Sunday, March 13, 2011

'विदेह' ७७ म अंक ०१ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७७) PART VI


३. पद्य




  






३.६.१.  डॉ. शेफालिका वर्मा २. प्रभात राय भट्ट

३.७.१. राम वि‍लास साहु- नैनाक खेल


१.संस्कृति वर्मा,. चन्दन झा


            संस्कृति वर्मा
 हमर देश
हम सब भारत केर संतान छी
जगमग धरतीक ख़ुशी महान छी
हिमालय पर्वत स निकलैत
गंगाक पावन धार छी

हमर भारत देश महान 
सब से सुन्दर ,सब से प्यारा 
हमर देश सब ठाम से न्यारा..
रंग रंग के फूल खिलल अछि 
चलि रहल सुंदर सुखद समीर 
जन जन के मोन में सत्य , शिव  
सुन्दर  भाव भरल अछि ... 
उत्तर में कश्मीर - फूल क घाटी
दक्षिण में कन्या कुमारी क
पैर छुवैत सागर अछि
रंग रंग क वेश भूषा में
एकताक  सूत्र  में बान्हल
ई हमर  देश  भारत अछि ........

चन्दन झा
पिता श्री मदन मोहन झा, बाबा- डॉ. उपेन्द्र नाथ झा, गाम- लोरिका, भाया-बेनीपट्टी (मधुबनी)

  बीतल माघ फागुन आयल

    बीतल माघ फागुन आयल
   
फूलसँ लहरैत खेत जगमगायल
          
जीवनमे रस भरि आयल
      
ढलैत ठंड  तपैत धरती
      
सरसों अलसी राहरि गहूम
       
ऊघि-ऊघि सभ घर आनत
      
रोटी दुनू साँझ पकायत
     
काजल नैना पेट  भरि खेती
     
फसल अछि नीक खाइ भरि कऽ 
        
खेत न आइत जाइत कियो
        
करू मजदूरी जा हम
   
ओ सभक सभ घरपर रहता      
        
नैना माइकेँ हम कहबनि
    
ओ रोज खेत पर आबथि
  
साथ लगा देबैन काजर नैनाकेँ
  
जे किछु बेशी धन लौती
      
चाहथि भगवन यदि तँ
       
अगहनमे पहुना औता
   
अबकी बेर बड़की बेटीक
  
हाथमे हरदि लगबायब
  
केथरी-कंबल साठ जे लेता
  
माघक रैना गुरगुर करता

संस्कृतिक विडंबना

संस्कृतिक विडंबनाक
 जखन जखन अहसास होइए
           
एकटा प्रश्न बेर-बेर
          
हृदएमे तीर जकाँ चुभैए
         
हिंदी अंग्रेजीक बरसातमे
         
मैथिली भाषा मलिछोंह भऽ गेल
        
कोनबलाक कारण अपन
       
संस्कृति अनचोक्के हेरा गेल    
        
की भेल एहन जे अपन
       
चन्दन गावर भय गेला
      
शब्दक असरि हेरा गेल
       
परिभाषा मलिछोंह सन भऽ गेल
       
कहा गेल ओ पत्थरक पता
     
चतुरताइ  हवा भऽ गेल
      
की भेल एहन जे अपन
     
चन्दन गावर भऽ गेल
..
 
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गंगेश गुंजन
राधा ३०म खेप
अखन धरि अहाँ पढ़ने रही...
..अपन एकान्ती जीवनक सीमित अनुभव यथार्थ
तकर संवेदनाक  प्रवाह बनैछ, उद्यत करैत अछि मनुखक 
एक वचन मनक बहु वचन समाज, समाजक बड़ विराट संसार प्रसारित करैत, बनबैत अपन कर्म
सप्रसंग !

आब आगाँ...
कोनो प्रसंग मे की क' जाइछ मनुष्य
कोनो प्रसंगें की भ' जाइछ मनुष्य
सेहो एकटा विचित्र प्रहेलिका थिक
देखबा मे जे यथार्थ बुझाइत अछि 
बेशी काल से नितान्त अपूर्ण आ भ्रामक निकलैत अछि 
तें तर्क निष्कर्ष प्रयत्न बड़ सार्थक  
कम संदेहास्पद अधिक होइत अछि
ई सबटा मनुक्खेक द्वारा मनुक्खेक 
होइत अछि एही दशा दिशा मे लोक 
पर पीड़न सँ ल' आत्म पीड़नक रोगी बनि जाइत अछि         
उपचारक उपहास कर' लागि जाइत अछि आ 
दुःखक उपभोग कर' लगैत अछि। भोग नहि, उपभोग।
सात रंग सुन्दर सृष्टि कें एक रंग पीयर-पीयर आ 
रुग्ण देख'-बूझ' आ कह' लगैत अछि, मनुक्ख नितांत अपन झीवन-भोगक आँखियें, भरि समाज 
संसार कें देख' आ बूझ' लगैत अछि, अपन सैह नियति बना लैत अछि, सबटा ओहन यथार्थ जे 
ओकरा अतिरिक्तो सौंसे समाजक लोकक किछु यथार्थ सेहो
होइत छैक-भ' सकैत छैक तकरा पर ध्यान देब तँ भिन्न 
ओकर अस्तित्वे सँ अनभिज्ञ होइत चलि जाइत अछि
प्रति पल,दिन,मास वर्ष, आयु स्वयं अपना चतुर्दिक एकटा
रोगाह परिवेश निर्मित कर' लगैत अछि आ बाँचल अपन
समस्त जिजीविषा-ऊर्जा कें एहि बुद्धिये दिशा मे सक्रिय क' लैत अछि
मनुख्ख अपने विरुद्ध अपना चारू कात बन्धन बान्हि लैत अछि।                        
अपन गति, अपन सहज जीवन-प्रवाह कें अनेरेक अवरोधक  
पहाड़ी चेखान सभक अपनहि निर्मित बाधा सब सँ कुंठित क' लैत अछि।  
अपन से कुंठा अपन स्नेही,संबंधी, सौंसे समाज पर उगलैत रहैत अछि।    
जत'-जत'सृजन छैक ओत' ओत' संहारक ब्यौंत-वातावरण बनब' लगैत अछि।
अपन, नितांत अपन कुंठाक माहुर -मनें ओ अपना अतिरिक्त सभकें कलुषित,  
जीवन विरोधी आ अमानुष बुझबाक तदनुरूपे आचरण करबाक   
एकटा दुःस्वभाव बना लैत अछि,   
सबकें व्यर्थ ,बाहरी लोक बना देबाक अपनहि सक्रिय मनोदशा मे,    
अपनहि असकर एकान्त तथा दयनीय बनि क' रहि जाइछ,
से ओकरा बुझबा मे अबैत नहिं छैक। नहि बुझबा मे अबैत छैक जे 
ओ भ' चुकल अछि -रोगी, मनोरोगी !
देह-रोग सँ बहुत बेशी, बहुत गंभीर मनोरोग...'
-' तँ कि हम मनोरोगी भ' गेलौंहें, हम ?'
अकस्मात् राधाक प्राण चौंकल। स्वयं के पूछ' लागल यैह टा प्रश्न !  
गुंजित-अनुगुंजित-प्रति गुंजित... 
बड़ आर्त स्मरण कएलनि- ' हे कृष्ण'        
किछु नहि हएत, कृष्ण कें बजौलहु सँ हएत नहि किछु,                                                   
आने जेकाँ हुनको छनि आब कम्मे फुरसति  
बहुत रास छनि कपार पर काज, उत्तर दायित्वक पैघ संसार
हुनको आखिर चाहियनि अपन काज-कर्तव्य सँ अवकाश  
हुनको संसार मे बहुत किछु घटित भ' रहलनिहें न'         
हुनको मोनक स्थिति आब नहि छनि स्वाधीन, ने छनि   
किछुओ नितांत मनमौजी-अपनहि सुखक संग रहब संभव नहि छनि हुनको लेल 
ओहो अपना प्रकार सँ फिफियाइत रहैत छथि
छुच्छ गाय चरायब आ बँसुरी बजायब नहि रहि गेलनिहें हुनक एकमात्र काज।
माखन चोरायब भ' रहल छनि दुर्घट !
गाम मे कम दूध देब' लगलैक अछि सभ घरक गाय,  
दुब्बर भ' रहलैए नेरू-बाछी
गायक हुकड़ब नहि रहलै आब असंभव,          
' रहल छैक आइ काल्हि बेसी काल ।  
सुन्नर कोमल गुड़कुनियाँ लैत नेरू पर्यन्त भ' रहलैक अकाल काल कवलित
अपना मायेक सोझाँ देखैत गाय माय होइछ मनुक्ख नहि,                                          मनुक्कक माय कें पर्यन्त यद्यपि सह' पड़ि रहलैक अछि-संतान शोक ! 
चर-चाँचर सभक हरियरी जानि नहि कोन अदृश्य महापशु अन्हरिया,  
चरि क' चलि गेलय केकरो नहि ज्ञात। 
सौंसे फाटल शुष्क माटिक धरती पर पीयर-पीयर सुखएल खुट्टी-खुट्टी      
चलैत पएर सभक तरबा मे गड़ैत 
जे यमुना अपना कंठ धरि ऊपर आबि क' ' देत छलीह समय-समय पर हुलकी,      
स्वयं दूबरि गता, स्थिर भेलि स्तब्ध छथि।   
धार-कातक सघन रंग लता-वृक्ष ? केहन भेल श्रीहीन तट
स्तब्धे अछि बेसी बस्तु। मथुराक बेशी घटना स्थल, लोक 
लोकक आचार-व्यवहार स्तब्ध'  
कोनो परोक्ष बोझक त'र प्रतिपल दबायल जाइत ..   
ककरो नहि भ' पाबि रहलैये अंटकर एकर कोनो अनुमान।
अपना-अपना घर मे सब क्षुब्ध बैसल। हेराएल छैक ज्ञान !
पूछ' चाहैत अछि सब एक दोसरा कें मुदा पड़ितहि ओकर आकृति अपना सोझाँ,               
बदलि जाइत अछि लोकक मन ओकर उदासीक ध्यान    
भम पड़ैत अछि मोन,मोनक उदासी सँ भरल सब दलान
कृष्ण एही सब मे छथि ओझरायल करैत आवश्यक अनुसंधान            
कृष्ण छथि किन्तु अन्यथा सेहो हरन-फिरीसान जेना साँस कोनो आन देह ल' रहल हो अन्त'  
जेना देह कोनो आन नाक सँ घिचि रहल हो साँस   
जेना देह हो कतहु
, क्रिया आ स्पंदन होइत हो कतहु अन्त'   
जेना राधा छथि अपना आँगन एकान्त मे  कृष्ण अपना कर्म, क्रिया-कलापक संसार मे अपस्यांत 
होइत परस्पर एक दोसरा सन करैत क्रिया अप्पन-अप्पन 
काज कतहु कारण कतहु ओतहु सेह, सैह एतहु
ककरा लेल के अछि विकल-बचैन 
ककरा लेल ककरा ननहि अबैत छैक कतेक दिन सँ चैन  निर्णय करब अछि असंभव।
एना किएक एहि समय मे बेसी रास बात जे,     
नितांत छल सहज संभव, ' गेलय निठ्ठाहे असंभव,      
हाथ सँ बाहर, बेहाथ !
स्थिति यैह यैह स्थिति दू टा पीठ दू टा विरुद्ध  
बेशी किछु विरुद्ध किएक भ' रहलय एहि युगक बेसी विषय 
भाव आ वस्तु एना विरुद्ध...


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जगदीश प्रसाद मण्‍डल-
कवि‍ता/ गीत

मधुमाछी

पुष्‍प रस पीब मधुमाछी
मधुर चालि‍ चलए मधुमास
मोहि‍-मोहि‍ रस बना मधु
बि‍लहए उपकारक आश
माछी रहि‍तौ तान मारि‍-मारि‍
गबैत जि‍नगीक गीत
वायु सदृश्‍य गंध पसारि‍
बनैत सबहक हि‍त
डंक रहि‍तौ डंकि‍नी नै
जोगा मधु मधुरानी
सबहक सि‍नेह पाबि‍ राति‍-दि‍न
महतानि‍ बनि‍ कहबए रानी
महलक बीच संग-संग
बाँटि‍ काज चलबए दरवार
जे जेहेन से तेहेन करि‍
पबैत स-मान परि‍वार
उपैत धन जोगा-जोगा
महल बीच सजबए रानी
सबहक सभ छी सभ छी एक
मुस्‍की दए-दए सुनबए रानी
कि‍यो उपैत, करैत कि‍यो रक्षा
कि‍यो पसारए परि‍वार
एक सुत्र संचालि‍त भऽ
हँसैत-बजैत वारम्‍वार
अजगुत मोहनि‍ छाती सजा
सृजति‍ नाजूक परि‍वार
हराएल-ढराएल बाजि‍-बाजि‍
नि‍त सजबए राज-दरवार
ति‍याग-तपस्‍या समेत बीछ
जोगबए मान-सम्‍मान
जे लेलौं से देने जाइ छी
नै कहब ि‍कयो बइमान
की लए एलौं की लऽ जाएब
जानए जागल नैनि‍
घर नै सजने बनबै केना
सजल घरक गि‍रथानि‍
आबो सुनू, सुनू आबो
छाती फाड़ि‍ कहै छी
अपने केलहा छी भागी
सदएसँ सुनै छी
पौरूष पाबि‍ पूजू वि‍वेक
लाज जेकर जेबर छी
डेगे-डेग सम बना चालि‍
दि‍न-राति‍ सजबै छी
जे जे छी से से सएह छी
परखु अपन-अपन सीमा
ककरो मनमे ई नै उठए
भसि‍या गेल बालुक सीमा
कालक टूकड़ी सभकेँ भेटल
अपन-अपन छी रक्षक
कलंकक मोटरी बान्‍हि‍ जुनि‍
हँसाउ नाओं बनि‍ भक्षक
देव कतए दानव अछि‍ कतए
दुनि‍याँक सभ लीला छी
बेमत भऽ इन्‍द्रि‍य घोड़ा
दानव देव बनै छी।
(श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीकेँ सादर समर्पित....।)




श्री नागेन्‍द्र कुमार झा जीकेँ समर्पित-
भुताहि‍ गाछी

बीया उगि अकुर-अकुर
बढ़ैत बनि‍ बनल गाछ
पुरूष संग पौरूष पाबि‍
बनाओल जि‍नगीक आस।

सोन्‍हि‍ सि‍र सन्‍हि‍या धरतीमे
उठा पाएर सुन-सान अकास
संगी सजि‍ चलि‍ दुओ संगे
बैस गेल धरती ओ अकास।

डेगे-डेगे डगर नि‍रमा
नै जेकर ओर-छोर
तृप्‍त चि‍त्त बैस सरोवर
मढ़ै-गढ़ै साँझ-भोर।

घाट पहुँच देख तुलसी
अनन्‍त सरोवर झील
उमरि‍-घुमरि‍ गाबै वसन्‍त
हुलसि‍-हुलसि‍ भऽ तुलि‍।

अश्रु ओस सजि‍ अनन्‍त कमल
लगबै भोम्‍हरा छाती
वि‍ष-अमृतक सेज सजा
प्रेम पसारि‍ दि‍न-राति‍।

बाँसक घर देख भोम्‍हरा
भोमहैर बनाओल माटि‍ मुसरी
ढहि‍ डगर हुच्‍ची बनि‍ते
संग नचए लगल टुसरी।

अपन सुख सि‍रजैले
उजाड़ि‍-उजाड़ि‍ दोसरकेँ
वंश उजाड़न भेल बनौनि‍हार
क्षण-पल मेटबै दोसराकेँ।

हुच्‍ची खसि‍ हि‍या हारि‍
लगल ति‍यागए जान-परान
एका-एकी मेटए लागल
हँसैत-खेलैत खनदान।

पावसक परसाद पबए
हँसि‍-हँसि‍ आबए भूत
पाबि‍ परसाद पौरूख जगि‍ते
बनि‍ बदलि‍ यमदूत।

मि‍ल सभ यमदूत नि‍रमा
जौ-ति‍ल चढ़बए यमराज
साटि‍-साटि‍ सहे-सहे
नैयायि‍क बनाओल धर्मराज।

अकास-पतालक बीच रचि‍
जि‍नगी-मृत्‍युक संसार
स्‍वर्ग-नरकक बीच बाँटि‍
लीला शुरू भेल अपरमपार।

नि‍:सहाय नि‍रीह धरतीकेँ
बनाअोल भोगक चास
तामि‍-कोड़ि‍ परती-पराँत
ऊँचगर बनाओल डीह-बास।

जामुन चढ़ि‍ यमदूत हँसए
बना बास देवी फुलवारी
जीन पसरि‍ धरती चुमए
भूत लपैक बीट बँसवारी।

देख दशा गाछी-वि‍रछीक
लगौनि‍हार भऽ गेल बताह
होइबला कहाँ होइ छै
कानि‍-कुहरि‍ भरए आह।

अबोध कुहरि‍ बोध कुहरि‍
कुहरि‍ भरए आहि‍
सि‍हरि‍-सि‍हरि‍ सि‍सकै वि‍वेक
बनि‍ गेल गाछी भुताहि‍।

भूतक डर ककरा ने होइ छै
बूढ़ हुअ आकि‍ जुआन
मुदा भूत तँ भूते छी
जि‍न्‍दा रखैत सदति‍ धि‍यान।
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 राजेश मोहन झा 'गुंजन'
मुस्‍की रहल उदासे

डोलि‍ पत्ता, छि‍ती-ति‍त्ती चाेरि‍ आर नुकैआ
सि‍खलौं ककरहा देखि‍ते भेलौं दूसरा पासे
छलौं लड़कपनमे खेलैत बचपनमे
की जानी ने की भ' गेल मुस्‍की रहल उदासे।

दि‍न कटै छल साग तोड़ैमे
राति‍ बि‍ताबी मायक कोरमे
मुँहक लाली पीयर भ' गेल
सीताक जीवन जकाँ वनबासे।

आठ बयसमे मॉग भराएल
कन्‍यादानक अर्थ नै बुझलाैं
तैयो देव नै देखला लाली
चान बि‍नु जेना अकाशे।

झहफल सन प्रभात बनल छी
बैशाखक पत्रहीन गाछ बनल छी
नै देखलौं सि‍नेही वसंतकेँ
नोरक पारण जेना उपासे।

अपन वेदना कहू ककरासँ?
दुष्‍ट समाजक रीति‍ घेरने अछि‍
जड़ल भाग्‍य पजड़ल अछि‍ जीवन
सुक्‍खल कली बि‍नु रवि‍-प्रकाशे।

अपरोजक आ डाइन कहाबी
कछमछ जीवन डगराक बैगन
वि‍धाता हमरा अपन संग लगाबथु
देह नि‍ष्‍प्राण मुदा संग अछि‍ सांसे।

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गंगेश गुंजन 
गीत



दुर दुर छीया छीया छीया
अपना घर मे पैसारी कगेलय एक अनठीया

आन कोनो नहि बात लाभ कामनाक कारण
ध्ुरखुर पर बाड़ल जाइए अनकर माटिक दीया

स्नेह प्रेम सौहार्द्र लगा देलौंहें सबकिछु भरना
देखब बेचि घरारी एक दिन खेत-पथारो सबटा

प्रेमक मार्ग कांट कुश उपजल खद्ध-खुद्ध्ी
लतखुर्दनि संबंध् स्वकीया अभिनन्दित परकीया

पिफरीशान छथि बेशी अपनहि स्वजन लोक सं
पूछि-पूछि हलकान कहू जे-स्नेह काहे को कीया

आब समाजक रुचि रुझान अपने दोसर दिसि
तुच्छ बात पर झगड़ा-झंझटि कतेक हो तसपफीया

तें हमरे नहि चित्त गंुजनोक आंदोलित छनि
प्रति पल मन विरुद्ध् युग मे जरैत रहै छनि हीयक
 


अहांक बात तं अहां जानी
अनेरे भेल हमर बदनामी

ओना तं चुप रहबाक सप्पत छल
बीत जाय किछु दःुख मे नहि कानी

से निबाहल नहि तें ई दुनिया
गढै़ये नित्य नवे नब कहानी

जे भेल-भेल तमाशा एक रतीक
रागा रागी तं ऐपर नै ठानी

तंग बड़ हाथ मोन विकल अहुंक
बजार नित्य महग भेल की आनी

तैयो अनुरोध् अहांक दोखी हम
वचन रहय ने ठोढ़ पर आनी
 
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१.  डॉ. शेफालिका वर्मा २. प्रभात राय भट्ट
१.

                     डॉ शेफालिका वर्मा
 हम आबि रहल छी.. ........
माँ !
अहाँ किएक कानि रहल छी
कोन सोच में डूबल छी
शक्ति रहितो अशक्त बनल छी
हम सबटा जनैत छी
सबटा बूझैत छी .................
अहाँ स्वयं के मेटी
आन के बनव चाहलों
लोक बनैत रहल ,अहाँ मिटैत रहलों
ई की अहाँक त्याग नै थीक माँ ?
------हम चौंकी  उठलों ..अहाँ के छी
कत स बाजि रहल छी ??
माँ - हम अहांक कोखि में छी
अहाँ हमरा नहि चिन्हलों..
हम अहींक गर्भ स बाजि रहल छी
अहाँ चोंकि किएक गेलों
अहींक तं प्रतिकृति छी हम \
हमर दादा दादी स डरा गेलों माँ
फेर बेटिय भेल के दंस स तिलमिला गेलों
घाह घाह भेल अहांक अंतर
हम देखने छी ...किन्तु,
अहाँ हमरा नष्ट नहि करब माँ
हम अहांक हिस्सा छी
अहांक अपूर्ण कामनाक पूर्णता  छी
हम जनैत छी 
हमर माँ नै कान्तिह
बाबु उदास नै हेताह 
एखनही  त एकटा माय बाबु
अपन विकलांग बेटी के योग्य बना देलनि
बेटी की होयत छैक जमाना के देखा देलनि
अहांक विहुँसैत चेहरा हमर ताकत बनत
हम  आबि रहल छी माँ
अहाँ जत जत हारलों
अपन आन में उन जकां ओझरेलों
हम ओते ओते जीती के देखा देब
सबटा सम्बन्ध सोझरा लेब
हम आबि रहल छी माँ ....................
ठप्पा
     

अहांक गाम कते अछ
प्रश्न सुनतही अकचका गेलों हम
कनिक काल सोचैत ---
हमर गाम ??
उयेह ने जाहि ठाम अपन घर होयत छैक ?
हं हं उयेह घर ,उयेह गाम !
हमरा ते दू टा गाम अछ ..
एकटा जते से हम आयल छी
दोसर हम जते एलहुं अछ
मुदा, एहि में हमर कोन अछ
हम नै बूझैत छी जते स हम एलों
ओते स सनेस बारि द हमरा विदा
क देल गेल 'जाह अपन घर बेटी'
जाहि ठाम आयल छी ओहिठाम सब
सनेस बारी बिल्हल गेल
'कनियाक गाम से आयल छैक'
हम की जाने गेलों हमर गाम कोन थीक
हमरा नाम पर ते कत्तो किछ नै
भरल पुरल घर में हमर अस्तित्व किछ नै
बस 'फलना गामवाली' बनि रही गेलों
जाहि ठाम स आयल छलों
ओहि गामक ठप्पा बनल रही गेलों............




प्रभात राय भट्ट, ग्राम: धिरापुर - २, जिल्ला महोतरी ,अंचल  जनकपुरधाम, नेपाल
पिता :-श्री गंगेस्वर राय (शिक्षक ) माता :-श्रीमती गायत्री देवी (समाज सेविका ), शिक्षा :-आई .ए., भूतपूर्व  पेशा :- नेपाल ट्राफिक प्रहरी , वर्तमान पेशा :आर्म्ड  फ़ोर्स (अमेरिकन  राजदुतावास ,साउदी अरबिया )

कुमारी धिया



सुनु सुनु यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !!

संगी सखी सभक भेलई ब्याह, हमर होतई कहिया !!

तिस वरखक भेली हम, मुदा अखनो रहिगेली कुमारी धिया !!

हमरा लेल नए छाई संसार में, एक चुटकी सिंदुरक किया !!

रोज रोज हम सपना देखैत छि, डोली कहार ल्या क ऐलैथ पिया !!

आईख खुलैय सपना टूटईय, जोर जोर स: फटईय हमर हीया !!

गामे गाम हमर बाबा घुमैय,ल्याक हाथ में माथक पगरी !!

कतहु वर नए भेटैय,की विन पुरुख के छई यी मिथिला नगरी ?!!

बेट्टावाला केर चाहि पाँच दश लाख टाका आ गाड़ी सफारी !!

तिनचाईर लाख टाका ऊपरस:जौ चाहैछी जे ओझा करे नोकरी सरकारी !!

अन्न धन्न गहना गुरिया एतेक चाही जे भईरजाई हुनक भखारी !!

बेट्टीवाला दहेज़ में सबकुछ लुटा क अपने भजाईत अछि भिखारी !!

बाबा हमर खेत खलिहान बेच देलन आ बेच रहल छैथ अपन घरारी !!

अहि कहू यौ मिथिलावासी आऔर मिथिलाक बाबु भैया !!

कतय स:देथिन बाबा हमर दहेज़ में एतेक रुपैया !!

बालविबाह
हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालीउमरिया मे !!

पढ़ लिख खेल कूद दिय,हमरा अपन संग्तुरिया मे !!

--निक घर वर भेटल छौ,दहेज सेहो कमे मंगैछौ !!

आगुम की हेतै से नए मालूम,ब्याह करहीटा परतौ !!

ब्याह करहीटा परतौ गे बेट्टी.........................!!

--हम चौदह वरखक कन्याकुमारी अहाक राजदुलारी !!

मुदा दूल्हा छैथ विदुर आ पाकल हुनक केस दाढ़ी !!

हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे २ !!

--दूल्हा विदुर भेलई तईस: की धन सम्पति अपार छई !!

भेटतौ नए कतौ एहन घर वर दूल्हा सेहो रोजगार छई !!

--रुईक जाऊ रुईक जाऊ बाबा यौ हमरा पैघ होब दिय !!

पैढ़लिख क हमरो कोनो सरकारी नोकरी करदिय !!

बेट्टावाला अहाक दरवाजा पर अओता !!

कहता अहाक बेट्टी स:हम अपन बेट्टा क ब्याह करब !!

अहा कहब नै नै अखन हम बेट्टी क ब्याह नए करब !!

फुइक फुइक क चाय पीयब ,अहू किछ शान धरब !!

हम नए ब्याह करब यौ बाबा वालिउमरिया मे !!

--एक लाख टका के बात कहले तू भगेले सयान गे !!

बेट्टी क भविष्य नए सोचलौ,हमही छलौ नादान गे !!

बेट्टी क ब्याह कोना हयात सतौने छल हमरा दहेज़ क डर !!

बाल विबाह करबई छलौ,खोईज लेलौ बुढ्बा वर !!

नए ब्याह करबौ गे बेट्टी तोहर वालिउमरिया मे !!

पढ़ लिख खेलकूद तू अपन संगतुरिया मे !!


 




आहा जे नई भेटतौ त जिनगी रहित हमर उदास !!
सागर पास होइतो मे बुझैत नई हमर मोनक प्यास !!
अहि स पूरा भेल हमर जिनगी केर सबटा आस !!
नजैर मे रखु की करेजा मे राखु अहि छी हमर भगवान !!
उज्जरल पुज्जरल हमर जिनगी मे आहा एलौ !!
रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौं !!
की हम भेलू अहाक प्रेम पुजारी ,अहा हमर भगवान यौ !!
मुर्झायल फूल छलौ हम ,अहि स खिलल हमर प्रेमक बगिया !!
बालविधवा हम अबोध छलौ ,समाज केर पैरक धुल !!
उठैलौ अहा हमरा करेजा स लगैलौ, बैनगेली हम फूल !!
पतझर छलौ भेल हम,सिच सिच क अहा लौटेलौ हरियाली !!
अनाथ अबला नारी के अपनैलौ आ बनेलौ अपन घरवाली
अहि स यी हमर जिनगी बनल सुन्दर सफल सलोना !!
गोद मे हमर सूरज खेलैय,अहा बनलौ बौआक खेलौना !!
हमर उज्जरल पुज्जरल जिनगी मे अहा येलौ !!
रंग विरंग क ख़ुशी केर फूल खिलेलौ,ख़ुशी स हमर आँचल भरलौं !!
हमर मन उपवन मे अहि बास करैत छी, अहि केर हम पूजित छी !!

 






ई अछि हमर परिचयरुपी कविता,
ई अछि हमर प्रेमपरागक सरिता,
धन्य धन्य अछि भाग्य हमर,
जन्म लेलौ हम मिथिलाधाम मे,
बास अछी हमर पावनभूमि धिरापुर गाम मे,
स्वर्ग स सुन्दर आनन्द बरसैय,अई मिथिलाधम मे,
धिरापुर केर धिरेस्वरमहादेव छैथ बड़ ओढरदानी,
हम बालक प्रभात अबोध अज्ञानी,
पिता गंगेस्वर छैथ ईश्वर के स्वरूप ,
माता गायत्री ममता स भरल देवीक रुप,
भातृत्व प्रेमक प्रतिक प्रकाश प्रभात प्रविन,
सब भाई मे अछी आदर सत्कार स्वाभिमान नबिन,
सुन्दर सरल सुशिल शालीन बहिन आशा,
धन्य धन्य अछि भाग्य हमर पुरा भेल अभिलाषा ,
भौजी सद्खन ममता स भरल स्नेह बर्सबैय,
भावो भावनात्मक बत्सल स्नेह बच्चा सब मे बटैय,
हमर मन उप्वनमे बास करैय चन्द्रबदन पत्नी पुनम,
सोन स सुन्दर सरल शुशिल बेट्टी अछी स्वर्णिम,
सत्यमार्गी संतान तेज्स्व्बी बेट्टा अछी सत्यम ,
धन्य धन्य अछि भाग्य हमर जन्म लेलौ मिथिलाधाममे


गीत स्वतंत्रताक

सुनु सुनु ययो बाबु भैया ,
नींद स तू जगबा कहिया ,
भूखे पेट पेटकुनिया देला स
नई चलत आब कम हौ
कालरात्री के भेलई अस्त ,
उठह उठह कर दुसमन के पस्त ,
आइधैर तोरा पर शासन केलक ,
आब कतय दिन रहबा गुलाम हौ,
भेलई परिवर्तन बदैल गेलई दुनियाँ,
मधेस अखनो रहिगेलई शासक केर कनियाँ,
हसैछ दुसमन दैछ ललकार ,
उठह उठह दुष्ट शासक के करः प्रतिकार ,
मग्लाह स त भूख गरीबी रोग शोक देलकह ,
आब छिनक ला ला अपन अधिकार हौ ,
अखनो नई जगबा त जिनगी हेतह बेकार हौ ,
बेसी सुत्बा त अम्लपित बैढ़ जेताह ,
बिस्फोट भक्ह प्राण निकैइल जेताह ,
उठह उठह करः अपन प्राण क रक्षा ,
सिखह तू मान-स्वाभिमान क शिक्षा ,
प्राण तोहर मधेस माई मे ,
मान-स्वाभिमान छह तोहर स्वतंत्रता मे ,
बन्धकी परल छह तोहर मधेस माई,
उठह उठह हों बाबु भाई ,
मधेस माई केर मुक्ति दिलाब ,
सुन्दर शांत विकाशील मधेस बनाब ,
कालरात्री केर भेलई अस्त ,
उठह उठह करः दुसमन केर पस्त



संग्राम संग्राम ई अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !!
विना हक हित अधिकार पौने हम नए लेब आब विश्राम !!
अईधैर हम सहित गेलौ दुस्त शासक केर अन्याय !!
मुदा आब नई हम सहब लक हम रहब अपन न्याय !!
निरंकुश शासक शासन करईय घर मे हमरा घुईस !!
मेहनत मजदूरी हम करैतछी, खून पसीना ललक हमार चुईस !!


अढाईसय वरखक बाद आई भेलई मधेस मे भोर हौ !!
गाऊ गाऊ गली गली मे आजादी क नारा लागल छै जोर हौ !!
निरंकुश शासक कहैया हम छी बड़ा बलबंत !!
मुदा आई हेतई दुष्ट निरंकुश शासक केरअंत !!
संग्राम संग्राम यी अछि मधेस मुक्ति केर महासंग्राम !!
विना हक हित अधिकार पौने आब नई हम लेब विश्राम !!


अईधैर हम सहैत गेलौ उ बुझलक हमरा कांतर !!
तन मन धन सब कब्जा कौलक हमरा बुझलक बांतर !!
आब हम मांगब नई छीन क लेब अपन अधिकार हौ !!
उतैर गेलौ हम रणभूमि मे करैला दुष्ट शासक केर प्रतिकार हौ !!
मेची स महाकाली चुरेभावर स तराई,समग्र भूमि अछि मधेस माई !!
हिन्दू मुश्लिम यादव ब्राम्हिन थारू सतार संथाल हम सब एक भाई !!
जातपात कोनो नई हमर हम सब छी एक मधेसी हौ !!
अपन भाषा भेष संस्कृति नया संविधान मे हम करब समावेशी हौ !!



 








हम रहैत छी परदेश मुदा प्रेम अछि अपने देश स:!!
हम छी पावनभूमि मिथिलाधाम मधेस स:!!

लिखैत छी चिठ्ठी अपन ब्याथ केर नैनक नोर स:!!
मोनक बात चिठ्ठी मे लिखैत छी मुदा बाईज नई सकैत छी ठोर स:!!

लिखैत छी अपन दुःख क पाती,रहैत छी कोना परदेश मे !!
अईब केर परदेश हम फैस गेलौ बड़का क्लेश मे !!

माए केर ममता भौजी केर स्नेह बिसरल नई जाईय !!
साथी संगी खेत खलिहान हमरा बड मोन परईय !!

माथ जौ दुखैत हमर माए लग मे अब्थिन !!
की भेल हमर सोना बेट्टा के कहिक माथ मालिश करथिन !!

बोखार जौ लागैत हमरा भौजी बौआ बौआ करैत लग अब्थिन !!
दुधक पट्टी माथ पर रख्थिन आ दबाई ला क हमरा खुअब्थिन !!

मुदा अ इ परदेश मे धर्ती गगन चंदा सूरज सब लगईय अनचिन्हार !!
बड अजगुत लगैय हमरा देख क ऐठामक दूरब्यबहार !!

मानब्ता नामक छीज नई छई इन्शान बनल अछि इंजिन !!
अठारह घंटा काम कर्बैय मालिक बुझैय हमरा मशीन !!

जान जी लगाक केलौ काम दू चैरगो रोग हमरा भेटल इनाम !!
नई सकैत छी त आब कामचोर कहिक हमरा केलक बदनाम !!

लिखैत छी कथा अपन ब्यथा केर बुझाब आहा सब बिशेष मे !!
नून रोटी खैहा भैया अपने देश मे ,जैइहा नई परदेश मे !!


 


मिथिलाधाम...
स्वर्ग स: सुन्दर अछी हमार मिथिलाधम !!
ऋषि मुनि तपस्वी आर माँ जानकी जन्म लेलैथ अहि ठाम !!
ज्ञानभूमि तपोभूमि आर स्वर्गभूमि अछी हमर जनकपुरधाम !!
गौतम कणाद मन्दन भारतीसुशिला यी अछी मिथिलांचल के गरिमा !!
युगो युग गुनगान होइत अछी मथिलांचल धर्ति क महिमा !!
हरबाहक श्रमदेखि धर्ति प्रतिदान केलैथ सिया जी सन् गहना !!
मिथिला क सब घर स्वर्ग लगैया,लोग ईहा के साधु सन्त !!
चाहे कोनो ऋतु होइ सद्खन बहैत ईहा बसन्त !!
मनोरम प्रकृति आर मनमोहक मिथिला क संस्कृति !!
एक दोसर स: सब लोग करैत अगाध प्रेम आर प्रिती !!
हर जीव ईहा के स्वाभिमानी करैथ नै किनको आशा !!
मधुरों स: मधुर मिथिला क मैथिल भाषा !!
मिथिले मे पुनरजन्म लि यी सब लोग मे अछी अभिलाषा !!
महाकवि विधयापति आर नागार्जुन सन् प्रखर विद्वान !!
जग ब्याप्त कैलैथ मिथिला क गरिमामय शान !!
स्वर्ग स सुन्दर धर्ति अछी हमर मिथिलाधम !!!!!!


 





सपना देख्लौ बड अजगुत..

की कहिय राएत सपना देखलौं बड अजगुत हो भाई ,
हमरा पाछु लागल रहे एकटा बहुरुपिया कसाई,
धमकी देलक गल्ह्थी लगौलक देखौलक चाकू छुरा ,
जान स माएर देबौ,प्राण निकाइलदेबौ,नईतकर हमर माग पूरा ,
गाल हमर लाल कौलक खीच क मारलाक चटा चट चांटा ,
निकाल बाक्स पेटी स फटा फट दू चार लाख टाका,
डर स हम थर थर कापी मोन रहे घबराईल ,
तखने एकटा पहरा करैत प्रहरी हमरा लग चईल आईल ,
मोने मोन हम सोचलौ इ करता हमरा मदत ,
मुदा उहो रहे ओई चंडाल कसाई केर भगत ,
दुनु गोटा कान मे कौलक फुस फूस ,
बाईन्ध क हमरा डोरी स घर मे गेल घुईस ,
छन मे सबटा भेल छनाक घर मे परल डाका ,
झट पट जे आईंख खोल लौ ,त की कहिय काका ,
उ सपना नई सचे के बिपना रहे ,
हमर बिपति क एकटा घटना रहे ,


 

गीत वियोग के...

पिया निर्मोहिया गेलैथ परदेश ,
भेजलैथ नई चिठ्ठी आ कोनो सन्देस,
जिया घबराईय ,चैन नई भेटैय,
सद्खन साजन अहि पर सुरता रहैय,
अहाविन हे यौ साजन मोन नई लगैय - २

आईबकेर परदेस हमहू छी कलेश मे ,
दुःख केर पोटरी की हम भेजू सन्देस मे ,
आईबकेर परदेस मोन पचताईय ,
अहाक रे सुरतिया सजनी बिसरल नई जाईय ,
अहा विन हे ये सजनी मोन नई लगईय - २

नई चाही हमरा गहना ,रुपैया आऔर बड़का नाम ययौ ,
ख्याब नून रोटी झोपडी मे मुदा चएल आउ गाम ययौ ,
अहाक मुन्ना मुन्नी पर नई अछि हमार काबू ,
बाट चलैत बटोही क कहीदईया झट सा बाबु ,
सम्झौला स झट पुईछबैठेय कतए गेल हमर बाबु ,
सुनीकेर बेट्टाबेट्टी के बोली ,दिल पर चैइल जाईत अछि गोली ,
चुप चाप हम भजईत छी ,मोने मोन हम लाजईत छी

कहिदु मुन्ना मुन्नी के बाबु गेल छौ पाई कमाईला विदेस ,
ल क अईतोऊ तोरासबल्या खेलौना आ मीठ मीठ सनेश ,
मोन तर्शैय हमरो सजनी अहाक प्यार आ अनुरागला ,
आ बेट्टा बेट्टी केर मिठिका दुलार ला - २ !!!

 





गंगा तट स: हिमालय केर पट

 
गंगा तट स: हिमालय केर पट
कोसी स: गनडकी तक !!
यी सम्पूर्ण भूमि अछि मिथिलांचल !!
जतेय बहथी निर्मलगंगाजल !!
हम थिक मिथिलाभूमि केर संतान !!
मिथिलांचल अछि हमार आन वान शान !!
मिथिलाक संस्कृति अछि हमर स्वाभिमान !!
स्वर्ग स: सुन्दर अछि हमर मिथिलाधाम !!
वसुधा केर हृदय थिक यी जनकपुरधाम !!
जतेय जन्म लेलैथ माँ जानकी आऔर साधू संत कवीर !!
एतही परम्पद पैलैथ ऋषि मुनि संत महंथ आऔर फकीर !!
राजर्षि जनक छलैथ विदेह राज्यक महर्षि राजा !!
कवी कौशकी गंडक बाल्मिकी मंडन !!
भारती सुशीला कुमारिल भट्ट नागार्जुन !!
महाकवि बिध्यापतिसं: बिद्वान रहथि प्रजा !!
मिथिला रहथि न्यायिक आऔर मसंसा ज्ञानक प्रदाता !!
येताही ब्याह केलैथ चारो भाई मर्यादापुरुषोतम राम बिधाता !!
मिथिला अछि भारतवर्ष केर प्राकृतिकाल स: ज्ञानबिज्ञान क स्रोत !!
यी सब हम जनैत भेलंहू ख़ुशी स: ओत प्रोत !!



मिथिला माए

 

अहो भाग्य अछि हमर जन्म लेलौ मिथिला माए के कोरा में !!


एहन निश्छल आ बत्सल प्रेम भेटत नए चाहुओरा m


प्रकृति केर सुन्दर उपहार ,संस्कृति केर बिराट संसार !!


मानबता केर सर्बोतम ब्याबहार मिथिलाक मुलभुतआधार !!


राम रहीम मंदिर मस्जिद दसहरा होई या ईद क रित !!


मिथिलावासी हिदू होई या मुस्लिम एक दोसर स:करैछैथ प्रीत !!


मिथिलाक पसु पंछी सेहो जनैत अछि प्रेमक परिभाषा !!


मधुरों स:मधुर अछि मिथिलाक मैथिलि भाषा !!


ज्ञान सरोबर एतिहासिक धरोहर अछि मिथिलाक संस्कृति !!


मन मग्न भजईत अछि देख क सुन्दर आ मनोरम प्रकृति !!


मिथिले में जन्म लेलैथ सीता केर रूप में माए भगवती !!


महाकवि विद्यापति केर चाकर बनला महादेव उमापति !!


वैदेही केर सुन्दरता पर मोहित भेलैथ भगवान राम !!


बसुधा केर हृदय बनल अछि हमर महान मिथिलाधाम !!


कहैछैथ शास्त्र पुराण विद्वान पंडित आऔर प्रोहित !!


मिथिलावासी क दर्शन स:मात्र भजाईत अछि !!


मनुख क सम्पूर्ण पाप तिरोहित !!

 मजदुर !!! 
 
भगवान क असिम कृपा स अहा भेलौ धनवान !!

मुदा भुखा निर्बस्त्र आर निर्धन सहो छैथ इन्सान !!

भुख स छटपटा रहल छै,निर्धन ख्याला एक टा रोटि !!

मुदा धनक लोभ स खुली नै रहल अछी अहा क पोटि !!

भुखा प्यासा निर्बत्र मे करु अपन अन्न धन्न दान !!

तखने ह्याब अहा सबकेर नजैर मे महान् !!

दुख:भुख आ विपति सहके बईनगेल छै गरिब क मजबुरी !!

दु टुक्रा रोटि ख्यालेल खुन आ पसिना बहाके करैया मजदुरी !!

मजदुरक श्रम स उब्जैया फलफुल तरकारी आ बिभिन्न अन्न !!

मालिक भजाईय धनवान मुदा श्रमिक रही जाईय निर्धन !!

आदमी नै छै अहाक नजैर मे नोकर चाकर आर मजदुर !!

निर्धन गरिब पर हुक्मत करैछी कहाँ भेलौ अहा निस्ठुर !!

नै देखाऊ अईठाम ककरो झुठा रुवाब आर साख !!

एकदिन जईरके भ ज्याब अहु अई माटीमे राख !!

कंकर पाथर थाली मे भेटत् भुख स जौं अहा छ्टपटयाब !!

मुठी बांधके जग मे एलि हाथ पसाइरके ज्याब !!
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राम वि‍लास साहु
कवि‍ता-

नैनाक खेल

नैना-भूटका खलैए खेल

अपनामे करैए ठेलमठेल

मारि‍-पि‍ट करैत खेलैए खेल

खेल-खैलैत जँ होइत झगड़ा

अठा-पटक करैत रगड़ा

गरदा झारि‍ करैत मेल

सभ मि‍ल करैत खेल

खेल जाति‍-पाति‍ मि‍ट गेल

जेना पानि‍-पानि‍ एक भ' गेल

नै कोनो मनमे अछि‍ मैल

एकताक पाठ पढ़ल गेल

देशक लेल सोच बदलल गेल

देशक वि‍कास लेल खेलब खेल

नैना-भुटका खलैए खेल....।

 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.संजय कुमार मण्‍डल, २.संजय कुमार झा

संजय कुमार मण्‍डल
कवि‍ता-
परदेसि‍या

असगर मनुख जाधरि‍ युवा रहैए
पढ़ैए-लि‍खैए, खेलैए-धुपैए
पढ़ाइ समाप्‍त कऽ वि‍आह करैए
परि‍वारि‍क जि‍म्‍मेबारीक हेतु
दूर-देश जा नोकरी-चाकरी करैए
भोरे उठि‍ टि‍फि‍न लऽ ड्यूटी जाइए
अधि‍क रूपैयाक लोभे ओभर टाइम खटैए
बेचाराकेँ नवकी कनि‍याँक यादि‍ अबैए
सब रवि‍ कऽ सासूर फोन करैए
कनि‍याँ आ सारि‍-सरहोजि‍सँ
घंटा-घंटा भरि‍ गप्‍प करैए
‍कहि‍या गाम आएब?”
कनि‍याँ पुछै छै
माघक शी‍तलहरी कन्ना
बि‍तेलहुँ कहै छै
अहाँ नि‍र्दय छी, हमर हाल नै जनै छी
भरि‍-भरि‍ राति‍ हम करौट फेड़ैत जगै छी
की कहतै कि‍छ नै फुड़ै छै
ओ बेवस्‍थाक जंजालमे ओझराएल फि‍रै छै

डेढ़े मास बाद होली पावनि‍ छै
होलीमे नै आएब तँ कहि‍यौ ने आएब
एक्के बेर हमरा मुइलाक बाद अाएब
मरल मुँह देख एकटा लकड़ी चढ़ाएब

कनि‍याँक बोली सुनि‍ तिलमि‍ला उठैए
उनटि‍ अपन शहरी जीवन दि‍स तकैए
कहि‍यो बर्गर, कहि‍यो छोला-भटोरा
कहि‍यो बड़ा-पाउ खा राति‍ बि‍तबैए
कोड़ी-कौड़ी, छि‍द्दी-छि‍द्दी जोड़ि‍
महि‍ने-महि‍ना हजार रूपैआ
बाबुकेँ पठबैए
वि‍डम्‍बना देखू,
मनुख सालक तीन साए तीस दि‍न
जतऽ जी‍बैए,
ओढ़ना-बि‍छान छोड़ि‍ कि‍छुओटा ने कि‍नैए
सभ दि‍न बीना सि‍रहौनेक सुतैए
गाम एबाक लेल
ठि‍केदारसँ एडभांस उठबैए
आधा रूपैआसँ साड़ी-धोती,
साबुन-शेम्‍पू, सेन्‍ट कि‍नैए
आधा रूपैआ बचा गाड़ी पकड़ि‍ गाम अबैए
सुनि‍ते महाजन आबि‍ दरबज्‍जाक माटि‍ खुनैए
पनरह दि‍न धरि‍ खुब मासु-माछ कचरैए
अबै काल मासुलक लेल
फेर महाजनक दरबज्‍जा ओगरैए
जाइत देरी रूपैआ पठा देब
महाजनकेँ गछैए
ककरा कहतै के पति‍येतै
परदेसि‍या मनुख कोना जीबैए
बाप सदि‍खन कहै छै
ई छौड़ा तँ फाउ खैलाइए।

(2) शीतलहरि‍

हम छी पछि‍या शीतलहरि‍
हम छी पछि‍या शीतलहरि‍
जन मानसपर हम ढाहब कहरि‍
हम छी कहि‍ रहल चि‍करि‍-चिकरि‍
हम छी पछि‍या शीतलहरि‍....

जौं कनि‍यो अछि‍ जानक फि‍कड़ि‍
हमरा सोझासँ हटि जाउ
नै तँ हम बेध देब, सेद देब
हाथ पाएर सुइसँ छेद देब
हम नै बुझब छी अहाँ
बूढ़, बच्‍चा आकि‍ सि‍यान
जौं करब कनि‍याें
जुआनि‍क अभि‍मान
हम एक्के झोंकामे देब पटैक
एक बेर रमकब तँ कऽ देब लुल्ह-नाङर
जखन हएत पेरेलाइसि‍स एटैक
जल्‍दी कोनो कोनमे रहू दुबैक
अपन नाङरि‍केँ राखू सुटैक
 हम छी पछि‍या शीतलहरि....

हम अहि‍ना रमकब-उमकब

जे आओत सोझा ओकरेपर बमकब

 हम छी पछि‍या शीतलहरि....

संजय कुमार झा, पिता-श्री लक्ष्मी नारायण झा, माता- श्रीमती मुंद्रिका देवी, पता- ग्राम-बेलौन, पोस्ट-नवादा, भाया- बहेरा, जिला- दरभंगा, बिहार
जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल 
जन्म सों मैथिल, कर्म सों मैथिल 
मिथिलांचल अछि गाम यौ
काज करै छी सबहक किछु-किछु
सब सों किछु-किछु काम यौ

शिक्षा-दीक्षा मिथिलांचल केर
बचपन बीतल गाम यौ 
चाकर एकटा एमएनसी केर
दिल्ली बीतय शाम यौ

मिथिलाक बेटी जीवन संगी
दू बेटी केर बापो छी 
असगर पुत्र पिता केर छी हम
दू  टा भागिनक माम यौ

निहुरी-निहुरी कए गोर लगई छी
भेट-थि जों अप्पन सों पैघ
छोटक माथ राखै छी सदिखन
आशीषक निज पाम यौ

नोर बहै या सुख में, दुःख में
नोर पोछ-इ  में छी आगाँ
नीक लग-इ  या पोथी-पतरा
मनुक्खक अछि चाम यौ

किछु विद्रोही किस्म हमर अछि
भागी नहि कहियो रन सों
हारिक नहि कहियो भेल खेद
जीतक नहि गुमान यौ

सब रहथि कुशल जीवन भरि
येअह रख-इ छी मोनक चाह
अपनों गारी खर-खर चलय
जीब सकी विथ मान यौ
 

मैट भ गेलै जिनगी ओकर
जे नहि जाई या गाम यौ
आम खा रहल आने-आने
सूखि रहल लताम यौ

खेत परल परात बरिस सों
 
सुन्न परल दालान यौ
के पटाबय बारिक मेथी
 
टूटि रहल मचान यौ

उजरल-उपटल गाम लगय या
फुलवारी मसोमांत यौ
ओ करौछ आ घैला, पटिया
लोटकी, सोहारी, जांत यौ

छोटकी काकिक नैहरक भरिया
कहाँ भेटत ओ चतुर सुजान
कहाँ सुनब दुखियाक ओ राग
कोर्थू वाली भ गेल आन

भग्वात्ती घरक ओ कीर्तन
कहिया सुनबई आब नवाह
कहिया फेर खेलेबई नाटक
शोले, गोरख और गवाह

बाबा संगे बैगनी गेन्नै
सपने रहि जेत्तई यौ दोस
झिल्ली-कचरी कतय सा किनबई
कहाँ भेटै ओ भोरक ओस

भौजिक मूंह देखब भेल साल
गाल छुबय ले तरसय मोन
होलिक ओ हुरदंग ने भेटय
कानि रहल छी कोने-कोन

कतेक सुनाबी मोनक आह
कोंढ़ फटे या, सुखाई नोर
चलू चलय छी गाम दोस यौ
जिनगी रहि गेल थोरबे-थोर


ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर)

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 

२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।


३.श्वेता झा (सिंगापुर)





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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...