Friday, June 03, 2011

'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३) PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ८३ म अंक ०१ जून २०११ (वर्ष ४ मास ४२ अंक ८३)NEPALINDIA                
                                               
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine   नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own script Roman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
ऐ अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य










३. पद्य









३.६.१. पंकज कुमार झा  .नवीन कुमार आशा

३.७. १.रामवि‍लास साहु २.रामदेव प्रसाद मण्‍डल 'झारूदार' .किशन कारीगर-ग़रीब४.जगदीश प्रसाद मण्डल


४. मिथिला कला-संगीत- १.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर) ४.गुंजन कर्ण

 



 

६. बालानां कृते-१.जगदीश चन्द्र अनिल २.प्रेमचन्द्र मिश्र- अपन बेटा अभिनव मिश्रकेँ बल दै लेल कविता

 

७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]






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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।


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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'



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गामक जिनगी (कथा संग्रह)-जगदीश प्रसाद मंडल 21.1%  (341 votes)  
 
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक (विविधा)-गजेन्द्र ठाकुर 20.17%  (326 votes)  
 
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रामलोचन ठाकुर- पद्मा नदीक माझी (बांग्ला- माणिक वन्दोपाध्याय) 60.92%  (198 votes)  
 
मेनका मल्लिक- देश आ अन्य कविता सभ (रेमिका थापा- नेपाली) 22.77%  (74 votes)  
 
कृष्ण कुमार कश्यप आ शशिबाला- मैथिली गीतगोविन्द (जयदेव - संस्कृत) 14.77%  (48 votes)  
 
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प्रीति ठाकुर (गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा) 53.45%  (248 votes)  
 
ले.क.मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ- बालकथा संग्रह) 23.92%  (111 votes)  
 
जीवकांत - खिखिरक बिअरि- कविता संग्रह) 11.21%  (52 votes)  
 
विद्यानाथ झा "विदित" (साते भवतु सुप्रीता- बाल उपन्यास) 11.42%  (53 votes)  
 
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आनंद कुमार झा- हठात् परि‍वर्त्तन ( नाटक) 50.28%  (442 votes)  
 
विनीत उत्पल - हम पुछैत छी (कविता संग्रह ) 16.5%  (145 votes)  
 
उमेश मंडल- निश्तुकी ( कविता संग्रह) 16.84%  (148 votes)  
 
ज्योति सुनीत चौधरी- अर्चिस (कविता संग्रह ) 15.59%  (137 votes)  
 
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संपादकीय

“हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा “रमणक” ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?” (सियाराम झा “सरस”, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला)
वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- “छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!)
गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे।
देवशंकर नवीन लिखै छथि “...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..”।
लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे “ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक” कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि।
हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति चौधरी अपन कविता संग्रह “अर्चिस्” मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ  रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा (वा वार्णिकमे वर्ण) २० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही।
गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छथि ? मायानन्द मिश्र “गीतल” कहि आ गंगेश गुंजन “गजल सन किछु मैथिलीमे” कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद अजित आजाद आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी।
लोकवेद आ लालकिला:
आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रहमे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन,  नरेन्द्र,  डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य “धीरज”,  रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”,  रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द,  सियाराम झा “सरस” आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि।
कलानन्द भट्ट
भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज
करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।
तारानन्द वियोगी
दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि
बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि

सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)।  दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल।

देवशंकर नवीन
अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच
नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।

नरेन्द्र
निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ
बासन ली ठोकि बजाकेँ
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
डॉ महेन्द्र
चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए
जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि।
रमेश
जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए
हमर छाती मे गजलक लहास बरैए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए।
ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए।

एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक “गजल हमर हथियार थिक” , सियाराम झा “सरस”क “थोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक “नागफेनी” आ तारानन्द वियोगीक “अपन युद्धक साक्ष्य” मे सँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ साहित्यिक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि।

जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक “लेखनी एक रंग अनेक” देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै,  मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए।
एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ
लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ
(रवीन्द्रनाथ ठाकुर “लेखनी एक रंग अनेक”)

सूचना: विदेहक तेसर अंक (१ फरबरी २००८)मे हम सूचित केने रही- विकीपीडियापर मैथिलीपर लेख तँ छल मुदा मैथिलीमे लेख नहि छल,कारण मैथिलीक विकीपीडियाकेँ स्वीकृति नहि भेटल छल। हम बहुत दिनसँ एहिमे लागल रही आ सूचिकरैत हर्षित छी जे २७.०१.२००८ केँ (मैथिली) भाषाकेँ विकी शुरू करबाक हेतु स्वीकृति भेटल छैक, मुदा एहि हेतु कमसँ कम पाँच गोटे, विभिन्न जगहसँ एकर एडिटरक रूपमे नियमित रूपेँ कार्य करथि तखने योजनाकेँ पूर्ण स्वीकृति भेटतैक।” आ आब जखन तीन सालसँ बेशी बीति गेल अछि आ मैथिली विकीपीडिया लेल प्रारम्भिक सभटा आवश्यकता पूर्ण कऽ लेल गेल अछि विकीपीडियाक लैंगुएज कमेटीआब बुझि गेल अछि जे मैथिली बिहारी नामसँ बुझल जाएबलाभाषा नै अछि आ ऐ लेल अलग विकीपीडियाक जरूरत अछि। विकीपीडियाक गेरार्ड एम. लिखै छथि  ( http://ultimategerardm.blogspot.com/2011/05/bihari-wikipedia-is-actually-written-in.html  )
-ई सूचना मैथिली आ मैथिलीक बिहारी भाषासमूहसँ सम्बन्धक विषयमे उमेश मंडल द्वारा देल गेल अछि- उमेश विकीपीडियापर मैथिलीक स्थानीयकरणक परियोजनामे काज कऽ रहल छथि, ...लैंगुएज कमेटी ई बुझबाक प्रयास कऽ रहल अछि जे की मैथिलीक स्थान बिहारी भाषा समूहक अन्तर्गत राखल जा सकैए ?..मुदा आब उमेश जीक उत्तरसँ पूर्ण स्पष्ट भऽ गेल अछि जे नै
रामविलास शर्माक लेख (मैथिली और हिन्दी, हिन्दी मासिक पाटल, सम्पादक रामदयाल पांडेय) जइमे मैथिलीकेँ हिन्दीक बोली बनेबाक प्रयास भेल छलै तकर विरोध यात्रीजी अपन हिन्दी लेख द्वारा केने छलाह , जखन हुनकर उमेर ४३ बर्ख छलन्हि (आर्यावर्त १४/ २१ फरबरी १९५४), जकर राजमोहन झा द्वारा कएल मैथिली अनुवाद आरम्भक दोसर अंकमे छपल छल। उमेश मंडलक ई सफल प्रयास ऐ अर्थेँ आर विशिष्टता प्राप्त केने अछि कारण हुनकर उमेर अखन मात्र ३० बर्ख छन्हि। जखन मैथिल सभ हैदराबाद, बंगलोर आ सिएटल धरि कम्प्यूटर साइंसक क्षेत्रमे रहि काज कऽ रहल छथि, ई विरोध वा करेक्शन हुनका लोकनि द्वारा नै वरन मिथिलाक सुदूर क्षेत्रमे रहनिहार ऐ मैथिली प्रेमी युवा द्वारा भेल से की देखबैत अछि?
उमेश मंडल मिथिलाक सभ जाति आ धर्मक लोकक कण्ठक गीतकेँ फील्डवर्क द्वारा ऑडियो आ वीडियोमे डिजिटलाइज सेहो कएने छथि जे विदेह आर्काइवमे उपलब्ध अछि।   

नीचाँक
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( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १११ देशक १,७८९ ठामसँ ६१, २६१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,०५,४७५ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। )
 

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 
http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

 

२. गद्य








जगदीश प्रसाद मण्‍डल

दीर्घकथा

शंभूदास


जि‍नगीक ओइ सीमापर शंभूदास पहुँच गेल छथि‍ जतए पैछला जि‍नगीक बहुतो वि‍चार आ काज स्‍वत: छुटि‍ गेलनि‍। कि‍छु नव जे मनमे उपकि‍ रहल छन्‍हि‍ ओ करैले जइ शक्‍ति‍ आ सामर्थक जते जरूरत छन्‍हि‍ ओ तकनहुँ नै भेट रहल छन्‍हि‍। जना आगि‍क चि‍नगोरा रसे-रसे पझा-पझा या तँ मैल जकाँ उपर छाड़ने जा रहल छन्‍हि‍ या झड़ि‍-झड़ि‍ खसि‍ रहल छन्हि‍। डंटीसँ टूटल पोखरि‍क कमल सदृश्‍य हवाक सि‍हकी वा पानि‍क कम्‍पन्नसँ दहलि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो कामधेनु, फूल-फड़सँ लदल वृक्ष सदृश्‍य छलनि‍ वएह आइ ठाँठ वा पत्रहीन ठूठ बुझि‍ पड़ि‍ रहल छन्‍हि‍। जे कहि‍यो राजभोगक बीच दिन बि‍तबैत छलाह आइ अन्न-वस्‍त्र वि‍हीन भीखक घाटपर बैस अपन जि‍नगीक हि‍साब-वारी जोड़ि‍ रहल छथि‍। मन कहैत छन्‍हि‍ जे सभ दि‍न तँ गुनगुनाइत रहलौं- जे बच्‍चा कनैत ऐ धरतीपर अबैत अछि‍ आ हँसैत जाइक चाहि‍ऐ, मुदा से कहाँ......? जे आत्‍मा बि‍नु वि‍वेकक जि‍नगी टपि‍ वि‍वेकवान लग पहुँचल ओ आगू नै बढ़ि‍ पाछु दि‍स कि‍अए ढड़कि‍ रहल अछि‍। सोन-सन उज्‍जर धप-धप दाढ़ी-मोछक संग माथसँ पएरक अंगुरि‍क धरि‍क केश, आमील सन सुखाएल गालक संग अगि‍ला भाग, सामर्थ हीन हाथ-पएरक मुदा आँखि‍क ज्‍योति‍ भोरक ध्रुवतारा जकाँ ललौन मन उफनि‍ उठलनि‍ जे देवस्‍थान जकाँ ति‍रपेखनि‍ ऐ दुनि‍याँक करब।

जहि‍ना बाध-वोनक ओहन परती जइपर कहि‍यो हर-कोदारि‍ नै चलल सुखि‍-सुखि‍ गाि‍छ-वि‍रि‍छ खसि‍ उसर भऽ जाइत, ओइ परतीपर या तँ चि‍ड़ै-चुनमुनीक माध्‍यमसँ वा हवा-पानि‍क माध्‍यमसँ अनेरूआ फूल-फड़क गाछ जनमि‍ रौद-वसात, पानि‍-पाथर, अन्‍हर-वि‍हाड़ि‍ सहि‍ अपन जुआनी पाबि‍ छाती खोलि‍ बाट-बटोहीकेँ अपन मीठ सुआदसँ तृप्‍ति‍ करैत तहि‍ना जमुना नदीक तटपर शंभूदासक जन्‍म बटाइ-कि‍सान परि‍वारमे भेलनि‍। रवि‍ दि‍न रहने समाजक दाय-माय शुभ दि‍न मानि‍ शंभू नाओं रखलकनि‍। परदेशि‍या जकाँ तँ नै जे जन्‍मसँ पहि‍नहि‍ माए-बाप नामकरण कऽ लैत। छठम दि‍नसँ पूर्वक सभ कष्‍ट वि‍सरि‍ शंभूदासक माए सुखनी अपन सुखैक नि‍आसा छोड़ि‍ अपन देवस्‍थानक देवता पूजनमे हराएल। अपन मर्यादा गसि‍ कऽ पकड़ि‍ शंभूक सेवामे जुटि‍ गेलीह। परि‍वारक बोझक तर पि‍ता, तँए बि‍लगा कऽ कि‍छु नै सोचथि‍।

पाँच वर्ख पूर्व धरि‍ संतोखीदास अपने बोनि‍हार सभ जकाँ दुनू परानी संतोखी आ सुखनी, खेति‍हर बोनि‍हार छलाह। खेति‍यो तँ मौसमेक हाथक खेलौना। बेठेकान। मुदा तैयो तँ सभ बुझैत जे जाड़, गरमी आ बरसात, सालक तीन अवस्‍था छी। भलहि‍ं गोटे साल शीतलहरी पाबि‍ जाड़ अपन वि‍काराल रूप देखबैत तँ रौदी पाबि‍ गरमी। बरखा पाबि‍ बसात बाढ़ि‍क संग नंगटे नचैत तँ झाँट पाबि‍ ताण्‍डव करैत।

बजारवादक हवा सि‍हकल। ओना तँ वि‍हाड़ि‍क रूप हवा उठल मुदा पहाड़, बोनक टाट अँटकौलक। गति‍केँ कम केलक मुदा तैयो बहि‍ते रहल। जाड़-रौदीक मारल कि‍सानो अा बोनि‍हारो गाम (खेती-पथारी) छोड़ि‍ बजार दि‍स वि‍दा भेल। जहि‍ना घर बनबैमे पातरसँ मोट खूँटक जरूरत होइत तहि‍ना करखाना चलबैक लेल मजदूर बोनि‍हारसँ लऽ कऽ संचालक धरि‍क आवश्यकता भेल। उजड़ल-उपटल गामक रूखि‍मे बदलाव अबए लगल। खेतमे काज केनि‍हार बोनि‍हारकेँ करखन्नाक नव मजदूरी भेटए लगल। जइसँ जि‍नगीमे हरि‍यरी अबए लगलै। मुदा हवाक गति‍ धीरे-धीरे तेज हुअए लगल। सस्‍त मजदूर पाबि‍ रंग-वि‍रंगक कारोवार शहरमे जन्‍म लि‍अए लगल। जइसँ श्रमि‍कक मांग बढ़ल। टूटैत गामक जि‍नगीसँ तंग भऽ वेवस श्रमि‍क जेर बना-बना बजारक बाट पकड़लक। श्रमक वि‍करीक कारोवार जोर पकड़लक। खुल्‍लम-खुल्‍ला वि‍करी बट्टा हुअए लगल।
गामक श्रमि‍कक पड़ाइनसँ गामो हलचलाएल। खेतबलाकेँ करखन्ना पहुँचने खेतीमे ठहराव आएल। श्रमि‍कक अभावमे खेती ठमकल। समाजक वि‍चारधारामे बदलाव आएल। एक वि‍चारधारा -जे अखनो धरि‍ सम्‍पति‍केँ प्रति‍ष्‍ठा बुझैत- जे पहि‍लुकके खेतीकेँ थोड़-थाड़ अन्न-पानि‍ खुआ-पि‍आ जीवि‍त रखलनि‍ तँ दोसर वि‍चारधारा (शहरी कारोवार देख) खेत-पथार माने ग्रामीण सम्‍पत्ति‍केँ पूँजी बुझि‍ आमद-खर्चक ि‍हसाब जोड़ि‍ वि‍चारमे बदलाव अनलनि‍। संग-संग बटाइ खेतीक बीच नव-समस्‍या सेहो उठल। जइठाम एखन धरि‍ गामक जमीनदार खेतक उपजे बेर-टामे खेतक दर्शन करैत, ओ गामसँ बाहर भेने सालक-साल खेतक दर्शनसँ वि‍मुख भेला। संग-संग गाममे श्रम-शक्‍ति‍क अभाव भेल। बटेदारक वर्गक वृद्धि‍ भेल। खेतक बटाइ प्रथामे बदलाव आएल। जइसँ आमक कन (फड़क हसावसँ) उपजाक मनखप आ पोसि‍या माल-जालमे बदलाव आएल। कोनो धरानी संतोखीदास एकटा बड़द बनौलक। दू परानीक हाथ-पएर आ एकटा बड़द पाबि‍ संतोखीदस बटेदार कि‍सानक रूपमे ठाढ़ भेल। पेट भरने परि‍वारमे खुशीक बाढ़ि‍ तँ नै मुदा पटवी पानि‍क खुशी जरूर आबि‍ गेल। बीघा भरि‍क खेति‍हर संतोखीदास बनि‍ गेल। नव आर्थिक वि‍कास भेने परि‍वरक बच्‍चो सभमे मौलाहट कमल। जइसँ बच्‍चाक मृत्‍युक संख्‍यामे कमी आएल। ओना एखनो धरि‍ श्रमकि‍ परि‍वारमे बेट-बेटीमे अन्‍तर नै बुझल जाइत कि‍एक तँ भगवानक अगम लीलाक बीच हस्‍तक्षेप्‍ नै करए चहैत मुदा बजारक बि‍खाएल वयार तँ बहि‍ये रहल अछि‍।
शंभूक तीन बर्ख पुरि‍ते, जहि‍ना शीतलहरीमे पौ फटि‍ते सुरूजक रोशनीक आशा जगैत, बदरीहन समए बादलकेँ छि‍ड़ि‍आइते घरसँ बहराइक आशा जगैत तहि‍ना संतोखि‍यो दास आ सुखनि‍योकेँ भेल। जि‍नगी भरि‍क लेल मनखप खेत भेटने कि‍अए नै दुनू परानीक मनमे आशा आओत। तहूमे बाढ़-रौदीक सालक कोनो देनदरि‍ये नै, रहल सुभ्‍यस्‍त समैक देनदारी। ओहो देनदारी कि‍ अन्‍तैसँ कमा कऽ आनए पड़त। धरती माता कामधेनु। जते करब तते पाएब। जखन मन हएत, तखन खाएब। दि‍न-राति‍ ओंघराइत रहब।
एखन धरि‍ सुखनी शंभूक पाछु आंगनसँ नै नि‍कलि‍ पबैत छलीह मुदा आब तँ शंभू तीन सालक भऽ गेल। अगहन मासमे खेतक आड़ि‍पर धानक खाेंचड़ि‍क घर बना देब ओइमे खेलेबो करत आंेघी लगतै तँ सुतबो करत। गरमी मासमे गाछक छाहरि‍मे रहत। लऽ दऽ कऽ बरसात रहल। तँ बरखो कि‍ लोककेँ बि‍ना चेतौने अबैए। अबैसँ पहि‍ने राजा-रजवाड़ जकाँ समाद पठा दैत अछि‍। तहूमे बरखा केहन रूपमे आओत सेहो तँ कहि‍ये दैत अछि‍। जेठुआ बरखामे जे दुइयो बेर देह धुआ जेतै तँ सालो भरि‍ धुआएले रहतै। बच्‍चा कि‍ कोनो सि‍यान सैतान होइए जे भरि‍ दि‍न डौं-डौं करत। ओकरा तँ अन्न-पानि‍ भेट जाए, भरि‍ दि‍न बौआइत रहत। जहि‍ना नव दाँत जनमने मसुहरि‍ कि‍छु करैले सबसबाइत अछि‍ तहि‍ना बच्‍चो मन।
जेठक दसहारा। बृहस्‍पति‍ दि‍न। गि‍रहस्‍तीक पतराएल काज। अटूट फड़ल आम-जामुनक गाछ। गामक-गाम लोकक मन गदगद। कि‍अए ने रहत। दू मास जे अमृत फल भेटत। बाधक चौबगली गाम अष्‍टयाम कीर्तनक मंत्रसँ अकास गनगनाइत। कि‍म्‍हरो सीताराम, सीताराम सीताराम जय सीताराम तँ कि‍म्‍हरो काली, गुर्गे राधे श्‍याम, गौरी शंकर सीताराम। कि‍म्‍हरो हरे राम, हरे राम...। तँ कि‍म्‍हरो हरे कृष्‍ण हरे कृष्‍ण।
दसहारा रहने ब्रह्मस्‍थानमे घोड़ा चढ़ौल सजाओल जाएत। ऐबेर तँ जहि‍ना ब्रह्मबाबा खुशी छथि‍न तहि‍ना लोकोक मन। आन साल जकाँ कि‍ ऐबेर हल्‍लुक दामा रंग सुखा घोड़ा लोक चढ़ौत पहि‍ने साय-बेना- दऽ दऽ सरैसो घोड़ासँ नि‍म्‍मन-नि‍म्‍मन चढ़ौत। दूध-पीठ खाइत-खाइत ब्रह्मोबाबाक मन अकछा गेल छन्‍हि‍ तँए ऐबेर सेरही, पनसेरही, दससेरही, अधमनीक संग मनही मंूगाबा सेहो परदेसि‍या सभ चढ़ौत।
दि‍नक एगारह बजैत। माटि‍-पानि‍ तबने हबो तबि‍ गेल। खेतक जे खढ़ अछि‍ ओ रोहणि‍ मि‍रगि‍सरामे नै सूखत तँ सालो भरि‍ ओकर ओधि‍ थोड़े सुखत। तँए संतोखीदास मरूआ खेत जोतए आ सुखनी खढ़ बि‍छए गेल। मुदा छोट बच्‍चा शंभूकेँ असकरे आँगनमे केना छोड़ि‍ दि‍तथि‍। बच्‍चोले बाटीमे भात आ भरि‍ डोल पानि‍ नेने खेत गेली। अपनो सभकेँ पि‍यास लगत तँ पीबैक खि‍यालसँ। खेतसँ कट्ठा दुऐक हटि‍ आड़ि‍पर एकटा बज्‍जर केराइक अनेरूआ गाछ। जकरा नि‍च्‍चामे सघन छाहरि‍ तँ नै मुदा छाहरि‍। जतए शंभूकेँ खेलाइले छोड़ि‍ अपने दुनू परानी संतोखीदास खेतमे काज करैत। काज लगि‍चाएल देख, खाली हड़मड़ी चौकी देब बाकी, हर खोलि‍ चौकी ठेक संतोखीदास पत्नीकेँ कहलखि‍न- रौदमे मन तबैध गेल हएत, कनीखान छाहरि‍मे जीरा लइले चलू।
सुखनी- सएह कहए चाहै छलौं मुदा काज लगि‍चाएल देख नै कहै छलौं। जे काज ससरि‍ जाइ छै ओते तँ जाने हल्लुक होइ छै कि‍ने।
हँ से तँ होइ छै। मुदा काजो कि‍......?”
से की?”
गैंचि‍याह नजरि‍ पत्नीपर दैत संतोखीदास मुस्‍की दैत कहए लगलखि‍न- जहि‍ना भाँग-गांजा अपन सेवककेँ बौरा दैत, बेशि‍या इश्कबाजकेँ, तहि‍ना ने काजो अपन कर्ताकेँ बाबला बना जान लइपर तुलल रहैत।
नै बुझलौं?”
देखै नै छि‍ऐ, दोकान सभमे लि‍ख कऽ टांगल रहैए जे, काज करैत चलू फलक आशा नै करू।' जखन मनुख छी रोड-सड़ककेँ नाि‍प मीलक पाथर गारल रहैए तखन कतऽ कोन रास्‍ता चलक चाही से तँ सोचए पड़तै कि‍ने। आकि‍ रस्‍ते भुति‍या जाय। जे बाट नै देखल रहै छै ओही बाटमे ने लोक भुति‍आइए। खाइर, छोड़ू ऐ सभकेँ चलू कनी ठंढ़ाइयो लेब दू घोंट पानि‍यो आ तमाकुलो खा लेब।
दुनू परानी बज्‍जर केराइ गाछसँ फड़ि‍क्के देखलनि‍ जे शंभू पूवारि‍ पारक अष्‍टयामक मंत्र- हरे कृष्‍णा, हरे कृष्‍णा, कृष्‍णा-कृष्‍णा हरे-हरे एक ताले छठि‍क ढोल जकाँ थोपड़ी बजबैत गबैत रहए। बेटापर नजरि‍ पड़ि‍ते सुखनी अध खि‍लू फूल जकाँ वि‍हुँसैत पति‍केँ कहलनि‍- देखि‍यौ ऐ छौंड़ाकेँ। आन धि‍या-पूता रहैत तँ माए-माए करैत। केहेन मगन भेल अछि‍।
पति‍- रौदमे तबैध तँ ने गेल अछि‍?”
तबधल बच्‍चा थोपड़ी बजा गाओत आकि‍ अँहोछि‍या काटत।
हँ से तँ ठीके।
जहि‍ना तत्‍व चि‍न्‍तक आत्‍माक तार जोड़ि‍ ब्रह्म तत्‍वक अन्‍वेषण करैत तहि‍ना शंभू कृष्‍ण मंत्रसँ अपन मनक तार जोड़ि‍ अष्‍टयामक धुनमे बेसुधि‍ भेल मीरा जकाँ गाबि‍ रहल अछि‍।
जहि‍ना एक्के फुलबाड़ी वा गाछीमे भि‍न्न-भि‍न्न रंगक फूल वा फल ताधरि‍ अपन परि‍चयसँ हराएल रहैत जाधरि‍ बच्‍चा सदृश्‍य पालल-पोसल जाइत, मुदा जखन अपन गुण वा रूप देखबै जोकर भऽ जाइत तखन एकठाम रहि‍तो बेड़ाए लगैत तहि‍ना सात बर्ख अबैत-अबैत शंभूओ बेड़ाए लगल। परि‍वारमे अनेको रंगक वस्‍तु-जात रहि‍तो ओतबे सि‍नेह रखैत जते काजक वस्‍तु बुझैत। जइ वस्‍तुक प्रयोजन आन-आन रूपकेँ आन-आन काजमे होइत तइसँ भि‍न्न ओइ वस्‍तुक उपयोग अपन काज देख करए लगल।
अपना खेत-पथार नै रहि‍तो संतोखीदासक परि‍वार गामक कि‍सान परि‍वारक खाड़ीमे आबि‍ चुकल छल। जहि‍ना कि‍सान परि‍वारमे वाइस-बेरहट कऽ कऽ खाइत अछि‍ तहि‍ना संतोखि‍यो दासक परि‍वारमे चलए लगलनि‍। ओना ई गति‍ लगातार नै चलि‍ पबैत, कि‍एक तँ कि‍सान परि‍वार, डेंगी नाह जकाँ सदति‍ उपर-नि‍च्‍चा होइत रहैत। जइ साल खरचट्टा वा दहार समए भेल तइ साल सभ धुआ-पोछा गेल। मुदा जइ साल सुभि‍तगर समए भेल तइ साल पुन: नव-पुरानक चालि‍ पकड़ि‍ लैत। नवे-पुरानक चालि‍ ने रसगरो आ सुअदगरो होइए, अगि‍ला-पछि‍ला बाट देख चलबे ने दि‍शा दैत। जेना एक्के आमक चटनी टटका नीक होइत तँ अचार बसि‍या। जते-पुरान तते रसगर। मुदा चटनी तँ लगले अरूआ जाइत। तहि‍ना नवका कुरथीक दालि‍ आ पुरान राहड़ि‍क दालि‍।
एखन धरि‍ शंभू, परि‍वारकेँ खाली खाइ-पीबै, माता-पीताक संग रहैक टा बुझैत। कि‍एक तँ बाल-बोध बुझि‍, ने माता-पि‍ता कि‍छु करैले अढ़बैत आ ने शंभू परि‍वारक काजकेँ अपन काज बुझैत। सदति‍ धैनसन। सोलहन्नी बेरागी जकाँ। मुदा तँए कि‍ शंभू भरि‍ दि‍न ओछाइनेपर ओंघराएल रहैत सेहो बात नै। जँ कि‍छु नै करैत तँ दि‍न-राति‍ केना कटैत छैक।
अखनो धरि‍ गामक िकसान धरतीसँ अकास धरि‍क स्‍मरण साँझ-भोर जरूर करैत अछि‍। भोरमे धरतीक स्‍मरण तँ साँझमे अकास वि‍चरण जरूर करैत अछि‍। आने परि‍वार जकाँ संतोखि‍यो दासक परि‍वार। परि‍वारमे शंभूक कोनो मोजरे नै। मात्र खाइ-पीबै आ सुतै बेर माता-पि‍ता सि‍र चढ़बैत। बाकी समए साँढ़-पारा जकाँ अनेर बौआइत ढहनाइत। तँए कि‍ सींग-नाङरि‍बला पशु जकाँ कि‍ शंभूकेँ थइर-पगहाक जरूरत होइत। 'अनेर गाएकेँ धरम रखवार' होइत।
भोरमे जखन संतोखीदास खेत-तमैक वि‍चार करए लगथि‍ तँ नचैत हृदेक घूघड़ूक कम्‍पन्न ठोठक स्‍वर होइत खपड़ि‍क मकइ-जनेरक लावा जकाँ कूदि‍-कूदि‍ नि‍च्‍चा खसैत तहि‍ना संतोखि‍यो दासक मुँहसँ रंग-वि‍रंगक मौसमक संग मौसमी सि‍नेह छि‍ड़ि‍याए लगैत। जकरा बीछ-बीछ शंभू खेलेबो करैत आ तहि‍या-तहि‍या सीनाक डायरीमे लि‍ख-लि‍ख रखबो करैत। हृदयंगम करैत। मुदा बच्‍चाक कचि‍या डायरी रहने कि‍छु लि‍खेबो करैत आ कि‍छु नहि‍यो लि‍खाइत। मुदा प्रति‍ भोर आ साँझक स्‍वर 'सीताराम-सीताराम, राधेश्‍याम-राधेश्‍याम' डायरीक उपरेक पन्नामे लि‍खा गेल। जकरा भरि‍ दि‍न शंभू गो-मुखी रूद्राक्षक माला बना जपैत रहैत। कामधेनु गाए जकाँ सदति‍ दूधक ढारसँ नव-नव राग-रागि‍नी स्‍वत: अबए लगल। कंठक स्‍वर-लहरी हाथकेँ थि‍रकबै लगल। जइसँ कखनो दुनू हाथ मि‍ल ताल मि‍लबैत तँ कखनो पल्‍था मारि‍ बैस  ठेहुनपर ताल मि‍लबए लगल।

घर-अंगना एक रहने पि‍ताक संग माइयोक पाछु-पाछु आंगन बाहरैत समए, चुल्हि‍-चि‍नमार नीपैक समए, जाँत-ढेकी चलबैक समए शंभू नचए-गबए लगल। बेटाक बौराइत मन देख माइयो आत्‍म-वि‍भोर भऽ झुमि‍-झुमि‍ शंभूक आँखि‍मे आँखि‍ गारि‍ फड़ैत-फुलाइत फुलबाड़ीमे हरा जाइत।
माता-पि‍ताक उसकैत हाथ देख शंभूओक हाथ खाइबला बाटीपर उसकए लगल। खजुरी जकाँ ओकरा बजाएब शुरू केलक। कोना नै करत? कामेसँ राम आ रामेसँ काम ने चलैत अछि‍। मुदा भारी द्रव्‍यक बाटी रहने हाड़-मासुक हाथक ओंगरी कतेखान ठठत। जे बात शंभू तँ नै बुझि‍ सकल मुदा संतोखीदास बुझि‍ गेलखि‍न। सोचलनि‍ जे जँ खजुरी बना दि‍अए तँ चौबीसो घंटा शंभू आनन्‍दमे मगन रहत। बेटाक प्रति‍ पि‍ताक दायि‍त्‍वे कि‍? यएह ने जे हँसी-खुखीसँ दि‍न-राति‍ चलैत रहए। मन मानि‍ गेलनि‍ जे बेटाकेँ खजुरी बना देबै। एकलव्‍य जकाँ साजमे खजुरि‍यो ने अछि‍। ने ओकरा दोसर संगीक जरूरत होइत आ ने कखनो अपनाकेँ असगर बुझैत। जहि‍ना हवामे उड़ैत रोग लोककेँ पकड़ि‍ लैत, लगन अबि‍ते बर-कन्‍याकेँ पकड़ए लगैत, तीर्थ-व्रतक डोरी लगैत तहि‍ना शंभूओकेँ गीत-नादक माने संगीतक रांग पकड़ि‍ लेलक। जइसँ पि‍ताकेँ हर जोतैत, कोदारि‍ पाड़ैत, धान-रोपैत कालक गुनगुनीक संग आंगन बाहरैत, धान कुटैत, जत्ता चलबैत कालक गुनगुनी पकड़ि‍ लेलक। जकरा संग शंभू भरि‍ दि‍न मगन भऽ गारा-जोड़ी केने बुलए-भंगए लगल। मुदा तँए कि‍ शंभू एतबेमे ओझराएल रहल? नै! ने ओकरा गामक आन घर अनभुआर आ ने लोक अनठि‍या बुझि‍ पड़ै। तहूमे एकठाम रहने, जखन माए-बापक संग बाध-बोन दि‍स जाए तँ वएह घर वएह लोक देखए। समाज तँ ओहन सरोबर छी जइमे घोंघा-सि‍तुआसँ लऽ कऽ कमल धरि‍ फुलाइत अछि‍। देवस्‍थानमे साँझ-भोर घड़ी-घंट, शंख बजैत खरि‍हाँनमे धान फटकैत सूपक अवाज अकासमे उड़ैत। काठपर ओंघराइत टेंगारी-कुड़हरि‍ गर्द करैत तँ चुल्हि‍पर चढ़ल बरतनक अदहन झ-झ-काली करैत रहैत।
छह बर्खक बेटा शंभू लेल संतोखीदास खजुरीक ओरि‍यान करैक वि‍चार केलनि‍। ओना हाट-बजारमे खजुरी तँ नै बि‍काइत अछि‍ मुदा हरि‍हरक्षेत्र, सि‍हेश्वर, जनकपुर आ देवघरमे तँ बि‍काइते अछि‍। मुदा ओतएसँ आओत कोना? एखन तँ अोम्‍हर मुँहे जाइक नि‍यार नै अछि‍। ओना गामोमे बरही लकड़ीक कठरा बनबैए। मघैया सरि‍सोबा सनगोहि‍ मारि‍ खेबो करैए आ ओकर छाल बेचबो करैए। अगर जँ कठरा बनबा, सनगोहि‍क छाल कीन लेब तँ तेबखाक बेसनसँ अपनो छाड़ि‍ लेब। हम सभ कि‍ कोनो शहर-बजारक लोक छी जे बेटा-बेटीकेँ पेस्‍तौल बम-बारूद-छुड़छुडी-फटाका- खेलाइले देबै। जँ खेत-खरि‍हाँन दि‍सक मन देखि‍ति‍ऐ तँ खि‍एलहा हँसुआ-खुरपी खेलाइले दैति‍ऐ जँ से नै देखै छि‍ऐ तँ एकरा खजुरि‍येक ओरि‍यान कऽ देबै। सएह केलनि‍।
जहि‍ना हाथमे औजार ऐने श्रमि‍क बड़का-बड़का इंजीन बना चलबैत तहि‍ना हाथमे खजुरी ऐने शंभूओ परि‍वारक संग समाजक कीर्तन, भजन, यज्ञ इत्‍यादि‍मे शामि‍ल हुअए लगल।
छह बर्ख बीतैत-बीतैत शंभूक हाथ खजुरीपर बैस गेल। जइसँ असकरे आंगनक ओसारपर बैस जाधरि‍ हाथक आंगुर नै दुखाए लगै ताधरि‍ एकताले सीता-राम सीता-राम, राधेश्‍याम, राधेश्‍याम खजुरि‍क अवाजक संग अपन कंठक अवाज मि‍ला उन्‍मत्त भऽ गबैत-रहैत।
भगवानोक लीला अजीव छन्‍हि‍। एक्के मनुख वा पशु-पक्षीक गोटे बच्‍चाकेँ उम्रसँ बेसि‍ऐ बना दैत छथि‍न आ कोनोकेँ कम बना दैत छथि‍न। कि‍यो पाँचे बर्खमे पनरह बर्खक बुद्धि‍-ज्ञान अरजि‍ लैत अछि‍ तँ कि‍यो पनरहो बर्खमे पाँचो बर्खसँ नि‍च्‍चे रहैत अछि‍। जना शंभुओकेँ भेल। छबे बर्खमे पनरह बर्खक बच्‍चाक कान काटए लगल। तहूँमे तेहन समाजक स्‍कूल अछि‍ जे जते मि‍हनत करए चाहब ओते फलो भेटबे करत।
सदि‍काल कतौ ने कतौ कोनो ने कोनो उत्‍सव समाजमे होइते रहैत अछि‍। देवस्‍थानसँ परि‍वार धरि‍, कतौ अष्‍टयाम-कीर्तन, तँ कतौ बच्‍चाक मूड़न, कतौ सत्नारायण भगवानक पूजा तँ कतौ ि‍वयाह-दुरागमन। शुभ काज तँए शुभ वातावरण बनबैक लेल शुभ-शुभ क्रि‍या-कलाप। शुभ क्रि‍या-कलापक लेल कतौ ढोलक-झालि‍ हारमोनि‍यमक संग रामधुन चलैत तँ कतौ ढोल-पीपहीक संग गीत-नाद। ततबे नै संग-संग परि‍वारक उत्‍सवमे समबेत स्‍वर माए-वहीनि‍क गीत-नाद सेहो चलबे करैत अछि‍। जहि‍ना पाँच बर्खक बच्‍चा स्‍कूलमे नाअों लि‍खा दोसर-तेर बच्‍चा संग पढ़ैत तहि‍ना शंभूओ समाजमे कतौ ढोलक-झालि‍ वा ढोल-पीपहीक अवाज सुनि‍ते ठोकले ओइ जगहपर पहुँच, बेद पाठी जकाँ आँखि‍-कान समेट ताधरि‍ देखैत-सुनैत रहैत जाधरि‍ वि‍ज्ञाम करैले नै बन्न होइत। शंभूक क्रि‍या-कलापसँ दुनू परानी संतोखीदास सेहो नि‍चेन भऽ अपन काज करैत रहैत। काजमे मस्‍त रहैत। कि‍एक तँ दुनू परानी बुझि‍ गेलाह जे जतए ढोल-पीपही बजैत हएत शंभू ओतए जरूर हएत। तँए जखन खेत-पथारसँ काज कए घुमैत तँ ठोकले ओइ स्‍थानपर पहुँच शंभूकेँ ताकि‍ अनैत।
समाजो तँ ओहन बाट बना चलैत जइसँ हँसैत-खि‍लैत जि‍नगी बि‍नु थकनहि‍ सदैत चलैत रहैत। कोना नै चलत? धार ककर आशा-बाटक प्रति‍क्षा करैत। जहि‍ना अपना गति‍ये दि‍न-राति‍ चलैत रहैत तहि‍ना ने समाजो अपना गति‍ये सदैत चलैत रहैत।
आओर आगाँ


शेष अगि‍ला अंकमे......।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल

नाटक
झमेलि‍या बि‍याह
पहि‍ल दृश्‍य


              (भागेसर, सुशीला)
              (रोग सज्‍जापर सुशीला। दवाइ आ पानि‍ नेने भागेसरक प्रवेश।)

भागेसर-         केहेन मन लगैए?

सुशीला-         की कहब। जखन ओछाइनेपर पड़ल छी, तखन भगवानेक हाथ छन्‍हि‍। राजा-दैवक कोन ठेकान?

भागेसर-         से की?

सुशीला-         उठि‍ कऽ ठाढ़ो भऽ सकै छी, सुतलो रहि‍ सकै छी।

भागेसर-         एना कि‍अए बजै छी। कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै नि‍काली। दुरभखो वि‍षाइ छै।

सुशीला-         (ठहाका दऽ) बताह छी, अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा कि‍अए ने पड़ै छै? सभ मन पति‍अबैक छी।

भागेसर-         अच्‍छा पहि‍ने गोटी खा लि‍अ।

सुशीला-         एते दि‍नसँ दवाइ करै छी कहाँ एकोरत्ती मन नीक होइए?

भागेसर-         बदलि‍ कऽ डाॅक्‍टर सहाएब गोटी देलनि‍। हुनका बुझबेमे फेर भऽ गेल छलनि‍। सभ बात बुझा कऽ कहलनि‍।

              (गोटी खा पानि‍ पीब पुन: सि‍रहौनीपर माथ रखि‍।)

सुशीला-         की सभ बुझा कऽ कहलनि‍?

भागेसर-         कहलनि‍ जे एक्के लक्षण-कर्मक कते रंगक बेमारी होइए। बुझैमे दुवि‍धा भऽ गेल। तँए आइसँ दोसर बेमारीक दवाइ दइ छी।

सुशीला-         (दर्दक आगमन होइत पँजरा पकड़ि‍।) ओह, नै बाँचब। पेट बड़ दुखाइए।

भागेसर-         हाथ घुसकाउ ससारि‍ दइ छी।

              (सुशीला हाथ घुसकबैत। भागेसर पेट ससारए लगैत कनी कालक पछाति‍।)

सुशीला-         हँ, हँ। कनी कऽ मन असान भेल।

भागेसर-         मनसँ सोग-पीड़ा हटाउ। रोगकेँ दवाइ छोड़ाओत। भरि‍सक दवाइ आ रोगक भि‍ड़ानी भेलै तँए दर्द उपकल।

सुशीला-         भऽ सकैए। कि‍अए तँ देखै छि‍ऐ जे भुखल पेटमे छुछे पानि‍ पीलासँ पेट ढकर-ढकर करए लगैए। भरि‍सक सएह होइए।

भागेसर-         भगवानक दया हेतनि‍ तँ सभ ठीक भऽ जाएत।

सुशीला-         कि‍अए भगवानो लोके जकाँ वि‍चारि‍ कऽ काज करै छथि‍न।

भागेसर-         अखैन तक एतबो नै बुझै छि‍ऐ।

सुशीला-         हमरा मनमे सदि‍खन चि‍न्‍ते कि‍अए बैसल रहैए। खुशीकेँ कतए नुका कऽ राखि‍ देने छथि‍। आ कि‍.....?

भागेसर-         कि‍ आ कि‍?

सुशीला-         नै सएह कहलौं। कि‍यो ठहाका मारि‍ हँसैए आ हमरा सबहक हँसि‍ये हराएल अछि‍।

भागेसर-         हराएल ककरो ने अछि‍। माइटि‍क तरमे तोपा गेल अछि‍।

सुशीला-         ओ नि‍कलत केना?

भागेसर-         खुनि‍ कऽ।

सुशीला-         कथीसँ खुनबै?

भागेसर-         से जे बुझि‍तौं तँ एहि‍ना थाल-पाि‍नमे जि‍नगी बीतैत।

सुशीला-         जखन अहाँ एतबो नै बुझै छि‍ऐ तँ पुरूख कोन सपेतक भेलौं। अच्‍छा ऐले मनमे दुख नै करू। नीक-अधलाक बात-वि‍चार दुनू परानी नै करब तँ आनक आशासँ काज चलत।

भागेसर-         (मूड़ी डोलबैत जना महसूस करैत, मुँह चि‍कुरि‍अबैत।) कहलौं तँ ओहन बात जे आइ धरि‍ हराएल छलै मुदा ई बुझब केना?

              (भागेसरक मुँहसँ बतीसो दाँत सोझ आएल, जइसँ पत्नी हँसी बुझि‍।)

सुशीला-         अहाँक खुशी देख अपनो मन खुशि‍या गेल।

भागेसर-         मन कहाँ खुशि‍आएल अछि‍।

सुशीला-         तखन?

भागेसर-         बतीसयासँ सठि‍या गेल अछि‍। वएह कलपि‍-कलपि‍, कुहरि‍-कुहरि‍ कुकुआ रहल अि‍छ।

सुशीला-         छोड़ू ऐ लट्टम-पट्टाकेँ। जेकरा पलखैत छै ओ करैत रहह। अपन दुख-सुखक गप करू।

भागेसर-         कना दुख-सुखक गप अखैन करब। मन जड़ाएल अछि‍ हुअए ने हुअए.......?

सुशीला-         की?

भागेसर-         जड़ाएले मनक ताउसँ बौराइ छै। पहि‍ने देहक रोग भगाउ तखैन नि‍चेनसँ वि‍चार करब।

सुशीला-         बेस कहलौं। भि‍नसरेसँ झमेलि‍याकेँ नै देखलि‍ऐ हेन?

भागेसर-         बाल-बोध छै कतौ खेलाइत हेतै। भुख लगतै अपने ने दौड़ल आओत।

सुशीला-         ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। तहूमे बेमारी ओछाइन धरौने अछि‍। जीता जि‍नगी पुतोहू देखा दि‍अए?

भागेसर-         मन तँ अपनो तीन सालसँ होइए जे बेटा-बेटी करजासँ उरीन रहब तखन जे मरि‍यो जाएब तँ करजासँ उरीन मनकेँ मुक्‍ति‍ हएत।

सुशीला-         सएह मनमे उपकल जे बेटीक बि‍याह कइये नेने छी। जँ परानो छुटि‍ जाएत तँ बि‍नु बरो-बरि‍यातीक लहछू करा अंगबला अंग लगा लेत। मुदा.....?

भागेसर-         मुदा की?

सुशीला-         यएह जे झमेलि‍योक बि‍याह कइये लि‍अ।

भागेसर-         अखन तँ लगनो-पाती नहि‍ये अछि‍। समए अबै छै तँ बुझल जेतै।

              (झमेलि‍याक प्रवेश।)

झमेलि‍या-         माए, माए मन नीक भेलौं कि‍ने?

सुशीला-         बौआ, लाखो रोग मनसँ मेटा जाइए, जखने तोरा देखै ि‍छयह। भि‍नसरेसँ नै देखलि‍अ कतए गेल छेलहहेँ?

झमेलि‍या-         इसकूलक फीलपर एकटा गुनी आएल छलै। बहुत रास कीदैन-कहाँ सभ झारामे रखने छलै। डमरूओ बजबै छलै आ गाबि‍-गाबि‍ कहबो करै छलै।

सुशीला-         कि‍ गबै छलै?

झमेलि‍या-         लाख दुखक एक दवाइ। पाँचे रूपैया दामो छलै।

सुशीला-         एकटा नेने कि‍अए ने एहल?

झमेलि‍या-         हमरा पाइ छलए?

सुशीला-         केमहर गेलै?

झमेलि‍या-         मारन बाध दि‍सक रस्‍ता पकड़ि‍ चलि‍ गेल।

सुशीला-         बौआक बि‍याह करा दि‍यौ?

              (वि‍याहक नाआंे सुनि‍ झमेलि‍याक मुँहसँ खुशी नि‍कलैत।)

भागेसर-         वि‍याहैओ जोकर तँ भइये गेल अछि‍। कहुना-कहुना तँ बारहम बर्ख पार कऽ गेल हएत?

सुशीला-         पैछला भुमकमकेँ कते दि‍न भेल हएत। ओही बेर ने जनमल?

भागेसर-         सेहो कि‍ नीक जकाँ साल जोड़ल अछि‍। मुदा अपना झमेलि‍यासँ छोट-छोट सभकेँ बि‍याह भेलै तँ झमेलि‍यो भेइये गेल कि‍ने?

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दोसर दृश्‍य

              (सुरूज डूबैक समए। बाढ़नि‍ लऽ झमेलि‍या आंगन बाहरए लगैत। सुशीला आबि‍ बाढ़नि‍ छि‍नैत।)

सुशीला-         जाबे जीबै छी ताबे तोरा केना आंगन-घर बहारए दि‍औ।

झमेलि‍या-         कि‍अए, ककरो अनकर छि‍ऐ? अपन घर-आंगन बहारब कोनो पाप छी।

सुशीला-         धरम आ पाप नै बुझै छी। मुदा एते तँ जरूर बुझै छी जे भगवानेक बाँटल काज छि‍यनि‍ ने। पुरूख आ स्‍त्रीगणक काज फुट-फुट अछि‍।

झमेलि‍या-         राजा-दैवक काज ऐसँ फुट अछि‍। सभ दि‍न कहाँ बहारए अबै छलौं। अखन तू दुखि‍त छेँ, जखन नीक भऽ जेमे तखन ने तोहर काज हेतौ।

सुशीला-         सएह बुझै छि‍ही, ई नै बुझै छि‍ही जे काजे पुरूख-सत्रीगणक अन्‍तर कऽ ठाढ़ रखने अछि‍। भलहि‍ं बेटा छि‍ऐ एहेन-एहेन बेरमे तू नै देखमे तँ दोसर केकर आशा। मुदा.......?

झमेलि‍या-         मुदा की?

सुशीला-         यएह जे माए-बाप बेटा-बेटीक पहि‍ल गुरू होइ छै। हि‍नके सि‍खैलासँ बेटा-बेटी अपन जि‍नगीक रास्‍ता धड़ैए।

              (माइयक आगू झमेलि‍या ओहि‍ना देखैत अछि‍ जहि‍ना रोगसँ ग्रसि‍त माए अपन दूधमुँह बच्‍चा देख हुकड़ैत अछि‍। तहि‍ना हाथक बाढ़नि‍ नि‍च्‍चा मुँहे केने सुशीला झमेलि‍याक चेहरापर रखि‍ जना पढ़ि‍ रहल हुअए कि‍ ऐ कुल-खनदान आ परि‍वारक संग माइयो बापक तँ यएह माइटि‍क काँच दि‍आरी छी जे अबैत दोसर दि‍आरीकेँ लेसि‍ टि‍मटि‍माइत रहत। तइकाल भागेसर आ यशोधरक प्रवेश।)

भागेसर-         (झमेलि‍यासँ) बौआ साँझ पड़ल जाइ छै, दुआर-दरवज्‍जाक काज देखहक।

झमेलि‍या-         दरबज्‍जा बहारि‍ आंगन बहारए एलौं कि‍ माए बाढ़नि‍ छीन लेलक।

              (बि‍ना कि‍छु बजनहि‍ भागेसर नीक-अधला वि‍चार करए लगल।)
              (कनीकाल बाद।)

भागेसर-         (पत्नीसँ) मन केहेन अछि‍?

सुशीला-         अहूँ बुझि‍ते छी आ अपनो बुझि‍ते छी जे साल भरि‍ दवाइ खाइले डॉक्‍टर सहाएब कहलनि‍ से नि‍महत। जइठीन मथटनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि‍ पथ-पानि‍क संग दवाइ खाएब......?

              (बहीनक बात सुनि‍ यशोधरकेँ देह घमा गेल। चाइनि‍क पसीना पोछैत।)

यशोधर-         बहीन, भगवानो आ कानूनो ऐ परि‍वार जबाबदेह बनौने छथि‍। जाबे जीबै छी ताबे एहेन बात कि‍अए बजै छह?

सुशीला-         भैया, अहाँ कि‍अए.....? खाइर छोड़ू काजक की भेल?

यशोधर-         बहीन, मने-मन हँसि‍यो लगैए आ मनो कचोटैए। मुदा.......?

सुशीला-         मुदा की?

यशोधर-         (मुस्‍की दैत) पनरह दि‍नमे पएरक तरबा खि‍आ गेल मुदा काजक गोरा नै बैसल। एकटा लड़कीक भाँज नवानीमे लागल। गेलौं। दरबज्‍जापर पहुँच घरवारी अवाज दैते आंगनसँ नि‍कललाह।

              (बि‍चहि‍मे भागेसर मुस्‍की देलनि‍।)

सुशीला-         कथो-कुटुमैतीकेँ हँसि‍येमे उड़ा दइ छऐ?

यशोधर-         हँसीबला काजे भेल। तँए हँसी लगलनि‍।

सुशीला-         की हँसीबला काज भेल?

यशोधर-         दरबज्‍जापर बैस गप चलेलौं कि‍ जहि‍ना हवाक सि‍हकीमे पाकल आम झड़भड़ा जाइत तहि‍ना स्‍त्रीगण सभ आबए लगलीह।

सुशीला-         स्‍त्रीगणे अबए लगली आ पुरूख नै?

यशोधर-         स्‍त्रीगण बेसी पुरूख कम। एकटा स्‍त्रीगण बि‍चहि‍मे टभकि‍ गेलीह।

सुशीला-         की टपकली?

यशोधर-         (मुस्‍की दैत) हँसि‍यो लगैए आ छगुन्‍तो लगैए। बजली जे बर पेदार अछि‍ कि‍ जे आनठाम कन्‍यागत जाइत छथि‍ आ अहाँ......? सुनि‍ते मनमे नेसि‍ देलक। उठि‍ कऽ वि‍दा भऽ गेलौं।

सुशीला-         स्‍त्रीगणेक बात सुनि‍ अगुता गेलौं। परि‍वारमे बेटा-बेटीक बि‍याह पैघ काज छऐ पैघ काजक रास्‍तामे छोट-छोट हुच्‍ची-फुच्‍चीपर नजरि‍ नै देबाक चाहि‍ऐ।

यशोधर-         एतबे टा नै ने, गामो नीक नै बुझि‍ पड़ल। आमक गाछीसँ बेसी तरबोनी खजुर बोनी। एहेन गामक स्‍त्रीगण तँ भरि‍ दि‍न नहाइये आ झुटकासँ पएरे-मजैमे बीता देत। तखन घर-आश्रमक काज केना हएत। सोझे उठि‍ कऽ रास्‍ता धेलौं।

सुशीला-         आगू कतए गेलौं?

यशोधर-         ननौर। गाम तँ नीक बुझाएल। मुदा राजस्‍थाने जकाँ पानि‍क दशा। खाइर कोनो कि‍ बेटीक बि‍याह करब। बेटाक करब। बैसि‍ते गप-सप्‍प चलल। घरवारी कुल-गोत्र पुछलनि‍। कहलि‍यनि‍। सोझे सुहरदे मुँहे कहलनि‍, कुटुमैती नै हएत। ‍

सुशीला-         कि‍अए, से नै पुछलि‍यनि‍?

यशोधर-         कि‍ पुछि‍ति‍यनि‍। उठि‍ कऽ वि‍दा भेलौं।

सुशीला-         भैया, दि‍न-दुनि‍याँ एहने अछि‍। कते दि‍न छी आ कि‍ नै छी। मन लगले रहि‍ जाएत।

यशोधर-         कोनो कि‍ बेटीक अकाल पड़ि‍ गेल जे भागि‍नक बि‍याह नै हएत।

सुशीला-         डाॅक्‍टर सहाएब ऐठाम कते गोटे पेटक बच्‍चा जँचबए आएल रहए।

यशोधर-         ओ सभ वि‍याहक दुआरे खुरछाँही कटैए। मुदा.....?

सुशीला-         मुदा की?

यशोधर-         माइयो-बापक सराध छोड़ि‍ देत। वि‍याहसँ कि‍ हल्‍लुक काज सराधक छै।

सुशीला-         ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना मत्‍थापर दइ छै। ई तँ बुझै छी जे, जे 'गाए मारि‍ कऽ जूत्ता दान' कहलो जाइ छै। मुदा बुझनहि‍ कि‍ हएत। आगूओ बढ़लौं?

यशोधर-         छोड़ि‍ केना देब। तेसर ठाम गेलौं तँ पुछलनि‍ जे लड़का गोर अछि‍ कि‍ कारी?

सुशीला-         कि‍अए एहेन बात पुछलनि‍?

यशोधर-         लोकक माथमे भुस्‍सा भरि‍ गेल छै। एतबो बुझैले तैयार नै जे मनुक्‍खक मनुखता गुणमे छि‍पल छै नै कि‍ रंगमे।

सुशीला-         (नि‍राश मने) कि‍ झमेलि‍या ओहि‍ना रहि‍ जाएत। सृष्‍टि‍ ठमकि‍ जाएत?

यशोधर-         अखन लगन जोड़ नै केलकै हेन, तँए। जहि‍ना संयोग आबि‍ जेतै तहि‍या सभ ओहि‍ना मुँह तकैत रहत आ बि‍याह भऽ जेतै।

यशोधर-         बहीन, ऐ लेल मनमे दुख करैक काज नै । जखन काजमे भीड़ गेलौं तँ कइये कऽ अंत करब। ओना एकटा लगलगाउ बुझि‍ पड़ल।

सुशीला-         की लगलगाउ?

यशोधर-         ओ कहलनि‍ जे अहूठामक परि‍वार, परि‍वारक काज देख लि‍यौ आ ओहूठामक देख कऽ, काज सम्‍हारि‍ लेब।

भागेसर-         ई काज हेबे करत। अपनो ब्रह्म कहैए जे एक रंगाह परि‍वार (एक व्‍यवसायसँ जुड़ल)मे कुटुमैती भेने परि‍वारमे हड़हड़-खटखट कम हएत?

सुशीला-         (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। मुदा वि‍धताक चूक भेलनि‍ जे मनुक्‍खोकेँ सींघ नाङ कि‍अए ने देलखि‍न।

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तेसर दृश्‍य

              (राजदेवक घर। पोता श्‍यामकेँ पढ़बैत।)

राजदेव-         बौआ, स्‍कूलमे कते शि‍क्षक छथि‍?

श्‍याम-           थर्टिन गोरे।

राजदेव-         ऐ बेर कोनमे जाएब?

श्‍याम-           थ्रीमे।

              (हाथमे अखवार नेने कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश।)

कृष्‍णानन्‍द-        कक्का, एकटा दुखद समाचार अपनो समाजक अछि‍?

राजदेव-         (जि‍ज्ञासासँ) से कि‍, से कि‍?

कृष्‍णानन्‍द-        (अखवार उनटबैत। आंगुरसँ देखबैत।) देखि‍यौ। चि‍न्है छि‍ऐ एकरा?

राजदेव-         (दुनू आँखि‍ तरहत्‍थीसँ पोछि‍ गौरसँ देखए लगैत।) ई तँ चि‍न्‍हरबे जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कनी गौरसँ देखए दाए हाथमे तानल बन्‍दूक जकाँ बुझि‍ पड़ैए।

कृष्‍णानन्‍द-        हँ, हँ कक्का, पुरानो आँखि‍ अछि‍ तैयो चि‍न्हि‍ गेलि‍ऐ।

राजदेव-         कनी आरो नीक जकाँ देखए जाए। गामक तँ एक्के गोरे सीमा चौकीपर रहैए। ब्रह्मदेव।

कृष्‍णानन्‍द-        (दुनू आँखि‍क नोर पोछैत।) हँ, हँ कक्का। हुनके छातीमे गोली लगलनि‍। मुँह देखै छि‍ऐ खुजल। देश भक्‍ति‍क नारा लगा रहलाहेँ।

राजदेव-         (ति‍लमि‍लाइत।) बौआ, तोरे संगे ने पढ़ै छेलह।

कृष्‍णानन्‍द-        संगि‍ये छेलाह। अपना क्‍लासमे सभ दि‍न फस्‍ट करै छलाह। हाइये स्‍कूलसँ मनमे रोपि‍ नेने छेलाह जे देश भक्‍त बनब। से नि‍माहि‍यो लेलनि‍।

राजदेव-         बौआ, देश भक्‍तक अर्थ संकीर्ण दायरामे नै वि‍स्‍तृत दयरामे छै। ओना अपन-अपन पसन आ अपन-अपन वि‍चार सभकेँ छै।

कृष्‍णानन्‍द-        कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ?

राजदेव-         देखहक, खेतमे पसीना चुबबैत खेति‍हर, सड़कपर पत्‍थर फोड़ैत बोनि‍हार, धारमे नाओ खेबैत खेबनि‍हार सभ देश सेवा करैत अछि‍, तँए देशभक्‍त भेलाह।

कृष्‍णानन्‍द-        (नमहर साँस छोड़ैत।) अखन धरि‍ से नै बुझै छलि‍ऐ।

राजदेव-         नहि‍यो बुझैक कारण अछि‍। ओना देश सीमाक रक्षा बाहरी दुश्मनक (आन देशक) रक्षाक लेल होइत अछि‍। मुदा जँ मनुष्‍यमे एक-दोसराक संग प्रेम जगत तँ ओहुना रक्‍छा भऽ सकैए। मुदा से नै अछि‍।

कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हँ से तँ नहि‍ये अछि‍।

राजदेव-         मुदा देशक भीतरो कम दुश्‍मण नै अछि‍। एहेन-एहेन रूप बना मासूम जनताक संग कम गद्दारी केनि‍हारोक कमी नै अछि‍।

कृष्‍णानन्‍द-        से केना?

राजदेव-         देखते छहक जे जइ देशमे खाइ बेतरे लोक मरैए, घर दवाइ, पढ़ै-लि‍खैक तँ बात छोड़ह। तइ देशमे ढोल पीटनि‍हार देश सेवक सभ अपन सम्‍पत्ति‍ चोरा-चोरा आन देशमे रखने अछि‍ ओकरा कि‍ बुझै छहक?

कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ ठीके कहै छी।

राजदेव-         केहेन नाटक ठाढ़ केने अछि‍ से देखै छहक। आजुक समैमे सभसँ पैघ आ सभसँ भयंकर प्रश्न देशक सोझा ई अछि‍ जे सभकेँ जीबै आ आगू बढ़ैक समान अवसर भेटै।

कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ जरूरि‍ये अछि‍।

राजदेव-         एक्के दि‍स एहेन बात नै ने अछि‍?

कृष्‍णानन्‍द-        तब?

राजदेव-         समाजोमे अछि‍। कनी गौर कऽ कऽ देखहक। पैछले बर्ख ने ब्रहमदेवक बि‍याह भेल छलै?

कृष्‍णानन्‍द-        एक्कोटा सन्‍तान तँ नै भेलैक अछि‍।

कृष्‍णानन्‍द-        नै। हमरा बुझने तँ भरि‍सक दुनू परानीक भेँटो-घाँट तेना भऽ कऽ नै भेल हेतै। कि‍अए तँ गाम अबि‍ते खबड़ि‍ भेलै जे सीमापर उपद्रव बढ़ि‍ गेल, तँए सबहक छुट्टी केन्‍सि‍ल भऽ गेल। बेचारा बि‍याहक भोरे बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍ दौड़ल।

राजदेव-         अखन तँ नव-धब घटना छै तँए जहाँ-तहाँ वाह-वाही हेतै। मुदा प्रश्न वाह-वाहीक नै प्रश्न जि‍नगीक अछि‍। बेटाक सोग माए-बापक आ पति‍क दुख स्‍त्रीकेँ नै हेतै?

कृष्‍णानन्‍द-        हेबे करतै।

राजदेव-         एना कि‍अए कहै छह जे हेबे करतै। जहि‍ना एक दि‍स मनुष्‍य कल्‍याणक धरम हेतै तहि‍ना दोसर दि‍स माए-बाप अछैत बेटा मृत्‍युक दोष, समाज सेहो देतनि‍।

कृष्‍णानन्‍द-        (गुम होइत मूड़ी डोलबए लगैत।)

राजदेव-         चुप भेने नै हेतह। समस्‍याकेँ बुझए पड़तह। जे समाजमे केना समस्‍या ठाढ़ कएल जाइए। तोंही कहह जे ओइ दूध-मुँहाँ बच्‍चि‍याक कोन दोख भेलै।

कृष्‍णानन्‍द-        से तँ कोनो नै भेलै।

राजदेव-         समाज ओकरा कोन नजरि‍ये देखत?

कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत।) हूँ-अ-अ।

राजदेव-         हुँहकारी भरने नै हेतह। भारी बखेरा समाज ठाढ़ केने अछि‍। ओइ, बच्‍चि‍याक भवि‍ष्‍य देखनि‍हार कि‍यो नै अछि‍, मुदा......?

कृष्‍णानन्‍द-        मुदा की?

राजदेव-         यएह जे, एक दि‍स कलंकक मोटरीसँ लादि‍ देत तँ दोसर दि‍स जीनाइ कठि‍न कऽ देत।

कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ करबे करत।

राजदेव-         तोही कहह, एहेन समाजमे लोकक इज्‍जत-आवरू केना बचत?

कृष्‍णानन्‍द-        (मूड़ी डोलबैत। नमहर साँस छोड़ि‍।) समस्‍या तँ भारी अछि‍।

राजदेव-         नै, कोनो भारी नै अछि‍। सामाजि‍क ढर्ड़ाकेँ बदलए पड़त। वि‍घटनकारी सोच आ काजकेँ रोकि‍ कल्‍याणकारी सोच आ काज करए पड़त। तखने हँसैत-खेलैत जि‍नगी आ मातृभूमि‍केँ देखत।

कृष्‍णानन्‍द-        (मुस्‍की दैत।) संभव अछि‍।

राजदेव-         ई काज केकर छि‍ऐ?

कृष्‍णानन्‍द-        हँ, से तँ अपने सबहक छी।

राजदेव-         हँ। ऐ दि‍शामे एक-एक आदमीकेँ डेग बढ़बैक जरूरत अछि‍।


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चारि‍म दृश्‍य

              (भागेसर दरबज्‍जा सजबैत। बहाड़ि‍-सोहाड़ि‍ चारि‍टा कुरसी लगबैत। कुरसी सजा भागेसर चारूकात नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ गौर करैत। तहीकाल बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍यामक प्रवेश।)

भागेसर-         (कुरसीपर सँ उठि‍।) आउ, आउ।

              (कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।)

बालगोवि‍न्‍द-       (राधेश्‍यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छि‍अ। अखन समए अछि‍ तँए......?

भागेसर-         अपने दुनू बापूत गप-सप्‍प करू।

              (उठि‍ कऽ भीतर जाइत।)

राधेश्‍याम-        अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छि‍ऐ, ताबे हम.....।

भागेसर-         नै, नै। परि‍वारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक बि‍याह होउ आकि‍ बेटी-बहीनक होउ।

राधेश्‍याम-        हँ, से तँ होइते अछि‍। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि‍ ओते थोड़े अछि‍। तखन तँ बहीन छी, परि‍वारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परि‍वारेक होइत अछि‍।

बालगोवि‍न्‍द-       जाधरि‍ अंजल नै केलौंहेँ ताधरि‍ दरबज्‍जा खुजल अछि‍। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......?

राधेश्‍याम-        हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि‍। गामक की बेबहार अछि‍ से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......?

बालगोवि‍न्‍द-       मुदा तैयो कि‍?

राधेश्‍याम-        ओना तँ बहुत मि‍लानीक प्रश्न अछि‍ मुदा कि‍छु एहेन अछि‍ जेकर हएब आवश्यक अछि‍?

बालगोवि‍न्‍द-       आब कि‍ तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि‍ जे अल्‍पसंख्‍यक नै छी।

राधेश्‍याम-        कि‍ अल्‍पसंख्‍यक?

बालगोवि‍न्‍द-       जइ जाति‍क संख्‍या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बि‍हंगरा ठाढ़ होइत अछि‍। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि‍ कहलहक?

राधेश्‍याम-        कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मि‍लानी अवस होइ। पहि‍ल गामक दोसर परि‍वारक आ तेसर लड़का-लड़कीक।

बालगोवि‍न्‍द-       जँ तीनूक नै होइ?

राधेश्‍याम-        तँ दुइयोक।

बालगोवि‍न्‍द-       अपन परि‍वारक बेबहार छह तेहने अहू परि‍वारक अछि‍। गामो एकरंगाहे बुझि‍ पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह।

राधेश्‍याम-        तखन कि‍अए काज रोकब?

              (जगमे पानि‍ आ गि‍लास नेने आबि‍, टेबुलपर गि‍लास रखि‍ पानि‍ आगू बढ़बैत। गि‍लास हाथमे रखि‍।)

बालगोवि‍न्‍द-       नीक होइत जे पहि‍ने काजक गप अगुआ लेतौं।

भागेसर-         अखन धरि‍ अहूँ पुरने वि‍ध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्‍जापर आबि‍ जँ पानि‍ नै पीब, ई केहन हएत?

बालगोवि‍न्‍द-       (पानि‍ पीबैत। तहीकाल झमेलि‍या चाह नेने अबैत।) पानि‍ पि‍आ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत।

बालगोवि‍न्‍द-       समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्‍जति‍ नै रहैए। बसीसँ बेसी चारि‍-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए।

भागेसर-         हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बि‍हाड़ि‍मे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि‍ कऽ कतएसँ कतए चलि‍ जाएब, तेकर ठेकान रहत।

बालगोवि‍न्‍द-       पैछला लगनक एकटा घटना कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छलनि‍ मुदा पढ़ि‍-लि‍ख परि‍वार एते उन्नति‍ केने अछि‍ जे इलाकामे कि‍यो कहबै छथि‍।

भागेसर-         वाह।

बालगोवि‍न्‍द-       लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक ि‍बयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते माि‍र-दंगा भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि‍।

भागेसर-         मारि‍ कि‍अए भेल?

बालगोवि‍न्‍द-       पुछलि‍यनि‍ ते कहलनि‍ जे बि‍याह-दानमे कोनो रसे नै रहि‍ गेल अछि‍। लड़काबला सदि‍खन लड़कीबलाकेँ नि‍च्‍चा देखबए चाहैत तँ सरि‍याती बरि‍यातीकेँ। अही बीचमे रंग-वि‍रंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि‍-पीट होइए।

भागेसर-         एहेन बरि‍यातीमे जाएबो कठि‍न।

बालगोवि‍न्‍द-       सज्‍जन लोक सभ छोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैयो कि‍ बरि‍याती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फि‍रैए।

भागेसर-         खाइर, छोड़ू दुनि‍याँ-जहानक बात। अपन गप करू।

बालगोवि‍न्‍द-       हमरेसँ पुछै छी। कन्‍यागत तँ सदति‍ चाहै छथि‍ जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि‍ जाए। अपने लड़काबला छि‍ऐ। कोना दुनू परि‍वारक कल्‍याण हएत, से तँ......?

भागेसर-         दुनि‍याँ केम्‍हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ कि‍छु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि‍ के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत।

बालगोवि‍न्‍द-       कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि‍ छै से मानता दुनू परि‍वार मि‍ल-जुलि‍ काज ससारि‍ लेब। मुदा नढ़ि‍या जकाँ जे भूकत तेकर कि‍ करबै?

भागेसर-         हँ से तँ ठीके पैछलो नीक चलनि‍ आ अखुनको नीक चलनि‍ अपना कऽ अधला छोड़ देब। कि‍अए कि‍यो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत।


क्रमश:



कथा

बि‍हरन
(पूर्वांश)


जहि‍ना चैत-बैशाखक लहकैत धरती गरमाएल वायुमंडलक बीच अनायास हवा कऽ खसने बि‍हाड़ि‍क प्रति‍क्षा कएल जाइत, अनायास सुर्ज मेघक छोट-छीन चद्दरि‍ ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ी सदृश्‍य अवाज दौड़ए लगैत, रहि‍-रहि‍ कऽ गुलाबी वस्‍त्र सज्‍जि‍त ठनका ठुनकए लगैत तँए अनुमानि‍त मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे बि‍हाड़ि‍ पानि‍ पाथर ठनका संग आबि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना रघुनन्दन आ सुलक्षणीक परि‍वारमे ज्‍योति‍ कुमारीक जन्‍मसँ भेलनि‍।
भलहि‍ं आइ-काल्हि‍ बेटीक जन्‍म भेने माए-बाप अपन सुभाग्‍यकेँ दुरभाग मानि‍ मनकेँ कतबो कि‍अए ने कोसथि‍ जे परि‍वारमे बेटीक बाढ़ि‍ हि‍मालयसँ समुद्र दि‍स नि‍च्‍चा मुँहे ससरब छी मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणीकेँ नै भेलनि‍। जहि‍ना गद्दा पाबि‍ कुरसी गदगर होइत तहि‍ना दुनू प्राणी रघुनन्‍दनक मन गद-गद। से खाली परि‍वारे धरि‍ नै सर-समाज, कुटुम-परि‍वार धरि‍ छलनि‍। ओना आन संगी जकाँ रघुनन्‍दन नै छलाह जे तीनि‍ये मासक पेटक बच्‍चाकेँ दुश्‍मन बनि‍ मोछ पीजबैत आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगैत। दुनू परानी बेहद खुशी। कि‍अए नै खुशी रहथि‍, मन जे मधुमाछी सदृश्‍य मधुक संग मधुर मुस्‍कान दैत छलनि‍। पुरूष अपन वंश बढ़बै पाछु बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्‍हि‍ बौगली भरि‍ रौदमे ओंघरा देब कते उचि‍त छी। दुनू प्राणीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन ति‍रपि‍त भऽ तड़ैप-तड़ैप नचैत।
आेना तीन भाइक पछाति‍ ज्‍योति‍क जन्‍म भेल, मुदा तइसँ पहि‍ने आगमनो नै भेल छलनि‍ जे दोखि‍यो बनि‍तथि‍। भगवानोक कि‍रदानी कि‍ नीक छन्‍हि‍, नीको कोना रहतनि‍ काजक तते भार कपारपर रखने छथि‍ जे जखन टनकी धड़ै छन्‍हि‍ तखन खि‍सि‍या कऽ कि‍छुसँ कि‍छु कऽ दैत छथि‍। मुदा से लोक थोड़े मानतनि‍, मानबो कि‍अए करतनि‍ जखन अपने अपने हाथ-पएर लाड़ि‍-चाड़ि‍ जीबैए तखन अनेरे अनका दि‍स मुँहतक्कीक कोन जरूरत छै। कि‍अए ने कहतनि‍ जे अहाँ ि‍नर्माता छी तखन तराजू एक रंग राखू, कि‍अए ककरो जेरक-जेर बेटा दइ छि‍ऐ आ ककरो जेरक-जेर बेटी। जँ देबे करै छि‍ऐ ते बुद्धि‍ कि‍अए भंगठा दइ छि‍ऐ जे बेटासँ धन अबैत अछि‍ आ बेटीसँ जाइत अछि‍। जइसँ नीको घरमे चोंगराक जरूरत पड़ि‍ जाइ छै।
उच्‍च अफसरक परि‍वार तँए परि‍वारि‍क स्‍तर सेहो उच्‍च। भलहि‍ं कि‍अए ने माए-बाप छाँटि‍ परि‍वार होइन। खगल परि‍वार जकाँ सदति‍ गरजू नै। परि‍वारक खर्च समटल तइसँ खुल्‍ला बजारक कोनो असरि‍ नै। सरकारी दरपर सभ सुवि‍धा उपलब्‍ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलहि‍ं जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होइन। जइसँ महगी-सस्‍ती बुझैमे सेहो फेर भऽ गेल होइन। मुदा परोछक बात छी चारू बच्‍चाक प्रति‍ समान सि‍नेह रहलनि‍। परि‍वारमे सभसँ छोट बच्‍चा रहने सबहक मनोरंजनक वस्‍तु। मुदा गुरूआइ तँ ओहि‍ना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महि‍क्का मनक टेमीसँ सदति‍ देखैत, जप करैत। आखि‍र ऐ धरतीपर ज्ञान दानी नै होथि‍। भलहि‍ं ओ अधखि‍जुए वा अधपकुए कि‍यो ने होथि‍। जहि‍ना कोनो मालीक बच्‍चा पि‍ताक संग जामंतो (अनेको) रंगक फूलक फुलवारीमे जि‍नगीक अनेको अवस्‍था देख चौकैत तहि‍ना भरल-पूरल परि‍वारमे ज्‍योति‍योकेँ भेलनि‍। देखलनि‍ जे गुलाबक कलीमे जहि‍ना अबैत-अबैत रंगो, सौन्‍दर्यो आ महको अबैत अछि‍ तहि‍ना ने जि‍नगी छी। जँ मनुष्‍यकेँ डोरीसँ बान्‍हल जाय तँ डोरी तोड़ैक उपाए तँ हुनको छन्‍हि‍।
समुचि‍त वातावरण ज्‍योति‍ संगी-साथीक बीच नीकक श्रेणीमे आबि‍ गेलि‍। जहि‍ना संगीक सि‍नेह तहि‍ना शि‍क्षकोक सि‍नेह भेटए लगलनि‍। जहि‍ना टि‍कट कटाओल यात्री गाड़ीमे सफर करैत तहि‍ना समतल जि‍नगी पाबि‍ ज्‍योति‍ आगू बढ़ए लागलि‍। जि‍नगीमे बधो अबै छै तइसँ पूर्ण अनभि‍ज्ञ ज्‍योति‍। जना कर्म-धर्म बनि‍ जि‍नगीक बाट बनौने होय।

क्रमश:
 



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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...