Friday, July 01, 2011

'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५)- PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ८५ म अंक ०१ जुलाइ २०११ (वर्ष ४ मास ४३ अंक ८५)NEPALINDIA                          
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य











३. पद्य









३.६..-बिनोद मिश्र 



४. मिथिला कला-संगीत- १.ज्योति सुनीत चौधरी .श्वेता झा (सिंगापुर) ३.गुंजन कर्ण

५. गद्य-पद्य भारती: मूल भोजपुरी- भिखारी ठाकुर (१८८७-१९७१), मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर (१९७१- )- वृद्धाश्रमक पक्षमे 


 

६. बालानां कृते-प्रेमचन्द्र मिश्र- अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता

 

७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 



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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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रामलोचन ठाकुर- पद्मा नदीक माझी (बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय) 61.28%  (220 votes)  
 
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कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द (जयदेव - संस्कृत) 15.88%  (57 votes)  
 
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ले.क.मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ- बालकथा संग्रह) 23.8%  (119 votes)  
 
जीवकांत - खिखिरक बिअरि- कविता संग्रह) 12%  (60 votes)  
 
विद्यानाथ झा "विदित" (साते भवतु सुप्रीता- बाल उपन्यास) 11.2%  (56 votes)  
 
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आनंद कुमार झा- हठात् परि‍वर्त्तन ( नाटक) 50.27%  (460 votes)  
 
विनीत उत्पल - हम पुछैत छी (कविता संग्रह ) 16.39%  (150 votes)  
 
उमेश मंडल- निश्तुकी ( कविता संग्रह) 16.72%  (153 votes)  
 
ज्योति सुनीत चौधरी- अर्चिस (कविता संग्रह ) 15.63%  (143 votes)  
 
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१. संपादकीय

मैथिली लेल एकटा अनुवाद सिद्धान्त: अनुवादक इतिहास बड्ड पुरान छै। कोनो प्राचीन भाषा जेना संस्कृत, अवेस्ता, ग्रीक आ लैटिनक कोनो कालजयी कृति जखन दुरूह हेबऽ लागल तँ ओइपर चाहे तँ भाष्य लिखबाक खगताक अनुभव भेल आ कनेक आर आगाँ ओकरा दोसर भाषामे अनुवाद कऽ बुझबाक खगताक अनुभव भेल। प्राचीन मौर्य साम्राज्यक सम्राट अशोकक पाथरपर कीलित शिलालेख सभ, कएकटा लिपि आ भाषामे, राज्यक आदेशकेँ विभिन्न प्रान्तमे प्रसारित केलक। भाष्य पहिने मूल भाषामे लिखल जाइत छल आ बादमे दोसर भाषामे लिखल जाए लागल।

मैथिलीसँ दोसर भाषा आ दोसर भाषासँ मैथिलीमे अनुवाद लेल सिद्धान्त: मैथिलीसँ सोझे दोसर भाषामे अनुवाद अखन धरि संस्कृत, बांग्ला, नेपाली, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि सीमित अछि। तहिना ऐ पाँचू भाषाक सोझ अनुवाद मैथिलीमे होइत अछि। ऐ पाँच भाषाक अतिरिक्त मराठी, मलयालम आदि भाषासँ सेहो सोझ मैथिली अनुवाद भेल अछि मुदा से नगण्य अछि। मैथिलीमे अनुवाद आ मैथिलीसँ अन्य भाषामे अनुवाद ऐ पाँचू भाषाकेँ मध्यस्थ भाषाक रूपमे लऽ कऽ होइत अछि।  अहू पाँच भाषामे हिन्दी, नेपाली आ अंग्रेजीक अतिरिक्त आन दू भाषाक मध्यस्थ भाषाक रूपमे प्रयोग सीमित अछि। अनुवादसँ कने भिन्न अछि रूपान्तरण, जेना कथाक नाट्य रूपान्तरण वा गद्यक पद्यमे पद्यक गद्यमे रूपान्तरण। ऐ मे मैथिलीसँ मैथिलीमे विधाक रूपान्तरण होइत अछि आ अनुवाद सिद्धान्तक ज्ञान नै रहने रूपान्तरकार अर्थ आ भावक अनर्थ कऽ दैत अछि। मैथिलीमे आ मैथिलीसँ अनुवादमे तँ ई समस्या आर विकट अछि।
उत्तम अनुवाद लेल किछु आवश्यक तत्त्व: शब्दशः अनुवाद करबा काल ध्यान राखू जे कहबी आ सन्दर्भक मूल भाव आबि रहल अछि आकि नै। श्ब्द, वाक्य आ भाषाक गढ़नि अक्षुण्ण रहए से ध्यानमे राखू। मूल भाषाक शब्द सभ जँ प्राचीन अछि तँ अनूदित भाषाक शब्द सभकेँ सेहो पुरान आ खाँटी राखू। मूल आ अनूदित भाषाक व्याकरण आ शब्द भण्डारक वृहत् ज्ञान एतए आवश्यक भऽ जाइत अछि। मूल भाषामे मुँह कोचिया कऽ बाजल रामनाथ, उमेशक प्रति सम्बोधनकेँ रामनाथो, उमेशोक बदलामे रामनाथहुँ, उमेशहुँ कऽ अनुवाद कएल जाएब उचित हएत मुदा सामान्य परिस्थितिमे से उचित नै हएत। से शब्द, भाव, प्रारूपमे सेहो आ मूल कृतिक देश-कालक भाषामे सेहो समानता चाही। अनुवादककेँ मूल आ अनूदित कएल जाएबला भाषाक ज्ञान तँ हेबाके चाही संगमे दुनू भाषा क्षेत्र इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान सेहो हेबाक चाही। ई मध्यस्थ भाषासँ अनुवाद करबा काल आर बेसी महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। ऐ परिस्थितिमे “दुनू भाषा क्षेत्रक इतिहास, भूगोल, लोककथा, कहबी आ ग्रम्य-वन्य आ नग्रक संस्कृतिक ज्ञान” सँ तात्पर्य अनूदित आ मूल भाषा क्षेत्रसँ हएत मध्यस्थ भाषा क्षेत्रसँ नै। कखनो काल मूल भाषाक कोनो भाषासँ सम्बन्धित तत्त्व वा गएर भाषिक तत्व (सांस्कृतिक तत्त्व) क सही-सही उदाहरण अनूदित भाषामे नै भेटैत अछि आ तखन अनुवादक गपकेँ नमराबऽ लगैत छथि वा ओइ लेल एकटा सन्निकट शब्दावली (ओइ नै भेटल तत्त्वक) देमए लगैत छथि। ऐ परिस्थितिमे सन्निकट शब्दावली देबासँ नीक गपकेँ नमरा कऽ बुझाएब वा परिशिष्ट दऽ ओकरा स्पष्ट करब हएत। ऐ सँ मूल भाषासँ मध्यस्थ माषाक माध्यमसँ कएल अनुवादमे होइबला साहित्यिक घाटाकेँ न्यून कएल जा सकत।
कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध), निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक पोथीक अनुवाद करबा काल किछु विशेष तकनीकक आवश्यकता पड़त। निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद ऐ अर्थेँ सरल अछि जे ऐ सभमे विस्तारसँ विषयक चर्चा होइत अछि आ सर्जनात्मक साहित्य {कथा, कविता, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य (गीत-प्रबन्ध)} क विपरीत भाव आ संस्कृतिक गुणांक नै रहैत अछि वा कम रहैत अछि। संगे एतए पाठक सेहो कक्षा/ विषयकक अनुसार सजाएल रहैत छथि। केमिकल नाम, बायोलोजिकल आ बोटेनिकल बाइनरी नाम आ आन सभ सिम्बल आदि जे विशिष्ट अन्तर्राष्ट्रीय संस्था सभ द्वारा स्वीकृत अछि तकर परिवर्तन वा अनुवाद अपेक्षित नै अछि। सर्जनात्मक साहित्यमे नाटक सभसँ कठिन अछि, फेर कविता अछि आ तखन कथा, जँ अनुवादकक दृष्टिकोणसँ देखी तखन। नाटकमे नाटकक पृष्ठभूमि आ परोक्ष निहितार्थकेँ चिन्हित करए पड़त संगहि पात्र सभक मनोविज्ञान बूझए पड़त। कवितामे कविताक विधासँ ओकर गढ़निसँ अनुवादकक परिचित भेनाइ आवश्यक, जेना हाइकूक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद करै बेरमे मैथिलीक वार्णिक ५/७/५ क मेल जँ अंग्रेजीक अल्फाबेटसँ करेबै तँ अहाँक अनूदित हाइकू हास्यास्पद भऽ जाएत कारण अंग्रेजीमे ५/७/५ सिलेबलक हाइकू होइ छै आ मैथिलीमे जेना वर्ण आ सिलेबलक समानता होइ छै से अंग्रेजीमे नै होइ छै। ऐ सन्दर्भमे ज्योति सुनीत चौधरीक मैथिलीसँ अंग्रेजी अनुवाद एकटा प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि। कविताक लय, बिम्बपर विचार करए पड़त संगहि कविता खण्डक कविताक मुख्य शरीरसँ मिलान करए पड़त। कथामे कथाकारक आ कथाक पात्रक संग कथाक क्रम, बैकफ्लैशक समय-कालक ज्ञान आ वातावरणक ज्ञान आवश्यक भऽ जाइत अछि। आब महाकाव्यक अनुवाद देखू, रामलोचन शरणक मैथिली रामचरित मानस अव्धीसँ मैथिलीमे अनुवाद अछि मुदा दोहा, चौपाइ, सोरठा सभ शास्त्रीय रूपेँ अनूदित भेल अछि।
संस्कृत भाषाक अनुवादक माध्यमसँ पाठन आंग्ल शासक लोकनि द्वारा प्रारम्भ भेल। ऐ विधिसँ ने लैटिनक आ नहिये ग्रीकक अध्यापन कराओल गेल छल। ऐ विधिसँ जँ अहाँ संस्कत वा कोनो भाषा सीखब तँ आचार्य आ कोविद कऽ जाएब मुदा सम्भाषण नै कएल हएत। जँ कोनो भाषाकेँ अहाँ मातृभाषा रूपेँ सीखब तखने सम्भाषण कऽ सकब, संस्कृति आदिक परिचय पाठ्यक्रममे शब्दकोष; आ लोककथा आ इतिहास/ भूगोलक समावेश कऽ कएल जा सकैत अछि।
संगणक द्वारा अनुवाद: सर्जनात्मक वा निबन्ध, स्कूल-कॉलेजक पुस्तक, संगणक विज्ञान, समाजशास्त्र, समाज विज्ञान आ प्रकृति विज्ञानक अनुवाद संगणक द्वारा प्रायोगिक रूपमे कएल जाइत अछि मुदा “कोल्ड ब्लडेड एनीमल” क अनुवाद हास्यास्पद रूपेँ “नृशंस जीव” कएल जाइत अछि। मुदा संगणकक द्वारा अनुवाद किछु क्षेत्रमे सफल रूपेँ भेल अछि, जेना विकीपीडियामे ५०० शब्दक एकटा “बेसी प्रयुक्त शब्दावली” आ २६०० शब्दक “शब्दावली”क अनुवाद केलासँ, गूगलक ट्रान्सलेशन अओजार आदिमे आधारभूत शब्दक अनुवाद केलासँ आ आन गवेषक जेना मोजिला फायरफॉक्स आदिमे अंग्रेजीक सभ पारिभाषिक संगणकीय शब्दक अनुवाद केलासँ त्रुटिविहीन स्वतः मैथिली अनुवाद भऽ जाइत अछि।
रामलोचन शरणक मैथिली राम चरित मानस

महाकाव्य वा गीत प्रबन्ध: महाकाव्यक वर्णन जे ई कतेक सर्गमे हुअए, एकर नायक केहन प्रकृतिक हुअए आ ओ उच्च कुल उत्पन्न हुअए आदि आब बुद्धिविलास मात्र कहल जाएत। जेना गद्यमे कथा होइत अछि आ विस्तारक अनुसार लघुकथा, कथा आ उपन्यासमे विभक्त कएल जाइत अछि तइ सन्दर्भमे उपन्यास (वा बीच-बीचमे नाटककक) पद्य रूपान्तरण महाकाव्य कहल जाएत। जँ ऋगवैदिक परम्परामे जाइ तँ महाकाव्यकेँ गीत-प्रबन्ध कहल जएबाक चाही।

आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस: मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आ श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण - ऐ दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत अछि। पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल, कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचना ग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़िआयल लेख सभ, ऐ तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नै स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लिअ जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधारपर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन ओ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे जे अखंड रामायण पाठ होइत अछि से बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारणपर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ। कैकटा चन्द्र रामायण आ लालदासकृत मिथिला रामायण, रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि तइ भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भऽ सकए, केर निर्माण संभव नै भऽ सकल अछि, से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नै छल, श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानस एकर प्रमाण अछि। अपन समीक्षक लोकनि ऐ मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किए नै भऽ सकलाह, एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किए नै कएल जाइत अछि। स्व.हरिमोहन झाक कोनो पोथी मैथिली अकादमी द्वारा हुनका जिबैत प्रकाशित नै भेल आ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो हुनका मृत्योपरांत देल गेलन्हि। आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम ऐ महाकाव्यक फोटोकॉपी पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ लोकनि एकरा देख कऽ आश्चर्यचकित रहि गेलाह आ अगिला साल ऐ रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाए, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नै सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही, मुदा ऐ पोथीक नै। मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायनपर आबि किए खतम भऽ जाइत अछि। आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नै अछि। अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आँगाँ ओ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा सुमन तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि। से सभकेँ ई देखल गुनल सेहो छलन्हि।

आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक गेयता: आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक प्रारंभ देखू आ एकर गेयताक तुलना चन्दा झाक रामायण आ लालदासक रामयणसँ करू:-

जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥
ता धारि बाट देखब सहि सूले। खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥
जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥
ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥
सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥
पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥
जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥
सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥


तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आ हुनकर भाषा आ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आ दुरूहता खतम कऽ देने छथि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य ओ तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रामचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे परिगणित कएल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकि रामायणक रूपांतर तमिलमे कऽ रहल छलाह तखन ओ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र अछि आ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मनसूबा बना रहल अछि जे ऐ सभटा दूधकेँ एक्के बेरमे पीबि जाइ। ओना ईहो सत्य जे कंबन कहियो (आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि) रामायण केँ अपन मौलिक कृति नै कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि, जखन कि ओ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बना देलन्हि। बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष मानैत छलाह। बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आचार्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नै पड़लन्हि किएक तँ लोकक कंठमे तुलसीक मानस बसि गेल छल, आ हुनका एकर गेयताक निर्वाह मात्र करबाक छलन्हि।

आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानस आ एकर नारी आ शूद्र-वन्यजाति विरोध प्रदर्शन: आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि,
लछुमन बान सरासन आनू।
सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥

तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि-
ढोल गमार सुद्र पसु नारी।
सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥

एकर अर्थ ई जे सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षा किंवा सबक देबा योग्य अछि, गमार सुद्र आ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नै छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नै ध्वनि भऽ जाएत। फेर समुद्र ओइ स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नै भऽ सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत छथि, आ ओइ पात्रक मुँहसँ नीक आ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता ऐपर निर्भर करैत अछि, जे ओ अपनाकेँ अपन पात्रसँ फराक कऽ पबैत अछि आकि नै। मुदा तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि। जखन भारतमे सामन्तवादी सरकार छल तखन हुनकर शूद्र आ गएर द्विज जातिपर कएल टिप्पणी अनावश्यक बुझि पड़ैए। मिथिलाक स्मृतिकार लोकनि यएह परम्परा बादोमे रखलन्हि आ आश्चर्य तँ तखन होइए जखन ऐ तरहक गएर जरूरी टिप्पणी अंग्रेजी शासनकालमे प्रणीत संस्कृत ग्रन्थ सभमे मैथिल लोकनि द्वारा कएल देखै छी, ओइ अंग्रेजी शासनमे मे ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मण सभकेँ ब्लैक इण्डियन कहै छलाह।

तुलसीक प्रासंगिकता वा कट्टरता नै वरण मात्र ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि। उपरोक्त विवादास्पद पदक अतिरिक्त आनोठाम ई जातिवादिता देखबामे अबैत अछि।

मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १२ क बादक तेसर पद देखू:-

करय बिचार कुबुद्धि कुजाती।
हैत अकाज कोन बिधि राती॥३॥


मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा ५९ क बादक पहिल पद देखू:-

कोल किरात सुता बन जोगे।
विधि रचलनि बंचित सुख भोगे॥१॥

मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १६१ क बादक चारिम पद देखू:-

विधियो सकथि न तिय हिय जानी।
सकल कपट अघ अबगुन खानी॥४॥ (स्त्रीक हृदैक गति विधातो नै बुझि सकै छथि, ई कपट, पाप आ अवगुणसँ उगडुम अछि!!)

मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा १९३ क बादक तेसर पद देखू:-

लोकवेद सबतरि जे नीचे।
छुबि जसु छाह लैछ जल सीचेँ॥३॥


तुलसी आ तेँ आचार्य रामलोचन शरण सेहो अपनाकेँ पात्रसँ बहुत ठाम फराक नै कऽ पबै छथि (कम्बन वाल्मीकिक अनुवाद करैत काल बहुत ठाम नव युगक अनुरूक अपनाकेँ फराक करैत छथि) आ तेँ मैथिली रामचरित मानस अयोध्याकाण्डक दोहा २५० क बादक तेसर पदमे वन्यजातिक मुँहसँ कहबै छथि:-


यैह हमर अछि बुझु बड़ सेबे।
बासन बसन चोराय न लेबे॥३॥


मैथिली रामचरित मानस बालकाण्डक दोहा ६२ क बादक सातम पद देखू:-

जद्यपि जग दारुण दुख नाना।
सब सौँ कठिन जाति अपमाना॥७॥


मुदा जखन बीसम शताब्दीमे साहित्य अकादेमीक पोथीमे लोरिकपर मैथिली आलेखमे एकटा सज्जन लिखै छथि जे ब्राह्मणपर कएल शूद्रक अत्याचारक विरुद्ध लोरिक ठाढ़ भेलाह तँ अकबरकालीन तुलसी आ ओकर छन्दोबद्ध अनुवादक आचार्य रामलोचन शरणकेँ की दोष देल जाए! जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रक कथा कहैत-कहैत स्त्री आ शूद्रक पाछाँ अकारण क्रूर भऽ जाइ छथि सएह हाल राम चरित मानसक अछि।

आचार्य रामलोचन शरणक गीत-प्रबन्ध मैथिली रामचरित मानसक विशेषता: मैथिली रामचरित मानस बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्य़काण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड आ उत्तरकाण्डमे विभक्त अछि। वाल्मीकि रामायणक सुनियोजित कथ्यमे किछु हेरफेर कएल गेल अछि। एकर शैली आ चरित्रक अंकन उदात्त अछि। श्रृंगार रसक प्राधान्य नै अछि मुदा राम सीताक सन्दर्भमे वियोग आ संयोग दुनू कालमे एकर प्रयोग भेल अछि। मुख्य अंगी रस अछि शान्ति, ओना ई सभटा रामभक्तिमे समाहित अछि। भक्तिक प्रधानता अछि मुदा ज्ञान आ कर्मक महत्व कम नै कएल गेल अछि, सगुणक प्राधान्य रहितहुँ निर्गुण भक्तिक महत्व कम नै भेल अछि, राम ब्रह्म छथि आ हुनकर निर्गुण आ सगुण दू रूप छन्हि। जीव आ ब्रह्म एकहि अछि। वचनक पालन हुअए वा पितृभक्ति, भ्रातृभक्ति वा नारीक प्रेम वा पतिव्रतक मैथिली रामचरित मानस ऐ सभ आदर्शसँ ओतप्रोत अछि। मैथिली रामचरित मानसमे सभ अलंकार प्रयोगमे अछि मुदा मुख्य रूपेँ रूपक आ उपमा प्रयोगमे अछि। प्रेमाख्यानमे प्रयुक्त दोहा आ चौपाइ आधारित प्रबन्ध पद्धतिक कड़वक विधिक प्रयोगक बादो संस्कृत छन्द सभ प्रयुक्त भेल अछि। मैथिली रामचरित मानसमे विद्यापतिक गीत-विधि, वीरगाथा सभक छप्पय विधि, दोहा, सोरठा, भाट सभक कवित्त-सवैया, नीतिवाक्यक सूक्ति, घनाक्षरी, तोमर, त्रिभंगी छन्दक प्रयोग भेल अछि। मनुक्खक बहुत रास टोटमाक सेहो वर्णन यत्र-तत्र भेल अछि। एकर उद्देश्य अछि मोक्ष, लोककल्याण आ रामरायक स्थापना। मुदा ऐमे रामक अतिरिक्त कृष्ण, शिव (सेतुबन्ध कालमे राम द्वारा शिवक पूजा) आ गणेशक स्तुति अछि। प्रकृति आ चरित्र दुनूक चित्रणमे मैथिली रामचरितमानस अद्वितीय अछि। कवि खिस्सा कहि रहल छथि मुदा बीच-बीचमे ई भारद्वाज-याज्ञवल्क्य आ गरुड़ काकभशुण्डीक सम्वादक माध्यमसँ सेहो कहल गेल अछि। सम्वाद शैलीक प्रयोग मैथिली रामचरितमानसमे खूब भेल अछि। लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद हुअए वा मंथरा आ कैकेयीक सम्वाद आकि रावण आ अंगदक सम्वाद, सभ ठाम नाटकक सम्वाद शैली सन रोचक पद्य अहाँकेँ भेटत। प्रारम्भक बालकाण्ड आ अन्तक उत्तरकाण्डमे ऐ गीत-प्रबन्धक दूटा ध्रुव दृष्टिमे आएत। उत्तरकाण्डमे गुरु-शिष्यक खराप होइत सम्बन्ध आ ब्राह्मणक वेद बेचबाक आ पतित हेबाक चर्चा भेटैत अछि मुदा उत्तरकाण्डमे रामराज्यक रूपरेसेहो सेहो भेटैत अछि।

मैथिली साहित्यक गीत-प्रबन्ध मध्य मैथिली रामचरितमानसक स्थान: मैथिली वा कोनो भाषामे रामक चरित वाल्मीकि रामायणसँ प्रभावित भेने बिना नै रहि सकैए। आचार्य रामलोचन शरणक तुलसीक मानसक समश्लोकी मैथिली अनुवाद ओइ अर्थेँ आर विशिष्ट भऽ जाइत अछि जे आचार्य रामलोचनशरण खाँटी मैथिली तत्वक कतौ अवहेलना नै केने छथि आ ई गीत-प्रबन्ध मैथिलीक अखन धरिक आकारमे (आ गुणात्मक रूपेँ सेहो) मैथिलीक सभसँ पैघ गीत-प्रबन्ध (महाकाव्य) अछि।


अंशुमालाक सहायता करू: १.अंशुमालाक ब्लड ग्रुप छन्हि AB+, ओना जँ अहाँक ब्लड ग्रुप दोसरो अछि तँ अहाँ हुनका लेल रक्तदान कऽ सकै छी, अहाँक रक्तक बदलामे हुनका हॉस्पीटल AB+ रक्त दऽ देतन्हि। संयोगसँ हमरो रक्त AB+ छल आ जखन हम ब्लड डोनेट कऽ आइ.जी.आइ.एम.एस.सँ घुरि रहल छलौं तँ अंशुमालाक पितासँ ई सुनि आश्चर्य भेल जे मैथिलीसँ जुड़ल क्यो गोटे (अजित आजाद आ कमल मोहन चुन्नकेँ छोड़िू) नै तँ हुनका सभक कोनो खोज खबरि लेने छलखिन्ह आ जे संस्था सभ मंगनीमे मैथिलीक नामपर हुनका बच्चीसँ बच्चेसँ मंचपर गीत गबबै छल ओ सभ एकटा ज्ञापन वा बयान तक जारी नै केलन्ह अछि। रक्तदान लेल सम्पर्क करू हुनकर पितासँ -ISHWRANAND JHA (मो. 09835492214, 09905326400)
२.अंशुमालाक एकाउन्टमे सेहो अपन आस्था अनुसार अहाँ पाइ जमा कऽ सकै छियन्हि, बच्चाक मैगी आ चिप्स आ अहाँक प्रतिदिनक पॉकेट खर्चसँ ई पाइ बहार भऽ सकैत अछि। हुनकर एकाउन्टक विवरण अछि:
Name– ANSHU MALA, Bank – State Bank of India, SBI Account Number - 30356321958 Branch – D.U, New Delhi IFSC code - SBIN0010433
फेसबुकपर विनीत उत्पल सेहो अंशुमालाक सहायता लेल ग्रुप बनेने छथि, ओतए अंशुक स्थितिक विषयमे जानकारी अपडेट कएल जा रहल अछि: ग्रुप ज्वाइन करू- http://www.facebook.com/home.php?sk=group_208980722479513
३.बिहार सरकार अंशुमालाक सहायता करबाक घोषणा केने अछि, मुदा सरकारी प्रक्रियामे कतेक झमेला होइ छै से सभकेँ बुझले हएत। बिहार सरकारक स्वास्थ्य विभागमे जे कियो छथि से प्रक्रियाक अन्तर्गत काजमे तीव्रता अनबामे मदति करथि से आग्रह। हमर जे व्यक्तिगत जान-पहिचान अछि हुनका सभसँ हम सम्पर्क साधने छी, अहाँ सभ सेहो ध्यानमे ई गप राखि आगाँ आउ।

सूचना: १. कैथी आ मिथिलाक्षर दुनू लिपिकेँ यूनीवर्सल कैरेक्टर सेट (यूनीकोड) मे एनकोड करबाक अंशुमन पाण्डेय द्वारा देल आवेदन स्वीकृत भ गेल अछि। आब ई दुनू लिपिक यूनीकोड फॉन्ट बनेबाक क्रिया क्यूमे लागि गेल अछि आ जखन एकर सभक बेर एतै ऐ दुनू लिपिक आधारभूत फॉन्ट बनेबाक क्रिया शुरू भऽ जाएत। मिथिलाक्षरक आधारभूत फॉन्टक नाम तिरहुता रहत (जेना देवनागरीक आधारभूत फॉन्टक नाम मंगल आ बांग्लाक आधारभूत फॉन्टक नाम वृन्दा अछि)। मिथिलाक्षरक फॉन्ट लेल तेसर बेर संशोधित आवेदन देल गेल रहए, दोसर आ तेसर आवेदनमे विदेहक योगदानक विस्तृत चर्चा भेल अछि, यथा- [Figure 11: Excerpt from a Maithili e-journal published as PDF (from Videha 2011: 22; Videha: A fortnightly Maithili e-journal. Issue 80 (April 15, 2011), Gajendra Thakur [ed]. http://www.videha.co.in/ ."Gajendra Thakur of New Delhi graciously met with me and corresponded at length about Maithili, offered valuable specimens of Maithili manuscripts, printed books, and other records, and provided feedback regarding requirements for the encoding of Maithili in the UCS."-Anshuman Pandey.]
सूचना: २. गूगल मैथिली: गूगल लैंगुएज टूल-
http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseProject
अपन योगदान गूगल ट्रांसलेट लेल करू, आ कएल सम्पादन बदलबा काल कारण मे (अंग्रेजीमे) "बिहारी" नाम्ना कोनो भाषा नै हेबाक चर्चा करू। ऐ लिंकपर अनुवाद करू; गूगल एकाउंट सँ लॉग इन केलाक बाद । 
http://www.google.com/transconsole/giyl/chooseActivity?project=gws&langcode=bh
ऐ लिंक http://www.google.co.in/language_tools?hl=en केँ मैथिलीक उपलब्धता लेल चेक करैत रहू।

सूचना: ३.विकीपीडिया मैथिली:
मीडियाविकीक २६०० संदेश अंग्रेजीसँ मैथिलीमे विदेहक सदस्यगण द्वारा अनूदित कऽ देल गेल अछि। आब http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai  ऐ लिंकपर Group मे जा कऽ ड्रॉपडाउन मेनूसँ अ-अनूदित मैसेज अनूदित करू। जँ अहाँ विकीपीडियाक ट्रान्सलेटर नै छी तँ http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator ऐ लिंकपर मैथिलीमे ट्रान्सलेट करबाक अनुमतिक लेल अनुरोध दियौ, ऐ सँ पहिने ओतै ऊपरमे दहिना कात लॉग-इन (जँ खाता नै अछि तँ क्रिएट अकाउन्ट) कऽ आ प्रेफरेन्समे भाषा मैथिली लऽ अपन प्रयोक्ता खाताक लिंककेँ क्लिक कऽ अपन प्रयोक्ता खात पन्ना बनाउ। किछु कालमे अहाँकेँ ट्रान्सलेट करबाक अनुमति भेट जाएत। तकरा बाद अनुवाद प्रारम्भ करू।

विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचित करैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक लैंगुएज कमेटीआब बुझि गेल अछि जे मैथिली बिहारी नामसँ बुझल जाएबलाभाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि  ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html  )
-ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे नै
रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि?
उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि।   

नीचाँक पाँचू साइट विकी मैथिली प्रोजेक्टक अछि, प्रोजेक्टकेँ आगाँ बढ़ाऊ।
http://translatewiki.net/wiki/Project:Translator

http://meta.wikimedia.org/wiki/Requests_for_new_languages/Wikipedia_Maithili

http://translatewiki.net/wiki/Special:Translate?task=untranslated&group=core-mostused&limit=2000&language=mai

http://incubator.wikimedia.org/wiki/Wp/mai

http://translatewiki.net/wiki/MediaWiki:Mainpage/mai

सूचना:४ :: विदेह द्वारा आयोजित पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११- निर्मली (जिला सुपौल):- साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कोलकाता मैथिली कवि सम्मेलन मे २१म शाताब्दीक पहिल दशकक सर्वश्रेष्ठ मैथिली कविता संग्रह "अम्बरा"क लेखक राजदेव मंडल आन श्रष्ठ कविकें नै बजाओल गेल आ ने हुनका लोकनिकेँ कोनो सूचना देल गेल। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल विदेह द्वारा पहिल "समानांतर साहित्य अकादेमी" मैथिली कवि सम्मेलन २०११" दिनांक ०९ जुलाइ २०११ केँ निर्मली (जिला सुपौल) मे आयोजित कएल जा रहल अछि, समए: ४.१५ (अपराह्न): स्थान असर्फी दास साहू समाज महिला महाविद्यालय परिसर (निर्मली- जिला सुपौल वार्ड नम्बर ७); सम्पर्क-श्री उमश मंडल-०९९३१६५४७४२। ऐ मे ककरो प्रवेष निषेध नै कएल जाएत। साहित्य अकादेमीक प्रवेश निषेधक ऐ कृत्यक सुधार लेल ई कार्यक्रम छै विरोध लेल नै..हमर प्रायोरिटी दिल्लीसँ बेसी मिथिला (भारत+नेपाल) अछि जतए मैथिलीक नेटिव स्पीकर रहै छथि। ई कार्यक्रम मैथिली नाटक आ रंगमंचमे सेहो मिथिला क्षेत्रमे शुरु हएत, आ मात्र साहित्य अकादेमीक गलतीक सुधार लेल नै वरन मैथिली नाटक आ रंगमंचमे शामिल तथाकथित मैथिली रंगमंचीय संस्था/ विद्यापति समिति / चेतना समिति/ मैथिल ब्राह्मण सभा, रहिका आदि सभक सुधार लेल सेहो कएल जाएत। कवि-सम्मेलन तँ मात्र शुरुआत अछि..मैथिली सिनेमा बनेबामे जतेक लोक अपस्याँत छथि ओइसँ कम खर्चामे तेलुगु/ हिन्दी/ तमिलक हिट फिल्म मैथिलीमे डब क' सकै छी, सीरियल/ कार्टून सभ मैथिलीमे डब क' सकै छी, भोजपुरीकेँ देखियौ जे भोजपुरी थानामे दरोगा बजैए सएह ओकर सिनेमाक हीरो सेहो बजैए, ... मुदा मैथिलीक फिल्म आ धारावाहिकमे किदनि मैथिली बाजल जाइए.. कवि-सम्मेलन आ रंगमंच/ नाटकक बादक स्टेज मैथिली फिल्म/ धारावाहिक आ कार्टूनक हएत..

( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि ११२ देशक १,८५२ ठामसँ ६२,७३० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०९,४४८ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। )

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

 

२. गद्य









मानेश्वर मनुज- मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी/ बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू
मुम्बइ ०६ जून २०११-०६-३०
आदरणीय भाइ,
हमरा पत्रकेँ सम्पादक लोकनि मिथिले-मिहिर टाइमसँ चर्चाक विशय बनबैत रहलन्हि अछि। सोमदेव कहैत छलथि जे पत्र-लेखकक रूपमे मितिला-मिहिरमे अहाँ चर्चित छलहुँ। कतेको सम्पादक हमरा आलेखकेँ पत्रक रूपमे छापि देने छथि आ कतेको एकरा सम्पादकीय बना देने छथि।
मुक्तिबोध कविता छोड़ि की डायरी लिखऽ लागल छलथि। हम अप्पन दू-टूक बात बहुतो विद्वान् आ लेखककेँ पत्रसँ आकि फोनपर कहि चुकल छियनि। स्वार्थवश ओ लोकनि ओइपर ध्यान नै दैत छथिन।
समीक्षक ओ आलोचककेँ लेखक आ कविक पहचान नै छनि, इतिहासकार लोकनि आलोचक आ समीक्षकक विषय किछु नै जनैत छथि। सभतरि मैथिलीक नामपर निजी स्वार्थ-साधना भऽ रहल अछि। दोसर दिस भाषा-वैज्ञानिक लोकनि डंकाक चोटपर कहि रहल छथि जे किछुये भाषा छोड़ि सभ भाषा मरि जाएत।
भाषा मरि जाएत तँ के रोकतैक मुदा साहित्य तँ आनो भाषामे रूपान्तरित भऽ जीबि सकैत अछि। मुदा सभ विधाक विकासक दिशामे कहाँ कतौ निःस्वार्थ प्रयास भऽ रहल अछि। पत्र सेहो साहित्यक एक विधा अछि जे मरल जा रहल अछि।
अहींक
मानेश्वर मनुज
मैथिल दृष्टिक प्रसंग मुम्बइसँ एक चिट्ठी

जीवकान्त सभ दिन क्षेत्रीयताक पृष्ठ पोषक रहलथि अछि। ओ अप्पन वार्तामे सभ दिन कहैत रहलथि अछि जे जे शक्ति झंझारपुरक माटिमे छैक ओ बेनीपट्टीक माटिमे कतऽ सँ अओतैक आ राजनगरोमे कतऽसँ अओतैक। दोसर दिस ओ हरदम गाम आ शहरक बात करैत रहैत छथि। ओ गामक लेखक छथि। आ बहुतो गोटे शहरक लेखक छथि।
हाइ स्कूलसँ बढ़ि कऽ कोनो स्कूल नै होइत छैक तकर ओ अध्यापक छलथि। पढ़बैत तँ विज्ञान छलथि मुदा ओ बी.ए.पास छथि। यानी कलाक ग्रेज्युएट छथि। ओ हाइ स्कूलक पाठ्यपुस्तक यथा अर्थशास्त्र, नागरिकशास्त्र, इतिहास, भूगोल, जीव विज्ञान आ गृह विज्ञानपर जरूर नजरि देने हेताह। ई सभ विषय एक संग बैस कऽ पढ़ि लेलाक बाद मोनक  बहुत रास अन्हार हटि जाइत छैक। शहरीकरण आधुनिक सभ्यताक परिणति अछि। जाइ देशक जतेक अधिक लोक शहरमे आबि बसि गेल अछि ओ ओतेक सभ्य कहबैत अछि। विकसित देशमे बीज आ खाद हेलीकोप्टरसँ छीटल जाइत अछि। जोताइ आ कटाइ अत्याधुनिक मशीनसँ होइत अछि।
समुन्नत गाँवकेँ शहर कहैत छैक आर शहर आ गाममे किछु अन्तर नै होइत अछि। शहरमे पाँच-पाँच एकड़ जमीनमे एकटा अस्पताल बनल रहैत अछि, दू-तीन एकड़क पार्क रहैत अछि, चौड़ा-चौड़ा सड़क रहैत अछि, नमहर-नमहर वाकिंग-स्पेस रहैत अछि, पैघ-पैघ लिफ्ट मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगमे रहैत अछि। मुदा रहबाक लेल छोट-छोट रूम रहैत अछि।
मुम्बइ महानगरमे दुपहरियाक समय जे जे होस्पीटलक अगल-बगलमे घुमि कऽ देखियौ- कतेक पिपरक गाछ आ कतेक बड़क गाछक निच्चामे कंगाल सभ बैसल छैक। जइ जगहपर एक रूमक दाम बीस लाखसँ कम नै ओतऽ भिखमंगो गुजर-बसर कऽ रहल छैक। कफ-परेड सन महग एरियामे बिल्डिंग- दोगा-दोगी- मजदूर वर्ग सेहो गुजर कऽ रहल छैक। झोपडपट्टी सभ- सरकारी जमीनक अनाधिकार अधिग्रहण छैक मुदा ओकरा केओ हटा नै पबैत छैक।
मुम्बइ महानगरमे कमसँ कम एक लाख स्त्री-पुरुष- बीच शहरमे बनल रेल-लाइनपर खुलेआम मल्ल त्याग करैत रहैत अछि। भोर पाँच बजे जे लोकल ट्रेनसँ यात्रा करी तँ ई दृश्य देखल जा सकैत अछि। जे कोनो स्त्री-पुरुष नै देखने होथि ओ लाख-लाख स्त्री-पुरुषक अंग दर्शन कऽ सकैत छथि। दोसर दिस ओतुक्का जेवन-यापनमे एतेक भागम-दौड़ छैक जे प्रति दिन रेल आ अन्य दुर्घटनामे करीब पचास आदमी मरि जाइत अछि आ ओकर कतौ ओतबो चर्च-बर्च नै होइत छैक जतेक चर्च कतौ छागर वा मुर्गीकेँ कटलाक बाद होइत छैक।
शहरमे बिल्डर सभ जमीन्दार भऽ गेल अछि, पैघ व्यापारी सभ जमीनदार भऽ गेल अछि। पैघ नेता आ पदाधिकारी सभ घोटाला कऽ आकि घुसखोरी कऽ जमीन्दार भऽ गेल अछि। ओ सभ समृद्ध (एफलुएन्ट) अछि। ओ सभ शहरक भोग कऽ रहल अछि। बाँकी सभ तँ शहरोमे गामेक दैन्य जीवन जी रहल अछि।
दृष्टिक संकीर्णता यात्रासँ समाप्त होइत छैक। योगी लोकनिक दृष्टि विशाल होइत छनि कारण ओ सभ एक ठाम नै रहैत छथि, घुमैत-फिरैत रहैत छथि। कबीर पढ़ल-लिखल नै रहथि मुदा घुमैत-फिरैत रहथि। ओ अप्पन गुरु कतौ अगल-बगलमे नै तकलथि। ओ अप्पन गुरु आधुनिक महाराष्ट्रमे आबि तकलथि। रामकेँ कोन प्रयोजन छलनि जनकपुर अएबाक। कर्णकेँ भागलपुर (आधुनिक) केँ छोड़ि गुजरात जेबाक कोन प्रयोजन छलनि। कालिदास उच्चैठ की करऽ एलथि (लोक कथा आधार)। राजनेता लोकनि घुमैत-फिरैत लोक सभसँ बातचीत करैत लोकक दर्शन करैत अप्पन दृष्टि विकसित कऽ लैत छथि। यात्रीक दृष्टिमे आकि राजकमलक दृष्टिमे जे विस्तार छलन्हि ओ हुनका लोकनिक घुमकड़ी स्वभावक कारणेँ। आइ गौरीनाथ गाम घरसँ दूर दिल्ली महानगरमे पत्रकारिता क्षेत्रमे अप्पन स्थान बना लेलन्हि अछि एकर कारण की अछि? ओ मैथिलीक अलावे हिन्दीक अत्यधिक रचनाकारसँ सम्पर्क बना लेलन्हि अछि।
बेनीपट्टीमे कहियो पाँच सौ आदमी एक दरखास्तपर दस्तखत कऽ कलक्टरक जनता दरबारमे नै देने हेतैक मुदा पाँच सौ डीलर अप्पन पक्ष लऽ जनता विरोधी पेटीशन दऽ दैत छैक। दिल्लीमे जे नै रहैत छथि आकि विश्व पुस्तक मेलामे नै जाइत छथि ओ की जानि सकैत छथि जे कतेक प्रकाशक एक ठाम जुटि सकैत अछि।
एहन व्यवस्था छैक जे सभ क्षेत्रक कार्यकर्ता आकि नेता आकि साहित्यकार देशक आ विदेशक भ्रमण करथि। एक दोसरासँ हिलथि-मिलथि, मित्रता स्थापित करथि आ बात ओ विचारक आदान-प्रदान करथि। की कहियो मैथिलीक कोनो पत्रकारकेँ आकि लेखककेँ एहन अवसर भेटलन्हि अछि फेर दृष्टिमे विकास कोना हेतन्हि।
जीवकान्तजी कहैत छथि जे हमर संस्कृति बाहर नै जाइत अछि। हमर पुस्तक बाहर नै पढ़ल जा रहल अछि। अंग्रेजीक पत्र जे एक दिनक लेल छपैत छैक एक-एक शब्दपर विचार कएल जाइत छैक, दस-दस बेर प्रुफ देखल जाइत छैक मुदा मैथिलीक पत्र-पत्रिका की पुस्तको बिना प्रुफ देखने निकलि जाइत अछि। तँ की चाहैत छी जे ई अन्यत्र पढ़ल जाएत?
सरकारक अंग विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका आ राष्ट्रपति अछि। सभक ऊपर राष्ट्रपति अछि जे मात्र एक व्यक्ति अछि। एक-एक व्यक्ति एक राष्ट्र अछि। ऐ आशयसँ साहित्यसँ समाज कहिया ने हटि गेल अछि। मुदा हमरा लोकनि स्कुलिये विद्यार्थी जकाँ तोता-रटन्त कऽ रहल छी- साहित्य समाजक दर्पण होइत अछि। एक यात्रीजी भेट गेला कि सभ हुनके नाङरि पकड़ि पार उतरऽ लागब। स्वयं अपना आपकेँ एक व्यक्तिक रूपमे स्थापित करक कोशिस नै करब।
एक अस्त्र बनैत अछि दोसर अस्त्रकेँ निरस्त कऽ देबक हेतु। एक कविता लिखाइत अछि ओइसँ पूर्वक कविताकेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक लेखक जन्म लैत छथि पूर्वक लेखककेँ खारिज कऽ देबक हेतु। एक संग्रह छपैत अछि पूर्वक संग्रहकेँ काटि देबक हेतु। ई स्पर्धा एक-दोसराक धारकेँ देखबाक हेतु व्याकुल करैत छैक। कतौ भोथ हाँसू पड़ल छैक लोक किएक देखत।
रवीन्द्रनाथकेँ चिन्ता छलनि जे आइसँ सौ साले बाद कोन कवि जनताक मनोरंजन कराओत। मुदा प्रगतिवादी लेखक मनोरंजनसँ अपन आयकेँ फराक रखैत छथि। कतौ एतेक कल्पना भऽ जाइत अछि जे सत्यक कतौ कोनो स्थाने नै रहि जाइत अछि। कतौ एतेक सत्य/ यथार्थ आबि जाइत अछि कि ओ कथा सत्य-कथा यानी अपराध कथा बनि जाइत अछि। आ परिणाम एहन बिन्दुपर नै चलि जाइक जे उत्तेजनाक संचार होइक। कठिनतम विषयकेँ कलाक माध्यमसँ कहल जाइत छैक। राजमोहन झाक प्रत्यावर्तनकथामे पति-पत्नी होटलमे जा एक राति प्रेमी-प्रेमिकाक सुख भोगैत छथि आ जखन घर अबैत छथि तँ पत्नीसँ कहैत छथि जे आ होटलक रूम लेल जे बीस रुपैया खर्च भऽ गेल ओकर मेक-अप कोना करब? स्वतन्त्रता कथिक लेल होइत छैक- व्यक्तिक सुखक लेल। अपना ओतेक कहब छैक- सुखमे सघौर, अहाँ तँ हमर सुख आ सौख दुनू मारि देलौं, दियरकेँ कहैत छैक छिनरा आ जाउतकेँ खेलड़ा!
कलकत्तामे दुर्गापूजाक समय युवक आ युवती स्वतन्त्र भऽ जाइत अछि। जतऽ घुमी जतऽ फिरी। तहिना मुम्बइमे गणेश पूजामे दीआबातीमे पश्चिम भारतमे आ पश्चिम उत्तर भारतमे चान पृथ्वीपर आबि जाइत अछि। गुजराती समाज एक अति समृद्ध समाज अछि। नवरात्रामे डांडिया मुम्बइ, बड़ोदा, सूरत, अहमदाबाद आ आन सभ छोट आ पैघ जगहपर खेलल जाइत अछि। तकर बाद लाइन लागि जाइत अछि गर्भपात केन्द्र सभमे। बंगालमे कहल जाइत छैक जे विवाहसँ पूर्व सात घर देखी आ ओइमे सँ एक चुनि ली। आर बहुत बात अछि जे बंगालक ओपेन फैक्टक रूपमे जानल जाइत अछि जकरा साहित्यकार प्रेमक रूपमे रूपान्तर केने छथि। दक्षिणे मातुली कन्या अपन विस्तार पश्चिम तक लऽ लेने छथि। शिवभक्तिक अर्थमे मिथिला तमिलनाडु आ केरलसँ मिलैत अछि। माछ आ भोजनक अर्थमे मिथिला, बंगाल, उड़ीसा आ केरलसँ मिलैत अछि। वेश-भूषा आ शरीरक आकृतिक अर्थमे मिथिला गुजरातसँ मिलैत अछि। धार्मिक रीति-रेवाज इत्यादिक अर्थमे मिथिला उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र आ गुजरातसँ मिलैत अछि।
आर्थिक दृष्टिसँ ई क्षेत्र सम्पूर्ण देशमे सभसँ पछुआएल अछि। कहैत छैक जे जतऽ दर्शन हेतैक ओतऽ मैनेजमेन्ट हेबे करतैक। जतऽ वैज्ञानिक हेतैक ओतऽ फैक्ट्री हेबे करतैक। जतऽ दवाइक फर्मूला हेतैक ओतऽ दवाइ बनबे करतैक।
आइ कोन कारणसँ जाइ भोगेन्द्र झाक बड़हा गाममे सैकड़ों इन्जीनियर, ओइ गाममे एक रस्ता नै। आइ कोन कारण अछि जे जइ स्कूलक अध्यापक जीवकान्तजी ओ स्कूल सभसँ खराप। आइ किएक देशक सभ विश्वविद्यालयसँ पाछाँ मिथिला विश्वविद्यालय आ सभ अस्पतालसँ खराप दरभंगा अस्पताल।
एहना स्थितिमे अपनामे सुधार नै आनि हमरा लोकनि मैथिल दृष्टि आ मैथिल दर्शनक बात करैत छी।
मिथिलाक पंडित शिक्षक, भनसीया, योगी आ दरबान करीब-करीब अंग्रेजक समयेसँ बंगाल, असाम, राजस्थान आ गुजरात तक पसरल छल। ई क्रम चलिते रहल। हालक वर्षमे राज्यसँ बाहर रोजगारक गति किछु बेसी जोर पकड़लक अछि। नेवीमे देखू, एयर फोर्समे देखू, आर्मीमे देखू, विभिन्न आइ.आइ.टी. मे देखू, बैंकिंग सेवामे देखू, रेल-सेवामे देखू, स्वास्थ्य-विभागमे देखू। एक-एक ठाम बिहारक लोकक प्रतिशत निनानवे प्रतिशत तक पहुँच चुकल अछि। सभ राज्य चिन्तामे अछि जे कोन रस्तासँ दोसर ठामक लोककेँ ओतऽ रोजगार पयबासँ वंचित कएल जाए। जातीयताक बन्धन तँ लगाएले जा चुकल अछि, क्षेत्रीयता आ भाषाक बन्धन सेहो लगेबाक प्रयत्न कएल जा रहल अछि। कतेको ठाम उच्च शिक्षाधारीकेँ कोनो कार्यसँ वंचित राखल जा रहल अछि तँ कतौ अन्य क्षेत्रक लोककेँ वंचित राखल जा रहल अछि आ आब पुनः क्षेत्रीय भाषाक बात उठा दोसराकेँ रोकक प्रयास भऽ रहल अछि। बिहारक छात्रक प्रवेश-पत्र आ उत्तर-पुस्तिकापर असाम, तमिलनाडु, महाराष्ट्र सभतरि प्रहार भेल अछि। एकर अछैतो बेनीपट्टी- बेहटामे केओ युवक लिख देने छलथि- बेहटा हो कि गोहाटी, अपनी मिट्टी अपना पानी। जयकान्त मिश्र सभ दिन इलाहाबादमे रहलथि आ बात मिथिलाक माटि आ पानिक करैत रहलथि। जीवकान्तजी सेहो माटि आ पानि भाषा आ भूगोलक बात करैत रहलथि अछि। मुम्बइमे एक महाराष्ट्रियन एक मैथिलसँ कहैत अछि- झा भाइ, अब मुम्बइ तो आप लोगों का हो गया, अब हम लोगों को तो यहाँ से खुर्दूबारी भागना पड़ेगा। ओतै अपनाकेँ बाकी इन्डियासँ बीस-बर्ख आगाँ कहऽबला बंगाली अधबैसीकेँ पूणाक एक सुसभ्य सुसंस्कृत वृद्ध अंग्रेजीमे डाँटि रहल छलैक- आ ओ युवक बकर-बकर मुँह ताकि रहल छल। तैओ भीड़मेसँ आबि एक गवाठीकइएक फाइट ओकरा मुँहपर मारलकैक। चुप्प रहलासँ कि हारि मानि लेलासँ सेहो केओ छोड़ैत नै छैक।
पटनाक बसमे एक मुम्बइ ट्रेन पकड़बाक लेल एक यात्री छल। बिपतिक मारले केओ परदेश जाइत अछि। वेश-भूषा वएह रहैक। केओ पुछलकैक, कतऽ जेबैक। तँ कहलकैक- बम्बइ। कोनो सुसभ्य आदमी कहलकैक- कतऽ बममे। किछुए दिनक बाद मुम्बइमे बम विस्फोट भेलैक।
मिथिलाक दृष्टि आ व्यवस्था एतेक अकिंचन भऽ गेलैक अछि। किछु स्थानीय उच्च वर्गक भोथ दिमागक नोकरिहारा शिक्षक, बैंक कर्मचारी, राज्य सरकारक विभिन्न कार्यालयक कर्मचारी आ मध्यम वर्गीय किसान तक्षक नाग जकाँ अप्पन आसन जमौने छथि आ ओ आसन अछि सामन्तवादक आसन। सामन्ती सोचसँ मैथिली साहित्य तक भरल अछि। मिथिलाक संस्कृति जकरा कहैत छी ओ किछु अलग संस्कृति नै ओ हिन्दू जीवन पद्धति अछि जे सम्पूर्ण देशमे अछि। जे अमन चैनसँ सुतऽ चाहैत छथि तिनका पेटोकेँ छुट्टी देबऽ पड़तनि। ई पद्धति आलस्यक पद्धति अछि जकरा त्यागक प्रयोजन अछि। कोनो समयमे ऐ पद्धतिक प्रधानता छलै। पैघ-पैघ किसान छलै। लोक बाहरसँ रोजगारक लेल एतऽ अबैत छैक आ गुहनारमे अप्पन झोपड़ी-पट्टी बना लैत छल- छोट लोक कहबैत छल।
मुम्बइमे तहिना दू अट्टालिकाक बीच आकि नालाक कात, गुहनारक, रेलक पटरीक काते-कात, पोस्ट ऑफिस आकि आन कोनो सरकारी कार्यालयक बगलमे, जकर भार केओ सरकारी कर्मचारी आकि अधिकारी लेबऽ लऽ तैयार नै, झोपड़ पट्टी बनि गेल अछि। पटनेमे गली सभक दुनू कात झोपड़ी ठाढ़ भऽ गेल अछि। ऐ हालातमे मिथिलाक लोक अन्यत्र जीवि रहल अछि। बोली सुन्दर छैक आवाज बहराइत छैक- हे, यौ, , अप्पन-पेपर जे छल ओ फेक देलनि। आब कथीपर सूतब। पूणे जाइत एक दम्पत्ति- जकरा देहपर कतौ लत्ता नै, आग्रह करैत छैक मुम्बइ जाएबला यात्रीसँ- जरूर आएब यौ, नासिकमे सेहो देखक बहुत चीज सभ छैक जकरा अही क्षेत्रवादक कारण खेहारि-खेहारि कऽ भगाओल जाइत अछि।
मुदा मास्टर साहेबकेँ दुःख छनि- आब भरिया-खबास नै भेटैत छनि। भनसीया नै भेटैत छनि। मुदा ठिकेदार भेट जाइत छनि। ड्राइवर भेट जाइत छनि।

बुच्ची दाइक निलामी कोना से देखू
विभा रानीक एहिना एकटा बुच्ची दाइघर-बाहर पत्रिकाक अक्टूबर-दिसम्बर २००६ अंकमे छपल छल। फेर ओ नवनीतफरवरी २००७ मे हिन्दी कहानीक रूपमे यूँ ही बुच्ची दाइ नामसँ सेहो छपल छल। विभा रानीक कथा शुरुहे सँ ओइ सभ अवगुणसँ भरल रहैत अछि जे कोनो कथाकेँ कथा बनऽसँ वंचित करैत छैक। मैथिलीक सम्पादक आ आलोचक लोकनि जतेक प्रोत्साहित हुनका केलखिन्ह ततेक कोनो आन लेखिकाकेँ नै। विभा रानीक कथा आन बहुतो लेखक जकाँ ओइ सभ तत्वसँ शुरुहेसँ भरल रहैत छन्हि जे तत्व कोनो कथाकेँ कथा कहबऽ सँ वंचित करैत छैक। छात्र जीवनमे जखन हुनकर कथा देखैत छलौं तँ सोचैत रही जे हिनका आगाँ जखन बोध हेतन्हि तँ संग्रहमे एकरा सुधारि लेतीह मुदा ओ सभ पूर्ववत खोहसँ निकसैतमे आयल अछि। विभा रानी शुद्ध-अशुद्ध रूपमे अनपढ़क बीच प्रयोग होइत जे किछु सुनैत छथि आकि सुनने छथि सभकेँ मिथिला वा मैथिल वा मैथिलीक संग जोड़ि दैत छथि- आ मिथिला नामक जतेक जे अर्जित क्रेडिट छैक- अपना माथपर लऽ लेबऽ चाहैत छथि। आइ नेता बनक हेतु जेना प्रचुर समय आ प्रचुर पैसा चाही तहिना लेखक बनक लेल सेहो प्रचुर समय आ पैसाक जरूरति पड़ैत छैक। एहन भाग्य दर्जन भरि मैथिलीक प्राध्यापक संग हिनका आ नवीन चौधरीकेँ प्राप्त छन्हि। हिन्दी विभाग सन अमन चैनक जिनगी कोनो नोकरिहारा हेतु दुर्लभ अछि आ ताहूमे हिन्दी पदाधिकारी तँ सोनामे सुगन्धे।
हरिमोहन बाबूक बुच्ची दाइकेँ उठा कऽ विभा रानी एहिना एकटा बुच्ची दाइमे लऽ अनलन्हि अछि। मिथिलामे विधवा विवाह आ अन्य समस्या सिर्फ उच्च कुल आ उच्च वर्गमे अछि। बोनिहार लोक वियाह आ तलाकक अर्थमे अमेरिका-इंगलैण्डोसँ आगाँ अछि।
विभा रानी जहाँ-तहाँ विद्यापतिक प्रसिद्ध गीत सभक गलत रूपमे उल्लेख करैत छथि। शुद्ध एना अछि:-
सर बिनु सरसिज सरसिज बिनु सर
की सरसिज..............बिनु सूरे
यौवन बिनु तन   तन बिनु यौवन
की यौवन.......पिये दूरे
एहिना एकटा बुच्ची दाइकथाक अन्तिम तीन पाँति
दुःखहि जनम लेल, दुखहि गमाओल
नयन न तिरपित भेल
हे भोलानाथ कखन हरब दुःख मोर!क कतेक गलत प्रयोग भेल अछि, जे देखल जा सकैत अछि। ध्यानाकर्षणार्थ:-
दुःखहि जनम भेल, दुःखहि गमाओल सुख सपनहुँ नहि भेल, हे भोला दानी कखन हरब दुःख मोर!

नयन न तिरपित भेलअनावश्यक शिव स्तुतिमे मिला देल गेल अछि। शुद्ध रूप एना अछि:-
कत मधुआमिनी रभसि गमाओल
नहि बुझि कैसन केलि
सैहो मधुबोल श्रवणहि सूनल
श्रुतिपथ नहि भेल
जनम अवधि हम रूप निहारल
नयन न तिरपित भेल।
विभा रानी शुरुहेसँ शब्दक प्रति अल्हड़पन देखबैत अएलथि अछि मुदा तैयो हुनकर कथा सभ ऐ नोटक संग आन सभ लेखिकाकेँ अपमानित करैत छपल अछि:- आन लेखिका जकाँ विभा रानीक कथा महिला कोटाक अन्तर्गत नै छापल जा रहल अछि।
यूँ ही बुच्चीदाइक किछु शब्द देखू- माँ-बाउजी, कहाना-वहानी, लोग-वाग, पता नहीं, पारा-पारी, घास-पुआल, जैसी बढ़ती हो चली जाती, अगर ब्राह्मण की बहु रहतीन आपकी माँ तो वे भी एक के बाद एक के बाद एक लेद-गेद जनमाती रहती, पुरुषों का होता है हमारे में, लड़कियों का नहीं। मिथिला की बेटियाँ, तिलकोर के बेल की तरह चतर गयी, अलच्छा, रंडापा, सिद्धा, आज मगर कानून बन जाने के बाद भी कहाँ कोई जयदाद देता है।
ई सभ शब्द विभारानी ककरा लेल रचने छथि। हिनका मंडन मिश्रक पनिभरनी याद नै अबैत छन्हि जे शंकराचार्यसँ संस्कृतमे बात कएने छलथि। कथाक बहन्ने, लोक कथाक बहन्ने वा संस्कार ओ उत्सवक बहन्ने कतेको ठाम विभा रानी बिहार कि मिथिला कि मधुबनीक प्रयोग गलत अर्थमे कएने छथि। कोनो कथा थूक फेकक लेल वा गूँ-मूतक बात करक लेल नै लिखल जाइत छैक। कथा सभ्यताक पहिल डेग अछि। कथाकार रामधारी सिंह दिवाकरजीवन भरि दरभंगामे रहि कहानी लिखैत रहलथि मुदा ओ कतौ दरभंगा वा मिथिलाक नाम नै लेलन्हि।
जखन तखनजनवरी-मार्च ०७ अंकमे पुनः विद्यापतिक पाँति गलत रूपमे दोहराएल गेल अछि। बड़ रे जतन सँ सिया दाइकेँ पोसलहुँ सेहो रघुवंशी नेने जाय।हेबाक चाही।
पंडित लोकनि बड़ प्रयत्नसँ मैथिलीकेँ बचौने छथि। मैथिलीक बड़प्पन अष्टम अनुसूचीमे अएलासँ नै भेल अछि। मैथिली जहिया ज्ञानक भाषा बनत तहिया मैथिलीक बड़प्पन हएत। मैथिली अनपढ़क भाषा बनल रहत तँ कि ज्ञानक कोनो विषय मैथिलीक भरोसे बैसल रहत। जीवकान्त जी कहैत छलथि जे मैथिलीक लेखक कुंठित लोकक बीच रहैत छथि तँ कुंठा नै तँ की लिखताह। जिनका कोनो विषयक ज्ञान नै ओ शिक्षक बनैत छथि, जिनका कोनो अध्ययन नै ओ लेखक बनैत छथि, कारण ओ सुविधा जीवी छथि।
जँ केओ अयोग्य व्यक्ति सम्पादक बनैत छथि कि पुरस्कारक हेतु जूरी बनैत छथि तँ ओ मैथिलीक टांग घीचि रहल छथि।
किछु आलोचक लोकनि आब कथा आ कविता लिखऽ लगलथि अछि आ किछु कथाकार लोकनि आलोचना। हम जखन ककरो लाठी भँजैत देखैत छिऐक कि नचैत देखैत छिऐक कि गबैत देखैत छिऐक वा सर्कस-सिनेमामे अपन करतबकरैत देखैत छिऐक तँ सोचैत छी जे ओ गुण मैथिलीक लेखक लोकनिमे किएक नै छैक। फुटबल, क्रिकेट कि सर्कसमे किछुओ गलती भऽ जाइत छैक तँ सभकेँ देखाइ दैत छैक मुदा साहित्यपर गवार राज्य कऽ रहल छैक से किएक ने केओ देख रहल छैक। एक गोटे कहैत छथि जे: देखैत तँ सभ छैक मुदा ककरो कोन मतलब। जेना राजमोहन झा कहलनि- लोकक सम्पर्कमे नै अएबैक तँ लोककेँ कोन मतलब जे अहाँ नीक लिखैत छी कि बेजाए। एतद्धि।



 ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कथा

बि‍हरन

जहि‍ना बैशाख-जेठक लहकैत धरती अगि‍आएल वायुमंडलक बीच हवाकेँ खसने, अनायास मेघक छोट-छोट चद्दरि सूर्ज‍ ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ीक हुमड़ैत अवाज दौड़ए लगैत, रहि‍-रहि‍ कऽ गुलाबी  इजोतक संग छि‍टकए लगैत, तँ अनुमानि‍त मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे‍ पानि‍-पाथर, ठनका संग बि‍हाड़ि‍ आबि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना रघुनन्दन आ सुलक्षणीक परि‍वारमे ज्‍योति‍ कुमारीक जन्‍मसँ भेलनि‍।
भलहि‍ं आइ-काल्हि‍ बेटीक जन्‍म भेने माए-बाप अपन सुभाग्‍यकेँ दुर्भाग्‍य मानि‍ मनकेँ कतबो कि‍अए ने कोसथि‍ जे परि‍वारमे बेटीक आगमन हि‍मालयसँ समुद्र दि‍स नि‍च्‍चा मुँहे ससरब छी मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणीकेँ नै भेलनि‍। जहि‍ना गद्दा पाबि‍ कुरसी गदगर होइत तहि‍ना खुशीसँ दुनू प्राणी रघुनन्‍दनक मन गद-गद। से खाली परि‍वारे धरि‍ नहि‍ सर-समाज, कुटुम-परि‍वार धरि‍ सेहो छलनि‍। ओना आन संगी जकाँ रघुनन्‍दन नै छलाह जे तीनि‍ये मासक पेटक बच्‍चाकेँ दुश्‍मन बनि‍ पुरूषार्थक मोछ पीजबैत आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगैत। दुनू परानी बेहद खुशी! कि‍अए नै खुशी रहि‍तथि‍, मन जे मधुमाछी सदृश्‍य मधुक संग मधुर मुस्‍कान दैत छलनि‍। पुरूष अपन वंश बढ़बै पाछू बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्‍हि‍ बौगली भरि‍ रौदमे ओंघरा देब कते उचि‍त छी? दुनू प्राणीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन ति‍रपि‍त भऽ तड़ैप-तड़ैप नचैत।
आेना तीन भाँइक पछाति‍ ज्‍योति‍क जन्‍म भेल, मुदा तइसँ पहि‍ने बेटीक आगमनो नै भेल छलनि‍ जे दोखि‍यो बनि‍तथि‍। भगवानोक कि‍रदानी कि‍ नीक छन्‍हि‍? नीको कोना रहतनि‍, काजक तते भार कपारपर रखने छथि‍ जे जखन टनकी धड़ै छन्‍हि‍ तखन खि‍सि‍या कऽ कि‍छुसँ कि‍छु कऽ दैत छथि‍। मुदा से लोक थोड़े मानतनि‍, मानबो कि‍अए करतनि‍ जखन अपने अपने हाथ-पएर लाड़ि‍-चाड़ि‍ जीबैए तखन अनेरे अनका दि‍स मुँहतक्कीक कोन जरूरत छै। कि‍अए ने कहतनि‍ जे अहाँ ि‍नर्माता छी तखन तराजूक पलड़ा एक रंग राखू, कि‍अए ककरो जेरक-जेर बेटा दइ छि‍ऐ आ ककरो जेरक-जेर बेटी। जँ देबे करै छि‍ऐ ते बुद्धि‍ कि‍अए भंगठा दइ छि‍ऐ जे बेटासँ धन अबै छै‍ आ बेटीसँ जाइ छै‍। जइसँ नीको घरमे चोंगराक जरूरत पड़ि‍ जाइ छै।

उच्‍च अफसरक परि‍वार तँए परि‍वारि‍क स्‍तर सेहो उच्‍च। भलहि‍ं कि‍अए ने माए-बाप छाँटि‍ परि‍वार होन्‍हि। खगल परि‍वार जकाँ सदति‍ गरजू नै। परि‍वारक खर्च समटल तइसँ खुलल बजारक कोनो असरि‍ नै। सरकारी दरपर सभ सुवि‍धा उपलब्‍ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलहि‍ं जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होन्‍हि। जइसँ महगी-सस्‍ती बुझैमे सेहो फेर भऽ जाइत होन्‍हि‍। मुदा परोछक बात छी चारू बच्‍चाक प्रति‍ समान सि‍नेह रहलनि‍। परि‍वारमे सभसँ छोट बच्‍चा रहने ज्‍योति‍ सबहक मनोरंजनक वस्‍तु। मुदा गुरूआइ तँ ओहि‍ना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महि‍क्का मनक टेमीसँ सदति‍ देखथि‍, जप करथि‍। आखि‍र के एहन छथि‍ जे ऐ धरतीपर ज्ञान दानी नै छथि‍। भलहि‍ं ओ अधखि‍जुए वा अधपकुए कि‍अए ने होथि‍। जहि‍ना कोनो माली केर बच्‍चा पि‍ताक संग जामंतो रंगक फूलक फुलवारीमे जि‍नगीक अनेको अवस्‍था देख चमकैत तहि‍ना भरल-पूरल परि‍वारमे ज्‍योति‍योकेँ भेलि‍। देखलनि‍ कलीमे जहि‍ना अबैत-अबैत रंगो, सौन्‍दर्यो आ महको अबैत अछि,‍ तहि‍ना ने जि‍नगी छी। जँ मनुष्‍यकेँ डोरीसँ बान्‍हल जाय तँ डोरी तोड़ैक उपायो तँ हुनके करए पड़तनि‍।
समुचि‍त वातावरण रहने ज्‍योति‍ संगी-साथीक बीच नीकक श्रेणीमे आबि‍ गेलि‍। जहि‍ना संगीक सि‍नेह तहि‍ना शि‍क्षकोक सि‍नेह भेटए लगलनि‍। टि‍कट कटाओल यात्री जहि‍ना नि‍श्चि‍न्‍तसँ गाड़ीमे सफर करैत तहि‍ना समतल जि‍नगी पाबि‍ ज्‍योति‍ आगू बढ़ए लागलि‍। जि‍नगीमे बधो अबै छै तइसँ पूर्ण अनभि‍ज्ञ ज्‍योति‍। जना कर्मकेँ धर्म बना‍ जि‍नगीक बाट बनौने हुअए।

थम्‍हसँ नि‍कलैत केराक कोसा, जहि‍ना अपन घौड़क संग हत्‍थो आ छीमि‍योक अनुमानि‍त परि‍चय दैत, फूलक कोढ़ी फूलक दैत तहि‍ना बच्‍चेसँ कुमारी ज्‍योति‍ सुफल जि‍नगीक अनुमानि‍त परि‍चय दि‍अए लागलि‍। जेना-जेना बौद्धि‍क वि‍कास होइत गेलनि‍ तेना-तेना तीनू भाँइयो बुझए लगलाह जे ज्‍योति‍ तेहन चन्‍सगर‍ अछि‍ जे आगू कि‍छु जरूर करत। जइसँ भैयारि‍ये जकाँ ज्‍योति‍क संग बेबहार करए लगलाह। लैंगि‍क प्रभाव ओतए अधि‍क देख पड़ैत जतए भाए-बहीनि‍क दूरी जते अधि‍क रहै छै। से रघुनन्‍दनक परि‍वारमे नै छलनि‍ दोसर कारण इहो छलनि‍ जे वैचारि‍क दूरी जेना आन-आन परि‍वारमे रहैत तेना सेहो नहि‍ये जकाँ छलनि‍। परि‍वारक सभ अपन-अपन दायि‍त्‍व बुझि‍ अपन-अपन काजमे दि‍न-राति‍ लागल रहैत। ओना ज्‍योति‍केँ सभ अपना-अपना नजरि‍ये देखैत। गुरूक रूप रघुनन्‍दन देखथि‍ तँ जगत-जननी जानकीक सुनैनापुर रूप माए देखथि‍। जइसँ एक-एक लूरि‍-बुद्धि‍केँ धरोहर जकाँ सजबैत छलीह। भाइक मन सामा-चकेबाक संबंधमे ओझराएल। केना नै ओझराइत? आइ धरि‍क इति‍हासक दूरी जे मेटाइत देखथि‍! कतेक प्रति‍शत परि‍वार एखन धरि‍ इति‍हासक पन्नामे लि‍खाएल अछि‍ जइमे भाए-बहीनि‍क शि‍क्षाक दूरी समतल हुअए। तँए सबहक सि‍नेहक अपन-अपन कारण। जनकपुरमे जहि‍ना रामकेँ आ मथुरामे कृष्‍णकेँ देख, देखि‍नि‍हारकेँ भेलनि‍ तहि‍ना ज्‍योति‍योक परि‍वारमे।

बाल-बोध जहि‍ना अपन मनोनुकूल वस्‍तु पाबि‍ छाती लगबैत हृदैसँ खुशी होइत तहि‍ना वि‍ज्ञान वि‍षयसँ ज्‍योति‍ सटि‍ गेलि‍। नीक -वि‍ज्ञानक वि‍षयमे- नम्‍बर आनि‍‍ बि‍जलोका जकाँ ज्‍योति‍ संगि‍यो-साथी, शि‍क्षको आ मातो-पि‍ताकेँ चमकबए लगली। हाइ स्‍कूल पएर दैते जेना अपन आँट-पेट बुझि‍ कोनो वि‍द्यार्थी साइंस तँ कोनो कामर्स तँ कोनो आर्ट वि‍षय चुनि‍ आगू बढ़ैत तहि‍ना ज्‍योति‍यो साइंस चुनि‍ नेने रहए। घरसँ बाहर धरि‍ सर्वत्र बहारे-बहार। ऋृषि‍-मुनि‍क लेल दुनि‍याँ जहि‍ना समतल देख पड़ैत, तहि‍ना स्कूलक शि‍क्षकक संग दू-दूटा भाए पाबि‍ ज्‍योति‍क दुनि‍याँ सेहो समतल। जइसँ कोनो तरहक असोकर्ज घरसँ बाहर धरि‍ नहि‍ये। असोकर्ज तँ ओइठाम होइत जतए एकपेरि‍या चरि‍ पेरि‍याक-चौवट्टी-मि‍लैक भौक होउ। भौक तँ ओतए ने बेसी बुझि‍ पड़ैत जतए जेहन चलनि‍हार होइत। जइठाम बेसी चलनि‍हार रहैत ओतए कच्‍चि‍यो सड़क पक्कि‍ये जकाँ सक्कत आ पक्कि‍यो कच्‍चि‍ये जकाँ बनि‍ जाइत।

साइंस कओलेजसँ ज्‍योति‍ फि‍जि‍क्‍ससँ नीक नम्‍वर पाबि‍ एम.एस.सी. केलक‍। जहि‍ना अखराहापर लपटैत-लपटैत पहलवानक कश बनि‍ जाइत तहि‍ना ज्‍योति‍योकेँ भेलि‍।
नारी मुक्‍ति‍ संघक स्‍थापि‍त अध्‍यक्ष होइक नाते पि‍ता रघुनन्‍दनक सि‍नेह आरो बेसी ज्‍योति‍पर। ज्‍योति‍केँ कओलेज पहुँचैत-पहुँचैत तेसरो भाय नोकरी पकड़ि‍ लेलनि‍ जइसँ आरो बेसी सुवि‍धा भेटलनि‍। ओना काजकेँ कर्म बना करैक अभ्‍यास सुलक्षणी बच्‍चेसँ लगबैत आएल रहनि‍। जइसँ घरक काजक जहनि‍ ज्‍योति‍क जेहन तक पकड़ि‍ लेने तँए जहि‍नगर। सदति‍ कर्मकेँ सहयोगी प्रेमी जकाँ दुलरबैत, प्रेम करैत। तँए कि‍ ज्‍योति‍ सुलक्षणीक बेटी नै?, परि‍वारक सभसँ बेसी सि‍नेही बेटी छि‍यनि‍। मुदा सुलक्षनीक मनमे सदति‍ एक कचोट कचोटि‍ते रहनि‍ जे कुल कन्‍या की? कुल तँ अनेको अछि‍- गुरूकुल, पि‍तृकुल, मातृकुल इत्‍यादि‍। जे पश्न अखनो धरि‍ नै सोझरेलनि‍।
एम.एस.सी. करि‍ते दुनू बेकती रघुनन्‍दनकेँ जहि‍ना बि‍नु हवोक पीपरक पात‍ डोलए लगैत, तहि‍ना ज्‍योति‍क प्रति‍ सि‍नेह डोलए लगलनि‍। अनायास दुनूक मनमे प्रश्नपर प्रश्न उठए लगलनि‍। बीस बर्खक बेटी भऽ गेलि‍, वि‍याह करब माए-बापक कर्तव्‍य कर्म छी। कओलेजक अंति‍म सीढ़ीक आगू टपि‍ चुकलि‍, संग इहो जे पारदर्शी सीसा जकाँ ज्‍योति‍क शरीर देखथि‍ जे जुआनीक रंग सगतरि‍ चमकि‍ रहल छै। ओना कओलेजक आन छात्रा जकाँ नै, मि‍थि‍लाक धरोहर कुल-कन्‍या। जे गुरूकुलमे वि‍द्याध्‍ययन करैत। दुनू प्राणीक दायि‍त्व बुझि‍ रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलनि‍- ज्‍योति‍ वि‍याहै जोकर भेल जाइए से कि‍ वि‍चार?”
संयासि‍नी जकाँ सुलक्षणी उत्तर देलखि‍न- अपन कोनो काज पछुआ कऽ नै रखने छी, जे बाकी अछि‍ अहाँक छी। तइ बीच कि‍ वि‍चार देब।
पत्नीक उत्तर सुनि‍ रघुनन्‍दन ति‍लमि‍लाइत वि‍चार करए लगलाह। एहेन उटपटांग उत्तर कि‍अए देलनि‍? मुदा सोलहो आना तँ अनुमानोसँ कोनो बात नै बुझल जा सकैत अछि‍। नीक हएत जे पुन: प्रश्न उठा आगू बजबाबी। ई तँ नि‍श्चि‍त जे एको परि‍वारमे काजक हि‍साबे सबहक सोचै-वि‍चारै आ बुझैक ढंग फुट-फुट भऽ जाइ छै। भलहि‍ं सासुसँ ऊपर कि‍अए ने जेठ सासु मानल जाए, मुदा सासु तँ सासु होइत। जहि‍ना देवालयक कपाट लग ठाढ़ भक्‍त हाथ जोड़ि‍ अपन दुखड़ा भगवानसँ सुनबैत तहि‍ना तड़पैत रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलखि‍न- संयासि‍नी जकाँ कि‍अए घरसँ पड़ाए चाहै छी। कि‍ बि‍‍सरि‍ रहल छी जे घरनी सेहो छी?”
पति‍क गंभीर वि‍चारकेँ अँकि‍ते सुलक्षणीक करेज कलपि‍ गेलनि‍ मुदा पानि‍क बहैत बेगमे जहि‍ना गोरसँ गोरि‍या-गोरि‍या‍ गोर उठाओल जाइत तहि‍ना सुलक्षणी ज्‍योति‍क जि‍नगीक धारामे ठाढ़ भऽ बजली- अहूँ कोनो हूसल नै छी, सभ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ बच्‍चे बुझैए। मुदा एतऽ से बात नै छै। अहाँ लि‍ये भलहि‍ं ज्‍योति‍ बच्‍चा हुअए मुदा ओ आेइ सीढ़ीपर पहुँच गेलि‍ अछि‍ जतऽ मनुष्‍य अपन जि‍नगीक बाट चुनैक गुण प्राप्‍त कऽ लैत अछि‍। तँए दुइये प्राणी नै, बेटाे-पुतोहूसँ वि‍चारि‍ लि‍अ।


सेनट्रल बैंकक ब्रान्च मैनेजर भोगेश्वरक संग ज्‍योति‍क वि‍याहक बात पक्का भऽ गेल। जहि‍ना ज्‍योति‍ तहि‍ना भोगेश्वर। अद्भुत मि‍लानी। वि‍षुवत रेखाक समान दूरीपर जहि‍ना उत्तरो आ दछि‍नो समान मौसम समान उपजा-बाड़ी होइत अछि,‍ तहि‍ना दुनूक बीच। अलेल कमाइ तँए छि‍ड़ि‍आएल जि‍नगी भोगेश्वरक। हजारो कोस हटि‍ भोगेश्वर अपन परि‍वारसँ रहैत। नव-नव वस्‍तुसँ भरल बजार, जे दुनि‍याँक एक कोणसँ दोसर कोण पहुँचैत, भोगेश्वर चकाचौंधमे हरा अपन माइयो-बाप आ भाइयो-भौजाइसँ दूर भऽ गेल। कि‍अए ने हएत? जखन सभकेँ अपन कर्मक फल भोगैक अधि‍कार छै तँ भोगेश्वर कि‍अए ने भोगत। एक तँ दि‍न राति‍ रूपैयाक पेंच-पाँचक गुत्‍थी खोलैक क्षमता तइपर जेकरे माए मरै तेकरे पात नै भात?
नीक बर पाबि‍ रघुनन्‍दन चंदाक ति‍जोरी -नारी मुक्‍ति‍ संघक कोष- खोलि‍ देलनि‍। कोनो अनचि‍तो तँ नहि‍ये केलनि‍। चंदो तँ मुक्‍ति‍येक लेल अछि‍। एक तँ मनी-ग्रुप अर्थशास्‍त्रसँ पी.चए.डी. तइपर सँ सेन्‍ट्रल बैकक शाखा-प्रबंधक, कि‍अए नै भोगेश्वर अपन अधि‍कारक उपयोग करत। वि‍याहक दि‍न तँइ भऽ गेल। तइ बीच ज्‍योति‍केँ, मास दि‍न पूर्व देल आवेदनक, इन्‍टर-भ्यूक चि‍ट्ठी भेटल। तहूमे वि‍याहक दि‍नसँ तीन दि‍न पूर्वक। दोहरी काज परि‍वारमे बजरि‍ गेल। छोड़ैबला कोनो नै। तइपर ज्‍योति‍ सेहो वि‍याहकेँ माइनस आ इन्‍टर-भ्‍यूकेँ पलसमे हि‍साब लगबैत। वि‍याहक ओरि‍यानक धुमसाही परि‍वारमे। मुदा ज्‍योति‍ वि‍परीत दि‍शामे मुड़ि‍ इन्‍टर-भ्‍यू दइले अड़ि‍ गेलीह। इन्‍टर-भ्‍यूओ तँ लगमे नहि‍ये जे दू-चारिघंटा समय लगा पुराओल जा सकैए। दछि‍न भारत लऽग नै। केतबो तेज दौड़ैबला गाड़ी भेल तैयो चौबीस घंटासँ पहि‍ने नै पहुँच सकैए। तहूमे वि‍याह सन शुभ काजमे बर-कन्‍याकेँ सुरक्षि‍त रहब जरूरी अछि‍। सीमा कोना पार कएल जा सकैए। गाड़ी-सवारीक कोन ठेकान। ज्‍योति‍क प्रश्न परि‍वारकेँ स्‍तब्‍ध केने। जेठ भाय प्रेमकुमारक सि‍नेह ज्‍योति‍पर उमड़ि‍ पड़लनि‍। हि‍साब लगबैत पि‍ताकेँ कहलखि‍न- वि‍याहक दि‍नसँ चौबीस घंटा पहि‍ने अवश्य पहुँच जाएब। अहाँ सभ वि‍याहक ओरि‍यान करू ज्‍योति‍क संग जाइ छी।
प्रेम कुमारक वि‍चारसँ रघुनन्‍दन दुनू काज होइत देख खुशी भेलाह। मुदा सुलक्षणीक मन आरो बेसी कडुआए लगलनि‍। खोलि‍ कऽ बजती कोना? एक तँ पुरूष-प्रधान परि‍वार तइपर सभ बापूतक एक वि‍चार। स्‍त्रीगणक कोनो ठेकाने नै। कहैले ने चारि‍ गोरे परि‍वारमे छी मुदा ननदि‍-भौजाइक संबंध केहन होइ छै से कि‍ ककरोसँ छि‍पल छै। नीक हएत जे पोल्हा कऽ बेटि‍येकेँ पुछि‍ ली। मुदा वि‍ध-बेबहारपर नजरि‍ पड़ि‍ते पुन: मन भगंठि‍ गेलनि‍। बि‍नु वि‍धि‍-बेबहारक वि‍याह केहन हएत। रस्‍ते पेरे तँ सेहो लोक वि‍याह कऽ लइए मुदा परि‍वार केहन बनै छै। आठो दि‍न तँ कमसँ कम वि‍ध-बेबहारमे लगबे करत।

ज्‍योति‍क इन्‍टर-भ्‍यूओ आ वि‍याहो भऽ गेलनि‍। अद्भुत वि‍याह तँए समाजमे चर्चक वि‍षय। चर्चो मुँह देख मुंगबा परसैत। जेहन मुँह तेहन मुंगबा। कि‍यो दुनू बेकतीक -बर-कन्‍याक- शि‍क्षाक चर्च करैत तँ कि‍यो युगक अनुकूल बर-कन्‍याक जोड़ाक। कि‍यो वि‍ध-बेबहारक लहासक चर्च करैत तँ कि‍यो समाजक अगुआएल नारी जाि‍तक। कतौ भोज-भातक चर्च चलैत, तँ कतौ गमैया बरि‍यातीक संग बजरूआ बरि‍यातीक। मेल-पाँच बरि‍याती तँए सबहक बात दमगर। इनार पोखरि‍क घाटसँ लऽ कऽ दुआर-दरबज्‍जा धरि‍ संसद चलैत। मुदा सबहक मन ओइ ि‍बन्‍दुपर अँटकि‍ जाइत जतऽ भोगेश्वर आ ज्‍योति‍क वैवाहि‍क बंधन रहए।
वि‍याहक तीन दि‍न पछाति‍ भोगेश्वर दुरागमन प्रस्‍ताव केलनि‍। प्रस्‍ताव सुनि‍ परि‍वारमे सबहक मनमे सभ रंगक वि‍चारक संग उत्तरो उठलनि‍। मुदा आगू बढ़ि‍ कि‍यो बजैले तैयार नै। मने-मन सुलक्षणी सोचथि‍ जे वि‍याहक साल तँ बर-कन्‍याक वि‍ध-बेबहार होइत। जँ वि‍ध-बेबहारक कारण नै होइत तँ कि‍अए साओन-भादो आ पूस-माघ बेटीक वि‍दागरी नै होइत। बि‍नु वि‍धि‍-बेबहारक वि‍याह तँ ओहने होइत जेहन बि‍नु मसल्‍लाक तरकारी। कहैले ने लोक बजैत अछि‍ जे फल्‍लां चीजक तरकारी खेलौं मुदा कि‍ बि‍नु मसल्‍लेक बनल छलै। जँ मसल्‍लोक सागि‍रदीसँ तरकारी बनल तँ ओकर चर्च कि‍अए ने होइ छै। तर-उपर मनकेँ होइतो कंठसँ नि‍च्‍चे सुलक्षणी ि‍वचारकेँ अँटका रखलीह। रघुनन्‍दनक मनमे भि‍न्ने वि‍चार औंढ़ मारैत रहनि‍। मुदा गारजनक हैसि‍यतसँ धड़-फड़ा कऽ बाजबो उचि‍त नै बुझि‍ सुरखुराइत मनकेँ रोकने रहलाह। मुदा तैयो होन्‍हि‍ जे बि‍नु कहने बुझता कोना? भीतरे-भीतर मन बजैत रहनि‍ जे जहि‍ना बीजू -आँठीसँ जनमल साल-दू सालक आमक गाछ- गाछ कलमी डारि‍मे छीलि‍ कऽ डोरीसँ बान्‍हि‍ कि‍छु मास जुटैले छोड़ि‍ देल जाइत तहि‍ना ने वि‍याहो छी। फागुनक कन्‍या जँ फागुनेमे सासुर चलि‍ जाथि‍ तँ समन जरब देखब सासुरमे नीक हएत? चैताबरक टाहि‍ सासुरमे नव-कन्‍याक देब उचि‍त हएत? आमक गाछीक मचकीक बारहमासा आ साओनक राधा-कृष्‍णक कदमक गाछक झूलाक अर्थे कि‍ रहत? तहीले ने वि‍याह-दुरागमनक बीच समय रहैत अछि‍। भलहि‍ं नै बनैबला रहत तँ पान-साल, तीन साल नै मुदा सालो तँ टपबए पड़त। जँ से नै टपत तँ केना सासु-ससुर, सारि‍-सरहोजि‍, सार-बहि‍नोइ, सर-समाजक बीच संबंध बनत। परि‍वारक बीच कम्‍मो दि‍नमे संबंध स्‍थापि‍त भऽ सकैए मुदा समाज तँ नमहरो आ गहींरगरो होइत अछि‍। कोनो धारक पानि‍क पैमाना तँ तखन ने नापल जाएत जखन भादोक बढ़ल आ जेठक सटकल पेटक पानि‍ नापल जाए। तहि‍ना ने समाजो छी। अपना गरजे लोक थोड़े जुरशीतल आ फगुआ आन मासमे कऽ लेत। जँ से करत तँ चरि‍ टंगा आ दू टंगामे कि‍ अनतर भेलै? एतबे ने बि‍नु सि‍ंग-नाङरिक रहत। मुदा मन ममोड़ि‍ कऽ रहि‍ गेला। अनेको कारण अनेको मनकेँ घेर‍ लेलकनि‍। ज्‍योति‍क भाए-भौजाइ‍ अखन धरि‍ धर्मसूत्र आ गृहसूत्र पढ़नहि‍ नै तँए कोनो ि‍चन्‍ता मनमे रहबे ने करनि‍। नोकरि‍या रहने होइत जे जते जल्‍दी काज फरि‍या जाएत ओते जान हल्‍लुक हएत। अनेरे सी.एल. दुइर हएत? मुदा से सारेक मनमे नै रहनि‍ भोगेश्वरक मनमे सेहो रहनि‍। बैंकमे घंटाक कोन बात जे मि‍नटोक महत्‍व छैक। सदि‍खन पाइयेक बरखा। अनेरे पा-भरि‍ खाइले दि‍न-राति‍ सासुर ओगरब कोन कबि‍लती हएत। स्‍त्रि‍ये लऽ कऽ ने सासुर, आ जे संगे रहत तँ सबदि‍ना सासुर नै भेल? जरूर भेल। अपना परि‍वारकेँ जँ सासुर बना सौंसे गाम जे ओझे बनि‍ जाएत तँ ककरा सोझा जाइक आँखि‍-मुँह रहत। मुदा तीनू भाँइ प्रेमकुमार चुप्‍पी लाधि‍ लेलनि‍ जे अखन घरक गारजन माए-बाबू छथि‍ तखन कि‍छु बाजब उचि‍त नै। मुदा मनमे तीनू भाँइकेँ शंका जरूर होन्‍हि‍ जे स्‍त्रीगणक स्‍वभाव होइत अछि‍ जे पुरूखक टीकपर चढ़ि‍ कऽ मुरगीक बाँग देब। तइ संग समाजोक डर। समाज तँ ओहन शक्‍ति‍ छी जे बि‍नु डोरि‍-पगहाक रहनौं चपरासीसँ लाट सहाएब धरि‍ सजौने अछि‍। हाकि‍म-हुकुम आ रि‍नि‍या-महाजन रहै वा नै। भलहि‍ं बि‍लाइ बाझकेँ खाए वा बि‍लाइकेँ बाझ।

जखनसँ जमाइबाबूक दुरागमनक प्रस्‍ताव परि‍वारमे आएल तखनसँ सभ सकदम! चुप्‍पा-चुप, धुप्‍पा-धुप। जइसँ धारक पानि‍ जकाँ बहैत बोल ठमकि कऽ‍ भौर दि‍अए लगल। ओना बन्न मुँह रहि‍तो आँखि‍क नाच जोर पकड़नहि‍, मुदा ि‍सर्फ मूक नाच। जेठुआ गरेक सूर-सार देखते जहि‍ना सचेत लोक पहि‍ने बाल-बच्‍चा आ माल-जालक उपाय सोचि‍ आगू डेग उठबैत तहि‍ना रघुनन्‍दनकेँ अपन भार परि‍वारक बीच उठबैक वि‍चार भेलनि‍। फुरलनि‍-संग मि‍ल करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज।जाधरि‍ नीक-अधलाक बीचक सीमा-सरहद नै बुझल जाएत ताधरि‍ हारि‍-जीतक चर्चे बचकानी। मुदा समाजो आ परि‍वारोक तँ चलैक रास्‍ता अछि‍ये। मनमे खुशी उपकलनि‍। खुशी उपकि‍ते मुँह कलसलनि‍। मुदा पत्नी सुलक्षणीक मन महुराएले! कि‍अए ने महुराएल रहतनि‍? जकरा मुँहमे ने थाल-कादो लागल अछि‍ आ ने पसीनाक सुखाएल टगहार अछि‍ ओ कि‍अए ने रूमालेसँ काज-चला लेत। मुदा जकरा मुँहमे थालो आ तह-दर-तह सुखल पसीनोक टगहार छै ओ कोना बि‍नु पानि‍ये धोनहुँ चि‍क्कन हएत। कि‍ अपनो मन मानत?
सहमत भऽ परि‍वारक सभ सुलक्षणीकेँ बजैक भार देलकनि‍। सुलक्षणी बजलीह- ओना साल भरि‍ नै तँ छओ मास, जँ सेहो नै तँ तीनि‍ओ मास, जँ सेहो नै तँ एको पनरहि‍या नै रूकताह तँ कोना हेतनि‍। जँ से नै मानताह तँ हमहूँ नै मानबनि‍।
सासुक ि‍नर्णए सुनि‍ अपन शक्‍ति‍क प्रयोग करैत भोगेश्वर बजलाह- अपन अधि‍कार क्षेत्रसँ अनचि‍न्‍ह भऽ बाजि‍ रहल छथि‍। तँए......?”
भोगेश्वरक बात सुनि‍ ज्‍योति‍क हृदैमे तरंग उठलनि‍। तरंगि‍त होइत मुँह तोड़ि‍ उत्तर दि‍अए चाहलनि‍। मुदा इन्‍टर-भ्यू मन पड़ि‍ते ठमकि‍ गेली। मुँह तँ बन्न रहलनि‍ मुदा मनमे तीन परि‍वारक टक्कर उठलनि‍। रूइ सदृश्‍य बादलक टक्करसँ ठनका बनि‍ सकैए तँ तीन परि‍वारक तीन जि‍नगीक रग्‍गर कते शक्‍ति‍शाली भऽ सकैए! दि‍न-राति‍क सीमा-सरहद तोड़ि‍ ज्‍योति‍ पति‍केँ कहलनि‍- अधि‍कार आ कर्तव्‍य हर मनुष्‍यक धरोहर सम्‍पत्ति‍ छि‍ऐ नै कि‍ खास-व्‍यक्‍ति‍क खास....?”
ज्‍योति‍क वि‍चार सुनि‍ भोगेश्वरक देह सि‍हरि‍ गेलनि‍। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत बजलाह- साते दि‍नक छुट्टी अछि‍। एक तँ अहुना आन-आन वि‍भागसँ कम छुट्टी बैंकमे होइ छै, तहूमे एते सुवि‍धा भेटै छै जे काज केनि‍हार ओहो छुट्टी काजेमे लगबए चाहैए।
तइ बीच ज्‍योति‍क मोबाइलि‍क घंटी टुनटुनाएल। मोवाइलि‍क अनभुआर नम्‍बर देख सावधानीसँ ज्‍योति‍ रि‍सीभ करैत बजलीह- हेलो।
हेलो।
अपने कतएसँ बजै छी?”
वि‍ज्ञान शोध संस्‍थानसँ। सात दि‍नक भीतर आबि‍ ज्‍वाइन कऽ लि‍अ। ओना चि‍ट्ठि‍ओ पठा देने छी।
ज्‍वाइनि‍ंगक समाचार सुनि‍ ज्‍योति‍क मन ओहि‍ना खि‍ल उठलनि‍ जहि‍ना फूलक कली कोनो वस्‍तुसँ दवा तरेतर तँ खि‍लैत रहैत, जे समए पाबि‍ फुड़फुड़ा कऽ फूलक रूपमे आबि‍ जाइत। अखन धरि‍क वि‍चार ज्‍योति‍क तर पड़ि‍ गेलनि‍ आ नव दुनि‍याँक नव वि‍चार उपर चढ़ि‍ गेलनि‍। रघुनन्‍दनकेँ कहलनि‍- बाबूजी, अपन कर्तव्‍य जइ रूपे अपने नि‍माहलौं बहुत कम लोक नि‍माहि‍ पबैए। आग्रह करब जे ककरो जि‍नगीक रास्‍ताक बाधक नै बनि‍ऐ।
ज्‍योति‍क बात सुनि‍ जि‍ज्ञासा करैत जेठ भाय प्रेमकुमार प्रश्न उठौलनि‍- कि‍ रास्‍ताक बाधा?”
ज्‍योति‍- भाय सहाएब, अखन जबाबक उचि‍त समए नै अछि‍। अखन एतबे जे काल्हि‍ चलि‍ कऽ हमरा शोध संस्‍थान पहुँचा दि‍अ।
ज्‍योति‍क बात सुनि‍ सुलक्षणी पुछलखि‍न- आइ तीनि‍ये दि‍न वि‍याहक भेलह हेन, बहुत वि‍ध-बेबहार पछुआएल छह?”
जे पछुआएल अछि‍ ओ पाछु हएत। मुदा कोनो हालतमे काल्हि‍ जेबे करब। चाहे......?”
ज्‍योति‍क संकल्‍पि‍त वि‍चार सुनि‍ भोगेश्वर बजलाह- भाय-सहाएब, काल्हि‍ये हमहूँ चलि‍ जाएब। सभ संगे चलब, हम हाबड़ामे उतड़ि‍ जाएब आ ई सभ आगू बढ़ि‍ जइहथि‍।
सएह भेल। ज्‍योति‍केँ शोध संस्‍थान पहुँचा तीनू भाँइ प्रेमकुमार घुरि‍ कऽ घर आबि‍ गेलाह।

उर्वर भूमि‍क बनल परतीमे जहि‍ना जोत-कोर, नमीक संग बीआ पड़ि‍ते, कि‍छुए दि‍न पछाति‍ हरि‍या उठैत तहि‍ना ज्‍योति‍क उर्वर शक्‍ति‍मे अनुसंधानक नव-नव अंकुर पानि‍क हि‍लकोर जकाँ उठए लगलनि‍। एक नै अनेक। जहि‍ना पोखरि‍मे झि‍झरी जकाँ पानि‍क हि‍लकोर चलैत रहैत तहि‍ना ज्‍योति‍क मनमे सेहो चलए लगलनि‍। भूखल व्‍यक्‍ति‍केँ अपन अन्नक भंडार भेने, वस्‍त्रहीनकेँ वस्‍त्र भेने, गृहवि‍हीनकेँ गृह भेने जहि‍ना वि‍शाल जल-राशि‍ पाबि‍ नदी उफनि‍ जाइत तहि‍ना ज्‍योति‍क मन उफनि‍ गेलनि‍ आइ धरि‍क दुनि‍याँ। नव दुनि‍याँ, नव-नव सुर्ज-चान, ग्रह-नक्षत्र, नव-नव वस्‍तुसँ सजल दुि‍नयाँ। ओ दुि‍नयाँ जइठाम पहुँच मनुष्‍य सृजन शक्‍ति‍ प्राप्‍त कऽ सृजक बनि‍ सृजन करए लगैत। ज्‍योति‍-ज्‍योति‍ नै सृजक बनि‍ गेलीह।
नन्‍दन बनक माली जहि‍ना अपन जि‍नगी ओइ वनकेँ उत्‍सर्ग कऽ नव-नव फूल-फलक गाछ आन-आन जगहसँ जोहि‍ आनि‍ फुलवारी सृजैत, जकरा देख माली पुत्र अपन भवि‍ष्य बुझि‍ एक संग छि‍ड़ि‍आएल जामंतो जि‍नगी लोढ़ि‍, फुलडाली सजा, देवमंदि‍रक लेल रखए चाहैत तहि‍ना ज्‍योति‍केँ, श्रृंगी ऋृषि‍क वि‍शाल उपवन भेट गेलनि‍। जइसँ ओइ माली पुत्र जकाँ अपन भवि‍ष्‍य देखए लगली। दू धारक बीच महारपर ठाढ़ भऽ, एक दि‍स तड़ा-उपड़ी गि‍रल मनुष्‍य तँ दोसर दि‍स जि‍नगीक खेलौना हाथमे लेने समुद्र दि‍स पीह-पाह करैत धारमे उधि‍आएल जाइत। उगैत-डूबैत देखलनि‍ जे कि‍यो मात्र पति‍-पत्नीक जीवन लीलाकेँ जि‍नगी बुझि‍ तँ कि‍यो अमरलत्ती सदृश्‍य वंश-वृक्षपर लतड़बकेँ, कि‍यो धार-समुद्रक बीच धरतीकेँ तँ कि‍यो अकास-पतालक बीचक वि‍शाल वसुदेवकेँ। देखैत-देखैत ज्‍योति‍क मन बेसम्‍हार भऽ गेलनि‍। अपन जुआनीक खि‍लैत कलीक संग चढ़ैत तन, ऊफनैत मनकेँ सम्‍हारि‍ धारमे कुदए चाहली। मुदा मनमे नचलनि‍ माए-बाप! धरतीक प्रथम गुरू! जहि‍ना शि‍क्षक सि‍लेटपर खांत लि‍ख शि‍ष्‍यकेँ सि‍खबैत तहि‍ना शि‍ष्‍यो ने लि‍ख शि‍क्षकसँ शुद्ध करबैत। शुद्ध होइते ओहो खांत ने खांत बनि‍ जाइत। रील जकाँ माता-पि‍ताक सटले पति देखलनि‍। मुदा कि‍छुए क्षण धरि‍ मनमे अंटकलनि‍। वि‍याहक वि‍धो तँ पछुआएले अछि‍! लगले फेर माता-पि‍ता आबि‍ आगूमे ठाढ़ भऽ गेलनि‍!
राति‍-दि‍न ज्‍योति‍क मन साओनक मेघ जकाँ उमड़ए-घुमड़ए लगलनि‍। धारमे चलैत नाह जकाँ डोलि‍-पत्ता हुअए लगलनि‍। आँखि‍ उठा तकलनि‍ तँ देखलनि‍ जे माता-पि‍ता छोड़ि‍ कहाँ कि‍यो छथि‍। फेर लगले मन घुरलनि‍ तँ सभ कि‍छु देखलनि‍। कि‍ नै अछि‍? मातृभूमि‍क संग पि‍तृभूमि‍ सेहो अछि‍। मनमे खुशी एलनि‍। होइत भोर कागज-कलम नि‍कालि‍ पि‍ताकेँ पत्र लि‍खए लगलीह-

माता-पि‍ता, सहस्र कोटि‍ प्रणाम।
एक जि‍नगीक आखरी आ दोसरक पहि‍ल पत्र लि‍खैत मन उमकि‍ रहल अछि‍। तँए कतौ शुद्ध-अशुद्ध लि‍खा जाए, से माफ करब। सुधारि‍ कऽ पढ़ि‍ लेब। अपने लोकनि‍क सेवा, शि‍खर सदृश्‍य शि‍ष्‍य जकाँ शि‍रोधार्य केने रहब। जहि‍ना बादलक बुन्न धरतीपर अबि‍ते धरि‍या धार होइत समुद्र दि‍स बढ़ैत तहि‍ना अपने दुनू धरि‍या देलौं। कुल-कन्‍या वा कुल-कलंकनी बनब हमर कर्म छी। मुदा बेटी तँ अहींक छी। हमहूँ तँ एतै बसब। तँए ताधरि‍क छुट्टी असीरवादक संग दि‍अ जे वास बना बसए लगी।

ज्‍योति।

पत्र पहुँचते अह्लादसँ दुनू बेकती रघुनन्‍दन आ सुलक्षणी, बेटी ज्‍योति‍क पत्र पढ़ैक सुर-सार केलनि‍। पत्रपर नजरि‍ दौड़ैबते दुनू बेकती अलि‍सा गेलाह। आगूमे अन्‍हार पसरि‍ गेलनि‍। मुदा मन लगले भक्‍क खोलि‍ रघुनन्‍दन पत्नीकेँ कहलखि‍न- पत्रक उत्तर देब जरूरी अछि‍ मुदा कि‍ लि‍खब से फुरबे ने करैए।
जेहने गर्म-ठंढ़क बीचक सीमा असथि‍र रहैत तेहने चि‍त्ते सुलक्षणी पति‍केँ वि‍चार देलखि‍न- कोन लपौरीमे पड़ल छी। माए-बाप ककरो जन्‍म दइ छै। जीबैले अपने ने रौद-वसात सहए पड़तै। आब अहीं कहू जे एहनो बात पत्रमे लि‍ख बेचारीक पढ़ैक समए बड़देबै? रहल असीरवादक तँ एतैसँ दुनू प्राणी मि‍ल दऽ दि‍यौ।

(ई कथा युवा साहि‍त्‍कार- श्री आशीष अनचि‍नहार लेल)
 



 
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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