Friday, December 23, 2011

'विदेह' ९६ म अंक १५ दिसम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४८ अंक ९६) PART III


१.ओमप्रकाश झा  -बुढिया मैंयादुर्गानंद मण्‍डल-२ टा विहनि कथा

ओमप्रकाश झा                                                
  
बुढिया मैंया (कथा)


मोबाईल पर बाबूजीक फोन आयल। हम उठेलौं त' कुशल क्षेमक बाद बाबूजी कहलैथ- "बुढिया मैंया स्वर्गवासी भ' गेलीह।" हम धक् रहि गेलौं। एखने दू मास पहिने गाम गेल छलौं, ' बुढिया मैंया स्वस्थ छलीह। ओना हुनकर अवस्था ९५ बर्ख छलैन्हि। पता चलल जे हर्ट अटैक आबि गेल छलैन्हि आ दरिभंगा ल' जैत बाटे मे हुनकर देहान्त भ' गेलैन्हि। बाबूजीक निर्देशानुसार हम तुरत गाम चलि देलियै। राति मे गाम पहुँचलौं, ' पता चलल जे दाह संस्कार लेल कठियारी गेल छैथ सब। माताजीक निर्देशक मोताबिक काठी चढेबा लेल हमहुँ कठियारी भागलौं। बुढिया मैंयाक दिव्य आ शान्त मुख देखि एना लागल जे ओ आब उठि बैसतीह। हुनका सानिध्य मे बिताओल समय मोन मे घूरिया लागल। एक दिन सब एहीना शांत भ' जैत। बुढिया मैंया कखनो केँ कहैथ रहथिन जे बौउआ, आब कते दिन बुढिया मैंया, हमर जे पार्ट छल से हम खेला लेलौं, आब अहाँ सभ अपन पार्ट खेलाइ जाइ जाउ। ठीके कहै छलखिन्ह ओ। अपन पार्ट खेला केँ कते दिन सँ हमरा सबहक पूर्वज एहीना शांत होइत रहलाह आ नबका पात्र सब मनुक्ख आ मनुक्खता केँ आगू बढबैत रहलाह। इ खेल सतत चलैत रहत। नब नब पौध आंगन मे आबैत रहत आ पुरान गाछ सब एहीना धाराशायी होइत रहत। मायाक जंजाल मे बान्हल हम सब एहीना मुँह ताकैत रहब। कतेक असहाय भ' जाइ छै मनुक्ख, जखन कियो अपन सामने सँ चलि जाइ छै आ ओ किछ करबा मे असमर्थ रहैत छै। एहने विचार सब मोन मे आबैत रहल आ हुनकर चिता जरैत रहलैन्हि। जखन दाह संस्कार पूर्ण भ' गेलै त' हरिदेव कक्का कहलैथ- "कोन विचार मे हरायल छी ओम बौउआ। चलू आब नहा केँ गाम पर चली। ओहिनो भोर भ' गेल। नहा-सोना केँ कनी सुतब, रतिजग्गा भ' गेल।" हम कहलियैन्हि- "कक्का, बुढिया मैंया बड्ड मोन पडै छैथ।" हरिदेव कक्का बजलाह- "छोडू ने इ सब गप, हमरा की नै मोन पडै छैथ। ऐ लेल गाम नै जैब की। मोन खराप क' ली बिना सुतने। अरे भेलै चलू, ९५ बरख केर पाकल उमैर मे गेलैथ, कते शोक मनायब।" हम चुपचाप चलि देलियै गाम दिस। आबि केँ नहा-सोना केँ सुतै लेल गेलौं। ओतय आँखि मुइन सुतबाक उपक्रम कर' लागलौं। आँखि मुनैत देरी बुढिया मैंया सामने ठाढ भ' गेलीह। हमरा दिस सिनेह सँ ताकैत वैह पुरना सवाल पूछ' लागली जे बौउआ खेलौं। हम हुनका एकटक ताकैत रहि गेलौं।
बुढिया मैंया हमर बाबाक काकी छलीह। हमर प्रपितामही लागैत छलीह। पूरा आंगन मे सब सँ जेठ आ आब त' बच्चा सभक संग सब गोटे हुनका बुढिया मैंया कह' लागल रहैन्हि। पूरा आंगनक बच्चा सभक सम्पूर्ण भार हुनके पर रहै छलैन्हि आ ओ एकरा पसिन्न करै छलखिन्ह। बच्चा सभ सँ खूब सिनेह रहै छलैन्हि हुनका। हमरा सभ केँ खुएनाई हुनके जिम्मा रहै छलैन्हि। जखने हम सब खाई मे एको रत्ती हिचकिचाइ छलियै की ओ तुरते तोता कौर आ मैना कौर बना केँ खुआब' लागै छलीह। माताजी गाम पर पहुँचैत देरी हमरा सब केँ हुनकर संग लगा दैत छलीह। जेना हमरा बूझल ए, बुढिया मैंया ३५ बरखक आयु मे वैध्वय प्राप्त केने छलैथ। हुनका तीन गोट पुत्र श्रीदेव, रामदेव आ विष्णुदेव छलखिन्ह। विष्णुदेव बाबाक पुत्र हरिदेव कक्का छलाह जिनका सँ हमरा बड्ड पटै छल। श्रीदेव बाबा खेती पथारी करै छलाह। रामदेव बाबा आ विष्णुदेव बाबा नौकरी करै छलाह आ आब रिटायर भ' केँ गामे मे रहै छलाह। बुढिया मैंयाक तीनू पुत्र आ तीनू पुतौह जीबते छलखिन्ह। हम नौकरी भेंटलाक बाद कखनो काल गाम जाइत छलौं त' बुढिया मैंया कहैथ जे भगवान हमरा उठबै मे किया देरी लगा रहल छैथ, हम चाहै छी जे तीनू पुत्रक सामने आँखि मुनी। पूरा आंगनक बच्चा बच्चा बुढिया मैंयाक चेला छल। हमहुँ छलौं। कियाक नै रहितौं, ओ निश्छल प्रेम, ओ देखभाल, सब गोटे केँ हुनका दिस आकर्षित करै छलै। सब पुतौह हुनका लग नतमस्तक रहैत छलीह। बुढिया मैंयाक हुकुमक अवहेलना कियो नै करैत छल। सबहक लेल हुनका मोन मे नीक भावना छलैन्हि। हम त' हुनकर जाउतक पोता छलौं, मुदा कहियो आन नै बूझलैथ। एहेन बुढिया मैंयाक पौत्र हरिदेव कक्का केर गप सँ हमरा बड्ड छगुनता लागल छल। हम सोचैत रही जे एखन चौबीसो घण्टा नै भेल हुनका मरल आ इ सब हुनका बिसरै मे लागि गेलाह। कियाक एना कियाक। ठीक छै जन्म मरण पर अपन बस ककरो नै छै, मुदा जे एतेक बर्ख धरि हमर धेआन राखलक, की हम ओकरा लेल किछो दिन, किछो बर्ख धरि नै सोची।
यैह सब सोचैत कखनो आँखि लागि गेल। एकाएक हंगामा सँ निन्न टूटल। जल्दी कोठली सँ बहरेलौं। आँगन मे बुढिया मैंयाक तीनू पुतौह वाक् युद्ध मे लीन छलैथ। पता चलल जे बुढिया मैंयाक गहना गुडिया पर बहस होइत छल। श्रीदेव बाबाक कनियाँ एक दिस छलखिन्ह आ रामदेव बाबा आ विष्णुदेव बाबा केर कनियाँ एक दिस। बहसक विषय वस्तु छल एकटा अशर्फी। बुढिया मैंयाक पेटी मे १६ गोट अशर्फी छलै। तीनू पुतौह ५-
टा हिस्सा लेलाक बाद सोलहम अशर्फी पर भीडल छलीह। पहिने कहा सुनी भेल आओर बाद मे व्यंग्य आ गारिक समायोजन सेहो भेल। हम जल्दी सँ आँगन सँ बाहर दलान पर चलि एलहुँ। ओतुक्का दृश्य कोनो नीक नै छल। बुढिया मैंयाक तीनू पुत्र हुनकर कोठलीक अधिकार एहि विषय पर धुरझार वाक् युद्ध मे लागल छलाह। हमरा इ सीन किछ किछ संसद आ विधान सभाक सीन जकाँ लागै छल। तीनू भाई अपन अपन कण्ठक उच्च स्वर प्रवाह सँ लाउडस्पीकर केँ मात देने रहथिन्ह। एना लागै छल जे एकटा लहाश आइ खसिये पडतै। हम बड्ड डरि गेलौं आ बाबू केँ फोन लगेलियेन्हि- "बाबूजी, एतय त' मारा मारीक भयंकर दृश्य उपस्थित भेल अछि। आब की हेतै।" बाबूजी कहलाह- "अहाँ नै किछ बाजब। यौ दियादी झगडा एहीना होइ छै। फेर मेल भ' जेतैन्हि।" मुदा हमरा नै रहल गेल आ झगडाक स्थान पर जा केँ हम कहलियैन्हि जे बाबा अहाँ सब क्रिया-कर्म हुए दियौ, तकर बाद एहि मुद्दाक समाधान क' लेब। विष्णुदेव बाबा बजलैथ- "समाधान ' आइये हेतै। हमहुँ तैयारे छी।" हम बजलौं- "एना नै भ' सकै ए जे ओहि कोठली केँ बुढिया मैंयाक स्मृति बनाओल जाइ।" एहि बेर श्रीदेव बाबा बजलाह- "बडका ने एला स्मृति बनबाबै वाला। बुढिया की कोनो चीफ मिनिस्टर छलै आ की कतौक प्रेसीडेण्ट।" हम गोंगियाइत बजलौं- "मुदा बाबा ओ हमरा सभक एकटा स्तम्भ छलीह। मजबूत स्तम्भ।" रामदेव बाबा मुस्की दैत हमरा दिस ताकैत बजलाह- " छौंडा चारि लाईन बेसी पढि केँ भसिया गेलै हौ। इ नै बूझै छै जे पुरना घर खसैत रहै छै आ नबका घर उठैत रहै छै। बुढिया बड्ड दिन राज केलकै नूनू, आब हमर सबहक राज भेल, हम सब फरिछा लेब।" तीनू गोटे हमरे पर भिड गेलाह। हम तुरत ओहिठाम सँ गाछी दिस निकलि गेलौं, जतय बुढिया मैंया केँ जराओल गेल छलैन्हि। साराझपी नै भेल छल। ओहि स्थान पर छाउर छल, जतय हुनका जराओल गेल छल। हमरा लागल जेना बुढिया मैंया ओहि छाउर मे सँ निकलि हमरा सामने ठाढ भ' गेलीह आ कह' लागलीह- "बउआ अही माटि सँ एकदिन हम निकलल छलौं आ अही माटि मे फेर सँ चलि एलहुँ। अहाँ कथी लेल चिन्तित होइ छी। हमर स्मृति अहाँक मोन मे अछि, सैह हमर पैघ स्मृति अछि। जखन पुरना घर खसै छै ने, ' ओकर मलबा एहिना कात क' देल जाइ छै। ओहि जगह पर नबका घर बनाओल जाइत अछि। हम पुरान घर छलहुँ, खसि परलौं, अहाँ सब नब घर छी, जाउ उठै जाउ आ नाम करू। एहि सँ हमरो आत्मा तृप्त रहत। बिसरि गेलौं, बच्चा मे अहाँ सब केँ घुआँ मुआँ खेलबैत छलौं त' की कहै छलौं नब घर उठै, पुरान घर खसै।" हमरा अपन नेनपनक खेल मोन पडय लागल। बुढिया मैंया अपन ठेहुँन पर चढा केँ घुआँ मुआँ खेलबै छलीह। की इ संसार एकटा घुआँ मुआँक खेल थीक। एहि मे एहिना पुरना घर खसा केँ बिसरि देल जाइ ए आ नबका घर सभ अपन चमक देखबैत रहै ए। हम ओहिठाम सँ सोझे बाजार दिस विदा भ' गेलौं इ बडबडाईत जे नब घर उठै, पुरान घर खसै।
दुर्गानंद मण्‍डल
२ टा विहनि कथा
पोस्‍टमार्टम

रामेश्वरबाबू गामक लब्‍धप्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍, सभ तरहेँ सुखी-समपन्न, कथुक कमी नै। कनि‍याँ गामक प्राइमरी स्‍कूलमे शि‍क्षि‍का। छठम बेतन भेने दरमोहो बढ़ि‍याँ। अपने एकटा उच्च वि‍द्यालयमे प्रधानाध्‍यापक पदपर वर्तमान कार्यरत। कुल मि‍ला कऽ मासि‍क आमदनी लाखोसँ ऊपर! लहना-पातीसँ आमदनी अलगे। स्‍वयं जतए-कतौ रहलाह। प्रधानाध्‍यापक रहबाक कारणेँ औटी आमदनीक जोगार सदि‍खन लगौने रहैत छलाह। आन-आन काज करबाक लेल आरो शि‍क्षकगण। मुदा आरम-फारम भर्ती-काल शुल्‍कादि‍सँ उपरी आदमनी अपनहि‍ जेबीमे। सहयोगी शि‍क्षक आ छात्रो सभसँ बननि‍ नै। हप्‍ता दस दि‍नपर कि‍छु-ने-कि‍छु रमन-चमन होइते रहैत छलनि‍। तखने हुनकर मन ठीक-ठाक रहैत छलनि‍। कएक बेर कौमनरूम, शौचालय, बोड  आदि‍क लेल तोड़फोर भेल, मुदा हुनका लेल धैनसन! एक दि‍नक समए छल। समैसँ घंटी लागल, प्रार्थना भेल, शि‍क्षक लोकनि‍ अपन-अपन वर्गमे गेला।

रामेश्वरबाबूक सेहो कक्षा दसमे वर्ग छलनि‍। बच्‍चा सबहक आग्रहोपर वर्ग दसमे जेबाक लेल तैयार नै भेलाह तँ सभ बच्‍चा वर्गसँ नि‍कलि‍ हि‍नका ऑफि‍ससँ खीचि‍ बाहर आनि‍ कहा-सुनीक बाद, लाते-मुक्के गत्र-गत्र फोड़ि‍ देलकनि‍। आब कहबी परि‍...... अपने करनी, गै मुसहरनीभऽ गेलनि‍।

प्रात भने गारजि‍यन सभ बजाओल गेलाह। स्‍कूलपर बैसार भेल। मनधनबाबा मास्‍सैबसँ पुछलखि‍न- मास्‍सैब, कि‍एक हमरा लोकनि‍केँ बैसौलौं अछि‍?”
रामेश्वरबाबू सभ बात कहलकनि‍। मनधनबाबा आँखि‍ मुनने नि‍चेनसँ सुनि‍ उत्तर देलकनि‍- अहाँ अपने गुरू छी बच्‍चासँ समाज धरि‍ शि‍क्षा देबक अधि‍कारी छी ओहो मात्र समाजे नहि‍ सरकारोक नजरि‍मे। तखन....?”




प्रदूषण

आजुक भैति‍कवादी युगमे वि‍भि‍न्न प्रकारक संसाधनादि‍क उपभोगसँ मानव जीवन त्रस्‍त अइ। कतौ मि‍नटो भरि‍क लेल चैन नै। बढ़ैत जनसंख्‍या, गाड़ी-घोड़ा, रि‍क्‍शा-तांगा, जर-जनरेटरक आवाजसँ कान बहीर! शांति‍पूर्ण ढंगसँ कम मीठ आवाजमे बाजब, स्‍वच्‍छ हवा लेब कठि‍न! फलस्‍वरूप नाना प्रकारक रोग-व्‍याधि‍क साम्राज्‍य पसरल अछि‍। घरे-घर नेना-भुटका सभ कोनो-ने-कोनो प्रकारक रोग-व्‍याधि‍सँ ग्रसि‍त अछि‍। तात्‍पर्य, सुख लेल एतेक संसाधन होइतो कि‍यो सुख-चैनसँ जीब नै रहल छथि‍।
दोसर दि‍स सहोदर होइतो सहोदराक संग भैयारी नै नि‍भा दुश्‍मनी राखब, प्रेमसँ नै रहि‍ झग्‍गर-झाटीमे फसि‍ जाएब। ने सुखसँ अपने रहब आ ने दोसरकेँ रहए देब।

रोगहु पुछलक मोल्हुसँ- भाय, तों तँ पढ़ल लि‍खल लोक छह। एकटा बात कहह औझका मनुखमे एतेक अलगाउ कि‍एक?”
मोल्हु बाजलाह- से नै बुझहक, ऐ सबहक जड़ि‍ बाहरी प्रदूषण नै, अपि‍तु मनुखक भि‍तरी प्रदूषण थि‍क।

 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
              पोथी समीक्षा : गामक जिनगी

हम कोनो व्यावसायिक आलोचक, समालोचक वा समीक्षक नञि छी, पर मैथिली पढ़ब लिखब नेनपने सँ नीक लगैत छल तेँ आइ एक गोट पोथीक समीक्षा लीखि रहल छी । पोथी थिक श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी रचित कथा संग्रह गामक जिनगी - ओना कोनो पोथीक ई हमर पहिलहि समीक्षा छी । एहि पोथीक समिक्षा पहिनहु किछु जगह ब्लॉग वा पत्रिका आदि मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि जे पढ़ि हम स्वयं पुर्ण रूपेण संतुष्ट नञि भऽ सकलहुँ आ पोथीक पुनर्समिक्षा करबाक इच्छा भेल । बहुधा देखल जाइत अछि कि कथा संग्रहक नाँव कोनो एक गोट महत्त्वपुर्ण कथा वा घटना वा अंश पर राखि देल जाइत अछि, पर एहि बेर से नहि । एहि संग्रह मे ‍१९ गोट कथाक समावेश भेल अछि आ संग्रहक हरेक कथा स्वतंत्र रूपेँ व समग्र रूपेँ संग्रहक नाँव केँ प्रतिबिम्बित करैछ । हर कथा मे गामक जिनगीक एक अलगहि स्वरुप देखबा मे अबैछ ।
                                आमुख मे श्री सुभाष चन्द्र यादव जी बहुत सटीक लिखने छथि - "एहि संग्रहक कथा सभ मे औपन्यासिक विस्तार अछि । वर्त्तमान समए मे प्रचलित आ मान्य कथा सँ ई कथा सभ भिन्न अछि । हर कथा घटना बहुलता आ ऋजु सँ युक्त अछि ।" पर एहि औपन्यासिक विस्तार आ ऋजु सँ युक्त होयबाक बादो हरेक कथा रुचिकर, लयबद्ध आ सुसम्बद्ध अछि । आधुनिक टी॰भी॰ धारावाहिकक सदृश भँसियाइत नञि अछि, दिशाहीन सन नञि बूझि पड़ैत अछि । कथा केर प्रवाह दिग्भ्रमित नञि होइत अछि । कथाक हर घटना अप्पन ऋजु वा वक्रताक बावजूदो कथाक मुख्य भावनाक वा विषयवस्तुक अनुपूरक व सम्वाहक अछि । जेना कि डाक्टर हेमन्तनामक कथा मे गामक जमीनक दियादी बँटवाड़ा, सरकारी नोकरीक झंझटि आ क्लिनिकक झंझटि आ बाढ़िक संघर्ष चित्रित अछि पर तइयो कथा मे कोनो विरोधाभास नञि अबैछ, कथा एक लय मे शान्त अखण्ड प्रवाह जेना आगू बढ़ैत रहैत अछि । 
                              रौदी दाही मिथिलाक सभ दिन सँ प्रमुख समस्या तेँ गामक जिनगी मे ओ समाविष्ट नञि हो से कोना । कथा संग्रहक आरम्भ भैँटक लावाबिसाँढ़ नामक कथा सभ सँ होइत अछि जाहि मे क्रमशः दाही (बाढ़ि) आ रौदी (अकाल) केर बहुतहि सटीक व सजीव वर्णन भेटैछ । ओना मिथिलाक अभिन्न अंग होयबाक कारणेँ एहि बिभीषिका सभक विभिन्न रूपक दर्शन आनो कथा सभ मे भेटैछ पर हर बेर नऽव स्वरूप मे, पुनरुक्ति कतहु नहि । 1967 ई॰ केर अकाल मे भारतक तत्कालीन प्रधानमण्त्री केँ देखाओल गेल छल जे कोना मुसहर लोकनि बिसाँढ़ खा कऽ अपन जीवनक रक्षा कएलन्हि तकरे अधार बना कऽ बिसाँढ़नामक कथा लिखल गेल अछि । यद्यपि ई एहि प्रकारक कथा मैथिली साहित्य मे बहुत पहिनहि अयबाक चाहैत छल पर नहि आबि सकल, एखन आयल अछि मैथिली साहित्यक धरोहड़ि कथा बनत ।
                                     जिनगी वास्तव मे एकटा संघर्ष थिक, पर जे हिम्मत नञि हारैत अछि, परिस्थितिक सामना करैत अछि आ आगाँ बढ़ैत अछि सएह जीतैत अछि । ई एहि संग्रहक पुर्वार्धक हरेक कथाक मूल मण्त्र अछि तथापि पढ़बा मे उपदेशात्मक कथा सनि बोझिल कथमपि नञि बूझि पड़त । हर कथा मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक वर्गक जीवन संघर्ष केँ सजीव रूपेँ चित्रित करैछ चाहे ओ बोनिहारिन मरनीहो, ठेलाबला हो, चूनवाली हो, दू पाइ कमयबाक इच्छा सँ दिल्ली जायबला फेकुआहो, पीरारक फऽड़ बेचि गुजर कएनिहार पिचकुन आ धनियाहो वा जीविकाक लेल संघर्षरत शोभाकान्त व उमाकान्तहो । चाहे ओ जीवनक उत्तरार्ध मे गाम आयल श्रीकान्त आ मुकुन्दहोथि, नऽव युगक जीवनक अभिलाषी कुसुमलालहो, माए बाप केँ एकसरि छोड़ि अमेरिका बसनिहार रघुनाथहो अथवा अप्पन निजि जिनगी आ ऑफिसक बीच ओझड़ायल डॉक्टर हेमन्तहो । 
                 किनको मोन मे भऽ सकैत छन्हि जे जिनगी तऽ ओहिना संघर्ष थिक - ओहि मे ई संघर्षक खिस्सा पिहानी के पढ़त ? पर से नहि, लेखक केँ मनोविज्ञान पर एतेक जबर्दस्त पकड़ि छन्हि जे ओ जिनगीक संघर्षक एहि कथा सभ केँ सेहो अत्यन्त सहज ओ रुचिकर ढंग सँ प्रस्तुत करबा मे सक्षम भेलाह अछि । कोनो कथा कत्तहु निन्नक गोली सनि नञि बुझना जायत । पात्र सभक नाँव गाँव भले जे हो पर कथा पढ़बाक काल हर वर्गक पाठक लोकनि केँ कथा अपनहि वा अपनहि कोनो सर सम्बन्धीक बुझि पड़तन्हि ।
                                   बहुतेक कथा जिनगीक संघर्ष वा दुख सँ प्रारम्भ होइत अछि पर सुखान्त अछि ई पाठक केँ एक मनःस्फुर्ति दैछ । किछु कथा किछु वर्ग व ओहि वर्ग सँ जुड़ल व्यवसायक सैकड़ो वर्षक उतार चढ़ाव व संघर्ष केँ चित्रित करैछ, जेना कि कुम्हार (हारि जीत) , चूनवाली  आदि । वास्तव मे ठेलावला, रिक्सावला, चूनवाली, बोनिहारिन, कुम्हार आदि सभ तऽ अपनहि मैथिल समाजक अंग छथि पर मैथिली साहित्य शायदे कखनहु अपन एहि अभिन्न अंग सभक सुधि लेलक आ तेँ एहि वर्गक लोक सभ अपना केँ मिथिला - मैथिली सँ पृथक बुझैत रहलाह । ई कथा संग्रह हुनिका लोकनिक मन मे विश्वास आ ढाढ़स दैछ कि ओहो सभ एहि मैथिल समाजक अविभाज्य अंग छथि । यद्यपि पुर्व मे किछु साहित्यकार लोकनि एहि आर्थिक वा सामाजिक रूप सँ पिछड़ल , संघर्षरत समुदाय पर लिखबाक प्रयास कयलन्हि अछि पर या तऽ ओ कृत्रिम बुझाइत अछि अथवा यथार्थपरक रहितहु पाठकक लेल ओ बोझिल सन बुझना जाइछ । एहि विषय सभ पर यथार्थपरक नीक व रुचिकर कथा सभक मैथिली साहित्य मे बहुधा अभाव रहल अछि । हमरा विचारेँ एहि कथा संग्रह मे ई दोष नञि कथा संग्रह केर हरेक कथा विभिन्न समाजिक वा आर्थिक वर्गक जीवन संघर्ष केँ चित्रित तऽ करैछ पर संगहि संग पढ़बा मे रुचिकर सेहो लगैछ । एकर अतिरिक्त किछु कथा जेना कि अनेरुआ बेटाकामिनी” - अन्त मे एक गोट प्रश्न छोड़ि समाप्त होइत अछि । कथा लेखनक ई शैली मैथिलीक प्रशिद्ध कथाकार स्व॰ राजकमल चौधरीजीक कथालेखनक शैली सँ साम्य रखैत अछि जखन कि आन कथा किछु हद तक स्व॰ हरिमोहन झाजीक कथाशैली सँ साम्य प्रदर्शित करैछ । पर शैली मे एहि प्रकारक साम्य कथमपि कोनो कथाक मौलिकता केँ प्रभावित नञि करैछ । 
                   किछु लोकनिक कहब छन्हि जे लेखकक कथा संघर्षपरक छन्हि , सौन्दर्यपरक नहि । पर हमरा जनैत लेखक जिनगीक संघर्षक संग संग जिनगीक सौन्दर्यक सफल ओ सकारात्मक चित्रण कयलन्हि अछि । लेखकक सौन्दर्यबोध मात्र दैहिक नञि भऽ कऽ बहुत व्यापक अछि आ कायिक सौन्दर्यक अतिरिक्त जगह जगह पर मानसिक ओ प्राकृतिक सौन्दर्यक अजगुत चित्रण भेटैछ ।
                 लेखक जहिना मैथिल समाजक विभिन्न सामाजिक, आर्थिक वा व्यावसायिक रूपेण दलित (पिछड़ल) वर्गक जीवन संघर्ष केँ अपन लेखनी मे उताड़बा मे सफल रहलाह अछि तहिना स्त्रिगणक मनोवैज्ञानिक चित्रण करबा मे सेहो । हरेक वयसक व वर्गक स्त्रीक मनोदशाक सजीव चित्रण एहि कथा संग्रह मे यत्र तत्र भड़ल पड़ल अछि । चाहे ओ भैँटक लावा मे जिबछीहो, बिसाँढ़ मे सुगियाहो, पीरारक फऽड़ बेचनिहारि धनियाहो, फेकुआक माए रामसुनरिहोथि, पजेबा फोड़निहारि वृद्धा मरनीहोथि वा मरनीक संग लबलब कएनिहारि स्वच्छन्द बाला सुगिया। चाहे पति सँ दू घड़ी बात करबाक लेल तरसैत रागिनीहो, चून बेचनिहारि मखनी”, ओकर पुतोहु फुलियावा ओकर पोती कबुतरीहो, मसोमात लुखियाहोथि, आधुनिक नऽव परिवेशक बाला सुनएनाहो अथवा कोशी कछेड़क निश्छल बाला सुलोचनाहो । 
                एकर अतिरिक्त लेखक किछु आनो सामाजिक समस्या सभ दिशि इशारा कएलन्हि अछि यथा स्त्री भ्रुण हत्या (ठेलाबला), शराबक समस्या व नऽव जीवन शैलीक लापरवाह अनुकरण (भैयारी), नऽव जीवन शैलीक महत्त्वाकांक्षा आ टूटैत सम्बन्ध (बहीन, पछताबा व कामिनी), प्रतिभा पलायन (पछताबा), साम्प्रदायिक हिंसा (बहीन) आ रुपैय्याक जोड़ेँ बेमेल बियाह (कामिनी) आदि ।

                                          पोथीक भाषा शैली सर्वसामान्यक विशुद्ध मानक मैथिली थिक । ओना कतहु कतहु क्रिया आदिक प्रयोग मे मानक मैथिली सँ थोड़ेक फड़ाक बुझि पड़ैत अछि (यथा लागलकेर स्थान पर लगल”)  परञ्च ओ कथाक पात्र आ परिवेशक अनुरूपहि थिक तेँ ओ मानक मैथिली सँ पृथक नञि थिक । भाषा विन्यास बहुतहि सहज व स्वभाविक अछि तेँ बुझबा मे दुरूह नञि । किछुकेर जगह हमेशा कुछ वा कछुकेर प्रयोग भेल अछि जे बहुशः कथानकक अनुरूप सही अछि पर कतहु - कतहु मानक मैथिली मे भऽ रहल सम्वाद मे अचानक कुछया अइठीनकेर प्रवेश अखरैत अछि । एक्कहि शब्द, पात्र व परिवेशक अनुसारेँ साहित्य मे एक स्थान पर मानक भऽ सकैछ तऽ दोसर स्थान पर नञि यथा कुछया अइठीन” – जँ कथा मे कोनो गामक सर्वसामान्य लोकक वार्त्तालाप थिक तऽ ओहि ठाम मातृभाषा होयबाक कारणेँ ओ मानक मानल जायत, पर ओएह शब्द जँ कथा मे कोनो मैथिलीक विद्वान बजैत अछि वा आन लोक - जकर मातृभाषा मैथिली नञि थिक - से बजैत अछि तऽ ओहि ठाम ओ मानक सँ विचलित बूझल जायत ।  पोथी मे शब्दक वैविध्य आ खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक प्रयोग स्व॰ हरिमोहन झा जीक रचना सभक याद करा दैत अछि । खाँटी मैथिलीक विलोपित होइत शब्द सभक ई कथा सभ एक अनमोल संग्रह थिक । इतिहासक किछु एहनो बातक इशारा एहि कथा सभ मे भेटैछ जे शायद एखनुका पीढ़ीक धिया पुता केँ नञि बूझल होन्हि यथा चून पहिने डोका सँ बनैत छल (चूनवाली) , कोना छतौनी सन सन मैथिल क्षेत्र मे अपनहि गलती सँ आन भाषा - भाषीक आधिपत्य भेल (बोनिहारिन मरनी) आदि ।
            अन्त मे हम श्री गजेन्द्र जीक पाँती (पोथीक पश्च मुखपृष्ठ पर देल) केँ दोहड़ाबए चाहब जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जी केर कथा सभ मैथिली कथा धाराक यात्रा केँ एकभगाह होयबा सँ बचा लैत अछि । एहि संग्रहक सभटा कथा उत्कृष्ट अछि, मैथिली साहित्यक रिक्त स्थानक पुर्ति करैत अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जागरणक प्रमाण उपलब्ध करबैत अछि । 
                 ओना तऽ कोनो पोथी केँ पाठ्यक्रम मे शामिल करबाक की प्रक्रिया छै से हमरा नञि बूझल पर अपन विषयवस्तु, मौलिकता आ भाषाविन्यासक आधार पर एहि कथा सभ केँ पाठ्यक्रम मे सम्मिलित करबाक चाही । केवल एक आध कथा केँ नहि अपितु सम्पुर्ण कथा संग्रह स्नातक वा उच्चतर मैथिलीक पाठ्यक्रम मे शामिल करबा जोग अछि । बहुत सम्भव अछि जे हमर ई बात आइ अतिशयोक्ति लागए पर भविष्य मे ई जरूर मैथिली पाठ्यक्रम मे अपन स्थान बनाओत । 

पोथीक नाँव
गामक जिनगी
लेखक श्री जगदीश प्रसाद मण्डल
प्रकाशक श्रुति प्रकाशन, 8/12, न्यू राजेन्द्र नगर, दिल्ली - ‍110008
दाम (अजिल्द / साधारण संस्करण‍)   -  भारतीय रु॰ 200/ मात्र, वा US $ 60



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३. पद्य











३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा"

१.कामिनी कामायनी- द्रौपदी २.भावना नवीन- गजल

कामिनी कामायनी
द्रौपदी
सखा कहू रहस्य जिनगीक
हमरा किछु नै सुझैए
आगाँ आगाँ दू डेग फराक
हतभाग्य हमर चलैए ।
      संकट बाधा विध्न बहुल
       धेने पछोर किए हम्मर
        सुख चैनसॅ भरल जिनगी
        लिखल किएक नहि गिरधर 
जहिना चलल जनमक खिस्सा
तहिना सकल यौवनक
कहै लेल रानी, महल नसीब नै
देखल भटकि कऽ वनमे
     सूरज अहिना उगथि पुरूबमे
पच्छिम अस्त होबैत छल ।
दारूण दुख विपदाक संग कहुना
दिवस हमर कटै छल ।
     भोर साँझ  नित देव पितरक
      हमहूँ ध्यान करैत छी ।
      मानव तन एक बेर खसैत अछि
       हम नित रोज मरै छी ।
रूप गुणसँ सजल बहादुर
हमरे पति कहाबथि
बाट बाट पर खतरा जिनका
हरदम घेरय आबै ।
    कहू सखा हम कोना कऽ जिबतौं
     जौं संग अहाँ नै दैतौं
     मनक तार तरंगित करि कऽ
बुद्वि बल नहि भरितौं ।
     मोन पडै छै एखनो ओ दिन
    रोम रोम सिहरैत अछि ।
    कोना द्युतमे दाव लगा कऽ
    हमरो सभ हारैत अछि ।
आएल जखन भवनमे हम्मर
दूत सुनाबए खिस्सा
कहने छलहुँ तमकि कऽ हमहूँ
हारल के कोन हिस्सा
    हारि चुकल जे अपने पहिनहि
   हमरा की दाँव लगाओत
  पूछू जा कए गुरूवृन्द सॅ
ई अधिकार के पाओत ।
           न्यायक गप सुनि दुर्योधन 
          कड़कि गरजि कऽ बाजल
         झोंट पकड़ि दासी ला जल्दी
       जौं नै होइ छै आएल
अन्तःपुर सॅ दरबार धरि
सौ जोजनक छल दूरी
मुदा दूत राजा के आएल
देखबैत किछु मजबूरी
         भरल सभामे जेठ श्रेष्ठ लग
कऽल जोरि कऽ कानैत 
कातर दृष्टि ताकि रहल अछि
गुरूजनसॅ किछु मांगैत।
     विदुर धृतक वाक् बन्न छल
    पांडव मूॅह लटकौने ।
 कहै बहुरिया जे प्रजा गण
तिनको किछु नै फुरैलन्हि।    

 
भावना नवीन
गजल

अहाँक मुस्की हमरा नीक लागल
लजा गेलों अहाँ हमरा नीक लागल

जाने कहिया अहाँसँ हेतीऐ मिलनाइ
अचक्के एनाइ अहाँक हमरा नीक लागल

रही तँ हमरा लेल अहाँ अनचिन्हार
अहाँसँ बतियेनाइ हमरा नीक लागल

चलि गेलौं अहाँ "भावना" मे बहि कऽहमर
अहाँक यादिमे कननाइ हमरा नीक लागल


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१.ओमप्रकाश झा- सातटा गजल २.जगदीश प्रसाद मण्डल- कविता- संघर्ष

संघर्ष
ओमप्रकाश झा

 
गजल
सब कहै ए पंचतत्व मे आइ अहाँ विलीन भ' गेलौं।
हम निशब्द भेल ठाढ छी, देखियौ वाणी-हीन भ' गेलौं।

नब वस्त्र पहीरि अहाँ कोन जतरा पर निकललौं,
बाट जोहैत छी एखनो, अपस्याँत राति-दिन भ' गेलौं।

अंगुरी अहाँक पकडि बाध-बोन हम घूमैत छलौं,
आब कहाँ ओ अंगुरी, हम बाट नापि अमीन भ' गेलौं।

जेनाई छल निश्चित, यौ दिन तकेने अजुके छलियै,
बंधन कोना केँ तोडलियै, कानैत आब बीन भ' गेलौं।

चिंतित "ओम"क तन्नुक कन्हा आब कोना बोझ उठेतै,
गेल आब अहाँक छाहरि, हम छत-विहीन भ' गेलौं।
(१३.१२.२०११ केर राति हमर छोटका बाबा(हमर पितामहक अनुज) 88 बरखक अवस्था मे स्वर्गवासी भ' गेलाह। हुनकर स्मृति मे हम अपन भावांजलि ऐ गजलक माध्यमे प्रकट भेल। दिवंगत आत्माक शांति भेटैन्हि, येह परमात्मा सँ प्रार्थना अछि।


अपने खोज मे अपन मोन हम धुनैत रहै छी।
छिडियैल मोती आत्माक सदिखन चुनैत रहै छी।

आनक की बनब, एखन धरि अपनहुँ नै भेलौं,
मोन मारि केँ सब गप पर आँखि मुनैत रहै छी।

कहियो भेंटबे करतै आत्माक गीत एहि प्राण मे,
छाउर भेल जिनगी केँ यैह सोचि खुनैत रहै छी।

झाँपै लेल भसियैल जिनगीक टूटल धरातल,
सपनाक नबका टाट भरि दिन बुनैत रहै छी।

बूझि सोहर-समदाउन जिनगीक सभ गीत केँ,
मोन-मगन भेल अपने मे, हम सुनैत रहै छी।
---------------- वर्ण १९ ----------------


हेतै की आब बूझाय नै एहि देश मे।
देश फँसल अछि घोटाला आ केसमे।

कोना केँ बचायब आब घर चोरी सँ,
फिरै छै चोर सगरो साधुक भेष मे।

जरै छै गाम, तखनो बंसी बजाबै ओ,
बूझै नै लिखल देबालक सनेस मे।

शिकारी मनुक्खक बनल छै मनुक्खे,
गोंतै छै सब बाट आ घरो कलेश मे।

बेईमानीक पताका फहरै आकाश,
पाकै ईमान आब पसरल द्वेष मे।
---------- वर्ण १४ ------------


हम त' केने बहाना राम केर, अहींक नाम लैत छी।
बनि गेलौं हम चर्चा गाम केर, अहींक नाम लैत छी।

रखने छी करेज सँ सटा केँ यादि अहाँक सदिखन,
हमरा काज की ताम-झाम केर, अहींक नाम लैत छी।

ताकि दितिये कनी नजरि सँ मुस्कीया केँ जे एक दिन,
काज पडितै नै कोनो जाम केर, अहींक नाम लैत छी।

हमर काशी, मथुरा, काबा सब अहीं मे अछि बसल,
जतरा भ' गेल चारू धाम केर, अहींक नाम लैत छी।

रोकि सकतै नै जमाना इ मोन सँ मोनक मिलनाई,
मोन कहाँ छै कोनो लगाम केर, अहींक नाम लैत छी।
--------------------- वर्ण २० --------------------


देखि हुनकर असल रंग, भक हमर टूटि गेल।
पोखरि मे सब नंग-धडंग, भक हमर टूटि गेल।

सभ आँखिक नोर सुखायल, आगि एहेन छै लागल,
देखि केँ कानैत यमुना-गंग, भक हमर टूटि गेल।

बूझलौं अपना केँ कपरगर, एकटा संगी भेंटल,
छोडि देलक ओ जखन संग, भक हमर टूटि गेल।

कते बियोंत लगाबै छलौं अहाँ केँ अंग लगाबै लेल,
जखन लगेलौं अंग सँ अंग, भक हमर टूटि गेल।

मस्तीक नाव भसिया गेल छै समयक ऐ प्रवाह मे,
छलौं यौ हमहुँ मस्त-मलंग, भक हमर टूटि गेल।
----------------- वर्ण २० --------------------

हमरा सँ की नै करेलक सिहन्ता हमर।
सदिखन खाली कनेलक सिहन्ता हमर।

अहाँ भेंटतौं, से हमर कहाँ इ भाग्य छलै,
मुदा अहीं दिस बढेलक सिहन्ता हमर।

सुरूजक आगि सँ बचू, यैह जमाना कहै,
बाट सुरूजक धरेलक सिहन्ता हमर।

चान मुट्ठी मे बन्न कैल ककरो सँ नै भेलै,
हमरा यैह नै सिखेलक सिहन्ता हमर।

"ओम"क सिहन्ता जेना कतौ मरि-हरि गेलै,
सबटा सिहन्ता जरेलक सिहन्ता हमर।
--------------- वर्ण १६ ---------------

आउ मजा लिय' शुरू फेर खेल भ' गेलै।
देखू खेलनिहार सब मे मेल भ' गेलै।

कोनो नियम-निष्ठाक जरूरति नै एत',
कोनो दोग सँ ढुकु, ठेलम-ठेल भ' गेलै।

जकरा किछ लागल नै हाथ, हल्ला करै,
जे लेलक मजा ओकरा त' जेल भ' गेलै।

टिकट बाँटै आ काटै केर कबड्डी शुरू,
चुनाव भेलै नै जेना कोनो रेल भ' गेलै।

जीतला पर सुन्नर कोठा-गाडी भेंटत,
बाटक इ धूरि जनताक लेल भ' गेलै।
-------------- वर्ण १५ ------------

जगदीश प्रसाद मण्डल
संघर्ष

पएर पंज पबि‍ते पबैत
पैजनि‍ चाह करैए।
तहि‍ना चाहि‍ चेत कुंड
धारण जि‍नगी करैए।
काया-माया संग सदए
मि‍लि‍ संग जि‍नगी पबैए
शि‍व सदृश्य सीमा सि‍रैज
राति‍-दि‍न रूप धड़ैए।
बीच कृष्‍ण घन-श्‍याम जना
महाभारत द्वापर रचैए।
संग मि‍लि‍ तहि‍ना सदए
वि‍परीत दि‍शा धड़ैए।
एक कौरब एक पांडव बनि‍
शरीर-शरीरी खेल करैए।
गीता गाबि‍ सम्‍हारि‍ शास्‍त्र
लीला जि‍नगीक रचैए।
भरल हाथ एक, एक नि‍हत्ता
उतड़ि‍ भूमि‍ वंश कुरूक्षेत्र।
हारि‍-जीत संगे सि‍रैज
संगे-संग रक्‍छो करैत।

ि‍नर्जीव दूध नि‍कलि‍ सजीव
आगि‍ चढ़ि‍ आरो ि‍नर्जीव बनैए।
कहि‍ दही मटकुर सजि‍
दूध-दही कहबैए।
होइते ठाढ़ि‍ बनि‍ते दही
प्रेमी चाह करैए।
पाबि‍ प्रेमी प्रेम पकड़ि‍
पपीहा नाच करैए।
पकड़ि‍ संग संगी बना
मर्त सर्ग सज सजैए।
कहि‍-कहि‍ जीवन-मरण
साँझ-भोर डहकैए।
अदय-अस्‍त नचि‍ते-नचैत
भू-भूलोक भुलबैए।
बरि‍स बादल गरैज‍-गरैज‍
मन मगन करबैए।
आशा-आस सटि‍ते-सटैत
आँखि‍ धार धारण करैए।
पकड़ि‍ प्रेम पड़ि‍ पएर
राहीक राह रचैए।
सीचि‍ जल शीतल बन मन
चलए संग कहैए।
बि‍नु सि‍रक राही रचि‍
भवसागर टपए कहैए।

अजस्र धार भवसार सजल छै।
नाओं एक खाली पड़ल छै।
डेग-डेगी डेगि‍ते डगै छै
डगमग-डगमग पएर करै छै।
डोर-डोर पकड़ि‍ डारि‍
बनि‍-बनि‍ सुत घि‍चै छै।
बनल सूत राही जेना
तहि‍ना सगरो पसरल छै।
पि‍छड़ि‍-पि‍छड़ि‍ दीन-हीन
रूप सजि‍ सटै छै।
कि‍यो सटए झूलैत दहि‍ना
वामा कि‍यो सटै छै।
कि‍यो सटै कोनो कोनचर
कि‍यो बीचे-बीच उड़ै छै।

सदएसँ होइते एलैए
होइते रहतै आगूओ दि‍न।
अन्‍हार-इजोत बीच सदए
दि‍न-राति‍ बीच दुर्दिन
दि‍न-दुर्दिन बनि‍ते बनैत
अकास बीच उड़ैए।
सुदि‍न-कुदि‍न सीमा पकड़ि‍
नि‍हाड़ि‍ नजरि‍ नचबैए।
डि‍म सतमी भगवती जेना
सि‍रजए सदैत ज्‍योति‍ शक्‍ति‍क।
राति‍-महाराति‍ बैस बीच
दर्शन दि‍शा दैत भक्‍ति‍क।
शक्‍त-शक्‍ति‍क संग सदए
जि‍नगीक होइत संघर्ष।
सीमा बीच जखन अबैत
मचबए लगैत दुर-घर्ष।
घर्ष-दुरघर्ष बीच जखन
जि‍नगी करए रस्‍सा-कस्‍सी।
बीच समुद्र सि‍रैज‍ मथान
पकड़ए लगैत अपन-अपन मस्‍सी।
आँखि‍ मि‍चैनी खेल अजीब
कखन सुर-असुर बनैत।
असुर-सुर बनि‍ते, बनि‍
कर्म-अकर्म एकबट्ट करैत।


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 १. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल२.मिहिर झा ३.जगदानंद झा 'मनु'



जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल

गजल

टूटल छी तें गजल कहै छी
भूखल छी तें गजल कहै छी.

ऑफिस-ऑफिस हमहूं गेलहुं
लूटल छी तें गजल कहै छी.

घरमे बैसल दुनिया देखू
गूगल छी तें गजल कहै छी.

खापड़ि सं परिचय अछि हमरो
भूजल छी तें गजल कहै छी.

उखड़ि आओर समाठ जनैए
कूटल छी तें गजल कहै छी.

यात्रीजीक अहां बलचनमा
सूतल छी तें गजल कहै छी.

हम खट्टर कक्काकेर तबला
फूटल छी तें गजल कहै छी.
 

नदी छोड़ि कनहरमे एलहुं
गाम छोडि कशहरमे एलहुं.

कहलक लोक शराब ने पीबू
हम नहि ककरहु कहलमे एलहुं.

तीन साल धरि रहलहुं मंत्री
चारिम साल जहलमे एलहुं.

जय हो जय हो के बी सी जी
खोपड़ी छोड़ि महलमे एलहुं.

बाट तकैत छलहुं फगुआमे
आखिर जूड़शीतलमे एलहुं.

आइ राति भरि करू तपस्या
आइ कथी लेसहलमे एलहुं.

रूसल रहलहुं अहां कते दिन
आइ हमर एहि गजलमे एलहुं.

मिहिर झा
जमाना आब नहि सोहाइये
अपना से गॅप करै मे डर लगैये
विचार सब मोन से निकलि मुह मे अछि
ओकरा मुह से बजै मे डर लगैये |

जमाना छल खूब ठिथीयायत छलहु
सभ से खूब गपियायत छलहु
मोन रहैत छल प्रसन्न
अनको प्रसन्न रखैत छलहु |

धीरे धीरे चुप्पी आयल
अपन लोक सब छिरियाल
बजेलो पर आब कोई नई अबेयै
जमाना आब नहि सोहाइये |
जगदानंद झा 'मनु',
पिता- श्री राज कुमार झा, जन्म स्थान  पैत्रिक गाम : हरिपुर डिहटोल ,जिला  मधुबनी, शिक्षा :प्राथमिक -ग्राम  हरिपुर डिहटोल मे, माध्यमिक आ उच्च माध्यमिक -सी बी एस ई, दिल्ली, स्नातक -देशबंधु कालेज ,दिल्ली बिश्वविद्यालय

                          गजल 
भाइ आब हमहूँ लिखब अपन फुटल कपार पर
जेना इ भात-दालि तीमन ओकर उपर अचार पर

सोन सनक घर-आँगन,स्वर्ग सन हमर परिवार
छोड़ि एलहुँ देस अपन दू-चारि टकाक बेपार पर

कनियों आटा नहि एगो जाँता नहि करछु कराही नहि
नून-मिरचाइ आनि लेलहुँ सभटा पैंच-उधार पर

चिन्हलक ने केओ ने जानलक टुग्गर बनि रहलहुँ
गेलहुँ इ अपन माटि-पानि छोड़ि दोसरक द्वार पर
 

हम कमेलहुँ धन ओ भरि लेलक हमर घर खालिए
आब बैसल हम कनै छी अपन फुटल कपार पर
 
सुगँधसँ सराबोर सुगन्धित सुंदर सजनी सुगंधा
हमर ह्रदय ओ जा बसली  अदभुत सुंदरी सुगंधा 

जिनक सुगंध चहुदिस नभ-थल कए  कण-कण मे
रोम-रोम मे हमर ओ बसल छथि प्राणेश्वरी सुगंधा 

सुर कए श्याम जेना राधाकेँ नटवर मुरली वजैया
श्वाँस-श्वास मे ओ छथि समायल हमर सजनी सुगंधा

जिनक नशा मे ई रचलौंहेँ हम सुर-सुगन्धित सुगंधा 
ओ छथि हमर ह्रदयक रानी प्राण सँ प्यारी सुगंधा 

ध्यानमे मानमे जिनकर आनमे अर्पित अछि 'सुगंधा'
भूल हुअए त मानियो जाएब 'मनु' मनके रानी सुगंधा    
                   
किनका कहियौन्ह पतियौता कए
हमर मोनक व्यथा बुझता कए

दिन भ्रि हम फर-फराइत  छी 
बुझु जेनाँ पंछी बंद पिंजरा कए 

हम मकड़ा जाल मे ओझरैल छी 
ने बुझहु हम नारी मिथिला कए 

दुनियाँ कए तँ बात  नहिये  पूछू
लोक-व्यवहार केलक कोना कए    

मुनलएन  केबार विधाता सेहो 
अबितए कोइखमे ममता कए 

पुत्र अहीं कए हमहूँ छी हे माँ
नजरि किएक फेरैत छी हे माँ

अहाँ जगत जननी छी भवानी
अहाँ सँ छिपल किछु नै छी हे माँ

दिन-हिन् हम बालक अज्ञानी
अहाँ केँ सुमरि कऽ कनै छी हे माँ

सरधा भाव छी अहाँ वस देने
अर्पित ओकरे कएने छी हे माँ

नहि हम जानै छी पूजा-अर्चना
जप तप किछु नहि जानी हे माँ

माया मे हम घेरावल भवानी
ध्यान लगावए नहि जानी हे माँ

अहाँ मैया हम पुत्र अहीं कए
वस एतबे तँ हम जानी हे माँ

 
कविता
मिथिलाक गुणगान

सुनु मिथिलाक गुणगान अहाँ, हम की कहु अपन मोनेसँ
सभ किछु तँ अहाँ जनिते छी मुदा, हम कहैत छी ओरे सँ

उदितमान ई अछि अति प्राचीन, ज्ञानक अति भंडार अछि
ऋषि-मुनिक पावन धरती, महिमा एकर अपार अछि

ड्यौढ़ी-ड्यौढ़ी फुलबारी, आँगनमे तुलसी सोभती
कोसी-कमला मध्य वसल ई, भारतक सुंदर मोती

भक्ति-रस सँ कण-कण डुबल, अछि महिमा एकर अपार
शिव जतए एला चाकर बनि कऽ, सुनि भक्तक करुण पुकार

कलि विष्णु पूजल जाइ छथि, मिथिलाक एके आंगनमे
छैक कतौ आन ई सामर्थ कहू, होइ जइ आँखिक देखनेमे

एहि धरतीसँ जानकी जनमलि, सृष्टिक करै लेल कल्याण
श्रीराम संग व्याहल गेलि, पतिवर्ताक देलनि उदाहरण महान

आजुक-काइल्हुक बात जुनि पुछू, भ्रष्ट बनल अछि दुनियाँ
मुदा मिथिलामें एखनो देखू, सुरक्षित घरमे छथि कनियाँ

माए-बापकेँ आदर दै छथि, एखनो तक मिथिले वासी
पूज्य मानी पूजा करैत छथि, घर आबैत जँ कियो सन्यासी

आजुक युगमे धर्म बचल अछि, जँ किछु एखनो मिथिलेमे
आँखिक पानि बचल अछि देखू, जँ किछु एखनो मिथिलेमे

की कहु आब मिथिलाक महिमा,समावल जाएत ने लेखनीमे
हमरामे ओ सामर्थ नहि अछि, बान्हि सकी जँ पंक्तिमे
मैथिलीक विकासक बाधा

मैथिलीक विकासक बाधा थिक
आजुक युवाशक्ति मिथिलाक
पढि लिख कऽ बनि जाइ छथि
डाक्टर आ कलक्टर
मुदा नहि पढि-लिख सकैत छथि
मिथिलाक दू अक्षर
घर सँ निकलैत
ओ कहथिन "चलो स्टेशन"
लागैत छनि संकोच
कहै मे की "चलु स्टेशन"
जेता जखन गामक चौक पर
लागत जेना
बैस रहला मैथिलीक कोइख पर
सदिखन दुगोट समभाषी
बाजत अपने भाषा
परंच दूगोट मैथिल
जतबै लेल अपन पर्शनेल्टी
मैथिली तियागि कऽ
बाजए लगता सिसत्मेती
अपन मायक भाषा सँ
प्रेस्टीज पर लागैत छनि बट्टा
लोक की कहतनि
संस्कारी सँ भऽ गेला मर्चत्ता
संस्कारी सँ भए गेला मर्चत्ता |

 

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१.शान्तिलक्ष्मी चौधरी रवि मिश्राभारद्वाज

१.
शान्तिलक्ष्मी चौधरी
गज़ल १

गुनगुनाइत प्रेमक गीत लs कंठ भेल सधुन सितार पिया 
सिनेह खेल काल कियैक ऐना देखबैत छी लटमझार पिया 

काटु जुनि एहन जोर सँ बड्ड दुखाइत अछि ई लहरचुट्टी 
देखु सम्हैर चलु सुकुमार आंगुर नै आबि जाय मोचार पिया 

कचोर हरियर गभाइत धान सन गम्हरैत ई स्त्री-यौवन
एहन तन तरुण केर भुखायल छैक सगर संसार पिया 

सुमधुर अहाँक प्रीत संग गमकैत अछि हमर सुबदन
प्रेम-पाशक बान्हु जुनि छान खसब हम धड़मबजार पिया 

अनुराग-बिराग आतिपाति खेलि कतैक स्नेह-कलह करब 
उढ़ैर रहल आब मोन मे उठल सभ मधुरस शृंगार पिया 

"शांतिलक्ष्मी" कहैत छथि ऐना जुनि विचलित मोन हौउ हे सखि 
भरि आँखि सुप्रीतरस लs मुस्कैत भावैं भs गेलाह देखार पिया 


                               ................वर्ण २४.............
गज़ल २

धधकलै सौंसे घरक लोकवेद डिविया लुक्का भs गेलय 
फेरो बेटीये भेलय सुनिते अगिलग्गिक धुक्का भs गेलय

सौस ससुर दुनुप्राणिक मुँह बिधुयैल बकोर लागल 
अधकचरुस तमाकु सन धुयैन मुँह हुक्का भs गेलय 

बर हुनकर ओम्हर तामस सँ बोतलैल घुरै सगरे
लागय घरमे एखने चोरी चपाटी घरढुक्का भs गेलय

परसौतीक बाप माय केँ सभ दिस सँ हुरकुचैन पड़ै 
माँझघऱ लतियाति गरकैत लतिकुच्च चुक्का भs गेलय 

दर दुश्मनक करेज जुरैले तेँ ते हँस्सै-बाजै मुस्कियावै
मुँह लाल सिनुरिया आम डम्हकैत देखनुक्का भs गेलय 

अपना बेचारी प्रसवक पीड़ो सँ बेशी मोनक बेथै मरै 
मुँह फूल मौलायल वा फुलिकेँ-चुटकल फुक्का भs गेलय 

शांतिलक्ष्मीतेँ समाजक आचार देखि भालरि सन काँपय 
कलपैत छाति पर दनदन बरसैत मुक्का भs गेलय 

.........................वर्ण २२.........................

गज़ल ३

लोकपाल! लोकपाल! जनलोकपाल! जनलोकपाल! 
देसधर्म रक्षा लेल घुरि आउ हे गोविन्द! हे गोपाल! 

कुरुक्षेत्र मे ता बाकयुद्ध केर घमासान मचल छै 
अधर्म कपटी-भूप जनताकेँ पटकवा मे बेहाल 

गोंगियाइत राजाक बेलज्ज प्यादा फुच-फुच उछलै 
राज-मोहक आन्हर धृष्टराष्ट्रक घिचपिच घौंचाल 

दुर्योधन-दुसाशन राष्ट्रक चीरहरण लs आतुर 
राजलक्ष्मी केँ नग्न नचेताह मातृभुमियेक भुपाल 

भीष्म द्रोण कर्ण पदत्यागि केँ धर्मक संग ठाढ़ भेल 
s लोकतंत्रक अस्त्र, सत्य-अहिंसा उपासक सुढ़ाल 

"शांतिलक्ष्मी" कलजोड़ि अनुनय सुविनय करै अछि 
हौइयौ आबो प्रगट हे कृपाल! हे प्रभु दीन-दयाल! 

        .................वर्ण २०.............

गज़ल ४

सोसल साइट पर करैत छै सेंसर के दाबी रे भाय 
अभिव्यक्तिक स्वच्छंद साँढ़ मुँह बन्हबै की जाबी रे भाय 

जखन चुट्टी केँ घरघरावै मौत निकैल आबै छै पाँखि 
आकि नढ़ियाक पैइर जे शहर दिस पराबी रे भाय 

राखै देने छियौ बंदुक तँ देखवै छै हवलदारी रौव 
पदक निंशा मे एना भँगेरी जकाँ जुनि बौराबी रे भाय 

नागरिक अधिकार मान केँ मरदें भs गेल छै हिंसक  
हमरे पोसल बिलाय हमरे मिआँऊ सुनाबी रे भाय 

देसक दहिण करूआरी धs तुँ हमरे प्रतापेँ  बैसल 
हमरे किचकिचावै की फ़ुरलौ जे मल्हार गाबी रे भाय 

"शांतिलक्ष्मी" अहुँ नै करी अमोघ अस्त्रक अभद्र प्रयोग 
पाकिस्तानक हाथ जेना अणुशक्ति शालाक चाबी रे भाय 

           ................वर्ण २१...........

रवि मिश्राभारद्वाज
ग्राम : ननौर
जिला : मधुबनी

 
'गजल'


 
सजबै अहाँ एना त दिन मे चान उगि जेतै
देखी अहाँ के हमर करेजा मे उफान उठि जेतै

अहाँक झलक पावक लेल बैसै छि जे दलान पर
लोक कहीं बुझि गेलै त ऒ दलान छुटि जेतै

मोन हमर बहुत चंचल ताहि पर ई यौवन
एना जे नैना चलेवै त हमर ईमान झुकी जेतै

हमर जान जुरल जा रहल या अहाँक जान सँ
ज अहाँ आब रोकबै त इ नादान रुठि जेतै
 
अहाँक चौवनीया मुस्की केलक घायल
मोन हरौलक अहाँक छमछमायत पायल

केलक एहेन जादु अहाँक नैना के तीर यै
देखलौव बहुत मुद कियो दोसर नै भायल

कतय चुरौलौ अहाँ हमर मोन यै
कने कहु कतय अछि हमर मोन हरायल

आँखि सँ चुरा क नुकौलौ करेजा मे
फसल एना ककरो घिचनौ ने बहरायल
 
 कविता

नवकी बहुरीया
शहर सँ एलि नवकी बहुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

पहिरने जिंस ताहि पर टँप्स गजवे
घुमे सौसे चौक चौबटिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

जेहने ढीठ तेहने निर्लज
टुकुर टुकुर देख हाँसे बुढिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

के जान आर के अन्जान
लागे जेना सब हुनक संगतुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

कतेक करब गुनगान हुनक
मुँह मे राखैत हैदखन पुरीया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

बुढ सास सँ काज कराबैथ
ठोकने रहैत दिनो के केवरिया
पुरनकी देख काटे अहुरीया

 

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१. अनिल मल्लिक २. झा हेमन्त बापी

अनिल मल्लिक
हम कहि दैत छी

आइयो सजल छी पुतरी जेहन हम, लऽ कऽ जेबैन्ह हम फेरो चाय
लाख मना केलहुँ हम फेरो, चलल हमर नै कोनो उपाय

फेर अओलथि देखबा लेल हमरा, पुत्र,पिता आ संगे माय
बजता, भुकता, देखता, सुनता फेर निकलता कहिते बाय

फेर असमंजसमे कटत समय किछु, चिन्तित रहता बाबु, भाय
भोर मन्दिरमे सांझे चौरा, सदिखन प्रार्थना करती माय

रंग,रुप,गुण चाही विलक्षण, संगे जथगर जोगार भऽ जाए
मिन-मेख हमरेमे निकालथि, अपन पुत्रक खुब बड़ाइ

हमरा देखता एना की कहथि, चलु प्रोडक्टक डिस्प्ले भऽ जाए
सोचि बुझि कऽ ने जाइ छी कतहु यौ, बेर बेरक झमेला किए भाइ?

कहिया धरि एहन सहब हम, आब करब हम ठोस उपाय
कलम बनल अछि शस्त्र हमर, आ माँ शारदे छथि सहाय

यश, कीर्ति, धन, मान, प्रतिष्ठा, सभकेँ लेब हम आब रिझाय
पीड़ा की होइ छै तखन ओ बुझता, जखन हुनका हम देब घुमाय

आजुक बाद ने सजब एना हम, ने लऽ कऽ आब जाएब हम चाय
किछु दिन बाद ओ चाहता "अपोइन्टमेन्ट", हमरा संग पिबै के चाय !!

झा हेमन्त बापी
ओझौल दरभंगा

माधुरी (एक नारी)

मस्टर साहेबक असगरे बेटी छलथि माधुरी।
संगे सतबा भाइ, भाउज रहै छलथि माधुरी।
आन्हर मस्टर साहेबक इजोत छलथि माधुरी।
खाइलै माधुरी,नित्यक्रिया ले माधुरी।
चलैले माधुरी, फिरैले माधुरी।
हुनकर बुढ़ाड़ीक ठेंगा , बनल छलथि माधुरी।
तइयो हुनकर जानक जपाल छलथि माधुरी।
सदिखन हुनकर मूहेँ, अपशब्द सुनै छलथि माधुरी।
तखनो खुशीसँ रहै छलथि माधुरी।
हसै छलथि माधुरी, गाबैत छलथि माधुरी, खेलाइत छलथि माधुरी।

मैटूअर तँ छलैथे, एक दिन बपटुअरो भेलथि माधुरी।
भाइ भाउज कहलथि माथ बथायल माधुरी।
सदिखन घरक काजमे अढ़ल रहै छलथि माधुरी।
दुनु गोटेकेँ खुश करएमे भिड़ल रहै छलथि माधुरी।
तखनो भाइक आँखिमे गड़इ छलथि माधुरी।

एक दिन कहुना बियाइहि कऽ सासुर गेलथि माधुरी।
पियक्कड़ पतिक संग उसनाइत छलथि माधुरी।
साँझ, भोरे, दिन, राइत मारि खाइ छलथि माधुरी।
साउस ससुर वरक सेवामे, मिझाइत छलथि माधुरी।
मोनक सपना मोनेमे पिस कऽ, औनाइत छलथि माधुरी।

समय बितल एक बेटाक माय भेलि माधुरी।
सोचलथि आब निक सँ, समय बितायब माधुरी।
शराब बनोउलक हुनका मशोमात ,कानैत छलथि माधुरी।
साउस ससुरसँ आब धिक्कारल जाइ छलथि माधुरी।
तखनहु आँखिक तारा बनै के परयास करै छलथि माधुरी।
कहियो दिन फिरत सोचैत छलथि माधुरी।
चौदह बरख टकटकी लगा कऽ ,निमाहि लेलथि माधुरी।

बेटा भेल सयान तँ आश केलन्हि माधुरी।
बहुरल दिन मोनमे बास कएलन्हि माधुरी।
साउस ससुरकेँ बहकेलासँ बेटासँ गारि सुनल माधुरी।
फुइट फुइट कऽ कानए लगलि देख विपदा माधुरी।
कि एहिना जनमे बितत विधाता, सोचि पड़ेली माधुरी।

अखन राहे, बाटे घुमै फिरै छथि माधुरी।
पहिनहिसॅ बेसी हसै, गबै छथि माधुरी।
बुधियार लोक सभ कहै छथि "बताहि" भऽ गेल माधुरी।
मुदा "बापी" क आँइखक नोर बनल छथि माधुरी।
जे सभ ठाम खसि रहल अछि बनि एगो माधुरी।

की नारिक इएह परिभाषा थिक

दोषी

छथि सोचिमे लल्लन बाबू, धऽ माथापर हाथ।
सौसे गाँवसँ घुरि कऽ एलाह , नै टाका भेलनि हाथ।
काल्हि बुचिया केर सगुन उठत, पूरा पाइ नै पास।
बाप पुते सभ प्राणि घर, बैसल भेल उदास।
माल जाल खेती बाड़ी बेच , किछु तँ पाइ जोगेलथि।
गहना गुड़िया बेच घरक , दहेजक सामान जुटेलथि।
सोचलनि पाग राखि पएर पर, वर पछ केँ बुझेबनि।
होइते पाइक व्यवस्था हम , किछुए दिनमे पहुँचेबनि।
घरक भीतर केवाड़ पाछूसॅ , सहमल बुचिया ताकै अछि।
कोइस रहल खुदकेँ विधाताकेँ, अप्पन भाग्यपर कानै अछि।
पहुँच लड़काक घरपर, भेल सभ बिध बेबहार।
मुदा लल्लन बाबुकेँ आँइखक आगाँ बुझल अन्हार।
देबु बाबू कहला बजा क, समधि कनी इम्हर अबियौ।
लेन देनक बात तँ अहाँ , पहिने तँ फरिछबियउ।
हाथ जोड़ि बजला लल्लन बाबू , नै भेल अखन जुगाड़।
किछु बेरक समय देल जाउ , सधा देब सभ उधार।
हम व्यापारी नै छी, सभ टा चाही एखने।
पूरा पाइ जे देब तँ सगुन, सगुन उठत आब तखने।
हाथ जोड़ि कऽ पएर धरि कऽ, लल्लन बाबू गोहरैला।
आरो सभ लोग बुझेलकनि, देबु टससॅ मस नै भेला।
हारि थाकि कऽ गमा कऽ इज्जति, लल्लन बाबु अएला घर।
वज्रपात भेल सभक उपर सुनि क
ए ई खबर
कानैत बजलाह लल्लन बाबु, एकरा कारणे इज्जैत गेल
कथिलै जनमल घर ई छौड़ी, जनैमते किए नै मरि गेल
सुनि बापक बज्जर सन बोल , बुचिया नै सहि पौलक।
चुप्पे चाप अपन कोठरीक , केवाड़ बन्द क
ए लेलक
बोझ बनि बापक उपर, जियब हम कथी ला।
लगा कऽ फसरी बुचिया अप्पन शेष केलक इह लीला।
जतए शुभक गान होइत छल, मचल ओतए कोहराम।
बलि चढ़ल एक और नारि के , लऽ कऽ दहेजक नाम।
"बापी" एक्कर के अछि "दोषी", केकरा फाँसी चढ़ायब।
लड़का या लड़काक बाप, या पुरा समाजपर दोष लगायब।

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निशांत  झा, माँ  श्रीमती मंदाकिनी देवी (प्रधानाध्यापिका म. वि.) (साहित्याचार्य), पिता श्री प्रद्युम्न नाथ झा (समाजसेवी), घर सिंगियौन, प्रखंड राजनगर, जिला मधुबनी,


मरुस्थल रूपी हृदयमे
तृष्णा
गर्म दहकैत
  बालू अछि 
की कखनो
 
हरियरीक
 लेल 
नेह रूपी जल
 भेटत ?
या
 की  
मृगतृष्णामे
भटकि
  जाएत जीवन
मोन
  आर आँखि दुनु टा  
आकाशकेँ तकैत
  
जलधरक
  प्रतीक्षामे
पुलकित होइत
  
मात्र जिन्दगी
 एकटा 
उच्छ्वास बनि कऽ
 रहि जाएत ... 
काल्हि  जे गला मिलैत छल...
आइ
 गला काटि रहल  अछि..
 काल्हि जे साथ मुसकियाइ छलए ...
आइ नोर
 बाँटि रहल   अछि....... 
देखू , समयक रचना केहेन ..
सभ कियो
 बाँटि रहल अछि अज्ञान...
कतेक बदलि गेल इन्सान ...

बदलाव
  अछि  आदति एकर.. 
तरक्कीक  नशामे  चूर  सभ ...
कनी
  कागतक  टुकड़ा  जतए...
सोचैक
 देरी  रुकत ओतए...
 काल्हि तक  जे डराइत छल ..
आइ
  बुराइ अछि  सबहक ईमान ...
कतेक बदलि गेल
 इन्सान ...

पएरमे
  माँ  स्वर्ग अछि ..
सुनाउ, सिखने छलौं कखनो यएह..
आउ देखू
 कनैत बूढ आँइख केँ ..
जमाना
  आएल अछि .. हे भगवन केहेन...
जे
  पालि-पोसि कऽ बड़का केलक..
बनि
 कऽ रहि गेल घरमे मेहमान ...
कतेक बदलि गेल
 इन्सान ...

 
नारीक  अछि रूप कतेक...
शब्दमे
  के एकर बयान करए........
अछि पल पल पूजनीय एकर ..
एक
  जीवनमे .. सातटा, बलिदान करए. .. (सात जन्मक )
सरे  आम  बिकैत अछि  .. लाज  शर्मक  गहना  आब ..
देखू
  केना  खुलल अछि ई दोकान ..
कतेक बदलि गेल
 इन्सान......

अछि आतंक चारू दिश ....नदी अछि खूनक
  ..
दिन
  दहाड़े -बाजार अछि आइ .. बौछार गारिक ..
बंद
  कर    खेल  लाशक ...आब तँ ..
मांग
  सुन्न भऽ रहल छै ...कतेक डोलीक...
काल्हि धरि जे  पूजैत छल ... गीता    कुरआन 
आइ
  पुजाए  हैवान..
कतेक बदलि गेल इन्सान
 ......
देखू
 ..
कतेक बदलि गेल ......
सभटा यादक बुनियाद अछि ई झूठ ..
आदमीक सच्चा औकाति अछि ई झूठ ..
सच कहैत अछि .. दिल .. सचाई भरम अछि ..
सबहक ठोरपर घर बनेने अछि ई झूठ ..
भूखैलक लेल तृप्त भेनाइ अछि ई झूठ
आनहरक लेल आँइख भेनाइ अछि ई झूठ...
मोन बहलाबै के बात अछि ई झूठ ..
फकीरा जे घुमैत अछि डगर डगर ...
सत्यक दर्शन नै हुअए मगर ...
भगवानकेँ पेबाक कोशिशो अछि झूठ..
आइ हवामे गर्मी अछि..
आँइखमे बेशर्मी अछि ..
मुरदा अछि एतऽ सभटा जिनगी जे चलि रहल अछि ..
खुश छी हम...
हर पल अपनासँ कहैत छी ई झूठ ..
काल्हि हमर होएत ...
एकटा नवका सवेरा होएत ...
सपनामे जंजीर आ ...
नींद मे पहरा नै होएत ...
रोज सुतऽ सँ पहिने दौगाबैत अछि ई झूठ ...
ककरो दुखी करै लेल तँ..
ककरो सुखी करै लेल ..
सभ दिन पता नै कतेक बाजल जाइत अछि झूठ...
हमहुँ झूट्ठा छी..
हमरा ऐ बातक विश्वास अछि ...
ओ एथिन भेट करैले एक दिन ...
जखन याद आबए तँ करेजसँ कहबेलौं यएह झूठ....
सभटा यादक बुनियाद अछि ई झूठ ..

आदमीक सच्चा औकाति अछि ई झूठ ....

 
भीजल कागतक जकाँ अछि जिनगी हमर
कियो लिखतो नै अछि आ कियो जरबितो अछि नै

ऐ तरहेँ अकेला भऽ गेल छी हम आइ-काल्हि
कियो सतबितो नै अछि आ कियो मनबितो अछि नै

सुखैल फूल जकाँ आब हम भऽ जे गेलौं ..
कियो तानक महफिलमे हमरा सजबितो अछि नै

सभ दिन भोर अबैए एकटा साँझक बाद
कियो अपन बनाकऽ निंदसँ जगबितो अछि नै

तन्हा अकेला रस्तामे चलैत चलल जा रहल छी ..
कियो रोकितो नै आ अंत अबितो अछि नै..

डराइत छी हम ..अहि भीड़मे कतौ हरा नै जाउ
हे भगवान अहाँक घरक पता कियो बतबितो अछि नै

तन्हाइक ई अन्हार सभ किछु बिसरा देलक
कियो बतबितो अछि नै…,आ किछु मोन पड़ैत अछि नै

भीजल कागत जकाँ अछि जिनगी हमर
कियो लिखतो नै अछि आ कियो जरबितो अछि नै
आइ भऽ जाए सिर्फ एक बेर दिदार अहाँक हमरा ,
ऐ रस्मंजी मे आइ बिना पिने आब तँ बहकैक अछि

कनी आइ तँ ओ तान तँ छेरू हम्मर प्रीत केर अहाँ
हम्मर मोनक यएह धुन पर आइ मोन भरि कऽ थिरकनाइ अछि

जिनगी हम्मर रुकल अछि सिर्फ अहाँक एबाक इन्तजारमे,
किछु दया तँ करियौ करेजपर; ऐ दिलकेँ आब निश्चिंतसँ धड़कनाइ अछि

बुझल अछि हमरा अखन बहूत वक्त छै अहाँक एबामे
दिलकेँ अहींक यादक सहारे आब मचलैक अछि

अहाँक बिना हम्मर डेग डगमगाइत अछि महफिलमे
"अहींक सहारे" निशांतकेँ ऐ महफिलमे सम्हारमे रहैक अछि

अहींक यादमे जिबैत छी अहींक यादमे मरियो जाएब
अहींक याद कऽकऽ हम्मर ई नयन केँ आब डुबबाक अछि


हम्मर ई आँखि तराशि रहल अछि आब अहाँकेँ देखऽ लेल
एक बेर देखा जाए बस आब ई पपनीकेँ झपककने अछि

हम अहाँकेँ भेटी या नै भेटी जिनगीमे कहियो ,
बस खुश रही अहाँ, यएह हम्मर दुआ यएह हम्मर सपना अछि
कखनो रूसि रहलौं , कखनो छिरिऐ लगलौं...
हम अहाँकेँ ई चालि बुझि गेलौं ...
अहाँ निभायब ..रित प्रीत केँ ..
प्रिये हम अहाँकेँ पहचानि गेलौं ...

नैनमे छुरी रखबाक, अहाँकेँ शौख अछि
ई मारूख नयनपर नै बुझलिऐ ...
हमरा जेना कतेक बर्बाद भेलै

अहूँ निभायब ..रीत प्रीत केर ..
प्रिये हम अहाँकेँ चीन्हि गेलौं ...

ई गुलिश्ता नै एहन गुलबदन ..
ई नाज ई चालि अछि दिलफरेब
अपन दुपट्टाक झालरीसँ..
अहां टा जमानाक हुश्न छानि लेलौं ..

अहूँ निभायब ..रीत प्रीत केर ..
प्रिये हम अहाँकेँ चीन्हि गेलौं ...

हमहूँ कहियो ठोस छलौं पाथरसँ ..
नै एते कहियो प्यारमे पुछि लिअ करेजसँ.
लेकिन अहाँ निकललौं एक डेग आगू हमरासँ ..
वाह ! की इच्छा अहाँकेँ रूप हम ई मरि गेलौं ..

...अहूँ निभायब ..रीत प्रीत केर ..
प्रिये हम अहाँकेँ चीन्हि गेलौं ..

कखनो रूइस रहलौं, कखनो छिरिऐ लगलौं...
हम अहाँकेँ ई चालि बुझि गेलौं ...
अहूँ निभायब ..रीत प्रीत केर ..
प्रिये हम अहाँकेँ चीन्हि गेलौं...
आजुक दिनो बीतल
छा गेल अछि साँझ
फेर राति गहराए लागत

तकर बाद भोर होएत
ओहो धीरे-धीरे
दुपहरिया , सांझ आ रातिमे
बदलि जाएत
अहि तरहेँ
दि‍न पर दि‍न
कैलेण्‍डरपर तारीख
बदलैत रहत
अहिमेसँ
कोनो एक
हम्मर अंति‍म तारीख हएत
आ दीवारपर हम
एकटा तस्‍वीर बनि
टंगि जाएब
आबऽ बला सभटा
तारीखक लेल।

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१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
      
     
।। प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।
(मिथिला वन्दन गीत)


स्वर्गहु   सँ   सुन्नर   पावन   जे    धाम  
प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।*

मण्डन - अयाची - उद्याना     केर     नगरी ।
कवि कोकिल विद्यापति केर गाम एतए विसफी ।
आबि   एतए    भेलाह    शंकर     निरूत्तर ,
कर्मभूमि   जनकक,    सीता   केर  गाम ।
प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।

गोबर   सँ   नीपल   द्वारि , पाड़ल  अरिपन ।
स्वच्छ - सुगम्य बाट - घाट  लागय  मनोरम ।
गाछ  जतऽ  फूल,  बेलपात   अशोक केर ,
खल खल    हँसैत,     भरल     खरिहान ।
प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।

नामी  जतऽ   केर   अछि   भोजन  सचार ।
चुड़ा - दऽही - चिनी     आमक    अचार ।
नामी   अछि  विश्व  भरि  पेण्टिङ्ग जतऽ केर,
नामी  जतऽ  केर  अछि  पान     मखान ।
प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।

गीत   विद्यापति  केर   गूँजय  हर  अङ्गना ।
बाजय   राधा   केर   पायल     कङ्गना ।
गूँजय    यत्र तत्र   गीत    भगवान    केर,
हर हर   महादेव,   जय   राम घनश्याम ।
प्रथम्  पुज्य मिथिला हमर शत् - शत् प्रणाम ।।

* ई हमर बहुत पुराण गीत सभ मे सँ थिक, जे कि ‍१९९० - ‍१९९७ केर बीच किछु लोकनि द्वारा जे॰ एन॰ कॉलेज मधुबनी”, “आर॰ के॰ कॉलेज मधुबनीतथा भगवती स्थान कोइलख मधुबनीआदिक मञ्च सभ सँ गाओल जा चुकल अछि ।

नवकी कनिञा

हरिहर झा*  केर    आङ्गन  मे,
अएलखिन्ह आइ नवकी कनिञा ।
जनिका  कारण चुटकी लै छन्हि,
हुनिकर     सगरो     दुनिञा ।
ठोकि बैसल छथि अपन कपार, सोचैत किछु अङ्गना मे ।
हरिहर झा केर आङ्गन मे ............................................... ।।

कोन जन्म केर पाप हमर छल,
भाग्य   हमर   एहेन   भेल ।
कुल  खानदानक  मान मर्यादा,
माटि  मे  सभ  मीलि  गेल ।
हाय रेऽ जऽरल हमर कपार, सोचै छथि बैसि अङ्गना मे ।
हरिहर झा केर आङ्गन मे ................................................ ।।

मोबाइल  पर  बतियाए हमेशा,
जीन्स   पैण्ट   पहिरए  छै ।
ब्युटी  पार्लर  जाय  दड़िभंगा,
केश    सेट   करबए    छै ।
पहीरि कऽ पएर मे सैण्डिल लाल, घुमै छै कोना अङ्गना मे ।
हरिहर झा केर आङ्गन मे .................................................... ।।

आठ  बजे ओ सूति कऽ उठती,
काज   ने  किछुओ   करती ।
लाज शर्म केर छुति ने कनिञो,
भरि  दिन  सिनेमा   देखती ।
कोना चलतै एहि घऽरक काज, सोचै छति बैसि अङ्गना मे ।
हरिहर झा केर आङ्गन मे ................................................ ।।

* हरिहर झा नामक व्यक्ति काल्पनिक छथि ।
वास्तविक दुनिञाक कोनो हरिहर झा सँ एहि गीतक कोनो सम्बन्ध नञि थिक ।

कल्पनाक यान सँ
(गीत)


कल्पनाक यान सँ,
                मोनक उड़ान सँ,
                             घुरि  फिरि  आबैत  छी,  प्रेयसीक  गाम  सँ ।।

कोनटा केर कात सँ,
                ग्रसित लोक लाज सँ,
                            स्वागत ओ कयलि, अपन मन्द - मन्द हास सँ ।।

अधीर सनि गात सँ,
                 विरहक  प्रताप  सँ,
                                 सोझाँ  भेलीह    मिलनक  उसास  सँ ।।

कोमल सनि हाथ सँ,
                 तिलकोरहि पात सँ,*
                                आँजुर  दुइ  नेह  देल  पुर्वहि  प्रभात  सँ ।।

कागक  अवाज  सँ,
                आभासहि  प्रात सँ,
                               टूटल जे  निन्न, स्वप्न  डूबल  सन्ताप  सँ ।।



       * तिलकोरहि पात  =  प्रेयषीक पातर पातर ठोरक लेल उपमा =  तिलकोरक पात सन पातर ठोर

  

 २.नवीन कुमार "आशा"
की फुराएल ने जानि

की फुराएल ने जानि
कोना फुराएल ई आइ
कोना जागल सूतल प्राण
कोना आएल मिथिला याद
जेकर केने छलौं त्याग
कोना याद आएल हुनक बलिदान
जे देलथि भारतीयक पहचान
की फुराएल ने जानि।

कोना फुराएल हमरा ई आइ
माए बाबूक कोना आएल याद
जे हमरा लेल केलथि अपन त्याग
हुनक याद कोना सताएल
कोना मोन भेल घुरि जाइ गाम
ने जानि की हमरा फुराएल।

कोना याद आएल अपन मिथिला
राजा जनकक ओ मिथिला
जतऽ क अछि मण्डन अयाची
सर गंगानाथ सन लोकसँ जुड़ल पहचान
की फुराएल ने जानि
कोना फुराएल ई आइ।

की फुराएल हमरा ई आइ
घुरि चलि आब अपन देश
छोड़ि दी आब ई परदेश
नै जानि हृदयमे आइ ई की भेल
की फुराएल ने जानि
कोना फुराएल हमरा ई आइ

मिथिलाक माछक आएल याद
जेकर अछि किछु अलगे स्वाद
गामक भोजक अलगे मान
ओइमे लोकसँ होए पहचान
कोना याद आएल ओ मिथिला
याद कोना एला मिथिलावासी
ने जानि ई कोना भेल
कोना फुराएल हमरा ई आइ।

भाइ बहिनक आएल याद
जिनकासँ मिलि करी हुड़दंग
सभ कियोकेँ करै छलौं तंग
याद आएल ओ पुरान क्षण
कोना ने ई जानि
की फुराएल ने जानि
कोना फुराएल हमरा ई आइ।

अंतमे आशाबस एतबा चाहए
सभ कियोक जँ हुअए ईएह विचार
मिथिलापर की होए अत्याचार
की फुराएल ने जानि
कोना फुराएल हमरा ई आइ।

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 जवाहर लाल कश्यप-  काटि लिय कोना दुनू पॉखि २. नवीन ठाकुर


 जवाहर लाल कश्यप
  काटि लिय कोना दुनू पॉखि
अहॉके सौंदर्य मे, ओझरा क हम अप्पन ऑखि /         
  काटि लिय कोना दुनू पॉखि ,  काटि लिय कोना दुनू पॉखि /
 चन्द्र राशि के तजि क हम, केश राशि मे कोना भटकि जाउ /
 संसारक हम गुढ प्रश्न तजि ,बाहुपाश मे कोना अटकि जाउ /
और-और अन्यान्य सत्य के अपना स हम दूर हॉकि /
 काटि लिय कोना दुनू पॉखि ,  काटि लिय कोना दुनू पॉखि /
हम छलहुँ उन्मुक्त, तन-मन हम्मर निर्बंध छल /
 उडैत पवन संग उडैत छलहुँ , आ गति नीर सन चंचल छ्ल /
 व्यस्त छलहुँ हम मस्त छलहुँ  हम,  वेकारी के धुल फॉकि /
काटि लिय कोना दुनू पॉखि,  काटि लिय कोना दुनू पॉखि /
 दुर्लभ मानव तन अछि भेटल , गुढ रहस्य खोजबा लेल /
 ध्वंश क विगलीत् व्यवस्था नव निर्माण करवा लेल /
 अहॉ कहै छी  ठम्हि  जाउ, मुदा बैस कोना जाउ, हारि-थाकि /
 काटि लिय कोना दुनू पॉखि, काटि लिय कोना दुनू पॉखि /

 
नवीन ठाकुर
गंगा

कल.कल ..करैत बहैत नीर
चुबैत ममता होइत अधीर

पतित पावनी निर्मल गंगा
जन्भूमिक बहैत रुधिर

तारैत सब निस्कंट पापकेँ
एहि सँ जीवन आ शरीर

छुबैते ह्रदय द्रवित भऽ जाएत
गगन नयन भरि जायत नीर

एहन पवित्र जल नै कोनो
जहिना विष्णु सागर क्षीर

दर्शन कऽअहाँक मैया
पुलकित भऽ उठल शरीर

कल्पना नै बिन गंगा क
लागत भूमि हमर पूर्ण बिहिर !!

गुटखा माने मावा --

गली गली आ गाँव गाँवमे एहन देखेलक झटका ,
मतवाला भऽ किनऽ लागल रंग बिरंगक गुटखा !

रंग बिरंगक पन्नीमे जहरीला अछि पान मसल्ला
केंसरक प्रयोगशाला बनि गेल एही कऽ सेवन करऽवला

भेल लाचार युवा पीढ़ी, मुँह क केंसर केलक अट्टहास
दांतों सबहक भेल कबाड़ा, सेहत केलक सत्यानास

तबाह, यमराज, कफन -दफन, काल पसंदी एकर नाम
जाहिमे जतेक बेसी जहर , सभसँ कम ओकर दाम

हँसि कऽकहल गुटका सभसँ , हम छी कतेक सर्वव्यापी
सुन रे मुर्खबा खा वला, हम छी यमराजक कार्बन कापी

कहत जवाहर सुन भाइ स्वादु
धूम मचा -रंग जमा , चलिते -फिरते कऽअर्थी उठा!

अक्लक आन्हर खाइ वला , जहर किनि कऽखाइए
जेकरा पास अक्ल अछि , जहरो सँ माल कमाइए

 

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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत


१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
.
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।






२.श्वेता झा (सिंगापुर)


३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।


.
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

५.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
 ३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि)

४.
बिपिन कुमार झा
कर्णभारम्-महाकवि भास (मैथिली अनुवाद बिपिन कुमार झा)

अनुवादकर्ता एवं ग्रन्थ परिचय:- अनुवादक बिपिन कुमार झा, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभागमे अध्यापनरत छथि। संस्कृत केर प्रमुख ग्रन्थक अनुवाद मैथिलीमे करब अनुवादकक सहज रुचि मात्र छन्हि। यदि अनुवाद केर कोनो अंश समुचित नहि लालगए तँ अवश्य सूचित करी। एतय प्राप्त श्लोकक भावानुवाद गद्येमे देल गेल अछि । ई ग्रन्थ चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसीसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। कर्णभारम्महाकवि भास रचित एकटा एकांकी अछि। जतय कर्णक उदात्त चित्रण कएल गेल अछि। कोनो प्रकारक टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर दऽ सकैत छी।


नाटकक पात्र केर परिचय

पुरुष पात्र
कर्ण- कौरव केर सेनापति (अङ्गदेश केर राजा)।
शल्य- कर्ण केर सारथी (मद्र देश केर राजा)।
भट- सिपाही
इन्द्र- ब्राह्मणरूपधारी इन्द्र
देवदूत- इन्द्रक ब्राह्मणरूपधारी दूत।

(नान्दीपाठक अन्त में सूत्रधारक प्रवेश।)

सूत्रधार-
जाहि भगवान विष्णुक नरसिंह अवतारक शरीर के देखि के नर-नारी, राक्षस, देवतालोकनि और पाताललोक सेहो आश्चर्य मे पडि गेलाह। जे अपन वज्रक समान कठोर नहक अग्रभाग सँऽ दैत्यराज हिरण्यकश्यप केर छाती विदीर्ण कयलथि। एहेन राक्षसी सेनाक विनाश करयबला भगवान श्रीधर अहाँ सभ कें कल्याण करथु।।१॥

एहि तरहें हम अपने सभ कें सूचित करैत छी जे (घूमि कें आ कान द कें सुनैक अभिनय करैत) अरे ! सूचना देबा मे व्यस्त हमरा ई कोन तरहक आवाज सुनाई दरहल अछि। ठीक! देखियै तऽ!

(नेपथ्य में)

महाराज अङ्गराज कर्ण सँ निवेदन कयल जाय; निवेदन कयल जाय।
सूत्रधार- ठीक अछि। बुझि गेलहुँ।
भयंकर लडाई शुरू भय गेला पर; व्याकुल आ हाथ जोडैत परिचारक, दुर्योधनक आज्ञा सँ कर्ण के समाद दय रहल अछि॥२॥

(सब चलि जाइत अछि।)

॥प्रस्तावना खत्म भेल॥
क्रमशः (... तीन भाग मे समाप्त होयत।)

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...