Saturday, August 13, 2011

'विदेह' ८७ म अंक ०१ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८७)- PART II



राजदेव मण्‍डल
उपन्‍यास- हमर टोल

गतांशसँ आगाँ

 

स्‍वार्थक कारणे दुनू परानीमे झगड़ा भेनाय स्‍वभावि‍के अछि‍। झगड़ाक बाद देह आ मन अलग हेबे करतै। वएह सुआरथ फेर दुनूकेँ मि‍लन करबौतै। से बात साँचे कि‍न्‍तु झूठे। जे हुए कि‍न्‍तु झगड़ाक बाद मि‍लन एक तरहक नव संचार करैत छै, मोनमे। जेना लगैत रहै छै जे सभकि‍छो अभि‍नव भऽ गेल हुअए। दमि‍त लीलसा सभ फन-फनाक ठाढ़ भऽ गेल हो। मनक फुलवाड़ीमे नव नव फूलक आगमन। भनभनाइत भ्रमर। आबि‍ जाइ छै- अभि‍नव प्रीत!

धर्मडीहीवाली आपस आबि‍ गेल छै। जागेसर आब डरे कि‍छो नै बजै छै। एक सए झंझटसँ एकेटा झंझट ठीक। ठीके कहै छलै उचि‍तवक्‍ता- ‘मौगीसँ जे अराड़ि‍ करबें तँ सभ नेबाबी भीतरी घोंसारि‍ देतौ आ बोलती बन्न भऽ जेतौ।

धर्मडीहीवालीपर भनभनि‍याँ भूत सवार भऽ गेल छै। जखैन-तखैन भनभनाइते रहै छै। कोन ठेकान छै। ोग कने हटि‍ए कऽ ओकरासँ गप्‍प करैत अछि‍।

धर्मडीहीवालीक मोनक बात के बूझत। जखैन ओ असगर होइत अछि‍ तखैने ओकरा अगल-बगलमे सखी, सेहेली, भर-भौजाइ, अड़ोसी-पड़ोसी सभ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍। जहि‍ना नैहरामे ठाढ़ होइत छलै, तहि‍ना। ओकरा सभकेँ कि‍यो नै देखै छलै। देखतै कि‍एक। मोनक आँखि‍सँ देखै छलै मात्र धर्मडीहीवाली, आ गप्‍पो करै छलै।
गे ि‍नरमला, सन्‍तान कोन भारी चीज छै। चाहनेसँ कोन चीज नै होइ छै। कने दि‍माग लड़ा सभ कुछो ठीक भऽ जेतौ। देखै छी दि‍दि‍याकेँ। ओकरो सासुरमे एहि‍ना झगड़ा होइत छलै। बेटा जनमैते रानी बनि‍ गेलै।

है शुरूमे तँ बहुतो हल्‍ला-फसाद भेलै। बदचलन छै। बेहया छै। कि‍न्‍तु सभ कि‍छो रसे-रसे दबि‍ गेलै। के केकरा याइद रखै छै, कथी। फुरसैतमे दोसरोक गप्‍प मोन पड़ैत छै आ काजक बोझ जँ माथपर रहै तँ अपनो वि‍षयमे बि‍सरि जाइत अछि‍।

ई तँ एहेन दुनि‍याँ अछि‍। जे जखैन ढोल पि‍टैक हएत तखैन केकरो सुगबुगाइतो नै देखबै। आ जँ चुप्‍पी साधि‍ लेबाक बखत तँ बाघ जकाँ गर्जन करए लगत।

के कथी बजै छै से बात छोड़ू। अपना वि‍षयमे सोचू। अहाँकेँ बच्‍चा चाही। ओकरा जन्‍म दि‍अ पड1त। डागदर-वैघ गहवर-भगत चाहे जतएसँ हुअए।

धर्मडीहीवाली हँसैत अछि‍ भनभनाइत....। फेर तमसा जाइत अछि‍। डरे खोलि‍ कऽ नै बजैत अछि‍ कि‍न्‍तु पति‍केँ देखते ओर मान धि‍रनासँ डुबकि‍ जाइत अछि‍। कोनो काज मोन लगा कऽ नै करैत अछि। जेना उड़ी-बि‍ड़ी लगले रहैत अछि‍।
आब जागेसरो मनकेँ मारने रहैत अछि‍- डरे....। फेर ने पर-पंचैती बैस जाए। आ समाज थू-थू करए लगे।
समए आबि‍ मुँह दाबि‍ कऽ कखनहुँ काल कहि‍ दैत अछि‍।

ओहि‍ दि‍न खेलावन भगतसँ झगड़ि‍ गेलि‍ये। कहू तँ ओकरासँ फेर देखा दी। नै तँ महतो बाबा लग डाली लगबा दी। वि‍सवास नै होइत अछि‍ तँ डागदर-वैध जइठाम चलब ततहि‍ चलू।

कि‍न्‍तु धर्मडीहीवालीकेँ दिल-मोन तँ भरबे नै करै छै, ऐ गप्‍पसँ जेना। हरदम देहमे आगि‍ लगले रहै छै। सुतैत-बैसैत बेचैन। सोचैत छै- जँ पति‍ चाहैत अछि‍ तँ आइ भगतसँ भेँट करबै।
कौआ, मैना, बगरा सभ एकेठाम खेलाइत छलै। चि‍ल्हौड़क छाँह देखते सभटा एकेबेर फड़फड़ा कऽ उड़ि‍ गेलै, अासमान दि‍स....।
खुला आकाशमे उड़ैत एक खुंडी मेघ। धर्मडीहीवालीक छाती धुकधुका उठल। नै जानि‍ कि‍एक....।

 
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अरविन्द ठाकुर

मिथिलाक संस्कृति:किछु अप्रिय बिन्दु 

मिथिला वर्तमान मे एकटा मिथक मात्र अछि|आइ ने एकर कोनो भुगोल अछि आ ने कोनो संवैधानिक अस्तित्व|अत्योक्ति नहि होयत,जँ कही जे मिथिले जकाँ मिथिलाक संस्कृति सेहो एकटा मिथके अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन द्वारा लिखल आ शिक्षा-व्यवसाय सँ जुड़ल पंडितजन द्वारा बेर-बेर दोहरायल गेल ओहि तथाकथित स्वर्णिमकालक गौरवशाली अध्याय सभक वर्तमान मे कोनो अवशेष-प्रमाण नहि देखाइत अछि|एकांगीए सही,भूत मे जँ आगि रहय त वर्तमान मे छाउर देखाइ पड़बाक चाही ने?
विदेह माधवक आगमन आ हुनक पुरोहित गोतम रहुगण द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित कए भूमिक पवित्रीकरण सँ एहि आलोच्य क्षेत्र मे आर्यसंस्कृतिक सूत्रपात मानल जाइत अछि|एहि सँ पूर्व एकरा द्रविड़-किरातक मिश्रित संस्कृतिक स्थल अथवा व्रात्यलोकनिक निवास-स्थल मानल जाइत रहल अछि|व्रात्यलोकनिकेँ आर्य मानबाक आग्रह सेहो किछु इतिहासकारक छनि|एहि आर्यीकरणक पश्चात वर्ण-व्यवस्थासँ जाति-व्यवस्था,समाजसत्ताक प्रभुत्वसँ व्यक्तिसत्ताक प्रभुत्व,परिवर्तनशीलतासँ जड़ता आ उदारतासँ कट्टरता धरि पहुँचैत एहि क्षेत्रक समाज इतिहासक कोन-कोन अन्हार-इजोतक खोह सभमे ढुकैत-बहराइत वर्तमान धरि पहुँचल अछि,ताहिपरसँ एखनो बहुत रास आवरण सभ हटब बांकिए अछि|इतिहास जँ रस्ता देखबैत अछि तँ रस्ता भोतियाबितो अछि|ओहुना इतिहास पर शासक-समाजक वर्चस्व रहल अछि आ कोनो कालमे आम-अवामक की स्थिति छलय ताहिपर इतिहास सभ आन्हरे सदृश्य रहल अछि|राज्याश्रयी विद्वतजन केँ जनसमाजक स्थिति-चित्रणक ने बेगरता रहनि आ ने पलखति|तेँ इतिहासक भूल-भुलैयामे घुसलाक बादो आ बेर-बेर ‘खुल जा सिमसिम’कहलाक बादो कएकटा चोरदरबज्जा अदृश्य आ कएकटा दरबज्जा बन्द भेटैत अछि आ तेँ हमरासभक सोच-विचार एकटा अनिश्चितताक बिरड़ोमे पताबय लागैत अछि,स्थिर नहि भए पबैत अछि|जनसमाजक दुख-सुखक महासागरमे जा डुबकी नहि मारल जाएत,संस्कृतिक मोती कि पाथर कोना भेटत?ओम्हर हमर सभक शिक्षातन्त्र सेहो इतिहासक पाठ्य-पुस्तक आ अपन बनायल विचार-परिधिसँ बाहर जयबाक अनुमति नहि दैत अछि|सृजनात्मक लेखन यथास्थितिक बैरी मानल जाइत अछि आ तेँ जखन-जखन एहन प्रयास होइत अछि त विरोधीक रुपमे शिक्षातंत्रक संग-संग लाठी-फ़रसा लएकए तैयार मिथिलाक रुढिवादी आ यथास्थितिवादी तत्व ठाड़ भेटाइत अछि|किन्तु सृजनात्मक लेखनक प्रतिनिधि सुच्चा साहित्यकार प्रतिरोध आ असहमतिक संस्कृतिक संवाहक होइत अछि आ तेँ ओकरा शिक्षाव्यवसायी-पन्डितलोकनिक बिरादरीसँ फ़राक अपन सोच आ लेखन दुनूमे रचनात्मक दुस्साहस करैए पड़तै आ मिथिलाकेँ आइ एहने दुस्साहसी सभक बेगरता छै| बेगरता छै जे परम्परा आ लीकसँ हटि इतिहास आ संस्कृतिक अज्ञात-अबूझ पक्षसभक ईमानदार उत्खनन कएल जाय|बेगरता छै जे यथास्थितिक बिषायल सस्सरफ़ानीमे फ़ँसल संस्कृतिक व्यापकताकेँ बाहर आनल जाय आ अभिव्यक्तिक सभटा खतरा मोल लेल जाय|जँ कोशीक रत्न साहित्य-संस्कृतिक अग्रदूत संतकवि लक्ष्मीनाथ गोसाइकेँ राज्याश्रयजीवी सम्पादक-संकलक मैथिली कवि नहि मानैत छथि त बेगरता छै जे एकर विरोधमे बगावत हेबाक चाही-मठ,मठाधीश आ मठसैन्यकेँ धराशायी करबाक हद धरि|बेगरता छै जे संस्कृतिक नव इतिहास लिखल जाय|मिथिलाक महान विभूति राष्ट्रकवि दिनकरक कहब छनि-“साहित्यक ताजगी आ बेधकता जतेक शौखिया लेखकमे होइत अछि,ओतेक पेशेवरमे नहि|कृतिमे प्राण ढारैक दृष्टान्त बरोबरि शौखिया लेखके दैत छथि|थरथराहटि,पुलक आ प्रकम्प,ई गुण शौखिएक रचनामे होइछ|पेशेवर लेखक अपन पेशाक चक्करमे एना महो रहैत छथि जे क्रान्तिकारी विचारकेँ ओ खुलिकए खेलय नहि दैत छथि|मतभेद भेलहु पर ओ हुकुम,अंतत:,परम्परेक मानैत छथि|संस्कृतिक इतिहास शौकिये शैलीमे लिखल जाए सकैत अछि|इतिहासकार,अक्सर,एक वा दू शाखाक प्रमाणिक विद्वान होइत छथि|एहन अनेक रास विद्वानक कृति सभमे पैसिकए घटना आ विचार सभक बीच सम्बन्ध बैसयबाक काज वएह कए सकैत अछि ,जे विशेषज्ञ नहि अछि,जे सिक्का,ठीकरा आ ईंटाक गवाहीक बिना नहि बाजबाक आदतक कारणें मौन नहि रहैछ|सांस्कृतिक इतिहास लिखबाक, हमरा बुझने दूएटा मार्ग अछि|या त वएह बात धरि महदूद रही,जे बीसो बेर कहल जाए चुकल अछि आ,एना,अपनो बोर होउ आ आनोकें बोर करू;अथवा आगामी सत्यक पुर्वाभास दिअओ,ओकर खुलिकए घोषणा करू आ समाजमे नीम-हकीम कहाउ,मूर्ख आ अधकपारीक उपाधि प्राप्त करु|”
ई दू-टूक कहल जयबाक चाही जे कोनो क्षेत्रक संस्कृति ओहि क्षेत्रक राजा अथवा शासकक बपौती नहि होइछ|संस्कृति होइछै समाजक,जाहिमे शासक-शासित,राजा-प्रजा सभ सन्निहित छै|दोसर शब्दमे संस्कृतिक मात्र आ एकमात्र श्रोत वा केन्द्र मनुष्य आ ओकर जीवन अछि| मनुष्यक समाज ,ओकर सामाजिक संरचना,ओकर खान-पान,रीति-रिवाज आदिक सम्मिलित स्वरूप एहि संस्कृतिक निर्माण करैत अछि|एकरे पसारसँ एकटा क्षेत्र-विशेष अपन एकटा अलग पहचान विकसित करैत अछि जे ओहि क्षेत्र-विशेषक संस्कृति कहल जाइछ|तेँ कोनो क्षेत्रक संस्कृतिक उत्स ओहि क्षेत्रमे रहनिहार मनुष्य,ओकर समाज आ ओकर सामाजिक संरचनामे खोजल जयबाक चाही|
देशक अन्य भूभाग जकाँ एतहु आर्यलोकनि आर्येतर जाति संग मिलि जाहि समाजक रचना कयलनि सएह आर्य अथवा हिन्दूलोकनिक बुनियादी समाज भेल आ आर्य-आर्येतर संस्कृतिक मिलनसँ जे संस्कृति जनमल से एतहुका बुनियादी संस्कृति भेल|ई जे बुनियादी समाज भेल,तकर सुसंचालन लेल वर्णाश्रम-व्यवस्था बनल जे कालान्तरमे जाति-व्यवस्थामे परिणत भेल|तेँ मिथिलाक संस्कृतिक यथार्थकेँ बुझबाक लेल देवालय,पोखरि,माछ,मखान,पान आ पाग आदि-इत्यादिक बाइस्कोप देखयसँ पहिने एहि वर्ण-वर्ग-जाति व्यवस्थाक व्रणकेँ फ़ोड़ब आ निर्ममतासँ एकर खैंटी उतारब बहुत आवश्यक अछि|ई पीड़ा देत,दुर्गन्ध पसारत,मुदा एकरा निर्मूल करबाक लेल अथवा वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितिक आवश्यकतानुसार नवीकृत (renewal)करबाक लेल ई जोखिम लेबहि पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक प्राचीन निरन्तरताक खूबी-खामीकेँ बुझबाक लेल आ वर्तमान चुनौती सभसँ जुझैत भावी उत्कर्ष पर लए जएबाक लेल एहि व्यवस्थाक संकल्पना,एकर बीजारोपण व सिंचन सँ लएकए एकर पुष्पित-पल्लवित होइत,मौलाइत,क्षरण दिस जाइत आ रोग-दोषसँ ग्रसित भए वर्त्तमानक निकृष्टतम रूप धरि पहुँचैक सम्पुर्ण प्रक्रियाक वैचारिक शल्य-चिकित्सा(चीड़-फाड़) बहुत अनिवार्य भए गेल अछि|एहि समुद्रमन्थनसँ विष बहरयबाक संभावना सेहो अछि किन्तु सामाजिक सत्यक अमृत प्राप्त करबाक लेल ई जोखिम लेबए पड़त|जाधरि एहि सामाजिक संरचनाक रोग-दोषकेँ नीकसँ बूझल नहि जेतैक ताधरि ने एकर कायाक सम्मानजनक नाश सम्भव छै आ ने एकर कायाकल्पक कोनो सम्भावना छै|मिथिले नहि,सम्पूर्ण भारतीय समाजक सांस्कृतिक उत्थान-पतनक जड़िआठमे इएह वर्ण सँ रुपान्तरित जाति-व्यवस्था अछि|
विदेह माधव एलाह,हुनक पुरोहित गोतम रहुगण अग्नि प्रज्ज्वलित कएलनि,आवश्यकतानुसार जंगल-झाड़ जराओल गेल,खेती योग्य समतल भूमि बनाओल गेल,समाज सभ्यता आ विकास दिस अग्रसर भेल|आर्य-अनार्यक सम्मिलन सँ बनल मिनजुमला संस्कृति विकसित भेल|कालक्रममे एकीकृत आ व्यवस्थित समाजक रचनाक्रममे परिवर्तनीय वर्णाश्रम-व्यवस्था विकसित भेल|ई वर्णव्यवस्था अपन समयक सर्वाधिक वैज्ञानिक आ व्यावहारिक समाजव्यवस्था छल जखनकि विश्वक अनेकानेक भूभाग तखनो अविकसित आदिम अवस्थामे पड़ल छल|ई व्यवस्था सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक चारि खाम्हबला सशक्त अधिरचना छल|एहि वर्णसमाजमे सामाजिक श्रम,सामाजिक रक्त-सम्बन्ध एवम सामाजिक विचारक नियम परिवर्तनीय छल|सामाजिक व्यक्ति अपन योग्यता,क्षमता आ अभिरुचिक अनुसार सामाजिक श्रमकेँ अंगीकार कए अपन जीवनयापन लेल ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रक रोजगारमूलक चक्रसँ अपन वर्ण आ श्रम-प्रकार चुनि ओहिमे अपन प्रतिभा आ सामर्थ्यक सदुपयोग आ प्रदर्शन करबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ अपन रागात्मक आकर्षणक आधार पर रक्त-सम्बन्ध स्थापित कए सामाजिक व्यक्ति बनबाक लेल स्वतन्त्र छल|ओ प्रत्येक सामाजिक पहलू पर निर्भीकतापुर्वक अपन विचार व्यक्त करबाक लेल स्वतन्त्र छल|अपन प्रकृतिमे पूर्ण समाजवादी वर्ण-समाज प्राकृतिक सन्साधन पर बेसी आ सामाजिक श्रमसँ अर्जित साधन पर कम निर्भर छल|प्रत्येक व्यक्तिक रोटी आ आजादीक गारन्टी छल|सृजनात्मक संस्कृतिसँ आलोकित ओ काल ताधरि रहल जाधरि ओहि व्यवस्थामे परिवर्तनशीलता रहलै|जँ देखल जाय त सामासिक संस्कृतिक बीजारोपण आ ओकर तीव्र विकासक ओएह कालावधि छल|एहिकालमे सामाजिक श्रम-संस्कृतिक महत्ता त स्थापित भेबे कएल;महासागर,वनप्रदेश,गिरिप्रदेश,मरुप्रदेश,हिमप्रदेश,आकाश आदि पर विजय प्राप्त कए ओकरा अपन अधीन करबाक घातक प्रवृतिक जगह पर ओकरा अपन मित्र बनाए ओकर संरक्षण करबाक संस्कार सेहो जन-जनमे विकसित भेल|देहक नश्वरता आ आत्माक अमरताक सिद्धान्त मनुष्यकेँ अपन भावी पीढीक भविष्यसँ जोड़लक|ई ओ समय छलै जखन विद्यानुरागी आ विद्वानकेँ ब्राह्मणत्व भेटैत छलै,अजुका जँका नहि जे ब्राह्मण वन्शमे जन्म लेलहु त विद्वान होयबे करब|ई ओ समय छलै जखन रणकौशलमे निपुणता क्षत्रियत्वक पैमाना होइत रहय,अजुका जकाँ नहि जे ओहि कुलमे जनमलहुँ त वीर होयबे करब|
एकरा जनसंख्याक दबाव कही,वा तत्कालीन समाजक समयगत बाध्यता जे वर्णाश्रम अधिरचनाक परिवर्तनशीलता अपन निरन्तरता कयम नहि राखि सकल आ तकर परिणामस्वरूप अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था अस्तित्व मे आयल|समाज-सत्ताक क्षरणस्वरूप व्यक्ति-सत्ताक बढैत वर्चस्व सेहो एकटा कारण भए सकैत अछि|इएह जन्मना जातीय समाज हमरा सभक वैभवशाली मानवीय संस्कृतिक क्षरणक महत्वपूर्ण कारक भए गेल अछि|
जाहि मिथिक नाम पर मिथिला बनल आ जनक वंशक स्थापना भेल,जाहि विदेहकेँ मनु महराज ‘वैश्य द्वारा ब्राह्मणीक गर्भसँ उत्पन्न सन्तान ‘ कहय छथि आ जेकर वर्गीकरण व्रात्यक रुपमे सेहो होइत अछि,ताहि वंशक सीरध्वज जनकक सभामे ‘जनक(वैदेह)वस्तुतः जनक(पिता)छथि’कहैत आ’जनक-जनक‘ उच्चरित करैत ब्रह्मविद्याक ज्ञान लेबाक लेल विद्वतजन सभ दौगैत छलाह|विश्वामित्रक श्रेणी क्षत्रियक छलनि मुदा हुनक प्रबल विद्यालोलुपता अंततः हुनका ब्रह्मर्षिपद उपलब्ध करबैलकनि|अऊँठा कटबाइओकए एकलव्य प्रमाणित कयलनि जे धनुर्विद्यामे पारंगत होएबाक लेल क्षत्रिय होयब त कात जाय दिअ,गुरू आ ब्राह्मणक सदेह उपस्थिति अथवा शिक्षा कतहुसँ आवश्यक वा अनिवार्य नहि अछि|शंबूक अपन घेंट कटबयसँ पहिने विद्वान होएबाक लेल ब्राह्मण होएबाक अनिवार्यताकेँ आधारहीन प्रमाणित कए चुकल छलाह|
अपरिवर्तनीय जन्मना जाति-व्यवस्था धरि अबैत-अबैत हमरा सभक समाज कवचमे बन्द घोंघा सदृश्य भए गेल|ई कवच छल पुर्वाग्रहक|जाति-प्रथासँ उपजल एहि स्थितिक मादे समाजविज्ञानी जवाहरलाल नेहरूक कहब छनि जे’भारतमे दुनू बात एके संग बढल|एकदिस त विचार आ सिद्धान्त मे हम सभ बेसी सँ बेसी उदार आ सहिष्णु होएबाक दाबी कएलहुँ|दोसरदिस,हमरसभक सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होइत गेल|ई फाटल व्यक्तित्व,सिद्धांत आ आचरणक ई विरोध,आइधरि हमरासभक संग अछि आ आइओ हमसभ ओकर विरुद्ध संघर्ष कए रहल छी|कतेक विचित्र बात अछि जे अपन दृष्टिक संकीर्णता,आदत आ रिवाज आदिक कमजोरीकेँ हमसभ ई कहि अनठिआए देबए चाहैत छी जे हमरासभक पुरखा बड़का लोग छलाह आ हुनकर बड़का-बड़का विचार हमरासभकेँ विरासतमे भेटल अछि|किन्तु,पुरखासभसँ भेटल ज्ञान आ हमरासभक आचरणमे भारी विरोध अछि आ जाधरि हमसभ एहि विरोधक स्थितिकेँ दूर नहि करब,हमरासभक व्यक्तित्व फाटल के फाटले रहि जाएत|’नेहरूक ई कथन मिथिलो पर अक्षरसः लागू होइत अछि|अपरिवर्तनीयता आ जन्मना-एहि दुनू सुरक्षा-कवचसँ संरक्षित मिथिलाक मार्गदर्शक वर्ग आत्ममुग्धता,आलस्य आ मुफ्तखोरीकेँ अपन हक मानि लेलक|श्रेष्टताबोधक पाखंड मिथिलाक ग्रहणशक्तिकेँ गीलि गेल|’जे हम छी,हमरा लग अछि,सएह सर्वश्रेष्ट अछि’क डपोड़शंखी मानसिकता बाहरसँ उत्कृष्टतम चीजहुँकेँ लेब अस्वीकार करए लागल|विदेशी आक्रांतासभक शासनाधीन नहि रहितय त अनेकरास कला,शिल्प,तकनीक,विधा जे विदेशीसभक संग आयल छल,मिथिला समाज तकरोसँ वंचित रहि जैतय|ई मजबूरीमे ग्रहण कएल गुणसभ छल जे हमरासभक गंग-जमुनी संस्कृतिकेँ समृद्ध कयलक,जकरापर आइ हमसभ गर्व करय छी|
कोशी नदी मिथिलाक नम्हर भूभागक भाग्यनियंता रहल अछि|एकदिस ई हमरासभक धार्मिक-सांस्कृतिक भौतिक धरोहरसभकेँ नष्ट-भ्रष्ट कयलक अछि त दोसरदिस एकरे चलतबे अपरिग्रह आ संघर्षक संस्कृति निर्मित आ विकसित भेल जेकर सीधा लाभ सामान्य जन-समाजकेँ भेटल|विशिष्ट जन-समाज एहि संस्कृतिसँ अलगे-थलग रहबामे कुशल मानलनि|जँ संघर्ष-संस्कृतिकेँ सर्वस्वीकृति भेटल रहितय त क्षत-विक्षत लोकजीवनक जीजीविषाक परिणामस्वरूप शासनमे आयल खेतिहरसमाजक प्रतिनिधि गोपाल आ सत्ताक निरंकुशताक विरुद्ध जनांदोलन कए शासनमे आयल भीम केवट निर्विवाद नायकक सूचीमे होयतथि|
हमसभ जाहि आर्य-आर्येतर सभ्यता-संस्कृतिक संवाहक मानल जाइत छी ओ समन्वयवादी,सामासिक,समावेशी संस्कृति छल|आर्य मनीषी लोकनि हमरासभकेँ ’वसुधैव-कुटुम्बकम’क मंत्रसँ सिक्त कएने छलाह|इएह संस्कृति छल जे सनातन धर्मकेँ एतेक विस्तार देलक|एहि सनातन-सागरमे आबि विदेशी आक्रांतासभक सैकड़ो रक्त-समूह भारतीय भए गेल|सनातन धर्मक विस्तार हमरसभक संस्कृतिओकेँ निरन्तर समृद्ध कयने गेल|सम्पूर्ण मिथिलाकेँ प्रमुखतः सनातनी मानल जाइत अछि|किन्तु,आइ हमसभ ई स्वीकार करी जे हमसभ अपन पूर्वजक नीक,इमानदार आ सुयोग्य उत्तराधिकारी प्रमाणित नहि भए सकलहुँ आ ओहि सनातन-सामासिक संस्कृतिकेँ अक्ष्क्षुण्ण नहि राखि सकलहुँ|जे समाज अपन धूर विरोधी बुद्धकेँ अपन अवतार घोषित करबाक उदारता देखयलक,वएह समाज मैथिल-महासभाक आयोजक भेल|जाहि बौद्धिक वर्ग पर वर्ण-जाति संरचना-संरक्षणक भार छलय सएह वर्ग परम स्वार्थी बनि अपन रक्त-शुद्धताकेँ रेकर्डेड करयबाक उताहुलतामे पंजी-प्रवन्धक व्यवस्था कए लेल|वेदव्यास एतेक ध्यान राखलनि जे’चातुर्वर्ण्य मया सृज्यते’कृष्णावतार-मुखसँ कहबएलनि,मुदा सत्ता-संरक्षणक आत्ममुग्धतामे पंजी-प्रवन्धक औचित्य लेल कोनो लोकलाजक पालन नहि कएल गेल|”मिथिला”आ”मैथिल”शब्दक प्रयोगकेँ हमसभ जतेक विराट आ व्यापक अर्थवत्ता प्रदान करिऔक,एहि दुनू शब्दक अर्थ आम-अवाममे की लगाओल जाइ छै,से ककरोसँ नुकायल नहि अछि|एतय मिथिलाक सामाजिक बुनावटक रग-रग चिन्हयबला साधु-जनकवि वैद्यनाथ मिश्र यात्री जीक एकटा लेखक अंश देब समीचीन बुझाइत अछि-“मैथिल महासभाक सिद्धान्तानुसार मैथिल ब्राह्मण तथा कर्ण कायस्थ(!)मात्र सुच्चा मैथिल थिकाह|मिथिलाक सीमाक भीतर बसैत,मिथिलाक अन्न-जलसँ निर्वाह करैत,विशुद्ध मैथिली बजैत भूमिहार-क्षत्रिय आदि अन्य जातीय यदि क्यो अपनाकें मैथिल कहताह तँ जातीय महासभा नांगरि ठाढ क क हुनका दिस बधुआएत,मुँह विजकौत|परिणामस्वरूप हुनका लोकनि अपना घर-आंगनमे व्यवहृत भाषा-ठेठ मैथिलीकें मैथिली कहबामे अपन हेठी बुझै लागल छथि|’हम मैथिल नहि,बिहारी थिकहुँ’-ई भावना हमरा लोकनिमे जाहि तेजीसँ पसरि रहल अछि,से देखि एहन कोन मैथिल हृदय हैत जे आहत नहि भ रहल हो?मिथिलेश-सुधारक मिथिलेश(?)जाहि संस्थाक कर्णधार होथि,तकर एहि प्रकारक संकुचित सिद्धांत देखि मिथिलाक लाख-लाख अधिवासी-जे मैथिल होइतहुँ मैथिल नहि,क्षुब्ध अछि|चिरकालसँ अपनहि घरमे,अपनहि बन्धु-वर्गक द्वारा ठोंठिऔल गेल मिथिलाक सन्तान आइ यदि आजिज आबि अपनाकें बिहारी कहब आरंभ कैलक अछि तँ एहिमे केकर दोष?’महासभा’क कतोक सदस्यक मनमे घुरि-फिरि ई बात अबैत हेतैन्हि जे मिथिलाक सकल अधिवासीकें मैथिल मानि लेला सँ मैथिलत्वक अग्रगण्य अंगमे धार्मिक वा समाजिक धक्का लगवाक सम्भव|” यात्री जीक ई विचार आइ सँ 73वर्ष पहिने विभूति,फरवरी 1938 अंकमे छपल छल|एहि स्थितिमे आइओ कोनो सकारात्मक परिवर्तन नहि भेल अछि,उन्टे बिगड़ले अछि|
वर्ण-व्यवस्थाक बिगड़ल निकृष्ट रूप जाति-व्यवस्थाक औचित्य-अनौचित्य पर घमर्थन होइत रहल छै,होइत रहतै,मुदा एहि यथार्थसँ मुँह नहि मोड़ल जाय सकैत अछि जे मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थान-पतनमे ई व्यवस्था अनिवार्य आ महत्वपूर्ण कारक रहल अछि आ रहत|आल्हा-रुदल,नैका-बनिजारा,लोरिकायण,भगैत आदिक जे लोकगायनक संस्कृतिक परम्परा रहय अथवा छै,तकर निर्वहनमे आइ धरि केओ द्विज किऐक नहि एलाह?ई ठेकेदारी की मात्र सोल्हकनक छिअय?मैथिली मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक भाषा छै आ एहिसँ सम्बन्धित सभटा संस्था-पुरस्कार पर इएह दुनू जातिक आधिपत्य छै-एहि आरोपक कोनो प्रायोगिक खण्डन आइ धरि किऐक नहि भए सकल?भाषा सेहो संस्कृतिक आवश्यक आ अविभाज्य अंग छै|जँ भाषा समावेशी नहि हएत त समावेशी संस्कृति कोना विकसित हएत?
ई प्रसन्नताक गप अछि जे जँ राजनीतीक क्षेत्रकेँ छोड़ि दी त सामाजिक जीवनमे जाति-पातिक महत्ता समाप्त प्रायः छै|एकर कारण खुलल अर्थव्यवस्थाक नीती होअय,भौतिकवादी होड़ होअय वा एहि दुनूक चलतबे बढल जीवन-संघर्ष,किन्तु जाति-पाति अजुका लोकक विचार-सूचीमे बहुत नीचाँ छै आ मात्र चुनावेक बेरमे शीर्ष पर आबय छै|तेँ समरसताक संस्कृतिकेँ फिलबक्त सतह पर कोनो खतरा नहि देखाइत अछि|एहि क्षेत्रक ऊर्वर माटि-पानिमे सामासिक संस्कृतिक बीआ तेहन सघन छीटल छै जे बेमुरव्वत मौसम आ लापरवाह किसानक अछैतहुँ ई पनुकैत रहय छै,फसिल दैत रहय छै आ एतहुका वासीकेँ जीवित आ गतिवान बनेने रहैत छै|किन्तु कतहु गहींरमे आगि भए सकैत छै|तेँ समयक तगादा छै जे वर्त्तमानमे जातीय-व्यवस्थाकेँ कोनो तार्किक आ वैज्ञानिक निष्कर्ष धरि आनल जाय,अन्यथा सांस्कृतिक उत्कर्षक लक्ष्य पायब सन्देहास्पद अछि|जवाहरलाल नेहरु कहने छलाह-“आइ हमरासभक समक्ष जे प्रश्न अछि,ओ मात्र सैद्धांतिक नहि अछि,ओकर सम्बन्ध हमरसभक जीवनक सम्पूर्ण प्रक्रियासँ अछि आ ओकर समुचित समाधान आ निदाने पर हमरसभक भविष्य निर्भर करैत अछि|साधारणतः,एहन समस्यासभकेँ सोझराबयमे नेतृत्व देबाक काज मनीषी लोकनि करैत छथि|किन्तु ओसभ काज नहि एलाह| ओहिमे सँ किछु त एहन छथि,जे एहि समस्याक स्वरुपहिकेँ नहि बूझि पाबि रहल छथि|बकियासभ हारि मानि लेने छथि|ओ सभ बिफलता-बोधसँ पीड़ित आ आत्माक संकटसँ ग्रस्त छथि आ बुझिए नहि पाबि रहल छथि जे जीवनकेँ कोन दिशा दिस मोड़ब उचित होयत|”नेहरुक एहि निराश टिप्पणीक बाद वैश्विक समाजवादी चिन्तक एंजेल्सक ई वक्तव्य विचारणीय अछि-“कोनो खास आर्थिक संरचनाक समस्याक समाधान ओही संरचनाक नियम के अनुसार कएल जायब अनिवार्य अछि,जँ कोनो दोसर संरचनाक नियमसँ ओकर समस्याक समाधान कएल जायत त ओ बेजाय ढंगसँ विद्रूप भए जायत|”एंजेल्सक एहि कथनमे हमरासभक जातीय(आर्थिक)संरचनाक समस्याक समाधानक कुंजी नुकायल अछि|मिथिला आ भारतक लेल सांस्कृतिक संकटक कारण बनल जातिप्रथाक वर्त्तमान संकटक समाधान एहि जातिप्रथाक संरचनाक भीतरे अछि|एकरे नियमसँ एकरा युगानुरूप उपयोगी बनायल जाए सकैत अछि आ ई काज हमरेसभकेँ करए पड़त|मिथिलाक संस्कृतिक इएह तगादा अछि|मिथिला आ एकर संस्कृतिक उत्कर्षक इएह टा मार्ग अछि| 

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 ३. पद्य









३.६.गजेन्द्र ठाकुर- गजल



 सुबोध झा (१९६६- ), पिता श्री त्रिलोकनाथ झा
संस्कृति ओ संस्कार

पुरूष पातर सभ बिसरि गेलाह सन्ध्यावन्दन एकोदिष्ट ओ तर्पण ।
ऑंगन दिसि बिसरि गेलीह हरिसों तुसारी सामा ओ अडिपन ।।
आजुक छौंडी सभ की बुझतैक बरसाति पचाइक आ भ्रातृद्वितिया ।
बूढ पुरान सभ टा करैत अछि घॉंटो सपता विपता आ खरजितिया ।।

आब तऽ गामो मे विरलेक भऽ रहल अछि छठि आ चौरचन ।
घरक लोको केँ मुइला पर ने कटबैत अछि केश आ ने बारैत अछि नोन ।।
अष्टमी मे लुप्त भेल जा रहल अछि पातरि आ कुमारिक पूजन ।
नहि होइत अछि पार्थिव लिंगक पूजन कान तरसि गेल सुनबाक लेल डहकन ।।

सभ होमए चाहैत अछि सामाजिक बन्धन सँ स्वतन्त्र ।
सभ बिसरल अछि दुर्गाशप्तशती आ दूर्वाक्षतक मन्त्र ।।
विलीन भऽ गेल पूजापाठ आ निशापूजाक महक जगरणा ।
सुखरातीक ऊक फेरब आ जूडशीतलक मॉंथपर पानि लेब भेल सपना ।।

उपनयन चूडाकर्ण आ विवाहक नियम राखल गेल ताक पर ।
तर्क करबाक लेल नवयुवक सभ बैसल अछि बात बात पर ।।
बिलाएल जा रहल अछि सलहेसक पूजा आ भगताक प्रभाव ।
लहाश पडल अछि आगि देनिहार पुत्र केर अछि सर्वथा अभाव ।।

आब तऽ सत्यनारायण पूजाक शालग्राम लए बौआइत छी भरि गाम ।
खसैत संस्कार केँ देखि लगैत अछि बिसरब संस्कृति जल्दीए एही ठाम ।।
हे भगवान कतए छी दियौक मनुक्ख केँ सदबुद्धि अहॉं तऽ छी अन्तर्यामी ।
कलयुगक पाप सँ सभ केँ बचाऊ आब तऽ भेला सभ केओ अज्ञानी ।।

इतिहास बनल जा रहल अछि मिथिलाक संस्कृति ।
जल्एिद पूजब एकरा बनाए माटिक मूर्ति ।।
यदि बॉंचि जाएत कतहु कतहु एहि संस्कृतिक भग्नावशेष ।
तखन तकलहु पर नहिं भेटत कतहु एकर अवशेष ।। जय मिथिला जय मैथिली ।।


जिनगी

जिनगी छल बड छोट ।
एहि बातक रहल सतत कचोट ।।
यदि कएने रहितहुँ लोकक उपकार ।
तऽ नाम लितए सगर संसार ।।

पसेनाक पाई जाहि लए रहलहुँ जिनगी भरि बेहाल ।
बैंकवला सभ भेल रहल ओहि पाई सँ मालामाल ।।
आब तऽ घरोवला नहिं करैत अछि चर्च अप्पन जानि ।
बहा रहल अछि संचित धन जेना बुझि पडैत हो पानि ।।

पाप मे रहलहुँ डूबल बिसरलहुँ देवता पितर ।
तेँ मुइलाक बादहु घुमैत छी जँहतर पँहतर ।।
सब बन्द केलक डिब्बा मे कहलक सूतू भऽ चेन ।
नरकहु मे नहिं भेल जगह भेल छी बेचेन ।।

यदि कऽ लेने रहितहुँ ओहि पाई केर गरीब मे उपयोग ।
तऽ नहिं मरितहुँ पाबि एहन असाध्य रोग ।।
आब मोन मशोशि केँ की भेटत हृदय पर जे लागल चोट ।
खाली रहि रहि केँ भऽ रहल अछि कचोट ।।




वाह रे कपार

हमरा की चाही………………………
लाल लाल झूड झूड तिलकोर तरल ।
बारी वला अरिकोंच झोड सँ भरल ।।
भुन्ना मॉंछक पलई देखितहिं अबैत अछि मुँह मे पानि ।
मुदा जर्दा आमक सुगन्ध सब केँ कऽ दैत अछि पानि पानि ।।
कनिञॉं हो तऽ “अन्जेलीना जोली” केर रूप लेने ।
बेटा जनम लए सोनक चमचा मुँह मे लेने ।
सदिखन रही आकाश मे जहाज मे उडल ।।
बैंक हो तऽ गहना आ नोट सँ भडल ।।
मुदा वाह रे हमर जडल कपार ।
एकहु टा सपना नहिं भऽ सकल साकार ।।
बनि जैतहुँ नेता कहिबैतहुँ सरकार ।
गबितहुँ गति वाह रे कपार वाह रे कपार ।।





शायरी

 
हुनकर कजराएल डोका सन ऑंखि देखितेँ मारलक मोन मे हिलकोर ।
ताकए लगलहुँ ओहिना जेना चान केँ ताकए लगैत अछि चकोर ।।
ओहि ऑंखि केँ हम कोना बिसरब जे बेधि देलक एकहि बेर मे हमर हृदय ।
जाइतो जाइत नहिं हँसलीह मोन मसोसैत पहुँचि गेलहुँ मदिरालए ।।
…………………………………… पहुँचि गेलहुँ मदिरालए ।।


हुनक तीतल केश सँ चुबैत पानि सँ मेघो केँ भऽ रहल छैक लाज ।
हुनक गौरवर्ण स्वरूप देखि चन्द्रमा कहथि इजेरियाक कोन आब छैक काज ।
हुनक ऑंखिक पीपनी खसब उटब सँ होइत अछि सॉंझ आ भोर ।
जिनगीक दुइयो डेग चलिताथि हमर सँग तऽ भरए दितहुँ एहि मे नोर ।।
……… खाइत छथि सप्पत नहिं खसए दितहुँ एकहु ठोप नोर एकहु ठोप नोर।।



 
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१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’

जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कवि‍ता

मि‍थि‍ला केहेन

अहीं कहू भाय मि‍थि‍ला केहेन?
सभ दि‍न कमला-कोसी डुबलौं
अन्‍हर-बि‍हारि‍, दानो-दुख सहलौं
कानि‍-खीजि‍ संगे-संग रहलाैं।
कि‍सान-बोनि‍हारक वंश गढ़ि‍
धरती-अकासक बीच खेलेलौं।
आबो बुझि‍यो मि‍थि‍ला केहेन
अहीं कहू भाय मि‍थि‍ला केहेन?
पसरि‍ चौर करमीक लत्ती
वुद्धि‍क वृक्ष सजौलक।
नैति‍कताक फल-फूल सजा
हँसि‍-गाबि‍ जीवन पौलक।
जगत-जननी, जनक-जानकीक
मि‍थि‍लाक तस्‍वीर जेहेन
आबो कहू भाय मि‍थि‍ला केहेन
अहीं कहू भाय मि‍थि‍ला केहेन?

मौसमक मुस्‍की

दि‍न घतट कि‍ राति‍ यौ भैया
मौसम मुस्‍की दैत छै।
साले दि‍नक समए कत्ते होइए
ली‍लाक रंग बदलैत छै।
अपन-अपन सनेस बि‍लहि‍
सुरभि‍-सुगंध पसरैत छै
खसल-पड़लमे जान फूकि-फूकि‍
सोग मुक्‍त बनबैत छै।
समए‍ ने ककरो संग छोड़ैए
ने ककरो संग दैत छै
अपन-अपन कुटल-पीसल
दुनू हाथ समटैत छै।
देखल दि‍न केना बि‍तै छै
देखते देखि‍ ससरैत छै
मृत्‍यु सय्यापर मोन तड़पै छै
बेरथक बाट पकड़ैत छै।
खेल-खेलए चाहलौं जि‍नगी केर
बनि‍ खेलौंना गुड़कि‍ गेलौं
अन्‍ति‍म सॉस बि‍ड़हाएल होइ छै
नोर छोड़ि‍ कि‍छुअो ने पेलौं।

तरंग

सभतरि‍ जगबए प्रेम एकचि‍त्त
दोसर सदति‍ वि‍वाद करए
एम्‍हर-ओम्‍हर छोड़ि‍-छाड़ि‍
बीचका बाट पकड़ि‍ रहए।
रंग-रूप, चेहरा अनेक
चेतन-चि‍त्त तँ एक रहैत।
मुदा वृत्ति‍क कि‍रदानीसँ
सदि‍खन तँ उगैत-डुमैत।
सत् बनि‍ कखनो राज-बि‍राजए
रज बनि‍-बनि‍ शासन करए
धरि‍ते धारण तम तम-तमा
झहरि‍-झहरि‍ फुनगीसँ गि‍रए।
खेलक खेल काल सृजैए
अपनो तँ खेले बनैए
कहाँ रखि‍ पाबए दि‍न-राति‍
गति‍येकेँ मति‍यो बदलैए।
सृष्‍टि‍क तँ खेले वि‍चि‍त्र
सुख-दुख संग दि‍न-राति‍ चलए
खेलए जेहेन खेल खेलाड़ी
ओहने ओ खेलौना पाबए।
कोनो खेल धरती बीच खेलए
खेलए कोनो सतरंगी अकास
कोनो सत् सागर खेलए
चुटकी बजा-बजा रनबास।
वि‍वेकसँ पुछए जखन चि‍त्त
थीसि‍स एन्‍टीथीसि‍सक बीच पड़ए
सि‍नथीसि‍स तँ सि‍नथीसि‍स छी
अ, उ, मक वि‍चार करए।

आशा

खुशीक जि‍नगी बनबैत चलू
मगन भऽ जीबैत चलू
सोग ने सुधरए वचनसँ
रोग नइ उपदेशसँ
कर्तव्‍य कर्म तड़कस उठा
आशाक जि‍नगी बनबैत चलू
मगन भऽ जीबैत चलू
कण-कणसँ पहाड़ बनै छै
बुन्न-बुन्न सत् सागर
अणु-अणु सोग उपजाबए
कारी घटा बनि‍ बादर
सभ समैट अङेजति‍ चलू
मगन भऽ चलैत चलू।
दि‍न-राति‍क बीच संसार
ससरि‍-ससरि‍ ससरैत चलए
खने मेघौन खने उग्रास भऽ
पाबि‍-पाबि‍ चलैत चलए।
तीत-मीठक भेद भूला
पानि‍आे पानि‍ पीबैत चलू
मगन भऽ चलैत चलू।

आँखि‍

छलकि‍ आँखि‍ बादल तरंगि‍
कोन रचैता देखलनि‍ मोर
नि‍वस्‍त्र कऽ कय केलनि‍ सृजन
कानि‍ अखौंसी पोछए नोर
नाक नचए पहरि‍ नकौसी
चक्र टकड़ाबए चढ़ि‍-चढ़ि‍ सि‍र
केहेन भेल ई बीच मधुरक
सटि‍ गेल तौलाक बीचक हीर।
सदि‍खन दोहरी खेल रचि‍
रखलनि‍ सेहन्‍तगर नाओं
चेहरा-मोहरा काटि‍-छाटि‍
ठाढ़ भेल बनि‍-बनि‍ गाआें
सुनि‍ कान सनसना कुकि‍
पकड़ि‍ सुगंधि‍त बाट सु-आन
गुण दऽ गुणी बना-बना
कालचक्र संग गाबए गाण।।
रामदेव प्रसाद मण्‍डल ‘झारूदार’

झंडा गीत

झंडा तीरंगा सभसँ चंगा, छै दुनि‍याँमे ई बेमि‍शाल
एकर ऊँचाइ हीमगि‍री सन, छुइ नै सकल कि‍यो एकर भाल
अइमे सागरक गहराइ, पाइब नै सकल कि‍यो एकर पार
करतै जे कि‍यो एहन ढि‍ठाइ, नि‍श्चि‍त हेतै तेकर हार
हरा रंग छै जीवन हम्मर, कऽ रहलै झंडा एलान
हरा हमर छै बाग बगि‍चा, हरा हमर छै खेत खलि‍हान
रंग केशरि‍या गजब के पुरि‍या, ई खोललनि‍ रणवाँकुड़ा वीर
देखलनि‍ नै कि‍छु आगू-पाछू, रँइग देलनि‍ अपन सीना चीर
श्वेत रंग तँ दयावान छै, ई सच्‍चाइक पहि‍चान
नीत धरम धीरज के उपमा, अहीसँ छै भारतक शान
चक्र सि‍खबै छै हम सभकेँ, ठहरू नै सुनि‍ मि‍ठी बात
राह कठि‍न होइ चाहे कतनो, बढ़ु वि‍कासक पथपर दि‍न राति‍
सत्‍यमेव जयतेक अर्थ छै, सत्‍यक होइ छै हरदम जीत
सभकोइ पकरू सत्‍यक डोरी, एकरा मानू अपन मीत
लालच नै होइ मनमे ओहन सीमा पार होइ अप्‍पन राज
रहै अछुत अप्‍पन सीमा, तकरा खाति‍र कसु आवाज
शारनाथक अशोक स्‍तम्‍भसँ, लेलनि‍ हि‍न्‍दी तीन बाघ नि‍शान
ट्रि‍पुल शेर अहाँ हि‍न्‍द नि‍वासी, भरल रहै मन एतए शान
सि‍क्का नोट सरकारी पुस्‍तक, दस्‍तावेजपर शोभि‍त नि‍शान
समृद्ध छै प्रभुत्‍व हमर ई, सुना रहल दुनि‍याक गाण
दायाँ बैल और वायाँ घोड़ा, बीच वि‍राजैत चक्र नि‍शान
हाथ मि‍ला दुनू गाबै छै, जय जय जवान और जय जय कि‍सान
दया धरमकेँ ऐ धरतीपर, लेलनि‍ बुद्ध गाँधी अकार
गंगा यमुना कृष्‍णा कॉवेरी, बहै छै जतए पावन धार
जन-जनमे छै सच्‍ची श्रधा, जनता सेवक जतए नरेश
हजरत, तुलसी बालमि‍कीकेँ, गुइन्‍ज रहल घर घर अपदेश
जि‍नकर चरण पखारै सागर, हीमगि‍री जेकर ि‍सरमौर
हृदैमे जकड़ा पावण गंगा, जलै दीप सुज्ञानकेँ और जागु-जागु बाबू।


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बृषेश चन्द्र लाल
 
जीवन सपना
                 
किछु सपना एहन होइत अछि
ने छोडैत अछि ने जोडैत अछि ।
निन्नमे आबि मुदा देखू
नव आश जीवनमे कोरैत अछि ।।

 जौं टुटि जाइछ जीवनधारा
सपने जीवनकेँ ढोइत अछि ।
कहुँ लोरीसँ कहुँ होरीसँ
जीवनकेँ सपना धोइत अछि ।।

मगन प्रेममे सपनामे
कहुँ खिलखिल क' मुस्काइत छी ।
कहुँ डरसँ थरथर कनैत–कनैत
कहुँ तपमे खूब भफामइत छी ।।

सपना जीवन की जीवन सपना
ई भेद बड अछि भेदी भैया ।
ने एतए नाओ मझधार विकट
ने ओतए केओ अछि खेवैया ।।

 चलू सपनामे जीबू मनसँ
जीवन सपनेसन भ' जाओ ।
ई सुख दर्दकेर सागरमे
दुनू अपनेसन भ' जाओ ।।

ने भेद रहए सपनासँ जौँ
जीवन अनन्त भ' जाइत अछि ।
ने रहैछ तखन सीमा बन्धन ।
ई 'हम' दिगन्त बनि जाइत अछि ।।


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राम वि‍लास साहु


कवि‍ता/ हाइकू/ टनका

प्रेमक भूखल

हे उधो कि‍यो हरत दुख मोर
पएर पकड़ि‍ हम अहाँकेँ कहै छी
दुखक नै कोनो ओर
दि‍लक दुख हम कोना ककरो कहबै
श्‍याम बनल चि‍त्तचाेर
हे उधो कि‍यो हरत दुख मोर
चढ़ल यौवन उमरल सन दरि‍या
प्रेम वीरहसँ मन भेल मजबूर
थर-थर काँपए देह हमर
कलेजा भेल कमजोर
भरल यमुना लेलक कोर
आँखि‍यासँ बहए हमरा नोर
हे उधो कि‍यो हरत दुख मोर
डगर बहारि‍ हम अङना नि‍पलौं
मुरि‍-मुरि‍ देखैत चहु ओर
सोलह श्रृंगार सजि‍ बाट जोहै छी
बनसी धून सुनि‍ हम भेलौं वि‍भोर
कहि‍या भेटत श्‍याम चि‍त्तचाेर
हे उधो कि‍यो हरत दुख मोर
सभ गोपि‍यन प्रेमक भूखल
कन्‍हैया कि‍एक अछि‍ रूसल
प्रेम वीरहमे हम छी सुतल
सात जनम तक आस करब हम
कन्‍हैयासँ दि‍लक बात कहब हम
कोन कसूर भेल हमरासँ
जल्‍दीसँ कहि‍यौ कन्‍हैयासँ
वि‍नती सुनि‍यौ दुखक मोर
कन्‍हैया हरत दुख मोर
कहि‍या मि‍लत श्‍याम चि‍त्तचोर
हे उधो कि‍यो हरत दुख मोर।

(2) मरूआक मान
अन्नमे मरूआ बड़ अनमोल
रूपसँ कारी बड़ गुणकारी
उपजे ऊसर खेत मुदा हि‍तकारी
राजा रंक खाइतो लजाइ
गरीबक बचाबै प्राण
वि‍पत्ती समैमे मरूआ
अति‍थि‍ओकेँ राखए मान
मरूआक रोटी तोरीक तेल
नोन मरि‍चाइ चटनीसँ मेल
नहि‍ कोनो खर्चा खाइतो चर्चा
इचना, पाेठी माछक चटनी
संगे जे खाइ मरूआ रोटी
नहि‍ बनत रोगी मोटी
रक्‍तचाप, मधुमेह, जलोदर
भागल रहत देहसँ
कहि‍यो नहि‍ हएत कफ खांसी
मरूआ औषधि‍ गुणक खान
आदि‍कालसँ रखने अछि‍ मान
मरूआ होइत अछि‍ टि‍काउ
कोठीमे वर्षो तक रहए बन्‍द
सभ दि‍न होइत अछि‍ बि‍काउ
मरूआक खेती बड़ असान
अन्नमे मरूआक बड़ मान
सभ दि‍न राखए गरीबक मान।

हाइकू/ टंका
1
अति‍थि‍ सेवा/ देव धर्मसँ पैघ/ मधुर सेवा।
2
सभ दि‍न नै/ होइत छै समान/ राजा आ रंक।
3
अमृत पान/ जि‍नगी दैत अछि‍/ अमर दान।
4
मोरक पंख/ चमकै चटकि‍ली/ प्रेम जगाबै।
5
धनी बनब/ सभकेँ इच्‍छा अछि‍/ दीन कि‍एक नै।
6
चौबीस घंटा/ दि‍न राति‍ बनैत/ सात दि‍नक/ सप्‍ताह बनैत छै/ बारह मास वर्ष।
7
फूलक बाग/ सि‍ंचैत अछि‍ माली/ इन्‍द्र सि‍ंचैत/ धरती उपवन/ अन्न उपजै खेत।
8
टूटल दि‍ल/ प्रेमसँ जुटैत छै/ सूखल नदी/ जलसँ जि‍वैत छै/ क्षने आगू बढ़ै छै।
9
चहकै चि‍ड़ै/ वन-उपवनमे/ गमकै फूल/ वागमे झुलि‍-झुलि‍/ देखै चान हँसैत।
10
नेना-भुटका/ खेलै गुड़ि‍या खेल/ पानि‍सँ मेल/ जाि‍त भेद भुलि‍/ पढ़ै एकता पाठ।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.आशीष अनचिन्हार- दूटा गजल २.गंगेश गुंजन ३.सदरे आलम ’गौहर’
आशीष अनचिन्हार
गजल

देह केराक थंब सन गोर-नार लगैए
अड़हूलक फूल सन भकरार लगैए

 
नोर अँहाक तँ बेली-चमेली,गेंदा-गुलाब
मुदा हँसी तँ अँहाक सिंगरहार लगैए

 
मरनाइ तँ एकै होइ छै सभहँक लेल
लहासे सन तँ कटल कचनार लगैए

 
सीसोक सीस कटल,चऽहुक चऽहु टुटल
आमक नव पल्लव तँ अंगार लगैए

 
आम-जाम,कुम्हर-कदीमा,लताम-सरीफा
आब तँ जकरे देखू अनचिन्हार लगैए
अँहा तँ असगरें मे कानब मोन पाड़ि कए
करेजक बाकस के घाँटब मोन पाड़ि कए

 
आइ भने विछोह नीक लागि रहल अँहा के
काल्हि अहुरिआ काटि ताकब मोन पाड़ि कए

 
मिझरा गेलैक नीक-बेजाए दोगलपनी सँ
कहिओ एकरा अँहा छाँटब मोन पाड़ि कए

 
अँहा जते नुका सकब नुका लिअ भरिपोख
फेर तँ अँही एकरा बाँटब मोन पाड़ि कए

 
आइ जते फाड़बाक हुअए फाड़ि दिऔ अहाँ
मुदा फेर तँ इ अँही साटब मोन पाड़ि कए

(उपरका दुनू गजल बहर (सरल वार्णिक छन्द) मे अछि। पहिल गजलमे गाछ-बृच्छ सभक बिम्ब अद्भुत अछि।)


 
गंगेश गुंजन
किछु गजल सन अपन

  कवि भीमनाथ झा कें समर्पित ई कविता 
अक्षर  किएक भेल  निस्तेज
तेहनो तं नहि  भेल अछि एज
सद्यः जात   अतीत- स्मृति
मने  अछि    हरियरीक डेज़
मानल जे  जीवन  मे  अबैछ
ईहो  अनुभव  एहनो   फेज़
काल्हि रहल जे  सुपर  स्टार
लुप्त होइत  छैक तकरो क्रेज़
ओना अवश्य युगक यैह रंग
सब तरहें रफ्तार अछि तेज़
अनुभूतिके   चमक  संभव
कम भेलए ई  टुटल करेज
करय ओना अभिभूत एखनो
वैह सिंगार ओहने सुखसेज
खयलक नहि खयलक दुनू
पछताएबे जीवन  केर फेज़
आइ समाजक भय  सं भेंट
क’  रहलौंहें  तकरे   प्रेज़
गुंजन रहला  सतत विकल
बचब’  मे  बेकार   इमेज़   

२. कवि रामलोचन ठाकुर कें समर्पित
यत्लब्धम्  तत्लब्धम् दुनिया
एके रती  बेशी-कम दुनिया
क्यो कत्तहु  पूरय नहि जाय 
भने हकार पड़ल सबजनिया
कनियां बड़क बर बनल अछि
बड़ बनल कनियांकेर कनियां
पलंगक युग मे खाट  नेवाड़क
के चीन्हय चैकी  एक जनिया
पुरना  लोकक  करैत  उपेक्षा
नबका पीढ़ी अछि बड़  बढ़िया
बूढ़ि सासु कें  कतिया-धकिया
नवतुरिया  निचैन  नव कनिया
बेशी  तं    बरियात   भंगेरी
भंगपीबे  त्रिकाल   लोकनिया
ब्रह्मज्ञान  औकाति  पर उतरल
एहि बजार मे छथि सब बनिया
गंुजन  दुःख बेकार  करै  छी
ई संसार चलत  किछु  एहिना
३. कवि.पत्रकार अजित आज़ाद कें समर्पित 
अद्भुत हल्ला गुल्ला अछि
नेता गणक मोहल्ला  अछि
झुग्गी -झोपड़ी  यमुना  मे
हिनकर घर चरितल्ला अछि
टोपी तं पहिरथि नहि आब
भोटक मोन  बेलल्ला अछि
एहन समय एहि समाज मे
बापो-माय  तेहल्ला  अछि
मछहट्टाक विसाइन माहौल
की  संसद  मे हल्ला अछि
गंुजन  खेलनि तेना  शपथ
जनु पिन्टुक रसगुल्ला अछि


४. शेफालिका वर्मा जी कें समर्पित   
बात किछु तं ज़रूर गुमसुम छी
से थीक की बाजू  की   भेलय
अछि बूझल हमर पछिला खिस्सा
कोनो दोसर तं ने  शुरू  भेलय
केना हेराएल कते चुप छी उदास 
फेर कहियो क’ ओ नै  आएलए
जे भेल भेल से  बिसरी ने किए
ओ अतीतक  प्रसंग आब  किए
एहन व्यवस्थाक  समाजो सएह
घेंट काटय आ भभा क’  हंसए
देत के आजुक संसार मे  किछु
उन्टे  अहींक  जे  हड़पि   लैए
ई कोनो आब ने  उदासीक बात
बात जे  फेर ने  सस्नेह  लिखय
एतेक चलिक’ जीवनक  सफर
आब अंते मे ने  चलल  होइअए
सब गछल कें  करै  मे  पूरा
ध्यान नै गेल  लोक  की दैए
दैत जाएब  हरदम देबेक सुख
सेहो निसें   आब बुझल भेलए
एना उजड़ल-उपटल सन अहंक
छोड़ि  संसार ई के चलि गेलए
भेल बड़  बेर  राति  बीति रहल
आब की आओत ओ जे चलि गेलए
कोन चैबट्टी  पर  गंुजन  ठाढ़
बाट अपनो ने कएल तय होइअए


५.  प्रिय सकेतानंद कें समर्पित ई कविता

एक  बेर  फेर  सं जैतौं ओम्हरे
चैन जाहि बाट मे हेराएल तिम्हरे

ओ कतहु ठाढ़ हो एखनो ओहिना
  कहीं ताकि रहल  हो  हमरे

हमहूं निबाहि  ने सकलौं जकरा
ई कलेशो  तं हमर  अछि तकरे

कत’ कहांक याद आएल बसात
जाइ ओत्तहि आ श्वांस ली तकरे

ओना सिलेट पर  लीखल अक्षर
से मेटाएल  तं सेहो अछि तकरे 

बजा रहल छथि फेर अपना गाम
एक बेर गाम जं  जइतौं  हुनके
(ऐ गजल सभमे बहर/ छन्दक कमी अछि।)
 
सदरे आलम "गौहर"
व्याख्याता:-एस.एम.जे.कालेज खाजेडीह, ग्राम पो:- पुरसौलिया.मधुबनी
गजल
दाम एतय सभ चीजक देब' पड़ै छै।
अधिकारक लेल झग्गड़ क'र' पड़ै छै।

गज भरि जमीन जौँ कौरव नहि देब' चाहै।
पाँडव के फेर लोहा लेब' पड़ै छै।

कर्बला केर खिस्सा त' दुनिया जानै छै।
धर्मक खातिर शीश कटाब' पड़ै छै।

झग्गड़ झँझट मानलौँ नीक नहि होइ छै मुदा।
जीब' खातिर ईहो क'र' पड़ै छै।

"गौहर" साधु ब'न' लए चाहैत अछि मुदा।
दुर्जन केँ जे पाठ पढ़ाब' पड़ै छै।

(ऐ गजलमे बहर/ छन्दक कमी अछि।)

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
गजेन्द्र ठाकुर
       गजल
        

बाट तकैत दिन बीति जाएत बुझलिऐ
आस तकैत जिनगी बिताएत बुझलिऐ

 
आफन तोड़ब अहाँ सुनबै तखन की की
बीतत बेर उदासी कहाएत बुझलिऐ

 

ऊँह ई टीस उठल फेर वेदना सहै
छी
आदति बनल बनि बुझाएत बुझलिऐ

 
सहबाक शक्ति जे खतम भेल काल्हियेसँ
सम्वेदना अदौसँ जँ हराएत बुझलिऐ

 

 
गढ़ुआरि छी पहिने दर्द नै छल कनेको
दुख सहैक सुभावे कहाएत बुझलिऐ

 
करऽ पड़त मेहनति तिगुना कैक गुना
गोनरिपर बैसल सोचाएत बुझलिऐ

 
गभछब ऐ मालक जिरतिआ कहबैत
गोरहन्नी लऽ खपड़िआ गाएत बुझलिऐ

 
गतायात बन्न, भाव गोपलखत्ता गेलैए
गच्छ बना कऽ गोधियाँ बनाएत बुझलिऐ

ऐरावतक गोधिआँ बनत के असगर
हाथी-हेंज बिसरत हराएत बुझलिऐ

छोड़ि कऽ जे बिनु बजने जा रहल अछि
हृदै चिरैत आगि सुनगा रहल अछि

 
नीक लगै छल ओकर बोलक संगोर
जाइए आइ हृदैकेँ कना रहल अछि

 
नै बुझलिऐ ई एते बढ़ल अछि बात
देखल आइ जे ओ भँसिया रहल अछि

 
हमरासँ कते की माँगै छल रहरहाँ
जे जुमल ओ बिनु लेने जा रहल अछि

 
ओकर हाक्रोस हमर चुप्पी सुनै छल
बाजब से बिनु सुनने जा रहल अछि

 
ऐरावत पटा देलक अपन लहास
नेसुआ कऽ नेढ़िया सृष्टि खा रहल अछि

 

घिसियाइत सहसह करैत अधसर अबैए भगलो नै होइए
बात फुराइए घुरियाइए टनटनाइए मुदा बजलो नै होइए

 
जड़िआएल तहिआयल बात टोइआ दैत अछि दगधल मोनमे
बीझ काटि साफ केलक आ बिनु पढ़ने जाइए ओ रोकलो नै होइए

 
ककरा कहबै जे पतिआएत आइ ह्रिदै लगैए छै सीयल सभक
सभ बोल वचन उपरागो बिनु सुनेने जाइए सहलो नै होइए

 
घुरत नै देखेलक अपनैती अपन ओ घुमि रहल छी ऐ शून्यमे
अछि आँखिक झोँझक शून्य असगर हहराइए रहलो नै होइए

 
आफदी-आसमानी आएल अछि ऐमे के टोकत ठाढ़ होइले कहत
सभ मुँह सीयल शून्य-परिधि बढ़ैत देखाइए देखलो नै होइए

 
थितगर कौआठारि बनल छी ऐरावतक गत्र-गत्र सिहरै अछि
करजनी सन आँखि बिन बजने जे कहि जाइए सुनलो नै होइए
  

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जवाहर लाल कश्यप २.मनोज झा मुक्ति- गामक सावन
३.प्रभात राय भट्ट ४रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’
जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।
उद्वेलित केने अछि / एकटा प्रश्न 

उद्वेलित केने अछि
एकटा प्रश्न 
व्याकुल भेल अछि
हम्मर मोन
कलिकाल मे ठाढ हम
खोजि रहल छी
एकटा युद्धिष्ठिर के
जे सत्यवादी ,
तत्वदर्शी,
परमग्यानी हो ,
जे सक्छम हो 
जीवनक आलोचना मे 
हम यक्छ बनि
पुछि सकि एकटा प्रश्न
आखिर
 जीवनक नीयति की छै?     
मनोज झा मुक्ति

गामक सावन

हवा रे लऽ चल तों हमरा
मोनके गाम तु लऽजो ।
सावनमे झूला लगतै ना
देखाकऽ हमरा तों दऽजो ।।

देखाकऽ हमरा तों दऽजो
ओ, खेतक कादो आ रोपनी
आरिपर बैसर गिरहथवा
गजारैत खेतके हरबाहा
कोदारिसँ आरि–धूर बन्हैत
गवैत–झूमैत– रोपैत जनी
कखनो मेघके गरजन
कखनो टिपटिपाइत बुन्नी
देखैला तरसि रहल नैना
खेतक बादमे तों धऽजो ।
हवा रे लऽ चल तों हमरा
मोनके गाम तु लऽजो ।।

बितैत ओ नेनपन सावनमें
बनल पोखरि सब आँगनमें
भिजैत डोका बिछैछ ओ हूँज
केओ कागजक नाओके बहबैत
रातिमें बेंगक टरटों–टरटों
सुनैला मोन ई व्याकूल अछि
हमर ई कष्ट निदानकलेल
मोनके सँग उड़ाकऽजो ।
हवा रे लऽ चल तों हमरा
मोनके गाम तु लऽजो ।।

सावन त सगरो आएल छै
मूदा ओ दृश्य कतऽ भेटत ?
निकलैत सजि–धजिकऽ यूवती
लोढैला फूल संगीक संग
गुञ्जैत चहुदिस बटगवनी
देखैला दृश्य गामक ई
हमरापर कृपा तों कऽजो ।
हवा रे लऽ चल तों हमरा
मोनके गाम तु लऽजो ।।
 
३.
प्रभात राय भट्ट
 
बाबुजी छथि बड होसियार
हमर बाबुजी छथि  बड होसियार,
हुनका सन कियो नै बुधियार,
लेनदेनमे छथि ओ बड माहिर ,
भला अर्थ स: संसार चलैय,
ई बातों छै जग जाहिर,
हम कहैछी बी.ए.एम्.ए.पढ़दीय,
बाबु कहैछथि बस आब रहदीय,
आई.ए.पैढ़ लेलौ ई की कम अछि?
हम कोण पढ़ल लिखल ?
मुदा शिक्षा मंत्री बनल अछि,
पि.ए. स:सभटा काज कराबैछी,
साइनके जगह औठाछाप लगाबैछी,
काज करू एहन जैमे पाए नै लागे,
बैसल बैसल अपार धन सम्पति घर आबे,
बात हमर सुन बेट्टा,बन तहूँ हमरा सन नेता,
फेर देख जिन्दगी मे चमत्कार भजेतौं,
हमरा संग संग तोरो उधार भजेतौं,
जो मंदिर,मस्जिद मे आईग लग्बादे,
गिरजा घर,बौध गुम्बा पर डोजर चल्बादे
ई सब करिहे राईत के अन्हार मे,
दू चाईर गो हिन्दू के गिरादीहे ईनारमे,
फेर देख हिन्दू मुस्लिम मे लडाई भजेतई,
हमरा नेता सभक बड़का कमाई भजेतई,
भलेही मंदिर मस्जिद के आईग बुईझ जेतई,
मुदा धर्म मजहब केर आईग लागले रहतई,
अनेरो घुमैत रहिहे गामेगाम टोला टोला,
साथ वोकरे दिहे जेकर छै बोलबाला,
वोट बैंक बैढ़ जेतौं भजेबें तहूँ हमरा सन नेता,


२.६०१ सभासद महान
जे नै देखलौं कतय दुनियां मे
ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे
चोर डाका घुसल शिंहदरवार मे
लोकतान्त्रिक नेता क भेष मे
लूटपाट मे सभ लागल अछि
 देसक मालखजाना
भिखमंगा कह्बैय अपना के 
आब उच्च राजघराना 
साईकल जे चलबैछल बिनु ब्रेक के
ओ करैय लैंडक्रूजर के सवारी,
जे पेनहैछल फाटलपुरान अंगा
ओ पेन्हैय आब सुटसफारी
उज्जर केश रैंग करैय कारी
खाई मे जेकरा छल आफद चायपान
ओ बियर वार मे करैय मधुपान
गाम मे जेकर छल टुटलफूटल मकान
राजधानीमे बनौलक महल आलीशान
देखू यी चोर नेता सभक शान
सय मे अछि पचासी बेईमान
तैयो अछि ६०१ सभासद महान
जे नै देखलौं कतय दुनियां मे
ओ सभटा देखलौं नेपाल देस मे
दू वर्ष मे नै बनौलक संविधान
संविधानसभाक समय केलक अवसान
फेर एक वर्ष ललक अनुदान
ओकरो यी ६०१ केलक अपमान
फेर लेलक ३ महीनाक अनुदान
दिन बितल जाईय देखू
कहिया बनत संबिधान
गिद्ध जिका करैय सभ घिचातानी
नेता सभक पोषण मे
 देसक टाका बनल पानी
तिन पार्टी मे तेरह गुट
स्वार्थलोलुपतामे भेल फुट
करैय मे लागल अछि सभ ब्रम्ह्लुट
सावधान!! सावधान!! सावधान!!
भलेही तू नेता जो स्वार्थमे फुट
मुदा हम जनता अखनो अछी एकजुट
शाही तंत्र के हम जनता केलौं अंत
जुनी बुझिहें अपनाक बलबंत
जौं तिन महिनामे संविधान नै बनलौं
हेतौ ६०१ सभासद्क शर्मनाक अंत !!!

 
रामकृष्‍ण मण्‍डल ‘छोटू’
कवि‍ता

रेल

सकरीसँ चलल, ि‍नर्मलीक रेल
झंझारपुरमे, लेलक मेल
सुनबै छी, आइ ट्रेनक खेल
बीमे भाइकम, बोगीमे चोरी भेल
मंगलाक कपड़ा, आ पैइसो गेल

कि‍नका कहब नि‍क आ चारे
बोगीमे मचल अछि‍ शोर
चाेर-चारे-चाेर
पकड़ चाेर, पकड़ चोर
मुदा कत्त गेल चाेर

इंजनपर बैसल, तरकारीवाली
फटल य जि‍नकर साड़ी
बौगलीमे पैसा, मुँहमे पान
चलबैए तेज जुबान

कि‍ कहब, हि‍नकर कहानी
अपनाकेँ बुझैए राजधानी
जी.आर.पी आकि‍ सी.आर.पी
सभ छथि‍ एकरा आगू फेल
ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल।

आह! चोर आइ पकड़ा गेल
जेल उ भेजल गेल
खतम भऽ गेल, चोरीक खेल
मुदा, बेलहीमे फेर भाइकम भेल
रेल-रेल-रेल, ई कि‍?
बोगीमे य ठेलम-ठेल
बुदरूक, बच्‍चा, बुढ़बो गेल
ई य सकरीसँ ि‍नर्मलीक रेल। ‍

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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...