Saturday, May 14, 2011

'विदेह' ८१ म अंक ०१ मइ २०११ (वर्ष ४ मास ४१ अंक ८१) -PART II

छठम दृश्य

(कृष्‍णदेवक डेरा। सूर्यास्‍तक समए। पनरह बर्खक बेटा दि‍नेश आ तेरह बर्खक बेटी सुधा दरवज्‍जापर बैस परीक्षाक गप-सप्‍प करैत।)

सुधा-           भायजी, अहाँ सबहक परीक्षा तँ लगि‍चा गेल?

दि‍नेश-          हँ। अगि‍ला महीना आठ तारीखसँ हएत।

सुधा-           सुनै छी, अइबेर चोरि‍-तोरि‍ नै चलत?

दि‍नेश-          चोरि‍ बन्न भेनाइ ओते असान अछि‍ जे नै चलत। भलहि‍ं सेन्‍टरपर नै होउ मुदा आरो जगह बन्न हएब साधारण अछि।

सुधा-           (जि‍ज्ञासासँ) आरो ठाम होइ छै?

दि‍नेश-          होइ छै भेला जकाँ खूब होइ छै। जएह भोजैतनी सहए चटैतनी। जेकरे उपर चोरि‍ रोकैक भार छै सएह सभ करैए। जेकरे फलाफल छी जे नीक वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट अधला होइ छै। आ अधला वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट नीक होइ छै।

सुधा-‍           से एना कि‍अए होइ छै?
              (कृष्णदेवक प्रवेश)

दि‍नेश-          हम तँ सभ बात बुझबो ने करै छी पापाकेँ सभ बुझल हेतन।

सुधा-           पापा, परीक्षामे चाेरि‍ कतऽ-कतऽ होइ छै?

कृष्‍णदेव-         बुच्‍ची, ओना पुछलह तँ कहबे करबह। मुदा अधला गप सुनैमे समए नहि‍ये लगावी, सएह नीक।

सुधा-           जँ अधला गप नै सुनब तँ फेर नीक-अधला बुझबै केना?

कृष्‍णदेव-         (मुस्‍की दैत) कहलह तँ ठीके। देखहक ओना लोक परीक्षाकेन्‍द्रपर जे कि‍ताब-चि‍ट-पुरजी लऽ कऽ लि‍खैए ततबे बुझै छै। मुदा ऐ सभसँ नमहर-नमहर चारि दोसर होइए। जखन कापी एकत्रि‍क भऽ परीक्षक ओइठाम पठौल जाइ छै तखन कापी बदैल-बदैल लेल जाइए।

सुधा-           नै बुझलि‍ऐ। कनी नीक जकाँ फरि‍छा कऽ कहि‍यौ?

कृष्‍णदेव-         परीक्षाभवनसँ बाहर काँपी लि‍खाइत अछि‍ आ जमा करैकाल बदलि‍ लेल जाइत अछि‍।

सुधा-           (आश्चर्यसँ) तखन तँ ओकरा बहुत नम्‍बर अबैत हेतै?

कृष्‍णदेव-         अबि‍ते अछि‍। कोनो कि‍ एतबे होइए। एकर उपरान्‍तो जइठाम काँपी जमा होइए आ मार्क-सीट तैयार होइए असली करामात तइठीन होइए। बनि‍याँक कारोवार जकाँ रूपैयाक बरखा होइए।

सुधा-           तखन तँ रूपैयेबलाक वि‍द्यार्थीक रि‍जल्‍ट नीक होइत हेतै?

कृष्णदवे-         होइते अछि‍।

              (कर्मदेवक प्रवेश)

कर्मदेव-          गोड़ लगै छी कक्का।

कृष्‍णदेव-         नीके रहह। गाम-घरक की हाल-चाल छह?
              (भीतरसँ कृष्‍णदेवक पत्नीक अबाज- गौआँ-घरूआ दुआरे रहब कठि‍न भऽ गेल। ककरो असपतालक काज होउ, आकि‍ कोट-कचहरीक दौड़ल चलि‍ आएत। जना सबहक तोरा एतै गारल होइ।
कान घुमा कर्मदेव सुनि‍ ग्‍लानि‍सँ भरि‍ गेल। मुदा समाजक प्रति‍नि‍धि‍ बुझि‍ सभ सहैक लेल तैयार।)

कर्मदेव-          काका, आइ धरि‍ एहेन रौदी नै देखने छलौं। ओना उमेरे कते अछि‍ मुदा जहि‍यासँ गि‍यान-परान भेल तहि‍यासँ एहेन समैसँ भेँट नै भेल छलए।

कृष्‍णदेव-         (सुधासँ) बुच्‍ची कर्मदेव भाय एलखुन। चाह नेने आबह।
              (दुनू भाए-बहि‍न जाइत अछि‍)

कर्मदेव-          अपना दि‍सक कि‍ हाल-चाल अछि‍?

कृष्‍णदेव-         नीक नहि‍ये कहक चाही। तखन तँ कौबलाक छागर बनल छी। कखनो काल सोचए लगै छी तँ लाज हुअए लगैए जे एते दरमाहा पावि‍यो कऽ पेंइच-उधार करए पड़ैए।

कर्मदेव-          कि‍अए?

कृष्‍णदेव-         छअ-छअ मासक दरमाहा पछुआ जाइए। मुदा घरक खर्च तँ हेबे करैए। एते दि‍न मकानक पाछू तबाह छलौं मुदा पैछला महि‍ना नि‍वृत्ति‍ भेलौं।

कर्मदेव-          बड़का चि‍न्‍ता पाड़ केलौं।

कृष्‍णदेव-         की पाड़ केलौं। आगू दि‍स तकै छी तँ ओहूसँ नमहर-नमहर चि‍न्‍ता घेरने अछि‍।

कर्मदेव-          से की?

कृष्‍णदेव-         दू बर्खक बाद बेटाकेँ मेडीकलमे नाअों लि‍खाएब तइपरसँ बेटी सेहो वि‍आहे जोकर भइये जाएत।

कर्मदेव-          हँ, से तँ हेबे करत।

कृष्‍णदेव-         पढ़ौनाइ-लि‍खौनाइ आब हल्लुक रहल। लाखक तँ कोनो मोजरे नै छै। अपन कमाइ हजारमे अछि‍ आ खर्च लाखमे अछि‍ तखन चि‍न्‍ता कि‍अए ने पछुऔत।

कर्मदेव-          अहाँकेँ की कमाइये टा अछि‍, गामोमे तते अछि‍ जे.......?

कृष्‍णदेव-         सएह कखनोकाल सोचै छी जे गामक खेत बेच बैंकेमे रखि‍ ली। जइसँ मौका-कुमौका काजो करब आ सुदि‍यो हएत।

कर्मदेव-          (आँखि‍ गड़ा कृष्‍णदेवकेँ देखैत) कक्का, परि‍वार माया-जाल छि‍ऐ कि‍ने? जे गरीब अछि‍ ओकरा छोटका माया पकड़ै छै आ जे जते नमहर हुनका ओते नमहर पकड़ै छन्‍हि‍।

कृष्‍णदेव-         ठीके कहै छह। राज दुखी परजा दुखी, जोगीकेँ दुख दूना। अपने बात कहै छि‍अ, गाममे कते खेत अछि‍ जे देखते छहक। समए सुभ्‍यस्‍त होइए तँ सालो भरि‍क बुतातो आ कि‍छु बेचि‍यो-बि‍कीन लइ छी। अइबेर सेहो नै हएत।

कर्मदेव-          अहाँ सभ पढ़ल-लि‍खल छी तखन........?

कृष्‍णदेव-         (मुस्‍कुराइत) ब्रह्मफाँसमे पड़ि‍ गेल छी। जहि‍ना बाबाकेँ तहि‍ना बाबूकेँ चौगामा लोक मालि‍क कहै छलनि‍, मलि‍काना नि‍माहि‍तो छलाह। हमरो लोक तहि‍ना बुझै छथि‍। मुदा ब्रह्मफाँस केहन लागल अछि‍ जे ओ मान-प्रति‍ष्‍ठा सम्‍पत्ति‍मे सन्‍हि‍या गेल अि‍छ। जँ एको धुर बेचब तँ सोझे प्रति‍ष्‍ठा प्रभावि‍त हएत।

कर्मदेव-          खाइर, छोड़ू खि‍स्‍सा-पि‍हानी। अपनेसँ भेँट करैले‍ समाज पठौलनि‍हेँ।

कृष्‍णदेव-         (अकचका कऽ) समाज पठौलखुनहेँ? की बात, की बात, बाजह।

कर्मदेव-          ऐ दुआरे पठौलनि‍हेँ जे गाममे खेत-पथारबला तँ अहीं सभ छि‍ऐ तँए सभकि‍यो एकठाम बैस गामक कल्‍याणक वि‍चार करी। बेर-बेर रौदी-दाही भऽ जाइए तेकर कोनो स्‍थायी समाधानक वि‍चार करी।

कृष्‍णदेव-         बहरबैया सभ रहताह?

कर्मदेव-          ओहीक जानकारी देवाले पठौलनि‍हेँ। अहीं लगसँ काज शुरू केलौंहेँ। एेठामसँ घनश्‍यामकाका ऐठाम होइत रघुनाथकाका ऐठाम जाएब। हुनका ऐठामसँ मोहनकाकाकेँ भेँट करैत गाम जाएब।

कृष्‍णदेव-         अखन घनश्यामक दि‍न-दुनि‍याँ दोसर भऽ गेल अछि‍। एक तँ जमीन-जत्‍थाबला लोक पहि‍नेसँ रहलाह तइपरसँ बैंकक नोकरी।

कर्मदेव-          हुनकर सोभावो कि‍छु आने ढंगक छन्‍हि‍।

कृष्‍णदेव-         सोलहन्नी बनि‍याँक चालि‍ पकड़ने अछि‍। खाइर, जुगो-जमाना तँ ओकरे सबहक छि‍ऐ।

कर्मदेव-          आठम दि‍न रवि‍केँ बैसार छी। से अपने समैपर पहुँच जाइऐ।

कृष्‍णदेव-         बड़बढ़ि‍याँ। परसू तक तँ तोहूँ घुरि‍ जेबह?

कर्मदेव-          हँ, हँ। जते जल्‍दी भऽ सकत ओते जल्‍दी घुमैक कोशि‍क करब।

कृष्‍णदेव-         चारि‍म दि‍न हमहूँ फोनपर सभसँ सम्‍पर्क करब। एहेन नै जे एक गोटे जाय आ दोसर पहुँचबे ने करी।

कर्मदेव-          हँ, हँ, सभ कि‍यो वि‍चारी लेब। आखि‍र समाजक तँ अहींसभ बुझनुक भेलि‍ऐ कि‍ ने?
पटाक्षेप।


सातम दृश्‍य

              (घनश्‍यामक घर। एजेंट शि‍वशंकरक संग।)

शि‍वशंकर-        मैनेजर सहाएब, हमर कम्‍पनीक इति‍हास सए बर्खक अछि‍। वस्‍तुक गुणवत्ता आ व्‍यापारि‍क साख एहेन अछि‍ जेकर बाँहि‍ पकड़ैबला दुनि‍याँमे एकोटा कम्‍पनी नै अछि‍। जे पाइप (बोरि‍ंगक) आ इंजन (दमकल) हम देब ओ दोसर कि‍यो नै दऽ सकैए।

घनश्‍याम-         बैंक की कोनो अप्‍पन छी। मात्र एक ब्रान्‍चक मनेजर छी। जाबे काज करै छी ततबे धरि‍। सरकारक नजरि‍ कनी गामक खेत दि‍स उठल तँए ई अवसर आएल। तइ अवसरसँ..........?

शि‍वशंकर-        हँ, हँ। हमहूँ कहाँ चाहैक छी जे अवसरक लाभ नै हुअए।

घनश्‍याम-         परसुए एक गोटे (दोसर कम्‍पनीक एजेंट) आएल रहथि‍ ओ पाँच प्रति‍शत कमीशनक बात केने छलाह। ओना अखन धरि‍ हमरो स्‍पष्‍ट आदेश उपरसँ नहि‍ये आएल अछि‍। मुदा पैछला मि‍टि‍ंगमे बाजाप्‍ता चर्चा भेल रहए। यएह बात हुनको कहि‍ पनरह दि‍नक वाद भेँट करैले कहलि‍यनि‍।

शि‍वशंकर-        अहाँ, भलहि‍ं ओइ कम्‍पनीक बात नीक जकाँ नै बुझैत होइऐ मुदा हम तँ रत्ती-बत्तीक बात बुझै छी। केहन घटि‍या माल बना-बना सप्‍लाइ करैए। ओ दोसर-दोसर बैंकसँ पता लगा लेब। हमर पाइप जँ ओकरापर पटैक देतै तँ थौआ-थाकर कऽ देतै। अहूँ तँ जनि‍ते छी जे नीक वस्‍तुक उत्‍पादनमे नीक खरचो बैइसै छै।

घनश्‍याम-         खरचा बेसी बैइसै छै तँ दामो बेसी होइ छै कि‍ने?

शि‍वशंकर-        हँ, से तँ होइ छै। मुदा घटि‍या माल कते दि‍न चलत सेहो ने देखबै?

घनश्‍याम-         से तँ बेस कहलौं मुदा जे आदेश हएत सएह ने करब।

शि‍वशंकर-        ऐठामक सक्षम कि‍सानक रि‍पोट देबै तँ कि‍अए घटि‍या मालक आदेश हएत। जइठाम पछुआएल कि‍सान अछि‍, पहि‍ने-पहि‍ल बोरि‍ंग देखते ओ कि‍आने गेल नीक-अधला।

घनश्‍याम-         हँ, से तँ मानलौं। मुदा सोलहो आना नेत बि‍गाड़ि‍यो लेब सेहो तँ नै।

शि‍वशंकर-        (बात लपकि‍) हँ, एह वि‍चार हमरो कम्‍पनीक अछि‍। जे आॅनर छथि‍ हुनकामे ई भावना कूट-कूट भरल छन्‍हि‍। मुदा बीचमे जे घटि‍या कारोवारी सभ अछि‍ वएह सभ ने नीको मालक बजारकेँ घेर घटि‍या बजार बना दइए। दू-पाइ बेसि‍यो लगने जँ उपभोक्‍ताकेँ नीक वस्‍तु भेटै छै तँ ओकर उपयोगो बेसी दि‍न करैए।

घनश्‍याम-         मानलौं, जे अहाँक समान तेज अछि‍ मुदा सभकेँ ने अपन-अपन कारोवार अछि‍। पद आ प्रति‍ष्‍ठाक लोभ ककरा नै छै। जे ब्रान्‍च जते लाभ बैंककेँ देखाओत ओते ने ओइ स्‍टापकेँ आगू बढ़ैक अवसर भेटतै।

शि‍वशंकर-        हँ, से तँ मानै छी। मुदा हमर ओहन कम्‍पनी अछि‍ जे देशे नै वि‍देशोमे सप्‍लाइ दैत अछि‍। दू-साल बीतैत-बीतैत घटि‍या कम्‍पनी सभकेँ बजारसँ भगा दैत अछि‍। भलहि‍ं नव बजार ठाढ़ भेने शुरूमे कि‍छु कमाए लि‍अए मुदा कते दि‍न।

घनश्‍याम-         खाइर, छोड़ू ओइ सभकेँ। मोट गाछक मोट मुसरो होइ छै। मुदा जहि‍ना अहाँ तहि‍ना हम। अपना दुनू गोटेक बीच संबंध केना बनत, तइपर वि‍चार करू।

शि‍वशंकर-        (ठहाका मारि‍) आब रास्‍ताक बात भेल ने। अखन ने अहाँ सोचै छी जे एक्के भागक आमदनी अछि‍ मुदा से नै। दुनू भाग अछि‍।

घनश्‍याम-        से केना?

शि‍वशंकर-        हमहूँ गामेसँ आएल छी। पि‍ताजी कर्मचारी छलाह। जखन लगमे बैसै छलि‍यनि‍ तखन जमीन-जत्‍थाक खेरहा करै छलाह।

घनश्‍याम-         (मुस्‍की दैत) की कहै छलाह?

शि‍वशंकर-        (हँसैत) कहै छलाह जे जखन जमीन्‍दारी चार्ज सरकार लेलक तखन हमरा सभकेँ अगहन आबि‍ गेल। खेत-खरि‍हानसँ लऽ कऽ आँगनि‍-कोठी धरि‍ धाने-धान।

घनश्‍याम-         नै बुझलौं?


शि‍वशंकर-        गाममे कत्ते कि‍सान छथि‍ जि‍नका जमीनक सही-सलामत सबूत छन्‍हि‍। एक तँ पहि‍नहि‍सँ जाल-फरेबी, तइपर बाढ़ि‍ घर-दुआरक संग कागजो पत्तर ने लऽ जाइ छलै।

घनश्‍याम-         (मुस्‍कुराइत) हँ, से तँ अछि‍।

शि‍वशंकर-        सरकारक सुवि‍धा तँ बैंके माध्‍यमसँ ने हएत। असल कार्यालय तँ बैंक हएत। जे कि‍छु ि‍कसानकेँ भेटत ओइले तँ बैंकेमे ने बौण्‍ड बनबए पड़त। बौण्‍डक लेल तँ ताजा सबूत (करेंट कागजात) चाही। ई तँ अहीं हाथक भेल।

घनश्‍याम-         (हँसैत) एक प्रति‍शत कम कऽ देब।

शि‍वशंकर-        बड़बढ़ि‍याँ। कारोबारक गप भइये गेल। चलै छी।

घनश्‍याम-         ओहि‍ना जाएब उचि‍त हएत। हम सभ मि‍थि‍लांचलक ने छी। अति‍थि‍केँ देवता बुझैत छी। कि‍छु रस-पानी केने बि‍ना........?

शि‍वशंकर-        आब कि‍ ओ जुग रहल जे सुरा-सुन्‍दरीसँ अति‍थि‍क सेवा होइत छल। हम सभ तँ तेहेन जुगमे आबि‍ गेलौं जे ने खाइक ठेकान आ ने आराम करैक।

घनश्‍याम-         (नोकरकेँ सोर पाड़ि‍) बहादुर, बहादुर?

              (पहाड़ी नौकरक प्रवेश)

              आँखि‍क इशारा घनश्‍याम देलनि‍। भीतर जा दूटा गि‍लास आ सनतोला रंगक शीशी नेने आबि‍ टेबुलपर रखि‍ चलि‍ जाइत। शीशी खोलि‍ दुनू गि‍लासमे लऽ गोटे पीलनि‍।)

शि‍वशंकर-        आब आदेश होइ। (कहि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत। घनश्‍यामो ठाढ़ होइत तखने कर्मदेवक प्रवेश। अबि‍ते कर्मदेव पएर छुबैत)

घनश्‍याम-         बौआ, हि‍नका वि‍दा कऽ दै छि‍यनि‍। नि‍चेनसँ गप-सप्‍प करब।

कर्मदेव-          हँ, हँ, कक्का। हमहूँ कि‍छु वि‍चारे करए एलौंहेँ।

              (हाथमे हाथ मि‍ला धनश्‍याम सड़क तक अबैत छथि‍। घुरि‍ कऽ आबि‍)

घनश्‍याम-         आब कहह बौआ, गाम घरक हाल-चाल। मुदा पहि‍ने कपड़ा खोलि‍ फ्रेश भऽ चाह पीब लाए। तखन नि‍चेनसँ गप-सप्‍प हेतै।

              (चाह अबैत। कमदेवक हाथमे कप धड़बैत घनश्‍याम अपन चाह आपस करैत।)

कर्मदेव-          अहाँ कि‍अए चाह घुमा देलि‍ऐ?

घनश्‍याम-         देखबे केलहक। चाह पीबैत-पीबैत पेट भरि‍या गेल अछि‍। खाली शीशी आ गि‍लास देख...।)

कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) कक्का, की कुशल गामक रहत। एक तँ अोहि‍ना सभतरहेँ खाधि‍मे खसल छी तइपरसँ तेहेन रौदी भऽ गेल जे परान बँचब लोकक कठि‍न भऽ गेल अछि‍।

घनश्‍याम-         जे बात कहलह ओ नान्‍हि‍टा नै अछि‍। मुदा बि‍ना केनौं तँ नहि‍ये कल्‍याण हएत। भने छुट्टीक दि‍न रहने मनो हल्‍लुक अछि‍। मुदा तैयो एक दि‍नमे सभ बात कहलाे नै जा सकैए। ओना तू पढ़ल-लि‍खल नवयुवक छह तँए कम्‍मो कहने बेसी बुझबहक।

कर्मनाथ-         अहाँ सभकेँ व्‍यवहारि‍क ज्ञान अछि‍ काका। हम तँ हालेमे कॉलेज छोड़लौंहेँ। गामक लेल तँ सोलहो आना अनाड़ि‍ये छी।

घनश्‍याम-         गाम तँ तेहेन भऽ गेल अछि‍ जे दू-चारि‍ गोटे, एकठाम बैस अपन सुख-दुख नि‍वारणक गप करब, सेहो ने अछि‍। सभ अपने ताले बेताल। कि‍यो अपनाकेँ कम बुझैले तैयारे नै होइत अछि‍। सबहक मन घेराएल अछि‍ जे हमरासँ बुद्धि‍यार दोसर के अछि‍?

कर्मदेव-          एना कि‍अए अछि‍?

घनश्याम-         अखन धरि‍क जे बेबस्‍था रहल ओ संस्‍कारे बि‍गाड़ि‍ देने अछि‍। मुदा अखन ऐ बातकेँ छोड़ह। अखन जे दुरकाल उपस्‍थि‍त भऽ गेल अछि‍ ओइपर गप करह।

कर्मदेव-          हँ, सएह बढ़ि‍याँ।

घनश्‍याम-         अखन दुइये गोटे छी। तहूमे भने डेरेमे छी। तँए अखन दुइये परि‍वारक गप करह। देखते छह जे गाममे सभसँ बेसी खेत अछि‍। बाबाक अमलदारीमे एकटा मुनहर आ तीनटा बखारीक संग हाथि‍यो छलनि‍। तखन नोकरी करैक जरूरत हमरा कि‍अए भेल?

कर्मदेव-          (कि‍छु सोचैत) कि‍अए भेल?

घनश्‍याम-         यएह सोचै आ बुझैक बात छी। हमरा सम्‍पत्ति‍ छलए, घरसँ बाहर जा पढ़लौं। मुदा जेकरा खाइयोक उपाए नै छै ओकर बाल-बच्‍चा स्‍कूल आँखि‍ देखत? खि‍स्‍सा तँ सभ कहतह जे बहि‍न रहि‍तो लछमी-सरस्‍वतीक बास एकठाम नै होइत छन्‍हि‍।

कर्मदेव-          (जि‍ज्ञासा करैत) छातीपर हाथ रखि‍ कहै छी जे ने अपने मनमे अखन धरि‍ ई बात उठल आ ने कि‍यो कहलनि‍।

घनश्‍याम-         ई तँ मात्र पढ़ै-लि‍खैक बात कहलि‍यह। पढ़नाइ-लि‍खनाइसँ जरूरी अछि‍ खेनाइ, रहनाइ आ बर-बेगारीसँ बचैक उपाए। आँखि‍ उठा अपने देखह जे कि‍ अछि‍?

कर्मदेव-          (आँखि‍ उठा उपर-नि‍च्‍चा देख) ठीके कहै छी काका। मुदा हएत केना? अहाँ सभ सन बुझि‍नि‍हार गामे छोड़ि‍ देने छी तखन अबूझ केना सबूझ बनत। जाधरि‍ बुझबे ने करत ताधरि‍ आगू डेग केना उठाओत?

घनश्‍याम-         यएह बात बुझैक जरूरत अछि‍।

कर्मदेव-          जाधरि‍ बुझत नै ताधरि‍ ओहि‍ना पाछु मुँहे गुड़कैत जाएत।

घनश्‍याम-         (दुनू हाथसँ दुनू आँखि‍ मलैत) बौआ, सच पुछह तँ अपना सभ स्‍वतंत्र देशक गुलाम छी। कि‍सानक देश पूँजीपति‍सँ हारि‍ गेल छी। भलहि‍ं एकरा पछुअाएब कहि‍ अपन प्रति‍ष्‍ठा बचा ली मुदा शासनसँ बाहर छी।

कर्मदेव-          सरि‍या कऽ कहि‍यौ कक्का। नीक नहाँति‍ नै बुझलौं।

घनश्‍याम-         सत बात बजैमे कनि‍यो धड़ी-धोखा नै होइए। जइ परि‍वारक सम्‍पत्ति‍सँ चालि‍स-पचास परि‍वार चलै छल तइ परि‍वारकेँ नोकरी करए पड़ै, कते लाजि‍मी छी। मुदा.....?

कर्मदेव-          काका, अहाँ लगसँ चाइक मन नै होइए। मुदा काजक भार बैइसै ने दि‍अए चाहैए। कि‍एक तँ एक नि‍श्चि‍त सीमामे काजक सम्‍पादन नै भेने, गड़बड़ाइये जाएत। अखन समाजक काजमे बन्‍हाएल छी। नि‍चेनमे दोसर दि‍न आरो बुझब।

घनश्‍याम-         हँ, हँ। से तँ ठीके कहै छह। मुदा आइ बुझि‍ पड़ि‍ रहल अछि‍ जे एकटा संगी भेटल, जे पेटक बात पेटमे लि‍अए चाहैए। कोन चीजक कमी अछि‍।

कर्मदेव-          से तँ नहि‍ये अछि‍।

घनश्‍याम-         ओना लोकक बुद्धि‍ वि‍पत्ति‍क मारि‍सँ घटैत-घटैत एते घटि‍ गेल अछि‍ जे समयक संग पकड़ि‍ नै पबैत अछि‍। खाइर छोड़ह। काजक बात कहह?

कर्मदेव-          गामक दशा बदसँ बदतर भऽ गेल अछि‍। माल-जाल उपैट रहल अछि‍। लोक भागि‍ रहल अछि‍। चलन्‍त सम्‍पत्ति‍ (खेत) पाछु मुँहे ससरि‍ रहल अछि‍। यएह सभ देख समाज वि‍चार केलनि‍ जे अगि‍ला रवि‍केँ सभ मि‍ल बैसार करी जइमे गामक कल्‍याणक बाट ताकी।

घनश्‍याम-         (अध हँसी हँसि‍) हृदए गामक संग अछि‍। तँए जते संभव हएत ओते समाजक सहयोग करब।

कर्मदेव-          जखने अहाँ सभ तैयार हेबै तखने समाजक कल्‍याण नि‍श्चि‍त हएत। आब जाइ छी।

घनश्‍याम-         तोरा जइ चीजक जरूरत हुअ, आन नै बुझि‍हह। बड़बढ़ि‍याँ जाह।

पटाक्षेप।



अाठम दृश्‍य

              (इंजीनि‍यर मनमोहनक डेरा। दोसरि‍ साँझ। मनमोहन आ संतोष गप-सप्‍प करैत)

मनमोहन-         बाउ, पहि‍ल ज्‍वानि‍ंग छि‍अह, तँए पहि‍ने घोसि‍या जाह। पछाति‍ बदलीक जोगार लगा देबह।

संतोष-          बाबू, भलहि‍ं अहाँ सभ दि‍न शहरमे रहलौं मुदा गाम गाम छी।

मनमोहन-         से की?

संतोष-          डेरासँ ऑफि‍स आ आॅफि‍ससँ डेरा करैत रहलौं, ऑफि‍समे बैस घरसँ सड़क धरि‍क नक्‍शा कागजपर बनबैत रहलौं जइसँ काजक दायरा सि‍कुड़ गेल। मुदा हम तँ चारि‍ बर्खमे माटि‍ये-पानि‍क गुण-अवगुन बुझलौं। अपार धन माटि‍-पानि‍मे छि‍पल अछि‍।

मनमोहन-         से केना?

संतोष-          अपना ऐठामक जे माटि‍-पानि‍ आ मौसम अछि,‍ ओ दुनि‍याँमे कतौ ने अछि‍। नान्‍हि‍टा देश जापान, जे ऐशि‍ये महादेशमे अछि‍, देखि‍यौ ओकरा।

मनमोहन-         की अछि‍, केहेन अछि‍।

संतोष-          ओना ओकर आन बात तँ नै पढ़लौंहेँ। मुदा ओकर भौगौि‍लक बनाबटि‍ आ उन्नति‍ जरूर पढ़लौंहेँ। अपना देशक (अखुनका, पहि‍लुका एक राज्‍य) दूटा राज्‍यक बराबरि‍ ओकर लम्‍बाइओ-चौड़ाइ छै आ जनसंख्‍यो छै। मुदा दुनि‍याँक अगुआएल देश अछि‍।

मनमोहन-         एतबे टा अछि‍?

संतोष-          एतबेटा कि‍अए कहै छि‍ऐ। ओहूमे दुनि‍याँक सभ देशसँ बेसी भूमकमो होइ छै।

मनमोहन-         भूमकम कि‍अए होइ छै?

संतोष-          ओइठाम ज्‍वालामुखी बेसी अछि‍। खाइर, ऐ बातकेँ छोड़ू। छोट देश आ कम आबादी रहि‍तो ओ ओते अगुआ कि‍अए गेल अछि‍।

मनमोहन-         कि‍अए अगुआएल अछि‍?

संतोष-          जहि‍ना ओकर खेती अगुआएल अछि‍ तहि‍ना कल-कारखाना। दुनि‍याँक बाजारमे ओकर माल पटने अछि‍। तहि‍ना खेति‍ओक छै। जते उपज (रकबा हि‍साबे) ओकरा होइ छै आते ककरा होइ छै।

मनमोहन-         केना एते उन्नति‍ खेती केलक?

संतोष-          ओइसँ बेसी अपनो सभ कऽ सकै छी। मुदा ऐठाम सभसँ पैघ कारण अछि‍ जे साठि‍ बर्ख आजादीक उपरान्‍तो ऐठामक लोक गुलामीक जि‍नगी जीब रहल अछि‍। स्‍वतंत्र नागरि‍कक संस्‍कार आ गुलामीक संस्‍कारमे अकास-पातालक अन्‍तर होइ छै। ओना अपनो देश उद्योग-धंधामे जते अगुआएल अछि‍ ओते खेती-पथारीमे नै अछि‍। जे भारी खाधि‍ दुनूक बीच बनल अछि‍।

मनमोहन-         एहेन बात अछि‍?

संतोष-          अपने बात लि‍अ। अखनो गाममे खेतबला परि‍वार अपन अछि‍। मुदा खेती करै छी? सभटा बटाइ लगौने छी। बटेदारो सभ तेहेन अछि‍ जे ने आेकरा खेत जोतैक उचि‍त साधन छै आ ने खेती करैक आन साधन। सोलहो आना मौनसूनपर ि‍नर्भर रहैत अछि‍। एक तँ साधन नै दोसर करैक ऊहि‍यो ओहन नै जइसँ दुनि‍याँक खेतीक बराबरीमे आैत।

मनमोहन-         ओते मत्‍था-पच्‍ची करैक कोन जरूरी छह। खाइत-पीबैत रामलला। जहुना जि‍नगी चलै छह तहुना जे नि‍माहि‍ लेबह, ओहो कम भेल।

संतोष-          नै बाबू, जि‍नगीक सार्थकता होइत अपनासँ आगू बढ़ि‍ करैक। सरकारोक आँखि‍ गाम दि‍स उठलहेँ, तँए ओकर उपयोग हेबाक चाही। जहि‍ना बाबा अमलदारीमे बखारीक शोभा छल तहि‍ना फेर हएत?

मनमोहन-         अखन जते असानीसँ शहरक लोक जीबैत अछि‍ ओते गाममे थोड़े हएत?

संतोष-          ओइसँ बेसी हएत। हँ अखन नै अछि‍। मुदा केना हएत ई तँ गामेक लोककेँ सोचए पड़तै। अपने बात लि‍अ, हजार-बजारक नोकरी खुसीसँ करै छी मुदा ई बुझै छि‍ऐ जे जँ अपन खेतकेँ समुचि‍त सुवि‍धा बना कएल जाएत तँ करोड़ोक आमदनी हएत?

मनमोहन-         हमरो नोकरी लगि‍चाइले अछि‍, संगे शरीरो एते भरि‍आ गेल अछि‍ जे कि‍छु करै जोकर नहि‍ये रहलौं। एहना स्‍थि‍ति‍मे केना जीब?

संतोष-          केना की जीब? जहि‍ना गाम छोड़ि‍ नोकरी करए शरहल गेलौं तहि‍ना शहर छोड़ि‍ गाम चलब। हमहूँ ओतबे दि‍न नोकरी करब जाबे तक अपन समुचि‍त खेतीक रूप नै पकड़ि‍ लेत। अहाँ नै देखै छि‍ऐ जे पँच-पँच-सत-सत सए रूपैये कि‍लो अन्नक बीआ, आन-आन देशबला बेचैए। कनी गौर कऽ कऽ देखि‍यौ जे कि‍लो भरि‍ अन्नक दाम कते अछि‍।

मनमोहन-         की हम अपने ओहन बीआ तैयार नै कऽ सकै छी। जरूर कऽ सकै छी। तहि‍ना नीक बना पशुपालन, नीक कि‍स्‍म बना माछ आ आरो कते कहब। हाथसँ करैक हि‍म्‍मत आ माथसँ सोचैक शक्‍ति‍क जरूरत अछि‍।

              (कर्मदेवक प्रवेश)

मनमोहन-         आ-हा-हा, बाउ कर्मदेव?

कर्मदेव-          (दुनू हाथ छातीपर रखि‍) प्रणाम, चाचाजी।

मनमोहन-         बाउ (संतोष) लोटामे पानि‍ नेने आबह। बाटक झमाड़ल छथि‍। तेकरा बाद चाह-पान चलतै।

              (संतोष भीतर जाइत अछि‍ आ लोटामे पानि‍ आनि‍, कर्मदेवक आगूमे ठाढ़ भऽ)

संतोष-          होउ, पहि‍ने पएर धोउ?

कर्मदेव-          अच्‍छा पछाति‍ धो लेब। कोनो कि‍ पएरे चललौंहेँ। सड़कपर सवारीसँ उतड़लौंहेँ।

मनमोहन-         चाह नेने आबह। (संतोष भीतर जाइत अछि‍।) आकि‍ पहि‍ने कि‍छु खेबह?

कर्मदेव-          नै, अखैन कि‍छु ने खाएब। मन गदगड़ल अछि‍। चाह पीब लेब।

              (दू कप चाह नेने संतोष अबैत अछि‍।)

मनमोहन-         (चाहक चुस्‍की लैत) अब कहह गामक हाल-चाह?

कर्मदेव-          गामक हाल-चाह की कहब चच्‍चाजी। नरकंकाल जकाँ गामक हाड़ झक-झक करैए।

              (कर्मदेवक बात सुनि‍ मनमोहन बेउत्तर होइत मुँहपर हाथ लऽ मूड़ी झुका कऽ सोचए लगै छथि‍। बीचमे ठाढ़ संतोष कखनो पि‍ता दि‍स देखैत तँ कखनो कर्मदेव दि‍स। मुदा कि‍छु बजैत नै। दुनू गोटेकेँ चुप देख।)

संतोष-          हम जेठ छी की कर्मदेव, बाबूजी?

मनमोहन-         कर्मदेवक तँ नै बुझल अछि‍ मुदा तोहर एक्कैसम लगि‍चाएल छह।

कर्मदेव-          हमरो एक्कैसम चलि‍ रहल अछि‍।

मनमोहन-         तखन तँ कि‍छुए मासक कम-बेसी हेतह। एक बतरि‍ये भेलह।

कर्मदेव-          चाचाजी, जौआँ बच्‍चाक अंतर पाँचे-दि‍स मि‍नट होइ छै मुदा ओहूमे जेठाइ-छोटाइ होइ छै?

मनमोहन-         हँ, से तँ होइ छै। मुदा ई तँ सर्टिफि‍केटसँ फरि‍एतह।

कर्मदेव-          ओहूसँ नीक जकाँ (इमानदरीसँ) नहि‍ये फड़ि‍आएत? कि‍एक तँ अहाँ घरमे भलहि‍ं जन्‍म टि‍प्‍पणि‍ हुअए मुदा हमरा घरमे नहि‍ये अछि‍। टि‍प्‍पणि‍ देख स्‍कूलमे नाओं लि‍खौने होय, मुदा हमर तँ अनठेकानी लि‍खाएल अछि‍।

मनमोहन-         भैयारी बनब पेंचगर छह। दुनू गाेरे दोस्‍ती कऽ लाए। संतोषोक वि‍चार गामेमे रहैक छै आ तहूँ गामेमे रहै छह।

कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) चाचाजी, अहाँ तँ अमृत फल खुआ देलौं। मि‍त्र तँ नरकोसँ उद्धार करैत अछि‍।

              (तीनू गोटेक ठहाका)
हम केमहर एलौं से तँ पुछबे ने केलौं?

मनमोहन-         गामसँ हटि‍ भलहि‍ं रहै छी, तँए कि‍ समाजक सभ कि‍छु छोड़ि‍ देलौं। दुआरपर आएल अति‍थि‍केँ पुछल जाइ छै जे केमहर एलौं? अति‍थि‍येक सेवा तँ धर्मखातामे लि‍खाइत अछि‍।

कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत) अपने कहै छी। अखन धड़फड़ीमे छी तँए बेसी गप-सप्‍पमे समए नै दऽ सकब। जते समए गमाएब तते काज पछुआएत।

              (मनमोहन आ संतोषो सुनैक इच्‍छासँ कर्मदेव दि‍स तकए लगैत।)

              रवि‍ दि‍न सामाजि‍क बैसार छी, सएह कहए एलौं।

मनमोहन-         कनी फरि‍छा कऽ बाजह?

कर्मदेव-          गामक मूल पूँजी (उत्‍पादि‍त) खेत छी। खेतेक उपजापर गामक लोक ठाढ़ भऽ जि‍नगी चलबैत अछि‍। समाज तँ बनि‍ गेल मुदा सामाजि‍क पूँजी नै बनि‍ सकल। जइसँ एते भारी खाधि‍ (दूरी) दुनूक बीच बनि‍ गेल जे अछैते पूँजि‍ये लोक पूँजी विहीन भऽ गेल अछि‍। अही सबहक विचारक लेल बैसार भऽ रहल अछि‍।

मनमोहन-         (मूड़ी डोलबैत) उद्देश्‍य तँ जवरदस अछि‍, मुदा......?

कर्मदेव-          मुदा की। ऐ धरतीपर सभसँ अगुआएल मनुष्‍य अछि, तखन?

संतोष-          कर्मदेव भाय, अहूँ हालेमे काओलेज छोड़लौंहेँ आ हमहूँ हालेमे। व्‍यवहारिक दौरमे दुनू गोरे अनाि‍ड़ये छी। किएक तँ जइ गाममे रहै छी ओ जमीनक एक निि‍श्चत सीमाक अन्‍तर्गत निर्धारित अिछ। जहिना जमीन तहिना बसल लोक। मुदा.....।

कर्मदेव-          मुदा की?

संतोष-          जमीनकेँ जाल कहल जाइ छै। जाल फँसबैक वस्‍तु छी। जहि‍ना मछवार जाल फेक माछ फँसबैत, शि‍कारी शि‍कार फँसबैत, तेहने शि‍कारी सभ जमीनक जाल फेक जमीनकेँ फँसा नेने अछि‍, तँ........?

              (आँखि‍ वि‍थाड़ि‍ मनमोहन संतोषपर देने। तहि‍ना कर्मदेव सेहो संतोषक आँखि‍पर आँखि‍ अटकौने।)

कर्मदेव-          तँए की?

संतोष-          छोटका जालमे छोट माछ आ‍ छोट शि‍कार फँसैत मुदा जेना-जेना जाल नमहर होइत तेना-तेना नमहर माछो आ शि‍कारो फँसैए। जखन कि‍ महजालमे छोट-पैघ सभ फँसैए। तहि‍ना अखन सम्‍पत्ति‍क दौड़मे वि‍श्व-जाल पसरल अछि‍।

कर्मदेव-          नीक जकाँ हमरो नै बुझल अछि‍। मुदा इशारा रूपमे ओइ दि‍न सुनलौं जइ दि‍न कओलेज दीक्षाक सटि‍फि‍केट समारोहमे शि‍क्षक लोकनि‍ वि‍दा केलनि‍।

कर्मदेव-          दीक्षाक अर्थ?

संतोष-          सेहो ओही दि‍न बुझलौं। कान फूकि‍ दीक्षा मंत्र देनि‍हार जेरक-जेर घुमैत अछि‍। मुदा दीक्षाक अर्थ होइत प्राप्‍ति‍। अहाँ कओलेजसँ नि‍कलैक सर्टिफि‍केट नै लेलौंहेँ?

कर्मदेव-          हँ, ऑफि‍ससँ तँ जरूर भेटल मुदा दीक्षान्‍त समारोह कऽ कऽ नै।

संतोष-          कि‍अए?

कर्मदेव-          नीक जकाँ तँ नै बुझल अछि‍ मुदा दस-पनरह बर्खसँ कहाँ दीक्षान्‍त समारोह भेलहेँ।

संतोष-          साले-साल हेबाक चाहि‍येक।

कर्मदेव-          भने भाय अहूँ गामेमे रहि‍ मोटर साइकिलसँ आॅफि‍सो करब आ गामोक काज देखब।

संतोष-          बेसी समए गामेक काजमे लागत।

कर्मदेव-          बहुत बढ़ि‍या, बहुत बढ़ि‍या।

पटाक्षेप


नवम दृश्‍य

              (डॉ. रघुनाथक घर। ओसारक कुरसीपर बैसल, माथपर हाथ दऽ आँखि‍ मूनि‍ सोचैत। चाह नेने पत्नी अनुराधा अबैत।)

अनुराधा-         आँखि‍ लगल अछि‍। चाह पीबू।

रघुनाथ-         आँखि‍ कि‍ लागत कपार। अनेरे आँखि‍ बन्न भऽ रहल अछि‍।

अनुराधा-         अपने डॉक्‍टर छी तखन......?

रघुनाथ-         अपने डाॅक्‍टर छी तकर माने.......?

अनुराधा-         तखन कि‍अए रोग......?

रघुनाथ-         रोगक सीमा-नाङरि‍ अछि‍। मनुक्‍खे जकाँ बि‍ना सींघ-नाङरि‍क जानवर जकाँ अछि‍। देहक रोगक डॉक्‍टर ने छी, मनक रोगक थोड़े छी।

अनुराधा-         से की?

रघुनाथ-         कोनो कि‍ देहेटा मे रोग होइए। मुदा मनोक तँ देहे जकाँ ने सभ कि‍छु छै।

अनुराधा-         तखन तँ आरो नीके कि‍ने। जहि‍ना थर्मामीटरसँ बोखार परखल जाइ छै, तहि‍ना ने मनोक बोखार परखैक यंत्र हेतइ। तइसँ नापि‍ दवाइ खा लि‍अ।

रघुनाथ-         वि‍धाता ऐठाम जखन बुइधि‍क बँटवारा हुअए लगल तखन सभकेँ चम्‍मछ लऽ लऽ देलखि‍न आ अहाँ बेरमे बरतने उझैल देलनि‍।

अनुराधा-         एना बताह जकाँ कि‍अए बजै छी? जखन मन गड़बर भऽ गेल तखन ओकर प्रति‍कार करब। हमहूँ सहयोगी छी, सहयोग करब आकि‍ सभकेँ भगा अपने पगलखन्नाक हरीमे ठोकाएब। मन थीर करू। चाह पीबू सि‍गरेट नेने अबै छी।

              (अनुराधा भीतर जाइत। रघुनाथ एक-एक चुस्‍की चाह पीबैत आ कखनो अकास दि‍स तँ कखनो नि‍च्‍चा दि‍स तकैत।)

रघुनाथ-         (बड़बड़ाइत) भूमकम भेलापर उनटनो होइत। जहि‍ना अकासक गाछ-जमीनपर खसैत तहि‍ना ने जमीनो अकास दि‍स चढ़ैत। मुदा पाबस तँ अकासक अमृतसँ सीचैत।

              (रघुनाथकेँ बड़बराइत देख अनुराधा मुहथरि‍पर ठाढ़ भऽ सुनए लगली।)

              आ-हा-हा कि‍ सुन्‍दरता पाबसोक होइत। करोड़ो-अरबो जीब जन्‍तुकेँ सृजनो करैत, अमृतेसँ स्‍नानो करबैत, पीबोक लेल दैत आ दुनूक (अकास-जमीन) बीच अमृतेक बाटो बनबैत।

अनुराधा-         (मने-मन उदास भऽ) भरि‍सक बुद्धि‍क बीमारी पकड़ि‍ लेलकनि‍। (आगू बढ़ैत) लि‍अ सि‍गरेट-सलाइ नेने एलौं। चाहो तँ नहि‍ये पीलौंहेँ?

रघुनाथ-         हमरे नै सुझैए आकि‍........। मन भरि‍ गेल अहाँ कहै छी चाहो ने पीलौं।

              (रघुनाथक मुँहक सुरखी उदास होइत जाइत)

अनुराघा-         मुँहक सुरखी बदलि‍ रहल अछि‍?

रघुनाथ-         लाउ, सि‍गरेट पीब तखन चुहचुही आओत। की भकुआएल जकाँ बुझि‍ पड़ै छी? (सलाइ खरड़ि‍ सि‍गरेट धड़ा कस खींच उपर मुँहे धुआँ फेकैत।) देखि‍औ धुँआ केना उपर मुँहे जाइए।

अनुराधा-         ओछाइन ओछा दै छी। आराम करू।

रघुनाथ-         कहलौं तँ वि‍धाता बुइधि‍क बरतने अहाँ आगूमे उझैल देलनि‍। जागलमे जइ रोगकेँ भगाओल (इलाज) नै हएत सुतलमे केना हएत?

अनुराधा-         कि‍ सभ होइए?

रघुनाथ-         बैसू, कहै छी। ब्रज कन्‍या तँ अहींटा छी तँए अपन दि‍लक-दुख अहाँकेँ नै कहब तँ दोसराकेँ कहने कि‍ हएत?

अनुराधा-         (मुस्‍की दैत) से की, से की?

रघुनाथ-         अहाँ जे भकुआएल बुझै छी से ठीके बुझै छी। मुदा नीनक भक्क नै जि‍नगीक रास्‍ताक भक्क लागल अछि‍! कि‍महर जाए‍ब से चौरासापर बुझि‍ये नै पबै छी।

अनुराधा-         बीचमे ठाढ़ भऽ कऽ देखि‍यौ जे कोन बाटक दुभि‍ (खढ़-पात) पएरक रगड़सँ उड़ि‍ गेल छै आ कोन दुभि‍याह अछि‍।

रघुनाथ-         कहलौं तँ बेस बात, मुदा भकुआएल मने दुखबो करि‍ऐ तखन ने। आन्‍हरे जकाँ सभ अन्‍हारे बुझि‍ पड़ैए। (दुनू आँखि‍ दुनू हाथसँ मलैत)
कि‍ सपना छल आ की देख रहल छी।

अनुराधा-         से की? से की?

रघुनाथ-         सभ कि‍छु समाप्‍त भऽ रहल अछि‍। आकि‍ जि‍नगि‍ये समाप्‍त भऽ रहल अछि‍ से बुझि‍ये ने पाबि‍ रहल छी।

अनुराधा-         से की?

रघुनाथ-         परसु रि‍टायर करब।

अनुराधा-         सभ रि‍टायर करैत अछि‍ आकि‍ अहींटा करब?

रघुनाथ-         खाली नोकरि‍येटा सँ नै ने रि‍टायर करब। देहोक रोग (ब्‍लड प्रेशरो) कि‍छु बढ़ि‍ गेल अछि‍ जइसँ रोगी सबहक शि‍काइत आबि‍ रहल अछि‍।

अनुराधा-         से तँ आब उमेरो भेल कि‍ने?

रघुनाथ-         उमेरक असर शरीरपर पड़ै छै आकि‍ ब्रेनपर। आमक आठी जकाँ कोइलीसँ पकुआ बनत आकि‍ पकुआसँ कोइली।

अनुराधा-         तखन कि‍अए एना भेल?

रघुनाथ-         ब्रेने छि‍ड़ि‍या गेल। एकरा केना समटब।

अनुराधा-         आबो समटू।

रघुनाथ-         छि‍ड़ि‍आएल बौस बीछ-बीछि‍ समटल जा सकैए। छि‍ड़ि‍आएल मन केना समटल जाएत? पाछु उनटि‍ तकै छी तँ कतौ गड़बड़ नै देखै छी। मुदा आगू तकै छी तँ नोकरीक संग प्राइवेट कमाइयोकेँ जाइत देखै छी।

अनुराधा-         से केना?

रघुनाथ-         चढ़त छल तखन मकान बनेलौं, क्‍लीनि‍क बनेलौं। रेस्‍ट-हाउसक संग जाँच-पड़ताल करैक यंत्र कीनलौं। मुदा आइ की देखै छी?

अनुराधा-         की नै देखै छी, कोन चीजक कमी अछि‍?

रघुनाथ-         अपने मुइने जग मुअए। जइठीन रोगीक भीड़ लागल रहै छलए तइठीन गोटि‍-पङरा आबि‍ रहल अछि‍। तहि‍ना रेस्‍ट-हाउस ढन-ढन करैए। सप्‍ताहक-सप्‍ताह जाँच मशीन बैसले रहैए। अपनो दरमाहा अधि‍याइये जाएत। मुदा खर्च.......?

अनुराधा-         एना कि‍अए भेल?

रघुनाथ-         समए कते आगू बढ़ि‍ गेल, से नै देखै छी। सभ चीज पुरान पड़ि‍ गेल।

अनुराधा-         ऐ सभ दि‍स नजरि‍ नै गेल छल?

रघुनाथ-         नजरि‍ कोना जाएत। नजरि‍ तँ शान्‍तचि‍त्तमे टहलैत अछि‍। से कहि‍यो कहाँ भेल। दि‍न-राि‍त एकबट्ट कऽ काजमे लागल रहलौं। जि‍नगीक वि‍षयमे सोचैक पलखति‍ये कहि‍या भेल।

अनुराधा-         चि‍न्‍तो केने तँ नहि‍ये हएत।

रघुनाथ-         से तँ नहि‍ये हएत। मुदा अनहरि‍या राति‍ जकाँ अन्‍हार तँ बढ़ले जाइए।

              (कर्मदेवक प्रवेश।)

कर्मदेव-          (दुनू हाथ जोड़ि‍) गोड़ लगै छी चच्‍चाजी। (अनुराधाक पएर छुबि)‍ गोड़ लगै छी चाचीजी।

रघुनाथ-         गाम-घरक हाल-चाल कहह?

कर्मदेव-          गाम-घरक कि‍ हाल-चाल रहत। रद्दी कागज जकाँ गामोक दशा भऽ गेल अछि‍। पैछला साल तँ कनी-मनी नीको छल जे ऐ बेरक रौदी तँ उजाड़ि‍ लगा देलक।

रघुनाथ-         बौआ, अपनो दशा ओहने भऽ गेल। मुदा कहबो ककरा करबै। अपन हारल बजि‍तो लाज होइए। मुदा.......?

कर्मदेव-          मुदा की?

रघुनाथ-         यएह जे गामक समाजमे अखनो बेर-बि‍पत्ति‍ पड़लापर एक-दोसरकेँ सहारा दैत। मुदा बजारक समाज तँ ठीक उल्‍टा अछि‍। सभ अपने ताले-बेताल अछि‍। ककरा एते छुट्टी छै जे अनको हाल-चाल पूछत।

कर्मदेव-          चाचाजी, अखन हमहूँ औगताइले छी। कहि‍यो नि‍चेनसँ गप-सप्प करब। अखन जइ काजे एलौं से गप करू।

रघुनाथ-         केहेन काजे धड़फराएल छह?

कर्मदेव-          गामक दशा देख समाजक (गौआँक) वि‍चार भेलनि‍हेँ जे जेहो सभ बाहर नोकरी-चाकरी करै छथि‍ हुनको सभकेँ बजा समाजक कल्‍याण केना हएत? तइले एकठाम बैस रास्‍ता नि‍काली। सएह कहए एलौंहेँ।

रघुनाथ-         छाँहो-छुहो तँ कि‍छु कहह?

कर्मदेव-          चाचाजी, गाममे जे छथि‍ हुनका दूधक डाढ़ी जकाँ अपन खेत छन्‍हि‍। जखन कि‍ जे बाहर रहै छथि‍, बेसी जमीन हुनके सबहक छन्‍हि‍। तइले बैसार भऽ रहल अछि‍।

रघुनाथ-         वि‍चार तँ बड़ दि‍व्‍य अछि‍, मुदा........?

कर्मदेव-          मुदा की?

रघुनाथ-         थाके पॉव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी।' सोझे आगूमे देखै छह। धानक खखड़ि‍योसँ बत्तर हालत भऽ गेल अछि‍। जेहो जि‍नगी बाकी (बँचल) अछि‍ ओहो पहाड़ जकाँ बुझि‍ पड़ैए।

कर्मदेव-          से कि‍अए, चाचाजी?

रघुनाथ-         बौआ, डाॅक्‍टरी छोड़ि‍ आन चीज तँ पढ़लौं नै जइसँ दुनि‍यो-दारीक बात बुझि‍तौं। ऐ अवस्‍थामे आब बुझि‍ पड़ैए जे जि‍नगि‍ये ओझरा गेल।

कर्मदेव-          जखने सभ मि‍ल एकठाम वि‍चार करब तखने ने अहूँक ओझरी छुटि‍ जाएत।

रघुनाथ-         (कने गुम रहि‍, कि‍छु सोचि‍) बहरबैया सभ रहताह?

कर्मदेव-          आश्वासन तँ सभ देलनि‍। तखन तँ........?

रघुनाथ-         कहि‍याक समए बनौलनि?

कर्मदेव-          समए तँ समाजे बनौने छथि‍। अहाँकेँ जानकारी दि‍अ एलौं। रवि‍ दि‍न दू बजेसँ बैसार छी।

रघुनाथ-         बड़बढ़ि‍या। जरूर भाग लेब। परसुए सेवा-नि‍वृत्ति‍ सेहो भऽ रहल छी।

कर्मदेव-          परसुए सेवा-नि‍वृत्त भऽ रहल छी?

रघुनाथ-         (मि‍ड़मि‍ड़ा कऽ) हँ, बौआ।

कर्मदेव-          (मुस्‍की दैत।) चाचाजी, अहीं सन-सन लोकक जरूरत समाजकेँ छै।

रघुनाथ-         से की?

कर्मनाथ-         ऐठामक काज ने हरा गेल। मुदा गाममे अहाँ सभले ओते काज अछि‍ जे कएले ने पाड़ लागत।

रघुनाथ-         (कि‍छु सोचि, मुस्‍कुराइत) बेस कहै छह बौआ।

पटाक्षेप


दसम दृश्‍य

              (कृष्‍णदेव, घनश्‍याम, मनमोहन आ रघुनाथ। घनश्‍याम घर। चाह-पान, सि‍गरेट चलैत)

घनश्‍याम-         कर्मदेव जे कि‍छु कहलनि‍, तइपर तँ अपनो सभ वि‍चारि‍ लेब।

कृष्‍णदेव-         अबस-अबस।

घनश्‍याम-         एक तँ बैंकक नोकरी, तहूमे ब्रान्‍चक जबावदेही। भरि‍ दि‍न लोकक चरबाहि‍ करैत-करैत परेशान रहै छी। जइसँ गाम-समाजक कुशलो-क्षेम नै बुझि‍ पबै छी। तँए अपने दि‍शा-ि‍नर्देश दि‍यौ।

मनमोहन-         बहुत बढ़ि‍या, बहुत बढ़ि‍या घनश्‍याम भाय बजलाह।

कृष्‍णदेव-         कहलौं तँ बड़बढ़ि‍या, मुदा जे चकचकी अहाँ सबहक अछि‍ ओ थोड़े अछि‍।

रघुनाथ-         मनक बात अहाँ बुझि‍ गेलौं।

कृष्‍णदेव-         अहाँ सभ कागज-पत्रक बीच रहै छी। हम कि‍तावक बीच अन्‍तर एतबे अछि‍। मुदा रहै छी तँ सभ कागजेक बीच।   

रघुनाथ-         कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या, मुदा हम सभ सादा कागजक बीच रहै छी अहाँ सजाैल कागजक बीच।

कृष्‍णदेव-         सभकेँ अपन-अपन बुझैक दायरा होइ छै, तँए अहूँ सबहक वि‍चारकेँ नकारि‍ नहि‍ये सकब। मुदा कि‍छु छि‍पा कऽ बाजब उचि‍त नै, तँए.......?

रघुनाथ-         तँए की? जखने अपन-अपन वि‍चार सभ व्‍यक्‍त करब तखने ने चारि‍ परि‍वारक तीत-मीठ सोझामे औत। जखने तीत-मीठ सोझामे औत तखने ने कि‍छु........?

कृष्‍णदेव-         ई बात तँ सभ बुझै छि‍ऐ जे गामक-समाजक- पढ़ल लि‍खक अपने सभ छि‍ऐ। मुदा अपनो सबहक बीच तँ चारि‍ रँगक जि‍नगि‍यो अछि‍। जइठाम अहाँ सभकेँ दरमाहाक संग आनो आमदनी अछि‍ तइठाम हमरा तँ मात्र दरमेहेटा अछि‍।

मनमोहन-         (मूड़ी डोलबैत) हँ, ई तँ अछि‍।

कृष्‍णदेव-         मुदा परि‍वार तँ जहि‍ना अहाँ सबहक अछि‍ तहि‍ना अछि‍। खेनाइ-पीनाइ, कपड़ा-लत्ता, पढ़ाइ-लि‍खाइ तँ सभकेँ अछि‍। कनी सोचि‍ कऽ देखि‍यौ जे हम अहाँ सभसँ पछुआएल छी कि‍ने।

रघुनाथ-         मानै छी। मुदा गामक बैसारमे गामक चर्च हएत कि‍ने। तइ हि‍साबसँ तँ सभ जमीनदारे (अधि‍क जमीनबला, नै कि‍ मालगुजारीबला) छी। गामक बारह आना जमीनक मालि‍क तँ अपने सभ छि‍ऐ कि‍ने।

कृष्‍णदेव-         हँ, से तँ छि‍ऐहे। मुदा ओझरि‍यो तँ असान नै अछि‍। जइ तरहक जि‍नगी बनि‍ गेल अछि‍ ओते कमाइ-दरमाहा-सँ पूरा नै पबै छी। अपने गाममे नै रहै छी जे खेति‍यो करब। तइपर सँ जँ एको धुर बेचब तँ प्रति‍ष्‍ठा माटि‍मे मि‍लत।

मनमोहन-         तखन?

कृष्‍णदेव-         जँ सबुर कऽ छोड़ि‍यो देब सेहो नै हएत।

मनमोहन-         ई तँ ि‍वचि‍त्र ओझरीमे फँसि‍ गेल छी?

कृष्‍णदेव-         बाल-बच्‍चाकेँ नीक स्‍कूल-कओलेजमे नै पढ़ाएब सेहो नै हएत। कि‍छुए दि‍नक उपरान्‍त रि‍टायर करब तखन औझुका जकाँ दरमहो नै रहत। तीन-तीनटा कन्‍यादान अछि‍।

रघुनाथ-         अच्‍छा, गामक बैसार संबंधमे वि‍चार रखि‍यौ।

कृष्‍णदेव-         की वि‍चार राखब, कि‍छु फुड़बे ने करैए।

घनश्‍याम-         आब अपन वि‍चार दि‍यौ डाॅक्‍टर सहाएब?

रघुनाथ-         कृष्‍णदेव बाबूसँ कनि‍यो नीक नै छी।

घनश्‍याम-         से कि‍अए? हुनके जकाँ बेतनेटा पर तँ नै छी?

रघुनाथ-         बेस कहलौं। दुरसक ढोल सोहनगर लगै छै। मुदा लगमे.......।

मनमोहन-         जँ लग तबला हाथ बजौल जाए, तखन.......?

रघुनाथ-         बेस कहै छी। तबले जकाँ ढोलोक मुँह छोट आ पॉलि‍स कएल होइए। रि‍टायर भेने पेन्‍शन (अधा दरमाहा) पर आबि‍ गेलौं। जते जाँच-जुच करैक यंत्र कीनने छी ओ पैछला खाढ़ि‍क भऽ गेल। नवका ठाढ़ भऽ गेल। अपन जे इलाजक प्रक्रि‍या छल ओ पछड़ि‍ गेल।

मनमोहन-         आगूक कि‍ साचै छि‍ऐ?

रघुनाथ-         रोग-रोगी आ इलाज छोड़ि‍ सोचलौं कहि‍या जे आन बात सोचब।

मनमोहन-         जीब केना?

रघुनाथ-         जे भाेग-पारसमे हएत से थोड़े ि‍कयो बाँटि‍ लेत। जाबे सुखक दि‍न छल सुख केलाैं, दुखक दि‍न औत दुख करब। यएह ने भगवानक लीला छि‍यनि‍।

घनश्‍याम-         अपने सभ जे एना सोचबै तखन समाज केना आगू बढ़त? समुद्रक ज्‍वार जकाँ तँ समाजक गति‍ नै छैक।

रघुनाथ-         (कने गुम्‍म भऽ, मूड़ी डोलबैत) प्रश्न तँ वि‍चारणीय अछि‍। मुदा आगूक स्‍पष्‍ट रास्‍ता कहाँ देख पबै छी। कनी समए ि‍दअ, पछाति‍ कहब।

मनमोहन-         भाय सहाएब, अहाँ अहाँसँ कनि‍यो नीक नै छी।

घनश्‍याम-         (मुस्‍कुराइत) से की। से की?

मनमोहन-         ओना पाँच बर्ख नोकरी बँचल अछि‍। मुदा जे रूखि‍ देख रहल छी ओइसँ बुझि‍ पड़ैए जे आगूमे बनरफाँस लटकल अछि‍।

घनश्‍याम-         से केना?

मनमोहन-         अपने इंजीनि‍यर बनि‍ गामसँ शहर एलौं आ बेटा एग्रीकल्‍चर पढ़ि‍ गामेक ब्‍लौकमे जुआइन केलक।

घनश्‍याम-         ई तँ बढ़ि‍याँ बात।

मनमोहन-         अपने कतऽ रहब। सभ दि‍न शहरमे रहलौं आब गाममे नीक लागत?

घनश्‍याम-         शहरेमे रहब।

मनमोहन-         कहलौं तँ बड़बढ़ि‍या। अपन बेटा-पुतोहू गाममे रहत। रि‍टायर भेलापर सरकारि‍ये अमि‍ला-फमि‍ला रँगगर कपड़ा पहि‍रा वि‍दा कऽ देत। तखन.......?

घनश्‍याम-         तखन की?

मनमोहन-         बुढ़ाढ़ीमे एक गि‍लास पानि‍यो के देत।

घनश्‍याम-         गामे चलि‍ आएब।

मनमोहन-         (मजबूरी हँसी) सभ दि‍न पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच प्रति‍ष्‍ठा बना रहि‍ रहल छी। मुदा गामक कोन लूरि‍ अछि‍ जे बुद्धि‍क उपयोग करब।

घनश्‍याम-         नै बुझलौं?

मनमोहन-         जेकरा जइ काजक लूरि‍ रहल ओ ओहीमे ने बुद्धि‍यार अछि‍। मुदा हम?

रघुनाथ-         तीनू गोटेक बात तँ सभ सुनबे केलौं। अहीं (घनश्‍याम) आब वि‍चार ि‍दयौ।

घनश्‍याम-         भाय सहाएब, अपने बि‍गड़ि‍ गेलि‍ऐ।

रघुनाथ-         बि‍गड़ब कि‍अए। मुदा.......।

घनश्‍याम-         मुदा की?

रघुनाथ-         बि‍नु बुझल पैघ रोग रहि‍तो जँ रोगीकेँ रोगक जनतब नै दऽ रोगमुक्‍त होइले दवाइ खाइले कहबै तँ हँसी-खुशी खाइए।

घनश्‍याम-         हँ से तँ खाइए। मुदा इहो तँ होइ छै जे समुचि‍त ढंगसँ रोगक जनतब दऽ इलाजोक प्रक्रि‍याक जनतब देल जाए तँ आरो खुशीसँ दवाइ खाइए।

मनमोहन-         हँ, इहो तँ होइए।

घनश्‍याम-         मनमोहन भाय, जहि‍ना रोगक नि‍दान डॉक्‍टर, इंजीनि‍क नि‍दान इंजीनि‍यर करैत छथि‍ तहि‍ना समाज कल्‍याणक नि‍दान समाजशास्‍त्री करै छथि‍। मुदा.......?

मनमोहन-         मुदा की?

कृष्‍णदेव-         (बि‍चहि‍मे) समाजशास्‍त्री तँ हमहूँ छी। जि‍नगी भरि‍ समाजशास्‍त्रे पढ़लौं। मुदा......।

घनश्‍याम-         भाय सहाएब, अपने अधि‍कारी वि‍द्वान छि‍ऐ, तँए........?

कृष्‍णदेव-         तँए की?

घनश्‍याम-         हम बैंकर नै छी, मुदा बैंकक काज केने समाज आ धनक संबंध थोड़-थाड़ बुझए लगलौं। तँए कृष्‍णदेव भायसँ आग्रह करबनि‍ जे जँ आदेश दथि‍ तँ कि‍छु कहबनि‍।

कृष्‍णदेव-         जखन सभ एक प्रश्नपर बैसल छी तखन आदेशक कोन प्रश्न। अखन तँ सभ अपन-अपन सुझि‍क अनुसार सुझाव राखि‍ रहल छी।

घनश्‍याम-         अपने तँ कि‍ताबमे लि‍खल पढ़ै छी मुदा कि‍ताबी बात ताधरि‍ ठमकल रहत जाधरि‍ समाजक गति‍क अनुकूल चलैत नै रहत।

कृष्‍णदेव-         (साँस छोड़ि‍) हूँ......।

घनश्‍याम-         अखन जइ काजे बैसलौं तइपर वि‍चार करू। कोनो काज करैक जेहेन इच्‍छा शक्‍ति‍ लोकमे रहै छै ओ ओते आगू बढ़ि‍ कऽ सकैए। तँ कोनो ऐहेन समस्‍या नै छै जेकर समाधान नै भऽ सकैए। सभ कि‍यो आदेश दी तँ.......?

              (तीनू गोटे)

तीनू गोटे-        (कृष्‍णदेव, रघुनाथ आ मनमोहन) आदेशे-आदेश। खुलि‍ कऽ बाजू।

घनश्‍याम-         रघुनाथ भाय छथि‍, शहरमे पछड़ि‍ रहला अछि‍ मुदा गाम तँ ओइ जगहपर ठाढ़ अछि‍ जइ जगहपर रोगक इलाजक लेल अखनो झाड़-फूक आ टोना-टापर होइए।

रघुनाथ-         (मुस्‍की दैत) बेस कहलौं।

घनश्‍याम-         एहि‍ना सभ समस्‍या अछि‍। जरूरत अछि‍ एक-एक समस्‍यामे एक-एक आदमीकेँ सटाएब। जखने समस्‍यासँ आदमी सटत तखने......।

रघुनाथ-         ठीके कहै छी घनश्‍याम। गामक संबंधमे.......?

घनश्‍याम-         भाय, एक तँ ओहि‍ना बाढ़ि‍-रौदीक चपेटमे पड़ि‍ गाम अधमरू भऽ गेल अछि‍, तइपर लोकोक कि‍रदानी एहेन रहैए जे आरो गर्तमे ठेल रहल अछि‍।

कृष्‍णदेव-         ऐठाम चारि‍ये गोटे छी, तँए सबहक (सौंसे गौआँक) बीचमे बैस जे वि‍चार करब ओ ओते अधि‍क नीक हएत।

पटाक्षेप


एगारहम दृश्‍य

              (नसीवलालक दरबज्‍जा। कर्मदेव आ नसीवलाल गप-सप्‍प करैत।)

नसीवलाल-       काजक की समाचार अछि‍ बौआ कर्मदेव?

कर्मदेव-          तीत-मीठ दुनू अछि‍।

नसीवलाल-       (मुस्‍कुराइत) तीत-मीठ दुनू अछि‍। बेसी कोन अछि‍?

कर्मदेव-          स्‍पष्‍ट कहाँ बुझि‍ पौलौ। जँ स्‍पष्‍ट रहैत तँ दुनूकेँ मि‍ला कहि‍तौं।

नसीवलाल-       ओ मि‍लबो मोसकि‍ल अछि‍।

कर्मदेव-          ओ कोना मि‍लत?

नसीवलाल-       प्रकृति‍क अद्भुत खेल अछि‍। कि‍छु वस्‍तु एहेन होइए जे अपन सुआद आरो गाढ़ बनबैए। तँ कि‍छु अपने सुआदे बदलि‍ लैत अछि‍। तीतसँ मीठ आ मीठसँ तीत भऽ जाइए। कि‍छु एहनो अछि‍ जे ने तीते अछि‍ आ ने मीठे। दुनूक बीच अछि‍।

कर्मदेव-          एहेन पेंचगर स्‍थि‍ति‍मे सोझराएब कठि‍न अछि‍।

नसीवलाल-       एहेन कोन दुख अछि‍ जेकर दवाइ नइए। भलहि‍ं ओ दवाइ समझसँ बाहर कि‍अए ने हुअए।

कर्मदेव-          तखन?

नसीवलाल-       सभ खेल जि‍नगीये ले चलैए। ऐ प्रश्नक उत्तर दू गोटेक बीच नै भेटत। प्रश्नो ओझराएल-ए। एहेन ओझरी लगल अछि‍ जेहन अमती आ तेतरि‍क सुआद बेराएब।

कर्मदेव-          (वि‍हुँसैत) आगू कि‍ करब?

नसीवलाल-       जानकारी (बैसारक) भेलापर कि‍ कहलनि‍?

कर्मदेव-          बैसारमे भाग लेबाक आश्वासन तँ सभ देलनि‍।

              (आभा आ शान्‍तीक प्रवेश)

नसीवलाल-       आभा आ शान्‍ती तँ आबि‍ये गेलीह। चारि‍ गोटे सेहो भेलौं। कनी पहि‍ने कि‍ कनी पाछू ओहो सभ एबे करताह।

कर्मदेव-          हुनका सभकेँ बजौने आबी।

नसीवलाल-       नै जरूरी अछि‍। जि‍नगी दू रस्‍ते चलैत अछि‍। एक काजक सवारीसँ दोसक खाली-खाली।

कर्मदेव-          की मतलब?

नसीवलाल-       काजक सवारी कतबो उभर-खाभर होइत कि‍अए ने चलए मुदा सुरो-सुन्‍दरीसँ बेसी सोहनगर होइए। जइसँ समैक ठेकाने बि‍ला जाइत अछि‍।

कर्मदेव-          तखन?

नसीवलाल-       एबे करताह। काजक अपन महत्‍व होइए। जे महत्‍व सभ समान दृष्‍टि‍ये नै बुझैत छथि‍। जेकर फल समए पाबि‍ नीकसँ बेसी अधले भऽ जाइए।

आभा-           हमहूँ घरपर सँ सोझे कहाँ एलौं। जलखै खा कऽ जे नि‍कललौं से नि‍कलले छी।

कर्मदेव-          कतौ बाहर गेल छलौं?

आभा-           गामसँ कहाँ बहराएल छलौं। मुदा गामोमे तँ रँग-वि‍रँगक सरोवर, झील, जंगल, पहाड़ अछि‍। जेकरा पार करैमे कि‍छु अधि‍क समए, सरपट रास्‍तासँ, बेसी लगि‍ते अछि‍।

कर्मदेव-          कि मतलब?

आभा-           मतलब यएह जे एक तँ ओहि‍ना कुम्‍मकर्णी नीनमे अधासँ बेसी सुतल अछि‍। तइपर सँ दुखक दर्द सेहो सुता रहल अछि‍।

नसीवलाल-       ई तँ होइते अछि‍ जे जइ खेतकेँ जोत-कोड़ नै होइ छै ओ रौद-वरसात पाबि‍ परती बनि‍ जाइए। मुदा पृथ्‍वी पुत्र ओकरो उपजाउ बनाइये लइए।

कर्मदेव-          (मूड़ी डोलबैत) हूँ-अ-अ।

नसीवलाल-       जे जि‍बटगर अछि‍ ओकरा परति‍ये तोड़ब बेसी नीक लगै छै।

शान्‍ती-          चाचाजी, कनी काल सोचए लगै छी तँ छगुन्‍तामे पड़ि‍ जाइ छी जे हम सभ केहेन स्‍वतंत्र देशक जि‍म्‍मेदार नागरि‍क छी। जि‍म्‍मेदारी की छी आ कतऽ अछि‍।

नसीवलाल-       प्रश्न तँ गंभीर अछि‍। मुदा बेहद खुशी भऽ रहल अछि‍ जे एहेन प्रश्नपर नजरि‍ जा रहल अछि‍। धन्‍यवाद।

शान्‍ती-          (उत्‍साहि‍त होइत) चाचाजी जहि‍ना गहबरकेँ आँचरसँ पोछि‍ नोरसँ नीप भक्‍ति‍नि‍ एकटंगा दऽ शक्ति‍सँ शक्‍ति‍ पबैत तहि‍ना मन हुअए लगैए।

नसीवलाल-       वि‍चार तँ बहुत पैघ अछि‍। मुदा ओइले धरतीमे जमि‍ कऽ पएर रोपए पड़त।

शान्‍ती-          कि‍ मतलब?

नसीवलाल-       मतलबसँ पहि‍ने ई कहू जे जेकर प्रति‍नि‍धि‍त्‍व (अगुआइ) करै छि‍ऐ ओ कतऽ ठाढ़ अछि‍?

शान्‍ती-          ठाढ़ तँ कम्‍मे देखै छी। बेसीकेँ तँ जहि‍ना मुइल नढ़ि‍याकेँ कुत्ता लि‍ड़ी-बि‍ड़ी कऽ खाइत अछि‍ तहि‍ना समस्‍या खा रहल अछि‍।

नसीवलाल-       समस्‍याक रँग-रूप केहेन अछि‍?

शान्‍ती-          कते कहब।

नसीवलाल-       कि‍छुओ जँ बाजब नै तँ आन केना बुझत?

शान्‍ती-          चाचाजी, (माथक घाम पोछैत) कि‍यो खोपड़ी ले तरसैए तँ कि‍यो ताजमहल ले, कि‍यो दूधक धारमे नहाइए तँ कि‍यो एक घोंट लेल।

              (सुकदेव, सोमन आ मनचनक प्रवेश)

आभा-           जहि‍ना मनचन भायकेँ पछुआ रोटी भौजी खुअबैत छथि‍न तहि‍ना गामोक काजमे।

मनचन-          (वि‍हुँसैत) भरि‍ दि‍न अहूँ बाल-बोधकेँ सि‍खबैत हेबै जे खाइमे (भोजमे) आगू आ काजमे पाछू रही।

आभा-           से कहाँ सि‍खबै िछऐ। सि‍खबै छि‍ऐ जे पहि‍ने करू तखन खाउ। ककहारामे जहि‍ना डारि‍-पात छुटैत जाइए तहि‍ना।

मनचन-          (अधहँसी) भूखे भजन ने होइ गोपाला।

आभा-           कठि‍या लाड़नि‍क कोन काज होइ छै, से तँ......?

मनचन-          हँ, से तँ जि‍नगीमे कते पँचकठि‍या देखलौं आ आगूओ देखब।

सुकदेव-         (दमसैत) रे बूड़ि‍वाण, सभ दि‍न एक्के रंग रहमे। उमेरक ठेकान नै छौ।

मनचन-          भैया, दुनू हाथ उठा भगवानोकेँ यएह करै छि‍यनि‍ जे जहि‍ना जि‍नगी भरि‍ गाए दूधे दैत रहि‍ जाइए, आमक गाछ आमे तहि‍ना हँसते-खेलते दि‍वस काटि‍ ली। की लऽ एलौं आ कि‍ लऽ जाएब।

नसीवलाल-       अखन जइ काजे सभ एकठाम छी से काज करै जाइ जाउ?

सुकदेव-         की बाउ कर्मदेव, जि‍नका सभ ऐठाम गेल छलौं ओ सभ औता कि‍ नै?

कर्मदेव-          कहलनि‍ तँ सभ। मुदा.....?

सुकदेव-         मुदा की?

कर्मदेव-          पढ़ल-लि‍खल लोकक कोन ठेकान। एक-एकटा बातक सत्तरह-सत्तरहटा अर्थ अगर-मगर करैत बुझैत छथि‍। तँए....?

सुकदेव-         तँए की?

कर्मदेव-          यएह जे हमरा गप्‍पक कि‍ माने लगौलनि‍। से थोड़े बुझै छी।

सुकदेव-         गामक-समाजक- प्रति‍ कि‍नकर केहेन आकर्षण छन्‍हि‍?

कर्मदेव-          ओना सबहक उपरा-उपरी छन्‍हि‍। मुदा घनश्‍याम कक्काक कि‍छु वि‍शेष छन्‍हि‍।

सुकदेव-         आरो गोटेक?

कर्मदेव-          सभ अपने बेथे बेथाएल छथि‍। मुदा घनश्‍याम कक्काक जेहने बेवहार छन्‍हि‍ तेहने आगू देखैक वि‍चार। असकरो जँ ओ आबि‍ जाथि‍ तैयौ बहुत-कि‍छु भऽ सकैए।

नसीवलाल-       जँ चौथाइयो बल बाहरसँ भेट जाए तैयौ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइमे सूहलि‍यत हएत।

मनचन-          नसीवलाल भैया, जहि‍ना पानि‍मे डूबैत चुट्टीकेँ साधारनो खढ़ भेटने जान बचै छै तहि‍ना जँ कनि‍यो आस भेटत तैयौ कदमक गाछमे मचकी लगा झूलि‍ लेब। चारि‍यो आनासँ कम भोट पौने एम.एल.ए. एम.पी. बनि‍ मुर्गी दकड़ैए आ हम सभ भातो-रोटी नै खा सकै छी।

आभा-           अहाँ भोट दै छि‍ऐ की नै?

मनचन-          कि‍अए ने देबै।

आभा-           ककरा दै छि‍ऐ।

मनचन-          जेकरा जीतैत देखै छि‍ऐ तेकरा।

अाभा-           से पहि‍ने केना बुझै छऐ?

मनचन-          हद करै छी। जखन जीतक घोषणा होइ छै तखन जा कऽ माला पहि‍रा दै छि‍ऐ।

आभा-           ओ मानि‍ लइए?

मनचन-          कि‍अए नै मानत। जे अपने सात घाटक पानि‍ पीब‍ गरि‍थानि‍ जकाँ बजैए आ पति‍वरता कहबैए, ओ कि‍अए ने मानत।

आभा-           तब ते अहाँ ठकोसँ नमहर ठक छी।

मनचन-          से केना?

आभा-           ठक तँ ओ भेल जे नि‍रीह, मुँहदुब्‍बर, सोझमति‍याकेँ ठकैत अछि‍ आ अहाँ तँ ठकक ठक भेलौं।

मनचन-          एहि‍ना ने उनटल गंगामे लोक नहा गंगा-स्‍नानक फल गंगासँ मंगैत छन्‍हि‍।

आभा-           गंगा दै छथि‍न?

मनचन-          कि‍अए ने देथि‍न। भलहि‍ं सुनटाक फल देथि‍न वा नै नहि‍ उनटाक फल कि‍अए ने देथि‍न।

आभा-           कोना दै छथि‍न?

मनचन-          साँपक केचुआ देखलि‍ऐहेँ?

आभा-           कि‍अए ने देखबै?

मनचन-          की ओइ केचुआमे साँपे जकाँ मुँहसँ नांगड़ि‍ तक नै रहै छै?

आभा-           हँ, से तँ रहै छै।

मनचन-          तखन।

आभा-           मुदा?

मनचन-          मुदा तुदा कि‍छु नै। अहाँकेँ बुझैमे फेर अछि‍। देखै छि‍ऐ ि‍कने जे गामक सभ कहत जे एकोटा आॅफि‍समे बि‍ना घुस नेने काज नै चलैए।

अाभा-           हँ से तँ अछि‍ये।

मनचन-          मुदा पाइ लऽ लऽ भोँट दै छि‍ऐ सेहो कहि‍यो।

आभा-           यएह बुझैक बात अछि‍, जखैन भोटरसँ भोँट लेनि‍हार धरि‍ घुसेक बेपार करए लगत तखैन जुग बदलतै।

पटाक्षेप


बारहम दृश्‍य

              (गामक वि‍द्यालयक आंगन। बच्‍चा सभ फील्‍डपर खेलैत। रस्‍ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्‍णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्‍याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल।)

क्रमश:
  
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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...