Friday, October 14, 2011

'विदेह' ९१ म अंक ०१ अक्टूबर २०११ (वर्ष ४ मास ४६ अंक ९१)- PART III


३. पद्य











३.६.डॉ. अजीत मिश्र

३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमरआनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ४.प्रभात राय भट्ट






१.शांतिलक्ष्मी चौधरी २.मनोज झा मुक्ति


श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।

बरखा रानी

ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

बैसलखीन पालथि बदलि दादी चुक्कुमाली!
आँचर सम्हारि ओढ़लैन्हि भरि देह साड़ी!!
देह सिहरैत जनु हुनका जरौन लगैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

गोलियेल दियादिन चारू ओसार केँ धेनै!
अलसायल मोन एहेन कियो उठै कहै नहि!!
हाफी पर हाफी, मोनक बात बतबैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

बड़का कक्का ओतय ओढ़ना ले औनाइत!
कहियो दिनेस केँ कनि तौनी दs जाइत!!
दूआरे सँ रहि-रहि बहिया केँ चिकड़ैत छथि!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

भाय हमर करैत छथि कखनै सँ कछमछ!
मुत्तवास केने हिनका कखने सँ अक्कछ!!
बुन्नी तँ कनियो छैको नहि करैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

चुल्हा लग भौजी काज छैन्हि पसरल!
घोघरी लs लालबहिन अइघर ओईघर!!
तरल-तरल माछ रोटी जलखै बनैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

घर भरि छिटल डाबा, दोल, कठौत, कप!
खपड़ा केर घर सगर चुबैत छैक टपटप!!
छोटका कक्का कारकौआ पर कुढ़ैत छथि!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

ओलतीक सीरही पर चाली करैत सहसह!
चुटकी सँ नून छिटै नेनतूर उखमज सभ!!
कोनटा मे जोंक देखु कोना नमरैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

धीया-पुता केँ जेना उनमत्ति छै चढ़ल!
खोपरिक नाह लेल कागज फारै चर-चर!!
लिखनाक पन्ना लेल किओ ठुनकैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

भादव केर बरखा तैयपर वर कोवर घर!
रति केँ लग पावि कामदेव छथि रसगर!!
पुरवा वयार वहै मदन मोन रमकैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!

ओलतीक पानि तँ छर-छर झहरैत छै!
बरखा रानी आइ छम छम बरसैत छै!!



तिलकोर

छी विदेह बाड़ीक ई अखंड सोहाग भाग
मिथिला-संस्कृति पर पलरल अमरलत्ती
घरक पछुआर मे ओहिना कचरैत भेटैत
तरूआपातक तिरहुतिया तिलकोर लत्ती

बलबूत बाला महराजा दरभंगा होइ
कि गाम समाजक किओ कमजोर
सभक लिलसा पुरेवाक उदार-दानी
भरिसाल सुलभ रहताह ई तिलकोर

चौंका मे तरूआ अल्लुक होइ आकि
कदीमाफूल, तग्गर, कुम्हर-सिस्कोढ़
रमतोरय, भाटा, वा कि मिरचाइ होइ
बुझु सब छै सुन बिन एक तिलकोर


गरम गरम करूगर माछक तीमन होइ
की कबकब ओल, बुटक-बड़ी, कुम्हरोर
सभहक स्वाद तखने शोभय उत्तम सन
जखन संग उपलब्ध होइ एक तिलकोर

सुन्दर हींग देल कदीमाक तरकारी होइ
वा कि सरिसौं देल अरिकंचनक झोर
चिकना देल सजमैनि खाहे केहनो बनै
सभक सुलाज राखै छथि एक तिलकोर

समधि, जमाय सन गरिष्ठ पाहुन होइथ
वा कि मुहल्ग्गु भोजीक भाय मुँह्चोर
मामा, मोसा, पीसा, सभक सुमान अधुर
पाहुन केँ जँ नै परसलियै गरम तिलकोर

गरम गरम लोहिये मे तरूआ टुभटुभ
सुगंधे सँ मोन मे होएत रहत हिलकोर
मिथिलावासीक छैक ई खोज अनुप-सन
नै पता मिथिला ऐला कोना ई तिलकोर

नीम-हकीमी के तँ आब गप्पे छोड़ु
आब तँ पहुँचलाह ई ’एम्स’-आरोग्य
बड़का पढ़लका एम.डी. केर कान काटै
बाड़ी-बैसल चीनीक डाक्टर ई तिलकोर



बथुआक तीमन

मिथिला बाधक अनेर मोथा-बथुआ,
शहरी तरकारी बजारक अनमोल!
जर-जजातक हरमुठ हरमादी,
पोष्टिक आहारक छथि सिरमोर!!

गामक भनसाघरक चीज अनुप,
परदेसी धीयापुताक किलोल!
केहनो मरल भुख केँ जगा दिये,
आमील देल बथुआक सग्ग्भट्टा झोर!!


–मनोज झा मुक्ति
 ककरा करु विश्वास !

केओ भुखे मरैछ, केओ मरैछ खुब खा–खा कऽ
ककरो परल लल केओ जरबैछ अन्न सड़ा–सड़ा कऽ ।

दिनराति कटैत अछि गरदनि खुल्लम खुल्ला जे,
पाप अपन कट्बैत अछि मन्दिरमे जा–जा कऽ ।

दोसरके उन्नतिमे घुसक गन्ध सुँघनिहार सब,
पुरस्कृत अपने होइत अछि चाकरी बजा–बजा कऽ ।

कहैछ जे छी सच्चा सदिखन भूmठक विछहन छिटैत अछि,
जेब ओ अपन भरैत अछि, बोली भजा–भजा कऽ ।

ककरा कहियै भल, भगवान सेहो तेहने छई,
केओ पानि बिनु सुखाइत, केओ मरैछ दहा–दहा कऽ ।

 
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१.इरा मल्लिक ओमप्रकाश झा ३.विनीता झा ४उमेश पासवान
इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।
भोर भेलै
भोर भेलै,
घरनीक तँ हाल बड़ा बेहाल छै,
तहियो ओ नेहाल छै।
घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के।
आँखि मिरैत उठि पुठि भोरे,
भनसाघर ओ दौड़ै छथि,
चाय बनाब के छैन्ह हुनका,
केतली चूल्हा पर चढ़बै छथि,
नास्ता संग तैयार करैत छथि,
दिनभरि के दिनचर्या,
घरनी धुरी छथि गृहस्थी के।
घर भरि कान मे तूर तेल लेने,
एखनो निसभरि सूतल छथि,
पतिदेव आ नेना के,
जगेनाय एखैन तँ बाँकि छै,
ऑफिस आ स्कूल भेजवाक,
सरंजाम केनाइ तँ बाँकिये छै,
तहियो भोरतरँगक खुशियाँ,
समेटि आँचर मे बान्है छथि,
घरनी धुरी छैथ गृहस्थी के।
जीवनक अइ आपाधापी मे,
खुशी के फूल लोढ़य छथि,
ओहि फूलक सुरभित माला सँ,
परिवारक बगिया सजबै छथि,
जीवन के सृँगार बसल,
सुँदर हिनक गृहस्थी मे,
सँगीतक सुर तान बसल अछि,
मनभावन हिनक गृहस्थी मे,
घरनी धुरी छथि गृहस्थी के!
आँखि सुतल नहि रातिभर
आँखि सुतल नहि रातिभरि,
मोन भटकैत रहल जिनगी के,
बितल पल पर ,कखनो आइ पर!
मोनक गति विचित्र छैक,
छन मे अहिठाम, पल मेँ ओइठाम,
यादि अबैत अछि ,अपन बचपन के,
मधुर, सुँदर, सोहनगर बात,
माँ के लोरी,बाबी के प्यार,
दुलार भैया के,बहिनक नेह,
कनियाँ पुतरा के ब्याह,
देर तक, दूर तक,
बस खेलहि खेल,
निर्बाध स्वच्छँद!!!!!
किताबक बस्ता, स्कूलक रस्ता,
सब यादि अछि।
बरसा के पानि,
कागज के नाव,
गरमीक रौद,
आमक टिकोल,
जाड़ के मास,
थरथराइत गात,
सबकिछ पाछू छुटि गेल।
छुटि गेल ओ मेला ठेला,
पावैन तिहारक अपनत्व रंग,
बाग बगीचा, अँगना झूला,
सब किछ अछि ओहिना अंकित,
हमर मोन के कोना मेँ,
किँतु एकहि पल मेँ जी उठैछ,
अंतर्मनक शिशु आइ,
मचलि उठल,
आँखि मे भरि लैत छी,
कतेको सुँदर रँग,
आ समेट लैत छी,
अपन आँखि मे,
पलक मे बँद क दै छी,
अपन बचपन!
अपन नेनपन!!

ओमप्रकाश झा
थान केँ नपबाक फेर मे गज छूटल जाइ ए।
आकाश छूबाक फेर मे जमीन छूटल जाइ ए।

भाँति-भाँति के सुन्नर फूल लागल फुलवारी मे,
कमल लगेबाक फेर मे गेंदा टूटल जाइ ए।

चानी सँ संतोख भेल नै, आब सोनक पाँछा भागू,
सोन कीनबाक फेर मे इ चानी रूसल जाइ ए।

दूरक चमकैत वस्तु अंगोरा भय सकै अछि,
मृगतृष्णाक फेर मे देखू मृग कूदल जाइ ए।

चानक इजोरिया मे काज "ओम"क होइते छल,
भोर-इजोरियाक फेर मे चान डूबल जाइ ए।

विनीता झा, पति-श्री गंगानाथ झा, धानेरामपुर, पो.लोहनारोड, जिला दरभंगा।
हम छी बुद्धिक थोड़

हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़
हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़

एलौं शरणमे माँ जगदम्बे
झुकबैले अपन शीष
जँ भेल मैया गलती हमरासँ
क्षमा करू अपराध हे मैया
..
मैया नै जानी पूजा जप-तप
नै करी अहाँक ध्यान
हे मैया नै करी अहाँक ध्यान
तैयो मैया पूरा करू हमर मनोरथ
लऽ कऽ एलौं आस
हे मैया लऽ कऽ एलौं आस

बहुत बिपति पड़ल अछि मैया
नैय्या डूबि रहल अछि
हे काली हे जगजननी मैया
हमरो नैय्या पार लगाउ
जे फँसल अछि बीच मझधार
हे मैया..

असुर संहारिनी दुष्ट विनाशिनी
हे भवतारिणी मैया
आस लगेलौं एलौं मैया
छोड़ि अपन घर संसार
हे मैया छोड़ि घर संसार
विनीता करै अछि विनती हे मैया
करू ओकर विनति स्वीकार
हे मैया करू विनति स्वीकार
हे मैया हम छी बुद्धिक थोड़
४.
उमेश पासवान
कवि‍ता

भि‍तरसँ कारी

कतेक लि‍खब
दलि‍तक व्‍यथा हम
कतेक लि‍खब
समाजक वि‍डम्‍बना
शलहेशक गाम सनेंुश
आब नीक, कि‍छु नै रहल, बस रहि‍ गेल
भरल अछि‍ एतए
दुख: आ कलेश
कतेक लि‍खब....
केकरासँ कही
के बूझत
कि‍ अछि‍ झुठ आ कि‍ अछि‍ साँच
टि‍क-मे-टि‍क जोड़ि‍ रहैए
बुझैए अपनाकेँ बड़का
भि‍तरसँ कारी अछि‍
दलि‍तक दुश्‍मन अछि‍ तरका
कतेक लि‍खब
दलि‍तक व्‍यथा
दलि‍तक अधि‍कारक
हल करैए
बड़-बड़ करैए नाँच
कतेक लि‍खब।


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१.मिहिर झा २.शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’
१.
मिहिर झा
हे भगीरथ, पुनः आउ
ई सडल गलल धरा के
मरल मानवीय संस्कार के
आबि अहां फेर जियाउ
हे भगीरथ, पुनः आउ

एक भागीरथी अहां आनल
अपन संतति अहां जियाओल
रक्तबीज सन पसरल ओ
पूर्ण धरा मे छाओल
अपन कर्म रत निरंतर गंगा
श्वेत रूप गमाओल
आब अहां भागीरथी बचाउ
हे भगीरथ, पुनः आउ

दिनचर्या हो वा राजनीति
साहित्य हो वा वाणिज्य
क्रीडा हो वा हो शिक्षा
सगरे पाओल एके दीक्षा
लालच अहां मेटाओ
हे भगीरथ, पुनः आउ

पसरल अधर्म सब जाग जानी
मिथ्या भेल आब कृष्ण वाणी
कतय छथि भगवती से ने जानी
खूने आब ने रंगाओ
हे भगीरथ, पुनः आउ
असमंजस

बॅंटल छी दू टुकड़ा मे
आधा एम्हर आधा उम्हर
संघर्षरत अछि सतत
मोन हमर एम्हर - उम्हर
की छोडी की राखी हम
लालच अछि फैलल सगर
ग़ामे जन्म बचपन बीतल
व्यवसाय विदेश डगर
सुख सुविधा रहितो सदिखन
मोन बसल स्वदेश अपन
किया जाउ गाम हम वापस
उन्नति छोडि अवनति डगर
दिया सलाई फेक के नेसी
पाथर घसि चुल्हि भन्साघर
इंटरनेट छोडि ली समाचार
बैसि दलान चौपाडि पर
नोत पुरै के नाम पर अपन
टांगी नौकरी खुट्टी पर
ई सब बुझितो मोन गडल अछि
गड्चुन्नि के झोरे पर
बाधक ताज़ा बसात भोरूकबे
की भेटत ओ पार्क मे ?
गपास्टक अध्याय दलान पर
की भेटत ई मीटिंग मे ?
फेन्टब तास जमा चौकड़ी
की भेटत ई पार्टी मे ?
घूर मे पाकल अल्हुआ अल्लू
स्वाद भेटत ई ओवेन मे ?
सोचि सोचि हम बिखरल छी
आधा एम्हर आधा उम्हर |

 
शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’
कवि‍ता
मुरूदा जगाउ

इजोतमे तँ सभ चलै छै
अन्‍हारमे चलि‍ कऽ देखाउ
स्‍वान सुनि‍ पदचाप जागय
चचरी चढ़ल मुरूदा जगाउ
पृपक मीठ दर्द सुनि‍ बौराएल
पटरानी-मंत्री-सेनापति‍-चाकर
ओइ अभागल दि‍स के तकलकै
जे सर्ववि‍हि‍न जकर देह जर्जर
भरल पेट हाफी करैत
पहुँचल महाजन दुआरि‍ जखने
स्‍वार्थक दुग्‍धसँ बनल पयस
भरि‍ थारी आगाँ रखलौं तखने
ऑत चटचट कंठ सूखल
पानि‍ नै जे घोंटि‍ पाबय
सुक्‍खल अछोप मद्यम जनकेँ
झाॅटि‍ ‘चंडाल’ कहि‍ भगाबए
देवध्‍वनि‍मे नि‍पुण वाचक
पंचतत्‍व देहे भरल छै
पि‍रही नै केओ दैत ओकरा
छुद्र कुलमे ओ जनमल छै
देव धर्मकेँ पीस रहलै
झपटल सोन बोरि‍ कऽ बटोरल
केहेन वि‍कराल मृगतृष्‍णा ई
सभ घोंटि‍ उन्‍मत्त जहर घोरल
अंति‍म आग्रह ि‍थक सुनू बौआ
ऐ फेरमे कखनौं परब नहि‍
अपना संग सभकेँ जगाएब
कुमार्ग कहि‍यो धरब नै।।


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१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.रामवि‍लास साहुअक्षय कुमार चौधरी
शिवशंकर सिंह ठाकुर
 
आँजन सँ आंजित आंखि हुनकर,
सोन सँ बढ़ी क रूप हुनकर ,
सिनुर भरल माँग हुनकर ,
ललका साडी में लिपटल देह हुनकर !!!!!

लाज भरल मुस्कान अधर पर ,
फूल सँ कोमल काया हुनकर,
प्रेम सँ छालकैत नयन हुनकर,
मेंहदी रचल हथेली हुनकर !!!!!!

छम-चम् बाजैत पायल हुनकर,
मिसरी सनक बोल हुनकर,
गुलाबक पंखुरी सन ठोर हुनकर,
खिलल यौवन मदमाईत हुनकर !!!!!!!

मोन के लुभाईत नजरि हुनकर,
अविरल धार प्रेमक हुनकर,
रमैत शिव शंकर देखि क हुनका,
रसपान करैत रूप हुनकर !!!!!!!
लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ

रहि-रहि क हमरा सताबय छथि,
यौवन अपन ओ देखाबय छथि,
हम विवश छि अपने हाथें ,
प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि !!!!!!!
यौवन अपन ओ ............

कखनो ओ कहती जे चलु सिनेमा,
कखनो ओ मेला देखाबै छथि,
कखनो क हमरा गाडी में घुमाबैत,
कखनो ओ बाईस्कोप देखाबै छथि !!!!!!
यौवन अपन ओ ..........

कखनो कहती जे मांथ दुखाईये,
कखनो क पैर ओ दबवाईत छथि,
कहियो कहियो जाँ प्रसन्न रहै छथि,
रस्गुल्लो ओ हमरा खुआबई छथि !!!!!!!!!
यौवन अपन ओ ...........

हमहू सोचै छि जे हर्जे की अई ,
प्रेमो त हमरा सँ ओ करै छथि,
कखनो कहै छथि 'हम केहन लगई छि',
कखनो ओ ठेंगा देखाबै छथि !!!!!
यौवन अपन ओ .............

कखनो ओ कहती जे बाड़ी मे चलु,
कखनो ओ गाछी घुमावई छथि,
मने मने हमहूँ त राजिये रहै छि,
की की ने हमरा देखाबै छथि !!!!!!
यौवन अपन ओ ..........

एक दिन भेँट गेली रस्ते मे ओ ,
पईत गेली बुझु सस्ते मे ओ ,
फेर की की भेल से कहलो ने जाय ,
लुटा गेलौंह हम त रस्ते मे यौ !!!!!!!!!
ठका गेलौंह हम त सस्ते मे यौ,

यौवन अपन ओ देखावै छथि,
प्रेम ओ हमरा पर लुटाबई छथि,
गूड़क माईर बुझु धोकरे जनैया,
की की ने हमरा संग करइ छथि !!!!!!!!!!

रामवि‍लास साहु
कवि‍ता

धनरोपनी

सावनक राति‍
इजोरि‍या जरैत
पूरबा हवा दोमैत
आसन लगौने बैस
अकास नि‍हारैत
सोचैत छल
आश लगेने
सावनक बून्न
कहि‍यो खसत
जे भरि‍ खेत
धनरोपनी हएत
कि‍छु दुर नवमे
बि‍जली चमकैत
ढनमनाइत दस्‍तक दैत
बादल उमरि‍ गेल
धरतीपर बेंगक
बाजा नि‍रंतर बजैत
झि‍ंगुरक झनकारसँ
धरती धमकाबैत
मेघक बरि‍याती
सजए लागल
कारी काजर सन
मेघ उमरि‍ पड़ल
बि‍जली छि‍टकैत छि‍टकैत
मेघक रास्‍ता देखबैत
पसरि‍ गेल चारूकात
घनघोर बर्खा भेल
डबरा-खत्ता भरि‍ गेल
खेत चानी सन चमैक गेल
खेतक पानि‍सँ
धूर तड़पैत उछलैत
इचना-पोठी-टेंगरा
चाल दैत कुदकैत देख
गामक बच्‍चा बेदरू
कूदि‍-कूदि‍ माछ पकड़ैत
बि‍हानेसँ गजार कदबा
हुअए लगल खेत
हर जोतैत हरबाह
बि‍रहा गाबैत
गामक माए-बहि‍न
धानक बीज उपारैत
भूलल बि‍सरल
सोहर समदाउन गबैत
धनरोपनी करैत खेत
हर्षित मनसँ कहैत-
हरक नाश आ
खेतक चासपर
पेट भरबाक अछि‍
सभकेँ आश।
अक्षय कुमार चौधरी पिता राजनारायण चौधरी, ग्राम+पोस्ट: महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला: सहरसा. संप्रति दिल्ली स्कुल आ‌‍फ इकोनोमिक्स मे अन्वेषक आ समाजशास्त्री छथि. हिनक "Dowary among the Maithil Brahmins: aspects of Change and contitunity" बिषय पर पी. एच. डी. आओर "Marriage among the Maithil Brahmins" बिषय पर एम. फ़ील. केर अन्वेषन काज छैन्हि. अन्य बिषय पर प्रकाशित आ अप्रकाशित सेमिनार पेपर के अतिरिक्त वर्ष २००९ मे जापानक क्यो़टो विश्वविद्यालय केर 1st Next Generation Glowal Workshop मे हिनका द्वारा प्रस्तुत कैल आ छपल लेख "Gender and Heterosexsual Relationship in Intimate and Public Sphere: Ethnography of Maithil Brahmin Community" विषय पर लिखल गेल अछि।
वाणिक लैस

उत्तराहा कहलथिन दखिनाहा कैं-
रौ, तोरा माटि मे लैस छौ
मुदा वाणि मे लैस नहि.
...उत्तराहा? ...दखिनाहा?
वाणिक ऐव तँ ऐव छैक!
...कैव तँ कैव छथि!!
ओलक कब-कब ऊपजै छै
गंगोतिओ माटि-पानि पर!
कोशिकन्हो माटि-पानि पर!!
बोल, भाव, स्वभाव, केर मिठास
कि मोल भेटय बजार में?
वाणिक लैस कें कि मतलब
उत्तर, दखिन, शिक्षा, विदूता सँ!
वाणिक तेख तँ तेख छैक!
... कैव तँ कैव छथि!!

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 १.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’२.उमेश मण्डल ३.विकास झा रंजन


 १.
जगदीश चन्द्र  ’अनिल’


गजल



मन्दिर सं हम उतरि गेलहुं
सत-सत बाजब बिसरि गेलहुं।


दू टा कन्यादान शेष अछि
एकहिटामे उजड़ि गेलहुं।


आबि रहल छल चन्दा मांग’
बाध दीस हम ससरि गेलहुं।


कजरी लागल छलै बाट पर
नहि देखलियै, पिछड़ि गेलहुं।


अहांक आंखि केर नोर भेलहुं हम
अहंक गाल पर टघरि गेलहुं।

हमहूं हाट छलहुं भरि गामक
सांझ पड़ल तं उसरि गेलहुं।





आएब नीक लागल, छिड़ियैब नीक लागल
दू-चारि दिन बिताक’ घुरि जैब नीक लागल।


सत्य बाजि क’ कियो मुइल कहां कहियो
ईशा जकां शूली चढि जैब नीक लागल।


जहां-तहां गहुमन सोझांमे ठाढ़ भेटल
कात द’ क’ आगां बढ़ि जैब नीक लागल।


भाफ जकां कखनहुं सागर सं उड़ि गेलहुं
मेघे जकां कखनहुं झड़ि जैब नीक लागल।


हंसिए क’ कटलहुं पताल केर जीवन
आकाश जखन भेटल, उड़ि जैब नीक लागल।


ओम्हर छल परसल छप्पन प्रकार व्यंजन
एम्हर अहांक चिट्ठी, पढ़ि जैब नीक लागल।
 
उमेश मण्डल
1
एतऽ माथ चकराइए चलू घुरि‍ चली
तनोसँ तन छुबाइए चलू घुरि‍ चली

कि‍यो ककरो नहि‍ देखैए ऐ समाजमे
मोने मन झगड़ाइए चलू घुरि‍ चली

गोर मौगी गौरवे आन्हर भेलि‍ अड़ल
करि‍या बाट बुझाइए चलू घुरि‍ चली

कोन उपाए लगाबी तौड़ैले ऐ फानीकेँ
टूटि‍ मन जे कनाइए चलू घुरि‍ चली

करब नै कोनो आस ऐ समाजसँ हम
उमेशो जे घुरियाइए चलू घुरि‍ चली


2
कल्‍याणक बाट नै पकड़तै लगैए ई
भाँड़ि‍-भाँड़ि‍ सभकेँ झपटतै लगैए ई

अकालोमे काल बनि‍ बौएलक सभकेँ
कि‍छु बाजी तँ और मखड़तै लगैए ई
 
‍कोनो आंगुर कटने अपने होइ घा
भेद नै करबै तँ झगड़तै लगैए ई

मुँह सीब क रहब तँ रहि‍ सकैत छी
लोक गीत जँ गेबै चहकतै लगैए ई

छोड़ि‍ देने टूटि‍ जाएत समाज अपन
उमेश जोड़तै तँ चहकतै लगैए ई‍

विकास झा रंजन

गीत
नजरि

नजरि बचा कऽ नजरिसँ देखै छी,
देखी ने अहाँ डेरा कऽ देखै छी!

जखनो देखै छी मुदा नवे लगै छी,
तैं नित नजरिसँ नुका कऽ देखै छी!

सोझाँमे अबितौं बाटे तकै छी,
नजरिमे अहींक छाही देखै छी!

नजरिसँ सभटा खेरहा करैत छी,
चुप्पे मुदा हम सभटा देखै छी!

अहाँ रूपक किताबो पढ़ै छी,
 
जुनि सोचू गलत नजरिसँ देखै छी!
 

रुबाइ
 ईशा आ पैगम्बरक झगरा सुनलौं,
अन्हरा जिहादक फतबा सुनलौं,
सुनलौं निछा गेलइ लादेन परसू ,
आइ फेर केदन लादेन भेल ई की सुनलौं !

हुनक सोह टीसइए काँट बबूर जेना ,
आँखि भिजैए तारी खजूर जेना ,
हुनके रूपक चिप्पी लगेलौं करेजमे,
ओ अघाइ छथि कछहरिक हजूर जेना !




ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. अजीत मिश्र,
जन्म स्थान- नबटोल(मात्रिक), पैत्रिक- आदित्य वास, पाहीटोल, सरिसब-पाही, मधुबनी।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दड़िभङ्गासँ स्नातकोत्तर(मैथिली) कएलाह बाद 1994 सँ 2006 धरि आकाशवाणी, दड़िभङ्गामे आकस्मिक मैथिली अन्तरवार्ताकार ओ समाचार-वाचक रुपमे कार्य। पछाति भारत सरकारक अन्तर्गत भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरमे मैथिलीक प्रवेशक उपरान्त मैथिलीक पहिल प्रतिनिधिक रुपमे पूर्वी प्रादेशिक केन्द्र, भुवनेश्वरमे पाहुन प्राध्यापक  भए 10 जूलाइ, 2006सँ कार्य प्रारम्भ। एतए लगातार तीन वर्ष धरि कार्य सम्पादनक बाद भारत सरकारक राष्ट्रीय ज्ञान आयोगक अनुशंसा पर राष्ट्रीय अनुवाद मिशनकेर गठनक उपरान्त मैथिलीक मुख्य शैक्षिक सलाहकारक रुपमे मइ, 2009सँ भारतीय भाषा केन्द्र, मैसूरमे कार्यरत।
दुर्गा चालीसा
वन्दन-अभिनन्दन गुरुक चरणमे, जनिक कृपासँ सभ मतिमान।
मनमे इच्छा करी प्रार्थना, माँ भगवतिकेर चपल चरण प्रणमान।।
शक्ति-दायिनी, बल-बुद्धि प्रदायिनी, कए कृपा सदा बढ़ाबी मान।
अछि मन करी अभ्यर्थना, जनिक कृपासँ सब किछु गतिमान।।
        
1
जय-जय-जय दुर्गा महरानी,
 दुख-दारिद्र-विपत्ति हारिणी।
2.
सकल मनोरथ पूर्ण कारिणी,
 शंख-चक्र-त्रिशुल धारिणी।
3
कर कृपाण आ ढाल हाथमे,
 दस भुजा शोभय साथमे।

5.
ताकए चहु दिस अपनेक आस,
करी ने ककरो कहिओ निरास।

7.
बाजल चहु दिस जनिकर डंका,
रहल ने ककरो शक्तिक शंका।

9.
अपरुप सुन्दर जनिकर रुप,
शोभए सबहक हृदय स्वरुप।


4
जन-जन मांग वास हृदयमे,
 सभ पूरन हो सैह माथमे।

6.
सुर-असुरकेर आस बनल जे,
महिषासुरकेर नास कएल से।

8.
जन-जन मनमे जनिक निवास,
बहए सगर दिस सुन्दर सुवास।

10.
मनमे बास पूरत सभ आस,
जन-जन हो ने कतहु निरास।


11.
हे भगवति! छी अहँ अपरुप,
करए आ पाबए से समरुप।

13.
जगभरि जकरा आस ने कोनो,
भरि आबए सुख तकरा मोनो।
15.
धवल नवल नव नित सयानी,
हरए-पूरए सब हित कल्याणी।

17.
  मुनहर नहि कहिओ मुरझार,
  परतन रहए सगरो धुरझार।



12
गहल चरण मनसँ जे तोर,
पाओल धन-जन तोरे कोर।

14.
हे माँ-ममता जगत भवानी,
मोर उर वास करह शर्वाणी।
16.
   चीवर वसन नयन सिनेह,
दीघर सपन भरल मुड़ेर।

18.
हे भगवति! अहँ रही सहाय,
   सकल मनोरथ संग पुराय।



19.
आस-वास हो सकल जहान,
जहिना जहनि बनए महान।
21.
क्षोणी मौनीसँ,   हो  परिपूर्ण,     
जन-मन नहि हो, घमंडे चूर्ण।
 23.
करी कृपा आ सदा सहाय,
भरी धरा माँ, सभे समाय।
25.
शक्ति-भक्तिसँ हो न विभक्त,
जन-मनमे हो  तोरहि भक्त।

27.
पूजए चहु दिस आस लगाए,
रहए सबे नित हँसी भभाए।
20.
  चलए मस्त भए जेना कुरंग,
मन मयूर भए बाजए मृदंग।
22.
कृपा आशमे नति मति भए,
हम धएल आइ ई बेना माए।
24.
माँ केर ममता पाबि सकल,
दीन-हीनकेर मिटए विकल।
26.
धएने रही सब दिन ई धामा,
पड़ए ने कहिओ ककरो बामा।

28.
ईशक दृष्टिसँ पूर्ण धरा ई,
 सृष्टि रक्षा चढ़ि करू करी।
29.
 ई धरा धारसँ हो परिपूर्ण,
 मुदा धारकेर गर्व हो चूर्ण।
31.
हे मैया! तोँ सबहक रक्षक,
नजरि टेढ़ करए ने भक्षक।

33.
 ई जीवन जबूर ने लागे,
हीन भावना दूरे भागे।
35.
रहि-रहि मनमे भरए भावना,
नहि कहिओ क्षीण कामना।




30.
हम पतित तेँ ई पतिकिरनी,
चलए ने आबए अंगने घिरनी।
32.
जप-तप हमरा नहि ने आबए,
नहि मन हमरा थीर उपजाबए।

34.
वन्दन-अभिनन्दन नित्यनूतना,
करी कृपा जे, सफल साधना।
36.
तारा- तारिणी- रुद्राणीसन,
 शर्वाणी- नारायणी मनेमन।




37.
माँ केर ममता चहुदिस भाबए,
सगर समाजमे हित्तहि साजए।

39.
हे मैया अछि तोरहि आस,
करह ने कहिओ हमे निरास।
38.
नित-नित नूतन हे भवानी,
   हित-हित जीवन कहे पिहानी।

40.
जन-गण-मनमे तोरहि वास,
रहए सगरभरि सुन्दर सुवास।



शिवप्रिया हे रुप भवानी, करहु कृपा भए हित-कल्याणी,
       जन-मन बसए रुप मसानी, तोहेँ मैया ने बनह मानिनी।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.डॉ॰ शशिधर कुमरआनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा" ४.प्रभात राय भट्ट
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर                                    
एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा                                    
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४
     

        डॉ॰ शशिधर कुमर                                    
एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा                                    
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४

सभ सँ रसगर माएक भाषा (गीत)
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ  नञि हो मिसरी ।
करी ज्ञानार्जन पढ़ि बहुत विधा,
                          पर निज भाषा केँ जुनि बिसरी ।।


भाषा जे  पशु सँ  भिन्न केलक,
भावाभिव्यक्ति केर चिन्ह देलक ।
रटि  दोसर  बोली, बनि  सुग्गा,
                          अहँ ओहि भाषा केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


हो सारि  प्रिय,  सरहोजि  प्रिय,
पत्नी  केँ  राखी  सटा   हृदय ।
पर अछि अस्तित्व जनिक कारण,
                          अहँ ओहि माता केँ जुनि बिसरी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।


माएक  भाषा , अप्पन  भाषा ।
मिथिला – भाषा, अप्पन भाषा ।
परहेज  किए  एहि  भाषा सँ ?
                          आउ एहि पर हम सभ गर्व करी ।
सभ  सँ  रसगर  माएक  भाषा,
                           भाषा सँ मीठ नञि हो मिसरी ।।
         गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर (गीत)  


कमल नयन लखि,
               मधुर वयन सुनि,
                              हुलसित मन ई चकोर ।
                                              गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।
       
हमरा  एते  तोँ जुनि तरसा गे ।
अपन अधर मधु रस बरिसा दे ।
                           जुनि बन तोँ एतेक कठोर ।
                      गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।

बोल - सुबोल  हृदय  उद्‌बेधल ।
तोहर सरिस दोसर नञि देखल ।
                          उर – अन्तर उठय हिलोर ।
                     गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।

कोयली जदपि सातहु सुर सीखल ।
तदपि सखी , तोहरा नहि जीतल ।
                            मधु भरल छौ पोरे पोर ।
                     गे सजनी !  फोल कने फेर ठोर ।।








          हम नञि कहब कि ......... (गीत)

हम नञि कहब कि  फूल  मे गुलाब  छी अहाँ,
हमर जिनगी केर स्वप्न ओ “ताज”  छी अहाँ ।
मुदा जिनगीक एकसरि  अन्हरिया मे विकसित,
सुन्नर     सुमधुर   प्रभात   छी  अहाँ ।।

हम नञि कहब कि “सुष्मिता” सँ नीक छी अहाँ,
“ऐश्वर्या”  केर   जेरॉक्स   प्रतीप   छी  अहाँ ।
अहाँ  नञि  चाही  हमरा,    इच्छा   अहँक,
मुदा अहीं  हमर  अन्तरा , ओ गीत छी अहाँ ।।

किछु  अन्यथा  ने    सोचब,  से  आग्रह  हमर,
एक  कवि  केर   दुस्साहस  केँ  कऽ  देब क्षमा ।
अहाँ    अँऽही    रहब,   हऽम    हमही   रहब,
अहँक   चाहत    रखबाक    हमर   हस्ती    कहाँ  !!


 

आनंद कुमार झा
आनंद झा "मैथिल"
पंचैती


एक बेरक बात कहै छी
गाममे होइत रहै पंचैती
अप्पन खुट्टा एतै गारब तइ ले
भेल फरिछैती

सुखु बाबु अध्यक्ष बनला
पुछलनि की भेल बात
टुनमा - मुनमा चला रहल छल
एक दोसरपर हाथ

मंगरू कहलक यौ पंडी जी
कोना कऽ छुटतै झगरा
एकरा दुनुमे मुन्मा
सदिखन करैत रहै छै रगरा

मंकुआ केँ
 रहल नै गेलै
कहलक मंगरुआ चुप रह
मुनमा संग तोरो झगरा छौ
अखन कने तों गुम्म रह

भोला बाबू झट दऽ
 बजला
कोन काजमे लागल छी
बहत्रम साल हमर चढि रहल अछि
बिन बियाह हम अभागल छी

कोरियानी सँ छप्पन महतो
हरबर हरबर आयल
सब पञ्च केँ कल जोड़ि कऽ
बैसल छल सरियाएल

मोती काका जोर सँ बजला
टुनमा मुनमा सुनि ले
जत्तऽ जत्तऽ खुट्टा गारबें
दुन्नू खद्धा खुनि ले

अहजव शाहू चट दऽ बजला
दुन्नू बंद करू ई नाटक
हमरो टोलमे सुनरी काकी
चला रहल छै टाटक

केम्हरो सँ
 पहलमान जी केँ  देखलौं
लाठी लेने दौड़ला
सुखु बाबू लंक लऽ कऽ देखते
ओतऽ सँ भगला
पंचैती टूटि गेल तखने
टुनमा-मुनमा देखलक
छोड़ ई झगड़ा बंद ई रगरा
दुनू भैयारी सोचलक

टुनमा कहलक सुन रौ मुनमा
खंती आ खुट्टा लऽ कऽ आबए
जतए मोन छौ छोट भाइ छें
खुट्टा ओतए धसाबए

मुनमा केँ रहल नै गेलै
कहलक, भैय्या..
हम सभ की करै छलहुँ ,
एक ठाम जँ
नै जीबै तँ कोन जहर पीबै छलहुँ

छुटल झगड़ा मिटा गेल रगरा
दुन्नू हाथ मिलेलक
अंतमे बाजल यएह छै मिथिला
सबहक नाम बढेलक
 

नवीन कुमार "आशा"
कोना बिसरू तोरा
तोहर यादमे गै सजनी
एकटा गीत पेश करै छी
जहिया तूँ गेलेँ दूर
नै लागए किछु नीक
तोहर यादमे पेश करै छी
दिलसँ एकटा गीत

आ आ आ आ आ
सजनी सजनी सजनी गै सजनी
के कहत हमरा साजन
ककरा लेल बजाउ बाजन
आब बस रहलौ तोहर इयाद
ककरासँ करू फरियाद
के कहत हमरा साजन
ककरा लेल बजाउ बाजन
सजनी सजनी गै सजनी

प्रभात राय भट्ट
चुनमुन चुनमुन करैत चिड़िया 
बैसल अपना खोतामे
ऊपर सं मूत्र प्रवाह केलक
हमर जल भरल लोटामे
तामस सं हम मातल
आइग लगेलौं खोतामें
फुर सं चिड़ैया उड़ीगेल
आइग लागल हमरा कोठामें
चीं चीं करैत चिड़ैया
खोता जरैत देख ब्याकुल भेल
लहलहैत आइगमें चिड़ैयाक
 बच्चा जैरक मईरगेल
मनाबरूपी दानव तोई
केले किये एहन दुष्कर्म
रिस रागक वशीभूत मनुख
कतय गमैले दया धर्म
हमरा खोतामे आइग लगेले
अपनो घर जरैले
तू बुझैत छे इ कोठा तोहर
हम बुझैत छि इ खोता हमर
ईर्ष्या  दोष  लोभ  क्रोध  मोह 
त्याग  देख  कने दूरदृष्टि
मुदा नै किछ तोहर नै हमर
इ थिक  ईस्वरक श्रृष्टि 
खाली  हाथ  येले  जगमे  
खाली  हाथ तोई जएबे
कर्निक धरनी मालिक कें
दरवारमे तोई पएबे
गरीबक जिनगी भेल पहार
दुनिया सगरो लगैया अन्हार -- २

भूखल पेट जेकर टूटल घरदुवार
वर्षा में भीत गिरल हवा उरौलक चनवार
फाटल अंगा झलकैया अंग उघार
सर्दी सं थर थर कापिं बहैय पूर्वाबयार
गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2
दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2

दिन दू;खी पैर हुकुम करैया
नेता आर सरकार
गरीबक बच्चा कोना जिबैय
केकरो नै कुनु दरकार
गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2
दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2

बड़का माछ छोटका माछके
बनौलक अपन  आहार 
धनवान बनल अछि शिकारी
निर्धन के करेय शिकार
गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2
दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2

अन्न अन्न लय जी तर्सैया
भेटे नै किछु आहार
के बुझत मर्म गरीबक
साहू महाजन नै दैय उधार
गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2
दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2

माए बाबु रोग सं ग्रसित
कोना करी हुनक उपचार 
तंग आबिगेलहूँ हम
देख इ दुनियाक व्यवहार
गरीबक जिनगी भेल पहार ..............2
दुनिया सगरो लगैया अन्हार ............2


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ .अमित मोहन झा

रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’, मैथिलीक पहिल जनकवि आ मैथिलीक भिखारी ठाकुर रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क गीत आ झारु।
गीत-
झारू- डूबल हि‍न्‍द अज्ञान के सागर।
तैप रहल अछि‍ लोभ बुखार।।
शाशको तँ बंचि‍त नै देखाबै।
के करतै एक्कर उपचार।।

झारू- फेर कऽ गेल ऐपर सभटा।
एण्‍टि‍वायोटि‍क धरम इमान।।
नि‍ष्‍ठा नैति‍कता मर्यादा।
दया मानवता नीि‍त ज्ञान।।

तर्ज- मानव मारै छै मानवताकेँ
चढ़ि‍ गेल छै अज्ञान यौ-2
सभा लगा कऽ सभ कि‍यो सोचू
देशक सभ वि‍द्वान यौ-2

गीत- सभ बनल छै पैसा रोगी,
अन्‍धवि‍श्वास, कुरीतक जोगी
सि‍र चढ़ल परवान यौ। सभा......।
जनता राजा सभ अन्‍हरेलै
न्‍याय वि‍कासी काम बनरेलै
साहि‍त बनि‍ कऽ ठक लुटेरा
लुटै शान्‍ति‍ ज्ञान यौ। सभा......।
अहाँ बि‍ना के ई दुख हरतै
अहींसँ ई सभ दानव मरतै
कलमकेँ एक बेर फेर बनाबू
रामक तीर कमान यौ। सभा......।

दू दर्जन ‘झारू’
1
ताज मि‍लै सम्‍पूर्ण जगतकेँ
आ बनि‍ जीबए झारूदार
मानवमे मानवता होइ तँ
बदलै नै ओकर अवतार।।
2
रंगू नै जीवन जाइत धरमसँ।
सभकेँ मानू अप्‍पन मीत।।
नीच ऊँचक भेद भुलि‍ कऽ।
गबैत रहु मानवता गीत।।
3
सत्ता हमर सारे जगतपर।
मानवता हमर मेघा वि‍धान।।
पालनमे जे करए ढि‍ठाइ।
स्‍वीकारए ओ नरकक खान।।
4
जन-जनपर हम्‍मर शासन छै।
हर चि‍जपर हम्‍मर अधि‍कार।।
कोनो प्रप्‍त अप्राप्‍त कहाँ छै।
तर्क लगा करू स्‍वीकार।।
5
हर अेा मानव हमर सि‍पाही।
जि‍नका छन्‍हि‍ मानवता ज्ञान।।
मारू कुचलि‍ दियौ बेमानवता।
बढ़ाउ जगमे अपन नाम।।
6
हमरासँ पहि‍ले कोनो नै शासन।
नै छै कोनो धर्मक वि‍धान।।
हमरा बि‍नु जगत सूना छै।
हटैबला छै पशु समान।।
7
हमरा लेल छै कि‍यो नै ऊँच।
नहि‍ कि‍यो नीच नादान।।
जे बरतलक ऐ धर्मकेँ।
अटल जगतमे हुनकर नाम।।
8
हम मानवक मूलाधार छी।
सभ धरमक पि‍ता समान।।
पाप पुण्‍यसँ अति‍ परे छी।
देवतो छी हम्‍मर संतान।।
9
मानव वास्‍ते सीमा सरहद
मानवताकेँ सक्कर खेद।।
जाति‍ धरम सरहदसँ अलग छै।
मानवतामे कोनो नै भेद।।
10
जब धरै मानवता मानव।
रहै नै भीतर जाइत धरम।।
नि‍ष्‍ठा इमान कऽ करए आदर।
और पुजै नि‍त्‍य सत् कर्म।।
11
जब मानव धरै मानवता।
तब बढ़ै जन-जनसँ मेल।।
दूर रहै घरसँ सभ टेन्‍शन।
ब्‍यापै नै कोनो झगड़ा झेल।।
12
जब धरै मानवता मानव।
पक्का होइ ओकर इमान।।
डर लगै छै असत् कर्मसँ।
कि‍न्‍नौं नै बदलै ओकर जुवान।।
13
जब मानवता धरै मानव।
तब उपजै मन लाज लेहाज।।
आदर दीली बड़ा पाबै छै।
रहै नै छोट प्‍यारसँ बाज।।
14
मानव जब धरै मानवता।
ओकरासँ कोइ दुखै नै जीव।
और नै दुनि‍याँ ओकरा सताबै।
जीवमे देखै अल्‍ला शि‍व।।
15
मानव जब मानवता धरै।
तन पहि‍र नैति‍क परि‍धान।।
धरम इमानक रक्षा खाति‍र।
करै न्‍यौछावर धन आ जान।।
16
मानवता जब धरै मानव।
मि‍ट जाए नि‍च ऊँचक शान।।
दुनि‍याँ देखाबै सम बराबर।
देखै ने कि‍यो अप्‍पन आन।।
17
धरै जब मानवता मानव।
ब्‍यापै नै ओकरा त्रि‍वि‍ध ताप।।
काम क्रोध ने लोभ सताबै।
अन्‍धवि‍श्वासमे करै नै जाप।।
18
मानवता जब शासक धरै।
सुख सम्‍पन्न होइ जनता तमाम।।
मि‍टै मूलसँ भूख गरीबी।
रहै नै पाछाँ वि‍काशी काम।।
19
मानवता जौं न्‍याय कर्मी धरै।
कम हेतै केश फाइलक थान।।
कहल मुक्‍त भऽ साड़ी जनता।
देखतै फेरसँ नया बि‍हान।।
20
जौं मानवता धरै सि‍पाही।
शुद्ध शासन कऽ रचै वि‍धान।।
झगड़ै नै जन-जनसँ कि‍यो।
शान्‍ति‍ होएत सबहक परि‍धान।।
21
मानव जब मानवता धरै।
प्रगट होइ भीतर नीत इमान।।
नि‍ष्‍ठा मर्यादा नैति‍कता।
दया धरम सतकरम वि‍धान।।
22
जब त्‍यागै मानवता मानव।
भऽ गेल ओकर शान्‍ति‍ भंग।।
जकरा अखन तक कहै छल अप्‍पन।
ओकरेसँ भऽ गेल भारी जंग।।
23
मानवता जब छोरै मानव।
भऽ गेल अेाकर बेड़ा गर्क।।
चि‍क्कारे जगवासी ओकरा।
जीबै जीवन बना कऽ नर्क।।
24
अमूल रत्न मानवता मानू।
जे पाॅलक ई जनहि‍त भाव।।
दुख तँ हुनका रहि‍ते नै छन्हि‍।
रहै नै कोनो सुक्खक अभाव।।


अमित मोहन झा, ग्राम-भंडारिसम (वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत।

कोना जीवन बिततै

ताकै छी नैना भरि भरि,
काटै छी अहुरिया,
हाँ बिन तड़पइत बीतए,
कोना कऽ उमरिया,
कोना जीवन बिततै ,
यौ कोना जीवन बिततै,
बाटपर लागल अछि नजरिया,
कोना जीवन बिततै।

जखने सँ सोलह चढ़लै,
पिया निर्मोहिया बनलै,
कोना कऽ हमरा बिसरलै,
कोना कऽ नेहा टुटलै,
कोना जीवन बिततै,
यौ कोना जीवन बिततै,
एलै यौवनक दुपहरिया,
कोना जीवन बिततै।

चिठ्ठियो नै पाँती पेलौं,
रातियो तरेगन गनलौं,
यादिमे कुहकैत कुहकैत ,
गाछीक कोयली बनलौं,
कोना जीवन बिततै,
यौ कोना जीवन बिततै,
नहिये एला हमर साँवरिया,
कोना जीवन बिततै,
सुनू अमित आनंदक नजरिया,
कोना जीवन बिततै।

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"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...