Monday, August 29, 2011

'विदेह' ८८ म अंक १५ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८८)- PART II


३. पद्य










३.६.नवीन कुमार आशा

३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर 


१. रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ २. उमेश पासवान

रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’ , (मैथिलीक भिखारी ठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध मैथिलीक पहिल जनकवि रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’क किछु गीत आ झारु प्रस्तुत अछि।-सम्पादक)
गीत

अपन देश

अपन देश अपन देश, अपन देश मि‍थि‍ला देश।
राजा जनककेँ ऐ धरतीपर, रहै नै लेश क्‍लेश।
अपन....................।
पसरल एतएसँ ज्ञान जगतमे, छै प्रगट भगवान भगतमे।
हर नारी अतए पार्वती छै, हर नर अतए महेश।
 अपन....................।
पग-पगपर अतए ति‍रथ धाम छै, झुठ नै अतए सत्यक नाम छै।
पर उपकारक खाति‍र मानव, सहै छै भारी क्‍लेश।
 अपन....................।
जगतरनी जतए गंगा धारा, ज्‍योति‍ लि‍ंग केर जतए उज्‍यारा।
हजरत तुलसी बाल्‍मि‍कक गुँजि‍ रहल उपदेश।
 अपन....................।
भिन्नतामे जतए भरल छै एकता, भेद मुक्‍त छै अत केर जनता।
माला तोरि‍ कऽ जाति‍ धर्मक, सभ कोइ देलकै फेक।
 अपन....................।
सेवा केर जतए परमपरा छै, हर मानव लेने हाथ खड़ा छै।
घर आएल मेहमानमे देखै, अल्‍ला ईषू गणेश।
 अपन....................।
खेत बाग हरि‍याली भरल छै, अन्नसँ सभ भण्‍डार भरल छै।
बरदकेँ घंटीसँ टि‍कल होय, जतए केर पुरा देश।
अपन....................।
ऊँच जतए मेहनतक मान छै, खुन पसि‍ना सभक शान छै।
हाथ नै फैले ककरो आगू, घर होइ की प्रदेश।
 अपन....................।
ई जननी छै हि‍र वीर केर, सागरसँ गहींर धीर केर
मतृभुमि‍ केर रक्षा खाति‍र, गला सजल छै अनेक।
 अपन....................।
सभ होइ जतए केर ज्ञानी ध्‍यानी, सभ होइ जतए सद्गुन वि‍ज्ञानी।
मंदि‍र, मस्‍जि‍द, गुरूद्वरासँ बटै अमन संदेश।
 अपन....................।
धूम जतए सेवा केर मचल होइ, भला अइसँ कि‍यो कोना बचल होइ
सदि‍योसँ जतए रीत पुरान, जनता सेवक नरेश।
अपन....................।
जतए होइ कि‍मती आइन जानसँ, झुकै नै बस टुटै शानसँ।
नि‍ष्‍ठा, मर्यादा मानवता, जकड़ा लेल होइ नेक।
अपन....................।


झारू-
वन झि‍ल नदि‍ और वनवासी
पहार पठार संग रेगि‍स्‍तान।
करू सुरक्षा पर्यावरण केर
ऐ सँ देश बनत धनवान।।

गीत-
केमरासँ तस्‍वि‍र बनेबै
मि‍थला मैथि‍ल परि‍वर केर।
तकरा देखेबै पटना जा कऽ
वि‍कास पुत नीि‍तश कुमारकेँ।
फोटो बनेबै खेत असि‍ंचि‍त
सि‍ंचाइ पानि‍ वि‍जलीसँ वंचि‍त।
और बनेबै बाँटल खेतमे
दूर-दूर फाटल दरार केर।
तँ....।
फोटो बनेबै टूटल घरक
उखरहा एकताकेँ जोड़ि‍ कऽ।
भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा
आगू खड़ा पहारकेँ।
तँ.....।
अंधवि‍श्वासक महल देखेबै
फोटो कुरीतक जहल देखेबै।
फोटो बनेबै छुपल लुटेरा
ढाेंगी ढोंग ढपारकेँ।।

झारू-
पहि‍र कऽ माला मानवताकेँ
देश वि‍काशक लगाबू होर।
अहाँ बनि‍ जाउ चान गगन केर
नि‍हारै जनता बनि‍ कऽ चकोर।।

गीत-
मि‍ल कऽ सजेबै राज पंचायती
मेल एकता केर फूलसँ।
भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा
तब ने मि‍टतै मूलसँ।
युवा वर्ग आबू सभ जागू
न्‍याय वि‍काशी फूल खि‍लाबू।
शि‍क्षाकेँ नै गारि‍ सुनाबू
लोभ लालच केर फूलसँ।
भू......।
न्‍याय दि‍अबै गामे अन्‍दर
लोग नै बनतै कोर्टमे बन्‍दर।
सभ मि‍ल झगरा आगि‍ बुतेबै

समता मूलक शूलसँ।

भू....।

सही सही राजकोष चलेबै

घर-घर शान्‍ति‍ दीप जरेबै।

वि‍कास खोधि‍ धरतीसँ नि‍कालबै

शंकर केर त्रि‍शूलसँ।

भूख गरि‍बी रोग अशि‍क्षा...।



उमेश पासवान
रचनाकार- श्री उमेश पासवान, गाम- औरहा, पंचायत- उत्तरी बनगामा, भाया- नरहि‍या, थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी। पहिल विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी मैथिली कवि सम्मेलनक उपलब्धि छथि कवि श्री उमेश पासवान जी। प्रस्तुत अछि हुनकर दूटा मैथिली कविता 

कवि‍ता-

पलटन लाल

केहेन-केहेन माेछबला दरोगा ऐ थानासँ गेले
तँ आब एले पलटन लाल
ओजन छै हि‍नकर एकसौ कि‍लो
चलै छै केना मोकनी हाथीक चालि‍
केहेन-केहेन.....।
क्षेत्रमे दि‍ने देखार भ’ रहल छै चोरी, डकैती,
अपहरण, हत्‍या
खाली ओ कमबैमे लागल छै माल
केहेन-केहेन....।
घूस लेनाइ जेना छै हि‍नकर पुस्‍तैनी आदति‍
एतएक जनता हि‍नकासँ छै तंगहाल
हम-अहाँ कि‍ करबै आब तँ बि‍हारमे ठेकेपर
अफसर सभ भ’ रहल छै बहाल
केहेन-केहेन मोछ.....।


कवि‍ता-

बाढ़ि‍

गड़-गड़ चुबि‍
रहल छल छप्‍पड़
काइट रहल छल
माछी मच्‍छर
राइत भरि‍मे डुबि‍ गेल
डबरा आ डगर
एक्केबेर आएल एहेन बाढ़ि‍
छन भरि‍मे देलक सभ कि‍छु उजाड़ि‍
नेना-भुटुका सभ छल ठि‍ठुड़ैत
पछबा हबा बहि‍ रहल छल गुफड़ैत
भगवान कि‍एक मारलक एहेन मारि‍
हाथ जोड़ि‍ करै छी वि‍नती
आब नै आनब एहेन बाढ़ि‍।




 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कवि‍ता

जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कवि‍ता

रणभूमि‍

ओर-छोर बि‍नु भू‍मि‍ कुरूक्षेत्रक
एक आबए एक जाए धीर।
साधि‍-साधि‍ तड़कस सजा
रंग-बि‍रंगी सधए तीर।
युद्धभूमि‍ संसार केर
भोगि‍नि‍हार योद्धा रण-वीर
रसमे डूबल रसि‍क शि‍रोमणि‍
देखए सदि‍खन भऽ थीर।
ज्ञान-कर्म बीच बसए धर्म
अङेज चलए सदति‍ कर्मवीर
जतए बसी सएह भूमि‍ ने
मातृभूमि‍क बनैत हीर।
मातृभूमि‍ तँ मातृभूमि‍ छी
सृजए सदा भऽ गंग।
शि‍वसि‍र चढ़ि‍ दुनू गाबए
कि‍ गंग कि‍ भंग।
मुँह चमकबए ज्ञान सरूपा
दोसर पक्ष कहबए कृष्ण
तेसर जाल पसारि‍-पसारि‍
दु:शासन, अर्जुन बीच कृष्ण ।
तीन तीर बेधने दुनि‍याँकेँ
दैवि‍क, भौति‍क ओ अध्यात्म।
बेरा-बेरा देख तीनू केर
धर्म-अधर्म बीच महात्म।
तन रोग मन सोग
अनि‍वार्य खेल जि‍नगी केर
डटए पड़त दुनूसँ
मक्खनसँ मि‍सरीक लेल।
दैवी दाह तँ चलि‍ते रहत
कि‍ राति‍ कि‍ दि‍न।
तइ संग चारू कात नचए
खीचि‍ बाँहि‍ लेत छीन।
सम दृष्टिर‍क हथि‍यार तेज
जे देखए तइ लेल।
दूधो-लाबा वि‍ष सृजए
सदि‍खन देखू जि‍नगीक लेल।
बि‍ना प्रेमी प्रेम कतए
प्रेमास्पदक पकड़ू बाट।
नाचि‍-नाचि‍, वि‍हुँहि‍-वि‍हँसि‍
देखैत प्रेम सरोवर घाट।
जेहने मढ़ल संख घाट केर
तेहने शीतल सरोबर पानि‍
तन पबि‍त्र मन केर सिंचू
सक्कत वि‍वेक बना ठानि‍।
करए शुद्ध तन-मन केर
पहि‍ल पहर नै छोड़ू जानि‍।
दि‍न-राति‍क रहस्य  बुझि‍
हूसू नै कखनो जानि‍।


महजाल

महजाल पसरि‍ पुरनी पोखरि‍।
माटि‍ जलधर कात केचली
उड़ि‍ उड़ि‍ सदए चालि‍ बदलए
पाबि‍ गदि‍आएल जुआनी
नाचि‍-नाचि‍ जि‍नगी बदलए।
एक-दोसरकेँ ठोठ दाबि‍
गैंची-अन्‍है रूप धड़ए
पाबि‍ प्रकृतक वेढ़ंगी चालि‍
कानि‍यो खीजि‍ जि‍नगी धड़ए।
नीकक गुण छी नीक बनबैक
अधला कि‍अए पुस्‍तैनी छोड़त
अधला जँ चालि‍-वानि‍ बदलए
नीक ि‍कअए अभि‍मानी छोड़त।
भलहि‍ं भभकि‍ जाए इचना-पाेठी।
तेकर नै परवाह करू
सजि‍ रूप सरि‍ता सरोवर
धीर भऽ धीरज धरू।
ससरैत देख महजालकेँ
जरैत जाठि‍ चि‍कड़ि‍ कहत
गति‍या-गति‍या रूकि‍ ठमकि‍
सभ कि‍छु सुनबैत चलत।

बेथा

पूछत के केकरा यौ भाय
अपने बेथे सभ बेथाएल।
घसा-घसा चानी बनि‍ टलहा
चीन-पहचीन सभ हेराएल।
कोन कष्‍ट कि‍नका पकड़ने
देखि‍नि‍हारो बौआएल छथि‍।
रंग-बि‍रंगी चश्‍म दृष्‍टि‍
मने-मने हेराएल छथि‍।
दि‍अए पड़त दृष्‍टि‍ धरती
तीन दि‍शा तीनू चलए।
आत्‍मि‍क भौति‍क ओ देवी
जगह पाबि‍ तीनू खेलए।
एक खेले तन-मन केर भीतर
दोसर करए तेज परहार
तेसर तीनू बाट घेरने
रोकि‍-रोकि‍ बि‍लहए उपहार।
तत्‍व कहैत मुँह खोलि‍-खोलि‍
तीनूक तीनू छी तकरार।
खोलि‍ आँखि‍ अगात देख
फुलाएत अभि‍-मन्‍यु भकरार।
कहाँ अछि‍ कठि‍न बाट जि‍नगीक
चि‍क्कन चालि‍ चलैत चलू।
जि‍नगी तँ पाइनि‍क बुलबुल्‍ला
परेख-परेख‍ छाती धड़ू।

बाट

चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू
सोचि‍-वि‍चारि‍ चलैत चलू।
तीन चास जोति‍ते-जोति‍ते
ढेपा फुटि‍-फुटि‍ माटि‍ बनए।
चि‍क्कनमे सभ चाहे चलए
चलि‍ते-चलि‍ते बाट बनए।
मलड़ि‍-मलड़ि‍ ससरैत चलू
मखड़ि‍-मखड़ि‍ गबैत चलू।
चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू।
पाँच पएर पड़ि‍ते-पड़ैत
चुनमुन माटि‍ करए इशारा।
बनि‍ पहरूदार दि‍न-राति‍
हँसि‍-हँसि‍ दैत इशारा।
संगी-संग अकड़ैत चलू
डेग-डेग मि‍लबैत चलू
चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू।
बाट बनए जहि‍या जतए
सोझ-साझक मांग करए
अगि‍ला-पैछला मि‍ला-मि‍ला
बीचो-बीच बढ़ैत चलए।
गीताक गीत गाबि‍-गाबि‍
जि‍नगी परखैत चलू
चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू।
सदि‍खन सनातन सहमि‍-सहमि‍
नव कनि‍याँक सदृश्‍य कहए
नव सूत जेबर पाबि‍-पाबि‍
वसन्‍त राग भरैत कहए।
जँ कि‍रदानी (कमैनी) नै तँ जुआनी कि‍
जँ जुआनी नै तँ मर्दगानी कि‍
बि‍नु युद्धभूमि‍क मर्दगानी,
अछि‍या पड़ल जि‍न्‍दगानी छी।
चेत-चेत चि‍त्त चेतन
समवैत संगीत बजबैत चलू
झूमि‍-झूमि‍ मलड़ैत चलू
चलि‍-चलि‍ बाट बनबैत चलू।
जि‍नगीक गीत गबैत चलू।

नङरकट घोड़ा

यज्ञ सजल यज्ञभूमि
पहुँचल रंग-बि‍रंगक घोड़।
जेहने रंग पानि‍यो तेहने
एक-दोसर बीच केलक होड़।
हि‍नहि‍ना-हि‍नहि‍ना सभ डाकए
जीतब बाजी एे भूमि‍क।
बनि‍ तीन अगुआ-अगुआ
लीअ भजारि‍ ऐ शक्‍ति‍क।
फटकि‍ फटकारि‍ एक-दोसरकेँ
मुँह मारि‍ नि‍कालू बात
अनसोहांत जखने झमकब
धक्कादऽ कऽ देब कात।
फूसि‍ बजैक अभ्‍यास पूर्वा
सभ दि‍न सि‍खलक गर लगा
बेर पाबि‍ वि‍हुँसि‍ बाजल
अछि‍ चढ़ल खुमारी नशा।
शीतल सि‍हकी सजि‍ सि‍हकै
जुनि‍ अलि‍सा करू वि‍श्राम
चलए दि‍यौ मि‍ल दुनूक संग
बहए दि‍यौ देहक सभ घाम।
नै बुझलक सुतल कि‍ जागल
गमा चुकल पहि‍ने दुनू सींग
ठूठ नाङरि‍ ठि‍ठुरए लगलै
सुआस पाबि‍ भेल तल्‍लीन।
सीमा-सरहद बि‍नु बुझने
तड़कि‍-तड़कि‍ तड़कए लगल।
बेहोशी भऽ जखने खसल
नङरकट्टा कहबए लगल।

चपरासी भाय

पाबि‍ पद चपरासी केर
खुशी हँसी बनि‍ उठल परि‍वार
धरती छोड़ि‍ अकास छि‍टकै
सुर्ज-चान संग करत वास।
आइ धड़ि‍ खि‍लचल घर
समाजक वि‍लटल परि‍वार
बसैत मनुख मनुखेक संग
चाहे जेहन हो परि‍वार।
ओसारेक इस्‍टुलपर
भेटलनि‍ काज भाय चपरासी
पद गढ़ि‍ अंग आॅफि‍सक
रूप सजौलनि‍ दरवाजि‍क।
नाचि‍ मन गाबए लगलनि‍
खि‍खि‍या ताल देखबए लगलनि‍
आँखि‍ मारि‍ इशारा करैत
सूर-ताल झुमए लगलनि‍।
रोब कहाँ रूआब कहाँ
गनल दि‍नक पदक छी।
लेखा-जोखा सबहक होइ छै
नीचा-उपर चाहे कुरसी।
नि‍चला कुरसी कखनो कुदि‍
तोड़ि‍-फाड़ि‍ धरतीपर पटकए
बति‍या उपरका चीड़ि‍-चाड़ि‍
दोख मढ़ि‍-मढ़ि‍ फँसरी लगबए।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

१.राजदेव मण्‍डलरामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’


राजदेव मण्‍डल

देश-गीत

आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ
श्वेत-श्‍याम नर-नार मि‍ल एकता बनाउ
ऊसर धरा केँ श्रमसँ सींच उर्वर शीघ्र बनाउ
आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ
संस्‍कृति‍-सभ्‍यताकेँ नभ तक पहुँचाउ
सम्‍पन्नताकेँ दि‍यौ आमंत्रण
वि‍पन्नताकेँ दूर भगाउ
ति‍मि‍र दुर्गकेँ तोड़ि‍ ज्ञानक ति‍रँगा लहराउ
भारत भू केँ विश्वक अग्रणी देश बनाउ
 आउ बन्‍धु आउ स्‍वतंत्रताक गीत गाउ।  
 
रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’
कवि‍ता
माइ
यै माइ अहाँ कतए गेलि‍ऐ
अहाँकेँ देखैले हम्‍मर, आँखि‍ बरसि‍ रहल ये
अहाँसँ बात करैले, हम्‍मर दि‍ल तरसि‍ रहल ये
अहाँ तँ पूर्णिमाक चान छी
मनमे बसल, एकटा भगवान छी।
यै माइ......।
बचपनक ओ दि‍न
गोदमे खेलल ओ दि‍न
लोरी सुनैत ओ दि‍न
साँच कहुँ मन नै लगैए
आब अहाँ बि‍नु
यादि‍ अबै छी जखैन अहाँ
आँखि‍सँ मोती गि‍रैए
प्‍यार-ममता भरल
ओ दि‍न यादि‍ आबैए
यै माइ अहाँ बि‍नु.....
अहाँ बि‍नु ई जि‍नगी अधूरा अछि‍
सभकुछ रहैत हमर घर सूना अछि‍
अहाँ ममताक ओ मूरत छी
देवतोकेँ अहाँ जरूरत छी
यै माइ......।
मनमे बसल ओ, तस्‍वीर छी अहाँ
प्‍यारक ओ जंजीर छी अहाँ
दुनि‍याँसँ ठोकर लालग
भरि‍ दुनि‍याँ कहलक पागल
माइ, हम पागल छी ओ बताह
अहाँ, हमरा ओतने प्‍यार देलि‍ऐ

यै माइ.....।
रेल

सकरीसँ चलल, ि‍नर्मलीक रेल
झंझारपुरमे, लेलक मेल
सुनबै छी, आइ ट्रेनक खेल
बीमे भाइकम, बोगीमे चोरी भेल
मंगलाक कपड़ा, आ पैइसो गेल

कि‍नका कहब नि‍क आ चारे
बोगीमे मचल अछि‍ शोर
चाेर-चारे-चाेर
पकड़ चाेर, पकड़ चोर
मुदा कत्त गेल चाेर

इंजनपर बैसल, तरकारीवाली
फटल य जि‍नकर साड़ी
बौगलीमे पैसा, मुँहमे पान
चलबैए तेज जुबान

कि‍ कहब, हि‍नकर कहानी
अपनाकेँ बुझैए राजधानी
जी.आर.पी आकि‍ सी.आर.पी
सभ छथि‍ एकरा आगू फेल
ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल।

आह! चोर आइ पकड़ा गेल
जेल उ भेजल गेल
खतम भऽ गेल, चोरीक खेल
मुदा, बेलहीमे फेर भाइकम भेल
रेल-रेल-रेल, ई कि‍?
बोगीमे य ठेलम-ठेल
बुदरूक, बच्‍चा, बुढ़बो गेल
ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल। ‍


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
रवि मिश्र “भारद्वाज”, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी।
     १.     

अन्तिम क्षणमे

काल्हि किछु काल असगरेमे
हम केलौं अपनासँ किछु बात
पुछलौं अपनासँ बिना मतलबक
की ककरो तोहर छौ आस
कियो नै भेटल जे चाहितै, सुनितै
हमरासँ हमरा भाव-विभोर कऽ,
चाहलक तँ सभ कियो हमरा,
मुदा नै देखलक हमर आँखिक नोरकेँ
बेचैन भऽ कऽ कानए लागल
हमरेपर जखन हमर आँखि
हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल
ऐ उमरोमे एना
कि कियो देखावा कऽ सकै छै
हँसऽ लगलौं हमहूँ हुनका देखि कऽ
दुख अपन हँसीमे नुका कऽ



२.
मरहम
जखन कखनो
ककरो दर्द केँ
बुझै छी
अपन दर्दकेँ
जेना
हृदै जाइ अछि सहमि
आँखिसँ आबि जाइत अछि पानि
सोचै छी काश
होइत हमरा पास
किछु आर देबऽ केर
खाली भरोसा आ दिलासाक
पाबऽक कनेक
अपन सुख आ आराम
लोक एना किए
बिसरि गेल
अपन लोकक पहिचान
ओ जे कखनो कहै छल जिनका
अहाँ छी हमर जान
बिसरि गेल-अइ हुनकर नाम

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश चन्द्र  ’अनिल’

गजल


लोक जते छथि गाम पर
सभहक मोन लताम पर।


शिक्षा,शील,स्वभाव स्वर्ण थिक
लोक मरैए’ चाम पर।

भारी पड़ि गेल बर्गर-पिज्जा
मुरही आर बदाम पर।


कनिते भागि गेला कन्यागत
बात अटकि गेल दाम पर।


देव विराजथि बाध-बोनमे
मेला होइए धाम पर।


दुर्वाक्षत केर मंत्र पढथि सभ
गांधी-सेतुक जाम पर।


यश,अपयश आ हानि-लाभ सभ
छोड़ि देलहुं हम राम पर।




सुन्दर सपना सभ क्यो देखू
मोती बरसत घाम पर।
 
 आगूमे इनार भ्रष्टाचार के
पाछूमे पहाड़ भ्रष्टाचार के।


भूखल छी अहां, किरकेट देखू
मनमोहक संसार भ्रष्टाचार के।


जल- थल-नभमे शोर मचल अछि
सभठां जय -जयकार भ्रष्टाचार के।


सभ गााछ पर लतरल - चतरल
बड़का कारोबार भ्रष्टाचार के।


एक दीस बाबा आ अन्ना केर अनशन
दोसर दिस सरकार, भ्रष्टाचार के।


प्रेम,शांति,सुख,सत्य आर आनंदक क्षण
सभटा भेल आहार भ्रष्टाचार के।


 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नवीन कुमार आशा


कि जीवनक अछि सत्य

जागल सूतल सदिखन सोचि
जीवनक
की अछि सत्य
ता
कैत फिरी प्रश्नक उत्तर
जतय ततय सर्वोत्तर
जखन नहि भेटल उत्तर
तखन कखनो कखनो सो
ची
सुख वा हो दुख
आँखि भ
रिबए नोर
की अछि जीवनक सत्य ?
बच्चा
मे जकरा भेटए दुलार
माए बापक भेटनि प्यार
जखन ओ होथि सियान
माए बापसँ लगाबथि जुबान
कि ई
एह अछि जीवनक सत्य ?
पढि-लिखि जखन ले
बए बच्चा
आ नीक पाबि जाए
नोकरी
तखन
वएह धिया-पुता
माता पिताक नहि कर
थि सम्मान
कि ई
एह भेटलन्हि हुनका ज्ञान
की अछि जीवनक सत्य ?
घु
मैलौंश्न्नक उत्तर लेल
तखन मोन भेल
र विचलित
पुतोहु करथि सास-ससुरपर वार
आ बेटा करथि आगु-पाछु
करै
रहथि हुनक अपमान
ने देथि हुनका सम्मान
कीएह अछि जीवनक सत्य ?
त्तौ-कत्तौ देखै लेल भेटल
जिबैकिए नहि करथि अपमान
जँ मरि गेलाह ओ व्यक्ति
हुनक समाज क
रए गुणगान
की जीवनक अछि सत्य ?
शाक छनि विनती
भकेँ दियौन मान
किए ने ओ होथि अज्ञान
जीवनक
बनि पाओत सत्य ?

(
अपन मामाजी डा. रमानंद झा "रमण" केँ समर्पित, जिनक हमर जीवनमे एकटा अलग स्थान अछि)



                     

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ॰ शशिधर कुमर,                                    एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) - ४११०४४

       
                                   मेघ
हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी ! जीवन  हमरहि  आनल  अछि ।
नञि गोर जदपि हम छी कारी, पर स्नेह सुधा संग आनल अछि ।।

जखन – जखन  एहि भूतल पर,
रविकिरणक साहस  बढ़ैत गेल ।
सभ जीव जन्तु , गाछी बिरछी,
जल विन्दु-विन्दु ले तरसि गेल ।
एहि दारुण दुःख मे संग तोहर, हर बेर हृदय मोर कानल अछि ।
हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी !  जीवन हमरहि  आनल अछि ।।

हर आह हमर शीतल बसात ,
नोरक हर बुन्न बनल अमृत ।
लहलहा उठल खेतक जजाति,
हर जीव तृप्त, धरती संसृत ।
स्वागत मे सदिखन आदिकाल सँ मोर मुदित मन नाचल अछि ।
हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी !  जीवन हमरहि  आनल अछि ।।

हर सड़सि  ताल सरिता निर्झर,
वन उपवन हमरहि सँ शोभित ।
हर जड़ि चेतन केर प्राण हमहि,
छी रग मे हमहीं बनि शोणित ।
हमरहि निर्मित ई सकल स्वर्ग , हमरहि वसन्त ई आनल अछि ।
हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी !  जीवन हमरहि  आनल अछि ।।
नञि दोष हमर, जँ हो अनिष्‍ट,
आ नाचथि ताण्डव  महाकाल ।
जलमग्न धरा,  बाढ़िक कारण,
आ देखि पड़य  कत्तहु अकाल ।
सोचू एहि मे अछि दोष ककर ? की नियम अहाँ सभ मानल अछि ?
हम मेघ थिकहुँ, धरतीवासी !   जीवन   हमरहि  आनल अछि ।।
  

हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।
हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।
नञि  दुनिञा  केर  कनिञो ध्यान ।
की होयत सोचि भविष्य विषय, हम तऽ अतीत केर करी गान ।
                    हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।।

नञि  दुनिञा  सँ, कनिञो घबड़ायब ।
नञि प्रगति देखि कऽ हम ललचायब ।
छल  हमर  अतीत  बहुत   सुन्नर ,
तेँ   रहत  भविष्यहु  नीक   हमर ।
की अजगर करइत अछि चिन्ता ? अरे सबहक दाता , अपनहि राम ।
                         हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।।

विग्यानक द्वारि, अशान्तिक द्वारि ।
एहि  सँ   नीक,  बैसी  चौपाड़ि ।
करी   अराड़ि   पढ़ी  गारि ।
नञि  ताहि सँ जीती, करी मारि ।
अछि  फॉर्मूला - परिभाषा व्यर्थ ।
चान – विजय  अभिलाषा  व्यर्थ ।
की धरती’क चान अलोपित अछि , जे करी गगन चानक अभियान ?
                         हम  मैथिल ! मिथिला केर सन्तान ।।

हम मानि लेल  अहँ  सर्वश्रजष्ठ ।
लाठी  भाँजए  मे  छी  यथेष्ठ ।
अहँ  शूरवीर,  अहँ  परम वीर ।
अहँ   कर्मवीर,  अहँ  धर्मवीर ।
अहँ माए मैथिलीक पुत्र धीर, जे सहि सकलहुँ माएक अपमान ।
                     अहँ मैथिल , मिथिला केर सन्तान ।।


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जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।
स्नेह-सूत्र टुटि गेल
स्नेह-सूत्र टुटि गेल  
सब कियौ छुटि गेल    
 माला के एक-एक     
 मोती छिडिया गेल     
 चिडिया के ऑखि भेलै 
 अप्पन-अप्पन पॉखि भेलै    
 सब कियौ उडि गेल
 खोंता विरान भेल
स्नेह-सूत्र टुटि गेल
आपस के प्रेम मे
वैर कोना आबि गेल      
हंसी-मजाक बीच
व्यंग्य ठौर पाबि गेल
कि भेल के नहि जानि
ककर नजर लागि गेल  
स्नेह-सूत्र टुटि गेल
किछु दिन पहिले तक
परिवारक मान छल
सब किछु अप्पन छल
कियौ नहि आन  छल
सब किछु खाख भेल
कोन आगि लागि गेल   
 स्नेह-सूत्र टुटि गेल

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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