Wednesday, March 30, 2011

'विदेह' ७९ म अंक ०१ अप्रैल २०११ (वर्ष ४ मास ४० अंक ७९)- Part I



                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' म अंक ०१ अप्रैल २०११ (वर्ष ४ मास ४० अंक ७)NEPALINDIA     
                                               
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य









३. पद्य






३.६.नवीन कुमार आशा- तोहर गोर गोर गाल


३.७.किशन कारीगर भिन भिनौज


४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर)

 

५. गद्य-पद्य भारती: फूसि- वासुदेव सुनानी:ओड़ियासँ अंग्रेजी अनुवाद शैलेन राउत्रॉय आ अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा



 

 

 भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]



 VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)बिपिन कुमार झा लेटेक्सगणितीयटंकनशिक्षणपरिशीलनम्-2



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक मटम पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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संपादकीय

रुबाइ : गजल
रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ हेबाक चाही।
रुबाइमे मात्रा २० वा २१ राखू। रुबाइक सभ पाँतीक प्रारम्भ दू तरहे शुरू होइत अछि- १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ। ओना फारसी रुबाइमे पाँती सभ लेल प्रारम्भक आगाँक ह्रस्व-दीर्घ क्रम निर्धारित छै, मुदा मैथिली लेल अहाँ २०-२१ मात्राक कोनो छन्द जे १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ होइत हो, तकरा उठा सकै छी। पाँती २० वा २१ मात्राक हेबाक चाही, (मफलु ।।U ) वा (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ हेबाक चाही। मुदा एक रुबाइक वाक्य सभक बहर वा छन्द/ लय एकसँ बेशी तरहक भऽ सकैए। 
आन चतुष्पदी जाइमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि मुदा मात्रा २०-२१ नै हुअए आ पाँती (मफलु ।।U ) वा (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ नै हुअए से रुबाइ नै मुदा "किता/कतआ"क परिभाषामे अबैत अछि।
रुबाइक चतुष्पदीक चारिम पाँती भावक चरम हेबाक चाही।

दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि।
एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए।
दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, काफियाक भीतरमे सेहो रदीफ रहि सकैए; रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ मात्रा, एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। मुदा काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत।

गजल कोनो ने कोनो बहर (छन्द) मे हेबाक चाही। वार्णिक छन्दमे सेहो ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना
तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस
तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन
रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन
छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
(दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू
दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू

मात्रिक छन्दमे द्विकल, ्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए।
द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत।
त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे।
चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत।
वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी।
आब कतेक पाद आ कतऽ काफिया (यति,अन्त्यानुप्रास) देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी।

मैथिली हाइकू: संस्कृतमे सत्रह सिलेबलक मीटर सभ अछि- शिखरिणी, पृथ्वी, वंशपत्रपतितम, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम, कोकिलकम, आ भाराक्रान्ता; ई सभटा वार्णिक छन्द अछि आ ऐ सभमे १७ वर्ण अक्षर होइत अछि (सभ पदमे १७ सिलेबल)। तेँ ५/७/५ क क्रममे १७ सिलेबल लेल १७ वर्ण अक्षर मैथिली हाइकू लेल प्रयुक्त हेबाक चाही।

( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०८ देशक १,७३७ ठामसँ ५८, ३४२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,९७,१११ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। )
 

 

 

२. गद्य









सुजीत कुमार झा

मैथिलीमे क्रिकेटक कमेन्ट्री

 
भारत आ पाकिस्तानबी मोेहालीक पंजाब क्रिकेट एशोसिएशनक मैदानमे ३० मार्च कऽ भेल सेमीफाइनल म्याचमे एक सँ एक इतिहास बनल तऽ दोसर दिस मैथिलीक इतिहासमे सेहो एकटा अध्याय जोडायल अछि । जनकपुर सँ प्रशारण होबयबला रेडियो मिथिला एफएम पुरे म्याचकेँ मैथिली भाषामे कमेन्ट्री कएलक अछि ।
बेरिया दू बजे सँ रातिक साढे ११ बजेधरि भेल ओ कमेन्ट्रीक क्रममे हरेक बलकेँ क्रिकेट खेलाडीसभद्वारा समिक्षा सेहो कएल गेल । अहि सँ पहिने रेडियोमे मैथिली भाषामे क्रिकेटक कमेन्ट्री नहि भेल छल ।
कमेन्ट्रीमे कँे सभ रहथि ?

कमेन्ट्रीक संचालन रेडियो मिथिलाक समाचार प्रमूख सुजीत कुमार झा आ वरिष्ठ समाचारदाता अतिश कुमार मिश्र कएलन्हि । कमेन्ट्रीमे समीक्षककेँ रुपमे जनकपुरक चर्चित युवा खेलाडीसभ शोभा कान्त पाण्डे, कुमार प्रसुन, राज मोहम्मद, अभिषेक झा आ सुनिल कुमार प्रसाद सहभागी रहथि ।
कमेन्ट्रीमे समीक्षकेँ रुपमे सहभागी सुनिल कुमार प्रसाद कहलन्हि क्रिकेटक प्रत्येक बलक विषयमे अपन धारणा राखब एकटा खेलाडीक रुपमे बहुत मज्जा आयल । मैथिलीमे कमेन्ट्री करब कोना कोना बुझाइत छल मुदा बाजहोमे सहज भेल आ एकटा अनुभव सेहो भेल दोसर समीक्षक अभिषेक झा कहलन्हि ।
कमेन्ट्रीक प्रभाव

भारत आ पाकिस्तानबीचक म्याच भेलाक कारण भारत आ पाकिस्तानक लोक मात्र नहि संसारभरिक लोक उत्सुकता सँ प्रतिक्षा कऽ रहल छल । सभगोटे म्याचक दृश्य देखय वा सुनय चाहैत छल । अहि दुआरे मिथिलाञ्चलमे सेहो ठामठाम बड़काबड़का प्रोजेक्टरसभ लागल छल । एहन प्रोजेक्टरक संख्या शहर वा अर्धशहरमे बेसी भेलाक कारण ग्रामीण क्षेत्र जनता एखनो रेडियो एफएमपर निर्भर रहैत अछि । ओतयकेँ जनता विशेष उत्साहकेँ संग रेडियो मिथिलाक कमेन्ट्री सुनलन्हि । ओना पहिल बेर मैथिलीमे कमेन्ट्री भेलाक कारण शहर हुए वा गाम सभ ठामक लोक सुनलन्हि । एकरो प्रतिक्षा क्रिकेटे म्याच जकाँ देखल गेल छल । जनकपुर नगर पालिकाक पूर्व मेयर बजरंग प्रसाद साह कहलन्हि –‘हम तऽ टिभी सेहो देखी आ अपन भाषाक कमेन्ट्रीकेँ लगमे रेडियो राखि कऽ सुनी ।पूर्व मेयर साह पुरे कमेन्ट्री सुनलन्हि ।
महराज महेश ठाकुर कलेज दरभंगाक प्राध्यापक चन्द्रमोहन झा पड़वाक कमेन्ट्रीक अलग अनुभव रहलन्हि । ओ दरभंगा सँ जयनगर स्थित अपन गाम जा रहल छलथि । ट्रेन अबेर भेलाक कारण भारतपाकिस्तानबीचक म्याच कही छुटि नहि जाए ताहिकेँ लेल चिन्तित रहथि । मुदा ट्रेनमे चढलथि कि सभकेँ देखलखिन मोबाइल लगा कऽ क्रिकेटक कमेन्ट्री सुनि रहल । मैथिली आन्दोलन सँ सेहो जुडल पड़वा कहलन्हि –‘रेलक एकटा ढिब्बा मात्र नहि पुरे रेल क्रिकेटमय बनि गेल छल सभ एफएमपर अपना भाषामे कमेन्ट्री सुनि रहल छल । किछ गामसभमे लउडीस्पीकरमे एफएम लगा कऽ क्रिकेटक कमेन्ट्री सुनल गेल ।
मैथिलीमे कमेन्ट्रीक सोच कोना बनल ?
नेपालक एफएम क्षेत्रमे एकटा अलग पहिचान बनावयबला रेडियो मिथिला किछ नहि किछ नयाँ करैत रहैत अछि । नेपाल भारतक जतेक चुनाव होइत अछि ओकर मतदान दिनक आ मतगणना दिनक प्रत्येक्ष प्रशारण करैत अछि । क्रिकेटेकेँ सेहो कमेन्ट्री किया नहि कएल जाए इ मोन विश्व कप शुरु भेले दिन सँ रहल कहैत रेडियो मिथिलाक प्रबन्ध निर्देशक गोपाल झा साइत सायद भारते पाकिस्तानबीचक म्याचदिन जुडल छल उल्लेख कएलन्हि । जनकपुर क्षेत्र लोक कमेन्ट्री हिन्दी वा अंग्रेजीमे सुनैत अछि एहनमे मैथिलीमे केहन हैत एकर चिन्ता छल प्रबन्ध निर्देशक झा कहलन्हि –‘स्रोताक रेसपोन्स गजबकेँ आएल अछि अहि सँ हमसभ अति उत्साहित छी ।
क्षेत्रीय स्तरक खेलमे सेहो मैथिलीमे कमेन्ट्रीक माँग
जनकपुर क्षेत्रमे वा नेपाल भारतक मिथिलाञ्चल क्षेत्रमे होवयबला क्षेत्रीय स्तरक क्रिकेट प्रतियोगितासभक कमेन्ट्री मैथिली भाषामे करावयकेँ जनकपुरक खेलाडीसभ माँग कएलन्हि अछि । क्रिकेट खेलाडी शोभाकान्त पाण्डे एफएममे मात्र नहि लउडीस्पीकर केँ माध्यम सँ होवयबला कमेन्ट्रीमे सेहो मैथिली भाषाक प्रयोग करवाक लेल सभकेँ अनुरोध कएलन्हि अछि ।


 ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
हम पुछैत छी: बेचन ठाकुरसँ मुन्नाजीक गपशप
गमैया नाटकक परि‍वेशजन्‍य सृजनकर्त्ता एवं नि‍स्‍वार्थ भावनासँ रचनारत श्री बेचन ठाकुर जीसँ हुनक रचनात्‍मक प्रक्रि‍या मादे युवा लघुकथाकार मुन्नाजी द्वारा कएल गेल वि‍भि‍न्न प्रश्‍नक उतारा अहाँ सबहक समक्ष देल जा रहल अछि‍।

मुन्नाजी-       प्रणाम ठाकुरजी!
बेचन ठाकुर-   प्रणाम मुन्ना भाय!

मुन्नाजी- साहि‍त्‍यक मुख्‍य: दू गोट वि‍धाक एतेक रास प्रकारमे सँ अपने नाटकक सर्जनक प्राथमि‍कता देलौं कि‍एक, एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै अछि‍?
बेचन ठाकुर-   जखन हम परि‍वारक संग वा पड़ोसीक संग गमैया नाच वा नाटक देखैले जाइत रही तँ हुनके सभसँ प्रेरि‍त भऽ नाटकक प्रति‍ अभि‍रूचि‍ जागल आ दि‍नोदि‍न बढ़ैत रहल।

मुन्नाजी- अहाँक नाटकक कथानकमे केहेन स्‍थि‍ति‍ वा परि‍वेशक समावेश रहैए।
बेचन ठाकुर-   हमर नाटकक कथानकमे समाजक स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍ति‍ आ ओकर यथासंभव समाधानक परि‍वेश रहैए।

मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या नाटक लेखन प्रारम्‍भ केलौं, कहू जे तहि‍या तहि‍या आ आजुक सामाजि‍क, सांस्‍कृति‍क उपरस्‍थापन वा बदलावक प्रति‍ अहाँक नजरि‍ये केहेन स्‍थि‍ति‍ देखना जाइछ?
बेचन ठाकुर-   काओलेज जीवनसँ कि‍छु-कि‍छु लि‍खैक प्रयास करैत रहलौं जैमे नाटक मुख्‍य रहल। नाटकक दृष्‍टि‍ऍं प्रारंभि‍क सामाजि‍क आ सांस्‍कृति‍क स्‍थि‍ति‍ तथा आजुक स्‍थि‍ति‍मे बड्ड अंतर देखना जाइए। गमैया नाटक जस-के-तस पड़ल अछि‍, कनी-मनी आगू घुसकल अछि‍। मुदा शहरी नाटक हरेक क्षेत्रमे अपेक्षाकृत बड्ड आगू अछि‍।

मुन्नाजी- आइ नाटक कथानक, शि‍ल्‍प एवं तकनीकी दृष्‍टि‍कोणे उम्‍दा स्‍तरक प्राप्‍ति‍क संग थि‍येटरमे आबि‍ जुम अछि‍, अहाँ थि‍येटरमे प्रदर्शित आ गमैया नाटकक बीच कतेक फाँट देखै छी। आ कि‍एक?
बेचन ठाकुर-   कथानक, शि‍ल्‍प एवं तकनीकी दृष्‍टि‍ऍं थि‍येटर आ गमैया नाटकमे बड्ड फाँट देखै छी। दर्शकक आ कलाकारक साक्षरता, स्‍त्री-पुरूषक भूमि‍का, साज-बाजक ओरि‍यान, इजोतक जोगार इत्‍यादि‍मे बड्ड फाँट अछि‍। फलस्‍वरूप गमैया नाटक अपेक्षाकृत पछुआएल रहि‍ गेल अछि‍।

मुन्नाजी- गाममे आइयो बाँस-बत्ती आ परदाक जोगारे नाट्य प्रदर्शन होइछ आ दर्शक सेहो जुटैछ तँ अपने गमैया नाटक अतीतक दशा आ भवि‍ष्‍यक दि‍शा मादे की कहब?
बेचन ठाकुर-   गमैया नाटकक प्रदर्शनमे दर्शकक भीड़ रहैए। कारण गाम-घरमे मनोरंजनक साधनक सामूहि‍क स्‍तरपर अभाव छै। शहरक देखादेखी आब गामो-घरक स्‍थि‍ति‍मे सुधार भऽ रहलैए। तैं गमैया नाटकक दशा भवि‍ष्‍यमे अवस्‍य सुधरत, वि‍श्वास अछि‍।

मुन्नाजी- अहाँ एतेक रास वि‍भि‍न्न तरहक नाटक लि‍ख मंचन कैयौ कऽ हेराएल वा बेराएल रहलौं कि‍एक?
बेचन ठाकुर-   हम एकटा नि‍जी शि‍क्षकक दृष्‍टि‍ऍं अपन वि‍द्यार्थीक बौद्धि‍क वि‍कास हेतु अपन कोचि‍ंगक प्रांगणमे कोनो वि‍शेष अवसरपर तैमे खास कऽ सरस्‍वती पूजामे रंगमंचीय सांस्‍कृति‍क कार्यक्रमक बेबस्‍था करै छी जैमे अपन ि‍नर्देशनमे वि‍द्यार्थी द्वारा कार्यक्रम संपादि‍त होइए। ओइ तरहेँ दस-बारहटा नाटकक मंचन सराहनीय ढंगसँ भऽ चूकल अछि‍। सूत्रक अभावमे हम हेराएल रही। मुदा आब प्राप्‍त सूत्र आ बेबस्‍थाक कृतज्ञ छी।

मुन्नाजी- अहाँ नाटकक अति‍रि‍क्‍त आअोर की सभ लि‍खै छी, सभसँ मनलग्‍गु कोनो वि‍धाक कोन प्रकारक अहाँ प्रेमी छी आ कि‍एक?
बेचन ठाकुर-   हम नाटकक अति‍रि‍क्‍त कथा, लघुकथा, राष्‍ट्रीय गीत, भक्‍ति‍ गीत, कवि‍ता, टटका घटनापर आधृत गीत इत्‍यादि‍ लि‍खबाक प्रयास करैत रहै छी। गोष्‍ठीमे उपस्‍थि‍त भऽ कऽ कथा पाठो  कलौंहेँ। सभसँ मनलग्‍गू वि‍धा हमर संगीत अछि‍। ओना हमर प्रति‍ष्‍ठाक वि‍षय गणि‍त अछि‍।

मुन्नाजी- जाति‍-वर्ग वि‍भेदक अहाँक रचनाकेँ कतेक प्रभावि‍त कऽ पौलक अछि‍ अपने ऐ जातीय वि‍षमताक टापर-टोइयामे अपनाकेँ कतऽ पबै छी?
बेचन ठाकुर-   जाति‍-वर्ग वि‍भेद हमर रचनाकेँ अंशत: प्रभावि‍त केलक। ऐमे हम अपनाकेँ अपन जगहपर अड़ल पबै छी।

मुन्नाजी- नाटक वा अन्‍यान्‍य रचनात्‍मक सक्रि‍यताक मादे अपनेक अगि‍ला रूखि‍ की वा केहेन रहत?
बेचन ठाकुर-   नाटक वा अन्‍यान्‍य रचनात्‍मक सक्रि‍यताक मादे अपन अगि‍ला रूखक संबंधमे कि‍छु नि‍श्चि‍त नै कहल जा सकैए। इच्‍छा प्रबल अछि‍। जतए धरि‍ संभव भऽ सकत करब।

मुन्नाजी- अपनेक अमूल्‍य उतारा हेतु बहुमूल्‍य समए देवाक लेल हार्दिक धन्‍यवाद!
बेचन ठाकुर-   अपनेक प्रश्नक यथासंभव जबाबसँ अपनाकेँ गौरवान्‍वि‍त बुझि‍ अपनेकेँ हार्दिक धन्‍यवाद ज्ञापि‍त करैत हमरो अपार हर्ष होइए।


 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्डल 
कम्प्रोमाइज नाटक आगाँ तेसर दृश्‍य
(मवेशी हाट। माल-जालक संग अन्नो-पानि‍ आ तीमनो-तरकारी।)

सोमन आ रामरूप
रामरूप- गोधि‍याँ, मालक मंदी आबि‍ गेल अछि‍। दोसर कोनो बाटे नै सुझल तँए कनी घटो लगाकेँ बेच लेलौं। तोहर केहन रहलह?

सोमन-  (मुस्‍कुराइत) सुतड़ल गोधि‍याँ। सुपौलि‍या बेपारी पकड़ाएल। अपन मन तँ झुझुआइते छलए।
सोमन-  पौरूके तीन हजारमे बड़द कीनने छलौं। लार-पातक दुआरे अधो देह नै छलै। मनमे छलए जे पाँच बरख मारि‍-धुसि‍ जोतबो करब आ तेकर बादो बेचब तैयो दाम आबि‍ये जाएत मुदा की कहबह खूट्टा उसरन भऽ गेल।
रामरूप- अही दुआरे हमहूँ बेच लेलौं। तेहेन धन छलै जे मनसँ नै जाइ छलए मुदा रखबो करि‍तौं तँ खाइले की दैति‍ऐ? महीना दि‍नसँ कपैच-कुपैच कऽ खाइले दै छेलि‍ऐ। मुदा परसू आबि‍ कऽ ओहो सैध गेल। गठूा घर उछेहलौं जे दू दि‍ चलल।
सोमन-  घर उछेह खुआ लेलह तँ फेर घर?

रामरूप- खूट्टापर जेकरा बान्‍हि‍ कऽ रखने छेलि‍ऐ ओकरा जे अधो पेट खाइले नै दैति‍ऐ से केहेन होइत। जखने थैरमे जाइ छलौं आकि‍ हुकड़ए लगै छलए। ओकर कलपैत मन देख अपनो मन कलैप जाइ छलए। तँए सोचलौं जे बरसात तँ अगि‍ला साल आओत, बुझल जेतै।

सोमन-  (मूड़ी डोलबैत) हँ से तँ ठीके। जैठीन एक दि‍न पार लगनाइ कठि‍न अछि‍ तैठीन साल भरि‍ आगूक सोचब बूड़ि‍बक्कि‍ये ने हएत।
रामरूप- आब तँ गामे चलबह कि‍ने?

सोमन-  हँ। चलब तँ गामे मुदा एकटा काज पछुआएल अछि‍। चलह एक फेरा लगाइयो लेब आ आधमन चाउरो कीन लेब।
रामरूप- मन तँ हमरो होइए। मुदा मालक पएरे एलौं से थाकि‍ गेलौं। मोटरी उठबैक साहसे नै होइए।
सोमन-  यएह हद करै छह तोहूँ। चलह ने कोनो दोकानपर बैस जलखैइयो चाह करब आ दस मि‍नट जि‍राइयो लेब। बुझै छहक जे कहुना पाँच रूपैया कि‍लो सस्‍ता भेटतह।

(चाहक दोकान। बेंचपर चाउरक मोटरी रखि‍ रघुवीर सेहो बैसल)
रामरूप- कनी मोटरी घुसका लि‍अ। की छी मोटरीमे भाय?

रघुवीर-       की रहत। चाउर छी। आब ि‍क कोनो भात खाइ छी कि‍ दि‍न घीचै छी।
रामरूप- से की?

रघुवीर-       अपना सबहक जे अगहनी चाउरक सुआद आ मस्‍ती छै से थोड़े ऐ चाउरमे छै। तखन तँ अपन हारल......।
रामरूप-       की भाव देलक?

रघुवीर- तँए, कनी मन मानलक। अगहनी चाउरसँ पाँच रूपैया सस्‍ता अछि‍।
रामरूप- तब तँ गोधि‍याँ अपनो सभ अध-अध मन कऽ लऽ लेब, से नीके?

सोमन- हमहूँ तँ यएह सोचि‍ कऽ कहलि‍यह। अखन जदी कनी भीरे हएत तँ तीन दि‍नक सि‍दहामे चारि‍ दि‍न कटि‍ जाएत।
रामरूप- हम सभ पछुआएल छी तै बीच सठतै ते ने भाय?

रघुवीर- से कि‍ अद्दी-गुद्दी बेपारी छी। पाँच गो ट्रक भि‍ड़ौने अछि‍। मुदा खड़तुआ जकाँ लेबाल ढेरि‍अाएल अछि‍।
रामरूप- (मोटरी दि‍स देख) तरजू देखै छी। अहूँ कोनो चीज बेचैले अाएल छलौं?

रघुवीर- हँ। तरकारी उपजेबौ करै छी आ हाटमे बेचबो करै छी। भगवान दसे कट्ठा खेत देने छथि‍। ओकरे बीचमे कल गरा देने छि‍ऐ आ बारहो मास तरकारीये उपजबै छी।
रामरूप- सभ कि‍छु बि‍क जाइए?

रघुवीर- (कनी ठमकि‍) हँ बि‍क तँ जाइए मुदा.....?

रामरूप- मुदा की?

रघुवीर- यएह जे तेहेन चि‍क्कनि‍या लेबाल सभ भऽ गेल अछि‍ जे चीज चि‍न्‍हबे ने करैए।
रामरूप- से की?

रघुवीर- की कहब। लहटगर देख चीज कीनैए। कीड़ी-फति‍ंगीक बेसी दवाइ हम नै दै छि‍ऐ। तैसँ देखैमे समान कनी दब रहैए।
रामरूप- अहाँ कि‍अए नै दवाइ दै छि‍ऐ?

रघुवीर- अपनो खाइ छी कि‍ने। देखैमे ने दवाइ देल नीक लगैए मुदा जहरक अं ओइमे रहि‍ये जाइ छै कि‍ने। मुदा भगवान हमरो दि‍स देखै छथि‍?

रामरूप- से की?

रघुवीर- अखनो एहेन कीनि‍नि‍हार छथि‍ जे हमरे चीजकेँ पसि‍न्न करै छथि‍। दू-पाइ महगे वि‍काइए। अहाँ सभ कतऽ आएल छलौं?

रघुवीर- (मि‍ड़मि‍रा कऽ) की कहब भाय, रौदीक मारल डि‍रि‍आइ छी। बड़द-गाए बेचए आएल छलौं। खुट्टा उसरन भऽ गेल।
रघुवीर- (मूड़ी डोलबैत) दोसर उपाइये कि‍ अछि‍। तेहेन दुरकाल समए भऽ गेल अछि‍ जे लोकोक प्राण बँचव कठि‍न भऽ गेल अछि‍ तैठाम माले-जाल गेल कि‍ने। पहि‍ने मनुक्‍खक जान बचाउ। तखन बुझल जेतै।
रामरूप- अहाँ तँ हाटक तरी-घटी बुझैत हेबै। कहू जे एते-एते दूरसँ जे बेपारी सभ अबैए, से कना पार लगै छै?

रघुवीर- एकरा सबहक भाँज बड़ भारी छै। बड़का-बड़का बेपारी सभ छी। चरि‍-चरि‍, पॅच-पॅच बएच बनौने अछि‍। गामसँ हाट आ हाटसँ गाम एक बट्ट केने रहए। अड्डा बना-बना कारोबार पसारने अछि‍।

रामरूप- एकरा सभले रौदी-दाही नहि‍ये छै।
रघुवीर-       (अचंभि‍त होइत) रौदी-दाही! हद करै छी अहूँ। सदि‍खन घैलापर पाइ चढ़ौने रहैए। जेना अपना सभले रौदी-दाही जनमारा छी तेना एकरा सबहक अगहन छी। एकबेर रौदी-दाही पौने सेठ बनि‍ जाइए।
                         
पटाक्षेप


चारि‍म दृश्‍य
(नसीबलालक घर। दरबज्‍जाक ओसारक कुरसीपर आँखि‍ मूनि‍ कि‍छु सोचैत सोमनक संग सुकदेव अबैत)
सुकदेव- नीन छी यौ भाय?

(सुकदेवक बात सुनि‍ आँखि‍ ओलि‍ धड़फड़ा कऽ)
नवीसवलाल-    नै! नै! सुतल कहाँ छी। समैक फेरीसँ चि‍न्‍ति‍त भऽ गेल छी। खेलहो अन्न देहमे नै लगैए। एक दि‍स जहि‍ना पि‍यास मेटा गेल तहि‍ना आँखि‍क नीन्न सेहो। धैनवाद अहीं सभकेँ दी जे एहनो दुरकालमे हँसी-खुशीसँ जीबै छी।
सोमन-  हद करै छी भाय! राँड़ कानए अहि‍वाती कानए तै लागल बरकुमारि‍ कानए।
नसीवलाल-     तोहर बात कटैबला नहि‍ये छह सोमन मुदा......?

सोमन-  मुदा की?

नसीवलाल-     ओना, जे जते पछुआएल अछि‍ ओ ओते समस्‍यासँ गरसि‍त अछि‍। मुदा प्रकृतक वि‍पैत सभपर पड़ै छै। तहूमे जे जते अगुआएल रहैए ओकरा ओते बेसी पड़ै छै।
सोमन-  हँ, से तँ पड़ि‍ते छै।
नसीवलाल-     बौअा, ओना तोहर उमेरो कम छह। एक गाममे रहि‍तो कम सम्‍पर्कमे रहै छह। सुकदेव भाय बतरि‍या छथि‍। तहूमे बच्‍चेसँ दुनू गोरे गामसँ जहल तक संगे रहलौं। मुदा.....?

सोमन-  मुदा की?

नसीवलाल-     यएह जे आब बुझि‍ पड़ैए जे जि‍नगि‍ये ठका गेल।
सोमन-  से की?

नसीवलाल-     की कहबह आ कते कहबह। एकटा कोसि‍ये नहैरि‍क बात सुनह। जहि‍या जुआने रही तहि‍येसँ कहै छि‍अह। बड़ लि‍लसा रहए जे कोसी नहैर बनत। डैम बनतै। नहरि‍क पानि‍सँ खेत पटत आ डैममे पनि‍बि‍जलीक यंत्र बैसतै। जैसँ तते बि‍जली हएत जे घर-दुआरक इजोतक संग करखन्नो चलत। मुदा सभ आशापर पानि‍ हरा गेल। आइ जौं बि‍जली रहैत तँ गामो बजारे जकाँ भऽ गेल रहैत। मुदा......?

सोमन-  मुदा की?

सीवलाल-      यएह जे ई बात मनसँ मेटा गेल छलए जे एहेन रौदीसँ भेँट हएत। मुदा.....!

सोमन-  मुदा की?

नसीवलाल-     अपन संग-संग गामोक कल्‍याण भऽ जाइत। खेती-पथारीक संग एते छोट-पैघ करखन्ना बनि‍ गेल रहैत जे बेरोजगार ककरा कहै छै से तकनौसँ नै भेटैत। मुदा आइ देखै छी जे गाम-गामक लोक उजहि‍ दि‍ल्‍ली, कलकत्ता चलि‍ गेल।
सोमन-  हँ। से तँ भेल। मुदा माटि‍यो फाँकि‍ कऽ तँ मनुख नहि‍ये रहि‍ सकैए। जतऽ पेट भरतै ततऽ ने जाएत।
नसीवलाल-     कहलह तँ बेस बात। मुदा गाम ताबे नै हरि‍याएत जाबे गामक बच्‍चा-बच्‍चा ठाढ़ भऽ अपन भवि‍स दि‍स नै ताकत।
सोमन-  एहेन समए भेने लोक केना ठाढ़ हएत?

नसीवलाल-     सएह ने मनकेँ नचा रहल अछि‍। सभ माए-बाप बेटा-बेटीपर आशा लगौने रहैए जे हमरासँ नीक बनि‍ धीया-पूता गुजरो करत आ नीक जकाँ आगूओ बढ़त। मुदा आँखि‍ उठा दुनि‍याँ दि‍स तकै छी तँ चौन्‍ह आबि‍ जाइए। बाल-बच्‍चाक कोन गप जे अपने बुढ़ाढ़ी भरिसक कनि‍ते कटत।
सुकदेव- वएह बात मनमे औंढ़ मारलक भाय, तँए एलौंहेँ।
नसीवलाल-     भाय, कि‍ वि‍चार करब। छुछ हाथ मुँहमे दैए कऽ की हएत। ने कि‍यो गाम-घरक महौत बुझैए आ ने अपन शक्‍ति‍क उपयोग करए चाहैए। सभ अपन अमूल्‍य श्रम-मेहनत- दोसराक हाथे बेच बजारक चकचकीमे बौआइ-ए।
सुकदेव- यएह सभ देख ने मन उछटि‍‍ गेलहेँ। मुदा ककरा कहबै, के सुनत। अहाँ तँ गुल्‍ली-डंटासँ अखनि‍ धरि‍क संगी छी। जे तीत-मीठ भेल तैमे तँ दुनू गोरे संगे छी।
नसीवलाल-     (चानि‍ परक पसेना पोछैत) जहि‍ना माटि‍क ईंटाकेँ वएह माटि‍ पानि‍क संग मि‍ल जोड़ि‍-साटि‍- दैत अछि‍ तहि‍ना ने मनुक्‍खोकेँ सि‍नेह साटि‍ दैत अछि‍। मुदा सि‍नेह आओत केना? एक दि‍स धनक भरमार दोसर दि‍स भूखल पेट। तै बीच चोर-उचक्काक सघन बोन। केना लोकक परान बँचतै?

सुकदेव- सोझे चि‍न्‍ते केनौ तँ नहि‍ये हएत। नै भगलाहाले तँ गामोमे रहनि‍हारले तँ सोच-वि‍चारए पड़त। जँ से नै करब तँ एक लोटा पानि‍ आ एकटा काठि‍यो मुइलापर के देत।
नसीवलाल-     भाय, जहि‍या घोड़-दौड़ करैबला छलौं तहि‍या तँ करबे ने केलौं, आब आइ बुढ़ाढ़ीमे की हएत? कि‍छु करए लगै छी तँ हाथ-पएर थरथराए लगैए। जैसँ बुझलो काजमे धकचुका जाइ छी।
सुकदेव- भाय, असे तँ जि‍नगीक संगी छी। जै संग लोक जि‍नगीक रस चुसैत अछि‍। तेकरो छोड़ि‍ देब......?

नसीवलाल-     (सुकदेवपर आँखि गरा मूड़ी डोलबैत) भाय कहै तँ छी लाख टकाक गप। अपनो जोकर नै सोच-वि‍चार करब तँ अकाल मरबो तँ नीक नहि‍ये छी।
सुकदेव- नीक अधला कतऽ छै भाय! भलहि‍ं लोक अपना जि‍नगीकेँ स्‍वार्थी बुझे मुदा जाबे धरि‍ अपने नि‍रोग नै रहब ताबे धरि‍ दोसराक वि‍षयमे कि‍ सोच आ कि‍ कऽ सकै छी।
नसीवलाल-     हँ, से तँ ठीके। वि‍चारोकेँ प्रभावि‍त तँ जि‍नगि‍ये करैत अछि‍। नीक-नीक भाषणे करब आ अपन चालि‍ छुतहरक अछि‍ तँ ओइ भाषणक महौते की? जहि‍ना वि‍ज्ञान सि‍द्धान्‍त-थि‍योरीक- संग व्‍यवहारो-प्रेक्‍टि‍कलो- कऽ कऽ देखबैत अछि‍ तहि‍ना ने नीति‍शास्‍त्र सेहो अछि‍।
सुकदेव-      अखन धरि यएह बुझि‍ ने जीबैत एलौं, मुदा.......?

नसीवलाल-     हँ, समैक चक्र तँ प्रवल अछि‍ये मुदा एहेन प्रबल तँ नै अछि‍ जेकरासँ सामना नै कएल जा सकैत अछि‍। जीता-जि‍नगी हारि‍यो मानि‍ लेब, ओहो तँ......?

सुकदेव- हँ, से तँ उचि‍त नहि‍ये अछि‍। मुदा समनो तँ.......?

नसीवलाल-     हँ, कठि‍न अछि‍। मुदा लंका सन राक्षसक बीच हनुमान केना.......?

सुकदेव- हँ, तहि‍ना।
नसीवलाल-     (अपसोच करैत) पाछू घुरि‍ तकै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे जरूर चूक भेल। जना कोसी नहरि‍ आ पनि‍बि‍जली लेल सामाि‍जक स्‍तरपर ठाढ़ भेलौं तेना व्‍यक्‍ति‍गत जीवनक बाट छुटि‍ गेल।
सुकदेव- से की?

नसीवलाल-     यएह जे जना मध्‍यम कि‍सान छी। अपना खेत अछि‍। तेना ने खेतमे पानि‍क ओरि‍यान केलौं आ ने परि‍वारो जोकर मशीन। जौं से केने रहि‍तौं तँ भलहि‍ं महग काज होइत मुदा जीबैक बाट जरूर धरौने रहैत।
सुकदेव- जखन चारि‍ पएरबला हाथी चूकि‍ जाइए तखन तँ मनुख दुइये पएरबला अछि‍। जै समए जे चूक भेल, आइ ने ओ समए बँचल अछि‍ आ ने जि‍नगीक ओ अंश।
नसीवलाल-     अखन धरि‍ तँ हाले-चालमे समए नि‍कलि‍ गेल। काजक गप तँ छुटि‍ये गेल। कि‍महर आएल छलौं?

सुकदेव- भाय, अहाँसँ नुकाएल नहि‍ये छी। अखन तक जे जीबैक आस बटाइ खेत अछि‍ ओ टुटि‍ गेल। खेतबलाकेँ तँ खेत रहबे करै छन्‍हि‍ मुदा बटेदारकेँ घरोक आँटा गील भऽ जाइ छै।
नसीवलाल-     दुर्भाग्‍य अछि‍ भाय।
सुकदेव- जकरा सोन छै ओकरा पहीनि‍नि‍हार नै छै आ जे पहीरि‍नि‍हार अछि‍ ओकरा सोन नै छै।
नसीवलाल-     से तँ अछि‍ये। गामक बारहआना खेत नोकरि‍हाराक अछि‍। जे खेती नै करैत अछि‍। जखन कि‍ बारहआना लोक खेतीपर जीबैत अछि‍। मुदा कोन दुख एहेन छै जेकर दवाइ नै छै।
सुकदेव- भारी बनर फाँसमे पड़ि‍ गेल छी। अखन तक‍ खेती छोड़ि दोसर लुरि‍ नै सीखलौं। खांहि‍सो नै भेल। घरसँ बाहरो जाएब से कोन लुरि‍ ल‍ऽ कऽ जाएब। भीख मांगि‍ खाइसँ नीक अन्न-पानि‍ बेतरे घरमे प्राण ति‍यागि‍ देब हएत। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल छी।
नसीवलाल-     अहूँसँ बेसी तँ अपने पड़ि‍ गेल छी। अहाँ तँ नै ऐ गाम ओइ गाम जा कऽ कमाइयो-खा सकै छी मुदा.....।
सुकदेव- यएह बात मनमे अहुरि‍या काटि‍ रहल अछि‍। जहि‍ना संग-मि‍ल एते दि‍न कटलौं तहि‍ना आगूओ केना कटत, तेकर......?

नसीवलाल-     कनि‍तो जीब। सेहो नीक नहि‍ये।
(कर्मदेव आ सोमनक प्रवेश)
नसीवलाज-     भाय, मन तँ अखनो तेहेन हुड़कैए जे शेष जि‍नगी जहलेमे बि‍ताएब मुदा बुढ़ाढ़ी.....। नवतुरि‍यामे समाजक प्रति‍ कोनो रूचि‍ये नै अछि‍। रूचि‍यो केना रहत। तहि‍ना परचा पोस्‍टरमे परि‍वारक परि‍भाषा दैत अछि‍ तहि‍ना समाजक कोन बात जे माइयो-बापकेँ परि‍वारसँ लोक अलगे बुझैए।
कर्मदेव-       काका, हमहूँ सएह पुछए एलौं जे एहेन समैमे घरसँ बि‍ना भगने केना जीब?

नसीवलाल-     बौआ, तोरे सभपर समाजक दारो-मदार अछि‍। मुदा जखन तोंही सभ चि‍ड़ै जकाँ उड़ि‍ पड़ा रहल छह तखन तँ समाजक-गामक- भगवाने मालि‍क।
सोमन- ककरापर करब सि‍ंगार पि‍या मोरा आन्‍हर हे।
कर्मदेव- काका, जँ जीबैक बाट भेट जाएत तँ कि‍अए भागब?

नसीवलाल-     बौआ, तूँ तँ पढ़ल-लि‍खल नौजवान छह। तोरामे एते शक्‍ति‍ छह जे कि‍छु कऽ सकै छह। आशा जगाबह।
कर्मदेव- अखुनका समैसँ जे अपन तुलना करै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे करि‍या बादल लटकल भादोक अमवसि‍याक बारह बजे राति‍क बीच पड़ल छी।

नसीवलाल-     पढ़ि‍-ि‍लखि‍ कऽ एते नि‍राश कि‍अए छह?

कर्मदेव- बुझि‍ पड़ैए जे एहेन पढ़ाइ पढ़ि‍ लेलौं जे ने घरक रहलौं आ ने घाटक।
नसीवलाल-     ओना जीबैक बाट व्यक्‍ति‍-वि‍शेष सेहो बनबैए आ बना सकैए। मुदा समाजकेँ बनने बि‍ना जहेन हेबाक चाही से नै बनि‍ सकैए। तँए बेगरता अछि‍ जे दुनू संग-संग बनए। जइले तोरे सन-सन नवयुवक अपेकछा अछि‍। फाँड़ बान्‍हि‍ मैदानमे कुदए पड़तह।

कर्मदेव- कि‍यो तँ काजे देखि‍ ने फाँड़ बान्‍हत?

नसीवलाल-     (अर्द्ध हँसी हँसि‍) अइले समाजकेँ जगबए पड़तह। जखने समाज नीन तोड़ि‍ सुनत तखने ओछाइन समेटि‍ घरसँ बहरा रस्‍तापर आबि‍ ठाढ़ भऽ जाएत। जखने ठाढ़ हएत तखने नव सुर्जक रोशनीमे अतीतक गौरव देखत।
कर्मदेव-       की गौरव?

नसीवलाल-     मि‍थि‍ला दर्शनक गौरव देखैक लेल ओकर बनैक प्रक्रि‍या देखए पड़तह। संयुक्‍त परि‍वार बजनहि‍ नै, बनैक आ चलैक ढंग घड़ए पड़तह। जहि‍ना कोनो बाट कोनो स्‍थान धरि‍ पहुँचबैत तहि‍ना मि‍थि‍ला दर्शन छी।
कर्मदेव- की दर्शन?

नसीवलाल-     एते धड़फड़मे नै बुझि‍ सकबहक। अखन हमहूँ औगताएल छी। मालो-चाजकेँ पानि‍ नै पीयेलौंहेँ, हुकड़ैए।
कर्मदेव- तखन?

नसीवलाल-     सौंसे समाजक बैसार ब्रह्मस्‍थानमे करह। सबहक वि‍चारसँ एकटा रास्‍ता ताकि‍ आगू डेग उठाबह।
कर्मदेव- आइये बैसार करब।
नसीवलाल-     एते अगुतेने काज नहि‍ चलतह। कौल्हुका समए बना काने-कान सभकेँ जना दहुन।

कर्मदेव- बेस।
पटाक्षेप।
क्रमश:
           

 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।


 मनोज कुमार मण्‍डल       
‍बाप भेल पि‍त्ती‍अधि‍कार नाटक'क सफल मंचन
चनौरागंज, मधुबनी।
वसंतक वेलामे सरस्‍वती पूजाक शुभ अवसरपर जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेंटर केर संस्‍थापक सह शि‍क्षक श्री बेचन ठाकुर जीक रचि‍त दू गोट नाटकक मंचन कोचि‍ंगक बालक-बालि‍का द्वारा कएल गेल। पहि‍ल नाटक बाप भेल पि‍त्ती‍ सतौत माएक नाकारात्‍मक चरि‍त्रपर आधारि‍त छल। ऐ सम्‍पूर्ण नाटकक सफल प्रस्‍तुति‍ कोचि‍ंगक बालि‍का द्वारा कएल गेल। स्‍त्री, पुरूष दुनूक भूमि‍का बालि‍का सभ केलनि‍।
नाटकक सफल मंचनक श्रेय श्री बेचन ठाकुरकेँ देबामे कनि‍यो असोकर्ज नै कारण नाटक लि‍खबासँ लऽ कऽ ि‍नर्देषन धरि‍ ठाकुरजी स्‍वयं केलाह। ऐ नाटकक प्रस्‍तुति‍सँ बुझि‍ पड़ल जे ठाकुरजी समाजसँ कतेक सरोकार रखै छथि‍ आ समाजक कतेक सूक्ष्‍म अध्‍ययन करै छथि‍। गाम-घरक परि‍वेश रहि‍तो दर्शक धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे नाटक देखबामे भाव-वि‍भोर भऽ गेल छलाह।
दोसर लघु नाटक छल अधि‍कार‍ ई नाटक सूचनाक अधि‍कारसँ सम्‍बन्‍धि‍त बेस्‍ट सि‍टि‍जन अवार्ड‍सँ पुरस्‍कृत मो. मजनूम नवादपर आधारि‍त छल। ऐ नाटकक प्रस्‍तुति‍ संस्‍थानक बालक द्वारा कएल गेल। सभसँ महत्‍वपूर्ण बात ई अछि‍ जे दर्शकक पहि‍ल पति‍यानीमे बैस मो. मजनूम नवाद सेहो आदि‍सँ अंत धरि‍ नाटकक आनंद लेलाह। संगे चनौरागंगक अगल-बगल जेना बेरमा, मछधी, सि‍मरा, कनकपुरा, चनौरा, जगदर, रबारी, वि‍शौलक लोक सभ दर्शक रूपमे उपस्‍थि‍ति‍ रहथि‍‍। हजारोक संख्‍या कहबामे कम बुझना जाइ छल। कि‍छु लोक एहनो भेलाह जे अपन भाव मंचपर उपस्‍थि‍त भऽ कऽ अभि‍व्‍यक्‍त केलथि‍। जै‍मे श्री कामेश्वर कामति‍, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, श्री गोवि‍न्‍द झा, श्री चेत नारायण साहु, श्री रमेश प्रधान, श्री वि‍पि‍न साहु, श्री महावीर साहु, श्री बहादुर ठाकुर, श्री मनोज कुमार मण्‍डल इत्‍यादि‍ प्रसन्न भऽ नाटककार सह आयोजन कर्ता माने मंचक श्री बेचन ठाकुरजीकेँ धन्‍यवाद ज्ञापनक संग-संग कलाकार-वि‍द्यार्थी-सभकेँ प्रोत्‍साहन केलकनि‍। उपस्‍थि‍त श्रोता सभ नाटकक वि‍षय-वस्‍तुसँ काफी प्रभावि‍त भेलाह। जेकर कारण नाटकक भाषा सेहो स्‍पष्‍ट रूपमे देखार भेल।
ऐ नाटकक मंचनसँ आ श्रोता-दर्शकक उपस्‍थि‍ति‍ आ लगावसँ ई स्‍पष्‍ट देखार भेल जे जौं अहि‍ना मैथि‍ली नाटकक संचालन मि‍थि‍लाक गामपर हुअए तँ मैथि‍लीक वि‍कास माने मि‍थि‍लाक वि‍कासक प्रेमी-साहि‍त्‍यकार-अपन वि‍चारकेँ परोसबामे तेजी आनि‍ सकै छथि‍। प्रसाद पोनि‍हारक कमी नै अछि‍। हमहुँ अपना तरफसँ आदरनीय श्री बेचन जीकेँ धन्‍यवाद दै छि‍यनि‍ आ आशा करै छी जे आगूओ अहि‍ना अपन नाटकक माध्‍यमसँ समाजकेँ ओझल वि‍षय-वस्‍तुसँ सुगम भाषामे समै-समैपर अवगत करबैत रहताह।

जय मि‍थि‍ला! जय मैथि‍ली!!


ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
मिथिला चित्रकला (पेटिंग): भूत, वर्त्तमान आ भविष्य 
परिचय
५००० वर्ष पुरान भारतीय संस्कृति अपन आगामी पीढ़ी के परंपरा, आधुनिकता आ मूल्य प्रणालीक संयोजन सँ युक्‍त दिव्य मस्तिष्क देलक, जे समयक गति , बेर बेर भेल विदेशी हमला आ जनसंख्या मे पैघ वृद्धिक बावजूदो नीक सँ राखल गेल अछि । ई हुनका लोकनि कें विशिष्ट व्यक्‍तित्व देलक । २० वीं सदी अनेको क्षेत्र मे महत्वपूर्ण रहल आ एहि संबंध मे कलाक उल्लेख सेहो कएल जा सकैछ । २०वीं सदी मे बनल गीत, नाचक रूप, साहित्यिक काज आ कलाक काज मे नव अभिव्यक्ति आयल आ ई बात साबित भऽ गेल जे ई सदी नहि केवल मानवक इतिहास मे महान रहल वरन नव आविष्कार आ तेज नवीकरणक अवधि सेहो रहल । जहन कि कलाक सभ रूप पर्याप्त उपलब्धि प्रदर्शित कयलक, सिनेमा, पॉप म्यूजिक आर टेलीविजन वृत - चित्र एहेन नव कला रूप सेहो आविष्कृत आ लोक- प्रिय भेल । मिथिला चित्रकला (पेंटिंग ) जे मधुबनी चित्रकला (पेंटिंग) क रूप मे सेहो जानल जाईत अछि । मूल रूप सँ एहि क्षेत्रक सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा बनाओय जाइत अछि । एहि देशक महिला अति प्राचीन समय सँ विभिन्न रूपक रचनात्मकता मे स्वयं के संलग्न रखलनि । हुनक रचनात्मकताक सभ सँ नीक चीज प्रकृति, संस्कृति आ मानव मनोवृतिक बीच सम्बंध आछि । ओ ओही सामग्रीक उपयोग केलनि जे हुनका लग पास मे पर्याप्त मात्रा मे उपलब्ध छल । लोक चित्रकला आ कलाक आन रूपक माध्यम सँ ओ अपन इच्छा, सपना, आकांक्षा के व्यक्‍त कलनि आ अपन मनोरंजन सेहो केलनि । इ समानान्तर साक्षरता थिक, जेकरा द्वारा ओ लोकनि अपन सौंदर्यविषयक अभिव्यक्ति के व्यक्त केलनि । हुनक रचनात्मक कला स्वयं मे लिखनाईक शैली मानल जा सकैत अछि, जेकरा द्वारा हुनक भावना, आकांक्षा, वैचारिक स्वतंत्रता आदिक अभिव्यक्ति होइत अछि । हुनक पृष्ठभूमि, प्रेरणा, आशा, सौंदर्य विषयक सजगता, संस्कृति ज्ञान आदि हुनक सभ संभव कला मे व्यक्‍त भेल । हुनक कलाक विषय मे लिखबा आ गप्प करबा सँ पहिने हुनक आंतरिक संस्कृतिक स्तर आ सिखबाक तरीकाक विषय मे जानब आवश्‍यक अछि । ई आलेख महिला के केन्द्र बिन्दु मे राखि कें लिखल गेल अछि ।
एहि देशक कोनो क्षेत्र महिला रचनात्मकता सँ फ़राक नहि अछि । हम पंजाब मे फ़ुलकारी, गुजरात मे वारली, लखनऊ मे चिकन कशीदाकारी, उत्तर मे बुनाई, बंगाल मे कंथा, राजस्थान मे लघु चित्रकला, बिहारक मिथिला क्षेत्र मे सुजनी आ केथरीक रूप मे मिथिला चित्रकला (पेंटिंग) क उदाहरण देखैत छी ।
मिथिला पेंटिंग एहि क्षेत्रक महिला लोकनिक जीवंत रचनात्मक काज अछि । ई मुख्यत: मिथिलाक ग्रामीण महिला द्वारा कागज, कपड़ा, बन- बनायल पोशाक आदि पर चित्रित कएल गेल प्रसिद्ध लोकचित्र अछि । मूलत: ई मुसलमान सहित सभ जाति आ समुदायक महिला द्वारा प्राकृतिक रंग सँ देबार आ सतह पर बनाओल गेल लोकचित्र थिक । बाद मे किछ लोक एहि मे रूचि लेलनि आ महिला लोकनि के अपना कला कें देबार आ सतहक अलावा कैनवास पर उतारबाक प्रेरणा देलनि आ एहि रूप मे एहि कला कें कला जगत मे आ बाजार मे पहचान भेटलैक । एहि लोक कलाक अपन इतिहास, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, महिलाक एकाधिकार आ विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान अछि । मिथिला कतय अछि ? एहि भूमिक सांस्कृतिक अ ऐतिहासिक महत्व की अछि ? इ कला मिथिला मे विशेष रूपें किएक अछि ? एहि कला रूपक विषय मे किछु लिखबा सँ पहिने एहि प्रश्‍न समक उत्तर अपेक्षित अछि ।
भारतक पैघ शहर आ आधुनिक दुनिया सँ दूर एक सुंदर क्षेत्र अछि जे कहियो मिथिलाक रूप मे जानल जाईत छल । ई पूर्वी भारत मे स्थापित पहिल राज्य छल । ई क्षेत्र उत्तर मे नेपाल, दक्षिण मे गंगा, पश्‍चिम मे गंडक आ पूब मे बंगाल धरि पसरल मैदानी भाग अछि । वर्तमान बिहारक चंपारण, सहरसा मुजफ़्फ़रपुर, वैशाली, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सुपौल, समस्तीपुर, मुँगेर, बेगूसराय, भागलपुर आ पूर्णियाँ जिलाक भाग मिथिला अछि । ई पूर्णत: समतल अछि । एकर माटि दोमट अछि जे गंगा नदी द्वारा आनल गेल अछि । यदि मानसून मे विलंब भेल या कम वर्षा भेल तँ फ़सल मे रूकावट अबैत अछि । लेकिन यदि पानिक देवताक कृपा भेल तँ पूरा मैदन हरियरे हरियर रहैत अछि । मधुबनी पेंटिंगक हृदय स्थली अछि । एहि क्षेत्रक सघन हरियाली प्राचीन दर्शक लोकनि कें ततेक आकर्षित कयलक जे ओ एहि क्षेत्र के मधुबनी (मधुक जंगल ) कहलनि । आब इ जिला पेंटिंगक लेल सब सँ बेसी जानल जाइत अछि । एहि पौराणिक क्षेत्र मे राम (अयोध्याक राजकुमार आ विष्णुक अवतार) सीता सँ वियाह केलनि । सीताक जन्म हुनक पिता जनक द्वारा हर (हल) जोतबाक समय भेल । मिथिला ओ पवित्र भूमि अछि जतय बौद्ध धर्म आ जैन धर्मक संस्थापक आ संस्कृत शिक्षाक छह परंपरागत शाखाक विद्वान जेना कि याज्ञवल्क्य, वृद्ध वाचस्पति, अयाची मिश्र, शंकर मिश्र, गौतम, कपिल, सचल मिश्र, कुारिल भट्ट आ मंडन मिश्रक जन्म भेलनि । १४ वीं सदीक वैष्णव कवि विद्यापतिक जन्म मिथिला मे भेल जे अपन पदावलीक माध्यम सँ एहि क्षेत्र मे राधा आ कृष्णक बीचक संबंधक व्याख्या करैत प्रेम गीतक नव रूप के अमर बना देलनि । इएह कारण अछि जे लोक हुनका जयदेवक पुनर्जन्म रूप मे (अभिनव जयदेव ) स्मरण रखलक । कर्णप्योर (बंगालक एकटा शास्त्रीय संस्कृत कवि) अपन प्रसिद्ध भक्‍तिमय महाकाव्य "पारिजात हरण" मे मिथिलाक लोकक विद्वताक चित्रण केलनि । कृष्ण अमरावती सँ द्वारका जेबाक मार्ग मे एहि भूमिक ऊपर सँ उड़ैत काल सत्यभामा सँ कहलनि, "कमलनयनी ! देखू ई मिथिला थिक, जतय सीताक जन्म भेल । एतय विद्वान लोकनिक जीह पर सरस्वती सगर्व नचैत छथि (मिश्र, कैलाश कुमार २००० ) " । मिथिला एकटा अद्‍भुत क्षेत्र अछि जतए कला आ विद्वता, लौकिक आ वैदिक व्यवहार दुनू पूर्ण सौहार्द्र सहित संग संग चलैत अछि ।
पृष्ठभूमि
भारतक विविधता जेकाँ एकर लोक कला एहि देशक बहुविध संस्कृति के विभिन्न रंग द्वारा प्रदर्शित करैत अछि । ई कला (पेंटिंग) लोक कलाक समुद्रक रूप मे मानल जाइत अछि, जाहि मे प्राचीने समय सँ लोकप्रिय कला रचना भारतीय उपमहाद्वीपक हर भाग सँ अबैत रहल । भारतक कला मध्य मिथिला पेंटिंगक अपन महत्वपूर्ण स्थान अछि । मिथिला मे महिला देबार, सतह, चलायमान वस्तु आ कैन्वस पर पेंटिंग करैत छथि, माटि सँ देवता, देवी] जानवर आ पौराणिक पात्रक प्रतिमा बनबैत छथि; सिक्‍की घास सँ टोकरी, छोट- छोट वरतन और खिलौना बनबैत छथि, केथरी आ सुजनी बनेबाक रूप मे कशीदाक काज करैत छथि, वभिन्न तरहक धार्मिक आ काजक चीज बनबैत छथि । ई कलाक काज महिला द्वारा दैनिक काजक रूप मे कएल जाइत अछि, जे हुनका पूर्ण रचनात्मक व्यक्ति, एकटा गायक, मूर्तिकार, चित्रकार , कशीदाकार आ सभ किछु बनबैत अछि । पीढ़ी दर पीढ़ी मिथिलाक महिला विभिन्न विशिष्ट पेंटिंग बनेलनि अछि ।
चर्चा
मिथिला मे सामान्यतया पेंटिंग महिला द्वारा तीन रूप मे कएल जाइत अछि : सतह पर पेंटिंग, देबार पर पेंटिंग आ चलायमान वस्तु पर पेंटिंग । प्रथम श्रेणी मे अरिपन अबैत अछि जे सतह पर अरबा चाऊर (कच्चा चावल) क लई सँ बनायल जाईत अछि । सतहक अलावा एकरा केरा आ मैना पात आ पीढ़ी पर सेहो बनाओल जाइत अछि । एकरा दहिना हाथक आँगुरक प्रयोग सँ बनाओल जाइत अछि । तुसारी पूजा (कुमारि लडकी द्वारा नीक पतिक कामना सँ शिव और गौरी के प्रसन्न करबाक लेल त्योहार) क अरियन उज्जर, पीयर आ लाल रंगक चाऊरक चूर्ण सँ बनाओल जाइत अछि । विभिन्न अवसरक लेल विभिन्न तरह क अरिपन होईत अछि । अष्टदल, सर्वतोभद्र दशयत आ स्वास्तिक एकर मुख्य प्रकार अछि । देबार परहक पेंटिग अनेको रंगक होईत अछि । एहि मे मुख्यत: तीन सँ चारि रंगक प्रयोग होईत अछि । एहि मे नयना जोगिन, पुरैन, माँछक भार, दही, कटहर, आम, अनार आदिक गाछ आ चिड़ै जेना सुग्गाक चित्र बनाओल जाइछ । चलायमान वस्तु पर पेंटिंग मे शामिल अछि माटिक बरतन, हाथी, साभा- चकेबा, राजा सलहेस, बाँसक आकृति, चटाई, पंखा आ सिक्‍की सँ बनल वस्तु । एहि मे सँ कतेक पेंटिंग तांत्रिक महत्वक अछि । विवाह समारोहक दौरान किछु अवैदिक प्रथाक सेहो पालन सिर्फ़ महिला द्वारा कएल जाइत अछि जेना ठक- बक, नयना- जोगिन आदि, जे मिथिला तंत्र सँ संबंधित अछि ।
देवार परहक पेंटिंग आ सतह परहक पेंटिंग जे घर के सुन्दर बनेबाक लेल आ धार्मिक उद्देश्‍य सँ कएल जाईत अछि, महाकाव्य युग सँ चलि रहल अछि । तुलसीदास अपन महान काव्य रामचरितमानस मे सीता आ रामक वियाहक अवसर पर कएल गेल मिथिला पेंटिंंगक वर्णन केलनि अछि । राम आ सीतक सुंदर जोड़ी सँ प्रभावित भऽ कऽ गौरी वियाहक समारोह मे भाग लेलनि आ कोहबरक चित्रण करय चाहलनि जतय सुमंगलीक कें एहि आदर्श जोड़ीक लेल गीत आ संबंधित विध व्यवहार करक छलनि । एहि चित्रण मे परंपरागत चित्र, हिन्दू देवी- देवताक चित्र आ स्थानीय जीव-जन्तु आ वनस्पतिक चित्र बनाओल जाइत अछि । महिला कलाकार एहि कलाक एकमात्र अभिरक्षक छथि, जे ई चित्रण करैत छथि आ पीढ़ी दर पीढ़ी ई माय सँ बेटी के हस्तांतरित भऽ जाइत अछि । ओ एहि कला रूप कें प्राचीन समय सँ बचा कें रखने छथि । लड़की ब्रश आ रंग सँ नेने सँ काज करब शुरू करैत छथि जेकर पराकाष्ठा कोहवर में देखल जा सकैछ । वियाह सँ संबंधित सभ धार्मिक समारोह कोहबर मे होइत अछि । अहिवातक पातिल के चारि दिन लगातार जरा कऽ राखल जाइत अछि । मिथिला पेंटिंग (मधुबनी पेंटिंग) क वर्तमान रूप देबार पेंटिंग, सतह पेंटिंग केर कागज आ कैंपस पर रूपांतरण थिक । ई प्रयोग बहुत पुरान नहि अछि । २०वीं सदीक साठिक दशक मे भयंकर अकालक चुनौती कें सामना करक लेल महिलाक लेल काजक अवसर निमित्त किछु महिला लोकनि देबार आ सतह परहक अपन कला कें कागज या कैनवस पर उतारब शुरू केलनि । प्रारंभ मे एकरा देखवला कम लोक छल परन्तु बाद मे एहि मे वृद्धि भेल । एहि काज मे महिला लोकनि कें खूब सफ़लता भेटल आ व्यवसायक एकटा नव मार्ग खूजल । ताहि समय सँ पेंटिंग मे विविधता आएल अछि । देबार पेंटिंग के हाथ सँ बनल कागज पर हस्तांतरित कएल गेल आ धीरे- धीरे ई आन स्थान यथा ग्रीटिंग कार्ड, ड्रेस, सनमाइका आदि पर सेहो उतरल । नीक चित्रांकन, चमकदार स्वदेशी रंग, सभ संभव स्वदेशी प्रयोग आदि सँ पूरा दुनियाक दर्शक आकर्षित भेलाह । प्रारंभ मे किछु ब्राह्मण महिला कें एहि कला कर्मक अवसर देल गेल परन्तु १० वर्षक बाद किछु कार्यस्थ महिला एक नव रीतिक संग एहि क्षेत्र मे एलीह । एखन धरि हरिजन महिला एहि क्षेत्र मे नहि आयल छलीह । सीता देवी मिथिला पेंटिंगक ब्राहमण स्टाइल कें आगाँ बढ़ेलीह । एहि मे मुख्यत: कोहबर और देवी देवताक चित्र छल । बौआ देवी आ हुनक बेटी सरिता सेहो एहि क्षेत्र मे अपन पर्याप्त योगदान देलनि ।
कायस्थ महिला एहि क्षेत्र मे सेहो आगाँ अएलीह आ सतरिक दशक मे हुनक पहचान बनल । ओ लोकनि गाम आ धार्मिक दृश्‍य के पेंटिंग मे स्थान देलनि । गंगा देवी, पुष्पा कुमारी, कर्पूरी देवी, महासुन्दरी देवी आ गोदावरी दत्त प्रमुख कायस्थ महिला कलाकार छलीह । एहि दुनू वर्गक महिला कलाकार लोकनिक प्रयास सँ मिथिला कला कें मूर्त रूप भेटल ।
तेसर समूह हरिजन महिला १९८० क दशक मे आगाँ अयलीह । दुसाध आ चमार जातिक महिला लोकनि परंपरागत पेंटिंग क प्रयोग अपन धार्मिक काज आ घर-वार सजेबाक लेल करैत छलीह । ओ लोकनि गोदना आ अन्य चमकदार रंगक प्रयोग अपन पेंटिंग मे करय लगलीह । बाद मे एहि मे लाईन, तरंग, वृत आदि सेहो जुड़ि गेल। जमुना देवी आ ललिता देवी प्रसिद्ध हरिजन कलाकार भेलीह । ओ लोकनि पेंटिंग मे दैनिक जीवनक वस्तु जातक सेहो चित्रण करय यगलीह । आब तँ सभ जातिक लोक एहि कलाक उपयोग जीविका अर्जन निमित्त करैत छथि ।
सभ कलाकर लोकनि रंगक लेल मुखयतया प्रकृति पर निर्भर करैत छथि । ओ लोकनि माटि, छाल, फ़ूल , जामुन सँ कतेको प्राकृतिक रंग निकालैत छथि । रंग मुख्यत: लाल, नीला, हरिहर, कारी, हल्कापीयर, गुलाबी आदि होईत अछि । प्रारंभ मे घर मे बनाओल गेल रंग सँ काज चलैत रहल तथापि एहि विद्य सँ प्राप्त रंगक मात्रा कम होईत छल आ तें महिला लोकनि बाजार मे उपलब्ध रंगक प्रयोग करब सेहो शुरू केलनि ।
कोहबरक चित्रांकन पौराणिक , लोकगाथा आ तांत्रिक प्रतीक पर आधारित अछि । कोहबरक चित्रण नव जोड़ाक कें आशीषक निमित्त कएल जाईछ । एहि पेंटिंग मे सीताक वियाह या राधा कृष्णक चित्रांकन अछि । शक्‍ति भूमि हेबाक कारणें मिथिला पेंटिंग मे शिव, शक्‍ति, काली, दुर्गा, हनुमान , रावण आदिक चित्रण सेहो भेटैत अछि । उर्वरता आ संपन्नता प्रतीक यथा माछ, सुग्गा, हाथी, काछु, सूरज, चन्द्रमा, बाँस, कमल आदिक चित्रांकन प्रमुखता सँ होइत अछि । एहि पेंटिंग मे देवताक स्थान बीच मे आ हुनक प्रतीक, वनस्पति आदिक स्थान पृष्ठभूमि मे रहैत अछि ।
वाणिज्यीकरण सँ एहि कला कें नोकसान पहुँचल अछि । महिला आ पुरूष एहि कला के शहर आ नगरक बाजार सँ सीखि रहल छथि । प्रशिक्षण देनिहार स्वयं एहि कलाक तत्व आ सौंदर्य सँ अनभिज्ञ छथि । किछु गोटा तँ रंगक संयोजीकरण, प्रकृति सँ एकर प्राप्ति, पृष्ठभूमिक निर्माण, लय, रंग, गीत, विधि, नृत्य सँ एकर संबंध आ पेंटिंगक ढ़ंग सँ सेहो अपरिचित छथि । पेंटिंगक विषय बा डिजाइन आब अधिकांश मामिला मे खरीददार द्वारा निर्णीत होइत अछि । खरीददार केन्द्रित पहल एहि महान कला रूपक रंग, डिजाइन, मूल, संवेदना आदि पर खतरा अछि । हम देखैत छी जे तांत्रिक पेंटिंगक नाम पर महिला मिथिलाक परंपरा सँ बहुत अलग किछु बनवैत छथि । वाणिज्यिकरण सँ बहुतो पुरूष कलाकार सेहो एहि मे रुचि लेब शुरू केलनि अछि । ओ एहि मे महिलाक महत्व कें बुझने बिना पेंटिंग करैत छथि । ओ मिथिला पेंटिंगक नाम पर खरीदनाहारक जरूरतिक मोताबिक किच्छो पेंटिंग करक लेल तैयार रहैत छथि ।
लेकिन जहन हम लोक आ परंपरागत पेंटिंगक रूप मे मिथिला पेंटिंगक गप करैत छी , जे धार्मिक अवसर पर बनाओल जाइछ या भारतक कोनो धार्मिक पेंटिंगक गप करैत छी तँ हम देखैत छी जे एहि मे कतेको कार्यकलाप जूड़ल अछि । ई संयोजन वस्तुत: कला कें विशेष महत्व दैत अछि । अवधारणा आ अनुभवक आधार पर देखला सँ सभ स्थानीय, क्षेत्रीय, अखिल भारतीय आ भारत सँ बाहर कलाक अभिव्यक्ति आंतरिक मन सँ उभरैत देखाइत अछि आ जीवनक एकटा अभिन्न अंग अछि । पेंटिंग, गीत, नृत्य, कविता आ आन कार्यात्मक चीज कें पौराणिक कथा, धार्मिक रीति, त्योहार आ संस्कार सँ अलग कऽ कऽ नहि देखल जा सकैत अछि । जहन एकटा पेंटर देबार या सतह कें पेंट करैत रहैत छथि तँ अन्य महिला लोकनि गीत गाबि कऽ हुनका मददि करैत छथिन । लोक कथा सँ लेल गेल ज्ञान सेहो हुनका पेंटिंगक लेल विषय प्रदान करैत अछि । तांत्रिक पेंटिंग वस्तुत: मधुश्रावणीक कथा पर आधारित अछि । आ एहिना पेंटिंग आ आन कलाक संबंध कतेको लोक कला सँ अछि ।
एकटा महिला जहन देबाल पर चित्रांकन करैत छथि तँ ओ कतहु सँ आर्थिक लाभक आशा नहि करैत छथि । तथापि जहन ओ अपन पेंटिंग के बेचबाक लेल बनबैत छथि तँ हुनक पूरा ध्यान संस्कृति सँ ग्राहक दिस चलि जाईत अछि । तहन ओ परंपरा के जीवित रखबाक लेल पेंटिंग नहि करैत छथि, वरन जीविकाक लेल पेंटिंग करैत छथि । मिथिला सँ जीविकाक निमित्त सतत पलायन सेहो एहि पेंटिंग के बाहर अनलक अछि आ बाजार मे एकरा नव खरीददार भेटलैक अछि ।
किछु चित्रकार अर्थात कर्पूरी देवी, गंगा देवी आ जमुना देवी अपन खरिददारक जरूरतक अनुसार पहल केलनि अछि । गंगा देवी अपन पेंटिंग मे रामायण चित्र के उतार लनि अछि । गंगा देवी मधुबनी सँ अपन यात्रा शुरू केलनि । ओ इलाजक निमित्त दिल्ली एलीह । ओ अपन पेंटिंग मे रेलगाड़ी, डॉक्टर, अस्पताल, सीरिंज, मेडिकल वार्ड सभ किछुक चित्रांकन केलनि । हुनक पहल अनेको तरह सँ विशिष्ट छल । किछु लोक हुनक आलोचना केलनि जे एहि सँ मिथिलाक लोक चित्रांकन के हानि होएत, तठापि बहुतो लोक हुनक समर्थन केलनि ।
जमुना देवी आ हुनक भाई मितर राम चमकीला रंगक स्टाइलक विकास केलनि, जेकर बराबरी मिथिला कला मे नहि अछि । ओ स्वयंभू कलाकार छथि आ जानवर जेना कि गाय आदिक चित्रण सँ आनंदित होईत छथि । हुनक चित्रण परिपाटी सँ स्वतंत्र अछि । तठापि ओ रंगक प्राप्ति, कैनवासक पृष्ठभूमिक निर्माण, सजीव चित्रांकन आदि मे परंपराक पालनक प्रति दृढ़ छथि ।
इ चित्रकार लोकनि भूकंप, नदी आ आन कोनो वस्तुक चित्रांकन करैत छथि, जे ग्राहक हुनका सँ चाहैत छथि । जितवारपुर आ राँटी गाम मे मिथिला पेंटिंग वाणिज्यिक कार्यकलापक रूप मे उभरल अछि । जहन हम हाले मे जितवारपुर गेलहुँ तँ देखलहुँ जे जमुना देवी १५ सँ बेसी छात्र के, जे हरिजन सँ लऽ कऽ ब्राह्मण परिवार सँ छल, पढ़बैत छलीह । पुछला पर ओ उत्तर देलनि, "हम एकरा सभ के माय जेना पढ़बैत छियैक । ई सभ एहिठाम अपन घर जेकाँ अनुभव करैत अछि । हम एकरा सभ सँ कोनो फीस नहि लैत छियैक । अगर हम फीस लेबैक तँ हमर कला गंदा भऽ जायत । सब सँ उत्तम पुरस्कार हमरा लेल इ अछि जे जहन कोनो ब्राह्मण लड़की अपन प्रशिक्षण पूरा केलाक बान हमर पयर छुबैत अछि तँ हम ओकरा हृदय सँ आशीष दैत छियै आ एकटा प्रमाणपत्र सेहो दैत छियैक।"
मिथिला पेंटिंग कला सँ उपर अछि । एहि रचनात्मक क्षमता सँ महिलाक एक समूह अपन इच्छा, सपना, आकांक्षा, आशा आदि कें व्यक्त करैत छथि । यदि अहाँ हुनका सँ पुछबनि जे की कऽ रहल छी तँ उत्तर भेटत "गहबर या कोहबर लीखि रहल छी"। हुनका लोकनिक लेल हुनक स्टाइल एक तरहक लिपि थिक, जेकरा माध्यम सँ ओ पुरुष समुदाय या दुनियाक बाँकी लोक सँ संवाद करैत छथि । ओ कलात्मक लेखक छथि जे अपन भावना के पेंटिंगक माध्यम सँ लिखैत छथि । वस्तुत: ओ सृजनकर्ता आ ईश्वरक समीप छथि । आर्थिक युगक कारणें यद्यपि किछु पुरुष-पात सेहो एहि क्षेत्र मे उतरलह अछि, परंतु मूलत: आईयो ई महिलाक रचना थिक ।
निष्कर्ष
यदि भरत नाट्यम, मनिपुरी, कुचीपुड़ी, ओडिसी आ सतरिया नृत्य के मूल रूप मे रखैत दिनानुदिन लोकप्रिय कएय जा स्कैत अछि, तँ एहि महान लोक चित्रकला के मूल रूप मे किएक ने राखय जा सकैत अछि? कला वस्तु के बेचनाई खराब नहि थिक, तथापि खरीददारक समक्ष कलाक संपूर्ण परंपरागत रचनात्मकता आ मूल्यक समर्पण ठीक नहि थिक । मिथिला पेंटिंगक मूल रूप मे बचा दऽ रखबाक लेल गभीर चिन्तनक आवश्यकता अछि । अन्वेषणकर्ता, गैर सरकारी संगठन पेशेवर, लोक कलाकार आ संबंधित व्यक्ति के एहि कलाक मौलिकता बचेबाक लेल एकजुट भऽ जेबाक चाही।

 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. कैलाश कुमार मि‍श्र
कथा: प्रकृति‍ सुन्‍दरि‍ आ चूहर मि‍स्‍त्री



छोटानागपुर अर्थात आजुक झारखण्ड केर धरती, पहाड़, झरना, जंगल, नदी वन्‍यजीव आ अन्‍तत: नि‍श्छल नि‍ष्‍कपट जनजाति‍सँ हम जेना नेनपनेसँ एक अटूट सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त कऽ लेने रही। हरदम अपना-आपकेँ जनजातीय वर्गक बच्‍चा एवं उमरगर लोक सभ लग हम सुरक्षि‍त अनुभव करैत रही। कुनो संशय अथवा भय कहि‍यो नै भेल।

मुदा जखन-जखन माए हमरा सभ लग सेन्‍हा रहय लेल अबैत छलीह तँ अनेरे परेशान भऽ जाइत छलीह। हम्‍मर माएकेँ अगल-बगलक स्‍त्रीगण सभ कहलकनि‍ जे अतए केर आदि‍वासी, वि‍शेष रूपेँ उराँव धानक बीया छीटैसँ पहि‍ने ग्राम्‍य देवता, स्‍थान देवता, कृषि‍ देवता एवं कुल देवताकेँ प्रसन्न करबाक लेल प्रथम सात बाकुट धानकेँ मुर्गा, कुनो आरो चि‍ड़ै, चाऊरसँ निर्मित स्‍थानीय शराब - हंड़ि‍या    अन्‍तत: मनुक्‍खक शोनि‍तसँ सानि‍ ओइकेँ अभि‍मंत्रि‍त कए ओकरा सर्वप्रथम गामक प्रधानक हाथसँ खेतमे बाउग करैत अछि‍। मनुक्‍खोमे बच्‍चा सभकेँ खूनक प्रयोगक उत्तम मानल जाइत छैक। ऐ लेल चोरा कऽ कुनो बच्‍चाकेँ पकड़ि‍ ओकर  घेटक टेटुआकेँ तेजगर चक्कूसँ काटि‍ ओकर रक्‍तकेँ बांसक  फोफीमे  निकालि‍ ओइ रक्‍तसँ पूजा कएल जाइ छै। ऐ प्रक्रि‍यामे जै बच्‍चाकेँ गर्दनि‍केँ टेटुआकेँ काटल जाइ छै तकर मृत्‍यु ओतहि‍ भऽ जाइ छै। टेटुआकेँ पूजामे प्रयुक्‍त होबाक हेतु काटक परम्‍पराकेँ स्‍थानीय भाषामे ओरका कहल जाइ छै। हलांकि‍ अप्‍पन जीवनक 23 वर्ष धरि‍ हम कहि‍यो कुनो घटना अपना आँखि‍सँ नै देखलि‍ऐक। लोक-सबहक मुँहेँ ऐ वि‍षयमे चर्चा करैत अनेको बेर सुनने अवश्‍य रही।

हम्‍मर कारी भेनाइ शाइद हमरा लेल एकटा वरदान छल। छोटानागपुरक आदि‍वासी सभ हमरा कारी होबाक तथा घुरमल-घुरमल केस होबाक कारणे अपने समुदायक सदस्‍य बुझैत छल। उपरसँ सेन्‍हा तथा सेन्‍हाक अगल-बगलक लगभग 15 गाममे आदि‍वासी महि‍ला सभ चर्खा चलबैत छलीह। पि‍ताजी खादी भंडारक व्‍यवस्‍थापक छलाह, तै कारणे सेहो आदि‍वासी-महि‍ला-पुरूष हमरा बड्ड सि‍नेह करैत छल। हम सदति‍काल कोनो-ने-कोनो बहाना बना गामे-गाम घुमैत छलहूँ। कखनो-काल माए सेहो कहैत छलीह- जो राधव, बगलक आदि‍वासी गामसँ खेतक टटका हरि‍यर तरकारी लऽ आ।‍

आ हम अही सभ चीजक फि‍राकमे रहि‍ते छलौं चटदनि‍ कुनो आदि‍वाी गाम दि‍स वि‍दा भऽ जाइत रही।

केवल धनरोपनीक समैमे हमर माए साकांक्ष भऽ जाइत छलीह। साफे मना कऽ दै छलीह- देख राघव, कुनो परि‍स्‍थि‍ति‍मे भरि‍ रोपनी तों कुनो गाम दि‍स नै जएबैं। हमरा कतेको लोक सभ कहलक अछि‍ जे अही समैमे आदि‍वासी सभ ओड़का पूजै छै। हम तोरा पि‍ताजीकेँ सेहो बुझा देने छि‍यनि‍ जे ऐ एक-डेढ़ मास धरि‍ तोरा कतौ असगरे नै भेजथुन्‍ह।‍

हम्‍मर परि‍वारमे माइक आज्ञाक अवहेलना करबाक हि‍म्‍मत हमर कुनो भाए-बहि‍नकेँ नै छल। पि‍ताजी सेहो हरदम माइक बातकेँ सर्वोपरि‍ मानैत छलथि‍न। हमरा लेल तँए ओ एक-डेढ़ मास बड्ड बेकार होइत छल। हम रोपनीक समैमे अपना-आपकेँ  जहलमे कैद, लाचार अपराधी मानै छलौं। मुदा दोसर कुनो उपायो तँ नै छल।
आदि‍वासी महि‍ला सभ चर्खा हमर पि‍ताजीक अथक प्रयासक कारणे कटनाइ प्रारम्‍भ केलनि‍। हुनका सभकेँ हरेक पनरह दि‍नपर  सेन्हा खादी भण्‍डारपर बजा कऽ बीट करा कऽ तूरक पोला देल जाइत छलनि‍। पोला जोखि‍ कऽ देल जाइत छलैक। जखन महि‍ला सभ ओइ पोलाकेँ चरखापर चढ़ा ताग बना लैत छलीह तँ हरेक 15 दि‍नपर ओइ तागकेँ जोखि‍ कऽ खादी भण्‍डारमे लऽ लेल जाइत छलैक। मि‍हनताना तागक एकबद्धता तथा सूक्ष्‍मताक आधारपर देल जाइत छलैक। सूक्ष्‍मताक माप 40 अंकसँ प्रारंभ भऽ 160 अंक धरि‍ चलैत छलैक। जतेक कम अंक भेटतैक ततेक मोट आ उखरल सूत मानल जेतैक। कि‍छु एहेन बेबस्‍था छलैक। आ जतेक पातर आ समरस हेतैक ततेक बेसी नम्‍बर भेटतैक अर्थात् ई जे कम नंबर वालीकेँ कम मि‍हनताना जा ज्‍यादे पातर या सूक्ष्‍म ताग तैयार करैवालीकेँ ज्‍यादे मि‍हनताना।

चर्खाक मरम्‍मत, रखरखाव, लोक सभकेँ  सेन्हा मुख्‍य खादी भण्‍डार तथा गाम-गाम जाइक जानकारी देबाक जि‍म्‍मेवारी खादी भण्‍डारक छलैक। खादी भण्‍डारमे ई कार्य एकटा कार्यकर्ता श्री मंगनू ठाकुर करैत छलैक। मंगनू ठाकुरक अवस्‍था ओइ समए करीब 52 वर्ष छलैक। ओ जाति‍केँ बढ़इ तथा समस्‍तीपुरक कुनो गामक छल। दुबर-पातर चेरा सन शरीर आ श्‍याम बरण केर छल ंगनू ठाकुर। नशामे केवल तम्‍बाकू चुसै छल। महा कंजुस। सदति‍काल पैसा बचेबाक प्रवृत्ति‍मे मग्‍न रहैत छल। ओकर जेठ बेटाक वि‍याह-दान भऽ गेल रहैक। खादी भण्‍डारक तमाम चर्खा तथा ओकर कल-पूर्जाक बड्ड नीक जानकारी छलैक मंगनू ठाकुरकेँ। अपन धंधा अर्थात चर्खा वि‍शेष रूपसँ अम्‍बर तथा पेटी चर्खाक महारथी छल ओ। यएह कारण छलैक जे हमर पि‍ता ओकरा दोसर ठामसँ स्‍थानान्‍तरण करा अपना लग सेन्‍हा अनने छलथि‍न। इम्‍हर पाँच वर्षमे दू बेर मंगनूकेँ स्‍थानान्‍तरणक आदेश प्रधान कार्यालय, छोटानागपुर खादी ग्रामोद्योग संस्‍थान, तिरील, राँचीसँ अएलैक मुदा दुनू बेर हमर पि‍ताजी अपन प्रभुत्‍वक बलपर ओकरा सेन्‍हासँ कतौ आनठाम नै जाए दलथि‍न।

जनजातीय समुदायसँ हमर आत्‍मीयता बढ़ाबैमे मंगनू ठाकुर केर भूमि‍का बड्ड पैघ रहल छैक। ओ अनेको जनजातीय गाम सभमे जखन चर्खा निरीक्षण मे जाइत छल तँ हमरा कहैत छल- बउओ, अहूँ चलब?

आ हम अपन माए लग नि‍वेदन करए लगैत छलौं। मंगनू दरवारी प्रवृति‍क आरमी छल। ओकरा बूझल रहैक जे अगर मैडम (हमर माए) प्रसन्न रहती तँ मैनेजर साहेबसँ कुनो कार्य आसानीसँ भऽ जाएतेक। आ माएकेँ प्रसन्न करबाक लेल हमरासँ पैघ कुनो हथि‍यार नै भऽ सकैत छलैक ओकरा लेल। ओ माए लग आबि‍ कहए लागैत छलैक- जाय दि‍यौक बउओकेँ मैडम!‍ कुनो दि‍क्कत नै हेतैक। हम अपना संगे साइकिलपर बैसा कऽ लऽ जाइत छि‍यैक आ अपने संगे तीन-चारि‍ घंटाक भीतर वापस लेने अएबैक। अतए ओहुना तँ बच्‍चा सभसँ मारि‍-पीट करैत रहैत अछि‍। ओतए लोक सभ लग एकर मोनो बठा जेतैक।

अन्‍तत: हमर माए कि‍छु ना-नुकुर केलाक बाद मंगनू हमरा लऽ जेबाक हेतु अनुमति‍ दऽ दैत छलथि‍न। पि‍ताजीसँ आज्ञा लेबाक कहि‍यो प्रयोजन नै परल। ओ हमरा प्रति‍ हरदम लि‍बरल रहैत छलाह। आ ऐ तरहेँ हम अनेको बेर सेन्‍हाकेँ अगल-बगलमे बसल जनजातीय गाम सबहि‍क भ्रमण मंगनू ठाकुर संग करैत रही। साइकि‍लक पाछाँमे बैस कऽ पहाड़ी इलाकामे भ्रमण करबाक एक अलग तरहक आनन्‍द अबैत छैक- परमानन्‍द! उबर-खाबर पगडंडी, ऊँच-नीच रस्‍ता। कतेको ठाम मंगनू ठाकुर साइकिल चलबैत-चलबैत हॉफय लगैत छल। कतेकोठाम ओकरा इंच चढ़ाइपर डबल लोडमे साइकिल नै हॉकल होइत छलैक। ऐ स्‍थि‍ति‍मे साइकिलपर सँ अपनो उतरि‍ जाइत छल आ हमरोसँ पैघ आत्‍मीय ढंगसँ कहैत छल- बौआ, उतरि‍ जो। आगाँ बड्ड चढ़ाइ छैक। जखने चढ़ाइ समाप्‍त भऽ जेतैक तखने पुन: साइकिलपर हमरा लोकनि‍ चढ़ि‍ जाएब।‍

हमर चंचल मोन मंगनू ठाकुरकेँ ऐ तरहक प्रस्‍ताव बि‍ना कुनो प्रश्‍न आ उत्तरक मानि‍ जाइ छल। हम तुरन्‍ते साइकिलपर सँ उतरि‍ जाइत रही। आ जखने चढ़ाइ समाप्‍त होइत छलैक तँ हमरा साइकिलकेँ पाछाँमे बैसा ढलानपर मंगनू मस्‍तीमे एक-आध पैडल मारि‍ साइकिलपर झुमैत हर-हराएल चलल जाइत छल। मुदा एहेन रास्‍ताक लेल साइकिलकेँ पछुलका  आ अगुलका दुनू ब्रेककेँ बि‍ल्‍कुल फीट आ टंच भेनाइ जरूरी, जैसँ कुनो बेलैंस बि‍गड़लापर अथवा रस्‍तामे कुनो तरहक बाधा अक्‍समात अएलापर साइकिल सवार ब्रेक मारि‍ अपन तथा अन्‍य लोकक सुरक्षा कऽ सकए। एक बेर तँ हम कालक गालमे जाइत-जाइत बचि‍ गेल रही। भेलै ई जे हम्‍मर साइकिलकेँ दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहए। हम एकटा बि‍ल्‍कुल नीचा दि‍स ढलकैत सड़कपर अपन साइकिल चलेने तीव्र गति‍सँ जाइत रही। साइकिलकेँ आरो तेज करबाक रोमांसमे रोमांचि‍त होइत हम आरो जोर-जोरसँ पैडलकेँ अपन पएरसँ चलाबए लगलौं। लगैत छल साइकिलकेँ बदला कुनो फटफटि‍या चला रहल छी। एकाएक नीचामे टी  प्‍वाईंट-क्रॉस सेक्‍सन-पर एकटा ट्रक तेजीसँ जाइत रहैक। हम ट्रकक बि‍ल्‍कुल लग आबि‍ गेल रही। झटाक दऽ ब्रेक मारि‍ साइकिलकेँ काबूमे करबाक प्रयास केलौं। मुदा बेकार। ब्रेक कार्य नै केलक। आब लागल जे मृत्‍यु अवि‍श्‍यम्‍भावी अछि‍। मुदा के नै अपन प्राणक रक्षा करए चाहैत अछि‍? हमहूँ बि‍ना एकौ क्षण बरबाद केने टांग-हाथ, मुँह-कान टुटबाक चि‍न्‍ता केने चलैत साइकिलपर सँ कुदि‍ गेलौं। साइकिलकेँ एना धक्का देलि‍यैक जैसँ ओ  कातक खत्तामे खसि‍ गेलैक। हम स्‍वयं सड़कक कछेरमे खसलौं। पाँच मि‍नट धरि‍ कि‍छु पते नै चलल। जखन होश आएल तँ देखलौं जे हमर पि‍ताक एक मि‍त्र हमरा लग बड़ा चि‍न्‍ति‍त अवस्‍थामे ठाढ़ छथि‍। हुनकर चेहरापर क्रोध स्‍पष्‍ट परि‍लक्षि‍त छलनि‍। हमरा लागल जे आब ई हमरा नीक जकाँ बेइज्‍जत करताह। मुदा से नै भेल। ओ केवल अतवे कहलनि‍- राघव, आइ अहाँ कालक गालसँ बचि‍ गेलौं। बच्‍चा छी बच्‍चा जकाँ साइकिल चलाउ।‍
हम पश्चातापक स्‍वरमे कहलि‍यनि‍- की कहु काकाजी, एकाएक ब्रेक कार्य केनाइ बन्‍द कऽ देलक। साइकिलमे दुनू ब्रेक ढील भऽ गेल रहैक तकर जानकारी हमरा नै छल। आब जि‍न्‍दगीमे एहेन गलती नै करब।‍
ओ कहलनि‍- कुनो बात नै। पहि‍ने उठि‍ कऽ ठाढ़ होउ। देखू कतौ चोट तँ नै आएल अछि?
ई कहैत ओ हमरा उठबए लगलाह। मुदा हम अपने फुरफरा कऽ उठलौं। खास चोट नै लागल छल। केवल ठेहुन आ कौहनी कनी छि‍ला गेल रहए। साइकिल उठेलौं तँ ओकर हैंडल कनी टेढ़ भऽ गेल रहैक। काकाजी साइकिलकेँ ठीक करैमे मदति‍ केलनि‍ मुदा कहलनि‍- राघव, पहि‍ने अहाँ साइकिलक ब्रेक ठीक कराउ तखने ऐपर चढ़ब।‍

हम अपन गर्दनि‍ हि‍ला हुनकर आज्ञा मानबाक स्‍वीकृति‍ दैत साइकिल गुड़कबैत लऽ गेलौं।

चली आब कथाक प्रसंग दि‍स। मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा बच्‍चा सभ लग छोड़ि‍ स्‍वयं घरे-घरे लोकक चर्खाकेँ मरमम्‍ति‍ करए लगैत छल। लोक सभ हमरा बड्ड सि‍नेह करैत छल। हमर घरक नीपा-पोता तथा बरतन-बासन धोइवाली चेरी जकरा झारखण्‍डमे लोक दाई' कहै छैक, एक उराँव महि‍ला  छलि‍।  ओकर बेटा-बेटी हमरा संगे खेलाइत छलैक। दाइ सेहो हमरा माइये जकाँ सि‍नेह करैत छलि‍ आ हमर धि‍यान रखैत छलि‍। ओकरा सबहि‍क संगति‍मे हम उराँव भाषा धाराप्रवाह बाजब सीख गेल रही। तँए कुनो उराँव बहुल गाम अथवा इलाकामे हमरा सम्‍प्रेषणमे कुनो तरहक समस्‍या नै छल। बीच-बीचमे मंगनू ठाकुर हमर खोज-खबरि‍ लैत रहै छल। वापस जाइकाल हमरा लोकनि‍ अपना संगे बहुत रास हरि‍यर तरकारी, फल इत्‍यादि‍ लऽ जाइत रही।

जे महि‍ला सभ चर्खा कटैत छथि‍, तनि‍का लोकनि‍केँ खादी भण्‍डारक शब्‍दवलीमे कति‍न' कहल जाइत छलैक। ओ सभ हरेक पन्‍द्रह दि‍नपर अपन काटल सूत-ताग-लऽ सेन्‍हा अबैत छलि‍। बीटमे सूतक नम्‍बरक आधारपर ओकरा सभकेँ मेहनताना देल जाइत छलैक। कुल आयमे सँ बांगक पैसा काटि‍ लेल जाइत छलैक आ बचल आमदनीकेँ चारि‍ अना हि‍स्‍साक खादी भण्‍डारमे जमा कऽ लेल जाइत छलैक, जकरा एवजमे ओ सभ साल भरि‍क भीतर कखनो कुनो खादीक वस्‍त्र यथा चद्दरि‍, कम्‍बल, धोती, कुर्ता, लुंगी, ओछाइन इत्‍यादि‍ किंवा वस्‍तु जेना कि‍ सरि‍सबक तेल, मधु, साबुन, अगरबत्ती आदि‍ लऽ सकैत छलि‍। बाद बाकि‍ बारह अना हि‍स्‍साक पैसा तुरत भुगतान हमर पि‍ताजी अपना सामने करबा दैत छलथि‍न।

ओइ कति‍न सभमे एक कति‍न छलैक- राजकुमारी। ओ सेन्‍हासँ करीब 8 कि‍लोमीटर दूरक गामसँ पन्‍द्रह दि‍नपर पैदल आबैत रहैक मुदा ओकर वि‍याह नै भेल रहैक। बाइस वर्खक अवस्‍थामे ओकरा वि‍याह नै भेल रहैक से कुनो आश्चर्यक बात नै रहैक। कारण ई जे उराँव जनजाति‍क लोक पूरा वएस भेलाक बादे अपन लड़का अथवा लड़कीक वि‍याह करैत अछि‍। राजकुमारी बड़ा शांत आ गंभीर स्‍वभावक महि‍ला छलि‍। चेहरामे हरदम एक प्रकिर्तिक हंसिक भाव लेने तथा चुपचाप अपन काजमे मग्‍न। यएह छलैक राजकुमारीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व। ओ सांवरि‍ छलि‍। नाक कनि‍ पीचकल, चाम अन्‍य आदि‍वासी वालाक तुलनामे कनी साफ, कनी चमकगर, कनी रमनगर। वस्‍त्र ओ बड़ा तल्‍लीनतासँ धारण करैत छलि‍। कहि‍यो ओकरा उटपटांग वस्‍त्र पहि‍रने तथा अपन शरीक कुनो अंगकेँ देखार केने नै देखलि‍ऐक। राजकुमारी स्‍वभावसँ अतेक शांत छलि‍ जे अगर ओकरा संगे वार्तालाप केनि‍हार दस आखरि‍ बजैत तँ राजकुमारी एक आखरि‍। मुदा ओ अपन उपस्‍थि‍ति‍सँ लोककेँ अवश्‍य प्रभावि‍त करैत छलि‍। राजकुमारी सेन्हा मि‍डि‍ल स्‍कूलसँ सातवी धरि‍ पढ़लि‍ छलि‍। आगा शायद आर्थिक तंगी आ अगल-बगलमे हाइ स्‍कूल नै हेबाक कारणे नै पढ़ि‍ सकलि‍। हमरा आश्चर्य हरदम ऐ बातक होइ छल जे ओकर नाम राजकुमारी  कियाक छलैक। एक दि‍न यएह प्रश्न हम अपन पि‍तासँ पुछलि‍यनि‍। हमर पि‍ता कहलाह- राजकुमारीक माता-‍पि‍ता कुनो वि‍शेष कारणसँ एकर नाम राजकुमारी राखि‍ देने हेथि‍न।

मुदा अपन पि‍ताक जवाबसँ हम संतुष्‍ट नै भेलौं। हमर पि‍ता सेहो बुझि‍ गेलनि‍ जे राघव ऐ उत्तरसँ संतुष्‍ट नै अछि‍। हमर पि‍ता हमरा लोकनि‍क प्रसन्नतासँ आनन्‍दि‍त आ हमरा लोकनि‍क कष्‍टसँ दुखी होइत छलाह। ओ झटदनि‍ कहलनि‍- ठीक छै राघव। अहाँ चि‍न्‍ता नै करू। ई प्रश् हम राजकुमारीक पि‍ता करमा उराँवसँ पुछबैक। फेर अहाँकेँ बताएब।‍

एक दि‍न जखन राजकुमारी अपन पि‍ताक संग खादी भण्‍डार आयलि तँ हम दौगल अपन पि‍ताजी लग गेलौं। हमरा देखते पि‍ता जीकेँ याद एलनि‍। ओ हमरा दि‍स देखैत हँसए लगलाह आ करमा उराँवकेँ पुछलखि‍न- करमा उराँवजी, अहाँ अपन बेटीक नाओं राजकुमारी कि‍एक रखलौं?

करमा उराँव कहलकनि‍- श्रीमान, हमरा सेन्‍हा स्‍कूलक हेड मास्‍टर एकटा बड्ड सुन्‍दर कथा सुनौलनि‍। ओइ कथाक मुख्‍य पात्र एक गंभीर आ सुन्‍दरि‍ कन्‍या छलैक। ओइ पात्रक नाओं छलैक राजकुमारी। ई नाम जेना हमरा हृदेमे रचि‍-बसि‍ गेल। ओइ कथाक दू वर्षक वाद जखन भगवान हमरा बेटी देलनि‍ तँ हम झटदनि‍ एकर नाओं राजकुमारी राखि‍ देल। श्रीमान, नामे अनुसार एकर व्‍यक्‍तत्‍व भऽ गेल छैक। बड्ड गंभीर, बुझनुक आ‍ मि‍लनसार अछि‍ हमर राजकुमारी। बेटा नालायक भऽ गेल अछि‍। सदति‍काल नशामे धूत्‍त रहैत अछि‍। मुदा हमर ई बेटी बेटोक भूमि‍का करैत अछि‍ हमरा सभ लेल। ऐ सभ कारणे एकर वि‍याह एखन धरि‍ टालि‍ रहल छी। अनेको रि‍श्‍ता लड़काबलासँ आबि‍ रहल अछि‍। मुदा डर भऽ रहल अछि‍ जे कहीं ई चलि‍ गेल तँ हमर सभकेँ की हाल हएत? इहो कहैत अछि‍, बाबा! हमरा ि‍वयाह नै करक अछि‍। हम अहाँ सबहक सेवा करए चाहै छी। मुदा श्रीमान एना कहीं भेलैक अछि‍? ि‍वयाह तँ करेबे करबै। राजकुमारीक माए हमरा आब सदति‍काल खोचारैत रहैत छथि‍ : कहै छथि‍ कि‍यो बेटीकेँ भला अपना सुख लेल बि‍ना ब्‍याहने अपना लग जि‍नगी भरि‍ रखै छै? लोक की कहत? राजकुमारी नेनमति‍मे ई बात कहि‍ रहलि‍ अछि‍ जे वि‍याह नै करब। हमरा अहाँकेँ मृत्‍युक पश्चात एकराकेँ देखतैक? आ श्रीमान हमरा राजकुमारीक मायकेँ बात कुनो अनरगलो नै लगैत अछि‍। हम तँ राघवजीक माएसँ सेहो निवेदन केलि‍यनि‍ अछि‍ जे ओ राजकुमारी के  वि‍याह लेल मनाबथि‍। राजकुमारी अहाँ लोकनि‍केँ बात मानैत अछि‍।

पि‍ताजी राजकुमारीक पि‍तासँ वार्तालाप चलि‍ रहल छलनि‍। आब हमरा राजकुमारीक नामक रहस्‍यक पता चलि‍ गेल छल। राजकुमारी एहेन संस्‍कारी बेटी अछि‍ जे अपना माता-पि‍ताक कारण वियाहो नै करय चहैत अछि‍, ई जानि‍ राजकुमारीकेँ प्रति‍ हम्‍मर श्रद्धा बढ़ि‍ गेल। हमर पि‍ता सेहो राजकुमारी आ ओकर व्‍यक्ति‍वसँ बड्ड प्रभावि‍त भेलाह।

क्रम अहि‍ना चलैत रहलै। कि‍छु दि‍नक बाद हम एक दि‍न ई अनुभव केलौं जे मंगनू मि‍स्‍त्री राजकुमारी दि‍स किछु बेसी आकर्षित भऽ रहल छल। ठीक एकर वि‍परीत राजकुमारी ओकरासँ दूर हेबाक प्रयास। जखन हमरा मंगनू मि‍स्‍त्री देखलक तँ ओकरा अपन गलतिक  अनुभूति‍ भेलैक। कहलक- बौओ। अहाँकेँ मैनेजर साहेब ताकि‍ रहल छलाह। हमरो पुछैत छलाह कि‍ राघव कतए गेल अछि‍? अहाँ जल्‍दीसँ हुनका लग जाउ। शायद कि‍छु अत्‍यावश्‍यक कार्य छन्हि‍। जाउ बउओ जल्‍दी जाउ। "

हमरा भेल जे पि‍ताजी हमरा तकने हेताह। आ हम तुरत पि‍ताजी लग वि‍दा भेलौं। हम जखने पि‍ताजी लग जाए लग्लौं तँ मंगनू मि‍स्‍त्रीक मोन प्रसन्न भऽ गेलैक आ राजकुमारी कि‍छु परेशान आ वि‍वश बुझना गेल। तथापि‍ हम पि‍ताजी लग चलि‍ गेलौं। आब चर्खाक कार्यशाला मे राजकुमारी आ मंगनू मि‍स्‍त्रीकेँ अलावे कि‍योक नै छलैक‍!

राजकुमारीक व्‍यक्‍ति‍वमे कि‍छु वि‍शेष अवश्‍य छलैक। ओ हमेशा बड्ड साफ-स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण केने रहैत छलि‍। ओकर केश बड्ड नमहर आ झमटगर रहैक। आँखि‍ छोट मुदा पनि‍गर, दाँत दूध जकाँ उज्‍जर सफेद, गसल-गसल, शरीर ने मोटे आ ने पतरे, कद करीब पाँच फीट-पाँच ईंच। कनीक शि‍क्षा प्राप्‍त करबाक कारणे राजकुमारी स्‍नो-पोडर इत्‍यादि‍ लगबैत छलि‍। ओ आन आदि‍वासी लड़की सभ जकाँ अपन शरीरमे कतौं गोदना नै गोदेने छलि‍। ओकर हाथ, गर्दनि‍, छाति‍क कि‍छु भाग, नाभि‍ प्रदेशक ि‍कछु भाग आदि‍ देखलासँ एना बुझना जाइ छलैक जेना ओकर समस्‍त शरीरमे कुनो दाग वा धब्‍बाक नामो नि‍शान नै छैक- Spotless beauty!!! ओ हमरा हरदम अप्‍पन छोट भाए जकाँ सि‍नेह करैत छलि‍। यदा-कदा हमराले अपन गामसँ मधु, आम, खीरा, ककरी, नेबो एवं अन्‍य चीज अवश्‍य आनैत छलि‍।

एक दि‍न मंगनू मि‍स्‍त्रीक संगे हम पुन: साइकिलपर चढ़ि‍ राजकुमारीक गाम घुमए गेलौं। मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा गामक मध्‍यमे बच्‍चा सभ लग छोड़ि‍ देलक। हमहुँ ओइ बच्‍चा सभ संगे पाकल-पाकल बीजू आम तोरए लगलौं। एक कतीन बड्ड सि‍नेहसँ अप्‍पन बारीसँ कुन्‍दरी देलक आ कहलक- राघव, अहाँ ई कुन्‍दरी मैनेजर साहेबले लेने जाउ। हुनका नीक लगै छन्‍हि‍।

हम कुन्‍दरीबला झोरा उठा लेलौं। पता चलल जे मंगनू राजकुमारीक घर गेल अछि‍ ओकर चरखा ठीक करक हेतु। हमहुँ एक हम-व्‍यस्‍क आदि‍वासी कि‍शोर संगे राजकुमारीक घर दि‍स वि‍दा भेलौं। हमरा लोकनि‍केँ रस्‍तामे राजकुमारीक पि‍ता करमा उराँव भेटल। ओ कहलक- राघवजी, हम तँ जंगल  दि‍स जाड़नि‍ लाबए जा रहल छी। मि‍स्‍त्री साहेब हमरे घरमे राजकुमारीकेँ चरखाक भाङठी कऽ रहल छथि‍। अहूँ सभ ओतए जाउ। करमा उराँव अप्‍पन हाथमे तेजगर आ भरि‍गर कुरहरि‍ लेने छल। ओकर पत्नी चारि‍टा रस्‍सी लेने ओकरे संगे जंगल जाए रहल छलैक।‍

खाइर, हम मस्‍तीमे चलैत राजकुमारीक अंगना लग एलौं। अंगनामे अबैत मातर बहुत वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍क सामना करए पड़ल। एहेन स्‍थि‍ति‍ जकर कल्‍पनो नै केने रही। अंगनामे अबैत मातर देखै छी जे राजकुमारीक घरक दरबज्‍जा आधा ओटाएल आ आधा खुजल। राजकुमारीकेँ कानक आवाज आबि‍ रहल छलैक। हमरा लोकनि‍ जखन ओतए गेलौं तँ देखलौं जे मंगनू मि‍स्‍त्री राजकुमारीक संग बलजोरी शारीरि‍क सम्‍बन्‍ध स्‍थापि‍त कऽ रहल अछि‍। राजकुमारीकेँ अपना बांहपाशमे दबेने!! वि‍ल्‍कुल हिंस पशु जकाँ! अचानक राजकुमारीक धि‍यान हमरा दि‍स गेलैक। हम अपन गर्दनि‍ मोड़ि‍ वापस जाए लगलौं। राजकुमारी बहुत जोरसँ धक्का मारि‍ मंगनू मि‍स्‍त्रीकेँ अपनासँ अलग केलक। मंगनू मि‍स्‍त्री पुर्णत: वस्‍त्रहीन छल। अतबा काल धरि‍ हम आ आदि‍वासी कि‍शोर राजकुमारीक अंगनासँ बाहर चलि‍ आएल रही। लगभग 10 मि‍नटक बाद मंगनू मि‍स्‍त्री हमरा लग आएल। साइकिल नि‍कालैत कहलक- चलू बउओ, आब वापस सेन्‍हा चलै छी। नै तँ अन्‍हारमे अनेरे परेशानी हएत। जंगल दने रस्‍ता छै। लोक सभ कहैत छल जे कखनो काल बाध-भालू,  हाथी आदि‍ रस्‍तापर आबि‍ जाइ छै।‍

हम बि‍ना कि‍छु कहने ओकर साइकिलक पाछाँ बैस रहलौं। आनबेर राजकुमारी जाइकाल हमरा भेँट करए अबै छलि‍। ओइ दि‍न नै आएलि‍। हमहुँ भगवानसँ यएह मनबैत रहलौं जे 'हे भगवान आइ हमरा राजकुमारीसँ दर्शन नै हो तँ बड्ड उत्तम।'

मंगनू मि‍स्‍त्रीक साइकिलपर पाछाँ बैसल हम चुपचाप ओकरा संगे सेन्‍हा आबि‍ रहल रही। रास्‍तामे कुनो तरहक वार्तालाप नै भेल। हमरा मोनमे मंगनू मि‍स्‍त्रीक प्रति‍ घोर घृणा उत्‍पन्न भऽ गेल छल। ओ हमरा मनुक्‍ख कम राक्षस बेसी लगैत छल। मोन होइ छल ऐ पापीकेँ घेंट दबा दी आ एकर जीवनक अन्‍त कऽ दी। मोनमे राजकुमारीक प्रति‍ दयाक भाव सेहो आबि‍ रहल छल। ओकर वि‍वशता आ लाचारीपर चिंतित छलौं। होइ छल केना कऽ राजकुमारी अप्‍पन चेहरा हमरा देखाओत आ केना कऽ हम ओकरासँ बात करब!! मोनमे घृणा, आक्रोश, लाचारी, वि‍वशता-तमाम भाव एक संगे आबि‍ रहल छल।

एकाएक मंगनू मि‍स्‍त्री साइकिल रोकि‍ उतरि‍ गेल। हमरा कहलक- बौओ, कनी नीचा उतरू।‍

हम उतरि‍ गेलौं मंगनू हमरा कनीक डेराएल लागल। परेशान चेहरा, घामसँ तर-बतर, आँखि‍ लाल-लाल, समस्‍त मुखाकृति‍पर पश्चातापक भाव। ओ हमर हाथ पकड़ि‍ बड़ा आत्‍मीय भावसँ जोरसँ दबेलक आ छोट बच्‍चा जकाँ कानए लगल। दुनू आँखि‍सँ दहो-बहो नोर झहड़ए आ मुँहसँ नि‍कलए लगलैक- बउओ, अहाँ तँ हम्मर दुनू बेटासँ छोट छी। हमरासँ गलती भऽ गेल। माफ कऽ दि‍अ। हम अहाँकेँ पएर पकड़ै छी। राजकुमारी सेहो अप्‍पन माथ-कपार पीट रहलि‍ छलि‍। बउओ, अगर अहाँ ई बात अप्‍पन माए-बाबूजीसँ कहबनि‍ तँ हम आत्‍महत्‍या कऽ लेब। राजकुमारी सेहो अप्‍पन जीवनक अन्‍त कऽ लेत।‍

हम कहलि‍यनि‍- अहाँ एहेन काज कि‍एक केलौं?

तैपर मंगनू कहए लागल- बउओ, गलती भऽ गेल। ई हम्‍मर जीवनक प्रथम आ अन्‍ति‍म गलती थि‍क। भवि‍ष्‍यमे आब कहि‍यो नै हएत। अहाँ अप्‍पन माए-बाबूजीसँ ऐ बातक चर्चा नै करबनि‍। हम आहाँक पएर पकड़ै छी।‍

हमरा मंगनू मि‍स्‍त्रीपर दया आबि‍ गेल। हम कहलि‍यनि‍- ठीक छै, हम अप्‍पन माए-बाबूजीसँ ऐ सम्‍बन्‍धमे कुनो चर्चा नै करबनि‍।‍

हमर ऐ अश्वासनपर मंगनूकेँ जान-मे-जान एलेक। ओ हमरा नीक जकाँ जनैत छल : जे हम एकबेर जे बाजि‍ देलौं से ब्रह्मलकीर होइत छै। एकर बाद हमरा लोकनि‍ सेन्‍हा आबि‍ गेलौं। मंगनूक प्रति‍ हमर मोनक घृणा आइयो धरि‍ नै कम भेल अछि‍।
ऐ घटनाक बाद हम दू मास धरि‍ राजकुमारीक गाम नै गेलौं। घटनाक बादक 15मा दि‍नक बीटमे राजकुमारी नै अएलै। सूत लए बीट करक हेतु ओकर पि‍ता : करमा उराँव असगरे अएलै। करमा पि‍ताजीकेँ कहलकनि‍ जे राजकुमारी केर तबि‍यत ठीक नै छै।

कि‍छु दि‍नक बाद हम एक वर्ष लेल अपन गाम आबि‍ गेलौं गामे केर स्‍कूलमे भैया नाओं लि‍खा देलनि‍। पुन: एक वर्षक पश्चात सेन्‍हा गेलौं तँ पता चलल जे राजकुमारीक वि‍याह भऽ गलैक आ ओ आब अपन पति‍क संगे अप्‍पन सासुरमे रहैत अछि‍। चरखा ओ सासुरोमे कटैत छलि‍। सामान्‍यतया ओकर पति‍ बीटक दि‍न कऽ सूत लऽ कऽ आबि‍ जाइ छलैक। एक दि‍न एक महि‍ला पाछाँसँ हमरा टोकलक- राघवजी‍”!

हम पाछाँ तकलौं तँ राजकुमारी छलि‍। एकदम पातर, रोगी जकाँ शरीर, आँखि‍क पानि‍ गाएब, चेहराक लालिमा समाप्‍त, केश ओझराएल, फाटल मैल सनक नुआ पहि‍रने.....। पहि‍ने तँ चि‍न्‍हेमे नै आएलि‍। फेर ओ स्‍वयं कहए लागलि‍- वि‍मार पड़ल छी। डाक्‍टर कहैत अछि‍ टी.वी. भऽ गेल अछि‍। बड्ड महग इलाज छै। कौहुना चला रहल छी। राघवजी, अहाँ कोना छी?

राजकुमारीक बगे देख हमर मोन खि‍न्न भऽ गेल। भेल एक लहलहाइत फूल असमैमे केना मुरझा गेलै? भगवान एकरा की केलथि‍न?  अतबे कहलि‍ऐक- हम ठीक छी। कहि‍यो अहाँक सासुर अवश्‍य आएब। जल्‍दीये आएब कि‍एक तँ पि‍ताजीकेँ तबादला होबएबला छन्‍हि‍।‍

ई कहि‍ हम अप्‍पन संगी सभ लग खेलाइले चलि‍ गेलौं।

तकर बाद करीब चारि‍ मास धरि‍ हम सेन्‍हा रहलौं। मुदा हम कहि‍यो राजकुमारी लग नै गेलौं आब हम राजकुमारी ओइ मुरझाएल, वि‍मार आ आभाहीन मुखमण्‍डलकेँ नै देखए चाहै छी। एक दि‍न भोरे-भोर करमा उराँव हमर माए लग आबि‍ कानए लागल। ओकर बूढ़ शरीर हीलए लगलैक। माए पुछलथि‍न- की भेल?
तँ करमा उराँव आरो जोरसँ ठोहि‍पाड़ि‍ कानए लागल। बड़ी-कालक बाद टुटैत स्‍वरमे कहलकनि‍- की कहू मालकि‍न, हमर राजकुमारीकेँ दुनि‍याँ उजड़ि‍ गेल। ओकर सर्वनाश भऽ गेलैक।

हमरा माएकेँ भेलनि‍, शाइद राजकुमारीक पति‍क देहान्‍त भऽ गेलैक।  चिंतित एवं व्‍यग्र होइत पुछलथि‍न- साफ-‍साफ बाजू ने की भेलै राजकुमारीकेँ? अहाँ जमाएकेँ तँ ने कि‍छु भेल?”

तैपर करमा उराँव कहलकनि‍- ओइ कसइयाकेँ कि‍ए कि‍छु हेतै मालकि‍न। पहि‍ने तँ हमरा बेटीकेँ दुखि‍त कऽ देलक। फेर अवहेलना। तकर बाद दोसर वि‍याह कऽ लेलक। आब हम्‍मर जमाए आ ओकर सगही बहु, दुनू मि‍ल कऽ राजकुमारीकेँ अपना घरसँ मारि‍-पीट कऽ भगा देलकै।‍

हम्‍मर माता-पि‍ता एवं हम स्‍वयं करमा उराँवकेँ ऐ व्‍यथासँ बड्ड द्रवि‍त भेलौं। मुदा की कऽ सकै छलि‍ऐक। कनी-कालक बाद भोजन बनलै। माए ओकरा बलजोरी भोजन करा देलथि‍न। एकटा नव नुआ, ब्‍लाउज, साया तथा तीन खण्‍ड पुरान नुआ राजकुमारीकेँ पहि‍रैले देलखि‍न। पि‍ताजी कि‍छु नगद सेहो देलखि‍न।

एक मासक बाद पि‍ताजीक स्‍थानान्‍तरण सेन्‍हासँ राँची भऽ गेलनि‍। हम सभ राँची आबि‍ गेलौं। करीब एक वर्ष बीत गेलै। एक दि‍न राँची कि‍छु समान लेबाक लेल मंगनू मि‍स्‍त्री अएलैक। ओ हम्‍मर माएसँ भेँट करए अएलनि‍। अनेक तरहक बात भेलैक। अन्‍तत: माए पुछलखि‍न- राजकुमारीक की हाल? दोसर वि‍याह केलकै की नै?

मंगनू मि‍स्‍त्री कहलकनि‍- वि‍याह की करत बेचारी। ओ तँ ऐ दुनि‍येसँ वि‍दा भऽ गेल। राजकुमारीक मरला करीब पाँच साम भऽ गेलैक। पहि‍ने बाप मरलै बादमे अपने दवाइ दारूक बेतरे कहरि‍ कऽ मरि‍ गेल।‍

ई बात सुनि‍ हम्‍मर माए बड्ड दुखी भेलीह। हमरा भेल- 'चलू नीक भेलै, बेचारीकेँ कष्‍टसँ मुक्‍ति‍ भेट गेलै।' हँ मंगनूपर धोर तामस होइत छल। भेल ई आदमी 10 बरि‍ससँ टी.बी.सँ ग्रसि‍त अछि‍। मुदा नीक वस्‍तु सभ खा पी कऽ दवाइ लऽ कऽ सामान्‍य जीवन जीब रहल अछि‍। ई नीच, चरि‍त्रहि‍न आ चूहर मिस्त्री अप्‍पन वीमारी राजकुमारीकेँ पटा देलकैक। एक्के संग ओकर परि‍वारक सर्वनाश कऽ देलकैक। भगवान एकरा कि‍एक नै कुनो दण्‍ड दैत छथि‍न!!!

राति‍मे हम असगरमे बड्ड कनलौं। मुदा अन्‍तत: ऐ बातक चैन जरूर छल जे आब बेचारी राजकुमारी संसारि‍क कष्‍ट आ यातनासँ आजाद भऽ गेल। पुनर्जन्‍मक बारेमे हमरा कि‍छु नै बूझल अछि‍। अगर पुनर्जन्‍म होइ छै तँ हम भगवानसँ यएह प्रार्थना करबनि‍ जे हे भगवान राजकुमारीकेँ अगि‍ला जनममे कुनो राजाक घरमे सत्तेमे राजकुमारी बना देबैक आ अगर संभव हो तँ ओकर बाप करमा उराँवकेँ राजा बना देबैक आ तकरे बेटी राजकुमारीकेँ बनेबैक। हे भगवान अगर राजकुमारीकेँ राजा घर नहि‍यो जन्‍म देबैक तँ ठीक मुदा ओकरा चूहर मंगनू मि‍स्‍त्री सनक घटि‍या आदमीसँ दूर रखबैक।


 
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ज्योति सुनीत चौधरी
शहरक होलिका दहन

मोन अछि अपन छुटपनक होली।हम सब पिचकारी आ रंग किनाबयमे व्यस्त रहैत छलहुँ।मुदा पैघ लोक सबलेल तऽ होलीके पाबैन बेस परिश्रमक काज होयत छल।केवल महिला सब लेल नहिं बल्कि पुरूषो सबलेल।स्त्री सबके की छलनि. रर्चि रचि कऽ पूर्आ पकवान पकाऊ।बेसी सऽ बेसी कर्नी मनी बजार हाटक काज सेहो क लेती ।मुदा बजार हाट केनाई.. पार्क पकवान बनाबयमे मददि आदि काजक अतिरिक्त पुरूष सबके खस्सीक मॉंस कीनै लेल लम्बा पॉंतीमे ठाढ़ हुअ पड़ैत छलैन कारण ओहि दिन तऽ स्त्री सब भानर्सभात छोड़ि मात्र होरीये खेलय बाहर निकलैत छली।
अहू सबसऽ बेसी मिहनतक काज छल दस दिन पहिने सऽ रातिक रात जगरना जे पुरूषे के करय पड़ैत छलैन।ओना तऽ गरमीमे खाट बगानमे बाहर कऽ सूतक चलन खूब छल। मुदा होली नजदीक अबिते लोकसब बाहर सूतय लागैत छल।कारण रातिमे मुहल्लाक युवक सब लकड़ी चोराकय होलिका दहनके समान जमा करैत छल।कनी नीक सऽ ऑंखि लागल तऽ बगानक बाउण्डरी के खुट्टा आ लकड़ीके गेट सब उखाड़ि लऽ जायत छल।ई समस्याक समाधान भेल जखन कम्पनी सबघरके सामने कन्क्रीटक छहरदिवारी बना देलकै मुदा लोहाके गेट अखनो बड़ नीचे छल जकरा फानिक लोकसब जीबैत बड़का गाछ सब काटिक लऽ जायत छल।कुनो लकड़ीक वा बेंतक समान जौं रातिमे बगानमे छुटि गेल तऽ फेर भोरे नहिं भेटत।
सबके बूझल छलैजे ई काज युवावर्गक अछि मुदा पकड़नाई मुश्किल छल। एकटा वृद्ध कक्का तहकीकातमे भीड़ल छलैथ जे जखन ई काज अहि मुहल्लाक लोक करैत अछि तऽ पकड़ने बिना छोड़ब नहिं। हुन्का लेल एकटा लोहाक कुर्सी सदखिन बाहरे रहैत छल। सॉंझ होयत छलै जखन ओ बगानमे अपन चिरपरिचित छटाव सऽ पुस्तक पढ़ैत चाय पी रहल छला कि नजरि गेलैन छौंरा सबके भीर पर।तुरन्त बजेलखिनजे की चोरीक नीति बना रहल छऽ।सब उदास भऽ लग आयल। प््राणामपातीक बाद कहलकैन जे ओकर सबहक दोस्तक दादा के दिमागी बिमारी भऽ गेल अछि से सब दुःखी अछि। बुजुर्ग पुछलखिनजे की बिमारी भेल अछि ताहि पर सब कहलकैन जे आधा रातिमे चिकरय लागैत छथिन।बुजुर्ग बुझलखिन जे ई सब बात टारि रहल अछि आ इहो अंदाज भऽ गेलैन जे आहि राति ई सब फेर किछु करत तैं सम्मेलन कय रहल अछि।
फेर राति भेल आ सब अपर्न अपन खाट लगा बाहर सूतला।ई बुजुर्ग सेहो अपन बड़का टा बगान टपि गेट लग खाट लगाकऽ सूति गेला।हिन्कर बगानमे नीर्क नीक गाछ रहैन।हनुमानजीके झण्डा सेहो लगेने रहैथ बॉंस पर। आहि बेसिये सतर्क छलैथ। करौट बदर्लि बदलि नींद तोड़ैत हला। बीच रातिमे लघुशंका लगलैन से कनिये काल लय भीतर गेला आ जैने बार एला तऽ हुन्कर खाटे लापता भऽ गेल छलैन।अतबे कालमे चोर सब दूर नहिं गेल हेतै से सोचि मोन भेलैन जे चिचियाई जोर सऽ आ सबके जगाकऽ खिहारि चोरके मुदा ककरो संगीके दादाके दिमागी रोग मोन पड़ि गेलैन ताहि कारने च्ुाप रहि गेला।
    
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...