Tuesday, December 13, 2011

'विदेह' ९५ म अंक ०१ दिसम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४८ अंक ९५) PART_III


१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.अमित मोहन झा ३. रवि मिश्राभारद्वाज
 १.
शिवशंकर सिंह ठाकुर
लगई छी अहाँ सोना जकां

चन्द्रमा सन चेहरा अहाँ के ,
चानन सन शीतल छाँव अहाँ के ,
निकलै छी अहाँ जोऊ कतोउ स ,
गम्कैत छी अहाँ फूल जकां ..................

रूण -झुन,रूण-झुन पायल बजै अछि ,
चंचल अहंक नैन लागैत अछि ,
देखि जिम्हर सं अहाँ जाई छी ,
ताकै छी अहाँ के हिरण जकां .........

जूड़ा बना क जे घर स निकलै छी,
लागै छी अहाँ सोना जकां ,
अपन अदा स जे अहाँ देखै छी ,
चमकै छी अहाँ बिजुली जकां .........

राति इजोरिया नीक लगई अछि ,
लागै छी अहाँ चानी जकां ,
चोर नजरि स जे हमरा देखै छी,
लागै छी अहाँ बादल जकां .............

"प्रेम अहाँ स हम करै छी"
बाजू अहाँ कनी नीक जकां ,
जिनगी हमर हैत स्वर्ग स सुन्दर ,
राखब अहाँ के रानी जकां ...........

२.
अमित मोहन झा
ग्राम- भंडारिसम(वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत।
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।
पहिलुक दिन हम याद करई छी,
नबकी भीर पर माछ मारई छी,
पहिलुक दिन हम याद करई छी,
ई पैनपीबी ओ पुरहित्ता,
पोखईर मखानक बिढ़नी के छ्त्ता,
मारल माछ उपइछ के खत्ता,
जामुनक गाछ पर घोरणक छत्ता,
आम लतामक की पुछई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

पापाजी कमाबईथ बड्ड थोड़,
पर हुनकर इच्छा बड्ड ज़ोर,
हमहू पढ़ही थोरबों थोर,
सुइन सुइन हमर माथा घोर,
हुनक प्रयास नहि बिसरी सकई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

नहि देखला जहन तनिको सुधार,
मन मे सब क्यो केलइन विचार,
स्कूल हमर बदलबाक चाही,
प्राइवेट स्कूल सबहक उर माही,
सब बुझलइथ आब सुधईर सकई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

भरि दिन गाछी मे बौएनाइ,
नहि स्कूलक टास्क बनेनाइ,
मित्रक संगे दिन बीतेनाइ,
गामे गामे खूब छिछिएनाइ,
यादि करैत ओ सिहरि उठई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

सिंगही बिल मे हाथ घुसेनाइ,
सुग्गा पकरई शीशो पर चढ़नाई,
ब्योंत लगा कांकोर बहरेनाइ,
ओरहा बादामक बना के खेनाई,
यादि करैत आब हम शरमाई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

कल्याणी के गुढ़ विचार,
क्षुब्ध देखि हमर ई व्यवहार,
ओ सदिखन केलैन प्रयास,
बदलब हम हुनका छल भास,
बड़की बहिन मे माँ के पबई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

बाबा हमर विद्वताक खान,
ओ नहि छेला किछ से अनजान,
तकला क्षण मे एक उपाय,
पापा के कहलाइन समझाय,
हिनका अहाँ ल जाउ अररिया,
रन-बन घुमईथ भरि दुपहरिया,
हाथ से कहीं ई निकलि नै जाय,
ततत्काल ई करू उपाय,
ओ वचन अखनों तक सुनई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

एकर छेलइन्ह पापा के भान,
लय जाइथ संगे वाणेश्वरी स्थान,
रास्ता भरे बुझाबईथ जाइथ,
ई नहि करी ओमहर नहि जाइ,
सब दृशतांटे यादि करई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

पापा संगे अररिया गेलौ,
अपन आदत ओतहु नहि छोरलौ,
पापा जेबी से पाई चोराय,
रॉयल टाकीज़ सिनेमा देखय जाय,
कॉमिक्सक ते खान बनेलौ,
गलत राह पर किछ आर चललौ,
पापाक बेबसी यादि करई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

स्कूल से कतेक बेर भगलौ,
तुइत इमली तर समय बीतेलौ,
पहिल विचारल नहि हम पढ्बइ,
नगर नगर मे घुमबे करबई,
अन्न्पूर्णा के गोल मिठाई,
मित्रक सब संग तास खेलाई,
यादि करैत हम खूब बिहूसई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

पापा अपनहि खेनाई बनाबईथ,
घर-बजारक काज सरियाबईथ,
ओजपूर्ण कविता ओ सुनाबईथ,
हमर सुतल आत्मा के जगाबईथ,
रोम रोम पापाक ऋणी पबई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

आंखि हमर तुरंत फुजि गेल,
भेलहु जहन दसवीं मे फेल,
माँ-पापाक आंखिक नोर,
पिघलल हमर हृदय कठोर,
प्रण केलौ आब करब ईजोर,
चाहे सूरज बदलईथ छोर,
ई बातक आइ गांठ बनहई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

लक्ष्य अखनि धरि अइछै दूर,
प्रण अछि जे करबई ओ पूर,
करईथ शारदे कृपा अपार,
हमर लगाबईथ बेरा पार,
हे माँ कल जोरि नमन करई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

माँ हमर जनमहि नहि देल,
भाग्य विधाता सेहो भेल,
छईथ दुर्गा के ओ अवतार,
करय एली हमर उध्धार,
माँ पापा लेल अमितलिखई छी,
पहिलुक दिन हम यादि करई छी।

रवि मिश्राभारद्वाज
ग्राम : ननौर
जिला : मधुबनी

जिनगी की कहु एहेन अंजान बाट मे चलल जा रहल अछि
भोर ठीक सों भेल नहि मुदा सांझ ढलल जा रहल अछि

मोजर त खूब लागल छल गाछ मे
टुकला ठीक सों भेल नही मुदा मोजर झरल जा रहल अछि

कियो अन्न बिन तरपै अछि त कियो पानी बिन
ककरो पानी भेटल नई मुदा ककरो गिलास मे मदिरा भरल जा रहल अछि

ककरो चूल्हा अन्न बिन बुझायल अछि
महगा बेचे के चक्कर मे ककरो कोठी मे अन्न सरल जा रहल अछि

बाहारक लगाल आगी देखी सब कियो बुझायात
के बुझायेत मोनक आगी जे बिन धधरे जरल जा रहल अछि

कियो मरि के जिब रहल अछि
कियो जी के जेना मरल जा रहल अछि

 
2
'कलेश"
करेजा मे धूसल एहेन कलेश
पल मे बदैल गेल सुन्दर रुप आ भेश
एहेन बज्र खसौलक विधाता
तौर देलक जिनगी केर डोर
ईजोतो मे सिर्फ अन्हार अछि
संतोष धरब ककरा पर
रोकने नै रुकै या आखिक नोर
हे सखी पहिने आबि
रांगल जिनगी केर रांगै छलौ
करम हमर फूटल
अपन सँ संग छूटल
अहुँ किया फेरै छी मुँह
कनेक खूशी देबय मे किया लागै या अबुह
जी के जेना रोज मरै छी
ककरा देखायब ई नोर
रोज आँचर मे धरै छी
ई नोर नै निकलैत अछी सिर्फ,
अपन दुखमयी जिनगी आ दशा पर
बल्कि किछू लोकक अवहेलना आ कुदशा पर
शूभ काज सँ राखल जाय या हमरा दुर
किछू लोकक मोन अछि कतेक क्रुर
हे सखी हमहु अही जेना नारी छी
मुदा भेद अछी सिर्फ अछि एतवा
लोक कहैत अछी हमरा विधवा


'गजल'
जिनगी किया एना तंग लागै या
रांगल त छी मुदा बेरंग लागै या

बचपन बितेलौ रेत, मे जवानी खेत मे
कोना कततै बुढापा ऐकता जंग लागै या

जे दोस्त बनि दूस्मन भेल छल दूर
बेचारा भेल लाचार आब त ऒहो संग लागै या

मोजर नहि केलौ जकरा कहीयो
भैल शक्ति क्षिन्न आब ऒहो दबंग लागै या

·         'गजल'


जिनगी की कहु एहेन अंजान बाट मे चलल जा रहल अछि
भोर ठीक सों भेल नहि मुदा सांझ ढलल जा रहल अछि

मोजर त खूब लागल छल गाछ मे
टुकला ठीक सों भेल नही मुदा मोजर झरल जा रहल अछि

कियो अन्न बिन तरपै अछि त कियो पानी बिन
ककरो पानी भेटल नई मुदा ककरो गिलास मे मदिरा भरल जा रहल अछि

ककरो चूल्हा अन्न बिन बुझायल अछि
महगा बेचे के चक्कर मे ककरो कोठी मे अन्न सरल जा रहल अछि

बाहारक लगाल आगी देखी सब कियो बुझायात
के बुझायेत मोनक आगी जे बिन धधरे जरल जा रहल अछि

कियो मरि के जिब रहल अछि
कियो जी के जेना मरल जा रहल अछि

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. अनिल मल्लिक २उमेश पासवान ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू

अनिल मल्लिक
स्वीकारोक्ति

आखर आखर शब्द लिखै छी, शब्द अर्थ औ मर्म लिखै छी
मात्र लिखै छी, मर्म ने बुझलहु, केलहु हम एहन कुकर्म लिखै छी
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'बैष्णव जन....पीर पराई..' बिसरलहु, अपराधबोध दिन रैन लिखै छी
अन्त समय निकट आबि रहल अछी मुदा, मोन मे नै अछी चैन लिखै छी

प्रेम लिखै छी, प्रित लिखै छी, कहियो बिरह'क गीत लिखै छी
अपराध हमर क्षमा करु माँ मिथिला”, हम ई धीया के जीत लिखै छी
साँझ दुपहरिया भोर लिखै छी, सन्ताप'क नई कोनो छोर लिखै छी
किन्हको ने होय येहन पिडा पछतावा, विन्ती हम कर-जोर लिखै छी


सुनी सभ ब्यथा दद्दाके अयलहु अछी, हुन'क मात्र बयान लिखै छी
बर्ण बिन्याश मे छी हम अज्ञानी, गल्ती'क देब क्षमादान लिखै छी

कहय सुनय मे सहज लगै अछी मुदा, आब करु दृढ सँकल्प लिखै छी
"आत्म-लोकपाल" देत मुक्ती ई तक्षक सॉ ,नै और कोनो बिकल्प लिखै छी

आखरआखरशब्द…!


उमेश पासवान
कवि‍ता-

डेग डेगपर खतरा

लोक लोककेँ
जानसँ मारै छै
दानव सन
करै छै बेबहार
कि‍यो भऽ गेल
बइमान कि‍यो चाेर
कि‍यो दहेज लोभी
कि‍यो डाकू खॅखार
वि‍श्वास केकरापर
के करत?
अपनो अप्‍पनकेँ
लऽ लइ छै जान
मनुख-मनुखकेँ
नै चीन्‍हि‍ रहलैए
मनुख चरि‍त्र
जानवर सन भऽ रहलैए
डेगपर खतरा अछि‍
ओना बुझाइए
देखू आजुक मनुख
बदलाव देखि‍ गि‍द्धो सरमाइए।

जगदीश प्रसाद मण्‍डल
जगदीश प्रसाद मण्‍डलक आधा दर्जन कवि‍ता.......

धोबि‍ घाट

कि‍नछरि‍ धार धोबि‍घाट बनल छै
बामी-दहि‍नी बीच पड़ल छै।
ठेहुन पानि‍सँ भीत्ता महारक
खाढ़ी-खाढ़ी रूप गढ़ल छै।
अपना सीमा रोकि‍-रोकि‍ घाट
ति‍रछि‍या-ति‍रछि‍या धारा चलै छै।
जहि‍ना ले-ऊँच घाट मढ़ल
तहि‍ना ले-ऊँच ठाढ़ धोबि‍ छै।
एक ओरीकेँ पकड़ि‍-पकड़ि‍
उनटा-उनटा पाट पटकै छै।
रेहे-रेहे सटल मैल
खाढ़-खाढ़ी पटकि‍ झरै छै।

तीन ताल पकड़ि‍ते पकड़ि‍
चि‍न्‍ह-पहचि‍न्‍ह तीनू करै छै।
दू पाटन बीच पड़ि‍-पड़ि‍
रचल-बसल मैल संग छोड़ै छै।
जुग-जुगसँ जकड़ि‍ जकड़ल
पटका-पाबि‍-पाबि‍ संग छोड़ै छै।
गुड़कि‍-गुड़कि‍ गहे-गहे
पानि‍क संग-संग सेहो बहै छै।

सहस्रोसँ रचि‍-रचि‍ बेबस्‍था
कोने-सान्‍हि‍ये पकड़ि‍ लेने छै।
उनटा-पुनटा देखि‍-देखि‍ धोबि‍
गरे-गर उनटा पटकै छै।
दंगल बीच पहलवान जहि‍ना
लपैक बाँहि‍ पकड़ै छै।
छाती-पीठ सटा फेकै छै
पाट धोबि‍या सीखै छै।
एक धैर्य टूटि‍-टूटि‍ दोसर
बालि‍क शक्‍ति‍ पबै छै।
सात ताड़ बीच जहि‍ना वीणा
आनए पकड़ि‍ महुराएल साँप छै।
अपन मधुर स्‍वर-लहरीसँ
नंगटे नाच नचबै छै।
परखि‍ देखि‍ देखि‍ते देखि‍नि‍हार
अपन दि‍शा देखै छै।
पबि‍ते अनुकूल दि‍शा अपन
मधुर-मधुर फल सभ चीखै छै।

समए साक्ष्‍य शीशा सि‍रजि‍
ऐनाक रूप धड़ै छै।
पबि‍ते रूप अपन ऐनामे
समए-संग दौगए लगै छै।


चल रे जीवन

चल रे जीवन चलि‍ते चल।
संगी बनि‍ तूँ संगे चल
जौवन चल जुआनी चल
जि‍नगानी संग मर्दगानी चल
चि‍ंतन संग दि‍लेरी चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

यात्रीकेँ आराम कहाँ छै
यात्रा पथ वि‍श्राम कहाँ छै।
ओर-छोर बि‍नु जहि‍ना जि‍नगी
तहि‍ना ऐ दुनि‍याेँ केर छै।
पकड़ि‍ मन तूँ चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

ग्रह नक्षत्र सभटा चलै छै
सूर्य तरेगन सेहो चलै छै
दोहरी बाट पकड़ि‍ चान
अन्‍हार-इजोतक बीच चलै छै।
देखा-देखी चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

बाटे-बाट छि‍ड़ि‍याएल सुख छै
संगे-संग बि‍टि‍याएल दुख छै।
काँट-कुश लहलहा-लहलहा
गंगा-यमुना धार बहै छै।
परखि‍-परखि‍ तूँ चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

कि‍छु दैतो चल कि‍छु लैतो चल
कि‍छु कहि‍तो चल कि‍छु सुनि‍तो चल
कि‍छु समेटतो चल कि‍छु बटि‍तो चल
कि‍छु रखि‍तो चल कि‍छु फेकि‍तो चल
बि‍चो-बीच तूँ चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

समए संग चल
ऋृतु संग चल
गति‍ संग चल
मति‍ संग चल।
गति‍-मति‍ संग चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

गति‍ये संग लछमी चलै छै
सरस्‍वती मति‍ये चलै छै।
वि‍श्वासक संग अशो चलै छै
तही बीच जि‍नगीओ चलै छै।
साहससँ संतोष साटि‍-साटि‍
धीरज धारण करि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

टूटए ने कहि‍यो सूर-ताल
हुअए ने कहि‍यो जि‍नगी बेहाल।
जहि‍ये समटल जि‍नगी चलतै
बनतै ने कहि‍यो समए काल।
बूझि‍ देखि‍ तूँ चलि‍ते चल
चल रे जीवन चलि‍ते चल।
की लऽ कऽ आएल एतए अछि‍‍?
की लऽ कऽ जाइत अछि?
सभ कि‍छु एतए छोड़ि‍-छाड़ि
जस-अजस लऽ पड़ाइत अछि‍।
नि‍खरि‍-नि‍ख‍रि‍ कऽ चलि‍ते चल।
चल रे जीवन चलि‍ते चल।

सती-बेश्‍या

सरि‍पहुँ कहए छी, कि‍यो नै
बसए दि‍अए चाहैए।
मोख पकड़ि‍ मुँह छेकि‍
खूर-पूजैक आहूत करैए।
बि‍नु खूर-पुजौने पकड़ि‍-पकड़ि‍
दलदलमे भरमबैए।
जाधरि‍ दल-दल टपि‍ नै पेबै
गाछक झोंझ लसकौनेए।
लसकैयाेक बि‍कराल वोन छै
पसरल सगतरि‍ धरतीपर।
केना ससरि‍ पाएब ओकरा
अरूप-सरूप क्षण बदलै छै।
नव-नव चालि‍ नव रूप सजा कऽ
धूप-छाँह बनि‍ खेलै छै।
जाधरि‍ जड़ि‍केँ जानि‍ नै पेबै
नाओं-ठेकान केना बुझबै।
बि‍नु नाओं-ठेकाने, केनए-केनए
मड़ि‍आएल आँखि‍ चि‍न्‍ह पेबै।
बि‍नु देखने चीन्‍हि‍ केना पेबै
चालि‍-चलैन आ कि‍रदानी।
बि‍नु गछाड़ने, डेग नै कहि‍यो
देत उठए अपन मन-मानी।
जुग-जुगसँ छि‍छि‍या-छि‍छि‍या
छुछका-छुछका छुछकौने अछि‍।
राड़ी-डबहारी रोपि‍-रोपि‍
राहीकेँ रगरगबैत अछि‍।

जँ लग्‍गाक लागि‍ लगा
जाए चाहब ओइ पार।
बीचे रूप बदलि‍-बदलि‍
धरा खसाएल बीच धार।

जखने नि‍कसी बान्‍हि‍ लग्‍गा
हँसि‍ लग्‍गा लग्‍गी बनत।
लग्‍गा भरि‍ जे छल हटल
ससरि‍-ससरि‍ लग आऔत।
पाबि‍ बान्‍ह जेना खढ़ आ बत्ती
घर नाओं धड़बैत छै।
तहि‍ना सहेजते सज्‍या
बसोबास बनबैत छै।
बीत भरि‍ ओ बाँसक छि‍प्‍पी
उनटि‍ टूटि‍ सटैत छै।
पड़ि‍ते बान्‍ह दुनू-सँ-दुनू
नोकसी रूप धड़ैत छै।
जखने पड़ैत जौड़क लटपटी
प्रेमि‍काकेँ दि‍अए इशारा।
अजगुत रूप प्रेमी-प्रेमि‍काक
दुनूक-दुनू बनैत सहारा।
लीला अगम बनल दुनूक
अछि‍ चाहैत करए सभ प्रेम।
मुदा, की? ई थि‍क अनुचि‍त
हँसि‍ दुनि‍याँसँ करी प्रेम।
लग्‍गि‍ये छी जौहरी करामाती
कखनो तोड़ए गाछक डारि‍।
कखनो नापए कुदि‍-कुदि‍
खेते-खेत बनबैत आड़ि‍।
कखनो धारमे नाउ दौगा
धार पार करैत अछि‍।
कखनो फल-फूल तोड़ि‍-तोड़ि
भुखल पेट भरैत अछि‍।
लग्‍गी बनि‍ बनि‍ते ओजार
नचनी-नाच नचए लगैत।
अपने हाथे खुआ-खुआ
अकड़ि‍-सकड़ि‍ चालि‍ धड़बैत।
हाथ-हथि‍यार बनि‍ते बनैत
कनखि‍या देखबए उड़ि‍याइत सती।
बि‍लगा-बि‍लगा, बुझा-बुझा
आन नै, अपने हेती।

पड़ि‍ते दृष्‍टि‍ दहलि‍, ढुलकि‍
गमे-गमे गुड़कए लगैत।
पकड़ि‍ डोर सि‍नेही सि‍नेह।
स-हरि‍ सि‍हरि‍ सटए लगैत।
कॅपैत करेज कुहरि‍ कुकुआ
गुन-गुन गुनाइत गीत
तड़कि‍-तड़पि‍ तन-तना
प्रेमी मन झकसए लगैत।
रेहे-रेहे सींच झकासी
सीता शीत सि‍हरबए लगैत।
चाक चढ़ल पानि‍-माटि‍ जेना
नव-नव वर्तन गढ़ैए।
तहि‍ना मन तनमे
सुमति‍ सोच सृजैए।

सच्‍चे कहै छी, नै बसए
दि‍अए चाहैए हमरा।
झीक-झीक झोंट झटकि‍
लीड़ी-बीड़ी सेहो करैए।
नवकी कनि‍याँ बूझि‍-बूझि‍
बेश्‍या-सती बनबैए।
धर्मराजसँ यमराज बनि‍
छतपति‍ नाअों धड़बैए।
केना बॅचि‍ पाएत यौ भैया
सत्-क सतीत्व हमर?
केना जीब पाएब हम
संसारक ई समर।
मोख मारि‍ बैसल बेश्‍या-ए
ससरि‍ केना सकब कहू।
देखि‍ते देखि‍, बुझि‍ते बूझि
की करब सेहो कहू।

सत्‍ बसाएब बेश्‍या कहाँ‍
वृत्त-कुवृत्ति‍क खेल छी।
हाथ-मुँहक कि‍रदानी सभ
देखि‍-देखि‍ बकलेल छी।
चहल-पहल कि‍रदानी शब्‍दक
नाकक नाथ बनबैत अछि‍।
सुकुमार-सुकोमल नाक पाबि‍
गाएक आत्‍मा नथैत अछि‍।
पड़ि‍ते नाक पड़ि‍ नथि‍या
नर्तकीक रूप गढ़ैत अछि‍।
काजर-चून लगा-लगा
मारि‍ ठहाका हँसैत अछि‍।
काजर घर केना बास करब
करए पड़त बुद्धि‍क स्‍नान
केने बि‍ना से केना पएबे
तन-मन अन्‍तर धान।
धाने-धन कहबै छै भैया
केना ने मुँहो खोलब।

मुदा, मुकरि‍-मुकरि‍ कमड़जाल
पानि‍-बरफ केना बुझब।

अपनेपर हँसै छी

ठक वि‍द्या वि‍द्यालयसँ
नीकहा डि‍ग्री कि‍नलौं।
शि‍क्षामि‍त्रक उजैहि‍यामे
हमहूँ नोकरी पेलौं।
लाखे रूपैयामे,
दशो कट्ठा जमीन गमेलौं।
गुरू दक्षि‍ना देने बि‍ना
गुरूआइक भार उठेलौं।
दि‍न-राति‍ गुरूआइ करै छी
मुँह भरल मधुरसँ।
जे नि‍कलत सएह मधुर
सुनैत रहू असथि‍रसँ।
आरो बात सुनबै छी
अपनेपर हँसै छी।

मात्रा घुसका-फुसका
शब्‍द बनेलौं ठूठ डारि‍।
अक्षर काटि‍ ईंटा बनेलौं
साहूल खसा देलौं डांरि‍‍।
तीरछा-तीरछा चेन्‍ह लगा
कोने कानी लेलौं नाओं।
बाहरे-बाहर सोझ-साझ
उठि‍-बनि‍ गेलइ सौंसे गाओं।
पुरने घरक ईंटा जोड़ि‍-जोड़ि‍
नवका घर बनबै छी।
अपनेपर हँसै छी।

पुरनाकेँ पुराण कहि‍-कहि‍
नवका चालि‍ सि‍खबैत एलौं।
धर्म सनातन कहि‍-कहि‍
अर्थ-जाल फेकैत एलौं।
इचना पोठी छानि‍-छानि‍
डेली भरैत एलौं।
गुबदी मारि‍ बि‍हुँसि‍‍ छी
मन कनैत, हँसैत तन
कठहँसी हँसि‍ हँसै छी।
अपनेपर हँसै छी।

धन की? केकरा कहबै
धन यौ भाय
गाए-माए छी एक्के
पूछि‍ लि‍यनु यशोदा माइ।
बि‍नु धनक धनि‍क जहि‍ना
ताम-झाम देखबैए।
देखि‍-देखि‍ आँखि‍ करूआए
लाजे आँखि‍ मुनै छी।
अपनेपर हँसै छी।

हेहरा गाछक फल खा-खा
हेहरपन्नी सि‍खैत छी।
दि‍न-राति‍ हहरि‍-हहरि‍
नि‍चाँ ससरैत छी।
उनटा मुँह आगू घुमा
कल्‍याण-कल्‍याण रटैत छी।
क्षणे-क्षण पले-पल
रीत-नीति घटबैत छी।
अपनेपर हँसैत छी।
गालक सि‍तार बना-बना
राग-पुराणक श्वर चढ़ा।
वेद-पुराण गबैत छी
अपनेपर हँसैत छी।


सासु

सासु हमर बड़ अपखैतनी
बेटी बना डेबने छथि‍।
जहि‍ना माइयक बेटी दुलारू
तहि‍ना बना रखने छथि‍।
सोलहो आना काज अपनसि‍र
गार्जन मानि‍ रखने छथि‍।
कोनो धैन-फि‍कि‍र नै हमरा
बेटी बूझि‍ बुझबै छथि‍।
जँ कोनो गलती होइए
अल्हरी नाओं सुनै छी
मुदा लगले, तइखन
घरक लछमी पात्र कहबै छी।
पावर तँ पावर होइ छै
बुझए पावर कुर्सी बैसनि‍हार।
मनुखक पावर स्‍वयं मनुख छी
जानए मनुख बनि‍ जीनि‍हार।


ओ दि‍न

ओ दि‍न, ओ दि‍न छी,
जइ दि‍न भयक प्रेमी देखलौं।
ओ दि‍न, ओ दि‍न छी,
जइ दि‍न भयसँ यारी केलौं,
दर्शन पाबि‍ भैयारी केलौं।

माघ मास राति‍ सतपहरा
आशाक आश भैयारी देखलौं।
ओ दि‍न, ओ दि‍न छी,
संग सटल भैयारी देखलौं।

जेकर सि‍र सोर बनि‍
पानि‍क संग पताल पहुँचए।
सि‍सैक-सि‍सैक‍, संग आशाक
जि‍नगीक संग जी‍बैत चलए।
संग मि‍लि‍ हँसए,
गबैत चलए संग-संग।
राति‍-दि‍न सहन सृरजि‍
कूदि‍-कूदि‍ कुदैत संग।

घर भैयारी, बाहर भैयारी
संगी, मि‍त्र-दोस्‍त कहबैत।
प्रेमाश्रु संग ढुलकि‍-ढुलकि‍
धरती बीच नाओं धड़बैत।
सि‍र उसरगए मि‍लि‍ संग
वीर-शहीद कहबैए।
मातृभूमि‍ ओ पि‍तृभूमि‍ बीच
सेवा कऽ जगबैए।

बजि‍ते एक देबाल घड़ी
घरक घंटी घुनघुनाएल।
पकड़ि‍ कान गुनगुना-गुना
रणभूमि‍-कर्मभुमि‍ देखाएल।
सातो घर सजल सेज
देखते मन तड़पि‍ उठल।
दलदल करैत दलकीमे
चि‍चि‍या-ि‍चचि‍या चहकि‍ उठल।
अछि‍ कठि‍न कर्मक परीक्षा
मुदा, सफल नै हएब कठि‍न।
वि‍चार सहजि‍ सुता
समटि‍-समटि‍ कएल एकठीन।
बेंग सदृश्‍य कुदए लगैत
तरजू कला समेटि‍ धड़ब।
कलाकारी छी, मोचना कठि‍न
आङुरसँ पकड़ि‍ धड़ब।
जि‍नगी परीक्षाक ओ घड़ी
जइ दि‍न जि‍नगी नाओं पड़ए।
जागल-सुतल बीच दुनूक
जागलनाथ काज धड़ए।
पैघ काजक पैघ फल
एक्के आँखि‍ये दुनि‍याँ देखैत।
कनाह कहू आकि‍ समूह
देखि‍-देखि‍ लगैत समोह।
साध सृरजि‍ साधक सदति‍
फूल वृक्ष सजबैए।
सृरजि‍ शक्‍ति‍, शक्ति‍ संग
सदति‍ भक्ति‍ करैए।

४.
मुन्नाजी
गजल
बिगड़लो रूपक नकल करैए आब लोक
नकलोकेँ यथार्थ संजोगि रखैए आब लोक

दायित्व बुझैए मात्र अपन स्वार्थ पूर्ति लेल
अनकासँ अपनाकेँ विलगा लैए आब लोक

धुँआधार हँकैए गप्प लोक कल्पनाक भावेँ
यथार्थमे अपनाकेँ सुनगा लैए आब लोक

जीवनक दशा-दिशा तय करैए मात्र स्वयं
देखाबामे स्वयंकेँ हँटा लैए आब लोक

पहिनेसँ बेशी आरक्षित भऽ कऽ जीबैए सभ
मुदा बेर पड़ने देखार होइए आब लोक

स्तरसँ उठि कऽ जीबाक भऽ गेलैए परिपाटी
पाइक फेरमे भ्रष्टाचारी भेल-ए आब लोक

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१. अन्जनी कुमार वर्मा २.रामबिलास साहू

अन्जनी कुमार वर्मा

आत्मबल
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संघर्ष मय जिनगी सं फराक रहब निक अछि
अहि बिगड़ल समाज सं सुनसान जंगले निक अछि
मुदा कतैक दिन धैर ?
उचितक बात पर नहि क सकैछ धनुषाकार
आत्मबल कें राखि देखू आत्म्बलक इतिहास
धनुषाकारक बाद भ जाईछ जनजागरण
क्रांतिक विकराल रूप क लैछ धारण
जगविदित अछि क्रांति केर की की होईछ परिणाम
रौद्र रूप धारण कय जखन लैछ तीर- कमान
नहि अप्पन प्राण केर भय होइछ
नहि दोसराक प्राणक मोह
तखैन देह में आबी जैत अछि
अभिमन्यु केर खून
सोइच लिय हे पथभ्रष्ट जयद्रथ
होयत कोन उपाय
कतेक दिन धैर सहन करत
दुखिया केर समुदाय
लौह-भुजा आब फड़कि रहल अछि
प्राण -प्राण लेल तड़पि रहल अछि
क्रांतिक ज्वाला भड़कि रहल अछि
आब सोचु अप्पन उपाय
नहि मानत पीड़ित समुदाय
क्रन्तिये ठीक अंत उपाय..........


बहैत बसात
,,,,,,,,,,,,,,,,
प्रासाद बनि जाएत अछि
निर्दोष पीड़ितक नोर सं
गजराज मरी जाएत अछि
नन्हकी चुट्टीक क्रोध सं
शीर्ष पद पर बैस करैछ
रावण सन हुंकार
मुदा एकटा बानर जारि देने छल लंका..
बजा देने छल डंका...
अरब लोकक भावना
नहि बुझब त चल जायत
सुख,सुविधा आ शांति......


परिभाषा
,,,,,,,,,,,,,
आवेदन,अंतर्विक्षा आ अपव्यय सं
थाकि गेल अछि मन
बेकार बुढायत अछि
उच्च शिक्षाक प्रमाणपत्र,
आब सबके समेटि
बंद क देलियेक अछि पेटी म
पैसा,प्रतिष्ठा आ पैरवीक लेल
शुरू क देलों अछि स्वरोजगार
कुरता पैजामा आ बंडी पहिरी
बन गेलोंहअछि..नेता.....



रामबिलास साहू
किछु टनका
रामवि‍लास साहु जीक टनका


52. सावन मास
रि‍मझि‍म फुहार
प्रेम बढ़ाबै
प्रेमीकेँ ललचाबै
गोरीकेँ तरसाबै।

53. मोनक बात
की कहब सजनी
समय नहि‍
की भेजब सनेस
दि‍ल दर्दक क्‍लेश।
54. दि‍लक रोग
नहि‍ कोनो इलाज
प्रेमक भूख
नहि‍ ि‍मटै धनसँ
नहि‍ कोनो दवासँ।

55. चंचल मन
ि‍चत्‍त घबराइत
मन डोलैत
नयन सुखदाय
प्रेमी कहै लजाय।

56. सोना कंगना
पैर पयजनि‍यँा
नाचै अंगना
घुरि‍ घुरि‍ ताकैत
हमर सजनि‍यँा।

57. फूलक डारि‍
झुलि‍ सनेश दैत
देशवासीकेँ
सदा प्रसन्‍न रहुँ
देशक सेवा करू।

58. देशक सेवा
मायक सेवा करू
ि‍जनगी भरि‍
र्ध्‍मक पालन छै
गरीबक कल्‍याण।

59. सुइत उठि‍
माय-बाप गुरूकेँ
छूऊ चरण
ि‍नत्‍य बन्‍दन करू
कृपा करत देव।

60. पि‍ढ़ ि‍लखकऽ
बनु ज्ञानीसँ दानी
करू देशक
ि‍वकास कल्‍याणक
रखू उँचा ि‍तरंगा।

61. सभ अपन
पराया नहि‍ कोय
सूरज चँाद
सभकेँ समझैत
एक समान हि‍त।

62. राजा दुखि‍त
प्रजा सभ दुखि‍त
जोि‍गक दुख
दुखि‍या सँ छै बेसी
संसार अछि‍ दु     :खी।

63. सेवा करैत
पथ पर चलैत
आगू बढ़ैत
झरना सन आगू
संघर्ष सँ बढ़ैते।

64. खूनक दाग
ि‍छपाय नहि‍ पावै
पापक भार
धरती नै उठाबै
सत्‍य करै से होय।

65. प्रात:क जल
पीबैत रहु ि‍नत्‍य
टटका फल
खाऊ जीबैत धरि‍
बनल रहु स्‍वस्‍थ।

66. रथक चक्‍का
उलटि‍ चलै बाट
चाक् चलै छै
ठामे ठाम नचैत
दुनु करै दू काम।

67. बच्‍चा बेदरू
खेलैत संगे खेल
कखनु झगड़ा
कखनु करै मेल
पढ़ै छै पाठ एक।

68. ि‍खलैत फूल
देखैत भौंरा नाचै
रस पि‍बैत
राति‍ बि‍तबै संगै
प्रेमक बात करै।

69. दि‍लक बात
की कहब सजनी
प्रेमक बँाध
सभसँ मजबूत
तोड़लौं सँ नै टुटै।

70. खूनक दाग
सभसँ अछि‍ पक्‍का
मि‍टैत नहि‍
कारी दागसँ भारी
बड़ पैघ बीमारी।

71. सच्‍चा इंसान
ज्ञान धर्म ईमान
उच्‍च ि‍वचारि‍
मानवक श्रृंगार
कार्य करै महान्।

72. सूर्य रौंद सँ
धरती तैप तैप
शुद्ध होयत
सोना तपै आगि‍सँ
धर्म सँ तपै लोक।

73. मोछक मान
राखै छै घरवाली
सेवक करै
घरक रखवाली
गाय छै हि‍तकारी।

74. दुर्जन साधु
नौकर बेईमान
कपटी ि‍मत्र
ई तीनु छी शैतान
क्षणमे लेत प्राण।

75. खाना खजाना
जनाना पखाना केँ
पर्दामे राखू
जौं राखक बाहर
ि‍बख बाि‍न जाएत।

76. प्रीत नै जानै
ओछी जाि‍त, नीन नै
टुटल खाट
प्‍यास नै धोबी घाट
सभ कहै छै बात।

77. बैल खींचैत
अछि‍ काठक गाड़ी
मनुख खींचै
छै दुि‍नयाक गाड़ी
की बनल लाचारी।

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१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
      
        
किए हँसबै छऽ मिथिला  केर नाम भैय्या ?
            (गीत)

होइ छऽ मिथिला केर कण कण निलाम भैय्या ।
कोना  तोँ   सभ  करै  छऽ  अराम   भैय्या ??

धरती ई जनकक आइ आहत पड़ल छऽ ।
तोरहि  सभ   केर   बाट  तकै   छऽ ।
कोना  बैसल  छऽ  मूनि  आँखि  कान भैय्या ?
कोना  तोँ   सभ  करै  छऽ  अराम   भैय्या ??

मिथिला केर माटि केर बोली लगै छऽ ।
खरिहानहि  पैसि, दुष्ट गोली दगै  छऽ ।
हृदय  मैथिलीक  भेलह  लहु लुहान  भैय्या ।
कोना  तोँ   सभ  करै  छऽ  अराम   भैय्या ??

मिथिलाऽक नाँव बेचि गद्दी चढ़ै छऽ ।
पाछाँ सऽ  एकरहि  गर्दनि कटै छऽ ।
कतऽ   गेलह  तोऽहर    शान    भैय्या ?
कोना  तोँ   सभ  करै  छऽ  अराम   भैय्या ??

छीः छीः तोरा की लाजो ने होइ छऽ ।
कुक्कुर जेकाँ  अँइठ पातो  चटै छऽ ।
किए  हँसबै  छऽ  मिथिलाक   नाम   भैय्या ?
कोना  तोँ   सभ  करै  छऽ  अराम   भैय्या ??

ककरा दृष्टि मे नीक, के कह ?
       (कविता)

तन  सुन्नरि हम देखि रहल छी,
मन  सुन्नर - से  कोना  कहू ।
तन  केर सुन्नरता घातक थिक,
जँ सुन्नर मन  केर  बिना रहू ।।

अहँ सुन्नरि छी, बड़ सुन्नरि  छी,
चर्चा   पसरल  सौंसे  जग  मे ।
पर सुन्नरता की थिक - के कह ?
के  एकरा  फरिछाओत जग मे ??

नञि ठोस तरल वा गैस ई थिक,
हो  मानक  परिभाषा   जकरा ।
ककरा  दृष्टि  मे नीक  के कह ?
थिक कक्कर अभिलाषा  ककरा ।।

तन केर सुन्नरता  चञ्चल  थिक,
मन  केर  सुन्नरता   रहए थीर ।
मन सिन्धु  समान अथाह, स्वच्छ,
तन   बरसाती   धाराक   नीर ।।

तन भ्रामक थिक, तन नश्वर थिक,
नहि  प्रेमक थिक  ओ परिचायक ।
नञि  तऽ, श्रीकृष्णक  की  हस्ती ,
जे बनितथि   सभहक नायक ।।

सुनइत   छी   लैला  कारी  छलि,
कोयली  कारी  से  जनितहि  छी ।
आँखिक   पुतरी   होइतछि   कारी,
गुन एकर विश्व भरि मनितहि छी ।।

हो  तन  सुन्नर,  हो  मन  सुन्नर,
तऽ  एहि सँ  बढ़ि कऽ की  होयत ?
नहि  चरम  मेल  दुहु  केर सम्भव,
जँ  होयत,  तऽ  बढ़ि  की होयत ??

की  इएह   कहाबैछ   सुन्नरता ??
          (कविता)

तन गोर, नयन  हिरणी सनि हो,
हो  अंग   अंग  मे  चञ्चलता ।
दुहु  ठोर  पात तिलकोरहि  सनि,
पातर  कटि  मे  हो  लोचकता ।।

हो पीनि पयोधर  शिरिफल  सनि,
मुस्कान  भरल   हो   मादकता ।
दाड़िम  दाना  सनि  दाँत  जकर,
हो  केश   मे  मेघक  पाण्डरता ।।

हर  अलंकरण   सज्जित  तन  पर,
हर  चालि - चलन  मे  अल्हरता ।
की  एतबहि  सँ ओ सुन्नर अछि ?
की  इएह   कहाबैछ   सुन्नरता ??
        

 २.नवीन कुमार "आशा"
मिथिलामे बसए प्राण

संस्कारक होइ छी धनी
सदिखन सबहक हृदय बसी
प्रतिभाक होइ छी खान
सभ ठाम छोड़ी अपन निशान
चाहे रही कतबो असगर
ओतौ बना ली एकटा समाज
किछु-किछु अछि दुर्गुण
तैयो लोक कहए निपुण।
भोरे-भोर उठी नहाइ
भगवानक सुमिरण हृदय बसाइ
तखन करी एतऽ ग्रहण
फेर करी ओतौ विचरण

ठाढ़ रहै छी सदिखन सधने
नै बूझब छी अकान
जखन होइ छै गलत
तखन खोली अपन जुबान

जखन होइ अछि बड़ गुणगान
तखन बाजी ठहरू श्रीमान
बैसऽ काल मुँह राखी चुप
आबऽ दैत छी पहिचान

मिथिलाक छी हम वासी
मैथिली अछि हमर भाषा
माता-पिताक करी सम्मान।

मिथिलाक अछि पहिचान
धोती-कुर्ता पान-मखान
कतबो रही दूर देश
तखनो बसए मिथिलामे प्राण
मिथिलामे प्राण
बस आब आशा देत पहिचान
घानेरामपुरमे अछि ओकर मकान
अछि मुखसँ कनी कठोर
पर राखए सबहक ओ मान
संस्कारक होइ छी धनी
(माँ मिथिलाकेँ समर्पित)



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१.प्रभात राय भट्ट  २. अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र
१.
प्रभात राय भट्ट
दहेज मुक्त मिथिला बनाबू
समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज //
की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२

बेट्टा बनल अछि मालजाल बाप बनल पैकारी
दहेजक
 आगिमे जड़ि रहल अछि बहु बेट्टी बेचारी
समाजमे दहेजक रोग लागल अछि बड भारी
जौं उपचार नहि करब तँ फैल  जाएत महामारी
समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज //
की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //२
बेट्टी जन्म लैते बाप माथ पएर हाथ धरै
बेट्टीक ब्याह कोना करब चिंतामे डुबल रहैए
शिशु हत्या  करैए  कियो भ्रूण हत्या करैए
आगि
 लागल दहेजक बेट्टी जड़ि मरि मरैए
समाजक कलंक बनल अछि
 तिलक दहेज //
की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //
मैथिल ललना पढ़ि लिख भोगेलथि विद्द्वान
मुदा दहेज छै अपराध ई किनको नहि ज्ञान
मांगी
 दहेज किए करैतछी बेट्टी बहुक अपमान
करू आदर्श ब्याह यौ ललना बढ़त अहांक शान
समाजक कलंक बनल अछि तिलक दहेज //
की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //

उठू जगु मैथिल ललना बढ़ू आब आगू
तिलक
 दहेजक विरुद्ध एक अभियान चलाबू
मैथिली वैदेही
 जानकीक भ्रूण हत्यासं बचाबू
उठू
 जगु मैथिल दहेज मुक्त मिथिला बनाबू
समाजक कलंक बनल अछि
 तिलक दहेज//
की जाने लोग कोना करैए एकरा परहेज //

 

अमरेन्‍द्र कुमार मि‍श्र
पि‍ताक नाओं- श्री वि‍नोद मि‍श्र
गाम- बेरमा
भाया- तमुि‍रया
जि‍ला- मधुबनी
(बि‍हार)


कवि‍ता-
नेता
गामक नेता देशक नेता
राज आ समाजक नेता
होइत अछि‍ कमजोर आ होशि‍यार
अप्‍पन नकली बात बना कऽ
करैत अछि‍ जनतासँ प्‍यार

नेता मुर्ख हुअए वा गमार
कहैत अपने-आप बुद्धि‍यार
चौक-चौराहा भाषण दऽ कऽ
मचा रहल अछि‍ भ्रष्टाचार
गामक नेता................।

ई नेताजी जुर्मक बेटा
जनता सभकेँ लोभा लेता
बान्‍ह-सड़कमे माल बनेताह
मजदुरि‍योपर ई टेक्‍स लगेताह
करताह हरदम अत्‍याचार
जनता लग रखता खाली वि‍चार
गामक नेता..................।

जखन आएत चुनावक बेर
परचा आ भाषणक बेर
गाम-टोल घुमि‍-फि‍र ओ
जनताक आगू शि‍ष नवेता
लोभक रस जनताकेँ पि‍येता
वैलेट पेपर हाथमे थम्‍हेता
मकराक जालमे सभकेँ फॅसेता
गामक नेता देशक नेता राज आ समाजक नेता।


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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत


१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) . उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
.
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।






२.श्वेता झा (सिंगापुर)


३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।





राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद


बालानां कृते
डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह                                
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४,

मातृ भू वन्दना
   (बालगीत)

सिता मधुरम्, मधुरपि मधुरम्,
मधुरादपि  मधु  माएक  भाषा ।
संस्कृत  प्रिय,  हिन्दी  प्रियतर,
दुहु सँ  बढ़ि कऽ मिथिलाभाषा ।।

धरती  सुन्नर,  भारत  सुन्नर,
पर  सुन्नरतम   मिथिलाबासा ।
जिनगी हो समर्पित एकरहि लए,
अछि मात्र  इएह टा अभिलाषा ।।

मिट जाय भलहि, नञि हिय हारी,
सम विषम, माए अहीं केर आशा ।
रहए ध्यान सतत् अहँ चरणहि मे,
हो  हरेक  जन्म  मिथिलाबासा ।।

 सिता = चिन्नी वा मिश्री
२ मधुर /  मधूर = मिठाई
३ मधुर = मीठ

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 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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