Thursday, September 15, 2011

'विदेह' ८९ म अंक ०१ सितम्बर २०११ (वर्ष ४ मास ४५ अंक ८९) PART II



राजदेव मण्‍डल

हमर टोल
उपन्‍यास
गतांशसँ आगू....

गतांश आगाँ...

‘ठक-ठक-ठक’
      गाछ कटि‍ रहल छै। झमटगर आमक गाछ। कटबा रहल छै- झटकलाल मड़र। कुरहैड़क चोटसँ डारि‍-पात थर-थर काँपि‍ रहल अछि‍। चि‍ड़ई-चुनमुनी फड़फड़ा कऽ उड़ि‍ रहल छै। जार-जार कानैत जेना कहि‍ रहल छै-गाछ।

हौ, हमरा नै काटह। हमर कोनो दोख नै। हम तँ तोहर सहायक छीयह। मीठ-मीठ फल, पवि‍त्तर हवा, शीतल छाँह दैतै रहए छी। बरखा बूनीमे हमर सहयोग देखते छी। तैयो हमर जान लऽ रहल छी। आह... हमरा बहैत खूनकेँ कि‍यो नै देख रहल अछि‍- हौ......।

जल्‍लाद जकाँ दू गोटे चला रहल अछि‍-कुरहैड़। गाँजाक नि‍साँसँ दुनू आँखि‍ लाल। घामसँ नहाएल। चाहै छै- जलदीसँ जल्‍दी गाछकेँ गि‍रा दी। मौतक निन्न सुता दी।
कि‍छु दूर हटि‍ कऽ झटकलाल मड़र ठाढ़ अछि‍। जल्‍दी गाछ कटबाक आग्रह कऽ रहल छै। जेना गाछ नै कोनो भरि‍गर बोझ ओकरहि‍ कपारपर लाधल छै।

झटकलाल मड़रक छोटका बेटा अजय जेना गाछक करूण क्रन्‍दन सुनि‍ लेलक। ओकरा पाएरमे तेजी आबि‍ गेलै।
बाबूजी! आमक गाछ कि‍एक कटबा रहल छि‍ऐ?”
झटकलाल मड़र घुरि‍ कऽ देखलक आ कने गम्‍भीर होइत बजल- ई अपन गाछ नै छी अजय। ऐपर जीबू बाबूक अधि‍कार छन्‍हि‍।
जीबू बाबूकेँ?”

हँ, हुनके दक्षि‍णामे देल गेल छै। बरि‍सोपूर्व ताेहर दादाजी केँ श्राद्ध-कर्ममे आत्‍माक शांति‍ आ मुक्‍ति‍क लेल। दान-दक्षि‍णामे देलाक बादसँ हम सि‍रि‍फ रखबारि‍ करै छि‍ऐ।

अजयक व्‍यंग्‍यसँ भरल स्‍वर नि‍कललै- आ आम पकलापर अहाँ घर पहुँचा दैत छि‍ऐ- वाह..।

हँ हौ। ब्राह्मण देवता छथि‍। हमरा ईमानदारीपर गाछ छोड़ने अछि‍। हुनके सबहक हाथमे तँ मुक्‍ति‍ छै। ओ जँ हमरापर वि‍श्वास करै छथि‍ तँ हमरो कर्तव्‍य नि‍माहए पड़तै कि‍ने...।

अहाँ बताह भऽ गेल छी बाबूजी। हम गाछ नै काटय देब।

फेर, अहाँ पढ़ि‍-लि‍ख कऽ की बजै छी। आगि‍सँ खेल करए चाहै छी। सराप दऽ देत तँ अगि‍ला जनम तक पड़ि‍ जाएत। जि‍नगीकेँ सफल करबाक लेल बहुत बात सहए पड़ै छै।

गाछ केकरो। रखबारि‍ कोइ आर करए। डरे फल दोसरठाम पहुँच जाए। अहाँ डेराएल छी। आन्‍हर छी।

झटकलाल मड़र तमसा गेल।

दू अछर अँग्रेजी पढ़ि‍ लेलहक तँ हमरा आन्‍हर बुझै छहक। पात्रकेँ देल दान छि‍ऐ। तेकरा हम बैमानी कऽ ली। अधरमी कहीं कऽ।

नै सुनने छहक- ‘जो जस करहि‍ सो तस फल चाखा।’

हँ, हँ बुझलौं। गाछक सेवा अहाँ करै छी। फलक रखबारि‍ अहाँ करै छी। ओ फल खाइत अछि‍- जीबू झा। ई छि‍ऐ कर्मक फल।

हमरा फलक चि‍न्‍ता नै अछि‍। असलमे गाछ हमर नै छी। हुनका लकड़ीक जरूरत छन्‍हि‍। अपन गाछ कटबा कऽ लऽ जा रहल छथि‍। दान-दक्षि‍णामे देल गेल छन्‍हि‍ तेकरा हम केना रोकि‍ देबनि‍। एहन जुलुम हमरा बुत्ते नै हएत।

बाबूजी, जुलुम तँ अहाँसँ भऽ रहल अछि‍। जीअत गाछकेँ काटनाइ पाप करम छि‍ऐ। अपराध छी। पर्यावरण दूषि‍त भऽ रहल छै। गाछ-बि‍रि‍छक अभावसँ प्रदूषण फैल रहल छै। अहाँ गन्‍दगी फैलाबैमे मदति‍ कऽ रहल छि‍ऐ।

हम गन्‍दगी फैला रहल छि‍ऐ की? अधरमी जकाँ बात तू करै छहक। पाप-पुण्‍यक गि‍यान नै छह तोरा। तोरे सन लोकक संख्‍या जँ धरतीपर बढ़ि‍ जेतै तँ ई धरती थरथर काँपए लगतै।

अजय अपन केश नोचैत धुनधुना कऽ बजल- भैंसक आगाँ बीन बजेलासँ की फैदा। कि‍न्‍तु गाछ तँ नै काटए देबनि‍।
फानि‍ कऽ आगू गेल आ लपकि‍ कऽ कुरहैड़ पकड़ैत बजल- रूकि‍ जा। गाछ नै काटि‍ सकै छह।
कनेक दूरपर धर्मानन्‍द बाबू आ ढोढ़ाइ गुरूजी दुनू गोटेसँ गप्‍प कऽ रहल अछि‍।
झटकलाल मड़र जोरसँ शोर पाड़ैत अछि‍- यौ धर्मानन्‍द बाबू सभ गोटे एम्‍हर आउ। देखि‍यौ हमर बेटा पागल जकाँ करैए। गाछ नै काटए दइए। कहू जे जीबूबाबूकेँ की जबाब देबनि‍। कोनो तरहेँ एकरा ऐठामसँ हटाउ।

धर्मानन्‍द लग आबैत बजल- जीबूबाबू तँ हमरे दुआरि‍पर छथि‍। हमरे टाएर गाड़ीसँ हुनकर लकड़ी जेतै। बहलमानक खोजमे आएल छलौं। घोंचाय तँ गाड़ी चलबैमे माहि‍र छै। ओकरे ताकि‍ रहल छी।
फेर फुसफुसाइत स्‍वरमे आगू बजल- अहाँ तँ जानि‍ते छि‍ऐ मड़र। टाएरगाड़ी तँ घोंचायकेँ नाओंसँ उठल छलै। ऑफि‍समे ओकरे नाम दरज छै। ओइ दि‍न- हम तँ चलाकीसँ आनि‍ लेलौं। संदेह होइत अछि‍ आब। कहीं बुझि‍ जाएत तँ गाड़ी घेर लेत।
झटकलाल मुड़ी झुलबैत कहलकै- धुर, ओकरा केना मालूम पड़तै। मुरूख-चपाट छै। एम्‍हर जीबूबाबू अपना सबहक संग छथि‍। कि‍छो नै हेतै। लेकि‍न पहि‍ले हमरा ऐ झंझटसँ नि‍कालू। अजयकेँ ऐठामसँ ठेल-ठालि‍ कऽ हटाउ।

ढोंढ़ाय गुरूजीकेँ संगे आओर दू गोटे आबि‍ गेल।
झटकलाल मड़रक इशारा पाबि‍ सभ गोटे एक्केबेर अजयकेँ पकड़ि‍ लेलक। घि‍ंचैत-ठेलि‍यबैत ओइठामसँ दूर लऽ जेाक प्रयास करए लगल।
अइठामसँ चलह। तूँ पढ़ूआ बाबू छहक। तोरा समाजक सभ गप्‍प नै बूझल छह। जीबूबाबू साधारण लोक नै छथि‍। पैघ पैरवीबला बेकती छथि‍। हमरा सभकेँ कतेक बेर नीक-अधलामे बचौने छथि‍।

अजय ओइठामसँ घुस कऽ नै चाहैत छै। वि‍रोध कऽ रहल छै। ओकरा सबहक बन्‍धनमे छटपटा रहल अछि‍। कि‍न्‍तु बन्‍धन ढील पड़ै तब ने।
कहै छी हम। हमरा छोड़ि‍ दि‍अ। नै तँ बड्ड खराब बात भऽ जाएत। पाछू हमरा दोख नै देब।

झटकलाल मड़र ठेलैत कहलक- चहल अजय चलह। काज नै रोकहक। सुनह- धरम करैत जँ हुए हाि‍न, तैयो नै छोड़ी धरमक बानि‍।

अजय जालमे फँसल चि‍ड़ै जकाँ फरफरा रहल अछि‍। जाल तोड़बाक बारम्‍बार प्रयास कऽ रहल अछि‍। असोथकि‍त भेलापर देह थि‍र भऽ गेल। मुदा बुइध तेजीसँ दौड़ए लगल। घर-दुआरि‍-गाम-शहर-राज्‍य-देश आओर आगू दि‍स.....।

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जारी........................................
  
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), पिता: श्री श्यामानन्द झा, ग्राम+पोस्ट: गोविन्दपुर, भाया: प्रतापगंज, जिला: सुपौल।

मैथिल नारि केर समस्याक समाधान
मैथिल नारि केर समस्याक समाधान तकै कालमे ई दूनू महत्वपूर्ण काज संगहि-संग कोना होमय, मैथिलक सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा आ आधुनिक उपयोगी मूल्यक समावेश। विधवा-विवाहक लेल मानसिक परिवर्तन जरूरी छैक, खास कऽ कऽ आइ-काल्हि जखन की परिवार छोट भऽ रहल छैक, जीवन-यात्रामे पाइक अहम महत्व छैक आ पाइ-कौड़ी एकत्रित करैमे भतेरो दिक्कतक सामना छैक, नीक आ सुखमय जीवन जीअएमे मानवीय मूल्यक प्रति लोकक श्रद्धा कम भऽ रहल छैक, भाइ-बहीन, चचा-चाची आ एतए तक कि माय-बाबूसँ आत्मीय संबंध सेहो घटि रहल छैक, लोकमे भगवानक प्रति विश्वास आ डर कम भऽ रहल छैक, सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा लोकक द्वितीयक लक्ष्य छैक आ विलासी-सुखमय जीवन जीनाइ प्राथमिक लक्ष्य भऽ गेलैकहेँ...तखन तँ पहाड़ सन जिनगी लऽ कऽ बाल-विधवा बेचारीक जीनाइ बड्ड मुश्किल छैक। संयुक्त पलिवार तेँ आब छैक नै, बड़का बेटा कलकत्ता, छोटका चेन्नै आ मझिला बनारसमे अपन अपन बाल-बच्चा केँ लऽ कऽ एकटा वा दू टा कोठलीक घरमे कोहुना कऽ रहैत छथि। बाल-विधवा बेचारी जँ सासुरमे रह्ती तैयो वा नैहरमे रहती तैयो पलिवारमे लोकक कमी छैक। जे संजुक्त पलिवार काल्हि तक अपन दुखिता धीया-पूताकेँ मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, आर्थिक आ मनोरंजनात्मक बल दैत रहैक ओ आब अपनहि अस्तित्वक अंतिम साँस लऽ रहल छैक। तखन एकटा बाल-विधवा बेचारी अस्करे भूत जकाँ गाममे कोना रहतीह। एक तँ मानसिक असकरू आपनक स्थिती आ दोसर जे जँ हुनका देहमे कनिओटा सुखायल यौवन-रस बचल छैक तँ बड़का-बड़का ठोप वाला भुखायल गिद्ध सभ हुनकापर लक्क लगोने रहैत छथि। स्त्रित्व तँ आब अपनो घरमे असुरक्षित छैक तँ सर-संबंधिक गप्पे छोड़ू। तेँ विधवा-विवाह आइ बेसी प्रासांगिक छैक। मुदा प्रश्न छैक जे आब सनातनी मैथिलक सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा कोना हेतैक। मैथिल समाजमे नारीक जे जगह छैक ओइमे परिवर्तनसँ मैथिल समाज कोना समावेश करतैक। कियो ककरो ’हाफ-ब्रदर’(अर्ध-भाइ) होएतैक, कियो ’हाफ-सिस्टर’ (आधा-बहीन), कियो ककरो पहिलका दिअर-भौज हैतैक तँ कियो ककरो पहिलका ननद-ननदोइस। एखन तक मैथिल समाजमे ऐ सभ संबंध केर की रूप हैतैक आ हिनका बीच केहेन हेम-क्षेम रहतैक से स्पष्ट नै छैक। ऐ संबंध निर्धारण केर आवश्यकता एतए सेहो बुझना जाइत छैक। पुनः आइ जे मैथिल समाज ई विश्वासक दावा करैत छैक जे पति-पत्नीक सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरक, सीता-सावित्रीक उपाख्यान केर समजोर नय, मैथिलक घर-घरमे पुजिता गौरीक आदर्श-वाक्य वर होइहो तँ शंभू नै तँ रहों कुमारी, तकरो विकल्पमे तार्किक आदर्श-विचारक स्थापना करए पड़तैक। तखन मैथिल समाजक समक्ष अपन पुरातनी सभ्यता-संस्कृतिसँ विलगावक प्रश्न सेहो ठाढ़ भऽ सकैत छैक। हमरा बुझनासँ मैथिल समाज लग एकटा आओर रस्ता छैक जे अपन बाल-बच्चाक वियाह बचपनमे नै करी, ओकरा पढ़ा-लिखा कऽ बेसीसँ बेसी समय दिऐक। व्यस्क भेला उत्तर वियाहसँ जतए हुनका अपन शैक्षिक आ आर्थिक स्वावलम्बनक अवसर भेटतैक ओतै अपन मनोनुकूल वियाह करै मे सेहो मददि भेटतैक। व्यस्क वियाहसँ बाल-विधवा सनक दारूण समस्यासँ मैथिल समाजकेँ नै गुजरे पड़तैक किएक तँ व्यस्क विधवाक समस्यासँ ई बेशी कष्टप्रद छैक। विधवा-वियाह तेँ एखनो कमो-बेस सभ समाजमे होइतै छै, मैथिल समाज ऐ सँ अछूत नै छैक। मुदा ई वियाह एकटा "good marriage" (आदर्श विवाह) केर रूपमे नैय भऽ कऽ एकटा "bad marriage" (खराप विवाह)  केर रूपमे होइत छैक। ऐपर बेसी हंगामा नै करियौक। जे होइत छैक से होमए दियौक। आब केवल ई तय करियौक जे आधुनिक जीवन आ सनातनी जीवनकेँ देश, काल, पात्रक अनुकूल कोना जीअल जाय।

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रवि भूषण पाठक
कथा-बोधिसत्व
ट्रेन तऽ धीरे -धीरे रूकलइ ,मुदा भुटटु झा औंघायल छलाह ,लागलेन माथ मे चोट ।माथ हँसोथि देख‘ लागला ,केओ देखलक तऽ नइ ?ई देखि के कि सब सूतल छलइ ,निश्चिंत भेलाह ।कुलिया सँ झगड़ि के सीट नेने छलाह ,खिड़की लग वला सीट । दूरक यात्रा मे ऐ सीट क दाम पचास टका बेशी छलइ ,मुदा भुटटु झा किएक देथिन पैसा ,ओ कहलखिन हमरा संग मे टिकट छैक ,हम पैसा नइ देबओ ।कुलिया हिनकर कालर धऽ लेलकइ ,ईहो ओकर माथा वला केश बकुट्टा सँ पकड़ि लेलखिन ,तखन यात्रीगण आ प्लेटफार्म पर ठाढ़ सिपाही बीचबचाव केलकइ आ भुट्टु झा के कोनो आश्चर्य नइ भेलेन ,जखन ओ सिपाही ओमहर जाके कुलिया सब संगे हंसि हंसि के बात कर‘ लागल ,ई दुनिया एहने छइ सौंसे क सौंसे कि करियन आ कि दिल्ली ।झोरा सँ घड़ी निकालला ,पाँच बाजइ मे दस मिनट बाँकी छलइ ।कोनो ठीक ठाक स्टेशन छलइ ,नाम देखइ ले मूड़ी बाहर केला ,कोनो बोर्ड नइ मिललेन्ह ,गेट दिसि आबि के देखऽ लागला ,एकटा चाय वला देखेलेन,हिंदी मे पूछलखिन तऽ बतेलकेन कि ई जौनपुर जंक्शन छियइ ।जौनपुर सुनिते हुनका लागलेन जे ऐ गामक नाम त‘ सुनने छियइ ,यादि करऽ लागला काकी ,भौजी क नैहर आ बहिन ,दीदी क सासुरक नाम । भीड़हा ,बलहा ,बल्लीपुर ,मुस्लिमपुर ,बहेड़ी ,मालीपुर ,एघु ,शासन ,रमभदरा पुर ,कापनि ,बलिया ...............मसानखोन आ आरो कतेको नाम ।धीरे धीरे ईहो नाम सब सठऽ लागलइ ,यादिए नइ पड़लेन्ह कि ई जौनपुर क नाम कहिया सुनने छलियइ आ ऐ ठामक के सऽर सम्बन्धी या मित्र दोस्त अछि ।भुट्टु झा हाफी कर‘ लागला ,फेर एमहर ओमहर देखि तमाकू निकालला ,चुनौटी खोजइ काल मे हुनकर हाथ पोलीथीन सँ टकरा गेलइ ,भुटटु झा निश्चिंत भेला ,हुनकर सर्टिफिकेट सुरक्षित अछि ।मैथिली सँ स्नातकोत्तर ,प्रथम श्रेणी ,विश्वविद्यालय मे दोसर स्थान ।पहिल स्थान बलवन्त झा क पुत्री कें ।पहिल स्थानक रिजल्ट लगभग निकलले छलइ ,बलवन्त बाबू विभागाध्यक्ष छलखिन आ बेटी क‘ लेल स्पेशली नोट्स बनेने छलखिन ,मुदा परीक्षा क बाद सिचुएशन बदलि गेलइ ,काँपी विश्वविद्यालय सँ बाहर चलि गेलइ ,बहुतो विद्यार्थी फेल भऽ गेला या पचपन प्रतिशन नइ आनि सकला ।मुदा प्रोफेसर साहेबक पैरवी दोसरो ठाम चलल आ गार्गी प्रथम मे प्रथम भेलीह ।आश्चर्य भेलइ जे भुट्टु कोना दोसर स्थान आनला ।ओइ प्रसंग क चर्चा कने नून तेल लगा के हास्टल सँ ल‘ के विश्वविद्यालयक कर्मचारी वर्ग तक मे फैल गेलइ ,सब कहैत छलाह कि बलवंत बाबू अपना बेटी क टॉप करेलखिन आ होमय वला जमाय के लग सटेलखिन ,मुदा ई बात सब बेशी दिन नइ चललइ । गार्गी पी0एच0डी0 सेहो केलखिन आ बापे संग नियुक्त भऽ गेलीह ।बात बहुत लम्बा छैक ,भुटटु झा की सब यादि करताह ,तमाकूल चूना ठोर मे दबा सूतबा क प्रयास करऽ लागला ,मुदा सरबा नीन्न बिसरियो के कथी ले आयत ।एगो मच्छड़ माथे पर काटि लेलकेन आ जाबत ओइ दर्द सँ मुक्त हेता ,ताबत केओ उपरे सँ पादि देलकइ ।के हेतइ गौतमानन्द आ भुटकुन छथि ? पता नइ के ? भुट्टु झा हँसऽ लागला ,ठाढ़ भऽ के बर्थ पर देखलखिन दूनू एक दोसर के गोरथारी मे सूतल ,गौतमानंद क पैर भुटकुन के माथ लग रहइ आ भुटकुन अपन पैर के गौतमानंदक करेज मे सटेने रहइ ।ई दृश्य कोनो नया नइ छलइ दिल्ली मे गामक बारह टा पुरूष एके रूम मे रहैत छलाह ।बारह सौ किराया छलइ ,कोना के एक दू टा आदमी देतइ ,सब मिलि के रहऽ लागला ।जमीन पर सूजनी बिछा के सब लोकनि राति मे सनपट्ट भऽ जाइत छला । केओ रिक्शा चलेनहार ,केओ सेठ के हवेली मे गेटकीपर ,केओ दुकान मे दूहजारी सेल्समेनक काम,केओ घूमि घूमि के खाना बनेने घुरइ ।सब एके ठाम रहइ ने जाति ने गुटबाजी ।कखनो बाभन खाना बनबइ तऽ कखनो दुसाध ,आ प्रशंसा केवल नीक खाना के होइत छलइ ,जाति दिसि तऽ ध्याने नइ जाइत छलइ ,जकरा जे मून हो कर,जे पहिरबे पहिर ,जे बाजबे बाज ।भुटटु अइ स्वतंत्रता के बिसरऽ नइ चाहैत छथिन ।गौतमानंद आ भुटकुन के ओ फेर सँ देखैत छथिन आ हुनका लागैत छन्हि कि जे बात ऐ ठाम अप्रासंगिक छैक ,सएह गाम मे हिमालय जँका ठाढ़ भऽ जाइत छैक ।
’हिमालय‘शब्द दिमाग मे आबिते भुट्टु के कवि विद्यापति आ यात्री यादि आबैत छनि ,ओ स्पष्ट रूपे मानैत छथिन कि अइ दूनू कवि के रचना के आसपास मैथिली मे केओ नइ अछि । हुनकर ई मान्यता कतेको ठाम विवाद केने छैक ,तैयो ओ पूर्ववत छथि ।आब हुनका यादि पड़लेन कि जौनपुर सँ हुनकर की सम्बन्ध अछि? मिथिला क‘ राजा हुसैनशाही राजा सँ हारल छलाह आ कवि विद्यापति जौनपुर आयल छला ।भुट्टु झा फेर सोचऽ लागला कि मिथिला क‘ हजारो प्रोफेसर ,डॉक्टर ,इंजीनियर डेली दिल्ली ,पटना ,लखनउ ,लंदन घूमैत अछि ,लेकिन ओकरा मून मे किएक ने ओहन मौलिक विचार आबइ छैक ,जे कवि विद्यापति के जौनपुर मे एलेन ।मुदा जौनपुर आ विद्यापति के सोचि के की करताह भुट्टु झा ।प्रोफेसरी क नौकरी हिंदुस्तान मे शत प्रतिशत आरक्षित छैक । ई नौकरी प्राप्त करबा क‘ लेल प्रोफेसरक शुक्राणु वा अंडाणु सँ जनमनइ एकमात्र योग्यता छैक । भुट्टु झा के यादि एलेन कि बाबू हरिमोहन झा आ सुमन जी क सुपुत्र सेहो त प्रोफेसरे छथि ,फेर ओ अपने सोच पर राम राम करए लागला । हुनका लागलेन कि ई उदाहरण ठीक नइ अछि ।फेर तमाकू क डिब्बा खोजऽ लागला ,झोरा मे हाथ फेर सर्टिफिकेट सँ टकरा गेलइ ,आब तमाकुओ खेबा क मून उतरि गेलेन ।गार्ड हरियरका झंडी दिय‘ लागलइ ,ओहो निश्चिंत भेला ।झूठे मून व्याकूल अछि ,अनावश्यक चीज सब दिसि ध्यान लऽ जेबा क कोन फायदा ।उठऽ हओ भुटकुन ,उठऽ गौतमानंद ,आब त‘ दू घंटा मे बनारसो आबि जेतइ ,मुदा ओ दूनू बिना कोनो हरकत केने ओनाही सूतल रहलाा ।
भुट्टु झा सेहो सूति रहलाह ।ट्रेन धीरे धीरे बढ़ऽ लागल ।भुटटु झा के लागलेन कि ओ गाम पहुँचि गेल छलाह ,हुनका दलान पर अजीत झा बैसल रहए ,आ कोनो बात पर हुनकर गरदनि पकड़ि लेलकइ ।ओ कतबो प्रयास करथि ,गरदनि नइ छोड़ा पेलाह ,दलान पर बैसल किछु आर आदमी आबि के हिनकर गरदनि छोड़ब’ लागल ,मुदा ओ जत्ते छेाड़ाबथि ,अजीत क हाथ ओतबे मजबूत होइत गेलइ ।भुट्टु झा घिघियाब‘ लागला ,आब जान बचबा के कोनो संभावना नइ ।बचा........बू ...अओ ...लोक सब.......।जखन नीन टूटलेन त‘ गौतमानंद आ भुटकुन हुनका जगबैत आ हाथ पकड़़ने छलाह ।
की भेल भाइ?अहाँ सपना मे छलहुँ ।
कोनो खास नइ ,ओहिना.......
भुट्टु झा फेर गामके नीक जँका यादि कर‘ लागला ।विभिन्न जातिए नइ मूल गोत्र गुट टोल आ रूचिक असंख्य कोटि मे बँटल मैथिल समाज ।सच के सच कहबा के लेल तैयार नइ ,जे बड़ प्रगतिशील से सच के अठारह आवरण मे सामने आनता।अजीत ,फूलो ,दिगम्बर सब त‘ लंठे लंठ अछि ,अकेले भुट्टु ककरा ककरा सँ लड़ता ,आ रिक्शा चलबइ वला आ राति के पहरेदारी करएवला भुट्टु के लोक जुत्ता सँ नइ मारतइ त‘ कि करतइ ,ओकरा तर्क आ विवेकक बात करबा क अधिकार के देलकइ?ओ की जान‘ गेलइ सोसाइटी आ पोलिटिक्स ,आ कविता आ उपन्यास के ऐ मैथिल समाज के की जरूरत? आब भुट्टु झा राखने रहथु अपन सर्टिफिकेट के माथ पर टाँगने ।दुनिया एहिना चलि रहल छैक ,जकरा चलबा के हो से चलइ चलू आ नइ त‘ ओहिना उंगरी करैत रहू यत्र तत्र सर्वत्र.............
भुट्टु झा चाय पीलथि ,दू दू बेर तमाकू खेलथि ,एक बेर भुटकुन गरदनि के मटरो तोड़लकइ ,मुदा हुनकर चेहरा झुलसि गेलइ ,दसे मिनट मे लागलइ जे कोनो बड़का बीमारी हुनका दाबि देलकइ ।गामक भावी संघर्ष हुनका डराबऽ लागल ।अजीत झा ,फूलो झा ,दिगम्बर मिश्रक सौंझका दारूपीबा मंडली क विभिन्न रूप हुनका सामने आब‘ लागल ।पूजा क बहाने चंदा माँगबा क मासिक उपक्रम ,आ हिन्दू धर्म भरि साल व्यस्त बनेने रहबा क अवसर दैत रहल । ककरा ककरा सँ लड़ताह भुट्टु झा , के समर्थन मे आयत ,बेशी सँ बेशी केस करबा के ,गवाह बनबा के भरोसा । आ अहाँ शामिल भऽ जाउ हुनकर गेंग मे ।
गाड़ी स्पीड पकड़ि लेलकइ ,मौसम सेहो ठंडा गेलइ ,हवा बहिते झींसी पड़ऽ लागलइ ,भुट्टु झा के नीन लागि गेलेन ,भुटकुन माथ आ गौतमानंद पैर रगड़ऽ लागलइ ,भुट्टु झा फेर सपना देखऽ लागला ,मुदा अइ बेरि एकटा मुस्कुराहट हुनका ठोर पर छलइ ।अजीत भाला ल‘ के आ फूलो लाठी लेने हुनका तरफ दौड़लेन ,दिगम्बर सेहो कत्ता लेने छलइ ।मुदा ओ आब अकेले नइ छलखिन ,गामक सब सोलकन अपन हाँसू ,खुरपी ,कोदारि लेने ओकरा दिस बढ़ल ।भुट्टु झा स्पष्ट देखलखिन ,ओ कोनो साधारण सोलकन नइ छलइ ,ओ सब बुद्ध क विभिन्न अवतार छलाह ,कोनो बोधिसत्व ,कोनो अवलोकितेश्वर आ कोनो................।भुट्टु झा क मुस्कुराहट आर गहिर होइत गेलइ ।हुनकर ठोर देखिते भुटकुन आ गौतमानन्द सेहो मुस्कुरा उठला..................।
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३. पद्य











३.६.रामदेव प्रसाद मण्डल झारूदार २जवाहर लाल कश्यपरामवि‍लास साह

३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमरआनंद कुमार झा ३नवीन कुमार "आशा"  ४.प्रभात राय भट्ट

 १.शांतिलक्ष्मी चौधरी २–मनोज झा मुक्ति उमेश पासवान डॉ. शेफालिका वर्मा



१.
शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), पिता: श्री श्यामानन्द झा, ग्राम+पोस्ट: गोविन्दपुर, भाया: प्रतापगंज, जिला: सुपौल।

चुट्टीकट्टा

अगिमुत्ताक डर कम
चुट्टीकट्टाक हारि मानी

अगिमुत्ता जँ खिसियावै
ओ वार करय अगाति सँ
मुँह खोखरै, दाँत देखावै,
हबकै, कार-बान्है देखाती सँ,

जँ छी सम्हरल तँ-
अगिमुत्ताक डर कम
चुट्टीकट्टाक हारि मानी।

चुट्टीकट्टा जँ खिसियावै
ओ वार करय पिछाति सँ
हूर मारै, माथ फारै,
घोपै गुपती जँ, पिठाती सँ,

कतबो छी सम्हरल तँ-
चुट्टीकट्टाक डर बर
चुट्टीकट्टाक हारि मानी.


भाड़ाक घर

दिल्ली शहरमे छै जकर अपन घर रे भाइ
ओइ घर मालिकक तेवर कहल नै जाइ
थोड़े गोटय छथि बसंतक सिहरैत पवन-गण
बचल-जन जड़ैत जेठक दुपहरी पहर रे भाय
दिल्ली शहरमे.......

"पैसा पाँच धरि लेब, बिजली-पानी अलग हएत,
गेस्ट-वेस्ट एकदम नै, एगरीमेंट के बनैत?"
चुप-चाप गच्छि ले हुनकर सभ कहल रे भाइ
दिल्ली शहरमे.......

’बूरल लोक’ तँ बुझू हिनका एकदमे बरदास्त नै,
सरकारी नौकरी जँ तखन, गारेन्टरक बहस नै"
ओकिल, पुलीसपर छन्हि तिछन नजर रे भाइ!
दिल्ली शहर मे.......

"झारू नै देलौं, ओतए पोछा नै केलौं
देखू सीढ़ीक बगल ओ, गंदा कते केलौं"
छुबि छुबि देखतौ फरसक हर पथर रे भाइ
दिल्ली शहरमे.......

"उठै छी बर देरी, कनी सबेरे उठि जाउ
सप्लाइ जखन आबै, तखने झटपट नहाउ"
उचितो गप्पमे घोरतौ बिच्छा लहर रे भाइ
दिल्ली शहरमे.......

"मिलनिहार कम करू, जन एतै नै लाउ,
रातिक दस बाजै जँ, तँ बस सीधे घुमाउ"
छने-छन देखैतौ घर खाली के डर रे भाइ!
दिल्ली शहरमे.......

"पछिला महीना पानिक मीटर बर उठेलौं",
"यौ ऐ महीना गेस्ट एतेक किए अड़ेलौं",
बेर-बेर देतौ बस एहने एहन उलहन रे भाइ!
दिल्ली शहरमे.......

जँ कहियो घर खालीक ओडर दय देलकौ,
बहैत बड़दक अड़ूआरिमे पेनाठ कय देलकौ,
देखै धुँऐन-मुँह, सतति गप्प धीपल जहर रे भाइ!
दिल्ली शहरमे.......

"कम पैसा दैत छी, छोड़ब ऐठाम किएक,
मन सँ जँ खोजब, घर भेटत नै किएक"
अटरपैंचिये ढाहतौ अदभूत कहर रे भाइ!
दिल्ली शहरमे......





ओन-लाइन बदतमिजी

भैया यौ,
किओ कहियौन हिनका
नंगटपनीक धन्धा छोड़ि दिअ
धी-बहिनक संग
अबरपनीक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

देखते देरी ओन-लाइन
मधुक पाछु माछिक लाइन
ई लाइन-वाइनक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ..

देखते देखते पाँच, छौ, सात!
भरल स्क्रीन देखब की आब
ई बलजोड़ी चैटिंगक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

’हाय!’ ..’हाय डियर!’ सँ तुरते बाद
’आइ मिस यू!’ कहि बढ़ेता बात
ई मिस-विस केर धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

जँ कनिओटा रिसपांस केलिऐ
हाथ छोड़ि पहुचा पकड़ेलिऐ
ई पहुँचा पकड़ैक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

तेसर पोस्ट ’कतेक जल्दी...हम...!’
शेष बात बुझु तहन अपने दम
ई बुझोअल बुझेबाक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

जँ निर्लज्जकेँ लेसन पियेलिऐ
मेरिड-अनमेरिडक प्रश्न पुछबेलिऐ
तखनो तँ निर्लज्जइ धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

तामसमे कहि ’प्रोफाइल देखू’
रहू ओफ-लाइन, तँ ’सेफ़’ रहू
अपनहि ओन-लाइनक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...

की मनीष, की राजेश
एक्के रूप गन्हायले भेष
आबो गन्हकीड़ीक धन्धा छोड़ि दिअ
भैया यौ...
–मनोज झा मुक्ति
 पसरल अत्याचार


मेटा रहल अस्तित्व मनुख्खक बँचतै कोना ?
पसरल अत्याचार आब ई हटतै कोना !

सम्बन्ध अखन व्यापार भऽगेल जत्रतत्र आब,
पुत्र–पिताके स्नेह भाव आब जुड़तै कोना ?

संस्कृति ओ संस्कार सब छोड़ि रहल अछि,
अपन पहिचानक रक्षा आब होएतै कोना ?

नेतासब कऽ रहल दलाली, स्वार्थमें अपना,
देश, समाजक लाजक रक्षा होएतै कोना ?

जातिपाति आ नोटक बलपर भोंट खसैय,
देशभक्त, समाजिक नेता जनमतै कोना ?

कर्मचारी सब लुटि रहल अछि दिन दहाड़े,
गरीब जनताके काज आब सुतरतै कोना ?

व्यापारी व्यस्त मिलावट आ कालाबाजारीमे,
सुपथ मूल्यमे स्वस्थ पदार्थ आब भेटतै कोना ?

प्रहरी प्रशासन ताकमे बैसल घुसक खातीर,
चोरी–चकारी देश,समाजसँ हटतै कोना ?

पत्रकार दलाल बनल, चाहक कपपर बिकय,
निमुखा जनताक आवाज बाहर अओतै कोना ?

साहित्यकार चाटुकार बनल, सबके पदे चाही,
नीक साहित्यक रचना पाठक पढतै कोना ?

युवा, विद्यार्थी, बुद्धिजीबी सब चुप्पे बैसल,
सोंचियौ, देशक विकास कि होएतै अहिना ?

चुप्पी तोडू, सब संग मिलि लडू देशक खातिर,
नहि त देशक अस्तित्व आब बँचतै कोना ?




 

उमेश पासवान
रचनाकार- श्री उमेश पासवान, गाम- औरहा, पंचायत- उत्तरी बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी। पहिल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलनक उपलब्धि छथि कवि श्री उमेश पासवान जी। प्रस्तुत अछि हिनकर कविता।  

पोसि‍या
हम खोजै छी अहींकेँ
यौ कने अगारी आउ
लऽ कऽ ओ मोटरी
जे लेने छी अहाँ पोसि‍या
बरोबरि‍ कऽ
जइमे बन्‍हनै छी
हमर अधि‍कार
हमरा सोझाँमे खोलू
आबो सभ गि‍रह
आझरा कऽ नै रखू
माइक बोली मैथि‍ल भाषा
नै कसू आबो
अप्‍पन सोल्‍हनीबला रसा
आब नै सुनब हम
अपनेक बनाओल अपन हि‍तक खि‍स्‍सा
दुधक दाँत टुटि‍ गेल अछि‍
ज्ञानक इजोतसँ  आँखि‍
हमर खुइल गेल अछि‍
दऽ िदअ हमर हि‍स्‍सा
हम खोजै छी
अहींकेँ
यौ कनेक अगारी आउ
लऽ कऽ उ मोटरी आउ
जे लेने छी अहाँ पोसि‍या।
साहि‍त्‍यक दलि‍दर

साहि‍त्‍यक दलि‍दर
कतेक जुलुम करैत अछि‍ हमरापर
कि‍यो तँ बाजू
कि‍यो तँ हमरा दि‍ससँ अबाज उठाउ
खि‍ंच देने अछि‍ ओ
लक्ष्‍मण रेखा
बाँटि‍ कऽ एक भागमे
बन्न कऽ देने अछि‍
सभ रास्‍ता-द्वार
हरैप लेने अछि‍
ओ हमर हक
जाति‍क नाओंपर करैए ति‍रस्‍कार
दु:ख हमर ओ कोना कऽ बूझत
केकरासँ कही अपन दि‍लक हाल
वर्षोसँ देख रहल छी
हि‍नक यएह रंग-ताल

मंगै नै छी कि‍छो हम हि‍नकासँ

बस चाही मात्र

हमर अधि‍कार

साहि‍त्‍यक दलि‍दर

कतेक जुलुम करैत अछि हमरापर।



       डॉ. शेफालिका वर्मा
अहांक हास

अहाँक हास हम सुनलों
अविकल निर्झर झाहरैत झर झर
श्वेत स्फटिक मुक्ता माला
निश्छल  शिशु सन रजत  हास !
सिगरहार क  फूल
छोट छिन्न  सुन्नर सुन्नर
झहरैत जेना देवताक  वरदान  सन
नेनाक  मुस्कान सन  !!
अहांक  ई हंसी  जेना
लक्स क पौडर छिरिया गेल चारु क़ात
उज्जर उज्जर निर्मल  निर्मल
कत भेटत  एहि यांत्रिक युग  में
चाह्कैत चुह्कैत  प्रकृत हंसी .?
अधरों बनि  गेल मशीन
कौखन कोन कांटा कत जायत
मुंह्क   ठोर  सिकुडत सकुचाय्त
तखन बनैत  अछ एक टा हंसी
जकर नाम थीक फोरमेलिटी ?
मेल धेल  नुआ  में 
लेप्ट्ल    सेप्टल ग्न्हैत   गन्हायित 
आबैछ  घर नौडी
तेहने 
आजुक युग मे  ठोर पर नचैत अछ 
एकटा  बाईस तेबाईस
हंसी छौडी .............................................


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.दुर्गानन्‍द मण्‍डल
१.
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कवि‍ता

डभि‍आएल डगर

नि‍त नि‍त्‍यानन ि‍ननाएले नि‍कलए
देखए दुनि‍याँक दीन-दशा।
मधुआएल मन कड़ुआएल आँखि‍ये
झलफलाइत देखए दशा-दि‍शा।
कोनो बाट एकपेरि‍या कहबए
खुड़ुपेरि‍या कहबए दोसर।
जोहैत सदए जेर जइ
बनैत बाट नव तेसर।
भोरहरबा अन्‍हार रहने
नीनपनी देलकनि‍ पछाड़ि‍।
राड़ी-डबहाड़ि‍क बीच पड़ि‍ते
हाथ-पएर देलकनि‍ गछाड़ि‍।
ओझरी सोझरबैमे
नि‍त्‍यानन भेलाह वेदम।
हारि‍ नै थकान थकि‍ते
अबए लगलनि‍ हि‍या दम-दम।
वि‍ह्वल भऽ आर्त्त राड़ी
बि‍जकि‍ बाजल कानि‍-कलपि‍।
संग मि‍ल सभ दि‍न रहलौं
लेलकनि‍ बाँहि‍ लपकि‍।
फूल फुलाइत जहि‍ना सबतरि‍
तहि‍ना ने फुलाइ छी
पूरि‍ संग रौद-बसातमे
संगे-संग उड़ि‍याइ छी।
एक चढ़ए देव सि‍र ऊपर
दोसर चढ़ए महा-अकास।
बाॅकी सभ गैल-पैच
ससरि‍-ससरि‍ पहुँचए पताल।

लज्‍जैत

बि‍नु लज्‍जति‍क जि‍नगी ओहने
बि‍नु परनक प्रति‍ष्‍ठा जेहने।
रस पाबि‍ हरि‍याइत जहि‍ना
नि‍:रस होइत सुखाइत तहि‍ना।
मधुरस रि‍सै वि‍वेक वृक्ष
सि‍रजै सदि‍ जे लज्‍जैत।
लज्‍जैत हीन जीवन ओहि‍ना
गैचि‍या पाताल धड़ैत जहि‍ना।
लज्‍जैत तँ शोभा जि‍नगीक
सैजते‍ होइत आभूषि‍त।
तीत-मीठ भेद बि‍नु बुझि‍
हँसि‍-हँसि‍ होइत वि‍भूषि‍त।
लज्‍जति‍क लत्ती अमर
सड़ि‍तो-मरि‍तो सि‍रजै शक्‍ति‍।
तर-उपर रसा-रसा
लगए करए सदति‍ भक्‍ति‍।
जि‍नगीक पद्धति‍ रंग-वि‍रंगक
नीक-बेजाए बेड़ाएत केना।
पूबसँ उत्तर धरि‍
मि‍ल समाज चलल जेना।

धब्‍बा

रंग-रंगक धबैत धब्‍बा
दोस्‍ती कऽ संग धेलक।
उकनि‍ सि‍र चढ़ा गाछ
रीति‍-नीति‍ सभ गमौलक।
सुखि‍ पात पतझड़ पाबि‍
पथार पसरि‍ धरतीपर।
नग्‍न–बेनग्‍न बनि‍ वृक्ष
नोर ढड़कए करनीपर।
दर्शनक सभ महि‍मा गाबए
जहि‍ना देश तहि‍ना वि‍देश।
दि‍शा वि‍हीन भऽ भऽ
कोन गीत गाओत सु-देश।
धन जीवन कि‍ जीवन धन
पैस गंगा देखए पड़त।
अपना ले अपने आँखि‍ये
गंगाजल पीबए पड़त।
बि‍दुषी कि‍ ऋृषि‍का बनि‍
पुरबा पीब फुफुआएब।
धुन गुणक संग नाचि‍
नर्तक बनि‍ ठि‍ठि‍आएब।
मति‍-वि‍मति‍ पबि‍ते पाबि‍
दि‍शांसक खुमारि चढ़ैत।
ढड़कि‍-ढड़कि‍ ढाल ढल
हँसि‍-हँसि‍ वसन्‍त गबैत।

कवि‍ता

नव पथक अनुकूल पथि‍ककेँ
सही सवारी कुपथ-पथ चाही।
तहि‍ना खुशी खुदखुदबे-ले
मुस्‍की सजल शब्‍द कवि‍ता चाही।
उपयोगी नव-नव वस्‍तुक
जोड़ि‍-जाड़ि‍ छि‍हलैत डगर चाही।
हराएल रसि‍क प्रेमी-ले
बेराएल भाव कवि‍ता चाही।
बेराएल भाव तहि‍ये सजैत
जहि‍ये भेटैत छि‍ड़ि‍याएल भंडार।
चुनि‍-चुनि‍ चुनि‍या चुनैबतहि‍
नुकाएल पबैत शब्‍द-सार।
गढ़ैत सदति‍ चमचमाइत शब्‍द
सृजए अलंकार ओ छंद।
जाहे कतबो केहनो हवा सि‍हकै
चलि‍ते रहैत‍ मुस्‍काइत मन्‍द।
मन्‍थर गति‍ये चलि‍ मोहनि‍
परखए सदए दुध ओ पानि‍।
सि‍र ऊपर आकि‍ नीच-मध्‍य
देख पकड़ि‍ सम्‍हारि‍-वाणि।‍
दुर्गानन्‍द मण्‍डल
कवि‍ता-

हम हि‍न्‍दुस्‍तानी छी

हम हि‍प्‍दुस्‍तानी छी
नै ककरोसँ डरै छी
देश-ि‍वदेशक बात करै छी
अपने देशपर मरै छी।

कथा पूर्वजक नै पुछू
ओ सभ छथि सभसँ महान
खेती-बाड़ी जि‍नकर धंधा
जि‍नकासँ नि‍खरल हि‍न्‍दुस्‍तान।।

हमर रक्षक हमर भक्षक
हमरेसँ करै छथि‍ आश
कवि‍ बनू वा कलाम बनू
पूर्ण करू अभि‍लाषा।

बूढ़क सहारा बनि‍ हम
देशक रखबाला बनि‍ हम
नाओं हमर जेना दि‍वाकर
जगमे एहन काम करी।।



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.राजदेव मण्‍डलरामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’


राजदेव मण्‍डल

राजदेव मण्‍डल
कवि‍ता

हेलवार

घुच्‍ची भरि‍ पानि‍मे कऽ रहल छी खेलवार
कखनो एेपार कखनो ओइपार
बनए चाहै छी असली हेलवार
संकटमे करए पड़त धार-पार
धारक पेट हो अगम-अपार
जखैन छुरी फनकै
रहि‍-रहि‍ धारा सनकै
देख कऽ डरे मन झनकै
ठमकल बटोहीकेँ माथ ठनकै
तखैन जँ करब पार
तब ने बनब हम असली हेलवार।

कलीक प्रश्न    

कली पूछैत अछि‍ कलीसँ
एतेक दुखि‍त कि‍एक छी भेल
गुन-गुन गान सुनबैत छल हरपल
ओ भ्रमर कतए गेल
सुनू-सुन गप्‍प गुन
दुख आएल तँ सुख चलि‍ गेल
हमरा छल हृदैक मेल
ओकरा लेल धुरखेल
अहूँक समए आएत एहेन तँ
जानब भ्रमरक खेल।


 
रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’
रूसनी

गै रूसनी, एना नै कर
लोक मारैए ताना गै
बाहर घूमनाइ मोसकि‍ल भेल
बदलि‍ गेल जमाना गै

डाॅर हि‍ला कऽ चलै छेँ
गाबैत नवका गाना गै
कपड़ा केर थाह नै
आधा देह उघारे गै
गै रूसनी एना नै कर
बदलि‍ गेल जमाना गै

ठोरक लि‍पि‍स्‍टि‍क, केशमे गजरा
मुँहपर पाउडर आँखि‍क कजरा
नै छै एकर कोना मोल
तोरा देख कऽ ठहाका मारैत
चूटकी लइए पूरा टोल।

छोड़ि‍ दही ई झेल-झमेला
पढ़बीही तँ पढ़ैबो करबौ
काओलेजमे नाओं लि‍खेबौ गै
सरकारसँ दि‍एबौ टाका पैसा
साथे साइकि‍ल दि‍एबौ गै

तइसँ बेसी और चाहमे
स्‍कूल ड्रेस सेहो दि‍एबौ गै
माइ-बापक इज्‍जत बढ़तौ

जीवन तोहर सुधरतौ गै

गै रूसनी एना नै कर

लोक मारैए ताना गै

बाहर घूमनाइ मोसकि‍ल भेल

बदलि‍ गेल जमाना गै।


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’ २.रवि मिश्र “भारद्वाज”
शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’
कवि‍ता

कवि‍क कामना

पूत बढ़बैछ वंशक मान
मुदा पि‍परौलि‍या बाबासँ
मंगलनि‍ पोतीक रूपमे सुकन्‍या
अचा अपर्णा वा भव्‍या
कवि‍ बनि‍ गेला पि‍तामह
सफल भेल कबुला-पाती
भगवत कृपा देख-
खुशीसँ फुललनि‍ जीर्ण छाती
जेठका जीवन झखरैत पाषाण
वि‍याहक भेल सोलहम बरख
एखन धरि‍- नि‍: संतान
दोसर नि‍ष्‍कपट बुड़ि‍वक
परंच पि‍तृसेवक अवि‍राम
करची सन लकलक काया
रंग धन इव श्‍याम
घनश्‍याम कनि‍याँ कोरमे
सद्य: अएली वैदेही बनि‍ कन्‍या
कवि‍क उपवन भेल धन्‍या
मुदा! साक्षीक पि‍ताक स्‍थान
जेठकेकेँ भेटत
श्‍यामकेँ जौं छन्‍हि‍ बाप कहएबाक
सख आश वा दीर्घ पि‍यास
दोसर वेटीक लेल
राखथु एकादशी उपास
यएह भेल
कवि‍ गेला स्‍वर्ग
भेटलनि‍ मुक्‍ति‍ भेलनि‍ अपवर्ग
साक्षीक माताक कोरमे
फेर बेटी बनि‍ अएली भारती
वि‍चि‍त्र अन्‍हेर
प्रकृति‍क फेर
अङने अङने अड़ए लागल
गप्‍प हड़बि‍ड़रो
बरसए लागल कनफुसकीक झॉट
अपने हाथसँ कवि‍जी
रोपलनि‍ बबूरक काँट
बड़की काकी दि‍अ लगलनि‍ तान
नै छलनि‍ हुनका संसारक ज्ञान
कबुलामे कि‍एक मंगलनि‍ बेटी
हम जौं हुनका स्‍थानपर रहि‍ति‍यनि‍
तँ जनमि‍तहि‍ दाबि‍ देतौं
ऐ राक्षसनीक घेंट
बेटीक लेल प्रार्थना!
आश्चर्य केहन कवि‍क कामना
एकबेर आर अन्‍हेर
भावदक अन्‍हरि‍याक फेर
स्‍तब्‍ध छथि‍ सभ केओ
देख कवि‍ कुलक दशा
आङनक बहुआसि‍न सभ
टोलक अनन्‍या
कपार पि‍टए लगलथि‍न
छोटको पुतोहुक कोरमे
जनमलि‍... कन्‍या
हा भगवान महात्‍माक यएह मान
मङने देलि‍यनि‍ तीन
पुष्प माल लागल फोटोमे
कवि‍ छथि‍ मुग्‍ध तल्‍लीन
जेना कहि‍ रहल होथि‍
के रखलक जहानक मान?
के बढ़ेलक कुलक सम्‍मान?
के बचेलक वंश
सीता अहि‍ल्‍या सावि‍त्री
वा रावण कौरव कंस?
रवि मिश्र “भारद्वाज”, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी।
          

मतदान

लिअ मतदान फेर आबि गेल
सफेद पोशाकमे किछु भेड़ आबि गेल

बड़ा दुविधामे छी भैया
किनका चुनू नेता
की भरोसा जितबाक बाद
हमर विकासक फण्ड खेता

कतेक निर्लज्ज अछि किछु नेता
आबि गेल फेर चमकेने कुर्ता

आबि गेल माँगऽ भीखमे फेर भोट यौ
झोलीमे तँ नै कोनो भेद यौ
मुदा छै बड़का टा छेद यौ

विनती अछि अहाँसँ भैया
नै करू गलती ऐबेर
दियौ वोट कर्मठ नेता केर


अहाँक गलती केर कारण
की अन्ना फेर अनसन करतै
अही उमेरमे भूखे मरतै

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. जगदीश चन्द्र  ’अनिल’ २. सद्रे आलम गौहर ३सत्यनारायण झा

जगदीश चन्द्र  ’अनिल’


जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’

गजल
1

पूजैछी हम भगवान कें
मकइ,गहूम आ धान कें।

हम बूझैछी काशी-मथुरा
खेत आर खरिहान कें।

गुन-धुन मे छी, ककरा ताकू
कौआ कें कि कान कें।

अपनहि करनी केर फल भेटल
दोष देलहुं आसमान कें।

बिसरि गेलहुं सम्मानक सभ सुख
नहि बिसरल अपमान कें।

ठकुआ-केरा लय देखी हम
एखनहुं चौठी-चान कें।




2





जे सोचैत छी से बजबाक समय आएल अछि
जे बजैत छी से करबाक समय आएल अछि।


धूर तरक गप्प सड़क पर ल’ चलू
एखन त एक पांतमे बढ़बाक समय आएल अछि।


पाग डोपटा छोड़ि एखन बान्हू मुरेठा
एखन देश-कोस ले’ लड़बाक समय आएल अछि।


ई देश थिक ककर आ के देश केर छथि
छै देश-प्रेम ककरा बुझबाक समय आएल अछि।


आब जे हेतै, से हेतै, नीके हेतै
जे मंगैत छी से छिनबाक समय आएल अछि।



सद्रे आलम गौहर
गजल
जे घुसखोरी भागत
बहुत नीक लागत

लगेने रहू एहिना
अन्ना जी तागत

जे सभ आगू अउता
करै छिअनि स्वागत

ईमनदार नेता
के बूझू नियामत

सफलता जँ पायब
त' विश्वास जागत

समर्थन दियो एहिमे
नहि कानो लागत

भष्टाचार क'देत
भारत के गारत

देशवासी बढ़बियौन
अन्नाजीक तागत

अना हजारेसँ अनसन तोड़बाक अनुरोध



अनशन तोड़ि दियौ अन्ना जी
जीत अहाँ के भइए गेल

सत्ता के गलियारा दहलल
पक्ष विपक्ष नतमस्तक भेल

सत्य अहिँसा पर डटल छी
डोला सकल नहि अहाँ के जेल

असफल अहाँ कय देलिएक
भ्रष्टाचारी सभक खेल

भारत के बच्चा बच्चा सभ
देखियो आई अहीँके भेल
मैथिल सभकेँ ईद मुबारक
दिन आयल अछि ई उदगारक
मैथिल सब के ईद मुबारक

दान धरम के ई त्योहार
छोट बड़ सब के भेटै प्यार
हमर अहाँक प्यार मोहब्बत
कुरान आ गीताक अछि सार

मानवता के इएह उद्धारक
मैथिल सब केँ ईद मुबारक

हिँदू मुस्लिम बाद मे छी हम
सब सँ पहिने मैथिल छी हम

दूनूँ मिलि कयँ साबित कय देब
नहि दुबरि ककरो सँ छी हम

संघर्ष केँ होयत क्षमता मारक
मैथिल सब केँ ईद मुबारक

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...