Saturday, August 13, 2011

'विदेह' ८८ म अंक १५ अगस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४४ अंक ८८)- PART I



                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ८८ म अंक गस्त २०११ (वर्ष ४ मास ४ अंक ८८)NEPALINDIA                          
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य






३. पद्य










३.६.नवीन कुमार आशा

३.७.डॉ॰ शशिधर कुमर 


४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण

 

५. गद्य-पद्य भारती: रवि भूषण पाठक निरालाःदेहविदेह -३ (निराला हिन्दीसँ मैथिलीमे)


  भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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१. संपादकीय

गजेन्द्र ठाकुर
[ अभिनय पाठशाला (रंगमंच आ फिल्म लेल)- विदेह नाट्य (आ फिल्म) उत्सव २०१२ क पूर्वपीठिका]
 (ऐ आलेखक आधार हमर तीन मासमे देल ४० टा संस्कृतमे अनूदित व्याख्यान अछि जे हम श्री अरविन्द आश्रममे ओड़ीसाक प्राइमरी स्कूल लेल चयनित शिक्षक-शिक्षिका प्रशिक्षुकेँ देने रही। हम जतेक हुनका सभकेँ पढ़ेलौं, तइसँ बेसी हुनका सभसँ सिखलौं। ओ सभ आब ओड़ीसाक सुदूर क्षेत्रमे पढ़ा रहल छथि। ई अलेख हुनके लोकनिकेँ समर्पित अछि।-–गजेन्द्र ठाकुर)
अभिनय की अछि ? बच्चा सभ अपन समान पसारि किछु-ने-किछु काज करिते रहैत अछि। हमर बेटी फुसियाहींक चाह बनबैत अछि आ हमरा दैत अछि। हम सेहो ओकरा फुसियांहीक घुट-घुट पी जाइ छी। मुदा फेर ओ असली सूप अनैए, हम काज कऽ रहल छी, हम बिन मुँह घुमेने घुट-घुट चाह पीबाक अभिनय करै छी, मुदा बेटी कहैए, “ई असली छी”। हमर भक टूटैए आ हम असली दुनियाँमे आबि जाइ छी।
बच्चा नाटकसँ शिक्षा लैए, लोककेँ आ वातावरणकेँ बुझबाक प्रयास करैए।
 तखन मन्दिरक उत्सव आ राजाक प्रासादमे होइबला नाटक स्वतंत्र भऽ गेल आ एकर उपयोग वा अनुप्रयोग दोसर विषयकेँ पढ़ेबामे सेहो होमए लागल। दोसर विषयक विशेषज्ञक सहभागिता आवश्यक भऽ गेल। स्वतंत्र रूपेँ सेहो ई विषय अछि आ एकर अनुप्रयोग सेहो कएल जाइत अछि। पारम्परिक नाटक पेशेवर नाटकसँ जुड़त, उदाहरण स्वरूप कएल गेल नाटक, मंचक साजसज्जा, आ असल नाटकक मंचन रंगमंचक इतिहास बनत। मुदा ऐ सँ पहिने रंगमंचक प्रारम्भिक ज्ञानक संग नाटक पढ़बाक आदतिक विकसित भेनाइ सेहो आवश्यक अछि। आ से पढ़बा काल एकर मंच प्रबन्धन आ अभिनयक दृष्टिसँ विश्लेषण सेहो आवश्यक अछि।
 राजनैतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक घटनाक्रमक जानकारी सम्बन्धित प्रस्तुतिक सन्दर्भमे देब आवश्यक होइत अछि। भरतक नाट्यशास्त्रक अतिरिक्त कालिदास, भास आ शूद्रकक नाटकक परिचय सेहो आवश्यक।
रंगमंचसँ जुड़ल लोककेँ लिटल आ ग्रेट ट्रेडिशन, दुनूक अनुभव आ जानकारी हेबाक चाही।
बच्चा नाटक आ रंगमंचसँ जुड़त तँ जिम्मेवार नागरिक बनत, आर्थिक रूपेँ आत्म-निर्भर बनत आ सक्रिय नागरिक सेहो बनत।
 २
चैतन्य महाप्रभुकेँ जात्राक संगीत आ नृत्य युक्त वीथी मंचनक प्रयोग संदेशक प्रसार लेल केलन्हि।
नाट्य शास्त्रमे वर्णन अछि जे नाटकक उत्पत्ति इन्द्रक ध्वजा उत्सवसँ भेल। नाट्य शास्त्र नाटककेँ दू प्रकारमे १.अमृत मंथन आ २.शिवक त्रिपुरदाह, मानैत अछि। एहेन लगभग दस टा दृश्य वा रूपकक प्रकार भरत लग छलन्हि (दशरूपक) आ ओइमे नृत्य, संगीत आ अभिनय सम्मिलित छल; आ ऐ दशरूपकक अतिरिक्त श्रव्य गीत सभ छल।
 पाँचम शताब्दी ई. पू. मे पाणिनी शिलालिन् आ कृशाश्वक चर्चा करै छथि जे नट सूत्रक संकलन केने रहथि। नट माने अभिनेता आ रंग माने रंगमंच। नटक पर्यायवाची होइत अछि, भरत, शिलालिन् आ कृशाश्व!

मैथिली नाटक जे आइ धरि मात्र नृत्य-संगीतसँ बेशी आ चित्रकला आ दस्तकारीसँ मामूली रूपसँ जुड़ल छल, से आब भौतिकी, जीव विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आ साहित्यसँ सेहो जुड़ए, तकर प्रयास हेबाक चाही।
 ३
अभिनय पाठशाला:
विभिन्न औजारकेँ पकड़बाक आ चलेबाक विधि: ओकर ग्रीसिंग आदि केनाइ, ओकरा सुरखित रखनाइ सिखाउ। घरकेँ कोना साफ राखी, साफ आ अव्यवस्थित घरमे अन्तर, कोन चीजकेँ बेर-बेर साफ करऽ पड़ैए, कोनकेँ नै से सिखाउ। कनियाँ-पुतराक निर्माण, तार, फाटल-पुरान कपड़ा, टूटल चूड़ी/ गहना, पुरान साड़ी, रुइया आदिसँ मुँह, आँखि आदिक चित्रण होइत अछि। शरीरक चमड़ा लेल प्लास्टिक आदि वा कपड़ापर रंगक परत लगाउ। ऊन आदिसँ केस बनाएब, वीर, योद्धा आदि बनबैले तलवार लेल काठी आ पैघ जुत्ता, आ फेर मजदूर गुड़िया आदि बनेनाइ सिखाउ। माने सभ तरहक पात्रक निर्माण।
मवेशी पन्हेनाइ, दूध दुहनाइ, लथारसँ बचबाक अभिनय, दही पौरनाइ, लस्सी घोटनाइ, आँखि आ हाथक मिलान ई सभ काल्पनिक रूपेँ सिखाउ। खेल जेना करिया झुम्मरि आदिक परिचय दियौ।
कागचक नाव आ हवाइ जहाज बनेनाइ आ रेखाचित्र बनेनाइ सिखाउ। लिखलकेँ बुझबाक आ विषयकेँ बुझबाक तरीका अछि रंगमंच।
अभिनय- चलनाइ, चलनाइ सेहो कएक प्रकारक होइत अछि, हड़बरा कऽ चलनाइ, कोनो बोझ, कोदारि आदि उठा कऽ चलनाइ, जोशमे, दुखमे चालि आ थाकल ठेहिआयल चालि, नेङरा कऽ चलनाइ, भेड़ चालि, नारा लगबैत चलब, दू-तीन टा संगीक संग चलब, ई सभ बच्चा वा प्रौढ़ अभिनेताकेँ नीक जकाँ सिखाउ। स्पर्श:- गरम वस्तु छूनाइ, ठंढ़ा छूब, कड़गर आ मोलायम वस्तु छूब, फ़ेर तकर प्रतिक्रिया, भय-आसक्ति-तामस-लाज-नै करए बला भाव, जिद्द, दुःख, हँसी (खीखीसँ मुँह बन्न कऽ हँसबा धरि), देखनाइ खुशीसँ, आश्चर्यसँ, विभिन्न प्रकारक दृश्यपर प्रतिक्रिया सेहो देखेबाक आवश्यकता अछि। बजार, स्कूल, घर, सभा आदि कार्य, स्मरण शक्ति, शब्दावली, ध्यान, व्यक्तित्व, क्षमता, विचारधारा, स्वाभिमान, इच्छा, शारीरिक विश्वास प्रदर्शन, उत्साह, स्त्री-पुरुष विमर्श, मनोविज्ञान, कविता, गद्य, गीत, कथा आ प्रहेलिकाक समावेश, तकर स्मरण आ वाचन ऐ सभपर ध्यान देब आवश्यक अछि। अंग प्रचालन, नृत्य, संगीत, हस्त संचालन, कसरत (सम्मिलित रूपेँ), हवाक झोंकाक भीतर आएब, ऐ सँ खिड़की खुजब किछु माथपर खसब आदिक काल्पनिक अनुभव, ऐ सभक अनुभव बच्चा सभकेँ कराउ। वातावरण, गति, रूप, आकार-प्रकारक अनुभव। अपनसँ अलग प्रकारक व्यक्तित्वक अभिनय, ध्वनि आ दृश्यक संबंध आ दुनूक संगे-संग पुनरावृत्ति, वास्तविक आ काल्पनिक दुनूक मंचन, कोनो विषयपर वार्तालाप, किताब, अखबार, वृत्तचित्रक विषय, तात्कालिक विषय, जबरदस्ती यादि कराएब गलत मुदा सुनि-सुनि कऽ मोन राखब नीक। खेल- दूटा दल बना कऽ अभिनय, दल बना कऽ सेहो, एक दल सुतत, दोसर दल नढ़िया/ कौआ बनि उठाएत,श्लोक आदिक समवेत पाठ, ई सभ अभ्यास कराउ।
वर्कशॉपमे:- -किनको कोनो काजमे दिक्कत होइन्ह तँ दोसरकेँ ओकर सहायता लेल कहू,  -ककरो सुझावपर आपसमे सलाह लिअ आ मिल कऽ विचार करू, क्षमता अनुसारे काज दियौ, जे नीकसँ काज केलनि तकरा प्रशंसा सेहो भेटबाक चाही, मीठ बाजब सिखाउ, सही बाजब सिखाउ, बजबासँ पहिने अपन बेर अएबा धरि रुकू, निर्देशक पालन करू, बौस्तुकेँ बाँटि कऽ आ मिल कऽ प्रयोग केनाइ सिखाउ, कर्तव्यक बोध कराउ, जिम्मेवारी दियौ, सामूहिक कार्यमे भाग लिअ, अन्य सामाजिक व्यवहार अपनाउ, अवलोकन आ श्रवण द्वारा सम्भाषण आ अभिनय सिखाउ, अनुकरण द्वारा अभिनय सिखाउ, कोनो चीज दोहरा कऽ अभिनय सिखाउ, प्रशंसा/ प्रोत्साहनसँ सिखाउ, मनोरंजन आ आनन्दयुक्त वातावरण बनेने रहू, नमगर व्याख्यान नै दियौ, उदाहरण, अभ्यास आ प्रोत्साहन बेशी कारगर हएत (भाषणक बदला), दण्डसँ बचू, दू बच्चाक तुलनासँ बचू, कोनो बच्चाकेँ दोसर बच्चाक नजरिमे नै खसाउ, बाहरी लोकसँ बच्चा सभक भेँट करबाउ, त्योहार/ उत्सव संग मिल मनाउ, मिलि जुलि कतौ घुमैले जाउ, स्नेहसँ देखू/ मुस्की दियौ/ माथ हिला कऽ समर्थन करू/ पीठ ठोकू/ माता-पिताकेँ ओकर प्रशंसा करू/ मुदा बेर-बेर ओकर प्रशंसा ओकर सोझाँमे नै करू/ चॉकलेट आदिक लालच नै दियौ/ कोनो एहेन चीज नै गछि लिअ जे अहाँ पूर्ण नै कऽ सकी। पाँचसँ कम उमेरक बच्चाकेँ गलतीक कारण नै बताउ- ओतेक बुद्धि ओइ उमेरमे नै होइ छै। मुँहसँ/ इशारासँ, आवाज आ मुँह हिला कऽ गलती करबासँ रोकू, आवश्यकता हुअए तँ छोट-मोट दण्ड, पाँचसँ बेशी उमेरक बच्चाकेँ दियौ, मुदा ओकरा मारियौ नै, लज्जित नै करियौ/ शिकाइत नै करियौ, निर्णय लेबाक आदति दियौ, भागेदारीक सुखक अनुभव कराउ, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सिखबियौ, आत्मनिर्भर भेनाइ सिखबियौ, स्वभावक विषयमे बतबियौ, बात करबाक कला, आपसक सम्बन्ध, सार्वजनिक सम्पत्तिक आदर केनाइ सिखबियौ, पर्यावरणक ध्यान रखनाइ सिखबियौ, भावनाकेँ ठेस नै पहुँचबियौ, प्रश्न करबाक कला सिखबियौ, जीवनक नायक केहेन हेबाक चाही से बतबियौ, आत्मशक्तिक शक्तिक वर्णन करू, अपन गामकेँ बूझब सिखबियौ, धर्म-राजनीतिक-जातिक गुत्थी बुझबियौ।
अभिनयक पाठशालाक कार्यशाला लेल आवश्यक तत्व:
-शारीरिक आ अभिनय क्षमताक विश्लेषण/ शरीर रचना शास्त्रक ज्ञान/ नाटकक समाजशास्त्रीय दृष्टिसँ भेद/ नाट्य मंचनक जीबाक साधनसँ रहल जुड़ाव आ प्रभाव/ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आ राजनैतिक वातावरणक अध्ययनक दृष्टिसँ नाट्य मंचक प्रकारक सम्बन्ध, सिखबाक आ बुझबाक कलाक विकास, कोनो अवधारणाकेँ बनेनाइ आ ओकरा बुझि कऽ मंचन केनाइ, अभिनय लेल चलबाक आ बजबाक अभ्यास आ नाटक संस्कृतिक अंग बनि जाए तकर प्रयास, इतिहासक कालखण्ड आ ओइ कालखण्ड सभक नाटकक परिचय, तखुनका कालकेँ मंचपर स्थापित करब आ ऐ लेल इतिहास, भूगोल आ सामाजिक, सांस्कृतिक, रजनैतिक, आर्थिक अवस्थाक परिचय कराउ। पेशागत रंगकर्मक अवलोकनसँ मंचक पाछाँ होइबला काजक विषयमे जानकारी भेटत। नाटकक कालखण्डक अनुरूप मंच आ पहिराबाक अध्ययन, विभिन्न कालखण्डक नाटकक रेकॉर्डिंग वा मंचनकेँ जा कऽ देखबाक आवश्यकता आ ओइ कालक फोटो, चित्रकला आ आन सूचनाक संकलन। संगीत-नाटक अकादेमी, दिल्लीमे ढेर रास डोक्यूमेन्ट्री देखबा लेल आ ढेर रास सान्द्र मुद्रिका किनबा लेल उपलब्ध अछि।
कोलकातामे १८५० ई.क आसपास आधुनिक रंगमंच- ब्रिटिश क्लबमे शुरू भेल, मुदा बाहरी लोकक प्रवेश ओतए नै छलै। जात्रा आधारपर- विद्यासुन्दर (प्रेमी-प्रेमिकाक कथा)- बांग्ला खेलाएल जाइ छल, भारतेन्दु सेहो रासलीलाक आधारपर लिखलन्हि। विष्णुदास भावे- सीता स्वयंवर (१८४३ई.), मराठीमे यक्षगण (कर्णाटक)क आधारपर एकटा प्रयोग छल। हबीब तनवीर- नजीर कविपर- आगरा बाजार आ मृच्छकटिकम् (शूद्रकक संस्कृत नाटकक हिन्दीमे), शम्भु मित्र, बी.वी.कारन्थ, के.एन.पणिक्कर, रतन थियाम (चक्रयुध- अभिमन्यु कथापर, गीत-नृत्य आधारित, किछु लोक एकरा बैले बुझलन्हि।), पणिक्कर आ कारन्थ स्वर आ बोलक प्रयोग केलन्हि। कारन्थ-आलापक सेहो प्रयोग केलन्हि। १९५६ ई. संगीत-नाटक अकादेमी द्वारा प्रथम राष्ट्रीय नाट्य उत्सव- कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् (संस्कृत) सँ उत्सवक प्रारम्भ- गोवा ब्राह्मण सभा द्वारा। पणिक्करक मध्यम व्यायोग- भास (संस्कृत) आ थियाम- भास उरुमुगम (मणिपुरी) केलथि जइमे कलाकार नृत्यशैलीमे आस्तेसँ आबथि आ जाथि।
 विजय तेन्दुलकरक घासीराम कोतवाल, जकर आधार छल नाना फड़णवीस आ दोसर पुणेक भ्रष्ट ब्राह्मण (दशावतार आधारित पारम्परिक शैलीमे),आ शान्तत- कोर्ट चालू आहे; गिरीश कर्णाडक हयवदन (कथासरित्सागर- यक्षगण आधारित); मोहन राकेशक आषाढ़ का एक दिन, शम्भू मित्र- डायरेक्टर- रवीन्द्रनाथ, इब्सेन (डॉल्स हाउस), उत्पल दत्त- कल्लोल (तरंगक ध्वनि) ई सभ आधुनिक रंगमंचकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि।
पारसी रंगमंच:- मुम्बइक आर्थिक रूपेँ सम्पन्न पारसी समुदायक, एकरा हाइब्रिड (वर्णशंकर वा मिश्र) रंगमंच कहल जाइत अछि। १८५३ ई. मे एकर प्रारम्भ भेल। १९४० ई .धरि ई नीक-नहाँति चलैत रहल। सिनेमाक आगमनक बाद एकर मृत्यु भऽ गेल। एकरासँ जुड़ल लोक सिनेमाक क्षेत्रमे चलि गेलाह। पारसी नाटकक किछु प्रसिद्ध नाटक जेना इन्दर सभा, आलम आरा आ खोन्ने नहाक (सेक्सपियरक हेमलेट आधारित) सिनेमा बनि सेहो प्रस्तुत भेल।
विषय वस्तु: पारसी नाटकक विषय-वस्तु महाकाव्य आ पुराण आधारित छल। एकर विषय ऐतिहासिक आ सामाजिक छल। सभ बेर पर्दा खसबाक बाद हास्य कणिका खेलाएल जाइत छल। देश-विदेशमे पारसी थियेटरक प्रदर्शन होइत छल।रोमांच आ रहस्य एकर मुख्य अंग छल। चित्रित पर्दाक प्रयोग होइ छल। पर्दा कोनो रहस्य एलापर खसै छल। दर्शकक मांगपर रिटेक सेहो भऽ जाइ छलै आ ई रिटेक कोनो दृश्य वा कोनो गीतक पुनः प्रस्तुतिक रूपमे होइ छल, आ तइ लेल पर्दा फेरसँ उठि जाइ छलै। राजा रवि वर्मा आ पारसी थियेटर दुनू एक दोसरासँ प्रभावित छलाह। पारसी थियेटरक कलाकारक पहिराबा आ मंच सज्जापर राजा रवि वर्माक चित्रकलाक प्रभाव छल आ राजा रवि वर्मा अपन चित्रकलाक विषयक प्रेरणा पारसी थियेटरक दृश्यसँ ग्रहण करैत छलाह।
भरतक नाट्यशास्त्र:
नाटक दू प्रकारक लोकधर्मी आ नाट्यधर्मी, लोकधर्मी भेल ग्राम्य आ नाट्यधर्मी भेल शास्त्रीय उक्ति। ग्राम्य माने भेल कृत्रिमताक अवहेलना मुदा अज्ञानतावश किछु गोटे एकरा गाममे होइबला नाटक बुझै छथि। लोकधर्मीमे स्वभावक अभिनयमे प्रधानता रहैत अछि, लोकक क्रियाक प्रधानता रहैत अछि, सरल आंगिक प्रदर्शन होइत अछि, आ ऐ मे पात्रक से ओ स्त्री हुअए वा पुरुष, तकर संख्या बड्ड बेसी रहैत अछि। नाट्यधर्मीमे वाणी मोने-मोन, संकेतसँ, आकाशवाणी इत्यादि; नृत्यक समावेश, वाक्यमे विलक्षणता, रागबला संगीत, आ साधारण पात्रक अलाबे दिव्य पात्र सेहो रहै छथि। कोनो निर्जीव/ वा जन्तु सेहो संवाद करऽ लगैए, एक पात्रक डबल-ट्रिपल रोल, सुख दुखक आवेग संगीतक माध्यमसँ बढ़ाओल जाइत अछि।
नाट्यधर्मक आधार अछि लोकधर्म। लोकधर्मीकेँ परिष्कृत करू आ ओ नाट्यधर्मी भऽ जाएत।
लोकधर्मीक दू प्रकारक- चित्तवृत्यर्पिका (आन्तरिक सुख-दुख) आ बाह्यवस्त्वनुकारिणी (बाह्य- पोखरि, कमलदह)। नाट्यधर्मी-सेहो दू प्रकारक कैशिकी शोभा (अंगक प्रदर्शन- विलासिता गीत-नृत्य-संगीत) आ अंशोपजीवनी (पुष्पक विमान, पहाड़ बोन आदिक सांकेतिक प्रदर्शन)।
सम्पूर्ण अभिनय- आंगिक (अंगसँ), वाचिक(वाणीसँ), सात्विक(मोनक भावसँ) आ आहार्य (दृश्य आदिक कल्पना साज-सज्जा आधारित)। आंगिक अभिनय- शरीर, मुख आ चेष्टासँ; वाचिक अभिनय- देव, भूपाल, अनार्य आ जन्तु-चिड़ैक भाषामे; सात्विक- स्तम्भ(हर्ष, भय, शोक), स्वेद (स्तम्भक भाव दबबैले माथ नोचऽ लागब आदि), रोमंच (सात्विकक कारण देह भुकुटनाइ आदि), स्वरभंग ( वाणीक भारी भेनाइ, आँखिमे नोर एनाइ), वेपथु (देह थरथरेनाइ आदि), वैवर्ण्य (मुँह पीयर पड़नाइ), अश्रु (नोर ढ़ब-ढ़ब खसनाइ, बेर-बेर आदि), प्रलय (शवासन आदि द्वारा); आ आहार्य- पुस्त (हाथी, बाघ, पहाड़ आदिक मंचपर स्थापन), अलंकार (वस्त्र-अलंकरण), अंगरचना (रंग, मोंछ, वेश आ केश), संजीव (बिना पएर-साँप, दू पएर-मनुक्ख आ चिड़ै आ चारि पएरबला-जन्तु जीव-जन्तुक प्रस्तुति)द्वारा होइत अछि।
 दूटा आर अभिनय- सामान्य (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय) आ चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र २२म अध्याय): चतुर्विध अभिनयक बाद सामान्य अभिनयक वर्णन, ई आंगिक, वाचिक आ सात्विक अभिनयक समन्वित रूप अछि आ ऐ मे सात्विक अभिनयक प्रधानता रहैत अछि। चित्राभिनय आंगिकसँ सम्बद्ध- अंगक माध्यसँ चित्र बना कऽ पहाड़, पोखरि चिड़ै आदिक अभिनय विधान।
 नाट्य-मंचन आ अभिनय: कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाट्य निर्देशकक लेल पठनीय नाटक अछि। रंगमंच निर्देश, जेना, रथ वेगं निरूप्य,  सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं, इति शरसंधानम् नाटयति, वृक्ष सेचनम् रुपयति, कलशम् अवरजायति, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति, शकुन्तला परिहरति नाट्येन, नाट्येन प्रसाधयतः, कहि कऽ वास्तविकतामे नै वरन् अभिनयसँ ई कएल जाइत अछि। नाट्येन प्रसाधयतः, एतए अनसूया आ प्रियम्वदा मुद्रासँ अपन सखी शकुन्तलाक प्रसाधन करै छथि कारण से चाहे तँ उपलब्ध नै अछि, चाहे तँ ओतेक पलखति नै अछि। तहिना वृक्ष सेचनम् रुपयति सँ गाछमे पानि पटेबाक अभिनय, कलशम् अवरजायति सँ कलश खाली करबाक काल्पनिक निर्देश, रथ वेगं निरूप्य सँ तेज गतिसँ रथमे यात्राक अभिनय, इति शरसंधानम् नाटयति सँ तीरकेँ धनुषपर चढ़ेबाक निर्णय, सूत पश्यैनं व्यापाद्यमानं सँ हरिणकेँ मारि खसेबाक दृश्य देखबाक निर्देश, मुखमस्याः समुन्नमयितुमिच्छति सँ दुश्यन्तक शकुन्तलाक मुँहकेँ उठेबाक इच्छा, शकुन्तला परिहरति नाट्येन सँ शकुन्तला द्वारा दुश्यन्तक ऐ प्रयासकेँ रोकबाक अभिनयक निर्देश होइत अछि।
भरतक रंगमंच: ऐ मे होइत अछि- पाछाँक पर्दा, नेपथ्य (मेकप रूम बुझू), आगमन आ निर्गमनक दरबज्जा, विशेष पर्दा जे आगमन आ निर्गमन स्थलकेँ झाँपैत अछि, वेदिका- रंगमंचक बीचमे वादन-दल लेल बनाओल जाइत अछि, रंगशीर्ष- पाछाँक रंगमंच स्थल; मत्तवर्णी-आगाँ दिस दुनू कोणपर अभिनय लेल होइत अछि आ रंगपीठ अछि सोझाँक मुख्य अभिनय स्थल।
अभिनय मूल्यांकन: अध्याय २७ मे भरत सफलताकेँ लक्ष्य बतबै छथि, मंचन सफलतासँ पूर्ण हुअए। दर्शक कहैए, हँ, बाह, कतेक दुखद अन्त, तँ तेहने दर्शक भेलाह सहृदय, भरतक शब्दमे, से ओ नाटककार आ ओकर पात्रक संग एक भऽ जाइत छथि।
 नाट्य प्रतियोगिता होइत छल आ ओतए निर्णायक लोकनि पुरस्कार सेहो दै छलाह।
भरत निर्णायक लोकनि द्वारा धनात्मक आ ऋणात्मक अंक देबाक मानदण्डक निर्धारण करैत कहै छथि जे-
१.ध्यानमे कमी, २.दोसर पात्रक सम्वाद बाजब, ३.पात्रक अनुरूप व्यक्तित्व नै हएब, ४.स्मरणमे कमी, ५.पात्रक अभिनयसँ हटि कऽ दोसर रूप धऽ लेब, ६.कोनो वस्तु, पदार्थ खसि पड़ब, ७.बजबा काल लटपटाएब, ८.व्याकरण वा आन दोष, ९.निष्पादनमे कमी, १०.संगीतमे दोष, ११.वाक् मे दोष, १२.दूरदर्शितामे कमी, १३.सामिग्रीमे कमी, १४.मेकप मे कमी, १५. नाटककार वा निर्देशक द्वारा कोनो दोसर नाटकक अंश घोसियाएब, १६.नाटकक भाषा सरल आ साफ नै हएब, ई सभ अभिनय आ मंचनक दोष भेल।
निर्णायक सभ क्षेत्रसँ होथि, निरपेक्ष होथि। नाटकक सम्पूर्ण प्रभाव, तारतम्य, विभिन्न गुणक अनुपात, आ भावनात्मक निरूपण ध्यानमे राखल जाए।
स्टेजक मैनेजर- सूत्रधार- आ ओकर सहायक –परिपार्श्वक- नाटकक सभ क्षेत्रक ज्ञाता होथि। मुख्य अभिनेत्री संगीत आ नाटकमे निपुण होथि, मुख्य अभिनेता- नायक- अपन क्षमतासँ नाटककेँ सफल बनबै छथि।अभिनेता- नट- क चयन एना करू, जँ छोट कदकाठीक छथि तँ वाणवीर लेल, पातर-दुब्बर होथि तँ नोकर, बकथोथीमे माहिर होथि तँ बिपटा, ऐ तरहेँ पात्रक अभिनेताक निर्धारण करू। संगीत-दलक मुखिया- तौरिक- केँ संगीतक सभ पक्षक ज्ञान हेबाक चाही जइसँ ओ बाजा बजेनहार- कुशीलव- केँ निर्देशित कऽ सकथि।
मैथिली नाटक: बड्ड रास भाषण मैथिली आ आन नाटकक प्राचीनसँ आधुनिक काल धरि रहल तारतम्यक विषयमे देल गेल अछि। मुदा सत्य यएह अछि जे भारत वा नेपालक कोनो कोणमे रंगमंच आ रूपकक निर्देश भरतक नाट्यशास्त्रक अनुरूपेँ उपलब्ध नै अछि, ओकर पुनः स्थापन भरिगर काज तँ अछिये, मुदा प्रयास नै भेल सेहो नै अछि। बिनु ज्ञानक कालिदासक नाटकक लघुरूप भयंकर विवाद उत्पन्न करैत अछि। लोक नाट्यक नाट्यशास्त्रक अनुरूप निरूपण कऽ उपरूपकक मंचनक सम्भावना मैथिलीमे अछि। विदेह नाट्य (आ फिल्म) उत्सव २०१२ ऐ दिशामे एकटा प्रयास अछि।


गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 

http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

 

२. गद्य





 बिपिन झा

 [एहि लेख केर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) क रहल छथि। ]

यात्राक किछु प्रश्न
बिपिन कुमार झा
रिसर्च स्कालर
आई0आई0टी0 मुम्बई

चौसठम स्वाधीनता दिवस। ई चौसठ वर्षक स्वाधीनताक युवा कही अथवा वृद्ध, उत्साहवान कही अथवा थाकल एकटा यक्ष प्रश्न अछि।
राष्ट्रक एकटा आँखि आशावादी भविष्यक तेज सँ युक्त पर दोसर निराशाजनक वर्तमान सं मुरझायल। एहि तरहक संयोग कालचक्रक इतिहास मे अनुपम अछि।
चौसठवर्षक यात्रा क पिटारी उपलब्धि सँ भरल पड़ल अछि एहि मे कोनो दूमत नहि मुदा जेहितरहक व्यवस्था आई लोकतंत्रक चादर ओढ़ने संविधान कऽ आड़ लय बैसल अछि ओ निरंतर प्रबुद्ध समाज केय झकझोरवाक हेतु पर्याप्त छैक।
वर्तमान समयक अनेक प्रश्नक उत्तर हेतु प्रयासरत अछि। पहिल ई जे अपन राष्ट्र के गन्तव्य की थीक? दोसर ई जें राष्ट्रक निर्मल आत्मा भ्रष्टकार्य तंत्र सँ तखन धरि तक संघर्ष करत। दूनूमे के जीतत अथवा पराजित होयत?
अपन राष्ट्र ई सुदीर्घ यात्रा मे जो चौराहा पर ठार अछि जयत सँ उत्कर्ष, अपकर्ष, विकास, विनाश सभ दिशा लेल रास्ता फुटैत अछि। नीति नियन्ता वा प्रबुद्ध समाज कोन मार्गक चयन करैत छाथि ई वर्तमान सदीक हेतु लेल गेल सभसँ महत्वपूर्ण निर्णय रहत।
निराशा क अन्धकार मे आशा कऽ लुपलुपैत डिबिया बुझल नहि अछि अतः आशा ‘‘बलवती राजन’’ मुदा हाथ पर हाथ धरिकय बैसैक कोनो अर्थ नाहि।
प्रबुद्ध समाज हेतु इस समय आत्मचिन्तनक थीक। हुनक ई कर्तव्य छी जे एहि समय अपन भूमिका चिन्हथि यदि ई समय भटकि गेलाह त ई राष्ट्रक लेल दूर्भाग्यजनक होयत।


स्वतंत्रता दिवसक हार्दिक शुभकामना।
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्‍डल

हमर टोल
उपन्‍यास
गतांशसँ आगू....

सुनमसान बाधमे असगरे पीपरक गाछ। कोनो बटोहीकेँ छाँह देबाक लेल ठाढ़ छै। कतेको दि‍नसँ छै। कि‍न्‍तु आइ उ गाछ नै छै जे पहि‍ने रहए। ओइसँ की? गामक सीमानक नि‍रलय तँ गाछे करतै। एकरे धोधहैरमे बैस कऽ प्रेत बोमि‍येतै आ डेरबुक लोक एक कोला हटि‍ कऽ चकोना हैत पड़ैतै। बुधि‍यार लोक सात बेर गोर लागि‍ छाँहमे जि‍रेतै। कौआ जँ छेर दइ तँ तुरत्ते उठि‍ कऽ चलि‍ देतै। असगुन भेलौ भाग....। असगरमे फुनगी दि‍स तकबाक साहस केनाइ बुड़बक सबहक काज छि‍ऐ।

दूबज्‍जी गाड़ीक सीटी ऐ गाछ लग ठाेकले चलि‍ अबै छै। अजय गाछक छाँहमे ठाढ़ भेल। तीन बरि‍सक बाद गाछकेँ देख रहल छै। गामक लोग! कहुना कॉलेजक पढ़ाइ पूरा केलक। बी.ए. पास केनाइ कोनो मामूली गप्‍प छि‍ऐ! छाँहक बात मानि‍ ओ रूखगर जगहपर भि‍नभि‍नाइत बैस गेल।

सबचीज ओहि‍ना छै। तैयो बदलि‍ गेलै। बहुत दि‍न बि‍तला बाद देखलहो चीज अनचि‍न्‍हार बुझाइ छै।

झटकलाल मड़रकेँ लोक सभ झटकू मड़र कहै छै। कारण-कहैमे सुवि‍धा आ झटकू मड़र कोनो तमसाह बेकतीयो नै छै, जे कोनो डर हेतै।

झटकलाल मड़र मनमे बड़का-बड़का लीलसा पोसने छल। चाहे जे करए पड़ए। बेटाकेँ पढ़ेबै अजय बेसी पढ़त तँ बड़का हाकि‍म बनत। बापोकेँ नाओं जाति‍-जवारमे चमकैत रहत।

खरचा तँ दि‍ऐ पड़तै। आखि‍र बड़का हाकि‍म। जते तेल देबै ततबे ने गाड़ी दौड़तै। नै छै रूपैया। की तकै छी? शीशोक गाछ बेच। नै भेलौ तँ बाँस बेच। बेसी पैसा लगतै। कोनो मूतनार-हगनार खेत बेच ले। की यौ मालि‍क?

मालि‍क खेतक जड़सीमनबला रूपैया दैत टि‍टकारी मारने रहए- बाप बनौरा पुत्त चौतार, तेकर बेटा नेड़हा फौदार। देखि‍हेँ बादमे बापकेँ सरवेन्‍ट ने कहौ।
कि‍छो करतह कि‍न्‍तु पढ़ावह। पढ़लासँ बुइधगर मनुक्‍ख तँ बनबे करतह।

अजय सुनैत छल- कात-करोटसँ। कि‍छ गप्‍प संगी –साथीयोसँ बुझि‍ लैत छल। बीख-अमरीत पि‍बैत चलैत जि‍नगी!

सभ आस तँ पूरे नै होइ छै। कि‍छ बचलो रहै छै तँए ने जि‍नगीक दौड़ा-दौड़ी होइत रहै छै एक दोसरकेँ पछोड़ धेने दौड़ैत रहै छै। फेर नवका आश ठाढ़ भऽ जाइ छै।

कते कुद-फान केलक-अजय। कि‍न्‍तु मोन मोताबि‍क नौकरी नै भेट सकलै। ओने झटकलालक अभि‍लाषा!
सोचै छै अजय- बाबूजीकेँ कतऽसँ पता चलतै जे अइठाम कोन-कोन खेल चलै छै। भ्रष्‍टाचार आ ति‍कड़म केहेन नाच नचै छै। केना उनटा धुरीसँ हलाल होइ छै- लोक। हमरा जाति‍मे तँ कोनो बड़का नेतो नै छै। एक आध जँ छै तँ ओहो झोरउगहा। फेर तरघुसका रूपैया कतएसँ एतै? ने पैरबी आ ने पैसा तँ सड़कपर टहल लगाउ।

नौकरी-चाकरी नै भेल तँ पढ़लौं कथीले?

जेना पीपरक धोधरि‍मे सँ कोइ पूछलक- कतए जाइ छहक- अजय? गाम? गाममे के पूछतह तोरा? कोन काज करबहक तूँ? गमैया कोन काज हेतह तोरा बुत्ते? हड़-कोदारि‍ चला सकै छहक तँू? रौद-बसातमे रोपनी-कटनी कऽ सकै छहक? गामक वि‍द्वानक बीच रहि‍ सकबहक? ऐठाम केकरोसँ कोइ कम नै बुझै छै। लि‍खनाइ-पढ़नाइ भले नै जनैत छै कि‍न्‍तु सभ छै- ज्ञानवान वि‍द्वान। सबहक अपन-अपन वि‍चार आ थ्‍योरी छै। लाठीक सहारासँ चलैबला साँढ़ जकाँ ढेकरैत अछि‍। जेकरा घरमे एक साँझक खरचा नै छै ओकरो गप्‍प करोड़पति‍ जकाँ चलै छै।

अट्टहासक स्‍वर- हा-हा-हा-हा, गाममे तूँ नै रहि‍ सकबहक। मि‍स्‍टर अजय कुमार, तोरा सभ अजैया कहतह। बी.ए.क डि‍गरी हवामे उड़ि‍ जेतह-फर-फर। ऐठाम शहरी ज्ञान तँ दूरक गप्‍प छै, तोहर कोनो बात कोइ नै सुनतह। ही-ही-ही।

अजय गरजैत बजल- जरूर सुनतै। तँू चुप रह। हम समाजमे पसरल कुरीतकेँ हटेबाक कोशि‍श करबै। ऐठामक जड़ता आ जि‍दकेँ तोड़ए पड़तै। देशक अंग-अंगकेँ साफ आ स्‍वस्‍थ्‍य करए पड़तै। गाम-गाममे सुधार भेलासँ देशक सुधार हेतै। समाज बदलतै। नव समाज बनबए पड़तै। कि‍छ लोककेँ बीड़ा-पान उठबए पड़तै।

अजय हाथ चमकबैत जोर-जोरसँ बजए लगल।

शीला बड़ीकाल पहि‍नेसँ ओइठाम एकटा झोंइझमे नुकाएल अछि‍। ओ अजयकेँ हाथ-देह फड़कौने आ चि‍चि‍या कऽ असगरेमे बजनाइ देख रहल अछि‍। उ डेराएल सन सुरमे अजयकेँ टोकबाक प्रयास केलक। कि‍न्‍तु अजय नै सुनलकै। ओकरा पक्का वि‍श्वास भऽ गेलै जे गाछ परक प्रेत अजयकेँ गरसि‍ लेलकै। वएह एकरा देहपर चढ़ि‍ कऽ बजि‍ रहल छै। ऐठाम तँ कोइ छेबो नै करए। केकरा कहतै। कि‍छो जल्‍दी करए पड़तै। आगि‍-पानि‍सँ तँ भूतो-प्रेतो डेरा जाइ छै।

मनमे वि‍चार करैत अगल-बगल देखलक। लगीचेमे एकटा खत्ता छलै। खत्ताक कोरपर एकटा फूटल बालटी सेहो राखल छलै। शीलाकेँ तुरन्‍त फुरेलै।

ओ बालटीमे पानि‍ भरलक आ अजयकेँ माथापर उझैल देलकै। अजय चकोना हएत शीला दि‍स दौड़ल।
के छी? एना कि‍एक केलौं। ठाढ़ रहूँ।

शीला उनटि‍ कऽ भागलि‍। जेकरा देहपर भूत चढ़ल छै। से की करत, कोन ठेकान।

अजय झपैट कऽ पाछूसँ शीलाकेँ पकड़लक। तैयो शीला छुटबाक प्रयास कऽ रहल छै। जमीन भीजल छलै पकड़-धकड़मे दुनू खसल। तरमे शीला ऊपरसँ अजय चढ़ल।

मुँह देखते अजय चौंकैत बजल- शीला, अहाँ छी। एना ि‍कएक केलौं।
अहाँ असगरेमे अड़-बड़ बजै छलौं। हमरा तँ बुझाएल जे अहाँपर प्रेत चढ़ि‍ गेल अछि‍। आब बुझाइत अछि‍ अहाँपर सँ उतरि‍ कऽ हमरापर चढ़ि‍ गेल अछि‍।
तेकर मतलब हम प्रेत छी?”
अहाँ भूत-प्रेत नै चोर छी। तब ने हमरा मनक चोरि‍ केलौं आ नि‍पत्ता भऽ गेल छलौं। आबो देहपर सँ हटू ने।
नै हटब।
जल्‍दी हटू। नै तँ धकेल देब। देखै छि‍ऐ कोइ आबि‍ रहल छै।

दुनूक मन कतेक बरि‍स पाछू चलि‍ गेल छलै से पता नै। जेना पछि‍‍ला स्‍वर्गक सरोवर सोझा आबि‍ गेल छलै। आ ओइमे दुनू संगे-संग जल-खेल करए लगल छलै। गाछ परक चि‍ड़ै-चुनमुनी ओइ खेलकेँ देखैत चुन-चुन करैत ओकरा सभक आनन्‍दमे अपन उपस्‍थि‍ति‍ दरज कऽ रहल छलै।

वि‍रह आ प्रतीक्षाक कथा चलैत रहल। कतेक देरसँ पता नै। वर्तमान उपस्‍थि‍ति‍ भेल तँ अजय पूछलक- अहाँ एमहर कतए आएल छलौं?”
शीलाकेँ हँसी लागि‍ गेल कि‍न्‍तु ओकरा आँखि‍मे नोर भरल छलै।
हमर काका-काकी जहि‍या झगड़ा करैत छलै तहि‍या-तहि‍या अइठाम सुनहटमे आबि‍ जाइत छलौं आ अहाँक बाट जोहैत रहैत छलौं। कतेक माससँ अहाँक इन्‍तजारी करैत समए काटै छलौं। जखन कोनो चि‍रइयो टा समाद नै दैत छलै तँ कानैत-कानैत आपस घर घुरि‍ जाइत छलौं। आइ सगुनि‍याँ चि‍ड़ैकेँ दरशन भाेरे भेल छलै। भेँट भऽ गेल।
हम तँ सोचने रही जे अहाँक बि‍याहो भऽ गेल हेतै। कोरमे बच्‍चा खेलाइत हेतै। कि‍न्‍तु आब बुझाइत अछि‍ जे हमहूँ भाग्‍यशाली छी। शाइत दुनू गोटे एक दोसरक लेल बनल छी।
धुर, बि‍याहक बात की करैत छी। हमर पि‍तयौत बहि‍न लीलीयाक बि‍याह होइबला छै। की हेतै से नै जानि‍। जाति‍क सभटा लोक अरचन रोपै छै।
अरचन कि‍एक? ऐठाम लोक तँ बि‍याहकेँ यज्ञ बुझै छै तँए एक-दोसरक सहयोग करै छै।
हँ से तँ ठीके। कि‍न्‍तु हमर पलि‍वार तँ ढाठल छै। बागल छै। हमरा परि‍वारकेँ जाति‍सँ अलग कऽ देने छै।

अजय चौंकैत पूछलक- जाति‍सँ अलग कि‍एक कऽ देने छै?”
मुड़ी झुकौने शीला मन्‍द स्‍वरे बजली- बाबूजी केँ मरलापर काका सराध-गैतक भोज नै केलकै। कतऽसँ टका लाबि‍तै। ओइ साल फसि‍ल नीक नै उपजल छलै। सभ मुँह पुरूषकेँ कहलकै- जे हमरा घरमे कोनो उपाए नै छै। रोटीयो नै जुमै छै तँ भोज कतएसँ करब। कि‍न्‍तु भोजक नाओंपर सभ जाति‍ एक भऽ गेलै। ओ सभ कहलकै- अकलू मड़र दोसराक भोजमे बड़ फानैत छलै। जे भोज नै करए से दालि‍ बड़ सुरकाए। ओकरा सराधक भोज लगबे करतै। जँ पूरा जाति‍केँ भोज नै देतै तँ जाति‍सँ अलग। आगि‍-पानि‍ सभ बन्न।
भोजक एतेक महत्‍व छै अपना समाजमे।
की कहब घरमाबाबूपर घर ढुक्का पंचैती हैत रहए। चट दऽ धरमाबाबू भोज गछि‍ लेलकै आ कहलकै- उ तँ झूठ-मूठ हमरापर आरोप लगबै छै।
भोजक नाओंपर सभ कुकरम माफ भऽ गेलै। अजय अबाक्! शीलाक मुँह दि‍स ताकि‍ रहल अछि‍। मोनमे बि‍हाड़ि‍ सन उठल छै। जेना ओकरा सौंसे देहमे जाति‍क जाल लटपटा रहल छै।

कोइ आबि‍ रहल छै। अहाँ संगे देख लेत तँ की हेतै पता नै। कहैत शीला धड़फड़ा कऽ उठल आ टोल दि‍स चलि‍ देलक।

वएह बाट छि‍ऐ कि‍न्‍तु लगै छै ऊ नै छि‍ऐ। अजय अपना घर दि‍स बढ़ि‍ रहल अछि‍। ओ स्‍वप्‍नमे छै कि‍ यर्थाथमे पता नै। कि‍न्‍तु गाम दोसर रँगक लगै छै। ओ लवका रँग ओकरा आँखि‍मे छै कि‍.....।   
(जारी...)
  
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
दीर्घकथा

शंभूदास
गतांशसँ आगाँ.....


नवम् वर्ख चढ़ैत-चढ़ैत शंभूआ शंभू बनि‍ गेल। कारण भेल जे आन-आन बच्‍चासँ भि‍न्न काजक प्रति‍ झुकाव हुअए लगलै। जहि‍ना जीवनी (जीवनक पारखी) बोन-झाड़ वा गाछी-वि‍रछीमे, बरसातक उपरान्‍त आसीन-काति‍कमे नव-नव गाछकेँ माटि‍सँ उपर होइते डारि‍-पातसँ परेख लैत जे ई फल्‍लां वस्‍तुक गाछ छी मुदा अनाड़ी नै परेख पबैत तहि‍ना समाजोक पारखी शंभूकेँ परखए लगल। छोट बच्‍चा जहि‍ना लत्ती-कत्तीमे फड़ल हरि‍यर चारि‍ पएरबलाकेँ, जेकर मुँह घोड़ा सदृश्‍य नमगर होइत ओकरा घोड़ा मानि‍ पकड़ि‍ अपन खेलक एक भाग, सर्कश जकाँ, बना खेलैत तहि‍ना कीर्तन मंडलीक बीच शंभूओ एक अंग बनि‍ गेल। ओना अदौसँ लोक ि‍कछु समटल कि‍छु बि‍नु समटल, जे लोकक बोन-झाड़मे हराएल रहल, केँ चि‍न्‍हैत आबि‍ रहल अछि‍। जँ से नै रहैत तँ कि‍छु बनैया कि‍अए शि‍कारक पात्र बनैत। मनुष्‍यक लगाओल खेती-बाड़ी वा माल-जालकेँ जँ बोनैया नष्‍ट करए चाहत तँ कि‍अए लगौनि‍हार अपना सोझमे अपन श्रमकेँ नष्‍ट होइत देखत। एहनो-एहनो पारखी लगमे रहनि‍हार अपन (मनुष्‍यक) बच्‍चाकेँ नै परेख पबैत। कोना परखत? मनुष्‍य तँ गाछ-वि‍रीछ नै जे डारि‍क रंग-रूप आ पातक सि‍रखारसँ परेख लेत, मुदा मनुष्‍य तँ जीवक श्रेणी (जि‍नगीक पाँति‍) मे रहि‍तो आनसँ अधि‍क नमगर-चौड़गर, फूल-फलसँ लदल दुनि‍याँबला छी। जे बाहर नै भीतर छि‍पा क रखने रहैत अछि‍। रखने अछि‍ कि‍ राखल छैक ओ भि‍न्न बात।

जे शंभू अखन धरि‍ मनुक्‍खक मेलाक बच्‍चाक जेरमे नुकाएल छल ओ नमैर धान-गहूमक गाछ जकाँ बेदरंग हुअए लगल। मुदा रंग-रूप अधि‍क गाढ़ नै भेने ने अपने देखए आ ने आनेक नजरि‍क सोझ पड़ए। भलहि‍ं उम्‍मस भरल भादोमे पूरवा-पछि‍याक लपकी नै बुझि‍ पड़ै मुदा ओहन लपकी तँ माघमे जरूर अपन रूपक दर्शन करवि‍तहि‍ अछि‍। तहि‍ना शंभूओक भेल। एक आँखि‍सँ दोसर आँखि‍, एक कानसँ दोसर कान बीआ-बना हुअए लगल। मुदा बीआ तँ बीआ छी, कोनो फले बीआ, तँ कोनो ऑठि‍ये। कोनो पाते बीआ तँ कोनो डारि‍ये। तहि‍ना जते मन तते खेत। जते खेत तते रंगक गाछ। जते गाछ तते रंगक फल-फूलक आश। मुदा मनुक्‍खक बीआ तँ सभसँ बेढ़ंग (अजीब) अछि‍। जेहन-जते खेत तेहन तते रंगक बीआ खसि‍ तते रंगक गाछ संगे जनमैत। गाछ देख‍ कि‍यो बजैत, शंभूक सि‍नेह संगीतसँ तते भेल जाइए जे कहीं घर-परि‍वार छोड़ि‍ ओकरे संगे ने चलि‍ जाए। तँ कि‍यो बजैत, भगवान अपने बेटा जकाँ लुरि‍-वुद्धि‍ देने जाइ छथि‍न एक-ने-एक दि‍न लगमे बजाइए लेथि‍न।
ज्ञान स्‍वरूप देवत्‍व प्राप्‍त करैक लेल प्रेमास्‍पदक बाट धड़ए पड़त। जे बि‍नु बुझनहि‍ शंभूमे अबए लगल। जहि‍ना एक माटि‍ एक पानि‍ जगह पाबि‍ अपन भि‍न्न-भि‍न्न रूप बना भि‍न्न-भि‍न्न गुण पसारैत तहि‍ना तँ समाजो अछि‍। माटि‍क आँड़ि‍ बनि‍-बनि‍ बाध बँटल अछि‍, घेरा पाबि‍-पाबि‍ पानि‍ बँटल अछि‍ तहि‍ना ने समाजो अछि‍। समाजोक तँ भि‍न्न-भि‍न्न रूप आ भि‍न्न-भि‍न्न अर्थ अछि‍। कतौ गामक सीमान मानि‍ समाज मानल जाइत अछि‍ तँ कतौ जाति‍। कतौ कर्मक हि‍साबसँ समाज बनैत अछि‍ तँ कतौ व्‍यवसायि‍क। कीर्तन मंडलीक समाज ओहन अछि‍ जइमे घर-परि‍वार सम्‍हारि‍ लोक (मंडलीक) भगवानोक दरवार पहुँच अपन नीक-अधला (उचि‍ति‍-वि‍नती) बात सेहो कहैत अछि‍। तइले ने संगी-साथीक जरूरत आ साज-बाजक। थोपड़ी बजा वा चुटकी बजा वा बि‍नु बजेनहुँ मुँह खोलि‍ वा बिनु मुँहो खोलने जतबे समए पबैत ओतबेमे राधा जकाँ कृष्‍णक संग रमि‍ जाइत।

नवम् वर्ख खटि‍आइत-खटि‍आइत शंभू गामक कीर्तन मंडलीक सदस्‍य बनि‍ गेल। तइले ने नाओं लि‍खबैक जरूरत भेल आ ने कोनो रजि‍ष्‍टरक। मनक डायरीमे वि‍चारक कलम चलि‍ गेल। मुदा दुनूकेँ (शंभूओ आ मंडलि‍योक) आगू चलैक बाटो आ संगि‍यो भेटल। संगी पाबि‍ जहि‍ना शंभूकेँ, घरक छप्‍परसँ खसैत धरि‍आएल पानि‍ आगू बढ़ि‍ धारमे पहुँच जाइत तहि‍ना भेल। मंडलि‍योक फूलवारीमे एकटा नव फूलक गाछ पोनगल। जहि‍ना नमहर थैरमे नव गाए-महीसि‍केँ जाइति‍क समाज भेटलासँ अपन खुशहाल जि‍नगीक खुशी होइत तहिना शंभूओक संबंध रंग-वि‍रंगक कला-प्रेमीसँ भेल। जहि‍ना टाला-कोदारि‍ ल बोनि‍हार, रि‍ंच-हथौरी ल मि‍स्‍त्री अपन सेवा दइले जाइत तहि‍ना खजुरीक संग शंभूओ मंडलीक बीच सेवा दि‍अए लगल। अठवारे मंगलकेँ महावीरजी स्‍थान आ अठवारे रवि‍ क महादेव स्‍थानमे साँझू पहर क कीर्तन होइत। जइमे कीर्तन मंडलीक समाजक संग भक्‍त प्रेमी सभ सेहो एकत्रि‍त भ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ मगन भ भजनो-कीर्तन करैत आ सुनि‍नि‍हारो संगीक संग समुद्रमे दहलाइत-उधि‍आइत। मुदा बाल-बोध शंभू ने दि‍नक ठेकान बुझैत आ ने मासक। मंगल कोना घुमि‍-घुमि‍ अबै छै ने से बुझैत आ ने रवि‍। तँए अन्‍हारमे बौआइत शंभू। मुदा जहि‍ना अगि‍ला बाट भेटने शंकाक समाधान भ जाइत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रवि‍केँ भजि‍अबए लगल। खोजनि‍हार जहि‍ना घनगर बोनझारमे सँ कोनो जड़ी वा जरूरतक गाछ ताकि‍ क अबैत तहि‍ना शंभूओ मंगल आ रविकेँ भजि‍औलक। सातो दि‍न आ बारहो मासक गुण-अवगुण भजि‍आ मनमे रोपि‍ लेलक। जइसँ तीसो दि‍न मासक बीचक तीर्थ आ सातो दि‍नक आठो पहरक बोध भ गेलइ। राति‍-दि‍नक बीच घरक काज कखन कएल जाए आ बाहरक कखन, ऐ लेल तँ पहरे पहरा करैत अछि‍। वसन्‍ती-बयार तँ गोटि‍-पराक लेल नै सबहक लेल समान सोहनगर अछि‍ भलहि‍ं कि‍यो कुम्‍मकर्णी नीनक मस्‍ती लि‍अए आकि‍ ब्रहमलोक पहुँच कुम्‍हारक चाक चलबए। जा धरि‍ चाक नै चलत ता धरि‍ नव बर्तन केना गढ़ल हएत? ओहन खेत वा पोखरि‍ जकाँ शंभूक मन दि‍न-राति‍ छि‍छलए लगल जेहन पोखरि‍क कि‍नछरि‍मे ठाढ़ भ चौरगर खपटा वा झुटका पानि‍क उपर फेकलासँ उपरे-उपर छि‍छलैत दूर तक जाइत, जहि‍ना अनगर लबल धानक सीसपर होइत मन छि‍छलैत एक आड़ि‍सँ दोसर धरि‍ छि‍छलि‍-छि‍छलि‍ देख-देख खुशी होइत, तहि‍ना। भोरमे नीन टुटि‍ते शंभू ओछाइनेपर दि‍न भरि‍क जि‍नगीक बाट जोहए लगैत। साँझ परैत परैत जहि‍ना कृष्‍ण संगी-साथीक संग आबि‍ माए जशोदाकेँ अपन लकुटि‍ कमरि‍या सुमझा संध्‍या बंधन करए वि‍दा होथि‍ तहि‍ना शंभूओ उगैत सूर्यक संग दुि‍नयाँ देखैक उपक्रम सोचए लगैत। भगवानक नजरि‍ तँ पहि‍ने ओइ पुजेगरीपर ने पड़ैत जे नव-नव फूल-अछतसँ सजल सीकीक नव फुलडालीमे नव गाछक फूल ल रहैत। बाकीकेँ तँ गि‍नती क रखि‍ लेल जाइत। गाछमे सबुरक फलक सि‍रखार, कटहर जकाँ, देख पड़ैत। दि‍न भरि‍ समए बँचल अछि‍ जखने बाध-बोन दि‍स जाएब तँ कोनो ने कोनो भेटबे करत। जँ भेट गेल तँ बड़बढ़ि‍या नै तँ उचि‍ति‍-वि‍नती क भार्त भ थारीमे रूइक बत्ती लेसि‍ कानि‍-कलपि‍ कहबनि‍। अनकर जँ सुनैत हेथि‍न तँ हमरो सुनताह नै तँ ककरो नै सुनथि‍न। अपना-अपना करमे-भागे लोक जीब लेत।
चौदहो भुवन (चौदहो लोक) सदृश्‍य समाजमे चि‍त्र-कुटक घाट जकाँ अनेको घाट। कम वा बेसी सभक मनमे भगवानक प्रति‍ आस्‍था भलहि‍ं आत्‍मा, जीव आ मायाक तात्‍वि‍क रूप नै बुझैत हुअए। से सि‍र्फ पुरखेटा मे नै महि‍लोमे। समर्पित भ नि‍यम-नि‍ष्‍ठासँ आठ घंटासँ ल बहत्तरि‍ घंटाक तकक उपवास हँसैत-मुस्‍कुराइत क लैत। एहन पत्नि‍ये कि‍ जे अपन पति‍केँ देवालय जाइसँ रोकती। समाजक भीतर समबेत स्‍वरे अष्‍टयाम, नवाहक संग आनो-आन आ नाचोमे सामाजि‍क सेहो होइत जे मंचपर बैस सामूहि‍क रूपे गबैत। तहि‍ना माइयो-बहीनि‍क बीच छन्‍हि‍। मुड़न हुअए वा उपनयन, कुमार गीत हुअए वा बि‍याह, छठि‍ हुअए वा फगुआ, सामूहि‍क रूपे सभ एकठाम भ गबैत छथि‍। नव-नव गायि‍काक सृजनो होइत आ अवसरो भेटैत। कि‍एक तँ दादी बाबीक उदारतासँ कहैत छथि‍न जे आब बूढ़ भेलौं, कफ घेरने रहैए, तँए नवतुि‍रयेकेँ गाबए दहक। सामाजि‍क वातावरणमे श्रद्धा, प्रेमक संग भाइचाराक वेवहारि‍क पक्ष अखनो अछि‍। एकर अर्थ इहो नै जे आपराधि‍क वृत्ति‍ दबल अछि‍। अगुआएल छल, बहुत अगुआएल अछि‍। आँखि‍क सोझमे बहीि‍न-बेटीक संग दुरबेबहार बाड़ी-झाड़ीक वस्‍तु बलजोरी तोड़ि‍ लेब, खेतक फसल क्षति‍ क देव इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍। एक नै अनेक आपरधि‍क वृत्त अपन शक्‍ति‍सँ समाजकेँ दबने छल। मुदा तँए कि‍ जि‍नगीक आश नै छलैक, छलैक धरमक संग प्रेमसँ छलैक। जँ नै छलैक तँ बाड़ी-झाड़ी वा खेत-पथारमे काज-करैत कि‍सान कोना गौओं-घड़ुआ आ बाट चलैत बटोहीकेँ दूटा आम खाइले कि‍अए कहैत छलाह। एकटा सजमनि‍ अगुआ क दइ छलाह जे धि‍या-पूताकेँ तरकारी बना देबै। कहाँ मनमे छलनि‍ जे दस रूपैया बुड़ि‍ रहल अछि‍। रोपैइये काल दू-दूटा फलक गाछ लगबै छलाह जे एकटा परि‍वार लेल, दोसर समाज लेल। जँ परि‍वार-परि‍वारमे एहेन वृत्ति‍ अपनाओल गेल रहैत तँ कि‍ सामाजि‍क संबंधमे औझुके टुटान अबैत।
रवि‍-मंगलकेँ देवस्‍थानमे कीर्तन अनि‍वार्य रूपे चलि‍ते छल, जहि‍ना वि‍द्यालयक कार्य-दि‍वस। अनदि‍ना सेहो दरबज्‍जे-दरबज्‍जे होइते रहैत छल। जना सभक जि‍नगी बन्‍हाएल चलैत होइ। भरि‍ दि‍न खेत-पथारसँ माल-जालक पाछु लागल रहैत छला आ साँझ पड़ि‍ते कीर्तन-मंडलीक बीच पहुँच जाइत छला जे खेबा-पीबा राति‍ धरि‍ चलैत छल। खेला-पीला बाद सुतै छला। कहाँ कखनो समाजक प्रति‍कूल बात सोचैक समए भेटैत छलनि‍। जे लोकनि‍ मंडलीकेँ हकार द अपना ऐठाम कीर्तन कराबैत ओ अपन वि‍भवक अनुकूल, भोजनो आ साजो-समानक ओरि‍यान क दैत छलाह।

पहि‍ल दि‍न शंभूओकेँ सवा हाथ वस्‍त्र आ सवा-आना पाइ भेटल। खा क जखन शंभू वि‍दा हुअए लगल तँ गरे ने अँटै। दू हाथमे तीन समान (पाइ, वस्‍त्र, खजुरी) अन्‍हार राति‍मे केना ल जाएब। पाइकेँ जँ वस्‍त्रमे बान्‍हि‍ एक हाथमे ल लेब आ दोसर हाथमे खजुरी ल लेब, से भ सकैए। मुदा दुनू हाथ अजबाड़ि‍ राति‍मे चलब केना? ढि‍मका-ढि‍मकीक रस्‍तामे कत ठेंस लागत कत नै। जँ घरबारि‍येकेँ संग चलैले कहबनि‍ सेहो उचि‍त नै। हमरा सन-सन कते गोरे छथि‍। कि‍नका-कि‍नका संग पुरथि‍न। जँ कन्‍हापर आकि‍ डाँड़मे वस्‍त्र लगा लेब तँ पहि‍रौठ भ जाएत। केना बाबूकेँ पहि‍रोठ वस्‍त्र देवनि‍। गुन-धुनमे पड़ल शंभू एक गोटेकेँ अपना घर दि‍स जाइत देखि‍ पि‍ताकेँ समाद पठौलनि‍- बाबूकेँ कहि‍ देबनि‍ जे डलना तेहेन चोटगर बनल छलै जे इच्‍छासँ बेसि‍ये खुआ गेल। तइपर तीन-तीनटा वस्‍तु ल अन्‍हारमे केना आएल हएत तँए आबि‍ क जाथि‍।

एगारहम बर्ख पुरैत-पुरैत शंभूक गि‍नती गामक भजनि‍याक संग भगवानक भक्तोमे हुअए लगल। तहूमे ओहन भक्‍त जे बि‍नु वि‍आहल हुअए। ब्रह्मचारी। ओना शंभूक स्‍वभावमे सेहो सामान्‍य बच्‍चाक अपेछा वि‍शेष गुण छलैक जे सभ देखैत छलाह। जहि‍ना कि‍यो पनरह बर्खक उमेर बि‍तेलाक बादो पाँचो बर्खसँ कम उमेरक बच्‍चासँ पछुआएल (लुरि‍-बुधि‍मे) रहैत आ कोनो-कोनो बच्‍चा दसे बर्खमे सि‍यान जकाँ भ जाइत। मुदा समाज तँ अथाह समुद्र छी। जेहेन पारखी तेहेन परख। डोका-काँकोड़सँ ल हीरा-मोती धरि‍ समेटि‍नि‍हार समुद्र सदृश्‍य समाज। एहनो पारखी जे एक तरहक जानवर (गाए-महीस इत्‍यादि‍) पोसि‍ दोसरो-दोसरो तरहक जानवरक जि‍नगीकेँ दूर धरि‍ देखैत आ एहनो जे सभ दि‍न सोझमे रहि‍तो कि‍छु ने (जि‍बैक रास्‍ता) देखैत। तहि‍ना पारखी शंभूओकेँ परखलनि‍। कीर्तन मंडलीक उपर श्रेणीक कीर्तनि‍यामे शंभूक गि‍नती हुअए लगल। गुरू तँ सदति‍ शि‍ष्‍य तकैत। शि‍ष्‍य-गुरूकेँ एकठाम भेनहि‍ ने जि‍नगी आगू ससरैत अछि‍। जाधरि‍ से नै होइत ताधरि‍ मि‍श्री कुसि‍यारक पानि‍मे डूबल रहैत आ शि‍ष्‍य सरपतक श्रेणीक गाछ बुझल जाइत। शंभूकेँ एक संग दू गुरू भेटल। एक अगुआ (वजन्‍त्रीसँ गौनि‍हार) मुरते आ दोसर साज-बाज। जहि‍ना रंग-वि‍रंगक कोठीमे रंग-वि‍रंगक अन्न-पानि‍ देख गृहस्‍वामि‍नीक मन सदति‍ हरि‍आएल रहैत तहि‍ना शंभूओ हरि‍आएल।

अखन धरि‍ शंभूक गि‍नती परि‍वारमे (माए-बापक बीच) ओहन बच्‍चा सदृश्‍य छल जेहनकेँ काजक भार तँ नै मुदा जि‍नगीकेँ जि‍या राखब माए-बापक कर्तव्‍य-कर्मक श्रेणीमे रहैत। जइसँ बि‍नु पगहाक पशु जकाँ शंभूओ। तहूमे आब शंभू छेटगर भ गेल। जखने भूख लगतै तखने दौड़ल आओत नै तँ भरि‍ दि‍न भुखलो रहि‍ सकैए। तँए कि‍ शंभूक खाइ-पीबैक आ रहैक ठौरो वि‍ला गेल। नै ओ सभ रहबे कएल। हँ एते जरूर भेल जे कखैन आबए आकि‍ जाए से पुछि‍नि‍हार नै रहल। सुखनि‍ये संतोखी दासकेँ कहि‍ देने रहनि‍ जे बाल-बोधकेँ पाछूसँ नै आगूसँ टोकल जाइत अछि‍। जहि‍ना राहड़ि‍क गाछक बुट्टीकेँ चारू भागसँ सि‍र पकड़ने रहैत तहि‍ना तँ मनुक्‍खोक अछि‍। मुदा जीवनी तँ गर लगा कोदारि‍क छह मारैत जे अपन पएरो बँचै आ बुटो उखड़ै। तँए उत्तम कोटि‍क काज वएह ने जे साँपो मरै लाठि‍यो ने टूटए।
घरक कोनो काजक भार शंभूक नै रहैक कारण छल जे दुनू बेकतीक हृदए घेराएल जे माए-बाप अछैत जँ बेटा-बेटीकेँ कोनो भार पड़त तँ खि‍च्‍चा गाछ जकाँ वा केराक गाछ जकाँ पिचा क थकुचा भ जाएत। जइसँ शरीर खि‍लैच जेतै। जखने शरीर लि‍खचतै तखने जि‍नगी खि‍लैत जेतै। जइसँ रोगाएल गाछ जकाँ सभ दि‍न खि‍द-खि‍द करैत रहत। जँ एहेन जि‍नगी बेटा-बेटीक भेल तँ ओ परि‍वार कते दि‍न आगू मुँहे ससरत। तँए जाधरि‍ बाल-बच्‍चाकेँ नि‍रोग बना नै राखब ताधरि‍ बंशकेँ आगू मुँहे ससारब कोरी-कल्‍पना हएत। जइसँ ने माए-बाप (सुखनी-संतोखी दास) शंभूकेँ कोनो काज अढ़बैत आ ने शंभू कि‍छु करैत सभ कि‍छु अपन रहि‍तो शंभू अपन कि‍छु नै बुझैत। तँए धन्‍य-सन। परि‍वारक काजक तहमे पहुँचलापर ने कि‍यो बुझैत जे ऐ काजकेँ नै भेने परि‍वारमे कि‍ नोकसान हएत। ई जि‍नगीये तँ बरखा-पानि‍क बुल-बुला जकाँ अछि‍। लगले बनत, चमकत आ फुटि‍ जाएत। एहेन जँ क्षणभंगुरोसँ क्षणभंगुर जि‍नगी अछि‍, जेकर कोनो वि‍सवास नै अछि‍ तेकरा पाछु पड़बे नादानी हएत। भने ने जनकजी ऐ बातकेँ बुझि‍ भोगो-वि‍लासकेँ अधला नै बुझैत छलाह। भलहि‍ं षंभूक मनमे जे होय मुदा माए-बापक मनमे जरूर रहनि‍ जे जाबे थेहगर छी ताबे जँ काजसँ देह चोराएब तँ परि‍वारक प्रति‍ अन्‍याय करब हएत। बुढ़ाढ़ीमे झुनाएल धान जकाँ सीसक टूर टूटि‍-टूटि‍ जहि‍ना खसैए तहि‍ना ने शरीरक अंगो (आँखि‍, कान इत्‍यादि‍) खसबे करत। जखन देह भंग हुअए लगत तखन तँ बेटे-बेटी ने श्रवण कुमार जकाँ भारपर टाँगि‍ तीर्थ-स्‍थान घुमौत। एहेन काज तँ ओकरा उपर लधले छै तखन मुर्दा जकाँ नअ मन बोझ लधनाइ उचि‍त नै। कि‍ करत वएह बेचारा एक दि‍स माए-बापक बोझ पड़तै, अपनो जि‍नगी रहतै तइपर सँ बाल-बच्‍चाक कोनो ठेकान छै जे भगवान कते देथि‍न कते नै। हुनका थोड़े बुझल छन्‍हि‍ जे अन्न-पानि‍ कते महग भ गेल अछि‍। जत मड़ूआ बराबरि‍ क माछ बि‍कैत छल ओत मड़ूआ धि‍ना क देश छोड़ि‍ देलक मुदा माछ सि‍मटीक चि‍नमारपर गि‍रथानि‍ बनि‍ अजबारि‍ क बैसल अछि‍।
ढेरबा बच्‍चा रहि‍तो शंभू समैसँ दोस्‍ती केलक। दोस्‍ती नि‍माहैले मंडलीक संग पूरि‍ जखन सभ सुतए ओछाइनपर जाइत तखन शंभू साइकि‍ल सि‍खैत बच्‍चा जकाँ पहि‍ने हारमोनि‍यम, ढोलक इत्‍यादि‍केँ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ देखए। जहि‍ना युवक युवती पहि‍ल नजरि‍मे पहि‍ल रूप देखैत तहि‍ना शंभूओ देखलक। देखलक जे एक नै अनेको जुगल जोड़ीक संयोगसँ समाज ठाढ़ अछि‍। जइमे अपन-अपन गुणकेँ मि‍ज्‍झर भ मि‍ल-जुलि‍ चलि‍ उकड़ूसँ उकड़ू बाट टपि‍ श्रंृगी ऋृषि‍क फुलवारी देखैत। एक पेरि‍या झालि‍ केना टूक-टूक जोड़क बनल हारमोनि‍यम संग ठि‍ठि‍या-ठि‍ठि‍या चलैत अछि‍। शंभूक सि‍नेह समूहसँ भेल।

पचासक दशक (पाँचम दशक) सँ पूर्व, अष्‍टयाम कीर्तनक मूलमंत्र सीताराम, सीताराम छल। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍। जगत जननी जानकीक मि‍थि‍ला, जि‍नक संकल्‍प पूर केनि‍हार राम। सीताराम मंत्रमे शंभूकेँ ऋृतानुसार सभसँ भेटए लगल। जहि‍ना जखन जेहेन मन तखन तेहन वि‍चार, तहि‍ना। भोरमे प्रभाती बेर ‘सीताराम’मे शंभूकेँ वसन्‍ती वा ब्रह्मणी रस भेटए जखनि‍ कि‍ दि‍न-राति‍क गति‍ये रसोक रस बदलए लगै। मुदा मंत्रमे कोनो बदलाव नै होइ। बाल-बोध रहि‍तो शंभू जीवनी जकाँ सि‍र सजमनि‍क भाँज बुझैत। हनुमानजी जकाँ नै। जे छोटो काजले नमहर अस्‍त्रक प्रयोग करब। आ ने अनाड़ी-ध्‍ुनाड़ी जकाँ पराती बेर साँझ आ साँझक बेर पराती गबैत। जँ गेबो करैत तँ जहि‍ना हलुआइ जकाँ चीनीक चासनीमे रंग-वि‍रंगक वस्‍तु अना ओइमे बोड़ि‍ मधुर बनबैत। एहने सन शंभूओक मनमे उपजै। ओना जते रंगक मंत्रक जरूरत होइत तते एबो ने करै। नै अबै तहूमे ओकर दोख नै। दोखो कि‍अए हेतै एक तँ बेचारा पशु जकाँ असगरे खूँटा धेने, तइपर बाल-बोध। मुदा तैयो बकरी बच्‍चा जकाँ नै जे दूध पीवि‍ते छड़पए-कुदए लगैत।

हड़लै ने फुड़लै शंभू घरसँ पड़ा गेल। दुनू बेकती संतोखी दास खेतमे काज करए गेल रहथि‍। तँए भरि‍ दि‍न कोनो भाँजे नै लगलनि‍। कारणो रहए। दुपहर तक तँ आनो दि‍न हटले-हटले रहैत छलाह। साँझमे खोज करैत छेलखि‍न। दि‍न तँ घुमै-फि‍रैक होइ छै मुदा राति‍ तँ ठौर पकड़ैक होइ छै, तँए।
घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ शंभू घरक सभ कि‍छु वि‍सरि‍ गेल। खजुरि‍यो वि‍सरि‍ गेल। वि‍सरि‍ नै गेल मनसँ हटि‍ गेलै। तँए कि‍ दुखे मन वि‍छान पकड़ि‍ लेलक? नै। वि‍छान नै पकड़लक। नवका चानक (तीर्थानुसार) नव ज्‍योति‍ भेटलै। जहि‍ना ताड़ी देनि‍हार खजुर लपकि‍ क ताड़ पकड़ि‍ लैत तहि‍ना शंभूक खजुरी तबला पकड़ि‍ लेलक। तबला पकड़ि‍तहि‍ खजुरि‍येक हाथसँ बजबए लगल। बजबैत कते दूर गेल तेकर बोध नै रहलै। दुनि‍याँक बीच हरा गेल। जि‍महर देखे दि‍न छोड़ि‍ कि‍छु ने देखै। बाध-बोन, गाछ-बि‍रीछ, पोखरि‍-झाँखड़ि‍, हल्‍लुक-सुखाएल धार-धुर तँ सभ गाममे रहि‍ते छै। आड़ि-धुर बनौनि‍हार आकि‍ नक्‍शा-खति‍यान देखि‍नि‍हार ने खेत-पथार, गाम-घरक बात बुझैत, जे नै बुझैत ओ दि‍न-राति‍ छोड़ि‍ आरो कि‍ बुझत, तहि‍ना शंभूओ। बीच बाटपर शंभूक मनकेँ हुदि‍काबए लगल।          

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...