Saturday, May 14, 2011

'विदेह' ८१ म अंक ०१ मइ २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८१) -PART III



जगदीश प्रसाद मण्‍डल
कथा

मायराम

अमावास्‍याक राति‍, बारहसँ उपर भऽ गेल मुदा एक नै बाजल। डंडी-तराजू माथसँ नि‍च्‍चा उतड़ि‍ गेल। सन-सन करैत अन्‍हार।नअ बजेमे नि‍न्न पड़ैवाली मायरामकेँ आँखि‍क नीन नि‍पत्ता। कछमछ करैत ओछाइनपर एक करसँ दोसर कर उनटैत-पुनटैत, अकछि‍ केबार खोलि‍ बाहर नि‍कलली तँ काजर घोराएल राति‍मे अपनो हाथ-पएर नै सुझन्‍हि‍। जहि‍ना करि‍छौंह दुनि‍याँ आँखि‍सँ नै देखथि‍ तहि‍ना दसो दुआरि‍ बन्न मन खलि‍आएल बुझि‍ पड़लनि‍। पुन: घुरि‍ कऽ ओछाइनपर आबि‍ आेंघरा गेलीह। दि‍न-राति‍क बोध-वहीन मन तड़पि‍ उठलनि‍- नैहर।


पहि‍ल सन्‍तान भेलोपरान्‍त सुदामा (मायराम) बाइसे बर्खमे वि‍धवा भऽ गेलीह। गत्र-गत्रसँ जुआनी, फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ, छि‍टकैत! ओना सरकारी रजि‍ष्टरमे जुआन भऽ गेल छलीह मुदा बत्तीसीक अंति‍म दना नै उगल रहनि‍। साँपक बीखसँ करि‍आएल देह देख अपनो मरनासन भऽ गेलीह। पथराएल आँखि‍ टक-टक टकैत मुदा अन्‍हारसँ अन्‍हराएल। बगलमे डेढ़ बर्खक बेटा उठैत-खसैत अंगना-घर घुमैत-फि‍ड़ैत। तइ बीच हहाएल-फुहाएल शंकरदेव (भाय) आँखि‍मे यमुनाक धार नेने पहुँचलाह। बहीन बहि‍नोइक रूप देख अपन आँखि‍क नोर पोछि‍ भागि‍नकेँ उठा छाती सटा, बहि‍न (सुदामा)केँ कहलखि‍न- बुच्‍ची होश करू। दुनि‍याँक यएह खेल छि‍ऐ। अहीं जकाँ नानि‍योकेँ भेल रहनि‍। मुदा आइ केहन भरल-पूरल्‍ा परि‍वार छन्‍हि‍। एक ने एक दि‍न, ओहि‍ना अहूँक परि‍वार दुनि‍याँक फुलवाड़ीमे फुलाएल।
शंकरदेवक बात सुनि‍ सुदामाक आँखि‍ खुजल मुदा बकार नै फुटलनि‍। मुदा नर-नारीक करेजो तँ दू धारक दू माइटि‍क सदृश्‍य होइत बहि‍नोइक जरबैक ओरि‍यानमे आंगनसँ नि‍कलि‍ शंकर समाजक दि‍स बढ़लाह।

पनरहम दि‍न बहि‍नकेँ संग नेने अपना गाम वि‍दा भेला। गामक सीमानपर अबि‍ते गाममे कन्नारोहट शुरू भेल। बच्‍चासँ बूढ़ि‍ धरि‍ सुदामाकेँ छाती लगबए आगू बढ़ल। बेचारी नि‍सहाय भेल पड़ल। जहि‍ना चांगरा परक घर खसैत, तहि‍ना। मुदा ताधरि‍ गामक धरोहि‍क अगि‍ला अंक पहुँच गेल। एक्के-दुइये ढेरो छाती सुदामाक छातीमे सटि‍, चारू दि‍ससँ पकड़ि‍ टोल दि‍स बढ़ल। सुदामाक मनमे उठलनि‍ जँ अपने कानब तँ समाजक कानब केना सुनबै। सं नै तँ समाजेक कानब सुनि‍ जे आगूक जि‍नगी केना जीब। बीच आंगनमे माय ओंघरनि‍या दैत आ दरबज्‍जापर पि‍ता भुइयेँ पेटअकान देने। अपन-अपन अथाह समुद्रमे सभ डूबल। के ककर नोर पोछत। पएर भतीजी धाेय गाराजोरी केने आंगन बढ़लि‍। दुरखापर पएर दैतै सुदामाक रूदनसँ नि‍कलल- हे मइया...।

जहि‍ना धड़सँ कटल अंग छटपटाइत तहि‍ना कामि‍नीक (माए) मन छटपटाइत-छटपटाइत मनमे प्रश्नपर प्रश्न उठए लगलनि‍। मुदा कोनो प्रश्नक सोझ रास्‍ता नै देख काँटक ओझरी जकाँ मन ओझराए लगलनि‍। एक ओझरी छोड़बथि‍ बीचेमे दोसर लगि‍ जाइन।
.....कि‍‍ आगूक जि‍नगीक लेल बेटीकेँ दोसर वि‍याह कऽ देब। फेर उनटि‍, जि‍नगीक लेल सहचर तँ आवश्यक अछि‍?
.....कि‍ सहचरक लेल पति‍ आवश्यक अछि‍? मुदा जते असानीसँ गुंथी खोलए चाहथि‍ ओते असानीसँ खुजबे ने करनि‍। तइ बीच दोसर प्रश्न अकुर जाइन। बेटीक संग नाति‍यो अछि‍। जँ बेटी दोसर घरकेँ अपन घर बनाओत तँ नाति‍क.....?
पुत्र हत्‍याक पाप ककर कपार चढ़त? कि‍ कुत्ता जकाँ पछि‍लग्‍गू एहेन सुकुमार फुलकेँ बना देब। अखन ओ दूधमुँह अछि‍, कि‍ बुझत? अपन भूमि‍ आ आनक भूमि‍क मरजादा एक्के रँग होइत। कि‍ दोसरो घरमे ओहने ममता माइक भेटतै? मनुक्‍खेक क्रि‍या-कलाप ने कुल-खनदानक जड़ि‍मे पानि‍ ढारैत अछि‍। घुरि‍याएल मनकेँ राह भेटलनि‍। सुफल नारी जि‍नगी तँ वएह ने छी जेकरा आँचरक लाल मातृत्‍व प्रदान करैत अछि‍। जइसँ वीणाक झंकृत मधुर स्‍वर हृदेकेँ कम्‍पि‍त करैत अछि‍। से तँ भेटि‍ये गेल छै। मुदा जहि‍ना ठनकैत आकाशसँ ठनका खसैत तहि‍ना मनमे खसलनि‍- मुदा समाज?
कि‍ मनुष्‍य-पोनगैक स्‍थि‍ति‍ समाजमे जीवि‍त अछि‍।

सुदामाक सम्‍पन्न पि‍तृ परि‍वार। अदौसँ श्रम-संस्‍कृति‍क बीच पुष्‍पि‍त-पल्‍लवि‍त परि‍वार। जइसँ रग-रगमे समाएल अपन संस्‍कृति‍। ओना सम्‍पन्नताक सीमा असीमि‍त अछि‍ मुदा अपन आँट-पेट देख अपन (परि‍वार) जि‍नगीक स्‍तर बना चलब सम्‍पन्नताक अनेको कारणमे एक प्रमुख छी। तँए सम्‍पन्न परि‍वार। ओना आर्थिक दृष्‍टि‍ये सुदामाक वि‍याह दब परि‍वारमे भेल छलनि‍ मुदा व्‍यवहारि‍क दृष्‍टि‍ये बराबरीमे छलनि‍। कम रहि‍तो गोरहा खेत छलनि‍ जइसँ खाइ-पीबैक कोताही नै। कि‍छु आगुओ बढ़ि‍ ससरैत। सालक तेरहम मासमे घरक कोठी-भरली झाड़ि‍ इजोरि‍या दुति‍यासँ भागवत कथाक संग हरि‍वंश कथा सुनि‍, भोज-भनडारा कऽ सामा-चकेवा जकाँ आगू दि‍स बढ़ैत।

बेटाक पालन आ धरमक काज देख अपनो गाम आ चौबगलि‍यो गामक लोक सुदामक नाओं मायराम रखि‍ देलकनि‍। बच्‍चासँ बूढ़ धरि‍ माइयेराम कहए लगलनि‍।

सुदामाक पि‍ता रवि‍शंकर परि‍वारमे चुल्हि‍ नै पजड़ल। जखन सुदामा आइलि‍ तखन जे कन्नारोहट शुरू भेल, से भरि‍ दि‍न होइते रहि‍ गेल। कखनो बेसी तँ कखनो कम। चुल्हि‍ नै पजड़ने टोल-पड़ोसक परि‍वारसँ थारी-थारी भात-दालि‍ एते आएल जे राति‍ धरि‍ चलैत रहल।

सायंकाल रवि‍शंकर, आंगन ओसरपर बैस, सुदामाक भावी जि‍नगीक लेल पत्नि‍यो आ बेटो-पुतोहूकेँ बैसाए वि‍चार करए लगलाह। वि‍चारोत्तर ि‍नर्णए भेल जे काल्हि‍ये शंकरदेव ओइठाम-सुदामाक सासुर- जा खेती-गि‍रहस्‍ती ताधरि‍ सम्‍हारथि‍ जाधरि‍ बच्‍चा-सुदामाक बेटा जुआन नै भऽ जाए। संग-इहो भेल जे छह मास सुदामा सासुर आ छह मास नैहरमे रहत।

अठारह बर्ख पुरि‍ते राहुलक वि‍याह भऽ गेल। नव परि‍वार बनि‍ ठाढ़ भेल। शंकरदेव अपना ऐठाम चलि‍ एलाह।

तीन साल बाद पि‍ता रवि‍शंकर आ पाँच साल बाद माए शंकरदेवक मरि‍ गेलनि‍। मुदा दुनूठामक परि‍वारमे कोनो कमी नै रहल। हवाइ-जहाज जकाँ तेज गति‍ये तँ नै मुदा असथि‍र सवारी-टायरगाड़ी जकाँ परि‍वार आगू मुँहे ससरए लगल।

मायरामक प्रति‍ समाजक नजरि‍या सेहो बदलल। समाजक आन वि‍धवा जकाँ नै। जे कि‍यो अशुभ बुझि‍ कनछी कटैत तँ कि‍यो पशुवत बेबहार लेल मरड़ाइत।

तीर्थस्‍थान जकाँ मायरामक परि‍वार बनि‍ गेलनि‍। साले-साल भागवत कथाक संग हरि‍वंश कथा आ भोज-भनडारा कऽ समाजकेँ खुआ सालक वि‍सर्जन मायराम करए लगलीह।

पाँच बर्ख पछाति‍ मायरामक भरल-पुरल नैहर-शंकरदेवक परि‍वार- कोशीक कटनि‍यासँ धार बनि‍ गेल। गामक बीचो-बीच सनमुख धार बहए लगल।
घटनो अजीव घटल। चारि‍ बजे करीब बाढ़ि‍क हल्‍ला गाममे भेल। कि‍रि‍ण डुबैत-डुबैत धारक कटनि‍या शुरू भेल। गामक सभ बाध नदि‍या गेल। उत्तरसँ दछि‍न मुँहे बहए लगल। बाढ़ि‍क बि‍कराल रूप देख गामक लोक माल-जाल, बक्‍सा-पेटीक संग ऊँचगर-ऊँचगर जमीनपर पहुँचल। नट-मघैया जकाँ नव बास बनि‍ गेल।

बाढ़िक गूंगूआहट सुनि‍-सुनि‍ सभ कि‍छु बि‍सरि‍ परान बचबैक बात सोचए लगल। चारू कात बाढ़ि‍ पसरल। जइसँ इहो डर होइत जे जँ कहीं अहूपर पानि‍ चढ़त तखन कि‍ हएत? अन्‍हरि‍या राति‍, हाथ-हाथ नै सुझैत। जीवन-मरनक मचकीपर सभ झुलए लगल। भूख-पि‍यास मेटा गेल। जहि‍ना दुखि‍त नव वि‍आएल गाए-महीस व्‍यथि‍त आँखि‍ये बच्‍चाकेँ देखैत रहैत अछि‍ तहि‍ना सभ माए-बापक आँखि‍ बाल-बच्‍चापर। मुदा मनुख तँ मनुख छी नहि‍ कि‍ जानवर। जेना जानवर हरि‍यर घास देख बच्‍चो आगूक लुझि‍ कऽ खा लैत अछि‍ तेना मनुक्‍खो करत? बाल-बच्‍चाक लेल तँ मनुक्‍ख अपन खूनकेँ पानि‍ बनबैत, अपन सुआदकेँ छोलनी धि‍पा दगैत, अपन मनोरथ बच्‍चामे देखैत अछि‍। अपन जि‍नगीकेँ बलि‍वेदीमे आहूत दैत अछि‍।

भोरहरबामे हल्‍ला भेल जे बीस नमरी पुल कटि‍ कऽ दहा गेल। पुलक समाचार सुनि‍ सबहक छाती डोलए लगल। पूव दि‍सक रास्‍ता बन्न भऽ गेल। कि‍छुए काल पछाति‍ पुन: हल्‍ला भेल जे बेटा संग रोगही पानि‍मे डूबि‍ गेल। कि‍छु काल धरि‍ तँ हल्‍लामे बाते नै फुटैत मुदा तोड़मारि‍ हल्‍लामे वि‍हि‍आि‍त-वि‍हि‍आति‍ समाचार वि‍हि‍आ गेल। भासि‍ कऽ कते दूर गेल हएत तेकर ठेकान नै तँए कि‍यो आगू बढ़ैक हूबे ने केलक। जहि‍ना एक टाँग टुटने गनगुआरि‍ नै नेङराइत तहि‍ना एक गोटे मुइने समाज थोड़े नेङराएत। सभ दि‍न होइत एलै आ होइत रहतै।
हल्‍ला शान्‍त होइते शंकरदेव पत्नीकेँ कहलखि‍न- आब जान नै बँचत।
पत्नी- एते अन्‍हारमे कतऽ जाएब। भने ऐठाम छी।
पति‍- जँ अहूपर बाढ़ि‍ चढ़ि‍ जाएत?
सभ तूर संगे कोसीमे डूबि‍ जाएब। कि‍यो बँचब तखन ने दुख हएत। जँ दुख केनि‍हारे नै रहब तँ दुख ककरा हएत।

पौरूकी घुटकल। आन-आन चि‍ड़ै सुतले रहए। पौरूकी आवाज सुनि‍ शंकरदेवक, दुभीक नव मूड़ी जकाँ, मनमे नव चेतना जगलनि‍। बजलाह- भि‍नसर होइमे देरी नै अछि‍। जँए एते काल तँए कनी काल आरो। दि‍न-देखार तँ असगरो लोक अमेरि‍या चलि‍ जाइए। अपना सभ तँ बाधक थोड़े रास्‍ता काटब।

कि‍रि‍ण उगैसँ पहि‍नहि‍ ऊँचकापर पानि‍ चढ़ए लगल। चढ़ैत पानि‍ देख हरवि‍रड़ो भेल। गाए-महीस, बक्‍सा-पेटी छोड़ि‍ सभ अपन जान बँचबए वि‍दा भेल। जहि‍ना बेरागी दुनि‍याँकेँ मायाजाल मानि‍, छोड़ि‍, आत्‍मचि‍न्‍तनमे लगि‍ जाइत तहि‍ना माल-असबाव छोड़ि‍ सभ वि‍दा भेल। तही बीच बाँसक झोंझमे मैनाक झौहरि‍ भेल। जना ककरो बनबि‍लाड़ पकड़ि‍ नेने होउ, तहि‍ना।

पूब दि‍स फीक्का गुलावी जकाँ अकासमे पसरए लगल। मुदा बि‍लटैत जि‍नगी आ डुबैत सम्‍पत्तिक‍ सोग अन्‍हारकेँ आरो बढ़बैत। सुखल जमीनपर पहुँचते छोट-छीन आशा शंकरदेवक मनमे जगलनि‍। मुदा चारू बच्‍चो आ पत्नि‍योक मनमे दुधाएल चाटल दानाक खखरी जकाँ। बेर-बेर शंका खेहारैत जे हो-न-हो फेर ने आगूएसँ बाढ़ि‍ चलि‍ आबए। मि‍रमि‍रा कऽ पत्नी शंकरदेवकेँ कहलनि‍- एते लोकक गाममे एक्कोटा संगी नै देख रहल छी।
सभ अपने जान बँचबै पाछु अछि‍ तखन के केकरा देखत।
जाबे लोक, भरल-पूरल रहैए ताबे दुनि‍याँ हरि‍यर बुझि‍ पड़ै छै। मुदा......।
हँ, से तँ होइते छै। मुदा......।
हँ इहो होइ छै। अखन माए जीबैए, कतऽ बौआएब। बच्‍चो सबहक मात्रि‍के भेल, अपनो नैहरे भेल आ अहूँक सासुरे।
पत्नीक बात सुनि‍ शंकरदेव गुम भऽ गेलाह। मनमे चुल्हि‍पर खौलैत पानि‍ जकाँ वि‍चार तर-उपर हुअ लगलनि‍। बजलाह- कहलौं तँ बड़बढ़ि‍याँ। मुदा सासुरसँ नीक बहीन ऐठाम हएत।
केना?
जइ दि‍न वेचारि‍क उपर वि‍पत्ति‍ आएल छलै तइ दि‍न यएह देह अपन घर-परि‍वार छोड़ि‍ ठाढ़ भेल छलै। आइ कि‍ हमरे गाम-घर मेटा रहल अछि‍ आकि‍ ओकरो नैहर।
अहाँकेँ जे वि‍चार हुअए।
वि‍चारे नै, वि‍पत्ति‍मे लोकक बुद्धि‍ हरा जाइ छै। जइसँ नीक-अधलाक वि‍चार नै कऽ पबैत अछि‍। मुदा अहीं कहूँ जे सासुरमे कान्‍हपर कोदारि‍ लऽ कऽ खेत-पथार जाएब से केहेन हएत। अपन जे दुरगति‍ हएत से तँ हेबे करत मुदा दुनू परि‍वारक-सासुर-नैहर- की गति‍ हएत।

बाढ़ि‍क समाचार इलाकामे पसरि‍ गेल। मायरामक कानमे सेहो पड़लनि‍। भाय-भौजाइक आशा-बाट तकैत मायराम बेटा राहुलकेँ संग केने आगू बढ़लीह। मुदा कि‍छु दूर बढ़लापर सोगसँ पथराएल पएर उठबे ने करनि‍। बाटक बगलक गाछक नि‍च्‍चा बैस बेटाकेँ कहलखि‍न- बौआ, पएर तँ उठबे ने करैए। केना आगू जाएब? तू आगू बढ़ि‍ कऽ देखहक।

छबो तूर शंकरदेव ऐ आशासँ झटकल अबैत जे जते जल्‍दी पहुँचब ओते जल्‍दी बच्‍चा सभकेँ अन्न-पानि‍सँ भेँट हेतै। रौतुको सभ भुखले अछि‍। तइ बीच राहुलक नजरि‍ मामपर आ मामक नजरि‍ भागि‍नपर पड़ल। नजरि‍ पड़ि‍ते राहुल दौड़ कऽ ठाढ़े मामाकेँ गोड़ लागि‍ मामीक कोराक बच्‍चाकेँ लऽ बाजल- माइयो अबैए मुदा डेगे ने उठै छलै। आगूमे बैसल अछि‍।
राहुलक बात सुनि‍ मामी बच्‍चा सभकेँ कहलखि‍न- भैयाकेँ गोड़ लगहुन।
बच्‍चाकेँ कोरामे नेने आगू-आगू आ पाछु-पाछु सभ कि‍यो वि‍दा भेला। सभसँ पाछु शंकरदेव अपने। मन पड़लनि‍ रौतुका दृश्‍य। केना छनमे छनाक भऽ गेल। जि‍नगी भरि‍क जोड़ि‍आएल घरक वस्‍तु-जात आगि‍ लगने आकि‍ बाढ़ि‍ एने केना लगले नास भऽ जाइ छै। मान-प्रति‍ष्‍ठा, गुण-अवगुण, केना छनेमे कतएसँ कतऽ चलि‍ जाइ छै। ठीके लोक बजैए जे दि‍न धराबे तीन नाम। अपने छी जे एक दि‍न बहीनक रक्षक बनि‍ ऐ गाममे छलौं आ आइ......। एक दि‍न गाड़ीपर नाह आ एक दि‍न नाहपर गाड़ी। माटि‍-पानि‍क खेल छी। गंगा-यमुनाक बीच कतौ माटि‍ओ छै अाकि‍ पानि‍ये-पानि‍ छै।

कि‍छु फरि‍क्केसँ भाय-भौजाइकेँ अबैत देख मायरामक मन ओइ धरतीपर पहुँच गेलनि‍ जे सात समुद्रक बीच अछि‍। एक ओद्रक रहि‍तो एक भि‍खारी दोसर राजा। परोपट्टाक लोक सि‍नेहसँ मायराम कहै छथि‍ मुदा भैयाकेँ कि‍ कहतनि‍। कि‍ भैयाक कर्म वि‍गड़ल छन्‍हि‍। एक परि‍वारक बचाओल कर्म छन्‍हि‍। चान, सुरूज, धरती, ग्रह-नक्षत्र इत्‍यादि‍ तँ अपना गति‍ये करोड़ो बर्खसँ नि‍यमि‍त चलि‍ रहल अछि‍ आ चलैत रहत कि‍ मनुक्‍खोक गति‍ ओहन भऽ सकैए। आकि‍ चाने-सुरूज जकाँ मनुक्‍खोक चलैक एकबटि‍ये अछि‍। ब्रह्मक अंश जीवि‍ रहि‍तो कि‍ फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ नै अछि‍? जतऽ जेहेन जलवायु ततऽ तेहेन उपजा-बाड़ी। जँ कतौ वायु प्राणक रूपमे घट-घटकेँ आगू बढ़ैक प्रेरणा दैत तँ वएह वि‍षाक्‍त बनि‍ प्राण नै लैत। गोलाक चोटसँ जहि‍ना पोखरि‍क पानि‍मे हि‍लकोर उठैत आ आस्‍ते-आस्‍ते असथि‍र होइत चि‍क्कन आंगन जकाँ सहीट बनि‍ जाइत तहि‍ना मायरामक मन सहीट भऽ गेलनि‍। मुदा लगले नजरि‍ उड़ि‍ भतीजीपर गेलनि‍। भतीजीपर पहुँचते मन तड़पए लगलनि‍। बाप रे बाप, एहेन दुरकालमे भैया केना इज्‍जत बचौताह। अपनो लग जमा कि‍छु तँ नहि‍ये अछि‍ साले-साल हि‍साव फरि‍या लइ छी। हे भगवान जँ ककरो दुखे दइ छऐ आकि‍ सुखे दइ छि‍ऐ तँ तुलसी पात आकि‍ दूबि‍क मूड़ी जकाँ खोंटि‍-खाेंटि‍ कि‍अए ने दइ छि‍ऐ जे गुलाब-गेन्‍दा तोड़ि‍ये कऽ दऽ दइ छि‍ऐ। लगले नजरि‍ मायराम छि‍पा जकाँ छि‍हलि‍ अपन मातृत्‍वपर पहुँच गेलनि‍। केना बेटाकेँ पोसि‍-पालि‍ ठाढ़ केलौं आ ई सभ.........। लुधकी लागल एकटा गाछ फड़बे करत तइसँ गामक सबहक मुँहमे थोड़े जाएत। जते मनुख अछि‍ ओकरा तँ धरतीसँ अकास धरि‍ चाहये। तखन ने जीबैक आजादी भेटतै। मुदा लगले जहि‍ना पानि‍ ठंढ़ेने बरकक रूप लि‍अए लगैत तहि‍ना दूधसँ उपजैत दही जकाँ मायरामक मन सकताए लगलनि‍। साँस सुषुमा गेलनि‍। मनमे खौललनि‍। नैहर मेटा गेल तँए कि‍ सासुरो मेटा गेल। जहि‍ना भैया नैहरमे भैया छलाह तहि‍ना अहूठाम भैया रहताह। भगवान अपन कोखि‍ अगते लऽ लेलनि‍ तँए कि‍ ओकरा-भतीजी- अपन कोखि‍क नै बुझबै। ऐठाम जे अछि‍ ओ कि‍ भैयाक नै छि‍यनि‍। खेत-पथार, घर-दुआरि‍ चलि‍ गेलनि‍ आकि‍ हाथे-पएर चलि‍ गेलनि‍।

गुमे-गुम, जहि‍ना मृत्‍युक अवसरपर गुम भऽ असमरन कऽ नि‍राकरणक बाट जोहल जाइत, तहि‍ना सभ घरपर पहुँचलाह। ताधरि‍ पुतोहू-रोहि‍तक पत्नी- हाँइ-हाँइ कऽ खि‍चैड़ आ अल्‍लूक सन्ना बना, बाट तकैत रहथि‍। सबहक आँखि‍ सभ दि‍स हुलैक-हुलैक बौआइत। तइ बीच राहुलक कोरक छोटका बच्‍चा, घर देखि‍ते, बाजल- दीदी, बड़ भूख लागल ऐछ?
बच्‍चाक बात सुनि‍ मायरामक भक्क टुटलनि‍। अनायास मन पड़लनि‍ बटोहीकेँ जहि‍ना इनारपर ठाढ़े-ठाढ़ पानि‍ पि‍औल जाइत तहि‍ना ने अखन इहो सभ छथि‍। नहाय-धोयमे अनेरे देरी ि‍कअए लगाएब। बजलीह- कनि‍याँ, भरि‍ राति‍क थाकल-ठेहि‍याएल सभ छथि‍ तँए पहि‍ने कि‍छु खुआ कऽ आराम करए दि‍अनु। गप-सप्‍प पछाति‍यो हेतै। भोजन बादेक आराम तँ सोग कम करैक उपाए छी।

  


 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
प्रभात राय भट्ट
मिथिला गर्भपुत्र
माँ हम अहाक गर्भ मे पलिरहल्छी,मुदा जन्म लेबS पहिले हम अपन मोनक बात किछ आहा के सुनाब चाहैत छि!
 यी हमर पुनर्जन्म अछी हमअहि मिथिलांचल के जनकपुरधाम मे जन्मलरहलौ ताहि समय मे विदेह एकटा समृद्ध राष्ट्र रहैक जेकर अपन भाषा अपन भेष बिदेह के गौरव रहैक,कोशी स गण्डकी तक गंगा स हिमालय के पट यी सम्पूर्ण भूमि मिथिलांचल रहैक जतय कोशी कमला विल्वती यमुनी भूयसी गेरुका  जलाधीका दुधमती व्याघ्र्मती विरजा मांडवी इछावती लक्ष्मणा वाग्मती गण्डकी अर्थात गंगा
 आर हिमालय के मध्य भाग मे यी पंद्रहनदी के अंतर्गत परम पवन तिरहुत
 देश विख्यात छल !  जतये कोशी कमला  वेग  संगीत उत्पन होइत्छल दुधमतीस 
दूध बहथी नारायणी मे स्नान कैयलास स्वस्थ 
काया भेटैत छल, गण्डकी के वेग स प्रेरित कवी गंडक काव्यसुधा रचित छल,कवी कौशकी कोशी तट बईस काव्यवाचन
करैत छल !
अनमोलसंस्कृति  आर अनुपम  प्रकृति केर उद्गमस्थल याह मिथिलाधाम छल बागबगीचा मे कोइली मीठ मीठ संगीत गबै छल !
 शुभ-प्रभातक लाली स मिथिलाक जनजीवन स्वर्णिम छल !हर घर मंदिर आ लोग इह के साधू संत छल चाहे कोनो मौसम होइक सद्खन ईहाबहैत बसंत छल ! पग पग पोखईर माछ मखान मीठ मीठ बोली मुह मे पान इ छल मिथिलाक पहिचान, अहि ठाम जन्म लेलैथ पैघ पैघ विद्वान वाचस्पतिविद्यापति, गौतमकपिल, कणाद, जौमिनी, शतानंद, श्रृंगी, ऋषि याज्ञवल्क्य, सांडिल, मंडन मिश्र, कुमारिल भट्ट, नागार्जुन, वाल्मीकिकवी कौशकीकवी गंडक, कालिदास,
कवीर दास, महावीर यी सब छलैथ मिथिलापुत्र एतही जन्म लेलैथ माँ जानकी राजर्षि जनक के पुत्रीक रूप मे !एतही भगवान शिव उगना महादेव
 के रुपमे महा कवी विद्यापति के चाकर बनलाह ! मिथिला भूमि से अवतरित होइत छल ऋषि मुनि साधू संत भगवान ताहि 
 कहलगेल की यी मिथिलाभूमिअछि वसुधा के
 हृदय !
मिथिलाक मान समान स्वाभिमान भाषा  भेष
 प्रेम स्नेह ज्ञान विज्ञान विश्व बिख्यात छल! अहि ठाम जन्म लेबक लेल देवी देबता सबलालायित होइत छलतायहेतु हमहू पूर्व जन्म मे माँ जानकी s
 कमाना कयने रहलू जे हे माता जाऊ हम फेर
 मानव कोइख मे जन्म ली ता हमरा मिथिले मेजन्म देव !
ताहि स हम अपनेक
 कोइख मे पली रहल छि! मुदा  आजुक
 मिथिलाक दुर्दशा देखिक हम संकोचित भगेल्हू,विस्वास नए bh हरहाल अछि जे यी वाह्य
 मिथिला छई राजर्षि जनक के नगरी वैदेहिक गाम की कोनो दोसर ?सब किछ बदलल बदलल जिका लगैय,कियो कहिय हम नेपाल
 के मिथिला मे छि ता कियो कहैय हम 
विहार के मिथिला मे छि यी विदेह 
नगरी दू भाग मे विभक्त कोना भगेलई माएराजा प्रजा
 शाषक जनता भाषा भेष व्यबहार व्यापार ज्ञान विज्ञान सब किछ बदलल बुझाईय !मिथिलाक अस्तित्व विलीन आ परतंत्र शासन
 के आधीन मे हमर मिथिला  कोना आबिगेल माए ? मैथिल भाषा कियो नए बाजैय, धोती कुरता फाग के उपहास भरह्लय,महा कवी
 विद्यापति क गीत कियो नए गबैय ! मिथिलाक संस्कृति लोप के स्थिति मे कोना आबिगेल माए ?समां चकेवा ,जट जटिन,झिझिया,
झूमर,झंडा निर्त्य,सल्हेश कुमार्विर्ज्वान,आल्हा उदल,कजरी मल्हार यी नाट्यकला सब कतय चलिगेल ? मिथिलाक एतिहासिक स्थल
 सब एतेक जरजट कोना भगेल ?माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि विहार मे,माए हम त पुनर्जन्म
 मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि नेपाल मे ,माए हमर विदेह राज्य कतय चलिगेल ?माए हम त अपन मिथिला राज्य
 मे जन्म लेब चाहैत छि मिथिला माए क कोरा सन निश्छल आ बत्सल प्रेम खोजलो स नए भेटत चहुओरा मे !हम अपन मोनक सबटा
 जिज्ञासा ब्यक्त केनु आब आहा किछ मार्गदर्शन करू माए !हम मजधार मे फसल छि हमर करूणा सुनी हमर सपना साकार करू माए !!!


 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्‍डल
उपन्‍यास
हमर टोल

(गतांषसँ आगाँ)


ढेरूवा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- कतौ मोट कतौ पातर। मन थि‍र रहै तब ने। मनकेँ थि‍र राखब बड्ड कठि‍न। ई तँ कि‍यो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनि‍याँकेँ कोन गति‍ हेतइ। तँए पहि‍ने मन उड़ै छै तब तन।

जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि‍।
आइ तँ भुटायौ वैध जबाब दऽ देलकै- धर्मडीहीवालीकेँ सन्‍तान नै हेतौ। वि‍धाता कलम मारि‍ देने छौ। एकर कोखि‍ ऐ जनममे नै भरतौ।
हौ बा आब कोन उपाय हेतै हो। पहि‍ने तँ लोक खोंखीबाला कहै छलै। आब मुँह दाबि‍ कऽ कहै छै- नि‍रवंश।

दुआरि‍पर जगेसरा ढेरूआकेँ गि‍नगि‍ना रहल अछि‍। सँगे ओकर माथा घूमि‍ रहल अछि‍ आ माथामे घूमि‍ रहल अछि‍- धर्मडीहीवाली। कि‍न्‍तु पछि‍ला फूइसक घर थि‍र अछि‍।
ठीके कहै छलै- उचि‍तवक्ता- हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर वि‍याह। ला टटका माल। नीक नसल देख-सुनि‍ कऽ। पुरहि‍या लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि‍ जेतौा।

नसल तँ एकरो खराब नहि‍ए छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सि‍ंगार कऽ कए नि‍कलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै- जगेसरा भागशाली अछि‍। अपना तँ कमजोर करि‍आएल बेमरि‍याह अछि‍। कि‍न्‍तु ओकरा मौगीकेँ देखि‍यौ। जँ आगूसँ नि‍कलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।

भाग्‍यशाली  कतऽ। भाग्‍य कतएसँ नीक हएत। सुन्‍दर तँ अछि‍ लेकि‍न बाँझ। जँ नि‍पूतर रहब तँ पि‍ण्‍डदान के करत। हमरा बाद सम्‍पति‍केँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत?
ओह ऐ औरति‍याकेँ भगबहि‍ पड़त। ठीके कहै छलै- उचि‍तवक्‍ता। लेकि‍न भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्‍बर।
ओइदि‍न खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलि‍ये। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चि‍याइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि‍ देलि‍ऐ। छाउर बुझि‍ कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बि‍सबासे नै छै कि‍छोपर। फल कतएसँ भेटतै?
आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि‍ पड़तै। लेकि‍न केना कऽ आँखि‍ उनटा कऽ जँ हमरा दि‍स तकै छै तँ हमरा लघी लगि‍ जाइत अछि‍। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि‍ पड़त।
हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि‍ जेतै। संभार तँ हमरहि‍ करए पड़तै। कतेक दि‍नसँ एकर चालि‍-चलन देख रहल छी। नकोरबा बनि‍याँसँ कतेक सटि‍या कऽ गप्‍प करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ नि‍कलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि‍ जाइयो कोनो बात नै लेकि‍न ई भोरे नि‍कलि‍ जाएत- टोल चक्कर लगेबाक लेल। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। कतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि‍। हमरा दि‍स धि‍यान रहै तब ने। धि‍यान तँ आओर ककरोपर रहै छै।

धर्मडीहीवाली अँगनासँ नि‍कलि‍ कऽ टोल दि‍स जा रहल अछि‍। जागेसराक ढेरूआ रूकि‍ गेलै।
ऐ- कतऽ जा रहल छी? छूछे कूद फन? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि‍ देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।
धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि‍ गेलै। उनटि‍ कऽ बजल- देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बेमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि‍ फुट्टा कहीं कऽ।
झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़ि‍या चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि‍।
मुँहसँ गारि‍ नि‍कलतौ तँ थुथुन तोड़ि‍ देबौ।
गारि‍ नै देबौ तँ असि‍रवाद देबौ?”
यएह बड़का आएल अछि‍- असि‍रवाद देनि‍हारि‍। नि‍पूतरी, बाँझि‍न। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।
खबरदार, हमरा माइक नाम नै ले। पूछलीही नै अपना माएसँ। कतऽ कतऽ मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरि‍याहा.......।
जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि‍ गेल अछि‍। करोधसँ थरथरा रहल अछि‍।
मुँह बन्न राखबें आकि‍ देबौ चमेटा।
धर्मडीहीवालीकेँ आँखि‍ तामसे ललि‍या गेलै। उ आओर लग आबि‍ गेलै। देह अड़ि‍ कऽ बाजलि‍- ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि‍ कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।
चटाक, चटाक। मुँहपर थप्‍पर पड़ल।
तु थप्‍पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आओर बखतमे टि‍टही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे कतएसँ गरमी चढ़ि‍ जाइ छै।
ओ जगेसरा ि‍दस हुड़कैत अछि‍। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंग मे लटकए चहैत अछि‍। लेकि‍न जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि‍।
नि‍कल हमरा घरसँ- छि‍नरि‍या। कोन-कोन कुकरम कऽ के तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि‍ चलेबाै डंटा?”
ले मार। आओर मार हमरा। अहि‍ना भागि‍ जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घि‍ना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।
उ कानि‍-काि‍न कऽ फाेंफि‍या रहल अछि‍। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि‍।
भगा देबही। छातीपर छि‍पाठी रोपि‍ कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्‍पर मारबें। कहैत जागेसरकेँ धकेल देलक। आसाकेँ वि‍परीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गि‍र पड़ल आगि‍ नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी लेने उठल।
तोरी माँ की.........। आइ तोहर हड्डी तोड़ि‍ देबो। परान लऽ लेबो।
फटाक-फटाक।
धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरि‍स रहल अछि‍।
गे माइ गे माइ। मारि‍ देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़ि‍फुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि‍ गेलियौ गेऽऽऽ।
दूरेसँ टोलक लोक चि‍चि‍या रहल छै।
रे जगेसरा- रूकि‍ जो। मरि‍ जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।
एना मारबें तँ कोनो दि‍न लंका कांड भऽ जेतौ।
आखि‍र कोन झगड़ाकेँ नि‍पटारा नै होइ छै।
ई औरति‍यो बड्ड झगड़ालू अछि‍। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।
लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि‍। धर्मडीहीवाली दस पन्‍द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। आ ओइठामनसँ गरि‍या रहल अछि‍।
हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सबटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनि‍या, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि‍ फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।
जागेसर गरजैत अछि‍-
ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरति‍या सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकटा सि‍खा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।
कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि‍- हमरा बुझि‍ पड़ैत अछि‍ मरदे सभ सनकल अछि‍। दू-चारि‍ दि‍नपर एहि‍ना पि‍टाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।
पि‍टाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।
से कहाँ कहै छी हम। सभ कि‍छुकेँ एगो रास्‍ता होइ छै ने। आकि‍ कि‍छु बुझे ने सुझे फरमा दि‍या फाँसी।
ठीके कहै छै। सबहक औरति‍या कोनो बाँझि‍न छै आकि‍ छुलाहीए छै, ऐँ?”

औरति‍यो सभ चुप नै रहि‍ सकैत अछि‍।
हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरति‍यो भेलै टलहा। ओकर की गि‍नती छै।
चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहूकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छि‍ऐ। की बजब।
केकरापर करब सि‍ंगार-पि‍या मोरा आन्‍हरे हे...।
धि‍या-पुता कातमे डेराएल सन मुँह कएने ठाढ़ अछि‍।

धर्मडीहीवाली चौबटि‍यापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरि‍या रहल अछि‍। जगेसारा लाठी लऽ कऽ लेबाड़ैत अछि‍।
ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटि‍येपर बेदशा करबौ।
चोटक मोन पड़ि‍ते धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देख रहल अछि‍।
कनेके दूर दौगलापर जागेसर हककऽ लगैत अछि।
जो अपना बापक पास। एमहर जँ घुरि‍ कऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।
कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि‍- नैहर दि‍स। नुआ-बस्‍तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो।
ओ कानैत अछि‍। कि‍न्‍तु भीतरसँ बोल फूटि‍ रहल अछि‍।
हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे नि‍वंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरि‍पर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।

जागेसर ओहीठाम बैस कऽ खांेखि‍या रहल अछि‍।
खों...... खों...... खों....... आक थू.....।

पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर गामपर आइ स्‍थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि‍ अपनहि‍ आपपर। पता नै......।



कमश:


    
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

 

३. पद्य








३.६.नवीन कुमार आशा-अनामिका



३.७. १.किछु त हम करब शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- उनटा-पुनटा २. किशन कारीगर- किछु त हम करब


  
रवि भूषण पाठक
मरणोपरांत


1. कामना
हुनकर मृत्युक कामना के करैत अछि
जखन कि कतेको वृद्ध जवान
विदा भऽ गेलाह।
बिला गेलइ
कतेको सरकार
बन्हा गेलइ कतेको बाँध
आ मिटा गेलइ बाढ़ि भूकम्पक
छोट नमहर निशान ।
जीवनशतक तरफ अग्रसर
ऐ धतालबूढ़ सँ के डराइत अछि
कोन पंडित आ के कवि
चऽर चांचड़ के सठ लण्ठ
कत
के ज्योतिष
आ कहिया के कहबैका
परोपट्टा के पुरनिया
आंगन टोल क अज्ञविज्ञ
दियाद फरीक
जजिमान पुरहित
सेवा सँ पूतोहू
आ मर्यादा सँ बेटा
अपन अपन नौकरी आ बालबच्चा
क पोसैत पोता नाती
के धखाइत अछि
बाभन कि सोलकन
डीही कि भगिनमान
जिरात कि नाशी
गाछी कि मचान
ककरा की चाही
?
2. समाचार
दलान पर खोखैत
रस्ता दिस देखैत
छोटका बाबू
कतेको गणना के असफल करैत
अड़ल रहथिन्ह
दोसर के दिन गुणैत
जोगीभाई विजय बाबू
हारि गेलाह
अंदाज लगबैत
डाक्टर लोकनि
थाकि गेलाह
आला लगबैत
गौंआ घरूआ
बिसरि गेलाह
कि केओ वृद्ध मरणासन्न छैक
बेटा पोता क
सेवा जिज्ञासा क संगे
जमल रहलखिन्ह
छोटका बाबू ।
जिजीविषा क आगाँ
हारि गेलाह
यमराज
हृदयाघात क दू-दू प्रयासक
बाद पस्त भेलाह ।
मुदा छोटका बाबू
हारि गेलाह
उपेक्षा क कल्पना सँ
सहि नइ सकलाह
अपन रोपल फूलवाड़ी
मे वृथा कांट कूश
अमरबेलक लत्ती
सोहराय जहरफूस ।

3.ई ब्रेकिंगन्यूज नइ अछि
नब्बेपार बूढ़ क मरला मे कोन आश्चर्य
कथी क दुख आ केहन असौकर्य
मृत्यु क एकाधिक बेर अफवाह सँ
अइ समाचार क सेंसेशन खतम रहए
बेटा भतीजा पोता नाती तैयार
पहिनहि सँ छुट्टी क जोगाड़
काननए पीटनए
आ लोर क दिशा
पहिनहि छल भ्रमित ।
मृतकक औदात्य
ओकर मांगलिकता
पर नइ भेलइ यथेष्ट चर्चा
पता नइ
ई कोन किसिमक कंजूसी भेलइ ।
4.समाचार मिलला पर
ई जत्ते अंतिम संस्कार रहए
ततबे अंतिम रूढ़ि
छोटका बाबू वरक गाछ जकाँ
शताधिक जड़ि के समेटने छलखिन्ह
तीन भाइ
,पाँच बेटा
चौदह जवान नाती पोताक परिवार
आ भातिज क अलगे खूट
पितियौत क तीनटा बेटा
सेहो ततबे नजदीक
जमाए भागिन
बहिनोइक बात नइ पूछू
एकटा महान मध्यविन्दु
परिवारक गुरूत्वकेंद्रक
समाप्ति पर
जे जहिना छल
तहिना भागल
सिमरिया घाट ।
5.सिमरिया घाट पर
कवि दिनकर कऽ घर सँ
कोस भरि पूरब
चैत क्रुद्ध भ जेठ भेलइ
दुखी सूर्य झुकि गेलखिन्ह
गंगा मे खसब की
?
दुपहरिया बालू
आगि उगलति छल
साबुत माटि कतहु नहि
जरल लकड़ी रूइया कपड़ा
हड्डी क टुकड़ा बाउल
पन्नी घी क डिब्बा आ फूल
चकमकिया कपड़ा
जिंदगी क सब ऊंच-नीच
के धकियाबैत ।
6.जड़बए सँ पहिले
अनुपात बिसरि गेलखिन्ह
घरवारी
कत्ते मून लकड़ी
कत्ते घी
आ कत्ते चंदन
चिंता क कोनो बात नइ
अस्सी पार जोगी भाइ
जे कून हप्ता
नइ आनैत छथिन्ह
एकटा लहाश
सत्तर के लगभगबैत रामाश्रय बाबू
आ तहिना मजगूत
जगदीश आ संतोष
बिना चालीसे के
शंभूपंडी जी कंे आदत भ गेलइ
जरैया चिरैया गंध लेबाऽक
गाँवक शताधिक व्यक्ति
भऽ गेलखिन्ह
म्ूाकसाक्षी
अंतिम दर्शन प्रारम्भ भऽ गेलइ
7.जड़बैत काल
कतेको अनुभवी
भीड़ि गेलखिन्ह
मचान बनऽ लागलइ
अपन अपन बाप माए के जारए वला
केओ केओ अपन कनिया आ भाए के
एक दू टा महा अभागा
जे जरेने गाड़ने रहए अपन संतान के
सबक ध्यान महादाहक
सफलता दिसि
जोगी भाइ चेरा बिछबऽ लागलाह
रामाश्रय बाबू दोहराबऽ लागलाह
उठऽ जगदीश बायाँ सँ मजगूत करह
रूकू संतोष
पतरका चेरा उपर मे देबइ
गणेश भाइ चारू खंभा ठोकऽ लागलाह
गंगेश जी कहलखिन्ह
मुँह पर चेरा नइ राखियौ
मुखाग्नि पड़तए
सुरेश जी टोकलखिन्ह
मात्र विध छैक
केवल सटएबाक काज
चंद्रदेव भाए जीपे मे रहलाह
यम के डरे
वा थाकल हारे
घनश्याम जी एगो के डांटि देलखिन्ह
खड़ही के हाथ नइ लगाबहक
औखन बड्ड काज छैक
ओ अलगे रूसल
हमहूँ देखब
कोना लहाश जरत!

अंतिम परिक्रमाक बाद
मुखाग्नि पड़लए
आ अग्नि खींचऽ लागलखिन्ह
दिशांतक कोणांतक हवा
सूर्यदेव माथ पर आबि गेलाह
गंगाक धार प्रशांत भऽ गेलइ
परिजन निश्चिंत भेलाह
एकटा नवतुरिया खोललक बिस्लेरी
टो टापि के शीतल जल बँटऽ लागल
मुँहगर सब जुड़बऽ लागला अपन कण्ठ पेट
एकाएक दछिनबरिया कोना लचि गेलइ
सब एक दोसर पर बाजऽ लागलइ
हम तऽ पहिले कहैत छलियइ
दछिनबरिया कोना फलाँ बाबू बनेलखिन्ह
हओ बाबू आँचक दिशा बदलऽ
लाबऽ पतरका चेरा संठी ढ़ैंचा घी
तू ओमहर सँ बाँस भिराबह
हे हे उत्तर सँ देह उघार भेलइ
देखियौ तऽ हाथ पैर अकड़ि रहल छइ
कि ओ आर्शीवादक हाथ छैक
?
बूढ़बा अखनो तमसाइल छैक


8.विदेहक धरती
पैकबंद बोतल के फुजिते
बदलि गेलइ मौसम
जेना कि मृत्यु नइ
कोनो जन्म क उत्सव हो
विदेहक ई धरती
देहक मजाक उड़बऽ लागल
रंग रंगक चुटकुला
हवा बसात
क्षेत्रक वर्गक गामक
अलग अलग अनुभव ।
जगह धुंएने रहए
मुदा कठिहारी के यात्री
नहबऽ लागला
रगडि रगड़ि़ के
देहांतक बात बिसरि
आ दस मिनट बाद
खाए लागलाह
चूड़ा-दही
जिलेबी पूरी
गरम गरम
मसाला नमक क चर्चा करैत
ओएह पेटक लेल
ओएह देहक लेल
ऐ विदेहक धरती पर
9.ऐ सिमरिया मे
मात्र देहे नइ
धर्म आ धनहु क प्रति
विरागक लेल तैयार रहू
ऐ गंगा क माटि मे
एकहि ढ़ांचा क आदमी
बंाध सँ घाट तक ।
घाटक डोम
आ पंडित
सभ लोकनि
एके संख्या कहताह
एक हजार एक
आ तहिना होटल वला
नाम लियऽ
अन्नपूर्णा विद्यापति मिथिला
वैष्णव शंकर आदि आदि
सभ मिला के एके बात
एक हजार एक
10.चर्चा क विषय
चर्चा क विषय ई नइ छैक
कि छोटका बाबू कत्ते परहल लिखल
कत्ते बड़का विद्वान ज्योतिषी
केाना के पढ़ेलाह धिया पूता के
कि ओ चाहैत छलाह
कि पओलाह आ
कि मूने रहि गेलेन्ह
चर्चा ई छैक
कि कोना मरलखिन
के सेवा केलकए
आ के अनठेलकए
ककरा कि देलखिन्ह
आ के कि चाहैत अछि
कोना हेतए श्राद्ध
आ कोना कोना भोज
के सम्हारतए
आ के चौकी बजारतए
हरेक गौंआ घरूआ के
हाथ मे छैक
चित्रगुप्तक धर्मदण्ड
ओ नापि तौलि रहल छैक
आ आबि रहल छैक
निर्णय बदलि बदलि के
सब चौकस अछि
के एलए
के बिसरलए
अएबा के कारण
आ बिसरबा के बात पर
भऽ रहल छैक गोल गोलैसी
घिन घिन घोंघाउज ।





 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
आशीष अनचिन्हार

कविता
इ कविता समस्त स्त्री लोकनिक स्वतंत्रता के समर्पित छैक। स्त्रीक अस्तित्व कतए छैक से विचार करबाक समय आब आबि गेल छैक। अंठेने कोनो काज नहि होइत छैक। स्त्री ( मैथिलानीक जय हो)। इ कविता दू खंड मे बाँटल गेल अछि। प्रत्येक खंड मे पाँच-पाँच गोट चरित्र लेल गेल अछि। त करू आस्सवादन एहि कविताक।
कविता
पंचसती - पंचउपसती
सती खंड

अहिल्या
सूनू गौतम
ओहि भोर जखन अहाँ
चल गेल छलहुँ स्नान करबाक लेल
आ आएल छलाह इन्द्र अहाकँ रूप धए
हमर देहक लेल
ओही क्षण बूझि गेल छलहुँ हम
इ इन्द्र छथि
मुदा इ मोने छैक
सूनू गौतम
हम भासि गेल रही
अहाँक नजरि मे
मुदा
इ अर्धसत्य थिकैक
सत्य त इ थिक
आत्माक सर्मपण आ देहक सर्मपण
दूनू फराक- फराक गप्प छैक
सूनू गौतम
हम आहाँके देहक सर्मपण नहि कए सकलहुँ
अहाँ पाथर बना सकैत छी फेर सँ
आब हमरा रामक पएरक कोनो मोह नहि
सूनू गौतम ध्यान सँ सूनू ॰

तारा
इ सत्य थिकैक सुग्रीव जे हम
बालिक कनियाँ छलहुँ

बालिक पश्चात अहाकँ
इहो सत्य छैक
जतबे हम
बालि सँ प्रेम प्रेम करैत छलियैक
ततबे अहुँ सँ करैत छी
मुदा ताहू सँ बेसी इ सत्य छैक
जे
अहाकव मृत्युक पश्चात
हम तेसरोक कनियाँ हेबैक
ओकरो ओतबे प्रेम करबैक जतेक
अहाँ सभ के केलहुँ करैत छी.

इहए चक्र चलैत रहत हमरा संग
त्रेतायुग
सतयुग
द्वापर
आ कलियुग
सभ युग मे ॰

मंदोदरी
राज्यक संग-संग
विजेताक
रनिवासक सेहो विस्तार होइत छैक
मुदा एकर इ अर्थ नहि जे हम
विभीषणक कनियाँ भए गेलियैक
हँ
एकर अर्थ जरूर भए सकैत छैक
जे
हमरा
अर्थात मंदोदरी के
ढ़ेप बनेबा मे कोनो कसरि बाँकी नहि छैक
जँ बाँकी होइक
त ओकरो स्वागत छैक हमरा दिस सँ
मुदा
तैओ हम विभीषणक कनियाँ
नहि भए सकैत छियैक
विभीषणक संग
संभोगरत रहितो ॰

कुंती
योनि हरदम योनि होइ छैक
चाहे ओ
अक्षत हो वा क्षत
लिंग लग इ ज्ञात करबाक कोनो
साधन नहि छैक जे
योनिक की अवस्था छैक
इ त पुरुषक मोन छैक
जे
योनि के क्षत-अक्षतक खाम्ह मे बान्हि
स्त्री के गुलाम बना लेलकै
कर्ण के त्याग करैत काल मे हमरा लग
लोक लाज छल
मुदा आब नहि
संतान हरदम संतान होइत छैक
चाहे ओ कुमारिक होइक वा बिआहलक
आब लोक लाज भय सँ मुक्त छी हम
मने कुंती
अर्थात
कर्ण आ पांडवक माए
द्रौपदी
जखन कोनो जीवक
जिनगी
पंचतत्व सँ बनि सकैत छैक
त हमर सोहाग
पंचपति सँ किएक नहि ?
उपसती-खंड

सीता
राम विश्वामित्रक संग मिथिला अएलाह। धनुष तोरलाह। हमरा संग बिआह कएलाह।
अयोध्या जा निर्वासित भेलाह। हमहू संग धेलिअन्हि। हमर अपहरण भेल। हम अग्नि-परीक्षा
देलहुँ(अनावश्यक रुपेँ)। अयोध्या अएलहुँ। पुनः हमर निर्वासन भेल ( मजबूरीवश)। धरती फाटल,
हम असमय प्राण त्यागलहुँ।
ने त आब मिथिला अछि ने अयोध्या आ ने रामे । मुदा हम अदौ सँ निर्वासित होइत रहलहुँ । अग्नि-परीक्षा दैत रहलहुँ आ धरती मे घुसि जाइत रहलहुँ। केखनो अनावशयक रुपेँ केखनो मजबूरीवश।॰

अनूसूया
नाम थिक हमर अनूसूया
मुदा
एकटा गप्प सँ हमरा असूया होइत रहल
आर्यगण शूद्र स्त्री पर
किएक मोहित होइत रहलाह
घरक स्त्री उपेक्षित
रक्त-शुद्धताक तराजू बनल बैसल
इ बड्ड बादक गप्प थिक जे
आर्य ललना अपन स्त्रीतत्वक
रक्षाक लेल
शूद्र पुरुषक सहारा लेलथि
मुदाहाय रे हमर कपार
हम
महासती त बनि गेलहुँ
मुद स्त्री नहि ॰

दमयंती
जंगल मे नल हमरा छोड़ि
पड़ा गेलाह
इ कोनो बड़का गप्प नहि
जखन ओ नाङट रहथि
हम अपन नूआ फाड़ि
हुनक गुप्तांग झाँपल
मुदा इहो कोनो बड़का गप्प नहि
बड़का गप्प त इ छैक जे की
मात्र पुरुषे स्त्रीक इज्जतक रक्षा कए सकैत अछि
स्त्री पुरुषक नहि
जँ नहि
त हम कोना केलियैक ?

राधा
अच्छर-कटुआ हमरा
कृष्णक घरवाली बुझैए
साक्षर कुमारि
आ हम राधा
एहि बिआहल आ कुमारि दूनूक अवरुद्ध धारा मे
फसँल
एकटा नारि मुदा अबला नहि
कलियुग जँ कहिओ कदाचित् मुक्त संभोग व्यवहार मे हेतैक
सादर हम स्वागत लेल तैआर रहबै
ओनाहुतो इ जरुरी नहि छैक जे
बिआहक बादे संभोग कएल जाए
आ ने इ जरुरी छैक जे संभोगक बाद बिआह कएल जाए
बिआह आ संभोग मे की संबंध छैक से
विवेचना मिमांसक करताह
मुदा एतबा कहबा मे कोनो संकोच नहि
जकरा संग मोन नहि मानैत हो
ओकरा संगक संभोग
बलात्कार सँ कम नहि ॰

गांधारी
हमरा एक सए एक पुत्र छल
अर्थात
लोकक नजरि मे
हमर पति हमरा संग
एक सए एक बेर संभोग कएने हेताह
मुदा हम जनैत छी
ओ संभोग नहि
बलात्कार छल
एहन बलात्कार जाहि मे ने त
स्त्री चिचिआ सकैत अछि
आ ने केकरो कहि सकैत अछि
सुनिगबाक अतिरिक्त
लोक हमरा सती बुझैए एहि लेल
आनहर पतिक संग बनि गेलहुँ आन्हर
मुदा
पट्टी बान्हल हमर आँखि मे
अबैत रहल कतेक रास सपना
इ केओ कोना देखत ?
 छत्तीस-चौबीस-छत्तीस

कोनो बचिआ
सुन्ना-सुन्ना-सुन्ना रहैत-रहैत
अनचोके मे बदलि जाइत छैक
छत्तीस-चौबीस-छत्तीस मे

कैमरा-लाइट-एक्शन
एहि तीनू मे नहाइत अछि ओ
आ तखन
छत्तीस के सम्हारने रहैत छैक
पारदर्शी ब्रा
चौबीस-छत्तीस के
बिकनी
संयुत्ताक्षर जकाँ
ओहिकाल मे ओकरा हाथ मे रहैत छैक
कोनो ने कोने वस्तु
आ वस्तु सटि जाइत छैक
केखनो छत्तीस मे
केखनो चौबीस-छत्तीस मे
आ तखने तव हमहूँ सभ बुझैत छिऐक जे
वस्तु नीक छैक

बंधु
एकटा गप्प सत्त इमान सँ कहैत छी
छत्तीस-चौबीस-छत्तीस
देखलाक पछातिए तँ बुझैत छिऐक जे
वस्तु णीक हएबे करतैक
एकरा अबस्स किनबाक चाही
       


ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

सुनील कुमार झा
हाइकू / शेनर्यू
 
करियो कृपा/ करैत छि नमन/ हे छठी माई

 
साँझक बेर/ सूर्य देव के आगांs/ जोडैत हाथ

 
दुहि रहल/ पेट भरय लेल/ बकरी केर

 
दूर नै ये/ बस चारि कदम/ मंजिल लेल

 
सड़के कात/ बेचीं रहल छैक/ हाथक कला

 
अपन गीत/ अपन वेश-भूषा/ अपन नाच

 
नाचि रहल/ ढोल के धुन पर/ छोड़ा आ छौड़ी

 
फेनिल पानि/ कल कल करता/ देत डूबाई

 
स्वर्गक सीढ़ी/ बनाउ देलक ये/ विधना लेल

 
निर्मल पानि/ शांत पड़ल छैक/ ये किछु बात

 
धरती पर/ उतरी रहल ये/ नभ प्रकृति

 
मोहक दॢश्य/ प्राकृतिक रचना/ इन्द्रधनुषी


शेनर्यू
नेता

 
सबटा चोर/ मरय केर बाद/ बनल नेता

गिरगिट सों/ रंग बदलनाय/ सिखलक ये

मुहं में राम/ बगल में छुरी के/ करैत सिद्ध

वोटक लेल/ लगेता दाँव पर/ आँखिक लाज

सात पुश्त भी/ नेहाल भए जेता/ बनिके नेता

निगैल गेल/ सुरसा बनि केर/ सोंसे देश के

नेताक नाम/ सुनैय में लागय/ जेना गारि ये

 
मुखिया -:
चुनाव लेल
पहिरे लागल ये
खादी कुरता

सरपंच-:
बुझायल जों
महिमा चुनाव के
गेल बोराय

पंच-:
दारु,टका सों
ख़रीदे रहल ये
सबटा वोट

वार्ड-सदस्य -:
चुनावी नैया
पार करय लेल
जोड़ैत हाथ

जनता-:
पाँच साल के
निकालैत छिकार
ये बुधियार

दादा -:
नेता बनिके
पहिरे लागल ये
खादी कुरता

दादी-:
पान चबौने
नेने हाथ में लाठी
घूमि रहल

बाबूजी -:
धिया पुता ले
रौद में दिन भरि
खटैत रहे

माय -:
बनि पुतौह
करैत ये चाकरी
अपने घोर


बहिन -:
भेल जवान
बियाहक आस में
गिनैत दिन

भाई -:
लुच्चा बनिके
अंगना दुआर पे
छिछियाबैत

हम -:
देखि सुनि के
परिवारक गाथा
भेलोंउ क्षुब्ध
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजेश मोहन झा गुंजन
कवि‍ता

परि‍वार नि‍योजन

छोटका नेना बड़का नेना
एतेक नेनाक कोन प्रयोजन?
समाजक समस्‍या जकड़ि‍ रहल
बि‍नु सफल परि‍वार नि‍योजन
टुनि‍या मुनि‍या गुड़कि‍ रहल छै
एकटा बौआ फुदकि‍ रहल छै
फुदनी फुद-फुद फुदकि‍ रहल छै
बलचनमा दही सुड़कि‍ रहल छै
फुलमति‍या माइक मति‍ अछि‍ मारल
कहथि‍ भगवान हमर कपाड़केँ जाड़ल
कहलौं हम अहाँ देब ने दोषू
आबहुँ रूकि‍ जाउ एकरा सोचू
ऐ बि‍च टुनमा टाँग तोड़ौलक
जखने लोड़ही मॉथ उठौलक
केहेन अकि‍लपर पड़ल छै पाथर
सातसँ की बढ़ाएब सत्तर
जखने हाथे बाढ़नि‍ देखलौं
लत्ते-फत्ते दलान पड़ेलौं
पकड़ि‍ कान नै देब सजेसन
बढ़बए दि‍औ एहि‍ना, पोपुलेशन।


 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जीबू कुमार झा प्रभात राय भट्ट

जीबू कुमार झा
शक्ति स्वरूपा माँ अम्बे, हमर छी प्रणाम,
घूरि अबियौ अहाँ आब, मिथिलाक गाम।
कनडेरिये अहाँ जँ, ताकियो देबै,
महमहाँ भऽ उठतै, मिथिलाक गाम॥
विन्ध्यवासिनि अहाँ कहेलौं मैया,
दयाक सागर अहाँ बहेलौँ मैया।
क्षणहि चण्डी रूप धारण केलौंहेँ माँ।
संग महिषासुरकेँ पहुँचेलौं सुरधाम।..
काली लक्ष्मी अहाँ छी वीणावादिनी,
संहार करिते कहेलौं महिषमर्दिनी।
आर्त भऽ हम पुकारै छी, माँ अम्बे,
आब मिथिलाक करियौ अहीं कल्याण॥
 
पहिल भेंट
पहिल भेंट छी प्रियतम
मिलनक ई राति यौ
धीरेसँ दबायब अहाँ
कोमल ई हाथ यौ
पकड़ि ठेललक जखन, एहि घरमे सखि
साँस फूलि गेल हमर, देखि एक अजनबी
चुपचाप बैसलहुँ, हम एक कात यौ...

चौकलहुँ देखि हम बढ़ल दुइ हाथ यौ
धीरेसँ उठायब पिया, कोमल कली यौ
देह सिहरि उठल, थर-थर काँपय छाति यौ..धीरे

मूरि गोंति बैसलहुँ हुनके बगलमे
पुछलनि नाम हमर, लाज भेल मोनमे
धीरेसँ बजलहुँ हम फूलकुम्मरियौ
धीरे...

हमरा छोड़ि किए अहाँ पड़िलौं यै
अपने-जखने अहाँ भागि गेलौं
जीवन रेखा पोति देलौं यै..

ओ सुन्दर सजल कोबर घर
तै मे नव-नव कनियाँ वर
पाछू-पाछू अँगुरी धेने छलौं
तकरा बिचहि मोचरि देलौं यै...

पहिल रातिक ओ मधुर मिलन
ठोढ़ लाल ओ सजल नयन
हाथ जखनहि अपन बढ़ेलौं हम
अँगुरी किए तोड़ि देलौं यै..

अहाँ देखने हमर नै मोन मानै
रूसि भागलौं तखन कोन ज्ञाने
तखन होइत छल, जे की करी नै करी
दर्दक सभ नोर पीबि गेलौं यै..
हमरा छोड़ि अहाँ...
प्रभात राय भट्ट
देलौ हम पेटकुनिया

तिनगो बेट्टी देख कनियाँ,
देलौं हम पेटकुनियां,
डाक्टर कहैय अल्ट्रासाउंडमें,
फेर अछि बेट्टीये  यए,
बड मुस्किल स करपरत निर्वाह,
कोना हयात बेट्टीक व्याह,
चलू कनियाँ करादैछी एबोर्सन,
हम नए लेब आब एतेक टेंसन,
रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!!रूईक जाऊ!!
मईट स जन्म लेलक सीता,
करेजा स सट्लक जनक पिता,
हम अहाँक कोईखक सन्तान,
किया करैत छि हमर अबसान,
जनक छैथ मिथिलाक पिता,
बेट्टी इहाँ के सब सीता,
किया करैत छि बाबा अहाँ चिंता,
बेट्टा बेट्टी में नए छै कोनो भिन्ता,
भैया संग हमहू स्कुल जेबई,
मोन लगाक पढ़ाई करबई,
डाक्टर इंजिनियर पाईलट बनबई,
जगमे अहाँक नाम रोशन करबई,

दुल्हे पीयोलक जहर
व्याह क्याक पिया घर गेलौं,
मोन में सुन्दर सपना सजेलौं,
सासुर घरके स्वर्ग समझलौं,
डोली चैढ पिया घर एलौं,
हर्षित मन केकरो नए देखलौं,
गिद्ध नजैर स सब हमरा देखलक,
झाड़ू बारहैन स स्वागत केलक ,
बाप किया नए देलकौ तिलक,
जरल परल जूठकुठ खियोलक,
सपना सबटा भेल चकनाचूर,
सास भेटल बड़ा निठुर,
ठनका जिका ठंकैय ससूर,
बात बात में चंडाल जिका
आईंख देख्बैय भैंसुर,
जेकरा साथै लेलौं सात फेरा
ओहो रहैय मर स दूर,
जाधैर बाप देतौने रुपैया ,
सूत बिछाक आँगनमें खटिया,
कल्पी कल्पी केलों गोरधरिया,
कतय स बाप हमर देत रुपैया,
बाबु यौ हम अहाँक राजदुलारी,
छालों हम म्याके प्यारी ,
विधाता लिखलन केहन विधना,
किया रचौलक एहन रचना,
नरक स बतर जीवन हम जीबैत छि,
आईंखक नोर घुईट घुईट पिबैत छि,
दूल्हा मगैछौ फटफटिया  सोनाके चैन,
नए देभि त छीन लेतौ हमर सुखचैन,
बेट्टीक हालत देख बाप धैल्क हाथ माथ,
 चैन फटफटिया लक आएब हम साथ
सासूर घुइर जो बेट्टी रख बापक मान,
सपना भेल सबटा चकनाचूर,
सास सासूर भेटल बड़ा निठुर,
मालजाल जिका बन्ह्लक देवर,
ननद उतारलक गहना जेवर,
मुग्ड़ी स माईर माईर
बडकी दियादिन देखौलक तेवर,
पिजड़ा में हम फसल चीडैया,
कटल रहे हमर पंख  पंखुड़िया ,
पकैर धकैर दुल्हे पियोलक जहर,
 छटपट हम छटपटएलौं  कतेक प्रहर,
पत्थरके संसारमें कियो
नए सुनलक हमर चीत्कार,
प्राण निकलैत हम मुक्त भेलौं,
छोइड दलों यी पापी संसार,

ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नवीन कुमार आशा
अनामिका
..................................
साँझक समय
निकली दुनु भाई
छति ओ हमर छोट
पर छथि हमर जिगरी /
जखन जखन निकली घर से
टोकियनी हुनका सदिखन
सुनु यो भाई सुनु यो भाई
कानो करब आइ घुमाई
साझक............................../
किछु काल बाद ओ बजला
चलू बुझी भौजीक  हाल
बुझलो भैया भौजीक हाल
ओहो ते हेती बेहाल
साझक................................/
हम ओही पर बाजल
सुनु यो भाई सुनु यो बोआ
अहिने किछु अछी हमर हाल
रति के नहि नींद आवे
दिन के नहि चैन यो
साझक......................................./
सुनु यो भाई सुनु यो भाई
साझक कि कहू हाल
मोन रहे अछी बेकल
लागल रहे टकटकी  यो 
६बजेक इंतज़ार मे
जखन बाजे साझक ६ 
तखने भए जाइ हम छू 
साझक .............................../
गपक क्रम आगू बढ़ल
आब पहुचलो चौक  पर
फेर पुछला हमरा भाई
और सुनाऊ अपन हाल
साझक................................../
फेर उनका से कहल
जहिया से पायल हुनका
जिनगी भयी गेल उनटा पुन्टा
साझक......................................./
एकटा आरो गप कही
सुनी के जुनी हसब यो
जहिया जहिया देखि हुनका
बढ़ी जाए धड़कन
एक बेर जे सुरु भेल
फेर नहि सुने यो
साझक........................................../
अनामिका अनामिका अनामिका
ई शब्द सदिखन पावी
दोसरक नहि ज्ञान यो
जखन देखि आगू पाछु
सदिखन पावी हुनके आगू
साझक ........................................../
आब गप क विराम लगाके
साफ़ साफ़ हम कहे छि
हुनक छियानि  हम प्रिये
ओ हमर प्राणप्रिये
ओ हमर अनामिका
मनभावन प्रीतम अनामिका
साझक समय
निकली .............................................../
                           


ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.किछु त हम करब शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- उनटा-पुनटा २. किशन कारीगर- किछु त हम करब

   
शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू
कवि‍ता

उनटा-पुनटा
सबरी मायक सि‍नेह उनटल छन्‍हि‍,
पनटि‍ गेल छथि‍- तात राम
ति‍यागक मूरति‍ सि‍या बदलि‍ गेली
प्रति‍ झण बदलए आठो-याम
बोतल क्षीरमे नेना उबडुब
पुष्‍ट वक्षक लेल अंबा अंध
टाॅप पहि‍रलनि‍ यशोदा मैया
कान्‍हा हेरथि‍ ऑचर गंध
कक्का दलानपर रसमंजरि‍ लागल
पढ़ि‍-लि‍ख पूत भेलनि‍ अधि‍कारी
घूसक टाकासँ दलानकेँ छाड़ब
लालबत्ती बरू भऽ जाउ कारी
अन्न-पानि‍ बि‍नु बाबा मुइला
भीठ बि‍का हेतनि‍ वृषोत्‍सर्ग
सभ बौराएल यशोगान लेल
गजि‍या शीत तप्‍पत अपवर्ग
नांगरक चार चुआठ बनल
ति‍रपि‍त झाकेँ भेटलनि‍ शमि‍याना
गोदानक संग जौं सॉढ़ नै दागब
लोकवेद सभ देत ताना
पहि‍ल छायामे हमरो भेटल
राहरि‍ दालि‍ संग वासमती
बाबाकेँ जौं एहि‍ना खुआबि‍ति‍यनि‍
एखन नै जेता छल तट वागमी
छोट परि‍वारक लेल मामी माहुर
कात भेली नानी बनि‍ अपरतीप
आर्य भूमि‍मे मि‍झा गेल अछि‍
संयुक्‍त परि‍वारक खहखह दीप
सुकेश्वर रामक गाराक कंठी
हाथ धएने धर्मक पतवार
अपैत कुलमे जन्‍म की भेलनि‍?
माॅथ लि‍खयलनि‍ जाति‍ चमार
सुरावोरि‍ मुर्गी टांग चि‍बाकऽ
वि‍वि‍ध कुलक्षणक संग राति‍ बि‍ताबथि‍

पंडि‍त वंशक कठुआएल पौरूष

मास्‍टर साहेब ब्राह्मण कहाबथि‍।
 
किशन कारीगर

किछु त हम करब


 
अवस्था भेल हमर आब बेसी
टूघैर टूघैर हम चलब
अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा
अपना माटि पानि लेल किछु त हम करब

नुनु  बौआ अहाँ  आऊ
बुचि दाय अहूँ आऊ
दुनू गोटे मिली जल्दी सँ
मैथिली में किछु खिस्सा सुनाऊ

नान्ही टा में बजलौहं एखनो बाजू
मातृभाषा में बाजू अहाँ निधोख
कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब
नहि बाजब त कोना बुझहत लोक

परदेश जायत मातर किछु लोग
बिसैर जायत छित मातृभाषा कें
अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत
कहें मीठगर स्वाद होयत अछि मातृभाषा कें

अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति
पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर
एही धरोहर के हम बंचा के राखब
अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब

कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास
सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू
सभहक अछि एकटा इ दायित्व
किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू

हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि
एही परम कर्तब्य सँ मुहँ नहि मोडू
स्नेह रखू हृदय में सभ के गला लगाऊ
अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू

समाजक लोक अपने में फुट्बैल करैत छथि
मनसुख देशी त धनसुख परदेशी
एक्के समाज में रहि ऐना जुनि करू
एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू

एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब
अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब
आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब
जीबैत जिनगी किछु त हम करब

हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी
सभ लोक अपन भाषा में बाजब
औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी
अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब

 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
विद्यानन्द झा विदू

शिक्षाक मौलिकता

शिक्षाक साहचर्य सऽ सम्भव विकास
हटए अन्हार अज्ञानक पसरए ज्ञान प्रकाश॥
मानवक मौलिकता शिक्षा सभ्य समाजक अछि पहचान
हर समाज आओर हर मानवकेँ शिक्षामे अछि बसल प्राण॥
ज्ञान आओर विज्ञानक सीमा शिक्षा सऽ अछि बढ़ि रहल
छूबि सकल छी चांद गगनकेँ अनेको खोज अछि चलि रहल॥
कृषि कार्यमे हरित क्रान्ति शिक्षाक परिणाम भेल
वृक्षारोपणक की महत्व अछि शिक्षा सऽ ई ज्ञान भेल॥
जीवनकेँ साकार करू शिक्षाक प्रसार करू
अनपढ़ बचए ने एको मानव सब मिलि ई प्रयास करू॥
राष्ट्र समाज आओर हर मानवक ई प्रथम कर्तव्य हो
बच्चा-बच्चा हो सबल ई हमर संकल्प हो॥
विकासक परिभाषा शिक्षा उत्थानक आयाम बनत
मूलभूत अति आवश्यक ई सम्मानक आधार बनत॥
सुख शान्तिक श्रोत ई शिक्षा हर समाजक मान बढ़त
अध्ययन-अध्यापन सऽ बच्चा-बच्चा महान बनत॥
शिक्षा तऽ अछि असीमित सरोवर चाही जते से जल भरि ली
बँटला सऽ विस्तारे होयत ई मनमे विश्वास करी॥
जन-जनक हितकारी शिक्षा आउ एकर प्रसार करी
धन्य करी हम अपनहुँ जीवन अहूँ किछु प्रयास करी॥

ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत

१.श्वेता झा चौधरी .ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर)
१.
श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 

२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।



३.श्वेता झा (सिंगापुर)

ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।


विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
 
बालानां कृते

बिपिन झा, IIT Bombay

साक्षरता- बोधकथा
बालानां सुखबोधाय
एकटा नेना अपन बाबा सँऽ जिद्द केलक जे- बाबा यौ हम पाठशाला जायब आ पढब!बाबा के बड्ड मोन आह्लादित भेलन्हि। ओ कहलथि-कियाक नै हम आइये अहाँ के नाम लिखबा दैत छी। ओ गामे कऽ राधाकृष्ण इङ्गलिश पब्लिक स्कूल में अपन पौत्र कें नाम लिखबा देलखीन्ह। बच्चा पढबा में होशियार छल्हे सोजहे बर्षे ओ सा ते भवतु... आ बालोऽहं जगदानन्द... आदि कण्ठस्थ कय लेलक। ओकर बाद ओकरा मास्टर साहेब वर्णमाला सिखौलखीन्ह। ओ सम्पूर्ण आखर सिखिलेलक।
घर आबि ओ कहलक जे- बाबा यौ हम साक्षर भय गेलहुँ!! बाबा के बड्ड मोन प्रसन्न भेलन्हि।
हुनकर बाबा बड्ड पैघ विद्वान छलखीन्ह आ शताधिक ग्रन्थ लिखने छलखीन्ह। आब ओ बाबा के  ग्रन्थालय जा के अपन बाबा द्वारा लिखल सब सँऽ मोट ग्रन्थ उठा के पन्ना पलटावय लागल। कनिकाल केर बाद ओ बाजल-बाबा अहाँ तऽ एहि किताब के पहिले पाँती में गल्ती लिखिने छी!! बाबा हँसय लगलाह आ कहलथि कतय? ओ बच्चा बाजल हमरा मास्टर साहेब पढेलथि जे – ’केर बाद होइत छैक मुदा अहाँ तऽ केर बाद लिखिने छी! पंक्ति छल
पयसा कमलम्, कमलेन पयः।
पयसा कमलेन विभाति सरः॥
बच्चा केर गप्प सुनि बाबा मन्द-मन्द मुस्कान दिय लगलथि।
सोचू आ अपन टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर पठाउ। कथा केर लेखक छथि बिपिन झा, CISTS, IIT Mumbai.

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ।

 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...