Friday, December 23, 2011

'विदेह' ९६ म अंक १५ दिसम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४८ अंक ९६) PART II



डॉ.अरुण कुमार सिंह
भारतीय भाषाक भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय
भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर


मैथिलेत्तर भाषी प्रदेशमे मैथिली सीखबा-सीखैबामे कँप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका

भूमिका
भारत एकटा बहुभाषी देश अछि। एतय भारोपीय, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक आओर चीनी-तिब्बती चारि भाषा परिवारक लगभग 1650 ऊपर भाषा बाजल जाइत अछि। एक मतक अनुसार लगभग 1455 भाषा एहन अछि जकरा 10 हजारसँ कमे लोक बजैत अछि। सेंसस डाटा 2001 अनुसार-मैथिली बाज वलाक संख्या 12,179,122 बताओल गेल अछि। आइ संविधान मान्यता प्राप्त 22 भाषा (मैथिली, हिंदी, संस्कृत, मलयालम, तेलगु, तमिल, कन्नड़, मराठी, बंगला, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, उर्दू, उड़िया, असमिया, बोडो, संथाली, सिंधी, डोगरी, कोंकणी, मणिपुरी,नेपाली) अछि। तथा 100सँ बेसिए एहन भाषा अछि जे आठवीं अनुसूचीमे नहि अछि। भारतक एहन बहुसंख्यक भाषाई परिदृश्य पर बाजवलाक संख्या आओर भौगोलिक दृष्टि सँ जखन विचार कएल जाइछ तें पता चलैछ जे मैथिलीक महत्त्वकेँ नजरअंदाज नहि कएल जा सकैछ; कियाक तँ देशक एकटा पैध भू-भागक भाषा थिक। बिहारक प्रमुख भाषा अछि, तथा कतोक प्रदेशमे गौण भाषाक रूपमे सेहो व्यवहृत अछि।
            विश्वभ्रामक संकल्पना तँ तकनीकी (Technology)केँ चरण पर पहुँचा देल अछि। आधुनिक तकनीकीक विकासमे कँम्प्यूटरक आविष्कार एकटा युगांतकारी घटना अछि। कम्प्यूटर आइ जीवनक लगभग क्षेत्रमे अपन जगह बनाए लेल अछि। चूँकि भाषा जीवनक अभिन्न अंग अछि तेँ कम्प्यूटरसँ कोना असम्पृक्त रहि सकैछ। आइ भाषिक अध्ययन आओर विश्लेषणक लेल कँम्प्यूटरक उपयोग बहु अनिवार्य गेल अछि। अतः मैथिली भाषाक समृद्धि एवं प्रचार- प्रसारक लेल कँम्प्यूटरीकरण नितांत आवश्यक गेल अछि। प्रस्तुत आलेखमे द्विती भाषाक रुपमे मैथिली सिखैबामे कंप्यूटर आओर भाषा विज्ञानक भूमिका पर विचार करबाक प्रयास कएल गेल अछि।

भाषा शिक्षण एवं भाषा विज्ञान
            मानव-उच्चराण अवयव द्वारा उच्चरित यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकक ओहि व्यवस्थाकेँ जकर माध्यमसँ मानव समुदाय-विशेषक लोक परस्पर विचार-विनिमय करैत अछि, ओकरा बाजब, पढब, लिखब एवं सुनब तथा समझबाक शिक्षाकेँ भाषा-शिक्षण कहल जाइत अछि। झाँच अछि जे मैथिलेत्तरभाषी लोकक अपन मातृभाषा होइछ एवं ओकरा संगहि ओकर पहिल भाषा सेहो होइछ एहिलेल मैथिलीकेँ द्वितीय भाषाक रूपमे सीखबामे की-की कठिनाई अबैछ एवं ओहि कठिनाईकेँ भाषा-विज्ञान आओर कंम्प्यूटर कत धरि समाधान सकैछ एहि पर विचार करब समीचीन होएत।
            प्राचीने कालसँ जीविकोपार्जन एवं ज्ञानार्जन आदिक लेल अधिकांश लोककेँ मातृभाषाक संगे-संग दोसर भाषा सीखबाक आवश्यकता पड़ैत आबि रहल अछि। एहि दोसर भाषाकेँ द्वितीय भाषा कहल जाइछ। एहि द्वितीय भाषाकेँ सीखबाक लोककेँ भाषार्जनक जटिल प्रक्रियासँ बैस सतर्कतापूर्वक गूजर पड़ैछ। भाषा विज्ञान तथा शिक्षा शास्त्रक दृष्टिसँ पहिल भाषासँ हँटिक सीखल जायवला सभ देशी बा विदेशी भाषा द्वितीय भाषाक श्रेणीमे अबैछ।
            आधुनिक युगमे द्वितीय भाषा-शिक्षणकेँ गंभीरतापूर्वक लेल जा रहल अछि आओर एहि बातक पूरजोर प्रयास कएल जा रहल अछि जे विद्यार्थी कमसँ कम समयमे भाषाकेँ ठीक ढंग सँ सीखए आओर सुगमतापूर्वक प्रयोग करबामे सक्षम सकए। एहि संबंधमे चारि प्रारंभिक भाषा कौशल (Language Skills) सुनब, बाजब, पढ़ब आओर लिखबकेँ ध्यानमे राखि भाषा-शिक्षणकेँ अंजाम देल जा रहल अछि। एहिमे पहिल दुई भाषाक उच्चरित रूपसँ सम्बद्ध अछि जखनकि अन्तिम दुई भाषाक लिखित रूपसँ। उच्चरित भाषासँ संबंधित कौशलमे भाषाक बोलीगत रूपसँ सम्बन्धित दुई प्रमुख कौशल-सुनबाक तथा बोलबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष लेल जाइत अछि1. ध्वनीमे भेद करबाक योग्यता, 2. उच्चारणमे अनुकरणक सामर्थ्य, 3. उपकाव्य संरचना, 4. वाक्य संरचनाक नियमक ज्ञान, 5. मुक्त भाषण, 6. पदबन्ध, 7. शब्दावली, 8. श्रवण बोधन, 9. मुक्त बोधन, 10. गप-सप। वस्तुतः पहिल दुई सुनबासँ संबंधित अछि आओर शेष बाजबासँ।
            लिखित भाषासँ सम्बन्धित प्रमुख कौशल-पढ़बाक आओर लिखबाक अन्तर्गत निम्नलिखित भाषिक पक्ष अबैत अछि1. लिपि चिह्नक पहिचान, 2. लिपि चिह्नक लेखन, 3. संकेतक सहायतासँ लेखन, 4. सन्दर्भ व्याकरण, 5. मुक्त लेखन, 6. मुक्त पठन 7. सन्दर्भक पहिचान 8. पत्राचार, 9. वर्ण बोधन, 10. कोश देखबाक अभ्यास।
भाषा-शिक्षणमे बहुत रास पद्धति (Methods) प्राचीन कालेसँ उपयोगमे लाबल जा रहल अछि। एहिमे प्रमुख निम्नवत अछि


व्याकरण-अनुवाद पद्धति (Grammar translation Method)
पद्धति बहुत बेसी प्रचलित रहल अछि कियाकतँ एकरे माध्यमे शिक्षक अनुवादसँ भाषाक शिक्षण प्रदान करैत छलाह। विद्यार्थीकेँ अनुवादक माध्यमसँ द्वितीय भाषाक सभ आवश्यक जानकारी देल जाइत छल जे भाषा सिखबाक लेल महत्त्वपूर्ण अछि। परंच व्याकरण-अनुवाद पद्धतिक त्रुट ई छल जे छात्र नहि तँ भाषाक जीवंत तत्त्वसँ परिचित पबैत छल आओर नहि तँ व्यावहारिक ज्ञानें प्राप्त करबामे समर्थ सिद्ध होइत छलाह। हुनक ज्ञान, भाषाक केवल सैद्धान्तिक पक्षे धरि सीमित रहैत छल, जाहि कारणेँ विद्यार्थी लक्ष्य भाषा (Target Language) केँ बाजबाक क्षमता कतोक वर्षक प्रयासक बादो नहि प्राप्त पाबैत छल। एकर मूल कारण अछि जे शिक्षक प्रारम्भेसँ विद्यार्थीकेँ मात्र द्वितीय भाषामे अनुवाद करबाक आओर व्याकरणकेँ रटबाक शिक्षा दैत रहैत छलाह। कखनहुँ विद्यार्थीकेँ लक्ष्य भाषाकेँ बाजबाक अवसर कक्षा वा कक्षासँ बाहर नहि भेटि पबैत छल। जे आधुनिक दौरमे कोनो भाषाकेँ सिखबाक लेल अति आवश्यक अछि।
            व्याकरण-अनुवाद पद्धति आइयो देशक विभिन्न पाठशाला, मदरसा, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयमे प्रचलित अछि। जकर माध्यमसँ विद्यार्थीकेँ लक्ष्यभाषा (Target Language) तँ ज्ञान प्राप्त जाइत अछि, परंच ओकरामे लक्ष्यभाषाकेँ सूक्ष्मतासँ बाजबाक वा व्यवहारमे लाबक क्षमता विकसित नहि पबैछ। विद्यार्थी अपन समय मात्र भाषाक अनुवादेमे खपा दैत अछि। आइ हमसब भलीभाँति जनैत छी जे व्याकरणक नियमक ज्ञान आओर अनुवादक योग्याकेँ कोनो प्रकारेँ हम ओहि भाषामे बाजबाक, पढ़बाक आओर लिखबाक सक्षमताकेँ उचित मानक स्तर पर नहि राखि सकैत छी।
प्रत्यक्ष पद्धति (Direct Methods) पद्धति वर्त्तमान समयमे प्रभावशाली मानल जा रहल अछि। एहि पद्धतिक मूलभूत सिद्धान्त अछि जे मातृभाषे सदृश दोसरो भाषा सीखल वा सीखाओल जाय। यद्यपि एहिमे मातृभाषाक उपयोग नहि होइछ। परंच लक्ष्य भाषाकेँ सुनब, बोलब, लिखब, पढ़ब सिखाओल जाइत अछि। एहि पद्धतिक माध्यमे शिक्षण देलासँ विद्यार्थीमे भाषाकेँ बाजबाक क्षमताक विकास अत्यन्त तीव्रगतिसँ होइत अछि।
            इएह कारण अछि जे आइ अंग्रेजी माध्यम विद्यालयमे प्रत्यक्ष पद्धतिकेँ पूर्णरूपसँ अपनाओल जा चुकल अछि, आओर एकर पूरा फाइदा विद्यार्थीसभकेँ मिलि रहल अछि। ओ एहि पद्धतिसँ द्वितीय भाषा (Secondary Language) केँ सरलतासँ सीखि जाइत अछि आओर हुनक उच्चारण सेहो बड्ड बेसी संतोषजनक रहैत अछि। परंच एकरा संग दोसर विकसित पद्धति सेहो सहारा लेल जाय तेँ शिक्षण आओर अधिगम (Learning) दुनू काज सरल जाइत अछि।
            प्रत्यक्ष पद्धकिक अतिरिक्त जे दोसर पद्धति अछि ओहिमे स्वाभाविक पद्धति, मनोवैज्ञानिक पद्धति, अनुकरणात्मक पद्धति, वार्तालाप पद्धति, भाषा प्रयोगशाला पद्धति ऑडियो लिंग्वल मेथड, चलचित्र पद्धति आओर कम्प्यूटर-पद्धति आदि प्रचलित अछि। एहिमे ऑडियो लिग्वल मेथड (Audio Lingual Method) एवं भाषा प्रयोगशाला पद्धति (Language Laboratory Method) बहुत बेसी प्रचलित अछि। परंच एहि पद्धतिक किछु सीमा अछि; एहि कारणेँ विद्यालय तथा शैक्षणिक संस्थामे पद्धति बहुत कमे देखबामे अबैत अछि। एकर मूलकारण अछि जे भाषा प्रयोगशाला पद्धति बहुत बेसी खर्चावला अछि। एकरा कोनो साधारण संस्था वहन नहि सकैछ। जाहि संस्थामे एहि पद्धतिक प्रचलन अछि, ओहि संस्थामे भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक क्षमता एवं दक्षता व्याकरण-अनुवाद पद्धति आओर प्रत्यक्ष पद्धतिसँ द्वितीय भाषा सीखि रहल विद्यार्थीक तुलनामे बेसी बढ़ियाँ अछि।
            भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरक सात क्षेत्रीय भाषा-केन्द्र मैसूर, भुवनेश्वर, गुवाहटी, लखनऊ, पटियाला, पुणे, आओर सोलेनमे मैथिली, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, डोगरी, कश्मीरी, पंजाबी, उड़िया, संथाली, उर्दू, गुजराती, कोंकणी, मराठी, सिंधी, असमिया, बोडो, मणिपुरी आओर नेपाली भाषा द्वितीय भाषाक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि। ओहिमे प्रत्यक्ष पद्धति आओर ऑडियो लिंग्वल मेथड माध्यमेकेँ अपनाओल जा रहल अछि आओर विद्यार्थीक बाजबाक क्षमताक विकासक लेल सम्बन्धित भाषिक क्षेत्रमे पन्द्रह दिनक टूर सेहो कराओल जाइत अछि। जकर नीक परिणाम देखबाक लेल भेटैछ। जाहिसँ प्रशिक्षुक भाषिक क्षमता दस महीनामे एतबा विकसित जाइछ जे लक्ष्यभाषाक पठन-पाठनमे पूर्ण रूपसँ समर्थ जाइछ। आइकाल्हि ऑन लाइन शिक्षण (Internet Learning) सेहो एहि दिशामे एक नव प्रयास अछि।
            उपरोक्त पद्धतिक सन्दर्भमे ईहो बात उल्लेखनीय अछि जे जत एहि पद्धतिसँ भाषा-शिक्षणमे लाभ अछि, ओतहि एहि पद्धतिक किछु सीमा सेहो अछि।
            आधुनिक युगमे ध्वनि विज्ञानक बड़ पैघ महत्ता अछि। ध्वनि विज्ञानक द्वारा विद्यार्थीमे लक्ष्य भाषा (target language)केँ शालीनता आओर शुद्धतासँ बाजबाक क्षमता विकसित होइत अछि। ध्वनि विज्ञानक महत्त्व इहो लेल बढ़ि जाइछ जे जखन विद्यार्थी कोनो दोसर भाषाकेँ सीखैत अछि तँ भाषा ओकर मातृभाषासँ कतोक तरहेँ भिन्न होइत अछि। अर्थात् जखन द्वितीय भाषा सीखैत अछितँ सीखबाक क्रममे विद्यार्थीकेँ द्वितीय भाषाक कतोक नव ध्वनिक सामना कर पड़ैछ। जकर उच्चारणमे विद्यार्थीकेँ बहुत बेसी समस्या होइछ। विद्यार्थी द्वितीय भाषाक शब्दकेँ सुचारू रूपसँ उच्चारण नहि पबैछ। भाषाशिक्षणमे उच्चारणक महत्वकेँ कोनो प्रकारेँ नकारल नहि जा सकैछ; उच्चारणक महत्व रीढ़क हड्डीक समान होइत अछि। एकर सहि ढंगसँ प्रयोग कयलासँ नहि केवल भाषा अपन प्रारकृतिक दशा एवं सुगमताक संग प्रभावित करैछ, अपितु शब्दक उचित अर्थ एवं भाव सेहो प्रकट होइछ।
            भाषा विज्ञान द्वितीय भाषा-शिक्षण आओर प्रशिक्षणमे उत्पन्न हुअ वला समस्याक निराकरणमे महत्वपूर्ण भूमिका निबाहल अछि। जँ शिक्षक भाषाविज्ञानसँ सभ तरहेँ परिचित अछि तँ उच्चारण सदृश समस्याक समाधान सहजतापूर्वक सकैत अछि। भाषाक एहने सब समस्याकेँ देखैत व्यतिरेकी भाषा विज्ञान (Contrastive Linguistics) अस्तित्वमे आयल। जकरा द्वारा शिक्षक विद्यार्थीक मातृभाषाक संरचना (Structure) द्वितीय भाषाक संरचनासँ तुलनात्मक अध्ययन (Comparative study) कएल अछि आओर तत्पश्चात् एहि बातक पता लगैबाक प्रयास कएल जे लक्ष्य भाषाक कोन एहन ध्वनि अछि जे विद्यार्थीक मातृभाषामे नहि अछि। ओहन ध्वनि जे दुनू भाषामे पाओल जाइत अछि, छात्रकेँ कोनो प्रकारक समस्या उत्पन्न नहि करत। परंच ध्वनि जे द्वितीय भाषामे तँ अछि मुदा मातृभाषामे नहि अछि एहन ध्वनि समस्यात्मक ध्वनि (Problematic Sounds) कहाऔत आओर भाषा सीखबामे समस्या उत्पन्न करत। शिक्षककेँ एहि ध्वनिक उच्चारणमे पूर्णतः साबधानी बरत पड़त आओर एहि ध्वनिक उच्चारण प्रारंभिक मध्य आओर अन्तिम अवस्थआमे छात्रसँ कराब पड़त। एहि तरहेँ बेर-बेर उछ्चारण करौलासँ छात्रक उच्चारण ठीक होएत।
            अभ्यासक मात्रा मातृभाषा तथा द्वितीय भाषा-शिक्षणक उद्देश्य, शिक्षार्थीक अवस्था, अध्ययन-अध्यापनक लेल उपलब्ध समय आदि पर निर्भर करैछ। सैद्धान्तिक तथा व्यावहाहिक दृष्टिसँ मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रिया तथा तकनीकमे किछु अन्तर हैब स्वाभाविक अछि। भाषा कौशलक अभ्यास-मात्रा तथा ओकर प्रायोगिक पक्षमे जे अंतर देखार दैत अछि, तकर मातृभाषा तथा द्वितीय भाषाक शिक्षण-प्रक्रियासँ पर्याप्त संबंध अछि। भाषा शिक्षकेँ एहि भिन्नताकेँ दृष्टिमे राखि भाषा अध्यापन करबाक चाही, जे भाषा शिक्षार्थीक लेल सरल बोधगम्य सकए।
भाषा शिक्षणमे कॉर्पस (Corpus in Language Teaching)
भाषाविज्ञानमे कॉर्पस (कॉर्पोराक बहुवचन) पाठसभक एकगोट पैध आओर संरचनात्मक संग्रह अछि जाहिमे कोनो भाषाक शब्द तथा वाक्यकेँ संग्रहित ग्राह्य एवं पढ़बायोगय रूपमे राखल जाइत अछि। कॉर्पस एके भाषा (एकभाषी कॉर्पस) वा एकसँ बैसी भाषा (बहुभाषी कॉर्पस)मे पाठकेँ संग्रहित करैत अछि। बहुभाषी कॉर्पसकेँ प्रारूपित केँ तुलनात्मक दृष्टिसँ संरेखित समानांतर कॉर्पस सेहो कहल जाइत अछि। कॉर्पस दुई प्रकारक होइछ।
लिखित कॉर्पस (Written Corpus) एहिमे भाषाक लिखित रूप जेना, साहित्य, समाचारपत्र, कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना आदिमे प्रयोग हुअ वला भाषाकेँ रखैत छी।
वाचिक कॉर्पस (Speech Corpus) एहिमे सामान्य लोकक बीच सामान्य बोलचालक भाषाकेँ रिकार्ड संग्रहित कयल जाइछ। कॉर्पसक प्रयोग प्रमुख रूपसँ कोशकारिता, मशीनी अनुवाद, वर्तनी संशोधक, भाषा शिक्षण, भाषिक अनुसंधान इत्यादि काजक लेल कयल जाइत अछि। कॉर्पसमे लिखित तथा वाचिक डेटा द्वारा उपकरण बनाओल जाइत अछि जे बेसी सार्थक तथा उपयोगी होइत अछि। एहिमे एकत्रित कयल गेल डेटामे सामान्य लोकक गप्प-सप्प तथा फराक-फराक समय पर एक लोक द्वारा प्रयोगमे लाबल जायवला भाषा एवं शब्दाबलीमे बदलाव आदिक जानकारी होइत अछि। मैथिली शिक्षणमे समानान्तर कॉर्पस, तुलनात्मक कॉर्पस, डोमेन स्पेशिफिक कॉर्पसक योगदान बैस महत्त्वपूर्ण होयत।
सूचना प्रत्यानयन (Information Retrieval)
आजुक समय भूमण्डलीकरणक प्रभावसँ मानवक परिवर्त्तित जीवन-शैलीमे कमसँ कम समयमे बेसीसँ बेसी सूचनाक आवश्यकता सकैछ। एहने संकल्पना पर आधारित प्रक्रिया केँ सूचना-प्रत्यानयन कहैत छी। एहिमे कोनों पैध पाठ वा दस्तावेजसँ निश्चित सूचनाकेँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि। बल्कि एकर सम्पूर्ण प्रक्रिया संगणक पर आधारित होइत अछि अतः समयक कम लागब स्वाभाविके अछि; जेहन कि एहिमे होइतो अछि। एहिमे वेबमे मैथिलीक लेल सर्चइंजन निर्माण तथा कोशमे खोजबाक काज सरल सकैछ। खोज इंजनमे गूगल (Google), याहू (Yahoo), अल्ताविस्ता (Altavista), गुरूजी (Guruji.com), वेबखोज (Webkhoj), रफ्तार (Raftar) आदि उपलब्ध अछि। जाहिमे निरंतर नव-नव वर्जन लांच रहल अछि। गूगल हालिहमे क्रोम नामक नव वर्जन लांच कयल अछि। भाषा सीखबामे एहिसँ बहुत बेसी सहयोग लेल जा सकैछ अछि।
की वर्ड इन कान्टेक्स्ट एण्ड की वर्ड इन अदर कान्टेक्स्ट प्रत्यानयन (KWIC and KWOC Retriever)
एहि टूलक सहायतासँ भाषा शिक्षणमे सेहो सहायता लेल जा सकैत अछि। कोनो शब्द कोन-कोन संदर्भमे प्रयुक्त सकैत अछि, एकर जानकारी कमसँ कम समयमे प्राप्त कयल जा सकैत अछि। टूल कॉर्पस पर आधारित होइत अछि। जेना-कॉर्पसँ एहि टूलक सहायतासँ ज्ञात क सकैत छी जेबहब क्रिया कोन-कोन संदर्भमे आबि सकैत अछि। उदाहरणखून बहब, पानी बहब, धाम बहब इत्यादि।
वर्तनी संशोधक (Spell checker)
संगणकक माध्यमसँ मैथिली भाषाक मानक रूपकेँ संरक्षित एवं निर्धारित सकैत अछि, संगहि वर्तनी सम्बन्धी त्रुटिकेँ चिह्नित सकैत अचि। संगणक आधारित भाषा-शिक्षणमे सेहो महत्वपूर्ण योगदगान सकैत अछि। एकर सहायतासँ मैथिली भाषाक वर्तनीक शुद्धताकेँ सुधारल जा सकैत अछि। संगहि शुद्ध लेखनमे सहायक सकैत अछि।
रूपिमिक विश्लेषक (Morphological Analyzer)
मैथिलीक मूल धातु रूप (Root Form) डाटाबेस बनाक एहिमे प्रयोगक समय जुड़ल अतिरिक्त संरचकक रूपमे प्रतिपादककेँ छाँटि एकर भाषा-सापेक्ष विश्लेषण क्रमशः करैत अछि। एकर बाद उपसर्ग एवं प्रत्ययक संग्रहित सूचनाक आधार पर अपन विश्लेषणकेँ आगू बढ़बैत अछि।
लिप्यंतरण (Transliteration)
एक लिपिसँ दोसर लिपिमे अंतरणक प्रक्रिया लिप्यंतरण कहबैछ। लिप्यंतरणक द्वारा सेहो कोनो भाषाकेँ सीखबामे बहुत बेसी सहायता मिलैत अछि। कर्नाटकमे संस्कृतक बहुत रास टेक्स्ट कन्नड़ लिपिमे लिप्यंतरित अछि। जेना-रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, दुर्गाशप्तसती आदि। एत धरि जे स्नातकोत्तर संस्कृतक उपाधि सेहो लोक कन्नड़ लिपिमे लिखिक प्राप्त रहल अछि। Mozila FireFox’s Girgit add-on द्वारा सेहो भारतीय भाषासँ सीधे दोसर भारतीय भाषामे लिप्यंतरण सकैत छी। LDC-IL, CIIL सेहो लिप्यंतरण टूलक विकास कएल अछि।
ऑनलाईन मैथिली शब्दकोश (Online Maithili Dictionary)
भाषा सीखबाये ऑनलाईन मैथिली शब्दकोशक भूमिका सेहो महत्वपूर्ण अछि। जकर अवलोकन https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ लिंक पर कयल जा सकैत अछि। किछु प्रमुख ऑनलाईन शब्दकोश निम्न वितान स्थली पर उपलब्ध अछि
आवृत्ति शब्दकोश (Frequency Dictionary)
भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे एकगोट महत्त्वाकांक्षी परियोजना भारतीय भाषाक भाषावैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय (LDC-IL) अंतर्गत मैथिली कॉर्पस पर आधारित दस हजार शब्दक आवृत्ति शब्दकोश लगभग पूर्णताकेँ प्राप्त रहल अछि। एहिये समाविष्ट शब्द एहन अछि जे सभसँ बेसी प्रयोगमे अबैछ। पूर्णरूपसँ कॉर्पस पर आधारित अछि। LDC-IL अखन धरि कन्नड़, बंगाली एवं हिन्दी मे आवृत्ति शब्दकोशक निर्माण चूकल अछि। एवं अष्टम् अनुसूचिक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि।
उच्चारण शब्दकोश (Pronunciation Dictionary)
(LDC-IL) अन्तर्गत मैथिली कॉर्पस पर आधारित उच्चारण शब्दकोश बनयबाक दिशामे सार्थक प्रयास रहल अछि। एहिमे प्रयुक्त शब्द जे सबसँ बेसी प्रयोगमे अबैत अछि तकरा स्थान भेटि रहल अछि। एकर उच्चारण अहाँ सुगमतासँ सुनि सकैत छी आओर सीखबलाकेँ अभ्यास कराओल जा सकैत अछि। LDC-IL अखन घटि कन्नड़, बंगाली, एवं हिन्दीमे उच्चारण शब्दकोशक निर्माण लेल अछि एवं अष्टम अनुसूचिक भारतीय भाषामे काज चलि रहल अछि।
उपसंहार
भूमण्डलीकरणक एहि दौरमे भारत एक पैध बाजारक रूपमे उभरि रहल अछि एवं मैथिली बाज वलाक संख्या भारत एवं भारतसँ बाहर देखि एहन संभावना लागि रहल अछि जे मैथिलीकेँ कमोवेशम्पर्क भाषाक रूपमे प्रयुक्त कयल जा सकैछ। मनहि एकर एक निर्धारित सीमा कियैक नहि हो। मैथिली राष्ट्रक सांस्कृतिक चेतनासँ जुड़ल अछि। मैथिलीमे संस्कृत शब्दावलीक समावेशक कारणेँ मैथिलेत्तर भाषी लोक सेहो थोड़ प्रयासक बाद एकरा बुझि जाइत अछि। एकर कारण अछि जे दोसर भारतीय भाषामे संस्कृतक शब्दक पहिनेसँ समावेश अछि, चलन अछि। एहि कारणेँ शब्दावली परिचयक स्तर पर साम्यक स्थिति  बनि जाइत अछि आओर दुई व्यक्तिक बीच संवाद स्थापित करैब मे मैथिली सेहो सक्षम सकैछ।
सहायक ग्रंथ सूची
1.      श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, भाषा शिक्षण’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1992
2.      श्रीवास्तव, रविन्द्रनाथ, तिवारी भोलानाथ, गोस्वामी कृष्णकुमार, अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान’, आलेख प्रकाशन, दिल्ली 1980
3.      भाटिया कैलाशचन्द्र, आधुनिक भाषा-शिक्षण’, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001
4.      Subbia, Pon, ‘Tests of Language Proficiency’, Central Institute of Indian Languages, Mysore, 2005
5.      अनुवादपत्रिका (कंप्यूटर-अनुवाद विशेषांक-2), भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली, Apr-Jun 2007
6.      गवेषणा (सूचना प्रौद्योगिकी विशेषांक), केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, Oct-Dec 2007
7.      जैन, वृषभ प्रसाद, अनुवाद और मशीनी अनुवाद’, सारांश प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995
8.      मल्होत्रा, विजय कुमार, कम्प्यूटर के भाषिक प्रयोग’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002

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जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कथा- परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा

समाजमे सभकेँ छगुन्‍ता लगैत जे होइत भि‍नसर सौंसे गाम हड़-हड़-खट-खट शुरू भऽ जाइए मुदा कमलाकाकाक परि‍वारमे एको दि‍न नै सुनै छी, तेकर की कारण? जहि‍ना रंग-वि‍रंगक लोक समाजमे रहैए तहि‍ना ने रंग-वि‍रंगक रोगो-वि‍याधि‍ आ क्रि‍यो-कलाप रहैए। मुदा लंकाक वि‍भीषण जकाँ यमुनाकाकी आ कमलाकाकाक परि‍वार केहेन हलसैत-फुलसैत, कलसैत अछि‍!

बहुत आँट-पेटक परि‍वार कमलाकक्काक नै। आने परि‍वार जकाँ अपन दसे कट्ठा जमीन। मुदा पनरह कट्ठा बटाइयो करै छथि‍। जइसँ सहि‍-मरि‍ कहुना साल लगि‍ जाइ छन्‍हि‍। ओना आन परि‍वार जकाँ धीया-पुता झमटगर नै, ि‍सर्फ चारि‍ये गोटेक परि‍वार। दू परानी अपने आ बेटा-पुतोहू। डोरामे गाँथि‍ जहि‍ना फूलक माला बनैत तहि‍ना परि‍वारोक डोरा सक्कत। अपन-अपन सीमाक बीच चारू गोटे कोल्हुक बड़द जकाँ चौबीसो घंटा चलैत रहैत। ओना गामक अाधासँ बेसी परि‍वारक समांग गाम-सँ-बाहर धरि‍ रहि‍ परि‍वार चलबैत, मुदा कमलाकाक्काक परि‍वारमे के बाहर जाएत तेकर अॅटाबेशे ने होइत। काकाक मनमे रहनि‍ जे एक्केटा समांग अछि‍ जँ ओ बाहरे चलि‍ जाएत तँ बेर-कुबेरमे एक लोटा पानि‍यो के देत? मौका-कुमौकामे कोटो-कचहरी के करत? ततबे नै, जँ कहीं कि‍सकारक समए बेमारे भऽ जाएब तँ खेती-पथारी के सम्‍हारत? जनि‍जाति‍ तँ जनि‍जाति‍ये होइत, खेत केना जोतएत? जँ खेते नै जोताएत तँ खेती केना हएत? जँ खेति‍ये नै हएत तँ परि‍वार केना चलत? अपनो ि‍क आब ओ समरथाइ रहल जे बलधकेलो कि‍छु कऽ लेब।

जहि‍ना कमलाकाकाक मनमे अपन काजक ओझरी लगनि‍ तहि‍ना यमुनोकाकीक मन ओझराएल। मनमे उठनि‍ जे मुँह-झाड़ि‍ पति‍केँ कि‍छु तँ नहि‍ये कहि‍ सकै छि‍यनि‍ मुदा पुतोहू लगा बेटाकेँ तँ कहि‍ सकै छी। जखने बेटाकेँ कहबै तखने ओहो ने सुनताह। कोनो की कानमे ठेकी थोड़े रहतनि‍।
रधवाक मनमे तेसरे बात उठैत। गि‍रहस्‍ती काज बेसी बरसातमे होइए। मि‍रगि‍सरा-अद्राक पानि‍ तेहेन ने होइए जे हाथ-पएर सड़ा दइए। एक तँ हाथ-पएर घबाह भऽ जाइए तइपर सँ काजो बढ़ि‍ जाइए। तइसँ नीक जे परदेशे खटब। मुदा वि‍चार लगले रधवाक मनकेँ बदलि‍ दइ। ब्रह्म स्‍थानक भागवत कथा मन पड़ि‍ जाइ। ओना पनरहो दि‍न सुनने रहए मुदा एक्केटा बात मन रहलै। ओ ई जे माए-बापक सेवा करब बेटाक सभसँ पैघ धर्म छी।
पुतोहू लेल धैन-सन। कोउ नृत होउ हमे का हानी।एकटा गारजनकेँ के कहए जे तीन-तीनटा गारजनक तरमे छी। जेहने दि‍न तेहने राति‍।

पि‍ताक पीठपोहू बनि‍ रधवा कमलाकाकाक संग खेती-बाड़ीमे पूरैत। एते बात रधवा बूझि‍ गेल रहए जे खेतीक भरि‍गर काजमे हरबाहि‍, कोदरबाहि‍ आ करि‍नबाहि‍ अछि‍। ओना धनरोपनीमे सेहो डॉड़ दुखाइ छै। तँए पि‍ताकेँ ऐ सभ काजसँ फारकती दऽ देने रहनि‍। गि‍रहस्‍तीयो तँ अमरलत्ती जकाँ सघन होइए। काजक इत्ता नै। कलमसँ कोदारि‍ धरि‍क काज। जते समए तते काज पसारि‍ लि‍अ। ततबे नै, कि‍छु काज एहनो हाेइए जइमे कम तरद्दुत होइत आ कि‍छु एहनो होइत जे तीन-तीन बेर केलोपर गड़बड़ाएले रहैत। तइपर सँ मेठनि‍यो बेसी। भरि‍गरकाज रधवा सम्‍हारि‍यो लन्‍हि‍ तैयो कमलाकाकाकेँ सोहरी लागल काज रहबे करनि‍। जते हाथ-पएरसँ करथि‍ तइसँ कम बुधि‍योक नै। महीना, ग्रह, नक्षत्रक काज सेहो रहबे करनि‍। कोन नक्षत्रक धानक बीआ नि‍रोग होइए आ कोनमे पाड़ने कललग्‍गु भऽ जाएत? कोन नक्षत्रमे कोन चीजक बीआ पाड़ल जाएत आ कोन चीज रोपल जाएत। बारहो मासक हि‍साब कंठस्‍थ रखने छथि‍। जेकर खगता अखन धरि‍ रधवाकेँ भेबे ने कएल। जते काल काजमे लगल रहैत ततबे बुझैत। बाकी समए ने मारी माछ ने उपछी खत्ता। बि‍ना धैन-फि‍कि‍रक बीतरागी जकाँ चैनसँ रहैत। कमेनाइ-खेनाइ आ सुतनाइयेक जि‍नगी। तीनूक गति‍यो एकरंगाहे!

आंगनसँ बहराक काज जहि‍ना दुनू बापूत कमलाकाकाक बीच अड़ि‍आएल चलैत रहनि‍ तहि‍ना अंगनाक भीतरक काज दुनू सासु-पुतोहूक बीच। चूल्हि‍-चीनमार बाहरब-नीपब, घर-अंगना बहारबसँ लऽ कऽ थारी-लोटा धुअब, भनसा-भात करब धरि‍क भार पुतोहूक ऊपर। जे पुतोहुओ आ सासुओ बुझैत, तँए ने ककरो चड़ियबैक जरूरत आ ने कि‍यो अढ़बैक आशा करैत। तहि‍ना यमुनोकाकीक काज रहनि‍। कोठीक अन्न केना सुरक्षि‍त रहत, तइठामसँ लऽ कऽ माल-जालक थैर-गोबर केनाइ घास लौनाइ धरि‍क। ओना कि‍सकारोक समैमे आ कटनि‍योक समैमे गि‍रहस्‍ति‍योमे हाथ-बटबैत। चीनी मि‍लमे जहि‍ना एकठाम कुशि‍यार बोझि‍ते, रेलबे टि‍कट लेनि‍हारक धारी जेना रसे-रसे आगू बढ़ैत, तहि‍ना कमलाकाकाक परि‍वार। ने मुँहा-ठुठी करैक कोनो जगह आ ने होइत।

ओना गाम नीचरस जमीनमे बसल तँए ऊँचरस जमीनक बारहो-वि‍रहि‍णीक खेती नै होइत। भीठ जमीन नै रहने भीठक उपजो नहि‍ये! जइसँ गाममे बेख-बुनि‍यादि‍ सेहो कम आ गाछि‍यो-खरहोरि‍। तीन हीसमे बास आ एक हीसमे बाड़ि‍यो-झाड़ी। ओना तँ छह ऋृतु होइत अछि‍ मुदा गि‍रहस्‍तीक लेल मूलत: तीन मौसम होइत। ऋृतु दुइये मासपर बदलैत, जखन कि‍ फसि‍ल तीन मासक उपरान्‍ते बदलैत। कि‍छु-कि‍छु तीन माससँ कम्मो समैमे होइत मुदा बेसी तीन माससँ बेसि‍येमे। तँए मोटा-मोटी जाड़, गड़मी वरसाती फसि‍ल होइत। तहूमे डंडी-तराजू जकाँ बरसात डंडी पकड़ने अछि‍। तराजूक पलरा जकाँ जाड़-गरमी। एक-दोसराक दुश्‍मनो। कोनो एक्केटा रहत। सन्‍यासी जकाँ दोसर नै सोहाइत। मुदा बीचमे जँ पंच नै रहत तँ झगड़ेमे दुनू लगि‍ जाएत, आगू की बढ़त। सालक बरसाते मौसम एहेन होइत जे सालो-भरि‍क भाग-तकदीर ि‍नर्धारि‍त करैत। जहि‍ना बेसी बर्खा भेने दहार होइए तहि‍ना नै भेने रौदी! जे दुनू गि‍रहस्‍तीकेँ जान मारैए। हँ एहनो होइए जे, जइ साल समगम बर्खा भेल तइ साल सुभ्‍यस्‍त समए भेल। जइसँ नीचा ऊपर एक रंग फसि‍ल उपजल। जहि‍ना कृष्‍ण अर्जुनकेँ कहने रहथि‍न तहि‍ना मौसमो होइए।
जइ धरतीपर गंगा, सरस्‍वती, यमुना सन धार एकठाम  मि‍लि‍ कुम्‍भ सजबैत अछि‍ तइठाम दि‍न-दहार हत्‍या, बलात्‍कार अपहरण हुअए, बि‍नु बुद्धि‍क लोकक भरमार लागल रहए, मनुखकेँ मनुख नै बुझल जाए, तइठाम तीनू संगमक कोन उपकार? नमगर-चौड़गर ऑट-पेटक तीनू धार जे हँसैत-झि‍लहोरि‍ खेलैत समुद्रमे समाहि‍त होइत, तइठाम......?
हमरा सभकेँ इहो नै ओझल रखक चाही जे एकैसमी सदीक स्‍वतंत्र प्रजातंत्रक बीच बास करै छी। अखन धरि‍क इति‍हासमे एते सक्षम मनुख ऐ धरतीपर नै भेल छल। तखन दायि‍त्‍व बनैए जे युगक संग पकड़ि‍ युग-युगान्‍तरक धाराकेँ स्‍वच्‍छ बना चलए दि‍ऐ। काल मनुक्‍खेटा केँ नै सभ कि‍छुकेँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। जखने सभ कि‍छु प्रभावि‍त हएत तखने जीवन-पद्धति‍मे धक्का लगत। ओइ धक्काकेँ ि‍नष्‍क्रि‍य करए लेल जीवन-शैलीमे बदलाव आनए पड़त! बीतल युग तहि‍ना बदलल। सत्‍युगमे जे क्रि‍या-कलाप छल ओ त्रेतामे आबि‍ सुधरल, जइसँ बदलाव आएल। युग-परि‍वर्त्तन भेल। तहि‍ना त्रेतासँ द्वापर भेल। तँए जरूरी भऽ गेल अछि‍ जे समयांकन इमानदारीसँ हुअए।

कहैले तँ कमलाकाका परि‍वारक गारजन छथि‍ मुदा अंगनाक सीमासँ अपनाकेँ बाहरे रखने छथि‍। खेतक उपजा-बाड़ी बाधसँ आनि‍ पत्नीकेँ सुमझा दैत छथि‍न। यमुनोकाकी की‍ आब नव-नौताड़ि‍ छथि‍ जे परि‍वारक धक्का-पंजा नै बुझथि‍न। जि‍नगीक धक्का-पंजा जीबैक बहुत कि‍छु लूरि‍ सि‍खा देने छन्‍हि‍। सुभ्‍यस्‍त समए भेने काकीक मनमे खुशीक कोढ़ी शुरूहे अाद्रा नक्षत्रमे जे पकड़लकनि‍ से बढ़ैत-बढ़ैत अगहनमे भकरार भऽ फुला गेलनि‍।

धान दौन होइते, आने साल जकाँ यमुनाकाकी उसनि‍याँ करैसँ पहि‍नहि‍ उपजाक हि‍साब बेटो-पुतोहू आ पति‍योक कानमे दऽ देब, आने साल जकाँ नीक बुझलनि‍। मने-मन बुदबुदेलीह- कते धान भेल, तेकर कते चाउर हएत आ कते दि‍न चलत?”
कते दि‍न चलतमे ओझरी लगि‍ गेलनि‍। लोकक पेटक कोनो हि‍साब अछि‍। देखैमे ने बीत भरि‍क बूझि‍ पड़ैए मुदा हाथि‍यो खा-पी कऽ पचा लैत अछि‍। फेर मन घुमलनि‍। जखन अपने परि‍वारक बात अछि‍ तखन एना अग्‍गह-वि‍ग्‍गह कि‍अए सोचै छी। देखले परि‍वार नपले सि‍दहा। मुदा लगले मन आगू घुसुकि‍ गेलनि‍। आन-आन परि‍वार जकाँ तँ अपन परि‍वार नै अछि‍। आन-आनमे आनो-आनो उपाए छै अपना तँ से नै अछि‍। लऽ दऽ कऽ खेति‍येक आशा अछि‍। तहूमे एते दि‍न घटबी पुड़बैले गाम-गाम महाजनो छलए मुदा आब तँ ओहो ने अछि‍। ने ओ देवी आ ने ओ कराह। महाजनी मरैक कारणो भेल। राजे रोग जकाँ ने बाढ़ि‍यो-रौदी छी। जे जेहन तेकरा तही रूपे पकड़ैत अछि‍। जे जते कम आँट-पेटक ओकरा ओते कम आ जे जते नमहर ओकरा ओते बेसी नोकसान करैत। तइ संग इहो भेल जे गामक लोक बाहरसँ सेहो कमा-कमा अनए लगल। जइसँ महाजनीक बीच रोड़ा अँटकल।
ओना बहरबैयो बाहरक बहुत बात तँ नहि‍ये बुझैत मुदा जि‍नगीक कि‍छु बात तँ जरूर बुझए लगल। नै बुझैक कारण रहए जे पढ़ल-लि‍खल नै रहने एको गोटेकेँ ने बैंकक नोकरी रहै आ ने करखन्नाक ऑडि‍टरी। जइठाम धनक ककरोरबा बि‍आन होइत से कि‍यो ने बुझैत! मुदा रि‍क्‍शा चलौनि‍हार, ठेला ठेलि‍नि‍हार, गोदाममे बोरा उठौनि‍हारकेँ लगक महाजनसँ भेँट जरूर भेलै। जहि‍ना छोट बच्‍चा हाथक आङुर मुँहमे लैत-लैत बाहि‍यो पकड़ए लगैत, तहि‍ना खुदरा महाजन लग एने भेल। ओना छोट महाजनी रहने साले भरि‍क लेन-देन चलैत मुदा पच्‍चीस हजारक सहयोगी तँ भेटल। बेटा-बेटीक बि‍याह, घर-घरहट आ बर-बेमारीक आशा तँ भेटल। गामक महाजनीसँ सूदि‍यो छोट। जतए आसीन-काति‍कक कर्ज एक्के-दुइये मासमे सवैया-डेढ़ि‍या वृद्धि‍ करैत तइठाम दस प्रति‍शत व्‍याजक बदला पच्‍चीस प्रति‍शत दि‍अए पड़त, ततबे ने। मुदा तैयो तँ असाने भेल। दोसर इहो भेल जे आध-मन, एक-मन कर्ज लेल जे भरि‍-भरि‍ दि‍न साबेक जौड़ी खर्ड़ए पड़ैत छल सेहो बन्न भेल।

दुनू बापूत -कमलोकाका आ रधवो-केँ यमुनाकाकी बुझबैत कहलखि‍न- एते धान भेल। एकर एते चाउर हएत। एते दि‍नक पछाति‍ फेर अगि‍ला अन्न हएत। एते दि‍नमे एते साँझ भेल, एतेटा आश्रम अछि‍। दि‍नमे एते सि‍दहा लगैए।

यमुनाकाकीक हि‍साव सुनि‍ कमलाकाका वि‍चारक दुनि‍याँमे बौआ गेलाह। जेहो सुनलनि‍ सेहो रसे-रसे बि‍सरए लगलाह आ जे नै सुनलनि‍ से तँ नहि‍ये सुनलनि‍। अपन प्रस्‍तावक अनुमोदनक लेल यमुनाकाकी आँखि‍ नचबए लगलीह। कखनो पति‍पर तँ कखनो बेटापर दथि‍। उनटि‍ कऽ पाछू तकथि‍ तँ टाटक अढ़मे बैसल पुतोहूकेँ देखथि‍। सभ अपने-अपने दुनि‍याँमे बौआइत। अपन प्रस्‍तावक उत्तर नै पाबि‍ यमुनाकाकी पुन: दोहरौलनि‍- अखन सोचै-वि‍चारैक समए अछि‍ तँ कि‍यो कान-बात नै दइ छि‍ऐ, आ जखन बेर पड़त तखन थुक्कम-थुक्का करैत घि‍नमा-घीन करब?”
यमुनाकाकीक कड़ुआएल बात सुनि‍ कमलाकक्काक भक्क खुजलनि‍। मनमे उठलनि‍ जे मुँहो चोरौराइ नीक नै। कि‍छु तँ बजबे उचि‍त। बजलाह- खेतसँ खरि‍हान आनि‍ तैयार कऽ आंगन पहुँचा देलौं आबो हमरे काज अछि‍। आकि‍ ओकरा उसनब, रौद लगा कोठीमे राखब, की सेहो पुरूखे भरोसे छी।
काकाक उत्तरसँ यमुनाकाकीकेँ घरक लछमी मन पड़लनि‍। खुशीसँ मन नाचि‍ उठलनि‍। मुदा लगले, जना घुरमी लगैए तहि‍ना लगि‍ गेलनि‍। बजलीह- जोड़ भरि‍ धोती आकि‍ जोड़ भरि‍ साड़ी तँ कि‍यो साले भरि‍ ने पहि‍रत। साल भरि‍क पछाति‍ ओ थोड़े पहि‍रै जोकर रहै छै। एकर अर्थ ई नै ने भेल जे वस्‍त्रक जरूरत मेटा गेल, साल भरि लेल मेटाएल, तोहूमे कते बि‍हंगरा अछि‍। कहीं चोरि‍ये भऽ जाए की हराइये जाए, की कुत्ते बि‍लाइ दकैड़ दै आकि‍ आगि‍ये-छाइक प्रकोप भऽ जाए।
यमुनाकाकीक बात सुनि‍यो कऽ कमलाकाका अनठा देलनि‍। चुपे रहलाह! मुदा मनमे ओंढ़ मारए लगलनि‍ जे माए-बाप अछैत बेटा-पुतोहूकेँ परि‍वारक चि‍न्‍ताक उत्तरी पहि‍राएब उचि‍न नै। ओना काजक ढंग ओहन सि‍खा देब नीक, जइसँ जि‍नगीमे कहि‍यो चि‍न्‍ता नै सतबै। आगूमे बैसल रधवा, जना संस्‍कृत आकि‍ अंग्रेजी सुनि‍ कोनो बच्‍चाकेँ होइत, तहि‍ना सुनबे ने केलक। मुदा तैयो मनमे घुरि‍आइ जे जे-गति‍ सबहक हेतै से हमरो हएत। तइले अनेरे माथ-कपार पीटब आकि‍ धूनब नीक नै। रमरटि‍यासँ खढ़कटि‍ये नीक! भरमे-सरम चुपे रहल।

अढ़मे बैसल पुतोहूक मन बजैले लुस-फुस करैत। लुस-फुस करैक कारण जे के नै घर आकि‍ गामक मुख्‍यि‍यारी चाहैए? मुदा बेचारीकेँ कोनो एहन गरे ने भेटैत जे कि‍छु बजैत। एक तँ नव-नौतुक कनि‍याँ, दोसर नैहरोमे माए भानसे-भात करैक लूरि‍टा सि‍खौने। घरक जुति‍-भाँति‍क कोनो लुरि‍ सि‍खौनहि‍ नै। केना सि‍खेबो करि‍तथि‍? सभ गाम आ सभ परि‍वारमे कि‍छु-ने-कि‍छु भि‍न्नता होइते छै। जहि‍ना कोनो नट ओहने बोल्‍टमे नीकसँ लगैत जे समतुल्‍य होइत। तहि‍ना तँ परि‍वारो ने होइत अछि‍। माइये-बापक परि‍वार जकाँ सासुओ-ससुरक परि‍वार हएत, से कोनो जरूरी नै। चाहि‍यो कऽ वेचारी कि‍छु ने बाजि‍ सकल।

ओना धानक ढेरी देख कमलाकाकाक मन उमड़ैत रहनि‍। जहि‍ना पानि‍मे भीजने कि‍ताबक पन्ना एक-दोसरमे सटि‍ जाइत तहि‍ना कमलोकाकाकेँ भेलनि‍। परि‍वारक सभ हृदैमे सटि‍ गेलनि‍। मन उमड़ि‍ आगू बढ़लनि‍। पति‍केँ रहैत जँ पत्नीकेँ वा बाप-माएक रहैत बाल-बच्‍चाकेँ कोनो तरहक चि‍न्‍ता-फि‍कि‍र हुअए तँ जरूर कतौ-ने-कतौ माए-बापक दोख छि‍पल अछि‍। दोखक कारण मनमे एबे ने करनि‍। ओछाइनपर जहि‍ना नीन नै एने कछमछी लगैत तहि‍ना मन कछमछाइत रहनि‍। मुदा लगले, जहि‍ना सुतली राति‍मे ओछाइनपर सुतल माएकेँ देख जागल बच्‍चा सूति‍ रहैत तहि‍ना कमलोकाका केलनि‍।

काकाकेँ शान्‍त देख यमुनोकाकी असथि‍र भऽ गेलीह। मनमे उठलनि‍ जे चारि‍ गोटेक आश्रममे तीन गोटे तँ एक्के परि‍वारक छी, खाली कनि‍येटा ने अखन दस-आना छह-आनामे छथि‍। ओहो दू-चारि‍ सालमे रि‍ताइत-रि‍ताइत रि‍ता जेती। मुदा अखन तँ नैहरेक चाि‍ल-ढालि‍ छन्‍हि‍। अखन थोड़े ऐ घरक तीत-मीठ पचाैतीह। नैहर गेलापर जखन सखी-बहि‍नि‍याँ वा माए-पि‍ति‍आइन पुछतनि‍ जे बुच्‍ची अन्न-वस्‍त्रक ने तँ दुख-तकलीफ होइ छह, तखन ओ थोड़े आगू-पाछू ताकि‍ बजतीह। ओ तँ परि‍वारेक बचौने बॅचत। वएह ने परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा छी। जानि‍येँ कऽ तँ हमरा सभक घरक छप्‍पर भगवानक डंगेलहा छी, तेहीमे ने बॅचि‍-खुचि‍ कऽ घरक मर्यादाकेँ संगे लऽ कऽ चलैक अछि‍। अहीमे ने अपन इमान-धरम बचबैत परि‍वार चलाएब तखन ने समाजक संग कुटुमो-परि‍वारक प्रति‍ष्‍ठा ठाढ़ रहत।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
गजेन्द्र ठाकुर

 
उल्कामुख (मैथिली नाटक)

चारिम कल्लोल
(नेपथ्य्सँ गीत अबैत अछि)
कमला मैया बसत बड़ी दूर
गमक लागे गेंदा फूल
 कथी डालि‍ लोरहब बेली-चमेली
कथी डालि‍ लोरहब अरहूल हे
गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया.....
कि‍नका चढ़ाएब बेली-चमेली
कि‍नका चढ़ाएब अरहूल
गमक लागे गेंदा फूल
गमक लागे गेंदा फूल

कमला चढ़ाएब बेली-चमेली
कोयला चढ़ाएब अरहूल,
गमक लागे गेंदा फूल हे
कमला...कि‍नका सँ मांगब अन-धन सोनमा
कि‍नकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल वर लाल हे
ससि‍या सँ मांगब अन-धन सोनमा
मातैर सँ मांगब सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल वर लाल....।

(एक दिस मत्तवर्णीपर दीना आ दोसर दिस मत्तवर्णीपर भदरी छथि। एक दिस रंगशीर्षपर उदयन आ दोसर दिस रंगशीर्षपर वर्द्धमान छथि दीना भातढाला पोखरि आ भदरी सागढाला पोखरिक कातमे छथि। रंगपीठ खाली अछि।)

वर्द्धमान: धारक कातमे घर बनेने छी हम आ साँपबला घरमे रहै छी अहाँ आचार्य उदयन?
उदयन:: धारक कातमे निवास केनिहार आ आ साँपबला घरमे निवास केनिहारकेँ चैन कतऽ? वर्द्धमान, भातढाला पोखरि आ सागढाला पोखरि जाए पड़त तत्काल।
दीना: (चिकड़ि कऽ) भातढाला पोखरिपर, जतए भीम भात रखैत रहथि? हम छी दीना, एतऽ भातढाला पोखरिपर।
भदरी: (चिकड़ि कऽ) सागढाला पोखरि, जतए भीम साग रखैत रहथि। हम छी भदरी, एतऽ सागढाला पोखरिक कातमे।
उदयन: हँ, आ सिमलवन सेहो जाए पड़त ककरो, ओतऽ कब्जा छन्हि आचार्य सरभक।
भदरी: हँ वएह सेमापुर छी सिमलवन जतए अर्जुन अपन अस्त्र-शस्त्र अज्ञातवास कालमे नुकेने रहथि?
उदयन: हँ, एकटा आर युद्ध शुरू भऽ गेल अछि।
वर्द्धमान: मुदा ई युद्ध शास्त्रार्थसँ नै जीतल जा सकैए आचार्य उदयन। (रंगपीठ दिस इशारा करैत।) देखू ओतऽ सभ किछु लागि रहल अछि खाली खाली, मुदा अछि नुकाएल शस्त्र, घृणा आ..
उदयन: आ आचार्य सरभ। (रंगपीठक दूर भाग दिस इशारा करैत।) ओऽऽऽऽऽ छी ठाकुरगंज, भीम ठाकुर माने भनसिया बनि समै कटने रहथि, ओतै ओ कीचक वध केने रहथि।
भदरी: घृणाक वध हएत आब..
दीना: अवश्य भदरी
भदरी: अगड़म बगड़म काठ कठम्‍बर
दीना: दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ।
भदरी: (रंगपीठक लग भाग दिस आंगुर देखबैत) ओतए मनिहारीमे श्रीकृष्णक औंठीक मणि हेरा गेल छलन्हि।
उदयन: आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह। अहाँ सभकेँ कागचक व्याघ्र आ सिंह बनाबैबला आचार्य सरभक काट आब जा कऽ भेटल अछि..
(नेपथ्यसँ गीत अबैत अछि।)
कटबै मे सोना सुतरि‍या बि‍नबै झुमरि‍ जाल हे
जाल फरि‍-फरि‍ कमला एलखि‍न
सन-झुन लागै गोहबरि‍या
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हेऽऽ
कटबै......
जाल फरि‍-फरि‍ गांगो एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक,
सुन लगै गोहबरि‍या हे
सुन लगै गोहबरि‍या हे

कटबै.........
जाल फरि‍-फरि‍ मातैर एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हे
कटबै.....
बि‍नबै झुमरि‍ जाल हे।
(अन्हार पसरि जाइत अछि।फेर इजोत होइत अछि आ आचार्य सरभ विक्षिप्त अवस्थामे मुख्य मंचपर अबै छथि।)

आचार्य सरभ: (मंचसँ बाहर पाछू कात बोन दिस इशारा करैत।) ई बँसबिट्टी एतेक पातर किए भऽ गेल अछि। ऐमे सँ कोनो अबाज नै अबै छलै, मुदा आब ई गीत पहिल बेर एकरा चीड़ि कऽ आबि रहल अछि। ई कोना रोकि सकत उल्कामुखकेँ..कोना रोकि सकत..(ठमकि कऽ पाछू दिस ताकि कऽ) शिष्य..(फेर ठमकि कऽ) मुदा ई शिष्य सभ तँ कोनो जोकरक अछिये नै। ई सभ कोना कऽ रोकि सकत उल्कामुखकेँ? ई सभ तँ रटन्त विद्याक पालक सभ अछि..आ स्त्रीक प्रतिबन्ध चौपाड़ि आ टोलमे कऽ देने छिऐ पहिनहियेसँ..जे ओ सभ उल्कामुख बिसरि जाइ जाथि.. ई सभ तँ उल्कामुख बुझबे गुनबे नै करत तँ कोना कऽ रोकि सकत।
(आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंहक प्रवेश।)
आचार्य व्याघ्र: आचार्य सरभ, बहुत भेल कल्पना, थाकि गेल छी हम।
आचार्य सिंह: आचार्य सरभ, कल्पना खतम। ई जादू खतम, ई बँसबिट्टीक बेढ़ खतम भेने आब नहिये हमर, नहिये आचार्य व्याघ्रक, नहिये अहाँक, नहिये गंगेशक, नहिये वल्लभाक, नहिये वर्द्धमानक, नहिये उदयनक, नहिये दीनाक आ नहिये भदरीक अस्तित्व बाँचल।
आचार्य व्याघ्र: वृन्दावन बोन बनि गेल ई बँसबिट्टी। (बाट दिस इशारा करैत) एतऽ आबैबला रस्ता ई बाटो बहिन मदति केनाइ शुरू कऽ देने अछि वल्लभाक। काछुक खोपड़ीमे सरिसवक तेलमे बाती राखि बियाहक दीप बनाओल गेल छलै वल्लभा लेल। कपोत रूपमे बिध-बिधाता आबि गेल छथि। (नेपथ्यसँ साँइ-साँइ करैत अबाज अबैए। आचार्य व्याघ्र कान पाथि सुनै छथि।) सुनू ई स्वर। स्वप्नलोकमे विचरणक दिन खतम भेल।
आचार्य सिंह: (अकास दिस इशारा करैत) हरियर पाँखि आ लाल ठोरबला ई सुग्गाक जोड़ी, लटपटिया सुग्गाकेँ देखू, ऐ प्रेम सखा मोरक जोड़ी देखू, बिदा भऽ गेल अछि ऐ वृन्दावनमे।
आचार्य सरभ: छिन्नमस्ताक कटल मूड़ीबला धड़क बिचका मोटका धार ओकर नीचाँ खसल मूड़ी पीबै छै आचार्य सिंह, ओ खसल मूड़ी हम बनि गेल छी..
आचार्य व्याघ्र: आ दूटा आर धार दूटा दुनू कातमे ठाढ़ जोगिन पीबै छै आचार्य सरभ। दीना, भदरी, उदयन आ वर्द्धमान ओइ जोगिनकेँ मोहि लेलन्हि।
आचार्य सिंह: इच्छा एकटा मशीन छी। सत्यक आ इतिहासक सत्यता मात्र आभासी
आचार्य व्याघ्र: सत्य आ आभासीक बीच भेद मेटा देने रहए ई बँसबिट्टी।
आचार्य सिंह: अचेतनता चेतना बनि गेल। ओकर भाषा अछि उल्कामुख।
आचार्य व्याघ्र: आचार्य सरभ, अहाँक शिक्षा पद्धतिमे किछु भाव आ सोच वंचित रहए।
आचार्य सिंह: निरन्तरताक विरोध करैए उल्कामुख।
आचार्य सरभ: समताक लगक शब्द असमता, न्यायक लगक शब्द अछि अन्याय आ वंचितक लगक शब्द अछि प्राप्ति।
आचार्य व्याघ्र: नै आचार्य, ई अहाँक दमित करैबला शिक्षा पद्धति अछि, एकर विरोध करैत अछि उल्कामुख।
आचार्य सरभ: ऊँच स्थान लोकक केँ हाँ सभ नीचाँ आनऽ चाहै छी आ निचुलकाकेँ ऊपर।
आचार्य सिंह: अहाँक शिक्षा पद्धतिक भाग अछि ई ऊँच आ नीँच, एकर विरोध करैत अछि उल्कामुख।
आचार्य सरभ: (आचार्य सिंह दिस तकैत।) एकल वाद्यकेँ मेटा कऽ अहाँ जन कोलाहल आनऽ चाहै छी।
आचार्य सिंह: जन गाथापर लिखल नाराशंसीपर नाचत लोक आ ओकरे संगे नाच गन्धर्व। स्म्वेत स्वरक नाद अछि उल्कामुख।
आचार्य सरभ: (हाथसँ वीभत्स इशारा करैत।) मुदा रचनाकार तँ मरि गेल। के मानत जे के अछि लिखने ई उल्कामुख?
आचार्य व्याघ्र: रचनाकारसँ बेशी महत्वपूर्ण अछि ई रचना, एकर सन्देश, आ ओ रचना आ संदेश अछि उल्कामुख।
आचार्य सिंह: रातिक राजा छल चोर, दिनमे मालिक मालिक करै छल। चोरक रूप थोड़े होइ छै आब आब तँ चोरियो सभ करऽ लागल अछि। पहिने ओकर प्रशिक्षण होइत रहए, खेतक आरिपर। सिंह कोना काटल जाय से आरिकेँ काटि कए देखाओल जाइत रहए। भोर भेने जे लोक सभ खेत जाइत छल तँ देखैत छल। देखैत छल आरिमे काटल सिंघ भरि गाम हल्ला..। रौ, सतर्क रहै जाइ जो। कोनो पैघ चोरिक योजनामे अछि ई सभ। मुदा फेर वएह सभ दिनमे सामान्य मनुक्ख।.....
आचार्य व्याघ्र: दू दिनसँ फुटहा खा कऽ गुजर कऽ रहल छी। आइ चोरि लेल जाए पड़त। बच्चा सभक लेल। देहमे तेल लगा कऽ, मुँहमे भसम लगा कऽ। क्यो पकड़ए चाहत तँ छछलि कऽ भागि जएब। हे क्यो चोरकेँ रातिमे चीन्हि लेलहुँ तँ बरनी रहए देबैक। नाम नहि बकि देबैक। नहि तँ मारि देत...कारण दिनमे तँ अहाँ मालिक भऽ जएबैक। से डर छैक रातुक राजाकेँ।
आचार्य सरभ: की कथा सुना रहल छी..ओइ..की कहलिऐ..उल्कामुखक..
आचार्य सिंह: मुँह बिचकेलहुँ तँ लोक सभ बुझलक जे प्रसन्न छी, भौंहपर जोर देने बुझलक जे चिन्तनशील छी। मुदा हृदय रहैए सदिखन कनैत। से हम जनैत छी आचार्य सरभ..
आचार्य सिंह: (बाहर अकासमे एकटा किरण चमकैते रहैत अछि।) आ देखू, वनदेवी सेहो आबि गेलीह ऐ वृन्दावन, आ वनदेवीक सखी वनसप्तो, पाँखियुक्त ममातामयी गाय। आबि गेलीह वनसप्तो बोनमे हेराएल उल्कामुखकेँ रस्ता देखबै लेल।
(तीनू गोटे तेना अभिनय करै छथि जेना हबामे उड़िया रहल होथि। नेपथ्यसँ साँइ-साँइ करैत अबाज बढ़िते जा रहल अछि।)
तीनी गोटे सम्वेत: कल्पनाक पएर उखड़ि रहल अछिआबि रहल अछि उल्कामुख।

अगड़म बगड़म काठ कठम्‍बर
अगड़म बगड़म काठ कठम्‍बर
अगड़म बगड़म काठ कठम्‍बर
आबि गेल ई उल्कामुख
(उड़ियाइत तीनू गोटे खसबाक अभिनय करैत छथि आ सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।)
(फेर प्रकाश होइत अछि आ मंचपर घनक स्थान गोलाकार पिण्ड लऽ लैत अछि।)

भगता: घूमि रहल अछि ई पृथ्वी। (गोलाकेँ परिश्रमसँ हाथमे उठबैत छथि।) लटकल अछि ई अकासमे। एकर नीचाँमे कोनो आधार नै छै। एतेक भारी अछि तैयो कोनो भार नै छै एकरामे।
अगरम बगड़म काठ कठम्बर
(गोलाकेँ नीचाँमे राखि दै छथि आ घसकि कऽ पाछाँ आबि जाइ छथि- दक्षिण दिशामे। हुनकर शिष्य अबैत छथि आ गोलाकेँ घुमबऽ लगै छथि।)
भगता: देखू। ई घड़ी विपरीत दिशामे घूमि रहल अछि ई पृथ्वी, मुदा जँ उत्तर दिश देखबै तखन। दक्षिण दिस तकबै तँ घड़ीक दिशामे घुमैत देखाएत ई। आ हम अहाँ जे ऐ पृथ्वीपर छी ओकरामे भार छै। आ ई पृथ्वी अछि बिन भारक, अकासमे लटकि रहल।
(हुनकर शिष्य पृथ्वीकेँ उठा लै छथि।)
अगरम बगड़म काठ कठम्बर
(भगता उकासी करऽ लगै छथि। शिष्य गोलाकेँ नीचाँ राखि कऽ भगताक छाती ससारऽ लगै छथि।)
भगताक शिष्य: दक्षिण दिशासँ आएल छथि गुरुजी खिस्सा सुनि कऽ..(मोन पाड़ैत) बासवेश्वरक। कहै छथि जे मिथिलामे सेहो हेतै ई सभ। हजार सालक बाद पुरनका गप घटित हेतै। (मुस्की दैत) मुदा गुरु छै हमर सिद्ध, केहेन केहेन गप बाजै छै नै सुनै छिऐ।  
(भगता बेसी जोरसँ उकासी करऽ लगै छथि। शिष्य भगताक छाती ससारऽ लगै छथि। सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।)



पाँचम कल्लोल
पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाएल घन राखल छल, आब पाँचम अंकसँ भूत आ कल्पनाक प्रतीक ओइ संकेतक बदला वास्तविकताक प्रतीक गोला राखल रहत।
[सोहागो (गंगाधरक माता), शिष्य साही बनि गेल हरपति (गंगाधरक पिता), गंगेश बनि जाइ छथि गंगाधर, वल्लभा बनि जाइ छथि कुमरसुता (गंगाधरक पत्नी), भगता बनि गेल जटा, भगताक शिष्य बनि गेल दलित गायक हीरू, आचार्य व्याघ्र बनि जाइ छथि मनसुख (जीवेक पिता), आचार्य सिंह बनि जाइ छथि हरिकर-सेनापति (मेधाक पिता), आचार्य सरभ बनि जाइ छथि कीर्ति सिंह (राजा), वर्द्धमान बनि जाइ छथि मितू (गंगाधरक बहिनोइ), आनन्दा (गंगाधरक बहिन), मेधा (हरिकर- सेनापतिक बेटी), देवदत्त बनि जाइ छथि जीवे (मनसुखक बेटा), शिष्य खिखिर बनि गेल राजाक अर्थमंत्री नारायण, शिष्य नढ़िया बनि गेल दरबारी-१, शिष्य बिज्जी बनि गेल दरबारी-२, उदयन बनि गेल माधव (अनुभव मण्डलक सदस्य आ दरबारी), दीना बनि गेलाह माधवक सहयोगी-१, भदरी बनि गेलाह माधवक सहयोगी-२ , रुद्रमति (माधवक माए)]
(नेपथ्यसँ गीत आबि रहल अछि।)
पहि‍‍ल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
मूंगक दाल नहि‍ सोहाय, केहन गरम संओ रे
ललना रे....
दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पूसक माछी ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पौरल खीर ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
ललना रे....
चारि‍म मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
फगुआक पूआ ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे
चैत के माछ ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
आम के टि‍कोला ने सोहाय, कि‍ केहन गरम सेओ रे
सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
खुजल केश ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाकल आम ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
पि‍या के सेज ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
दसम मास चढ़ु भादव, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
देवकी दरदे बेयाकुल दगरि‍न बजायब रे
जब जनमल जदुनन्‍दन, खुजि‍ गेल बंधन रे
ललना रे.....
खुजि‍ गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे।
(गीत खतम होइते एकटा बच्चाकेँ कोरामे लेने हरपति आ सोहागो प्रवेश करै छथि।)
हरपति: (सोहागोकेँ सम्बोधित करैत) सोहागो, गंगा माएक प्रतापेँ ई दिन हमरा सभकेँ देखबामे आएल अछि तेँ एक्र नाम गंगाधर राखि दैत छिऐ।
सोहागो: अबस्से किने। (बेटाकेँ कोरामे दुलार-मलार करऽ लगै छथि।)

(तखने अगरम बगड़म काठ कठम्बर बजैत ऋषि जटा आ हुनकर दलित गबैय्या शिष्य हीरू प्रवेश करैत छथि।)
ऋषि जटा: अगरम बगड़म काठ कठम्बर। अद्भुत, अद्भुत, अद्भुत..ई बच्चा अद्भुत..
शिष्य हीरू:
 कौने मास मेघबा गरजि‍ गेल
      कोने मास बेंगवा बाजू रे
ललना रे कोने मासे होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
सावन मेघवा गरजि‍ गेल,
      भादव बेंग बाजू रे।
आसि‍न होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
कोने तेल देव सासु के
      कोने ननदि‍ जी के रे।
ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के
      गरी ननदि‍ जी के रे।
ललना रे अमला देबैन गोति‍न के
      हुनकर पैंच हेतनि‍ रे।
ऋषि जटा: (गरामे सरभ खचित एकटा ताबीज गंगाधरकेँ पहिराबैत छथि।) ई बच्चा अद्भुत..अद्भुत..अद्भुत..अछि.. सामान्य बच्चा नै अछि ई..तेँ ई असामान्य भेंट..
शिष्य हीरू: धधरा फेकैत ई गीदर..की छी ऋषि जटा..
ऋषि जटा: उल्कामुख….
(चारू गोटे एक दोसराक मुँह ताकऽ लागै छथि।)
शिष्य हीरू: (आश्चर्य करैत) उल्कामुख?
ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) उल्कामुख?
शिष्य हीरू: (आश्चर्य करैत) हँ, अहीं तँ कहलौं, उल्कामुख।
ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) हमहीं कहलौं?
हरपति: हँ, अहीं तँ कहलौं, उल्कामुख ऋषि जटा।
ऋषि जटा: (आश्चर्य करैत) सत्ते, हमहीं कहलौं?
सोहागो: हँ, ऋषि जटा, अहीं तँ कहलौं, की कोनो अनिष्ट अछि..
ऋषि जटा: नै, कोनो अनिष्ट नै.. की नाम रखने छी एकर..
हरपति: गंगाधर..

ऋषि जटा: ई ताबीज एकर गरामे चलि गेल, हमर गुरूकेँ हुनकर गुरू देने रहथि, आ हुनका हुनकर गुरू आ हम नाम बिसरि गेल रही ऐ ताबीजक..उल्कामुख..हँ यएह हमर गुरू कहने रहथि हमरा आ हुनका कहने रहन्हि हुनकर गुरु आ..दिव्य..दिव्य..ई बच्चा दिव्य..
(ऋषि जटा जोरसँ उकासी करऽ लगै छथि। शिष्य हीरू हुनकर छाती ससारऽ लगै छथि। सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि।)
(बालक गंगाधर आठ बर्खक भऽ गेल छथि। माए-बापसँ हुनकर बहस चलि रहल छन्हि। लगैए कोनो गम्भीर विवाद छन्हि।)

हरपति: एहनो भेल छै कहियो, यज्ञोपवीत नै कराएब। कोनो रोक-टोक हम केलौं, ब्राह्मणक बच्चा भऽ कऽ हीरूक टोल अहाँ गीत सुनैले, सिखैले जाइत रही, कहियो रोकटोक केलौ?

गंगाधर: (अपन उल्कामुख ताबीज देखबैत) हम एकरा धारण कऽ लेने छी पिताश्री। आ हीरू कहै छथि जे उल्कामुख धारण केनिहारकेँ कोनो संस्कार करेबाक आवश्यकता नै होइ छै।
(हरिपति क्रोधित भऽ जाइ छथि।)

सोहागो: (गंगाधर दिस ताकैत) एना नै बाजू गंगाधर, एहेन आइ धरि नै भेल अछि, लोक की कहत, पण्डित सभ की बाजत?

गंगाधर: माते, ई हमर अन्तिम निर्णय अछि..हीरू कहै छथि जे पण्डित लोकनि शास्त्रक गलत व्याख्या करै छथिधर्मकेँ छागरक बलि धरि सीमित कऽ देल गेल अछि..

हरपति: (बीचमे क्रोधित भऽ गंगाधरकेँ काटै छथि) हीरू कहै छथि..सभ गपमे हीरू कहै छथि..आ हीरूकेँकेँ ई सभ कहलकन्हि..

गंगाधर: हुनका ऋषि जटा ई गप कहलखिन्ह।

हरपति: (आर क्रोधित भऽ) आ ऋषि जटाकेँकेँ कहलकन्हि?

गंगाधर: ऋषि जटाकेँ हुनकर गुरु कहलखिन्ह..आ हुनकर गुरूकेँ हुनकर गुरूआ ..आकोनो रहस्य छै जे ऐ उल्कामुखमे छै..आ जे छै सभक विस्मरणमे..

हरपति: माने ककरो बुझले नै छै..आ ओइ गपपर अहाँ अपन ई अन्तिम निर्णय लेलौ..

गंगाधर: (गप काटैत) मुदा जटिल कर्मकाण्ड अहाँकेँ नीक लगैए? हमरा तँ हीरूक गीतमे बेशी तत्त्व बुझाइए..आ हँ हमर अन्तिम निर्णय तँ अहाँ बुझिए गेलिऐ..

हरपति: आ अहाँ अन्तिम निर्णय कऽ लेब, आ तकर बादो ऐ घरमे रहब, आ अहाँ ऐ घरमे रहब आ गौँआ सभ हमरा ऐ गाममे रहऽ देत..की ई सभ सम्भव छै?

(तखने मितू- गंगाधरक बहिनोइ आ आनन्दा- गंगाधरक बहिन प्रवेश करै छथि।)

आनन्दा: माँ- पिताजी। हमरा नै लगैए जे गंगाधर अपन बातसँ डिगत। गंगाधरकेँ अप्रत्यक्ष रूपमे घर छोड़बाक लेल विवश नै करू।

सोहागो: (आनन्दा दिस सम्मुख होइत) मुदा एतुक्का हाल नै देखै छहक।

हरपति: एतुक्का हाल छोड़ू, ई हमरो स्वीकार्य नै अछि..गंगाधर..हमर अन्तिम निर्णय अछि जे हम सभ ई गाम नै छोड़ब।

सोहागो: अहाँकेँ के कहैए गाम छोड़ैले।

गंगाधर: माते। हिनकर कहबाक अर्थ छन्हि जे जँ हम घर नै छोड़ब तँ हिनका गाम छोड़ए पड़तन्हि। पिताश्री..हम आइये सप्तरीक बोन दिस बिदा भऽ रहल छी..हमर अन्तिम निर्णय आ अहाँक अन्तिम निर्णयमे कोनो साम्य नै अछि।

सोहागो: गंगाधर, अहाँ आठ बर्खक छी..आ अहाँ असगरे

मितू: नै..गंगाधरकेँ हम सभ ओहिना नै छोड़ि सकै छियन्हि। हमहू सभ संगे जाएब..की आनन्दा..

आनन्दा: हँ, हम सभ नै छोड़ि सकै छियन्हि हुनका। माँ, अहाँ पिताजी लग रहू..हम वचन दै छी जे गंगाधर अपन अध्ययन पूर्ण करत..आ

गंगाधर: आ ई उल्कामुख ओकरा संग छैहे

(सोहागो विचलित भऽ जाइ छथि, हरपति पाथर बनि जाइ छथि। आ सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ गंगाधर, आनन्दा, मितू, ऋषि जटा आ हीरू देखा पड़ै छथि। सभक मुँहपर लक्ष्य पाबि जेबाक प्रसन्नता स्पष्ट देखा पड़ि रहल छन्हि।)

ऋषि जटा: हमर मोनमे आब संतुष्टि अछि गंगाधर, अहाँ सन शिष्य हमरा भेटल। ई सौभाग्य हमर गुरु, हुनकर गुरु आकि हुनकर गुरुकेँ नै भेटल छलन्हि। अहाँकेँ पढ़बैकालमे जे आत्म संतुष्टि हमरा भेटल से अद्भुत। रटन्त विद्याक अखुनका वातावरणमे अहाँक विषयकेँ बुझबाक प्रवृत्ति अजगुत लागल। सन्तुष्ट छी हम..ई उल्कामुखक प्रभाव छी आकि अहाँक प्रभाव ऐ उल्कामुखकेँ सिद्ध बना देने अछि नै जानि की गप अछि। जाउ..जाउ अहाँ कीर्ति सिंहक राजदरबार। देखू की करबैत अछि ई उल्कामुख…..



छठम कल्लोल

(कीर्ति सिंहक राजदरबार। दरबारी-१ आ दरबारी-२ सेहो छथि। गंगाधर आ राजाक अर्थमंत्री नारायणक प्रवेश दू दिशासँ होइत अछि।)


कीर्ति सिंह: (नारायण दिस तकैत) अर्थमंत्री नारायण, की भेल हिसाब-किताब मिलल आकि नै।

दरबारी-१: कोना मिलतन्हि, सभ रटन्त विद्याबला विद्यार्थी सभ पाठशालासँ बहार होइत अछि जे नव गणितक प्रश्नक ओझराहटिमे ओझरा जाइत अछि।

कीर्ति सिंह: (गरजैत) अर्थमंत्री नारायण।

अर्थमंत्री नारायण: (हड़बराइत) हँ, हँ सएह तँ जोड़बा रहल छलहुँ अपन एकटा शिष्यसँ एक जोड़ दू जोड़ तीनएक सए धरि..माने माने एकसँ एक सए धरि जोड़..कहने छल जे एक घण्टामे जोड़ि देब..तावत ई (दरबारी-२ दिस इशारा करैत) घीचि कऽ लऽ अनलन्हि।

दरबारी-२(दमसाइत): अर्थमंत्री, काल्हियो अहाँ बुते जोड़ मिलाओल नै भेल, जोड़पर जोड़..औ जीकतेक घाटा आकि नफामे अहाँक खाता-खेसरा अछि ई तँ साल भरिसँ पता चलिये नै रहल अछि।

गंगाधर: महराज जँ आदेश हुअए तँ हम किछु कही।

(राजा इशारासँ आदेश दै छथि।)

गंगाधर: (अर्थमंत्री नारायण दिस सम्मुख होइत) एकसँ सए जोड़बा लेल पहिने ई बुझू जे संख्या कएक टा अछि।

अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) सए टा आर कतेक।

गंगाधर: एक सँ सए आ सइया निनानबे ऐमे आब काज आएत। एक आ सए, दू आ निनानबे, तीन आ अनठानबे..ई सभ जोड़ाक कतेक परिणाम आएत।

अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) एल सए एक आर कतेक?

गंगाधर: दू दू टा जोड़ा अछि, तँ सए टामे कतेक जोड़ा भेल।

अर्थमंत्री नारायण: (बिहुँसैत) पचासटा आर कतेक?

गंगाधर: एक सए एक केर पचास टा जोड़ा अछि। तँ एक सए एक केँ पचाससँ गुणा करू। वा पचासकेँ सएसँ गुणा करू आ ओइमे पचास जोड़ू..कतेक भेल।

अर्थमंत्री नारायण: (आश्चर्यसँ आँखि फाड़ि बजैत) पचासकेँ सएसँ गुणा भेल पाँच हजारपाँच हजार पचास। पाँच हजार पचास भेल महाराज। हँ ठीके तँ..

कीर्ति सिंह: अहाँक शिष्य तँ बड काबिल अछि। (गंगाधर दिस तकैत) की नाम अछि अहाँक वत्स..

अर्थमंत्री नारायण: (लज्जित होइत) नै महराज, ई हमर शिष्य नै छथि। ई तँ हमरासँ नोकरी माँगऽ आएल रहथि। मुदा जखन पुछलियन्हि जे कोन पाठाशालासँ छी तँ कहलन्हि जे सपतरीसँ ऋषि जटा आ हुनकर शिष्य हीरूसँ पढ़ल छथि, कोनो पाठशालामे नै पढ़ने छथि। तेँ हम नोकरीपर नै रखलियन्हि। हम लज्जित छी महराज। हिनकर नाम छियन्हि गंगाधर..

कीर्ति सिंह: आश्चर्य। मुदा कोनो बात नै.. (दरबारी १-२ दिस इशारा करैत) जाउ आ हरिकर- सेनापतिकेँ बजाउ।

(दरबारी १ एक दिशासँ आ दरबारी-२ दोसर दिशासँ बहराइ छथि आ फेर संगे हरिकर सेनापतिक संग क्षणमे अबै छथि।)

कीर्ति सिंह: हम गंगाधरकेँ अपन धर्म बहिन कुमरसुतासँ विवाह करबा कऽ ऐ राज्यक प्राधानमंत्री बनबैत छियन्हि। सेनापति हरिकर..सभ प्रबन्ध कएल जाए।

सेनापति हरिकर: अवश्य महराज..अवश्य..शीघ्र सभ इन्तजाम भऽ जाएत।

(सगरे अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ लगैत अछि जे राजदरबारसँ बेशी महत्वपूर्ण गंगाधरक कार्यालय भऽ गेल अछि। ओ एकटा अनुभव मण्डलक स्थापना केने छथि जइमे ने कोनो जातिक भेद छै आ ने स्त्री-पुरुषक भेद। गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, आनन्दा, मेधा, जीवे, ऋषि जटा, हीरू, माधव, माधवक सहयोगी-१ आ माधवक सहयोगी-२ मंचपर आबि जाइ छथि, तखने प्रकाश होइत अछि। सभक गरामे उल्कामुख ताबीज लटकल छन्हि।)


गंगाधर: नव पाठशाला सभमे विद्यार्थी सभ सोचि रहल छथि, कऽ रहल छथि अपना हाथसँ काज। स्त्री-शिक्षा फेरसँ शुरू भऽ गेल अछि। जाति-पाति खतम कऽ देल गेल अछि, शिक्षा सभक लेल।

ऋषि जटा: आ सेहो रटन्त नै बुझन्त..जे हमर गुरू व हुनकर गुरू वा हुनकर गुरुक कालमे नै छलैरटल विद्या तँ बुझू गदहाक ऊपर राखल बोझ थिक।

मनसुख: बेटा जीवे, सभ अभ्यागत लेल जलखैक व्यवस्था करू।

हरिकर: पुत्री मेधा अहाँक जीवेक सहयोग करू गऽ।

(जीवे आ मेधा बहरा जाइ छथि।)

गंगाधर: अनुभव मण्डल परिश्रमक सत्कार करैत अछि धनिकक नै। धनिकक धन कुकुड़क दूध सन अछि, जइसँ कुकुड़क बच्चा मात्रक पोषण होइ छै, मिष्टान्न नै बनै छै। साँपक काटल आ भूत-प्रेतक शिकारसँ अहाँ किछु पूछि सकै छिऐ मुदा धन रूपी भूतसँ जे ग्रस्त अछि ओकरासँ की पुछबै?

मनसुख: सही कहलौं गंगाधर हमर बेटाकेँ कहियो अनुभव मण्डलक पाठशालामे अनुभव नै भेलै जे ओ सभ कहियो अछूत छल।

मितू: अछूत नै कहियौ मनसुख, अनुभव मण्डल ओकरा उल्कामुखी नाम देने अछि।

माधव: हँ उल्कामुखी। (माधव अपन सहयोगी-१ आ सहयोगी-२ दिस तकैत बजैत छथि।) अहाँ दुनू गोटे जाउ आ उल्कामुखी पाठशाला सभक बैसकीमे जे किछु आर्थिक जरूरति सोझाँ आबै ओकरा पूरा करू।


आनन्दा: तखन सभा खतम कएल जाए।

हरिकर: नै हमरा एकटा गप कहबाक अछि।

माधव: कोन गप सेनापति हरिकर।

हरिकर: माधव, गंगाधर अखन बाहर जा रहल छथि, सप्तरी। से अहींकेँ ई काज करऽ पड़त। हमर इच्छा अछि जे हमर पुत्री मेधाक बियाह जीवेसँ भऽ जाइ। हम बियाहक इन्तजाममे लागब, आ किएक तँ अहाँ आ हम दुनू गोटे राजाक दरबारमे छी से एकटा औपचारिक अनुमति हम सभ राजासँ ऐ लेल लै छी। तँ ई भार अहींपर।

गंगाधर: ई तँ हर्षक विषय अछि। (उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइ छथि। सभ उठि जाइ छथि आ मनसुख आ हरिकरकेँ बधाइ देबऽ लगै छथि। अन्हार पसरि जाइत अछि।)

(राजा कीर्ति सिंहक दरबार। राजा, अर्थमंत्री नारायण, दरबारी-१, दरबारी-२ आ माधव आ हुनकर दुनू सहयोगी दरबारमे छथि। राजा तमसाएल सन छथि।)

राजा कीर्ति सिंह: जखन हम जीवे आ मेधाक विवाहक अनुमति नै देने रही तखन ओ विवाह भेल कोना।

माधव: महराज, ओ तँ औपचारिक अनुमति छल, अनुभव मण्डलमे ओइ विवाहक कोनो विरोध नै भेल रहए।

राजा कीर्ति सिंह: अनुभव मण्डल, अनुभव मण्डल। ई रजदरबारसँ पैघ भऽ गेल अनुभव मण्डल?

अर्थमंत्री नारायण: हम सेहो आंगुर उठेने रही महराज। ई अनुभव मण्डल की की सदावर्त बँटने फिरैए, राजकोषक क्षति करैए।

माधव: अनुभव मण्डलमे सभ परिश्रमक खेनाइ खाइए अर्थमंत्री नारायण। अहाँ बीच-बीचमे गंगाधरपर ई आरोप लगबैत रहै छियन्हि मुदा ओ एकर नीक जकाँ उत्तर दऽ देने छथि, आ अहाँ संतुष्ट सेहो भऽ गेल रही।
दरबारी-१: संतुष्ट की हेता, हुनकर घुमौआ हिसाब हिनका बुझैमे अबिते नै छन्हि।

दरबारी-२: मुदा ओ सभ तँ छोट मोट गप छल, ऐबेर तँ राजाक आदेशक निरादर भेल अछि। अनुभव मण्डलक कोनो काजपर राजा प्रतिबन्ध नै लगेने रहथि। रटन्त विद्या खतम करू, खतम भेल..
दरबारी-१: मुदा रटन्त विद्यासँ हिसाब जे नै मिलै छलन्हि अर्थमंत्रीक।

अर्थमंत्री नारायण: मुदा रटन्त विद्या खतम भेने लोक दिमागसँ सोचऽ लागल। ई तँ प्रारम्भ अछि महराज। मनसुख चर्मकारक बेटा आ ब्राह्मण सेनापति हरिकरक पुत्रीक विवाह क्रान्ति आनि देत..की कहै छै ओकरा..(सोचैत)

माधवक शिष्य-१ आ २: उल्कामुखी

कीर्ति सिंह: माधव, अहाँ सभ जाउ आ हरिकरकेँ कहि दियन्हु जे आब ओ ऐ राजक सेनापति नै रहलाह। आ गंगाधर ऐ राज्यक प्रधानमंत्री नै रहलाह सेहो अनुभवमण्डल -हुँह- अनुभवमण्डलकेँ जानकारी दऽ दियौ। आब ई दुनू भार सम्हारताह नारायण। माधव, अहाँ सभ शीघ्र जाउ।

(माधव आ हुनकर दुनू शिष्यक प्रस्थान।)

राजा कीर्ति सिंह: सेनापति नारायण, हमरा चारिटा आँखि चाही, दूटा मेधाक आ दूटा जीवेक। ऐ दुनू गोटेक आँखि निकाललाक बाद दुनूकेँ पागल ऐरावतक समक्ष धऽ दियौ। पिचरा कऽ दियौ दुनूकेँ, मुदा पहिने हमरा चाही चारिटा आँखि।

(अन्हार पसरि जाइत अछि आ नेपथ्यसँ जीवे आ मेधाक कनबाक अबाज अबैत अछि। फेर हाथीक चिघारसँ अकासमे बिजली कड़कऽ लगै छै। पुरुष, महिला आ हाथीक अबाज परस्पर मिज्झर भऽ जाइ छै। इजोत अबैत अछि आ अनुभवमण्डल बैसकी देखा पड़ैत अछि जइमे गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, आनन्दा, ऋषि जटा, हीरू, माधव, माधवक सहयोगी-१ आ माधवक सहयोगी-२ सभ छथि मुदा जीवे आ मेधा नै।)

गंगाधर: की ई अहाँ सभक अन्तिम निर्णय अछि?

सभ सम्वेत स्वरमे: हँ, हँ, अन्तिम निर्णय, गंगाधर, अहाँ मानी नै मान॥

गंगाधर: अनुभव मण्डलमे सर्वदा बहुमतक सम्मान कएल गेल छै। ठीक छै, तँ एकर भार ककरापर देल जाए।

माधव: हम ई भार लै छी गंगाधर, सहर्षसहर्ष…(अपन दुनू शिष्यक संग माधव मंचपरसँ बहरा जाइ छथि।)

गंगाधर: ठीक छै तँ सएह हुअए। अनुभव मण्डलक सभ सदस्य पुनः सप्तरी प्रस्थान करथि। तँ सएह हुअए।

(अन्हार पसरि जाइत अछि आ जखन इजोत होइत अछि तँ रुद्रमति- माधवक माए, माधव आ माधवक दुनू शिष्य मंचप छथि। खेनाइक बासन बगलमे राखल छै। रुद्रमति तमसाएल छथि।)

रुद्रमति: (बर्तनसँ भात नीचाँ जमीनपर फेकैत) अनुभवमण्डलक निर्णयक बिनु पालन केने अहाँ घरमे कोना प्रवेश कऽ गेलौं पुत्र माधव। जाबे अहाँ अनुभवमण्डलक निर्णयक पालन नै करब ताबे अहाँ कुकुड़क योनिमे रहब, आ कुकुड़केँ थारीमे खेनाइ खेबाक अधिकार नै छै। खाउ, ई नीचाँमे फेकल भात खाउ।

(माधव भुकैत छथि आ छिड़िआएल भाय खाए लगैत छथि। अन्हार पसरि जाइत अछि। फेर जखन इजोत होइत अछि तँ राजदरबारमे राजा, दुनू दरबारी आ नारायणक संग माधव आ हुनकर दुनू शिष्यमे युद्ध होइत अछि। माधवक दुनू शिष्य दुनू दरबारी आ नारायणकेँ गछाड़ने छथि आ हुनका ऊपरसँ तड़पि कऽ माधव एकटा चक्कू लेने राजाक छातीपर चढ़ि जाइए आ ओकरा पेटमे चक्कू भोंकि दैत अछि। तावत राजाक सैनिक सभ आबि जाइत अछि मुदा माधव अपन पेटमे सेहो छूरा भोंकि लै छथि। माधवक दुनू शिष्यकेँ राजाक सैनिक मारि दै छथि। तीनू गोटेक गरासँ उल्कामुख ताबीज नारायण निकालैत छथि, आ सभकेँ देखबैत छथि। अन्हार फेरसँ पसरि जाइत अछि।)

(फेर मंचपर प्रकाश होइत अछि। मंच खाली अछि। अनुभवमण्डलक सदस्य मंचपर अबैत छथि जइमे गंगाधर, मनसुख, हरिकर, मितू, आनन्दा, ऋषि जटा आ हीरू छथि मुदा जीवे, मेधा, माधव आ माधवक दुनू सहयोगी नै छथि। गंगाढर छड़ी धेने छथि, आ शान्त छथि। सभ बैस जाइ छथि।)

गंगाधर: विदा लेबाक समए आबि गील मित्रवर। अनुभवमण्डल सभ जातिकेँ निकट आनलक, जाति खतम केलक, मुदा एकेटा डर..
ऋषि जटा: कोन डर गंगाधर।
गंगाधर: यएह जे बदला भावक ई आगि अनुभवमण्डलकेँ एकटा उल्कामुखी जाति नै बना दै ऋषि जटा। यएह एकटा डरयएह एकटा डर

(आस्ते-आस्ते गंगाधर प्राणत्याग करैत छथि। अन्हार पसरऽ लगैए आ नेपथ्यसँ अबाज अबैए..
डर लगैए हे डेराओन लगैए
तोर अंगना, भयाओन लगैए
हे अजगर के सम्‍हा पर धामि‍न के बरेड़ि‍या
गहुमन के कोरो फुफकार मारैए,
डर लगैए हे डेराओन लगैए
तोर अंगना, भयाओन लगैए
कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्‍हनमा
बि‍ढ़नी के खोता घनघन करैए।
डर लगैए हे डेराओन लगैए
तोर अंगना, भयाओन लगैए
सुगबा के पाढ़ि‍ पर ढोरबा के ढोलनमा
पनि‍या के जीभ हनहन करैए
डर लगैए हे डेराओन लगैए
तोर अंगना, भयाओन लगैए
बि‍छुआ के कुण्‍डल सनसन करैए।)

-समाप्त-
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
 १.डॉ. शम्भु कुमार सिंहमैथिलीमे अनुवाद पर अभिविन्यास कार्यशाला समपन्न२.अतुलेश्वर- विद्यापति समारोह, बिहार गीत आ मैथिल/ पूर्वी भारतीय भाषाक सेमिनार क बहन्ने/ विश्‍वक डॉ. इन्दिरा गोस्वामी आ असमिया लोकक मामोनी बाइदेउ

डॉ. शम्भु कुमार सिंह
मैथिलीमे अनुवाद पर अभिविन्यास कार्यशाला समपन्न
राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, मैसूर द्वारा अनुवाद साहित्यमे प्रशिक्षण देबाक उद्देश्यक तहत स्थानीय डी. बी. महाविद्यालय, जयनगर, मधुबनीक संयुक्त तत्वाधानमे अनुवाद पर पाँच दिवसीय अभिविन्यास कार्यशालाक उद्धाटन दिनांक 25 नवम्बर,2011 केँ स्थानीय विधायक श्री अरूण शंकर प्रसाद द्वारा कएल गेल। 25 सँ 30, नवम्बर,2011 धरि समपन्न भेल एहि कार्यशालामे विषय विशेषज्ञक रूपमे प्रो. कमलकान्त झा, प्रो. विजय कुमार मिश्र, प्रो. श्रुतधारी सिंह, डॉ. योगेन्द्र पाठक वियोगी आ डॉ. टी. पी. सिंह, लगभग 43 टा प्रतिभागीकेँ विभिन्न विषयक मैथिली भाषामे अनुवादक गुर सिखौलनि।   
पाँचो दिन क्रमशः दू सत्रमे संचालित एहि कार्यशालाक प्रथम सत्रमे जतय विभिन्न विशेषज्ञ द्वारा ज्ञान-पाठ्यक अनुवादमे आबए वला समस्या आ ओकर समाधान, अनुवादक प्रकार/सिद्धान्त पर व्याख्यान देल गेल ओतहि दोसर सत्रमे प्रायोगिक रूपमे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवादक हेतु चयनित ज्ञान-पाठ्य क्रमशः द इंडियन कन्टीच्यूशन : अ कॉर्नरस्टोन ऑफ द नेशन, ग्रेनविल हीट ट्रान्सफर, होलमैन फिजिकल कैमिस्ट्री, वॉल्टर आउटलाइन्स ऑफ इंडियन फिलॉसॉफी, एम. हिरियन्ना क पोथीसँ दू-दूटा अनुच्छेदक अंग्रेजीसँ मैथिलीमे अनुवाद कएल गेल, पछाति विशेषज्ञ लोकनि द्वारा ओहि अनूदित अनुच्छेदक वीक्षण कए संबंधित विषय पर परिचर्या कएल गेल।   
            कार्यक्रमक आरंभिक संबोधन सत्रमे मिशनक प्रतिनिधि डॉ. शंभु कुमार सिंह मिशनक गतिविधि आ उद्देश्य पर चर्चा करैत कहलनि जे राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, अनुवादक क्षेत्रमे भारत सरकारक एकटा पहल थिक जकर उद्देश्य छैक विभिन्न विषयक अंग्रेजीमे उपलब्ध उच्च स्तरीय ज्ञान-पाठ्य पुस्तकक भारतीय संविधानक आठम अनुसूचीमे सम्मिलित सभटा अठारहो भाषामे अनूदित संस्करण उपलब्ध कराएब। एहि महती उद्देश्य पूर्ति करबाक हेतु दिनांक 01 जुलाई,2008 केँ एहि मिशनक स्थापना भारतवर्षक प्रख्यात भाषाविद्, कवि, लेखक प्रो. उदय नारायण सिंह नचिकेता(तत्कालीन निदेशक, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर)क सत्प्रयासेँ भेल छल। एहि अवसर पर मिशनक आन प्रतिनिधि श्री पवन कुमार चौधरी एहि विषय पर प्रकाश देलनि जे वर्तमान परिस्थितिमे मैथिलीमे एहि तरहक अभिविन्यास कार्यशालाक औचित्य किएक अछि? कार्यशालाक संचालन, आगन्तुक अतिथिक स्वागत आ धन्यवाद ज्ञापन मिशनक प्रमुख प्रतिनिधि डॉ. अजीत मिश्र द्वारा कएल गेल।


अतुलेश्वर- विद्यापति समारोह, बिहार गीत आ मैथिल/ पूर्वी भारतीय भाषाक सेमिनार क बहन्ने/ विश्‍वक डॉ. इन्दिरा गोस्वामी आ असमिया लोकक मामोनी बाइदेउ

१.

विद्यापति समारोह, बिहार गीत आ मैथिल
बाबा विद्यापतिक प्रति जे सहानुभूति छलन्हि ओ तं तीनदिनुका समारोहमे पूरा भ गेल। जिनकर मोनमे जे छल सभ किछु कहि देलन्हि अपन-अपन विद्वता आ योगदानक चर्चा जतेक करबाक छलन्हि से भ गेल। सभ अपन-अपन धारणा बाबा मिथिला आ मैथिलीक प्रति देखाओल,किछु गोटें बरसाती बेंग जेकां टरटरेलाह आ किछु गोटे बड्ड गम्भीर भ किछु बात उठाओल। ओना ओकर संख्या कम्मे अछि , ओना ई एकटा सत्य छैक जे उचित आ गम्भीर गप्प कहनिहार कम होइत छैक । एहि परिपेक्ष्यमे एक जन कहलन्हि जे चेतना समितिक कार्यक्रममे आमलोकक संख्या कम छल ओकर कारण अछि जे चेतना समिति आमलोकसँ जुड़ल नहि अछि । बात ठीकें,मैथिलीक सभसँ पैघ संस्था मुदा कार्य किछु लोकक हेतु। राजधानीमे संस्था मुदा राजधानी मे मैथिलीक विरूद्ध होइत कोनो षडयंत्र सँ अनभिज्ञ। ओना सभसं बेशी सकारात्मक चिन्तन आयल धीरेन्द्र प्रेमर्षिक जे विद्यापतिकें राष्ट्रीय विभूति घोषित कयल जाए तेकरा लेल माहौल आ जनसमर्थन पर काज कएल जाए, चिन्तन बड्ड नीक।
हेमनिमे विद्यापति पर्व समारोहमे सत्ताशील पार्टीक नेताक लोकनि लेल नीक स्थिति नहि छल , कारण ओ लोकनि अपन पुरना राग जे हम सभ मैथिलीकें अष्टमअनुसूची मे स्थान देबाक लेल कोना कोना की की कएलहुं से बेशी जोर सँ नहि कहि सकलाह। कारण सुशासन बाबु तँ हुनकर लोकनिक एहि रागकें रोकि देलन्हि अपन कृति सँ । बिहार गीत मे मिथिलाक चर्च नहि। हम तँ कहब जे भेल से ठीके भेल । हमरा लोकनि हाथउठाइ ल ल ततेक ने ककरो गुणगान करए लगैत छी जे सभ किछु बिसरि जाइत छी। यदि एक दिश मिथिला राज्यक मांग क रहल छी तँ दोसर दिश मैथिली आ मिथिलाक संग अन्याय कएनिहारकें सम्मान।( कारण पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगरनाथ मिश्र मिथिला राज्यक विरोध करैत छथि दोसर दिश मिथिलाक संस्था हुनका सम्मानित करैत अछि ) हमरा जनैत सुशासन बाबू हमरा सभकें जगबाक लेल कहि रहल छथि यौजी हाथउठाइ जूनि लिय , संघर्ष करू तखनि मेवा भेटत नहि तं इएह सत्यनारायण भगवानक प्रसाद। (ओना की भ रहल अछि आठम अनुसूची मे मैथिली अयला सँ एहि पर बड्ड नीक चिन्तन कएलन्हि अछि आदरणीय पं.गोविन्द झा जी मिथिला दर्शन मे समीपेषु मध्य ।) सुशासन बाबू बुझैत छथि जे मिथिला सँ आयल जनप्रतिनिधि मिथिला आ मैथिली लेल कतेक साकांक्ष छथि,यदि ओ सभ कहताह जे नहि हम सभ साकांक्ष छी तँ ई कोना भेल । कोन कारण सँ मिथिलाक संग अन्याय कयल गेल कि ओकर संस्कार , संस्कृति आ भाषा सुदृढ़ छैक तैंए , एकर एक मात्र कारण छल हमर सभक छोट मानसिकता । यदि अपन अस्मिता आ स्वायत्त चाहैत छी तँ लड़य पड़त , आ संगहि अपन चरित्रकें सेहो बदलय पड़त। कारण हमरा लोकनि घर मे खूब कूदब जखने बाहर जायब तँ समझौता परस्त भ जायब आ ई चरित्रकें बदललाक बादें हम सभ ओहि मिथिला आ मैथिलीक अस्मिताक विषयमे सोचि सकैत छी कहियो सम्पूर्ण भारतवर्षक मान छल मिथिला। हमरा लोकनि कखनो सोचलहुं जे हमर सभक सांस्कृतिक आ भाषाई संबंध हिन्दी पट्टी सँ नहि पूर्वोत्तर आ नेपाल सँ अछि तखनि हमरा लोकनि कियाक नहि हुनके लोकनि जेकां अपन भाषा , अपन अस्मिताक लड़ाई कोना लड़ल जाइत अछि एहि पर सोचि । ओना हमरा लोकनि हिन्दी दा कें नहि छोड़बन्हि आ तखनि भेटत कि से शब्द नहि लिखि सकैत छी हमरालोकनि स्वयं सोचि। हमर सभक मानसिकताक विषय मे यैह धारणा अछि जे हम सभ मैथिली बजबा सं कि मैथिली आ मिथिलाक कथा कहबा सं लाज करैत छी, हमर एकटा मित्र छथि हुनका हम कहलियनि जे अपने पोथी मैथिली भाषामे लिखु भाषाक सेहो सेवा होयत आ अहांक ई काज सं बहुत गोटा प्रभावित हेताह एहि सं मैथिली आ मिथिला के लाभ हेतैक,हुनका ग्लानि भेलन्हि,तखनि हमरालोकनि सोचि सकैत छी जे मिथिलामे केहन लोक छथि ।
विद्यापति समारोहक समाचार पढ़ल जाहि मध्य एकटा महानुभाव कहने छलाह जे मैथिली रोजी-रोटीक भाषा भ गेल अछि आब एकर विकास कियो नहि रोकि सकत । हमरा महाशय सं पूछियनि कत। विदेश मे कि देश मे। एतेक झूठ कियाक । जे भाषा अपन क्षेत्रमे शिक्षाक माध्यम वा कोनो संस्था मे कार्यालयक भाषाक धरि नहि भ सकल अछि ओ रोजी कत स देत। कारण मिथिलाक भाषा मैथिली भेल आ ओ मैथिलीक ई दशा छैक जे ओकर विकास लेल एकगोट संस्था धरि नहि छैक जखनि कि मिथिलाक अपन सम्पति छलैक अपन शासन छलैक । तखनि रोजी रोटीक सं एतेक जल्दी जोड़ब कनेक अनसोहांत लागल,एहिना कियो बजने छलाह जे हम सभ आन्दोलनक लेल तैयार छी,ई कथा हुनक हम प्रत्येक विद्यापति समारोह मे सुनैत छियैन्ह आ लगैत अछि भविष्यमे आरो सुनब। एहि परिपेक्ष्यमे बिहार गीतक हंगामा उठल बेचारे सत्यनारायण मिथिला नहि देखलन्हि आ एकटा बचकौन गीत लिखि बैसलाह आ तेकर विरोधमे स्वर उठल जे बिहार गीतमे मिथिलाक चर्च नहि करबाक लेल हमरा लोकनि विरोध क रहल छी औजी विरोध कत कोठरीमे ,कने आगू बढ़ू( ई टिप्पणी एकगोट यशस्वी साहित्यकारक संस्था देने छल हुनका लेल, कारण मिथिलाक जनता घर सं बाहर भेल टा नहि अछि  ओ सब एकर प्रतिरोध क रहल अछि) । कारण किनको मोन मे मिथिला आ मैथिलीक प्रति सनेह रहतनि,तं मैथिली आ मिथिलाकें दुर्दशा कियाक केने रहितथि।सुकान्त सोम मिथिला दर्शन मे एकटा लेख लिखने  छथि जे मैथिली हाथउठाइ पर कते दिन’, जाहिमे जे-जे विन्दु पर ओ चर्च कएलन्हि से चिन्तनशील आ गम्भीर अछि । बांकी हम मैथिल , कि करैए छी से समय बताओत।
 
पूर्वी भारतीय भाषाक सेमिनार क बहन्नेः-
हेमनिमे गोहाटीमे एकटा सेमिनार आ कार्यशाला मे गेल छलहुं । सेमिनारक विषय छल लक्ष्मीनाथ बेजबरुआः- समकालीन पूर्वी भारतीय साहित्य आ कार्यशाला छल लक्ष्मीनाथ बेजबरुआक गल्पक पूर्वीय भारतीय भाषामे अनुवाद। ओतऽ जतेक लोक अपन-अपन आलेख पाठ कएलन्हि ओकर मध्य यैह देखबामे आयल जे सम्पूर्ण पूर्वी भाषा लक्ष्मीनाथ बेजबरुआक समयमे अपन-अपन अस्मिताक लेल लड़ाई लड़ि रहल छल जाहिमे असमिया आ उड़िया अपन स्वतंत्र स्थिति स्थापित क लेलक मुदा मैथिली हिन्दीक पाँजमे बहुत दिन धरि कि अखनो दबायल अछि आ ओ भाषाई स्वतंत्रता भेलाक पश्चातों अखनि धरि स्वतंत्र नहि भ सकल अछि ओकर कारण राजनीति,सामाजिक,आ आर्थिक अछि । हमरा लोकनिक राजनीति जातिगत सं भड़ल अछि राजनीति मिथिलाक अस्मिताक लेल नहि होइत अछि मात्र अपन स्वार्थक लेल। ओहिना सामाजिक स्थितिक अछि समाज जातिगत भेदभाव ,परम्परावादी  मानसिकता आ एक दोसराक प्रति द्वैष सँ भड़ल अछि आ ताहू सँ बेशी स्थिति दयनीय अछि आर्थिक । स्वतंत्रता एतेक वर्ष भेलाक बावजूदो मिथिला भारतक अन्य प्रांत सँ पिछड़ल अछि लोकक खेती-बारी चौपट छैक तँ रोजी-रोटीक लेल अन्य प्रांत जयबाक लेल मजबूर होइत अछि आ पलायन ओकर संस्कृति , भाषा आ स्वतंत्रताकें छिनि रहल अछि ,जेकर कारण संस्कृति आ भाषा एक ठाम सँ दोसर ठाम जाइत आ दहशत मे रहैत जीवन जाहि कारण दबायल जा रहल  अछि।जेकर कारण हम सभ मैथिली भाषी सं बेशी हिन्दी भाषीक रूप मे जानल जाइत छी आ हम सब अपन स्वतंत्र अस्तित्व नहि स्थापित क पबैत छी ।मुदा ई असम्भव नहि छैक एहि चेतनाक जगएबाक आवश्यकता छैक यदि अपन अस्तित्वक लेल चेतनशील रहब अपन स्वतंत्र अस्तित्व पाबि सकैत छी मुदा हमरा लोकनि मे एकर पूर्णतः अभाव अछि जेकर कारण हम सभ पिछड़ल छी। अपने  देखि सकैत छी असमक चाह बगान मे काज करबाक लेल आनल  गेल चाह बागानक मजूर अपन संस्कृति आ भाषाक आधार पर अपन स्वतंत्र अस्तित्वक निर्माण मे लागल छथि  आ स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करबामे  सफल सेहो भ रहल छथि कारण ओकर मूलमे अछि हुनक सांस्कृतिक एकजूटता आ भाषाई चेतना। मुदा हम सभ जातिगत संस्कृति , जातिगत भाषाक कारण एखनि धरि अपन स्वतंत्र अस्तित्वक नहि निर्माण क पाबि रहल छी ओकर मूल मे अछि हमर सभक एकजूटताक कमी। नहि तं मिथिलामे कोनो साहित्यकारक देहान्त होइत छनि तँ मिथिलामे किनको शोकाकुल नहि देखल जाइत अछि (जं किनको शोकाकुल देखल जाइत अछि ओ हुनक औपचारिकता छी) जखनि कि  मैथिली साहित्यकारों मिथिलाक लोकक जीवनकें अपन लेखनीक माध्यम सं विश्व परिदृश्यकें परिचित करबैत छथि आ एहि साधना मे लिन रहैत छथि ताहि बावजूदो मैथिली साहित्यकारकें  मिथिलाक समाज आ लोक  अपनासं नहि जोड़ि पबैत अछि  , मुदा 29 नवम्बरक भोर मे असमिया साहित्य आ ओतुक्का लोकक मामोनी बाईदेउ (डॉ. इन्दिरा गोस्वामीक) निधन हुनका प्रति संवेदना देखि लागि रहल छल जे असमिया लोकक परिवार अपन कियो हुनका सभकें छोड़िकें चल गेल होथि आ ई संवेदना देखि लोकक प्रति जे भावनाक संचार होइत अछि ओहि सँ बेशी अपना उपर लाज होइत अछि जे एक्के देह मुदा संवेदना आ भावनामे एतेक अन्तर कियाक। असमक धरती बाजारवाद सं बांचल अछि आ ज्ञानक धरती मिथिला संवेदनहीन भेल जा रहल अछि कियाक एहि विषय पर  सोच पड़त ।

विश्‍वक डॉ. इन्दिरा गोस्वामी आ असमिया लोकक मामोनी बाइदेउ
यथार्थ मे ई सत्य छैक  जे संघर्ष एकटा नव जीवनक जन्म दैत छैक आ जे व्यक्ति संघर्षकें  अपन भाग्यक दोष नहि मानि ओकरा कर्म पथक सारथी मानि लिअए तं बुझु ओ कतेक माननीय अछि । ई उदाहरण असमिया साहित्यक महिला लेखिका , समाजसेवी आ शान्तिक लेल लड़ैत डॉ. इन्दिरा गोस्वामीक मादे कहि रहल छी। असमिया भाषा साहित्य , असमिया समाज आ लोकसं हुनका जे लगाव आ स्नेह छलन्हि ओकर उदाहरण देखल जा सकैत अछि हुनका देहावसान आ हुनका प्रति लोकक लगाव। सम्पूर्ण शहरे टा नहि सम्पूर्ण असम अपन बाईदेउक निधन सं आहत। मुदा प्रश्न उठैत अछि ई आत्मीयता आ संवेदना कोना प्राप्‍त भेलन्हि एहि विदुषीकें। तं अपनेकें भेटत संघर्ष आ संघर्ष सं उपजल एक-एक टा बूंदकें अपन जीवनमे आत्मसात करब। कहल जाइत अछि जखनि बाइदेउक जन्म भेलनि तं ज्योतिषक अनुसार ई अभागली हेतीह आ हिनका मारि देल जाए मुदा से नहि भेल , मुदा ककरो अभाग्यक अन्त नहि होइत छैक ज्योतिष द्वारा मारि देबा सं बांचि जीवन तं भेटलन्हि मुदा दुर्भाग्य बाइदेउकें नहि छोड़लक पिता दुनिया सं छोड़ि देलन्हि आ ओकर पश्चात् पतिक सड़क दुर्घटनामे निधन। ई सभ घटना बाइदेउकें एक दिश असगर क रहल छल तं दोसर दिश संघर्षक जन्म द रहल छल। मुदा बाइदेउ हारैत नहि छथि जखनि कोनो पुरुषक जीवनक आरम्भ होइत छैक तखनि बाइदेउक जीवन अन्त होइत अछि मुदा बाइदेउक जीजिविषा एतेक मजगूत छल जे बाइदेउ एहि चुनौतीकें अपन जीवनसं आत्मसात् करैत छथि आ तेरह वर्षक अवस्था सं लेखनी प्रारम्भ कएनिहार बाइदेउ पुनः लेखनीसं जोड़ि लैत छथि । बाइदेउ मात्र अपन लेखनी मे नहि क्रान्ति नहि अनैत छथि ओ तं अपन जीवन मे सेहो क्रान्ति अनैत छथि। कहल जाइत अछि जीवनक एहि उकस-पाकसक क्षणमे बाइदेउ जखनि वृंदावन, काशी मे बास करैत छथि तं बाइदेउ अपन जीवनमे एक नव परिवर्तन अनैत छथि तं दोसर दिश बाइदेउ विधवाक जीवनकें अपन लेखनीसं कैनवास करैत छथि, कहल जाइत अछि बाइदेउ ओतऽ सं अयलाक बाद सधवाक रूपमे उपस्थित होइत छथि आ जीवनक अन्त धरि ओहिना रहैत छथि। बाइदेउक अपन जीवन मात्र लेखनी धरि सीमित नहि राखि ओ असमक शान्तिक लेल प्रयास करैत रहैत छलीह आ एहि कारण हुनका बहुत प्रकारक लांछना सेहो लगाओल गेल। मुदा जीवनक अन्त धरि ओ एहि लागल रहलीह किन्तु दुखद जे जखनि ओ असमक ओहि संत्रासकें कैनवास करबाक सोचलन्हि तावत धरि ओ दुनिया छोड़ि देलन्हि । एहि तरहें देखैत छी जे बाइदेउक जीवनमे जे जीजिविषा छल ओ मात्र असम आ असमिया साहित्य लेल नहि ओ सम्पूर्ण नारीक प्रतिक अछि जहिना मिथिलाक सीता सम्पूर्ण नारीक प्रतिक छथि ओहिना बाइदेउ सम्पूर्ण नारीक मार्गदर्शक ।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...