Sunday, November 13, 2011

'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९३)- PART VI


१. प्रभात राय भट्ट २.उमेश मण्डल

प्रभात राय भट्ट
तड़पि-तड़पि बाँचि रहल छी
सजनी अहांक इयादमे कोना कोना हम जिबैछी 
प्रियम्बदा हमर कोना हेती पूर्वा पवन सं पुछै छी
पात पात फुल फुल पैर अहांक नाम  लिखैछी 
प्रेम अहांक पागल भेल सदिख हम रहैत छी 

देख हमर हालत लोग मजनू हमरा बुझै
देख हमर तड़पन लोग बताह सेहो कहै
इयाद अहांक आबिते गोरी चिहैक उठै करेज
अहां बिनु निरसल जिनगी आब नै होइए परहेज २

घर घुरि आबू सजनी आब नै तपाबू
स्नेहक प्यासल मोनक हिया हमर जुड़ाबू
बेकल तनमन हमर अहांक संग खोजै
अहां बिनु दुनिया सुनसान वीरान लगै

मधुर मिलनक आ ड़पि ड़पि बांचि रहल छी  
मुदा भीतर भीतर हम विरह भेल टुटि रहल छी
कदम कदम पर ठेस लगै कंकर कांट  चुभैए
हिया हमर हारि गेल कत कुनु खबर नै भेटै

कतय गेलै चितचोर
बदरा उमैर उमैर घनघोर
बरसै आंगन मोर
प्यासल तनमन अछि
हृदय भेल हमर विभोर
दिल चोरा क प्रीतम मोर
कतय गेलै चितचोर २

सिनेहियाक सूरत देखैले
नैना सं झहरे नोर
रिमझिम रिमझिम सावन वर्षे
तनमन  अगनके जलन
सजन उठल बड जोर
कतय गेलै चितचोर २

अंग अंग व्यथा उठल
टैए पोर पोर
बदराक बूंद बूंद
लगै संगीतक शोर
खन खन खनकै कंगना
छम छम बजै पायल मोर २

पिया लग आ प्यास बुझा
मोन उठल ब जोरक हिलोर
अहां बिनु जीवन भेल भारी मोर
कत गेलै सजन चितचोर
विरहिन भेष देख हमर
मुस्की मारै चानचकोर 

 
उमेश मण्‍डल
कवि‍ता-

बाधा

वि‍दा भेल मंगला पू-भर
कान्‍हपर टँगने अछि‍ साइकि‍ल बालुपर
कहुना कऽ लगि‍चेलक
लटपटाइत पहुँचल
धारक कछेरमे।

बि‍नु पानि‍क अछि‍ धार
चक-चक करैत अछि‍ बालु चारूकात
नाव नै‍ बालु देख‍ भेलै
मंगलाकेँ थोड़े होश एलै
अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै।

आब टपैमे कोनो नै हएत बाधा
पहुँचबे करब सरायगढ़क पाठशाला
मुदा,
मंगला लसैक‍ गेल घाटपर
नजरि‍ दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर।

अपन जेबीमे देने हाथ
तकैए चारू कात
आब की करबै हौ बाप
ई तँ लेबे करतै घाटी
जेना लगैए एकरा उठल छै आँति‍
सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ
नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि‍‍।

सहए भेल मंगला घुरि‍ गेल
पछि‍मे मुरि‍‍ गेल।

धर्मात्‍मा

धर्मात्‍मा होइ छथि‍ ति‍यागी
ति‍यागी कहल केकरा जाए यौ भैयारी?
वएह ने
जे केलनि‍ ति‍याग
आकि‍ ओ
जे भाेग केलनि‍ वेसुमार।

मजदूर, हरबाह
भि‍नसरसँ साँझ धरि‍ देह धुनैए
उचि‍त बोनि‍ मात्र दू सेर पबैए
एक सेर बेच लऽ दोकान जाइए
नोन, तेल, हरदी, गोटी कि‍नैए
बचलाहा एक सेरसँ सभो परानी पेट चलबैए
भरि‍ दि‍न तँ ओहो खटबे करैए
अहीं कहू,
ई केहेन मशीन एले
हि‍साब जोड़ैकाल
ऊपरे-ऊपर नजरि‍ दौड़ौलकै
एकर ति‍यागपर नजरि‍ नै खि‍ड़ैलकै?
भागीकेँ धर्मात्‍मा कहि‍ गेलै।

श्रोता

भागवत वाचन शुरू भेल
श्रोता सभ आबि‍-आबि‍ जगह लेल
चारि‍ तरहक श्रोता बैसल छथि‍
अपन-अपन काज-धि‍यानमे मग्‍न छथि‍
बाचको आ श्रोतो।

एक तरहक श्रोता
भागवत सुनि‍ नीकक प्रचार करै छथि‍
दोसरोकेँ नव गप्‍पसँ अवगत करबै छथि‍
मुदा दोसर
दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि‍
मुदा बजै नै छथि‍ बि‍ना पुछने
तेसर श्रोताक देखि‍यो
बैसल छथि‍ भागवत प्रवचनमे
मुदा धि‍यान छन्‍हि‍ व्‍यापार मंडलमे
घुरि‍आइत-नुरि‍आइत
स्‍पष्‍ट अछि जे कि‍छु नै पेला ई
प्रसादटा खेला ई

चारि‍म श्रोतापर करू वि‍चार
ई छथि‍ मुदा सदाचार
सुनि‍तो छथि‍ आ गबि‍तो छथि‍
अपन जि‍नगीक क्रि‍यासँ मि‍लैबतो छथि‍
ओतबे नै
डेन पकड़ि‍ पछुएलहाकेँ खि‍चि‍तो छथि‍
ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबैत छथि‍।

देश

हमर देश
कि‍छु लोक खेल रहल छथि‍ धुरखेल
खुट्टीसँ आगाँ पड़ल बड़का देवाल
देवालक भीतरे लागल अछि‍ मड़कड़ी चारूकात
इजोत चकचकाइत अछि‍
दि‍ने जकाँ राइतो बुझाइत अछि‍
चुट्टी-पि‍पड़ी छोड़ि‍ सभ कि‍छु देखाइत अछि‍
मुदा
देवालक अंति‍म खुट्टीसँ ओम्‍हरे
भऽ रहल अछि‍ मनोरंजन
हेबक सेहो चाही
जरूरतसँ ऊपर उठि‍ गेलापर
स्‍वभावि‍क अछि‍।

मुदा देवालसँ इम्‍हर
बोन-झार सदृश्‍य मनुक्‍खक जरल रूपक
खेखनैत स्‍वर कि‍यो सुनैबला नै‍
चारि‍ तरहक नाओं रचैबला लोक
देशक भीतरेमे बड़का देवाल ठाढ़ करैमे
अपनो उड़ैलनि‍ होश
कऽ रहल छथि‍ कि‍लोल
हमर देश अछि‍ अनमोल
एक्कैसम शदीमे चलि‍ रहल अछि‍ ताबड़तोर।

भाषा भेद

हमरा सबहक माथपर
पसरल अछि‍ मरलत्ती जकाँ िकछु
िकयो सुचि‍न्‍तक नै
 जे
िच◌ंतन करता एेपर
ई कथी लतड़ल अछि‍ सभपर
मुदा दुर्भाग्‍य
एेमे छि‍पल अछि‍ िकछु बात
जइमे अछि‍ नै एक्कोटा पात
सबहक कहब छन्‍हि‍
ई आगाँ चलि‍ कऽ
करत प्रदूषण साफ
जीबैक लेल स्‍वच्‍छ हवा-बसातक
अछि‍ जहि‍ना खगता
करत ई दूर सबहक बेगरता।”

देखा चाही ई दूर करत प्रदूषण
आकि‍ करत सभकेँ िनपत्ता।

नोर

गोरसपट टकधि‍यान लगेने
मुन्नि‍या बैसलि‍ अकानैए
घर-अंगन, द्वारि‍-दरबज्‍जा
भोरे सभ दि‍न बहारैए
बर्तन-वासन, छि‍पली-कटोरी
सभ दि‍न चमका कऽ मांजैए
झक-झक झलकैत
थारी-बाटी देख
मुन्नि‍या माए गुनगुनाइए।

गुनगुन्नीमे अह्लाद भरल छै
सुख-दुख सेहो उमरल छै
मुन्नि‍या आब छोड़त ई दुनि‍याँ।

माइक आँखि‍क नोर
मुन्नि‍याक हृदैमे उठबैत हि‍लकोर
भऽ जाइत अछि‍ बेहोश।

होश अबि‍ते फेर अकानैए
आँखि‍क नोर नि‍ङहारैए
माइक मन टटोलैए
सुखक नोर आकि‍ दुखक नोर
दुनू एक्के संग टघरैत-झहड़ैत
मा
क चेहरापर देखैए।

खूर-खूर, खूर-खूर काजौ करैए
घर-आंगन सम्‍हारबो करैए।

मुन्नि‍या मुदा ई बुझि‍ नै पबैए
खुशीक नोर आकि‍ दुखक नोर
माइक आँखि‍क ई बुझि‍ नै पबैए।

यएह बेवसी मुन्नि‍याकेँ सतबैए।
उमेश मण्‍डल
संस्‍कार गीत (संकलन)


मल्‍लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 1

कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ
गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे,
अन देलौं धन देलौं लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे माइ बि‍नु लागै य सुनऽ हे।

कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ
गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे
अन देलौं धन देलौं लक्ष्‍मी बहुत हे
जे भाति‍ज बि‍नु लागै य सुन हे
कोयला-कोयला.....।

मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे
अन देलौं धन देलौं, लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे स्‍वमी बि‍नु लागै य सुन हे
मातैर-मातैर.....।

ससि‍या-ससि‍या सुनै छलौं, ससि‍या बड़ी दूर हे
अन देलौं धन देलौं, लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे बालक बि‍नु लागै य सुन हे
कमला-कमला......।

मल्‍लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 2

कमला मैया बसत बड़ी दूर
गमक लागे गेंदा फूल
 कथी डाली‍ लोरहब बेली-चमेली
कथी डाली‍ लोरहब अरहूल हे
गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया.....
कि‍नका चढ़ाएब बेली-चमेली
कि‍नका चढ़ाएब अरहूल
गमक लागे गेंदा फूल-2
कमला चढ़ाएब बेली-चमेली
कोयला चढ़ाएब अरहूल,
गमक लागे गेंदा फूल हे
कमला...
कि‍नका सँ मांगब अन-धन सोनमा
कि‍नकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल बड़ लाल हे
ससि‍या सँ मांगब अन-धन सोनमा
मातैर सँ मांगब सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल वर लाल....।
कमला...........।
गमक लागे गेंदा फूल....3

मल्‍लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 3

कटबै मे सोना सुतरि‍या बि‍नबै झुमरि‍ जाल हेऽऽ
जाल फरि‍-फरि‍ कमला एलखि‍न
सन-झुन लागै गोहबरि‍या
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हेऽऽ
कटबै......
जाल फरि‍-फरि‍ गांगो एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक,
सुन लगै गोहबरि‍या हे-2
कटबै.........
जाल फरि‍-फरि‍ मातैर एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हे
कटबै.....
बि‍नबै झुमरि‍ जाल हे।

मल्‍लाहक गोसाँइ, कमला गीत- 4

जग मग जग मग ज्‍योति‍ जले मंदि‍रमे
देखि‍यौ कमला के श्रृंगार कमला के
लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के
अधि‍कार जग मग जले मंदि‍र मे
देखि‍यौ मातैर के नाक मे नथि‍या सोभे
हुनका झुमका के अधि‍कार
जग मग जले मंदि‍र मे ससि‍या के मांग मे
टि‍का सोभे हुनका होसली के अधि‍कार
जग मग जग मग ज्‍योति‍ जलै मंदि‍र मे
कमला श्रृंगार.....।

मल्‍लाहक ब्राह्मन गीत- 1

नटुआ खूब सुन्‍दर सँ गाना गाभि‍हँ नाचि‍हेँ
ब्राह्मण के सुनभि‍येँ पहि‍ले
गबि‍हेँ ब्राह्मण गीत तखने रामचंद्र
रधुवि‍र नटुआ देतै असि‍रवाद
जुग जुग जीबह ब्राह्मण के सुनभि‍हेँ...।

मल्‍लाहक ब्राह्मण गीत- 2

ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछि‍या
ओहीपर कोइली धनश्‍याम हे..
कटबै चनन गछि‍या बेढ़बै अंगनामा हे
छुटि‍ जेतै कोइली घनश्‍याम हे..
कानए लगली खि‍जए लगली कोइली मुरूछि‍या
कथीसँ मेढ़ब तोहर दुनू पखि‍या हे..
कथी से मेढ़ब कोइली तोहर दुनू ठोर
सोने से मोरब हे कोइली
तोहर दुनू पखि‍या
रूपे से मेढ़ब तोहर दुनू ठोर हे..
जही वन जेबह हे कोइली रूनू झुनू बोलि‍या
रहि‍ जेत ब्राह्मण बाबू के नाम हे...।

मल्‍लाहक ब्राह्मण गीत- 3

गामक पछि‍ममे एक ठूठि‍ पखरि‍या
ओहि‍पर कोइली घनश्‍याम हे।
हरि‍नो ने मारे कोइली ति‍ति‍रो ने मारे
बीछि‍-बीछि‍ मारे लए मयूर हे
जब तोरा आहे कोइल सि‍न्‍दुर बकसब
रहि‍ जेत ब्राह्मण बाबू नाम हे..।



डोमीनक गोसाँइ गीत-1

करि‍या कुखा हे काली माय लेलनि‍ जोरि‍ आइ हे
मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे
काली माइ तेसर कोस उठल शि‍कार हे
हकन कनै छै काली बैन के मयुर हे
बकैस‍ दि‍यौ सीर के सि‍न्‍दुर हे
सारी रात नटुआ नचाबऽ हे
होइत भोर मे उसारब हे......।

डोमीनक गोसाँइ गीत-2

एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँ
हमरा पानि‍ सेब देवता अरैध के लबि‍हेँ गै
एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँ?
हमरा गौरध्‍या सन अरैध के लबि‍हेँ गै
एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँ
हमरा गहील सन देवता अरैध के लबि‍हेँ गैऽऽ.....।
डोमीनक गोसाँइ गीत-2

इहो हम जनति‍यौ गहि‍ल मैया
औथि‍न आंगन चनन घर ढौरि‍ति‍यौ हे
कथि‍ये दि‍यरा कथि‍ये के बाती
सेरसों तेल जराबि‍तौं सारी रात हे
सोने के दि‍यरा पताबर सुत बाती
सेरसौं के तेल जराइबतौं हे
जसो दि‍यौ जसो दियौ गोसाओं
अही जस वीरहब संसार हे..।

डोमीनक ब्राह्मण गीत

ब्राह्मण के अंगना मे चनन बृक्षि‍या
ओइ तरो कोयली धन श्‍याम हेऽऽ
काटबै चनन गाछ बेरबै अंगनमा
रहि‍ जेतै ब्राह्मण के इनाम हे
कथि‍ये मेराहयब कोयली तोहर दुनू पैखि‍या
कथि‍ये मेराहयब तोहर दुनू ठोर हेऽऽ
सोने से मेराहयब कोइली तोहर दुनू पैखि‍या
रूपे मेराहयब दुनू ठोर हे....।

मुसहरक गोसाँइ गीत-

कि‍नका कोखी बस्‍तीपर आएल गांगे जनमलि हे
कहाँ माँ लि‍औ बसेरा सखी-2
आजू गांगों गोहबर आएल हाथ कमल के फूल सखी-2
कि‍नका....
मैया कोखी गांगो जनमलि‍ हे,
गोहबर लि‍यो बसेरा सखी
आजू गांगो गोहबरमे आएल हाथ दि‍औ तलवार
सखी.....2
कि‍नका कोखी बस्‍तीपर आएल गोगे जनमलि‍ हे....2

मुसहरक ब्राह्मण गीत-1

ब्राह्मण बाबू अंगना चनन घन गछि‍या
ओही तर कोयली घनश्‍याम हे-2
काटबै चंदन गाछ, बेरब अंगनमा
छुटि‍ जेतै कोयली घनश्‍याम हे-2
कान खि‍ज लगलै कोयली बि‍रि‍छि‍या
झर लगलै नयना से नोर हे-2
ब्राह्मण........।
जानु-कानु जानु खोजै, कोयली मुरूति‍या
झर लगलै नयना से नोर हे-2
तोहरो जे देबौ हे काेयली
सोने दुनू पखि‍या रूपे से मोहबै ठोर हे-2
ब्राह्मण.......।
जहू वन जेब हे कोयली रूनु-मुनू बोलि‍तर
रहि‍ जेत ब्राह्मण बाबू के नाम हे-2
ब्राह्मण.......।

मुसहरक ब्राह्मण गीत-2

कथी बि‍नु यौ अहाँ ब्राह्मण कथी बि‍नु सकलक हि‍ं‍ग मैयो-2
शि‍व ब्राह्मण अयलह गोहबरमे
कि‍रतनि‍याँ नाच देखाओ सखी-2
कथी बि‍नु...........।
दूध बि‍नु सेवक मुँह मलि‍न लड़ू बि‍नु सकलक हि‍ंग भेल-2
शि‍व ब्राह्मण..........।
कथी ब्राह्मण के मुँह मलि‍न, कथी बि‍नु सकलक हि‍ंग मयो
भजू ब्राह्मण आहै गोहबर मे, कि‍रतनि‍याँ नाच देखाओ सखी-2
जनऊ बि‍नु सेवक मुँह मलि‍न, पान बि‍नु सकलक मुँह हि‍ंग मयो-2
भजू..........।

मुसहरमे छेका गीत-

झि‍लि‍या के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा हे
मइया मधुर देखि‍ रहलौ लोभाय-2
पहि‍ले जे अइवतौं जे गोसाआंे सब मधुर खइतौं
हे मइया सब मुधर गेल बि‍कायी हे-2
झि‍लि‍या के..........।
झि‍लि‍या के लोभे जे गोसाओन, अयलौं अंगनमा
यौ बाबा, मधुर देखि‍ रहलौं लोभाय हे-2
पहि‍ेल जे अइवतौं, सब मधुर खइतौं यौ बाबा
सब मधुर गेल बि‍कायी हे झि‍ि‍लया....।

मुसहरमे कुमार-बि‍याह गीत-

मन छैल मनोरथ सुति‍ घर बि‍याही तहुँ करि‍तौं पंडि‍त जमइया हे
सेहो देबौ नै जाने करि‍तौं नै पंडि‍त जमाय हे-2
मन छैल
लवका जे पतवा कहुँवा ने पायल पुरना पतवा जे भेल
अनमोल, छोटे-छोटे खि‍लि‍या लगहबि‍यौ बाबा
बहुते डड़ाबैए बरि‍यात हे-2
येहो हम जैनतौं गयि‍ पोती खपि‍ लैतौं दसे गाछै मरि‍चि‍या
मरि‍चयक जोग गै हम पोती, ओही तम फूल से उघार हे...2
मन छैल मनोरथ.....।

मुसहरक बि‍याह गीत-

छोटी-मोटी तुलसी के गछि‍या
ओही मे जे चतरल डरहि‍या हे-2
ओही तर कमला लेलनि‍ वि‍सराम
हे सोहागन तुलसी-2
केयो चढ़ाबै हुनका फूल अक्षत हे
केयो चढ़ाबै लड़ू पान हे सोहागन तुलसी-2
भगता चढ़ाबै जुनका फूल अक्षत
सेवक चढ़ाबै न पान
हे सोहागन तुलसी-2
छोटी-मोटी तुलसी...........।

चमार जाितक गोसाँइ गीत-1

साँझ दि‍यौ साँझ दि‍यौ बाभन के बेटि‍या यै साँझ बीतल जैयऽऽ
कथी के दि‍यरा राकी कथी सुत बाती यै साँझ बीतल यैयऽऽ
सोने के दि‍यरा राकी पाटेसुत बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ
जरै लागल दि‍यरा राकी जमाके लागल बाती यै साँझ बीतल जैयऽऽ
खेले लागल पचदेवती सारी रात यै साँझ बीतल जैयऽऽऽ

चमार जाितक गोसाँइ गीत-2

कारूवीर के अंगना मे अरहुल फूल गछि‍या हेऽऽ
फरल फुलाल डारि‍ लुबधल हेऽऽ
उत्तरे ही राजासँ ये सुगा एक आयल बैसल सुगा
अरहुल फूल गाछ हेऽऽ
फल ने खाइ छेँय रे सुगबा फूलो ने खाइ छेँय
डारीपाती केला सकचूर हेऽऽ
उत्तरे ही राजा सँ ये एलेँ सरनरि‍या बैसल सुगा दि‍औ
ने बझाईऽऽ
सुबगवों नै छि‍यै हौ सेवक पंछी नै छि‍यै
इहो छि‍यै सेवक के खेलौना हेऽऽ

चमार जाति‍क मूड़न गीत-

कौने बाबा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ
ललना रे अपन दादी लेलक जनम केश होरि‍ला‍जी के मूड़न हेऽऽ
अपन छुड़ि‍या गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ
ललना रे अपन मामा-मामी लेतनि‍ जनम केश हो सि‍लाजी के मूड़न हेऽऽ
अपन चाचा कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हेऽऽ
ललना रे अपन चाची लेतनि‍ जनम केश होरि‍लाजी के मूड़न हेऽऽ
अपन नाना कैची गरहाओल सोना से मेरहाओल हे
ललना रे अपन नानी लेतनि‍ जनम केश होरि‍लाजी के मूड़न हेऽऽ

चमार जाति‍क बि‍याह गीत-1

हरी हरी वाँस कटाइ द हो बाबा ऊँचे-ऊँचे मरबा
छराइ द हौ बाबा मरबा बती होने ठार भेलै
सोनी बेटी कइ लॉब एला वरि‍यात हे
गइया जे देलि‍यै हौ बाबा भैसि‍यो देलि‍यै साइकि‍ल रूसल जमाइ हे
छुब दि‍यौ पोती भि‍नसरबा लागा दि‍यौ बजार हेऽऽ
खरीद लेबै साइकि‍ल बोधि‍ लेबै जमाइ हे
हरि‍ हरि‍ वाँस कटाइ दहो बाबा मरबा के बती घेने ठार
सोनी बेटी कइ लाख एला वरि‍यात हेऽऽ
औठी जे देलि‍यै हौ पापा घड़ी जे देलि‍यै
मोवाइल ले रूसल जमाइ हे
छुब दि‍यौ भि‍नसरबा बेटी लागा दि‍यौ बजार हे
खरीद लेबै मोवाइल बोधि‍ लेबै जमाइ हे...।

चमार जाति‍क बि‍याह गीत-2

चलु चलु हे सखी सभ अजोध्‍या नगरी-2
अजोध्‍यामे जाय के भरब गगरी-2
अजोध्‍या के छौड़ा सभ बर रगड़ी
मारत तीर मैय गे फाेरत गगरी
हुनका राजा दशरथ सँ कि‍नायब गगरी
हुनका रानी कोशीला से भराएब गगरी।

चमार जाति‍क बि‍याह गीत-3

गेंद खेल गेला दुलरवा मालि‍न फूलवरि‍या
तोरि‍ देलक अरहुल फूल गाछ हेऽऽ
मछि‍या बैसल छथि‍न बाबा
से अपन बाबा मलि‍न देलक उपराग हे
एहेन ज्ञान पहि‍ले जे बरतहि‍हँ भोरे उठि देला उपराग हेऽऽ
लड़की जे रहि‍तै गै मालि‍न वरजल जाइतै
छहेलबा बरजलो ने जाइ हो।
गेंद खेल गेला दुलरबा मालि‍न फूल वरि‍या
तोरी देला सुपारी के गाछ हेऽऽ
मछि‍या बैसल छथि‍न पापा से अपन पापा
भोरे उठी देलक उपराग हे
लड़की जे रहि‍तै वरजल जाइतै छहेलबा बरजलो ने जाइ हे...।

संकलन, मूड़न गीत
गोसाउनि‍ नोतक गीत

बट्टा भरि‍ चानन रगड़ल पाने पत्र लि‍खल हे।
ताहि‍ पान नोतब गोसाउनि‍ जे नि‍त पूजि‍ थि‍कि‍ हे।
ताहि‍ पान नोतब पि‍तर लोक जे नि‍ज आशि‍ष देथि‍ हे
ताहि‍ पान नोतब ऐहब लोक जाहि‍ स मंगल हएत हे।

मूड़न बेरक-

कौने बाबा दि‍नमा गुनाय जग ठानल हे।
कौने बाबी पड़ि‍छथि‍ केश ि‍क होड़ि‍या के मूड़न हे।
लाल पीयर चीर पहि‍रब केश परीछब हे
बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे
देबउ हजमा बड़ इनाम कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।
शुभ-शुभ काट हजमा केश कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।

लाबा भुजै कालक

लाव भूजय बैसली बहि‍नि‍या
      चुलहा दहि‍नि‍या हे।
हे सुन्‍दरि‍ मंगल आगि‍ पजारल हे
सात्री पत्र मे राखल
      लावा पुनि‍ भूजल हे।
दुलहि‍न गृह मे बैसि‍ जे ब्‍याहल हे।
कहय हे सखि‍ सभ आनन्‍द मनावि‍य
      प्रभु गोहरावि‍य हे।
जुगे-जुगे बढ़ू अहि‍बात
      कि‍ अइहब गाबि‍य हे।

गोसाउनि‍क गीत

अहाँ जगजननी सकल दुख मन्‍जनि‍ हमरा
      बि‍सरि‍ कि‍ये देल।
हमहूँ अबोध बोध नै हमरो ि‍कये उसह दुख देल।
कि‍येक चरण तब हटल अम्‍ब हे कि‍येक ऐहेन मन
हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल
मूस कवि‍ कर जोड़ि‍ वि‍नय करू हमरा बि‍सरि‍ कि‍य देल।

2
हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जाि‍न केँ।
दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ।
आबि‍ आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि‍ केँ
विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि‍ केँ।
कोटि‍यो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि‍ केँ।
दीन प्रभु हम नि‍त्‍य पूजब नेम व्रत केँ ठानि‍ केँ।
      हे भवानी।

3
अम्‍बे-अम्‍बे जय जगदम्‍बे,
जय-जयकार करै छी हे।
ति‍नू भुवन के माय अहाँ छी
      तीन नयन से तकै छी हे।
सि‍ंह पर एक कमल राजि‍त,
ताहि‍ पर बैसल छी हे।
भूत प्रेत सब झालि‍ बजाबै
      योगि‍न के नचबै छी हे।
राक्षस के संहार करै छी
      दुनि‍याँ के जुड़बै छी हे।

4
कतेक दुख सुनाएब हे जननी
      कतेक दुख.......
तंत्र-मंत्र एको नै जानल
की कहि‍ अहाँ के सुनाएब हे जननी
मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुति‍आएल
रखबनि‍ संग लगाए, हे जननी
सूरदास अधम जग मूरख
तारा नाम तोहार, हे जननी
दुर्गा नाम तोहार।

5
मैया दुआर अड़हुल फुल गछि‍या
माँ हे फड़-फुल लुबधल डाि‍र
दछि‍न पछि‍म स सूगा एक आएल
माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ
फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय
माँ हे पाते पाते खेलय पतझार
कहाँ गेल कि‍ए भेल डीहवार ठाकुर
माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू जगदम्‍बा हे
माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय।

वि‍षहरि‍क गीत

1
वि‍षहरि‍ सेब मोरा कि‍छुओ ने भेल
बाँझि‍न पद मोरा रहि‍ये गेल
कि‍यो नीपय अगुआर, कि‍यो पछुआर
हमहुँ अभागलि‍ दुआर धेने ठार
ि‍कयो लोढ़ै बेली फूल कि‍यो अढ़ूल
हमहुँ अभागलि‍ ति‍रि‍या खोदू नामी दुबि‍
कि‍यो मांगय अन-धन, कि‍यो पूत
हमहुँ अभागलि‍ कर जोड़ि‍ ठार।
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ वि‍षहरि‍ माय
सभ दि‍न सभ ठाम रहब सहाय।

2
साओन वि‍षहरि‍ लेल प्रवेश
भादव वि‍षहरि‍ खेलल झि‍लहोरि‍।
आसि‍न वि‍षहरि‍ भगता लेल पान
कति‍क वि‍षहरि‍ नयना झरू नोर।
अगहन वि‍षहरि‍ हेती अनमोल।

3
ऊँच रे अटरि‍या पर वि‍षहरि‍ माय
राम, नीची रे अटरि‍या पर सोनरा के माय
देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि‍ सोन
राम, गढ़ि‍ वि‍षहरि‍ के कलस पचास
बाट रे बटोहि‍या कि‍ तोहें मोर भाइ
राम, कहबनि‍ वि‍षहरि‍ के कलसा लय जाइ
तोहरो वि‍षहरि‍ के चि‍न्‍हि‍यो ने जानि‍
राम, कहबनि‍ कोना के कलस लए जाय
हमरो वि‍षहरि‍ के नामी-नामी केश
राम, मुठी एक डाँर छनि‍ अल्‍प बएस।

मूड़न गीत

बाबा यौ जग मूड़न करा दि‍अ मूड़न करा दि‍अ
नटुआ नचा दि‍अ बाजा दि‍अ पूजा करा दि‍अ
लौआ मंगा दि‍अ मूड़न करा दि‍अ के यौ
लुटाबी अन धन सोनमा केओ हाथकेँ
कंगन मामा लुटाबए अन धन सोनमा
मामी लुटाबए हाथ के कंगनमा बाबा
यै जग मूड़न करा दि‍अ मूड़न करा
नटुआ नचा दि‍अ...।







महेशवाणी

1
दुर-दुर छीया ए छीया,
एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया
पाँच मुख बीच शोभनि‍ तीन अंखि‍या
सह-सह नचै छनि‍ सांप सखि‍या
            दुर-दुर.....।
काँख तर झोरी शोभनि‍, धथूर के बीया
दि‍गम्‍बर के रूप देख साले मैना के हीया
            दुर-दुर.....।
जँ धि‍या के वि‍ष देथि‍न पि‍आ
कोहबर मे मरती धीया
भनहि‍ वि‍द्यापति‍ सुनू धीया के माय
बैसले ठाम गौरी के गुजरि‍या
            दुर-दुर......।

2
ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे
      सखि‍ गौरी अंगनमा
गौरी अंगना सखि‍, पारवती अंगनमा
बहि‍रा साँपक माड़ब बनाओल
      तेलि‍या देल बन्‍हनमा हे
धामन साँपक कोरो बनाओल,
      अजगर के देल धरनमा हे
      सखि‍ गौरी अंगनमा
हरहरा के काड़ा-छाड़ा,
      कड़ैत के लाओल कंगनमा
पनि‍यादरार के पहुँची लाओल
      ढरबा के लौल ढोलनमा हे,
      सखि‍ गौरी........
सुगवा साँप के लौल जशनमा हे,
चान्‍द तारा के शीशा लाओल
      मछगि‍द्धि‍ के अभरनमा हे,
      सखि‍ गौरी.........।

3

सखि‍ जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे
अंगनमामे, हे भवनमामे
साँपहि‍-साँप बामदहि‍न छल
चि‍त्र-वि‍चि‍त्र वसनमामे
नि‍त दि‍न भीख कतए सँ लायब
घुरि‍ फि‍रि‍ जाहु अंगनमामे
भीखो ने लि‍अए जोगी, घुरि‍यो ने जाइ
गौरी हे नि‍कलू अंगनमामे
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइन
शि‍व सन दानी के भुवनमामे।

4
डर लगैए हे डेराओन लगैए
गौरी हम नहि‍ जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए
हे अजगर के सम्‍हा पर धामि‍न के बरेड़ि‍या
गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम....
कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्‍हनमा
बि‍ढ़नी के खोता घनघन करैए।
      गौरी.........
सुगबा के पाढ़ि‍ पर ढोरबा के ढोलनमा
पनि‍या के जीभ हनहन करैए
      गौरी.........
तेहि‍ घर मे बैसल छथि‍ अपने महादेव
बि‍छुआ के कुण्‍डल सनसन करैए।
      गौरी..........

5
हम नहि‍ गौरी शि‍व सँ बि‍आहब
      मोर गौरी रहत कुमारि‍ हे
भूत-प्रेत बरि‍याति‍ अनलनि‍
      मोर जि‍या गेल डेराइ गे।
गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल
      पएरो मे फाटल बेमाइ गे
गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब
      गौरी ले पड़ाएब नैहर हे।
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइनि‍
      इहो थि‍क त्रि‍भुवननाथ हे
शुभ-शुभ कए गौरी के बि‍आह,
      तारू होउ सनाथ गे माइ।

नचारी

बम-बम भैरो हो भूपाल
अपनी नगरि‍या भोला खेबि‍ लगाबऽ पार
कथी केर नाव-नवेरि‍या कथी करूआरि‍
कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार
सोने केर नाव-नवेरि‍या रूपे करूआरि‍
भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार
जँ तोहें भैरो लाला खेबि‍ लगाएब पार
मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद
हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै नि‍शान
बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान

2
भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी
अपन नगरी यो कैलास पुरी
पारबती के हम टल बजाएब
नि‍त उठि‍ नीर भरब गगरी
बेलक पति‍या फूल चढ़ाएब
ि‍नत उठि‍ भांग पीसब रगड़ी
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइनि‍
इहो थि‍क दानीक माथक पगड़ी।

3
जय शि‍वशंकर भोले दानी
      क्षमा मंगै छी तोरे सँ
अपराधी पातक हम भारी
      तैं कनै छी भोरे से।
तोहर शरण छोड़ि‍ ककरा शरण मे
      जाएब हे शंकरदानी
दयावान दाता तोरा सन
      के त्रि‍लोक मे नहि‍ जानि‍।
जाधरि‍ नहि‍ ताकब बमभोले
      हम चि‍चि‍आएब जोरे सँ
अपना ले फक्कर भंगि‍या
      ि‍कन्‍तु तोहर अनुचर भरले
कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर
      सेवक पर सदि‍खन ढरले।
जनम भेल माया तृष्‍णा मे
      से तृष्‍णा नहि‍ पूर भेलै।
कामना के लहरि‍ मे बाबा
      जीवन एहि‍ना दूरि‍ भेलै।
हे दुखमोचन पार लगाबऽ
      हम दुखि‍या छी ओरे सँ
पूजन वि‍धि‍ नहि‍ जानी हम हे
यएह जपि‍-जपि‍ कऽ धि‍यान धरी
कर्म चक्र के जीवन भरि‍ हम
      पेटे ले ओरि‍यान करी
जे ज्‍योति‍श्वर पार लगाबह
      हम दुखि‍या छी ओरे सँ।

4
हटलो ने मानय त्रि‍पुरारी हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब
चड़ि‍ गेल फूल-फूलवारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
अंगने-अंगने सखि‍ सभ उलहन दै छथि‍
कतेक सहब अति‍ गारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे गौरी दाइ
इहो छथि‍ त्रि‍शुलधारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी।


सोहर-

1
धन धन राज अयोध्‍या धन्‍य राजा दशरथ रे।
धन रे कौशल्‍या के भाग कि‍ राम जनम लेल रे।
देखैत पण्‍डि‍त पुरोहि‍त पोथी कर नेने रे
ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि‍ सि‍धारत रे।
से सुनि‍ रानी वि‍कल भेल राजा मुरक्षि‍त रे।
ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे।
मन गुनी रानी हरखि‍त भेली राजा मुदि‍त भेल रे।
ललना रे.......
भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे।

2
कौने मास मेघबा गरजि‍ गेल
      कोने मास बेंगवा बाजू रे
ललना रे कोने मासे होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
सावन मेघवा गरजि‍ गेल,
      भादव बेंग बाजू रे।
आसि‍न होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
कोने तेल देव सासु के
      कोने ननदि‍ जी के रे।
ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के
      गरी ननदि‍ जी के रे।
ललना रे अमला दबैन गोति‍न के
      हुनकर पैंच हेतनि‍ रे।

दसमासी सोहर
पहि‍‍ल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
मूंगक दाल नहि‍ सोहाय, केहन गरम संओ रे
ललना रे....
दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पूसक माछी ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पौरल खीर ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
ललना रे....
चारि‍म मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
फगुआक पूआ ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे
चैत के माछ ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
आम के टि‍कोला ने सोहाय, कि‍ केहन गरम सेओ रे
सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
खुजल केश ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाकल आम ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
पि‍या के सेज ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
दसम मास चढ़ु भादव, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
देवकी दरदे बेयाकुल दगरि‍न बजायब रे
जब जनमल जदुनन्‍दन, खुजि‍ गेल बंधन रे
ललना रे.....
खुजि‍ गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे।

4
यशोमति‍ अद्भुत लेखल, बालक देखल रे
सुन्‍दर हुनकर गात, कि‍ बात पकठोसल रे
कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे
पूतनाकेँ देल वि‍चार, जाहु तौहें गोकुल रे।
पूतना थन वि‍ष लेल घोरि‍ वि‍दा भेल गोकुल रे
घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे
देलनि‍ पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्‍दर रे।
पूतना दूध पि‍आओल, आओर वि‍ष पसारल रे
हरि‍ देलनि‍ दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे।

खेलौना

1
हाथक कंगना ननदी के दलनि‍
      से नहि‍ मन भाबय हो लाल।
फूल के घड़ी ननदि‍या माँगय,
      सेहो कहाँ पाएब हो लाल।
डाँड़ के डरकस ननदी के दलि‍एनि‍
      से नहि‍ मन भावय हो लल
पि‍यबा देलि‍यनि‍ ननदोसि‍या देलि‍एनि‍,
      से नहि‍ मन भावय हो लाल।
ई सभ कि‍छु नहि‍ हुनका चाही
      ओ मांगथि‍ पठनमे हो लाल।

2
सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए
सासु जे बजती बाजि‍ कऽ की करती
छठि‍यारी पुजाबऽ लए माय अबैए
सोठौरा ने खाएब......
गोतनो ने बजती बाजि‍ कऽ की करती
हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए।
सोठौरा ने.......
ननदो जे बजती बाजि‍ कऽ की करती
कजरा सेदै लए बहि‍न अबैए।
सोठौरा ने.......
देओर जे बजता बाजि‍ कऽ की करता
दगरि‍न बजबै ले भाय अबैए।
सोठौरा ने.......

  


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.डॉ॰ शशिधर कुमरपंकज कुमार झा ३.नवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४
      
 सुनू यौ भारत केर सरकार !  
      (आह्वान गीत)
               

सुनू यौ भारत केर सरकार !
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !
नञि  माँगय  छी  भीख  हऽम, निज माँगै छी अधिकार ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !

जाहि  धरती पर  जन्म लेलहुँ हम,
जाहि   धरती  पर  खेल  केलहुँ ।
पीबि जकर हम अमिय सलिल नित, 
अन्न   खाय   प्रतिपाल   भेलहुँ ।
माँगि  रहल  छी, माए  मैथिलीक  पावन निर्मल प्यार ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !

जन्महि सँ  सिखलहुँ   जे बाजब,
जाहि भाषा  सँ दुनिञा  जनलहुँ ।
जकर ज्ञान - गंगा  मे नहा  हम ,
वाणी रुपी  रुपी रत्न केँ पओलहुँ ।
माँगि  रहल  छी,  ओहि भाषा  मे भाव – ज्ञान सञ्चार ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !

किन्नहु आब ने रहतीह  मैथिली,
ककरहु     चरणक     दासी ।
लेब      अपन      अधिकार ,
रहब हम  लऽ कऽ अप्पन थाती ।
शान्ति  समाहित  क्रान्ति  ज्वाल सँ, दूर  करब अन्हार ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !

लेब  अपन  अधिकार,  मैथिलक
स्वाभिमान  अछि  जागि  उठल ।
निज समृद्धि, उन्नति, विकाश केर,
नूतन  पथ   अछि  बना  रहल ।
आब ने रहतीह मिथिला - शिथिला, ने सहतीह अत्याचार ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !

रोकि   सकैछ   ने   केओ  आइ,
कोशी   कमलाक  उमड़ल  धारा ।
बान्हि  सकैछ  की   केओ   हवा,
पहिरा   सकइछ  ओकरा   काड़ा ?
देब  जवाब  डूबा  ओकरा , जे  रोकत निज  करुआरि ।
                        सुनू यौ भारत केर सरकार !


   नोर (कविता)

रे  नोर  धन्य  जिनगी  तोहर,
                           निज प्रियाक नैन मे बसइत छेँ ।
बहि  नैन  सँ  छूबि  कपोल दुहु,
                          मधुकोष  अधर  मे  खसइत छेँ ।।

पी अधर  अमिय  तोँ भऽ चञ्चल,
                          मुख  चूमि  वेग  सँ  बढ़इत छेँ ।
पुनि  चूमि  प्रियाक  मृणाल  गृवा,
                         कुच  श्रृंग  मध्य  भऽ बहइत छेँ ।।

तोँ  केलि  करैत, अठखेलि  करैत,
                           नाभी  जल  पूरित  करइत  छेँ ।
पुनि  धार  अनेक  बना कटि पर,
                          चुम्बन  कऽ  आगाँ  बढ़इत  छेँ ।।

नीबी  नभ  तर  भऽ  हर्ष  चित्त,
                            सागर  सँ  संगम  करइत   छेँ ।
ओहि  अनुपम अर्णव  तट पहुँचि,
                          अपना  केँ  धन्य  तोँ बुझइत छेँ ।।

पर  व्यर्थ  तोहर  अभिमान  सर्व,
                            हमरहि  कारण  तोँ  बहइत  छेँ ।
नहि  मोल  तोहर  रे  अश्रु कोनहु,
                           बहबाक   हेतुअहि   बनइत  छेँ ।।

हमहीं  छी हुनक  चितवन  मे सदा,
                            यद्यपि  तोँ  आँखि  मे रहइत छेँ ।
हम  हुनक  हृदय,  हर अंग  मे छी,
                          स्पर्श   मात्र   तोँ   करइत   छेँ ।।

हम   जीवन   नेने   अबइत  छी,
                          तोँ  मरणक   राह  देखबइत   छेँ ।
हमरा  लग  हर्षक   द्युति - इजोत,
                         तोँ  तम  विषाद  लऽ  अबइत  छेँ ।।

हम कनितहु, कानि ने सकइत छी (गीत)

की  हाल  कहू,  हम  अहँ सँ  प्रिय,
                                सब हाल तऽ  अपने  जनितहि  छी ।
हम  एहि  ठाँ  दूर,  अहाँ  सँ  प्रिय,
                                चुप रहितहुँ सदिखन,  कनितहि छी ।।

हर एक  क्षण  अहाँ  हमर  सन्मुख,
                                हम  याद   अहीं  केँ  करइत  छी ।
अछि  भेल  जेना  निन्नहु   उन्मुख,
                               भरि   राति   तरेगन  गनइत  छी ।।

चन्ना  मे  देखि  अहँक  मुख  छवि,
                               जँ  धीर  कने   हम   धरइत  छी ।
तऽ  देखि   कलंक,  प्रिय   अहँ  केँ,
                              चानहु   बुझबा  सँ    डरइत   छी ।।

हे  प्राण   हमर !   अहँ   जुनि   पुछू,
                             हम अहँ बिनु  कोना  कऽ रहइत छी ।
संदेह   करब  अहँ   जुनि   कनिञो,
                             हम  अहीँ  केर   पूजा  करइत छी ।।

सौभाग्य  जे  प्रिय  अहँ  नाड़ि  थिकहुँ,
                            नोरहु   केर    भाषा   जनइत   छी ।
पर   हमर    विवशता    तऽ    देखू,
                           हम  कनितहु, कानि  ने  सकइत छी ।।
        

 २.
आउ सुनु कने बात हमर- पंकज कुमार झा
-पंकज जी सॉफ्टवेयर अभियन्ता छथि।

आउ सुनु कने बात हमर,
नै पकड़ू अहाँ कान हमर,
कहै छी हम आइ कनी अप्रियगर,
मुदा पिबहे पड़त क्रोधक जहर,
अहंकार आ क्रोध केँ,
कंठेमे धरु,
अहाँ आब नीलकंठ बनू,
जेकरा पुजैत एलहुँ सभ दिन,
वएह महादेव बनू अहाँ,
ध्यान करू,
कनी ज्ञान करू,
विज्ञानक अहाँ संग धरु,
परंपराकेँ बुझू अहाँ,
तर्क तथ्यसँ तौलू अहाँ,
कसौटीपर कसलाक बादे,
ओकरा अहाँ अंगीकार करू,
अंध मोहि धृतराष्ट्र जकाँ,
 गांधारी ने बनू अहाँ,
हिसाब करू,
कनी विचार करू,
अलग अलग विधासँ साक्षात करू,
अध्ययन करू,
निर्माण करू,
श्रीजनात्मक्ताक अहाँ आयाम बनू,
तास छोडू,
भाँग छोड़ू,
बिना बातक बात छोड़ू,
अपन बड़ाइक राग छोड़ू,
दलानक बैसार छोड़ू,
राजनीतक कौचर्य छोड़ू,
आब समय नै भोज भातक,
आब समय अइ समय संग चलै के,
उच्च अध्ययनमे पाइ लगाउ,
व्यपार बाणिज्यसँ हाथ मिलाउ,
अपन सहजता अपन सरलता,
अपन दर्शन केँ आर बढ़ाउ,
इतिहासमे नै,
आब बर्तमान केँ, 
अपन कर्मठतासँ सजाउ,
विज्ञानक ज्ञाता बनू,
दर्शनमे छलहुँ अग्रणी,
आब विज्ञानक बारी अइ,
पूजा पाठकेँ विज्ञानसँ जोड़ू,
नियम निष्ठाकेँ स्वास्थ्यसँ जोड़ू,
तहने टा कल्याण हएत,
जहने पान माछ मखानसँ उबरब,
खेबा टाक सिर्फ बात नै करब,
साँस साँसमे ध्यान करब,
आ बात बातमे विज्ञान,
गणित गणितक  चर्चामे,
तकनीकक आधुनिकतामे,
समय अपन पूरा बितैब,
कनी याद करू,
सीता उठाबै छलीह शिव धनुष,
आ अहाँ दबल छी दहेजक  ज्वालासँ,
गाम गाम नशामे डूबल,
कुंठाक निक्षेपसँ भरल,
आरोप आ प्रत्यारोपसँ उबरु,
अपनाकेँ अहाँ कलासँ जोड़ू,
आब समय विश्रामक नै अइ,
आब परिश्रमक अइ जरूरत,
जनकक गीते टा नै गाउ,
फेर जनक जकाँ विज्ञानक हर चलाउ,
ज्ञानक मटकूरमे सीता निकलतीह,
लक्ष्मीसँ भरपूर धरती,
राम पुरुषार्थ स्वयं औताह,
सीता के वरन करताह,
कतौ दुखक दरश नै हएत,
सबहक मोन निर्मल भऽ जएत,
माता पिता नै डराएल रहताह,
बाल बच्चाकेँ पढ़ाएल करताह,
गाम गाममे हएत विज्ञानक चर्चा,
हर्षित मोनमे खुशहालीक बर्षा,
खेल खेलमे गणितक पाठ,
बैसारीमे कविता कहानी,
पुनः मैथिल ज्ञान विज्ञानसँ आलोकित,
    करताह पूरा जगमे इजोत |



नवीन कुमार "आशा"

माए बाबु ..

माए बाबु आइ अहाँक मोन परल ,
तखन हमरा ने किछु फुराएल ..
बैसि कऽ आंगन मे ,
खूब हम नीर बहायल..
फेर सोचल जे सपना देखला बाबु ,
ओकर कोना करु त्याग ..
कोना घुरि जाए ओ गाम
जकरा लेल लेलौं वनवास ....

आइ मरम बुझे अछि आशा ,
की अछि ई मिथिला समाज ..
एकरा मे अछि ओ जान ,
जे मुरदा मे सेहो फुकै जान.
माए बाबु ने करब ई दुख
बौआ एतय अहाँक पाबै सुख.
जाबत ओ ने रचत इतिहास
नै आओत अहँक पास...
माए बाबु..
(अपन माँ बाबुजी कँ समर्पित ,हुनक आस ,नवीनक आशा)

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...