Friday, September 30, 2011

'विदेह' ९० म अंक १५ सितम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४५ अंक ९०) PART II



विनीत उत्पल
कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट 


मामला तँ तखने तूल पकड़ि लेलक जखन ग्वालियरक एकटा बाभन फेसबुकपर कबीरक एकटा दोहा पोस्ट कऽ देलक, "एक बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा/ एक रकत से सबहीं बने हैं को बाभन को सूदा'। मुदा गप पोस्ट करबे टाक नै छल। गप छल जातिवादकेँ लऽ कऽ झगड़ाक। यएह ओ दौर छल जखन कारगिल युद्ध भेल छल आ बरखा दत्त नामक पत्रकार राइते-राति युद्धक रिर्पोटिंग कऽ सभ छौड़ींक 'आइडियल" बनि गेल छल। ओहिनो पत्रकार बनाबैक लेल सभ कोनटामे कुकुरमुत्ता सन मीडिया संस्थान खुजि गेल अछि आ सभटा लड़की ओतएसँ डिग्री लेबाक लेल परेशान रहैत अछि। ई ओ काल अछि जखन नोएडामे आयल अप्पन बरियातीकेँ निशा दहेजक लेल घुरा दैत अछि। ऐ कालमे झारखंडक कोडरमाक रहैवाली पत्रकार निरुपमाक मरब हत्या वा आत्महत्याक बीच झुलले रहि जाइत अछि। फेर मंडल आयोगकेँ लागू करएबला प्रधानमंत्री कैंसरसँ लड़ैत दम तँ तोड़ि दैत अछि मुदा तखन धरि समाजक लोक जागि गेल छल। मंडल-कमंडलक नामपर कतेक लोक मरि गेल मुदा लोकक सपना देखबासँ आ ओकरा यथार्थमे बदलबाक मेहनत करबासँ कियो रोकि नै सकल।

ऐ कालमे कतेक सवर्ण एहन आएल जे सार्वजनिक जीवनमे दलितक हिमायती, स्त्रीगणक पैरोकार बनैत छल मुदा वास्तविक धरातलसँ ओ एहन मामलासँ दूरे रहैत छल। नै तँ एहन कखनो नै होइए जे हम जइ संस्कारक गप करैत छी आ कहैत छी जे ई संस्कार घरसँ अबैत अछि आ ओ ओइ घरमे नै हुअए। यएह हाल तँ ओइ छौड़ीक छल जकर बहनोइ सभटा तामझामक संग दलितक पैरोकार बनैत छल। ओकरो सपना 'बरखा दत्त-टू" बनैक छल आ लंदनमे रहैबला लड़कासँ शादीक लेल मना कऽ ओ दिल्ली भागि कऽ आबि गेल छल। दिल्ली तँ ओ अप्पन करियरकेँ नव मंजिल दै लेल आएल छल। पूरा खिस्सा तँ हमरा पतो नै चलतिऐ जौँ ओइ दिन ओकर पागल हइक खबर राष्ट्रीय अखबारमे नै पढ़ितिऐ। फेर दिल्ली राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर जखन हम मिथिलामे अप्पन खेतमे काज कऽ रहल छी तखन दिल्लीक गप एतए कतएसँ आबि सकैत अछि। हमहू कहियो बड़ पैघ-पैघ सपना देखने रही आ दिल्ली आएल छलहुँ मुदा ओतुक्का रौनक, मंडी हाउस, मेट्रो ट्रेन, कनॉट प्लेस, हैबिटेट सेंटर, प्रेस क्लब सन जगह हमरा प्रभावित नै कऽ सकल। आ फेर हमरा सनक लोककेँ ठामे-ठाम धोखा भेटब, ई कतएसँ बान्हि कऽ राखि सकैत छल। फेर 'बेसिक इंस्टिंक्स" केँ कियो नकारि सकैत अछि की?

ओ नवम्बरक मास छल जखन दिल्ली विश्वविद्यालयक दक्षिणी परिसरमे तीन दिनक मीडिया वर्कशॉप भेल छल आ ओइमे हम सेहो हिस्सा लऽ रहल रही। ओ वएह तँ छौड़ी छल जे दरबज्जाक कोनटा लग ठाढ़ि छल, पीयर रंगक टी-शर्टमे ओ गुड़िया जेहन लागैत छल। हमर मित्र कमलनाथ सिंह हमरा ओकरासँ भेँट करौने छल। फेर तँ कखन हम सभ एक-दोसराक दोस्त बनि गेलौं, से पतो नै चलल। गप-शप, भेँट-घाँट रोज हुअए लागल। एक दिन पता चलल जे ओ 'राष्ट्रीय उदय" मे इंटर्नशिप कऽ रहल अछि मुदा ताधरि हम एकटा राष्ट्रीय अखबारमे नोकरी करै लेल अजमेर जा चुकल रही। हँ, हम तँ ओकर नाम बताबैक गप बिसरि गेलौं। छोड़ू, ओहिनो नाममे राखल की अछि? मुदा खिस्साकेँ आगू बढ़ाबैक लेल तँ ओकर नाम बताबैये पड़त। अहाँ सभ किछु सोचै लेल स्वतंत्र छी मुदा हम ओकर असली नाम नै बताएब। एतबेटा जानि लिअ जे ओकर मोबाइलमे हमर नंबर 'परेशान आत्मा" आ हमर मोबाइलमे ओकर नंबर 'हाइली टेंपर" क नामसँ सुरक्षित छल।

तँ साहेबान, कद्रदान, पूरा मामला “परेशान आत्मा" आ “हाइली टेंपर" क बीचक गप छल आ सौंसे दिल्लीक मीडिया हुनका दुनूकेँ देखि रहल छल। एक दिन “परेशान आत्मा" केँ मालूम चलल जे ओकर गर्ल फ्रेंड जे ताधरि फ्रेंड टा छल, रांचीसँ छपैबला छोट-सन अखबारमे काज करए लागल अछि। ओ ओतए 'अंगूठीबला बाबा" क पैरवीसँ नोकरीपर लागल छल आ हुनका कहै तँ ओ 'सर" छल मुदा दुनूक सरसँ कतेक कोसीक पानि बहि चुकल छलै। दरभंगासँ आएल ओ छौड़ी दिल्लीक चकाचौंधमे डुमि चुकल छल, सांझसँ देर राति धरि इंडिया गेटपर “अप्पन सर"क संग आइसक्रीम खाएब ओकरा बड़ नीक लगैत छलै। आफिसमे ओकर भेँट रामेंद्र अशेषसँ भेल छल। ओ बड़ शांत छल आ सुसंस्कारवान सेहो। संगहि साहित्यक अनुरागी सेहो छल। “हाइली टेंपर"क नजरि ओकरापर पड़ल आ ओ सोचि लेलक जे ओ अशेषक कान्हपर चढ़ि कऽ दिल्लीक जत्रा पूरा करत।

रामेंद्र अशेष अत्ते भद्र पुरुख छल जे ओकरा पते नै चलैत छलै जे के ओकरा यूज कऽ रहल अछि आ के नै। अशेषजी चुपचाप ओकर “लेख”क शब्दकेँ ठीक कऽ दैत छल आ लोक “हाइली टेंपर" क वाहवाही करैत छल। ओकर एवजमे ओ प्यारक झांसा दैत छल। तइसँ जहिया जोशीजीक निधनपर गांधी शांति प्रतिष्ठानमे दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन एकटा सभा आयोजिक केने छल तँ रामेंद्र ओइ छौड़ी लग ताधरि नै बैसल जाधरि ओकर बहनोइ ओकरा लग बैसल रहल। ओकर बहनोइ जहिना बीच सभामे लघुशंका लेल हॉलसँ बाहर गेल तखने हाइली टेंपरक दोसर कातक खाली कुर्सीपर ओ अप्पन आसन जमा लेलक। जखन ओकर बहनोइ अबैत अछि तखन नमस्ते करैत अछि आ कहैत अछि जे अखने आयल छी।
हमहूँ अलग लोक छी। कतएसँ कतए चलि अएलहुँ आ अहाँसँ कोन गप करए लगलहुँ। रांचीक लोकल अखबारक ई दफ्तर दिल्लीक कनाट प्लेसक एकटा बिल्डिंगक पाँचम तल्लापर छल। ओकर आगूमे दैनिक भारतक बिल्डिंग अप्पन चमक-दमकक संग लोककेँ आकर्षित कऽ रहल छल। मुदा ओतए बाभन सभक बड़ रास भीड़ छल। ओतए जाइतक नाम देखि कऽ लोककेँ राखल जाइत छल आकि फेर ओकरा जे कोनो पैघ अधिकारीक थूक चाटैत छल। एहनामे परेशान आत्माकेँ नोकरी भेटबामे मुश्किल नै भेलै किएकि अजमेरमे जइ पैघ पत्रकारसँ ओकरा भेँट भेल छलै ओ दैनिक भारतमे पैघ पोस्टपर आएल छल। मुदा आब हाइली टेंपरकेँ लगलै जे जौं ओतए ओकरा नोकरी नै भेटत तँ ई बड्ड पैघ हारि हएत। ओ अप्पन परिवारकेँ ई देखाबैले चाहैत छल जे ओ अप्पन भरोसे किछु कऽ सकैत अछि। किएकि ओकरा दर्द छलै जे राष्ट्रीय उदयमे इंटर्नशिपक लेल ओकर बहनोइ बड़ पैरवी केने छल, तकर बाद ओकरा इंटर्नशिप भेटल छलै।

अन्तमे ओ दिन आबि गेलै जखन नवसिखुआ स्त्रीवादी लेखिकाक चोंगा पहीर कऽ ओ छौंड़ी, बाइस मंजिलक ओइ बिल्डिंगमे आएल, ई वएह स्था रहै जतए ओ बाबाक संग नोकरी ताकऽ लेल आएल छल , ई वएह “बाबा"छल जकरा ओ “सर" कहैत छल। ऐ बाबाक जीवनक परिभाषा “बाभन आपन करैं बड़ाई, गागर छुअन न देहिं/वैस्या के पायन तर सोवैं, यह देखो हिंदुआई” दोहामे सिमटल छल। एतय "परेशान आत्मा” ओकरा लेल आधार तैयार कऽ चुकल छल आ बिना टेस्ट, बिना रिज्यूमे जमा केने ओकरा नौकरी भेट गेलै। पहिने तँ कहल गेल जे अहाँ दुनू गोटेकेँ जूनियर कॉपी एडिटर बनाओल जाएत मुदा जखन पत्र भेटलै तँ ओइमे "स्ट्रींगर' लिखल छलै। 

कहल गेल छल जे सात हजार टका सेलरी भेटत मुदा पत्रमे लिखल छल पाँच हजार। आपत्ति केलापर बॉस कहलक जे अहाँ सभ गोटे फीचर सेहो लिखू आ ओइ लेल अहाँ सभकेँ दू हजार टका भेट जाएत। ओइ काल परेशान आत्माक संग हाइली टेंपर सेहो छल मुदा बादमे हाइली टेंपर ओकरा धोखामे राखि कऽ ज्वाइनिंग लेटर राखि लेलक। मीडिया भलहि दोसरक खामीकेँ लोकक आगू राखैत अछि मुदा एकर खामीकेँ कियो कोना आगू राखत? ओइ कालमे “मोहल्ला" आकि “भड़ास"क जन्म नै भेल छल जे मीडियामे काज करैबला लोकक दर्दकेँ आगू राखि सकए।

अहिनामे जतए उच्च पदपर काज करैबला तेरह टा पदपर बाभन अप्पन आसन जमौने छल ओतए निचला स्तरपर कतेक के होएत एकर अंदाजा केकरो नै छलै। अहिनामे दलित, स्त्रीवादीक खोल “हाइली टेंपर" उतारि कऽ फेंकि देलक आ सभ लोकक आगू कहि देलक जे हमहूँ तँ “'ब्राह्मण" छी। फेर तँ किछु ने किछु छल-प्रपंच करब आवश्यक छल। अहिमे कोनो संदेह नै छल जे ओकरा अप्पन दलित आ स्त्रीवादीक खोलसाकेँ उतारबाक छलै, अप्पन भेदियाकेँ सेहो खत्म करबाक छलै। अहाँ तँ जनिते छिऐ जे भेदिया वएह “परेशान आत्मा" छल। तेँ ओ अप्पन मोबाइलमे ओकर नंबर अहि नामसँ सुरक्षित राखने छल। ओकरा डर छलै जे कहियो ओ ओकर पोल ने खोलि दिअए। एनामे एक दिस ओ परेशान आत्माक संग प्रेम बढ़ेबाक ढोंग करए लागल आ दोसर दिस लोक लग ई कहैमे कनियो टा नै सकुचाएल जे परेशान आत्मा ओकरा परेशान कऽ रहल अछि।

जखन कखनो परेशान आत्मा कोनो काजसेँ ओकरा फोन करैत छल तँ ओ अप्पन मोबाइल दोसर गोटेकेँ पकड़ा दैत छल आ ई देखेबाक प्रयत्न करैत छल जे ओ ओकरा परेशान करैत अछि। ओतए असगरे भेटलापर परेशान आत्मासँ कहैत छल, “अहां कतेक भागमन्त छी जे गर्लफ्रेंड अहाँक संग अछि, संगे-संग ऑफिसमे काज करैत अछि आ फेर एकहि संग सांझमे घर दिस अहाँ सभ घुरैत छी।" अहिनामे एक दिन दुनू अंग्रेजी फिल्म “बेसिक इंस्टिंक्ट" देखऽ गेल छल। हम एना नै कहि सकैत छी जे ओइ छौरामे हृदए नै छलै, ओ तँ एहन चिक्कन-चुनमुन गपमे रहि जाइत छल मुदा ओकरा लगैत छलै जे कत्तौ ने कत्तौ कोनो गड़बड़ जरूर अछि। 
क्रमश:
(हिन्दीसँ अनूदित)

  
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।


 नव-नियोजित शिक्षिका आओर शिक्षक - मिथिला मे बदलैत स्त्री आ पुरुख केर संबंध-जाल

युनेस्को आ केन्द्र सरकार के सहयोग सँ बिहार राज्य मे चलायल जा रहल सर्वशिक्षा अभियान केर तहत नीतिश सरकार द्वारा शिक्षक नियोजन मे महिलाक लेल पचास प्रतिशत आरक्षणक बाद नारी सशक्तीकरण केर लक्ष्य पर ओकर नीक असर धरातल पर देखल जा सकैत छैक. आइ दूई-चारि साल सँ सुपौल आओर सहरसा शहर केर टेम्पू वा मेक्सी स्टैंड पर आठ सँ साढ़े नौ बजे धैरक बीच बेसी नवतुरीया आ किछु प्रोढ़ महिला लोकनि पर्स लटकौने, अपना केँ एकटा सुभ्यत शिक्षिकाक लूकमे स्कूल पकड़वाक लेल अस्त-व्यस्त भेट जाइत छथि. आँखिक देखल तँ नहि अछि मुदा अंदाज करै छी जे कि मिथिला अंचलक कोनो आन शहर वा एकर कोनो पैघ गाम केर स्टैंडक स्थिति सेहो एकरा  सँ भिन्न नहि हेतैक. शुरूआति मे तँ ई सभ शिक्षिका लोकनि अपन अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक सँग पाछु लागल ओहिना लजैल-धखैल अपन गनतव्य स्कूल दिस मुँहयाल चलि जायल करैत छलिह. मुदा आइ स्थिति बदललैक. एक तँ हिनका सभ मे आब गाम-घर सँ असगर बहरैवाक आत्मविश्वास बढ़लैक आ तेँ हिनका सभक लजैल, धकैल आ डरैल चालि-ढालि मे सेहो परिवर्तन एलैक. दोसर जे एही शिक्षिका-वर्ग मध्य जाति-धरम सँ ऊपर उठि कय सहकर्मी संग बहिनपाक नव संबंधक विस्तार भेला उपरान्त घर सँ स्कूलक बीचक हिनकर वाट सेहो आब निरस नहि रहलैकबहिनपाक ई संबंध बढ़ला सँ पहिने जे मैथिल स्त्रीगण मे स्व-गाम, सम-जाति, वा स्व-धरम केर पुरान सूत मे बुनल अपनत्वक जटिल जाल देखल जाइत रहैक, तकर गुत्थी मे फेर सँ, एकटा अलग नवका सूत जकाँ सहकर्मी बहिनपाक अपनत्व-संबंध जाल सेहो बेधल गेलैक. आई शहर वा गाम केर एहि स्टैंड पर ई सभ शिक्षिका बहिनपाक मध्य मुस्कियावैत वा हाथ हिलवैत अभिवादन, एक-दोसर लेल जगह राखैक व्यवहार, वा एक दोसरक लेल भाड़ा देवाक जिद्द भरल आग्रह, केर घटना आम रूपे देखल जाइत छैक, जकर की पहिने मिथिलाक गाम-शहर मे अभाव देखल जाइत रहैक. आब जेना लागैत छैक जे घर सँ बाहरो मैथिल स्त्रीगणक उपस्थिती छैक. टेम्पु आ मेक्सी वाला जे निछछ पुरूखे होइत अछि सेहो प्रायः एहि शिक्षिका लोकनि केँ आब नाम, मुहल्ला आ स्कुल सँ चिन्हैत छथिन. एहि पुरूखक लेल ऑफ़िस ऑवरक ई समय  सबसे बेसी व्यस्तम, चुटकी भरल, आ मधुरतम होवय लागल छैक जकर चर्चा मास्टरनी वर्गक लोक करैत रहैत छथि. मुदा आई घर सँ बाहर सड़क पर एहि मे सँ किओ महिला एसकर नहि छथि बल्कि हुनका संग हिनक एकटा सम्पूर्ण वर्ग अछि आ संजोगे सभ गोटय मास्टरीये पेशाधारी. तेँ हिनका सभ के आइ सड़क पर निधोख निकलवा मे आत्मविश्वास आ सुरक्षा-भाव बेसी छैन्हि.  

सँबंधक ई नवका जालक ताना-बाना खाली महिला महिलाक बीच पसरलैक अछि सेहो बात नहि छैक. एकर पसार महिला आ पुरूखक मध्य सेहो भेलैक. अपन वर, दिअर, भाइ, पिता, चाचा वा अपन कोनो निकटतम संबंधीक उपस्थिति सँ स्वतंत्र भेला सँ एहि नवतूरिया शिक्षिका लोकनिक लाज-धाक सेहो टुटलैक. ताहि सँ मैथिल समाज मे परस्त्री आ परपुरूख वर्ग केर बीचक अनेर दूरी राखय वाला जे पुरानपंथी बन्हन रहैक सेहो ढ़ील होइत बुझाइत छैक. एके विभागक कर्मी होवाक चलिते शिक्षा विभागक कोनो नव वा प्रस्तावित नियम, शिक्षा अधिकारिक औचक निरीक्षण आ तकर वादक घटनाक्रम, वा एक-दोसरक स्कूलक रोचक घटना मे दिलचस्पी, एहि स्त्री आ पुरूख शिक्षका-शिक्षक केँ आपसी संबंधक जाल केँ पसारै मे महत्वपुर्ण कारक बनलैक. एक तँ मिथिला संस्कृति मे नारी केँ उचित सम्मान देवाक विचार आओर दोसर केर माय-बहीन केँ अपन माय-बहिन बुझबाक पुरातनी व्यवहार पुरूख वर्ग केँ टेम्पू/मैक्सी पर महिला लेल सीट छोड़वाक लेल आ महिला वर्ग केँ आभार करै लेल बरवेश रहैक. ओतही दोसर दिस, बिपरीत लिंगक प्रति स्वाभाविक मानवीय आकर्षन किछु रसगर शिक्षक लोकनि केँ महिला लोकनि केँ चहटगर गप्प-सप, किस्सा-पिहानी, चुटकुला-मनोरंजन सुना कवा कोनो आन तरहक सहयोग कक अपना दिस आकर्षित करवाक अवसर आनैत रहैत छैक. खास कय कोशी दियरा प्रदेश केर अनेक पंचायतक विद्यालय मे काज केनिहार शिक्षका/शिक्षक सभ जखन बलुआहा, महिषी, मैना आदि कोशी घाट वाट टपैय जाइत छथि तखन नाह पर चढवा काल जनि-जाति केँ पुरूख लोकनि केर सहयोगक बेसी जरुरति होइत छन्हि. जेना कि पानि मे ठार भय नाह पकड़नायनाह पर स्त्रीगण केँ बैसैक जगह देनाइ, आ सबसे बेसी  महिला वृन्दक संग सहानुभुति आ सभ्यताक संग व्यवहार, जनि-जाति वर्ग के प्रभावित करवाक लेल बड्ड महत्वपूर्ण होइत छैक. जे अन्ततः एहि नव नियुक्त शिक्षक- शिक्षिकाक बीच मित्रताक संबंध केँ गाढ़ बना रहल छैक.

मानल जाइत अछि जे नवनियुक्त पखंड आ पंचायत शिक्षकगण मे बेसी गोटय समृद्ध घर के छथि. एहि लोकनि मे नौकरी सँ पहिने बेरोजगारी तँ छल मुदा हुनका सभ केँ खाइ-पिवाक वा ऐस-मोज करवा केर साधनक पहिनो कमी नय छल. गाम घर मे रहनिहार एहन लोकनि केँ जखन गामे-घरक आस-पास केर स्कूल मे नौकरी भेट गेलन्हि तँ ई बुझु जे हिनकर भाग्य फ़ुजि गेलन्हि. एक तँ घर सँ खाइते पीते रहथि, दोसर आब ई सभ अपन बूढ़ माय बाप केँ देख रेख केर अतिरिक्त अपन जमीन जथा केँ बटेदारी लगा केँ ओकर देख-रेख सेहो करै छथि, आ तेसर जे दरमाहा मे जे किछ पाँच छौ हजार महिना पाइ-कौड़ी होइत छनि ओ सभ बैंक खाता मे अक्षैत राखल रहैत छन्हि. ई सभ मास्टर साहैब लोकनि एकहक टा के मोटर-साईकिल ललेने छथि आ अपन योवनक मस्ती मे जेना पहिया लगा लेने छथि. नाह मल्लाह वाला रस्ता मे यदपि तरदूत छैक मुदा एहि तरदूतक उपरान्तो गाड़ी रहला सँ मास्टर साहेव लोकनि केँ ई लाभ छन्हि जे कोशी दियरा प्रदेश सनक अबूहो जगह पर समय पर पहुँच जाइत छथि आओर दुर्गम प्रदेशक बच्चा लोकनि केँ दू अक्षरक बोध दैत देस निर्माण मे सहभागी बनल छथि. तखन कोनो मास्टर साहेबजी केँ जँ कहिओ साइत-संयोगें मनपसंद मास्टरनी साहेब केँ अपन गाड़ी पर बैसा केँ हुनका स्कुल तक छोड़वाक अवसर भेट जाइत छनि तेँ ओ, हमर एकटा संबंधक दियर मास्टर साहेबक शब्द मे, अपन जीवनक बड्ड अनमोल आ भावुक समय होइत छन्हि. हिनका शब्द मे, ओहि मे काम-वासनाक बोध तँ बहुतो कम छैक परंच ओही स बेशी एकटा महिला केँ सहयोग कहुनका इम्प्रेस करैक आत्माभिमान केर मनोबोध बेसी प्रबल छैक. महिला पुरूखक मध्य मनोभावनात्मक संबंधक ई विस्तार वास्तव मे हिनका सभक मानसिकता मे छुपल प्रेम संबंध आ प्रेम विवाह केर संभावना आ सामर्थ्य केँ सेहो परिलक्षित करैत छैक.     

अपन दिअर मास्टर साहेबक गप्प सुनि एकटा गप्प मोन मे आबैत अछि. मिथिलाक गाम-घर मे जँ श्रमिक वर्गक जनि-जाति केँ छोरि देल जाइ तँ कोनो भी जाति, धरमक कनियो टा सुभ्यस्त परिवार मे नवतूरे सँ स्त्रीगण केँ अँगना सँ बहरेवाक प्रचलन कम भजाइत अछि आ ई व्यवहार ता बुढ़ापा चलैत रहैत अछि. हाँ, शहर मे ओ जे किछु करै छथि ओतय हुनका पर सामाजिक अंकुश कम होइत छन्हि. मुदा जा धरि ओ गाम घरक छहरदेवाली मे रहैत छथि ता धरि स्त्रीगण केँ अपना व्यवहार मे अपन यौन सदाचार आ परपुरुष सँ दुरी देखवैत रहय पड़ैत छैक. एकर अनदेखी भेला सँ समस्त पुरखा आ खानदान के नाक कटय लगैत छैक. तेँ गाम-घरक परिसीमा मे एखनहुँ प्रेम वा प्रेम विवाहक संभावना नगण्य रहैत छैक. मैथिल समाज मे प्रेम विवाह पर ई रोक खाली अपन स्त्रीगणेक आचरण पर अंकुस राखि नहि करैत अछि बल्कि अपन पुरूख पात्र द्वारा कोनो महिलाक संग कयल गेल छेड़खानी, वदतमीजी, वा घरढ़ुक्की केँ कुकर्मक श्रेणीक बुझैत छथि. पुरूखो पात्र द्वारा कयल गेल कोनो एहन अपराध समस्त पुरखा आ खानदानक पाग नीचा गिरावैत बुझल जाइत छैक. खास क क मैथिल ब्राह्मण आ करण कायस्थ समाज मे जा धरि पाँजि व्यवस्था प्रचलन मे रहलैक ता धरि तँ पुरुख पात्रक एहन सभ यौन अपराध समुचा खानदान केर पाँजि के पतीत करेवा मे महत्वपुर्ण रहलैक. मुदा पाँजि व्यवस्था कमजोर भेलाक बाद मैथिल समाज अपन पुरूख वर्गक एहन व्यवहार पर तँ बहुत ढ़ील द देल बुझाइत छथि मुदा अपन स्त्रीगणक सदाचारक व्यवहार पर बेसी दृढ़ आ शंकालु रहि गेलखिन. स्त्री आ पुरूख संग असमानताक ई व्यवहार केर चलितवे पुरूख लोकनि तँ समय अनुकूल आगु बढ़तै चलि गेलाह मुदा स्त्रीगण समय केर संग डेग नहि बढ़ा सकलीह. आइ जखन मास्टरी पेशा मे मैथिल स्त्रीगण केँ आरक्षण द क व्यापक संख्या मे गाम-घरक महिला वर्ग केँ घर सँ बाहर निकलवाक अवसर भेटलैक तँ हिनका लोकनि केर नीजी जीवन सेहो सर-संबंधीक पुरूख पात्र केर तीछ्ण नजरि सँ कनेकटा दूर भेलैक. जतय ओ पुरूख वर्गक संग बैस कय अन्य आधुनिक समाज जकाँ प्रेम, प्रेम विवाह, अन्तर्जातिय विवाह, पुरूखक शोषण, स्त्रीक दोयम दर्जा, आदि विषय पर खुलि कय बात कय सकैत छथि. एकर स्वीकृति हुनका पहिने घर-आँगन केर छहरदेवालीक अंदर नहिये केर बराबर छल. हमरा विचारे जे एतय ई ध्यान राखव जरूरी  कि प्रखण्ड/पंचायत शिक्षिका मे बेसीतर वोएह महिला छथि जे वेसी काल गामे घर मे रहलीह आ आइयो तक गाम घरक सामाजिक जीवन सँ समायोजित भरहल छथि. दोसर दिस स्त्री-पुरूखक भावनात्मक, कल्पनात्मक आ दैहिक संबंध केर अनुभवहीन युवक-पुरूख पात्र छथि जे मैथिल समाज मे स्त्री पर एहेन अंकुशक कारण आइ धरि अपन माय-बहिन, भगिनी-भतीजी, वा अन्य कोनो निकट संबंधी सँ  वेसी दुर केर एहने अनुभवहीनता वाली स्त्रीगणक संपर्क मे नहि एलाह. एहन युवक युवतीक मन मे भावनात्मक आ कल्पनात्मक प्रेम केर इडदबि केँ रहि गेलैक. स्त्रीगण पर तँ बहुत बेसी सामाजिक दबाब रहलैक. मुदा पुरूख पात्र मे एहन लोक बेसी काल अपन विपरित लिंगी आकर्षन केर फ़्रसट्रेशन केँ कोनो असगरूआ पकड़ैल स्त्रीगण पर अस्लील फ़ब्ती कसि कसि कवितेलाह. तखन एहने वा कोनो नीको सदाचारी आ भावुक युवक मास्टर साहेव के आइ जखन कोनो मनपसंद मास्टरनी सँ सानिध्य भेटैत छैक, हुनका इम्प्रेस करैक मोका भेटैत छैक, हुनका सँग भावनात्मक लगावक गप्प होइत छैक, तँ हुनका सभ गोटय लेल ई क्षण अनमोल आ भावुक जरूर बुझेतैन्हि जाहि मे काम-वासनाक बोध कम छैक आ परस्त्री केँ सहयोग कहुनका इम्प्रेस करवाक आत्माभिमानक मनोबोध बेसी छैक. एक अर्थे ई मैथिल समाज लेल शुभक सूचक छियैक. अभिवावक गण ई बुझथु सँ पुरूष गण स्त्रीगणक प्रति हरदम आक्रमके नहि होइत छैक. नीक भवना, परस्त्रीक प्रति आदर भाव, स्त्रीक सहयोग केर मनोवृति सेहो पुरूष मानसिकताक एकटा अंश छियैक.

शिक्षक नियोजनक बाद शिक्षक आ शिक्षिकाक मध्य वैवाहिक संबंधक कैकटा उदाहरण हमहूँ देखलियैक. एहि मे सँ दूइ टा उदाहरण "Love Cum Arrange" विवाहक आ शेष सभटा पुर्ण रूपेन "Arrange" विवाहक छलैक. "Love Cum Arrange" विवाहक हमर मतलव अछि जे, विवाहक एहि प्रक्रिया मे सबसे पहिने दूई हृदयक मध्य प्रेम भेलैक आ तखन माता-पिता वियाहक तय-तपेसिया केलन्हि. जखन की "Arrange" विवाह मे माता-पिता ही परंपरागत ढ़ंग सँ विवाह तय केलखिन जाहि मे नवदम्पत्तिक कोनो महत्वपुर्ण भुमिका नय भेलैक. "Love marriage" अर्थात माता-पिताक बिना कोनो महत्वपूर्ण योगदान वाला प्रेमीगणक विवाह जँ कतहुँ भेलो हेतैक तँ ओ हमरा नजरि मे नहि छैक. उपर्युक्त दूनू तरहक वियाह मे हम एकटा नव गप्प ई देखलिये जे अधिकांश कथाक उत्थान मे पहिने लड़के वाला लड़की वालाक ओहि ठाम गुप्त रूप सँ संबंधक प्रस्ताव पठेलखिन. जखन लड़की वाला तैयार भ गेलाह तखन लड़की वाला अपना शर्त पर अन्य बातक निराकरण करवे मे सफल रहलाह. हमर कहैक मतलब ई जे शिक्षिकाक नौकरी भेटलाक बाद नौकरी-पेशा स्त्रीगणक सामाजिक स्थिती मे बड्ड बदलाव एलैक. एक दिस जतय ओकर आर्थिक आ सामाजिक महत्व वरक घर आ नैहरक घर मे समान्य रूप स बुझल गेलैक ओतही ओकर सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक संबंध, आ सामाजिक सम्मान केँ सेहो बृद्धितर केलकैक.



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रवि भूषण पाठक

गामक जिनगीक समीक्षा

भैंटक फड़ देख बिहुसैत नर-नारी, बिसाँढ़क लेल पताल कोरैत मैथिलजन, चुन बनएबा आ बेचबाक कठिन उपक्रम करैत लोक आ बदलैत तकनीकीसँ तालमेल बैसबैत, उपार्जनक लेल गाम, राज्‍य छोड़ैत जनसमुद्र। संयुक्‍त परिवार, वर्णव्‍यवस्‍था  आ गामक पारंपरिक अर्थव्‍यवस्‍थाकेँ छेदैत विभिन्‍न  कोटिक परिवर्तन। कोनो ब्राहमण आ कुम्‍हारक ढहैत जजमानी। ताड़ी कीनए बेचए आ पीबैक अनंत अंर्तकथा। पोखरि, गाछी, खेत आ गाममे  पसरल मिथिलाक अनंत आ दिव्‍य सौंदर्यक एकसाथ दर्शन।

इतिहासक प्रश्‍न
गामक जिनगी’क पहिल तीनटा कथा भैंटक लावा, बिसाँढ़’, पीरारक फड़ अकालक समैमे मिथिलावासीकेँ पेट भरबाक साधन रहैत अछि, आ ई बात लेखकक सजग दृष्टि आ सामाजिक प्रतिबद्धताकेँ स्‍पष्‍ट करैत अछि। पुस्‍तकक संग उपलब्‍ध संक्षिप्‍त टिप्‍पणीमे गजेन्‍द्र ठाकुर जगदीश जीक कथाक ऐतिहासिक भूमिकाकेँ रेखांकित करैत छथिन्‍ह। बात केवल विषय चयनक दृष्टिसँ नइ अछि, बल्कि समग्र पुस्‍तकमे मिथिलाक निम्‍न मध्‍यवर्गक जिनगीक जतेक गहराइसँ देखल गेल अछि, ओ अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। कथाकार मिथिलाक गाममे जइ गंभीरतासँ भ्रमण करैत छथिन्‍ह, ई साहित्‍येटाक लेल नै अपि‍तु इतिहास आ अर्थशास्‍त्रक लेल सेहो प्रामाणिक सामग्री उपलब्‍ध करैत अछि।

नॉस्‍टेल्जियाक सच
की जगदीशजी अतीत मोहसँ ग्रस्‍त छथि। प्रस्‍तुत संग्रहमे लेखक मिथिलाक ग्राम आ ग्राम्‍य जीवनक प्रति खास अनुराग व्‍यक्‍त करैत छथि। एतबे धरि नै ओ शहरीकरण, शहरमे प्रवास आदिक प्रति खास वितृष्‍णा व्‍यक्‍त करैत छथि। भैयारी’ कथामे कुसुमलाल कोर्टमे नौकरी करैत छथि आ मधुबनीमे रहैत छथि। आ हुनकर पैघ भाय दीनानाथ गामेमे रहैत छथिन्‍ह। आ गामोमे रहैत दीनानाथ अपन जिनगीक गाड़ी नीक जकाँ चलबैत छथि, मुदा कुसुमलालक गाड़ी लसकि जाइत छैक। शराब पीबैत-पीबैत हुनकर लीवर गलि गेलै। सौंसे देहमे घाव भऽ गेलै। आ घरवाली सेवा करए केर बदला गरियाबै आ बड़का बेटा कहए- पप्‍पा जी, महकता है’।’
निस्‍संदेह गामक सहजता, सरलताक प्रति लेखकमे एकटा खास किस्‍मक सि‍नेह अछि, ताहि‍ दुआरे ओ डेग-डेगपर गाममे रहनाइ, गामक धन्‍धा-पानिकेँ गौरवान्वित केनाइ नै बिसरैत छथिन्‍ह।

क्‍लासिकी परम्‍पराक पृष्‍ठभूमि
कोनो भाषाक प्रतिनिधि कथाकार भाषा, साहित्‍य आ समाजक वर्तमानक दबाव ग्रहण करितहुँ प्रतिकारक व्‍यक्तित्‍व राखैत अछि, आ ऐ प्रतिकारेमे मौलिकता छैक। वरिष्‍ठ कथाकार सुभाषचन्‍द्र यादव गामक जिनगी’पर संक्षिप्‍त टिप्‍पणी करैत कहैत छथिन्‍ह-  हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि। आब प्रश्‍न ई अछि जे घटना बहुलता तँ कथाक नीक लक्षण नै मानल गेलइ तखन ऐ टिप्‍पणीक की मतलब?
कहानी वा कथा जखन घटना केंद्रित संरचना त्‍यागि कऽ मनोवैज्ञानिकता वा मनोविश्‍लेषण दिस प्रस्‍थान केलक तखन ई मानल गेलइ जे कथाक पहिल चरण समाप्‍त भेलइ आ कथा विकासक दोसर सोपन दिस बढ़ल। मुदा ऐ विकासक साँचाकेँ जगदीशजी सँ जोड़नइ जगदीशजीक संग अन्‍याय होयत, कारण जे जगदीशजी घटना बहुलतापर निर्भर नै छथि। बहुतो कहानी लेखकक कवितामयी व्‍यक्तित्‍व, हुनकर गंभीर मनोविश्‍लेषण आ सक्‍कत विचारसँ लैश अछि
पिछला बाढ़ि‍ मोन पड़तहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़ि‍क विकराल दृश्‍य आँखिक आगू नाचए लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बािढ़यो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुिढ़या। बुिढ़या रुप बना
नृत्‍य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्‍ह-पह‍चिन्‍ह मेटा समुद्र जेकाँ बनि गेल। जेम्‍हर देखू तेम्‍हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मँुहे दौगल जाइत। कतेक गाम-घर पजेबाक नहि रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल, पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल।’
ऐ प्रकृति दृश्‍यकेँ देखल जाओ, प्रकृतिक स्‍वाभाविक लीलादर्पणमे मानवक कठिन भविष्‍य देखाओल गेल अछि। कथामे आगू बाढ़ि‍जनित भुख आ दरिद्रताक मर्मस्‍पर्शी चित्रण अछि। निश्चित रूपेण जगदीशजी मैथिली कथाकेँ क्‍लासिकी परम्‍परा दिस बढ़बैत छथिन्‍ह आ मैथिली कथा एकटा गौरवशाली युगक दुआरिपर अछि।
                                        
आंचलिकताक भ्रम
कथा संग्रहमे ग्राम्‍य जीवनक विराट उपस्थिति ऐ भ्रमकेँ उत्‍पन्‍न करैत अछि, कि जगदीश जी आंचलिक शैलीक लेखक छथि। तद्भव आ देशज शब्‍दक बाहुल्‍य, एक खास वर्ग वा जातिक ग्राम्‍य जीवनक प्रसंगक बहुविधि चर्चा। चुनवाली’मे चुन बनबएबला मिथिलाक एकटा जातिक संघर्षक चर्चा अछि।
डाॅ. धीरेन्‍द्र वर्मा कहैत छथिन्‍ह- आंचलिकताक सिद्धिक लेल स्‍थानीय दृश्‍य, प्रकृति, जलवायु, पाबनि, लोकगीत, बातचितक विशेष ढ़ंग, मुहावरा, लोकोक्ति, उच्‍चारणक विकृति, आमजनक स्‍वभावगत आ व्‍यवहारगत विशेषता, हुनकर अपन रोमांस, नैतिक मान्‍यता आदिक समावेश अत्‍यंत सतर्कता आ सावधानीसँ कएल जाइछ।’

यदि ऐ मानकपर देखी तखन गामक जिनगीक अधिकांश कथा आंचलिकता दिस झुकाव देखबैत अछि। मुदा ई बात सदिखन स्‍पष्‍ट रहबाके चाही कि मिथिलाक प्रति अनुरक्ति देखेबाक बावजूद ऐ संग्रहक कथा आंचलिक नै अछि। किएक तँ लेखक कोनो कथामे मिथिला अंचलक नायक नै बनेने छथि आ ई विशेषता हिनका किछु-किछु यात्री जीसँ जोड़ैत अछि आ रेणुसँ अलग करैत अछि। ई बात उल्‍लेखनीय अछि कि लेखक मिथिला क्षेत्रक परंपरा, लोकोक्ति, गीत-नाद, नाच तमाशाक वर्णनक प्रति कोनो अतिरिक्‍त राग प्रदर्शित नै करैत छथि। अर्थात ई तत्‍व कथामे ओतबे अछि जते कि कोनो प्रगतिशील लेखकक कृतिमे होइछ। आंचलिकताक एकटा अन्‍य पहलू विचारनीय अछि। मिथिलाक निम्‍न आयवर्ग जीवनक जते प्रभावशाली चित्रण अइठाम अछि, ओ अन्‍यत्र दुर्लभ अछि। आ ई चित्रण जत्‍ते पूर्ण अछि ततबे प्रामाणिक। ऐ दृष्टिसँ चुनवाली ‘रिक्‍साबला हारि-जीतक विश्‍लेषण आवश्‍यक अछि।

जीवन संघर्षक कथाकार
सुभाषचन्‍द्रजी जगदीशजीकेँ जनवादी आ प्रकृतिवादी कथाकार नै मानैत छथिन्‍ह, बल्कि जीवन-संघर्षक कथाकार मानैत छथिन्‍ह। ऐ विचारमे निहित जनवाद आ प्रकृतिवाद सन पारिभाषिक शब्‍दक विवेचनसँ बचैत ई कहब आवश्‍यक अछि जे जगदीश जीक यथार्थवाद कोनो सुपरिभाषित यथार्थवादक साँचामे सेट नै होइत छैक आ सेट करबाक प्रयासो नै करबाक चाही। भारतीय साहित्‍यमे यथार्थवादक एकाधिक मॉडल उपलब्‍ध अछि, आ जगदीश जी ककरो अनुकरण करबाक स्‍थानपर नव मार्ग बनेबाक लेल प्रयासरत छथि।
ग्रामीण जीवनकेँ विषय बनेबाक लेल पाथेर पांचाली गणदेवतामैला आँचल गोदान सन कतेको क्‍लासिक उपलब्‍ध अछि। ई स्‍पष्‍ट नै अछि कि ओ ऐ मे कोन पढ़ने छथि आ कोन नै, मुदा ई स्‍पष्‍ट अछि कि ओ अपन विशेष दृष्टिसँ स्‍वीकृतकेँ अतिक्रमणक लेल कटिबद्ध छथि। जगदीशजी दुखकेँ गौरवान्वित करबामे विश्‍वास नै करैत छथिन्‍ह, ओ अनंत दुख आ दुखमयी विश्‍वक धारणामे विश्‍वास नै करैत छथिन्‍ह। ओ प्रचण्‍ड आशावादक लेखक छथि, ताहि दुआरे बाढि़, सुखार, अकाल, महामारी आ विभिन्‍न व्‍यक्तिगत आपदाक बीच आदमी जीवैत आ जीतैत छथि।

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३. पद्य











३.६.अक्षय कुमार चौधरी- दियाद बलजोर

३.७.    १.डॉ॰ शशिधर कुमरआनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा"

१.अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी" २.डॉ  जया  वर्मा ३.शांतिलक्ष्मी चौधरी

अंजनी कुमार वर्मा "दाऊजी"
सुखायल अतीत

दीप तँ लेसैत छी
मुदा बातीये सुखायल अछि
हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि....

कतेको बसंत आयल
आ चलि गेल वयसकेँ समेटि
आशा-अभिलाषाक पूनम लऽ लेलनि अमा समेटि
गीत तँ गाबऽ चाहैत छी
मुदा राग भोथियायल अछि
हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि........

 
मृगतृष्णा केर पाछू तँ
हम सदिखन दौगि रहल छी
श्वेत वसन केर कारीखकेँ
सदिखन ढोइ रहल छी
डेगहि डेगपर अछि शंका
मुदा संगी हमर पछुआयल अछि
हमर ख़ुशी तँ हुनक उदासीमे नुकायल अछि.....!

बेरोजगारक आत्मा

आँखि खुजतहि हेरए लगलौं छाँह
सरकारी शासन सँ मारवाड़ीक बासन धरि
मुदा सा्ँस स्थिर होइतहि
हमरा भेट गेल ओइ बहुरंगी अश्मशानक आगिमे......
प्रजा आ तंत्र

लोहा सँ लोहा कटै अछि
विष काटै अछि विष कें,
मुदा भ्रष्ट सँ कहाँ उखड़ै अछि
भ्रष्टाचारक ओइध ...?
निज स्वार्थ हेतु आश्वासन सँ
सागर मे सेतु बना दै अछि,
रामक दूत स्वयं बनि सभ
मर्यादा कें दर्शाबै अछि,
जनमत केर हार पहीर कऽ ओ
रावण दरबार सजाबै अछि,
जौं करब विरोध तँ शंकर बनि
ओ तेसर नेत्र देखाबै अछि,
थिक प्रजातंत्र तें रावणों केँ
भेटल अछि समता केर अधिकार,
हमरे सबहिक शोणित-पोषित
थिक प्रजातंत्रक सरकार.....

कोसी


हिमगिरीक आँचर सँ ससरि,
मिथिला केर माटिमे पसरि
दुहु कूल बनल सिकटाक ढेर,
पसरल अछि झौआ कास पटेर
मरू प्रान्त बनल कोसी कछार,
निस्सिम बनल महिमा अपार
सावन भादो केर विकराल रूप,
पाबि अहाँ यौवन अनूप
उन्मत्त मन ,मदमस्त चालि,
भयभीत भेल मानव बेहाल
की गाम-घर, की फसल-खेत,
की बंजर भू ,लय छी समेटि
प्रलयलीन छी अविराम,
मानव बुद्धि नै करए काम
कतय कखन टूटै पहाड़,
भीषण गर्जन अछि आर-पार
तहियो हम सभ संतोष राखि,
कर्तव्यलीन भेल दिन-राति
वर्षा बीतल हर्षित किसान,
खेतीमे लागल गाम-गाम
लहलहाइत खेत देखै किसान,
कोसी मैयाकेँ शत-शत प्रणाम .......

 
     डॉ  जया  वर्मा 
सागर  आ मोन    
   

सागरक  लहरि कखनो 
उद्वेलित 
कखनो उन्मादित 

एकटा सुनामी  समेटने अंतर मे 
कतेक मौन मूक 
मुदा लहरिक ओइ पार की अछि ??
अनिश्चित , अपरिचित ....
मोन उद्विग्न  भऽ उठैत  अछि /
बेर बेर ओ लहरि  हमरा बजा रहल अछि 
सपनो मे आबि बजैत अछि
भयभीत  नै होउ  
हम अभेद्य  नै छी..
हमरा छुबि कऽ तँ देखू 
हमहूँ  अहीं सन छी प्रतिपल  बेचैन 
मुदा खुश छी हम
जहिना अहाँ खुश छी मुदा बेचैन  
चैन  हेराय बेचैन  भऽ  जाइत अछि 
चैन पाबि बेचैन भऽ जाइत अछि   
मोन.......रहस्यमय मोन //


श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।
 
दरीदरी


ई गरीबी, दरीदरी निसरर,
जखन घुसय छै ककरो घर
ओ पुछै की तू हो--
रैजपूत छिअ की मुसहर?
बाभन छिअ की मेहतर?

काल्हियेसँ छी छिछियाइत,
दू तम्बा आटा ले बेकल;
ठारो जाइये नञ आब रहल
भासयै देह... डेग करै डगमग,

दू दिन सँ निरभुक्त, छी भुखल,
दू धीया सेहो निसूआयल सुतल.
कोरलगुआ घिचैये सुखल दूध,
चिलका चिचियावै अनहद.

धीया-पूताक देखि आंखिक नोर
आब हहरै जिया, मन इन्होर.
पैचो नञ भेटय, नय उधार;
भगवानो के कहाँ छै कत्तो ठौर.

भीखमंगनी बभिनियाँ विधवा सँ,
टोल-पड़ोसक लोक छै आजीज.
नोतो-उपकार मे कतैक खुओथिन
बातो तँ छै ईहो एकदम वाजीव.

दू पाई बचबैक छै जमाना,
तै पर दूनियाँ भरिक महगाई.
सदावर्त मे कतय सँ खुओथिन
वस्तूक दाम फेकय छै आगि.

ई सरकारो जुआएल सियार,
कुरसीक भुक्खा, छपकछोर.
सुनय छै निछछ बस तकरे
जे लड़ै, अड़दर करे अनघोल

.रोहियारक ’अगिता’ ’पछिता’ मिलि
अपन गरीब लेल उठाबै छै आवाज.
ई ’अगिता’ केर ’बड़का’ केँ कियै
अपन दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज?

ई ’पछिता’ केर ’छोटका’-’बड़का’ केँ कियै
हर दरीदर लेल बाजे मे लागे लाज?
बथुआ

जेना गामक जीमीदार सरकार,
उजारि दैत छथि जकरा मोन तकरा.
गहूँम, सरसौं, रैंचीक किसान,
उपाड़ि दैत छथि समुल-जड़ि हमरा.

तैयो हम अस्तित्व बचौने छी
ओलती, कोनटा, बाड़ी मे.
मिथिला केर तरकारी मे.

बाधबन मे जगह अछि मुस्किल
गहुम सरसौं छथि बोल वला
पाक-सुकला मे जगह मुदा ऐहन
के छथि ओतय सँ भगवै वला

सम्मान पेनै छी हम एखनो
सग्ग-भट्टा, सतसग्गा, झुरी मे
मिथिला केर तरकारी मे.

छौंकल मूर-भाटा-अदौरी तीमन लs
स्त्रीगन सुनै छी गिरवै छथि लहास
सग्गभट्टाक तीमन केँ तँ सेहो
बाँटी खाइ छथि पड़ोसिया दियाद

स्वादु व्यंजन छी हम एखनो
खेनिहारक आगुक थारी मे
मिथिला केर तरकारी मे



 
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१.इरा मल्लिक ओमप्रकाश झामनीष झा बौआभाई
इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।
भौजी
लाल साड़ी पहिरने भौजी,
मिथिला आँचर ओढ़ने,
चिक्कन चुनमुन गोर माथ पर,
लाल टिकुली छथि सटने।
छनछन पएरक नेपुर बाजे,
हाथक चूड़ी खनकए ,
भौजी शोभा छथि ,
हमर घर के।

बाजब हुनकर मधुर मधुर छन्हि,
अधर मुस्कैत सदिखन,
घर मे सभक ध्यान रखै छथि,
थकैत नहि छथि कौखन,
घरक साज सँभार करैत,
गृहिणी बनि मान बढ़ाबथि,
भौजी शोभा छथि,
हमर घर के।

बाबीक छथि चित्रसुन्नैर,
माँजीक भव्यारानी,
भोर भिनसर उठि ,
भौजी पहिने,
बाबी आ माँ क,
चरण छुबै छथि।
हमसभ भाइ बहिन ले भौजी,
जननी रुप धरै छथि,
भौजी शोभा छथि हमर
घर के।

स्वजन बन्धु सर कुटुंब मे भौजी,
मैथिल बेबहार खूब निभाबथि,
पावनि तिहारमे हम्मर भौजी,
नीक नीक पकवान पकाबथि,
भार्यारुपमे ओ तँ ,
भैयाक मान बढ़ाबथि,
घरमे प्राण संचार करै छथि,
भौजी शोभा छथि हमर घरक।
बड़ अजीब मँहगाइ छै!

आटा चाउर तेल शक्कर,
मँहगी केँ छूलक आसमान,
गृहिणी भनसाघर मे देखू,
कतेक भऽ गेलि परेशान,
बड़ अजीब मँहगाइ छै!

एतेक मोट तनखाक गड्डी,
मासांत पति घर अनै छथि,
दस दिनमे हालत गड्डीक देखू,
कतेक पातर दुब्बर भs जाइ छै,
बाँकी महिनाक बीस दिन,
कोना चलत, की करथि उपाय,
बड़ अजीब मँहगाइ छै!

पनपियाइ बेरहटक व्यंजन,
सुनु! सभ फीका फीका भऽ गेल,
भोर साँझक चाह संग बिसकुट,
सेहो गिनतीमे कम भेल,
एतेक कतर व्योँतमे घरनी,
अतिथि केँ कोना करती सत्कार,
बड़ अजीब मँहगाई छै!

पावनि तिहारक बात नै पूछू,
घरनी कोना करती ओरिआन,
कपड़ा सियेती या उपहारमँगेती,
कोना पकेती पुआ पकवान,
बड़ अजीब मँहगाइ छै!!!

ओमप्रकाश झा
सून मोनक अन्हार कोनमे दीप कोना कऽ बरत?
छूछे बोल-भरोस अहाँ के दुख कोना के चूरत?

ठोढ चुप हृदय स्पन्दित सदिखन राग गाबैत अछि,
ई राग जे अहाँ नहि बूझब, तँ सरगम कोनाकेँ गूँजत?

बिना बजेने चानन गाछसँ भुजंग रहैत अछि लपटल,
मूक संकेत अहाँ नहि जनबै, तँ प्रेम लता कोना केँ लतरत?

कौआ कुचरै भोरे सँ आँगनमे अनघोल केने अछि,
अहाँ साँझ धरि सूतले रहबै तँ सनेस कोना केँ पँहुचत?

कस्तूरी मृग मे, सर मे सरसिज, सुगंध सुमन मे सदिखन,
ऒहिना "ऒम" अहीं मे बसला, कतौ और कोना केँ भेटत?
हमर जिनगीक सागरमे तूफान बनल छी
लूटि कऽ हमर चैन अनजान बनल छी

आब हमरा बुझाइत अछि सभ पाथरक मुरुत
अहींकेँ तकैत हम सदिखन बेजान बनल छी

यै प्रेम तँ पवित्र छै जेना मन्दिरक पूजा
मुदा अहाँ किए प्रेमक दोकान बनल छी

नेनाक खेल जकाँ अहाँ खेला कऽ हमरा संग
कात कऽ देलिऐ, आब हम मसान बनल छी

“ओम”क मोनक पोथीक आखर अहीं छी
चारू कात हम अहींक गुणगान बनल छी


मनीष झा बौआभाई
ग्रा+पो-बड़हारा,भाया-अंधरा ठाढी 
जिला-मधुबनी(बिहार) 

हम ऋणी छी (कविता) 

मुँह लटकल छल फूलल गाल
पोन छल सगरो छौंकी स' लाल
माय कहली बाऊ कि भेल आइ
भोक्कासी पारि कहल सब हाल

कब्बिर  काने क' कान्चुन का'
नै छल याद तैं देलक  डेंगा'
एहि मस्टरबा स' आब नै पढ़बौ 
नहि त' काल्हि स' मारत ठेंगा

भावुक भेली माइओ सुनि क'
कहली बाउ अहाँ जुनि कानू
रूसी नहि कखनो अन्न छोडि क'
खा' लिय' आ बात हम्मर मानू

बाबू आइ साँझ में जाकय हुनका
बुझा देथिन्ह नै मारता आब
अहूँ पनपियाय क' बैसू पढबा लेल
काल्हि देखा देबन्हि सब बनल हिसाब

हिचकि-हिचकि क' क'र उठाबी
भ' गेल ए'क भात आ नोर
माइअक आश्वासन सुनि हम्मर
अपनहि सटि गेल दुन्नू ठोर 

जहिना जहिना भेलौं गिअनगर
तहिना तहिना पढ़लौ इस्कूल कॉलेज
मास्टर डांटथि प्रोफ़ेसर बुझबथि
हुनकहि प्रसाद स' जे किछु अछि नॉलेज   

ऋण नहि सधा सकब हे गुरुजन
अपनें लोकनि देल उधार जे
"मनीषक" श्रद्धा सुमन स्वीकारू 
नहि बिसरब एहि उपकार के

शिक्षक दिवस पर हम अपन प्रथम गुरु (बाबा-बाबूजी-माँ), शैक्षिक गुरु (जिनका स' प्रत्यक्ष ज्ञान/शिक्षा  लेने छी)  आ आदर्श गुरु (जिनकर  अनुसरण करैत जीवन के समस्त यश-कीर्ति-ख्याति के आकांक्षा रखैत अग्रसर भ' रहल छी) ओहि सभ गुरुजन कें श्रद्धा सुमन रुपी  ई एक छोट आ अदना सन रचना समर्पित क' रहल छी I




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१.मिहिर झा २.बिनोद मिश्र
मिहिर झा

हृदयक उमंग-दर्द
निकलल बनि गजल
एहेन गजल पर तेँ
वाह वाह हेबाक चाही |
अनकर लिखल पाँति
यदि खूब नीक लागल
ओहि कृति केँ सदिखन
"साभार" लिखबाक चाही |
ज्ञान प्रसार छैक धर्म
एहि मे तृप्ति छै भरल
किंतु एहि अंजाम लेल
ज्ञान, ज्ञान हेबाक चाही |
--वर्ण ९
चक्रव्यूह

निर्विकार निराकार उन्मुक्त पदार्थ
रंग रूप जातिसँ विमुक्त यथार्थ
मनुष्य हमरा कहै प्रेत
हम घुमै छी खेते खेत |

भेल एक टा जोरगर प्रहार
जन्म लेलहुँ करैत चीत्कार
देव ! जखन उठाएल मुँह
देलहुँ हमरा ई चक्रव्यूह

पढ़ल लिखल भूजा फाँकी
पहिल व्यूह टूटल पेट झाँकि
हँसैत छल सुनि हमर कथा
के बूझत मोनक व्यथा ?

व्याह भेल परिवार भेल
उत्तरदायित्व साकार भेल
बन्लहुँ हम कोलहुक बरद
कोनो कष्ट आब की गरत
तोड़ल दोसर व्यूहक तार
हे भगवान लगाउ पार।

धीया पुता पढि लिख गेल
व्याह दान सँ फुर्सत भेल
राम राम हम पढि रहल छी
अंतिम व्यूह सँ लड़ि रहल छी
 
फेर सँ आब हम भेलहुँ चेत
 
भनहि छलहुँ हम बनल प्रेत।

(१)
गुलाबक फूल लाल
सुंदरिक ठोढ लाल
कनियाँक लाज लाल
प्रेमक रंग लाल

(२)
क्रोधक मुँह लाल
रक्तक वर्ण लाल
आतंक सँ नभ लाल
हृदयक घाव लाल

(३)
क्रांतिक रंग लाल
रणक माटि लाल
योद्धाक तरुआरि लाल
विजेताक तिलक लाल

देह क आगि पुरबा मिझबय मोनक आगि सत्संग
हृदय के आगि पिया मिझबय जखन होथि ओ संग |


बौद्धिक प्यास मिझाइत छैक
आबि साहित्य केर शरण
अलग अलग पेय छैक
पीबू जे होइए मन
संतुष्टि उद्देश्य छैक
भिड़ू नै छने छन
आत्म सात करू प्रेमकेँ
छोड़ू रंज ओ रण

जमींदारी गेल राइयाई गेल/ सभटा गेल सोतियाइ नै गेल
जमींदारी गेल राइयाई गेल
भोजन कय दिन विश्राम गेल
खेत गेल खलिहान गेल
बचल आमक गाछी गेल
गाम छोरि कएल शहर बसेरा
नौकरी कऽ करै छी गुजारा
चिड़िया चुनमुन सपना भेल
माछ मासिक भोजन भेल
गप्प दै छी अछि नई मेल
सभटा गेल सोतियाइ नै गेल

भोज 
बदरी बाबू आयल छलाह
केश अपन कटेने छलाह
कहलन्हि बाबूक बरखी छी
नोत देमऽ आयल छी
नोत पूरा बहरी केँ अछि
चूड़ा दहीक व्यवस्था अछि।

भेलै सांझ पड़ै छल बुन्नी
बिदा भेलहुँ लऽ लोटा टुकनी
उप्पर मेघ नीचाँ थाल
अनहरियाक पसरल जाल
कहुना पहुँचलहुँ पुबरिआ टोल
बुझि गेलहुँ हम भोजक मोल

पएर धोलहुँ पाँतिमे बैसलहुँ
चूड़ा पड़साइत देखैत रहलहुँ
तावत आएल जोरक बसात
उड़ि गेल हमर असगर पात
लोटा उठा अन्तह बैसलहुँ
चूड़ा दही सँ शुरुआत केलहुँ।|

खाइते छलहुँ फछक्का भेल
पड़सनिहारक मटकूडी फूटि गेल
सौंसे देह दही लेभरायल
हँसैत हँसैत कानब बहरायल
गोर लागि हम पकड़ल कान
भोजपर नहि देब कहियो ध्यान।

पत्रहीन नग्न वृक्ष प्रकृति बहुरंग
कलाकारक ई कूची की करैत अछि व्यंग ?

 

बिनोद मिश्र, आई  आई  टी रूडकी,  उत्तराखंड 

डॉ. बिनोद मिश्र सम्प्रति आई  आई  टी रूडकी,  उत्तराखंडमे अंग्रेजी पढ़बैत छथि आ हिनक रचनाb अंग्रेजी आ हिंदी मे प्रकाशित भेल छन्हि। अहि वर्ष हिनक कविता संग्रह  Silent Steps and Other Poems प्रकाशित भेल छन्हि। एकर अतिरिक्त ई अंग्रेजीमे आलोचनाक क्षेत्रमे आठ टा पोथी संपादित  केने छथि। हिनक पोथी Communication Skills for Engineers and Scientists बहुतो  इंजीनियरिंग संस्थानमे पाठ्य पुस्तक रूपमे पढ़ाओल जाइत अछि।  

प्रेम पुष्प

सैंतैत अछि  ओ नित- दिन अपन एयरबैग 
ओना काजमे अनैछ अपन सभ वस्तु
तैयो  सरिअबैत अछि अपन एयरबैग 
जेना अभ्यास कऽ रहल हो घर गृहस्तीक प्रारम्भिक पाठ ।

ओकर एयरबैग पर्याय अछि
संतुलन आ आर्थिक समायोजनक 
ओकर  एकमात्र सहचर  छात्रावासक  घुरती यात्रामे 

ओकर एयरबैगक एक खलमे छैक  पोथी 
आ दोसरमे पाथेय 
एक टा छोट  खलमे छैक ओकर साज-सज्जाक सामग्री 
जे बढ़ा देत ओकर सौंदर्य
ओकर लैपटॉप  छैक एक टा टैरो कार्ड
जे घटा सकैछ ओकर दहेज----
की ई सभ ताकि सकैछ ओकरा लेल एक टा सुयोग्य वर ?

मूक अछि ओकर उच्च आ बहुमूल्य  शिक्षा 
विवाह केर बाज़ारमे 
ताकि रहल अछि बेसीसँ  बेसी द्रव्य दान आ दहेज।
असहाय ओकर शिक्षित मोन
पूछि रहल अपन अस्तित्वक अर्थ 
की प्रेम पुष्प भऽ सकत प्रस्फुटित 
ऐ क्रय-विक्रय केर बाज़ार मे ?
मौलायल पुष्प हुकहुकी भरैत 
की निभा सकत वेदीक शपथ  ?


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१.शिवशंकर सिंह ठाकुर २.सुबोध झा
शिवशंकर सिंह ठाकुर

किए दूरेसँ झांकि कऽ देखै छी यै कनियाँ,
किए हीया हमर अहाँ सालइ छी यै कनियाँ ,

हमर तकलीफ अहाँ कनिको ने बुझी ,
रहि -रहि अहाँ किए तड़पाबै छी यै कनियाँ ,

साथी संगतिया सभ हरदम चिढाबय ,
दूरे सँ अहाँ प्रीत जगाबै छी यै कनियाँ,

मोन मारि कऽ हरदम निठुरले रहै छी,
किए अहाँ हमरा सताबै छी यै कनियाँ ,

जिनगी हमर आब निरर्थक बुझाइए ,
प्रेमक दरस आबो देखाबू यै कनियाँ,

कतेक बुझाऊ हम एहि पागल दिल केँ ,
बेर -बेर अहीँ पर आबै अइ यै कनियाँ,

हमर अहाँक मिलन बुझु कतेक खुशी देत ,
प्रेमसँ अहाँक आंचर भरि देब यै कनियाँ,

प्रेम तँ मूल अइ एहि जीवन केर ,
प्रेम बिना सभ निरर्थक यै कनियाँ,

कहथि शिव शंकर बुझू ई सत्ते ,
जिनगी बना देब अहाँकेँ यै कनियाँ।
2
हे स्वर्णमयी, अहाँ छी कतऽ
अहाँक बिना हमर अन्तःस्थल
जानि किए रूसि गेल हमरा सँ
आर हमर कलम ने जानि किए
शब्द उगलनाइ बंद कऽ देलक।

मूक,उदास आ क्षुब्ध भेल छी,
जानि कोन सोच मे उलझल छी,
हमर अन्तरात्मा ने जाने किए,
सुतल अछि ,रूसल अछि
अओर गीत हमर बन्द भऽ गेल अछि I

छन -छन अहाँक पायलक गूंज ,
धड़कि रहल अछि हमर धड़कनमे,
आ अहींक स्वर्णमयी आभामे
कतऽ बिलुप्त भऽ गेल छी हम I

रहि-रहि कऽ अहींक स्वर
बेर बेर कान मे गुंजि रहल अछि,
मानू मिसरी घुलल अहँक वाणीमे,
हमर जड़ता केँ झंकृत कऽ रहल अछि I

मोन हमर उद्विग्न अइ तैयो
अहँक हाथ हमर छाती पर
धीरे -धीरे सरकि रहल अइ
आ हमर उद्विग्न मोन केँ
शान्त करबाक प्रयास कऽ रहल अइ ,
हमर सहिष्णुता केँ ललकारि रहल अइ I

हम शान्त रहितो अधीर भऽ जाइ छी,
एहन बुझाइत अछि जेना की
अहाँ एतहि कतौ छी,
आ शून्य दिशि ताकैत अहाँकेँ
चिन्हबाक प्रयासमे लागल छी,
अहँक भीतरक ब्यथा मानू
हमरा सँ किछु कहि रहल अइ I

हँ , ई अवश्य अछि जे कहियो
हम अहाँ एक दोसराक लेल
जन्म- जन्मान्तारक शपथ खेने रही,
एक दोसराक प्रति सत्य आ सनेह सँ
प्रेमक बंधन मे बन्हि गेल रही,
से की हम बिसरि जाएब ??
कथमपि नहि , कथमपि नहि,
ईएह तँ हमर प्रेमक आधार अइ I

मुदा एक दिन !
एहन की भेल जे अहाँ अपने सँ
ओइ शपथ केँ तोड़ि देलौंह ,
आ हमरा अइ मर्त्यलोकमे
डरल ,सहमल घुटि -घुटि कऽ
जीबाक लेल विवश छोड़ि देलौंह
हम कोना कऽ जिबू ? किए जिबू ?

कोना हम बिसरि जाउ जे अहाँ
हमर कन्हा पर अपन माथ राखि कऽ
अपन वेदना केँ प्रकट केने रही
आ हमहूँ तँ अहाँ केँ भरोसा देने रही,
तखन हमर कन्हा मजबूत छल I

ओ सामर्थ्य आब हमरा मे नहि रहि गेल,
हम मजबूर भऽ गेल छी,
विवश भऽ गेल छी,
अहँक शपथक खातिर हम
कहुना कऽ जीब रहल छी I

कहियो कहियो जखन हम
बड़ दुखी भऽ जाइ छी,
अहँक कन्हा पर माथ राखि कऽ
कनबाक मोन करैए ,
मुदा किछु नहि कऽ सकैत छी,
की करू ? कतऽ जाउ ?
अहाँ ई सभ तँ देखते हैब ,
हमर ब्यथा केँ बुझिते हैब I

कहियो कहियो अहँक फोटो दिस
देखि लैत छी ,
अहँक छवि केँ मानू
निहारि लैत छी,
फेर हम शून्य दिस
देखऽ लगैत छी,
अनन्त कल्पनालोक मे
डूबि जाइत छी.........I
सुबोध झा
मनबतिया
मनबतियाक छल बड सुन्नरि आ सुकुमारि
सभ देखैत छलैक गिद्ध जकॉं ऑंखि फारि फारि
कतेको दिन पश्चात मनबतियाक घर बसल
हमरा पर तऽ जेना हडहडी वज्र खसल ।

अन्हार होएतहिं अनायसे उठि जाइत छल डेग
फेर भेटत ओ मोन मे बढि जाइत छल उद्वेग
डर हौइत छल तेँ सतत इ बात नुकबैत रहलहुँ
अपना बुझैत जेना जाति आ पॉंजि बचबैत रहलहुँ ।

सामाजिक बन्धन जॉंत जकॉं बान्हल छल
ओकरहि पर हरदम मोन टॉंगल छल
सोचिते रहलहुँ आई ओ जाऽ रहल अछि
नहिं भेल हम्मर ओ ई बात खाऽ रहल अछि ।

कहिया हटत ई जातिक भेदभाव से नहि जानि
कतेको मनबतिया मरत आ जीअऽत कानि कानि
ओकरा की दोख देबैक हमहिं जातिक देबाल नहि खसाएलहुँ
आब कनने की होएत अप्पन जिनगी अपनहि मेटाएलहुँ ।

हमहीं नहि कतेको एहिना अन्हारक चुप्पीक बाट तकैत छथि
अप्पन सभ किछु उजरलाक बादहु बौक बनि बैसैत छथि
सिनेहक दीप मिझाएल जनिकर ओ भेल विक्षिप्त घूमैत छथि
विरहक आगि मे झरकाएल मोन मनबतिया केँ ताकैत छथि ।

कतेको भेटत जकर करेज जातिवादक भार सॅें थकुचाएल हो
ठोढ केँ रहए सीने करैत जेना अपनहि सँ सवाल जबाब हो
पढला लिखला सँ की जखैन ऊँच नीचक देबाल मनुक्खे बनबैत अछि
बिसरि जाईत अछि जे सभ मनुक्ख माईए केर कोख सँ जनमैत अछि ।
 

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 १.सद्रे आलम गौहर २.जगदीश चन्द्र  ’अनिल’


सद्रे आलम गौहर
       गजल

चलि गेली ओ आब सपना देखु
चित्र बनाउ कल्पना देखू

मुद्रा सँ तौलल जाए मनुक्ख आब
आई काल्हि के नपना देखू

भीतर कारी तेँ ने महकारी
उपर सँ ललका झपना देखू

जीति एलक्शन ठाठ करै ओ
जनता अपना अपना देखू

महंगाई आकाश चढ़ल आब
सस्ता होयत ई सपना देखू

दाम एतय सभ चीजक देब पड़ै छै
अधिकारक लेल झगड़ा कर' पड़ै छै

गज भरि जमीन जौ कौरव नहि देब' चाहय
पांडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै

कर्बला केर खिस्सा त' दुनियाँ जानै छै
धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै

झगड़ा झंझट मानलहुँ नीक नहि होइ छै मुदा
जीब' खातिर ईहो कर' पड़ै छै

"गौहर" साधु ब'न' चाहैत अछि मुदा
दुर्जन के जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै
रुबाइ
 
हरल भरल रहे देश अपन ई
हरित बनाबी भेस अपन ई

हरियाली लाबै खुशियाली
गौहरक अछि उपदेश अपन ई

 




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अक्षय कुमार चौधरी
दियाद बलजोर

नाम तँ मिठगर मोतीचूर बाबू
स्वाद तीत-माहुर नीम जकाँ
ज्ञानक तँ छथि फोंक बतासा
बलधकेली करताह भीम जकाँ

छोटका भाय हाकिम-हुकुम
छिछ्छा कातिकक कुकुर जकाँ
माय बेटी दुनूक दैहिक संसर्गी
निरलज थुकचट्ट थुथुर जकाँ

फरीकक सभटा डीह हड़पलन्हि
दवारि देनै छथि दुर्योधन जकाँ
बाप धृतराष्ट्र पुत्रमोह जालमे
भाय अबंड-निपट दुःशासन जकाँ

लठीधर घरमे बेटा बियाहलन्हि
लाठी भजै छथि खमपाड़ा जकाँ
फटेदार सभकेँ गामसँ हाँकि कऽ
खेत चड़ै छथि अनेर पाड़ा जकाँ

भाय-बन्धु परहेज केने छन्हि
पहलमानी करै छथि लंठ जकाँ
लोक परोछमे थूक फेकै छन्हि
तैयो तनि चलै छथि कंस जकाँ

दियाद-वादक डाह लऽ किछु लोक
समाजमे पसरल छै कोढ़ि जकाँ
राति-दिन महादेवकेँ कबुलथिन
दियाद गलैथ राहरिक दालि जकाँ।


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१.डॉ॰ शशिधर कुमरआनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा"
    १.
डॉ॰ शशिधर कुमर                                    
एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा                                    
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४
                            
बसात (हवा)
ओ शिल्पकार छी एहि धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।
स्पर्श मात्र कए सकइत छी , निज  आँखि  सँ देखब सपने अछि ।।

ब्रम्हा बनि कखनहु  सृजन करय,
कहुखन  हर  रूप  कराल धरय ।
कहुखन  हरि  सम   पालनकर्त्ता,
कहुखन यम - सद्यः काल बनय ।
ओ जिनगी छी  एहि  धरती केर,
सभ जीवक साँस समाहित अछि ।
एहि  धरती पर  जे  रिक्त लगय,
ओहि शुन्यक बीच प्रवाहित अछि।
नञि मूर्त रूप पओलक कहियो, पर दिव्य शक्ति संवरने अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

ओ योगवाहि,  की नञि बुझल ?
  कऽ सकैछ  ककरो संगति ।
जकरा संग,  जा धरि मीत रहय,
तकरे  सन  गुण, तकरे रंगति ।
के नञि जनैछ  पुरिबा – पछिबा,
मलयक बसात के नञि जनइछ ।
ककरा  नञि  अनुभव  चक्रवात,
लू – जेठक  दुपहरिया  तपइत ।
अनल,  अनिल  केर  संग  पाबि, सोनक लंका  केँ  डहने  अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

कहुखन एकसरि सरिता  जल पर,
जनु  जलतरंग  ओ बजा  रहल ।
कखनहु  मरु मे  वा सागर  तट,
लीखि बालु सँ अपने  मेटा रहल ।
ओकरा  सोझाँ,  के रहल  अडिग,
बिनु दर्प – दलित, के रहल ठाढ़ ?
कत विटप उखाड़ल, सिन्धु मथित,
भासित  पहाड़,  अपचित  पठार ।
अगनित पाथर केँ काटि – छाँटि, कत रूप - अनूप ओ गढ़ने अछि ।
ओ शिल्पकार छी  एहि  धरतीक, नञि जानि कते की रचने अछि ।।

 
      हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा

हे प्रिय ! अहँक सुन्नर मुखड़ा,
                                                         गहुमक  रोटी  सन गोल गोल ।
ने रक्त अधिक, ने श्याम प्रबल,
                                                       गहुमहि सन सुन्नर गोड़ गोड़ ।।

अछि मोन लोभाइत देखि – देखि,
                          दू  टा  फाँरा आमक अचार ।
संगहि राखल  सुन्नर - सुन्नर,
                          मिरचाइक फर दू गोट लाल ।।

की काज अहाँ केँ एहि रोटीक,
                        दऽ दियऽ सखी हम भूखल छी ।
आपस कए जुनि सिर पाप धरू,
                       हम छी अतीथि हम भूखल छी ।।

 

                                                          गजल *

जे गाबि सकी, से गीत भेल,  की गजल - छन्द - कविता - मुक्तक ?
जँ  हो  जजाति,  तऽ  खेत भेल,  की आढ़ि – धूर – हत्ता - टटहड़ि  ?? 

हम अंगहीन, कोनो अंग विना,  पर देह सिमित नञि,  अछि व्यापक ।
मुँह – नाक - कान आ पएर - हाथ,  छी हमरहि, पर ने हमर पड़तर ।।

कोँढ़ी  जँ  फुलायल,  फूल  बनल,   गेना – गुलाब – जूही - चम्पक ।
जे फड़य गाछ पर, फऽल कहल, हो आम – लताम – लकुच – कटहड़ ।।

छी वारि एक,  पर  विविध रूप,  अछि जलधि धरा,  नभ मे जलधर ।
खन शान्त कूप – पोखड़ि – डबरा, खन चंचल सिन्धु – सरित – निर्झर ।।

कर  कलम  हाथ  लिखबाक लेल,  पर मोन पता  नञि  की लीखत ।
अहँ कहलहुँ “गजल”  लिखू - लिखलहुँ, पर गाबि सकब तेँ गीत कहब ।।

अहँ  “अनचिन्हार”,  परिचित भेलहुँ,  पर हम  “विदेह”  सौंसे सञ्चर ?
उन्मुक्त बसात - चिड़ै सन मन,  नहि गजल - गीत,  खिस्सो लीखत ।।


 *श्री आशीष “अनचिन्हार” जी केर आग्रह पर तथा हुनिकहि समर्पित ।  


 

आनंद कुमार झा
याद आयल

आइ फेर याद आयल किएक
  मिथिला देश के
छोड़ि
  देने छी जहन  हम सभ अप्पन खेत  केँ
माय केँ कोना बिसरलौं, की भेल ई की कहू
चलि पड़ल छी लऽ पिपासा छोड़ी अप्पन भेषकेँ
भाइ छुटल , मित्र छुटल
छुटि गेल सभ याद सभ
हम तड़पि कऽ रहि गेलौं
बस हाथ धेने कसि कऽ
आइ फेर याद आयल ........

 
नया जमाना आबि गेलैए
पाइ टा भगवन छै
जकरा
  देखू एक्के रस्ता
पाइ केर इन्सान छै
सखी छुटल मीत छुटल
रुसि गेल सभटा कोना
आब तँ बिसरि रहल छी
नेनपनक खेल केँ
आइ...........................
.
गाम पर पीपर तरमे
खेलाइत रहिऐ कोना कहू
रोज एतए परदेश मे
दिन खुजिते रोज बहु
मोन कानल आँखि कानल
देखि कऽ कोना सहू
 
केना कऽ
  सभटा मेटायल
सपना अपने सोचि कऽ
आइ.............

 

नवीन कुमार "आशा"
आस
नै छल हमरा ई आस
तोरा पाएब की अपना पास
आँखिमे बसै छल तोहर मुखड़ा
जखन-तखन दिन-दुपहरिया
जखन कखनो मिलैए तोरासँ नैन
नै आबैए ओइ दिन चैन
नै छल हमरा ई आस
तोरा पाएब अपना पास
पूरा दू बरख बाद देखल तोरा
मुदा नै किछु कहि पाओल तोरा
अखनो देखि तोहर चंचलता
मोन करैए सदिखन तोरा देखी
तोहर देखी मन्द मन्द मुस्कान
बनेलकौ हमर दिलमे मकान
तोहर की करू आरती
जे अपने होअए पूर्णिमाक चान
जेकर होअए अपन पहिचान
ओकर की करू व्याख्यान
बस एकटा गप कहियौ गए
तोहर हृदैमे बसए आशाक जान
कहियो नै छल हमरा आस
पायब तोरा अपना पास


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१.जवाहर लाल कश्यप .अमित मोहन झा

जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।
ई की भेल ?

अखनो नाचि रहल अछि
वएह शीन
मानसपटल पर
घटना
जे घटल छल
स्टेशन पर्
एकटा
सुन्दर सुशील संभ्रान्त महिला
दोसर
दीन  दुखी दरिद्र महिला केँ
दान कऽ रहल छलीह
अप्पन फेरल कपडा
किछु एना
अपना आप केँ
ओकरा सँ बचा
कहीं टच ने भऽ जाय
ओकर देह मे
हम अवाक रहि गेलहुँ
ई कि भेल ?
पाप वा पुण्य
दया वा घृणा
अमित मोहन झा, ग्राम-भंडारिसम (वाणेश्वरी स्थान), मनीगाछी, दरभंगा, बिहार, भारत।

आयल  राखीक त्योहार
छायल खुशीक संसार,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरियामे,
हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरियामे।

रोली कुमकुम तिलक सजायब,
माथ भैयाकेँ लगायब,
उठल स्नेह तरंग मोर
मनमा मे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरियामे।

अरिपन अँगनामे बनायब,
ठाँव पीढ़ीसँ सजायब,
प्रेम अश्रु भरि आओत,
नयनमामे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।



सोनक थारमे राखि लायब,
भा-बहिनीक उरकेँ जुड़ायब,
पीढ़ी भैयाकेँ बैसायब,
अंगनमामे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरियामे।

भाईजी हाथमे राखी बानह्ब,
हुनकर आरती उतारब,
संगहि मुँह मिठायब,
भवनमा मे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।

भैया जीबहु लाख बरीष,
दै छी हृदयसँ आशीष,
सावन ल आयल प्रेम,
परनमा मे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।

भाई-बहिनक ई त्योहार,
महिमा एकर अपार,
अमि राखब बहिनक लाज,
त्रिभुवनमा मे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।

भाईजी बहिन केँ जुनि बिसरायब,
अपन हृदयसँ जुनि बिलगायब,
अमित राखी मे फेर आयब,
सावनमा मे,
बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।

हे बहिनी मिल-जुलि चलियौ,
भैयाक नगरिया मे।

(ऐ गीतक रचनाक श्रेय हम दुनु छोट बहिन कल्याणी एवं कल्पना केँ द रहल छियन्हि, जिनकासँ हमरा अमूल्य भावनात्मक सहायता भेटल ई गीत लिखबाक आमंत्रण हमरा श्रीयुत दीपक जी सँ भेटल तइ लेल हम हुनकर अपन हृदयक अंतर्तम बिन्दुसँ आभारी छी। रचनाकेँ वर्तमान रूपमे प्रस्तुत करबामे पूज्यनीय श्याम शेखर झा भाई जी अहम योगदान छन्हि। विश्वक समस्त भाइ- बहिनक अमर प्रेमपर लिखल हमर एक लघु प्रयास एक टा गीतक रूपमे अपने सबहक समक्ष प्रस्तुत अछि एवं विश्वक समस्त भाइ-बहिनकेँ हमरा दिससँ ई छोट उपहार।)


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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...