Sunday, October 30, 2011

'विदेह' ९२ म अंक १५ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९२) PART III


३. पद्य














१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी


श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी  राजेन्द्र मिश्रमहाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री,आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी  दिल्ली स्कूल ऑफइकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक  समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनीछथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी  एकटासमाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु  खास कऽमहिलाजन्य सामाजिक समस्या  प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।

गज़ल

क्षणे मे एना कोना अजबे क्षनाँक भऽ गेलय 
सुतली बुढ़ी क्षणे मे कोना टनाँक भऽ गेलय 

ई देह आकि प्राणोक छैक गजवे महत्तम 
हँसैत-खेलैत साँस क्षणे मे जाँक भऽ गेलय 

निरोग बुढ़ीकेँ मरै मे छैक किछु गरबर
की कहुँ जखन जनमले बुराँक भऽ गेलय 

कुटौन-पिसौन कैय बुढ़ी बेटाकेँ पोसलैनि 
वैह माय बेटाक लेल दम नाँक भऽ गेलय 

बच्चा मे बेटा सभ तेँ रहै बड़ सुसंसगर
आंखि-पांखि भेलै बेटा सभ उराँक भऽ गेलय 

बुढ़ी केँ बेटा सभ सेँ रहै बड़ बड़ सेहन्ता 
हुनक सभटा लिलसा फाँक -फाँक भऽ गेलय 

"
शांतिलक्ष्मी"केँ शंके भेनय कहियौ की बजती 
दुनियाँ बड्ड दुष्ट जालीम चलाँक भऽ गेलय
पुत कपुत एना हेबै तँ कोना चलतै
माय विदेह केँ कनेवै तँ कोना चलतै

माय मरै भुक्खे, पड़ै अहाँकेँ की अंतर
मोन केँ ऐना जँ बौरेबै तँ कोना चलतै

परदेस भल्हौं होइ अहाँ मुँहपुरुख
निजदेस सँ जँ परेलै तँ कोना चलतै

मानलौं माय भेली पिछिता अहाँ अधुना
माय केँ तेँ दुतकरवै तँ कोना चलतै

पड़ोसी भेली धनुखैनि माय दलिदर
तेँकि माय केँ जँ छोड़वै तँ कोना चलतै

अपनाकेँ खोरनाठी अनका सिक्कीपंखा
ई दुई रीत जँ चलेबै तँ कोना चलतै

माय-बापे सँ होइ छै सुजन परिचय
माय-देसक नै ठेकानै तँ कोना चलतै

बुझलौ जे रोटी लेल छै ई सभ चटुता
कर्ज दुधेक नै चुकेवै तँ कोना चलतै

अपना मोने मे छै नीति अनीतिक रीत
पुत सुमातेक बोहेतै तँ कोना चलतै

"
सभ्य"केर कुभाखा मोन केँ लागै सुन्दर
भाखा मैयेक जँ हरेलै तँ कोना चलतै

भाखा आन खेलकै कतै सरकारी टाका
मैथिलि खैरातो बिलोलै तँ कोना चलतै

"
शांतिलक्ष्मी" कहती अहाँसँ बस एतबे
स्वगौरव अहीं दबेबै तँ कोना चलतै


.................
वर्ण १५...............
 
मैथिलिये केँ सभ दिन तँ खोरि-खोरि खाइत छी 
तैयौ हुनके सेवा मे एना कियै नितराइत छी 

जे दिये दही-चुरा दिस तकरे के राखै छी नीति 
अपना मुंहेँ सैह बाजय मे किये चोराइत छी 

जाधरि खेलौ ताधरि गेलौ के रखने छी नियत 
राखिकेँ भरि मुंह मधुर कियै गोंगियाइत छी 

बुझलौ जे पाग बदलै मे अछि बड्ड चट्टकैति 
अछि सभ तेँ बुझिते तखन कियै औनाइत छी 

पैर छुबि-छुबि सभ दिन बढ़लौ ये अहाँ आगु 
सत कही तेँ हमरा पर कियै खिसियाइत छी 

निकाललौ बेगरता तँ टीक पकड़ै के आदत 
कियै घाट-घाटक पानि पिवै एना बौवाइत छी 

"
शांतिलक्ष्मी" बुझैत अछि अहाँक सभटा अस्सल 
झटकल डेग मे कोना आगु बढ़ल जाइत छी 

.......................
वर्ण १८..................
बेरोजगारी 

एहि शहर मे छथि सभ व्यस्त l
लोक एहिना अपने काजे पस्त ll

अहाँ जीबु आकि भs जाउ नष्ट l
ककरो छैन्हि क्षणिके तै लै कष्ट ll

माय बाप नित दिन हरकैलैन्हि l
मामा-मौसी सभ सेहो उबियेलैन्हि ll 

घरक जीनगी सँ जखन ओगतेलौह l
देस-कोस छोड़ि शहर दिस एलौ्ह ll

s s एतय आइल छलौ बड़ आस l
मुदा भेटैये कहाँ कत्तो कोनो निसास ll

दै ये सभकिओ ओएह एक्के अश्वासन l
थम्हु नै आइ लगवै छी कोनो आसन ll

गेलौ जतय कतहुँ लोक बुझेयै भार l
दू महिना सँ तैयो घुमै छी द्वारे द्वार ll

कैलिये सभ जनतव केर जा जा भैट l
कत्तौ कियो लगेता कोनो-नै-कोनो बैंत ll

फाइल मे भरि केँ सभ कागत जात l
भरि-भरि दिन घुमै छी घाटे घाट ll

नित दिन मरै छी हम दुःखै-ग्लानि l
दैख केँ ओतैक नमहर-नमहर लाइन ll

हजार-पाँच सौ केर आब तँ करजो भेल l
जेबीक टाका कहिये-नै-कहिये उड़ि गेल ll

जँ ली हम कत्तौ कोनो टेकनीकल ज्ञान l
फ़ीसे सुनि केँ छुटैयै बचल-खुचल प्राण ll

इतस-तीतस मे पड़ल छी तेहन नै आइ l
मोन होइये घुमि फेरि गामे चलि जाइ ll

मुदा सोचि केँ फेर वोएह गारि आ बात l
मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll

मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात l
मोनक मोने दबि जाइये सब टा बात ll
कुम्हर


एकटा छौरी केँ भरि देह चून,
जल्दी सँ कहु ओ फर कूनl

कुम्हरक फर छी हमर नाम,
गठुल्लाक छप्पर हमर ठामl

हरियर पात पीयर फुल,
तरकारीक लत्ती हमर कुलl

बातबोली के बड़ सुकुमरि,
अंगुरी देखेने बातिये सड़िl

शहर-बजार मे काँचो खाय,
गाम घर मे छोड़य जुआयl

कलायदालि मे बनी कुम्हरौरी,
किछुठाम कहे सिसकोढ-बड़ीl

मिठगर हम मुरब्बा़ मिठाइ,
दर-दोकान मे राखे सजायl

गभासकरैति मे फ़ुलक उद्योग,
गायगोवर पर साटैयक योगl

भरदुतियाक परतर नै दुज,
नौत लिये हमरे पाँच फुलl

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि  हिनकर मिथिला चित्रकलाकप्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित। ज्योति सम्प्रति लंदनमे रहै छथि।

जीवनक सिद्धान्त 

तितलीक के पाछा भागैत बच्चा
रंगके पकड़ि क राखक ईच्छा
तितली डोलैत फूल फूल पर
 
बच्चाक धमगज्जर धूल पर

फेर कैशोर्य के आबैत दिन
स्वयम् सबकिछ भेल रंगीन
अपन बनैत अलग पहचान
स्वयं के विशिष्टताक ज्ञान

जगत स साक्षात्कार शुरू यौवनमे
 
जीवन विभाजित श्वेत श्याम मे
क्षमा आ धैर्य के योगक कमी
परिभाषा बुझल मुदा उपयोगक कमी

प््राौढ़ावस्था संतोषक अभिव्यक्ति
बुद्धिक स्थिरता आ सीमाक प््रााप्ति
 
संसार देखलेल भेटल अनुभव क दृष्टि
किछु बदलल किछु दुहराएल स्थिति

जेहेन गाछ लगेने जीवन भरि
भोग कर पड़ैत तेहेने फरि
फेर किछु पिछला जन्मक बकियौता
वृद्धावस्था सबटा दर्पण जकॉं देखौता



 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.इरा मल्लिक ओमप्रकाश झा ३.उमेश पासवान
इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।
छम छम बरसा
छम छम बरसा,
छम छम पानि,
चम चम बिजली, 
चमकै आइ,
चम चम बिजली चमकै छै,
जियरामे आगि लगावै छै।
कारी कारी घटा घिर आओल,
मनक मोर शोर मचाओल,
बिजली चमकै जियरा हहरै,
कारि अन्हरिया राति भयाओन,
पिया केँ सन्देश सुना दिअ आइ,
चम चम बिजली चमकै छै।
 
संग सहेली घर चलि गेलि,
सून भवनमे छी हम अकेली, सनननन बड़ी जोर पवन अछि, 
घन घमंड देखावै आइ,
चम चम बिजली चमकै छै।
 
मन के मोर सुनु इक बैन,
पाओत मोन कोना कहु चैन,
किछ ते जतन करु अहाँ इहो रैन,
छोड़ू मचेनाय शोर किलोल,
पहुँ के सन्देश सुना दिअ मोर,
चम चम बिजली चमकै छै।

ओमप्रकाश झा
जखन मोन मे प्रेमक आँकुर फूटल, तखन प्रेमक गाछ निकलबे करत।
जखन जवानीक ककरो लुत्ती लागल, तखन प्रेमक धधरा उठबे करत।

प्रेम छै रामायण, प्रेम छै गीता पुराण, प्रेम छै पूजा-पाठ, प्रेम ईश-भगवान,
जखन इ मोन पवित्र मंदिर बनल, तखन प्रेमक मुरूत बसबे करत।

जिनगी कछेर बनल इ प्रेम छै धार, प्रेम इ समाज बनबै प्रेम परिवार,
जखन हिय सिनेहक संगम रचल, तखन प्रेमक इ गंगा बहबे करत।

प्रेम केँ बान्हत डोरी एखन नै बनल, प्रेम मुक्त छै सदिखन सहज सरल,
जखन जिनगी-आकाशक सीमा हटल, तखन प्रेमक चिडैयाँ उडबे करत।

"
ओम"क निवेदन अहाँ कते नै सुनब, एना अहाँ चुप रहि कते मूक बनब,
जखन याचना अहाँक मोन मे ढुकल, तखन प्रेमक भिक्षा त' भेटबे करत।
ताकलौं एना किया कोनो पैघ बात भय गेलै।
मोन डोलै हमर पीपरिक पात भय गेलै।

बिन पीने इ निशाँ किया हमरा लागै लागल,
हमरा बूझि केँ शराबी लोक कात भय गेलै।

हमरा हमरे सँ चोरी अहाँ कोना कय लेलौं,
बन्न छल हिय-खिडकी कोनो घात भय गेलै।

प्रेमक सींचल जिनगी आब भेलै रसगर,
सुखायल चाउर छलै मीठ भात भय गेलै।

सभ ओझरी सँ हम भिन्ने नीक रहैत रही,
नैन-ओझरी लागल "ओम"क मात भय गेलै।
आगि लागल मोनक धाह केँ रोकि देलियै।
कोनो दुख गहीर छल, मुस्की मोकि देलियै।

अपन मोनक धार कियो कोना के रोकत,
इयाद जे हमरा करेज मे भोकि देलियै।

आँखिक कोर भीजल नोर किया नै खसल,
कृपणक सोन जकाँ ओकरा झोकि देलियै।

नोर इन्होर होइ छै एहि सँ बाँचि के रहू,
फेर कहब नै अहाँ किया नै टोकि देलियै।

"
ओम"क फाटल छाती कियो देख नै सकल,
कोनो जतन सँ ओकरा हम सोपि देलियै।

३.
उमेश पासवान
कवि‍ता

भि‍तरसँ कारी

कतेक लि‍खब
दलि‍तक व्‍यथा हम
कतेक लि‍खब
समाजक वि‍डम्‍बना
शलहेशक गाम सनेंुश
आब नीक, कि‍छु नै रहल, बस रहि‍ गेल
भरल अछि‍ एतए
दुख: आ कलेश
कतेक लि‍खब....
केकरासँ कही
के बूझत
कि‍ अछि‍ झुठ आ कि‍ अछि‍ साँच
टि‍क-मे-टि‍क जोड़ि‍ रहैए
बुझैए अपनाकेँ बड़का
भि‍तरसँ कारी अछि‍
दलि‍तक दुश्‍मन अछि‍ तरका
कतेक लि‍खब
दलि‍तक व्‍यथा
दलि‍तक अधि‍कारक
हल करैए
बड़-बड़ करैए नाँच
कतेक लि‍खब।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

१. जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल२.मिहिर झा



जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
गजल


हमर-अहांक कसूर बहुत अछि
दिल्ली एखनहुं दूर बहुत अछि।


कीट नियंत्रण अछि आवश्यक
एहि घरमे झिंगूर बहुत अछि।


डाकनि दसुनबपड़तै 
बहुत कानमे तूर बहुत अछि।


बास सांप केर निष्चित बूझू
एहि कोठलीमे भूर बहुत अछि।


जहां-तहां सोहरल अछि चुट्टी
घरमे छीटल गूर बहुत अछि।


नोर भरल मैथिलीक आंखिमे
एखनहुं महग सिन्दूर गहुत अछि।






आगि बोनमे पसरि गेल अछि
लोक सड़क पर उतरि गेल अछि।


कुरूक्षेत्रमे देव, दनुज छथि
उठापट्टक बजरि गेल अछि।


रंग विरंगक छल फुलवारी
असमय सभटा उजरि गेल अछि।


चौंसठि बरखक वरक गाछ ई
झखड़ि गेल अछि,हहरि गेल अछि।


नौजवान चौहत्तरि बरखक
थाकब, सूतब बिसरि गेल अछि।


भारत मां केर आंखि नोरायल
नोर गाल पर टघरि गेल अछि।




मिहिर झा
गजल
मिलत जखन आन्खि से आन्खि तखन पता चलत
हिलत जखन करेज कनी तखन पता चलत

एखन त बौराई टौवाइ छी मदमस्त भेल रहू
कन्छी मुस्की जे बेधत हृदय तखन पता चलत

दियौ गप उडाउ खिल्ली अहां छी मनमत्त अबूझ
आन्खि से जखन निन्न उडत तखन पता चलत

मुस्काई छी उधियाय छी त अबढन्ग बनल रहू 
अधर से जे अधर मिलत तखन पता चलत

बिसरब दुनिया ओ भज़ार ई ठीक सत्य वचन
जखन होएत वाक हरण तखन पता चलत
बात जे झंपबै त ओ जडिएबे करत
चुल्हि चढल खापडि करिएबे करत

कतबहु दाबब गप के दबत नहि
लोक त लोक छैक ओ चरिएबे करत

तनला से सहो चलत नहि कोनो काज
मुस्टंडा मानत नहि फरिएबे करत

नहि पडू मुखिया ओ पंचक चक्कर मे
ओकर त काज छैक भरिएबे करत

आपस मे गप करू करू राफ ओ साफ
धीरज धरू मामिला सरिएबे करत
फेर से ओ जिनगी घुरि आयल
फेर अहां क याद घुरि आयल

छोडल छल सबटा याद अदौ
विस्मृत स्मृति फेर जुडि आयल

लकधक साड़ी खनखन हँसी
लाजक लाली कोना मुडि आयल

आमक गाछी चुप चुप अधर
डभ्कैत आन्खि मोन चुडि आयल

छल विदा करेज पर पाथर
बिसरब सब से फुरि आयल

किएक भेटल ओ पुरना पोथी
आखर देखि याद घुरि आयल
नहि जाएब परदेश, अहाँ एहिना तकैत रहू
खोलब हृदय के तार अह एहिना तकैत रहू

सखा भजार चुटकी लय के करैथ हँसी ठिठोली
अहां लेल दुनिया बिसरब एहिना तकैत रहू

सर समाजक कोनो चिंता ने अहाँक रूपक आगू
दीन ईमान सेहो बिसरब एहिना तकैत रहू

गीत ग़ज़ल छन्द ओ कविता लिखब देखैत रहू
प्रणय निवेदन करू स्वीकार नैना तकैत रहू

ज़मीन जथा किछु नहि चाही नहि चाही रंजो-द्वेष
सुगम सिनेह केर पावन महिना तकैत रहू

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।


शिवशंकर सिंह ठाकुर

श्रद्धान्जलि 

आइ पुनः आयल  दिवस अछि ,
हमर अहाँक आइ मिलन अछि,
आइयेक दिन हम अहाँ एक सूत्रमे बन्हल रही 
प्रेमक फूल अहाँक बाड़ीक 
हमर जीवनमे आइ खिलल छल ,
 हमर मिलन सेहो तँ प्रिय 
आजुक पावस दिवसमे
कतेको साल पहिने खिलल छल !!!!!!!!

कतेक बढ़िया छल  दिन 
 अहसास हमर मिलनक ,
जखन अग्नि केँ साक्षी मानि कऽ,
हम अहाँ आइये प्रणय-सूत्रमे बन्हल रही ,
 राति किछु खास छल ,
चांदनी मे नहायल छल ,
हमर अहाँक मिलनक गवाह बनल छल !!!!!!!!!!

हम समर्पित भऽ गेल रही अहाँक अंकमे ओइ राति ,
 अहूँ तँ अपना आपकेँ हमरा समर्पित कऽ देने रही
प्रेमक रसमे हम दुहु गोटे सराबोर भऽ गेल रही,
ओइ राति हमर दिल कतेक जोड़ सँ धड़कि रहल छल ,
 धौंकनी जकाँ धधकि रहल छल हमर सम्पूर्ण देह ,
घाम सँ लथपथ ,एक दोसराक बाहुपास मे सिमटल रहि,
ओइ राति हम हम नै रही,अहाँ अहाँ नै रही,
दुहू गोटा एक भऽ गेल रही !!!!!!!!!!!!!!!!

हमर बाड़ीक तीनू फूल आइ पैघ भऽ गेल,
कतेक सुन्दर लागि रहल अइ ,
अहाँ रहितौंह तँ देखितौंह  हमरा चिकौटी काटितौंह,
 तीनों तँ अहींक 'प्रेम 'गाछक फूल अइ ,
एकरा देखबाक खुशी कते पैघ होइत छैक ,
से तँ अहाँ बुझबे करैत छी,
एकरा तँ व्यक्त नै कएल जा सकैछ,
 तँ अव्यक्त होइत अछि,
आखिर मे  शरीर तँ सेहो स्थूल  जाइत अछि !!!!!!!!!!!!

आइ अहाँ नै छी तैओ हमरा लगैए ,
जे अहाँ किम्हरो सँ हमरा देखि रहल छी ,
हमर खुशी आइ अपूर्ण लागि रहल अछि,
तैयो हमर खुशी मे मानू अहाँ अपन खुशी ताकि रहल होइ,
आइ हम कतेक असगर लागि रहल छी,
रहि-रहि अहाँक स्मरण मे कोर कांपि रहल अइ ,
हमर मोनक भावना केँ कियो अनुभव  सकैछ ,
हमरा लेल आइयो अहाँ ओतबे स्नेहपूर्ण छी !!!!!!!!!!!

अहाँ दऽ जखन हम सोचै छी ,
अहाँक संग बितायल एक एक क्षण ,एक एक पल 
के स्मरण  कऽ हम प्रफुल्लित भऽ जाइ छी,
कोना कऽ अनझोके सँ हम अहाँ टकरा गेल रही ,
अहाँ कनी बेशी तमसा गेल रही ,
ओकर बाद  हमर अहाँक भेंट - घांट होइते रहल,
 हमर अहाँक प्रेम बढिते गेल ,
फेर दुहु गोटे प्रणय -सूत्र मे बन्हि गेलौंह !!!!!!!!!!!!!!!

आजुक  दिन अति पावन अइ ,
आब जखन की अहाँ नै रहलौंह,
हम की करू ,आजुक दिन केँ कोना कऽ मनाउ, 
से नै फुरा रहल अछि,
पहिने  दुहु गोटा मिल कऽ आजुक दिन केँ मनबैत रही ,
अही दिन के विशेष रूप सँ यादगार बनबैत रही ,
ओतेक हिम्मत आब हमरा नै रहि गेल !!!!!!!!!!

हम धीरे धीरे आब टूटऽ लग्लौंह अछि ,
आब जखन कखनो अहाँक याद अबै अछि 
हम चुप्पे सँ कानि लै छी,फेर बच्चा सभ के देख कऽ 
अपन काननाइ रोकि लैत छी,मोन मे गबधी मारि लैत छी,
भीतर सँ अशान्ते रहैत छी ,मोन मे लललाहा आगि के देखैए?
अहाँ तँ सदिखन हमर मोने मे रहब ,
तैयो आइ अहाँक बहुत याद अबैए ,
अकुलाइतो हम चुप छी ,
बुझाइए जे  चुप्पी हमर सांसक संगे टटि पाएत ,
मोनक बात मनहि रहि जाएत, 
अपन बात आइ एतेहि सम्पन्न करैत छी ,
आजुक  कलम अहींकेँ समर्पित करै छी!!!!!!!!!!!!!

हमर  फूल अहाँ स्वीकार करू ,
हमर  नोर ,ईएह शद्धांजलि अइ ,
गलती के माफ करैत ,
एकरा स्वीकार करू !!!!!!!!


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१.विकास झा रंजन २.जगदीश प्रसाद मण्डल


विकास झा रंजन
गजल
मोन मुंगबा फुटइए मीत हमर ,
सोझा अबैथ जखन प्रीत हमर !

हुनक जूट्टीमे गूहल भबित हमर ,
हुनक गजरा गछेरने अतीत हमर !

खाम्ह कोरो बनल मोन चीत हमर ,
हुनक लेपट सौं छारल अइ भीत हमर !

हुनक नख शिखमे नेह निहीत हमर ,
हुनक कोबरे करत मोन तिरपित हमर !

हम हुनके सिनेह  सरीत हमर ,
हुनक मुस्की सौं जागे कबीत हमर !


 
रुबाइ
अहाँ रूपक भेरिया-धसान लागल अइ,
छौड़ा संग बुढबोक आन जान लागल अइ
आबो समेटू अपन भाभट दसगरदा
आँगनमे घट्कक दलान लागल अइ !
                           
जिनगी अमोल तोहर कोंख भेटल माँ,
तोरे आँचरमे हमरा भरोस भेटल माँ,
सब आफद अनेरे उड़ल कपूर सन ,
तोहर ममता केँ जखने बसात भेटल माँ


जगदीश प्रसाद मण्‍डलक
एक दर्जन कवि‍ता-

परदेशी

नै बुझि‍ पेलौं एखन धरि‍
दाही-रौदीक औरूदा कते।
एक दि‍न जाड़ माघक बीतने
उनतीस दि‍न पड़ाएत जते।
बारह मासक साल बनै छै
एक करोटि‍या ऋृतुओ लइ छै
केंचुआ छोड़ि‍ नव रूप पाबि‍ जेना
नव जीवनक नूतन चालि‍ धड़ै छै।
अपन-अपनी रूप गढ़ि‍-गढ़ि‍
नव सृष्‍टि‍क बाट धड़ै छै
नव सि‍रजि‍ नव युगक
नव वि‍चारक लोक गढ़ै छै।
सृष्‍टि‍क भीतर सृष्‍टि‍ सि‍रजि‍
मौसमक सुर-तान भरै छै।
पवि‍ते हवा श्रृंगार सौरभक
ठठा-ठठा मुसकान भरै छै।
पेटक खाति‍र लुटा रहल छी
इज्‍जत-आबरू ओ सन-मान
हारल नटुआक संग पकड़ि‍
गाबै छी प्रभाती वि‍हान।
देखए पड़त मातृभूमि‍ मि‍थि‍लाकेँ
माटि‍-पानि‍ ओ बसात।
अंगेजि‍ अंग जखन बनब
देख पएब सोन्‍हगर अकास।
जे कहि‍यो सातम अकास चढ़ि‍
मुरलीक तान भरैए
कुरेड़क कुरहरि‍ कटि‍-कटि‍
दूरेसँ ढोल बजबैए।

बाल गीत

सुनू बौआ यौ सुनू नूनू यौ
चेहरा देख मन झहरै-ए
तरे-तरे देह सि‍हरै-ए
तड़पि‍-तड़पि‍ ओ कुहरि‍-कुहरि‍
बेथि‍त भऽ बेथा सुनबै-ए
बि‍रड़ोमे उड़ि‍-उड़ि‍ अहाँ
दोगे सान्हि‍ये पड़ा रहल छी
मातृभूमि‍क रस पीब बि‍ना
पुरूखाक पुरूषत्‍व हरा रहल छी।
मनुष्‍यक जि‍नगी आँकि‍-आँकि‍
अपनाकेँ अँकए पड़त।
ने ते गंगा-जमुना जकाँ
बोहि‍ आएत जि‍नगी चलत।
ककरो मेटेने कि‍ कहि‍यो
गंगा आकि‍ कोसी मरतै
धारक पेट सदए धारा
संग-संग चलि‍ते रहत।
मनुख-मनुखमे भेद कतए
देखए पड़त ओइ‍ दुर्गकेँ
ढाहि‍ ढुहि‍ ओइ आड़ि‍ धुर
नव जि‍नगीक नव दुनि‍याँ बना कऽ।

बाल कवि‍ता

पुत्र- बाबू यौ, पनि‍या दूध कि‍अए बेचै छी
एकरे ने पाप कहै छै?
जानि‍-बुझि‍ जे करए ढि‍ठाइ
तेकरे जमदुत पकड़ै छै?

पि‍ता- कहलह बौआ मधुर बात,
सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ हृदए सि‍हरि‍ गेल।
अजीव खेल धर्म-पापक
हँसि‍-हँसि‍ जि‍नगी टूटैत गेल।

पुत्र- की अजीब खेल धर्म-पापक
गुरूवर-गि‍रवर बनि‍ कहू।
कर्म, अकर्म, वि‍कर्म, सुकर्म,
बि‍लगा-बि‍लगा बुझा कहू।

पि‍ता- बाल-बोध रहि‍तो अहाँ
जि‍नगीक रहस्‍य-रस तकलौं
समए पाबि‍ आनि‍ देब
जि‍ज्ञासाक उठैक बाट।

अगहन

ठोर रंगि‍ तड़-तड़ करै छै
प्रेमी देख-देख मुँह दुसै छै।
लगनक आशा छोड़ि‍-छाड़ि‍
कुदि‍-फानि‍ घर अबए चाहै छै।
कहि‍या धार कुटाएब हाँसूमे
कहि‍या धारक सान बनाएब
काति‍कक पुरनि‍मो बीतल
आठ अगहन अबैमे देरी हएत।
धीरजसँ सभ कि‍छु होइ छै
आठ पुरैमे तीन दि‍न अछि‍
जुनि‍ अधीर होउ हे प्रीतम
मन फुला दि‍ल कलशैत अछि‍,
संगे मि‍लि‍ चलब दुनू संगी
बच्‍चोकेँ कन्‍हा लगा लेब।
लोटा भरि‍ पानि‍यो नै बि‍सरब
पनबट्टी सेहो लऽ लेब।
रौतुका नाच बनौआ होइ छै
दि‍न-दुपहरि‍या नचब मैदान
चौकीक तँ स्‍टेज नै छि‍ऐ
हँसबै गेबै मान-सम्‍मान।


केना मेटत गरीबी

केना कऽ मेटत गरीबी हो भैया
केना कऽ......।
अछि‍ भरल सोना मि‍ट्टीमे
भरल अछि‍ हीरा-मोती।
खुनैक ओजारे अछि‍ गजपट
केना कऽ पेबै मोती।
सोन बि‍ना कानक जहि‍ना
तहि‍ना ने माटि‍यो छै
ने अछि‍ पान आ ने श्रम छै
ने खाद आ ने बीआ छै
तखन कोन आस करबै हो भैया....
सत्ते कहै छी ओजारो बनलै
नहर खुनेलै कोसीसँ
धारक तँ चालि‍ये अजीब
बि‍नु बरखे पानि‍ आओत कतएसँ।
खादक बदला माटि‍ अबै छै
बोरि‍ंगक पाइपो तेहने नकली छै
पम्‍पि‍ंग सेटक कथे की कहब
तीन बेर साले सि‍सकै छै
अहीं कहूँ केना हेतै यौ भैया
केना कऽ...।
बि‍नु खेतक आकार देखने
फसि‍लक केना पहचान करब
उपजल दाही जखने हेतै
कोठीक कि‍अए जोगार करब।
वि‍ज्ञान बहुत उन्नैत केलकहेँ
सच्‍चे कहै छी यौ भैया
घासे बि‍खाह उपजि‍ खेतक-खेत
कोन मनसूबे दुहबै गैया
केना कऽ.....।
ललो-चपोसँ काज नै चलत
इमनदारीक नेत बनाएब।
फुलल-फड़ल खेत चमकत
देख वसन्‍ती तखन गीत गाएब।
ता धरि‍ नै चलतै यौ भैया,
ललकारा कतबो देबै।
टाल ठोकि‍ कतबो कुदब
खलीफा नै बनि‍ पेबै।
सएह कहै छी सुनू यौ भैया
केना कऽ......।


बाढ़ि‍क सनेस

जइ नहाए कोसी जाइ छी
जाइ छी कमला घाट।
अपने फुड़ने आबि‍-आबि‍
धो-धा देखा दैत बाट।
हँसि‍-हँसि‍ घरसँ नि‍कलि‍
खोंछि‍ भरने एली।
मुट्ठि‍ये-मुट्ठी बाँटि‍-बाँटि‍
गामे-गाम बि‍लहि‍ देली।
खोंछि‍क सनेसो तेहने
ठेंगी, खच्‍चरलत्ती ओ हराशंख।
हराशंखो तेहने गढ़ल छै
ने छी डोकी ने छी शंख।
खच्‍चरलत्तीक खचरपनीसँ
तंग-तंग होइए कि‍सान।
काटि‍ फेकब जतए ततएसँ
मोछ टेरैत देखबए शान।
गाछी-वि‍रछी, दि‍शा मैदानक
रोकैक ठीका ठेंगी लेलक।
खेत-पथार टहलि‍-टहलि‍
बोन-झाड़ सेहो अपनौलक।

पू-भर

माए‍ गे, सभ कोइ पू-भर जाइ छै
संगी संग हमहू जेबै।
गामक दशा देखते छीही
ऐठाम रहने की खेबै?

बौआ हौ, हम कि‍ कहबह
धीगर-पुतगर तोहूँ भेलह।
सुख-दुख तँ देखते छहक
आब की कोनो नेना छह।
एकटा बात बता दाए
करए जेबहक कोन काज?
से काज तँ एतै जगेबह
कि‍अए जेबह आन राज।

भ्रम-जालमे सभ फँसल, माए
के केकरासँ कम जनैत।
धन छोड़ि‍ धनवान बनल सभ
अपन बात बुझबे ने करैत।

पू-भर कतए कतए जेबह तँू
से कनि‍ये हमरो कहि‍ दाए।
मन हएत तँ पत्रो पठेबह
नाओं-ठेकान दि‍हह पठाए।

भभूत

लगि‍ते चाइन बाबाक भभूत
चेलबा हँसि‍-हँसि‍ बाजल।
छाउर केना भभूत बनि‍
छजनीपर जा अँटकल।
सुनि‍ते चेलबाक पेटक बात
पेट खोलि‍ आसन लगौलनि‍।
आँखि‍ खोलि‍ नजरि‍ मि‍ला
प्रभुता दर्शन करौलनि‍।
जि‍द्दी चेलबा मानता ओहि‍ना
प्रभुता परमान मंगलकनि‍?
पैरूख नाअों प्रभुताक कहि‍
झटपट अपन जान छोड़ैलनि‍।
जि‍द्दी कि‍ जि‍द्दी चेलबा छी
पैरूखक परमान मंगलकनि‍?
सामर्थ कहि‍ आँखि‍ घुमा
चटपट अपन काज ससारलनि‍।
नमड़ी जि‍द्दी जेहन चेलबा हुअए
तइसँ कम की बाबाक चेलबा
तड़पि‍-चेलबा लग आबि‍
समर्थकक परमान पुछलकनि‍।
शक्ति‍ समर्थकक उत्तर दऽ
मुँह मारि‍ बाबा बैसलाह।
बोलती बन्न देख बाबाक
डुबकी दैत चेला डुबलाह।

पि‍तृपक्षक भोज

अमावास्‍या आसीन केर
बीतते भोजक लगल ढबाहि‍।
आन-आन ओरि‍यानक संग
महाजनी चाउरक लगैत सवाइ।
गाम-गामक महाजनोक
रंग-वि‍रंगक हुकूम चलैत।
कतौ सवाइ तँ कतौ
डेरही, पौन-दोबर चलैत।
जेकर लाठी तेकर भैंस
खाली ई खि‍स्‍से नै छी।
पइस नहाएब जखन पोखरि‍
तखैन बुझब अपने ने कि‍छु छी।
मुदा गुन भेल, भाय हमरा
जाति‍-जाति‍क रग्‍गड़ मचल।
काटि‍-छाँटि‍ एकबाहि‍ केलक
मनमे खुशीक तूफान मचल।
जाइति‍यो तँ जाइति‍ये छी
दि‍न-राति‍ रग्‍गड़ करैत।
समए पाबि‍ जहि‍ना सि‍ंगरहार
खुशी-खुशी अपने झड़ैत।
गाममे जाति‍ असकर
असकर अछि‍ दि‍यादी।
बि‍नु भोजे उद्धार सभकि‍यो
बाबा, काका, भैया आदि‍।

ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं

ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं
हरे जोति‍तौं, कोदारि‍ये पाड़ि‍तौं।
रि‍क्‍शे चलैबतौं, ठेले ठेलतौं
उपहासक पात्रो तँ नहि‍ये बनि‍तौं।
ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं।
कि‍यो कहए भुसकौलहा हमरा
कि‍यो कहैत चोरि‍ पास।
कि‍यो कहैत कि‍नुआ डि‍ग्री छी
चारू दि‍स होइए उपहास।
धौना खसा तँ नहि‍ये चलि‍तौं
ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं।
नै पढ़ने नहि‍ये होइतए
पढ़ुआ कनि‍याँसँ वि‍याह।
नै जोड़ए पड़ैत खर्च सि‍नेमाक
नै जोड़ए पड़ैत साजो श्रृंगार
सीना तानि‍ गामोमे चलि‍तौं
ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं।
कतएसँ पुराएब खर्च बच्‍चाकेँ
कतएसँ आनब कनभेंट खर्च।
कतएसँ पुराएब इंग्‍लीस ड्रेस
कतएसँ आनब आवासीय खर्च।
भाग-भरोसे जे ठेलि‍ पइतौं
ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं
कोठीक नोकरी कोठि‍ये करि‍तौं
चोरा-नुका कऽ खुब कमैतौं।
अंग्रेजि‍या फैशनमे सजि‍-धजि‍
बम्‍बैया हीरो कहैबतौं
ऐ पढ़बसँ मुरखे रहि‍तौं।

अगो-लोरहा

हे गे बेटी गे, हे गे धीया गे
आइ धरि‍ दुखक दि‍न कटलौं
काल्हि‍सँ आओत समए सुखक।
राति‍ भरि‍ जागि‍ मन पाड़ि‍हेँ
बीतल साल, मास दि‍न दुखक।
कोन नक्षत्र अाबि‍ रहल छै
कनि‍ये दे हमरो बुझा।
कोन सुख काल्हि‍सँ आओत
सेहो दे नीकसँ सुझा
धनकटनीमे हाथ लगेबै
हाँसू धार कुटौने छी।
संग मि‍ल तोहूँ लोढ़ि‍हेँ
लोढ़ा बीछा तोरे ने छी।
चारि‍ साल जते जे लोढ़लौं
अगो तँ तोहूँ दैत एलँह।
भुरकुरी ढन-ढन करैए
कुटि‍-चुड़ि‍ तोहीं खेलँह।
समए पाबि‍ खेलि‍यौ बुच्‍ची
सुदि‍ दऽ पूरा करबौ।
अगो-लोढ़ा जोड़ि‍-जाड़ि‍
मुइरि‍क संग सुदि‍यो देबौ।
एहन अलछनी हमहीं हेबौ।
माए-बापसँ सुदि‍ लेब।
महाजनीक कारोबार कऽ कऽ
महाजनीक भार देब।
नै बेटी नै बुच्‍ची, नूनू
मुँह दाबि‍ एना नै बाजह।
जते गहन लगल बीच अछि‍
दोबरा-दोबरा मुड़ घुरेबह।
सुनि‍-सुनि‍ मन तड़पैए
माए-बाप की हम्‍मर नै।
बेटा-बेटी भेद कतए अछि‍
सेवा की हम्‍मर नै।

हथि‍याक झटकी

चढ़ि‍ते चैत पतरा कीनलौं
सालक हाथक रेखा देखलौं।
देखते नजरि‍ दौड़ल राशि‍पर
नाओं अक्षर तेकरा बीछलौं।
तेतरि‍ सदृश्‍य राशि‍ देख
पाछु दि‍स उनटि‍ ताकल।
तीन नामे लोक जनैए
देखि‍ये कऽ मन थाकल।
आगू बढ़ि‍ उपजा लग गेलौं
पानि‍सँ बेसी धाने देखलौं।
हवा-वि‍हाड़ि‍, ठनका भुमकमक
चर्च-बर्च कतौ ने देखलौं।
मन खुशी भेल, घरहट बाँचल
भगवान भरोसे ई साल चलतै।
घरनीक तगेदा अनठबैत
एको घर नै ऐ साल छाड़लौं।
हथि‍या तँ उनाड़ी बरखाक
झटकी कतएसँ दौड़ल आएल।
मनक सभ खुशी मनेमे
सभटा रहि‍ गेल धएले-धाएल।
एकटा घर माटि‍ पकड़लक
दोसर चोंगरा बले ठाढ़।
तेसरक कोनचारी लटकल
चारि‍म भीतक भरे ठाढ़।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...