Sunday, October 30, 2011

'विदेह' ९२ म अंक १५ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९२) PART IV


१. नवीन ठाकुर २.रमा कान्त झा



नवीन ठाकुर, गाम- लोहा (मधुबनी ) बिहार, जन्म -१५-०५-१९८४, सिक्षा - बी .कॉम (मुंबई विद्यापीठ)
रूचि - कविता , साहित्यक अध्यापन एवं अपन मैथिल सांस्कृतिक कार्यकममेरूचि। कार्यरत - Comfort Intech Limited (malad) (R.M. )

()

अंत --------(एक अनुभूति )
आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान
आब किएक नै करैत अछि कियो हरान
थमि गेल सभटा उजड़ि गेल सभटा
रुधिरक प्रवाह रुकल छूटल प्राण
आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान !
देहक पीड़ा , अस्थिक जकरण
नै छी आब कथू सँ परेशान
अछि ने अन्हार  नै इजोत
सभटा बुझी पड़ैए एकै सामान
आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान !
व्यंजन नाना प्रकारक बनल
तैयो बुझी पड़ैए मोन अछि भरल
नै कोनो ललसा नै कोनो लोभ
कथी पर करब आब ओतेक शान
आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान !
कतऽ अछि आब लहर  उमंग
ठहरि गेल जिनगी शिथिलताक संग
नै कोनो लाज नै कोनो शर्म
नै कोनो हकीकत नै कोनो भ्रम
नै अछि अंगना हमर नै अछि दलान
आब कतऽ अछि जिनगी कतऽ अछि जान !
(  )
अनुभव ..........

जे कियो नै रहल हेता असगर
हुनका की मालूम जे की छिऐ डर-  अनुभव
की छिऐ सम्वेदना की छिऐ अकेलापन
ख़ामोशी , सरसराहट , आहट, सूनापन
भरोसा कोना हेतैन अपना आप पर
जे कियो नै रहल हेता असगर !
ऐनामे मुँह नै देखने हेता ओही रुपे
नै पहचान हेतैन अपन स्वरुप के.....
एक जिन्दा सुगबुगाहटक तलाशमे
सुतलोमे.... नै जगेने हेतैन ....बिस्तर
जे कियो नै रहल हेता असगर !
हुनका की मालूम जे की छिऐक दूर सँ
अबैत आटा चक्कीक ह्र्द्य- कम्पन .... पुक-पुक,
 जेठक दुपहरियामे चिल्का के.. हकरब
टुक -टुक तकैत बगरा केँ देखैत ....आकि
अंगनामे पथार गौह्मक - मरुवाक पसरल
जे कियो नै रहल हेता असगर !
हुनका की मालूम जे की छिऐ डर-  अनुभव ! !

 
एखुनका मास्टरक व्यथा

सोचलहुँ अध्यपक बनि कऽ हमहू ड़ेंगाएब दिन राति...!
मुदा मोनक भरम छल ई जखने स्कूल पहुचलौं
देख विद्यार्थी हँसऽ लागल पुछलक कोन गृह सँ एलौं!
एगो विद्यार्थी ठाढ़ भऽकऽ सुनबऽ लागल खिस्सा ........!
अहाँसँ पहिने जे मास्टर छल हुनकर की भेल दशा !!
एगो विद्यार्थीक गलती पर देलखिन डंडा मारि .....
तेहन उछन्नर देलियनि हुनका भगलथि मानि कऽ हारि!
अहाँ जनि एहन गलती करब नै करब एहन शैतानी
नै तँ दइये दिनमे सभ मिल कऽ याद परा देब नानी ...!
कल जोरि कहिलिऐ, बौआ नै अहाँक कोनो दोख
ई परिवर्तन पहिने लवितहुँ तँ हमहूँ रहितौं निधोख .....!
हमहूँ रहितौं निधोक लितौं  डंडा चारि  बीत.....!
तोड़ितहूँ दुनु टांग मॉसटरबा क फेर जिनगी मंगबितहूँ भीख...!!

 
 
रमा कान्त झा, सौराठ मधुबनी (बिहार )


!!!देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात !!!

देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात,
चारा खा गेल मानुस कुपात,
हवा पीगेल राजा ,कोना बहत बसात ,
खेल बना देल तमासा ,
सिनेमा घरमे लागि गेल सिला के जबानी ,
  बनि सर्वस्व, जेल के बनि बसी ,
नर्तक भेल  जनता ,
गैस तेलपर चालक डंडा ,
बिजली रानी बरी सियानी ,
चूपेसँ लगेलक झटका ,
देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात!!

देलही बनल ददल के आड़ा ,
राजनीत के खोदल खड़ा ,
जनता नोर पोछि रखत दुपट ,
टोकी कपार सौँसे राखी सिलबटिआ ,
राजनीतिक नेता सभक अपना बाटा,
देखू भर्ष्टाचारक बहल बसात ,
ओकर किसानसँ नाता ,
लोनइहर सभ कटै बैंकक चक्र ,
भासल जनता बनल मुँह तक ,
मुख्य मंत्री बनि ,
नेनोमे देल टाटा केँ  टकर ,
भाषण देय भऽ गेली महरानी ,
सिंगुर केँ बना देल सुन्दुर  कहानी ,
रोजगार सभ भेल चौपट ,
भाषण देल फटाफट  फेर टाटा ,
आब ने आयत फेर टाटा ,
 बनल फ़िल्मी एक्टर ,
 बनल फ़िल्मी डाइरेक्टर ,
दुनु कहल एक्सन बनल तिहार जेल सलेक्सन ,
 सुन बन जीवन हमर ,
बाबूक नै चलल कुनु कनेक्सन
देखू भ्रष्टाचारक बहल बसात !!


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

१.डॉ॰ शशिधर कुमर  किशन कारीगरनवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर                                    
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                    
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
     

        डॉ॰ शशिधर कुमर                                    
एम॰डी॰(आयु॰) कायचिकित्सा                                    
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४
 
सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत)
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ  नञि हो मिसरी ।
करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा,
                          पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।।


भाषा जे  पशु सँ  भिन्न केलक,
भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक ।
रटि  दोसर  बोली, बनि  सुग्गा,
                          अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


हो सारि  प्रियसरहोजि  प्रिय,
पत्नी  केँ  राखी  सटा   हृदय ।
पर अछि अस्तित्व जनिक कारण,
                          अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


माएक  भाषा , अप्पन  भाषा ।
मिथिला भाषा, अप्पन भाषा ।
परहेज  किए  एहि  भाषा सँ ?
                          आउ एहि पर हम सभ गर्व करी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।
         गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर (गीत)  


कमल नयन लखि,
               मधुर वयन सुनि,
                              हुलसित मन ई चकोर ।
                                              गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।
       
हमरा  एते  तोँ जुनि तरसा गे ।
अपन अधर मधु रस बरिसा दे ।
                           जुनि बन तोँ एतेक कठोर ।
                      गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।

बोल - सुबोल  हृदय  उद्‌बेधल ।
तोहर सरिस दोसर नञि देखल ।
                          उर अन्तर उठय हिलोर ।
                     गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।

कोयली जदपि सातहु सुर सीखल ।
तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल ।
                            मधु भरल छौ पोरे पोर ।
                     गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।



  
          हम नञि कहब कि ......... (गीत)

हम नञि कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ,
हमर जिनगी केर स्वप्न ओ ताज”  छी अहाँ ।
मुदा जिनगीक एकसरि  अन्हरिया मे विकसित,
सुन्नर      सुमधुर   प्रभात   छी  अहाँ ।।

हम नञि कहब कि सुष्मितासँ नीक छी अहाँ,
ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी  अहाँ ।
अहाँ  नञि  चाही  हमरा   इच्छा   अहँक,
मुदा अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।।

किछु  अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर,
एक  कवि  केर   दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा ।
अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब,
अहँक   चाहत    रखबाक    हमर   हस्ती    कहाँ  !!
 
बनि जयतहुँ हम बच्चा (गीत)

आइ  अनायसहमर  मोन  मे, सुन्नर  सनि  एक  इच्छा ।
                     ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

सरस  बसन्तक अबितहि  भोरेबीछय जयतहुँ  टिकुला ।
बिनु  मजड़ल, आमक झाँखुड़ तर, टाँगि लगबितहुँ हिड़ला ।
दैत्यक  पहड़ाजेठ - दुपहरियापर  लोभेँ  बम्बईय्या ।
बौअइतहुँ  गाछी कलमेँ, पाबितहुँ  मालदह कलकतिया ।
पाकल पीयर लाल  बैड़ हम, जेबी भरि भरि  अनितहुँ ।
लिच्ची जामुन आओर जिलेबी, किछु खयतहुँ, संग लबितहुँ ।
भूत पड़ेतक डऽर तऽ, चलि  जयतय   पड़ाय  कलकत्ता ।
                      ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

साओन मास - पहिल वर्खा , बम्मा  सँ खसइत झड़ झड़ ।
जाय  नहयतहुँ, जेना  पहाड़क, कल - कल सुन्नर निर्झर ।
सण्ठी  केँ  धुधुआय   बनबितहुँ,   सिगरेटक  हम  नाना ।
घूर  मे  दऽ  अधखिज्जू  आलू तकर  बनबितहुँ  साना ।
चोड़ा नुकानिज माए बाप सँजयतहुँ  दौड़ल भोड़हा ।
कोमल - हरियर - कञ्च बदाम, उखाड़ि  बनबितहुँ ओड़हा ।
फलना  केँ  रखबाड़  पकड़लकभेल  गाम  भरि  चर्चा ।
                      ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

दुर्गापूजा छठि - दिवाली,   पावनि   तीन   सहोदरि ।
मास दिवस इस्कूल दरस नञि, पावनि सम नञि दोसर ।
की भसान केर  छल उमंगकी सुन्नर हुक्का लोली ।
खेल  कबड्डी किरकेट - गोलीखेली  नुक्का चोरी ।
चौठ चन्द्र, मिथिलाक विशेषीकृत पावनि अति अनुपम ।
भाँति भाँति पकवान देखिबढ़ि जाय  हृदय स्पन्दन ।
घण्टा घण्टा बन्शी  पाथितहुँरोहुक  आश  लगओने ।
रोहु बोआरि ने, पोठी  दू टाअबितहुँ  हाथ डोलओने ।
बन्शी लऽ घुमितहुँ भरि दिनपोखड़ि डाबर ओ खत्ता ।
                      ओ बीतल दिन आपिस चलि अबितय, बनि जयतहुँ हम बच्चा ।।

 
         आबहु मिता छोड़ू (गीत)

गोल गोलैसी, पर पञ्चैती ।
गप्प  अनेरोककानाफुसकी ।
                         आबहु मिता छोड़ू ।
दुनिञा देखू दौड़ि रहल अछि, अपने घसड़ब छोड़ू ।
                 हे यौ , अपने घसड़ब छोड़ू ।।

कमजोरहा  पर  देखबी  धाही ।
पुस्त - पुस्त केर करी उखाही ।
बात बात  पर लट्ठ - लठैती ।
घऽरे  फनफनबाहर   लाही ।
बड़ बुत्ता जँ, अहँक देह मे,  नूतन सर्जन कऽरू ।
               हे यौ ,  नूतन सर्जन कऽरू ।।

ओ केलन्हि, से नीक ने कएलन्हि ।
फलना जिनगी व्यर्थ गमओलन्हि ।
मुइलहा   सारा   कोरि  भर्त्सना ।
सकल  अकारथ   हुनक  सर्जना ।
आनक कृत्य अकृत्य अतीते, अहीं नीक नव गऽढ़ू ।
                 हे यौ , अहीं नीक नव गऽढ़ू ।।

ओ जिनगी भरि  कयल ऊकाठी ।
आम  खेलक  आ देलक  आँठी ।
आब  नरक सँ  देखथु  टकटक ।
हम्मर   बोझा , हुनिकर  आँटी ।
रोपल आन बबूड़, गलत छल, अहीँ काँट जुनि रोपू ।
                  हे यौ , अहीँ काँट जुनि रोपू ।।

दऽड़ दड़बज्जा, चौक चौबटिया ।
व्यर्थक  गप्प, अनर्गल  चर्चा ।
एकर फूसि, ओकरा केँ लाड़णि ।
अपन मजा लेऽ अनका चाड़णि ।
अपन समय बहुमुल्य नाश कय, अनका दोष ने मऽढ़ू ।
                    हे यौ , अनका दोष ने मऽढ़ू ।।

 
      अरिकोंच (कविता)
हरियर  बड़का बड़का पातदेखू  कत्तेक सुन्नर लाग ।
ऊगय  अपनहि आपपनिगर  खत्ता - बाड़ी - झाड़ी ।।

केओ  “अरिकञ्चन”  कहय,   हऽम  कही  “अरिकोंच
अहाँ   “अरकान्चू”   बुझूस्वाद  एक्कहि  मनोहारी ।।

पात पिठार  संग बान्हल, सरिसो  तेल चक्का  छानल ।
नेबो  खूब दए झोड़ाओल, पड़िसल तीमन  सोझाँ थारी ।।

संगहि भात  वा  सोहारी, झँसगर अरिकोंचक  तरकारी ।
लागय  भकभक तइयो नीकएकर  महिमा छी भारी ।।

गामक बच्चा बच्चा  जान, शहरक  अलखक   चान ।
जे अछि खएने - सएह बूझयआन तीमन पर  भारी ।।


लागय  किनको  जँ  फूसिवा हो मन मे  जँ  झूसि ।
चीखि   देखू   एक  बेर लागत   मन  मे  पसारी ।।


 
किशन कारीगर


नोर झहरि रहल छल।

बहिन उठि नैहर सँ सासुर बिदा भेलीह
बपहारि काटि कानि रहल छलीह
हमहू बाप बाप कानि रहल छलहुँ
आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल।

माए गे माए भैया औ भैया
एसगर हम आब जा रहल छी
भरदुतिया मे आएब अहाँ
एतबाक आस लगेने हम जा रहल छी।

छूटल नैहर केर सखी बहिनपा
आब मोन पड़त सब साँझ भिंसरबा
छूटल बाबू केर दुअरिया
डोली उठा ल चल हो कहरबा।

जाउ जाउ बहिन जाउ अहाँ अपना गाम
भरदुतिया मे आएब हम अहाँक गाम
माए हमर पुरी पका कए देतीह
हम नेने आएब चिनीया बदाम ।

जुनि कानू बहिन पोछू आखिक नोर
आब सासुर भेल अहाँक अप्पन गाम
सास ससुर केर सेबा करब
व्यर्थ समय गमा नहि करब अराम।

जेहने अप्पन माए बाप
तेहने सास ससुर
नहि करब कहियो झग्गर दन
लोक लाज केर राखब धियान।

भैया यौ भैया अहाँ ठीके कहैत छी
नहि करब हम केकरो स झगरदन
सभ सँ मिली जुलि के हम रहब
गृहलक्ष्मीक दायित्व केर करब निरवहन।

मुदा कोना क कहू औ भैया
छूटल नैहर बिदा भेल छी सासुर
माए कनैत अछि बाबू के लगलैन बुकोर
टप टप झहरि रहल अछि आखि सँ नोर।

धैरज राखू बहिन जाउ एखन अपना गाम
राखि मे चलि आएब नैहर बाबू केर गाम
हसी खुशी सँ गीत गाएब
सभ सखी मिली समा चकेबा खेलाएब।

सभ के प्रणाम क बहिन बिदा भेलीह
मुदा स्नेह स कानि रहल छलीह
दुनू भाए बहिन कानि रहल छलहु
आखि सँ टप टप नोर झहरि रहल छल।



नवीन कुमार "आशा"
करेजक प्यास
करेजक तूँ छँ प्यास
ने जँ देखि तोरा प्रिय
 ने लागे किछु नीक
तोरा लेल जतबा कहू
ओ होयत कम !
ने हमरा छल आस
जकर करी आरती
ओ बनत प्राणप्रिय
करेजक ...............!
ने करेज कहल माने प्रिय ,
ने चित अछि स्थिर
आजुक राति जुनि करु लाज
बस बनि जउ एक दोसरक साज
करेजक तूँ.............!
सजनी जुनि मुनियौ अपन नयन
आशा बनाओत ओकरा दरपण ,
ठोर जखन ठोरमे मिलै
मौधक ओ एहसास देइत अछि
करेजक...
मृगनयनी हे रुपवती
कते कहू अहाँक बारमे,
आजुक राति जे देखल तोरा
नवीन अंग गेलौं सिहरि
करेजक..............!
आब कते करु तोहर बखान
प्रिय चलू करी मिलान ,
आजुक राति ली हम कसम
देब अहँक जीवन धरि संग
करेजक तूँ छँ प्यास
परी छी

परी छी अहाँ नील गगनक नैन छी चैन..
इजोरियाक छी चाँद दीपक छी ज्योति ..
तनक छी खुशबु होंठक छी मौध
सदिखन देखि अहींक स्वप्न कि हमर बनब दर्पण..
प्रियशी कखन आएब अहाँ कहिया तक सताएब अहाँ
परी छी अहाँ .....
...
नैनमे अछि अहींक स्वप्न अहाँ बिनु जीवन अछि तंग..
करुणा संग विनति करियो गे ने तुँ पहुँचबिए ठेस ...
ने तँय आशा जिबैत मरि जाएत मरलो बाद घुरि  आओत
तोरा अपन सजनी बनाओत...परी छी अहाँ नील गगनक....


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार डा0अरुण कुमार सिंह


रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदारक गीत आ झारु।
रामदेव प्रसाद मण्‍डल झारूदार

झारू-
सत् कर्मसँ ऐ दुनि‍याँमे।
शान्‍ति‍क संग सुख छै कुल।।
असत् संग संगति‍ करबै तँ।
जीवन गुजरत बनि‍ कऽ शूल।।
गीत-1
सत् मे अटल रहू बाबू।
सत्तक सुखमे देर छै।।
असत् अज्ञान नरक केर भागी।
ई जीवन अन्‍धेर छै।।

जीवन डगरमे सत् करू संि‍चत।
बि‍तै नै पल सतसँ वंचि‍त।।
छोड़ि‍ असत जे सतमे जीबए।
से दुनि‍याँमे शेर छै।।
असत.....................।
असत छोड़ि‍ जे सत् नै धरै छै।
दुक्‍खक घर नरकमे परै छै।।
सत छोड़ि‍ असतमे जीबए
तकरा तँ दुख ढेड़ छै।।
असत...................।
सत डगरमे फुले-फूल छै।
डगर असतमे भरल शूल छै।।
जे परल अज्ञान अंधेरा।
ई बुझैमे फेर छै।।
असत.................।


झारू
हि‍न्‍दु मुश्‍लि‍म सि‍क्‍ख इशाई।
एके गाछक सभ फूल यौ।।
एके प्रकृति‍ सभकेँ रचलकै।
दु बुझनाइ छी भूल यौ।।

गीत-
जाइत धर्मक सीमा तोरू।
मानवसँ मानवकेँ जोरू।।
जब एकटामे सभ मि‍ल जुड़बै।
देश हेतै मृदुल यौ।।
एके................।
जगत गुरूवार सभ रचना केलकै।
मेल एकताक मंतर देलकै।।
जन जोरू जन फोरू बैनक।
सभकेँ चटाबै धुल यौ।।
एके..........।
झुठ-फुसक आइर बनल छै।
अपनो भैया गैर बनल छै।।
अर्थक अनर्थ लगा कऽ।
देशकेँ भोंकै छी शूल यौ।
एके.........।


 
डा0अरुण कुमार सिंह
प्रियवर सम्पादकजी

प्रियवर सम्पादकजी
यथोचित
अहिना सम्पादकीय लिखैत रही
मने-मन हर्षित होइत रही
सत्यसँ भेंट करैत रही
शब्दक अर्थ बुझैत रही
गरल मुर्दाकेँ उखारैत रही
नव-नव इतिहास बनाबैत रही
मिथिला,मैथिली एवं मैथिलकेँ परिभाषित करैत रही
युग-युगसँ परिव्याप्त गलतफहमीकेँ सुधारैत रही
परिवारवादसँ मैथिलीक रक्षा करैत रही
वर्त्तमान् क कुचक्र चालिक पर्दाफाश करैत रही
मैथिलीक हत्याराकेँ सजा दियाबैत रही
मैथिल,ननमैथिल एवं सोइतक झगड़ाक फरिच्छोंठ करैत रही
मैथिलीक आवाजकेँ जनता-अदालत धरि पहुँचाबैत रही
आक्रोषितक आक्रोषकेँ आशीर्वचण बुझि अपनाबैत रही
मैथिलीकेँ लहटा दिस जएबामे मदति करैत रही
मैथिलीक प्रकाण्ड विद्वान प्रोफेसरकेँ शुद्ध- शुद्ध उच्चारण सिखाबैत रही
कब्रमे लटकल पाइरकेँ अपन प्रतिष्ठा बचैबाक पाठ पढबैत रही
अवसरवादीक अवसरवादिताकेँ बाँचैत रही
वैशाखी छोड़ि अपना बलेँ खाड़ होइत रही
मिथिलाक्षरकेँ पुनरस्थापित करबाक प्रयास करैत रही
विधि, विज्ञान,वाणिज्य एवं नव-नव प्रौद्योगिकीक संग मैथिलीकेँ जौड़ैत रही
मिथिला,मैथिलीक विकासमे सदति लागल रही
सम्पूर्ण विश्वमे अपन स्थान निर्धारित करैत रही


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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण.इरा मल्लिक ५.राजनाथ मिश्र
.
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लन्दनमे रहै छथि।

दीयाबाती



२.श्वेता झा (सिंगापुर)

३.गुंजन कर्ण  राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि।www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।

४.
इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।

५.
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/  )

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद

३.
बिपिन कुमार झा-श्री देवब्रत बसुक संस्कृत कथाक मैथिली अनुवाद
सुख केँ मृगमरीचिका बुझू।
 [एहि कथा[1] केर अनुवादक बिपिन कुमार झा राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानितविश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभाग मे अध्यापनरत छथि। कोनो प्रकारक टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर अपेक्षित]
[1] बालबोधिनी, अनूदित कथा, मूल संस्कृत लेखक श्री देवब्रत बसु

कोनो राजा अपन वृद्धावस्था मे अपन बेटा के राज्यक भार दय के स्स्वयं जंगल दिस तपस्या करबाक हेतुअ प्रस्थान कयलथि। बाटहि मे कोनो तेजस्वी पुरुष सऽ भेंट भेलन्हि। राजा हुनका नम्रता पूर्वक नमस्कार केलथि। ओ तेजस्वी पुरुष पुछलथि हे राजा ! आई नहिं  त अहाँक संग कोनो सैइक अछि नहि तऽ कोनो राजचिह्न! न रक्षक , न घोडा। एना असगरेअ कतय जाइत छी?
राजा बजलाह- महोदय! संसारमोह के छोडि कें जंगल जाइत छी।
तेजस्वी कहलथि- की अहाँ केर निश्चय दृढ अछि? क्रोध सँ, अपमानित भय के, उपेक्षित भय के, पराजय मे अधिक हानि प्राप्त कय के कदाचित् संसार त्याग करबाक मन करैत अछि। किन्तु बितैत समय केर संग स्वयं के संसार मे सामंजस्य बनेबाक लोक प्रयास करैत अछि। अहाँ तऽ ओहि प्रकारक नहि छी जे हारि मानि ली?
हे महात्मा! हम उत्तम राजवंश मे उत्पन्न भेलहुँ। हमर बहुतो रानी सन्तान छथि। हम बहुतो इनार आ पोखरि खुनाओल। पूजा व्रत आदि बहुत कयल। बहुतो  देश जितलहुँ। विद्यालय आ चिकित्सालय सेहो प्रतिष्ठापित करायल। किन्तु कतहु हमरा सुख नहिं भेटल। एकर की कारण?
कनिक काल रुकि के ओ तेजस्वी नजदीके मे विद्यमान नीमक गाछ देखा के बजलाह- हे राजा! ई नीमक गाछ  तीते टा होइत अछि। प्रार्थना सँ, दान सँ, पूजा सँ की एकर मधुर फल प्राप्त कयल जा सकैत अछि? संसारो अही नीमक गाछ जँका अछि। ओ मृगमरीचिका अपना सभ के एम्हर स ओम्हर  घुमबैत अछि। मृत्यु नजदीक एलाओ पर सुख नहि भेटैत अछि। सत्कर्म आ अनुष्ठान सँ, भगवान केर धान सँ, शरणागति सँ सुखक आशा रखबाक चाही न कि अन्य प्रकार सँ।
दोसरे क्षण ओ तेजस्वी नहिं देखाई देलथि। भगवाने वस्तुतः हुनक तत्त्व बुझेबाक हेतु एहि रूप आयल छलाह ई सोचि राजा डेग आगू बढवैत भगवान केर स्मरण करैत बढि गेलाह।



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बालानां कृते
१. डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह २. इरा मल्लिक ३.कुन्दन कुमार ४.कैलाश कामत

डॉ॰ शशिधर कुमर विदेह”                                
एम॰डी॰(आयु॰)  कायचिकित्सा                                   
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी  प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) ४११०४४,

                    चन्ना मामा (बालगीत)


दियाबातीक समय थिक । किछु छोट क्षिण धिया पुता केर मित्र मण्डली जमा अछि । ओ सभ एतबहु छोट नहि कि किछु नञि बुझल होइ । ओकरा सभ केँ ई तऽ बुझल छै कि रॉकेट नामक कोनो चीज़ होइत छै जे चान पर जा सकैत अछि आ मनुक्खो केँ लऽ जा सकैत अछि । ओकरा सभ केँ ईहो बुझल छै कि फटक्का मे रॉकेट नामक एकटा फटक्का होइत छै जे अकाश मे उड़ैत छै । पर ओ सभ एतबो पैघ नञि कि सभटा बात बुझले होइ । ओकरा सभ केँ ई नञि बूझल जे फटक्का वला रॉकेट नञि तऽ अपनहि चान पर जा सकैत अछि आ नहिञे ककरो चान धरि लऽ जा सकैत अछि । अपन घऽरक पैघ सदस्य द्वारा आनल फटक्का वला रॉकेट केँ देखि कऽ ई अबोध धिया पुता सभ की की कल्पनाक उड़ान भरैत अछि से एहि बाल गीत मे वर्णित अछि । देखल जाए :-

चल रॉकेट !  उड़ान भर ।
लऽ चल हमरा चान पर ।
चन्ना मामा शोर करै छथि, बैसल आसमान पर ।।

मामा भेटथिन्ह, मामी भेटथिन्ह ।
नाना भेटथिन्ह, नानी भेटथिन्ह ।
नाना सँ खूब खिस्सा सुनबै, सूतए काल दलान पर ।।

मामा  संगे  सौंसे  घुमबै ।
दुर्गा - पूजा  मेला  देखबै ।
नटुआ नाच, सिनेमा, नाटक, देखबै दुर्गा थान तर ।।

कचड़ी खएबै, मुरही खएबै ।
रसगुल्ला  बलुसाही खएबै ।
चूड़ा दऽही गरम जिलेबी, नथुनी साव दोकान पर ।।

ओहि ठाँ माएक दूध भात नञि ।
ओहि ठाँ बाबू, बहिन, भाए नञि ।
ओहि ठाँ हम ने रहबै हरदम, घुरि फेर अएबै गाम पर ।।
 
इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।
माँ!!!!

माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना!
खेलब मोन भरि,
नहि उत्पात मचायब,
नहि पसारब आब,
हम कोनो घेउना,
माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना।
 
ना ना नहि करू,
जिद अहाँ छोड़ू, 
आनि दिअ कनी सुंदर सुन्दर, 
भालू, बन्दर, खग, मृग छौना,
माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना।
 
जाउ बजार अहाँ जल्दी सँ,
करु नहि देर ,
हमरो सँग लS लिय,
रिमोटवाSल्ला ओ मोटर गाड़ी,
हवाइ जहाज किनू,
होइ महग या भारी,
बैटरीवाला मोटर-बोट हो,
हाथी .घोड़ा,या गुड़िया छोट हो,
ढोल, मजीरा,ड्रम, कैसियो,
जे पसंद हुअए अहाँकेँ मैया,
कीनि दिअ नहि ताकु रुपैया,
माँ हमरो कीनि दिअ खिलौना।

लेकिन माँSS!
नहि चाहि हमरा,
बंदूक ,रायफल, तीर, कमान,
खेल खेल मे हम नहि सीखी,
हिंसा सनके पाप ,
हम छी भारतमाँक सपूत,
हमरा भरS के अछि ,
बड्ड ऊँच उडान ,
जन जनक रच्छा कS सकी,
देशक कय सकी कल्यण,
देश मे आनी खुशहाली, 
बालपन क,
खेल खेल मे.
पूर्वाभ्यास एकर कS ली,
माँ! हमरो कीनि दिअ खिलौना।

कुन्दन कुमार
आँखि झूठ नै बजैत अछि,
राज हृदयक आँखि खोलैत अछि।
पुछलिऐ कतेको बेर, 
ऐ दिल!
कनी बताउ हमरा,
ओ कोन घड़ी छल,
ओ केहेन पल छल!
जहि पल मे ,
हम दS देने छलहुँ,
अहाँ केँ,
आन क हाथ,
करु नै धोखा,
नहि करु प्रपंच,
बता दिअ हमरा, 
हृदय हारैक कारण!
नीलामी तेँ नै लगा कऽ,
बैसल छलहुँ हम,
हाय लटकि गेलहुँ हम,
ई केहेन फंदा मे,
अनजान सफर अछि.
अनजान अछि रास्ता,
मंजिलक कोनो ठेकान नै,
चलल जा रहल छी हम कतय,
तैयो!
 
हमरा लए,
तीख रौद रहितो,
मस्त पवनक झकोर बुझि.
मोन सँ कहैत छी,
सुहाना सफर अछि अपन,
कहैत छैक,
चलनाइ जीवन थिक,
निरन्तर, लगातार, अनवरत!
 
४.

कैलाश कुमार कामत,  पि‍ताक नाओं- श्री गंगाराम कामत , माताक नाओं- श्रीमती सुनीता देवी, गाम- बेरमा, भाया- तमुरि‍या , थाना- मधेपुर, जि‍ला- मधुबनी , (बि‍हार)

 
मधुबनी जि‍लाक बेरमा गामक मध्‍य वि‍द्यालयमे पढ़ैत कैलाश कामत, सातमाक छात्र छथि‍ बड़ लगनसँ फोटो बनबै छथि‍।


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 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...