Friday, June 17, 2011

'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३) PART III


३. पद्य








३.६.१. पंकज कुमार झा  .नवीन कुमार आशा

३.७. १.रामवि‍लास साहु २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल 'झारूदार' .किशन कारीगर-ग़रीब४.जगदीश प्रसाद मण्डल

१.जगदीश चन्द्र अनिल- गजल २. रवि भूषण पाठक- मरणोपरांत-३
जगदीश चन्द्र अनिल (मूल नाम- जगदीश चन्द्र ठाकुर, जन्म: 27.11.1950,शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। मैथिलीमे प्रकाशित पोथी-1. तोरा अडनामे -गीत संग्रह-1978 2. धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-1999

गजल - जगदीश चन्द्र अनिल

पोखरिमे मखान गामे-गामे
दारू के दोकान गामे-गामे।

दिनमे पूजा राति बिताबय चोरीमे
रावण के खरुहान गामे-गामे।

कबुला केलक
, पूर मनोरथ भेलै लोकक
गेल छागर के जान गामे-गामे।

लोक मुतैए ठाढे-ठाढे माथे पर
टाका केर मचान गामे-गामे।

ब्याहक दू दिन बाद एलैए वर-वरियाती
सभ रस्ता पर जाम गामे-गामे।
रवि भूषण पाठक
मरणोपरांत-३

मरनाहर के यादि करू
हे चन्द्रदेव
,राम ,भूषण
आ कृष्णमोहन
मरनाहर के यादि करू
जेेना मंदिरक निरमाल
बीतल सम्मेलनक पोस्टर
आरती पूजाक बाद शालिग्राम ।
ई नइ कि
ई देलाह
आ ई नइ देलाह
रोड पर अपने घर बनेलाह
आ हमरा बँसबिट्टी देलाह
अपने भीठा
आ हमरा उसरौठी देलाह
भाइ पर कम
आ बेटा पर बेशी ध्यान देलाह
ई आहक तुकबन्दी बंद करू
मरनाहर ककरो सँ किछु नइ लेलक
भले ककरो किछु कम देने होए ।
ताहि दुआरे आबू
आ काज मे रमि जाउ
जमीन जाल खेत मकान
गाछी बाँस रहबे करतइ
काल्हि सँ बाँटब
आ बाँटिते रहब ।
हयओ इंजीनियर साहेब
बजाबू खुआबू विनय सँ
ई धरती हरदम नीचा
आ अकाश हरदम ऊपरे रहैत छैक
अहाँक पुरूषार्थ सँ अविचलित
मूड़ी कनि नीचा आ
छाती बिन उतान केने
आनू मुँह पर कनि
विज्ञापित नकली मुसकान
गौंआ घरूआ
निमंत्रित छथिन्ह
ई नइ छथिन्ह
खबास आ जोन
ई नइ छथिन्ह
पुल बान्हक ठीकेदार
बिसरि अपन नाम पद
स्वागत करू सब के ।
चाहे केओ कतबो खगल
कपड़ा लत्ता फाटल चीटल
झुकि जाउ स्वागत मे
सम्मान
,मर्यादा क तमघैल कहिया ले राखब
खुलि के खर्च करू
संचित प्रतिष्ठा के बेन बनाउ
आउ
,झुकि जाउ
भोज काल
पसरि गेलइ सुअन्नक गंध
आब
लागलाह निमंत्रित
घुसक
लागलइ बिलाइ कुकुर
चौकस कौआ उल्लू बनबिलाइ
बैस
लागलइ पांति क पांति
आब
लागलइ जेरि क जेर
विदा भेलाह गौंआ दियाद
नून तीमन क मीमांसा करैत
सुपारी चून लैत
कुरता खोलि गरदनि पर राखैत
साफ कर
लागलइ जोन खबास
पांति मे गिरल पत्ता
भात दालि दही बरी
फाटल पात छिट्टा मे जाइतो जाइत
गिरि जाइ किछु भात किछु दही
दही क विषेन गंध दालि तरकारी मे मिलि
बना देलकए भोजेन !भोजेन !
भोजगंध अलसियाब
लागलइ
दौड़
लागलइ गोला करिया कुकुर
हा हा कर
लागलाह दामो सुरेश
चिकर
लागलाह बैजू बाबू
गंगेश जी मन्नू बाबू
जल्दी ला रे खर्रा पानि झारू
उठाबू अओ पात
लाबू भात
कहाँ गेलइ तरकारी दालि
दूनू तरकारी एक साथ उठाबू
आब बरी भ गेलइ
बस दही उठाउ
ओमहर सँ के उठि रहल अछि
बैसू !बैसू !बैसू !
देखब कुकुर पांति मे नइ घुसए
हओ एमहर दही छूटि गेलइ
चलू आब पातिल राखू
भंडार घर बन्द करू



 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.गंगेश गुंजन राधा- ३० म खेप २.
जवाहर लाल कश्यप (1981- )

१.
गंगेश गुंजन
राधा- ३० म खेप
कोनो प्रसंग मे की क' जाइछ मनुष्य
कोनो प्रसंगें की भ' जाइछ मनुष्य
सेहो एकटा विचित्र प्रहेलिका थिक
देखबा मे जे यथार्थ बुझाइत अछि
बेशी काल से नितान्त अपूर्ण आ भ्रामक निकलैत अछि
तें तर्क निष्कर्ष प्रयत्न बड़ सार्थक
कम संदेहास्पद अधिक होइत अछि
ई सबटा मनुक्खेक द्वारा मनुक्खेक
होइत अछि एही दशा दिशा मे लोक
पर पीड़न सँ ल' आत्म पीड़नक रोगी बनि जाइत अछि
उपचारक उपहास कर' लागि जाइत अछि आ
दुःखक उपभोग कर' लगैत अछि। भोग नहि, उपभोग।
सात रंग सुन्दर सृष्टि कें एक रंग पीयर-पीयर आ
रुग्ण देख'-बूझ' आ कह' लगैत अछि, मनुक्ख
नितांत अपन झीवन-भोगक आँखियें, भरि समाज
संसार कें देख' आ बूझ' लगैत अछि, अपन सैह
नियति बना लैत अछि, सबटा ओहन यथार्थ जे
ओकरा अतिरिक्तो सौंसे समाजक लोकक किछु यथार्थ सेहो
होइत छैक-भ' सकैत छैक तकरा पर ध्यान देब तँ भिन्न
ओकर अस्तित्वे सँ अनभिज्ञ होइत चलि जाइत अछि
प्रति पल,दिन,मास वर्ष, आयु स्वयं अपना चतुर्दिक एकटा
रोगाह परिवेश निर्मित कर' लगैत अछि आ बाँचल अपन
समस्त जिजीविषा-ऊर्जा कें एहि बुद्धिये दिशा मे सक्रिय क' लैत अछि
मनुख्ख अपने विरुद्ध अपना चारू कात बन्धन बान्हि लैत अछि।
अपन गति, अपन सहज जीवन-प्रवाह कें अनेरेक अवरोधक
पहाड़ी चेखान सभक अपनहि निर्मित बाधा सब सँ कुंठित क' लैत अछि।
अपन से कुंठा अपन स्नेही,संबंधी, सौंसे समाज पर उगलैत रहैत अछि।
जत'-जत'सृजन छैक ओत' ओत' संहारक ब्यौंत-वातावरण बनब' लगैत अछि।
अपन, नितांत अपन कुंठाक माहुर - मनें ओ अपना अतिरिक्त सभकें कलुषित,
जीवन विरोधी आ अमानुष बुझबाक तदनुरूपे आचरण करबाक
एकटा दुःस्वभाव बना लैत अछि,
सबकें व्यर्थ ,बाहरी लोक बना देबाक अपनहि सक्रिय मनोदशा मे,
अपनहि असकर एकान्त तथा दयनीय बनि क' रहि जाइछ,
से ओकरा बुझबा मे अबैत नहिं छैक। नहि बुझबा मे अबैत छैक जे
ओ भ' चुकल अछि -रोगी, मनोरोगी !
देह-रोग सँ बहुत बेशी, बहुत गंभीर मनोरोग...
-' तँ कि हम मनोरोगी भ' गेलौंहें, हम ?'
अकस्मात् राधाक प्राण चौंकल। स्वयं के पूछ' लागल यैह टा प्रश्न !
गुंजित-अनुगुंजित-प्रति गुंजित...
बड़ आर्त स्मरण कएलनि -' हे कृष्ण !'
किछु नहि हएत, कृष्ण कें बजौलहु सँ हएत नहि किछु,
आने जेकाँ हुनको छनि आब कम्मे फुरसति
बहुत रास छनि कपार पर काज, उत्तर दायित्वक पैघ संसार
हुनको आखिर चाहियनि अपन काज-कर्तव्य सँ अवकाश
हुनको संसार मे बहुत किछु घटित भ' रहलनिहें न'
हुनको मोनक स्थिति आब नहि छनि स्वाधीन, ने छनि
किछुओ नितांत मनमौजी-अपनहि सुखक संग रहब संभव नहि छनि हुनको लेल
ओहो अपना प्रकार सँ फिफियाइत रहैत छथि,
छुच्छ गाय चरायब आ बँसुरी बजायब नहि रहि गेलनिहें हुनक एकमात्र काज।
माखन चोरायब भ' रहल छनि दुर्घट !
गाम मे कम दूध देब' लगलैक अछि सभ घरक गाय,
दुब्बर भ' रहलैए नेरू-बाछी,
गायक हुकड़ब नहि रहलै आब असंभव,
' रहल छैक आइ काल्हि बेसी काल ।
सुन्नर कोमल गुड़कुनियाँ लैत नेरू पर्यन्त भ' रहलैक अकाल काल कवलित
अपना मायेक सोझाँ देखैत गाय माय होइछ मनुक्ख नहि,
मनुक्कक माय कें पर्यन्त यद्यपि सह' पड़ि रहलैक अछि-संतान शोक !
चर-चाँचर सभक हरियरी जानि नहि कोन अदृश्य महापशु अन्हरिया,
चरि क' चलि गेलय केकरो नहि ज्ञात।
सौंसे फाटल शुष्क माटिक धरती पर पीयर-पीयर सुखएल खुट्टी-खुट्टी
चलैत पएर सभक तरबा मे गड़ैत
जे यमुना अपना कंठ धरि ऊपर आबि क' ' देत छलीह समय-समय पर हुलकी,
स्वयं दूबरि गता, स्थिर भेलि स्तब्ध छथि।
धार-कातक सघन रंग लता-वृक्ष ?
केहन भेल श्रीहीन तट !
स्तब्धे अछि बेसी बस्तु। मथुराक बेशी घटना स्थल, लोक
लोकक आचार-व्यवहार स्तब्ध'
कोनो परोक्ष बोझक त'र प्रतिपल दबायल जाइत ..
ककरो नहि भ' पाबि रहलैये अंटकर एकर कोनो अनुमान।
अपना-अपना घर मे सब क्षुब्ध बैसल। हेराएल छैक ज्ञान !
पूछ' चाहैत अछि सब एक दोसरा कें मुदा पड़ितहि ओकर आकृति अपना सोझाँ,
बदलि जाइत अछि लोकक मन ओकर उदासीक ध्यान
भम पड़ैत अछि मोन,मोनक उदासी सँ भरल सब दलान
कृष्ण एही सब मे छथि ओझरायल करैत आवश्यक अनुसंधान
कृष्ण छथि किन्तु अन्यथा सेहो हरन-फिरीसान
जेना साँस कोनो आन देह ल' रहल हो अन्त'
जेना देह कोनो आन नाक सँ घिचि रहल हो साँस
जेना देह हो कतहु, क्रिया आ स्पंदन होइत हो कतहु अन्त' 
जेना राधा छथि अपना आँगन एकान्त मे
कृष्ण अपना कर्म, क्रिया-कलापक संसार मे अपस्यांत
होइत परस्पर एक दोसरा सन करैत क्रिया अप्पन-अप्पन
काज कतहु कारण कतहु ओतहु सेह, सैह एतहु
ककरा लेल के अछि विकल-बचैन
ककरा लेल ककरा ननहि अबैत छैक कतेक दिन सँ चैन
निर्णय करब अछि असंभव।
एना किएक एहि समय मे बेसी रास बात जे,
नितांत छल सहज संभव, ' गेलय निठ्ठाहे असंभव,
हाथ सँबाहर, बेहाथ !
स्थिति यैह यैह स्थिति दू टा पीठ दू टा विरुद्ध
बेशी किछु विरुद्ध किएक भ' रहलय एहि युगक बेसी विषय
भाव आ वस्तु एना विरुद्ध...
(जारी...)



जवाहर लाल कश्यप (1981- )

पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।

                   समयक धार
अहॉके याद होयत , वा नहि
एकटा आमक गाछ छलै   
रस्ता कात मे, पोखरि पर
खुब झमटगर
ओकरे छॉह मे खेलै छलैं      
भोड आ सॉझ, कबड्डी वा किरकेट
मोन परैत अछि ,बहुत रास बात
पूसक शीतलहर, माघक मज्जर
कोयलक कू, होलीके पू
कलम गाछी, बरद बाछी
फ़ुलही थाडी, कटही गाडी
चौरचन आ जीतिया,
ठकुया पीडिकिया
बाध बोन ,तीतली के पाछा उडैत मोन
धानक लावा, दुधक डावा
वियाहक चुमान ,कोजगराके मखान
विधक गीत,बचपनक मीत
पुरहर आ पाती, दीयाबाती
छैठक पूजा, चाउरक भुसबा
गामक भोज ,याद आवय रोज
समयक धार मे भसिया गेलै
बहुत रास बात
देखैत रहि गेलँहु हम
मुक दर्शक,
निरीह प्राणी जकॉ
समयक संग भसिया गेलँहु हम
आब ने ओ गाछ अछि,
ने बहुत रास बात

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
ज्योति सुनीत चौधरी
ब्रह्महास्त्र

अन्तर्जालक सुविधा छल तऽ बड़ी नीक
ई मेल सऽ दुनिया भऽ गेल छल नजदीक
प््रातिद्वंदतामे दामो भऽ गेल छल ठीक
ऑनलाइन ज्योतिष धेने पाखंडीक टीक

समाचार होय वा होय मनोरंजनक बात
वेबसाईट देने छल टीवी रेडीयो के मात
मोनक माफित घरे बैसल करू बजार हाट
शौक सऽ सीखू आ सिखाऊ भानसभात

मुदा अवगुणक मेल रहिते अछि गुणक संग
हैकरक उद्दण्डता सऽ व्याकुल रहल मन
उपाय बड़नीक सूझल फेर ब्रह्महास्त्र सन
पासवर्ड मे लिखलहुँ हैकरके नामपर डहकन।।
 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
उमेश मण्‍डल
संस्‍कार गीत (संकलन)


गोसाइ गीत (मल्‍लाह)

कमला

कमला-कमला सुनै छलौं कमला बड़ दूर हेऽऽ
गहबर पहसैत कमला भए गेल कसहूर हे,
अन देलौं धन देलौं लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे माइ बि‍नु लागै य सुनऽ हे।

कोयल-कोयला सनै छलौं कोयला बड़ी दूर हेऽऽ
गोबर पहसैते कोयला भऽ गेल मसहूर हे
अन देलौं धन देलौं लक्ष्‍मी बहुत हे
जे भाति‍ज बि‍नु लागै य सुन हे
कोयला-कोयला.....।

मातैर-मातैर सुनै छलौं मातैर बड़ी दूर हे
अन देलौं धन देलौं, लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे स्‍वमी बि‍नु लागै य सुन हे
मातैर-मातैर.....।

ससि‍या-ससि‍या सुनै छलौं, ससि‍या बड़ी दूर हे
अन देलौं धन देलौं, लक्ष्‍मी बहुत हे
एकेटा जे बालक बि‍नु लागै य सुन हे
कमला-कमला......।

2
कमला मैया बसत बड़ी दूर
गमक लागे गेंदा फूल
 कथी डालि‍ लोरहब बेली-चमेली
कथी डालि‍ लोरहब अरहूल हे
गमक लागे गेंदा फूल कमला मैया.....
कि‍नका चढ़ाएब बेली-चमेली
कि‍नका चढ़ाएब अरहूल
गमक लागे गेंदा फूल-2
कमला चढ़ाएब बेली-चमेली
कोयला चढ़ाएब अरहूल,
गमक लागे गेंदा फूल हे
कमला...कि‍नका सँ मांगब अन-धन सोनमा
कि‍नकासँ मांगब सोहाग गे सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल वर लाल हे
ससि‍या सँ मांगब अन-धन सोनमा
मातैर सँ मांगब सोहाग गे
मलहि‍नयाँ देखै मे फूल वर लाल....।

3
कटबै मे सोना सुतरि‍या बि‍नबै झुमरि‍ जाल हे
जाल फरि‍-फरि‍ कमला एलखि‍न
सन-झुन लागै गोहबरि‍या
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हेऽऽ
कटबै......
जाल फरि‍-फरि‍ गांगो एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक,
सुन लगै गोहबरि‍या हे-2
कटबै.........
जाल फरि‍-फरि‍ मातैर एलखि‍न
रून-झुन लगै गोहबरि‍या हे
कहाँ गेली परलोभि‍या सेवक
सुन लगै गोहबरि‍या हे
कटबै.....
बि‍नबै झुमरि‍ जाल हे।

4
जग मग जग मग ज्‍योति‍ जलै मंदि‍रमे
देखि‍यौ कमला के श्रृंगर कमला के
लट मे तेल सोभे हुनका सेंदुर के
अधि‍कार जग मग जलै मंदि‍र मे
देखि‍यौ मातैर के नाक मे नथि‍या सोभे
हुनका झुमका के अधि‍कार
जग मग जलै मंदि‍र मे ससि‍या के मांग मे
टि‍का सोभे हुनका होसली के अधि‍कार
जग मग जग मग ज्‍योति‍ जलै मंदि‍र मे
कमला श्रृंगार.....।

गोसाइ (डोमीन)

करि‍या कुखा हे काली माय लेलनि‍ जोरि‍ आइ हे
मैया एक कोस गेलऽ हे काली माय दुइ कोस गेलऽ हे
काली माइ तेसर कोस उठल शि‍कार हे
हकन कनै छै काली बन के मयुर हे
बकसि‍ दि‍यौ सीर के सि‍न्‍दुर हे
सारी रात नटुआ नचाबऽ हे
होइत भोर मे उसारब हे......।

2
एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँ
हमरा पानि‍ सेब देवता अरैध के लबि‍हेँ गै
एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँऽ?
हमरा गौरध्‍या सन अरैध के लबि‍हेँ गै
एक मूड़ी तुलसी जल साजि‍ के रखि‍हेँ गै मलहीनि‍याँ
हमरा गहील सन देवता अरैध के लबि‍हेँ गै.....।


संकलन, मूड़न गीत
गोसाउनि‍ नोतक गीत

बट्टा भरि‍ चानन रगड़ल पाने पत्र लि‍खल हे।
ताहि‍ पान नोतब गोसाउनि‍ जे नि‍त पूजि‍ थि‍कि‍ हे।
ताहि‍ पान नोतब पि‍तर लोक जे नि‍ज आशि‍ष देथि‍ हे
ताहि‍ पान नोतब ऐहब लोक जाहि‍ स मंगल हएत हे।

मूड़न बेरक-

कौने बाबा दि‍नमा गुनाय जग ठानल हे।
कौने बाबी पड़ि‍छथि‍ केश ि‍क होड़ि‍या के मूड़न हे।
लाल पीयर चीर पहि‍रब केश परीछब हे
बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे
देबउ हजमा बड़ इनाम कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।
शुभ-शुभ काट हजमा केश कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।

लावा भुजै कालक

लाव भूजय बैसली बहि‍नि‍या
      चुलहा दहि‍नि‍या हे।
हे सुन्‍दरि‍ मंगल आगि‍ पजारल हे
सात्री पत्र मे राखल
      लावा पुनि‍ भूजल हे।
दुलहि‍न गृह मे बैसि‍ जे ब्‍याहल हे।
कहय हे सखि‍ सभ आनन्‍द मनावि‍य
      प्रभु गोहरावि‍य हे।
जुगे-जुगे बढ़ू अहि‍बात
      कि‍ अइहब गाबि‍य हे।

गोसाउनि‍क गीत
अहाँ जगजननी सकल दुख मन्‍जनि‍ हमरा
      बि‍सरि‍ कि‍ये देल।
हमहूँ अबोध बोध नै हमरो ि‍कये उसह दुख देल।
कि‍येक चरण तब हटल अम्‍ब हे कि‍येक ऐहेन मन
हम अपराध कएल बड़ जननी मातु क्षमा कय देल
मूस कवि‍ कर जोड़ि‍ वि‍नय करू हमरा बि‍सरि‍ कि‍य देल।

2
हे भवानी दुख हरू माँ पुत्र अपनो जाि‍न केँ।
दय रहल छी दुख भारी बीच भँवर आन केँ।
आबि‍ आशा मे पड़ल छी की करू हम कानि‍ केँ
विश्वमाता छी अहाँ माँ आह! से हम मानि‍ केँ।
कोटि‍यो ने पएर छोड़ब हाथ राखब छानि‍ केँ।
दीन प्रभु हम नि‍त्‍य पूजब नेम व्रत केँ ठानि‍ केँ।
      हे भवानी।

3
अम्‍बे-अम्‍बे जय जगदम्‍बे,
जय-जयकार करै छी हे।
ति‍नू भुवन के माय अहाँ छी
      तीन नयन से तकै छी हे।
सि‍ंह पर एक कमल राजि‍त,
ताहि‍ पर बैसल छी हे।
भूत प्रेत सब झालि‍ बजाबै
      योगि‍न के नचबै छी हे।
राक्षस के संहार करै छी
      दुनि‍याँ के जुड़बै छी हे।

4
कतेक दुख सुनाएब हे जननी
      कतेक दुख.......
तंत्र-मंत्र एको नै जानल
की कहि‍ अहाँ के सुनाएब हे जननी
मूर्ख पुत्र एक अहाँ के भुति‍आएल
रखबनि‍ संग लगाए, हे जननी
सूरदास अधम जग मूरख
तारा नाम तोहार, हे जननी
दुर्गा नाम तोहार।

5
मैया दुआर अड़हुल फुल गछि‍या
माँ हे फड़-फुल लुबधल डाि‍र
दछि‍न पछि‍म स सूगा एक आएल
माँ हे बैस गेल अड़हुल फूल गाछ
फड़ो ने खाय सुगा फूलो ने खाय
माँ हे पाते पाते खेलय पतझार
कहाँ गेल कि‍ए भेल डीहवार ठाकुर
माँ हे अपन सूगा लीअ सुमझाय
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू जगदम्‍बा हे
माँ हे सेवक पर रहबइ सहाय।

वि‍षहरि‍क गीत

1
वि‍षहरि‍ सेब मोरा कि‍छुओ ने भेल
बाँझि‍न पद मोरा रहि‍ये गेल
कि‍यो नीपय अगुआर, कि‍यो पछुआर
हमहुँ अभागलि‍ दुआर धेने ठार
ि‍कयो लोढ़ै बेली फूल कि‍यो अढ़ूल
हमहुँ अभागलि‍ ति‍रि‍या खोदू नामी दुबि‍
कि‍यो मांगय अन-धन, कि‍यो पूत
हमहुँ अभागलि‍ कर जोड़ि‍ ठार।
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ वि‍षहरि‍ माय
सभ दि‍न सभ ठाम रहब सहाय।

2
साओन वि‍षहरि‍ लेल प्रवेश
भादव वि‍षहरि‍ खेलल झि‍लहोरि‍।
आसि‍न वि‍षहरि‍ भगता लेल पान
कति‍क वि‍षहरि‍ नयना झरू नोर।
अगहन वि‍षहरि‍ हेती अनमोल।

3
ऊँच रे अटरि‍या पर वि‍षहरि‍ माय
राम, नीची रे अटरि‍या पर सोनरा के माय
देबौ रे सोनरा भाइ डाला भरि‍ सोन
राम, गढ़ि‍ वि‍षहरि‍ के कलस पचास
बाट रे बटोहि‍या कि‍ तोहें मोर भाइ
राम, कहबनि‍ वि‍षहरि‍ के कलसा लय जाइ
तोहरो वि‍षहरि‍ के चि‍न्‍हि‍यो ने जानि‍
राम, कहबनि‍ कोना के कलस लए जाय
हमरो वि‍षहरि‍ के नामी-नामी केश
राम, मुठी एक डाँर छनि‍ अल्‍प बएस।





महेशवाणी

1
दुर-दुर छीया ए छीया,
एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया
पाँच मुख बीच शोभनि‍ तीन अंखि‍या
सह-सह नचै छनि‍ सांप सखि‍या
            दुर-दुर.....।
काँख तर झोरी शोभनि‍, धथूर के बीया
दि‍गम्‍बर के रूप देख साले मैना के हीया
            दुर-दुर.....।
जँ धि‍या के वि‍ष देथि‍न पि‍आ
कोहबर मे मरती धीया
भनहि‍ वि‍द्यापति‍ सुनू धीया के माय
बैसले ठाम गौरी के गुजरि‍या
            दुर-दुर......।

2
ना जाएब, ना जाएब ना जाएब हे
      सखि‍ गौरी अंगनमा
गौरी अंगना सखि‍, पारवती अंगनमा
बहि‍रा साँपक माड़ब बनाओल
      तेलि‍या देल बन्‍हनमा हे
धामन साँपक कोरो बनाओल,
      अजगर के देल धरनमा हे
      सखि‍ गौरी अंगनमा
हरहरा के काड़ा-छाड़ा,
      कड़ैत के लाओल कंगनमा
पनि‍यादरार के पहुँची लाओल
      ढरबा के लौल ढोलनमा हे,
      सखि‍ गौरी........
सुगवा साँप के लौल जशनमा हे,
चान्‍द तारा के शीशा लाओल
      मछगि‍द्धि‍ के अभरनमा हे,
      सखि‍ गौरी.........।

3

सखि‍ जोगी एक ठाढ़ अंगनमामे
अंगनमामे, हे भवनमामे
साँपहि‍-साँप बामदहि‍न छल
चि‍त्र-वि‍चि‍त्र वसनमामे
नि‍त दि‍न भीख कतए सँ लायब
घुरि‍ फि‍रि‍ जाहु अंगनमामे
भीखो ने लि‍अए जोगी, घुरि‍यो ने जाइ
गौरी हे नि‍कलू अंगनमामे
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइन
शि‍व सन दानी के भुवनमामे।

4
डर लगैए हे डेराओन लगैए
गौरी हम नहि‍ जाएब तोरा अंगना, भयाओन लगैए
हे अजगर के सम्‍हा पर धामि‍न के बरेड़ि‍या
गहुमन के कोरो फुफकार मारैए, गौरी हम....
कड़ेत के बत्ती पर सांखड़ के बन्‍हनमा
बि‍ढ़नी के खोता घनघन करैए।
      गौरी.........
सुगबा के पाढ़ि‍ पर ढोरबा के ढोलनमा
पनि‍या के जीभ हनहन करैए
      गौरी.........
तेहि‍ घर मे बैसल छथि‍ अपने महादेव
बि‍छुआ के कुण्‍डल सनसन करैए।
      गौरी..........

5
हम नहि‍ गौरी शि‍व सँ बि‍आहब
      मोर गौरी रहत कुमारि‍ हे
भूत-प्रेत बरि‍याति‍ अनलनि‍
      मोर जि‍या गेल डेराइ गे।
गे माइ गालो चोकटल, मोछो पाकल
      पएरो मे फाटल बेमाइ गे
गौरी लए भागव, गौरी लए जाएब
      गौरी ले पड़ाएब नैहर हे।
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइनि‍
      इहो थि‍क त्रि‍भुवननाथ हे
शुभ-शुभ कए गौरी के बि‍आह,
      तारू होउ सनाथ गे माइ।

नचारी

बम-बम भैरो हो भूपाल
अपनी नगरि‍या भोला खेबि‍ लगाबऽ पार
कथी केर नाव-नवेरि‍या कथी करूआरि‍
कोने लाला खेबनहारे, कोने उतारे पार
सोने केर नाव-नवेरि‍या रूपे करूआरि‍
भैरो लाला खेबनहारे, भोला उतारे पार
जँ तोहें भैरो लाला खेबि‍ लगाएब पार
मोतीचूर के लड़ुआ चढ़ाएब परसाद
हाथी चलै, घोड़ा चलै, पड़ै नि‍शान
बाबा के कमरथुआ चलै, उठै घमसान

2
भोला नेने चलू हमरो अपन नगरी
अपन नगरी यो कैलास पुरी
पारबती के हम टल बजाएब
नि‍त उठि‍ नीर भरब गगरी
बेलक पति‍या फूल चढ़ाएब
ि‍नत उठि‍ भांग पीसब रगड़ी
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे मनाइनि‍
इहो थि‍क दानीक माथक पगड़ी।

3
जय शि‍वशंकर भोले दानी
      क्षमा मंगै छी तोरे सँ
अपराधी पातक हम भारी
      तैं कनै छी भोरे से।
तोहर शरण छोड़ि‍ ककरा शरण मे
      जाएब हे शंकरदानी
दयावान दाता तोरा सन
      के त्रि‍लोक मे नहि‍ जानि‍।
जाधरि‍ नहि‍ ताकब बमभोले
      हम चि‍चि‍आएब जोरे सँ
अपना ले फक्कर भंगि‍या
      ि‍कन्‍तु तोहर अनुचर भरले
कोसे-कोसे नामी तूँ शंकर
      सेवक पर सदि‍खन ढरले।
जनम भेल माया तृष्‍णा मे
      से तृष्‍णा नहि‍ पूर भेलै।
कामना के लहरि‍ मे बाबा
      जीवन एहि‍ना दूरि‍ भेलै।
हे दुखमोचन पार लगाबऽ
      हम दुखि‍या छी ओरे सँ
पूजन वि‍धि‍ नहि‍ जानी हम हे
यएह जपि‍-जपि‍ कऽ धि‍यान धरी
कर्म चक्र के जीवन भरि‍ हम
      पेटे ले ओरि‍यान करी
जे ज्‍योति‍श्वर पार लगाबह
      हम दुखि‍या छी ओरे सँ।

4
हटलो ने मानय त्रि‍पुरारी हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
खूजल बसहा के डोरी कोना पकड़ब
चड़ि‍ गेल फूल-फूलवारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
अंगने-अंगने सखि‍ सभ उलहन दै छथि‍
कतेक सहब अति‍ गारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी
भनहि‍ं वि‍द्यापति‍ सुनू हे गौरी दाइ
इहो छथि‍ त्रि‍शुलधारी, हो वि‍पत्ति‍ बड़ भारी।


सोहर-

1
धन धन राज अयोध्‍या धन्‍य राजा दशरथ रे।
धन रे कौशल्‍या के भाग कि‍ राम जनम लेल रे।
देखैत पण्‍डि‍त पुरोहि‍त पोथी कर नेने रे
ललना रे बालक होयत सगेआन वनहि‍ सि‍धारत रे।
से सुनि‍ रानी वि‍कल भेल राजा मुरक्षि‍त रे।
ललना रे राम जनम लेल जौं बन जायत रे।
मन गुनी रानी हरखि‍त भेली राजा मुदि‍त भेल रे।
ललना रे.......
भल भेल राम जनम लेल, बाँझी पद छुटल रे।

2
कौने मास मेघबा गरजि‍ गेल
      कोने मास बेंगवा बाजू रे
ललना रे कोने मासे होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
सावन मेघवा गरजि‍ गेल,
      भादव बेंग बाजू रे।
आसि‍न होरि‍ला जनम लेल
      कि‍ गोति‍नक हि‍या सालू रे।
कोने तेल देव सासु के
      कोने ननदि‍ जी के रे।
ललना रे, करू तेल देबैन सासु जी के
      गरी ननदि‍ जी के रे।
ललना रे अमला दबैन गोति‍न के
      हुनकर पैंच हेतनि‍ रे।

दसमासी सोहर
पहि‍‍ल मास चढ़ु अगहन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
मूंगक दाल नहि‍ सोहाय, केहन गरम संओ रे
ललना रे....
दोसर मास चढ़ु पूस, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पूसक माछी ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
तेसर मास चढ़ु माघ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पौरल खीर ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
ललना रे....
चारि‍म मास चढ़ु फागुन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
फगुआक पूआ ने सोहाय, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाँचम मास चढ़ु चैत, देवकी गरम संओ रे
चैत के माछ ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
छठम मास चढ़ु वैशाक, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
आम के टि‍कोला ने सोहाय, कि‍ केहन गरम सेओ रे
सातम मास चढ़ु जेठ, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
खुजल केश ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
आठम मास चढ़ु अखाढ़, देवकी गरम संओ रे
ललना रे.....
पाकल आम ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
नवम मास चढ़ु साओन, देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
पि‍या के सेज ने सोहाय, कि‍ केहन गरम संओ रे
दसम मास चढ़ु भादव, कि‍ देवकी गरम संओ रे
ललना रे....
देवकी दरदे बेयाकुल दगरि‍न बजायब रे
जब जनमल जदुनन्‍दन, खुजि‍ गेल बंधन रे
ललना रे.....
खुजि‍ गेल बज्र केबार पहरू सभ सूतल रे।

4
यशोमति‍ अद्भुत लेखल, बालक देखल रे
सुन्‍दर हुनकर गात, कि‍ बात पकठोसल रे
कंस केँ जी थर-थर काँपय, अपन घर पहुँचल रे
पूतनाकेँ देल वि‍चार, जाहु तौहें गोकुल रे।
पूतना थन वि‍ष लेल घोरि‍ वि‍दा भेल गोकुल रे
घर स बहार भेली यशुमती, बालक लइली रे
देलनि‍ पूतना केँ कोर, बालक बड़ सुन्‍दर रे।
पूतना दूध पि‍आओल, आओर वि‍ष पसारल रे
हरि‍ देलनि‍ दरसन बैसाइ खसल मुरछाइ रे।

खेलौना

1
हाथक कंगना ननदी के दलनि‍
      से नहि‍ मन भाबय हो लाल।
फूल के घड़ी ननदि‍या माँगय,
      सेहो कहाँ पाएब हो लाल।
डाँड़ के डरकस ननदी के दलि‍एनि‍
      से नहि‍ मन भावय हो लल
पि‍यबा देलि‍यनि‍ ननदोसि‍या देलि‍एनि‍,
      से नहि‍ मन भावय हो लाल।
ई सभ कि‍छु नहि‍ हुनका चाही
      ओ मांगथि‍ पठनमे हो लाल।

2
सोठौरा नइ खाएब राजा तीत लगैए
सासु जे बजती बाजि‍ कऽ की करती
छठि‍यारी पुजाबऽ लए माय अबैए
सोठौरा ने खाएब......
गोतनो ने बजती बाजि‍ कऽ की करती
हलुआ बनाबए लए भौजी अबैए।
सोठौरा ने.......
ननदो जे बजती बाजि‍ कऽ की करती
कजरा सेदै लए बहि‍न अबैए।
सोठौरा ने.......
देओर जे बजता बाजि‍ कऽ की करता
दगरि‍न बजबै ले भाय अबैए।
सोठौरा ने.......


 
उमेश मण्‍डल
कवि‍ता

के मैथि‍ल?

जहानक परम सत्‍य
जेकरा अंग्रेजीया युनि‍भर्सल ट्रुथ कहै छथि‍-
सुरूज पूवमे उगैछ।
जौं बेर-बेर आदि‍त्‍यसँ पूछल जाए
तँ की हएत,
ओहो भऽ जेताह भक्
कि‍ देखबए चाहै छथि‍
संसारक लोक
की हम कर्तव्‍य पथसँ वि‍मुख छी?
प्रत्‍यक्षकेँ प्रमाण की?
कि‍अए देतीह
वैदेहीकेँ बेर-बेर अग्नि‍ परीक्षा।

दशानन जौं सीयासँ  
करि‍तथि‍ सम्‍पर्कक प्रयास
भस्‍मी‍भूत हएब नि‍श्चि‍त छल
भगवानोकेँ बूझल छलनि‍
तखन रघुवर कि‍अए लेलनि‍
सीताक अग्‍नि‍ परीक्षा?

मि‍थि‍लाक बेटी कतए गेलीह
दोख ककर,
राजधर्म वा कर्तव्‍यबोध
भरि‍गर पड़ल लोकक अवि‍श्वास
जकरा लेल सुखसँ वि‍मुख भेलथि‍ रघुवर
ओकरे आँखि‍मे नोर नै
तँए, दूर नै भगाउ
जौं मि‍थि‍लाकेँ बचेबाक इच्‍छा रखै छी
बेर-बेर कि‍अए कहै छी
हमहूँ मैथि‍ल
कखनो तँ अपन मोनसँ पुछू
अहाँ मैथि‍ल, कि‍ हम मैथि‍ल?”
फूलबाबूकेँ भेटलनि‍ पुरस्‍कार
वयनाक धेने हथि‍यार
मुदा, हुनक नेना-भुटका
मैथि‍लीसँ अनभुआर
फूलबा मैथि‍लीक नै अछि‍
साहि‍त्‍यकार
मुदा हाथमे भाषाक पतवार
धेने घुमि‍ रहल अपन खेत-पथार
डोका-काकाेर बीछ हम
भैंटक लाबा चि‍बा कऽ
उफनैत सोनि‍तकेँ जरा रहल छी
मि‍थि‍लामे बैसल.....।
मुदा,
प्रश्न रहि‍ये गेल
के मैथि‍ल?


कि‍छु नै फुराइए

की कही कहल नै जाइए
देखै छी रहल नै जाइए
सुनै छी तँ आश्चर्य लगैए
हवाइ लड्डू सगतरि‍ बि‍काइए
हाथीक बदला सि‍क्कड़ि‍ लेने
साँझ-परात घुमैए
लेलहा, लुल्हा, लुटलाहा
बंचि‍त भऽ कऽ
अपन भाग्‍यपर कनैए
बेबस्‍था केर होइत नाच
साँझ-परात सभ देखैए
नि‍नाएल आँखि‍, भकुआएल मोन
नैसर्गिक प्रति‍भाक टोना करैए
विश्वक आहटि‍ पाबि‍
वि‍ज्ञानक सुगबुगाहटि‍ देख
कि‍छु क्षणले सभ एक होइए
मुदा,
ओ सि‍क्कड़ि‍
कखनो जाति‍क तँ कखनो धर्मक
माला पि‍न्हबैए
कखनो झालि‍क धून तँ
कखनो मृदंगक
अपन धूनक धुनि‍मे सभ अंध भेल बौअाइए
कि‍छु नै फुराइए।

अपन गाम

उड़ैत-उड़ैत उठि‍ नै सकलौं
उजड़ि‍ गेलौं उपटि‍ गेलौं
केरा आ अड़ि‍कंचनक पात
कलक बगलक खत्ता बले
दुनूक लहलहाइत वीर देख
ि‍वश्वस्‍त भऽ आश्वस्‍त भऽ
हम उड़ि‍ गेलौं
बीना जड़ि‍-मूड़ीक भऽ गेलौं
ठुठ गाछ सन,
नव पेंपी खोजैक लि‍लसा
मनमे अछि‍ हमरा व्‍याप्‍त
मुदा,
खत्ताकेँ हम बुझै छी अधला
जे हमर करत कल्‍याण
संभवत: तँए
हमरा नै अछि‍ वि‍श्वास
उड़ैत-उड़ैत उठि‍ नै सकलौं
बौराए गेल छी अकासे-अकास।


हे यौ अहाँ केलौं कि‍छु अहाँ
जे केलौं अपनेले अहाँ
तइले दुख हमरा अछि‍ कहाँ।

सुन्नर ि‍नर्मल छोड़ि‍ अहाँ
अकल्‍याणक बाट पकड़ि‍ अहाँ
खुरछाही कटैत रहलौं
बदलैत रूप ओ स्‍थि‍ति‍केँ
चि‍न्‍ह-जानि‍ तैयो अहाँ
ढेका पकड़ि‍ टहलैत अहाँ
आइ जौं हम, कि‍छु बजै छी
कि‍छु करै छी
ऐमे केना मास्‍टरी करै छी अहाँ
काल्हि‍ अहाँकेँ हमर
कोनो ज्ञान नै छल
कन्नि‍को धि‍यान नै छल
मुदा, भुखलकेँ पेट भरबाक जगह
तेल, फुलैलक फेरमे
धकलैत ओइ जेरमे रहलौं अहाँ
आब गाम गाम नै रहल
वि‍श्वक गाम भऽ गेल
अहाँक बजोरोसँ पैघ, सघन
जतए इमानदार, कर्मठ, उदार
रहैत आएल अछि‍ आइसँ नै
सदि‍ओंसँ, जेकर साक्षी अछि‍ इति‍हास
संभवत: अहुँक चपचपी सघन
भऽ जाइत अछि‍ गामेक नक्शामे।

गाओल जाइत अछि‍
अपन गीतनाद,
मनाओल जाइत अछि‍
अपन वि‍ध-बेबहार
कएल जाइत अछि‍
अपन काज-राज
खाएल जाइत अछि‍
अपन कमाएल।

घाम

घाम चुबा-चुबा
तमैत अछि‍ कोला-कोला
कि‍सानक हृदैमे होइत अछि‍
गर्दमगोला।

अपनो खाएब आ दोसरोकेँ खि‍आएब
यएह तँ एकर छि‍ऐ सरोकार
मुदा
ऐ सरोकारकेँ कि‍यो नै दैत अछि‍.........।


हैकू/ टंनका

1
तोरा पएरे
हम नै जेबो आब
कि‍एक तँ तूँ
भेलेँ लापड़बाह
चऽल कोढ़ि‍क चालि‍।
2
अहाँक आखि‍
चपेट लैत अछि‍
हमर हृदे
औनाए लगैत छी
चारू भूवन हम।
3
मेघ बादल
दुनू चलै साधल
पहाड़ी दि‍स।
4
नदी गोंगि‍ऐ
कमल केर फूल
रँग बदलै
रौद लगलापर
उज्‍जरो भऽ जाइत।
5
इन्‍द्र कमल
होइत अछि‍ फूल
उज्‍जर धप्
6

थल कमल
गाएक घंटी सन
होइत अछि‍
7
बैंग बजैए
टर्र-टर्र रटैत
घोघ फल्का कऽ
उछलि‍-उछलि‍ कऽ
तड़ैप-तड़ैप कऽ
8
कदम फूल
सभरँगा रँगसँ
शोभि‍त छै
झड़ैत रहैत छै
समए समैपर।
9
बोनि‍हारि‍न
केर सोि‍नतक छै
सड़कपर
देल अलकतड़ा
नै छै ककरो पता।
10
सोनि‍त दान
महादान होइछ
जीवन लेल
11
हरि‍यरका
डग-डगीसँ भरि‍
जाइत अछि‍

12
कनैल फूल
पत्तामे नुकाएल
रहैत अछि‍

13
एतुक्का गि‍द्ध
पड़ाइन करैए
मनुक्‍खे जाकाँ

14
अंडी छाहरि‍
दैत अछि‍ राहति‍
कोशि‍कन्‍हामे

15
उज्‍जर मेघ
टि‍करी बनि‍-बनि‍
जेना चलैए

16
केराक वीर
अपन वीरताकेँ
घोकचौअने

17
मोड़-मोड़नी
वादलक सह पाबि‍
नाचै लगैत

18
गुफाक गुंज
श्वेत वादलक सह
अनुगुंजि‍त

19
रँगल कोसा
नेने अबैत संग
केरा घौड़केँ

20
चम्‍पा-चमेली
रोहनि‍क नक्षत्र
करक रौद

21
मरूआ बीआ
रोहनि‍ आम दुनू
उमझै पकै

22
ति‍क्‍खर रौद
बलुक जहाजकेँ
तेजी अनैत

23
सुरेब सि‍सो
ऋृगवैदि‍क सन
कठमकठ

24
पहार पार
उत्तरवारि‍ कात
कि‍छु अवश्‍य

25
पाथर उगै
पानि‍ सटकै छैक
मेघ लटकै

26
गोल-मोल छै
धप्-धप् चान छै
दाग लागल

27
सुग्‍गा बैसल
सोचि‍ रहल अछि‍
पाछू लोक ले

28
सुग्‍गा बैसल
चि‍न्‍तामे डूबल छै

दीन-हीन ले



 
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. सुनील कुमार झा- सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल २. प्रभात राय भट्ट

सुनील कुमार झा
सरल वार्णिक छन्दमे दूटा गजल
(१)
हुनका सों हँसि के बाजलों ते हल्ला मचि गेल
हुनक मुँह दिस ताकलों तs हल्ला मचि गेल

रूपक चन्द्रमा के कारी अमावस केने रही
चमकैत पूर्णिमा के देलों तs हल्ला मचि गेल

ओ नैनक कटार से सबके ये घायल केने
हम नजैर से जे ताकलों तs हल्ला मचि गेल

हुनक रूपक लाइट भक्क-भक्क जरैत ये
सबहक डिबिया मिझेलों तs हल्ला मचि गेल

ओ आँखिक इशारा जे मारलक मुंडेर पर
हम फाँदि गेलों जे देबार तs हल्ला मचि गेल

अहों लिखूं ग़ज़ल ओ कहैत रहे सदिखन
करिया कलम जेs उठेलों तs हल्ला मचि गेल

(२)

चमरपट्टी में गाय मरल ते कोनो बात नै
बभनपट्टी में बेंग मरल हल्ला मचि गेल

हमर झोपड़ी खसाs के ओ महल बना लेलाs
फेर से दुछत्ती जे बनेलों ते हल्ला मचि गेल

ओ नोटक जोड़ पर बड़का नेता बनि गेल
हमर ईमान नै बिकल ते हल्ला मचि गेल

विदेशो में रहि, नै बिसरल अपन माँटि के
एता गामों में बाजलों मैथिली हल्ला मचि गेल

नै बिसरब अपन माँटि के करियों ई प्रण
जे सुनलक हमर ई गोप हल्ला मचि गेल

प्रभात राय भट्ट

जन्म लेलौं हम जतय सीता माए के अछि गाम,
म्या गै हमरा एतेक बतादे की अछि हमार नाम,
किया कहैय हमरा सीसी बोतल आर बिहारी धोती,
आफद भगेल ख्यामे हमरा अपने देशमें दू छाक रोटी,
अपने देश बुझाईय परदेश शासक बुझैय हमरा बिदेशी,
नए छौ तोहर कोनो नागरिक अधिकार तू भेले मधेसी,
भूख स मोन छटपट करैय भेटे नए किछु आहार,
दया धर्म इमान नए छै शासक के किया करैय तिरस्कार,
की यी हमर राष्ट्र नए अछि? या हम सुकुम्बासी थिक?

बौआ हमर नुनु ययौ कान खोइलक दुनु सुनु ययौ,
अहाँ थिक मधेशक धरतीपुत्र हम अहाँक मधेस माए,
निठुर शासक के हाथ बन्धकी परलछि देलौं सब्किछ गमाए,
तन मन धन सब लुट्लक आब करैय खून पसीना शोषण,
आशा केर दीप अहिं अछि हमर वीरपुत्र करू मधेस रोशन ,
मधेसमे जन्म लेली जे कियो फर्ज तेकरा निभाव परत ,
नेपाल स मधेस माए के मुक्त कराब परत ,
सुन्दर शांत स्वतंत्र एक मधेस एक परदेश बनाब परत,
मंगला   भेटल नए आब छीन  लेब परत ,
लड़ पडत आजादी के लड़ाई देब परत बलिदान ,
तखने भेटत मान समानं  बनत मधेस महान

 यात्रा
मरलोउपरांत रहैय ओ आत्मा जीवंत,
जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त,
अनबरत चलैत रहू लक्ष्यक डगर पैर,
मिलय नए मंजिलक ठेगाना जाधैर,

पाछू कखनो घुईर नए ताकू,
डेग पैर डेग बढ़ाऊ आगू,
पाथैर कंकर पैर चल परत,
कांट क चुभन सहपरत,

भसकैय संगी सेहो साथ नएदिए,
एसगर जिनगी क यात्रामें चल पड़य,
रही रही मोनमें उठ्य जोर टिस,
जुनी कियो नए ताकत अहाँदिस,

भसकैय अपनों सम्बन्ध पराया,
साथ छोइड सकैय स्वस्थ काया,
मुदा टूटे  नए अटल विस्वास,
एक दिन बुझत मोनक प्यास,

भेटत अहांके अपन मंजिलके ठेगाना,
जिनगी अनंत यात्रा छै बुझत जमाना,
मरलोउपरांत रहैय ओ आत्मा जिवंत,
जिनकर यात्रा होइत अछि अनन्त,



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१. पंकज कुमार झा  .नवीन कुमार आशा

पंकज कुमार झा, सम्प्रति- एच.सी.एल. मे अभियन्ता छथि।

ओझरैल हमर बौद्धिक मोन (1)
एक अबोध
ह्रदय के शूल
बिना कोनो कारने
अई जन्मक भूल बिना
जहन भोगी रहल अई
दंड पूर्व जन्म के
तहनेटा पता चलैत अई
जन्मांतरक् खेल
ओना त सबटा
मिथ्या लगैत अई
विज्ञानक सोच में
ओझरैल हमर बौद्धिक मोन
ईस्वरक लीला मानैक लेल तैयार नै अई
मुदा !
जन्मे स रजा
आ जन्मे स रंक
जीवन के अनन्त रंग में
ऐना सनैल अई
कि सब किछ माया अई
वर्षाक बुलबुला जँका
रंगीन
मुदा !
फुटलाक बाद
कतौ किछ नै
(आर एम एल हॉस्पिटल में एक बच्चा ह्रदय रोग स पीड़ित छल)

आनंदक रहस्य (2)

देखलहुं आदमीक स्वभावक स्वरुप
जहन जहन बिपत्ति अबै छैन
मोनक कटुता दूर हटै छैन
मीठ बोल सहयोगी बनै छैथ
आ पुनः
समय अनुकूल होइते
मोन जहर स भैर जैत छैन
अजब गजब परिवर्तन
तुरंत तुरंत
एके व्यक्ति के
अलग अलग व्यबहार
समय के अंतराल में
केना रक्त के प्रवाह
बदैल देत छैक
भावनाक स्वरुप के
समझ स परे छैक
बुझैत समझैत जनैत
मुदा !
समय स हरैत
व्यक्ति स्वयं
घुटन महशुश करैत छैथ
मुदा !
अभ्यास हावी होइत छैन
आ ओ अभ्यासक परिहास
मुदा !
ई सब निर्माण
ईश्वर के कैल छैन
प्रिज्म जँका
भावनाओ के
अलग अलग रूप में
परावर्तित करैक छमता
मनुष्यक ह्रदय में बनौने छैथ
विस्मित त करैया
मुदा !
ई कोनो व्यक्ति विशेष नई
निर्माण कर्ता के निर्माण अई
स्वभावक सच स्वरुप तैं
समझनाई थोड़ेक कठिन अई
आ तैं
एकरा माईन लेला मात्र स
प्रसन्नता सहजे भेटनाईये अई


सृष्टिक खेल (3)
बड़ा अद्भुत अई
राम एला
कृष्ण एला
गंगा सेहो अवतरित भेलीह
ग्रंथो सब लिखैल
एखैन धैर
पूजन वाचन चलैत अई
मुदा !
कोनो परिवर्तन नई भेल
मानव स्वाभाव स वैह रही गेल
कियाकि ?
मानव के रचना अहि लेल भेल अई
ई मात्र एक टा लुकाछिपीक खेल अई
सृष्टि आ श्रष्टाक अनंत चक्र अई


सचक पथ (4)
सच त याह अई
कि सचक पथ पर
शुले टा गड़त
मोन भीतरे भीतर सबटा सहत
कियाकि सच स
सहनायियेटाक ज्ञान भेटल अई
एकर बिपरीत
चालला स
शूल ने गड़त
कियाकि असहनशीलताक ज्ञान
पहिले स शूल के उखाड़वाक प्रयत्न करत

संतुलन आ असंतुलन के खेल (5)

अजब ई देहक संरचना अई
मैट पैन स बनल
मुदा !
संतुलनेटा में जीवन अई
थोड़बे असंतुलन स
पुनः
मैट पैन स
अलग भै जैत अई
जीवन जड़ संग बिना
देह ख़त्म भै जैत अई
बड़ा कठिन अई
देहक संतुलन के बनौनाई
आ देह के बचा क रैख पौनाई
हर छन देहक प्रकृति बदलैत छैक
संतुलन असंतुलन के क्रम चलैत छैक
मैट के पैन स
पैन के मैट स
जुड़नाई बिछरनाई
चलैत रहैत छैक
देहक निर्माण
आ देहक अबसान
संतुलन आ असंतुलन के खेल छैक
ठाढ़ छी

ठाढ़ छी
समयक-शेषनाग स बन्हैल छी
सत्य आ असत्यक बिच
मथनी जँका मथाई छी
मंदराचल जँका
तटस्थ
कच्छप पर
देवता दिश एक बेर
आ असुरक दिश एक बेर
खींचल जैत छी
अपने धुरी पर
पृथ्वी जँका
दिन आ राइत में बंटैल छी




नवीन कुमार आशा

 अनाथ
माए बाबू अहाक आवे याद
जे पबितो दूनूक साथ
कि लोक कहिते अनाथ
जखन देखि अहाक छाया
ने रूकि पाबे तखन नीर
माए ....................................
कखनो कखनो मोन करे
हमहू पाबि कोनो कनहा
ने भेटे जखन कोनो कनहा
तखन लागे हम छी अनाथ
माए..........................................
अहा दूनू जे रहितो
निक खराबक पहिचान करेतो
कखनो हमरा डटितो
कखनो करतो दुलार
ने पेलौ ओ दुलार
जे म रहे सभक संसार
माए......................................
जखन करि बदमाशी
लोक कहे हमरा यो बाबू
कियाक ने हेते ऐहन
ने छे ककरो साया
कियाक ने करे कुसंग
ने छे ककरो साया
माए...................................
भगवान ने ककरो ऐहन दिन देखाबे
ने ककरो अनाथ बनाबथि
भेटे सबके माए बापक प्यार
जे मे अछि सभक संसार
माए...................................................
                           


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.रामवि‍लास साहु २. रामदेव प्रसाद मण्‍डल 'झारूदार'.किशन कारीगर- ग़रीब ४.जगदीश प्रसाद मण्डल

  १.
 रामवि‍लास साहु
कवि‍ता

बेरोजगारी

हम छी बेरोगार
काम करै छी लाचार
हमरासँ करबैत अछि‍ बेगार
भुखल पेट बनल छी दुखारी
दुखक मारल सुतल छी
उपरसँ परि‍वारक बोझ भारी
जहि‍ना लकड़ीकेँ चीरैत आरी
खेबाक नै भेटैत उधारी
बाल-बच्‍चा बनल अछि‍ भीखारी
हमरा देख लोक मारैए कि‍लकारी
की करब नै अछि‍ समझदारी
आसा नै कहि‍या बनब रोजगारी
की प्राण लेत अत्‍याचारी
देशमे कहि‍या मेटाएत बेरोजगारी
सरकारकेँ नै अछि‍ सभसँ सरोकार
हम छी बेरोजगार।


प्रीतक गीत

फागुन मास हमर बि‍तए यौवनमा
हमर दुख कहि‍या हरत सजनमा
गौना कराए लि‍अ एबकी फगुनमा
आमक गाछपर बैसल कोइली
प्रीतक गीत सुनबए एबकी फगुनमा
चैत मास जेना टपकै महुआ
ओहि‍ना टपकै हमर यौवनमा
सावनक मेघ भि‍जबए बदनमा
बि‍जली चमकए बादल बरसै
देहसँ छुटै पसि‍नमा
बरखा बरसै घनघनमा
पि‍या बनल अछि‍ बैमनमा
ऊमरल नदि‍या, दरद जगाबए
दरदक दुख केना केकरो कहबै
आबि‍ते सजनमा दरद हरि‍ लैत फगुनमा
गौना कराए लि‍अ एबकी फगुनमा
प्रीतक गीत सुनबै छी सजनमा।

रूपैआक ढेरी

रूपैआक ढेरीपर करैए खेल
दुनि‍याँकेँ नचबैए ठेल-ठेल
रूपयाक लालचमे बनल अछि‍ पागल
दानव बनि‍ मानवपर करैत राज
सुखक भुख मि‍टबैए रूपैआसँ
दीन दुखि‍याक तौलैए रूपैआसँ
मनुक्‍खक चालि‍ छोड़ि‍ चलैए
नाच करैए खंजन चि‍ड़ै सन
सुखक चाहमे भटकि‍ गेल राह
सोमरसमे समाए गेल मन वि‍चार
नंगा नाच करैए रूपैआ ढेरीपर
जोशमे होश उड़ि‍ गेल नचबैयाकेँ
जखन रूपैआक ढेरी अंत भऽ गेल
जि‍नगीक दू कि‍नारा बीच पि‍साए गेल
दुखक धारमे बहि‍ गेल रूपैआक ढेरी
जहि‍ना मनुख मुठ्ठी बन्न जनमैए
हाथ पसारि‍ संसारसँ चलि‍ जाइए
रूपैआक ढेरी ओहि‍ना रहि‍ जाइए।


भ्रष्‍टाचारी

जागु-जागु यौ देशक भैयारी
देशमे घुसल पैघ-पैघ चोर
चोर केहेन पहि‍चान नै आबए
देशमे घुसि‍ सभकेँ सतौनेए
देशक भैयारी, जागु, करू तैयारी
देशक करू रखबारी
आब अापसमे करू नै कोनो बेपारी।

चोर देशकेँ करैत अछि‍ कमजोर
चोरक नाओं छी भ्रष्‍टाचारी
सभ वि‍भागमे जमैने अछि‍ अधि‍कार
मंत्री-संत्री एकरे बलपर
भेल अछि‍ मालो-माल।

बड़का महलबलाक दि‍ल अछि‍ कारी
सभ भ्रष्‍टाचारी, बनल अछि‍ अधि‍कारी
देशक धन वि‍देशमे करैत अछि‍ बि‍कवाली
सभ भ्रष्‍टाचारी, बनल अछि‍ अत्‍याचारी
जनताक सोनि‍त
बेचबाक करैत अछि‍ रोज तैयारी
केना भागत देशसँ ई भ्रष्‍टाचारी

तेकर करू तैयारी

जागु-जागु यौ देशक भैयारी।


रामदेव प्रसाद मण्‍डल 'झारूदार'
जन्‍म- 13. 07. 1967
पता-
गाम- रसुआर
भाया- मुंगराहा (ि‍नर्मली)
थाना- मरौना
जि‍ला- सुपौल
पीन- 847452



1
जागू बाबू आबू आगू
जीयापर करू वि‍चार यौ
कोना जीयब अइ प्रदूषणमे
श्रृजनहार बेमार यौ

भू जल वायु घ्‍वनि‍ प्रदूषण
दुख दुनि‍यामे अपार यौ।
कोना बँचब एे काल गालसँ
सभ मि‍ल करू वि‍चार यौ।

वि‍ज्ञानक ई देन प्रदूषण बनि‍
घर घुसल चुहार यौ।
बाघ बनि‍ ई मुँह बौने अछि‍
दुि‍नयाँ बनल सि‍कार यौ।

इंजन हो पूरा कंडीसन
धुआँ नै छोड़ै बेकार यौ।
करू खि‍याल कि‍छु अगि‍ला पि‍ढ़ी
कोना रचत संसार यौ।

होयत कोना दुि‍नयामे पावन
घरतीपर नर नारि‍ यौ
जगत पावनि‍ गंगा मैया,
खुद शुद्धि‍केँ िभखाइर यौ।


2
दया धरम नि‍ष्‍ठा मानवता
ज्ञान भरल भरपुर गै
बोल गै दैया कोना नै हेतै
देशक गरि‍बी दूर गै।

काम क्रोघ आओर लोभ भगेतै,
घर-घर ज्ञानक दीप जरेतै।
आब नै राज अज्ञानक रहतै,
घरतीपर दूर दूर गै बोल.....

हि‍नसा छोड़ि‍ आब शान्‍ति‍ घरतै,
बसुदेव कुटुम कम गढ़तै।
जग अमनक पोथी पढ़तै,
साँझ भोर दुपहर गै बोल...
झारूदारक सभ झारू पढ़तै
दया मानवता मनमे भरतै।
सेवा केना आगाँ बढ़बै छै
सोचतै सभ जरूर गै
बोल.....
सेवा कर्मकेँ पूजा बुझतै
असत छुटै कऽ युक्‍ति‍ सुझतै
असत ति‍यागि‍ सभ सुख अपनेतै
आब बेसी नै दूर गै बोल....।

3
सभपर छै अज्ञानक छाया
सतसँ भेलै दूर हौ।
अपने भाएकेँ लहु चाटै छै
बनि‍ कऽ महि‍षा सूर हौ।

जाति‍ धर्म मानवता भेदी
लोग बनल सभ अही केर कैदी
धर्मक आगि‍मे जड़ै ई जनता
बनि‍ गेल छह सभ क्रुड़ हौ।

धर्म इमानसँ लोक छै बंचि‍त
काम क्रोध आओर लोभ छे संचि‍त
नि‍ष्‍ठा नीति‍ मानवताकेँ, सभ तपै छै घूर हौ
अंध वि‍श्वास छै सभकेँ धएने
कुरीति‍सँ घर छै भरने
अज्ञानक अागि‍मे जड़लै
सबहक करम कपुर हौ।
किशन कारीगर
ग़रीब ।

हम छी गरीब
नहि आब दैत छथि
हमरा कियो अपना करीब
किएक त हम छी गरीब।।

भरि दिन भूखले रहि केँ
किछु काज राज करैत छी
मुदा तइयो दू टा रोटी
लिखल नहिं अछि हमरा नसीब।।

जेकरे मौका भेटैत छन्हि
वैह हमर शोषण करैत अछि
किछु बाजब त बोइनो नहि भेटत
डरे हम किछु नहि बजैत छी।।

डेग डेग पर भ्रष्टाचार
एसगर हम केकरा सँ लड़ब
धिया पूता अन्न बिनू बिलैख रहल अछि
कहू कोना के हम जिअब।।

ठिकेदारो हमरे कमाई लूटि रहल अछि
जेबी मे नहि अछि एक्को टा टाका
नून रोटी खा कहूना के रहि जइतहुँ
मुदा बढ़ल मँहगाई गरीबक घर देलक डाका।।

टाकाक अभाव मे आब हम
बनि गेलहुँ अस्पतालक मरीज
डॉक्टरो हमरा देखी कहैत छथि
तू दूरे रह नहि आ हमरा करीब।।

विधाता केहेन रचना केलैन
जे हमरा बनौलन्हि गरीब
नहि आब दैति छथि
हमरा कियो अपना करीब।।

आब अहिं कहू यौ समाजक लोक
अधपेटे कोनो जीबैत छी हम
गरीबिक दुशचक्र अछि घेरेने
जिनगी जीबाक आस भेल आब कम।।

जी तोड़ मेहनत करैए चाहैत छी
मुदा कतए भेटत सब दिन काज
काज भेटलो पर होइत अछि शोषण
एना मे कोना करब धीया पूताक पालन पोषण।।

साँझ भिंसर दू टा रोटी भेटैए
एतबाक आस लगेने अछि गरीब
निक निकौत सेहन्तो नहि सोचैत छी
किएक त हम छी गरीब।।

 
जगदीश प्रसाद मण्डल

कवि‍ता

जुआनी

समए संग चढ़ैत जवानी
सुति‍-जागि‍ चलैत अछि‍।
नट-नटीक रंगमंच गढ़ि‍
घर-अंगना नचैत अछि‍।
चैत चि‍त्त चढ़ि‍ते चढ़ैत
योग-वि‍योग बीच मरड़ाइत।
लहलहाइत, फन-फन फानति‍
दन-दन-दनाइत तड़पैत।
कात-करोट देख-देख
सोलहो श्रृंगार सजबैत।
योगी-वि‍योगी बनि‍-बनि‍
राग-तान, सुर मि‍लबैत।
हपैत हवा थरड़ाएल ज्‍योति‍ बीच
वेदनक वाणसँ बेथि‍त
तन्नुक तन अधखि‍ल्‍लू मन
टुकड़ी-पुरजा भऽ उड़ैत।
शीतल समीर सि‍हरैत सज्जा
कलपि‍ कलसि‍ कोमन कली
हँसि‍-काि‍न झर-झर झहरि‍
नयन-नीर कोमल डली।
कड़कि‍ जुआनी झड़कि‍-झड़कि‍
हि‍यबै राह जि‍नगी केर
बैंकि‍ंग बौल बना-बना
खि‍ल पकड़ि‍ फेक साधि‍ केर।



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
                    डॉ. शेफालिका  वर्मा
 
इजोरियाक  भाषा
               

चलू,  परछाहींक पार   हम घूमी   आबि
लिखल   जे  सांसक  गाथा
मौनक भाषा मे  ओकरे  हम गुनगुनाबी......
दर्द  प्राण मे  अहाँक  स्मृतिक
विलाखि  विलाखि   छटपटा  रहल
आहत  गीत  उमड़ी   उमड़ी
बैसी अधर   पर कुहैरी   रहल  !
साँझक  दम तोडैत  बेला 
चैती  बयारक  कम्पन 
चाँदनी   बैसि   हमर अहाँक
लिखि  रहल   ओ भाषा
जे नहि  कहि सक्लों   हम अहांके
नहि  कहि सक्लों  अहाँ हमरा ...
चलू
तखन  इजोरिया   
अपन  अहाँक  मौन  गाथा
पुछि   आबि
मौनक   भाषा मे ओकरे हम गुनगुनाबी ..............

 
बीतल इतिहास
            

हम पलक पाँखि  मे पोसि   रहल छी
बीतल  युगक   नीरव  इतिहास !
नयन-पथ   सं सांस  मे मिलि
शिखी  चुनैत  जलजात  रहल
'आह ' सं  निकलि  'चाह' में खिली
टूटल  आस-पारिजात   रहल !
चंचल  सपना  पुलक  भरल
स्पंदन  चिर व्यथा केर
सुधि सं  सुरभित  स्नेह घुलल
आखर  तितल  हमर कथाक !
नयन  में अनगिन  चुम्बन 
सजग  स्मिति रहल  उन्मद
सांस  में सुरभि,  वेदनक क्षण 
चातकी  सन  तकैत प्रिये -पद !

आय  तं  सब सांस  में भरल
मरण  त्योहारक  निस्सीम जय
मौन  में प्रानक  तार टूटल 
निसांस  भेल पिआस  में लय
गहन  तम-सिन्धु में उमड़ल
अधर पर  अंगारक  हास
बीतल  युगक  नीरव  इतिहास....

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

 

विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत

१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण
१.
श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 

२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।





३.श्वेता झा (सिंगापुर)


४.गुंजन कर्ण राँटी मधुबनी, सम्प्रति यू.के.मे रहै छथि। www.madhubaniarts.co.uk पर हुनकर कलाकृति देखि सकै छी।



ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...