Monday, November 28, 2011

'विदेह' ९४ म अंक १५ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९४) PART III


१. शिवशंकर श्रीनिवास २.विकास झा रंजन ३.जगदीश प्रसाद मण्डल ४. मुन्नाजी हाइकू ५. रामबिलास साहू- टनका

शिवशंकर श्रीनिवास

दूटा गीत
रोटी भातक नै छै पत्ता
अगबे हर-हर गीत।
इमान मुखौटा लगा बहादुर
लऽ रहल छै जीत॥
औ जी बुद्धिक छै बलिहारी।
कहै छै दूध, मुदा छै ताड़ी॥

जतहि हथौरब कतहु किछु नै
अगबे चाले-चाल।
छुच्छ हाथमे कतहु किछु नै
जिनगी भेल बेहाल॥
पेपर लिखै बम- वम वम
टीबी नाचै छम छम छम
औजी अद्भुत छै अपियारी।
कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥
करौछ छिपाओल गरम पानिमे
कऽ रहल छै छनाक-छनाक
हूले- ले ले, हूले- ले ले
भऽ रहल छै दनाक-दनाक
औजी अद्भुत छै बुधियारी।
कहै छै दूध मुदा छै ताड़ी॥

आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥
कनियाँ औती बच्चा आओत
जागत गामक प्राण॥
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ।
नव ज्योति जे छिटकि रहल अछि
ओकरा आनू खेत
नदी पानि जे छै बौआयल
ओकरो मोरू रेत
महमह चास वासमे
प्रातीक सूनब टान।
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥
अहाँ बिना ई गाम उदास
कानै रन्ना माय
दूध भात के अङना खेतै
कनने चन्ना जाय।
अहाँ आयब तऽ ठुमकत आङन
हँसता मामा चान
आउ श्रमिक जन आउ
अपन गाम घुरि आउ
सुकरातीक आङनमे
अरिपन फेर लिखेतै।
आँचर तर हे दीप
नेह दुलारल जेतै॥
वासमती आ जलबा गमकत
लौकत मड़ुआ धान।
आउ श्रमिक जन आउ।
अपन गाम घुरि आउ॥

विकास झा रंजन
गजल
हमर घरक भीत लाईग छोट सन बाट
बाटक ध कगनी हुनक ताकि हम बाट

चान सुरुज देखि देखि घोर भेल नैना
जिनगीक चान आई उगती ई बाट

हसोथब कोना हुनक रूपक इजोत के
टहाटही अभरत आई इजोर ई बाट

हमरे सन हुनको भेल हेतैन धकमकी
देखि देखि इ सब मुसुकी देत ई बाट

हुनके गछेर हम कह्बैन निजगुत
जरे जरे काटब जिनगीक ई बाट
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कवि‍ता-

सान-धार-धारा

अबैत जखन मनुखमे सान
शानसँ चलए लगैत।
एक दोसरमे सान चढ़ा
परि‍वारक शान बनबए लगैत।

चढ़ि‍ते सान परि‍वारमे
बर्खा-बून बनि‍ धरि‍याए लगैत
धरि‍आइत-धरि‍आइत धरि‍आ,
धारा बनि‍ धड़धड़ाइत चलैत।

अपन-अपन माटि‍क रसे
अपन-अपन सभ धार सजबैत,
संग मि‍लि‍ चालि‍-चलैत
नीक-अधला रहए बनैत-बि‍गड़ैत।

जइ बर्खाक जेहन बून
तेहन से बनबैत धार
धार मि‍लि‍ धरा धार
अपना गति‍ये बदलैत धार।

जे धारा सृजए गंगा
कमला कोसी ओ महानन्‍दा
ओ धार कहि‍या धरि‍ ठमकि
मानैत रहत फंदा?

४.
मुन्नाजी
हाइकू

पजेबा काँच
ठीकाक मकान
भसैक गेल
पीड़ित नारी
प्रमोशन रुकै नै
तेँ मुँह बन्न
नोकरी नीक
भीतरमे गञ्जन
एयर होस्ट
हाक सूनल
मारि खेबाक डरे
नै बचौलक
भोगने बिना
जीवनक दर्शन
सत्यसँ दूर
अग्नि पीढ़ीमे
होहल्ला भेल बेसी
काजमे शून्य
मैथिली मध्य
ओलि वसूलीकेँ
समीक्षा बुझू
जाति पातिक
भेदभाव घटल
समरसता
इलाज भेल
हास परिहाससँ
एक माध्यम
१०
आब अछि नै
जीवनक विक्षोभ
कमौआ लेल

रामबिलास साहू
किछु टनका

30. पान मखान
ि‍मथि‍लाक सम्‍मान
धानक खान
जनकपुर धाम
ि‍मथि‍लाकेँ प्रणाम।

31. पढ़ैत सुग्‍गा
कहैत राम नाम
ि‍पंजड़ा बन्‍द
रहैत छै गुलाम
अछि‍ संत समान।

32. सँाच बजैत
जग मारल जाय
झूठ बजै तँ
जगत पति‍याय
नै छोरू सँाच बानि‍।

33. नीमक गाछि‍
सुतल रही खाट
सपनैति‍ छी
चलि‍तो पछताति‍
नदी तटक बाट।

34. दु:खक बात
नै कहि‍यो ककरो
सुनि‍ हसँत
हानि‍ करत मान
नै ि‍मलत सम्‍मान।

35. जीवन दैत
जल जीव जन्‍तुकेँ
शीतल चँाद
चँादनी िछटकैत
शोभा छै धरतीकेँ।

36. आमक डारि‍
झूला झूलैत राधा
कृष्‍ण पुकारै
संगे-संग झूलव
वृन्‍दावनक झूला।

37. पानक पात
मखानक प्रसाद
स्‍वर्गक बास
नदी तटक चास
नै होएत वि‍श्‍वास।

38. मायक गोद
धरतीकेँ बि‍छौना
फूलक सेज
सुख पाबै बेजोर
नै ि‍मलै परलोक।

39. बँासक वंशी
स्‍वर बजै मधुर
माया पसारै
स्‍वर छै अनमोल
सुनै सभ वि‍भोर।

40. कारी काजर
मुखड़ा ि‍बगारैत
कारी कोइली
मधुर गीत गबै
सभकेँ ललचाबै।

41. चँादनी राति‍
कहै मनक बात
प्‍यासल प्रेमी
प्‍यास बुझाबै राति‍
दि‍लसँ करै बात।

42. देव धर्मसँ
उपर माय-बाप
तीर्थक खान
धरती माता अछि‍
हि‍न्‍दुस्‍तान महान्।

43. मान घटै जँ
ि‍नत्‍य जाय सासुर
मान बढ़ै जँ
करै अति‍थि‍ सेवा
सेवासँ ि‍मलै मेवा।

44. कालक मुँह
खुलल छै ि‍वशाल
क्रमश: सभ
समाय बचै नहि‍
कोय एहि‍ चक्रसँ।

45. चमेली फूल
गमकै ि‍दन-राति‍
गजरा बनि‍
देवौकेँ नहि‍ चढ़ै
नारी सजाबै केश।

46. कमल फूल
ि‍बराजै लक्ष्‍मीजी
सुख शान्‍ति‍ दै
अन्‍न, धनसँ भरै
सभक छै कल्‍याण।

47. सावन मास
जलक बुन्‍न पड़ै
आसमानसँ
बेंगक बाजा बजै
खन्‍ता डबरा भरै।

48. पानि‍क बुनन
मोतीसँ महग छै
मोतीसँ नहि‍
ि‍मटै भूखक रोग
पानि‍ ि‍जनगी दैत।

49. मैथि‍ली भाषा
मौध सन मधुर
जे नहि‍ पढ़ै
वो बाजि‍तौ लजाय
पावै पढ़ि‍ते मान।

50. मौध मखान

रेहू माछक खान

पानसँ मान

पाग सँ बढ़ै शान

ि‍मथि‍लाकेँ ि‍नशान
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
. अन्जनी कुमार वर्मा २.विनीत उत्पल

अन्जनी कुमार वर्मा

ओजक भोज
,,,,,,,,,,,,,,,
इ आत्मीयता थिक मृगमरीचिका
जाहि पाछु आम लोक सदृश
स्थिति कें खुआ रहल छी ओजक भोज
झाँपल हाड़ भ गेल बहार
वसन तर सं द रहल अछि देखार
इ कर्तव्यक द्वार ,केयो नै पाबैछ पार
गलब अछि सहज मुदा
स्वर्ण बनब कठिन
इ सम्बन्ध अछि अनंत
इ आत्मीयता अभिन्न....

 

दुई गोट भूख
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
खसि गेलैक-ए आँखिक पानि
आब लोक चौबटिया पर बेच दैछ
अप्पन अस्तित्व ,
खोलि दैछ नीबी-बंध
कियैक तs पेटक होम कुंड मs
देबय परैछ आहुति ...
बढ्ले जा रहल अछि दिनानुदिन
अनंत दिशा में वासना केर भूख
वासनाक भूखल किनी लेछ
रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व
लोक में आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि
दानवी , पाशविक आ की कोनो तेसर ......
एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव
दुवs भुखक सम्बन्ध भs गेल अछि
अन्योन्याश्रय .....


 

समस्या
,,,,,,,,,,
आबक लोक की करत बसंतक अनुभव
की सुनत कोइलीक गीत
की घुमत पुष्प वाटिका में ,
कपार पर राखल करिया पाग कए
उघैत - उघैत बनल रहैछ बताह
नहि पाबि सकैछ थाह
नहि सुति सकैछ सुख सं
नहि बाजि सकैछ दुःख सं
गोंताह पानि में डूबल रहैछ कंठ धरि
छटपटाइत रहैछ, बऊआयत रहैछ मन
सपनहूँ में देखैछ सदिखन दुःख धंधा
घेंट में लागल फंदा ,
नहि रौदक चिंता अछि,नहि पानिक
मात्र चिंता अछि सबकें अप्पन पेटक
फंदा लागल घेंटक ....

विनीत उत्पल
तात-तात औ तात, सभ दिश अछि भ्रष्टाचार देखै छी
के राजा के रंक, सभक
 यैह अछि शिष्टाचार देखै छी

घूस दियो, घूस लियो, घूस पिबू,घूस
 खाइ जाउ यौ
घूस अछि हमर ब्रहम, ई अछि सदाचार देखै छी

घूसं ब्रह्मा, घूसं विष्णु, घूसं देव महेश्वरः
 सुनै छी
घूसं जीवन आ मरणं,
 इत्तेक छी हम लाचार   देखै छी

हाय पैसा, हाय पैसा, सभ किछु अछि पैसे-पैसा
  किए ई
धर्म करू, कर्म करू, छोडू ई सभटा दुराचार देखै छी

आजुक कालमे व्याकुल उत्पल कहि रहल
   अछि 
नीक काज
 नै करब, नाम पर होयत मूत्राचार.  देखै छी

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.डॉ॰ शशिधर कुमर २ नवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
      
        पूणा प्रवास (‍१)
        (कविता)

मिथिलाक  माटि सँ दूर एतए,
                          यौ अहाँ पुछै छी केहेन लगैए ।
त्वरित वेग, पर एकरस जिनगी,
                         पुरिबा पछिबा बुझि ने पड़ैए ।।

की  बसन्त बरसात घाम,
                       सभ एक्कहि रंग मधुमास लगैए ।
की आयल, की गेल, से नञि कहि,
                        शरद शिशिर हेमन्त बितैए ।।

सौ - सौ उर्वशि - रति - मेनका,
                          आँखिक  सोझाँ  सदा  रहैए ।
रुचिर प्रकृति - मनोहर - सुन्नर,
                         नन्दन - वन सन रोज हँसैए ।।

मुदा तदपि नञि जानि एतऽ किए,
                         हमर मोन, मिसियो ने लगैए ।
ओ मिथिला भू याद  आबैतछि,
                        मिथिला भाषा  कहाँ  भेटैए ??


     पूणा प्रवास (‍२)
       (कविता)

जे देखल, से कहि ने सकै छी ।
बिनु कहने, चुप रहि ने सकै छी ।
की पूणे नगरी छी रे भैय्या,
                      दूरहि देखि कऽ कहि ने सकै छी ।
                      जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।।

देव मानि,  आदर्श  बुझै  छी ।
जकरा हम सब नित्य पुजै छी ।
इन्द्रक कृत्य कतोक देवमय,
                    निज जीनगी अनुसरि ने सकै छी ।
                     जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।।

भोरक सूर्य - शान्त ओ सुन्नर ।
दूरहि,  चान - तरेगन  सुन्नर ।
लऽग सँ कक्कर दृश्य केहेन की,
                    कोना कहू, किछु कहि ने सकै छी ।
                     जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।।

पूणे - नगरी, विद्या केर नगरी ।
बहुत पैघ  बान्हल  तेँ  पगरी ।
नहि फूसि एकहु आखर एहि मे,
                   ओहो विद्या , जे ने वरणि सकै छी ।
                    जे देखल,  से कहि ने  सकै छी ।।


 चकोरक उक्ति चानक प्रति
       (कविता)

हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।
          हमर मृत्यु पर प्रशन्न छी ।
                         अहँक हृदयहीनता सँ, हऽम अवसन्न छी ।
                                    हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।।

जिनगी भरि रटलहुँ हम, अऽहीं केर नाम ।
मनमे  अऽहींक  छवि,  बसल  अभिराम ।
                          की हम कहू , अहाँ पाथर अनमन्न छी ।
                                    हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।।

अहीं  हमर  इच्छा,  अहीं  हमर  काम ।
अहीं  हमर  काया,  अहीं  हमर  प्राण ।
                         हम तऽ अहाँक, छद्म रूप देखि सन्न छी ।
                                    हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।।

अहीं केर वियोगेँ,  हम त्यागै छी प्राण ।
अहँक ठोर निष्ठुर,  छिड़ियाबै  मुस्कान ।
                         सोचि रहल छी, अपनेँ पाथर प्रणम्य छी ।
                                    हे  चान !  अहाँ  धन्य  छी ।।



अहाँ  सपनहि मे  आबै छी, आयल करू
              (गज़ल)


अहाँ  सपनहि मे  आबै छी, आयल करू ।
मोन सपनहि मे  क्षणिकहु, जुड़ायल करू ।।

हम चाही ने आओर  किछु, अहँ सँ प्रिय ।
अहँ बनि कऽ गुलाब, मुस्किआयल  करू ।।

पाबि सकलहुँ ने अहँ केँ जदपि हम प्रिय ।
अहँ ओहिना,  कौमुदि केँ  लजायल करू ।।

अहँ  दूरहि  रही,  अहाँ  अनकहि  सही ।
दीप   प्रेमक   हमेशा,   जड़ायल  करू ।।

प्रेम  प्रेमहि  रहत ,   मेटा ने सकत ।
अहँ चाही तऽ  सपनहु  ने  आयल करू ।।

प्रेम  मोनक मिलन, नहि  कामक सदन ।
अहँ जाहि ठाँ छी,ओहि ठाँ फुलायल करू ।।
        

 २.नवीन कुमार "आशा"
दफ्तर

दफ्तरक सब के खसता हाल जखन पहुँचब बुझु हएब हलाल .
दफ्तरक चक्कर बड खराब ,ओतय ने अछि कोनो जवाब ..
जँ अहा छी बड जल्दीमे ,स्वागत करियौनि नकदी सँ ..
ओतय चलए सब तरहक रेट ,सब कियो लै छथि अलग सँ भेट ..
बरका होथि वा छोटका सभकेँ दियौन टटका
जँ करबनि सिनाजोरि
 
हेत काज मे देरी...
देख ओतुक्का नजारा
 
चढल हमरा पारा,
बुझितय ओकर इलाज 
पर हमरो तँय छल काज..
मोनमे आएल सबक सिखाबि ,फेर आएल याद .
जँ हिनका सब सँ करब सिनाजोरि
तँ होयत काजमे देरी
कि करतै बेचारा आशा नै छलै आर कोनो आस .
.जेबीसँ निकाललक टाका आ करा देलक ओ निर्गत ...
कनिको ने सोचलक ओ जँ ऐकरा देब बढावा 
तखन तँ चढबै पड़त चढावा..
 
दफ्तरक  ई हाल

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार२. नवीन ठाकुर


रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदारक गीत आ झारु।

झारू
भाि‍ग गेला अंग्रेज अकेला।
छोरि‍ कऽ पाछू ढेरो जाि‍त॥
कर रंगदारी वसुल रहल अछि‍।
मारि‍ मारि‍ कऽ सभकेँ लाति‍॥
       गीत (1)
लोभी लालची कामी क्रोधी।
भूमि‍ भरल दूर-दूर हौ॥
बाजह हौ काका केना कऽ हेतह।
देशक गरीबी दूर हौ॥......2
हाथ कड़ोरो काम जे कैरतै।
सोनसँ खजाना भैरतै॥
घर बैसल घरघुसरा बैनि‍ कऽ।
कला कौशल मजदूर हौ॥ बा....
व्‍यर्थ बैसल मानव संसाधन।
हाथ पैर मेंहदी आँखि‍मे आजन॥
भरि‍ दि‍न चौकपर तास खेलै छै।
और मचबै छै हुर‍ हौ॥ बा....
सी.ओ, बी.डी.ओ, सरपँच मुखि‍या।
धरतीपर सभसँ ई दुखि‍या॥
फँड कोना सभ हम्‍मर हेतै।
हरदम भाजै भूर हौ॥ बा....
शान्‍ति‍ सभकेँ दँात काटै छै।
एक दोसर लऽ दुख बाँटै छै॥
अपने भायकेँ लहु चाटै छै।
बनि‍ कऽ महि‍षासूर हौ॥ बा....
काम-क्रोध और लोभ भरल छै।
आगि‍ अज्ञानमे सभ जड़ल छै॥
आम जानि‍ कऽ सभ रोपै छै।
गजड़ा काँट बबुर हौ।। बा....
सूस्‍त परल छै राजक कर्मी।
सेवामे बर्तै छै नर्मी॥
सत् कर्मकेँ सभकोई छोड़ि‍‍ कऽ
सुखसँ भेलै दूर हौ।। बा....
राजकोषपर नजर गरल छै।
हथि‍याबक लोभ भरल छै।।
हम्‍मर की कर्तव्‍य बनै छै।
ज्ञान हि‍नकासँ दूर हौ॥ बा....
जाति‍ धरम मानवता भेदी।
लोग बनल सभ अही‍ केर कैदी॥
धरम आगि‍मे जड़ि‍ ई जनता।
बनि‍ गेल छह सभ क्रुड़ हौ।। बा....
धरम इमानसँ लोग छै वंचि‍त।
काम क्रोध और लोभ छै संचि‍त।।
नि‍ष्‍ठा नीति‍ मानवताकेँ।
जड़ा तापल केर घुर हौ।। बा....
अन्‍धविश्वास छै सभकेँ धरने।
कुरि‍तीसँ घर छै भरने।।
अज्ञानक अग्‍नि‍मे जड़लै।
सबहक करम कपुर हौ।। बा....
वोटक खाि‍तर आजुक नेता।
मारै छै चानी केर जूता॥
कुछ पापी तँ वोट बेच कऽ।
खाधि‍ खसल छै जरूर हौ।। बा....
गप्‍पे-गप्‍पमे लफड़ा बढ़लै।
शाशक सि‍रपर टेन्‍शन चढ़लै।।
अलुल-जलुलसँ लड़ि‍ ई शाषक।
भेलह चकना चूर हौ।। बा....
मुँह देखैल पंचैती होई छै।
घूस पंच भगवानो खाइ छै।।
आब ककड़ापर आश करतै।
गामक लोग मजबूर हौ।। बा....
ज्ञानले नै कोइ स्‍कूल जाइ छै।
नौकड़ी कऽ ई जड़ि‍ देखाइ छै।।
शि‍क्षामे सभ कोई खोजै छै।
पाइ अड़जि‍ कऽ लुरि‍ हौ॥ बा....

 
नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म - १५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ), रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममे रूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. )
गीत --

किए जिनगीक आशा अहाँ सँ केलहुं / ........................(मुखरा)
अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ//
किए जिनगीक................................//

मोनक बाते मोने रहि गेल , ..............................(अंतरा )
उपजल जे ललसा कोना मरि गेल //
कंठ अधीर भऽ सुखाएल जाइए,
अपन अधरक जाम सँ वंचित केलहुँ /
किए जिनगीक...............................//

जनलहुँ ने दोख जे हमरा सँ भेल ,
प्रेमकेँ जं दोख बुझी हमरा सँ भेल //
प्रेमक परिभाषा बुझलिऐ ने कहियो ~
धनक बेगरता अहाँ प्रेममे सिखलहुँ /
किए जिनगीक ..................................//

बैसिते फुलवारीमे याद पड़ि गेल
टिशक दू संझा सँ आँखि भरि गेल //
प्राणक बिना कोनो जिनगी भेलैए ~
अहाँ देहकेँ बिसरि हमर प्राण लऽ गेलहुँ /
किए जिनगीक ..................................//

अपन हृदयक कोनामे अहींकेँ बसेलहुँ //
किए जिनगीक ..................................////



मिथिला दर्पण १

चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखू क्लेश ! !

ने बिसरू संस्कृति ने बदलू व्यवहार
 
मैथिल के देखिते नै बनू अनचिन्हार
 
संगठन बिन एकताक ने पूर्ण हएत उद्देश्य !
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश,
मिथिलाक संतति छी जुनि राखू क्लेश !!

अपना धरोहरकेँ कए बुझैत छी बेकार
दोसराक उत्सवमे जा पुरैत छी हकार
धियो - पुता केँ उनटा - सीधा दैत छी उपदेश
 
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

धर्म केर ई भूमि अछि मिथिला महान हमर
बुद्ध, जानकी, महावीर क धाम छी गाम हमर
सहेजू पुलकित भऽ एहन दुर्लभ सन्देश
 
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

ने छी कम किनको सँ, छी ने किछुमे पाछू
भ्रान्ति जे मोनक अछि तकरा मेटाबू
अपने दहीकेँ खट्टा कहि, करैत छी खुदसँ द्वेश
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !

छी नै अनभिज्ञ अहाँ मिथिलाक इतिहास सँ
बुझितो जे मुहं फेरै छी अपना विकाश सँ
मिथिलाक उत्थान हेतु बन परत मिथिलेश
 
चाहे रहू मिथिलामे चाहे रहू परदेश ,
मिथिलाक संतत छी जुनि राखु क्लेश ! !
 
 
मिथिला दर्पण २

परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर
 
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर !

पटुवा ,बथुवा और खेसारी साग बड छल अनमोल
बारीक़ कोबी आर कदीमा छोटका बरका ओल !
मति मारलक जे हमरा लागल बारीक़ पटुवा तीत
 
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओँक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

भोजक दिनमे भोरे सँ भरि दिन मचबैत छलहुँ हल्ला
 
कियो कहैत सकरौरी छै कियो कहैत छल रसगुल्ला
 
देखिते चुरा - दही पात पर , मुहं सँ छुबैत छल नीर
 
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

आमक महिना गाछी बिरछी बाध-बोन बौएतौं
 
कृष्णभोग , बम्बैया ,मालदह चोभा मारि कऽ खैतों
 
किछुओ जे छुबतौं हमर आमकेँ होइतौं हम अधीर
 
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !

छैठ, दिवाली , दुर्गा पूजा , भरदुतिया सन नै पाबैन
जे कियो नै बुझला मिथिला दर्पण हुनका के बुझाबैन
आस्था मिथिलाक प्रेममे बंधने अछि हमरा जंजीर
 
परदेशमे रहिकऽ मोन पड़ैए गाओंक पोखरी भीर !
भूखे गुलेर मीठ लगैत छै जहिना कोबराक खीर ! !
 

  
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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत


१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ६. उमेश मण्डल (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)
.
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।






२.श्वेता झा (सिंगापुर)


३.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।


.इरा मल्लिक



राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )

६.
उमेश मण्डल

मिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी  (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )


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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद


बालानां कृते

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह                                
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४,

हम  फूल बनब, हम काँट बनब
                (बालगीत)

हम  फूल बनब, हम काँट बनब ।
कोमलतम्,  टाँट  सँ टाँट बनब ।।

नहि ककरहु हम, अधिकार हरब ।
नहि ककरहु हम पथविघ्न बनब ।
पर अपन प्रगति - पथ - रोड़ा लेऽ
हम  लोहक  दण्ड समाठ बनब ।।

पानिक संग बनि कऽ माछ रहब ।
शत्रु  लेऽ  विषधर  साँप  बनब ।
सज्जन लेऽ शिव  अभिराम सही,
दुर्जन  लेऽ  हर विकराल बनब ।।

मिथिला  केर  पारावार  हमर ।
मिथिला भाषा  अधिकार हमर ।
अछि तुच्छ एतए, संसार सगर ।
मिथिला भाषा  सभसँ  मीठगर ।
आँखि  उठाओत  जे एकरा दिशि,
तकरा  लेऽ चूल्हिक आँच बनब ।
                   

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 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH


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विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
१.भारत आ नेपालक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली २.मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

१.नेपाल भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

१.१. नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक
  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, , , न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण र् हजकाँ होइत अछि। अतः जतऽ र् हक उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु क उच्चारण जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़गेलाह, लेल, उठपड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषा सम्बन्धी निअम अनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्ष सभकेँ समेटि कऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनीकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽबला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषी पर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़ि रहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषता सभ कुण्ठित नहि होइक, ताहू दिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

१.२. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि
, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर
, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन
, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा
, ठिना, ठमा
जेकर
, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ
, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल
, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक
न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४.
तथा ततय लिखल जाय जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह
, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे
के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व
वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे
ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव
लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ
, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद
कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग
, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध
ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय
, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क
लिखल जाय, हटा कनहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क
लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ ,  हटा कनहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा
' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

  २. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
२.१. उच्चारण निर्देश: (बोल्ड कएल रूप ग्राह्य):-   
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नै सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग
गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ (उच्चारण)
छथि- छ इ थ  – छैथ (उच्चारण)
पहुँचि- प हुँ इ च (उच्चारण)
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ ऐ सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा ऐमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- ऐ लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ / कऽ हटा कऽ। ऐमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना
छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नै। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए-
रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)।
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो ऐ तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- (उच्चारण संजोगने)
केँ/  कऽ
केर- (
केर क प्रयोग गद्यमे नै करू , पद्यमे कऽ सकै छी। )
क (जेना रामक)
–रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो)
सँ- सऽ (उच्चारण)
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नै। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)।

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ , तऽ , , केर (गद्यमे) एे चारू शब्द सबहक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना, के कहलक? विभक्ति क बदला एकर प्रयोग अवांछित।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ, नइं ऐ सभक उच्चारण आ लेखन - नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नै) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नै- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नै)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नै)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नै)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/ पोछै लेल/ पोछए लेल
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन) पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नै)
ओइ/ ओहि
ओहिले/
ओहि लेल/ ओही लऽ
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक/ (देखिऔक नै- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ / जेकाँ
तँइ/ तैँ/
होएत / हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ/ नै
सौँसे/ सौंसे
बड़ /
बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि), मुदा गाइक दूध (गाएक दूध नै।)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलौं/ समझलौं/ बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नै)
होइन/ होनि
जाइन (जानि नै, जेना देल जाइन) मुदा जानि-बूझि (अर्थ परिव्र्तन)
पइठ/ जाइठ
आउ/ जाउ/ आऊ/ जाऊ
मे, केँ, सँ, पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेसी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ। जेना ऐमे सँ ।
एकटा , दूटा (मुदा कए टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नै। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नै (जेना दिअ
,/ दिय’ , ’, आ नै )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नै दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे/ ऐमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ, नै)
सँ ( सऽ स नै)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
 तै/तइ जेना- तै दुआरे/ तइमे/ तइले
जै/जइ जेना- जै कारण/ जइसँ/ जइले
ऐ/अइ जेना- ऐ कारण/ ऐसँ/ अइले/ मुदा एकर एकटा खास प्रयोग- लालति‍ कतेक दि‍नसँ कहैत रहैत अइ
लै/लइ जेना लैसँ/ लइले/ लै दुआरे
लहँ/ लौं

गेलौं/ लेलौं/ लेलँह/ गेलहुँ/ लेलहुँ/ लेलँ
जइ/ जाहि‍/ जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/
अइ (वाक्यक अंतमे ग्राह्य) /
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/ जीब 
भलेहीं/ भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/ गै 
छनि‍/ छन्‍हि ...
समए शब्‍दक संग जखन कोनो वि‍भक्‍ति‍ जुटै छै तखन समै जना समैपर इत्‍यादि‍। असगरमे हृदए आ वि‍भक्‍ति‍ जुटने हृदे जना हृदेसँ, हृदेमे इत्‍यादि‍।  
जइ/ जाहि‍/
जै
जहि‍ठाम/ जाहि‍ठाम/ जइठाम/ जैठाम
एहि‍/ अहि‍/ अइ/
अइछ/ अछि‍/ ऐछ
तइ/ तहि‍/ तै/ ताहि‍
ओहि‍/ ओइ
सीखि‍/ सीख
जीवि‍/ जीवी/
जीब 
भले/ भलेहीं/
भलहि‍ं 
तैं/ तँइ/ तँए
जाएब/ जएब
लइ/ लै
छइ/ छै
नहि‍/ नै/ नइ
गइ/
गै 
छनि‍/ छन्‍हि‍
चुकल अछि/ गेल गछि
२.२. मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
नीचाँक सूचीमे देल विकल्पमेसँ लैंगुएज एडीटर द्वारा कोन रूप चुनल जेबाक चाही:
बोल्ड कएल रूप ग्राह्य:  
१.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
२. आ’/आऽ
३. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
४. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए
गेल
५. कर’ गेलाह/करऽ
गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
६.
लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/
७. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करैबला/क’र’ बला /
करैवाली
८. बला वला (पुरूष), वाली (स्‍त्री) ९
.
आङ्ल आंग्ल
१०. प्रायः प्रायह
११. दुःख दुख १
२. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
१३. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
१४.
देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
१५. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
१६. चलैत/दैत चलति/दैति
१७. एखनो
अखनो
१८.
बढ़नि‍ बढ़इन बढ़न्हि
१९. ओ’/ओऽ(सर्वनाम)
२०
. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
२१. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
२२.
जे जे’/जेऽ २३. ना-नुकुर ना-नुकर
२४. केलन्हि/केलनि‍/कयलन्हि
२५. तखनतँ/ तखन तँ
२६. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल
२७. निकलय/निकलए
लागल/ लगल बहराय/ बहराए लागल/ लगल निकल’/बहरै लागल
२८. ओतय/ जतय जत’/ ओत’/ जतए/ ओतए
२९.
की फूरल जे कि फूरल जे
३०. जे जे’/जेऽ
३१. कूदि / यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/
यादि (मोन)
३२. इहो/ ओहो
३३.
हँसए/ हँसय हँसऽ
३४. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/ नौ वा दस
३५. सासु-ससुर सास-ससुर
३६. छह/ सात छ/छः/सात
३७.
की  की’/ कीऽ (दीर्घीकारान्तमे ऽ वर्जित)
३८. जबाब जवाब
३९. करएताह/ करेताह करयताह
४०. दलान दिशि दलान दिश/दलान दिस
४१
. गेलाह गएलाह/गयलाह
४२. किछु आर/ किछु और/ किछ आर
४३. जाइ छल/ जाइत छल जाति छल/जैत छल
४४. पहुँचि/ भेट जाइत छल/ भेट जाइ छलए पहुँच/ भेटि‍ जाइत छल
४५.
जबान (युवा)/ जवान(फौजी)
४६. लय/ लए ’/ कऽ/ लए कए / लऽ कऽ/ लऽ कए
४७. ल’/लऽ कय/
कए
४८. एखन / एखने / अखन / अखने
४९.
अहींकेँ अहीँकेँ
५०. गहींर गहीँर
५१.
धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
५२. जेकाँ जेँकाँ/
जकाँ
५३. तहिना तेहिना
५४. एकर अकर
५५. बहिनउ बहनोइ
५६. बहिन बहिनि
५७. बहिन-बहिनोइ
बहिन-बहनउ
५८. नहि/ नै
५९. करबा / करबाय/ करबाए
६०. तँ/ त ऽ तय/तए
६१. भैयारी मे छोट-भाए/भै/, जेठ-भाय/भाइ,
६२. गि‍नतीमे दू भाइ/भाए/भाँइ  
६३. ई पोथी दू भाइक/ भाँइ/ भाए/ लेल। यावत जावत
६४. माय मै / माए मुदा माइक ममता
६५. देन्हि/ दइन दनि‍/ दएन्हि/ दयन्हि दन्हि/ दैन्हि
६६. द’/ दऽ/ दए
६७. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
६८. तका कए तकाय तकाए
६९. पैरे (on foot) पएरे  कएक/ कैक
७०.
ताहुमे/ ताहूमे
 ७१.
पुत्रीक
७२.
बजा कय/ कए / कऽ
७३. बननाय/बननाइ
७४. कोला
७५.
दिनुका दिनका
७६.
ततहिसँ
७७. गरबओलन्हि/ गरबौलनि‍/
 रबेलन्हि/ गरबेलनि‍
७८. बालु बालू
७९.
चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
८०. जे जे’
८१
. से/ के से’/के’
८२. एखुनका अखनुका
८३. भुमिहार भूमिहार
८४. सुग्गर
/ सुगरक/ सूगर
८५. झठहाक झटहाक ८६.
छूबि
८७. करइयो/ओ करैयो ने देलक /करियौ-करइयौ
८८. पुबारि
पुबाइ
८९. झगड़ा-झाँटी
झगड़ा-झाँटि
९०. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
९१. खेलएबाक
९२. खेलेबाक
९३. लगा
९४. होए- होहोअए
९५. बुझल बूझल
९६.
बूझल (संबोधन अर्थमे)
९७. यैह यएह / इएह/ सैह/ सएह
९८. तातिल
९९. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ/ एनाइ
१००. निन्न- निन्द
१०१.
बिनु बिन
१०२. जाए जाइ
१०३.
जाइ (in different sense)-last word of sentence
१०४. छत पर आबि जाइ
१०५.
ने
१०६. खेलाए (play) –खेलाइ
१०७. शिकाइत- शिकायत
१०८.
ढप- ढ़प
१०९
. पढ़- पढ
११०. कनिए/ कनिये कनिञे
१११. राकस- राकश
११२. होए/ होय होइ
११३. अउरदा-
औरदा
११४. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
११५. बुझएलन्हि/बुझेलनि‍/ बुझयलन्हि (understood himself)
११६. चलि- चल/ चलि‍ गेल
११७. खधाइ- खधाय
११८.
मोन पाड़लखिन्ह/ मोन पाड़लखि‍न/ मोन पारलखिन्ह
११९. कैक- कएक- कइएक
१२०.
लग ल’ग 
१२१. जरेनाइ
१२२. जरौनाइ जरओनाइ- जरएनाइ/
जरेनाइ
१२३. होइत
१२४.
गरबेलन्हि/ गरबेलनि‍ गरबौलन्हि/ गरबौलनि‍
१२५.
चिखैत- (to test)चिखइत
१२६. करइयो (willing to do) करैयो
१२७. जेकरा- जकरा
१२८. तकरा- तेकरा
१२९.
बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
१३०. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/ करबेलहुँ करबेलौं
१३१.
हारिक (उच्चारण हाइरक)
१३२. ओजन वजन आफसोच/ अफसोस कागत/ कागच/ कागज
१३३. आधे भाग/ आध-भागे
१३४. पिचा / पिचाय/पिचाए
१३५. नञ/ ने
१३६. बच्चा नञ
(ने) पिचा जाय
१३७. तखन ने (नञ) कहैत अछि। कहै/ सुनै/ देखै छल मुदा कहैत-कहैत/ सुनैत-सुनैत/ देखैत-देखैत
१३८.
कतेक गोटे/ कताक गोटे
१३९. कमाइ-धमाइ/ कमाई- धमाई
१४०
. लग ल’ग
१४१. खेलाइ (for playing)
१४२.
छथिन्ह/ छथिन
१४३.
होइत होइ
१४४. क्यो कियो / केओ
१४५.
केश (hair)
१४६.
केस (court-case)
१४७
. बननाइ/ बननाय/ बननाए
१४८. जरेनाइ
१४९. कुरसी कुर्सी
१५०. चरचा चर्चा
१५१. कर्म करम
१५२. डुबाबए/ डुबाबै/ डुमाबै डुमाबय/ डुमाबए
१५३. एखुनका/
अखुनका
१५४. लए/ लिअए (वाक्यक अंतिम शब्द)- लऽ
१५५. कएलक/
केलक
५६. गरमी गर्मी
१५७
. वरदी वर्दी
१५८. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
१५९. एनाइ-गेनाइ
१६०.
तेना ने घेरलन्हि/ तेना ने घेरलनि‍
१६१. नञि / नै
१६२.
डरो ड’रो
१६३. कतहु/ कतौ कहीं
१६४. उमरिगर-उमेरगर उमरगर
१६५. भरिगर
१६६. धोल/धोअल धोएल
१६७. गप/गप्प
१६८.
के के’
१६९. दरबज्जा/ दरबजा
१७०. ठाम
१७१.
धरि तक
१७२.
घूरि लौटि
१७३. थोरबेक
१७४. बड्ड
१७५. तोँ/ तू
१७६. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
१७७. तोँही / तोँहि
१७८.
करबाइए करबाइये
१७९. एकेटा
१८०. करितथि /करतथि
 १८१.
पहुँचि/ पहुँच
१८२. राखलन्हि रखलन्हि/ रखलनि‍
१८३.
लगलन्हि/ लगलनि‍ लागलन्हि
१८४.
सुनि (उच्चारण सुइन)
१८५. अछि (उच्चारण अइछ)
१८६. एलथि गेलथि
१८७. बितओने/ बि‍तौने/
बितेने
१८८. करबओलन्हि/ करबौलनि‍/
करेलखिन्ह/ करेलखि‍न
१८९. करएलन्हि/ करेलनि‍
१९०.
आकि/ कि
१९१. पहुँचि/
पहुँच
१९२. बत्ती जराय/ जराए जरा (आगि लगा)
१९३.
से से’
१९४.
हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
१९५. फेल फैल
१९६. फइल(spacious) फैल
१९७. होयतन्हि/ होएतन्हि/ होएतनि‍/हेतनि‍/ हेतन्हि
१९८. हाथ मटिआएब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटियाएब
१९९. फेका फेंका
२००. देखाए देखा
२०१. देखाबए
२०२. सत्तरि सत्तर
२०३.
साहेब साहब
२०४.गेलैन्ह/ गेलन्हि/ गेलनि‍
२०५. हेबाक/ होएबाक
२०६.केलो/ कएलहुँ/केलौं/ केलुँ
२०७. किछु न किछु/
किछु ने किछु
२०८.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ/ घुमेलौं
२०९. एलाक/ अएलाक
२१०. अः/ अह
२११.लय/
लए (अर्थ-परिवर्त्तन) २१२.कनीक/ कनेक
२१३.सबहक/ सभक
२१४.मिलाऽ/ मिला
२१५.कऽ/
२१६.जाऽ/
जा
२१७.आऽ/
२१८.भऽ /भ’ ( फॉन्टक कमीक द्योतक)
२१९.निअम/ नियम
२२०
.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२२१.पहिल अक्षर ढ/ बादक/ बीचक ढ़
२२२.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
२२३.कहिं/ कहीं
२२४.तँइ/
तैं / तइँ
२२५.नँइ/ नइँ/  नञि/ नहि/नै
२२६.है/ हए / एलीहेँ/
२२७.छञि/ छै/ छैक /छइ
२२८.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२२९. (come)/ आऽ(conjunction)
२३०.
आ (conjunction)/ आऽ(come)
२३१.कुनो/ कोनो, कोना/केना
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि-गेलनि‍
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ-कएलहुँ/केलौं
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/आ। आब'-आब' /आबह-आबह
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ- घुमेलाें
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/ होन्हि/
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५
.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौं
/ ज्योँ/ जँ/
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो/ कोनहुँ/
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कोना/ केना/ कन्‍ना/कना
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलनि‍/
गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि/ केलनि‍/
२५८.लय/ लए/ लएह (अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक/कनी-मनी
२६०.पठेलन्हि‍ पठेलनि‍/ पठेलइन/ पपठओलन्हि/ पठबौलनि‍/
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नै/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह (बिकारी) क प्रयोग उचित
२६५.केर (पद्यमे ग्राह्य) / -/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत/
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१
.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक/पि‍येबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह/ औताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जइ/ जै/
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जअए/ जए (लालति‍ जाए लगलीह।)
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै/ तइ
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलौं/ कहै छलौं- अहिना चलैत/ पढ़ैत
(पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित) - आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझै छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/ सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/ बिन। रातिक/ रातुक बुझै आ बुझैत केर अपन-अपन जगहपर प्रयोग समीचीन अछि‍। बुझैत-बुझैत आब बुझलि‍ऐ। हमहूँ बुझै छी।
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट/ भेँट
२९१.
खन/ खीन/  खुना (भोर खन/ भोर खीन)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/ गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नै अछि। वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८
.वाली/ (बदलैवाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
३००. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (
भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६. (come)/ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, यथासंभव बीचमे नै।
३०९.कहैत/ कहै
३१०.
रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच/ कागत
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...