्‍हि‍ बाँस
रस्‍सीक संग सटैए।

शील जखन गुण बनैए
मनुख गुण खि‍ंचए लगैए
गुणी बनि गुदगुदबैत मन
जीवन सुख संचार करैए।

कखनो रस्‍सा-कस्‍सी करैत
कखनो ढील-ढाल चलैए।
शीतल-समीर पाबि‍ कखनो
संगे-संग वि‍श्राम करैए।

दि‍न-राति‍क बीच समीर
कुरूक्षेत्र कहबए लगैए।
उनटि‍-पुनटि‍, ओंघरा-पोंघरा
रणभूमि‍ सि‍रजए लगैए।

जे फल पाबि‍ राम बनबौलनि‍
समुद्र बीच सघन पुल।
तहि‍येसँ उड़ए लगलनि‍
रस्‍ता-बाटक मि‍झि‍राएल धूल।

सएह फल पाबि‍ रचलनि‍ कृष्‍ण
भारतसँ बनैत महाभारत।
हि‍मालयसँ समुद्र
आ समुद्रसँ कैलाश महादेव

वएह थि‍क हमर भारत।
भरत बनि‍ भ्रमैत भॅबर
चरण-सि‍र धड़ैत जहि‍ना
सएह चरण सुरसरि‍ सि‍रजि‍

शि‍व-कैलाश समाएल जहि‍ना।
पी-घैल पाथर जहि‍ना
पाथर वर्फ कहबए लगै छै।
सि‍रजि‍ शील शीला बनि‍-बनि‍

शीला पत्‍थर कहबए लगैए।
नब रूप सि‍रजि‍-सि‍रजि‍
जल रूप धारण करैए।
बनि‍ जल-कण उड़ि‍ उकास
हवा संग झुमैत चलैए।

प्रेमी-प्रेमि‍का बीच दुनू
अश्रु-कण बि‍लहैत चलैए।
वएह कण-कणाइत बढ़ि‍
ओस बनि‍ धरती सि‍ंचैए।

धरि‍ते धड़ा-धरती कन्‍हुआ
हाथ दुनू छाती सटबैए।
मि‍लि‍ दुनू सि‍ंगार सजि‍
वसुदेव रूप धारण करैए।‍

बनि‍ वसुन्‍धरा बनि‍ बसुदेव
धार-धाराक धारण धड़ैत।
पबि‍ते जल जलधार बीच
राइ-पहाड़ रूप सजबए लगैत।

बीच-बीच बाट-घाट बनि‍
रूप श्रृंगार सजबए लगैए।
एक घाट दोसर नदी बनि‍
झील, सरोवर सागर सि‍रजैए।

झि‍लहोरि‍ झील खेलाइत रश्‍मि‍
आकर्षित-आकर्षण करैए।
प्रेमास्‍पद पबि‍ते पाबि‍
प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए।

पाबि‍ प्रेमी प्रेमी जखन
सागर गंगा मि‍लए चाहैए।
बॉसक पुल बना समुद्र
गंगा-सागर स्‍नान करैए।

वएह पवि‍त्र जल सागर
कंद पहाड़ बनैए।
बैस कंदरा जोगी-जती
भगवत-भजन करैए।

जहि‍ना भूखल पेट मांगए
तहि‍ना ने मनो मंगै छै।
भोज्‍यक तृष्‍णा दुनूक बीच
भजन-भोजन कहबैत चलैए।

बनि‍ शीला समुद्र बीच
पहाड़ बनि‍-बनि‍ ठाढ़ होइए
शि‍कारी पहाड़ घूमि‍-घूमि‍
मन-माफि‍त शि‍कार करैए।

सभ दि‍नसँ होइत आएल
देव-दानवक बीच रग्‍गड़
रगड़ि‍-रगड़ि‍ रगड़ैत चलि‍
मुंडे-मुंड पसरल झग्‍गर।

झग्‍गड़ दू दि‍स चलै छै
एक-रगड़ि‍ सुरधाम बढ़ै छै।
तँ दोसर धरती धारण करै छै।
स्‍वर्ग-नर्कक वि‍चमानि‍ कऽ
अकास-सँ-धती खसबै छै।

रंग-वि‍रंगक सृजि‍त कऽ
दि‍शा-हीन बनबए लगै छै।
उपदेशक तँ सभ बनैए
अपना ले की सभ सोचैए।

असार-सार संसार बूझि‍-बूझि‍
शील-धरम कहाँ बूझैए।
जि‍नगीक शील धर्म छी
एक दि‍न धारण करए पड़त।

राम-नाम सत् छी
अंति‍म दि‍न कहए पड़त।
अनिल मल्लिक
गीत-गजल
गीत
एकटा काल खण्ड, एतही जिलौं हम
यथार्थ'क हलाहल, एतही पिलौं हम

मेटायल तृष्णा, यश मान धन के
ओह! क्षुधा कहाँ मेटायल, हमर मन के

यतs चिक्कन रस्ता, बातानुकुलित अट्टालिका, गतिशिल सभकिछ
ओतs खरँजा, खपडा, कडगर धुपमे ठाड ताड'क गाछ, आर नै किछ

शर्द सीसा, उच्छ्वाश'क भाफ सियाही, आँगुर अछि कलम
अहिना महिशारी सॉ मेलबॉर्न यात्रा, लिखैत मेटबैत छी हम

दिग्भ्रमित उदिग्न मन नै अछि, आब स्पष्ट अछि, करब कि
एहन करब, मातृ ऋण सँ उऋण भs जायब, बेसी हम कहब कि

बिरक्त भs आयल छलहुँ, भेटल दुनियाँ रंग बिरंगी
पयलहुँ एतही हुनको, पग पग साथ दैत जिबन संगी

चुपचाप देखैत रहैत छलैथ, असगरे अपना सँ लडैत हमरा
कि भेलै नै जानि, कखैन ओ अओलैथ, देलैथ कन्हा'क सहारा

अश्रुपुरित, बाजि उठलैथ धीरे सँ, आब चलू केओ यतय रहय त रहौ
पलैट क हम देखलहुँ हुनका, चमैक उठल बच्चा जाकाँ आँखि.. ओहो !

मेघाच्छादित भादब मास, घुप्प अन्हार, जेना भेल अचानक प्रकाश चहुँओर
हजारो चिडै के एकसाथ चिडबिड चिडबिड,जेना भs रहल होई नव जिबन भोर

बहुत भेल, पियब नै ई चमकैत हलाहल, आब पियब अमृत प्याला
मन मलङ्ग अछि, चललहुँ हम सभ, बजा रहल प्रेम'क मधुशाला

  
गजल

जखनसँ खसल, आँचर देखलहुँ हम
मोन पर धरल, पाथर पयलहुँ हम

भूख सँ बिलखैत, कोरामे नवजात छलै
नयन मे साओन, भादव देखलहुँ हम

जिन्दा लहाश सभ', आँखि चमकैत छलै
मनुख'क भेष मे राक्षस देखलहुँ हम

बुझू जेना घेरने, दुस्साशन के भिड छलै
पाण्डव भेल जेना,  आन्हर देखलहुँ हम

तखने दुध, नूआ लेने, आयल एगो बच्चा
ओकरे कृष्ण, युग  द्वापर बुझलहुँ हम !!
 

 गजल
मय मयखाना, साकी प्याला, केओ हमरा सन पिबै बाला
टुकडी टुकडी भेल जीबन के, हमरा सन जीबै बाला

चन्द्रमुखी आम्रपाली हटलै, पाकिट मे जे पाई घटल
पारो के अर्पण ने हम देखलौं, नित दर्पण देखै बाला

निशा छटल, निसाँ टुटल, पयलौ घर नै कोठरी छल
पारो छल नव राह पकडने, हारलौ हम जितै बाला

अर्थ'क अर्थ नै बुझलौं ,अनर्थ हेतै कहाँ बुझल छल
सगरो जीनगी बीक रहल अछि, मारी करै कीनै बाला

छद्म छुअन स हर्षित तन आत्मा'क स्पर्श बुझल'क नै
टोकिएै त हमही बौरायल कहाँ केओ अछि मानै बाला

रंग रभस के भरम मे, छै जे जुआनी उजडि रहल
जीबन रंग लूटि रहल, नित नव रंग'क मधुशाला



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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

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