Friday, April 29, 2011

'विदेह' ८० म अंक १५ अप्रैल २०११ (वर्ष ४ मास ४० अंक ८०)- PART I I



 गजेन्द्र ठाकुर
हाइकू
हरित-कञ्च
लाल-उज्जर ठोप
हृदै संगोर
मरुद्यान नै
जलोदीपमे द्वीप
बालु नै पानि
ओ नील मेघ,
समुद्र पृथ्वी छोड़ि
भेल अकासी
पात आ चिड़ै
एक दोसरा सन
स्किन कलर
अकासी जल
पानिक अकासमे
रस्ता चीरैए
ई हिमपात
हिम सन अकास
आ धरा गाछ
सूर्यक पूब
आशाक छै किरण

मुदा रक्ताभ
प्रकृति पानि
हहारोहक बाद
शांत प्रशांत
व्याकुल चिड़ै
ठूठ गाछ सुखौंत
छै हतप्रभ
१०
प्रकृति नृत्य
प्रकृति संग जीब
प्रकृति भऽ कऽ
११
प्रकृति प्रेम
प्रकृति संग जीब
प्रकृति भऽ  कऽ
११
अलैचढ़ल
उत्साह हमर जे
देखी दोहारा

१२
अमरलत्ती
पनिसोखा जकाँ की
छूत अकास
१३
कजराएब
अकासक ऐ गाछ,
मेघक संग 
१४
देव डघर
अकाससँ उतरि
पृथ्वी अबैत
१५
धुरिया साओन
फेर भदबरिया
रेत पयोधि
१६
कचौआबध
मनोरथ गामक
जबका मारल

१७

गाछ बृच्छ आ
चिड़ै चुनमुनीक
बीच खेबै छी

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ज्योति सुनीत चौधरी
फेर आयल वसन्त

उठलहुँ अलार्मक आवाजपर
भोरक आभास समय देखलापर
आलससँ भरल भिनसरक सर्दी
मुदा आब कम भऽ रहल छल

सामान्य भऽ बाहर तकलहुँ
लागल बेसी इजोत सन
तुरत पर्दा कात केलहुँ
देखै लेल प्रकृतिक परिवर्तन

खिड़की खोलक समय फेर
वसन्त तरंगित झूलैत बसातमे
रंगक छिट्टा मारल सबतरि
देखार भेल गाछ आ पातमे

किछु गरमायल सूर्यक प्रकाश
घनक छाया छँटल आकाशसँ
बाहर भागा दौगी करैत लुक्खी
खिहारलहुँ अपन फुलबाड़ीसँ।

 
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नन्‍दवि‍लास राय
कि‍छु पद्य

(1)
वि‍द्यार्जन कएला उपरान्‍त
केलनि‍ चरि‍त्र ि‍नर्माण
माए-बाबूकेँ सेवा कए कऽ
भेलाह नैति‍कवान
सत्‍य आओर अहि‍ंसाकेँ जे
सभकेँ दे छथि‍ ज्ञान
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
छथि‍ पैघ वि‍द्वान।

(2)

जि‍नगी वि‍ताबैत छथि‍ सादा
मुदा छन्‍हि‍ पैघ वि‍चार
ऊँच-नीच, अमीर-गरीबसँ
करै छथि‍ समान बेबहार
अपन वि‍द्वतापर जि‍नका
कनेको नै गुमान
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
छथि‍ पैघ वि‍द्वान।

(3)

परउपकारक भावना राखि‍
दै छथि‍ सभकेँ शि‍क्षा
दीक्षा दै छथि‍ धने बुझि‍ कऽ
नै छन्‍हि‍ धनक इच्‍छा
आनक जे कल्‍याणक खाति‍र
सहै छथि‍ नोकसान
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
छथि‍ पैघ वि‍द्वान।

(4)
सभ जीवपर दया करै छथि‍
अधलाह काज करैसँ डरै छथि‍
हाथ जोड़ि‍ अपनासँ पैघकेँ
करैत छथि‍ जे प्रणाम
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
छथि‍ पैघ वि‍द्वान।

(5)
सभकेँ समैपर अबै छथि‍ काज
जि‍नका लेल नै छथि‍ कोइ आन
राक्षससँ बनि‍ जाइ छथि‍ मनुक्‍ख
एहेन जे दै छथि‍ ज्ञान
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
छथि‍ पैघ वि‍द्वान।

(6)
काजकेँ पूजा बुझि‍
करैत नै छथि‍ आराम
मदैत करैले‍ सदि‍खन हाजि‍र
की भोर की साँझ
छोट पैघ जीव सभमे जि‍नका
सुझै छन्‍हि‍ भगवान
बुझू ओइ मनुक्‍खकेँ
सभसँ पैघ वि‍द्वान।
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नवीन कुमार आशा

      

किया ने पावी तोहर टोन 
.....................................................
चोरी चोरी देखि तोरा
नही भावे दोसर मोरा
देखि तोरा ओही पल
पाओल  अपनाक धन्य
चोरी............................../
सदिखन देखि घरक आगू 
हरदम करि तोहर पाछु 
पर नहि पावी तोहर संग 
भई  गलो हम तंग
चोरी.................................../
तोहर धयान मोन स निकाली
करे लगलो हम पढाई 
कखनो कखनो याद आवे तोर 
ओहि पल निकले नोर
चोरी ...................................../
मेट्रो मे जखन देखल तोरा 
फेर आयल माथ मे फेरा
चाहलो गप  करि दू टुक
पर देखती रहलो टुक टुक
मोनक गप रोकती न बने
नै तोरा  टोकती बने 
चोरी चोरी .............................../
जिनाई भेल आछि दूभर 
पाबू केना तोरा गे 
सदिखन सोची तोरा 
की तू बनवी मोरा
चोरी चोरी......................../
चोरी चोरी खिचल तस्वीर 
ओकरे बुझल अपन तकदीर 
फेर सोचे मोन 
किया ने पावी  तोहर टोन
चोरी चोरी देखि तोरा 
नहि.............................../


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किशन कारीगर

किछु त हम करब


 
अवस्था भेल हमर आब बेसी
टूघैर टूघैर हम चलब
अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा
अपना माटि पानि लेल किछु त हम करब

नुनु  बौआ अहाँ  आऊ
बुचि दाय अहूँ आऊ
दुनू गोटे मिली जल्दी सँ
मैथिली में किछु खिस्सा सुनाऊ

नान्ही टा में बजलौहं एखनो बाजू
मातृभाषा में बाजू अहाँ निधोख
कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब
नहि बाजब त कोना बुझहत लोक

परदेश जायत मातर किछु लोग
बिसैर जायत छित मातृभाषा कें
अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत
कहें मीठगर स्वाद होयत अछि मातृभाषा कें

अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति
पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर
एही धरोहर के हम बंचा के राखब
अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब

कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास
सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू
सभहक अछि एकटा इ दायित्व
किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू

हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि
एही परम कर्तब्य सँ मुहँ नहि मोडू
स्नेह रखू हृदय में सभ के गला लगाऊ
अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू

समाजक लोक अपने में फुट्बैल करैत छथि
मनसुख देशी त धनसुख परदेशी
एक्के समाज में रहि ऐना जुनि करू
एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू

एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब
अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब
आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब
जीबैत जिनगी किछु त हम करब

हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी
सभ लोक अपन भाषा में बाजब
औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी
अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब

 
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विवेकानन्द झा
हाइकू
पसरल छै
हरियर धरती
तक आकास

धरती पर
नभ लाठी टेकल
इंद्रधनुषी

चिडैँ पाँखि सँ
तौलि रहल अछि
देस दुनिया

चित्रलिपि ई
प्रकृतिकुमारिक
मानू न मानू
दुर्लभ दृश्य
असम्भव एतय
गाम भऽ आबि
जलक बॊझ
सँऽ लकदक देखू
कृषक-नेह
उच्छवास ई
प्रेमीयुगल केर
धवल प्रीतिकर
उच्छवास ई
प्रेमीयुगल केर
धवलप्रीति
प्रेमप्रवाह
लजधि से छानल
नभचारी
१०
जनादेश ई
वाष्पकणक थिक
मंगलकारी

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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
 १.
अनुपमा प्रियदर्शिनी .श्वेता झा चौधरी .ज्योति सुनीत चौधरी .श्वेता झा (सिंगापुर)
१.
अनुपमा प्रियदर्शिनी, पति डॉ. रतन कर्ण, गाम- उजान (बड़कागाम), पो. लोहना रोड, जिला दरभंगा। सम्प्रति लोजियाना (संयुक्त राज्य अमेरिकामे), शिक्षा- एम.एस.सी. (जंतु विज्ञान), ल.ना. मिथिला वि.वि., दरभंगा; बी.एस.सी. बी.आर. अम्बेडकर वि.वि. मुजफ्फरपुरसँ, हॉबी, मिथिला चित्रकला, कमप्यूटराइज्ड चित्रकला, ललित कला। उपलब्धि: अखिल भारतीय कला आ दस्तकारी प्रतियोगिताक पुरस्कार 1995 मे; संस्कार भारती भाव नृत्य प्रतियोगिता 1989 मे सहभागी।
श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 

२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।


३.श्वेता झा (सिंगापुर)


विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
 

 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH

 Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary


Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine.
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.

Oh Ghurana!

I am telling you the truth, you hear, dear Ghurana
I am the Vidyapati and you are the Ugana

I showered you with water a lot
But you are still thirsty
I fed you juices a lot
But you are still grumpy
How can this change, you will remain the same
I am the Vidyapati and you are the Ugana

After walking here and there today
I am tired now
Bring down the chowki
I am coming now
Press my body, apply the double force
I am the Vidyapati and you are the Ugana

The mistress had chased you out
Unreasonably
I am also sad about
She abused you
The crow of the courtyard, wants to be pet
I am the Vidyapati and you are the Ugana

Buch had also seen
Your attitude yesterday
You showed your anger
At me too
Look into mirror your big cheek
I am the Vidyapati and you are the Ugana

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...