Friday, June 17, 2011

'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३) PART II



बेचन ठाकुर, गाम चनौरागंज, झंझारपुर, मधुबनी।
बेचनजी विगत पचीस बर्खसँ मैथिली नाटकक लेखन आ निर्देशनमे जुटल छथि। हिनकर एक दर्जन नाटक ग्रामीण सभक मोन तँ मोहनहिये छल, हिनकर विदेहमे प्रकाशित छीनरदेवी आ बेटीक अपमान विश्व भरिमे पसरल मैथिली भाषीक बीचमे कएकटा समीक्षात्मक बहस शुरू कऽ देने अछि। जखन मैलोरंग अपन सर्वेक्षण शुरू केलक जे मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ नाटक महेन्द्र मलंगियाक ओकर आंगनक बारहमासा वा बेचन ठाकुरक बेटीक अपमान आ आशीष अनचिन्हारक समीक्षापर बहस चलिये रहल छल तँ तारानन्द वियोगीक कथन आबि गेल, ऐ सर्वेक्षणकेँ रोकबाक आग्रह करैत- "हम त चकित छी प्रकाश। की मैथिलीक एहन दुर्दिन आबि गेलै जे आब एना तुलना कएल जेतै? जकरा बल पर सौंसे भारतीय साहित्य मे मैथिलीक झंडा बुलन्द मानल जाइत रहल अछि, तकरा मादे हमर नवतुरिया सब एना बात करता? एतेक सतही आ विवेकहीन पीढी मिथिला पैदा केने छथि यौ? की पं० गोविन्द झाक ओ कथन सत्य होब'बला छै जे तीस-चालीस साल मे मैथिली मरि जाएत। (मैथिली माने मैथिली साहित्य।) एना नहि काज चलत। किछु करियौ बाबू।" मुदा प्रकाश बाबू कहलखिन्ह- "सर ! किछु कारण अछि । सब नवतुरियाक स्थिति एक रंग नहि छनि । सभहक अपन अपन मनतव्य छनि । मुदा अँग्रेजी मे एकटा कहाबत अछि । सरभाइवल ऑफ दी फिटेस्ट.... । जे कियो जे किछु सोचैइथ मुदा मैथिली आ नाटक लेल सोचैत छैथि यैह हमरा लेल जीवन दायी अछि ।" तारानन्द वियोगी फेर लिखलन्हि- "मिथिलाक प्रति जं प्रेम अछि, तं अपन बिरासत कें चिन्हनाइ आ ओहि पर गर्व करनाइ सीखू। हरेक भाषा मे किछु एहन रचना होइ छै जे 'क्लासिक्स' के कोटि मे अबै छै। । (से मैथिलियो मे छै) जखन आगुओ कोनो ओहि टक्कर के रचना आबि जाइ छै तं ओकरा सम्मान दैत पूर्वक क्लासिक्स के बराबर मे राखल जाइ छै। एहि लेल बिरासत कें खारिज करब जरूरी नै छै। मानि लिय' जे गजेन्द्र ठाकुर बड्ड विशिष्ट कवि छथि, तें की अहां ई सर्वेक्षण कराएब पसन्द करब जे 'विद्यापति पैघ कवि की गजेन्द्र ठाकुर?' साहित्य के संस्कृति मे आम तौर पर एना नहि कएल जाइ छै। मुदा 'खास' तौर पर जं करए चाही, तं ताहि सं ककरो के रोकि सकै छै। राजनीति के संस्कृति मे तं से चलन छैके।" तइपर उमेश मंडल जवाब देलखिन्ह जे ई उदाहरण तखन सटीक होइतए जँ बेचन ठाकुर वा महेन्द्र मलंगियाक तुलना ज्योतिरीश्वरसँ कएल जाइत। ऐ डिसकसनक शुरूमे प्रकाशजीक विचार बेचनजीक नाटकक विरुद्ध छलन्हि आ से पुनः सिद्ध भेल जखन बेचन ठाकुरक "अधिकार" नाटक ऐ टिप्पणीक संग पोस्ट कएल गेल तँ ओ ओकरा डिलीट कऽ देलन्हि। एना किए भेल? जखन प्रकाश झा महेन्द्र मलंगियाक नाटक करबै छथि (मैथिलीमे विदेहक एलासँ पूर्व प्रूफरीडरकेँ सम्पादक कहल जाइ छल आ नाटकमे जे कियो कोनो काज नै करथि कुर्सीपर पएर लटका क' बैसथि आ गप छाँटथि तकरा नाटकक निर्देशक कहल जाइ छल) तँ 90 प्रतिशत दर्शक मैथिल ब्राह्मण आ जखन संजय चौधरी मलंगियेक नाटक करै छथि तँ 90 प्रतिशत दर्शक कर्ण कायस्थ; आ दुनू गोटे मैथिलीक नामपर सरकारी संगठनसँ, जे टैक्सपेयरक पाइसँ चलै छै, पाइ ल' नाटक करै छथि, शहरो वएह दिल्ली छिऐ। ई समाज किए तोड़ल जा रहल अछि? आ दु जातिक अतिरिक्त शेष मैथिली भाषी? मुदा तइले वियोगीजीक आह्वान प्रकाशकेँ नै भेटै छन्हि! किए!! आ प्रकाशजी बेचनजीक नामो बेचा ठाकुर लिखै छथि आ पाठकक ऐपर भेल विरोधक बावजूद सुधार नै करै छथि से उच्चारण दोष, ह्रिजै दोष अनायास भेल नै सायास भेल सिद्ध होइत अछि। प्रकाशजी उमेश मंडलकेँ कहै छथि जे ओ हुनकासँ सम्पर्क बढ़ेबामे रुचि नै राखै छथि मात्र फोनपर गप छन्हि से हमहूँ 2008 मे प्रकाशजीक पहिल बेर नाम नाम सुनने रहियन्हि, मिथिलांगनक अभय दास नाम-नम्बर देने रहथि आ तहियासँ दू-तीन बेर 2-3 मिनटक फोनपर गप अछि आ 2-3 बेर ठाढ़े-ठाढ़े गप अछि, अंतिम बेर जखन उमेश मंडल जीक कहलापर जगदीश प्रसाद मण्डल जीक नाटक हुनका देने रहियन्हि आ ओ ओइ बदलामे मलंगियाजीक पोथी कूरियरसँ पठेबाक गप कहने रहथि।  वियोगीजी आ प्रकाशजी अखनो धरि "मेडियोक्रिटी" सँ बाहर नै आबि सकल छथि आ सार्थक सम्वाद आ समालोचना सहबामे तत्काल अक्षम छथि। जँ जँ ओ लोकनि आर मेहनति करताह आ "मेडियोक्रिटी"सँ  बाहर बहरेताह तँ तँ हुनका लोकनिमे समालोचना सहबाक क्षमता बढ़तन्हि।
टैक्सपेयर तँ सभ छथि, ओतए तँ जाति-भेद नै छै।   मुदा "अधिकार" नाटक डिलीट नै कएल जा सकल, ई बचि गेल कारण ऐ नाटकक कएक टा बैकप कतेक संगणकपर उपलब्ध छल। से ऐ परिप्रेक्ष्यमे बेचन ठाकुर जीक तेसर नाटक "अधिकार" विदेहमे देल जा रहल अछि आ आशा करैत छी जे आशीष अनचिन्हार फेर ऐ नाटकक समीक्षा करताह आ सूतल लोक जेना आँखि मीड़ैत उठल अछि तहिना ई नाटक ग्रामीणक पहिने आ मैथिली नाटकक किछु ठेकेदार समीक्षक/ निर्देशक लोकनिक पछाति निन्न तोड़त। संगहि जेना मजारपर वार्षिक उर्स होइ छै जतए लोक सालमे एक बेर चद्दरि चढ़ा आ अगरबत्ती जड़ा क' कर्तव्यक इतिश्री मानि लैए, तहिना मैथिलीक नामपर खुजल कागजी संगठन सभक, जे बेसी (95 प्रतिशत) मैथिल ब्राह्मण सम्प्रदाय द्वारा टैक्सपेयरक पाइकेँ लुटबा लेल फर्जी पतापर बनाएल गेल अछि, वार्षिक (बर्खमे ओना एक्के बेर हिनकर सभक निन्न खुजै छन्हि) काजक समीक्षा होएबाक चाही।  जखन हम संस्कृत वीथी नाटकक निर्देशन/ अभिनय करै छलहुँ तँ ओतए अभिनय केनिहार सभक आ सह-निर्देशक लोकनिक प्रतिभा आ मेहनति देखि हर्ष होइ छल; मुदा एतए प्रतिभाक दरिद्रता किएक? उत्तर अछि जे एक जातिकेँ लेब आ तहूमे तै जातिकेँ जकरा अभिनयसँ पारम्परिक रूपमे कोनो लेना देना नै छै, आ जकरा लेना-देना छै तकरा अहाँ बारने छी तँ की हएत? जखन हरखा पार्टीमे खतबेजी रावणक अभिनय करै छलाह तँ से आ जखन ओ चन्द्रहास नाटकमे खलनायकक नै वरन चरित्र अभिनेताक अभिनय करै छलाह से, दुनू मे कियो नै कहि पबै छल जे कोन अभिनय बीस! बच्चामे गाममे आँखिसँ देखल अछि।   संगहि जे लिस्ट गनाओल जाइत अछि, तैमे खतबे जी कतौ नै!! दसटा मैथिली निर्देशक छथि जे पटना, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बइ, चेन्नइमे (सभटा मिथिलासँ बाहर) निवास करै छथि आ 200 लोकक सोझाँमे ऑडिटोरियममे नाटक करबै छथि आ कलाक न्यूनताक पूर्ति लाल-पीअर-हरियर लाइट-बत्ती जड़ा क' करै छथि (किछु अपवादो छथि), की भरि मिथिलामे एतबे नाटक मैथिलीमे होइए आ की एतबे निर्देशक मैथिलीमे छथि? गाम-गाममे पसरल असली मैथिली नाटकक निर्देशकक सूची आ हुनका द्वारा बिना टैक्सपेयरक फण्डसँ खेलाएल गेल नाटकक अभिलेखनक काज विदेह टीम द्वारा चलि रहल अछि जकर विस्तृत सूची "सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचर वोल्यूम.2 मे देल जाएत।
प्रस्तुत नाटक इन्दिरा आवास योजनाक अनियमितताकेँ आर.टी.आइ.सँ देखार करैबला आ रिक्शासँ झंझारपुरसँ दिल्ली जाइबला (आ अभिषेक बच्चनसँ झंझारपुरमे पुरस्कार पाबैबला) असली चरित्र मंजूरक कथा अछि जे डिलीट नै कएल जा सकल मुदा किए डिलीट कएल जा रहल छल, किनकर हितकेँ ऐ नाटकसँ खतरा छन्हि/ छलन्हि आ किए एकर विरोध एतेक तीव्र रूपमे भेल, से सभटा आब फरिच्छ भ' गेल अछि। -गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह।
अधिकार
-श्रीसरस्वत्यै नमः-

महान सामाजिक एवं क्रांतिकारी मैथिली लघुनाटक अधिकार

दृश्य - एक
( स्थान - मुखिया चन्दनक घर। दलान पर चारि-पाँचटा कुर्सि लागल छै। मुखियाजीक मुहँलगुआ अमरनाथ आ चन्दन कुर्सी पर बैस गपसप क ऽ रहल छथि। )
अमरनाथ - मुखियाजी
, आइ-काल्हि कोनो मुल्हा फँसलै की नै।
चंदन - फँसिते रहै छै की। ओना दू-तीनि दिनसँ बाहिनीओ नै भेल अमर भाई।
अमरनाथ - मुदा बड कसिक ऽ ध ऽ लै छिऐ अहाँ।
चंदन - की करबै
, अहीं कहु। हमरा सरकार कोनो तनखाह दै छै ? (मंजूरक प्रवेश पूर्ण गरीबी अवस्था में )
मंजूर - मुखियाजी प्रणाम।
चंदन - प्रणाम प्रणाम। आउ मंजूर भाई। ( मंजूर भूइया पर बैसि जाइ अछि।) मंजूर भाइ
, नीच्चाँमे किआए बैसलहुँ ? कुर्सी पर बैसु ने।
मंजूर - हम कुर्सी पर बैसैबला लोके नै छियै। कुर्सि पर हाकिम सभ बैसै छथिन्ह।
अमरनाथ भाई
, प्रणाम ।
अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम
, कहु मंजूर भाई, की हाल चाल ?
मंजूर - जीऐ छी नै मरै छी
, हुक्कुर-हुक्कुर रिै छीै अहाँ ऐ फाटल-चिटल लोक पर , कोनो ध्याने नै दै छी ।।
अमरनाथ - कहु धिया-पुताक हाल-चाल
, घरवालीक हालचाल ?
मंजूर - की कहब
, धिया-पूता चारि-पाँचटा बेसी भ ऽ गेलै। तैसँ अक्कछ रहै छी। कहलनि अपरेशन करा ऽ लिअ त कहलनि अपना सबहक हदीशमे से नै लिखल छै। आ फेर कहलनि हुअ न दियौ कत्ते हेतै अपन-अपन कमा ऽ खेतै।
(चन्दन आ अमरनाथ मुस्काए रहल छथि। )
अमरनाथ - मंजूर भाइ
, कनियां थेहगर छ से ?
मंजूर - की पूछै छी
? आब नै सकै छी तैयो बड हरान क ऽ दै आए। आब छोड़ भाइ मजाक तजाक। ऐ बुढ़बाकेँ की चटै छी ?
चन्दन - कह मंजूर केम्हर-केम्हर एलाह
?
मंजूर - सरकार
, इन्दिरा आवासवला गप हम कहिया कहलौं 2006ए में। कत्ते दिन भ ऽ गोलै ? ताबे कत्ते आदमीकेँ इन्दिरा आवास भेटबो केलै। सरकार हमरोसँ बेसी गरीब कियो छै ? टमटम चलबै छेलौं त ऽ घोड़ीओ खर्च नै निकलै छेलाए। सुखा-टटाक ऽ घोड़ीओ मरि गेल। करजा-बरजा ल ऽ क ऽ एगो पुरना रिक्षा कीनलहुँ। सेहो कहियो चलै बाए कहियो नै। टेम्पू-सवारी रिक्षेवलाक रोजी-रोटी खेलकै। आब हमरो पर ध्यान दियौ सरकार। बरसात में एक्को बुन्नी पानि बाहर लै खसै छै।
चन्दन - बीस हजार तोरा नाम सँ ऽ भेटतह । ओइमे की खरचा-बरचा करबहक
?
मंजूर - हम त ऽ कहब
, एक्को पाइ नै । मुदा अहीं कहियौ की केना लगतै ?
चन्दन - अमरनाथ भाइ
, कनी बूझाए दियौ।
अमरनाथ - मजूर भाइ
, ओना सभकेँ छ-सात हजार लगै छै, अहाँकेँ पाँच हजार लागतै।
मंजूर - बाप रे बा
, तहन हमरा की बचतै ? पनरह हजार मे केहेन घर हेतै ?
अमरनाथ - किछु अपनो दिशिसँ लगा देबै।
मंजूर - खाइ लाए मरै छी
,धिया-पुता पन्नी बिछै आए रोड पर। ओइ मे से एक-दू साए टका खइ-पीऐ लाए द ऽ देब, सरकार। किरपा करियौ।
चन्दन - पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै त ऽ नै हाएत। बात जानी साफ।
मंजूर - हे हे सरकार
, पाएर पकड़ै छी। दाढ़ी पकड़ै छी। एगो घर डाइनो बकसै छै। एगो गरीबो केँ कल्सरण करू। नीक हाएत सरकार।
चन्दन - बेसी नीक कमरा नै पचै छै। ओत्ते लगबे करत।
मंजूर - तहन जाइ छी सरकार। जे करियौ। ओना एगो गरीबकेँ तारितियै ऽ ऽ ऽ ऽ।
(प्रस्थान)
चन्दन - हम फेर मुखिया हाएब की नै
, के जनै छै ? माल बनेबाक बेर अनेक नै अछि।
अमरनाथ - से त ऽ ठीके मूखियाजी। काल्हि के देखलकै
? ओना मंजूर वास्तवमें बड गरीब अछि।
(पटाक्षेप)
दृष्य - दू
( स्थान - मंजूरक सलाहकार विनोदक दलान विनोद कूर्सी पर बैसि पेपर पढ़ि रहल छथि। दीन हीन अवस्था में मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - नेताजी प्रणाम।
विनोद - प्रणाम प्रणाम। कह की हाल चाल
? आइ बहुत दिन पर देखलिअ। कह केम्हर-केम्हर एलाह ?
म्ंाजूर - की पूछै छी नेताजी। मूखिया बिना घूसे
? इंदिरा आवास नै देम ऽ चाहैय। तहूमे बीस हजार मे कम-सँ-कम पाँच हजार। कहू त ऽ पनरह हजार मे की की करब ? अहूमे आइ चारि-पाँच सालसँ आइ-काल्हि आइ-काल्हि करै य। अखैन कतबो पाएर दाढ़ी पकड़लियैन तैयो उ नै घमलथि। एक्को बेर कहलथि, पाँच हजार देबै तहने हाएत। नै त नै हाएत। बात जानि साफ। अपने हमरा बुधि दिअजे एकर कोनो नियम कानून छै की नै ?
विनोद - कानून त छै
, मूदा दौड़ा-बढ़ी कर पड़तह। तों गरीब आदमी छह। तोरा सँ पार लागतह ?
मंजूर - नेताजी
, मरता क्या नहीं करता । मरल त हम छीहे। अहाँ हमरा रस्ता बताए दिअ, देखै छियै कानून मे दम छै की नै। उचितक लेल अहाँ हमरा जे कहब से करै लाए तैयार छी।
विनोद - हम एगो आवेदन लिखि दैत छियह। मुखिया लग बखैन चलि जा द ऽ दिहक आ की कहै छह से फेर कहिहह।
(विनोद मंजूर के एगो आवेदन लिख दैत छथि आ मंजूर उ ल ऽ क ऽ मुखिया लग तुरंत जाइ अछि। )
(पटाक्षेप)
दृष्य - तीन
( स्थान - चन्दन मुखियाक दलान। दलान पर चन्दन आ अमरनाथ कुर्सी पर बैस गपसप क ऽ रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - मुखिया जी प्रणाम।
चन्दन - प्रणाम प्रणाम।
मंजूर - अमरनाथ भाइ प्रणाम।
अमरनाथ - प्रणाम प्रणाम मंजूर भाइ। बैसू।
मंजूर - की बैसब
? बैसलासँ पेट भरतै। मुखिया जी एगो दरखास छै, देखल जाउ।
चन्दन - ल ऽ लिअ अमरनाथ। पढ़ियौ की लिखल छै।
( अमरनाथ दरखास्त लऽ कऽ पढ़ै छथि। मंजूर भूइयांमे बैसि जाइत अछि। )
अमरनाथ - सेवा में
,
श्रीमान् मुखिया महोदय।
ग््रााम पंचायत राज रामपूर।
महाशय
,
नम्र निवेदन अछि जे हम अति निर्धन व्यक्ति छी। अपन पंचाइत मे किनको सँ पहिने हमरा कोनो सुविधा भेटक चाही। ओइमे अपने हमरा पाछू छोड़ि दै छियै। इंदिरा आवास लाए चारि-पाँच साल सँ घूमबै छी। जै गरीबकेँ पाँच हजार टाका घुस लाए नै भेटै।
ऐ संदर्भ मे अपने सँ करबद्ध प्रार्थना अछि जे एगो महागरीबकेँ निःषुल्क इंदिरा आवास प्रदान कऽ कल्याण काएला जाए। संगहि सूचना अधिकारक तहत पंचाइत सचिव सँ इंदिरा आवासवला आयव्याय फाइल उपलब्ध कराब ऽ मे सहयोग काएल जाए। धन्यवाद।
अपनेक विष्वासी - मंजूर
चन्दन - जाउ मंजूर
, अहाँकेँ जै अधिकारक प्रयोग करबाक अछि करू ग। देख लेबै। नै, जदी पाँच हजार टाका ओइ मे से देबै तऽ अखनो भऽ सकैया।
मंजूर - नै मुखियाजी
, हमरा कानूनेमे जाए दिअ।
चन्दन - जाउ न हम रोकने छी।
मंजूर - बेस हम जाइ छी। (मंजूरक प्रस्थान )
अमरनरथ - मुखियाजी एकरा बुते एगो अल्हुआ तऽ उखरबे नै करतै आ आएल छेलाह धमकी दै लाए। केहेन-केहेन गेल्लाह तऽ मोंछवला एल्लाह।
चन्दन - हा हा हा ऽ ऽ ऽ ऽ (ठहक्का मरि हँसै छथि। ) जाए दियौ अमरनाथ कत्त जेतै कानून अपना हाथमे छै।
(पटाक्षेप)
दृष्य - चारि
(स्थान - विनोदक दलान। विनोद ससुराइर जाइक तैयारी मे छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - नेताजी प्रणाम।
विनोद - प्रणाम प्रणाम। कह मंजूर
, मुखियाजी भेटलखुन।
मंजूर - हँ भेटलथि त जरूर। मुदा फेर ओएह गप्प। बिना पाँच हजार घुसे काज नै हाएत। अहाँके जै अधिकारक प्रयोग करबाक हुआए ये करू।
विनोद - आब हुनक
, किछु नै कहक। हम तोरा तीनिगो आवेदन लिख दै छियह। एगो बी0 डी0 आ0 केँ द ऽ दिहक, एगो एस0 डी0 ओ0 के द ऽ दिहक आ एगो डी0 एम0 केँ द ऽ दिहक। डर नै न हेतह।
मंजूर - डर कथीके हेतै नेताजी। कोनो हम चोरी कर जाएव। अहाँ कनी हानिक ऽ लिखि दिअ।
(विनोद तीनीगो आवेदन लिखि दै छथि। )
विनोद - मंजूर
, ई तीनु आवेदन लाएह। तीनु ऑफिसमे दऽ दिहक। हम आइ ससुराइर जाइ छिसह। एक सप्ताहक बाद एबह। देखहक की होइ छै ?
मंजूर - हम एखनइ जाइ छी नेताजी।
विनोद - बेस जाह। हमहूँ लाइ छियह।
(पहिने मंजूरक प्रस्थान। तकर बाद विनोदक प्रस्थान। )

(पटाक्षेप)
दृष्य - पाँच
( बी0 डी0 ओ0 कार्यालय। गेट पर एगो सिपही छथि। बी0 डी0 ओ0 अषोक कार्यालय मे फाइल उनटा रहल छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। सिपाही मानसिंह छथि। )
म्ंाजूर - प्रणाम सर।
मनसिंह - प्रणाम प्रणाम। का बात हउ
?
म्ंाजूर - सर
, कनी बी0 डी0 ओ0 सहाएबकें भेंट करबाक छै।
मानसिंह - बात का ह
, से पहिले बोल न ? सहाएव जरूरी काममे फंसल बा ?
म्ंाजूर - सर
, हमरो बड जरूरी काज छै। इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै।
मानसिंह - अच्छा जा।
(मंजूर अशोक लग पहुँचलथि।)
म्ंाजूर - हाकिम परणाम।
अषोक - बाजू की बात अछि
?
म्ंाजूर - हाकिम इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै।
अषोक - अखैन उ सब काज नै होइ छै ब्लॉक मे। उ काज मुखिए करै छै। अपन मुखिए लग जाउ।
मंजूर - हाकिम
, मुखियासँ अक्कछ भऽ गेलहुँ जहन ने अपनेक शरणमे एलहुँ। चारि-पाँच साल पहिने बाढ़िमे घर दहाए गोल। सिरकी तानि सभ परानी कौहुना जीबै छी।
अषोक - मुखिया की कीहलनि
?
मंजूर - मुखिया कहलनि जे बीस हजारमे पाँच हजार लेब
, तहने हाएत, नै त नै।
अषोक - किछु लऽ दऽ के काम क ऽ लैतहुँ न
?
मंजूर - हाकिम
, हमरा उ बात एक्को रत्ती पसीन नै पड़ल। एक-दू साए वला गप रहितै तऽ सोंचबो करितिऐ। हाकिम, किरपा कऽ ई दरखास लियौ आ एगो गरीबोसँ गरीअ पर विचार करियौ।
अषोक - बेस लाउ। ( मंजूर अषोककेँ दरखास दऽ दै छथि। )
मंजूर - परणाम हाकिम। जाइ छी हम। रिक्षा चलबै लाए जाएब। ( प्र स् था न )
अषोक - सेवा मे
,
श्रीमान् प्रखंड विकास पदाधिकारी महोदय
,
कार्यालय - भगवानपुर
महाशस
,
सूचना अधिकारक तहत हम पूछै लाए चाहै छी जे इंदिरा आवास पाँच
हजार घुसे लऽ किआए भेठत
, ओना किआए नै भेटत ? एकर लिखित जवाब
दूः दिनक अन्दर चाही। नै त आगू बढ़ब। धन्यवााद
,
मंजूर
, ग्राम पंचाइत राजरामपुर।
(अषोक आवेदन पढ़ि कूड़ामे फेंक दै छथि। )
एकर लिखित जबाब दू दिनक अन्दर चाही
, नै तऽ आगू बढ़ब। जाउ, जत्त
बढ़ब
, तत्त बढ़ू। सब ठाम एक्के रंड. भेटत।

प टा क्षे प

दृष्य - छह

( स्थान - अनुमंडल कार्यालय। सुनील एस0 डी0 ओ0 आ बहादुर हुनक सिपाही छथि। सुनील फाइल उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - सर प्रणाम।
बहादुर - प्रणाम प्रणाम। कत्त हुरार जकँा हुरकल जाइ छी
? रूकू। पहिने एत्त पाँच गो टका दिअ, तहन अन्दर जाएब।
मंजूर - ( जोर सँ ) ऐ देहमे करौआ लागल छह की
? सरकार सँ तों तनखाह नै लै छहक ?
बहादुर -अच्छा जा। बेसी बाजह नै ( मंजूर सुनील लग पहुँचल। )
मंजूर - परणाम हाकिम।
सुनील - की बात
?
मजूर - इंदिरा आवासवला एगो दरखास छै। लेल जाउ।
सुनील - ( आवेदन लऽ कऽ ) अहाँ जाउ।
मुजूर - जाइ छी हाकिम। एगो गरीबोकेँ कल्यााण करबै। परणाम।( मंजूरक प्रस्थान। )
सुनील - सेवा में
,
श्रीमान् अनुमंडलाधिकारी महोदय
, बेनीपुर।
महाशय
,
हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपूर स्थाई निवासी छी। चारि-पाँच
साल पहिने बाढ़िमें काहि काटि रहल छी। इंदिरा आवास लाए मुखिया चंदन
पाँच हजार टाका घुस मांड.ै आए। बी0 डी0 ओ0 साहेब सेहो हमर आवेदन
पर कोनो ध्यान नै देलनि। सूचना अधिकारक तहत हम एकर लिखित जबाब
दू दिनक अन्दर चाहै छी। अन्यथा आगू बढ़ब।
धूः ई बकवासवला आवेदन छै। के माथा पच्ची
करतै ऐमे
?
( सुनील आवेदन के कूड़ा मे फेंक दै छथि । )

प टा क्षे प

दृष्य - सात
( स्थान - समाहरणालय। डी0 एम0 चन्द्रकान्त कार्यालय में फाइल उनटा रहल छथि। गेट पर सिपाही हंसराज ठाढ़ छथि। तखने मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - परणाम हूजूर। अन्दरा कलक्टर सहाएब छथिन्ह
?
हंसराज - की बात
?
मंजूर - हुनके सँ काज य।
हंसराज - कोन काज स
?
मंजूर - इंदिरा अवासवला एगो दरखस देबाक स हाकिमकेँ।
हंसराज - लाउ ने पाँच हजार टाका
, हमही काज कराऽ दै छी। हाथो-हाथ काज भऽ जाएत।
मंजूर - खाएब
, से ओकाइदे नै आ पाँच हजार टाका हम कत्त सँ देब ?
हंसराज - तहन ऑफिसमे नै घुसु। घुरि जाउ।
मंजूर - से किआए
, अहींक ऑफिस छी लगाएल।
हंसराज - बेसी फटर-फटर बाजलौंह तऽ एक्के झापर में ठीक भऽ जाएब। कोनो बाप काज नै देत - 3
मंजूर - बेसी बाप-बाप केलौं तऽ बुझिा लिअ।
हंसराज - ( मंजूर के एक थापर मारि ) हरमी कहीं के। आब बाज कोन बाप काज देतौ।
मंजूर - ( हंसराज केँ एक थापर मारि ) हरमी सभ
, चोट्टा सब गरीबकेँ खाकऽ साँढ़-पारा भऽ गेल।
( हंसराज आ मंजूर में हाथापाई भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि चन्द्रकान्त गेट पर एलाह। )
चंद्रकान्त - अहाँसब हल्ला-फसाद किआए करै छी
? हंसराज की भेलै ?
हंसराज - सर
, ई हमरा बिना मतलबकेँ गाड़ि द ऽ देलक।
मंजूर - सर
, पहिने इहाए हमरा गाड़ि देलक। तहन हम देलियै।
चंद्रकान्त - धिया पुता जेकाँ गाड़ि-गलैज
, मारि-पीट करै जाइ छी। छिः! छिः! लेक सब हँसत। बाजू बौआ, की बात अछि ?
मंजूर - हूजूर एगो इंदिरा आवासवला दरखास छै।
चंद्रकान्त - लाउ अन्दर आउ। ( मंजूर आ चन्द्रकान्त कार्यालस मे जाइ छथि। ) आब बाजू की कश्ट
?
मंजूर - हजूर हम रिक्षा चालक छी। कमाइ छी तऽ खाइ छी। नै तऽ उपासे रहै छी। चारि-पाँच साल पहीने बाढ़िमें हमर झोपरी दीहा गोल। इंदिरा आवास लाए मुखियालजीकेँ कहलियन्हि तऽ उ कहलनि जे पाँच हजार टाका घूस देबही तहने हेतौ नै तऽ नै हेतौ। पाएरो दाढ़ीयो पकड़लियनि जे खाइ पीयै लाए
, एक-दू साए टाका पेटो काटि कऽ देब। हमरा पर किरपा कएल जाउ। मुदा टस-सँ-मस नै भेलाह।
हजूर
, एगो हमर दरखास स्वीकार काएल जाउ।
चंद्रकान्त - बेस लाउ। ( मंजूर चंद्रकान्तकेँ दरखास्त दऽ दै छथि। )
मंजूर - हजूर
, हमरा पंचाइत मे हमरासँ बेसी गरीब कियो नै हाएत। अपने पता कऽ लियौ। एगो गरीब बड आशा सँ अपने लग पहुँचल अछि। किरपा अवस्स कएल जाउ हजुर।
आब हम जाइ छी हजुर। तीनि दिनसँ भुखले छी।
चंद्रकान्त - सेवा में
,
श्रीमान् समाहती महोदय
, परसा
महाशस
,
नम्र निवेदन अछि जे हम मंजूर ग्राम पंचाइत राज रामपुरक स्थाइ
निवासी छी। हम अति निर्धन रिक्षा चालक छी। चारि-पाँच साल पहिने
पहिने हमर झोपड़ी बाढ़िा में दहा गेल। हम सब परानी सिरकी तानि पषु
जीवन जीबै छी।
कृपया एगो इंदिरा आवासक अनुमति प्रदान काएल जाउ। ऐ लेल
हम अपनेक आजीवन कृतज्ञ रहब। ओना मुखिया
,बी0 डी0 ओ0 आ एस0 डी0
ओ0 के आचरणसँ हम पूर्ण आजीज छी।
कृपया हमर अनुमति दू दिनक अंदर देबाक कश्ट करी। अन्यथा हम
सूचना अधिकारक तहत घुसखोरीक विरूद्ध आवाज अवस्य उठाएब।
धन्यवाद
,
( आवेदन पढ़ि चन्द्रकांत कूड़ा में फेक दै छथि। ई तऽ सरासर धमकी भेलै। सूचना अधिकारक हमरा मुट्ठीमें छै। हम कोनो आइरी-गाइरी हाकिम छी
, डी0 एम0 छी। )
हंसराज - ( अन्दर कार्यालय जाक ) सर
, ई आदमी बड ख्च्चर छेलाह। जाहाँ कहलियै पाँच हजार घूस देबै तऽ हाथो-हाथ काज करा देब। फट सन एक थापर बैसा देलक। तकरे हाथापाई छेलै ।
चन्द्रकांत - जाए न दियौ। ओकरा कोनो ऑफिस गुदानतै।

प टा क्षे प
दृष्य - आठ
( स्थान - विनोदक दलान। विनोद कुट्टी काटि रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - नेताजी परणाम।
विनोद - परणाम परणाम। कह मंजूर
, काज भेलह ?
मंजूर - आइ पनरह दिन भऽ गोल। काजक कोनो अता-पता नै। बेकार लाए रोजी-रोटी छोड़ि कऽ हरानो भेलहुँ।
विनोद - मंजूर
, तों जिला तक पहुँचलक। तोहर काजक कोनो सुनबाई भेलै। आब बुझहकं प्रशासन केहेन भ्रश्ट छै। एकटा करह, छोड़ह माथा-पच्ची। जा कमैहह आ खैहह। ऐ सबहक चक्करमें नै पड़ह। ऐ रास्तामे बडा फैदरत छै।
मंजूर - नेताजी
, परेशानी झेलै लाए हम तैयार छी। अहाँ हमरा उपाइ बताउ।
विनोद - हाईकोर्ट छै
, सुप्रीम कोर्ट छै। सूचना आयोग छै।
मंजूर - नेताजी
, हमरा आहाँ जत्त जाइ लाए कहबै ओत्त जाइ लाए तैयार छी।
विनोद - बेसी
, एगो दरखास्त हम लिख दै छियह। तों जगदीशपुर चलि जाह। ओइ गाममे एगो हमर पुरना मित्र छथिनह। हुनक नाम ष्यामनन्द छियन्हि। पूछैत-पूछैत चलि जइहह। हुनका दरखास्त दऽ दिहक। बड नीक लोक छथिन्ह। गरीबकेँ अपनो दिशसँ मदति करै छथिन्ह।
मंजूर - बेस अपने लिखि दियौ। ( विनोद आवेदन लिखै छथि। मंजूर आवेदन लऽ कऽ प्रस्थान करै छथि। )
विनोद - केहेन भ्रश्ट प्रशासन छै जे ओइ बुढ़बाकेँ दौड़बैत-दौड़बैत हरान कऽ देलकै। मुदा बिन घुस एगो इंदिरा आवास नै भेटलै। ( मुँह बिजकाए लै छथि। )

प टा क्षे प
दृष्य - न ऽ
( स्थान - नेता ष्यामानन्दक दलान। दलान पर बैस उ पत्रिका उनटा रहल छथि। मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - परणाम सरकार।
ष्यामानन्द - परणाम परणाम। नै चिन्हलौंह।
म्ंाजूर - सरकार हम मंजूर छी। रामपुरसँ बड़ी आशसँ पाएरे एलहुँहें।
ष्यामान्नद - बाप रे बा
, एत्ते दूरसँ पाएरे। धन्यवाद अहाँक।
म्ंाजूर - सरकार
, मजबूरीक मारल छी, बाढ़िक झमारल छी, मुखिया-बी0डी0ओ0-एस0डी0ओ0-कलक्टर सभसँ रिटाइर छी।
ष्याामान्नद - कहु की बात अछि।
म्ंाजूर - सरकार
, एगो हमर दरखास छै।
ष्याामान्नद - लाउ दरखास्त। ( ष्यामानंद आवेदन लऽ पढ़ै छथि। )

सेवा मे
,
श्रीमान् सूचना आयुक्त महोदय
, पटना।
महाशय
,
निवेदन अछि जके चारि-पाँच साल पर्व बाढ़िमें हमर झोपड़ी दहा
गेल। हम गरीब आदमी छी। रिक्षा चलाकऽ कौहुना गुजर करै छी। कमाइ
छी तऽ खाइ छी नै तऽ उपासे रहै छी। आइ पाँच सालसँ सिरकी तानि पषु
जेकाँ रहै छी। बरसात में एक्कोटा बुन्नी बाहर नै खसै आए।
म्ुखियाजीकेँ पाएर-दढ़ी पकड़लियन्हि त उ कहलनि पाँच हजार
घुस देबै तऽ इंदिरा आवास भेट जाएत। नै तऽ कोनो उपाए नै।
बी0 डी0 ओ0
, एस0 डी0 ओ0 आ डी0 एम लग दरखास्त देलौं
आ सूचना अधिकारक तहत दू दिनमे जबाब मांड.लौह। आइ पनरहम दिन
छी। कत्तौ कोनो सुनवाइ नै।
ऐ संदर्भमे हमर श्रीमान् सँ करबध प्रार्थना अछि जे स्थितिक पूर्ण
जाँच करबाए हमर सूचना अधिकारक औचित्य पर गंभीरतापूर्वक विचार
काएल जाए आ एगो उजरल अतिदिनकेँ बसाएल जाए।
ऐ पुण्यात्मक कार्यक लेल हम अपनेक आजीवन आभारी रहब।
धन्यवाद
,
अपनेक विष्वासी
नाम - मंजूर
ग्राम - रामपुर
प्रखण्ड - भगवानपुर
जिला - परसा ( बिहार )
( ष्याामानंद किछु देर सोंचिकऽ )
टाइ धरि हमरा लग एहेन केस नै आएल छल। ई गंभीर केस अछि। खाइर मंजूर अहाँ जाउ। हम पूर्ण प्रयास करब।
म्ंाजूर - हमरा आबो पड़तै पटना।
?
ष्यामानंद - एखन नै। जरूरी पड़तै तऽ बजाए लेब।
म्ंाजूर - बेस सरकार किरपा अवस्स करबै।
ष्यामानंद - अहाँ जाउ। एत्ते दूर जेबाको अछि पाएरे।
म्ंाजूर - परणाम सरकार।
ष्यामानंद - परणाम परणाम। ( मंजूर प्रस्थान करै छथि। )
प टा क्षे प

दृष्य - दस

(स्थान - मंजूरक घर। मंजूर घरक आगू रस्ता पर माथा-हाथ दऽ बैसल छथि। )
मंजूर - अल्ला सबटा विपत्ति हमरे दऽ देलक। घोड़ीओ मरि गेल। सब दिन रिक्षो नै चलै आए। गाम-घरक कजो सब दिन नै भेटै आए। एम्हर धिया-पुत खोखरै आए। सिरकीयो चुऐ आए। की करी की नैं
, किछु नै फाुराइ आए। या अल्लाह, या खुदा।
( ष्यामानंदक नोकर मालिकक प्रवेश। )
मालिक - मंजूर अपने छिऐ
?
म्ंाजूर - जी जी
, की कहै छी से ?
मालिक - हमर नेताजी श्री ष्यामानंद बाबू अपनेकेँ काल्हिु पटना बजौलन्हि। सूचनाअधिकारक प्रयोग में अपनेक बड पैघ प्रतिश्ठा भेटऽ जा रहल अछि।
म्ंाजूर - परणाम सर
, परणाम सर। धन्यवाद अहाँकेँ। एहेन षुभ समाचार आइ धरि कियो नै देने रहथि।
मालिक - बेस हम जाइ छी। अहाँ जरूर जेबै
, बिसरबै नै। ( प्रस्थान )
म्ंाजूर - ( घरवाली नजीमा लग जा कऽ ) गै नजीमा काल्हि हम पटना जेबै। आब देखही अल्ला की करै छै
?
नजीमा - बटखरचा लाए तऽ घरमे किच्छो नै छै। कनी मुरही हेतै।
म्ंाजूर - साहाए दऽ दिहैन।
नजीमा - जेबहक केना
? ओत्ते दूर पाएरे हेतह जाएल।
म्ंाजूर - टेनमे मांडै.त-चांडै.त चलि जेबै गै।
नजीमा - कनी ओरियाके जइहह। सेहो तऽ गाड़ी आइए पकड़बहक तब नऽ काल्हि पटना पहुँचबहक।
म्ंाजूर - ठीक कहै छें नजीमा। जो अखने मुरही लेने आ विदे भ जाइ। ओना असडै.सँ टेन छुटि जाएत तहन। हमरा भीखो मांड. पड़तै नजीमा।
नजीमा - की करबहक
? मजबूरीक नाम महात्मा गाँधी होइ छै। तोरा अबेरो होइ छह। हैआए मुरही लेने आबै छियह। ( नजीमा एक मुठी मुरही खोंइछामे आनलथि। ) हैआए, एतबे छेलै।
म्ंाजूर - ला जे छौ से। ( नजीमा मंजूरक गमछामे देलक ) हम जाइ छियौ। राति विराति कनी जाइगे के सुतीहें। घर बेपरद छौ ।
नजीमा - बेस
, तू जा न अल्ला के नाम लऽ केऽ ।
म्ंाजूर - या अल्ला
, या विस्मिला ।
प टा क्षे प

दृष्य - एगारह
( स्थान - सूचना आयुक्त कार्यालय पटना। ब्रह्मदेव सुचना आयुक्त
, नेताजी ष्यामानंद आ उप सूचना आयुक्त अनजार कार्यालय मे बैसकऽ मंजूरक भूमिका पर समीक्षा कऽ रहल छथि। )
ष्यामानंद - सर
, आइ धरि हमरा मंजूर जेकाँ केस कहियो आ कत्तौ नहि टकराएल राहाए। एत्ते गरीब एवं मूर्ख रहैत एहेन कठिन स्टेप।
अनजार - साहाएब
, वास्तवमे मंजूर धन्यवादक पात्र आछ जेे निच्छछ देहाती आ औंठा छाप रहैत अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति संघर्शषीलताक प्रदर्षन केलनि।
ब्रह्मदेव - हम एते पद देखलहुँ मुदा मंजूर जेकाँ अपन हकक प्रति जागरूक एवं कर्मठ व्यक्ति नै भेटल राहाए। जदी उ अखैन एत्त रहिताए तऽ हम हुनका हार्दिक धन्यवाद दैतहुँ।
ष्यामानंद - आइ पटना आबै लाए ओकरा संवाद पठेने रहियै। संवाद भेटलै की नै। आएत की नै पता नै । ( मंजूरक प्रवेश। )
म्ंाजूर - (ष्यामानंद केँ ) परणाम हुजूर। (कर जोड़ि )
ष्यामानंद - परणाम परणाम।
म्ंाजूर - ( ब्रह्मदेव केँ ) परणाम हुजूर।
ब््राह्ममदेव - परणाम हुजूर।
म्ंाजूर - ( अनजारकेँ ) आदाब हुजूर।
अनजार - आदाब आदाब।
मंजूर - हुजूर सभ
, हमरा आबैमे बड देरी भऽ गेल। क्षमा काएल जाउ। हुजूर ?टेने लेट छेलै।
ब्रह्मदेव - अच्छा चलू कोनो बात नै। बेसी लेट नै भेल। अहींक नाम मंजूर छी ने
?
मंजूर - जी हुजूर।
ब्रह्मदेव - हम सूचना आयुक्त छी। हम अहाँकेँ हार्दिक धन्यवाद दै छ। ( वाह! वाह! कहि पीठी ठोकै छथि। ) अहाँ जेकाँ अपन अधिकारक आ कर्त्तव्यक प्रति समर्पित नागरिक देशकेँ उद्धार कऽ देत। अपने केँ बहुत-बहुत धन्यवाद। ( हिन्दुस्तान पत्रकार पवन आ दैनिक-जागरणक पत्रकार महेशक प्रवेश। दुनु मंजूरक फोटो घीचै छथि आ गपसप करै छथि।)
पवन - मंजूर
, ऐ कार्यालय मं अपनेकेँ की भेटलै ?
मंजूर - हुजूर। सूचना आयुक्तक साहाएब हमरा धनवाद देलकै।
महेश - जखन धन्यवाद नै दैतथि तहन
?
मंजूर - तखन हमरा हाकिम परसँ विशवास हटि जाइताए। हम बुझि जाइतहुँ जे बड़को आपिस बकवास अछि बेमतलब अछिै
पवन
$महेश - धन्यवाद मंजूर भाइ।

प टा क्षे प

दृष्य - बारह

( स्थान - आई0 बी0 एन0-7 चैनलक मनेजर अखिलेशक आवास। उ मिथिला समाद पेपर पढ़ि रहल छथि। )
अखिलेश - मंजूर को प्रतिश्ठा
मंजूर ग्राम-पंचाइत राज रामपूर
, प्रखंड-भगवानपुर, जिला-परसा ( परसा ) क स्थाई निवासी छथि। ओ अतिदीन रिक्शा-चालक छथि जे पूर्ण मुर्ख छथि। ओ इंदिरा आवासमे घुसखोरीक विरूद्ध आवाज उठेबामे सूचना कार्यालयसँ प्रतिष्ठा प्राप्त केलन्हि जइसँ सूचना आयुक्त ब्रह्मदेव हार्दिक धन्यवाद दैत पीठ ठोकलनि। ब्रह्मदेव कहलनि, ऐहेन कर्मठ नागरिक देशक उद्धार करत।
( अखिलेश किछु काल सोचिकऽ पेपर राखि दै छथि। )
म्ंाजूर मूर्ख एवं गरीब रहिकऽ ऐहन कठिन कदम उठौलनि देशक महान प्रेरणादायक काज केलनि। उ देशक अस्सल नागरिक छी। हुनका हमरा तरफसँ हार्दिक धन्यवाद आ अवार्ड परसु दिल्ली में भेटतन्हि। हम हुनका सपरिवार आबै-जाइक भाड़ा पठाए दै छियन्हि।
प टा क्षे प

दृष्य - तेरह
( स्थान - मंजूरक झोपड़ी। झोपड़ीमे मंजूर
, नजीमा, बेटी सलमा, नाजीनी, खुशबू आ बेटा अजहर, जफर एवं अस्फाक उपस्थित छथिै मंजूर सपरिवार दिल्ली जेबाक विचार-विमर्ष काए रहल छथि। )
म्ंाजूर - गै नजीमा
, अखिलेश अपना सभकेँ दिल्ली आबै-जाइक खर्च पठाए देलकौ, से जेबही ?
नजीमा - कथी लाए हौ
?
म्ंाजूर - से हमरो नै बुझल छौ। एक आदमी कहै छेलाए जे जाह दिल्ली
, अखिलेश बड़का अबार देतह। कहाँदुन पेपरमे निकलल छेलै।
नजीमा - चल न देखियौ तऽ ओकरा केहेन छै
? हौ हमरा से कुच्छो पूछतै तऽ की कहबै ?
म्ंाजूर - जे फुरतौ से कहियै। उ कोनो नै बुझै हेतै जे मंरूख आ गरीबक भनसिया सधारणीमे केहेन होइ छै।
गै नजीमा
, लोक सभ हमरा बड मजाक करै य जे दिल्ली जा न, रिक्षा पर बैसाक ऽ अन्नपूर्णा के खूम घुमबिहह।
नजीमा - हौ
, अपना सभकेँ अपने गाम लऽ के नै तऽ चलि जेतै ?
मंजूर - नै गै
, से तऽ नै बुझााइ छौ। चल नऽ बुझाल जेतै। बड़ बेसी तऽ अपना गाम लऽ जेतै। ऐ सँ बेसी की हेतै ? ओतै खाएब, पीसब आ मौज मस्ती मे रहबै बुझै छी ही, अखिलेश कत्तेक बड़का आदमी छै ?
नजीमा - हँ हौ
, सुनै छिऐ बड़ीटा लोक छै। बियाह-तियाह करै लाए नै न कहतै।
मंजूर - नै गै
, तूँ तऽ बूरबक जकाँ गप करै छें।
सलमा - बाबा
, हमहुँ जेबौ तोरा सँडे. दिल्ली अखिलेश केँ देखै लाए।
अस्फाक - बाबा
, हमहुँ ओकरेसँ बियाह करबै।
मंजूर - केकरासँ
अस्फाक - अखिलेशक साइर सँ।
मंजूर - धुर बुरबक
, लोक हँसतौ।
खुशबू - बाबा
, सभकेँ दिल्ली लऽ जेबहक आ हम घर पर असगरे रहबै ?
म्ंाजूर - सभ कियो चलबै बुच्ची राजधानी एस्प्रेससँ। ओइ टेनमे जाड़मं गरम आ गरममे जाड़ लगै छै।
गै नजीमा
, तू सभ जल्दी तैयार होइ जो। आइ रातिमे पटनासे ओ टेन छै। फेद एत्ते दूर जेबाको छै न। लेट भऽ रहल छौ।
नजीमा - जाइ छियह तैयार होइ लाए। तोंहूँ जा झारा-झपटासँ भऽ आबह। तोरा खुच-खुच झड़े लगैत रहै छह।
मंजूर - अच्छा हम ओम्हरसँ अबै छी। तों सभ तैयार रह।

प टा क्षे प

दृष्य -चौदह
( स्थान - दिल्ली। मंच सजल धजल अछि । दर्षकक भीड़ अछि। अखिलेश आओर अन्नपूर्णा मंच पर उपस्थित छथि। अखिलेश नौकर किसुन मंच पर घुमि रहल छथि। अखिलेश आ अन्नपूर्णा पेपर पढ़ि रहल छथि।
किसुन - मालिक
, ओ सभ एखन धरि नै पहुँचलथि की कारण भ सकै छै ?
अखिलेश - ट्रेनक टाइम आब भऽ गेलै आए। ओ सभ आबिते हाएत। ( सपरिवार मंजूरक प्रवेश )
मंजूर - परणाम हुजूर। ( अखिलश केँ )
अखिलेश - परणाम परणाम मंजूर भाइ।
मंजूर - परणाम मैडम।
अन्नपूर्णा - परणाम परणाम। बैसे जाइ जाउ।
( सब कियो कुर्सी पर बैसै छथि। )
अखलेश - मंजूर भाइ
, सपरिवार नीके ना एलहुँ न ?
मंजूर - जी
, बड नीकेना एलहुँ। राजधानी में चढ़ि हम सभ तइर गेलहुँ।
अन्नपूर्णा - मंजूर भाइ
, ई के छथि ?
मंजूर - हमरे घरवाली छियै नजीमा।
अन्नपूर्णा - नजीमा बहिन
, नमस्कार।
नजीमा - नमसकार बहिन।
अन्नपूर्णा - बहीन
, उ सभ के छथि ?
नजीमा - सभ हमरे धिया-पुता छथि।
अन्नपूर्णा - बहुते धिया-पुता अछि। ऐ पर सुधार करू
, बहीन।
नजीमा - की करबै
, अल्लाक मर्जी।
अन्नपमूर्णा - सभकेँ नीक जेकाँ पढ़ाएब-लिखाएब।
अखिलेश - मंजूर भाई
, आब अपना सबहक आयोजित कार्यक्रम पर ध्यान देल जाए।
मंजूर - जी हुजूर।
अखिलेश - समस्त दर्षक लोकनि
,
अखिलेशक नव वर्शक हार्दिक षुभकाना आ अभिनन्दन। आइ ऐ देशक अहोभाग्य अछि जे मंजूर जेकाँ अपन अधिकार आ कर्त्तव्यकेँ बुझ वला प्रथम नागरिक हमरा सभकेँ प्राप्त भेल जे गरीब-गवार रहैत देशक भ्रश्टाचारीक विरूद्ध बीड़ा उठा कऽ अपन इमानदारी आ कर्मठताक परिचय दैत सफलता समस्त जनताक बीच समर्पित केलनि।
हम हिनक अहम भूमिकासँ प्रसन्न भऽ कऽ बेस्ट सिटीजन ऑफ द नेशन अवार्डक लेल चुनलहुँ आओर एखन षीघ्र हम हिनका अपन अवार्डसँ सम्मानित करबैन।
( थोपरीक बौछार भऽ जाइ य। )
मंजूर भाइ अपनेक दर्षक लोकनिकेँ किछु कहियौ।
म्ंाजूर - हम दर्षक भाइ सभकेँ की कहबैन। हम तऽ मुरूख छी। तहन अपनेक आज्ञा भेलै तऽ किच्छो कहि दै छियै।
हम तऽ इहाए कहब जे देशमे भ्रश्टाचारीके जनम जनता देलकै आ ओकर पालन-पोशण से हो जनते करै छै। जदी एकजूट भऽ कऽ सख्ती सँ एकर विरोध काएल जाए तऽ पक्का कहै छी जे ऐ महामारीसँ देशके मुक्ति भेटतै आ हमर देशक कल्याण हेतै तथा दुनिया में एक रनाम हेतै। ऐ से बेसी हमरा किच्छो नै फुराए य। धनवाद। ( फेर थोपरीक बौछार भऽ जाइ छै। )
अखिलेश - आब अपने सबहक समक्ष हम मंजूर भाइकेँ सम्मानित काए रहल छियन्हि।
( अखिलेश मंजूरकेँ फुल-माला अर्पित केलनि। थोपरीक बौछार भेल। अखिलेश मंजूरकेँ अवार्ड देलनि। थोपरीक फेर बौछार भेल। मंजूर अखिलेश केँ पाएर छुबि प्रणाम कर चाहैत छथि। मुदा अखिलेश मंजूरक हाथ पकड़ि लै छथि। )
मंजूर भाइ
, सचमुच अपने ऐ देशक महान प्रेरक छियै। हमरा सँ बड पैघ छियै। आ हार्दिक प्रणाम।
म्ंाजूर - खुश रहु अखिलेश भाइ। अहाँकेँ हमर उमेर लगि जाए।
( मंजूर अखिलेश सँ गरदनि मिललथि आ नजीमा अन्नपूर्णा केँ पाएर छुबि प्रणाम केलक। थोपरीक बौछार भेल। )

प टा क्षे प

दृष्य -पनरह
( स्थान - मंजूरक झोपरी। मंजूर अपन भाए रमजानीसँ गपसप कऽ रहल छथि। )
रमजानी - भैया
, की केना भेलै दिल्ली मे ?
मंजूर - बौआ
, अखिलेश हमरा अबार देलकै आ फुल-माला हमरा पहिराकऽ नवाजलकै। लोकक बड भीड़ छेलै।
( चन्दन आ अमरनाथक प्रवेश। )
अमरनाथ - मंजूर भाइ नमस्कार।
मंजूर - नमस्कार
, नमस्कार। मुखियाजी, परणाम।
चन्दन - परणाम
, परणाम।
मंजूर - बैसल जाउ
, सरकार सभ ।
( चन्दन आ अमरनाथ पीढ़ीया पर बैसलथि। )
अमरनाथ - मंजूर भाइ
, खर्च-बर्च करू। अहाँकेँ इंदिरा आवासवला बीस हजार टाका आबि गेल आ मुखियाजी सेहो अपना तरफसँ पाँच हजार टाका दै छथि।
मंजूर - अमरनाथ भाइ
, हमरा हरामक पाइ नै चाही हमरा अपन उचित पाइ बीस हजार चाही अप्पन पाइ मुखिया जी अपने रखथि।
अमरनाथ - मंजूर भाइ
, अहाँकेँ मुखियाजीवला पाँच हजार लेमहि पड़त। उ अहाँकेँ पाँच हजार मदति में दै छथि।
मंजूर - एहेन मदति लेबाक मन नै होइ अए। कारण मुखियाजी समाजक संड. बड गददेदारी करै छथि।
चंदन - इएह लिय
, पच्चीस हजार टाका।
मंजूर - लाउ
, बड जिद्ध करै छी तऽ।
( चन्दन मंजूरकेँ पच्चीस हजार टाका देलनि। )
चन्दन - मंजूर भाइ
, आहाँ सचमुच महान छी। हमर गलती के माफ काएल जाए।
मंजूर - गलती तखने माफ करब जखन अपने पब्लिक संड. नीक व्यवहार करब।
चन्दन - आब केकरो संडे. गलत व्यवहार नै करब।
मंजूर - तहन गलती माफ अछि।
अमरनाथ - धन्यवाद मंजूर भाइ।
( चन्दन आ अमरनाथक प्रस्थान। )
रमजानी - भैया
, बड चौंसैठ छह मुखियाजी। एहेन घुसखोर नै देखल।
मंजूर - तैं न हमरा सनक गरीब आ मुरूख सँ घट्टी मानलनि।
रमजानी - भैया
, तोरा एत्ते आगू बढ़ाबा मे किनकर यानगदान छै ?
मंजूर - बौआ
, नेताजी विनोदक किरपा छैन। ओ गुदरीक लाल छथिन्ह। गरीब जरूर छथिनह मुदा सब तरहक बुधि में पारंगत छथिन्ह। गरीबक मसीहा छथि। उचितक लेल जी जान लगा दै छथिन्ह। ( नेताजी विनोदक प्रवेश। )
परणाम नेताजी।
विनोद - परणाम
, परणाम। कह मंजूर कह रमजानी की हाल-चाल छै ?
रमजानी - अपनेक किरपा सँ बड बढ़ियाँ छै। नेताजी
, भैयाकेँ खाली अबारेट भेटलै और कहाँ किछु भेटलै।
विनोद - कथी भेटतै
?
रमजानी - किच्छो पाइ-कौड़ी भेटतै तहन ने
?
विनोद - बौआ
, प्रतिश्ठा से बढ़ि कऽ किछु नै छै। ओना पाइयो प्रतिश्ठाक सिंड.ार छियै। सेहो मंजूर केँ जरूर भेटतै।
मंजूर तों धैर्य राखह सेतोश राखह। सबटा धीरे-धीरे हेतै। बहुत ठाम तोहर सहयोगक चर्चा भऽ रहल छै।
मंजूर - नेताजी
, अपने जेना कहबै। हम साएह करबै। नेताजी, अपने अपन अनुभव पब्लिककेँ किछु दैतिऐ त बड बढ़िया होइतै।
विनोद - हम कोन जोकरक छी जे पब्लिककेँ अपन अनुभव देबै। आइ-काल्हि कियो केकरोसँ कम नै छै। तैयो हम दू शब्द कहि दै छिऐ।
अशिक्षे कारण जनता सुयोग्य प्रतिनिधिक चयन नै कऽ पावै अछि
, ताड़ीए दारूए पर बीकी जाइ अछि। स्वभाविक छै जे प्रतिनिधि क्षतिपुर्ती मे घुसखोरीक अश्रय लेत। ओइ घुसखोरीकेँ मेटाबऽ लेल हमरा लोकनिकेँ एकजुट भऽ कऽ शिक्षाकेँ सबसँ आगू बढ़ेनाइ अछि। हमरा नजरिमे सबटा अव्यवस्थाक मूल कारण अशिक्षा छै।
अशिक्षा हटतै तहने व्यवस्था सुधरतै आ देशक चहुँमुखि विकास हेतै।
अंत मे मंजूरकेँ हार्दिक बधाई दैत अपन दू शब्द खत्म करै छी।

जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!!
पटाक्षेप



 
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शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू

समीक्षा

ि‍नश्तुकी

नि‍श्तुकीक अर्थ होइछ- निश्चि‍त”, निश्चि‍त माने परम सत्‍य। कोनो साहि‍त्‍यक कृति‍क नाओं ओइमे नि‍हि‍त तत्‍वक वि‍श्लेषणक हेतु मौलि‍क रूपरेखाक भान करबैत छैक। आधुनि‍क मैथि‍लीक नवतुरि‍या कवि‍ श्री उमेश मण्‍डल रचि‍त कवि‍ता संग्रह नि‍श्‍तुकीकेँ पढ़लाक बाद ई ज्ञात भेल जे ऐ छोट-छीन कृति‍मे मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क ओ समाजि‍क पराभव केर दशो दि‍शा नि‍श्‍चि‍त कएल गेल अछि‍।

उमेशजी शि‍ल्‍पी नै छथि‍ आ ने हुनक कवि‍ता सभमे अलंकारक दर्शन होइत अछि‍ कतौ कोनो भंगि‍मा नै, लयात्‍मक धार नै तखन ऐमे कोन प्रकारक तात्‍वि‍क वि‍वेचन अछि‍ जकर समीक्षा कएल जाए?
वास्‍तवमे मि‍थि‍लाक ग्राम्‍य जीवनमे रमि‍, ऊँच-नीचक अनुभव हि‍नक रचनामे अलग-अलग बि‍म्‍ब रूपेँ यथार्थक बोध करबैत अछि‍। वि‍राट जीवन अनुभव नै रहलाक बादो नवतुरि‍या कवि‍ अपन दैनन्‍दि‍नीकेँ काव्‍यात्‍मक रूप देलक, ऐ लेल कवि‍क पहि‍ल रचनामे कतौ अपन भाषा-संस्‍कृति‍ ओ साहि‍त्‍यसँ वि‍श्वासघात नै देखएमे आएल। उपेक्षि‍त समाजक मध्‍य जन्‍म नेनि‍हार कवि‍ प्रांजल रूपेँ उपेक्षासँ आकुल छथि‍ मुदा मात्र अपन नै, समाजमे व्‍याप्‍त वि‍षय जीवन शैली ओ श्रमक संग-संग श्रमजीवीक अधोगति‍ हि‍नक कवि‍ता सभमे नव रूपेँ परि‍लक्षि‍त भेल। ऐ उपेक्षामे कोनो क्रांति‍क वा उन्‍मादक आश नै, मात्र अधोगति‍क पराभव चाहैत छथि‍। ऐ प्रकारक वि‍षमता कोना दूर हएत ई तँ समाजपर ि‍नर्भर करैत अछि‍। मूलत: अर्थनीति‍क अपन दृष्‍टि‍कोण कवि‍क महत्ता थि‍क। ऐमे सन्नि‍हि‍त साम्‍यवाद लेलि‍न ओ स्‍टालि‍नक साम्‍यवादी वि‍चारधारा नै, हमर अपन मि‍थि‍लाक उमेश मण्‍डलक वि‍चारधारा थि‍क, जे जगदीश प्रसाद मण्‍डलक अवतारवादसँ प्रभावि‍त तँ छथि‍, मुदा कतौ-हुनक रचनाकेँ नै चोरौलनि‍।
पहि‍ल कवि‍ता हँसैत लहासमे कोनो लहासक वर्णन नै, जे मनुक्‍ख जीवि‍त रहि‍तो साधनहीन आ ग्‍लानि‍सँ भरल यायावरी जीवन ि‍जबैत-जि‍बैत थाकि‍ गेल अछि‍ ओइ जीवि‍त रहि‍तौ लहास बनल मनुक्‍खमे आब ज्ञानेंद्रीय तन्‍त्र सक्रि‍य भऽ गेल आ ओ बजवाक लेल उद्यत अछि‍। वास्‍तवमे एकरा क्रांति‍‍ मानल जाए। ऐ प्रकारक क्रांति‍सँ हमरा देशमे वि‍भि‍न्न प्रकारक आन्‍दोलन भेल, मुदा अइठाम ओ लहास कोनो आन्‍दोलन नै करत। आ ने नक्‍सलवादक जन्‍म हएत, ऐ लेल समाज नि‍श्‍चि‍न्‍त रहि‍ सकैत अछि‍, मुदा आन्‍दोलन हएत तँ वाह्य आडंवर ओ अपन संस्‍कृति‍क वि‍रूद्ध। परंच ओहूठाम लहास कोनो लाठी-गड़ाँस नै उठाएत, मात्र हँसत। दस पाँतीक ऐ लघुकवि‍तामे सांस्‍कृति‍क अधोगति‍पर कवि‍ तेज शब्‍दवाण चला कऽ मि‍थि‍लेटा नै, सम्‍पूर्ण आर्यावर्तमे व्‍याप्‍त समाजि‍क वि‍षमताकेँ झकझोड़ि‍ देलनि‍। कतेक समाजि‍क आन्‍दोलन भेल मुदा स्‍थि‍ति‍ यथावत्, नै जानि‍ कहि‍या धरि‍ ऐ प्रकारक वि‍षमता हमरा सबहक समाजकेँ कोढ़ि‍ बनि‍ गलबैत रहत। एकटा कनेक कमी ऐ कवि‍तामे देखएमे आएल ओ अछि‍ पराभवसँ मुक्ति‍क उपाए, कवि‍ नै प्रकट कऽ सकलनि‍ जे लहासक हँसीक परि‍णाम की हएत।

फाँट एकटा एहन शब्‍द थि‍क जे लोककेँ लोकसँ फराक कऽ रहल। श्राद्ध-कर्मक अंति‍म दि‍न ज्‍येष्‍ठ संतानक माॅथमे पगड़ी बान्‍हि‍ उतराधि‍कारी बनाएल जाइत अछि‍, मुदा क्षणहि‍मे मृतकक खड़ाम छोड़ि‍ सभटा आन वस्‍तु लेल परि‍वारक आन लोक ओइ उतराधि‍कारीक आदेश केर प्रतीक्षा सेहो नै करैत अछि‍। वास्‍तवमे फाँट शब्‍द बौद्धि‍कतापर भारी पड़ि‍ रहल, लोक अपन आचार-वि‍चारकेँ ताखपर राखि‍ देआद बनि‍ गेल छथि‍, मात्र कुल-वंशक अधि‍कार लेल नै, जीवनक समस्‍त कर्मस्‍थलीमे ऐ प्रकारक प्रवृति‍ अछि‍। कवि‍ता शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ देआदकेँ मि‍त्र बनाबए चाहै छथि‍। बाधागरीबक जीवनमे सहचरी बनि‍ कऽ कखनो नै संग छोड़ए चाहै छथि‍। मंगला पूव भर जा तँ रहल अछि‍, नदी पार करबाक क्रममे प्रसन्नो भेल जे नदीमे पानि‍ नै मात्र बालु तँए बि‍नु घटखेबा देने पार भऽ जाएब। मुदा......। ओतौ कि‍छु लंठ लोक घटखेबा लऽ रहल, मंगलाक जेबीमे कैंचा नै वापस पश्चि‍मे रहि‍ गेल। ऐ प्रकारक घटना पलायनवादकेँ रोकैत अछि‍। एकर शि‍कार मि‍थि‍लाक महान दार्शनि‍क उदयनाचार्य सेहो भेल छलाह जकर परि‍णाम भेल जे ओ गंडक पार नै कऽ सकलनि‍ आ आपस अपन जन्‍मभूमि‍ करि‍यनमे आबि‍ अपन नाओंक संग पूर्ण मैथि‍ल लगा लेलनि‍। भोजपुरी साहि‍त्‍यक आदि‍ कवि‍ भि‍खारी ठाकुर अर्थोपार्जनक लेल पलायन तँ केलनि‍ मुदा कटुफल भेटलनि‍ आ पुनि‍ भोजपुर आबि‍ गेलाह, जकर परि‍णाम सोझाँ अछि‍, भोजपुरी साहि‍त्‍य आर्य परि‍वारक भाषा समूहमे अपन स्‍थान बना लेलक। ई तँ भेल मंगलाकेँ भेटल व्‍यथाकेँ रोकबाक प्रयास, मुदा जौं ओ पू-भर मात्र मि‍थि‍लेमे जाइत हएत तँ एकरा की मानबाक चाही, गरीबक बाटमे काँट रोपबाक प्रयास नै?
सम्‍यक अर्थनीति‍क आश धएने एकटा आर कवि‍ता लि‍खल गेल अछि‍- भाेगी। भाेगी आ योगी समाजि‍क जीवन रूपी नदीक दू कछेर थि‍क मुदा अइठाम योगीक अर्थ श्रमजीवी आ भोगीक अर्थ अनैति‍क रूपसँ धनोपार्जन कऽ अंत धरि‍ समाजपर अपन अधि‍कार रखनि‍हार मनुक्‍ख। अइठाम आबि‍ कऽ कवि‍ कालीकान्‍त झा बूचक उक्‍ति‍- भोगीकेँ देहोक मोह नै, योगी तम कथि‍ तुम्‍मा रहि‍-रहि‍...
उनटा पड़ि‍ गेलनि‍। ओइकालसँ वर्त्तमान समए केर तुलनामे भोगी बेसी भारी पड़ि‍ गेल छथि‍।
छठि‍ कवि‍ता सूर्यकेँ उपासनासँ बेसी कर्जक प्रति‍ कृतज्ञताक बोध करबैत अछि‍। मुदा कोन प्रकारक कर्ज कवि‍ स्‍पष्‍ट नै कऽ सकलनि‍। कवि‍क फुलवारीमे फूलक डंटी वयस्‍क नै भेल छन्‍हि‍ कि‍एक तँ नवतुरि‍या छथि‍, एखन मात्र प्रांजल माली छथि‍, प्रवीण नै। तँए बेसी नकारात्‍मक अंश नि‍कालब हतोत्‍साहि‍त कऽ सकैत छन्‍हि‍। ऐ कवि‍ता संग्रहक आन कवि‍ता सभ सेहो बोधगम्‍य अछि‍ मुदा एकटा आर कवि‍ता जे एे संग्रहकेँ वैशि‍ष्‍ठ्यता प्रदान करैत अछि‍ ओ थि‍क- के मैथि‍ल
वास्‍तवमे बेर-बेर समाजक कात लागल वर्गकेँ आगाँक लोक कहैत छथि‍- अहूँ मैथि‍ले थि‍कौं ऐसँ कवि‍ मर्माहि‍त भऽ अपन तर्कसँ प्रमाणि‍त करवाक प्रयास कएलनि‍ जे मि‍थि‍लाक कात लागल वर्ग अान लोकसँ वेसी मैथि‍ल कहेबाक योग्‍य छथि‍। कात कऽ देल गेल समाजक लोक जौं कवि‍ भऽ जाइत छथि‍ तँ लेखनीमे अपन व्‍यथाकेँ झाँपब असंभव।
फजलुर रहमान हासमीक कवि‍ता- हे भाई जकाँ उमेश मण्‍डलक कवि‍ता- के मैथि‍ल भवि‍ष्‍यमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ क्रांति‍वादी दृष्‍टि‍कोणसँ अवश्‍य प्रकाशि‍त करत-
 डोका काँकोर बीछ हम
भैंटक लावा चि‍बाकऽ
उफनैत शोणि‍तकेँ जरा रहल छी
मि‍थि‍लामे बैसल........।
मुदा प्रश्न रहि‍ये गेल
के मैथि‍ल?”

कवि‍ आशु कवि‍ नै अछि‍, आ ने आत्‍मासँ कवि‍ता लि‍खलक, मुदा मि‍थि‍लाक समाजमे रमल कवि‍ अपन जीवन दर्शनकेँ झाँपि‍ नै सकल आ कवि‍ता सभक रूपेँ मि‍थि‍लामे परसि‍ देलक।
ि‍नष्‍कर्षत: पहि‍ल प्रयास सराहनीय मानल जाए। कोनो आन कवि‍क कवि‍ता सभसँ एकर तुलना करब अनुचि‍त हएत। कि‍एक तँ ऐमे ने तँ श्रृंगार आ ने वैराग्‍य, ने कतौ भक्‍ति‍क हि‍लकोरि‍, कतौ हास्‍यक समागम नै परंच बि‍म्‍बि‍त अर्थनीति‍ ओ वि‍चारमूलक कवि‍ताक आधुनि‍क श्रंृखला।
धन्‍यवादक पात्र छथि‍ वि‍देहक संपादक गजेन्‍द्र ठाकुर जे गामक वैध बनल उमेशमे कवि‍त्‍व गुण देख आगाँ बढ़एलनि‍, ई मात्र उमेशपर उपकार नै सम्‍पूर्ण मि‍थि‍लाक प्रति‍ गजेन्‍द्र जीक सि‍नेह थि‍क। ऐ लेल वि‍देह परि‍वारक संग-संग श्रुति‍ प्रकाशन सेहो धन्‍यवादक पात्र छथि‍ जे मात्र भाॅज पुड़एबाक लेल समाजक कात लागल वर्गक संग्रह प्रकाशि‍त नै करै छथि‍, वरन् आत्‍मीय रूपेँ सम्‍पूर्ण मि‍थि‍ला-मैथि‍लमे उपेक्षि‍त नीक रचनाकेँ प्रकाशि‍त करबाक योजना श्रुति‍ प्रकाशनकेँ आधुनि‍क मैथि‍लीमे शीर्ष स्‍थानपर बैसा देलक।

पोथीक नाओं- ि‍नश्‍तुकी
रचनाकार- उमेश मण्‍डल
प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली
दाम- १००
प्रकाशन वर्ष- २००९


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल

नाटक
कम्‍प्रोमाइज
(पछिला खेपसँ आगाँ)
बारहम दृश्‍य

              (गामक वि‍द्यालयक आंगन। बच्‍चा सभ फील्‍डपर खेलैत। रस्‍ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्‍णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्‍याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल...)

नसीवलाल-       (ठाढ़ भऽ...) आजुक बैसार लेल सभकेँ धन्‍यवाद दइ छि‍यनि‍ जे अपन व्‍यस्‍त समैमे आबि‍ गामक बैसारकेँ शोभा बढ़ौलनि‍। तइ संग होनहार कर्मदेवकेँ आरो बेसी बधाइ दइ छि‍यनि‍ जे जी-तोड़ि‍ मेहनत कऽ बैसार करौलनि‍।

मनचन-          भैया, अहाँ कर्मदेवक प्रशंसा बेसी केलि‍यनि‍।

नसीवलाल-       कम्मे केलि‍यनि‍। नवयुवक आ बाल-बच्‍चाक (बेटा-बेटीक) बेसी प्रशंसा कतौ-कतौ अधलो होइ छै।

कृष्‍णदेव-         (चौंकैत...) से केना?

नसीवलाल-       मनुष्‍यकेँ घरसँ बाहर धरि‍ प्रशंसा-नि‍न्‍दासँ परहेज करक चाही।

कृष्‍णदेव-         तखन?

नसीवलाल-       उचि‍त सीमाक उल्‍लंघन होइते बनै-वि‍गड़ैक संभावना बढ़ि‍ जाइत अछि‍।

घनश्‍याम-         (मूड़ी डोलबैत...) संभव अछि‍।

नसीवलाल-       संभव रहि‍तो कठि‍न (भारी) अछि‍। मुदा जाधरि‍ संभव नै हएत ताधरि‍ समाजक गाड़ि‍यो लीख दऽ ससरब कठि‍न अछि‍।

घनश्‍याम-         नीक-अधलाक वि‍चार तँ करैके चाही।

नसीवलाल-       नि‍श्चि‍त करैक चाही। मुदा हटि‍ कऽ नै सटि‍ कऽ।

घनश्‍याम-         की मतलब?

नसीवलाल-       मतलब यएह जे जहि‍ना समुद्रक कि‍नछरि‍क पानि‍ कम गहींरमे रहि‍तो अगम पानि‍सँ मि‍लल रहैत, तहि‍ना।

              (कनडेरि‍ये आँखि‍ये रघुनाथ, मनमोहन नसीवलाल दि‍स देखैत तँ मनचन, सुकदेव कृष्‍णदेव दि‍स। अपन-अपन मनोनुकूल मुँहक रूप सेहो बनबैत...)

घनश्‍याम-         (ठहाका मारि‍...) एखन धरि‍ गामक बैसार कोन रूपे चलैत अछि‍ नसीवलाल भाय?

नसीवलाल-       घनश्‍याम बाबू, जहि‍ना बन्‍दूकक अनेको गोली खेनि‍हारकेँ देहक कोनो अंग चि‍न्‍हार नै रहैत तहि‍ना गामो-समाजकेँ भऽ गेल।

घनश्‍याम-         कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ?

नसीवलाल-       ओना एखन जइ काजे सभ एकठाम बैसलौं पहि‍ने से काज हेबाक चाही। मुदा ऐ तरहक बैसार पहि‍ल-पहि‍ल अछि‍ तँए कि‍छु आनो बात चलबे करत।

मनचन-          भैया, हनुमानजी जकाँ कि‍यो छाती फाड़ि‍ देखबैए आकि‍ पेटक बात आ हाथक काजेसँ देखबैए।

              (मनचनक बात सुनि‍ कृष्‍णदेव हंसक हि‍लुसैत आँखि‍ जकाँ देख...)

कृष्‍णदेव-         एखन धरि‍ मनचनकेँ बटेदार बुझै छलौं मुदा से नै ओ समाजक पटेदार (हि‍स्‍सेदार) छी।

              (कृष्‍णदेवक वि‍चार सुनि‍...)

नसीवलाल-       जहि‍ना हाथमे पाँचो-आंगुर पाँच लम्‍बाइ-चौड़ाइक होइ छैक मुदा हाथक शोभा तँ बराबरे बढ़बैत छै कि‍ने?

कृष्‍णदेव-         हँ से तँ बढ़ैबते छै।

नसीवलाल-       तहि‍ना ने सड़क बनौनि‍हारमे पत्‍थर बैसौनि‍हारसँ लऽ कऽ नक्‍शा बनौनि‍हार धरि‍क होइ छै।

कृष्‍णदेव-         मुदा?

नसीवलाल-       हँ। जहि‍ना सि‍र क्षीणका भगवतीक महत्‍व होइत तहि‍ना ने मुस्‍कुराइत खर्गधारी भगवति‍योक होइत।

              (बि‍चहि‍मे...)

घनश्‍याम-         हँ हेबाक चाही। मुदा पहि‍ने दुनूक परि‍चए हएब जरूरी।

नसीवलाल-       नि‍श्चि‍त। जहि‍ना भूतपर भवि‍ष्‍य ठाढ़ होइत तहि‍ना ने मनुष्‍योक पैछला जि‍नगी अगि‍ला जि‍नगीकेँ ठाढ़ करैमे मदति‍गार होइत।

मनचन-          जँ से नै हुअए, तखन?

नसीवलाल-       ओहि‍ना हएत जहि‍ना सत्‍यवादी हरि‍श्चन्‍द्रक पार्ट (स्‍टेजपर) कि‍यो शराबी झुमि‍-झुमि‍ कठही चौकीपर अलापैत।

              (ठहाका...)

घनश्‍याम-         हँसी-मजाक छोड़ि‍ बैसारक गरि‍मा बनाउ?

नसीवलाल-       (अधहँसी हँसि‍...) बहुत नीक वि‍चार घनश्‍यामबाबू, देलनि‍। आइ धरि‍ हृदए तड़पैत रहल जे गामोक नक्‍शा इति‍हासक पन्नामे जोड़ाए। से......?

मनचन-          भैया, जइ समाजमे प्रोफेसर, इन्‍जि‍नि‍यर, डॉक्‍टर, बैंक मैनेजर लऽ कऽ गोबर बीछि‍नि‍हारि‍ धरि‍ छथि‍ तइ समाजक इति‍हारस नै बनै ओ लाजि‍मी छी।

नसीवलाल-       कहलह तँ ठीके मुदा.....।

मनचन-          मुदा की?

नसीवलाल-       यएह जे, ओना आइ धरि‍क समाजक पन्ना-पन्ना पढ़ए पड़त। ओकरा तकैमे कि‍छु मेहनत उठबए पड़त। मुदा जँ ओकरा वि‍चारणीय प्रश्न बना राखि‍ आजुक समाजक अध्‍ययन कऽ ि‍नर्माणक संकल्‍प लेल जाए, तहूसँ काज चलि‍ सकैए।

मनचन-          से कोना हएत?

घनश्‍याम-         जँ करैक इच्‍छाशक्ति‍ जगा संकल्‍पवद्ध भऽ डेग उठाबी तँ भऽ सकैए।

कर्मदेव-          घनश्‍याम काका, अहाँ तँ नारदजी जकाँ छोटका बैंकक मीटि‍ंगसँ लऽ कऽ बड़का बैंकक मीटि‍ंग धरि‍क अनुभव रखने छी तँए नीक हएत जे अपने समाजक एकटा रूप-रेखा बना बजि‍यौ?

घनश्‍याम-         बाउ कर्मदेव, कहलह तँ ठीके बाहरी दुि‍नयाँसँ भि‍न्न ग्रामीण दुनि‍याँ अछि‍। तँए जे तरी-घटी गामक नसीवलाल भाय जनैत-बुझैत- छथि‍ से नै बुझै छी।

सुकदेव-         ई कोनो बड़ पैघ समस्‍या नै छी। नीक हएत जे दुनू गोरे वि‍चारि‍ कऽ आगूक डेग उठाबी।

              (सुकदेवक वि‍चारकेँ मनमोहन आ रघुनाथ समर्थन केलनि‍। मुदा कृष्‍णदेव मुँहक बात रोकि‍ लेलनि‍...)

मनचन-          (मुस्‍की दैत...) घनश्‍याम भाइक तेहेन पटपेटा पेट छन्‍हि‍ जे नसीवलाल भैयाकेँ पीचि‍ये देथि‍न।

घनश्‍याम-         (हँसैत...) नै मनचन, मोटेलहा पेट रहैत तखन ने फुललाहा छी। कोढ़ि‍लोसँ हल्‍लुक।

मनचन-          गणेशजी बला। जे एक-रत्तीक मुसरी मुनहर सन पेटकेँ उठा दौड़ैत रहैए।

घनश्‍याम-         हँ। हँ। सएह बुझहक।

कृष्‍णदेव-         (रूष्‍ट भऽ...) समैक उपयोग करू।

घनश्‍याम-         भाय, वि‍चार अछि‍ जे सभ कि‍यो दि‍लसँ अपन-अपन जि‍नगीक अनुभव व्‍यक्‍त करी। जइसँ एक नव समाज बनैक सुदृढ़ नीब पड़त।

कृष्‍णदेव-         बहुत बढ़ि‍याँ, बहुत बढ़ि‍याँ। जाधरि‍ गामक दशाक सम्‍यक चर्च नै हएत ताधरि‍ दि‍शा ि‍नर्धारि‍त करैमे कि‍छु कमी रहबे करत।

नसीवलाल-       बहुत बढ़ि‍याँ वि‍चार कृष्‍णदेवबाबूक छन्‍हि‍। जाधरि‍ पेटक नीकसँ अधला धरि‍क वि‍चार समाजक बीच नै राखब ताधरि‍ समाजक अंतरी मि‍लान कोना हएत?

मनचन-          भैया, अंतरी मि‍लान केकरा कहै छै?

घनश्‍याम-         (मुस्‍की दैत...) छाती मि‍लानकेँ।

मनचन-          छाती मि‍लान......। छाती मि‍लान तँ दुइये ठाम......। समैधि‍क संग आ दुनू परानी.......। दू परानी.......?

घनश्‍याम-         कोन मंत्र पढ़ए लगलह मनचन?

मनचन-          व्‍यासजी आ गनेसजीमे यएह ने शर्त्त रहनि‍ जे बि‍नु बुझने कलम नै बढ़ावी।

घनश्‍याम-         अहाँ तँ शास्‍त्रो बुझै छी मनचन।

मनचन-          पढ़ि‍ कऽ नै, भागवत सुनि‍ कऽ। तेसरा तक अपनो गामक ब्रह्मस्‍थानमे साले-साल भागवत होइ छलै कि‍ने।

नसीवलाल-       एखन धरि‍ बैसारक मूल वि‍षयपर नै एलौंहेँ। अढ़ाइ-तीन घंटा बीत गेल। ओना, भलहि‍ं हम सभ वि‍षयानतरे गप-सप्‍प कि‍अए ने केलौं मुदा बेबुनि‍याद बात तँ नै भेल।

घनश्‍याम-         आन काजसँ भि‍न्न बौद्धि‍क काज होइए। हाथ-पएरक काज जकाँ लगातार केने काज छुटैक संभावना बढ़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......?

मनचन-          घनश्‍याम भाइक वि‍चारकेँ समर्थन करै छी।

नसीवलाल-       बीचमे टि‍फीनक आवश्यकता तँ जरूर होइत अछि‍।

सुकदेव-         पशुपति‍ नाथक दर्शन आ कि‍छु बनि‍ज हएब, जहि‍ना दोबर लाभ दैत अछि‍ तहि‍ना बाल-भोग भेलासँ हएत।

मनचन-          बेस कहलि‍ये भैया। एखन धरि‍ जे हम सभ समाजमे टौहकी संग पहटोमे फँसल छी, तेकरो.......?

घनश्‍याम-         मनचनक दृष्‍टि‍कूट नै बुझलौं?

नसीवलाल-       दोसराक व्‍याख्‍यासँ नीक मनचनेक व्‍याख्‍या हएत।

मनचन-          से कि‍अए भैया?

नसीवलाल-       हौ मनचन, जमीन-जाल, शब्‍द-जाल आ वाक्-जालमे सभ ओझराएल छी। तोहर आत्‍मा कि‍ बाजि‍ रहल छह से तोंहीटा बुझै छहक। वाणी होइत जे नि‍कलतह वएह बात तोहर भेलह।

मनचन-          भैया, आत्‍मो बोली तँ दुबटि‍या (बुइधि‍क मोड़) पर हरा जाइत अछि‍। एक्के वि‍चारकेँ आमक गाछ जकाँ डारि‍ छि‍‍टकि‍ जाइ छै।

सुकदेव-         मनचन, गप्‍पक छि‍लनि‍ छोड़ह?

मनचन-          भैया, जाबे गप्‍पक छि‍लनि‍ नै करब ताबे शीशो जकाँ सुरेब केना हएत। खाएर, जहि‍ना औझका बैसार ऐति‍हाि‍सक भऽ रहल अछि‍ तहि‍ना जे पनपि‍आइ करब तइमे सभ मि‍लि‍ बना, परोसि‍ सभ मि‍लि‍ खाए।

घनश्‍याम-         मनचन, जे कहलक ओ आब नै छै। सभठाम चलै छै।

मनचन-          आँखि‍क सोझमे जाइति‍क आ दू सम्‍प्रदायक बीच खानो-पान आ प्रेमसँ वि‍याहो होइत देखै छी। मुदा सर्वसम्‍मति‍सँ कि‍अए ने घोषणा कऽ दइ छै। जखन कि‍ धरतीसँ अकास धरि‍ उड़ि‍आइत अछि‍।

पटाक्षेप।



तेरहम दृश्‍य

              (दोसर बैसार...)

घनश्‍याम-         मनचन, बरी बड़ सुन्‍दर बनल छेलह। नून देनि‍हारकेँ चाबसी दइ छि‍यनि‍।

मनचन-          हमरा रि‍झबै छी। दू सालसँ सभ नोनगर भोज वि‍न्‍यासमे हमहीं नोन दइ छी।

घनश्‍याम-         कि‍अए?

मनचन-          गाममे बारह आना लोक रोगि‍ये-टट्टी अछि‍। कि‍यो नून बाड़ने अछि‍ तँ कि‍यो अधे खाइए। भोज तँ सामुहि‍क छी। एकठाम बैस खाएब।

घनश्‍याम-         दोसरो चाबसी दइ छी मनचन।

मनचन-          से कि‍अए?

घनश्‍याम-         एखन धरि‍ हमहूँ नै गौर केने छलौं जे अहाँ केने छी।

मनचन-          भाय, अहाँक सोझमे बजैत संकोच होइए। मुदा अपना घरमे लोक नीकसँ नीक आ अधलाहसँ अधलाह बजैत अछि‍ तँए........?

घनश्‍याम-         चुप कि‍अए भेलौं? आइ धरि‍ जे आनन्‍द जि‍नगीमे नै भेटल छल ओ भेट रहल अछि‍।

मनचन-          केना?

घनश्‍याम-         अपनासँ अगि‍ला लग जी हुजुरी करए पड़ैए आ पैछलाकेँ जी-हुजुरी करबै छि‍ऐ। जि‍नगीक कोनो आड़ि‍ये-धुर नै अछि‍।

सुकदेव-         मनचन, मुँह बन्न करह। बैसारक महत्‍व होइत अछि‍। दोसरो गोटेकेँ अवसर दहुन?

आभा-           एक तँ उमेरे कते भेल हेन। मुदा जतबे अछि‍ तइमे आइ जते समाजक बीच आएल ओते.......।

नसीवलाल-       कोनो गलत कि‍ सही परम्‍परा ओतबे दि‍न चलैत अछि‍ जते दि‍न लोक चलबैत अछि‍। ऐ दि‍स वि‍वेकीकेँ जरूर नजरि‍ देबाक चाहि‍यनि‍।

आभा-           कि‍ नजरि‍?

नसीवलाल-       यएह जे पाछुसँ अबैत व्‍यवहार आजुक समैमे अनुकूल अछि‍ वा नै। वि‍वेकी मनुष्‍य होइक नाते सबहक दायि‍त्‍व बनै छन्‍हि‍ जे सनातनी व्‍यवहार अछि‍ ओ जीवि‍त रहए।

आभा-           सनातनी बेबहार की?

नसीवलाल-       परि‍वर्तनशील बेबहार।

शान्‍ती-          काका, गलत बेबहार समाजमे पैसल केना?

नसीवलाल-       ने एकबेर पैसल आ ने एकदि‍न पैसल। घुसकुनि‍या-आेंघरनि‍या दैत पैस अंकुरि‍त भऽ वि‍शाल वृक्षक रूपमे बदलि‍ गेल। जइसँ लोक, परलोकक संग वि‍श्वक नक्‍शे बदलि‍ गेल।

शान्‍ती-          डाॅक्‍टरकाका, अपने कि‍छु......?

रघुनाथ-         देखि‍यौ, जहि‍ना रामायणमे तुलसी कहने छथि‍- हरि‍ अनन्‍त हरि‍ कथा अनंता' तहि‍ना अछि‍। ओना, दुनि‍याँक सभ मनुष्‍यकेँ कि‍छु आवश्यकता आ गुन एक तरहक अछि‍, मुदा.....?

शान्‍ती-          मुदा की?

रघुनाथ-         यएह जे कि‍छु एहनो अछि‍ जे सभकेँ फुटो-फुट-अलगो-अलग- होइत। ओना हमहूँ एक भगुए भऽ गेल छी। समाज अध्‍ययन तँ वि‍शाल अध्‍ययन छी, तँए......। कृष्‍णदेवबाबू आ मनमोहनबाबू बुझा सकै छथि‍।

मनमोहन-         भाय, जहि‍ना अहाँ रोग आ रोगीक बीच रहलौं तहि‍ना छी। मुदा मनक बात छि‍पाइयो कऽ राखब उचि‍न नै बुझै छी।

सुकदेव-         हृदेक बात इंजि‍नि‍यर सहाएब बजलाह।

मनमोहन-         जेना-जेना समए बीत रहल अछि‍ तेना-तना लोकोक जि‍नगी बदलि‍ रहल अछि‍। पहि‍लुका लोक सोलहो आना शरीरसँ श्रम कऽ शरीरक रक्षा करैत छलाह।

सोमन-          जेना आइ देखै छि‍ऐ तेना नै छलै?

मनमोहन-         नै।

सोमन-          (कि‍छु शंका करैत...) इंजीनि‍यर सहाएब, कते दि‍न भेल से तँ नीक जकाँ मन नै अछि‍। मुदा एहि‍ना एक बेर रौदी भेल से मन अछि‍। जहाँ-तहाँ लोक कमाइ-खटाइले लोक भागल। हमहूँ भोलबाकक्का सेने कलकत्ता गेलौं।

आभा-           कलकत्ता गेल छी?

सोमन-          गेले नै छी दू साल ठेलो चलौने छी। जइसँ सभ गली-कुच्‍ची देखल अछि‍।

आभा-           केना ठेला चलबै छेलि‍ऐ?

सोमन-          छातीमे ठेलाक अगि‍ला भाग अड़ा दुनू हाथसँ दुनू भागक डंटा पकड़ि‍ ठेलै छलौं।

आभा-           इंजीनि‍ गाड़ी सभ नै छलै?

सोमन-          छलै। जीपे-कारक कोन बात जे बड़का-बड़का कोठा, करखन्ना, दोकान सभ छलै। जेहेन ओइठीनक दोग-सान्‍हि‍क सड़क अछि‍ तेहन तँ अपना सभ दि‍स अछि‍यो नै।

घनश्‍याम-         बात दोसर दि‍स बढ़ल जाइए।

मनमोहन-         बड़बढ़ि‍या घनश्‍याम भाय कहलनि‍। एक तँ दैवी प्रकोप-बाढ़ि‍, रौदी-सँ अपन इलाका पछुआएल दोसर मनुक्‍खोक दोख कम नै छै। जे इलाका जते पहि‍ने जागल ओ ओते अगुआएल।

आभा-           कनी सोझरा दि‍यौ कक्का?

मनमोहन-         (मुस्‍की दैत...) पहि‍ने जंगली अवस्‍थामे अपना सबहक पूर्वज रहै छलाह। हाथे-पएरसँ सभ कि‍छु करै छलाह। जेना-जेना बुद्धि‍-अकील बढ़ैत गेल तेना-तेना आगू मुँहेँ ससरैत गेलाह। हथकरघासँ पाँच सीढ़ी आगू बढ़ि‍ कम्‍प्‍यूटर युगमे पहुँच गेल छी।

आभा-           ऐसँ आगूओ बढ़त?

मनमोहन-         निश्चि‍त बढ़त। नि‍चेनमे कहि‍यो आरो कहब। एखन जइ काजे एकत्रि‍त भेल छी तेकरा आगू बढ़ाउ।

सोमन-          भाय, हम सभ ने कहि‍यो काल मासुल दऽ कऽ बस, जीपपर चढ़ै छी। अहाँकेँ तँ अपने अछि‍।

मनमोहन-         से तँ अछि‍ये।

घनश्‍याम-         ओना बाढ़ि‍ रौदी दुनू जनमारा छी। मुदा आइ रौदीक वि‍चार करू।

शान्‍ती-          मैनेजर काका, अहाँ सभ तरहे उपर छी। ओना समाजक कि‍छु भार उपरमे अछि‍। तँए चाहब जे झगड़ा-झंझटसँ नै वि‍चारक रास्‍तासँ समाज आगू बढ़ए।

घनश्‍याम-         वि‍चार तँ अपनो सएह अछि‍। मुदा नहि‍यो चाहलापर कते-गोटेकेँ बैंकक लोनमे जहल पठबए पड़ैए आ चौकठि‍-केवाड़ उखाड़ए पड़ैए।

शान्‍ती-          से कि‍अए?

घनश्‍याम-         (ि‍वस्‍मि‍त होइत...) कि‍ कहब बोरि‍ंग-दमकल, गाए पोसैक लोन उठा सराध-वि‍याहक भोज कऽ पूँजी नष्‍ट कऽ लैत अछि‍। समैपर आपस नै करैत।

शान्‍ती-          तखन?

घनश्‍याम-         औझुका बैसार तँए ऐति‍हासि‍क अछि‍ जे समाज अपन कल्‍याणक दि‍शा नि‍श्चि‍त करथि‍।

नसीवलाल-       जुग-जुगान्‍तरसँ जे मनोवृत्ति‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओकरा एकाएक नै बदलल जा सकैए। मुदा बि‍ना बदलने काजो नै चलत। तँए जरूरी अछि‍ जे उत्‍पादन आ उपभोगकेँ नीक जकाँ सभ बुझी।

घनश्‍याम-         जुगक अनुकूल वि‍चार अछि‍।

सुकदेव-         घनश्‍यामबाबू, गामक बारहआना जमीन हुनका सबहक छि‍यनि‍ जे गाम छोड़ि‍ अनतए जा नोकरी करै छथि‍। जखन कि‍ खेती केनि‍हारकेँ अपन खेत नै छि‍यनि‍।

घनश्‍याम-         (मूड़ी डोलबैत...) हँ से तँ अछि‍ये।

सुकदेव-         तइ बीच कोना सामंजस्‍य हएत?

घनश्‍याम-         ओना अपना सभ बुझै छी जे अंग्रेजकेँ भगा हम सभ स्‍वतंत्र भेलौं मुदा से नै छी। जखन शासन आ सम्‍पत्ति‍ (देशक) सबहक सझि‍या भए जि‍नगीक समुचि‍त वि‍कास दि‍स बढ़त तखन हएत।

रघुनाथ-         (हृदए खोलि‍...) मन हल्‍लुक करै दुआरे अपन बात कहै छी। जहि‍ना जुआनीक उमकीमे गाम छोड़ि‍ शहर गेलौं तहि‍ना आइ बुझि‍ पड़ैए जे......?

मनमाेहन-         रूकलौं कि‍अए?

रघुनाथ-         संकोच होइए। जइठाम छी तइठाम नि‍हत्‍था भऽ गेलौं। जि‍नगीक सभ कि‍छु छीना रहल अछि‍। मुदा गाममे सभ कि‍छु देख रहल छी।

मनमोहन-         संकोच कि‍अए होइए।

रघुनाथ-         पूँजी नष्‍ट होइत देख रहल छी। जइले जि‍नगी गमेलौं सएह.......?

मनमोहन-         डाॅक्‍टर सहाएबसँ कनि‍यो नीक नै छी। ओना डाॅक्‍टर सहाएबकेँ सभकि‍छु भेट जेतनि‍ मुदा......?

रघुनाथ-         (मुस्‍की दैत...) मुदा की?

मनमाेहन-         एग्रीकल्‍चर शि‍क्षा पाबि‍ बेटा गाममे रहत आ अपने शहरमे। बुढ़ाढ़ीमे एकलोटा पोनि‍यो के देत।

सोमन-          अहाँक गाम छी। खेत-पथार छी। अहाँक सुआगत अछि‍ जे गाम आबि‍ अपन जि‍नगीक अनुभव अनाड़ी-धुनाड़ीकेँ दि‍ऐक।

कृष्‍णदेव-         एखन हम तनावमे चलि‍ रहल छी। मुदा तैयो कहै छी अहाँ सबहक वि‍चारानुसार जीवैक कोशि‍श करब।

शान्‍ती-          घनश्‍यामकाका, आगूक भार अहाँ उपर?

घनश्‍याम-         गामक भाग जगि‍ गेल। पूँजीक जते जरूरत हएत ओ बैंकसँ दि‍आ देब। भने एग्रीकल्‍चर ग्रेजुएट गाममे रहताह, हुनका माध्‍यमसँ गामक योजना बना उन्नति‍ खेती आ खेतीसँ जुड़ल कल-कारखानाक लेल प्रयासरत रहब।

शान्‍ती-          (हँसैत...) जि‍नगीक सार्थकता पाबि‍ रहल छी।

घनश्‍याम-         कि‍छु करैक संकल्‍प सभ लि‍अ। जखने सामुहि‍क डेग उठत तखने रस्‍ता धड़ैमे देरी नै लागत।

नसीवलाल-       सबहक दुख-सुख- सहबहक छी।
सबहक इज्‍जत- सबहक छी।

पटाक्षेप

समाप्‍त।
  
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बिपिन झा, IIT Bombay

स्तरविहीन स्तर
(अप्पन युनिभरसीटीकेर हाल)
{लेखक बिपिन कुमार झा, IIT मुम्बई मे Ph. D शोधरत छथि। टिप्पणी bipinjhajnu@iitb.ac.in पर सादर आमन्त्रित।}
लालबुझक्कर मन्त्री जयराम रमेशक भारतीय वि्वविद्यालय के स्तर केर सम्बन्ध मे कयल गेल टिप्पणी बुद्धिजीवी वर्गक बीच में पुनः चर्चा केर विषय बनि गेल ।आरोप प्रत्यारोप आ पूर्वाग्रह सँऽ ऊपर उठि यदि चिन्तन कयल जाय तऽ निश्चित रूप सँऽ अपन सभक वास्तविकता अछि। देश भरि में 200 सँऽ अधिक विश्वविद्यालय अछि। मुदा गिनती केर किछु विश्वविद्यालय छोडि अधिकांश डिग्री केर प्रिंटिंग प्रेस मात्र अछि। कहल जाइत छैक जे अंग्र्ज सभ विश्वविद्यालयीय शिक्षा केर माध्यम सँऽ भारत में शासन चलेबाक हेतु कलर्क तैयार करैत छलाह मुदा आजु क विश्वविद्यालय के उच्च शिक्षा प्राप्त औसत युवा एहियो योग्य नहि छथि।
      आजुक विश्वविद्यालय केर प्रक्रिया थीक येन केन प्रकारेण प्रवेश लिया, फीस भरू, साल भरि अपन सांसारिक क्रिया कलाप में व्यस्त रहू, जखनि परीक्षा केर प्रवेश पत्र आ सिड्यूल आबि जाय तखनि गेस पेपर श्योर सिरीज एवं अन्यान्य साधन सँऽ परीक्षा रूपी वैतरणी पार करू। कोनो कक्षा, कोनो लेक्चर, कोनो सेमिनार केर आवश्यकता नहिं। कतहु कतहु तऽ लक्ष्मीजी सेहो सरस्वतीजीकेर प्रमाणपत्र दैत छथीन्ह।
विशेष उदाहरण अप्पन स्वनामधन्य मिथिला विश्वविद्यालय कऽ लिआ। षड्वर्षीय योजना, पंचवर्षीय योजना वला ऐतिहासिक गौरव रखनिहार ई विश्वविद्यालय ओहि स्थान पर अछि जे स्थान भारतवर्ष में बौद्धिक रूप सँऽ सर्वाधिक ऊर्वर अछि। जकर परीक्षा कैलेण्डर कें भगवाने मालिक छथि किया कि हाल में हमर एकटा अनुज सेकेण्ड ईयर पास कयलाके मात्र दू महिना बाद थर्ड ईयर कें परीक्षा देलथि! आ पूर्व में हमर परिचित साढे पाँच वर्ष में स्नातक बिना फेल केने उत्तीर्ण कयलथि। जाहि तरहें एकटा भातक दाना पूरा वर्तन केर भातक परिचय दैत अछि ओहि तरहें ई उदाहरण पूरा देश कें सर्वव्यापी उदाहरण अछि।
      आब बात करी शोधक स्थिति। ई अपने आप में एकटा शोधकेर विषय अछि कियाक तऽ अधिकांश विश्वविद्या लय के रिसर्च वर्क आ रिसर्च थिसिस के की हालात अछि एहि से अपने सभ परिचित होयब। मात्र दस हजार रुपया में थिसिस लिखबा के जमा करू आ डाक्टरकेर उपाधि धारण करू। दुर्भाग्यवश हमहूं भारत केर सर्वश्रेष्ठ तीन टा संस्थानक (Allahabad University, Jawaharlal Nehru University, IIT Mumbai) छात्र रहलहुं हुनकर वास्तविकता कहि हम मर्यादा केर उल्लंघन नहिं करब। एहि लेल हम क्षमाप्रार्थी छी।
दस हजार रुपया खर्च कय Ph. D  उपाधि हासिल करू आ बोरा भरि पैसा अथवा झोडा भरि पैरबी केर माध्यम सँऽ कतहु असिस्टेण्ट प्रोफेश्वरकें पद प्राप्त करू और अपनहिं सदृश रक्तबीजकेर निर्माण करू। वेतन पचास हजार सँऽ सवा लाख रुपया मासिक और कार्यभार स्वेच्छानुसार
चर्चा में प्रोफेशनल कालेज केर चर्चा छुटि गेल। जे व्यक्ति इण्टरमीडियेट केर कैल्कुलस क  सवाल हल नहि कय सकैत छथि ओ इंजीनियरिंग कालेज (सामान्यतया प्राइवेट) के डाइरेक्टर आ फैकेल्टी आदि बनि गेल छथि। मध्यम आ निम्न वर्ग के माता पिता अपन बच्चा सभ के ऊपर जिन्दगी भरि के पूंजी खर्च करि एहि कालेज सभ सं बी. टेक आ एम.बी. ए करबैत छथि। हुनक हाल ई पंक्ति पर चरितार्थ होइत छन्हि बडे बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले
यद्यपि ई निराशाजनक तस्वीर एकटा वास्तविकता अवश्य छी मुदा एहि अन्हार में किछु चमकैत नक्षत्र सेहो अछि। आवश्यकता एहि गप्प के अछि जे शिक्षा प्रणाली में सस्थागत रूप सँऽ व्यापक परिवर्तन हेबाक चाही। शिक्षा हेतु अधिक धन आबण्टन, उच्चशिक्षाऽधिकारी के पद पर ईमानदार व्यक्ति कें नियुक्ति योग्य व्यक्ति के फैकल्टी के नियुक्ति, आ संगहि यदि पूर्ण पारदर्शी व्यवस्था अगर होइत छैक तऽ निश्चित रूप सँ तस्वीर किछु भिन्न होयत।
आशा अछि जे समाज बुद्धिजीवीवर्ग एवं नीतिनियन्ता उच्चशिक्षा केर सर्वोच्च प्राथमिकता देताह। तखनि  एकटा ज्ञान आधारित समाज केर निर्माण अवश्य हेतैक।

 
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आशीष अनचिन्हार
बेचन ठाकुरजीक नाटक बेटीक अपमान
हम व्यत्तिगत रुपेँ हरियाणाक प्रायः-प्रायः प्रत्येक कोणमे रहल-बसल छी आ तँए स्थानीय जनताक रुपमे हरियाणामे कत्तौ घुसि जाइत छी। एकर हानि हमरा जे भेल हुअए मुदा लाभ एतेक तँ जरुर भेल जे हम स्थानीय परेशानी बुझए लागल छिऐक। ओना हरियाणाक नाम सुनिते मोनमे समृद्धिक नजारा देखाए लगैत छैक। भरल-पुरल खेत सुझाए लगैत छैक। मुदा एहिठामक स्थानीय समस्या बहरिआ लोककेँ नै बुझल छैक। ऐठाम हरेक साल १००-१५० लड़काक बिआह दोसर राज्यक लड़कीसँ होइत छैक। जँ सोझ ढ़ंगे कही तँ हरियाणाक सेक्स रेशिओ (लिंगानुपात) असमान अछि। अर्थात १००० लड़कापर ८५०-९०० लड़की।
आब अहाँ सभ हमरा हूट करबाक सोचि रहल हएब। प्रस्तुत पोथी मैथिलीक अछि आ हम हरियाणाक गप्प कऽ रहल छी से अहाँ सभकेँ उन्टा लागि रहल हएत। मुदा ऐठाम हम ई कहए चाहब जे मात्र स्थान आ मनुख बदलि जाइत छैक, मनोवृति आ समस्या वएह रहैत छैक। आब हम अही समस्याकेँ मिथिलाक परिप्रेक्ष्यमे सोची। बेसी अंतर नै भेटत आ से ऐ द्वारे जे नेपालमे सेहो मिथिला छैक। आ भारतक मिथिला आ नेपालक मिथिला दुनूमे बिआह प्रचलित छैक। तथापि जँ भारतक हिसाबे सोची तँ बिहारमे १००० लड़कापर ९२१ लड़की छैक ( ओना जँ २०११ क जनगणनाक प्रोविजनल रिपोर्ट देखब तँ संपूर्ण भारतमे १००० लड़कापर ९४० लड़की छैक)
आ जँ ऐ समस्याक परिप्रेक्ष्यमे विकसित हरियाणा आ अविकसित मिथिलाकेँ देखी तँ कोनो बेसी अंतर नै बुझाएत। अर्थात ऐ समस्यासँ दुनू क्षेत्र ग्रसित अछि। मुदा ई आब बिचारए पड़त जे ई समस्या कहाँसँ निकलैत छैक? कोन मनोवृतिसँ ई समस्या परचालित होइत छैक ? आखिर ई कोन दृष्टिकोण छैक जइ तहत लोक बेटी नै चाहैत अछि आ ऐ लेल भ्रूण हत्या सन पाप करबासँ सेहो नै हिचकैत अछि ? मिथिलाक हिसाबे गप्प करी तँ दहेज प्रथाकेँ एकर जिम्मेदार ठहराओल जा सकैए मुदा हरियाणाक हिसाबें ई कारण ओतेक प्रभावी नै कारण हरियाणामे दहेज प्रथा नै कऽ बराबर छैक। तँए हम दहेजकेँ भ्रूण हत्याक एकटा कारण मानैत छी मुदा प्रमुख कारण नै। हमरा हिसाबे ऐ समस्याक प्रमुख कारण एखनो आधुनिक कालमे बेटाकेँ अनिवार्य मानब अछि। एकर समाजिक आ आर्थिक, दुनू पक्षमे बाँटए पड़त।
समस्या आ साहित्य दुनू एकै चीजक अलग-अलग नाम थिक। बिना समस्या कोनो साहित्य नै भऽ सकैत छैक। आ अंततः साहित्ये कोनो समस्याक समाधान तकैत छैक। मुदा मैथिली साहित्य एकर अपवाद अछि। ऊपर हम देखिए चुकल छी जे कोना मिथिला भ्रूण हत्याक समस्यासँ ग्रसित अछि। तथापि ऐठामक साहित्यकार ऐपर कलम नै चलौलन्हि। घोर आशचर्यक बिषए। आशचर्यक बिषए ईहो जे एहने-एहने समस्यासँ कतिआएल साहित्यकारकेँ आलोचक आ मठाधीश सभ बढ़ाबा देलथि।
कोनो समाज कोनो समस्यासँ कतिआ कऽ बेसी दिन नै रहि सकैत अछि। एकर अनुभव हमरा श्री बेचन ठाकुर लिखित नाटक " बेटीक अपमान" पढ़लापर बुझाएल। आ संगहि-संग ईहो बुझाएल जे आब बेसी दिन मिथिला सूतल नै रहत आ ने बेटीकेँ खराप बुझल जाएत ।
 श्री बेचन ठाकुर
 
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१.हम पुछैत छी: मुन्नाजीक सोमदेवसँ भेल गपशप २. हम पुछैत छी: मुन्नाजीक अशोकसँ भेल गपशप

हिन्दी-मैथिलीक विज्ञ कवि आचार्य श्री सोमदेवजीसँ हुनक दीर्घकालीन सृजन निरन्तरताक मादे विहनि कथाकार मुन्नाजीसँ सोझाँ-सोझी भेल विस्तृत गप्पक सारांश:

मुन्नाजी: सर्वप्रथम अपनेकेँ प्रबोध सम्मान प्राप्ति हेतु बधाइ। सामान्यतः मैथिली रचनाकार किछु कालावधिमे रचनारत रहि पुरस्कारक व्योंत वा प्राप्तिक प्रतीक्षारत रहि सुस्ताए लगैत छथि। मुदा अपने ऐ सभसँ ऊपर उठि प्रारम्भसँ एखन धरि एक्के सक्रियताक संग जुड़ल छी। ऐ निरन्तरताक पाछाँ की सोच वा कोन रहस्य! वा ई विशेष ऊर्जावान हेबाक परिणाम अछि?
सोमदेव:पुरस्कार आत्मबल दैत छैक। मुदा हमर माथमे सदिखन नव विचार घुरघुराइत रहैए, जकरा हम अपन लेखनीमे उतारलाक पछातिये संतुष्टि पबै छी। सम्प्रति लिख नै पबै छी, शारीरिक अक्षमताक कारणसँ। मुदा लिखबाक उद्देश्य अपन विचारकेँ दोसर धरि पहुँचेबाक रहैए।

मुन्नाजी: अपने अपन प्रारम्भिक रचनाकालक क्रियाकलाप वा मैथिली साहित्य सृजनमे प्रवेशक जनतब दी।
सोमदेव:हम लिखब हिन्दीमे प्रारम्भ केने रही। समयान्तरे हिन्दीमे हेरा जेबाक डर आ माइक भाषाक प्रति प्रेम हमरा मैथिली दिस अनलक आ ऐ भाषामे रचनारत रहि टिकल रहि गेलौं। संगहि अपन स्पष्ट विचारकेँ संप्रेषणीयताक स्तरपर मैथिलीमे बेसी फरीछ कऽ पबैत छी, हिन्दीमे नै।

मुन्नाजी:अहाँ हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषामे समान रूपेँ सृजनरत रही, एकर की कारण? उपरोक्त दुनूक अस्तित्वक फराकसँ कोना चिवेचन करब?
सोमदेव:रचनाक आरम्भमे दुनू भाषामे रचना केलौं मुदा बादमे मैथिली मात्रमे लिखलौं। दुनू उपरओँजक भाषामे गिरल जा रहल अछि। मैथिलीकेँ हिन्दीक आच्छादन आ हिन्दी अंग्रेजीक घोघ काढ़ल कनियाँ जकाँ भऽ घोंटल जा रहल अछि। बेगरता छै अपन अस्तित्वक रक्षार्थ अपन भाषा मात्रक रचना होइत रहए। दोसरा भाषाक देखाऊँसे वा वैशाखीक बलेँ ठाढ़ हेबाक चेष्टा नै हुअए।

मुन्नाजी:अहाँ अपन प्रारम्भिक रचना कालसँ आजुक अवधि धरि ऐ भाषाक रचनाकारमे रचनामे वा भाषा मध्य केहेन परिवर्तन वा टकरावक अनुभव केलौं आ से की सभ छल?
सोमदेव:प्रारम्भमे छन्दक प्राथमिकता छलै। बादमे छन्दमुक्त काव्य सभ एलै। हमहूँ एहेन रचना केलौं। मुदा पहिलुका जे स्तर छलै से अर्थपूर्ण छलै, आब अर्थहीन रचना बेसी आबि कऽ भरि गेलैए, जइसँ स्तर नीचाँ जा रहल छै। तकर मूल कारण रचनाकार द्वारा अध्ययन आ अध्यापनक अभाव छैक।

मुन्नाजी:मैथिली भाषाक एतेक प्राचीन आ स्वतंत्र अस्तित्व रहितो ओ आइयो अपन अस्तित्ववास्ते घैहैर काटि रहल अछि। एकर की मूल कारण वा अवरोध अछि?
सोमदेव:सत्य अछि जे दक्षिण एशिया, विशेष कऽ भारतमे संस्कृतक समकक्ष जँ कोनो भाषा छै तँ से अछि मैथिली भाषा आ तिरहुता लिपि (बादमे कैथी लिपि सेहो)। मुदा शास्सकक वैविध्यताक संग एकरो भौगोलिक रूपेँ टुकड़ी कऽ देल गेलै। आइ गुजराती, बांग्ला, असमी, ओड़िया,कुमाऊँ-गढ़वाली आदि एकरे टुकड़ी अछि, बेगरता छै एकाकार देबाक से भऽ जाए तँ एकरापन अस्तित्व छै से मरतै नै।

मुन्नाजी: अहाँ सबहक प्रारम्भिक रचनाकालमे गद्य आ पद्य दुनू विधाक जे स्वरूप से आजुक सन्दर्भमे बहुत बदलल अछि। समयान्तरे ऐ दुनू विधाक किछु आओर प्रतिरूप सोझाँ आएल यथा गजल आ विहनि कथा। ऐ सबहक भविष्य केहेन देखाइए?
सोमदेव:देखियौ मुन्नाजी, व्यक्ति, स्थान, भाषा वा रचना सबहक बदलाव समयानुसार स्वाभाविक छै। गजलकेँ कोनो भाषाक मूलमे निहित कएल जा सकैए, बशर्ते कि रचनाकार ओकर जड़िमे डूमल होथि। वर्तमान रचनामे एकर अभावे फूहड़पन वा गीजल चीज बेसी देखा पड़ैए। लघुकथामे अहाँ किछु गोटे नीक काज कऽ रहलौं अछि, से ठाम-ठीम देखै छी। भविष्यमे बदलैत समयानुसार पाठकक श्रेष्ठ खोराक बनत से विश्वास अछि।

मुन्नाजी: छठम-सातम दशकमे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक बिरड़ो उठलरहै। ओकर की प्रभाव भेलै आ आइ ओ कतऽ छै?
सोमदेव:यौ बौआ, कहियो एहेन बिरड़ो नै उठलै। तहिया कांग्रेसक शासन रहै आ ओ सभ मैथिलीकेँ दबौने रहलै। ऐ मे कोनो स्वतंत्र विचार वा वादतँ सपना मात्र रहै। हँ किछु गोटे अपनाकेँ हाइलाइट करबा लेल एहने विचारे उधियेबाक प्रयास केलनि। हमहूँ समाजवादी विचारक समर्थक रही, मुदा की गरीब वा गरीबीपर लिख देने समाजवादी कहाए लागब, किन्नहुँ नै। रूसक मार्क्सवादी विचार मिथिलाक कठकोकांइड़ बाभनवादमे कतौ सन्हिया सकै छै। नै, कहियो नै। मार्क्सवाद वा कोनो वादमे हमर समकक्ष वा श्रेष्ठ रचनाकार सेहो वादसँ जुड़बाक नामपर विचारहीन देखाइत रहलाह।

मुन्नाजी: मैथिली-हिन्दी मध्य साहित्यिक वर्णसंकरता पसरलै। मुदा मैथिलीकेँ पूर्णतःजातिवादिता गरोसने रहलै आ ई जाति विशेषक मुट्ठीक बौस्तु भऽ गेल। की ऐ सँ कहियो अहूँ सभ आच्छादित वा प्रभावित भेलौं? ऐ सँ रचनाकार वा साहित्यकेँ कोनो नोकसान भेल?
सोमदेव:ई किछु (मात्र किछुए) लोकक, जे रचनाकार नहियो छथि, तिनकर कुटिचालि अछि जे अदौसँ आबि रहल अछि। हँ ई सत्य जे कमाइक आस देखेलापर बाभन लोकनि अपन मूल भाषा संस्कृत छोड़ि गएर बाभनक मूलभाषा मैथिलीकेँ गरोसि लेलनि। तइमे गएर बाभन लोकनि ओतबे जिम्मेवार छथि, जे अपनाकेँ पूर्णतः कतियौने रहलाह।

मुन्नाजी: अहाँ निस्वार्थ सृजना वा साधनारत रहलौं। आ समय-समयपर ऐ सेवाक हेतु पुरस्कृत होइत रहलौं, एकर केहेन अनुभूति भेल?
सोमदेव:यौ , पहिनहियेँ कहलौंहेँ जे ऐ सँ आत्मबल भेटैछ। हमर अपन विचार लेब तँ जहिया जे पुरस्कार भेटल ओ राशि धीया-पुताकेँ दैत रहलौं। अकादेमी पुरस्कारक राशि बेटाकेँ पढ़बामे आ प्रबोध सम्मानक पाइ नातिनकेँ दऽ अपनाकेँ कृतार्थ बुझै छी। हँ एकटा बात जे सभ संतान, बेटा-जमाए, पोता-पोती, नाति-नातिन नीक पदपर छथि। हमर जीवनक सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारक सर्वस्व अनुभूतिक रूपमे ईएह अछि।

मुन्नाजी: नवका दशकमे गएर बाभनक झुण्डक सक्रिय साहित्यिक प्रवेशकेँ मैथिली साहित्यक नजरिये कोना देखै छी। एकर भविष्यक संकेत की अछि?
सोमदेव: आब किछु लोक जे सक्रिय छथि से संघर्षमे पाछाँ नै होथि तँ सफल अपनो हेता आ भाषाक भविष्य सेहो उज्जवल हएत, जै हेतु धैर्य आ सक्रियता चाही (दू-तीन दशकधरि), नै तँ ई भाषा पूर्णतः मरि जाएत।

मुन्नाजी: मैथिली आब कागज मोइससँ बहरा अन्तर्जालपर आबि वैश्विक स्तरपर पसरि गेल अछि, एकरा मैथिलीक वर्तमान वा भविष्यसँ कोन रूपे जोड़ि कऽ देखऽ चाहब?
सोमदेव:ई प्रसन्नताक बात अछि जे आब ककरो कोनो विचार (प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष) सेकेण्डेमे सभक सोझाँ अबैए आ अहाँ पाछाँ अपन वक्तव्यसँ मुँह नै मोड़ि सकै छी। दोसर जे अहाँक विचारकेँ वैश्विक मंच भेटल अछि, अगिला समएमे ओ जगजियार हएत। मुदा कागज मोइसक जमाना लदल नै अछि, ऐ मे सक्रिय रहबे करू।

मुन्नाजी: मैथिली साहित्यमे ललनाक प्रवेश निषिद्धता वा महिला रचनाकारक अभावक की मूल कारण अछि? एकर निदानार्थ की कहब? भविष्यमे एकर की प्रभाव भऽ सकैए?
सोमदेव:अहाँक ई सुन्दर सोचक प्रश्न अछि, तै लेल धन्यवाद। पहिने नारी घोघ तरक बहुरिया आ चहरदिवारीमे नुकाएल बान्हल मुट्ठीक चीज मात्र छल, तेँ ओकर विचार दबल रहि जाइत छल। आइ मैथिल ललना सभ मानसिक, शारीरिक आ तकनीकी सभ स्तरपर उच्च भऽ रहल अछि। विचार सेहो सद्भावपूर्ण,ठोस, राग-द्वेष रहित छै। ई पीढ़ी जुड़ि गेल तँ ई आर फरिछाएत, जे स्वच्छ चिन्तन आ चित्रण सोझाँ आओत।

मुन्नाजी: अन्तमे अपने नवका धीया-पुता (रचनाकार) केँ उज्जवल साहित्यिक भविष्यक वास्ते की सनेस देबऽ चाहब?
सोमदेव: नवका धीया-पुताक मगज थोरेक आर आगू छै। एकर रचनात्मक विचार ठोस आ दिशा सूचक अछि। ई सभ जुड़थि तँ मैथिलीक कल्याण हएत। हँ, अपन संस्कार नै बिसरथि बस ! एतबे।
अहाँ आ गजेन्द्रजी दुनू गोटेकेँ अन्तर्जालक जालमे हमरो लपेट अपन विचार रखबाक अवसर देबालेल हृदैसँ धन्यवाद।
मुन्नाजी: हार्दिक आभार! बहुमूल्य समय आ विचार देबाक वास्ते।




त्रिकोणक एक कोणसँ अशोकसँ साक्षात्कार
मुन्नाजी: अपने मैथिली रचना प्रारम्भक प्रेरणा कतऽ सँ पौलहुँ। एकर प्रारम्भ कहिया आ कोना भेल?
अशोक: हम मैथिलीमे रचनाक प्रेरणा काशीमे ग्रहण केलहुँ। साते वर्षक अवस्था सँ पिता संग काशीमे रहऽ लगलहुँ, पढ़बाक लेल। मायाअ भाइ-भाउज लोकनि गाममे रहैत रहथि। काशीमे राम मन्दिरपर रही। ओतऽ हमर पिता स्व. उमापति झा मन्दिरक व्यवस्थापक रहथि। राममन्दिरपर मैथिल छात्र संघ द्वारा अनेक साहित्यिक ओ सांस्कृतिक कार्यक्रम होइ। नेनेसँ सभ देखऽ सुनऽ लगलहुँ। कानमे मिथिला, मैथिल ओ मैथिली शब्द सभ जाय लागल। एही क्रममे हमहूँ कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। वर्ष १९६८ मे “वटुक” पत्रिका मे डॉ. सुधाकान्त मिश्र (जे “वटुक” पत्रिकाक सम्पादक रहथि) हमर पहिल कविता “शशि चन्दाके समान” छपने रहथि। ई कविता हम चन्दा झा जयन्तीक अवसरपर लिखने ओ पढ़ने रही। ओहि जयन्तीक अध्यक्षता मैथिलीक प्रसिद्ध कवि चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” केने रहथि। तकर बाद कविता सभ लिखऽ लगलहुँ। जखन दर्जन भरि कविता लिखल भऽ गेल तँ अपन जेठ भाइ स्व. सुशील झा (प्रधानाचार्य, एल.एन. जनता कॉलेज, झंझारपुर) केँ देखौलियनि। ओ हमरा ओहि कविता सभकेँ डॉ. धीरेन्द्र (हमरे गामक प्रसिद्ध साहित्यकार) केँ देखेबाक लेल निर्देश देलनि। डॉ. धीरेन्द्र कविता सभ देखलनि आ ओहिमे सँ किछुकेँ मिथिला मिहिरमे पठेबाक लेल कहलनि। ओहि कवितामे सँ दूटा कविता मिहिर मे छपल। जाहिमे पहिल “ई न्यू लाइटक फैसन थिक” वर्ष १९६९ मे मिहिरमे छपल रहय।

मुन्नाजी: त्रिकोणक शेष दू कोण माने शिवशंकरजी/ शैलेन्द्रजी संग कोना जुड़लौं? पहिल संग्रह त्रिकोणक प्रकाशनक नियार कोना भेल?
अशोक:काशीसँ गरमीक छुट्टीमे गाम आबी। अही क्रममे वर्ष १९६७-७० मे गाममे दुनू गोटेसँ भेँट भेल। दुनू गाममे रहैत छला आ दुनूमे नेनेसँ मित्रता रहनि। तीनूकेँ जखन भेँट भेल तँ बुझलहुँ जे तीनू एक्के रस्ताक पथिक छी। तीनू कविता आ गीत लिखैत छी। कविता लिखब हमरा तीनूकेँ एक-दोसरासँ जोड़ि देलक। तकर बादसँ तँ तेहेन मिलान भेल जे लगबे नहि करय जे कहियो अपरिचित छलहुँ।
कविताक संग तीनू गोटे हम, शिवशंकर आ शैल (शैलेन्द्र आनन्द) कथा सेहो लिखऽ लगलहुँ। कथा सभ पत्रिका सभमे छपऽ लागल। शैल गामेसँ “आहुति” पत्रिका सेहो निकालऽ लगलाह। तखन नियार भेल जे तीनूक एक कथा-संग्रह निकलय। हम तावत् नोकरीमे पटना आबि गेल रही। पटनेसँ तीनू कथाकारक पाँच-पांच टा कथाक संग्रह निकलल “त्रिकोण” नामसँ।

मुन्नाजी: त्रिकोणसँ कतेक पूर्व अहाँ सभ लेखन प्रारम्भ केलहुँ। फेर एक पटलपर कोना एलौं आ तकर की फाएदा आ नोकसान भेल?
अशोक: मोटामोटी कही तँ हमरा तीनू गोटे एक्के संग लेखन प्रारम्भ केलहुँ। हम काशीमे रही। ओतहि कविता लिखऽ लगलहुँ १९६७-६८ ई. सँ। शिवशंकर श्रीनिवास आ शैलेन्द्र आनन्द गाम लोहनामे रहथि। ओही ठाम रहि ओही समयसँ लिखऽ लगला। लिखब शुरू करबाक बाद करीब दू-तीन बरखक भीतरे तीनूकेँ गाममे भेँट भऽ गेल। तकर बाद तँ संग-संग तँ संग-संग साहित्यमे जीबऽ लगलहुँ। हम १९७१ ई. मे गाम चल अयलहुँ। सरिसब कॉलेजमे आइ.एस.सी. करबाक लेल। १९७२ ई. मे आइ.एस.सी. केलहुँ। ओहो दुनू सरिसबे कॉलेजमे पढ़थि। तीनू लगभग संगहि कॉलेज जाइ आ आबी। मित्रता प्रगाढ़ होइत गेल। बी.एस.सी. करबाक लेल हम सीतामढ़ी गेलहुँ १९७२ ई. मे। मुदा फेर १९७५ मे गाम चल अयलहुँ। दू वर्ष गामे रहलहुँ। बी.पी.एस.सी. क प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीक क्रममे। फेर एक संग तीनूक जुटान भऽ गेल। कोनो नव रचना करी तँ तीनू एक दोसराकेँ सुनाबी। तकर बाद हमरा नोकरी लागि गेल। पटना आ अररिया, बक्सरमे रहलहुँ। वर्ष १९८३ मे पटना आबि गेलहुँ। त्रिकोण १९८७ मे छपल। ई सहयोगी प्रकाशन तीनूकेँ कथाकार रूपमे परिचय स्थापित करबामे सहायक भेल। कथाकारक रूपमे लोक चीन्हय लागल। एहिसँ नोकसान नहि फाएदे भेल।

मुन्नाजी: अहाँ जहिया लेखन प्रारम्भ केलहुँ तहिया आ आजुक परिस्थिति (साहित्यिक) मे की समानता वा भिन्नता देखाइछ?
अशोक:हमरा लोकनि जहिया १९६७-६८ मे लेखन प्रारम्भ केलहुँ तकरा आइ चालीस वर्षसँ बेसी भऽ गेल अछि। एहि चालीस वर्षमे बहुत परिवर्तन भेल अछि। से परिवर्तन व्यक्तिगत आ साहित्यिक दुनू रूपमे भेल अछि। तीनू आब एक संग नहि रहैत छी। भेंटो-घाँट कमेकाल भऽ पबैत अछि। मुदा साहित्य लेखन चलि रहल अछि। तीनूक पोथी सभ प्रकाशित भेल अछि। तखन जे जोश-खरोश ओहि समय रहय से आब नहि रहि गेल अछि। से दुनू स्तरपर। व्यक्तिगत रूपमे पारिवारिक कारण सभसँ आ साहित्यिक परिदृश्यमे सामाजिक कारण सभसँ। जँ जँ मैथिलीकेँ सुविधा प्राप्त भऽ रहलैक अछि तँ तँ साहित्यकारमे लगनशीलता घटि रहलैक अछि। मैथिली लेल ओ जोश खरोस नहि देखाइत अछि जे तीस-चालीस वर्ष पहिने छल। आइ मैथिलीक लेल सभसँ पैघ समस्या नव-नव प्रतिभाशाली लोकक साहित्य क्षेत्रमे नहि जायब थिक। एहन बात नहि छैक जे नव लोक आबि नहि रहल छथि, आबि तँ रहल छथि मुदा जे लगाओ, जे निष्ठा चाही से नहि देखाइत अछि। एहि बातक अनुभव ओहि सभ व्यक्तिकेँ भऽ रहलनि अछि जे कोनो पत्रिका निकालि रहल छथि वा साहित्यक विकास लेल प्रयत्नशील छथि।

मुन्नाजी:अहाँक लेखनक मध्य साम्यवादी विचारधाराकहवा मैथिलीयो साहित्यमे बहलै। की मैथिली साहित्यमे कोनो एहन स्वतंत्र विचारधारा बनि पौलै। अहाँ ओइसँ कतेक लग वा दूर रहलौं!
अशोक:साम्यवादी विचारधाराक प्रभाव तँ मैथिली साहित्यमे एकदम देखार अछि। से यदि नहि देखार भेल रहैत तँ ओहिपर एतेक आक्रमण जे बढ़लैक अछि से नहि बढ़ितैक। साम्यवादी विचारक प्रभाव तँ मैथिलीमे कंचीनाथ झा “किरण” आ यात्रीक साहित्येसँ दृष्टिगोचर हुअ लगैत अछि। १९६०क बाद ओहिमे तेजी अयलैक। १९७१ ई.सँ १९८० क दशकमे वातावरणमे पसरल नक्सलवाड़ी आन्दोलनक प्रभाव मैथिली साहित्यमे पुरजोर रूपेँ पड़लैक। अनेकानेक कविता, कथामे एकरा देखल आ चिन्हल जा सकैत अछि। बादमे ई विचारधारा क्रमशः महीन होइत गेल छलैक। तैं आब, जेना अहाँ कहलौं, हवा जकाँ नहि लगैत अछि। आब ई विचारधारा कोनो फैसन जकाँ नहि अछि, जीवनक अंग भऽ कऽ आबि रहल अछि साहित्यमे।

मुन्नाजी:अहाँ गद्यक लेखनमे लघुकथा सेहो लिखलहुँ। लघुकथा लिखब केहेन लागल, एकर सोच कतऽ सँ आयल?
अशोक: लघुकथा हम मित्र विभूति आनन्दक कहलापर लिखलहुँ। ओ माटि-पानि पत्रिकाक सम्पादक रहथि। वएह पत्रिका लेल लघुकथा लीखि कऽ देबाक लेल कहलनि। किछु लघुकथा माटि-पानि आ आन पत्रिकामे छपबो कयल। सगर रातिमे सेहो किछु लघुकथा पढ़लहुँ। एम्हर बहुत दिनसँ कोनो लघुकथा नहि लिखलहुँ अछि। जहिया लिखलहुँ तहिया लिखबामे खूब आनन्द आयल।

मुन्नाजी: अहाँक नजरिमे आजुक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली लघुकथाक की स्थिति छै? की मैथिलीमे ओ स्वतंत्र स्थान पाबि सकत?
अशोक:मैथिलीमे आइयो लघुकथा खूबे लिखा रहल अछि। लघुकथाक पोथी सेहो प्रकाशित भेल अछि। तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, मधुकर भारद्वाज, अनमोल आ अहाँक लघुकथा सभ हम पढ़ने सुनने छी। मोन पड़ैत अछि जे श्रीधरम सगर रातिमे पहिले पहिल अपन लघुकथासँ हमरा सभकेँ आकर्षित केने रहथि। लघुकथाक एक संग्रह स्व. ए.सी.दीपकजी बहार केने रहथि। मैथिलीमे लघुकथाक तँ स्वतंत्र स्थान छैके। तखन एक संग्रहक प्रयोजन तत्काल हमरा अवश्य बुझा रहल अछि।

मुन्नाजी:वर्तमानमे अन्यान्य भाषा-साहित्य मध्य मैथिली साहित्यक की स्थिति देखा पड़ैछ।
अशोक:मैथिलीमे कविता आ कथा आन भाषा साहित्यसँ पाछू नहि अछि। उपन्यास अवश्य पछुआएल अछि। उपन्यासक खगता अवश्य मैथिलीकेँ छैक। एहन उपन्यासक जे आन भाषाक उपन्याससँ टक्कर लऽ सकय। आन अनेक विधामे सेहो स्तरीय पोथी नहि आबि रहल अछि। आन भाषा साहित्य सन वैचारिक लेखन सेहो नहि भऽ रहल अछि। हँ, तारानन्द वियोगीक “तुमि चिर सारथि” हिन्दीमे अनुवाद भऽ खूब धूम मचौलक अछि। चर्चित प्रशंसित भेल अछि। मैथिलीकेँ एहिसँ गौरव भेटलैक अछि।

मुन्नाजी:एखन धरि अहाँ द्वारा जतेक काज भेल ताहि हेतु कोनो ठोस मूल्यांकन वा पुरस्कारसँ वंचित रहि केहेन अनुभूति होइए?
अशोक: वस्तुतः पूछी तँ हम जतेक काज केलहुँ अछि तकर खूबे मूल्यांकन भेल अछि। हमरा मूल्यांकनक कोनो अभाव नहि बुझाइत अछि। काजे नहि कऽ पाबि रहल छी जते करबाक चाही। आन अनेक प्रकारक व्यस्तता लेखन नहि करऽ दैत अछि। तकर अनुभूति बरोबरि होइत रहैत अछि। जहाँ धरि पुरस्कारक गप अछि तँ तेहेन कोनो काजे हम आइ धरि नहि केलहुँ अछि। एखन तँ बहुत काज करबाक अछि। बहुत लिखबाक अछि।

मुन्नाजी:अपन तीनू कोणक मध्य अहाँ अपनाकेँ कतऽ पबै छी?
अशोक:तीनू कोणक अपन फूट-फूट महत्व आ विशिष्टता होइत छैक। मुदा तीनू मिलिए कऽ त्रिकोण बनैत अछि। तखन आइ एकटा कोण लोहनामे, एकटा कोण दरभंगामे आ एकटा कोण पटनामे अछि, एहि स्थानक भिन्नताक प्रभाव तँ पड़िए रहल छैक। तीनू कोण जखन फेरसँ एक संग लोहनामे जुटब तँ सोचब जे के, कोना आ कतऽ छी। त्रिकोणक यात्रा तँ एखन चलिये रहल अछि।

मुन्नाजी:नव पीढ़ीक रचनाकार वास्ते अपन विचार की देब?
अशोक: औ मुन्नाजी, हम तँ एखनहुँ अपनाकेँ नबे मानैत छी। किछु लिखैत छी तँ होइत रहैत अछि जे बनलैक की नहि। कोंढ़ कपैत रहैत अछि। हमरा तँ अपने बेर-बेर विचारक आवश्यकता होइत रहैत अछि। एहनामे हम विचार की देब?


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