Monday, January 16, 2012

'विदेह' ९७ म अंक ०१ जनवरी २०१२ (वर्ष ५ मास ४९ अंक ९७) PART VI


२.
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
      
     
सखि तोहर मुखक तुलना के कर
सखि तोहर मुखक  तुलना के कर ।
                            सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।।

रवि  ज्योतिर्मय,
               सुन्नर  अतिशय ।
                             पर किरणक ताप, प्रचण्ड  प्रखर ।
                            सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।।

शशि अतिव धवल,
               अतिशय शीतल ।
                            पर  अति  कठोर, केवल  प्रस्तर ।
                            सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।।

जँ कही जलज,
             नहि उचित तदपि ।
                            हो विकसित रूप ने बिनु दिनकर ।
                            सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।।

तोँ  छेँ अनुपम,
              अनमोल  रत्न ।
तोँ साँच थिकेँ,
           वा  हमर  स्वप्न ।
                            पर जे हो,  छेँ  तोँ  अति सुन्दर ।
                            सखि तोहर मुखक तुलना के कर ।।

  

 नवीन कुमार "आशा"
रोटी
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण
प्राण अखन हमरासँ कहए
हमरा दिअ दू चुरुक पाइन
पाइन पीबि भूक मेटाए
रोटी ने चाही हमरा भाइ
कतबो बुझाबी अन्तर्मनसँ
किछु ने किछु हेतै जोगाड़
ओ तखनो नै होए तैयार
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण

भोर बितल साँझ बितल
पसेनासँ कपड़ा तीतल
आब पसेना सेहो देलक जवाब
ओहो माँगै अछि हमरासँ जवाब
भूखसँ लागैए जाएत जान
डगमग-डगमग करैए प्राण
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण

आजुक अछि ई व्यथा
जँ भेटैत जूठन हमरा
लागत घुरि आएल प्राण
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण

तखने दूर देखाइ देलक आस
जागल जेना मिटत प्यास
बटै छलै मैयाक प्रसाद
लगबै छला पुजारीजी अबाज
आशाकहला अपना मोनसँ
लगलौ आजुक रोटीक जोगाड़
आजुक भूख तोहर मेटेतौ
नै जानि आब फेर कतेक दिन सहेतौ
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण


आशाक अछि एकटा विनती
जुनि करी खेनाइक अपमान
ओकरो अछि सम्मान
अछि ओकरा अपनापर अभिमान
रोटी लेल तिलमिल करै अछि
भूखल प्यासल हमर प्राण

मनीष झा बौआभाई 
नव बरखक
नव बरखक नव आगमन पर नव रचना के संग
अहिना लिखि लिखि परसैत भेटब कविता रंग बिरंग

 
कहाँ बिसरलहुं पोरकां सालक देल अहाँके नेह
ह्रदय बीच में पैस गेल छी सब पाठक आ विदेह

 
मोनक बात कोना क' लिखब से भेटल अछि अधिकार
मीन मेख नै कहियो देखल तै बेर बेर विदेहक आभार

 
सिद्धहस्त रचनाकारक संगे देल नवसिखु के सेहो स्थान
तालमेल क' छपने गेला आ बूझल सब के एक समान

 
महिमामंडित माँ मिथिले के धन्य अहाँ सब पूत
परसि रहल ई स्नेह पत्रिका बनि क' मिथिला दूत

 



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

१. रवि भूषण पाठक २.नवीन ठाकुर ३.प्रभात राय भट्ट ४.आनन्द कुमार झा ५. अमित मोहन झा


रवि भूषण पाठक
बर्फ भोर

सूर्यदेव कत' लुप्‍त भेला
कोन अंतरिक्ष ,मंदाकिनी मे
या जाड़ हुनकेा खेहाड़इ छइ
देखियौ ने कुम्‍हरबा
मटकूरी नइ बनाबए छइ ।
बनाओत की मटकूरी
घैल चुक्‍का पातिल तौला
उगता नइ सूर्यदेव
लेब की हम बमभोला ।
तहिना पसरल अन्‍हार कुहेसा
हड्डियो कंपकंपाइ छइ
बीलटबा सूतलेसूतल
ओछैने पर खाइ छइ ।
रूकल जीवन स्‍पंदन
गाय भैंस कुकुर बकरी
डोलबए छए गरदनि
डोलबए नांगरि पूछड़ी
कानए बिना नोर
दांत देखबै छै ।
बंद भेलै विद्यालय
बंद कटनी रोपनी
एहन बर्फ भोरो मे
नहा के छुन्‍नू पंडित
पहिर ओढि़ काजल टीका
तीन कोस जजिमनिका
साइकिल के गरूड़ बूझि
घंटी डोलबैत छइ

 

देश आ गेयर


देश सुस्‍ता रहल छइ
या पनहा रहल छइ
चाही एकरा तेल ग्रीस मोबिल
आ तहिना साहित्‍य आ सम्‍बन्‍धो मे
पहिले हमरा पढ़ैत देखि
मॉ आनइ छली चाय पानि
बाबू तमाकू चूनबैत
चलि जाइत छलाह अकाश सँ आगू
आ कनिया पहिरैत छली चूड़ी ,पायल नि:शब्‍द
झनझनाहट सँ भंग नइ हो हमर ध्‍यान
हवा बिहाडि़ सेहो बहैत छलए पूछि के ।
हमरे खोंखी सँ खोंखियाइ पूरा दुनिया
हमरे सपना सपनाइत उगैत छलइ चान सूरज ।
ओ आर जमाना छलए नेता जी
यादि अछि अहॉ क एक संकेत पर देश बिछ जाइत छलइ
अहॉ मतलब देश आ देश मतलब अहॉ नेताजी
आब दोसरे हवा बहि रहल
सब अपना विषय मे सोचि रहल
स्‍त्री ,सोलकन,जाम्बिया ,भूटान ,लातेहार ,पलामू
सबके पता छइ अपन हित अपन बात
देश ,सम्‍बन्‍ध ,साहित्‍य चढ़ाई पर चलि रहल
 चाही बेशी दम गेयर नम्‍बर चारि
बेशी गति बेशी तेल पानि
या फेर बच्‍चा क वीछियो जँका बढ़ा दियओ लेवेल
धूर्तता ,छल ,धोखाक लेवेल बढ़ब' पड़त
चाही नया नया मुखौटा
मोबिलाइजेशन प्रोपेगंडा
पाखंडक अद्यतन संस्‍करण
दोसरे हवा बहि रहल छैक
 देश दुनिया जागि रहल छइ
 
 
 पॉंच केबी

इंटरनेटक मंद गति
आ सुन्‍नरि तोहर फोटो
ससरैत बढ़ैत लहरि
जेना स्‍वर्गक परदा
खुलैत हो धीरे धीरे
सितार पर राग भैरवीक साथ
पॉंच केबी मे माथ
दस मे कपार पंद्रह मे आंखि पिपनी डिम्‍मा सहित
फेर रूकि गेलइ नेट
पता नइ आइ देखि सकब आंखिक निचला ढ़लान
अरे आंखियो देखा गेलइ 
आंखियो सँ नीचा
सिंधुगंगाक विशाल मैदान
कनि नाक त' देखियौ
हिमालयक बहिन बनल जाइ
देखियौ त' नेटक नरहेरपनी
केवल वामे देखाए छए
दहिना त' गिलने जाइ छैक
की दहिनो ओतबे पवित्र
ओहिना गंगाजल 

नेटकंपनी क लेल निकृष्‍टतम पंचाक्षरी गारि के घोंटैत
 बंद करैत हम जाल जंजाल सत झूठ
आ खेहारने अनेरे कवि यात्री
 आध फांक आंखि
आ आध फांक नाक

दोस महिम
कखनो जातिक लसेर लगबैत
कखनो कुल गोत्र क सोंगर नेने
उपकारक पंजी समेटने
बीतल युग पर टीका करैत
कोनो चित्र पर सँ जाल मकरी साफ करैत
आबि गेलखिन दोस
ओ कहथिन आ कहिते र‍हथिन
ओ सुनबा ले नइ आयल छथिन
हुनका मोल चाही
ओ तौल रहल छथिन
अतीत के सिनेह के
ओ खोजि रहल छथिन
सबसँ बड़का अंक
जे अचूक होए
आ बटखरा के बदला
राखि देने छथिन
बीतल युगक दोसतियारी

आब दोस डेली बतियाइ छथिन
सामना सामनी नइ त' फोने सँ
थाहइ छथिन
कोन नस कत्‍त' सँ पकड़ी
थाहैत छछारैत मुस्कियाइ छथिन
हम दबि रहल छी हुनकर जानकारी सँ
कालिदास मैथिली मोहम्‍मद रफी
आब हुनको प्रिय विषय अछि
पहिले मिलबा सँ बचैत रही
आब नइ आबइ छथिन
' कोनादिन लागैत अछि
दोस तमाकू जँका
ठोर कब्जियेने जाइ छथि
आ भांग जँका दिमाग
की कही
दिमाग त पहिले सँ
हफीमियाइल अछि
दोस एता
ओ कहता
आ हम करब
यद्यपि नफा नुकसान जनइ छी
मुदा दोस शिष्‍ट बना गेला
बाजइ भूकइक तरीका
नीक जँका सीखा गेला

गीत गाबैत श्‍लोक पढ़ैत
 उद्धरणक बरसा करैत
कखनो प्रेरक प्रसंग
कखनो वेद पुराण
तहिना अर्थराजनीति
कखनो भकुआइ
अकछी कखनो
दोस देवता देखाथिन
दया बेचैत
ओ छली फरेबी वंचक
बहुरूपिया छलइ
कखनो कालिदास
विद्यापति जपइ छलइ
महान ज्ञानी नइ
जानकार छलइ
फंसा लै छलै
कोनो चरचा मे
मनबा लै छलै बात
भ जाइ छलियइ चित्‍त
पटो मे किछु नइ करैत छलियइ
ओ कखनो बीमा
कखनो कविता
कखनो किताब बेचि पड़ा जाइत छल ।
ओ आब चुप अछि
ने दुश्‍मनीक बात
ने दोस्‍ती क चर्चा छइ
काल्हि फेर आयत
कोनो नया डिब्‍बा पेटी किताब
मोबाईल स्‍कीम नेने
हम फेर चित्‍त हेबइ
ओ फेर भूतिया जायत
अपन बटुआ सम्‍हारैत ।

मनोज भाय क चिट्ठी

की भाय आबो राजदूत उड़बै छियइ सौ पर
की भाय आबो हंसइ छियइ ओहिना हहा के
की भाय आबो देखइ छियइ रौद बरखा के ओहिना प्रेम सँ
की भाय आबो कचकूह आम देखि पानि आबैत अछि मुंह मे
अपन गाछी आ दोसरक आम एखनो नीक लागैत अछि
की भाय जालंधरो करियने जँका छैक
कोना साधए छियइ उदयनाचार्य आ जालंधरनाथ के एक साथ
नव्‍यन्‍याय आ नाथपंथक सूत्र कत' मिलैत अछि
या हमरे जँका उलझैत देरी छोडि़छाडि़ निवृत्‍त भ' जाइ छी
सही कहलहुँ भाइ
विदेहो त' हमरे छथि
आ हम पूरा दुनिया मे पसरलाक बादो ओतबे लोकल छी
सक्‍कत माटि खींचैत अछि हमरा
आ दरिद्रछिम्‍मरि रहितहुं ओतबे सामंतवादी छी
संग मे अछिए की ,जे दुनिया छीनत
तैयो पकड़ने छी अपन दूबि के बकुट्टा मे
छोड़ू ई सब
 की  ओतहु एहिना गामघर गीतनाद धूपदीप
यादि आबै छी हम ,गाम आ समाजक लोक
बड़ी ,‍सिंगराही ,नबकी  नौला पोखरि
बडि़याही ,बलहा घाट
ककरहा ,ठकुरनीया ,महिसर बाध
कखनो सुनइ छी प्राती ,नचारी ,समदओन
चाखै छी नबका चूड़ा पर छलियैल पूष मासक टटका दही
हंसए क बात पर हंसइ छी
आ कानइ क मौका पर
गिरैत अछि नोर
या आहूं के मारि देलक समय
जेना हमरा मारलक सम्‍हरल डांग सँ


बियाह आ मोंछ
ओ बियाह नइ ,मोंछक लड़ाई छलई
आ सभक अपन अपन प्‍लान रहए
बाबू ,मॉ ,दोस ,सासु ससुर
संस्‍कार कम ,नाच बजार छलइ ।
 बाबूए पढ़ेने लिखेने रहथिन
तें बियाह हुनके पसिन्‍नक जगह ,लड़की आ तिथि के निश्चित छलए
भैयाक लेल ई छलए अचूक मौका
साबित करबाक लेल बहुत रास चीज
तें केवल नवका चमचम गाड़ी क जखीरा रहए
आ यदि ऐ साल बियाह नइ हेतइ
तखन बाबू क मोंछ आ माथ नीचा भ' जेतेन ।
यदि हम काजर लगेबा सँ रोकबा क प्रयास करतियइ
तखन जनानी सबक नजरि मे
मॉ बहुत छोट भ' जेतइ
आ ससुर महराज सेहो लगेने रहथिन बाजी ककरो सँ
तें दिसम्‍बर पक्‍का रहए
आ ने हमर उमेर कम रहए
ने हम बेरोजगार रहियइ
तें ससुरक ससुर जांच करबा लेल पहुंच गेलखिन
बागमती सँ केन
कहीं कोनो जनानाक चक्‍कर त' नइ छइ
आ बियाह मे जरूरी रहए दारू पीनए आ नाचनए
किएक त' वीडियो गड़बड़ा जेतइ
आ धियान देने रहए बहुत लोक गिद्धो सँ बेशी
हम हुसियइ
आ ओ प्रारम्‍भ करए ।

 
प्‍लेटो आ हमर कनिया

अंतत:
प्‍लेटो के योग्‍य शिष्‍या मिलिये गेलेन
हे मैथिलीक स्‍वर्गीय कविगण
बता देबेन प्‍लेटा के
ओ एकटा युवा महिला छथिन्‍ह
आ जहिना प्‍लेटो दोड़ैत छलथिन्‍ह
कविता दिसि राजदंड ल के
तहिना ललकारैत छथिन्‍ह ई
एकटा नवोदित कवि के
आ पूछैत छथिन्‍ह एकटा अस्‍थापित कवि सँ
की हेतओ ऐ कविता ल' के
 काज रोजगारि छोडि़
किएक बताह भेल छें
सजमनि छीलैत आटा सानैत
फोड़न दैत छौंकक मेंजन तैयार करैत
बच्‍चा के मुंह मे कौर दैत
नेटा कांची पोछैत
नाना प्रकारक मुखाकृति
भाव भंगिमा
खुसुर फुसुर
खौंझाइत बड़बड़ाइत
गारि गीत जँका
कखनो गायत्री मंत्र
कखनो सप्‍तशती
कखनो कोनो अतुकांत वैदिक ऋचा
अरबीक अबूझ नेमाज जँका ।
आ प्‍लेटा जे नइ क' सकला मंत्री पद अछैत बधाई प्‍लेटो ।
अहॉक योग्‍य शिष्‍य अरस्‍तू वा
हमर कनियां
। ओ निर्णय निकालि नेने छथि
एहिना फिफियाइत रहब
हिहियाइत रहब किछु देखने सुनने
ऐ दुनिया मे सब केओ अछि आ
दुनिया ढ़न्‍नूक लाल सॅ नइ चलैत अछि
मुदा ई दुनिया ढ़न्‍नुको लालक छैक ।

टिप्‍स फ्राम खट्टरकका
न्‍यूटनक नियम मे
किछु जोडि़ घटा देबहक
कोनो दोसर भाषा कोनो आन फांट मे
किछु शब्‍द बदलि के
क्रम बदलि के
तखन की
ओ नियम तोहर भ' जेत'
नइ ने
 मुदा साहित्‍य मे ई फ्राड खूब लोकप्रिय अछि
टीपू आ छपि जाउ
बूझलहो वौआ
आ केओ पकडि़ लए
तखन कहि दहो हम त' हुनका सँ प्रेरणा लेने छी
आ बूडि़भकुआ तैयो नइ मान'
तखन जोर सॅ बाजिह'
ओकर कान तीरैत
कानिह' खीजिह'
अपनो मुंह कान नोचैत
ओकरो केश टीक तीरने
साल दू साल त' बिताए देब'
साहित्‍यो विज्ञान होइछ
तावत केओ आन कतउ सँ टीपतइ
ओ मंच पर आबि जेतइ
आ फेर नया सिरा सँ तीरमतीरा प्रारंभ भ' जेतइ

बर्फ पानि भाफ
देह ओकर बर्फ छलइ
मोन ओकर पानि छलइ
स्‍वप्‍न ओकर भाफ छलइ
देह मोन स्‍वप्‍न ओकर
बर्फ पानि भाफ छलइ
उमेर ओकर तेहने सन
सतरह अठारह छलइ
मोनक उन्‍नीस बीस
जिनगी केर पैघ छोट
जाउ कनि एमहर
वा ओमहर लजाति छलइ
मुसका बैत मंद मंद
आंखि नाक तीर तारि
नहू नहू डेग ओकर
कखनो बिहाडि़ छलइ
इतिहासक घंटी मे गणिते
बुझाइत रहइ
रामजीक सासुर
अयोध्‍या देखाइत रहए ।

१०
बस तीने दिन
लागि रहल पटना दरभंगा
 तीन दिन लसेर अओ
जुटि रहला बड़ बड़ महन्‍थ
सेर केओ सवा सेर अओ
सुनु सुनु रंगबिरही बाजा
वौआ पटना कक्‍का झाझा
पाउडर काजर खूब लगेने
कविक राग बहेर अओ
 लस्‍सी पेप्‍सी मुरगा माछक
 पन्‍नी शीशी  हड्डी कांटा
 लागि रहल अछि ढ़ेर अओ
 बस तीने दिन जय विद्यापति
 जय मिथिला के फेर अओ
फेर वौआ तहिना दिन रहतइ
कानिपीट के भाग पड़ेतइ
जगत जानकी सासुर बसतइ
बस तीने दिन दिनक फेरा

बिसरत सब नरहेर अओ

११
उत्‍थर लोक

जेहने हम
तेहने हमर ई उत्‍थर शब्‍द
करिया माटिक बड़का चेका
सुक्‍खल बज्‍जर सन
हर बरदक बात छोडू
ट्रेक्‍टरोक चक्‍का धसैत छैक
आ कखनो भुसभुसिया उस्‍सर
पनिसोखिया बलुआही
कनियो लैस नइ
की चापलूसी
कोन कृतज्ञता
नोकगर खतरनाक
सटला पर घोंपयबाक गारंटी
कखनो लाल लाल
जेना माटि खूनक दोस्‍ती हो
सुल्‍तानगंज भागलपुरक जमीन
अलगे उपज जेजात
बूझू कोनो ग'रक लोक नइ
अहॉ उपकार करब
हम हस्‍तक्षेप मानब
अकछियाएब अलगे
हम छी उत्‍थर लोक
परिधि पर रहए वला ।

१२
चमारक ऋण
 बहुत नमहर मोट पुरान रजिस्‍टर छैक
 चमार सभ कें संग मे
 हँ हँ सभ के संग मे छैक
 ककरो जिल्‍द रंगगर छैक
 ककरो सादा
 तहिना नव पुरान सेहो
 केओ छंद निछंद
 सभ्‍यासभ्‍य
 सभ पर छैक क्रोधक निशान
 कोनो कोनो मे प्रतिहिंसा क आगि ,लोहा ,पाथर
 केओ तर्कक साथ
 ई तर्क तर्कशास्‍त्रक उधार नइ
 विज्ञानक छैक
 आ कखनो फूले ,अंबेदकर
 कखनो कर्पूरीक फोटो
 सजा गेलइ ई रजिस्‍टर
 ई केओ चोरा नइ सकैत छैक
 केओ जरा गला नइ सकैत छैक
 एकर सभ शब्‍द
 चमार सभ के ह्रदय पर अंकित छैक
 पाथरक शब्‍द
 लोहाक शब्‍द
 कोनो आर भरिगर वस्‍तु होइ त कहब

१३
दीवाली क पहिले


दीवाली सँ पहिले
 कोदारि सँ खूनैत
 करिया माटि
 पनि द' छछारैत सानैत मिलबैत कुम्‍हार
 चाक पर बैसा के
 गांरि काटैत कुम्‍हार
 कखनो हवा बसात सँ बचबैत
 रौद मे सुखबैत कुम्‍हार
 गोइठा जारन कोयला
 सँ जरबैत कुम्‍हार
 लाल लाल दीप देखि
 मोंछ पिजाबैत कुम्‍हार
 


१४
धनतेरस राति

बहुतो रास दूटकिया लॉटरी
अखबारक ईनामी कूपन सब
दू नम्‍मर सॅं छूटैत डिवीजन
तीनू बेर बेटिये बेटी ।
तैयो साहस करैत
घुसलउँ बजार
सोना चानी क कोन बात
टिनही लेल भेल प्रात
डोलैत करौछ छोलनी बेलना सब
जेना डरबए लेल नाच करैत छल
कठौत टुकुर टुकुर ताकैत रहए
जेना हमहीं सनेबए
उसनए क नौत दैत छल
उ फूलही डेकची
अओ बाबू आइ त' भॉगो नइ खेलियइ
ई कूकर कथी लेल सीटी मारइ छइ
अरे बाप चूल्हियो कहॉ पजारल छइ
धुर जो
ई की भेलइ हमरा
किछु ने किछु त ' खरीदनइ जरूरिए
चलू थारी खरीदल जाए
छोट छोट बच्‍चा छइ
तीन चारि खाना वला थारी
नाना विधि व्‍यंजन नइ
छप्‍पन भोग नइ
नवान्‍नो त हेतइ
एकटा मे रसदार एकटा भूजिया
एकटा मे अँचार पापर
ऑखि नइ लगबू
जीय' दिय' हमरा
जाइ छी गाम पर
आहूं जाउ ।

१५
हम पुरहितिया



इजोत सँ अन्‍हारक अनंत यात्रा
हँ हँ पूर्णिमा से अमावस्‍या बूझू
पतरा देखैत दिन गुनैत
पतिया कटैत
सब शुभाशुभ जेना हमरे पाछॉ लागल अछि
ठीके चिन्‍हलउॅ
हम छी मिथिलाक पुरहितिया बाभन ।
सुरजो सँ पहिले शहरियो सँ पहिले
जोतुआ बड़द बहलमानो सँ पहिले
मियॉं जीक मुरगाके बॉगो सँ पहिले
सबसँ पहिले उठिके
पूज' चाहैत छी
अपन कम
दोसर के भगवान के बेशी
पाप पुण्‍य व्रत विधि
सब दोसरे लेल
मिलबो करैछ दोसरे कें
आ हम नित्‍य नित्‍य  घुमि रहल छी
कखनो पैदल कखनो साइकिल
हमरो दुनिया खूब जमल अछि
जजिमनिका क ऐ तीन गाम सँ
प्रति सॉझ हम आबइ छी
पाव भरि गहूम आसेर मकइ
किलो धान क पोटरी ल' के
संगहिसंग एक मटकूरी दही लेने
पंडिताइन खोलइ छथिन
ई पोटरी
जेना रानी खोलइ
पड़ोसी रानीक भेजल उपहार ।
वा कुबेरक कनिया जेना देखथि 
घरवला क कृतकृत्‍य ।
आ कहियो राति बारहो एक
जिन्‍न सबसँ बतियाइत 
ब्रह्मराक्षस कें चून तमाकूल दैत 
चुड़ैल सबके धकियाबैत 
पछुआबैत ब्रह्मडाकिनी के 
सरियाबैत अपन मटकूरी ।
आ वौआ बड कठिन छइ 
जजिमानी बचेनइ 
कम देबहो तैयो 
रूसनइ मना छइ 
बेशी देबहो तैयो 
प्रशंसा नइ सुनबहक 
गमि लेबहक तों सब 
सब बडा बढि़या 
खूब नीक 
चलि रहल छइ 
भगवानक माया छइ ।
रवि भूषण पाठक

१६
चालीसक बात
तेरह साल पहिलेक बात छइ
 ओ सब
 ओ सब बात
 आब त हमहु चालीसक लगभगाएल छी
 तोहूं जरूर चौंतीस पैंतीसक भ गेल हेबें
 कहां पूछि सकलियओ तोरा सं कोनो बात
 आब त प्रश्‍नो सब बिसरि गेलहुं
 जे यादि केने छलियओ तोरा सं पूछए लेल
 हवा क साथ दइ वला केश हमर
 किछु उडि़ गेल
 किछु पाकिके डरा रहल अछि
 हंसीक साथ निकलइ वला धवल दांतक पांति
 किछु टुटि गेल
 किछु हिल रहल अछि
 तहिना गोरनार चमरो ई
 भेल कारी बदरंग
 तू केहन भ' गेलें
 कतओ देखबओ
 त कोना चिन्‍हबओ
 ई कहनए त बिसरिये गेलियओ
 हमरा दू टा बच्‍चो अछि
 तोरा कएक टा छओ
 आ तों कत' रहैत छें
 की तूहू हमरे जँका नौकरी करैत बनरा गेलें
 आबो सुनइ छें राति के रेडियो
 आ लिखइ छें पोस्‍टकार्ड
 की तोरो कोनो पता नइ छओ
 ई निरर्थक गद्य बस तोरे लेल
 तूही बूझबीही छंदक भयानक दुनिया मे
 तुकहीन पद मे छुपल
 एकटा नीरव एकांत अर्थ

 
नवीन ठाकुर
गज़ल (प्रेम रस ) 
1.


 
अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२ 
गुण प्रीतम क बाट गबैत चलि जाउ !!२

 
मोनक बेगरता अछि , प्यासल अछि कंठ 
घुट- घुट नै जिबू एना बनू नै चंठ ........२ 
अछि ललसा जे मोनक कहैत चलि जाउ !!२
गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३ 
 
मानलौं जे पीने हएब बहुतो जहाँ क 
प्यासल अछि मोन जे तैयो अहाँ क.......२ 
अछि प्रेमक ई धारा बहैत चलि जाउ !!२
गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!३

 
ससरल ने कंठ सँ एहन कोन पिबै छी 
पिबते उतरि गेल , तेहन की पिबै छी........२ 
लिअ चस्का ई प्रेम क डूबैत चलि जाउ !! 

 
गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !!
अछि पियासल मोन तँ पिबैत चलि जाउ........२ 
गुण प्रीतम क बाटे गबैत चलि जाउ !! ५

 
२ .

मैथिली गीत --

सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा )
एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......!

कुचरैत छल कौवा आइ -बड जोर सँ..................(अंतरा )
एता जे कियो ई आस छल भोर सं......! २
देखते मुखड़ा ....
हो देखते मुखरा अंहक मोन बेभोर भऽ गेलै ....! २
एला पाहून हमर सौंसे.......................

अंगना दुआरि नीप, रखलहुँ सकाले
तरुवा - तरकारी अछि सभटा तरैले ! २
कने दही ला ...हे हे ...
कने दही ला किए अनघोल भऽ गेलै ......!२ ...एला पाहून हमर .........

कनिया - पुत्रा सभ हुल्की मारैए
टाटक दोग दऽ कऽ चुटकी मारैए ! २
किए जाईते .....
हो किए जाईते हमर मोन केँ चितचोर लऽ गेलै
एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ......

सुनिते बोली अहाँ क इजोर भऽ गेलै...............(मुखरा )
एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ..एला पाहून हमर सौंसे ......!
एला पाहून हमर सौंसे शोर भऽ गेलै ......! ३ 




प्रभात राय भट्ट
नव वर्षक आगमन के स्वागत करैछै दुनिया
नव नव दिव्यजोती सं जगमग करैछै दुनिया

विगतके दू:खद सुखद क्षण छुईटगेल पछा
नव वर्षमें सुख समृद्धि कामना करैछै दुनिया

शुभ-प्रभातक लाली सं पुलकित अछी जन जन
नव वर्षक स्वागत में नाच गान करैछै दुनिया

नव वर्ष में नव काज करैएला आतुरछै सब
शुभ काम काजक शुभारम्भ में लागलछै दुनिया

नव वर्षक वेला में लागल हर्ष उल्लासक मेला
मुश्की मुश्की मधुर वाणी बोली रहलछै दुनिया

जन जन छै आतुर नव नव सुमार्गक खोजमे
स्वर्णिम भाग्य निर्माणक अनुष्ठान करैछै दुनिया

धन धान्य ऐश्वर्य सुख प्राप्ति होएत नव वर्षमे
आशाक संग नव वर्षक स्वागत करैछै दुनिया
.............................
वर्ण-१९.......................
 
२.
गजल
नव वर्षक नव उर्जा आगमन भS गेल अछी
दू:खद सुखद समय पाछू छुईटगेल अछी

इर्ष्या द्दोष लोभ लालच आल्श्य कय त्याग करी
रोग शोक ब्यग्र ब्याधा सभटा पडागेल अछी

नव प्रभातक संग नव कार्य शुभारम्भ करी
नव वर्षक नवका सूर्य उदय भS गेल अछी

अशुभ छोड़ी शुभ मार्ग चलबाक संकल्प करी
दिव्यज्योति सभक मोन में जागृत भगेल अछी

निरर्थक अप्पन उर्जाशक्ति के ह्रास नहीं करी
शुख समृद्धि प्राप्तिक मार्ग प्रसस्त भS गेल अछी

सुमधुर वाणी सं सबहक मोन जीतल करी
सामाजिक सहिंष्णुता आवश्यकता भS गेल अछी
.............................
वर्ण:-१८ ...........................
 
आनन्द कुमार झा


 
मिथिला क बात  सुनबै छी
(तर्ज भारत का रहनेवाला हूँ)

 
अछि प्रेम जतय क रित बनल 
हम गीत ओतय क गावय छी 
मिथिला क रहै बाला छी 
मिथिले क बात सुनाबै छी 
जय मिथिला जय मैथली

जतय पाहुन बनि क राम एला 
जतय हर बाला मे सीता छै
सीता छै
जतय घरे घरे वेद पढ़ै
जतय हरेक हाथ मे गीता छै
गीता छै
हमहूँ मिथिलेमे जनम लेलौं २
ई सोचि सोचि इतराबै छी 
मिथिला क ..............................
जय मिथिला जय मैथली 
एतय मंडन अयाचिक जनम भेलनि 
अछि विद्यापति क गीत अमर 
गीत अमर 
राजा साल्हेशक ई नगरी 
अछि जनक धाम क रित अमर 
रित अमर 
जकर  कमला कोसी पएर धोबै 
हम नित नित शीष झुकाबै छी 
मिथिला क ..............................
जय मिथिला जय मैथिली  
जतय भोजन मे तिलकोर तरइ 
जतय माछक मूड़ भोग चढ़य
भोग चढ़य 
जतय डेगे डेगे पोखरि छै
जतय घरे घरे पान बनय
पान बनय
अछि फल मे मखानक तेज केहन
ई दुनियां केँ सिखाबय छी 
मिथिला क रहै बाला छी 
मिथिले क बात सुनाबय छी  
जय मिथिला जय मैथिली 

अमित मोहन झा

ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत।

 
काश
काश विश्व मे पुनः चिरशांति स्थापित कय पबितौं हम।

काश बितैत समय केँ रोकि पबितौं हम,
मित्रक संग बितायल समय पुनः आनि पबितौं हम,
नहि कहि कतेको काज देलथि मित्र सब हमर,
हुनका लेल ई जीवन केँ पाछु मोड़ि पबितौं हम।

काश आकाश मे स्वछंद उड़ान भरि पबितौं हम,
पंख पसारि हिमालय केँ लांघि पबितौं हम,
अगाध सागर केँ पार कऽ पबितौं हम,
काश अपन जीवन निर्भीक जी पबितौं हम।

काश डोरी संग अपनहि पतंगो बनितौं हम,
अपन डोर अपनहि संग राखि पबितौं हम,
मेघक संग अनवरत विचरि सकितौं हम,
काश रश्मि-सूर्य क स्पर्श कय पबितौं हम।

काश मानसरोवरक हंस बनि पबितौं हम,
समुद्री सीपक ओ अनमोल मोती बनि पबितौं हम,
एरावतक गजमुक्ता बनि पबितौं हम,
शेषनागक मस्तक-मणि बनि सजि सकितौं हम।

काश दीनजनक आंखिक आशा बनि पबितौं हम,
हुनक दुर्भाग्य, अपन सौभाग्य सँ बदलि पबितौं हम
असंख्य अबोधक चिर-बोध बनि पबितौं हम,
प्राणी मात्र क जीवन मे शीतल छांह आनि पबितौं हम।

काश अहांक कपोल कल्पना बनि पबितौं हम,
अहांक मधुर स्वप्न मे आबि पबितौं हम,
अहांक कान मे मधुर प्रेमगीत गुनगुना पबितौं हम,
अहांक हृदय मे चिर रिक्त स्थान छोड़ि पबितौं हम।

काश समग्र नारी जाति केँ माँ क स्थान दिया पबितौं हम,
भाइ बहिनक ओ अमर प्रेम जगा पबितौं हम,
पतिव्रता महिला सन, पुरूषो केँ एक पत्नीव्रती बना पबितौं हम,
प्रेमक एक नव आयामक निर्माण कय पबितौं हम।

काश मिथिलाकेँ शीर्ष पर पहुँचा सकितौं हम,
मैथिली(मधुर भाषा)केँ जन जन आवाज बना पबितौं हम,
अरिपनकेँ पुनः सजा सकितौं हम,
बाबा अयाची मिश्रकेँ फेर सँ बजा सकितौं हम।

काश मंडन मिश्रकेँ फेर सँ जगा सकितौं हम,
सुगासँ वेद पाठ करबा सकितौं हम,
बनि विदुषी भारती पुनः जगतगुरुकेँ हरा पबितौं हम,
मिथिलाकेँ भारतक सिरमौर बना पबितौं हम।

काश मानवताकेँ पुनः जगा पबितौं हम,
विश्वकेँ पुनः भाईचारा क पाठ पढ़ा सकितौं हम,
अन्यायकेँ न्यायसँ बदलि पबितौं हम,
अमित विश्वकेँ किछु आर आगू लय जा सकितौं हम।

काश ब्रहांडकेँ उद्भाषित कय पबितौं हम,
महाकालसँ पुनः तांडव करबा पबितौं हम,
बनि महाकाली, असुर-दुष्ट-दुर्भाग्य क भक्षण कय पबितौं हम,
अमितविश्व मे पुनः चिर शांति स्थापित कय पबितौं हम।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत


१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
.
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।






२.श्वेता झा (सिंगापुर)


३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।


.
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

५.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

 




विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
 ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि)

४.रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल)
५.असगर वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा-

४.

रेहनपर रग्घू”- श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद श्री विनीत उत्पल)

श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सीरेहन पर रग्घू । संस्मरणघर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो , नाटक: घोआस
विनीत उत्पल:विनीत उत्पल (जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)। पैत्रिक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित विषय मे बी.एस.सी. (आनर्स), ारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ जनसंचार आ रचनात्मक लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट रिजोल्यूलशन क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब, भागलपुर (रोटरी इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान" नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य। दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक विश्लेषण, हिन्दीक प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र का नया लोक" मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ नलिनी रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला पत्रिका 'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी" प्रकाशित।
साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत छथि।

रेहनपर रग्घू

जनवरीक ओ साँझ कहियो नै बिसरब।
साँझ तँ मौसम कऽ देने छल मुदा रहए दुपहरिया। कनी काल पहिने रौदे छल। ओ खेनाइ खेने छल आ खा कऽ अखन अप्पन कोठलीमे पटायले छल आकि एकबैग बिर्रो ऐल। घरक सभटा खुजल खिड़की-दरबज्जा धाँइ-धाँइ करैत अपनेसँ बन्द हुअए लागल आ खुजए लागल। किल्ली उड़ि कऽ कतौ खसल आ भट-भट की-की केना-केना खसऽ लागल, लागल जेना धरती थरथरा रहल अछि आ भीत हीलि रहल अछि। अकास कारी खटखट भऽ गेल छल आ चारू दिस अन्हार गुज्ज छल।

ओ उठि कऽ बैसि रहल।
अंगना आ दरबज्जा बड़का-बड़का ओला आ बरफक पाथरसँ छरा गेल, दलानक रेलिंग टूटि कऽ दू लग्गा दूर जा कऽ धड़ामसँ खसल। एकर बाद जे निराउ  बर्खा बरिखब शुरू भेल तँ ओ पाइनक बुन्नी नै छल, लागए जेना पाइनक बड़हा छल, जकरा पकड़ि कऽ कियो चाहए तँ ओतऽ धरि चलि जाए जतऽ सँ ओ छोड़ल आकि खसाएल जा रहल छल। मेघ लगातार गरजि रहल छल, दूर नै, लगेमे माथक ऊपर जेना बिजलौका लौकि रहल छल, दूर नै, खिड़कीसँ भीतर आँखिमे।एकहत्तरि बर्खक बूढ़ रघुनाथ अवाक! ई एकाएक की भऽ गेल? की भऽ रहल छै? ओ मुँहपरसँ बनरटोपी हटेलक, देहपर पड़ल सीरक हटेलक आ खिड़की लग ठाढ़ भऽ गेल।

खिड़कीक दुनू पल्ला अड़काक टेकसँ खुजल छल आ बाहर दिस देखि रहल छल। घरक आगुए कदम्बक बड़का गाछ छल मुदा ओकर पता नै चलि रहल छल, अन्हारक कारण, आ बर्खाक कारण जे धऽ कऽ तोपने छल, पथियाक पथिया उझील रहल छल। छातक डाउन-पाइपसँ पाइनक धार खसि रहल छल आ ओकर हहारो अलगेसँ सुना दऽ रहल छल। एहेन मौसम, एहेन पाइन आ एहेन हवा ओ कहिया देखने छल? दिमागपर जोर देलापर मोन पड़ल- साठि-बासठि बर्ख पहिने! ओ स्कूल जाए लागल छल, गामसँ दू माइल दूर। मौसम खराप देखि कऽ मास्टर समयसँ पहिने छुट्टी दऽ देने छल। ओ सभ नेना-भुटकाक संगे गाछी पहुँचले छल आकि आन्ही-बिर्रो-पाइन आबि गेल आ अन्हार पसरि गेल। सभ कियो आमक गाछक अढ़ लेबऽ चाहलक मुदा बिर्रो ओकरा सभकेँ जेना लऽ कऽ उड़ि गेलै आ गाछीसँ बाहर धानक बाधमे लऽ जा कऽ पटकलकै। ककरो झोराक आ किताब-पत्तरक कोनो पता नै छलै। पाइनक बुन्नी ओकर देहपर गोलीक छर्रा सन लागि रहल छलै आ ओ मारे चिचिया रहल छल। बिर्रो थम्हलाक बाद जखन पाइन-बुन्नी कनी कम भेल तँ गामक लोक लालटेन आ डिबिया लऽ कऽ बहार भेल छल ताकै लेल। ई एकटा अनहोनी छल आ अनहोनी जँ नै हुअए तँ जिनगी की?
आ ईहो एकटा अनहोनीये छल जे बाहर एहेम मौसम छै आ ओ कोठलीमे अछि।
कत्ते दिन भऽ गेल बर्खामे भिजना?  
कत्ते दिन भऽ गेल गरमी मासक दुपहरियाक बहैत लूमे घुमना?
कत्ते दिन भऽ गेल जेठक गुमारमे झरकनाइ?
कत्ते दिन भऽ गेल इजोरिया रातिमे बौएनाइ?
कत्ते दिन भऽ गेल ठारमे ठिठुरि दाँत कटकटेनाइ?
की ई अही लेल होइत अछि जे हम एकरासँ कोना बचि कऽ रही? बचि-बचि कऽ चली? आ अही लेल की एकरा भोगी, एकरा जीबी, एकरासँ दोस्तियारी करी, गप करी, माथपर बैसाबी?
हम एकरासँ एना व्यवहार कऽ रहल छी जेना ई हमर शत्रु अछि। किए कऽ रहल छी एहेन?

एम्हर कतेक दिनसँ रघुनाथकेँ लगैत छलन्हि जे ओ दिन दूर नै जखन ओ नै रहत आ ई धरती रहि जाएत। ओ चलि जाएत आ ऐ धरतीक वैभव, एकर ऐश्वर्य, एकर सौन्दर्य- ई मेघ, ई रौद, ई गाछ-बृच्छ, ई फसिल, ई धार, कछार, जंगल, पहाड़ आ ई सभ किछु एतऽ घुरि जाएत। ओ ई सभ किछु अप्पन आँखिमे बसा लैक चाहैत अछि जेना ओ जँ चलियो जाएत तँ ओकर आँखि अतै रहि जेतै। चमड़ीपर सभ चीजक थाप सोखि लै लऽ चाहैत अछि जेना चमड़ी केंचुल जकाँ एतऽ घुरि जाएत आ ओकर स्पर्श हुनका लग पहुँचैत रहत। हुनका लागैत छल जे बेसी दिन आब हुनका नै अछि जाइमे। भऽ सकैए जे ओ दिन काल्हि हुअए, जहिया हुनका लेल सुरुज नै उगै। उगत तँ अबस्से मुदा से दोसर लोक सभ देखत, ओ नै। की ई सम्भव नै अछि जे ओ सुरुजकेँ बान्हि कऽ अपना संग लेने जाए, ने ओ रहत, ने ओ उगत आ नहिये कियो आर ओकरा देखत! मुदा एकटा सुरुजे सौंसे धरती तँ नै, ओ कोन-कोनक बौस्तुकेँ बान्हत आ ककरा-ककरा देखबासँ रोकत?
हुनकर हाथ एतेक नम्हर किए नै भऽ जाइ छन्हि जे ओइमे सभटा धरतीकेँ समेटि लिऐ आ मरै वा जिअए तँ सभक संग!
मुदा एकटा मोन आर छल, रघुनाथक जे हुनका धिक्कारि रहल छल, काल्हि धरि कतऽ छल ई प्रेम? धरतीसँ प्रेमक ई आतुरताइ? ई अहलदिली? काल्हि सेहो ई धरती छल। यएह मेघ, अकास, तरेगण, सुरुज, चन्द्रमा छल। धार, निर्झर, सागर, जंगल, पहाड़ छल। यएह गली, मकान, चौबटिया छल। कतऽ छल ई अहलदिली? फुरसति छल हुनका ई सभ देखै कऽ? आइ जखन मृत्यु बिलाड़ि जकाँ आस्तेसँ कोठलीमे ढुकि रहल अछि तखन बाहरक जिनगीक अबाज सुनाइ दऽ रहल अछि?
सत-सत बाजू रघुनाथ। अहाँकेँ जे भेटल अछि ओकरा लऽ कऽ कहियो सोचने रही? कहियो सोचने रही जे एकटा छोट सन गामसँ लऽ कऽ अमेरिका धरि पसरि जाएब? ओसारपर पिरहीपर बैसि कऽ रोटी-पियाजु-नून खाइबला अहाँ अशोक विहारमे बैसि कऽ लंच आ डिनर करब?
मुदा रघुनाथ ई सभ नै सुनि रहल छल। ई अबाज बाहरक गड़गराहटि आ बर्खाक अबाजमे दबि गेल छल। ओ अप्पन सकमे नै छल। ओकर नजरि कोनमे राखल लाठी आ छत्तापर गेल। जाड़क ठंढ़ी ओहिने भयंकर छल आ ऊपरसँ ई ओला आ बर्खा। हिम्मत जवाब दऽ रहल छलै, तकर बादो ओ दरबज्जा खोललक। किल्ली खोलि कऽ ओ ठाढ़ भेल तँ दरबज्जा अपने खुजि गेल। सिहकैत बसात सनसना कऽ भीतर पैसि गेल आ ओ डरा कऽ पाछाँ हटि गेल। फेरसँ ओ साहस केलक आ बाहर जेबाक तैयारी शुरू कऽ देलक। पूरा बाँहिबला गरम गंजी पहिरलक, ओइपरसँ सूती अंगा, ओइपरसँ स्वीटर आ ऊपरसँ कोट। ऊनी पैंट ओ पहिनहिये पहीर लेने छल। यएह ओकर जाड़क मासमे भोरमे टहलबाक वस्त्र छल। मोफलर सेहो छलै मुदा ओइसँ बेसी जरूरी छलै गमछा।

बर्खाकेँ देखैत जेना-जेना कपड़ा भिजैत जेतै ओ एकाएकी उतारैत जाएत आ फेकैत जाएत आ अन्तिममे रहि जेतै मात्र ई टा गमछा।
ओ अप्पन पहिराबा-ओढ़ाबासँ आब सभ तरहेँ निश्चिन्त छल मुदा खाली माथकेँ लऽ कऽ ओ ततमतमे छल, कनटोप ठीक रहतै आकि माथमे गमछा बान्हि लए।
ओला जतेक खसबाक रहै से खसि गेल छलै। आब ओकरा कोनो अन्दाज नै छलै। ओ गमछाकेँ गरदनिक चारू दिस लपेटि लेलक, खालिये माथ बहरा गेल।
आब ने कियो रोकैबला छलै आ ने टोकैबला। ओ कहलक- “रौ मोन! घुरि कऽ आबि जेमेँ तँ वाह-वाह आ नै घुरि कऽ आबि सकमे तँ वाह-वाह।
बर्फ सन पाइनक अन्हार बीहरिमे उतरबासँ पहिने ओ ई नै सोचने छल जे भीजल कपड़ाक भार संग एक्को डेग बढ़ैब ओकरा लेल मोश्किल हेतै।
ओ कोठलीसँ तँ बहरा गेल मुदा गेटसँ बाहर नै जा सकल।
छत्ता खुजलासँ पहिने जे पहिलुक बुन्न ओकर बिन झाँपल केशहीन चानिपर पड़लै तँ ओ तुरत्ते बूझि नै सकल जे ई बिजलौका खसल छलै आकि लोहाक किल्ली खसल छलै जे माथमे भूर करैत भीतरे-भीतर तरबा धरि पहुँचि गेलै। ओकर सम्पूर्ण शरीर झनझना गेलै। ओ पानिक अछारसँ डरा कऽ बैसि गेल मुदा भिजबासँ नै बचि सकल। जाधरि छत्ता खुजितै ताधरि ओ पूरा भीजि गेल छल। आब ओ ओझरीमे पड़ि गेल छल, बर्फ सन बसात आ अछारक बीच। हबा टूटल दूभि सन हुनका उड़ा रहल छल आ अछार धरतीपर पटकि रहल छल। भीजल कपड़ाक भार हुनका उड़ऽ नै दै छल आ हबा हुनका घिसिया रहल छल। हुनका एतबेटा मोन छन्हि जे लोहाक गेटपर ओ कतेक बेर भहरा कऽ खसला आ ई बेर-बेर तखन धरि भेल जखन छत्ताक कमची टूटि गेल आ ओ उड़ैत गेटक बहार जा कऽ बिला गेल। आब ओकरा एना लगै छल जेना बसात ठामे-ठाम नोचि रहल होइक आ पाइन धीपल लोहसँ दागि रहल होइक। बेहोश भऽ कऽ खसबासँ पहिने ओकरा लग दिमागमे ज्ञानदत्त चौबे एलै। ओ दू बेर आत्महत्या करबाक विचार केने छल- पहिल बेर लोहता स्टेशनक रेलक पटरीपर गाम-घरसँ दूर निर्जनमे, जतऽ कियो आबै जाइ नै छल। तइ काल ओ सामान्य पैसेंजर वा मालगाड़ीकेँ नै, एक्सप्रेस वा मेलकेँ चुनने छल, किएक तँ जे हुअए से हुअए खट दऽ, एक्के निशाँसमे, जइसँ तकलीफ नै होइ। ओ पटरीपर सुतले छल आकि मेल अबैत देखा पड़लै। पता नै किए ओकरामे जीवनसँ मोह उत्पन्न भऽ गेलै आ ओ उठि कऽ भगबापर छल आकि ठेहुन लगक एकटा पएर खचाक।
ई तँ मरैसँ बेसी खराप भेलै। बैशाखीक आश आ घरक लोकक गाइर आ धुत्कारी। एक बेर फेर आत्महत्या करबाक धुनि सवार भेलै ओकरापर। ऐबेर ओ चुनकक सिमानपरबला इनार। ओ अप्पन बैशाखी फेकि कऽ ओइमे फांगि गेल छपाकसँ आकि एकटा बरहा पकड़िमे आबि गेलै। तीन दिन बिन खेने पीने भूखल सोर पाड़ैत रहल ओ इनारमे आ निकलल तँ दोसर पएर तोड़बा कऽ।
आइ वएह ज्ञानदत्त - बिन पएरक ज्ञानदत्त- चौबटियापर भीख मंगैत अछि। मरबाक ओकर इच्छा ओकरा कतौ कऽ नै छोड़लकै। मुदा ई हरमजदा ज्ञानदत्त ओकरा मोनमे एलै किए नै? ओ मरबाक लेल तँ नै निकलल छल? निकलल तँ छल ओ पाइनक ठोपक लेल, ओला सभक लेल, बसात लेल। ओ ऐ बातपर आबि गेल जे जीवनक अनुभवसँ पैघ अछि जीवन। जखन जीवने नै तँ अनुभव केकरा लेल।


पहाड़पुरमे रघुनाथ एक्केटा छल।
ओना कहैक लेल रामनाथ, शोभानाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ सेहो सभ छल मुदा ओ रघुनाथ नै छल।
आ रघुनाथक ई भाग्य छल जे जतऽ कतौ ओ देखा पड़ै छल, गाम घरक लोक बिख-सबिख भऽ जाइ छल आ पैघ साँस लैत कहै छल- बाह! की भाग्य पेलक अछि ई बिरनल! रघुनाथ पहाड़पुर गाममे असगरे पढ़ल लिखल लोक छल। डिग्री कॉलेजक अध्यापक। दुब्बर-पातर नमगर-छरगर देहबला। शुरुहक दस बरख धरि साइकिलसँ अबैत जाइत छल, बादमे स्कूटरसँ। पछिला सीटपर पहिने बेटी बैसै छलै, बादमे बेटा बैसऽ लगलै। कहियो एकटा, कहियो दुनू। मोटा-मोटी पाँच-छह माइलक दूरी रहै।
सभ सुखी आ सफल लोक सन रघुनाथ सेहो अपना जीबा लेल, आगाँ बढ़बा लेल आ अकास छूबा लेल किछु ईलम ताकि लेने छल। सत्य पूछू तँ ओ तकने नै छल, ओकरा प्रकृतिमे छलै। ओ खाली बूझि गेल छल आ ओकरा ओ नित्य व्यवहारक संग बनौने छल। ओ पातर आ नमगर छल आ तइसँ कने लीब कऽ चलै छल। कतौ अबैत-जाइत काल, केकरोसँ भेँट-घाँट करैत काल, बाजैत काल ओ कनी लीबल रहै छल। पहिल बेर ओ अप्पन बारेमे केकरो दोसरासँ गप्प करैत प्रिन्सिपल साहेबक मुँहसँविनम्रताशब्द सुनलक। एहेन हुनकर प्रशंसामे कहल गेल छल। जइ लीबल रहैमे ओ लाजक अनुभव करै छल, ओकर वएह खूबी छल, ई नव बोध ओकरा भेलै। ऐमे ओ आगू जा कऽ दूटा खूबी आर जोड़ि देलक, मुस्कियेनाइ, आ सहमति देनाइ। कियो किछु कहितिऐ ओ मुस्कियाइत रहितिऐ आ समर्थनमे मूड़ी हिलाबैत रहितिऐ। ई तखने सम्भव छलै जखन अहाँ अपना दिससँ कम बाजी।
ऐ तरहेँ रघुनाथ विनम्रता, कम बाजाभूकी आ मुस्की संगे जीवनक यात्राक प्रारम्भ केने छल।
आ एकरा संयोगे कहियौ जे ओ कहियो असफल नै भेल। ऐ संयोगकेँ दोसर लोक सभभाग्यकहैत छल। आ ऐपर रघुनाथ सेहो विश्वास कऽ लेने छल। भेल ई जे एक बेर ओ जखन कॉलेजसँ साइकिलसँ घर घुरि रहल छल तखन ओ देखलक जे ओकर साइकिलक चेन टूटि गेल छै। ओ साइकिलकेँ कॉलेजमे छोड़ि देलक आ बुलि कऽ आबऽ लागल। गर्मी मास, रौद खूब, हवा कतौ नै, देह घामसँ भीजल। बाटमे कतौ गाछो-पात नै। अकासमे मेघ छलै मुदा दुरस्तमे। हुनकर मोन बाजल- “ओह! ई मेघ जँ रहितए माथक ऊपर छत्ता सन।आ देखू, एक फर्लांग एबे कएल रहए आकि मेघ सत्ते ओकर माथक ऊपर आबि गेलै। आ एतबेटा नै, ओ मेघ हुनका संगे छाह करैत गाम धरि आएल।
अगिला दिन ई सिद्ध भऽ गेल जे ई मात्र भ्रम नै छल। ओ वर्गमे पढ़ेबा लेल जहिना बिदा भेल, तहिना ध्यान गेलै जे कलम नै छै। चाहे तँ ओ घरेमे छूटि गेलै आकि बाटमे खसि पड़लै। ओ एखन क्लासमे पहुँचलो नै छल आकि आगू हॉलमे ओकरा एकटा कलम खसल लखा देलकै, रौदमे चमकैत।
एहेन गप आन लोकक संग सेहो होइत अछि मुदा नै जानि किए हुनका लगै छल जे दीनदयालु परमपिताक हुनकापर विशेष कृपा छन्हि। ओ हुनकर सभ सुविधा-असुविधाक ध्यान रखैत अछि। ऐसँ जे ओ चाहैत छथि ओ देर सबेर भऽ जाइत अछि।आ देखू जे ओ जखैन-जखैन चाहलक, जे जे चाहलक से भेल गेल। हुनका किछु करऽ नै पड़ल, अपने मोने भऽ गेल।
पढ़ाइ खतम केलाक बाद ओ शोध कऽ रहल रहथि आ हुनकर मोन नै लागि रहल छलन्हि। आब कहिया धरि ओ करैत रहितिऐ शोध? कतौ नोकरी भेटि जेतिऐ तँ जान बचितिऐ।
आ बेसी दिन नै बितलै आ हुनका नोकरी भेटि गेलन्हि।
एकर श्रेय ओ हालेमे जन्मल अपन बेटीकेँ देलक। बेटी लक्ष्मी होइत अछि। वएह अप्पन संगे आ अपना लेल हुनकर नोकरी लऽ कऽ आएल छल। मुदा आब एकर बाद एकटा बेटा चाही। ई ओ नै, हुनकर हृदय बाजल।
आ देखू, चारि बर्खक बाद बेटा सेहो आबि गेल। एकर बाद एकटा आर बेटा- बस!
ऐ तरहेँ एकटा बेटी, दूटा बेटा, शीला आ रघुनाथ, सभ कियो मिला कऽ पाँच लोकक परिवार। छोट परिवार, सुखी परिवार। परिवार सुखी रहल हुअए वा नै, रघुनाथ सुखी नै छल। जिनगी हुनका लेल पहाड़पुरक धूल-धक्कर आ हँसी खेल नै छल। जन्मले छल तँ स्वयं कीड़ा-मकोड़ाक योनिमे किए नै जन्म लेलक? ओ ओतऽ जनमि सकै छल मुदा नै, भगवान जँ हुनका ऋषि-मुनिक लेल दुर्लभ योनिमे जनम देने अछि तँ एकर पाछाँ हुनकर कोनो उद्देश्य रहल हेतन्हि। जे जाउ, साठि-सत्तरि बरखक मौका दैत छी अहाँकेँ, जाउ धरतीकेँ सुन्नर आ सुखी बनाउ। धरती सुन्नर आ सुखी तखैन हएत जखैन अहाँक बाल-बच्चा सुखी, सुन्नर आ सम्पन्न हएत। अहाँकेँ जे बनबाक अछि ओ तँ अहाँ बनि गेलौं, आब बच्चा अछि जिनकर आगू पूरा जिनगी आ दुनियाँ राखल छै। यएह अहाँक भविष्य अछि। जीबू तँ हुनकर जिनगी, मरू तँ हुनकरे जिनगी।
आ रघुनाथ से केलक। हुनकर सभटा शक्ति आ सभटा बुद्धि आ सभटा पूँजी हुनका सभकेँ बनबैमे लागल रहल।
ओ चाहलक- सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करितिऐ।
सरला पढ़ि लिखि कऽ नोकरी करऽ लागल।
ओ चाहलक- संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियर बनितिऐ।
संजय सॉफ्टवेअर इन्जीनियरटा नै बनल, अमेरिका तक पहुँचि गेल।
ओ चाहलक- मैनेजर समधी हुअए।
संजय ई नै चाहलक। ओ से केलक जे ओ चाहलक।
रघुनाथक आस रहि गेल। दयानिधान किछु मदति नै कऽ सकल हुनकर। हुनका दुख ऐ गपक छल जे मैनेजर एकरा बाप-बेटाक मेलपेंच बुझलक। ओ बड़ मानसिक तनावमे चलि रहल छल, मुदा कॉलेजक हुनकर सहयोगी हुनका बधाइ दऽ कऽ भरोस देलक जे एकटा अन्हार खधाइमे खसबासँ ओ बचि गेला। ऐमे प्रिन्सपलक भूमिका आर नीक छल। ओ मोटामोटी तीस साल पहिने रघुनाथक संग कॉलेज पकड़ने छल। दुनुक दोस्तियारी छलै। जखैन भेटितिऐ हँसी मजाक, हाहा हूहू करितिऐ। ओ एक दिन आस्तेसँ कहलक- “यौ रघुनाथ, हमरा आश्चर्य लगैत अछि जे एतबेटा गप अहाँकेँ बुझैमे किए नै आएल? ओ अहाँक बेटीक बदलामे अहाँक बेटाकेँ खरीद रहल छल।
ऐ तरहेँ रघुनाथ सहज भऽ रहल छल जे एक दिन घरपर हुनका प्रिन्सपलक दसखतबला नोटिस भेटल। आरोप दूटा छल- “नेग्लिजेन्स ऑफ ड्यूटी”(काजमे ढिलाइ) आइनसबऑर्डिनेशन(उच्च अधिकारीक गप नै मानब)। एहेन कोनो संकेत अपन गपमे नै देने छल ओ पहिने कहियो।
ई दुनूटा आरोप छल निराधार। एकरा रघुनाथेटा नै, सहयोगी सभ सेहो जानैत छल आ प्रिन्सपल सेहो। सबहक सहानुभूति ओकरा संगे छलै, मुदा संग देबा लेल कियो तैयार नै छल। ओ उत्तर दऽ देलक मुदा ओ ई जानैत छल जे एकरासँ कोनो लाभ नै अछि। ओ फेंफियाइत एतऽ सँ ओतऽ दौगैत गेल। आजिज आबि कऽ प्रिन्सपलसँ भेँट केलक आ हुनकासँ सलाह मांगलक। ओ कहलक- “देखू रघुनाथ, अहाँ जतेको दौड़-धूप करू, निलम्बनक मोन बना लेने अछि मैनेजर। हुनकर शक्ति आ पहुँचकेँ अहाँ जनिते छी। एकर बाद अहाँ कचहरी जाएब, फौदारी लड़ब, ई कहिया धरि चलत, कियो नै जनैत अछि। भऽ सकैत अछि जे फैसला होइसँ पहिने अहाँ मरियो जाइ। हँ, जाधरि मुकदमा चलत, ताधरि पेंशन रुकल रहत। ई सभ देखि कऽ हमर तँ सलाह अछि जे अहाँ वी.आर.एस. (वॉलन्टरी रिटायरमेन्ट स्कीम, स्वेच्छासँ सेवानिवृत्ति सुविधा) लऽ लिअ।
रघुनाथ बड़ी काल धरि चुप रहल। हुनकासँ किछु बाजल नै गेल।
ठीक अछि, मुदा एकटा अहाँ मदति करू।
कहू, की कऽ सकैत छी हम?”
निलम्बनकेँ अहाँ ताधरि लटकेने राखू जाधरि बेटीक बियाह नै भऽ जाए। फेर हम सएह करब जे अहाँ कहने छी।
मनुष्यताक लेल ई करबाके छल। प्रिन्सपल चिन्तित भऽ कऽ बाजल- “जाउ, कोशिश करै छी, मुदा ई गप अहाँ कतौ नै बाजी, से।
आ प्रिन्सपल कहिया धरि बाट तकितिऐ।

(जारी….)


५.
असगर वजाहत- हम हिन्दू छी
हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा

हम हिन्दू छी

एहेन कन्नारोहट जे मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं, अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल। अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै।
'लाहौलविलाकुव्वत. . .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।' अम्मा बजली। 'अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .' हम कहलिऐ। 'ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै', अम्मा बजली।
सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, 'एकरा कहू छतपर सुतल करए।' सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए।
तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास  बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई  साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए।
सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर जगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हमसभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल।
नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल।

 
दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छतक ऊपरसँ


(जारी....)

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...