Sunday, October 30, 2011

'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४७ अंक ९३)- PART I



                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ९३ म अंक ०१ नवम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ७ अंक ९३)NEPALINDIA              
                                               
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य













३. पद्य











३.६.१. प्रभात राय भट्ट २.उमेश मण्डल


३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमरपंकज कुमार झा ३.नवीन कुमार "आशा"



४. मिथिला कला-संगीत-.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण ४.राजनाथ मिश्र (चित्रमय मिथिला) ५. उमेश मण्डल  (मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव-जन्तु/ मिथिलाक जिनगी)

 

बालानां कृते-१. डॉ॰ शशिधर कुमर  २.संस्कृति वर्मा ३.बिपिन कुमार झा

 

 भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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१. संपादकीय


दूषण पंजीक स्कैन कएल सिंगल पी.डी.एफ.क १७ टा फाइल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। पंजीक हमरा सभक पोथीमे ओना तँ ११००० तालपत्रक जे.पी.जी.इमेज क डी.वी.डी. सेहो अलगसँ किनबाक व्यवस्था रहै आ ओइ डी.वी.डी.केँ कबिलपुरक सगर राति दीप जरएमे हम बाँटनहियो रही, मुदा ओइमे जे दूषण पंजी रहै तकर कारण कतेक पंचैती भेल, कतेक गोटे सोझाँ आ फोनपर गारि पढ़लन्हि। अखनो बहुत गोटे पंजीमे ओकर चर्चासँ भितरे-भितरे गुम्हरैत रहैत छथि आ गपमे तामसे हाँफऽ लगै छथि जेना खून पीबि जेता। ऐ दूषण पंजीमे ब्राह्मणक आन जाति खास कऽ दलित आ मुस्लिमक संग विवाह, वा पतिक मृत्युक बाद सन्तानक जन्मक लिखित दस्तावेज अछि। ओकरामे हेर-फेर केनाइ हमरासँ सम्भव नै छल। पंजीक पोथीमे शब्दशः एकर मिथिलाक्षरसँ देवनागरीमे लिप्यंतरण भेल अछि। एतए हम मूल ताड़पत्र आ बसहा पत्रपर लिखल पंजीक स्कैन कऽ बनाएल पी.डी.एफ. फाइलक लिंक दऽ रहल छी आ संगमे पंजीक लिंक सेहो। कियो नै कहि सकैत अछि जे ऐ मे एक्को रत्ती अशुद्धि अछि। गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ फेर हुनकर चर्मकारिणीसँ भेल विवाहक एतए वर्णित भेटत। ई वएह नव्य-न्यायक जनक गंगेश छथि। आनन्दा चर्मकारिणीसँ विवाह एतए सेहो भेटत जे हमरा द्वारा लिखित प्रेमकथा "शब्दशास्त्रम्"क आधार बनल।
दूषण पंजी- मूल मिथिलाक्षर लेख- ताड़पत्र सिंगल पी.डी.एफ. https://docs.google.com/a/videha.com/viewer?a=v&pid=sites&srcid=dmlkZWhhLmNvbXx2aWRlaGEtcG90aGl8Z3g6ZjFiNTA5NGI2YTVlNGEx
 मोदानन्द झा शाखा पंजी- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/modanand_jha_shakha_panji.pdf
 मंडार- मरड़े कश्यप-प्राचीन- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mandar_marare_kashyap_prachin_complete.pdf
 प्राचीन पंजी (लेमीनेट कएल)-  http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/laminatedpanji.pdf
 उतेढ़ पंजी-  http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_7_uterh_panji.pdf
 पनिचोभे बीरपुर- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/Panichobhe_Birpur.pdf?attredirects=0
दरभंगा राज आदेश उतेढ आदि https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/DARBHANGA_RAJ_ORDER_PANJI_PACHHBARI_ORDER_UTEDH.pdf?attredirects=0
 छोटी झा पुस्तक निर्देशिका- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_directory_chotijha_shakha_pustak.pdf
पत्र पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/patra_panji.pdf
मूलग्राम पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_8_moolgram_panji.pdf
मूलग्राम परगना हिसाबे पंजी http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/panji_9_moolgram_parganawise_panji.pdf
मूल पंजी-2 http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/moolpanji_2.pdf
 मूल पंजी-३- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_3.pdf
मूल पंजी-४ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_4.pdf
मूल पंजी-५ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/mool_panji_5.pdf
मूल पंजी-६ http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/moolpanji_6.pdf
 मूल पंजी-७- http://videha123.files.wordpress.com/2011/09/prachin_panji_last.pdf

पंजी-पोथी- http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab

२. एकटा पोथी आएल छल "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला",१९६२ (लेखक: चित्रकार श्री लक्ष्मीनाथ झा), आ दोसर पोथी "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.), २००९ (गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा , पंजीकार विद्यानन्द झा)"पंजी-पोथी- http://www.box.net/shared/yx4b9r4kab आ पंजीक पात सभ https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर उपलब्ध अछि। आब ऐ दुनू पोथीक किछु भाग चोरि कऽ दू गोटे अपना नामेँ छपबेलन्हि अछि आ तइमे हुनका लोकनिकेँ सहयोग सेहो भेटल छन्हि। सुशीला झा "अरिपन"२००८ नामसँ "मिथिला की सांस्कृतिक लोकचित्रकला" पोथीक अनुवाद अपना नामे कऽ लेने छथि,फोटो तक स्कैन कऽ चोरा लेने छथि आ तकरा भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर प्रकाशन अनुदान देने अछि, जकर विवरण ऐ पोथीपर लिखल अछि। डा. योगनाथ झा तँ सद्यः "जीनोम मैपिंग: मिथिलाक पंजी प्रबन्ध- ४५० ए.डी.सँ २००९ ए.डी.) क एक भागकेँ अपना नामेँ पंजी-प्रबन्ध (वंश परिचय- प्रथमभाग, २०१०) नामसँ छपबा लेलन्हि आ ऐ मे हुनका सहयोग भेटलन्हि श्रोत्रिय समाजक संगठन "महाराजा कामेश्वर सिंह सांस्कृतिक विकास मंच"क। ई श्रोत्रिय समाजक संगठन श्री लक्ष्मीनाथ झा, जे श्रोत्रिय छलाह, केर पोथीक चोरिक विरोध कोना करत? हिनका सभकेँ देख कऽ तँ पुरान चोर पंकज पराशर (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr) सेहो लजा जाएत। दस बर्खक मेहनति दस मिनटमे चोरि करैबला ई महानुभाव डा. योगनाथ झा उर्फ योगनाथ "सिन्धु" उर्फ सिन्धुनाथ झा ७० बर्खक छथि!! आ काल्हि जँ हिनकर कियो सी.आइ.आइ.एल. मे जान-पहिचानक हेतन्हि तँ हिनको पोथीकेँ ग्रान्ट भेट जेतन्हि।

३.हम एकटा निबन्ध लिखने रही मिथिलासँ पलायनक विषयमे। ओइमे हम एकटा सिद्धान्त देने रही जे मिथिलाक गाममे पचासो बर्ख रहलाक उत्तरो लोक पलायन केने छथि, मुदा मिथिलासँ बाहर रहियो कऽ मिथिलासँ जुड़ाव सम्भव छै।
ऐ सन्दर्भमे हमर एकटा कथा शब्दशास्त्रम् देखल जाए। ओइमे एकटा ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक प्रेम विवाहक वर्णन छै आ सात टा गीत ओइमे छै। अजित मिश्र ओइ कथाक प्रशंसा केने रहथि जे ई साहसिक कथा थिक, मुदा ई सत्यकथापर आधारित अछि तँ साहसक गप कतऽ सँ आएल। धीरेन्द्र प्रेमर्षिकेँ कथा नीक लगलन्हि मुदा निम्न वर्गक कथाक भाषा हुनका पाण्डित्यपूर्ण लगलन्हि। कोनो समालोचनाक हम सामान्यतः उत्तर नै दै छी, मुदा एतए ऐ कथाक दूटा वैशिष्ट्य हम अहाँकेँ बता रहल छी। ई कथा पंजीमे उल्लिखित ब्राह्मण आ चर्मकारिणीक विवाहपर आधारित छै, से ५०० साल पहिलुका (एहेन-एहेन लगभग सए अन्तर्जातीय विवाहक विवरण ओइ पोथीमे छै, मूल मिथिलाक्षर पाण्डुलिपि आ पोथीक लिंक ऊपर देल अछि।)। हुनकर वंश आइयो मिथिलामे श्रोत्रिय आ ब्राह्मणक रूपमे विद्यमान छथि, नाम आनन्दा चर्मकारिणी सेहो पंजीयेसँ हम लेने रही। तँ ई मिथिलाक इतिहासमे ५०० साल पहिनहियो मान्य रहै। ओइमे गीत सभ रहै
पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल,
मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
शब्दशास्त्रम "पर्वत ऊपर भमरा.."आदि गीत https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ ऐ लिंकपर दुनियाँ सुनि रहल अछि आ बनौवा डोमकछ आदिबला गीत जँ अपन समाजसँ जुड़ावक आधारपर लिखल जैतए तँ ओ सामन्तवादी गीत नै बनितए। बृखेश चन्द्र लालक पार्टीक झिझिया लोकनृत्य असली जुड़ावक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।प्रेमर्षि जी केँ ई पाण्डित्यपूर्ण बुझेलन्हि जे कोना चर्मकारिणी सभ एहेन गीत गबैए,ओहेन भाषा बजैए। कारण हेल्लो मिथिलामे जे डोमरी आदि बला बनौआ गीत सभ बजाओल जाइए ओइमे तँ गएर ब्राह्मणक सभ्यता आ ओकर महिलाक लेल जे गीतमे शब्द प्रयोग कएल जाइ छै् आ ओइमे ब्राह्मण जे निम्न वर्गक महिलासँ छेड़खानी करैए (अथर्ववेदमे सेहो एहेन रेफरेन्स छै, मुदा तीन हजार बर्खक बाद वएह स्थिति!) से भने हुनका ओइ जाति सभकेँ जोड़बाक प्रयास लगैत होइन्ह मुदा ओ ब्राह्मण सामान्तवादी सोचक अगिला कड़ी मात्र अछि। मुदा पालन झा जे गाममे रहै छथि हुनका ई गीत/ कथाक शैली पाण्डित्यपूर्ण नै लगलन्हि ओ कहलन्हि “हमर गामक चर्मकार टोलीक महिलाक गीत सुनब तँ गुम्म पड़ि जाएब, ब्राह्मण महिलासँ नीक गीत ओ सभ गबै छथि।" जीवकान्त गाममे रहै छथि मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलक “मौलाइल गाछक फूलक” नायक द्वारा अपन सभटा जमीन बाँटि देब हुनका मैथिल समाजमे अजगुत बुझेलन्हि, असम्भव बुझेलन्हि, काल्पनिक बुझेलन्हि। किए? पंजीमे कमसँ कम तीनटा (कमसँ कम) सर्वस्वदाताक उल्लेख हमरा भेटल जे अपन सभटा सम्पत्तिक दान दऽ देलन्हि। “मास्टर साहेब जीवकान्तकेँ दुख छन्हि जे हुनका भरिया नै भेटै छन्हि, खबास नै भेटै छन्हि” मानेश्वर मनुज जीवकान्तक आत्मकथाक समीक्षाक क्रममे ठीके लिखै छथि। ई किए भेल? कारण जीवकान्त ७० बर्ख गाममे रहलोक उपरान्त ने चर्मकार/ डोमक टोल कोनो उत्सव मे गेलथि आ ने धीरेन्द्र प्रेमर्षि चर्मकार/ डोमक टोलक कोनो उत्सवमे । हमर साहित्यकार मिथिलामे रहियो कऽ, गाममे रहियो कऽ पलायन कऽ गेल छथि, इन्दिरा गाँधीकेँ १९६७ क अकालमे देखाओल गेल जे मुसहर सभ बिसाँढ़ खा कऽ जिन्दा छथि मुदा ओइपर कथा लिखल गेल जगदीश प्रसाद मण्डल द्वारा (गामक जिनगी,२००९ मे), किए ? हमर नाटक उल्कामुख जे विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे मंचित हएत, मे गंगेश (नव्य न्याय तत्वचितामणि कारक) , जिनकर जन्म पिताक मृत्युक ५ बर्ख बाद आ विवाह चर्मकारिणीसँ भेलन्हि, केँ अखुनका हिसाबसँ देखबाक प्रयास कएल गेल अछि। एकटा ई-पत्र बहुत पहिने आएल छल, धीरेन्द्र प्रेमर्षिक। ओ लिखने रहथि जे हम विदेहमे “घोड़ा आ गधा दुनूकेँ संगे घोंसिया दै छिऐ।” संदेश कॉलममे ई संदेश हम अपडेट नै कऽ सकल छी। आब देवशंकर नवीनजीक साक्षात्कारक शब्द जँ गारि छिऐ तँ ई की छिऐ। भीमनाथ झा राधाकृष्ण चौधरीक “अ सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर”क विषयमे लिखने रहथि जे राधाकृष्ण चौधरी हड़ही-सुरही लेखकक नाम सेहो ओइ पोथीमे दऽ देने छथि, इतिहासमे मात्र पैघ (कृतिसँ प्रायः हुनकर मतलब होइन्ह) लोकक चर्चा हेबाक चाही। तँ की भीमनाथ झाक बादक प्रेमर्षिक पीढ़ी सेहो ओही पुरान बाटक अनुगामी नै भेल? ई तँ स्वतः सिद्ध छै जे घोड़ा आ पैघ व्यक्तित्व ओ सभ स्वयं छथि मुदा दोसराक विषयमे (अपनासँ सापेक्ष) मूल्यांकन कियो स्वयं कोना कऽ सकैए? ऐ सन्दर्भमे हमर ई कहब अछि जे लिम्बा रामकेँ आर्चेरी ओलम्पिक प्रतियोगिता लेल भारत प्रस्तुत केलक, मुदा ततेक दवाब हुनकापर पड़लन्हि जे आब हुनकर नाम लोक बिसरि गेल। जँ विदेहमे ३०० लेखक छथि तँ ओइमे सँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल हमरा सभकेँ मैथिली साहित्यमे प्राप्त भऽ सकलाह। जँ मात्र मुठिया सिंघ, सिलेबी रंग आ अदन्त फलनां बाबू सभ जुड़ल रहितथि तँ विदेहक ९३ टा अंक लगातार नै निकलि पबितए आ ने मैथिली साहित्यकेँ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुर, झाड़ूदार, उमेश पासवान, उमेश मण्डल आदिक विराट लेखनीसँ साक्षात्कार भऽ पबितए।

४.जँ सुभाष चन्द्र यादव, धीरेन्द्र , परमेश्वर कापड़ि वा बलचनमा (यात्री)क भाषा तथाकथित छोटहाबला छिऐ तँ ओ लेखकक बेछप शैली छिऐ, ओइसँ हमरा कोनो दिक्कत नै अछि, ओइमे ब्राह्मणक आ अब्राह्मणक बीच वार्तालापमे कोनो अपमानक भाव बला दू तरहक मैथिलीक प्रयोग नै कएल जाइ छै। मुदा जँ मलंगिया ब्राह्मण पात्र आ अब्राह्मण पात्र लेल दू तरहक मैथिलीक प्रयोग करै छथि, (मैथिली तँ स्वयं लोकक भाषा अछि,देश-कालक अनुसारे सृजित अछि), ओइमे मलंगियाजी केँ कोन फेँट-फाँट करबाक आवश्यकता पड़ि गेलन्हि?) तँ ओकर कारण अछि हुनकर सामन्तवादी सोच, ओ थोपड़ी सुनबा लेल ब्राह्मण दर्शकक समक्ष (ओ मानि कऽ चलै छथि जे उच्च वर्ग मात्र हुनकर नाटक देखत) अब्राह्मणकेँ हँसीक पात्र बनबै छथि। ऐ तरहक नाटकक निर्देशक थोपड़ी सुनि विभोर भऽ जाइ छथि। ऐ तरहक नाटकक अभिनेता-अभिनेत्री अपन आ अपन निर्देशकक क्षमताक आभास ब्राह्मण-कायस्थ दर्शकक थोपड़ी मध्य देखै छथि आ नाटककार तँ सद्यः सिंहासनपर विराजमान छथिये। मुदा ऐसँ मैथिली भाषीक बहुसंख्यक वर्ग जेना अपनाकेँ अपमानित अनुभव करै छथि तकर कनिको आभास, तकर मनोविज्ञानक कनेकबो ज्ञान जँ नाटककार/ निर्देशक महोदय सभकेँ रहितन्हि तँ ई थोपड़ी हुनकर हृदयकेँ भेद नै दैतन्हि? आ तखन ई कन्नारोहट किए होइए जे मैथिलीक जनसंख्या घटल जा रहल अछि!! तँ ओइ विषयमे हमर कहब अछि जे “नाट्यशास्त्रक दूटा शब्द- "ग्राम्य" आ "भाषा", ई दुनू नाट्यशास्त्रकेँ मूल रूपमे नै पढ़निहार लेल भ्रम उत्पन्न करैए। ग्राम्य नाटक भेल जै मे आकाशवाणी नै होइए, वास्त्विकता होइए (हमर अभिनय पाठशालापर आलेख देखू), नाट्यशास्त्रमे निरूपित भाषाक अनुरूप जे नाटक लिखल गेल (संस्कृतक सन्दर्भमे) ओइमे स्त्री आ शूद्र लेल प्रकृतक प्रयोग कएल गेल (कारण बुझले हएत जे संस्कृतक पंडितक घरमे हुनकर कनियाँ मूर्ख होइत रहथि आ संस्कृत जन सामान्यक भाषा नै रहि गेल छल), मुदा एक्कैसम शताब्दीक दोसर दशकमे मैथिलीमे किछु गोटे तथाकथित निम्न-वर्गक मैथिली इजाद कऽ क‍ऽ घोसिया रहल छथि, मात्र थोपड़ीक उद्देश्य लऽ कऽ, जखनकि अखन जे संस्कृतमे नाटक लिखल जा रहल छै, जकर मंचनमे हम सहभागी रहल छी ओहूमे प्राकृत वा आन कोनो भाषा नै रहै छै। हँ नाट्यशास्त्र मे निरुपित भाषाक अनुरूप बेचन ठाकुर, जगदीश प्रसाद मण्डल आदि असल खाँटी मैथिली, जइमे प्रवाह छै, केर प्रयोग कऽ रहल छथि आ जे ब्राह्मणवादी नाटककार द्वारा इजाद कएल तथाकथित गएर-ब्राह्मणक भाषापर अन्तिम मारक प्रहार अछि। नाट्यशास्त्रमे ग्राम्य नाटकक सेहो चर्चा छै, मुदा लोक गाममे होइबला नाटककेँ गमैय्या नाटक आ शहरमे होइबला नाटककेँ शास्त्रीय नाटक बुझै छथि। शहरमे सेहो वास्तविकता आधारित ग्राम्य नाटक होइत अछि। यूरोपमे सर्कसमे चीनक लोककेँ गधापर आनल जाइ छलै..आब उनटे चीनबला सभ यूरोपियनक से हाल कऽ देतै..से थोपड़ीक उद्देश्यसँ मात्र ब्राह्मण दर्शकक आगमनक आशासँ जे मैथिलीक नाटककार अखनो ई खेल खेला रहल छथि, हुनका नाट्यशास्त्र मूल रूपमे पुनः पढ़बाक चाही। तेँ हुनकर सभक नाटक समीक्षाक उपरान्त , ऐ कारणसँ , अधिकसँ अधिक "मेडियोकर" स्तर धरि पहुँचि पबैत अछि।

५. मुद्दा छै जे किछु गोटे सगर रातिसँ लऽ कऽ सभ ठाम जगदीश प्रसाद मण्डल जीक लेखन शैलीपर सवाल उठा रहल छथि, कथाक स्तरपर गप होइते कहाँ अछि, मात्र जे "करैत" आ "जाइत" क बाद अछि किए नै अछि; रामनाथहुँ किए नै अछि रामनाथो किए अछि, शब्द सभ ई कोड़ि कऽ अनै छथि (एकटा दोसर पाठकक पत्र छल!)। जतेक लेखक छथि ततेक मानकीकरण अछि तखन कथाक स्तरपर गप किए नै होइए? विषय-वस्तुपर गप किए नै होइए? जखन की हुनकर कथा विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ (मानकीकरण सेहो हुनकामे अछि) श्रेष्ठ अछि, सगर राति दीप जरए, सुपौलमे जे जातिवादी स्वर उठल आ पुरोधा सभ चुप रहलाह, मुन्नाजीक ऐ सम्बन्धमे प्रश्नावलीक अखन धरि पुरोधा लोकनि उत्तर नै देलन्हि, ओइसँ लगैए जे सभटा साजिशक तहत भऽ रहल अछि।सी.आइ.आइ.एल. कएक साल बितलोपर किए मानकीकरणक कोनो खाका नै दऽ सकल, कएकटा मीटिंग टा भेल। जखनकि ओकर कमेटी एकछाहा छै आ ओइमे वएह लोकनि छथि जे सभ सगर राति आदिमे सक्रिय छथि आ मानकीकरणक आधारपर जगदीश प्रसाद मण्डलक आलोचना हास्यास्पद रूपेँ करै छथि! मण्डलजी वा मानकीकरणक लेल कोनो हल्ला नै छै, ई मात्र ओइ अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक हल्लाक उत्तर छै जिनका ई  सफलता अबूझ बुझाइ छन्हि , जे वास्तविकतासँ दूर छथि आ जे मैथिलीक सरकारी कार्यक्रममे (छद्म धरातली कार्यक्रम!) एक दोसराक ढोल पीटै छथि। जगदीश प्रसाद मण्डलक १३ टा पोथी,  मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटककार बेचन ठाकुरक एक टा पोथी आ राजदेव मण्डलक अम्बरा (जकरा हम २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ कविता संग्रह कहने छी) केँ मैथिली पाठक जे स्थान देबाक छलै इन्टरनेटेपर नै धरातलोपर दऽ देने छै। ई सभ पोथी सभ प्रिन्टक संग ऐ लिंकपर सेहो उपलब्ध छै, देखल जाए https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ । ७४म सगर रातिमे १५ गोट कथा पाठ भेलै जइमे जगदीश प्रसाद मण्लक नेतृत्वमे ९ गोटे गेल रहथि, आ शेष मात्र ६ गोटे रहथि, जेँ  जगदीश प्रसाद मण्डल तेँ ई सगर राति आइयो चलि रहल छै। मुदा साहित्य अकादेमी आ सी.आइ.आइ.एल.क प्रायोजित धरातली कार्यक्रम (!) मे से अनुपात नै छै , किएक? कारण ओ संस्था सभ जमीनी वास्तविकतासँ दूर अछि। तारानन्द जीक जातिवाद दोसरे तरहक छन्हि- ओ लिखै छथि- "एतए तं मैथिलीक दुर्बल काया पर कूडा-कचडाक पहाड ठाढ करबाक सुनियोजित अभियान चलि रहल छै। एकर सफाइ लेल मेहतरक फौज चाही। ठीके तं छै। पहिने कहल जाय जे मैथिली ब्राह्मणक भाषा छी, आगू कहल जाएत जे मैथिली मेहतरक भाषा छी।" ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर मिथिलाक विभिन्न जातिक ऑडियो आ ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/  पर  वीडियो रेकॉर्डिंग ऑनलाइन उपलब्ध अछि जइमे डोम-मल्लिक (जकरा वियोगीजी मेहतर कहै छथि आ ओकरा आ ओकर भाषासँ घृणा करै छथि)क रेकॉर्डिंग सेहो श्री उमेश मंडल जीक सौजन्यसँ अछि। महेन्द्र मलंगियाक काठक लोकओकर आंगनक बारहमासा जइ तरहेँ दलितक भाषाक कथित मैथिली (मलंगियाजीक सृजित कएल)क प्रति घृणा आ कुप्रचारक प्रारम्भ केलक तारानन्द वियोगी ओकरा आगाँ बढ़ेलन्हि। ई ऑडियो आ वीडियो रेकार्डिंग अन्तिम रूपसँ ऐ घृणा आ कुप्रचारकेँ खतम कऽ देने अछि आ विश्व ई सुनि आ देख रहल अछि जे जातिगत आधारपर मैथिली कोनो तरहेँ भिन्न नै अछि। वियोगीजी अपन ऊर्जा ऋणात्मक दिशामे लगबै छथि आ तकर कारण अछि हुनक दृष्टि आ आइडियोलोजीक फरिच्छ नै हएब आ तेँ दोसराक समालोचना ओ बर्दास्त नै कऽ सकै छथि। विदेहक सम्पादकीयपर हुनकर ई टिप्पणी आएल छल जकर जवाब ओ अविनाश (आब अविनाश दास)क फेसबुक वॉलपर देने रहथि। ओही सम्पादकीयक रेस्पॉन्समे गंगेश गुंजन जी लिखने रहथि जे युवा सुभाष चन्द्रक ई गप जे "गंगेश गुंजन पाँच साल पहिने कमानी ऑडीटोरियममे कहने रहथि जे ओ हिन्दीमे लिखै छथि मुदा मैथिलीबला सभ हुनका पुरस्कृत कऽ देलकन्हि" सत नै अछि, ओ कहलन्हि जे ओ ई नै बाजल छथि, सुभाष चन्द्र एकर उत्तर नै देलथि से गुंजन जीक गप मानल जाएत। डॉ. धनाकर ठाकुर सेहो साहित्य अकादेमीपर आंगुर उठेबासँ दुखी रहथि आ विदेहक सह-सम्पादक श्री उमेश मण्डल जी केँ कएकटा मेल पठेलन्हि। ओ जगदीश प्रसाद मण्डल आ उमेश मण्डलक असली मानकीकृत भाषाक पक्षमे नै छथि, भाषा विज्ञानपर जखन उमेश मंडल बहसक प्रारम्भ केलन्हि तँ ओ अपनाकेँ डॉक्टर बना लेलन्हि आ बहसमे भाग नै लेलन्हि। मेलक अतिरिक्त हजारीबागक "सगर राति दीप जरय"मे ओ आ बहुतो गोटे कहैत सुनल गेलाह- एना नै लिखू, अशोक-श्रीनिवास आदि सन लिखू, पहिने पढ़ू तखन ओहने लिखू (ई मानि कऽ ओ सभ चलै छथि जे ओ सभ बिन पढ़ने लिखै छथि!)। बेनीपुरीक "अम्बापाली" नाटक हिन्दीमे छै, एन.सी.ई.आर.टी. ओकरा स्कूलक पाठ्यक्रममे लगेलक मुदा सम्पादक कहलन्हि जे "क्रिया ’है’ क अनुपस्थिति" जेना "वह जा रहा",  बेनीपुरीपर स्थानीय क्षेत्रक प्रभावक परिणाम अछि आ तेँ सम्पादक मण्डल ओकर ऐतिहासिकताकेँ देखैत स्कूली पाठ्यक्रममे रहलाक बादो ओकरा सम्पादित नै कऽ रहल अछि। मुदा जखन उमेश मण्डल/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राम विलास साहू लिखै छथि, ओ जाइत, ओ खाइत, तँ "सगर राति"मे भाषा-विज्ञानसँ अनभिज्ञ विशेषज्ञ सभ किछु एहेन सलाह दऽ दै छथि जे मैथिलीक मूल विशेषते गौण पड़ि जाए, मैथिलीसँ प्रभावित बेनीपुरीक हिन्दी, एन.सी.ई.आर.टी.क सम्पादकसँ मैथिलीक नामपर बचि जाइत अछि, मुदा मैथिलीमे पसरल जातिवाद ओकरा नै छोड़बापर बिर्त अछि। से जातिवादी मानसिकता सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक परिणामकेँ सेहो भयंकर रूपेँ प्रभावित करत, कारण ओइमे छद्म मानकीकरणक आधारपर अनुवाद कार्यशाला आयोजित भऽ रहल अछि। मैथिलीक तथाकथित स्थापित/ पुरस्कृत साहित्यकार यावत असल मानकीकरणकेँ नै पकड़ताह, हुनकर अस्तित्व उपरोक्त राक्षसी प्रतिभा (विषय-वस्तु आ भाषा दुनू दृष्टिकोणसँ) सभक सोझाँमे मलिछौने रहत। जातिवादी मानसिकता माने जे केलक से हमर आनुवंशिक जाति केलक, से ककरोमे भऽ सकैए। छद्म मानकीकरण: एकटा खास जातिवादी स्कूलक विचारकेँ प्रश्रय देलाक परिणाम, जे एकाध किताब सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीमे निकाललक अछि आ जइ तरहेँ ओकर मानकीकरण प्रोजेक्ट सालक सालसँ बिना परिणामक चलि रहल छै, से सी.आइ.आइ.एल. मैथिलीछद्म मानकीकरण देखा रहल अछि असल मानकीकरण: मिथिलाक सभ क्षेत्रक सभ जातिक बाजल जाएबला मैथिलीक आधारपर गहन विचार विमर्शसँ बनाओल मानकीकृत मैथिली। एकर बानगी ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर देल बेचन ठाकुर/ जगदीश प्रसाद मण्डल/ राजदेव मण्डल आदिक रचनामे भेटत। फील्डवर्क ऐ लिंक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/ पर देल -मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल)- ४६ टा ऑडियो फाइलमे भेटत आ ऐ लिंकक https://sites.google.com/a/videha.com/videha-video/ - मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक संस्कार, लोकगीत आ व्यवहार गीत (सौजन्य: उमेश मंडल) - ४४ टा वीडियो फाइलमे भेटत तथा २००० पाठकक विचारपर आधारित मानकीकरणक सारांश ऐ लिंकपर http://www.videha.co.in/new_page_13.htm भेटत। ऑडियो आ वीडियो फाइल महेन्द्र मलंगिया द्वारा “काठक लोक” आ “ओकर आंगनक बारहमासा” द्वारा प्रचारित शोल्कन्हक कथित (हुनका द्वारा इजाद कएल) मैथिलीपर अन्तिम प्रहार अछि। राक्षसी प्रतिभा: पूरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकारक अपठित दुनियाँ एक दिस आ जगदीश प्रसाद मण्डल, राजदेव मण्डल, बेचन ठाकुरक पठित दुनियाँ दोसर दिस, जकरा ब्राह्मणवादी मैथिली साहित्यकार लोकनि “राक्षसी प्रतिभा” सम्भवतः आलोचनात्मक रूपमे कहताह/ कहै छथि मुदा हमरा मोने ओ हुनका सभक हारिक शुरुआत अछि। धनाकर जीक एकटा विचार छलन्हि (विचार नै निर्णय छलन्हि) जे रामनाथोक बदला रामनाथहुँ हेबाक चाही!! उमेश मण्डल आ धनाकर ठाकुरक पूर्ण बहस विदेहक ८४म अंकक सम्पादकीयमे आएल अछि।सी.आइ.आइ.एल.क अनुवाद मिशनक आरम्भिक मेहनति अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक कार्यशाला अछि, ओकरा पाठकसँ कोनो मतलब नै छै आ ने असल पठित साहित्यकारक साहित्यसँ। से ओकर परिणाम वएह हेतै जे साहित्य अकादेमीक छै। अमरजी लिखै छथि- साहित्य अकादेमीक पोथी सभ गोदाममे सड़ि रहल छै।विदेहमे जगदीश प्रसाद मण्डलक दीर्घ कथा शम्भूदास आएल अछि, ओकर दोसर पारा देखल   जाए:- “जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍।” की एतए “जाइत” "करैत" क बाद अछि देब आवश्यक छैक?

६.लोकमे आब गोलैसी नै छै, हमरा क्षेत्रक राजनेता सेहो आब जाति, गोत्रक आधारपर नै मुदा काजक आधारपर वोट माँगि रहल छथि। मुदा ओइ युगक साहित्यकार/ नाटककार - जिनका सी.आइ.आइ.एल., साहित्य अकादेमी, एन.एस.डी. आदिसँ मान्यता चाहियन्हि, तखने ओ साहित्यकार/ नाटककार कहेताह- से गोलैसी नै करताह तखन हुनकर छद्म अस्तित्व कोना रहतन्हि? कारण जइ युगक ओ छथि से युग तँ कहिया ने खतम भऽ गेलै। कोनो कालजयी लेखक/ नाटककारकक अस्तित्व ऐ सरकारी संस्था सभक मोहताज नै अछि।

७.मैथिलीक पहिल दुर्भाग्य तखन देखा पड़ैत अछि जखन एतए गजलकेँ मुस्लिम धर्मसँ जोड़ि कऽ देखल जाए लगलै आ मुस्लिम धर्म आ ओकर साहित्यकेँ अछोप मानि लेल गेलै। आ तखन मुस्लिम अहाँसँ कोना जुड़त। मुदा आब जखन गजलक जीवन युगक समाप्ति भऽ गेल अछि (जीवन युग- ऐ युगक प्रारंभ हम जीवन झासँ केने छी जे आधुनिक मैथिली गजलक पिता मानल जाइ छथि मुदा ओ कम्मे गजल लीख सकला। मुदा हुनका बाद मायानंद, इन्दु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सरस, रमेश, नरेन्द्र, राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, रौशन जनकपुरी, अरविन्द ठाकुर, सुरेन्द्र नाथ, तारानंद वियोगी आदि गजलगो सभ भेलाह।) आ अनचिन्हार युगक प्रारम्भ भऽ गेल अछि, जइमे गजलक परिभाषिक शब्द आ बहरक निर्धारणक आधारपर सुनील कुमार झा, दीप नारायण "विद्यार्थी", रोशन झा, प्रवीन चौधरी "प्रतीक", त्रिपुरारी कुमार शर्मा, विकास झा "रंजन", सद्रे आलम गौहर, ओमप्रकाश झा, मिहिर झा, उमेश मंडल, शान्तिलक्ष्मी चौधरी आदि गजलकार गजल लिख रहल छथि तखन मुस्लिमक प्रवेश मैथिलीमे हेबे करत।हम शेख मोहम्मद शरीफक तेलुगु कथाक अंग्रेजी माध्यमसँ मैथिलीमे अनुवाद केने रही (जुम्मा - कथा- विदेह:सदेह:१ मे सेहो प्रकाशित) आ विदेहमे सद्रे आलम गौहर आ मो. गुल हसन छपि रहल छथि। संगमे मैथिलीमे आब कसीदा, मसनवी, फर्द, बन्द, कता, रुबाइ, हम्त, नात, मनकबत, मर्सिया, मुस्तजात, नज्म, मुजरा, कौवाली आदिपर लेख (देखल जाए आशीष अनचिन्हार -http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/2011/10/blog-post_07.html )क बाद मुस्लिम लेखक मैथिलीसँ कतिआएल अनुभव नै कऽ रहल छथि। मिथिलाक खोजमे मुस्लिम आ क्रिश्चियन धार्मिक स्थलक वर्णन छै (देखू http://www.videha.co.in/favorite.htm ) आ मिथिला रत्नमे सेहो यथासम्भव उल्लेख भेट जाएत (देखू http://www.videha.co.in/photo.htm )।  मिथिलाक तँ छोड़ू कर्णाटकक मुसलमान सेहो किए कन्नडक बदला उर्दूकेँ अपन मातृभाषा मानि रहल अछि, जखनकि बगलमे तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा तमिल घोषित करैए (कन्नडक उपन्यासकार भैरप्पाक उपन्यासक संस्कृत अनुवाद "आवरणम" हम पढ़ने छी, ओइमे ऐपर सेहो चर्चा छै, कर्णाटकमे ऐ उपन्यासपर कतेक हंगामा भेल रहै । मुस्लिम मैथिलीसँ दूर भागल से तमिल, मलयालम आ बांग्लाक (आ काश्मीरीक) अतिरिक्त सभ भाषामे भेल। काश्मीरमे तँ लोक बजैए काश्मीरी आ पढ़ाओल जाइ छै उर्दू- (बिहार मे पढ़ाओल जाइ छै जेना हिन्दी) , मुदा एकटा छोट राज्य सिक्किम नेपालीक अतिरिक्त लेपचा / भुटिया सेहो पढ़बै छै (लेपचा लिपि सेहो इंटैक्ट छै),मुदा बगले मे दार्जिलिंगमे से नै छै। ओकर कारण अछि सिक्किमक भाषायी उदारता जे बिहारमे (आइये नै जमीन्दारी राजेसँ) मैथिली आ मिथिलाक्षरक  विरुद्ध अछि/ छल। मुसलमानक मातृभाषा उर्दू किए भेलै, आ हिन्दूक मातृभाषा हिन्दी किए से प्रश्न मात्र मैथिलीक नै अछि। बांग्ला आ तमिलकेँ बंगाल आ तमिलनाडुक मुसलमान अपन मातृभाषा किए मानै छथि। मिथिलाक मुसलमानेकेँ मात्र किए दोष देल जाए? मिथिलाक अधिकांश हिन्दू सेहो मैथिलीकेँ नै हिन्दीकेँ अपन मातृभाषा मानै छथि मुदा हुनका साम्प्रदायिक नै देशभक्त मानल जाइए! दोसराकेँ छोड़ू, हम तँ दरभंगाक पोथी बेचनिहारसँ मैथिली बाजैत थाकि गेलौं मुदा ओ सभ हिन्दीमे जवाब देलक! प्रश्न ओतेक सरल नै छै ।

८.नेट मध्य एशियामे की केलकै सभकेँ बुझले अछि। जमीनी स्तरपर निर्मलीमे जे "विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलन" आयोजित भेल छलै ओकर सफलतासँ सभ भिज्ञ छथि, तहिना विदेह द्वारा जे समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कारक घोषणा भेलै से काल्हि धरि अपठित मैथिली साहित्यक साहित्यकारक मध्य जे अहलदिली अनने अछिै तहूसँ सभ भिज्ञ छथि।

९.मिथिलाक आ मैथिलीक विकासक जे वातावरण अखुनका सरकारमे छै की ओ दरभंगा आ आन जमीन्दारी राज वा मैथिल मुख्यमंत्रीक कालमे कहियो रहै? १४ अक्टूबर २०११ केँ मुख्यमंत्री नीतिश कुमारकेँ निर्मलीमे जगदीश प्रसाद मण्डलक ५ टा आ राजदेव मण्डलक एकटा पोथी देल गेलन्हि, मुदा जखन चेतना समितिक बैसकीमे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटनामे ओ मैथिलीक ऐ संस्थाकेँ मैथिल ब्राह्मणक संस्था बुझने रहथि आ बाजलो रहथि (बड़ाइयेमे सही, वोटक उद्देश्येसँ सही) तँ कियो सांकेतिको करेक्शन किए नै केने रहथि?  १४ अक्टूबर २०११ धरि ओ  मैथिलीकेँ मैथिल ब्राह्मणक भाषा बुझै छलाह!!

१०.सी.आइ.एल.एल.क सभ निअम वेबसाइटपर उपलब्ध छै, आ ओकर कोन प्रावधान लक्ष्मीनाथ झा द्वारा लिखित हिन्दीक पोथी "बिहार की सांस्कृतिक चित्रकला"क निर्लज्ज चोरि कएल पोथी सुशीला झाक "अरिपन"केँ पूर्वप्रकाशन ग्रान्ट दै छै से हमरा नै बुझल अछि। मुस्लिमक गप तँ छोड़ू हिन्दूक मात्र एक जाति एकर सभ कार्यशालासँ लऽ कऽ सभ ग्रान्ट/ असाइनमेन्ट प्राप्त कऽ रहल अछिै, ओ कोन प्रावधानक अन्तर्गत छै? निअममे कोनो कमी नै होइ छै, यएह निअम तँ दोसरो भाषामे छै, ओतए किए एतेक समस्या नै छै?
 

११.साहित्य अकादेमीक मैथिलीक युवा पुरस्कार २०११ लेल भऽ रहल षडयंत्रक अन्तर्गत किछु एहेन पोथी सभ रेस मे अछि जे छपबे नै कएल, मात्र किछु प्रकाशकक लोगो आ आइ.एस.बी.एन. आ एक कॉपी साहित्य अकादेमीक देल अखबारी विज्ञापनक आलोकमे ३१ जुलाइ २०११ क अन्तिम तिथिकेँ मंगबाओल गेल (माने ओ पोथी मात्र ओ लेखक आ साहित्य अकादेमी टा पढ़ने अछि)। मुदा ई तथ्य सभकेँ बुझल छै जे कोन पोथी बजारमे अछि आ कोन मात्र पुरस्कार लेल एक कॉपी आएल अछि। साहित्य अकादेमीक युवा पुरस्कारक प्रारम्भिक लिस्टमे पंकज पराशरक चोरिक कविताक संग्रह सेहो अछि, धन्य साहित्य अकादेमी आ ओ कवि/ साहित्यकार लोकनि सेहो जे ऐ चोर महराजसँ अपन मैथिली कविता अनूदित करबा कऽ साहित्य अकादेमीक पत्रिकामे छपबै छथि आ तेकर एवजमे ओइ चोरकेँ पोसै छथि।

१२.श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर"मे कोनो कमी नै अछि, बशर्ते ओकर टाइटल जँ रहितै "बदलैत स्वर-मैथिली कथा श्रीनिवास-अशोक-विभूति-बिहारी-वियोगी-नवीनक विशेष सन्दर्भमे"; मुदा ई पोथी  सम्पूर्ण मैथिली कथा साहित्यक स्वर हेबाक दावा करैत अछि। से एकर सीमामे ने नक्सलवाद आबि सकत, ने बिसाँढ़ आ ने पइठ। जै ग्रुपक हेबाक बातसँ नवीनजी बेर-बेर अपन साक्षात्कारमे मना केलन्हि अछि, से ग्रुप "बदलैत स्वर"क स्वर अछि।



( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ खन धरि ११ देशक १,९५० ठामसँ ६,९७२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,२७,२१२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। )

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 

http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

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