Sunday, March 13, 2011

'विदेह' ७७ म अंक ०१ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७७) PART IV


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मने नहिहोइए मम्मी जी।
‘एकटा बच््या भऽ जाइत तऽ ओइ मे अहॉ बाझल रहित हुँ......।’
हम सोचऽ लगलहुँ की बच््या भेला सॅ हमर खलिपन भरि जाएत-आ से कतेक दिन एक वर्ष, दू वर्ष अध्कि सॅ अध्कि पाँच वर्ष? मोन भेल सासु से पूछिऐन्ह मम्मी जी अहाँ केँ समय बीतेनाइ कठिन नहिलगै’छ ? कोन एहन काज करि जाहि मे व्यस्त रहि से नहिपफुराइत छल। हं मन भेल पढ़ौनीक काज करि । नरेन्द्र सँ पूछलिऐन्ह। उतारा भेंटल-अहॉक दिमाग खराब भऽ गेल अछि ऽ आब अहाँ गुप्ता हाउसक बेटी नहिअग्रवाल हाउसक पुतौहु छी। संकेत छल कुमारि मे एकटा स्कूल मे पढ़बैत छलहुँ। सुनि कऽ काठ भऽ गेलहुँ।
पफेर एहन संयोग जे नरेन्द्र स्वयं प्रोपोजल देलनि। सत्तर केर दशकं विदेशी मुद्राक अभाव, विदेश गमन पर पाबंदी। आ मिú अग्रवाल मित्रा मंडली मे शान बधरैत छलाह साल मे दू-दू बेर विदेश जा कऽ। आब कछमछी छयने छैन्ह।बजलाह ‘प्रिया हम चाहैत छी अपनो एक्सपोर्टक ध्ंध शुरू करू। सार प्रमोद दिन-राति उठैत-बैसैत विलायतक डींग मारैत रहैत अछि।’ प्रमोद नरेन्द्रक जिगरी दोस्त छलै। पच््यीस वर्षक दोस्ती मुदा तइओ ओकरा शिकायत छलै प्रमोद जी सँ। इम्हर पाँच वर्ष सॅ ओ जिनगीके पटरी पर आनलनि अछि। सोझ, सच्चरित्रा लोक। बापक मुइलाक बाद भाई सब ध्न दाबि लेलथिन। बेचारा पत्नीक जेबर बेच कऽ सिल्कक कारोबार शुरू कयलनि। अपना करोड़ोक ध्ंध ध्ैन्ह तइओ प्रमोदक उन्नति सॅ जरैत छथि। पार्टी मे प्रमोदके बजबैत छथिन मुदा ककरो सँ परिचय नहिकरबैत छथिन।
एक दिन बजलाह आइ प्रमोद के बजा कऽ कहबै अपना कम्पनी मे हमरा डाइरेक्टर बना दे। प्रमोद जी बड्ड शालीनता सॅ ई बात टारि देलथिन। ओ जनैत छलथिन नरेन्द्र के लेबऽ आ देबऽ बला तराजू भिन्न-भिन्न छैक। प्रमोद जी कहलथिन।
‘भाई! एकटा व्यापारी भारत सॅ हैंडीक्राफ्रट अयात करऽ चाहै’छ....जँ कोनो हैंडीक्राफ्रटक वस्तु पढाओल जाए तऽ कारोबार शुरू भऽ सकैत छै।’
‘अरे, तऽ ई कोन पैद्य समस्या छै कोनो मैनेजर.....’ हं, मैनेजर राखि लिअ, आ एक वर्षक बाद अपन एक्सपोर्ट शुरू भऽ जाएत। मुदा एतेक छोट स्केलक काज तऽ अपने हाथे करऽ पड़त।’
‘से तऽ छै मुदा हमरा ओतेक समय कहाँ रहैए?’ हम किछ बजितहुँ ताहि सॅ पहिने प्रमोद भैया कहलथिन-‘अहाँ केँ समय नहिअछि तऽ भाभी जी के कहियोन्ह कारोबार सम्हारऽ लेल।’
‘हूँ, प्रिया आ एक्सपोर्ट......। रसोई घर मे तऽ जाइते नहिछथि।’ हमर मोन झुर-झुमान भऽ गेल।
‘भाई, हमरा जे कहबाक छल कहि देलहुँ आब अहॉ दूनू गोटेक जे इच्छा होइ करू। कलात्मक रूचि बिना ई व्यापार नहिभऽ सकै’छ आ प्रिया भाभीक व्यक्तित्व मे कलात्मक रूझान छैन्ह।’
‘आर्डर कतेक दिन मे भेटतै?’
‘जहिया कहू। अगिले मास ओ एमस्टरडम सॅ आबऽ बला छै। भभी जी कें कोनो ऑपिफस मे भरि दिन रहऽ पड़तैन्ह मात्रा दू-तीन घंटा क बात छै। एहि व्यापारक बहाना सॅ जतेक बेर इच्छा होइ विदेश घूमि आयब।
जिनगी मे पहिलबेर आ शायद आखरीबेर सासु हमर पक्ष लेलैन्ह-‘नरेन्द्र, प्रिया के इ व्यापार सम्हार दिऔ मन बाझल रहतैन्ह।’
हं, तऽ हम मोन लगाबऽ लेल काज शुरू कयलहुँ। जे बनि गेल हमर जीवनी शक्ति। छोटे स्तर पर छलै कारोबार मुदा हम व्यापारक सम्पूर्ण संरचना कें बुझबाक प्रयास कयलहुँ। हैंडीक्राफ्रटक पूरा इतिहास पढ़ि लेलहुँ। गाँव-गाँव जा कऽ देखलिऐ कोन वस्तु कोना बनैत छै। आब बुझलिऐ हमर देश केहन समृ( अछि!
......... पीतर आ ताम्बाक मूर्ति, हाथी दाँतक समान, लकड़ीक लुगदीक बनल वस्तु........। पहिल बेर हम नरेन्द्र संग विदेश गेलहुँ। पिफलिप के ऑपिफस में घुसऽ से पहिने नरेन्द्र कहलनि-‘प्रिया, अहाँ चुप्पे रहब।’ हम चुप्प छलहुँ। पिफलिप जे समान बनयबाक-सप्लाईक बात कहैत छलथिन तुरत नरेन्द्र कहैत छलथिन-‘नो प्रॉब्लम।’ हम जनैत छलिए कोनो वस्तु बनयबाक मे कतेक समस्या उत्पन्न हेतै। मुदा हमरा मनाही छल तैं चुप्पे छलँहु।
अन्त मे बजलाह पिफलिप-मिस्टर नो प्रॉब्लम! हमरा अछि एकटा समस्या। हम चाहैत छी ‘जे प्रदर्शनी मे भारतक व्यापारी भारतीय शिल्प के विषय मे चर्चा करए।’
प्रदर्शनी मे कतेक दिन रहऽ पड़ैत ?’
-‘सात-आठ दिन।’
‘सात-आठ दिन? बट आइ एम ए बिजी पर्सन।’
-पिफलिप बजलाहः ‘देन डोंट डू दिस वर्ष। ओ. के.। कहि घड़ी देखऽ लगलाह पिफलिप । बात टूटैत देख नरेन्द्र के चेहरा पर तनाव झलकैत छलैन्ह। हम डराइत-सकुचाइत बजलहुँ- ‘मि. रॉथवेल! अहाँ हमरा पाँच मिनट समय दऽ सकैत छी?’
‘हं, हं, कियेक नहि?’
‘सुनू-हमरा हैंडीक्राफ्रटक विषय मे किछु जानकारी अछि।
-अहाँ जाहि मूर्तिक विषय कहि रहल छी, तकर दू-चारि टा पीस त हूबहू बनि जायत मुदा हजारक संख्या मे असंभव छैक।’
‘कियेक?’
‘कारण स्पष्ट छैक हाथ सॅ बनाओल जेतैं प्रत्येक कारीगरक अलग-अलग ढंग होइत छैक। रंग मे पफर्क भऽ सकैत छै तैँ।’
‘मुदा हमर गांहक?’
‘ई अहाँक काज अछि जे अपना गांहक के हैंडीक्राफ्रटक अर्थ बुझाबी। हाथ सॅ बनैत छैक तैं मात्रा वैरियेशन एकर सुन्दरता छै। मशीनक बनल वस्तु लेल अहाँ हमरा देश नहिआयब। मशीनक बनल वस्तु तऽ अहाँ कें ताईवान मे भेंट जायत।’
‘अहाँ एकदम सत्य बाजि रहल छी।’ पिफलिप के चेहरा प्रसन्नता सॅ खिलल छलै। नरेन्द्र कें कहलथिन बुझाइत अछि अहाँक पत्नी अहाँ सॅ वेशी बुझैत छथि एहि विषय मे।’
ई सुनि नरेन्द्र के चेहरा पफक भऽ गेलैन्ह। पिफलिप एक लाख टकाक आर्डर देलनि। हम अति प्रसन्न छलहुँ। खुशी सॅ ध्रती पर पैर नहिपड़ैत छल। होटल पहुँचिते नरेन्द्रके गर पकड़ि लपटैत बजलहुँ ‘लेट्स सेलेब्रेट नरेन्द्र! चलू शैम्पन पीबऽ।’
‘हँू, एक लाखक आर्डर की भेंटलनि, रानी जी नाचऽ लगलीह। हम करोड़ो कमाइत छी तइओ एना नहिउधिएलहुँ कहियो।’ हम गुम्म भऽ गेल छलहुँ। संभवतः आपसी सम्बन्ध् मे ओहि दिन पहिलगांठ परि गेल छल, एमस्टरडमक रॉयल होटल, कमरा नम्बर तीन सौ चारि मे।
कमराक घंटी बाजल। चौंकलहुँ। ‘कम-इन’ कहैत केवाड़ खोललहुँ। रूम क्लीनिंग लेल होटलक नौकरानी आयल। ‘गुड मार्निग मैमऋ कहि सपफाई मे जुटि गेल। घड़ी देखलहुँ दस बजैत छै यानि सात बजे सॅ हम अहि बालकनि मे बैसल छी! नौकरानी सपफाई कऽ चलि गेल। हम शीशा मे अपन मुँह देखलहुँ ओझराएल केश। उदास ऑखि आ थाकल देहक पोर-पोर। विदेश मे अइठामक परिवेश वातावरण सॅ अपना के कटल-छंटल अनुभव होइत छै तयॅ लोक अपना के संदर्भ हीन बुझऽ लगै’छ । चाहैत छलहुँ अपन कथा लिखब मुदा सोचिते रहि गेलहुँ। एखन घरि एको पॉती नहिलिखलहुँ अछि। कतऽ सॅ शुरू करि की लिखी से पफुराइते ने अछि। ऑखि गेल दूर लहराइत समुद्रदिस। नील झिलमिल लहरि टूटल चटाðन क टुकड़ा कछेड़ पर देखाइत अछि। अचानक हमरा सब किछ ऊबाऊ लागऽ लागल। काल्हिए पिफलिप ओतऽ वालवाइक चलि जायब। हम आपरेटर सॅ वालवाइकक नम्बर मांगलिऐ। एखन पिफलिप ऑपिफस मे हेतै।
‘हं पिफलिप, हम काल्हि आबि रहल छी लुफ्रतांसाक फ्रलाइट सँ बेलग्रेड होइत। कनपफर्म्ड बुकिंगऋ नहि, ओ नहिभेंट जेतै। की बेलग्रेड सॅ नहिभेंटतै? जँ नहिभेंटतै तऽ हम सूचित कऽ देब। अहाँ एयरपोर्ट पर नहिआयब हम एमस्टरडम उतरि ट्रेन सॅ पहुचबा हं, बुझलहुँ, गलती भऽ गेल पहिने कनपफर्म्ड कऽ लितहुॅ तखन पफोन करऽ चाही। कहि तऽ रहल छी सॉरी पिफलिप। अहाँ सांझि मे पफोन कऽ रहल छी। ठीक। जूडी के हमर स्नेह....... बाई।’
पफोन रखलहुँ। अपन गलतीक एहसास भेल। दिमाग एहन सुस्त कोना भऽ गेल? अतीतक स्मरण की नरेन्द्रक व्यंग्यवाण सुनि! ‘.............. प्रमोदे के कारण अहाँ कें पिफलिप सॅ परिचय भेल’। मोन भेल कहिऐ-परिचय तऽ अहूँ के भेल छल तखन लोक के कियेक हमरा सॅ दोस्ती भऽ जाइत छै आ अहॉ सॅ छीह कटैत अछि? जोर सॅ भूख लागल। काल्हि राति मे खाना नहिखयने छलहुँ। नहा कऽ जल्दी-जल्दी कैपफे दिस बढ़लहुँ। एखन ने ब्रेक पफास्ट के बेर छै ने लंचक। कापफे प्रायः खालिए छल मात्रा दू चारि गोटे कापफीककप नेने अखबार पढ़ैत छल। सर्विस वाली लड़की खिड़की लग बैसल औंध रहल छल। हमरा देखिते पूछलकः ‘ह्नाट कैन यू आपफर?
-ओनली चीज एण्ड ब्रेड
‘मैडम इट्स यू लेट’ कहि हसॅऽ लागल। पफेर पूछलक
-‘कैन यू पिफक्स ए सैंडविच?’ हम कहलिऐ ‘एस व्हाई नॉट?’ नास्ता कऽ घूम बहरेलहुँ। पफेर तुरंत वापस आबि गेलहुँ। मोन पड़ल जा बुकिंग क बारे मे नहिपूछलिऐ?
खैर, बुकिंग भेल। सांझि मे पिफलिप पफेान करबे करत। पिफलिपे हॉपफमैन सॅ परिचय करौने छल। हापफमैन जर्मनी मे चमड़ाक व्यापारी छै। पिफलिप कहने छल चमड़ाक व्यापार मे वेशी स्कोप छै।
पफेर वएह सड़क गाछ बिरीछ। की करू? कत जाउ? मन कहलक चलैत रहू थाकि जायबतऽ बैस रहब। काज ध्ंध तऽ अछि नहि। कतेक दिनक बाद एहन चैन भेंटल अछि। ..... दूर क्षितिज दिस तकैत छी....... ओई पार हमर घर छल। हमर नेनपन, बाबूजी, मां, दाई मां, सरोज, बुल्ली, नीलू ............ पफेर ब्याह एकटा नव घर....... विदाई काल माँ कहने छलीह-बेटीक नैहर सॅ डोली उठैत छै आ सासुर सॅ अर्थी। तखन अइ घिसल-पिटल कहबी पर हँसी लागल छल। मुदा नैहर तऽ सत्ते छुटि गेल, आ सासुर तऽ कहियो अपन घर बनबे नहिकयल। घर छैन्ह नरेन्द्रक, सँजुक आ हमर सासुके। ओतुका व्यवस्था जाहि मे हम अपना के पूरा इमानदारी सॅ झोंकलहु मुदा रहलहुँ मिसपिफट। जहिया मां के घर मे कोनो परेशानी होइत छल तऽ मन के मना लैत छलहुँ कहियो हमरो अपन घर हेत। आ आब ओहू घर सॅ हटा देल गेल तऽ आब कतऽ जाउ?
कतेक सहजभऽ नरेन्द्र कहि देलनि-‘एत घुरिकऽ नहिआयब। यह, आइ मीन इट...... आइ एम सीरियस। हम कतेक परेशान छलहुँ जखन प्लेन दिल्ली उतरि रहल छल, विमानक भीतर एयर होस्टेस क स्वर गंूजि रहल छल ‘लंदन सॅ चलल प्लेन दिल्लीक इन्दिरा गांध्ी हवाई अडाó पर उतरि रहल अछि। आशा अछि अहाँ लोकनिक यात्रा सुखद रहल होएत। लंदन सँ दिल्लीक दूरी हम आठ घंटा मे पूरा कयलहुँ। अहाँ सभके सूचित कऽ रहल छी बाहरक तापमान एखन 28 डिग्री सेलसियस छैक।’
हम दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरि कऽ सोचलहुँ कतऽ जाउ? कलकत्ता..... नहि। नरेन्द्रक स्वर दसो दिन यात्रा मे माथ पर हथौड़ीक चोट जकां खटखट बुझाइत रहल-एत घुरिकऽ नहिआयब ........कहियो नहि। आ मां, मोन पड़ल कोना बजने छलीह आ हम पफेर नरेन्द्र संग विदा भेल छलहुँ। हमर अपन क्यो नहिअछि? एतेक कारोबार पसरल अछि, एतेक बड़का आर्डर लऽ कऽ आयल छी। तखन तऽ चाहैते छथि झगड़ा बढ़ए मुदा अइ लडाई सॅ पफायदा? मुदा एतबा सच छै जे ओ हमरा घर मे घुस नहिदेत। पफेर मन कहलक-कानूनी सहायता सॅ नरेन्द्र अग्रवाल कें चौबिस घंटा क भीतर जेल पठा सकैत छी। मुदा अइ सॅ पफायदा? पफेर मोन पड़ल वीरेन ओ एक दिन कहने छल ‘दीदी! अहींक भरोसे हमर सभक दू सौ लोकक भातक हंडी चूल्हा पर चढ़ैत छै। अहां आब एसगर नहिछी।’ आ लंदन जाइतकाल नीना बाजल छलीहः ‘भाभी! आब हम कारनानी स्टेट्स मे नहिरहैत छी। बालीगंज मे अपना फ्रलैट मे रहैत छी। अहाँ मां के छोटी मां कहैत छिऐतऽ हम सब आन कोना भेलहुँ?’ आ तखन हम सोचि रहल छी कतऽ जाउ? छोटी मां बहुत आहुति देलनि पापक नाम पर। हुनका मुइलाक बाद कहियो ऑखिक नोर नहिसुखलैन्ह। वातावरण कें हल्लुक करबा लेल नीना बजैत छथि-‘भाभी, ई भारतीय मानसून छै।’
-नीना! एहन कटुवचन जुनि बाजू छोटी मांक लेल।’
-अहीं कहू-मां कियेक अन्याय सहलनि। अपन हक पर अध्किार कियेक ने कयलनि।’
-ओह, नीना, अहाँ नहिबूझबै। अहाँ ने ब्याह कयलहुँ अछि ने प्रेमक जाल मे पफॅसलहुँ......... छोटी मां जे जेहन छलै सेह स्वीकारलनि।’
नीना कें पापा सॅ घृणा छलै। आ नरेन्द्र कें मि0 कोबरा कहैत छथि बड़ी मां के देवी जी। ग्रैंड होटल मे ओ इंटीरियल पर्सनल मैनेजमेंट पोस्ट पर छलीह। सब संग हॅसैत-बजैत खुशमिजाज। बस छोटी मां के नोर देखिकऽ उदास भऽ जाइत छलीह। कहैत छलीह-भभी! हमरा लोकनिके आर सभटा बात सिखाओल जाइत छै मुदा खुश रहनाइ सिखाओल नहिजाइछ। मम्मी ने कतहु जाइत अबैत छथि ने मनोरंजन क लेल हुनका समय छैन्ह। एकसंझा भोजन आ मात्रा पूजा घर देखैत छिऐ। लड्डूगोपालक सोझामे ध्यान लगौने तऽ हमरा होइत अछि गुडाó-गुड़िया राखल छै। शायद मां कें बेटा नहिभेलैन्ह तकर रिक्तस्थानक पूर्ति करैत छथिन बाल-गोपाल।’
हम सिनेह सॅ भरि पाँज पकड़ि नीना के कहलिऐन्ह-नीना आब अहॉ बड्ड बक-बक करऽ लगलहुँ अछि आब अहाँ लेल हम वर ताकब। कहू केहन लड़का चाही?
‘की ब्याह कऽ अहाँ खुश छी? खुश छथि बड़ी मां, मम्मी..... भाभी अहाँ के तऽ मिú कोबरा भेंटलनि आब हमरा कोनो बानरक गरमे बान्ह्ऽ चाहैत छी?’
-मिú लॉयन या मिú टाइगर कियेक नहि?’
‘घुर आइ काल्हि के लड़का?’
हम मने-मन प्रार्थना कयलहुँ भगवती! नीना के नीक सहचर भेंटए।’ दुनियाँ मे सुहृदय, संवेदनशील पुरुषोछै। मुदा नीना अपना कें ततेक इंसक्युलेट कऽ लेने छथि जे बाहरी हवा क ताजगी लेल कतहु कनिको टा भूर नहिभेंटैत छे। नीना अपन साथी लग कहियो पापाक चर्चा नहिकयलनि। एतबे कहने छथि जे हम बहुत छोट छलहुँ तखने पिताक मृत्यु भऽ गेलैन्ह। नीनाके सँजु सॅ कनि लगाव भऽ गेल छलै तऽ ओकरा अइठाम अयबालेल रोकिए देल गेलै। नरेन्द्र आ ओकर दादी नीक जकॉ सिखा-पढ़ा देलथिन जे ओ सभ नीक लोक नहिछै ने ओ जागह ध्यिा-पुताक जाय जोग छै। तोहर मां तऽ राति-दिन पढ़ैते-लिखैत रहै छौ तयँ ओकरा व्यवहारिक ज्ञान नहिछै।
एयर इंडियाक फ्रलाइट साढ़े तीन बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर उतर छल। कलकत्ताक विमान साढ़े आठ बजे जायबला छलै। सुस्त-सूतल एयरपार्ट जागि रहल छल-चाय-कॉपफी। हमरा दिस बला काउंटर खुजलै। श्रीनगर, बम्बई, जामनगर, आ हैदराबाद केर काउंटर खुजि रहल छल। देह झाड़ि उठलहुँ। बैसल-बैसल डॉर अकड़ि गेल छल। हम बगल मे बैसल महिला कें कहलिए-अहॉ कनिकाल हमर समान पर नजरि राखब? ओ बजलीह-‘हं, हं कियेक नाहि।’ यात्रा करैत-करैत अनुभव भेल अछि जे यात्रा में प्रायः महिला अपना के असुरक्षित महसूस करैत छथि आ सहयात्राी लेल आत्मीयता कनि वेशिए रहैत छनि। बाथरूम सॅ हम हाथ-मुँह धेऽ कऽ बहरेलहुँ। दू कप कॉपफी अनलहुँ। एक कप कॉपफी हुनका देलिऐन्ह।
कॉपफी लैत बजलीह-‘बहुत-बहुत ध्न्यवाद! बहिन, हम तऽ इ बच््याक लऽ कऽ कतहु जा नहिपबैत छी। अहॉ कतऽ जा रहल छी?’
‘कलकत्ता।’
‘हमहूँ कलकत्ते जा रहल छी। न्यूयार्क सॅ राति पैन-एम सॅ उतरलहुँ अछि। छोट बच््याक लऽ कऽ यात्रा करबा मे बड्ड असुविध होइत छै। आब अहांक संग नीक लागत।’
हम हुनकर बात सुनि सोचऽ लगलहुँ-आब, ई महिला हमरा चैन सँ किछ सोचऽ विचारऽ नहिदेत। इम्हर-अहर उम्हर तकलहुँ। ठाढ़ भऽ हुनका कहलिऐन्हहम कानिकाल आगाँवला कुर्सी पर पैर पसारि आराम करऽ जाइत छी। अहॉक कोनो हर्ज नहिने।’
‘नहि, नहि।’
हम अपन अटैची उठाकऽ आगाँवला कुसी पर जा कऽ पैर पसारि ऑखि मुनि लेलहुँ । मन मे पफेर वएह प्रश्न घुड़िआए लागल........ कत जाउ?’ हमरा एतेक स्पष्ट बुझल अछि जे नरेन्द्र हमरा सँ खुल्मखुल्ला लड़ाई करऽ चाहैत छथि। यद्यपि आब हमरा सेक्स भाव प्रायः खत्म भऽ चुकल अछि। मुदा हमर उद्दाम महत्वाकांक्षों कें नरेन्द्र बेर-बेर सेक्सुअल Úस्ट्रेशन क नाम दैत छथि। कतेक बेर मोन मे भेल अछि जे पूछिऐन्ह अहीं सन खेलाड़ी अहाँक कतेको मित्रा छथि हुनक पत्नी कियेक न्यूरोटिक छैन्ह? नरेन्द्र क्रूर टेढ़यालि। ओ सोचैत छथि हम हक लेलड़ब। केहन हक आ कथित हक? जखन प्रीत प्रतीत नहिएको क्षण लेल मध्ुर सम्बन्ध् नहितखन की बाँचल अछि? आ ध्न-सम्पत्ति? नरेन्द्रक ध्न? खरीद बिक्री, टका, टकाक सूदि ब्याज दर ब्याज। एनपफ! बहुत भेल, जें मोन होइन्ह करथु मुदा हमर पछोड़ छोड़थि। आ सँजु?’ एकमात्रा संजु हमर कमजोरि अछि बलिके बकरा जकॉ छटपटाइत छी। कानूनी दांव-पेंच के तौर पर सँजुक कस्टडी नरेन्द्रे के भेंटतैन्ह। हम सभ दिन आहुतिए दैत रहलह अछि। एहि जीवन यज्ञक मे इ हमर पूर्णाहुति होएत संजुँ अग्रवाल वंशक कुलदीपक। जहिया सॅ जनमल अछि। एखने सॅ बात-बात पर पापाक तरपफदारी करैत अछि। बात-व्यवहार मे नरेन्द्रेवला ठसक। कहैत अछि-‘मम्मी, देखबै हम बहुत बड़का इंडस्ट्री बनायब। इ एक्सपोर्टक काज तऽ सर्विस-ओरियंेटेड काज छैक के सार ‘गोर चमड़ी वलाक तड़बा रगड़त। सँजु! अहॉ इ गाड़ि पढ़ब कतऽ सॅ सिखलहुँ?’
मम्मी! हम कोन गलत बात बजलहुँ? पापा कहिलनि जे इ श्वेत अंग्रेज हमरा देशक शोषण कयने अछि। तऽ ओकरा गाड़ि नहिपढ़बै तऽ स्तुती करबै?
अच्छा बहुत बुझनुक भऽ गेलहुँ। पापा ई नहिबतौलनि जे ओ स्वयं ककर-ककर शोषण करैत छथि?’
बेचारा मासूम नेना हमर बात सुनि टकटकी लगा हमरा देखैत रहल। स्त्राीगण शोषणक परम्परा कें कोना झेलैत छथि से संजु की जानऽ गेल!
राति भरि जागले छलहुँ से ऑखि बेर-बेर मुना जाइत छल। आवाज सुनि ऑखि खुजल। एयरहोस्टेस पूछलनि-‘अहॉ चाय, कॉपफी किछ लेब? अहॉ सूतल छलहुँ।’
-‘चाह सर्ब करबा मे असुविध तऽ नहिहोएत?’
‘नहि, नहि, हम तुरत अनैत छी।’
एयरहोस्टेस के देखि कऽ हमरा नीना मोन पड़लीह। नीना एयरहोस्टेस बनऽ चाहैत छलीह। मुदा छोटी मां के कनने खिझने गैं्रड होटल मे नौकरी कयलनि। पिताक स्थान पर लिखने छलीह स्वर्गीय अग्रवाल। इ बात ओ निःसंकोच हमरा कहने छलीह।
एयरपोर्ट पर नीना छलीह।
‘भाभी! मां बजौलेनि अछि घर चलू। नहि, नीना, हमरा सबके अपन अपन लड़ाई स्वंय लड़ऽ पड़त। दोसर बात इ जे अहाँ कें बूझल अछि मिस्टर कोबराक जहर........।’
हम टैक्सी लऽ सासुर एलहुँ। हमरा देखिकऽ सासु प्रसन्न छलीह । दाई-नौकर सब खुश भेल। ‘बहू, अहाँक आइ अएबाक छल से सँजु बाबू कें बुझल नहिछलनि?’ बुझल रहैत छैन्हि तऽ ओ भोरे सॅ हमरा कहऽ लगैत छथि-रामसिंह समय पर एयरपोर्ट चलि जाए मम्मी आबि रहल छथि।
ताबत नरेन्द्र ऊपर सॅ उतरलाह। करैत साँप जकाँ पफुपफकार छोड़ैत बजलाह-‘अहाँ एतऽ एलहुँ कियेक? जाऊ एखन तुरत हमरा घर सॅ बाहर जाऊ।’
‘सुनू, वेशी हल्ला नहिकरू। इ घर हमरो अछि। तथापि हम दस दिनक भीतर अलग फ्रलैट लऽ लेब। एखन दस दिन हम एतहि गेस्ट रूम मे रहब।’ भीतरे-भीतर आगि ध्ध्कि रहल छल। नहिजानि कियेक इ पराया घर के ह बाँटऽ नहिचाहैत छलहुँ। ओना अइठामक ध्न-सम्पत्तिक लेल रति भरि मोह नहिअछि। आ नरेन्द्र तऽ कहिया सॅ हमरा सॅ दूर भऽ गेल छथि। मन मे इएह बात सब घुरिआइत छल कि नरेन्द्र बजलाह।
‘हमर ऑपिफस खालि कऽ दिअ।’
‘आर किछ........’
‘लॉकर के चाभी ककरा लग छै?’ मां लग। ‘मुदा ओइ मे तऽ हमर गहना अछि?’
बहुत गहना संयुक्त परिवारक छै। हीराक सेट आ चूड़ी कंगन सब मां के नाम सँ छै।
‘आ हमर गहना............ ?’
‘अहाँ नैहर सॅ अनने की छलहुँ? मात्रा दस भरि सोना से लऽ लिअ।
‘नरेन्द्र?’
हे वेशी बाजू जुनि। बकबास करबत अहॉक व्यापारो बन्द करबा देब। बसएकटा चिटीò रिजर्व बैंक के लिख देबै।’
-‘यू........ यू ब्लैकमेलर!’ आ, अहाँ खिसियाल बिलाड़ि घुरखुर नोंचए।’
हमरा तऽ बुझू बकौर लागि गेल। हे भगवान क्यो एतेक नीचॉ खसत, हम कल्पनो ने कयने छलहुँ। इनारो मे नीचॉ जमीन रहैत छै........ आ नरेन्द्रक नीचताई अन्तहीन छै कतहुँ ठौर ठेकान नहि। हमरा किछु नहिपफुराइत छल। गेस्टरूमक केवाड़ बन्द कऽ ध्ड़ाम सॅ पलंग पर खसलहुँ। नोर हिचकी...... आ सबसॅ कष्टकर अनुभूति निहथ्था एसगर लड़बाक बोध्। हम कोना निपटब एहन खूंखार जानवर सॅ ? कहिया अन्त होएत समझौता करबाक।
मन मे नरेन्द्रक प्रति केहन प्रतिक्रिया छल क्रो(! नहिक्रो( नहि। अर्न्तमन मे आहत पशु क चित्कार छल। होइत छल जॅ आब एको शब्द बजताह तऽ गरदनि दाबि देबैन्ह। आर किछ तऽ नहिकयलहुॅ हं, अपन चप्पल खोलि ठेकनाक देह पर पफेकलहुँ। मन कनि शान्त भेल। ग्लानि कनिको नहिभेल ने पश्चाताप। नरेन्द्रक प्रतिक्रिया आर तीव्र-‘राक्षसी .......... अपनाकें बड्ड बु(िमती बुझै’छ पढ़ल-लिखल हूँ...।’ मेज पर राखल पफूलदान उठाकऽ जोर सॅ देवार पर पटकलनि......... ‘जाउ जतऽ जयबाक मन होए जाउ मुदा अपन मुँह हमरा नहिदेखाउ। हम एको क्षण अहाँ कें देखऽ नहिचाहैत छी। आ तमतमा कऽ घर सॅ बहराइत हमरा मुँह पर पच््य सॅ थुकलनि। हम भोकारिपारि कनैत रहलहुँ अपने हाथे अपन कपार पीटैत छलहुँ। शायद ओइ दिन पफेर हमरा भीतर ओएह दस वर्षक बालिका अन्तिम बेर सुरक्षाक लेल संरक्षण मांगि रहल छल। नरेन्द्र वापस नहिघुरलाह। भरि घर शीशाक टुकड़ि पसरल छल। हम रूमाल सॅ सबके बटोरि रहल छलहुँ आ मने-मन सोचि रहल छलहुँ हम इ शीशाक टुकड़ि कियेक समेट रहल छी? जखन ककरो हमर जरूरते नहिछै तऽ घर मे किछ पसरल रहऔ ताहि सॅ हमरा की?
ओ छमास पर सेक्रेटरी बदलैत रहैत छथि एक सॅ बढ़ि कऽ एक सुन्दरी जे हिनकर भूख शान्त करैत छैन्हि। ई तमासा पापा छलथिन तखने सॅ देख रह छी। पापाक गेलाक बाद तऽ रूप-सुन्दरी सब घरो पर आब लागल। खैर, जकरा सॅ हमरा कनिको लगाव नहिसे किछ करय। हं, एक बेर एकटा सेक्रेटरी छमासक बदला डेढ़ साल रहिगेल छलै। ओ वास्तव मे नरेन्द्र सॅ प्रेेम करैत छल। ओकरा गर्भ मे नरेन्द्रक सन्तान छलै तइओ इ राक्षस ओकरा हटा देने छलै। ओकरा कहने छलै-बिसरी जाउ हमरा सॅ प्रेम भेल छल, शपथ खेने छलहुँ! बाजु कतेकटका जाही इ ऑपिफस छोड़बा लेल?
ओ कहने छलै- ‘टका? यू वास्टर्ड सन ऑपफ विच। की अहाँ बुझैत छी जे टका सॅ कोनो औरत कें मुँह बन्द कऽ देबै? हम अहाँ कें बर्बाद कऽ चैन लेब।’ बिजली जकाँ ओकर कड़कैत आवाज घर देवार के झकझोरि रहल छलै, आ नरेन्द्र मुसुकैत ओकरा पकड़ि कऽ घर सॅ बाहर ध्केलने छलै। ओ बताहि जकॉ केवाड़ पीटैत छल। हमर मन हहरि उठल मुदा हम ओकरा सॅ नहिपूछलिए जे अइ पुरूषक विषय मे तो सब बात जनैत छलै बूझल छलौ’जे विवाहित भऽ रोज औरत बदलैत छै तखन कोन भ्रमवश एकरा पर विश्वास कयलें। मुदा बिना किछ पूछने ओकरा हम अपना रूम मे लऽ एलिऐ। बड़ी कालध्रि ओ हमरा पकड़ि कनैत रहल पफेर शान्त भऽ चलि गेल। ओकरा गेलाक बाद नरेन्द्र व्यंग्य सॅ बजने छलाह-‘बड्ड हमदर्दी भऽ गेल। सौतिन आनि दिअ?’
एकबेर जूरीक लग हम अइ घटनाक चर्चा कयने छलहुँ। नरेन्द्रक क्रूरताक प्रसंग मे। तऽ जूरी कहने छल-अपना स्वार्थ पर चोट पड़ने लगभग सब लोकक प्रतिक्रिया एहने हिंसक होइत छैक, कियेक तऽ हमर आजुक सम्पूर्ण सभ्यता हिंसा आ प्रमादे पर टिकल अछि। नहि, प्रिया एहन नहिछै जे मात्रा महिलाक शोषण होइत छै पुरुषो क शोषण होइत छैक। व्यक्तिक अपन-अपन संवेदनशीलता छै एम्पैथी-दोसरक दुःख दर्द के अनुभव करबाक क्षमता। तखन हम पूछने छलिए जूडी सॅ खैर, इ कहू जे गलती हमर छल?
नहिप्रिया नहि। असल मे अहाँक आ नगेन्द्रक सम्बन्ध् निगेटिव रूप लऽ लेने छल जत एक दोसर के मारऽ पर उताहुल छलहुँ हम अहॉ कें दोष नहिदऽ रहल छी-मुदा हमरा विचार सँ नीक होइत हटि जायब। एक दोसर पर निर्मम प्रहार करबा सॅ।
कनैत-कनैत नहिजानि कखन सूति रहलहुँ। ऑखि खुजल केवाड़ ढ़कढ़कयबाक आवाज सँ। केवाड़ खोललहुँ। सॅजु हब्बोढ़कार कानि रहल छल। नरेन्द्र पसीना सॅ लथ-पथ आतंकित छलाह। सँजु हमरा भरि पाँज पकड़ि एखनहु हुचुकि हुचुकि कानि रहल छल। सासु माथ पकड़ने नीचाँ मे बैसल छलीह। सब दाई नौकर, महराज.....
हम घबड़ाकऽ पूछलिए-‘की भेलै?’ क्यो किछ नहिबाजल। सँजु कहलक-‘मां। पापा बुझलथिन अहाँ जहर खा कऽ सूतल छीं।’
‘ओह।’
‘मम्मी!’ सँजु पफेर कानऽ लागल। आया मम्मीजी के उठाकऽ सोपफा पर बैसौलकिन। मिस्टर कोबरा ऊपर अपना रूम मे चलि गेल छलाह।
होस्टल आबि, भोजन कऽ सूति रहलहुँ। पिफलिप के पफोन सँ निन्न टूटल।पिफलिप कें कहि देलिऐ-हम काल्हि आबि रहल छी। बुकिंग पक्का भऽ गेल।
चाह पीबि पैकिंग मे जुटि गेलहुँ। नीचाँ जा कऽ बिल बनाबऽ कहलिऐ। अइ सात दिन मे एत सॅ लगाव भऽ गेल छल। सभक चेहरा परिचित सन लगैत छल एकटा आत्मीय भावक अनुभूति होइत छल। राति मे भोजनकाल जोसेपफ पूछने छल-‘मैडम, अहाँ काल्हि जा रहल छी?’
‘हँ!’
‘मैडम हमर वेजिटेरियन प्लेट नहिनीक लागल?’
‘जोसेपफ-हमरा खूब नीक लागल आ सबसे बेशी नीक लागल तोहर आत्मीयता।’
‘मैडम किताब पूरा भऽ गेल?’
नहि, जोसेपफ एखन हम सोचिए रहल छी। जोसेपफ गंभीरता सॅ माथ डोलबैत कहलक Úांसक बड्ड पैद्य लेखक ठहरल छलाह। मैडम की कहू ओ ततेक पीबैत छलाह। मैडम की कहू ओ जतबे पीबैत छलाह, ततबे लिखैतो छलाह। जखन ओ जाइत छलाह तऽ बड़का बक्सा कागज सॅ भरल छलैन्ह।
‘हुनकर नाम की छलैन्ह?’
‘सॉरी, मैडम हम अपन मेहमानक नाम नहिबता सकैत छी। अच्छा, अहॉ लेल मीठ की आनु?’
-‘आइ मीठ की बनेलहुँ अछि?’
‘पीचमल्वा.....मेडिटेरियन पीच के स्वाद अपूर्व होइत छैक.....इटली सॅ मंगाओल गेल अछि। कान लग आबि पफुसपफुसाकऽ बाजल मैडम ई डिश हमरा एत खास मेहमान लेल छै।’
अच्छा! हमरा हॅसी लागल।
‘लऽ जाऊ?’
‘हँ-हँ।’
हम जोसेपफ कें कहलिए हम अपन कोनो ने कोनो उपन्यास मे तोहर पीच मल्वाक चर्चा अवश्य करब। पफेर ओकरा हाथ मे किछ डालर दऽ ओकरा सॅ विदाई लेलहुँ। ऊपर जा कऽ सूति रहलहुँ भोरे चारिए बजे उठबाक छल। एक मन भेल जे एक बेर समुद्र देखि मुदा नहिगेलहुँ। निन्न टूटल आपरेटरक आवाज सॅ-गुडमार्निंग, मैडम, इट इज टाइम टू वैक अप।’
हड़बड़ाकऽ उठलहुँ। एयरपोर्ट या स्टेशन जयबा लेल हमरा हरदम हड़बड़ी रहैत अछि। जँ समय सॅ आध घंटा पहिने पहुँच जाइ तऽ कोन हर्ज? पहिने पहुँचने तनाव नहिहोइछ। डूयब्रवनिक एयरपोर्ट पर शायद हमहीं पहिल यात्राी छलहुँ। काउंटर खुजलो नहिछलै। हम कोना वला कुर्सी पर जा कऽ बैसलहुँ- प्लेन जखन उड़ि रहल छल। खिड़की लग हमर सीट छल। स्वच्छ नील आकाश, उज्जर-उज्जर ठाम-ठाम बादरि नीचाँ आल्प्स करे बपर्फ सॅ झॉपल पहाड़ि। भूरा चितकबरा चटाðन पर बपर्फक तिरछाह रेखा बुझाइत छल।
असीम तनाव वला समय छल। लंदन सॅ घुरिकऽ घर आयल छलहुँ मुदा छलहुँ बेघर। सँजु बेचारा निरीह नेना। कखनौ पापाक अगवाज सुनि दौड़ैत अछि तऽ कखनौ मम्मी के कोरा मे बैसिकऽ दुलार मलार करै’छ।
‘मां अहाँ अहिठाम रहू ने? पापा क बातक दुःख नहिकरू। ओ तऽ सबके डँटैत रहैत छथिन। काल्हि राति दादी बड्ड कनैत छलीह।
हम मने-मन सोचलहुँ-दादी एतेऽ बढ़ावा देलथिन आब कानऽ के अलावा की करतीह। पैंतालीस वर्षक एकलौता बेटा। आ हुनका जे संस्कार छैन्हि पुरुषक वर्चस्व वला ताहि हिसाबें बेटा क बात-व्यवहार अनुचित्त लगितो नहिछैन्ह। हमर संस्कार दोसर अछि हम सँजुक सहारा लऽ नहिजी सकब। ने जिनगीक सहारा बेटा भऽ सकै’छ ने पति ने प्रेम। हँ हिनक संग सहयोग सॅ जीयब सहज भऽ सकै’छ। मन केँ भरोस भेटैत छै जे अपन क्यो अछि हमरा संग। मुदा जॅ ओ संग नहिदेमए उनटे एकतरपफा कर्त्तव्यक निर्वाह करैत अपन आहुति दैत रहि तऽ एक संग रहब कठिन भऽ जाइत छै। तैं हम अपना मन के मना लेने छलहुँ एकलाचलो रे जे संघर्ष करबाक होएत से करब। हम अपना दृष्टिकोण सॅ सही छी तऽ आनकऽ नजरि मे सही स्थापित करबा लेल कठिन तपस्याक कोन काज? बिल्कुल व्यर्थ। खास कऽ ई व्यर्थता क एहसास सॅ तखन आर कचोट होत छैक जखन बुझना जाइछ जे हमर बात सामने वला सुनऽ चाहिते ने अछि। अपना मन के कतेक तरहे बुझबैत छलहुँ मुदा हमर मन छल जे बुझियौ कें अबुझ बनल छल। हमर बेटा? एकलौता बेटा...... नहिनरेन्द्र किन्नहु नहिछोड़त। ओ नरेन्द्रक मुठीò मे छै कानूनो नरेन्द्रेक पक्ष मे छै। समाजो ओकरे संग देतै। प्रिया, अपना करेज पाथर पर राखू मुदा ओइ अबोध् नेनाकेँ बेघर नहिहोमऽ दिऔ। ओकरा अपना दादी सॅ लगाव छै पापा, पापा दिन भरि रट लगौने रहै’छ एको दिन पापा बिना नहिरहि सकै’छ। हँ, हमरो सॅ स्नेह छै-मुदा हमरा ओकरा जिनगी सॅ चुपचाप हटऽ पड़ल। दादी आ पापा सँजु केँ नीक जकाँ लालन-पालन कऽ लेथिन। प्रिया, स्वार्थी जुनि बनू ने अपना मातृत्व केँ महिमा मंडित करबा लेल बेचैन होउ। जँ स्वार्थी छी तऽ से स्वीकारि लिअ। कम से कम अपना आत्मा सॅ छल नहिकरऽ चाही। सत्य तऽ ई छै जे अहाँ बेटा सॅ वेशी अपना रोजगार कें चाहैत छी.....अहाँ के जँ स्नेह अछि तऽ अपना सॅ।मानलहुँ अपना आपके के नहिनेह करै’छ। इ हो बुझैत छी जे आइ ध्रि मात्रा महिले अपन आहुति दैत रहल अछि। मुदा से कियेक? अदौ से इएह होइत रहलैए तैं? मुदा जे अहॉ से होइत रहलै अछि सेह एखनहु होमए ई कोनो तर्क छै? तऽ..... हमकी करू?..... हे भगवान अइठाम ई अलाय बलाय सोचैत सोचैत हम पागल भऽ जायब। आ एकटा न्यरोटिक, राति-दिन कनैत-खीझैत मां लग कोनो नेना कतेक काल रहैत। एखन अबोध् छै दस वर्षक बाद बीस वर्षक युवा हमरा संग रहत किन्नहु नहिआ तखन हमर उम्र होएत पैंतालीस वर्ष! तऽ की पैंतालिसम वर्ष मे हम मृत्युक प्रतीक्षा करब? अपन समस्त स्वप्न कें आहूति दऽ दिअ?? भोर मे निन्न टूटल तऽ अपने सॅ पूछलहुँ-आब की करबाक चाही? आब कतेक दिन ध्रि कनैत रहू? आब कोनो ने कोनो रास्ता चुनऽ पड़त-अपन जंग अपने लड़ पड़ैत छै।
नरेन्द्र सबसे पहिने हमरा नैहर मे हमरा मां क सोझा मे हमरा विरू( बात उठेलैन्ह-प्रियाक बड्ड गर्म मिजाज छैन्ह! मां, ओ चप्पल उठा कऽ हमरा देह पर पफेकलनि। सँजु तऽ हिनका डरें थर-थर कँपैत रहै’छ अहाँ तऽ एतेक दिन सँ हमरा मां के जनैत छी-अहीं कहू हमर मां कहियो हिनका कथु लेल रोक-टोक कयलथिन? मुदा ई कहियो अपन घर-गृहस्थी बुझलनि? सोझे मे कहैत छी पूछियौन्ह-कहियो भोजन बनौलनि? अहीं कहूॅ हिनका काज करबाक कोन जरूरत छै? ई कियेक भोर सॅ सांझि धरि खटैत रहैत छथि? ई हो नहिजे कलकत्ते मे रहैत छथि आइ दिल्ली काल्हि मद्रास। घर घुरलनि कि पफेर लंदन तऽ अमेरिका। हिनका ऑपिफस सॅ सेक्रेटरी पफोन कऽ आया कें कहैत छै-‘मेम साहब के बक्सा सैंत कऽ राखि देबै’ ओ रतुका प्लेन सँ हांगकांग जयतीह।’
कहू तऽ आया बक्सा सैंत सकै’छ मम्मी कें हिनकर बक्सा सैंत कऽ राखऽ पड़ैत छैन्ह! की कहू ई अपन आलमीरा क चाभी ध्रि आया के सौंप कऽ चलि जाइत छथि। ऑपिफस सॅ हड़बड़ाइत औतीह आ विदा होमऽ लगतीह’ हमर मां दूध् क गिलास लऽ हुनका पाछू लागल रहैत छथि-प्रिया दूध् पी लिअ।’ बड़का भैया हं मे हं मिलबैत बजलाह।
नरेन्द्रबाबू अहॉक कहब उचित अछि-सरासर प्रियाक गलती छै। अहू घर मे पुतौहु छै एकरा जकॉ करतै क्यो तऽ एको दिनबास नहिहेतै।’
सेह, बुझियौ अहां सब। विजय बाबू की सब कहू ई हमरा राक्षस, कसाई आ जानवर कहैत छथि।’ आब मां कें रहल नहिगेलैन्ह। गुम्हरैत बजलीह।
‘प्रिया तोहर ई हिम्मत! छीः छीः तू जन्म लैते कियेक ने मुइलें।’ नरेन्द्र, हम गलत के गलते बुझैत छिऐ अपन बेटी अछि तैं की हम एकर पक्ष कखनहुँ ने लेलिऐ से अहॉकें बूझल अछि।’
मां, से तऽ हम बूझैत छी मुदा ‘ई प्रिया तऽ सबटा दोष हमरे दैत छथि। जनै’ छी ई हमरा कहलनि अछि जे चौबिस घंटाक अन्दर ई हमरा जेल मे बंद करबा सकैत छथि।
‘कोन आधर पर?’ बड़का भैया गरजैत बजलाह।
पर स्त्राीगमन.....मानसिक अत्याचार.....शोषण..... प्रिया एखन चुप्प कियेक छी बाजू ने की हम झूठ बजैत छी? कोन-कोन उपाध् िसॅ हमरा विभूषित करैत रहैत छी। हं, ई हमरे गलती अछि जे हम हिनका प्रेम मे पागल भऽ जे कहैत छलीह से करैत छलहुँ हिनका इशारा पर नचैत रहलहुँ। ई एक्सपोर्टक व्यापार करऽ चाहलनि हम यथासंभव सहयोग देलिएन्ह। हमरो भेल जे बैसल मन नहिलगैत छैन्ह हैंडी क्राफ्रटक काज छै मन लगतैन्ह किछु टको भऽ जैतेन्ह ‘हमरा ई कहाँ बूझल छल जे हिनकर महत्वाकांक्षाक सीढ़ि कहियो खत्म नहिहेतैन्ह। हिनकर लक्ष्य भारत सरकार सँ प्रथम पुरस्कार प्राप्त.......
-नरेन्द्र ई सत्य छै जे हमरा पुरस्कार भेंटल मुदा हम कखनहुँ चर्चा कयलहुँ की एकर प्रचार कयलहुँ? ‘प्रिया, हमरा कहऽ दिअ-हम विवाहक बाद- पन्द्रह वर्ष ध्रि चुप रहलहुँ आब हम चुप नहिरहब। हम पलंग पर पड़ल-पड़ल करैट पफेरैत रहैत छी आ ई आबि कऽ कारपेट पर सूति रहैत छथि। बत्ती ऑपफ कऽ कहतीह ‘हम बहुत थाकल छी आब सूतब’। हरदम इएह सुनैत छी-‘...हम व्यस्त छी विदेश सॅ ग्राहक आयल अछि।’ आ नहितऽ पफाइलक गठठर लऽ औती घर ऑपिफस बनि जाइछ।’
- ‘एकर कोनो मध्यम मार्ग ताकल जाए।’ बड़की दीदी बजलीह।
-‘पूछिऔ अपना बहिन सँ। काज दिनो-दिनो बढ़ले जाइत छैन्ह।.....हिनका हमरा सॅ कम्पटिशन छैन्ह........टका अहींटा नहिकमा स कैत छी हमहूँ कमा कऽ देखा सकै छी। एतेक अहंकार?’
‘हम की बाजू नरेन्द्रक बाबू! ई बेटी तऽ हमर सभक नाक कटा देलक। समाज मे कतहु मुँह देखाबऽ योग नहिरहलहुज। आर बेटी अछि क्यो एना-तमाशा नहिकएलक। हमरा तऽ आब चिन्ता होइछ हमर पोती सभक विवाह कोना होयत जकर पीसी एहन छै?’
भैया तऽ आर मक्खन बाजी शुरू कयलनि। समय पर उधरी टका भेटैत छैन्ह नरेन्द्र सँ। मां अन्तिम निर्णय सुनौलनि-प्रिया, हमर बात एखनहुॅ मान सोझे चलि जो नरेन्द्र बाबूक संग।’
‘प्रिया, मां ठीके कहैत छथि जे भेलै आब घर-गृहस्थी पर ध्यान दे। एहनघर-वर बड्ड भाग्य सॅ भेटैत छै।’ बड़की दीदी कहलनि। बड़का भैया डपटैत बजलाह-‘अगर एखन नरेन्द्र बाबूक संग नहिगेलें तऽ तोरा लेल अइ घरक दरवाजा बन्द भऽ जयतौ।’
छोटकी भाभी बजलीह-सरोज जी डाक्टर छथिन तइओ घरक खाना अपने बनबैत छथि। अहाँ आबहु चेत जाउ, लोक कहैए ताहि पर ध्यान दिऔ। सत्ते कहैत छी नरेन्द्र बाबू सन पति अग्रवाल हाउस सन सासुर भेंटत ने देवी सन सासु।’
ओह! सब एकतरपफा न्याय कऽ रहल अछि एखन धरि सभक बात सुनि ऑखि सॅ टप-टप नोरे चुबैत छल। आब नहिरहि भेल हम अपन पफैसला सुना देलिऐ-ठीक छै सभक नजरि मे हमहीं दोषी छी। तऽ हमरा नहिचाही एहन घर ने एहन वर ने देवी तुल्य सासु ने अग्रवाल हाउस! हमर अपन खून, अपना कोखिके बेटा कानूनन नरेन्द्रे के हेतैन्ह। आब सब सम्हारथु नरेन्द्र।’ मां अहू उम्र मे कड़कैत बजलीह-‘प्रिया चुंप रहबें की लगाबिऔ-थापड़?’
हम ओइठाम सॅ चुपचाप उठलहुँ। बाथरूम मे जा कऽ हाथ मुँह धे नीचा उतरलहुँ। अपना गाड़ी पर बैसक विदा भेलहुँ। गाड़ी स्टार्ट भेला पर ओ सब बुझलनि। बहादूर गाड़ीक पाछू दौड़ल-गाड़ी रोकू प्रिया बौआ, मां जीक आर्डर छैन्ह.......।’
सब स्वाहा भऽ गेल। किछु नहिबाँचल। ने अपन खून अपन होइत छै ने पानि। तखन अपन ककरा कहल जाए? छोटी मांक कोर मे बैसल कनैत रहलहुँ। पारंपरिक संस्कार आ स्वभाव बाली छोटी मां हमरा घर वापस पठा देलनि। हम दिन भरि पलंग पर पड़ल-पड़ल अपन अतीत आ वर्तमान देखैत रहलहुँ। घर क मुँह पर आबि सासु बजलीह-‘कनियाँ भरि दिन उपासले रहब? आउ कनि खा लिअ।’
ओह! आब सासुमां के हमर ध्यान अयलैन्ह! ठीक बेटे बला स्वभाव। मां बेटा दूनू के पर-पीड़न में आनन्द भेंटैत छैन्ह। आजीवन अपने वेदनाक प्रतिमूर्ति बनि बेटाक सहानुभूति बटोरि पापा के बात कहलथिन। एकदम संवेदन शून्य छथि। मुदा बेटा लेल तऽ बड्ड संवेदनशील छथि। खैर हमरा अइ सब सॅ आब कोन मतलब? एखन तऽ हमर अपने आस्तित्व पर संकट अछि। एखन चोटाह सांप जकॉ पूपफकार छोड़ैत नरेन्द्र पहुँचताह। भोजन करऽ गेलहुँ। मुदा दू कौर कहुना खा कऽ उठि गेलहु।
बेचारा संजु मां-बापक लड़ाई मे पिसा रहल अछि। हाथ धे कऽ अयलहु तऽ सासु बजलीह।
‘प्रिया! घर नहिउजारू। एहन काज सॅ कोन पफायदा। नरेन्द्र नहिचाहैत छै तऽ व्यापार छोड़ि दिअ। बात आगॉ’ नहिबढ़ाऊ।’
सँजुक सोझा मे मां क ई सब बाजब हमरा नहिनीक लागल। बजैत-बजैत चुप भऽ गेलहुॅ जे घर तऽ उजड़ि गेलै। अहॉक बेटा के हमर कोनो जरूरत नहिछैन्हि छ मास पर सेक्रेटरी बदलैत छथि। सब सुख भोगैत छथि। देखाबऽ लेल हम पत्नी छिऐन्ह। मुदा कहलिऐन्ह नहिकिछ। बुझल अछि मां अपना बेटाक कोनो गलती नहिस्वीकारती ठीक छै। हमहीं बदमाश छी।
नरेन्द्र पहुँचलाह तऽ हम कहलिऐन्ह
‘हमरा किछ कहबाक अछि।’
‘अहाँ के हमरा सँ एना लड़ब-झगड़ब......
-हम लड़ैत छी.....
‘शांति पूर्वक बाजू। हम कोनो समझौताक बात नहिकहि रहल छी।’
‘तऽ की कहऽ चाहैत छी?’
काउंटर चैलेंज। हं, अहां एकरा ध्मकी कहि सकैत छी। अहां हमरा कहने छलहुँ ने जे बिजनेश बंद करबा सकैत छी?’
‘हं, कहू तऽ कऽ के देखा दी।’
‘व्यापार हमर अन्तिम सहारा अछि।’
आ अहि व्यापारक बलें अहाँ कूदैत छी। अहाँ ई जुनि बसरू जे अहाँ सपफल उद्योगपतिक पत्नी छी।’ ‘देखू अहाँ पफेर हमरा ध्मकी दऽ रहल छी।’
‘ई ध्मकी नहि, आई मीन इट........ ,
तऽ की बाजू ने।
हम इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, एक्साइज संग सभटा घुरी पफंदी क भंडा पफोड़ब देखब अहाँ कोना बचैत छी?
‘ओह! तऽ अहॉ अतेक ध्रि सोचि लेन छी तऽ आब इ सब करबा सॅ पूर्वहि अहॉक गरदनि दबा दी सेह नीक।’
हं, इहो सौख पूरा लिअ। हम थाना मे एपफúआईúआरú कऽ के आयल छी। हम मुइलहुँ त अइ संसार मे एक व्यक्ति एहन छै जे हमर मौत के बदला अहाँ सँ अवश्य लेत।
पिशाच जकाँ विकृत हँसी हँसल नरेन्द्र। पफेर व्हिस्कीक छूंट पिबैत बजलाह ‘अच्छा, ई इशारा सँजु दिस तऽ नहि। हम बेर-बेर कहि चुकल छी हमरा कुल-दीपक दिस कखनौ वक्र दृष्टि सॅ नहिदेखू अन्यथा.....।’
‘सूनू नरेन्द्र हम सॅजु बिना रहब जीयब। अई झागड़ा मे हम बेटाक बलिनहिचढ़ायाब। हम नीना क बात कऽ रहल छी।’
नीना? नीना क नाम सुनिते भौंचक रहि गेलाह। आब गुम्म कियेक भऽ गेलहुँ। अहाँ बड़का व्यवसायी छी हमर व्यवसाय तऽ बड्ड छोट अछि मुदा हमरा जे अपन स्टापफक लॉयलटी भेंटल अछि से अहाकें नहिअछि। आ हमर गांहक सात समुद्र पार रहैत अछि जे हमरा सॅ चमड़ाक बैग किनैत अछि। हम सती सावित्राी छी-कि चरित्रा हीन ताहि सॅ ओकरा कोनो मतलब नहिछै’
तैँ एतेक हिम्मत!
बौखलाउ जुनि। हमर बात पर ध्यान दिऔ। हमरा बस दू मासक समय दिअ, हम ऑपिफस, घर, जेवर कपड़ा आ सँजु के छोड़ि देब।’ एतबा कहि हम सीढ़ी सॅ उतरलहुँ। हाल मे सासु बैसल छलीह। हमरा तमतमाकऽ उतरैत देखि पूछलनि ‘की-भेल प्रिया?’ ‘नहिकिछ नहिहम अपना रूम मे जा रहल छी।’ केवाड़ बन्द कऽ लेलहुँ। करेज पफाटि गेल। आँचर से मुँह बन्न कयने छलहुँ तथापि हिचकी बहरा रहल छल। हमरा संग सब दिन एना कियेक होइत अछि नेनपन सॅ एखन ध्रि कहियो चैन सॅ समय नहिबीतल। एना कियेक? हमर कोन अपराध् ??
दोसर दिन भोरे उठि सबसे पहिने मकानक दलाल के पफोन कयलहुँ....‘दो कमरे का छोटा सा फ्रलैट चाहिए, कम से कम सलामी। दलाल बेर-बेर पूछैत छल मिसेज अग्रवाल फ्रलैट ककरा लेल चाही। अन्त मे कहऽ पड़ल हमरा अपने लेल।
‘अपना लेल?’
‘हां, आब वेशी पूछताछ नहिकरू।’
नहि, आब किछु नहिपूछब। बस हमरा दस-दिनुका समय दिअ पता लगा कऽ सूचित करब। ओना एकटा फ्रलैट कारनानी स्टेट्स मे खाली छै, आ आब ओइ बिल्डिंग के रेपुटेशन नीक भऽ गेलैए पहिलुका बला बात नहिछै।’
‘अहाँ पूरा पता लगाकऽ बताऊँ।’
ऑपिफस जा कऽ हम सैम्पल सॅ भरल बक्सा वरेन के ध्रा देलिए।
‘आर्डर नीक भेंटल अछि....समय पर माल सप्लाइ कऽ दिऐ तऽ कोनो परेशानी नहिहेतै।’
‘कतेक के आर्डर छै दीदी। ई पार्टी तऽ एखन ध्रि बहुत कम आर्डर देलक अछि।’
हुनका हमर माल पसंद छैन्ह तैं जतबा बना सकब ततेक ओ लऽ लेता।’
एकर बाद हम बैंक मे पफोन कऽ एúजीúएमú सॅ समय लेलहुँ। हम जनैत छी-नरेन्द्र सॅ डेढ़ लड़ाई मे नहिसकब तैं सोझ बाट पकड़लहुँ। यूनियन बैंक पूरा सहयोगक वचन देलक। जँ एलúसीúपर माल जेतै तखन कोनो दिक्कत नहिहेतै। यूनियन बैंक सॅ हम सोझे इलाहाबाद बैंक गेलहुँ। चेयरमैन सॅ पार्टी मे परिचय भेल छल। कार्ड देखिते भीतर बजौलक।
‘हम यूनियन बैंक सॅ एकाउन्ट शिफ्रट करऽ चाहैत छी। अहाँ सॅ सहयोग भेंट सकै’छ?’
‘पूर्ण सहयोग भेंटत। चेयरमैन पफेर सब स्टेप्स एक-एक कऽ बुझौलनि। तकर बाद पूछलनि की हम जानि सकैत छी अहाँ बैंक कियेक बदलि रहल छी?’ बैंकर सँ कोनो बात नुका लेब गलत बुझाएल तैं सापफ-सापफ कहलिऐ-‘व्यक्तिगत कारण छै। हम पति, पत्नी पफरक भऽ रहल छी आ पफरक भेला पर पति हमरा लेल गारंटी नहिदेब चाहता।’
‘अहॉ अपन व्यक्तिगत गारंटी की दऽ सकै’छ?’
‘किछ नहि। मात्रा इएह जे हम ग्राहक दस लाख के रिवाइविंग एलúसीú खोलबाक लेल तैयार छथि।’ चेयरमैन कनिकाल गुम्म रहल पफेर पूछलक-अहांक भाई वा दोस्त?’
‘नहि, हम ककरो सॅ मदद नहिचाहैत छी आ हम तऽ एलúसीúक संग माल पठा रहल छिऐ।’
‘वेश, मुदा जॅ कहियो ओवर ड्राफ्रिंटगक जरूरत पड़ए तऽ?’
‘नहिसे जरूरत नहिहेत।’
‘तखन कोनो समस्या नहि।’
दस दिन के भीतर कारनामी स्टेट्स मे फ्रलैट भेंटल कहियो एहिठाम छोटी मां रहैत छलीह। आब इएह हमर घर आ आपिफस। छोटी मां अहि मे रहैत छलीह, मुदा आइ जे एत रहऽ आयल अछि से अग्रवाल हाउसक पुतौहु नहिमात्रा ‘प्रिया’ नामक महिला अछि। लोक बुझि नहिपबैछ कहिया, कखन जिनगी क गति विस्पफोटक भऽ जेतै। आ कखन अतीत के पफेकि कऽ ठाढ़ भऽ जायत।’ ओई दिन नरेन्द्र सॅ हमर आखरी बातचित भेल छल। अन्तिम राति छल ओइ बड़का घर मे। भोर होइते हम अपन बक्सा लऽ सीढ़ि सॅ उतरैत छलहुँ। हमरा बक्सा लऽ उतरैत देखि सासु माथ पकड़िकऽ पाथरक मूरत जकाँ गुम्म बैसल छलीह। नरेन्द्र निरपेक्ष भाव सॅ नास्ता कऽ रहल छलाह। सँजु स्कूल गेल छल। हम जानि बुझिक अहि समय मे विदा भऽ रहल छलहुँ। सँजु स्कूल सॅ अयला पर की सोचत? पफेर मन कहलक प्रिया कानूनन सँजु पर अहाँक कोनो हक नहिअछि। तखन करोड़ोक रोज सौदा करऽ बला ओकर बाप की बेवकूपफछै ओ सँजु के मां क बदला टका सॅ स्नेह करब सिखा देतै आ मां क जे तस्वीर ओकर मन मे छै तकरा छहों छित्त कर खत्म कऽ देतै। आ सेह भेलै। हम अयलहुँ कारन नी स्टेट्सक फ्रलैट मे तऽ हमरा सॅ भेंट करऽ अयलीह सबसे पहिने नीना आ छोटी मां। छोटी मां हमरा अपना करेज मे साटि कानऽ लगलीह। हमर दुःख-दर्द आ एकाकीपीन के अनुभव इएह कऽ सकै छथि। नीना-हाथ बढ़ा कहलनि की हम अहॉक काज मे किछ मदति कऽ सकैछी अहॉ हमरा अपन छोट बहिन,दोस्त वा बेटी किछ मानि आदेश दऽ सकैछी। हम अपन जी, जान लगा देब मुदा अहॉके प्राण, प्रतिष्ठा पर खरोंच नहिलागऽ देब।’
पफेर संजु आयल कनैत। हमर बेटा!
‘मम्मी, घर चलू ने...।’
‘नहिबौआ हम ओतऽ नहिजाएब।’
‘मम्मी हम की करू?’
‘जे दादी कहथि से करब आ बेटा पापाक वात मानब।’ हमरा अपना खून मे पफेंटल पानिक एहसास भेल। सँजुक कोन दोष! जहिया सॅ जनमल स्वार्थे देखैत रहल अछि। अइ नेना कें पैद्य लोक कोन मूल्यक बोध् करौल कै। जेहन वातावरण मे रहै’छ ओहने बनत। आ बच्चा कें हमरा इमोशनल ब्लैकमेल करब बड्ड अनुचित बुझनाजाइछ। मातृत्वकें देखाबटी महिमा मंडित करबाक कखनौ-इच्छा नहिभेल। चारि वर्षक बाद सँजु अठारह वर्षक बालिग पुरुष भऽ जायत।
हां, ओहि दिन सांझि मे हम नरेन्द्रक के पफोन के लिए कियेक तऽ ओई करोड़पति कें हमरा हिसाब देबाक छल जे हम की सभ अपना संग एतऽ अनलहुँ अछि-‘नरेन्द्र! हम सभटा ओतहि छोड़ि के आयल छी। मात्रा बीस पल्ला साड़ी आ अपन किताब एतऽ आनलहुँ अछि।’
बहुत बढ़ियाँ ध्न्यवाद!’
‘हं, सँजु के कहियो-कहियो एतऽ आबऽ देबै, कहीं एहन ने होमय जे ओकरा देखबा लेल हमरा कोर्ट जाए पड़ए।’
‘बड्ड तैश मे बात कऽ रहल छी?’
‘नरेन्द्र! मनुषक भाषा मे बाजू। अपन घर कोन महिला छोड़ चाहै’छ? आ, अहाँ तऽ हमर बेटो के राखि लेलहुँ?’
‘उचित कयलहुँ अछि। अपना कें सम्हारि लिअ सेह बहुत। अपन ठेकान नहिबेटा कें पालन-पोषण करतीह! विलायत आ अमेरिका बेटा के लऽ कऽ जायब? हाट फ्रयूचर कैन यू गिव हिम? टेल मी?’
हम व्यर्थ बुझैत छी किछ कहब दंभी व्यक्ति केँ नरेन्द्र आर किछ बकैत छल हम रिसीवर राखि देलिए।
-प्लेन एमस्टरडाम के एयरपोर्ट पर उतरि रहल छल। हम अपन ब्रीपफकेश बन्द कयलहुँ। हैंड पर्स मे टिकट, पासपोर्ट, टैªवेलर्स चेक सब केँ चेक कयलहुँ।
एयरपोर्ट पर पिफलिप ठाढ़ छल। लम्बा सुदर्शन आकर्षक व्यक्तित्व उम्रक प्रभाव सॅ खिचड़ी पाकल दाढ़ी खूब पफबैत छै। पिफलिप हमर दहिन गाल चूमैत पूछलक मित्रा, आब स्वास्थ केहन अछि?
‘एकदम नीक।’
‘हॅ देखऽ सॅ एकदम प्रफेश लगितो छी।’
ओकरा ऑखि मे बहुत जिज्ञासा छलै। मुदा संकोच संभ्रान्त संस्कार क ब्रिटिश मैनरिर्ज्मा हरदम हँसैत छथि पिफलिप पर। जूडी अमेरिकन छथि। गाड़ी स्टार्ट करैत पिफलिप पूछलक की प्रोग्राम अछि? आब उतर देबहि पड़त। ‘पिफलिप हम लिखऽ चाहैत छी।’ - ‘कि?’
‘अपन स्मृति। ओ सम्पूर्ण अतीत जकरा ठीक सॅ एखन सोचि नहिपयलहुँ अछि।’
‘मुदा ककरा लेल?’
से नहिसोचलहुँ अछि।
जूड़ी घरे पर छलीह गाड़ी सॅ उतरिते लपटि गेलीह।
पिफलिप कहलकैन्ह-‘प्रिया एत एकान्त मे किछ लिखऽ चाहैत छथि।’
‘वाह।’ कहि जूड़ी हमरा दिस तकलैन्ह। हम हुनकर हाथ नहुए दाबि कहलिऐन्ह हं, जूड़ी हमरा अहॉक सान्निध्यक, अहां दूनू गोटेक आवश्यकता अछि। हमर मनः स्थिति अहीं दूनू गोटे नीक जकां बुझि सकैत छी।
‘ओ. के. डियर! चलू हाथ-मुँह धे Úेश भऽ भोजन करू। पिफलिप चलि गेल। लगे मे ऑपिफस छै। छह बेडरूम बला मकान छै, पाँच टा गाड़ी, एकटा बेटी छै जे लंदन मे पढ़ैत छै। एत रहै’छ बस मियाँ-बीबी। पिफलिप के तरह-तरह के गाड़ीक सौरव छै। आ जूड़ी सॅ गप्प करबाक। हम पफूसि नहिकहैत छी.... बड्ड भेटक दृष्टि छै ओकर आर-पार ध्रि सब देख सकै’छ। हम किचेन क पर्दा निहारि रहल छलहुँ। जूडि कोना बूझि गेल। ‘प्रिया, ए प्रिया कोन दुनियाँ क सैर कऽ रहल छी?’
-कतहु नहि। अपने अड़तालीस वर्षक लेखा-जोखा कऽ रहल छलहुँ।
‘जतेक सोचब ततेक सिलसिला टूटत।’ ‘सत्ते कहैत छी जुड़ी। क्रम भंग भऽ जाइछ। अपन सम्पूर्ण तस्वीर नहिबना पबैत छी। कखनहुँ माथ गायब तऽ कखनहुँ हाथ-पैर, अंग-प्रत्यंग छिड़ियाएल लगै’छ अजीब हैल्यूसिनेशन।’
‘मन मे जखन जे घटना मोन पड़ए तुरत से लिख लेल करू।’
‘मुदा एना लिखने आत्मकथा कोना हेतै।’ प्रिया हम वा अहाँ साधरण मनुष छी। सजि ध्जि कऽ क्रमानुसार विशिष्ट व्यक्तिक जीवन वृतान्त लिखाइत छै।’
वाह जूडी अहा सरिपहुँ जीनिइस छी। हमर सब समस्याक समाधन अहाँ लग रहैछ।’
-‘सब समस्याक नहि। कतेक बेर तऽ अहाँ आ पिफलिप कोनो समस्या मे तेहन ओझराएल रहैत छी जे हमरा ओइठाम सॅ उठऽ पड़ैत अछि। अच्छा चलू आब अहाँ अपन रूम देख लिअ।’
‘वाह रूम बहुत मेहनत सॅ सजौने छी मन गदगद भऽ गेल। एहन नीक दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छै। ओतऽ’ कलकत्ता में एक-एक कऽ सब दोस्त घूटल जा रहल अछि। लगैछ जेना अपन शहर नहिहोमए। ओत क्यो अपन नहिरहल। मात्रा घर आ पफैक्ट्री अछि। साल मे छमास तऽ बाहरे रहैत छी। कहियो कतहु तऽ कहियो कतहु। हँ, दिल्ली या बम्बई जाइत छी तऽ क्यो पुरान परिचित भेंट जाइत अछि.......।’
-‘ए प्रिया नीचाँ आयब?’
‘पिफलिप जूड़ि के मना कयलो पर हमरा शोर पाड़लक, ई ओकर आदति छै। ओ जाबत सबटा बात पफरिछा कऽ बूझि नहिलेत ताबत सांस नहिलेबऽ देत। हमर जीवनक कोनो बात तऽ एकरा दूनू बेकती सॅ नुकायल नहिछै।’
कलम राखि नीचॉ गेलहुँ। एखन धरि मात्रा किछ प्वाइंट्स आ तारीख नोट कयलहुँ अछि। जूड़ी पूछलक ‘किछ लिखलहुँ की नहि।’
-‘नाम मात्रा।’
‘अहाँ नी के छी ने कहैत हमर बॉही पकड़ि पिफलिप सोपफा पर बैसौलक।’
‘किछ नहि। पिफलिप हम अपना विषय मे लिखऽ चाहैत छी आत्मकथा तऽ नहिओकरा आत्म विश्लेषण कहल जा सकै’छ।
‘आ जूडी अहाँ........?’
हम जा रहल छी किचेन मे करीब आध घंटा हमरा लागत खाना बनाबऽ मे।
‘हं, तऽ प्रिया.....?’ की हँ, तऽ?
‘मतलब अहाँ कथा-पिहानी लिखब!’
‘हँ, सेह सोचि रहल छी।’
‘कतेक दूर ध्रि सोचलहुँ अछि?’
‘की कहू।’
‘की कहू नहि, लिखब शुरू करू।’
‘हं, मुदा अजीब सन ब्लॉकेड लगै’छ एहन कोनो खास तऽ नहिअछि जहि सॅ हमरा जीवनीक प्रति ककरो रूचि होई?’
‘ई, तऽ अहाँक जर्नल अछि ने?’
‘हँ।’ पिफलिप सॅ गप्प करैत छलहुँ आ अर्न्तमन मे एकटा कथा जन्म लऽ रहल छल। गप्प करैत करैत पिफलिप एकाएक गुम्म भऽ गेल। पफेर हमरा आगाँ हाथ हिला कऽ पूछल ‘प्रिया अहाँ कतऽ छी?’ हम वापस अयलहुँ।
पिफलिप कहने छलाह-‘प्रिया, कखनौ कऽ अहाँ कें बूझब कठिन भऽ जाइछ।
‘तऽ छोड़ि दिऔ ने प्रियाक बूझब’ इ जूड़ी बजलीह। सत्ते जूडी पिफलिप पर खिसियाल छलीह-‘अहाँ पफेर प्रिया के बिमार पाड़ि देबै, अपना ढंग सॅ रहऽ दिऔ।’
हम उठि कऽ अपना रूम मे आबि गेलहुँ। किछ नहिपफुराइत छल। बिछावन पर पड़ि रहलहुँ ऑखि मुना गेल।
भोर मे ऑखि खुजल। खूब सूतलहुँ तथापि तन्द्रा मे बेचैन छलहुँ। पर्दा हटाकऽ खिड़की खोल लहुँ शीतल ताजा हवा नीक लागल। घड़ी देखलहुँ पांच बजै छै। आकाश ललछौंह छै एखन सूरज नहिउगैत। आकाश मे मेघ लागल छै। सामने लैम्पपोस्ट पर रौबिन चिड़ै बैसल छै। एत गोरैया नहिछै।
जूड़ी क्लास लेबऽ रोज पचास मील गाड़ी चलाकऽ जाइत छै। पिफलिप अपन बी.एम.डब्लू या पोर्शे मे हजार मीलक यात्रा करै’छ। मुदा जखन दूनू-गोटे रहै’छ तखन ने देश पराया लगै’छ ने ई घर। जूड़ीक व्यवहार बड्ड नीक छैक स्वभाव अति मधुर। लगै’छ जूडीक जन्मे सॅ प्रज्ञा जागृत छै बिना किछु कहने सब बात बुझि जाइछ।
लगै’छ जूडी जागि गेलीह नीचाँ कीचेन सॅ बर्तन क आवाज आबि रहल छै। ऊपर तकलक जूडी हमरा पर नजरि पड़िते विहुँसैत पूछलक-‘हाय, प्रिया राति मे निन्न भेल?’
‘हँ, आ नहि।’
से की?
असल मे हम सूतैते छी कम। मोन नहिपड़ैत अछि जेना लोक राति भरि चैन सॅ सूतैत छै तेना हम कहियो सूतल होइ! मानसिक त्रासदी मे क्यो कोना सूतत? तिल-तिल कऽ मरैत लोकक लेल आनन्द कहाँ? ‘आ जूडी अहाँकबूझल अछि तऽ एहन क्रूर भऽ कोना पूछैत छी?’
प्रिया, क्रूर हम नहि। क्रूर अछि अहाँक अर्न्तमन मे बैसल हजारो सालक परम्परा सँ ग्रसित रूग्न सोच जे अहाँ कें कहियौ चैन सँ रहऽ नहिदैत अछि। अपन उपलब्ध् िसॅ खुश नहिहोमऽ दै’छ। अहाँ स्वयं अपना प्रति आक्रमक छी। तैं सलीब पर लटकल अपने तरहथ्थी पर कील ठोकैत रहैत छी! की भेंटैत अछि आत्मपीड़न सॅ।
‘आत्मपीड़न?’ हमर स्वर आहत छल।
गलत नहिकहि रहल छी। सोलह आना सच आत्मपीड़न। अहीं कहू की अहाँ के बुझि पड़ै’छ जे अहाँक जिनगी मे एकदम सन्नाटा अछि एकदम नीरस। हमरा लोकनिक कोनो महत्व नहिहमर प्रेम देखाबटी अछि? नीना आ छोटी मां क अहाँ लेल कोनो महत्व नहि? प्रिया, अहॉ पिफक्स इमजेक शिकार छी। पति, पत्नी, बच्चा...... पारम्परिक परिवार......’।
‘सॉरी जूड़ी हमरा बात सॅ अहाँ केँ तकलीपफ भेल।’ तकलीपफक बाते छै। अहाँ अपनो कनैत छी आ दोसरो के कनबैत रहैत छी। अहाँ सँ तऽ वेशी बुझनुक नीना अछि। नीना के लेल आगि होइ वा पानि सब कें जिनगीक र्ध्म मानैत अछि। ओकरा। जिनगीक मे एकटा लय छै गति छै ओकरा कखनौ एकाकीपन चूभैत नहिछै। जिनगी समस्त तूपफान कें हँसि कऽ स्वागत करै’छ आ निर्भय, निःशंक भऽ जिनगी जीबैत अछि।
‘गुडमार्निंग लेडिज! की हम भीतर आबि सकैत छी?’ पिफलिप रसोई घरक, चौकठी लग हँसैत बाजल। पफेर जिज्ञास कयल-‘की जूडीक सैशन भोरे-भोर शुरू भऽ गैलेन्ह?’
अरे नहि, पिफलिप! ई प्रियाक दिमाग खराब भऽ गेलैए राति-दिन अपने तन-मन पर चाबुक सॅ प्रहार करैत रहै’छ। ओना एखन गप्प करू ने तऽ बुझाएत तेहन-सन जेना एहन संतुलित क्यो भइए ने सकै’छ।
‘की डाक्टर के देखिते रोगी शान्त....।’ हम बजलहुँ। अरे चुप्प रहू बेवकूपफ महिला! हम अहाँक दोस्त छी कोनो साइकियाट्रिस्ट नहि। हम जूड़ी लग जा कऽ ओकर हाथ चूमि लेलिऐ। ‘प्लीज, जूड़ी हँसी दिअ। हम अहॉक भावना बूझैत छी।’
‘सुनू प्रिया......।’
अरे रे जूडी, अहाँक क्लास ग्यारह बजे सॅ शुरू होएत। एखन तऽ भोरका छः बाजि रहल छै....
-जुडि भभाकऽ हँसल-हम एकरा जतबे प्यार करैत छी ऐ इ ततबे..
ततबे की? हम जूडी दिस तकैत पूछलिऐ।
‘किछ नहि। आब हम चललहुँ स्नान करऽ अहाँ पिफलिप संग माथापच्ची करू।’ हम पिफलिप के कान्हा पर हाथ ध्ऽ घूमि कऽ जुड़ी दिस तकलहुँ जूडी खिड़की लग ढाढ़ि छलीह। हम पूछलिऐन्ह। ‘जूड़ी अहाँ स्नान करऽ गेलहुँ नहि?’
अहाँ कें दुखी छोड़ि कऽ हम कतहुँ नहिजायब, चलू ऊपर कनिकाल गप्प-सप्प करब।
पिफलिप नौ बजे जयबा लेल कहने छलाह।
जूडी कहलनि नहिहम सब संगे बहराएब। ग्यारह बजे अहाँ आ पिफलिप लंच पर आबि जायब आ हम अपना क्लास मे रहब। प्रिया, आइ एम सॉरी हम जानऽ चाहैत छी जे अहाँक सम्बन्ध् एहन ऊबाऊ कोना भऽ गेल?
स्मरण करैत अतीतक घाव सॅ पीबऽ बहऽ लगै’छ श्रम सॅ बहार होइते एकटा निःशब्द दहशत घेर लै’छ। निरन्तर दुःखक सुरंग मे डूबि जयबाक भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के भय। कठोर सत्यक सामना करबाक भय। स्वयं के प्रति संशय। अतीतक एहन कोनो हिस्सा नहिअभरैत छल जतऽ चोट, दर्द टीस नहिहोमए। थूरल-थकुचल बचपन जे झट सॅ किशोरी बना देलक पफेर संघर्ष करैत औरत जे व्यवस्था सॅ समझौता करब कहियो सीखऽ नहिचाहलक। ईमानदारी सॅ तेहन ग्रसित मानसिकता अछि जे कोनो सम्बंध् मे बनाबटीपन या कृत्रिमता नहिस्वीकारि पबै’छ।
सूनू, जिनगी के पफेर सॅ शुरू करबाक लेल जीवित रहबाक लेल असीम साहस आ ध्ैर्य चाही। हम पश्चिमी महिला की कम संघर्ष कयलहुँ अछि? जखन हमर घर उजड़ल, बच्चा संग छोड़लक, साठि वर्षक पुरुष पाईक बल पर बीस वर्षक लड़की संग भोग करऽ लागल तखन हमहुँ सभ तिलमिला उठल छलहुँ। पुरूषक भोगवादी प्रवृति चरम पर छलै आ भोग्या छलीह हमर बहिन-बेटी। सामंतवादक नंगा नाच देखने छी। आइ तऽ कम से कम हम एतबा जनैत छी जे इलोना एक व्यक्ति जकाँ सोचैत अछि अपन निर्णय अपने लैत अछि अपना शर्त पर जीबैत अछि।
‘अहॉ ठीके कहैत छी।’
जूड़ी उसाँस लैत बजलीह-‘प्रिया, आब अहाँ तैयार भऽ जाउ। हमरो क्लास लेब जयबाक अछि।’
‘जूडी अहाँ तऽ साइकियाट्रिस्ट छी ने?’
ऊँ हूँ सबटा भूमिका पाछाँ हम एकटा संवेदनशील महिला छीं महिलाकदुःख दर्दक अनुभव करैत छी। प्रिया, मात्रा अहींक शोषण नहिभेल अछि। प्रत्येक महिलाक अपन-अपन दर्दक तहखाना छैक।’
‘जूडी, नरेन्द्रक संग जीवन-यापन करबाक लेल हम प्रत्येक क्षण समझौता करबाक प्रयास कयलहुँ मुदा सबटा असपफल भेल। हम नीक जकाँ बुझि गेलिऐ नरेन्द्रक परिवेशक जे ढ़ॉचा छै ताहि मे कनिको पफेर बदल असम्भव! हँ ओ चाहैत छल हम ओकरे अनुकूल भऽ जाइ ओकरे परिवेश मे दूध् पानि जकॉ हमर व्यक्तित्व घुलि जाए। मुदा हम ओइ ढंग सॅ ने सोचि सकलहुँ न ओइ अनुरूप हमर व्यक्तित्व बदलल। ई ककर दोष? तैं हम मात्रा अपने के दोषी बुझैत छी। नैहर मे मां, भाभी, दीदी सब बजैत छलीह मां जतबे प्रियाक विवाहक लेल चिन्तित छल प्रियाक ततबे नीक घर-वर भेंटलै। की ठाठ छै प्रियाक कतबो टका गनने दोसर बेटी कें एहन हैसियत बला घर-वर भेंटलै। कहै छै ने जे गुड़क मारि धेकड़े भोगैत छै सेह। हम केहन अभाव क अनुभव कऽ रहल छी से के बुझि सकै’छ हम अपना कंे एकदम एसगर पबैत छी क्यों हमर अपन नहिने मां, ने भाई-भाभी, ने दीदी एतऽ अपन पति छथि से हो अपन नहि। कखनौक मन मे होइत जखन हमरा सुख-दुःख मे संग देनहार क्यो नहिअछि तखन केहन रिश्ता-नाता? हमहीं कियेक ककरो लेल सोचू? विपत्तिकाल जॅ घर-परिवार समाज क्यो पूछनिहार नहितऽ ककर लेहाज करू कोन समाजक भय? समाज नाम क भीड़ केँ हम कहियो जानि पयलहुँ ने किछ बुझलहुँ। मनुष के जीवऽ लेल बहुत कम लोकक आवश्यकता होइत छैक से एतेक टा संसार मे हमरा अपन क्यो नहिभेंटै’छ? जे सबसॅ निकट अछि जकरा सॅ अपनापन बोध् होइत से तऽ बुझाइत जे हम आ नरेन्द्र उत्तरी आ दक्षिणी ध््रुव छी। दूनू क बात व्यवहार सोच सब मे आकाश-पतालक भिन्नता। मोन पड़ै’छ कॉलेजक दिन! ओ किताब-पोथी जाहि मे मानवीय मूल्य क विषय मे पढ़ने छलहुँ। सत्ते बहुत घुटन महसूस होइछ। व्यवस्थाक विपरीत चलऽ बला पुरुष के क्रान्तिकारी कहल जाइछ आ महिला के हेय दृष्टि सॅ देखल जाइछ। महिला कें कतहु ठौर नहि। तथापि हमरा नोर बहाबऽ बाली महिला नहिसोहाइत अछि। निष्क्रियता सॅ नीक संघर्ष करब।
‘कोनो महिलाकेँ अपन लड़ाई अपने लड़ऽ पड़ैत छै। जॅ महिला व्यवस्थाक प्रतिकूल पैर बढ़बैत अछि तऽ ओकरा कीमत ओकरा चुकाबऽ पड़ैत छै। हम जनैत छी जे भारतीय हमरा सभ पर हँसैत अछि ओ सभ बुझैत अछि जे पश्चिमी महिला बड्ड स्वच्छंद जीवन बीतबैत अछि कोनो रोक-टोक नहिजकरा संग मोन होमए राति बिताबी एतबे नहिहमरा लो कनि के घर उजाड़ऽ बाली बुझल जाइछ।’
हम स्वयं एहन बात नहिसोचैत छी।’
मात्रा अहॉ या किछ आंगुर पर गनऽ जोग लोक नहिसोचैत होइ मुदा भारतीय दृष्टिकोण इएह छैक। मुदा एकटा बात याद राखू इतिहास, समाजशास्त्रा मानव शास्त्रा वा मनोविज्ञान सभटा पुरूषक लिखल छैक इ मात्रा पूरबे नहिपश्चिमो मे। आज सच त इएह छैक जे कोनो पुरूष परिवर्तन नहिचाहैत छै ‘युग-युग सँ जे सुविध प्राप्त छैन्ह से कियेक छोड़ऽ चाहता।’
‘जूडी से तऽ अहॉ सत्ते कहैत छी। व्यवस्थाक बाहर पैर रखने हमरा बहुत कठोर सजा भेंटल। अपना मन के हम टुकड़ा-टुकड़ा कऽ बॉटि लेलहुँ अछि।’ आब हम आत्मनिर्भर छी। अपना काज मे खूब मोन लगैए व्यस्त रहैत छी। हं, अतीत कें बिसरऽ चाहैत छी से नहिभऽ पबैए।’
‘ओना प्रिया हम एकटा बात कहऽ चाहैत छी जे दुनियॉ मे सब पुरूष ने नरेन्द्रे सन छै ने डा बनर्जी सन। नीको लोक छै दुनियॉ मेँ।’
हं, जूड़ी, हम मानैत छी जे नीको लेक छै दुनियॉ मे। तऽ की महिलाक जिनगी क लक्ष्य सही सहचरक तलाश करब छैक? आइ धरिके अनुभवक आधार पर हम कहि सकैत छी जे पुरूषके सत्ताक लोभ रहैत छै। सत्य कहैत छी जूड़ी-एहन प्रेम हमरा लेल बड्ड कठिन अछि। समर्पणक ई परम्परा....ई तऽ दूनू दिस से होमऽ चाही?’
.....‘हूँ, पुरुष कहै’छ जे ओकर समर्पण देवत्वक प्रति रहै’छ तै ओ स्वयं भगवानबनऽ चाहै’छ। आ ओकर’ अपेक्षा रहैत छै जे महिला पुरूष के अपना सॅ वेशी महत मानि समर्पित भऽ अपन आहुति दै।’
मुदा से कियेक? अपना सॅ वेशी महत महत मानबाक कोनो तर्क छै? एतबे नहिजॅ आहूति देबऽ बला आहूतिक कीमत बूझै तऽ ओकरा कहल जाइछ जे निःस्वार्थ, शर्तहीन स्नेहक कीमत नहिहोइत छै ! हमरा तऽ अपना जीवन मे निःस्वार्थ स्नेह मात्रा दाई मां सॅ भेंटल। अन्यथा सब ठाम प्रतिस्पर्ध प्रतियोगिता, प्रथम पंक्ति मे बनल रहबाक कोशिक देखलहुँ। जूड़ी, पुरुष हरदम जीतऽ कियेक चाहै’छ?
प्रिया, तकर मुख्य कारण छै जे ओ नीक जकाँ जनै’छ जे ओ दिनोदिन हारि रहल अछि। मालिक बनल रहबाक वा सत्ता के पकड़ने रहबाक एकटा भिन्न प्रकारक पीड़ा होइत छै। मुदा ओ किछ कऽ नहिपबै’छ। कोनो विकल्प नहिभेंटैत छै।
‘मतलब स्त्राी-पुरूषक सम्बन्ध्क अर्थ मालिक आ गुलाम! भोक्ता आभोज्या!! कहिया ध्रि, प्रिया कहिया ध्रि इ द्वन्द्व चलैत रहतै?’
‘प्रिया! अहाँ कें अध्लाह नहिलागय तऽ एकटा बात कहऽ चाहैत छी। हम आ पिफलीप दूनू गोटे अइ विषय पर बहस कयलहुँ अछि आ हमरा ग्रुप थेरेपी मे अइ पर प्रायः चर्चा चलैत रहैत छै।’
एखन सभ्यताक संक्रमण काल छैक। तैं अहॉ एतेक कष्ट झेललहुँ। मुदा अइ कष्ट सॅ अहाँक भ्रम टूटल। अहॉ बनल बनायल रूढ़िग्रस्त व्यवस्थाक प्रतिकार कऽ पारस्परिकता क सम्बन्ध् स्थापित कयलहुँ। मुदा नरेन्द्र! ओकर चेतना त मालिकाना अहम तर दबले जा रहल छै। ध्न आ सत्ताक मद ओकरा केहन अहंकारी आ पागल बना देलकैए। ओ बूझैत छै टका क बल पर सब हासिल कऽ लेत। मुदा अहिं सोचि कऽ देखिऔ ओ की हासिल कऽ लेलक? ककरा सहानुभूति छै ओकरा सॅ? के स्नेह करैत छै ओकरा सॅ? ओकरा मुठीò मे बन्द भेल सँजु खुजल हवा मे साँस लेबऽ लेलि आकुलाइत नहिछै? आ कोन जीवन मूल्य देलकै अछि नरेनद्र सँजु कें?
हँ, जूडी! हम अइ बात सॅ सहमत छी-मुदा कखनौ कऽ होइत अछि जे एकरा पाछॉ हमहूँ अपराध्ी छी। संजूक प्रति नरेन्द्र जकॉ तऽ नहिमुदा ओहि परम्पराक हिस्सेदार बुझैत छी अपना कें। तखन होइ ए जे सँजु कें हम अपना संग कियेक ने राखलिऐ?’
तऽ की ओ अहाँक संग रहैत? मानलहुँ दू-चारि वर्ष, रहि जाइत मुदा पफेर ओ नरेन्द्र लग जाइत।
‘नहिजानि ओ रहैत, की नहि। मुदा हमरा कचोट अछि जे हम मां क भूमिका नहिनिभााहलहुँ। ओना तऽ एक तरहें अपन कोनो भूमिका क निर्वाह नहिए कयलहुँ अछि। भऽ सकै’छ सँजुओ हमरे गलत बूझए ओकरो मन मे इ बात उठि सकैत छै जे हम अपना महत्वाकांक्षाक कारण ओकर अवहेलना के लिऐ?’
‘अहाँ जहिया इ व्यवसाय शुरू कयलहुँ तहिया ओ कतेक वर्षक छल?’
‘बारह वर्षक।’
‘तऽ अहीं कहू बारह वर्षक लड़का के मां क जरूरत रहैत छै की पिताक?’
‘पिताक । शायद मां आ पिता दूनूक।
बालवाइक सॅ करीब-करीब चालीस मील दूर जंगलक बीचो-बीच एकटा खूब सुन्दर रेस्टोरेंट छलै। पिफलिपक कोशे अपना गति सँ चलि रहल छलै। हम नहुए नहुए अपन सीट के कनि नीचॉ कऽ चित्त भऽ पड़ि रहलहुँ। ऊपर आकाश दिस तकैत छलहुँ पॉछा छुटैत गाछ बिरीछक कतार देखैत छलहुँ पफेर कखनौ ऑखि मुनि लैत छलहुँ। कखनौ-कखनौ मित्राक संग कतेक सुख भेंटैत छै? पिफलिप आ जूडी केहन मन क मीत अछि। दूनू मे के वेशी अपनत्व दै’छ कहब कठिन। आइ ध्रि ने पिफलिप पूछलनि जे जूडी संग की बतिआइत छलहुँ ने जूडी कहियो पूछलनि जे पिफलिप संग की बात भेल। तनाव ग्रस्त मे हम एतऽ आबि गेलहुँ से नीके भेल।
‘प्रिया, अहॉक व्यापार केहन चलि रहल अछि? शिकागोक प्रदर्शनी केहन रहल? किछ आर्डर भेंटल?’ पिफलिपक स्वर सुनि हम मुनाइत ऑखि खोललहुँ।’
‘नीक जकाँ चलि रहल अछि पिफलिप। प्रत्येक व्यापारक अपन व्यवस्था होइत छै, अहाँ व्यापार शुरू किये कयलहुँ? अहाँक टकाक कोनो कमी नहिछल?’
‘जँ सच कहि तऽ टकाक अभाव छल। अमीरीक आवरण तर गरीब मनक ओछपनि झेलैत झेलैत हम थाकि गेल छलहुँ। कनि-कनिटा वस्तुलेल पाइ मांगऽ पड़ैत छल नरेन्द्र सॅ। एतबे नहिकथि मे कतेक पाइ खर्च भेलै से हिसाबो देबऽ पड़ैत छल। रोज अहिलेल बकझक होइत छल।’
से की?
‘नरेन्द्र सॅ खर्च लेल टका मांगऽ मे एक तऽ हमर स्वाभिमान आहत होइत छल दोसर ओकर बाद व्यंग्यवाण सॅ मानसिक तनाव बढ़ैत छल। टका दैत काल नरेन्द्र कहैत छलाह खूब पाइ उड़ाऊ, खर्च करऽ मे खूब मन लगैए आ जँ हिसाब मांगब तऽ रानी जी कहतीह हमरा सॅ दू-चारि टकाक हिसाब नहिलिखल पार लगै’छ। आखिर एतेक टका जाइ छै कतऽ पांच हजार टका हाथ खर्च लेल दैत छी।’ आ दोसर दिस घर खर्चा सॅ बांचल लाखो टका मम्मीक लगमे जमा रहैत छलनि जकर कोनो हिसाब किताब नहि।’
हम कतेक बेर कहनहु छलिए - ‘नरेन्द्र ओहि पाँच हजार टका मे सँजुक पढ़ाई-लिखाई कपड़ा लत्ता सब होइत छै। ‘तऽ कहैत छल ‘नरेन्द्र हमरा हिसाब चाही।’
‘नरेन्द्र! हिसाब नौकर सॅ मांगल जाइत छै हम अहांक पत्नी छी।’
ताहि लॅ की मम्मी तऽ आलू-परबल किनैत छथि से हिसाब लिखकऽ रखैत छथि। की ओ घर क सदस्या नहिछथि?’
एहन मनुष्य सॅ के मुँह लगाबय हमतऽ कहियो नहिदेखलिऐ जे मम्मी आलू परबल के हिसाब लिखने होइतीह। बाबूजी सॅ मम्मी कहियो टका मंगैत नहिछलथिन जे अपना मन सॅ दैत छलथिन ताहि सॅ खर्च करैत छलीह। हमकहियो हुनका पाई मंगैत नहिसुनलिऐन्ह। नरेन्द्र तऽ कहियो समय पर पाई दैते नहिछथि। संजुक स्कूल सॅ रिमाइंडर अबैत छलै तऽ मम्मी जी अपन टका सॅ कहैत छलीह पफीस दऽ देब। ओ सत्ते व्यवहारिक छथि बेर-कुबेर लेल अपन टका राखने रहैत छथि।
तखन पिफलिप बजलाहः कोनो व्यक्तिक किछतऽ अपन कौशलिया ;नीजि पाईद्ध रहैए चाहि। पॉकेटमनी पर दोसर के कोन अध्किार ओ तऽ खर्चे करबा लेल देल जाइत छै। जकर जेहन औकादि से ततेक टका बाल बच्चा आ पत्नीकें दैत छै। की कहू, पिफलिप! हमरा घरक बात अनोखे छै। जहिया नरेन्द्र कहैत छलथिन आइ घर पर भोजन नहिकरब ताहि दिन मम्मी रसोइ घर मे जा कऽ कहैत छलथिन महराज जी आइ छोटे बाबू खाना नहिखेथिन तैं हमरा तीनू गोटे ;मम्मी हम आ संजुद्ध लेल भरबा परबल बना लेब। अ। गनिकऽ छटा परोर दैत छलथिन। भनसिया आ नौकर दाई लेल आलू आ साग-पात। जँ कहियो कोनो काज लेल हम रुपया लैत छलिऐन्ह तऽ एकटा पुर्जा लिखकऽ थमा दैत छलीह प्रिया, अहाँक नाम पर एतेक टका अछि। कहबाक लेल तऽ हम बड़का घर क पुतौहु छलहुँ मुदा हमरा कोनो हक नहिछल। आ अइ बड़का घरक नौकर जाकर जँ ककरो कोनो आपफत होउ तऽ ककरो लग मुँह नहिखोलैत बस आबि कऽ हमरे कहैत छल बहुरानी! हमरा सौ टका चाही बेटा बीमार अछि इलाज बिना मरि जायत। ककरो घर दहा-भासिया जाय वा आगि लागि जाइ तऽ कहैत छल बहुरानी! अहीं कें कहि सकैछी कहुना उबारि दिअ। छोटे बाबू या मां जी कें कहने कोनो पफायदा नहि। बड़ा बाबू छलाह तऽ बेर-कुबेर बुझैत छलथिन। हम दऽ दैत छलिऐ। आ अइ सौ-दू सौ टका क हिसाब हमरा लग नहिरहैत छल। मां जी ककरो जँ सौ टका देतो छलथिन त प्रत्येक मास बीस-बीस टका काटि लैत छलथिन दरमाहा सॅ। हमरा सॅ एहन हिसाब किताब असंभव छल। दर्जी कपड़ा सीबि कऽ अनैत छलै आ जँ कहै ‘मां जी सिलाई दू सौ साठि टका भेल’ तऽ ओकरा अढ़ाई सौ दऽ कहैत छलथिन बस भऽ गेल आब एको टका नहि।’ हमर मन विचलित भऽ उठैत छल बेचारा दू-तीन हजारक कपड़ा सीब कऽ दऽ गेल आ अहाँ ओकर मेहनतक दस टका पचा लेलिए ताहि सॅ कतेक बचत भऽ जायत। हँ, एकटा हमर अपन व्यक्तिगत खर्च छल किताब कीनब जे नरेन्द्र के एकदम पिफजूल खर्ची बुझाइत छलैन्ह।’
‘प्रिया नरेन्द्र तऽ एम.बी.एम. कयने छथि ने। से हो अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तखन किताबक प्रति एतेक उदासीनता।’
हं, पिफलिप ओ अमेरिका सॅ पढ़ि कऽ आयल छथि। तइओ हुनक कहब छैन्ह ‘प्रिया अहाँ लाइब्रेरी मे जा कऽ कियेक ने पढ़ैत छी। मैगजीनक खर्च तऽ बुझबा मे अबै’छ मुदा ई हजारो टका क किताब? की कहू एकबेर पुस्तक-मेला सॅ किछ किताब किन कऽ अनने छलहुँ किताबक ढ़ेर देखि मन पुलकित छल होइत छल कखन खोलिकऽ पढ़िा। तखने नरेन्द्र अयलाह। किताब देखिते बजलाह-प्रिया अहूँ ध्न्य छी कोन जरूरी छल एतेक किताब किनबाक? हमरा जनैत ई देखाबऽ लेल किनलहुँ अछि आधे किताब पढ़ब नहि। टका पफूकबाक ध्ुन अछि पफूकि लिअ।’
‘हमरा तत्काल किछ नहिपफूरल गुम्मे रहि गेलहुँ। घर क पुरान ठाकुरा पच्चीस वर्ष सॅ काज करैत छल आब रिटायर्ड भऽ घर जा रहल छलै। हमरा लग आबि अपन दुखरा सुनाबऽ लागल-बहुरानी। अहीं घरक लक्ष्मी छी। छोटे बाबू त हजार टका हाथ पर घऽ देलनि बस भऽ गेलै। आइ जॅ बड़ा बाबू जीवित रहितथि तऽ.....।’
‘........ठाकरा जी, मोन छोट जुनि करू। छोटे बाबू अहॉक बहुत चाहैत छथि अहाँ हुनका अपना कारे मे खेलौने छिऐन्ह।’
‘नहि, बहुरानी नहि! आब हुनका किछ याद नहिछैन्ह। सभटा बिसरी गेलाह।’
हम आलमीरा खोली दू हजार टका आ नरेन्द्रक पुरान दू टा सपफारी सूट अपन पुरान साड़ी आ सँजुक पुरान कपड़ा ठाकरा जी के देलिऐन्ह।’
भगवान अहॉ के भरल-पुरल राखथि। बहुरानी अहाँ लक्ष्मी छी लक्ष्मी। ओ हमरा आशीष दैत गेठरी बन्हैत छल तखने नरेन्द्र आबि गेलाह। हमर करेजक धुकधुकी बढ़ि गेल आ ठाकरा जी खुशी सॅ बजैत जाइत छल छोटे बाबू देखियौ बहुरानीक करेज केहन पैद्य छैन्ह देखू हमरा दू हजार टका देलनि अछि ई कपड़ा सब। भगवान सदा सुहागिन राखथिन।’ ठाकरा जी के जाइते बम गोला पफाटल प्रिया, अहाँक कहिया बु(ि विवेक हेत? अहाँ ककरा सॅ पूछि कऽ दू हजार टका आ हमर सूट देलिए? की सभक मालकिन अहीं छी?’ ‘प्रिया, बुझि-सुझि कऽ कोनो काज करबाक चाही!’ सासु बजलनि। मने-मन बजलहुँ हँ, मम्मी जी अहाँ जकाँ नौकर-चाकर के कलपैत देखबाक सामर्थ रहैत तऽ नहिदितिऐ ककरो टका-पाई वा कपड़ा लत्ता। अहीं जकाँ एक के दू टका हिसाब मे लिखितहुँ तऽ हमरो बक्सा मे कपड़ा, टका भरल रहैत।
आब सासु चुप्प छलीह। हुनको बदला बेटा गरजैत छलैन्ह ‘लुटा दिऔ सभटा, खोलि लिअ सदाव्रत।’ मम्मी आब अहीं कें सँजुक पढ़ाई-लिखाई, कपड़ा लत्ता लेल टका देब। प्रिया के मात्रा हाथ-खर्चा लेल देबैन्ह।
सुनिकऽ स्तब्ध् रहि गेलहुँ। पफेर नहिरहल गेल तऽ बजलहुँ ‘नरेन्द्र। हम की नेना छी? हमरा बूझऽ नहिअबैए? की हमर कोनो उसूल नहिअछि कोनो सि(ान्त नहि, कोनो मानवीय भावना नहि? अहाँ बजैत छी कियेक तऽ अहाँ कमाइत छी, घर क मुखिया छी?’
‘हं, हं, हम कमाइत छी? कमाकऽ पाइ आनु तऽ बुझब।’
आब ओतऽ ठाढ़ रहब कठिन भऽ गेल हम अपना रूम मे आबि कानऽ लगलहुँ। एतेक अपमान घर क नौकर-चाकर सभक सोझा मे! मालकियत के एतेक अहंकार!! काल्हि पार्टी मे शंकर भैयाक सोझा मे गप्प हँकैत छलाह-पापा की छोड़ि कऽ गेलाह आइ दस करोड़ अछि हमरा हाथ मे। जे मन होए खाइ पहिरि। मन भेल कहिऐ जा कऽ नरेन्द्र जहिया अहाँ मरब तहिया संजु के कहि देबै ओ अहॉ लेल टकाक चिता सजाबए।
घुटन बढ़ले जा रहल छल। मानसून सॅ पहिने जेना समस्त वातावरण मे उमस रहैत छै, अबैत-जाइत श्वास आकाश दिस टकटकी लगौने रहैत छै, कखन मेद्य लगतै बुन्न टपकैत जे लोक क तन-मन शीतल हेतै-तहिना श्वास प्रश्वास शीतलता लेल व्याकुल छल।.......... बात-बात मे ऑखि सॅ नोर ढ़रकैत छल व्यथा के मरहम लगएबा लेल मुदा आइ ऑखि मे जल नहिमात्रा उमस सूखा गेल नीर नयनक।..... नव टटका घाव छल मन-प्राण पर जाहि पर खूनक पपड़ी जमि गेल छलै दर्द सॅ स्याह भऽ गेल छल। सम्पूर्ण अस्तित्व मे टीसक अनुभव भऽ रहल छल। मन कुहरि छल टका-टका-टका जन्म सॅ एखन ध्रि वैभव बीच रहलहुँ मुदा हाथ पर कहियो टका नहिजेना छप्पन भोग परसल होमए मुदा मुँह मे एक कौर नहिजाए! ई पारिवारिक ढाँचा ऐतिहासिक छैक। आत्मग्रस्तताक सीमा पार ......ई लोकनि केहन ग्रस्त छथि टका सॅ? सासुके आलमीरा मे लाखोक समान छै मुदा.....। कम से कम मां स्वभाव सॅ भावुकतऽ छलीह। सन्तुलनक अभाव छलैन्ह मुदा मन होइत छलैन्ह तऽ सबटा उठा कऽ दऽ दैत छलथिन। हं, हुनका एतबे दुख छलैन्ह जे ओ आदरणीयॉ देवी नहिबनलीह ने घर मे ने समाज मे। नहिजानि कियेक ओई दिन मां के प्रति सहानुभूति भेल छल हुनक पीड़ाक बुझबाक प्रयत्न कयने छलहुँ। हमर सासु तऽ लोकक नजरि मे देवी छथि-आत्मदाह आ वेदनाक प्रतिमूर्ति। ककरो कोनो सहायता नहिकरैत छथि तथापि प्रशंसा होइत छैन्ह। बजतीह किछ करतीह किछ कथनी आ करनी मे कोनो तालमेल नहि। ई पापा कें हरदम महसूस करौलथिन जे ओ अपराध्ी छथि। बेटो के सह देलथिन बाप क प्रति घृणाभाव कें। पापाक सोझा मे तेहन दयनीय मनोभाव देखबैत छलथिन जे ओ सतत् क्षति पूर्तिक लेल प्रयत्न करैत रहलथिन। छोटी मां के काली मंदिर मे कालीजी क समझ पापा सिन्दुर लगौने छलथिन। तऽ की ओ विवाह नहिभेलै? धूर हमहू हदे छी की सोचऽ बैसैत छी आ कतऽ चलि जाइत छी। मन मे अबैत भाव आ विचार के छॉटनाई संभवो नहिछै।
गाड़ी रूकल। देखलहुँ छोट सन एकटा रेस्टोरेंट सामने अछि। खूब पैद्य-पैघ बर्च आ पाइनक पेड़.......किछ आर गाड़ी लागल छलै। रेस्टोरेंट मे गेलहुँ कोना मे बैसैत पिफलिप सॅ पूछलिऐ-‘अहाँ किछ पूछने छलहुँ?’
‘हं, एक घंटा पहिने अहाँ तऽ कल्पना लोक मे रहैत छी। पफेर हमर माथ छुबैत बजलाह प्रिया रिलैक्स......आइ से रिलैक्स।’ नहिकहू ने की व्यापारक सम्बन्ध् मे पूछने छलहुँ?’
‘कहैत छी ने हम किछ तेहन नहिपूछने छलहुँ। हे, देखिऔ केहन नीक रौद छै। खाना खा कऽ चलब टहलऽ। की लेब? नीक बवारियन वाइन मंगाउ? अहाँ के मीठ स्वाद बला डसर्ट बाइन नीक लगैत अछि।’
‘एखन मोन नहिहोइए।’
बहुत अपनत्व सॅ देखैत बाजल-प्रिया अहॉ बहुत बहादुर महिला छी, एना जुनि करू टूटि जायब। आब तऽ अहॉ आत्मनिर्भर छी। अतीत के बिसरी जाउ। याद कयने कोनो लाभ नहिं’
‘से तऽ सत्ते कोनो पफायदा नहिछै। हम चाहैतो नहिछी बीतल बात मोन पारऽ जूड़ी ठीक कहने छलीह। शायद बीमारीक वजह सॅ वा व्यस्तातक कारण पछिला पन्द्रह वर्ष मे कहियो किछ सोचबाक पलखति नहिभेंटल।’
हम सब ग्रेप-जूस पी रहल छलहुँ जाहि मे छोट-छोट मिंट के पात आ संतराक छिलका क कतरन छलै। स्टुआर्ड आर्डर लिखैत छल-पिफलिप के हमर स्वादक वस्तु बुझल छैन्ह। डेनमार्क मे आलूके ततेक तरह क व्यंजन भेंटैत छै जे कि कहू। मक्खन, आलू, चीज आ चीनी सॅ छौंकल ऊपर सॅ नमक आ मरीच निबू संग मे वाइन .......... हम कोकाकोला लेलहुँ, खाना खा कऽ खूब टहललहुँ। पिफलिप पूछलक-‘हापफमैनक आर्डर कतेक के छैक?’
‘करीब-करीब दू तिहाई।’
‘हैंडबैग, की आर किछ?’
‘सब मिलल-जुलल।’
‘प्रापिफट?’
‘मार्जिन तऽ बहुत कम दैत छै। मुदा ओकर तीनटा बात बहुत नीक बुझाइत अछि। समय पर एल.सी. खोलि दैत अछि। क्वालिटी कनिको गड़बड़ भेला परमीन मेष निकालैत अछि मुदा क्लेम नहिकरैत अछि आ तेसर बात इ जे रेगुलर आर्डर दैत अछि।’
‘बड्ड तेज अछि हापफमैन। एहन खरीददार बड्ड कम भेंटत। हमरा तऽ जूडीक जिद्द के कारण एतेक नीक सप्लायर कें छोड़ऽ पड़ल। जूडीक कहब छै जे हमरा सभकें आर स्प्लायर भेंट जायत प्रियो के गाहक भेंटतै मुदा दोस्ती? ओकरा’ नजरी मे दोस्तीक महत्वपूर्ण स्थान छैक।’
आ अहॉक नजरि मे?’
सच तऽ ई छै जे जखन कलकत्ता या दिल्ली सॅ समय पर माल नहिभेंटैत अछि तऽ अहॉ सॅ समय पर माल नहिभंेटैत अछि तऽ अहाँ सन नीक सप्लायर कें हापफमैन सॅ जोड़बाक पछतावा होइत अछि।
‘पिफलिप एक तरहें ई नीके भेलै जे अहॉ ओइ समय नव-नव काज शुरू कचने छलहुँ तैं एल.सी.नहिखोलि पयलहुँ आ नरेन्द्र अहॉक संग हमरा काज करऽ दैत नहि। आब इ चमड़ाक व्यापार शुरू कऽ हमरा ई तऽ होइत अछि जे हम स्वयं काज शुरू कयलहुँ।’
‘से नीके कहैत छी प्रिया! हमरा क्रेडिट पर माल लेबाक छल आ अहॉ क्रेडिट पर नहिदऽ सकैत छलहुँ। तखन बैंक सॅ रुपया लेबाक लेल हापफमैन सन पैघ व्यापारीक जरूरत छलै।’
हं, मोन पड़ल, नरेन्द्र अहाँकें ध्मकी देने छल। अहाँक बैंकक गारंटी वापस लऽ लेने छल। ओकर छह सात दिनक बादे तऽ हम सब कलकत्ता पहुँचल छलहुँ आ अहाँक माल तैयारो नहिभेल छल ने सप्लायर के देबऽ लेल टका छल।’
‘तऽ अहीं एक लाख टका एडवांस देने छलहुँ आ हम अहाँ के सबटा बात सापफ-सापफ कहि देने छलहुँ।’
‘हँ, तखन हमरा लाखे टका संग मे छल आर रहैत तऽ वेशी दितहुँ। ओहि दिन हम कहने छलहु पफरक व्यवसाय शुरू करऽ लेल। मुदा प्रिया सत्य कहैत छी दैट वास्टर्ड। हम पुरूष होइतो ओकरा बुझि नहिपबैत छी।’
एकदम सही कहलहुँ! पिफलिप हमरो कतेक बेर मोन भेल नरेन्द्रकें गरियाबक! की कहू पिफलिप ओइ बेर लंदन सॅ घुरलाक बाद हम ओइ घर मे एक छत के नीचा रहैतो ककरो संग नहिछलहुँ। अन्त मे हमरा कठोर कदम उठाबऽ पड़ल।’
‘से की?’
‘ओ हमरा ब्लैकमेल करऽ चाहलक तखन हमरा ध्मकी देब पड़ल।’ एक बेर ओ चुप्प भेल। मुदा जखन ओ देखलक जे ओकरा बिना सहयोगक हमर काज सुचारू ढंग सॅ चलि रहल अछि तखन आर खुुंखार भऽ गेल। ओ अहंकारी पुरुष बर्दाश्त नहिकऽ पबैत छल जे पत्नी ओकरा बिना आगॉ बढ़ि रहल छै। ओह! पिफलिप अहाँ तऽ कल्पनो नहिकऽ सकब ओकर नीचताई के विषय मे।’ एतबा बजैत-बजैत प्रभाक स्वर थरथराए लगलैन्ह। ऑखि ऊपर उठलैन्ह गाछक पफुनगी पर होइत आकाश दिस तकैत रहलीह। पैरक नीचॉ सूखल पातक खर-खर स्वर। मन मे एहन हाहाकार जे चाहैत छलीह पिफलिप के करेज मे सटि खूब कानि। बहुत दिन सॅ ऑखि नोर सूखल छैन्ह पफेर तुरत दोसर मन बरजैत कहलकैन्ह की जिनगी मे एकटा पुरुषक सम्बल एहन जरूरी छै? पफेर मोन पड़लैन्ह जूडी कहैत छथि मात्रा महिले पुरुष सॅ सम्बल नहिचाहै’छ पुरुषो स्त्राीक सम्बल लेल आकुल-व्याकुल रहै’छ। हं, याचक बनिकऽ सम्बल कथमपि नहिस्वीकारि!’

हमरा नरेन्द्रक परिवार सॅ भनहिं किछ नहिप्राप्त होमए मुदा एकटा अदद वस्तु भेंटल अकारण आक्रमकता, निर्ममता मे डूबल व्यंग्य वाण जे शूल जकॉ गरल रहै’छ। ई इक्कैसम शताब्दीक समाज छैक की अठारहवीं शताब्दी से बुझब अइठाम कठिन। हम जखन कखनौ कोनो पार्टी मे जाइत छलहुँ तऽ सोझे-सोझे मुँह पर चाबुक मारैत शब्द उछलैत छल-‘आइ काल्हि अहॉकें एसगरे देखैत छी नरेन्द्र जी अहॉक संग नहिरहैत छथि?’
‘नहिरहैत छथि।’
‘कियेक?’
आब अइ कियेक के उत्तर की देल जाए? हम असमंजस मे रहैत छी लोक कनखी मारि एक दोसरा के किछ संकेत कऽ जहरीला हँसी हँसऽ लगै’छ। हम साहस कऽ बजैत छी इ हम्मर व्यक्तिगत सवाल अछि..बात पूरा होमऽ से पहिने व्यंग्यवाण पीठ पर भोंका जाइछ-अरे हमर सभक घरबला की व्यापार नहिकरैत छथि? प्रिया जी अहॉ किछ वेशीए व्यस्त रहऽ लगलहुँ अछि मिसेज वर्मा अहीं कहू ने हम पफूसि बजैत छी?
‘हे हम की बाजू मियां-बीबी क झगड़ा जे बाजए से लबड़ा।’
एना पल्ला झाड़ने समाज मे काज नहिचलैत छै की मिसेज आहूजा? हं, हमरा विचार सँ तऽ महिला के समझौत कऽ लेबऽ चाही.....ई अनगिन व्यंग्यवाण आ आगाँ-पाछाँ बामा, दहिना गरल ऑखि सॅ लहुलुहान भेल मन-प्राण समस्त शरीर मे झुनझुनी-की बाजू कतेक प्रश्नक उत्तर दिऐ? संग कियेक ने रहैत छी?....कोन बातक झगड़ा.....? आब की एसगरे रहब.....? आअइ सभक मूक गवाह हमर सासु! हुनका लेल छन्न-सन क्यो हमरा किछ कहए हम कतबो आहत होउ ओ मूक मौन रहतीह, निरूत्तर पत्थरक मूर्ति जकाँ। हुनक एहन सर्द उपेक्षा क लेल कोनो आखर नहिभेंटैत अछि। जखन ओ पुतौहु लेल एहन संवेदनहीन छथि तखन छोटी मां लेल सहानुभूति क प्रश्ने व्यर्थ ओ तऽहिनकर सौतिन छथिन! उनटे हुनका होइत छैन्ह जे हम परम्पराक अनुसार कियेक ने व्यवहार करैत छी? जेना घरक पुतौहु रहैत छै तेना कियेक ने रहैत छी? से हो मुँह खोलि कऽ नहिबजतीह आ हुनक ई चुप्पी सौ-सौ बिच्छुक डंक मारै’छ हमरा मन पर। आ हम मुखौटा। लगा नहिसकैत छी जे हुनका हं मे हं मिलाउ। एहन ओ कऽ सकै’छ जकरा पीठ मे रीढ़ नहिहोई मरुदंडहीन मनुष मुँहदेख बजै’छ ओ जकरा कोनो क्षुद्र स्वार्थक पूर्ति करबाक होइ वा बहुत एहन जाहिल महिलाक सम्पर्क सॅ वेशी एक्सपोजर के कारण, खैर जे होइ हमरा क्रोध् होइछ पुरुष पर। खास कऽ ओहन पुरुष पर जे शक्तिशाली आ सामर्थ्यवान बुझै’छ अपना कें। शुरू मे हम सभटा बर्दाश्त करैत छलहुँ होइत छल एना कयने ओ सुध्री जयताह। तैं अपमान, वंचना सब चुपचाप बिना कोनो प्रतिरोध् कयने सहैत छलहुँ। आब तऽ एहन बात सब लिखबाक मोनो ने होइत अछि। ने हाथक कलम ओहन लिखबाक लेल तैयार होइछ। जीवन के जीवंत बनाबऽ लेल हम सबसे पहिने नरेन्द्र संग जोड़ल गेठबन्हनक गेंठ खोलनाई शुरू कयलहुँ। जतऽ जतऽ ओ हमरा संग जाइत छलाह ओतऽ हम अपना कें लूल्ह-नांगर महसूस करैत छलहुँ। पार्क स्ट्रीटक मोड़ पर एक दिन देखने छलिऐ लूल्ह-नांगर कें भीख मंगैत लागल जेना हमहूँ ओहने अपंग छी आ समाज सॅ स्वीकृतिक भीख मांगि रहल छी। हम कतेक आ कतऽ धरि। जे नितांत एकांत क्षण मे जखन नरेन्द्र लग मे रहैत छलाह अन्तरंग गप्प-सप्प वा कोनो क्रिया कलाप मे हुनक वर्यस्व-भाव आ व्यवस्थाक विषाक्त लहरि तनाव बढ़ा दैत छल। एकर परिणाम भेल जे हम नरेन्द्र सॅ दूर रहबाक चेष्टा करऽ लागलहुँ तथापि भयभीत क्षुब्ध छलहुँ। हरदम मन मे होइत छल जे नरेन्द्र नराज ने भऽ जाए। हमर सपफलता सॅ जरैत रहैत छल तैं अपन सपफलता पर खुशी सॅ वेशी ओकर प्रतिक्रिया डर होइत छल। सब दिन एके रंगक रूटिन छल। भोरे आठ बजे घर सॅ बहराइत छलहुँ दिनभरि काज मे व्यस्त रहैत छलहुँ घर आबितऽ घर गृहस्थीक काज मे ओझरा जाइ पफेर पढ़ब-लिखब आध-आधा राति धरि जागले रहि। ऑखि मे नन्नि नहिढ़ेरो संशय कोनो राति चैन सॅ दूइओ तीन घंटा सूतल नहिहोएब।
‘की अहॉ के समाज सॅ डर होइत छल?’
नहि, पिफलिप समाज सँ नहिडर होइत छल पिफलिपक सर्कल सॅ। नहिजानि कियेक ओकर सभक सामना नहिकऽ पबैत छी। ओकरा सभक सोझा मे हम अपने कें अपराध्ी बुझऽ लगैत छलहुँ।
‘पफालतुडर! अरे, अहाँ व्यापार करैत छलहुँ कोनो अपराध् नहितखन डर कथिन?’
‘ई बात सही छै मुदा ई बुझऽ मे हमर आध जिनगी बीत गेल। नहिजानि ई केहन राजसिंहासन छलै जकर पाया पकड़ने-पकड़ने तरहत्थ लहूलुहान कऽ लेलहुँ।’
‘प्रिया सम्मान ककरो क्यो दैत नहिछै ओ लेाक के स्वयं अर्जित करऽ पड़ैत छै।’
अच्छा, पिफलिप अहीं कहू हम की सभ अर्जित करितहुँ, की एहन कतहु देखलिऐ ए जे अपने घर मे आन जकॉ लोक रहए हम एना छलहुँ जेना ककरो कोनो मतलब नहि। एकदम उपेक्षित ककरो हमर कोना परवाह नहि। हमरा अपन पीठ अपने ठोकऽ नहिअबैत अछि ने हम अपना पीठ पर अपन त्यागक ब्यौरा साटिकऽ घूमि सकैत छलहुँ। तखन पफैसला हमरा पक्ष मे होइत कोना? हँ, ई संघर्ष सॅ एतबा सीख भेंटल जे जिनगी मे जँ एकटा गलत समझौता करै’छ तऽ सौटा गलत समझौता करऽ पड़ैत छै। अहाँ जँ एक व्यक्तिक पैर तर तरहत्थ रखबै तऽ आबऽ बला प्रत्येक व्यक्ति अहाँक तरहत्थ के पैर पोछना बूझत।
‘हं, ई एकदम शोध्ल बात बजलहुँ।’ आब हम चुप्प मने-मन सोचैत छलहुँ। केहन छल हमर अतीत? कखनौ क्षोभ, कखनौ असहय व्यथा झेलैत रहलहुँ तऽ जिनगी विध्ेयक बनैत कोना। सही आ गलत की होइत छै इ मात्रा नैतिक विवादक विषय नहितैं हम हरदम जिनगीक गुणवत्ता पर विचारैत रहलहुँ। ई केहन जीवन हम जीवि रहल छी? भविष्यक भयावह छवि के कोना सुधरू जे व्यवस्थाक ठेकेदारक नजरि बदलए। एकरा हमर जिद बुझिवा बेवकूपफी। असंभव करे कल्पना करब आ व्यवस्थाक चुनौती देब नीक बुझाइत छल। चटाðन सॅ टकराइत विघ्न-बाध सॅ जुझैत निरन्तर प्रयासरत छलहुँ। मुदा हमर समस्त प्रयास विपफल भऽ रहल छल। असल मे संघर्ष करबा लेल जे हथियार छल से एकदम भोध् छल मुदा से बुझबा मे बड्ड समय गवां चुक्लहुँ। आब हमर मन हमरे सॅ पूछैत छल-कहू प्रिया, ककरो अहाँक जरूरत छै? तऽ विवेक उत्तर दैत छल-‘ककरो नहि।’ आ हमर अहम? ठोस एकटन लोहाक सख्त वजनदार ईगो कहैत छल नहिहम हार नहिमानब पैद्य से पैघ कीमत चुकाएब आर आहुति देब। देखै छी कोना क्यो उपेक्षा करै’छ? हमर जरूरत छै परिवार के समाज के हम नींव के पत्थर बनब। ई केहन अर्न्तद्वन्द्व मे हम पिसारहल छी मन क दू हिस्सा एकटा पूर्ण स्वतंत्रा सजग सतर्क दोसर डेग-डेग पर भय भीत। चारूभर बुझाइत छल जे सभक ऑखि मे प्रश्न प्रति प्रश्न छै व्यंग्य छै। सभके ई डरजे एहन महिलाक असर कहीं हमरो बेटी, पुतौहु पर पड़ि ने जाए। लोक हमरा सॅ एकटा दूरी बनाबऽ लागल। एहन खुल्लम खुल्ला अपमान! बिना कोनो अपराध् कयनहुँ लोकक लांछना!! नरेन्द्र क पत्नीक चालिचलन नीक नहिछै। आब हमरा ध्ैर्य संग छोड़ऽ लागल एहन बहिष्कृत जिनगी? हमर अपन परिवारक सदस्य, कुटुम्ब, अड़ोसी-पड़ोसी सभक चेहरा पर एकटा अजीब भाव भंगिया! अई सभक बहुत प्रभाव पड़ैत छलै सँजु पर ‘बेचारा ककर तरपफदारी करत मां क की पापाक। आ हमरा होइत छल जे लोकक हमरा प्रति एहन धरण कोना बनलै? हम तऽ घर के जोड़ने रखबाक प्रयास मे रहलहुँ तोड़लिऐ कोना? आ नरेन्द्र के हमर सपफलता पर प्रसन्नता होमऽ चाही शिकायत छै तकर सापफ मतलब छै जे ओ हीन ग्रंथि सॅ ग्रसित छथि। हम न्यूरोटिक भेल जा रहल छलहुँ। हम जनैत छी जे पागल के इलाज भऽ सकै’छ मुदा जे स्वयं अपन न्यूरोटिस बुझैछ, जे बेर-बेर हिस्टिरिक दौरा पड़ला पर हिंसक आक्रोशक कारण अपने देह के थकुचए बकए हे भगवती हमरा लऽ चलू तकर कोन इलाज? एक दिन हमर काज-व्यवसाय मे हमर क्षमता बु(िमताक प्रशंसा होइछ दोसर दिन परम्पराक ठेकेदार के बहुत-बहुत शिकायत छैन्ह।
तखन विचारलहुँ जे जॅ हम सपफल व्यवसायी छी टका कमाइत छी तऽ अपन व्यक्तिगत समस्याक समाधन कियेक नहिकऽ सकै छी। एतेक पढ़ला लिखलाक बादो एना कियेक मनोविज्ञान बुझितो आक्रमक औदास्य आ डिप्रेशनक घुन जकाँ तरे-तर खा रहल अछि? महीना मे दू-तीन बेर दौरा पड़ैत अछि। ट्रिगर पाइन्ट तऽ नरेन्द्र अछि आ ओकर द्वेषभाव क्यो आमंत्रित कयने छलै पूरा परिवार के मुदा आब नरेन्द्र हमरा कतौ नहिलऽ जाइत छथि। क्यो पूछितो छैन्ह तऽ कहि दैत छथिन-ओ बड्ड व्यस्त छथि। जेकरा जे मोन होइत छै अनुमान लगबैत अछि। हम सोचैत छी दोसर औरत के घर आनऽ बला ई पुरुष हमरा पर हाथ उठबैत अछि, लोक क सोझा मे अपमानित करैत अछि तइओ ओ हमर पति अछि? इ हमरे गलती अछि जे हमर संवेदना गहींर अछि वा हमर मूल्यबोध् भिन्न अछि। दिन-प्रतिदिन त्रासदी मन क भीतर अपन पैशाचिक पंजा गड़ौने बिना नहिरहै’छ क्षत-विक्षत हृदय कहै’छ बस काज मे व्यस्त रहू सभटा बिसरल रहत। ई काजे व्सवसाय तऽ ग्रह अछि एकरे कारण एतेक अपमान होइछ...मुदा ई छोड़ि देब से हो असंभव! छोड़बाक प्रश्ने नहिउठै’छ?
‘प्रिया! बुझाइत पफेर अहॉ कतहु भसिया गेलहुँ।’
‘सॉरी पिफलिप! बात ई छै जे......।’
‘आखिर अहॉ एतेक की सोचौत रहैत छी?’ पिफलिप कखनौ कऽ होइत अछि जे एहि व्यवसाय लऽ कऽ हमर दूनू गोटे मे दूरी बढ़ल?’
‘प्रिया! असल बात ई छै जे नरेन्द्र सन पुरुष महिलाक महत्वाकांक्षा कें सहन नहिकऽ पबै’छ। भनहिं ओ आन सपफल महिला दिस आकर्षित होउ मुदा अपना पत्नी कें दबाऽ कऽ रखबामे ओकर अहं संतुष्ट होइत छै हे, देखू अहॉ मे कतबो प्रतिभा होमए रहब हमरे अध्किार मे।’ अच्छा अहॉक कहियो जूडीक प्रति एहन भाव रहल अछि?’
प्रिया हम सत्य कहैत पता नहिजूडी अहाँ के कहियो कहलक की नहि। एलोना घर सॅ गेल तहिया सॅ हम दूनू गोटे पति-पत्नी सॅ वेशी दोस्त जकॉ रहैत छी। हमरा दूनू गोटे के एक दोसरा क प्रति परस्पर स्नेह सद्भाव अछि। हमरा ओ सम्मान दैत छथि आ हम हुनका सम्मान दैत छिऐन्ह स्वतः कोनो दबाव नहि। हुनकर काजक महत्व दैत छिऐन्ह ओ हमरा काजक महत्व दैत छथि। मुदा नरेन्द्र मे परस्पर प्रेम क भाव नहिछै ओ अपना के अहॉक मालिक बुझैत छथि। वास्तव मे अहॉक देश मे पति क वर्चस्व रहलैए तैं जॅ पत्नी चेतन शील रहैत छै तऽ वैवाहिक व्सवस्था दम तोड़ऽ लगैत छै।’

हम एकदम चुप्प भऽ गेलहुँ। पिफलिप इमानदारी पूर्वक उत्तर देने छलाह हम हुनक बात सॅ सहमत छी। भोजन परसल गेल मेज पर। दूनू गोटे चुपचाप खाइत रहलहुँ। मुदा हमर मन चुप्प नहिछल दिमाग मे चलैत टेप-रेकार्डर के बन्द करब अपना वश के बात नहि।
हम नरेन्द्र के अध्ीन भऽ जे काज करैत छलहुँ से हुनका नीक लगैत छलैन्ह। मुदा जहिया सॅ हम अपन स्वतंत्रा निर्णय लेब लगलहुँ तहिया सॅ हम पफुटलो ऑखि नहिसोहाइत छलिऐन्ह। बात-बीत मे टीका-टिप्पणी। जहिया हमरा घर सॅ बाहर जएबाक रहैत छल अरबैध् कऽ तहिये घर मे पार्टी क आयोजन होइत छल। हमरा सम्पर्क मे जे अबैत छल तकरा ओ देखऽ नहिचाहैत छलाह। आइ घरि कहियो हमरा व्यवसाय के विषय मे कोनो उत्सुकता देखौलनि ने किछ पूछलनि। जहिया पहिल बेर हापफमैन सँ हमरा आर्डर भेंटल छल हम बहुत प्रसन्न छलहुँ। हुलसैत कहने छलिऐ ‘नरेन्द्र आब तऽ अहाँ ई स्वीकारब जे हम स्वयं अपना स्तर पर नीक व्यवसाय कऽ सकैत छी?’
‘तऽ की अहाँ स्वयं कयलहुँ अछि? हापफमैन सॅ परिचय तऽ ओ अहॉक मित्रा की नाम छै.....पिफलिप हां पिफलिप करौने छल।’ ‘अहॉ की बुझैत छिऐ जे मात्रा परिचय सॅ काज भऽ जाइत छै?’ हं, होइते छै।’
एहन विबाह बोल सुनि हम गुम्म भऽ गेलहुँ। अइ व्यक्ति संग गप्प करब असंभव। हमरा दूनू गोटेक बीच एकटा विचित्रा जंग चलि रहल छल। हम ई नहिकहैत छी जे हमरा मे कोनो कमी नहिअछि हम तऽ शुरूहे सॅ मुँहदुब्बर अन्तर्मुखी लड़की छलहुँ। कहियो बहादुरीक मुखौटा लगएबहु ने कयलहुँ। सभा-सोसायटी, पार्टी/भीड़भाड़ मे एकदम असगर भऽ जाइत छी आ तखन हमर ऑखि ताकऽ लगैत छल नरेन्द्र केँ। जेना भीड़ मे नेना मां के तकै’छ। आ अई समस्त प्रक्रियाक प्रमुख कारण हमरा दृष्टिकोण सॅ अत्यअध्कि संवेदनशीलता वा आत्मविश्वासक कमी। हम नरेन्द्र कें कतेक बेर कहने छलिऐन्ह ई पैद्य लोकक सोशल सर्कल, ब्याह क भोजभात, कॉकटेल पार्टी मे हम सहज भऽ नहिरहि पबैत छी बहुत असहाय अनुभव होइछा एकतऽ घंटो पहिने तैयार होमऽ मे लगै’छ पफेर डर कोनो ने कोनो कमी बताकऽ नरेन्द्र भरि बाट बजताह.....अहाँ के कोनो लूरि नहिअछि....केहन साड़ी पहिरलहुँ आ अहॉक लग मैचिंग जेवर नहिअछि....कार्टियार बला घड़ी क अंचार बनैत......? अपना देहो पर ध्यान नहिरहै’छ कतेक मोट भेल जा रहल छी।
ऑखि डबडबा जाइत छल.....नरेन्द्र अहॉक ई भाषण सुनैत सुनैत हम हीनभाव सॅ ग्रसित छी आब अपनो नजरि मे.... हम स्वीकारैत छी जे हम अहॉक लायक नहिछी। हम देखैत छी जे पार्टी मे अहाँक आगाँ-पाछाँ, बाम दहिन एक सॅ एक रूपसी डोलैत रहै’छ ओइ रूपसी मे ककरो कोनो विषयक अध्ययन-मनन मे रूचि नहि, अपन कोनो व्यक्तित्व नहि। ओई सर्कल मे पाँचो मिनट क्यो कोनो विषय पर गम्भीरता पूर्वक बाजि नहिसकै’छ तथापि सब मगन रहै’छ हमहीं ओतऽ असहज भऽ जाइत छी। तइओ कोशिश करैत छी व्यवहारिक बनबाक, अहाँक अनुकूल बनबाक कोशिश करैत छी अपन व्यथित अतीत के बिसरबाक। मन होइत छल जे अहाँ के अपन मित्रा बनाबी मन क बात कही - सुनी मुदा ने अहॉ कखनौ शान्तिपूर्वक हमरा लग बैसलहुँ ने कहियो पूछलहुँ कियेक उदास छी? की हम अहॉक पाछू दौड़ैत-दौड़ैत अपन अतीत सुनाबितहुँ? दोसर बात ई जे जाबत अहॉ चैन सॅ नहिसूनब ताबत अध्खरू बात पर उखड़ि जायब अंट-संट बाजऽ लागब हमर कुंठित व्यक्तित्व के एकटा आर विशेषण दऽ देब। कियेक त अहॉक तर्क मे दू आ दू मात्रा चारि होइछ। अहॉ कहब प्रिया दू आर दू कहियो पाचँ नहिभऽ सकैछ? असंभव छै- प्रिया। ‘प्लीज बी लॉजिकल ....’ इएह तऽ अहाँ कहैत रहलहुँ अछि। तै ॅ नेकहलहुँ अतीत क व्यथा कथा ने कहब। एतेक वर्षक बाद आब हम अपन अतीत के बूझऽ लगलहुँ अछि। मात्रा बुझिए सकैत छी ओकरा बदलल नहिजा सकैत छ।
वेटर पिफलिप के प्लेट उठा रहल छलै। हम जल्दी-जल्दी खालि कयलहुँ। पिफलिप बात ई छै जे हमरा अर्न्तमन मे जबरदस्त विरोधभास शुरू भऽ गेल अछि। हम नरेन्द्र केँ कहने छलिऐन्ह-हमारा कनि समय दिअ । जिनगीक एक विशेष। स्थिति सॅ जूझि रहल छी। सन्तुलन बनयबाक प्रयास कऽ रहल छी। हमरा घर मे अबिते स्वंय महसूस होइछ जे हम सासुक नजरि मे नीक पुतौहु नहिछी ने अहॉ लेल नीक पत्नी ने सॅजुक नीक मां। मुदा हम की करू समय के अभाव तैं कोनो भूमिका मे सपफल नहिभेलहुँ।
‘अच्छा ई कहूँ जे अपना व्यवसाय तऽ अहॉक बहुत यश प्रतिष्ठा देलक’ से नहिमहसूस करैत छी?
पिफलिप! होइछ अनुभूति। मुदा समस्त सपफलताक बादों हृदय स्थल मे जे घाव अछि। तकर टीस बेचैन कऽ दैत अछि। एकटा एहन समय छल जहिया घर-बाहर सभठां लोक-हमरा सूली पर चढ़यबाक लेल सदिकाल आतुर छल। समाजक ठेकेदार केँ शायद मन होइत छलनि जे एक औरत एना विरोध् - भेलो पर व्यवसाय कऽ रहल अछि विदेश-ध्रि एसगरे जाइछ तऽ एकरा देखा देखी दोसरो घरक बेटी - पुतौहु के हिम्मत बढ़तै, ओ आत्मनिर्भर होेएबाक प्रयास करत।’
‘पिफलिप बजलाह हे, कनि रूकब हमरा पिआस लागल अछि।’
हं, हं कियेक नहि? गाड़ी सॅ उतरि हमहूँ डॉर सोझ कयलहुँ।
पाइन आ बर्च के बड़की-बड़की टा गाछ। पैरक नीचा सूखल पात। कनि ठंढ़ दुपहरक मीठका रौद। पिफलिप नहुॅए सॅ हमरा कन्हा पर अपन - कोट ध्ऽ दैत छथि एक दोस्तक गर्म संवेदनाक अनुभूति ..........निःस्वार्थ स्नेह ....एहन दोस्त भाग्य सॅ भेंटैत छैक।
‘शायद एहन दोस्तक स्नेह-सदभाव नहिभेंटैत तऽ शायद हम किछ नहिसकितहुँ अथबल भऽ बड़का घर मे नोर चुबैत बैसल रहितहुँ। मुदा आब दोस्तक प्रोत्साहन सॅ लगैछ जीनाई सीख लेलहुँ। अइ ध्रती पर हमरा हिस्साक हवा, पानी आ रौद सब प्राप्त अछि। अपन एक गति अछि लय अछि जे हमरा आगॉ बढ़ा रहल अछि।
प्रिया, पहुँचऽ कतऽ चाहैत छी?’ ‘पिफलिप! सदिखन लोक चलैछ कतहुॅ पहुँचबा लेल नहि! ओहुना चलैत रहब बिना उद्देश्य के ताहु मे एकटा आनन्द छै।’
‘ओह प्रिया! अहॉ तऽ दार्शनिक छी हम नहितैँ अहाँक एहन भाषा बुझब हमरा लेल कठिन अछि।’
‘ऊँहूँ दर्शन नहि। असल मे अइ त रहक अहाँ के अनुभव नहिभेल अछि तऽ बुझबै कोना? जखन मन क बात दबबैत-दबबैत ऑखिक नोर सूखा जाइत छै तखन....’
- ‘की तखन की होइत छै?’
बुझाइत छै जे करेज पर राखल पाथरक बोझ सॅ साँस बन्द होमऽ लगैल होए।
आ अतीत हुलकी मारऽ लगैत छै.........।
‘पहिने दर्शन आब कविता! प्रिया अहाँ के बूझल अछि हमरा साहित्य सॅ कहियो नाता नहिरहल.......’
‘हम भभाक हँसैत छी। की सत्ते पिफलिप-अहॉ किछ नहिबुझलहुँ! एतेक काल सॅ हम व्यर्थे बक-बक कयलहुँ।’
प्रिया, अध्लॉह नहिमानब मुदा एकटा सच छै जे अहाँ एखनहुँ अपन अतीत। रूढ़िवादी समाज आ घर परिवार सॅ मुक्त नहिभेलहुँ अछि।’
हं, जूडी कहैत छथि जे एकर कारण छै- ज हम अपराधबोध सॅ ग्रसित छी। की अहॉ ककरो हत्या कयलहुँ अछि की चोरी डकैती?’
-‘किछ नहिमुदा अपना पैर ठाढ़ एक आत्म निर्भर महिला केँ स्वीकारऽ मे समाज के समय-लगतै। खैर, अब चलू घर। चारि बाजी रहल छै जुड़ी आबि गेल होएतीह।’
गाड़ी पर बैसलहुँ। पिफलिप चुप छल। हमरा चुप्प नहिरहि भेल मन क बात बाजिए देलिए-पिफलिप! मुइल सम्बन्ध् केँ उघऽ मे जतबा शक्ति लगैत छै तकर चौथाई शक्ति मे व्यापार चमकऽ लगैत छै। अपना पर क्रो( होइत अछि जे नरेन्द्र के बुझऽ समझऽ मे एतेक समय कियेक नष्ट कयलहुँ।’
‘होइत छै एहन। अहाँक की बुझाइए जे हमरा मन मे कोनो द्वन्द नहि अछि?’
आब हम चुपचाप सौन्दर्य निहारि रहल छी खाली-खाली सड़क सापफ आकाश मन हल्लुक लगै’छ ठीक कहैछ पिफलिप आ जूडी सबके कोनो ने कोनो समस्या रहैत छै।
-पिफलिप कतेक दिन ध्रि आपसी तनाव झेलने अछि।
समय एकरंग सब दिन नहिरहै छै।
पिफलिप बड़ी काल सॅ गुम्म छलाह। एकाएक पूछलनि
-‘अहाँ एतेक भावुक कियेक भऽ जाइत छी’ व्यस्त रहबा लेल ढ़ेरो काज अछि?’
की कहू पिफलिप हम तऽ अतीत बिसरी गेल छलहुँ आ वर्तमान मे आन कहिया अपन बनि गेल से बुझबो नहिके लिए। हम बेटी ककर छी सेह नहिबुझैत छलहुँ मां के बदला दाई मां हमरा पोसलनि अपना सासु के बदला छोटी मां सम्हारलनि। छोटी मां अपन गहना बेच कऽ टका देलनी जाही सॅ हम दमदम बाला पफैकट्री लगाबऽ लेल। काज मे हमरा सब दिन मोन लागल। आ आब तऽ हमर द्वन्द्व खत्म भऽ गेल। ओकर बाद तऽ कोनो परेशानी नहिभेल? कोनो प्रकारक दुःख?’
हं, एकबेर जहिया सँजुक विवाह छलै ओ बाप सँ लड़िकऽ आयल छल हमरा बजाबऽ।’
अहाँ गेल छलिऐ विवाह मे?’
‘नहि’
‘से कियेक?’
‘जाहि घर मे छोटी मां आ नीना नहिजा सकै छ ओतऽ हमरा जयबाक प्रश्ने नहिउठै ‘छ’। ‘तखन तऽ सत्ते अहाँ के बहुत दुःख भेल होएत आ सँजुओ के खराब लागबे कएलै ओ पफेर कहियो घुरिकऽ आयल नहि।’
‘मुदा हमरा अपना ईमानदारी पर संतोष भेल।’
-‘तऽ अहाँ पहिल बेर कहिया पुतौहुक मुँह देखलहुँ?’
-निधि ;हमर पुतौहुद्ध एक दिन चोरा क आयल छलीए बेटा के लऽ कऽ। हम निध् िके ओ कंगन देलिऐन्ह जे - छोटी मां हमरा देने छलीह। सँजु सॅ वेशी इमानदार छथि निध् िसंवेदनशील - बु(िमती । मुदा पिफलिप सच कहैत छी आब हमरा लेल ई समस्त संसार अपने बुझाइछ पहिने जे अपन कहऽ बला रिश्ता-नाता क संकीर्ण घेरा छल जकरा हम शाश्वत बुझौत छलिऐ से सम्मोहन आब टूटि गेल।’
‘तऽ की आर बात क दुःख अछि?’ नहि, आब कनिको दुःख नहि होइछ। हं, शुरू मे दुःख होइत छल जहिया सीमित परिध् िसॅ - बहरएबाक प्रयास करैत छलहुँ। पिफलिप दू-तिहाई जिनगी खत्म भऽ गेल व्यर्थक विवाद मे। देखल स्वप्न टूटि गेल छल चाहैत छलहुँ नया सपना देखि, शरीर चाहैत छल स्नेहक स्पर्श। नरेन्द्रक नहि...... एक पुरूषक जे हमरा बूझए हमर दोस्त बनए।’
‘बुझाइछ जे कॉलेजक समय जे अहाँक अपफेयर छल तकरे याद अबैत होएत।’
‘नहि, पिफलिप ! ककरो याद स्पष्ट वा आवेगमय नहिछल तखन एसगर नीक नहिलगैत छल। जखन हम छोटी मां आ नीना भोजन करऽ बैसैत छलहुँ तऽ होइत छल जे कोनो पुरूष उपस्थित रहैत....... पापा रहितथि वा नीना क विवाह ककरो सॅ भेल रहितै? होइत छल जेना हम तीनू महिला समाज सॅ कटल छी। पफेर तकर बाद?’
‘बाद मे बुझना गेल जे आत्मनिर्भर महिलाक लेल पारम्परिक बन्हन तोड़ब कठिन नहि।’ गाड़ी ध्र के सोझा पहुँच गेल छल। गैरेज खोलि पिफलिप गाड़ी रखलनि। दरवाजा क ताला खोलैत पूछलनि ‘कतऽ बैसब?’
-‘उपर टेरेस पर ।’
‘ठीक छै। अहाँ चलू हम कॉपफी लऽ कऽ अबैत छी।’
शीतल बसात, सांझुक लुक झुक बेरआ अतीतक अतल - तल मे गोंता लगबैत हमर मन।
-‘कॉपफी लिअ।’ आ इतमिनान सँ कहू- की कहऽ चाहैत छलहुँ।’
इएह जे पुरूष कमाइत अछि आ अपन आश्रितक पालन पोषण करैत अछि तऽ ओकर पौरूष मानैत छै लोक समाज। मुदा जॅ महिला कमाइत छै तऽ परम्परावादी समाज ओकरा हेय-दृष्टि सॅ देऽैत छै।’ मुदा इ संसार मात्रा परम्परावादी लोके धरि सीमित नहिछै। आ हम इहो बुझैत छी जे हम औरत भऽ जे समाजक उपकार कऽ सकैत छी से नरेन्द्रर पुरूष भऽ नहिकऽ सकै छ।’ पुरूष भूमि, आकाश, हवा, जल आ अम्नि अछि महिला बीया जे ध्रतिक तरमे रहैछ समय पर अंकुरिकऽ शाखा-प्रशाखा मे पसरैत छै।
पुरुष वा महिला प्रत्येक व्यक्ति एक इकाई होइछ मुदा वास्तव मे जैविक ईकाइ ओ होइछ जे पुरूष प्रधन समाजक वर्यस्व के तोड़ि समतामूलक नव-निर्माण मे योगदान दैछ।
‘से तऽ छैक। प्रिया अहॉक बहुतो एहन पुरूष भेंटत जे लिंगभेद के मेटएबालेल सतत् प्रयत्नशील रहैंछ। तऽन एकटा बात छै जे पुरूष वा महिला एसगर रहने अपूर्ण रहैछातैँ एक-दोसराक जरूरत दूनू के छै परस्पर प्रेम रहने स्व केँ रिजेकशन नहिहोइ छै बल्कि एहि स्वीकृति सॅ पुरूष वा महिला अध्कि संवधर््ित होइछ अपना आगाँक पीढ़ी लेल किछु देबाक साम्थर्य रखै’छ। अपन सृजनात्मक उर्जा सॅ समाजक कुरीति के दूर करै’छ। ‘हँ, से बुझैत छिऐ पिफलिप!’
तखन कियेक बेर-बेर व्यथाक समुंद्र मे डूबैत छी?’
से की हरदम हम व्यथित रहैत छी? आब ओ समय बीत गेल, बीतल हमर अभिशापित अतीत बीतल। आब तऽ हमर मन हरियर पात, पफरल पफुलाएल ड़ारि जकॉ तरोताजा रहैछ आ हृदय करूणाक ओस सॅ भीजल-सरस सजल। सच कहैत छी पिफलिप एहन दूनू तरहक स्वभाव सॅ हमरा होइछ जे एहन-उतार चढ़ाव सॅ हमर व्यक्तित्व असंतुलित तऽ नहिअछि। एक बेर हम ई बात जूडि सॅ पूछने छलिऐ - ‘कहू सापफ-सापफ की हमर व्यक्तिव अहाँ केँ असंतुलित बुझाइत अहि?
हमरा कोनो मानसिक रोग तऽ नहिभऽ गेल?’
जूडी कहने छलीह-डोंट बी सिली प्रिया। अहाँ-एकदम सहज स्वभाविक रूप में छी? औरत-माने पाथर नहिने औरत कोनो बालूक समतल मैदान जे सब ट्टतु मे एके रंग रहतै! मनुष के नीक अध्लाह बात व्यवहारक प्रभाव पड़ैत छै ओ कखनहुँ हँसैत अछि तऽ कखनहुँ कनैत अछि। एहन कोनो औरतेक संग नहिहोइत छै पुरुषो के नीक-अध्लाह बातक प्रभाव पड़ैत छै। जॅ एहन नहिहोइतै’ तऽ ओ शराब नहिपीबैत! ने ओ रोज नव-नव महिलाक संग संभोग कऽ पौरुष क दंभ भरैत। ने बात-बात पर लाठी आ बंदूक लऽ मरऽ मारऽ पर उताहुल होइत। कोनो पुरुष देवता नहिमनुषे होइछ।
अच्छा आब हमरा एकटा प्रश्नक उत्तर ‘दिअ अहॉक जीवन मे सुख-शान्तिक क्षण कतबा छल आ आब सबसॅ वेशी संतुष्टि कथि मे भेंटैत अछि?’
‘बात ई छै जे एखनहुँ अतीत मोन पड़ैत अछि मुदा ओकरा हम बिसरौने रहैत छी तथापि ओकर प्रभाव वर्तमान पर झलकै’छ। हं तखन आब अपन काज जाहि मे सृजन आ अभिव्यक्तिक सुख भेंटैत अछि इएह हमर सबसँ पैघ आलंबन अछि, मुठीò भरि बीया छींटने छलहुँ से पफरऽ पफुलाए लागल अछि। पिफलिप महिला बिना लगाव, नेह-छोह के जीविए नहिसकै’छ। हमरा मां के लगाव छलैन्ह बेटा सॅ दाई मां के छलै हमरा, सॅ ओना हम ओकर के छलिऐ? आ हमर आत्मीयताक परिध् िहुनका सबसँ- विस्तृत अछि तैं हम एकरा अपन उपलब्ध् िबुझैत छी। आर किछु नहि। हम विशिष्टताक बोझ तर अपना के दाबल राखियो ने सकैत छै। एकदम सहज भऽ समय बीताबऽ चाहैत छी। दोसर गप्प ई जे हमरा अगिला पीढ़ी हमरा सँ वेशी बुझनुक, व्यवहारिक सशक्त आ ईमान्दार अछि। नीना के हम जखन देखैत छिऐ तखन अनुभव होइत अछि जे हम जे नहिकऽ सकलहुँ से ई कऽ सकैत छथि। हमरा होइत अछि जे काज हम शुरू कयलहु तकरा नीना आगॉ बढ़ाबथि। हमरा हुनका विवाहक चिन्ता नहिअछि ओ अपना योग सहचर ताकि लेतीह जँ मनक अनुकूल नहिभेंटतैन्ह तऽ अपन उपलब्ध् िके व्यर्थ नहिबुझतीह।’
‘अहॉक एतेक विश्वास अछि नीना पर?’ हँ, अपना सॅ वेशी विश्वास अछि। हम शताब्दीक अस्त होइत परिणाम छी। नीना आ नीध् िसन असंख्यलड़की, औरत हमर सभक कल्पनाकें साकार करऽ बाली भविष्यक ज्योति अछि। एखनध्रि समाजक परिपाटि रहलैए जे प्रत्येक घर मे बेटीक मां अपना के विवश बुझैत रहल अछि हीनभाव सॅ मुक्त नहिभऽ समाज परिवार स्वजन-परिजन सब टोका टाकी करैत-करैत बेगुनाह लड़की के गुनाहक सजा दैत छै। आ हमर मां क तेहन सोच छलै जे हमरा जन्म भेला पर ने अपना कें कहियो मापफ कएलनि ने हमरा। हमर सासु पति के परमेश्वर बुझैत छलीह आ छोटीमां के महापापी। अहीं कहू पिफलिप अपराध्ी पापा छलथिनकी छोटी मां? आ एहन वातावरण मे रहि नरेन्द्र सीखलनि औरत सॅ घृणा करब। हुनका नजरिये औरत के कोनो महत्व नहिओ मात्रा भोग्या छै।’
प्रिया हमरा दृष्टिकोण सॅ मनुष आखिर मनुषे होइछ, समस्त भूमिका सॅ हटि कऽ ओकर प्रेम के उपेक्षा कयने हमरा मनुषक कोटि मे रहबाक हक नहि बनै’छ। प्रेम हमहूँ कयलहुँ अछि बहुतो सॅ प्रेम भेल ककरो एक क्षण तऽ ककरो वेशी काल ककरो सॅ मात्रा स्वप्न मे। अन्त मे इएह निष्कर्ष भेल जे स्थायी प्रेम क समतल जमीन पर ठाढ़ रहब कठिने नहि असंभव छैक?’
‘पिफलिप। एहन कियेक ?’
प्रिया हमरा जनैत शाश्वत प्रेम, स्थायी रिश्ता वा सम्बन्ध् ई मिथक के अनावृत कयल जाए तऽ जीवन मे की बॉचल रहतै? विश्लेषण करब तऽ अहॉक स्वभाव अछि बिना चिड़-पफाड़ कयने अहाँ रहब नहिमुदा हमर आग्रह अछि ने अइ बात पर ध्यान दिऔ।’
‘एहन सत्य सॅ जीवन नीरस नहिभऽ जेतै।’
‘अहीं कहू अहाँ कें महसूस होइत अछि जे अहॉक भ्रम नहिटूटैत से नीक? पुरुष मात्रा सॅ अहॉक विश्वास उठल की नहि?’
हं, से तऽ सही कहलहुँ। मुदा पिफलिप स्त्राी पुरुषक सम्बन्ध्क जे परम्परा छै ताहि परम्परा सॅ विश्वास उठबाक मतलब ई नहिजे हमरा जिनगी सॅ विश्वास उठि गेल। जेना जेना हम अपना काज मे स्थापित होइत गेलहुँ तेना प्रेमक जरूरत कोना पुरुषक आवश्यकता क चाह खत्म होइत गेल। पहिने अपनत्व नहिभेंटला पर हम अपने के चीड़ पफाड़ कऽ तकैत छलहुँ जे हमर गलती की अछि। आब से नहिहोइए मन मे। आब सोचैत छी जे क्यो हमरा मोजर देबए वा नहिलोकक मर्जी। क्यो अइ सच के नकारि नहिसकै’छ जे ई सीमित दुनियॉ मे हमर सच अन्तिम सच नहिअछि। हमर स्वक परिध् िवृहद् सॅ वृहत्तर दिस अग्रसर भऽ रहल अछि। हम अइ दुनियाँ मे असुरक्षित नहिछी। हमर अपन व्यवसाय अछि। अइ व्यवसाय के माध्यम सॅ हमरा नित नव-नव लोक सॅ भेंट होइछ। हं, एक दिन मने-मन निश्चय कएलहुँ जे आब आर नहि। पाथर पर माथ पटकने कोनो लाभ नहि। हमरा चारूभर मनुष नहिचटाðन अछि जे या तऽ जड़वत अछि वा पहाड़ जकॉ गुरगुराइत नीचॉ लुढ़कै’छ ओकर अपने ततेक शोरगुल छै जे हमर सिसकी सुनल नहिजा सकै’छ। हं, ताहि दिन सॅ हम सबकिछ बिसरी जएबाक प्रयास कयलहुँ। अतीत के खाध्खिुनि ध्ऽ देलिए तरमे। अनावश्यक चुनौती केँ ‘महत्व नहिदैत छी। आब जीयब जीवंत भऽ जी कऽ देखेबै दुनियाँ कें। अपन अस्तित्वक एहसास बड्ड सुखद लगैछ। भविष्यक आधर भूमि हमर इएह वर्तमान बनत।’
पिफलिप पूछलनि ‘आर कापफी?’
‘नहिजॅ आब पीयब कॉपफी तऽ निन्न नहिहेत।’
अन्हार पसरल जाइत छलै वातावरण एकदम शान्त। हृदयक ध्ड़कन जाबत संग दै’छ ई दुनियाँ तखने ध्रि। ई अन्हरिया राति, ध्ंुध् मे मिझराएल पीयर इजोत बल्बके, नहँ-नहुँ अबैत आहट आ बगल मे बैसल पिफलिप। की पिफलिप सत्ते हमर मित्रा अछि? मन कहै’छ। हं, हं।’ बालवाइक छोट-छीन छै मुदा भव्य शहर अछि एकदम अलग व्यवस्था छै एतऽ।
जूडी ऑपिफस सॅ एलैन्ह। दूनू हाथ मे भोजनक वस्तु क थैला छलैन्ह।
‘अबिते आश्चर्य सॅ बजलीह-एँ, अहॉ दूनू गोटे एना गुमसुम कियेक बैसल छी’? झगड़ा भऽ गेल की?’
‘नहि, झगड़ा त नहिभेल अछि हम प्रियाक जिनगीक ध्ुनकें पकड़ऽ के प्रयास कऽ रहल छलहुँ।’
‘पिफलिप अहॉ अपन सिम्पफनिऐक ध्ुन सुनैत रहू।’ ‘ओ. के., हम आब चललहुँ।’
आब पिफलिप घंटो गाना सुनैत रहताह। हमहँु सभ अपना-अपना रूम मे गेलहुँ। हम तीन घंटा सॅ बतिइआइत छलहुँ मुदा बात खत्म भेल? कहियो खत्म हेएत ई बात? नरन्द्र केहन क्षुद्र लड़ाई लड़ने छल। पुरुष की एके रंग होइत छै? पलंग पर सूतल-सूतल इएह सब सोचैत छलहुँ। हमरा राति मे जल्दी निन्न होइते ने अछि।’
अन्त-अन्त धरि नरेन्द्र हमरा संग न्याय नहिकयलनि। हुनके कारण समाज हमरा जलील कयलक। करौ ओकर समाज छै के कतेक टा? मात्रा दू सौ अढ़ाई सौ मातवर घरानाक समाज? ओइ घराना सॅ कै गुणा वेशी छैक मानव समाज। आ जहिया सॅ हमर डेग बढ़ल अइ वृहत्तर समाज दिस तहिया सॅ हम रूकलहुँ एको क्षण? हम जतेक अपना व्यवसाय मे सपफल होइत रहलहुँ ततेक कचोटैतछल नरेन्द्रक क्षुद्र लोभ-लाभ द्वेष भाव। व्यापारक दुनियाँ मे काज क हमर आत्म-विश्वास बढ़ैत छल। हम स्वतंत्रा भऽ व्यापार मे दस टा संभावना मे एकटा चुनैत छलहुँ। स्वतंत्रा व्यक्तिक हैसियत सॅ अपन चुनाव पर डटल रहऽ मे कोनो कठिनाई महसूस नहिहोइत छल। आ नरेन्द्रक प्रेम ओ तऽ हमरा जीवनक अंकुरैत संभावना के देखिए कऽ सहमि जाइत छल। हुनका संग मे दस करोड़ टका छलैन्ह मुदाओ हमर दस लाख टका बर्दास्त नहिकऽ पबैत छलाह। हरदम हुनका मुँह सँ बहराइत छलैन्ह ऊँह, एतेक महत्वाकांक्षा। ई औरत हमरा तबाह कऽ देलक। एखनो संतोष नहिहोइ छै। ओ अपना के मालिक बुझैत छलाह। बढ़ैत गाछ के जड़िए सॅ काटि कऽ ओकरा बौना बनाबऽ मे आनन्द भेंटैत छलैन्ह। हमर विकास कोना सहन होइतैन्ह? एकटा गुलामक नजरि मालिकक कुर्सी पर रहतै? क्रो(े ऑखि कोना लाल भऽ गेल छलैन्ह जखन ओ हमरा पहिल बेर आपिफस मे कुर्सी पर बैसल देखने छलाह। व्यंग्यवाण छोड़ने छलाह ओह, हो, सीगल एक्सपोर्टक मैनेजिंग डाइरेक्टर?
आब अहाँ कें हमरा सॅ टका-पाई लेबाक कोन जरूरी? हमर आनल वस्तु कियेक नीक लागत आब तऽ श्रीमती जी अपने पाइ कमाइत छथि....
‘नरेन्द्र हम पाइ लेल काज नहिकरैत छी।’
तऽ काज करैत छी कथि लेल? भोर सॅ सांझि घरि एक पैर पर घिरनी जकॉ नचैत कियेक रहैत
नरेन्द्र! हम अपन आइडेंटिटी, व्यक्तित्वक विकास.... दिन-राति पोथा पढ़ि-पढ़ि कऽ पगला गेलहुँ अहाँ, अपना के महान, जीनियस बुझैत छी? अहाँ के होइत अछि मैडम क्यूरी, वा फ्रलोरेंस नाइटंेगल बनि जाएब? घर-गृहस्थी क लुरिए नहिचललीह महान बनऽ। एहन कोनो रंग रूप भगवान देनहुँ ने छथि।’
हम अपना के ने जीनियस बुझैत छी ने महान बनऽ चाहैत छी। मुदा की साधरण औरत के अपना ढ़ंग सॅ जीवऽ के अध्किार नहिछै? काज कयने हमर आत्मविश्वास बढ़ैत अछि। नहिजानि कियेक अहॉ सदिकाल हमर आत्मबल कें थूरैत रहैत छी? मोनतऽ भेल कहिऐ-नरेन्द्र अहीं कोन महान पुरुष छी? पापा क कमाएल ध्न मे दू-चारि करोड़ आर जोड़लहुँ। हम ककरो देल पूँजी सँ व्यवसाय शुरू नहिकएलहुँ। गली-गली घूमि कऽ काजक शुरूआत कएलहँु। अहाँ के तऽ एयरकंडीशन मर्सीडिज मे बैसल-बैसल पसेना चूबैत अछि अहॉ कोना बुझबै जे सैम्पलक बक्सा हाथ मे उठौने कतेक बौआइत छी, कारखाना मे मजदूरक संग खटैत छी।’ मुँह टेढ़ कऽ नरेन्द्र पफेर बजलाह-बहुत अहंकार अछि अपना पर?.......
हं, नरेन्द्र अहाँक मापदंड दोहरा अछि जे अहाँक लेल आत्मसम्मान से हमरा लेल अहंकार!
‘की अहाँ नहिचाहैत छी घर, परिवार, पाई समाज मे रूतबा.........? तखन हम किछ चाहैत छी तऽ अहॉ एतेक बौखलाइ छी कियेक? बजैत काल हमर स्वर स्वतः ऊँच भऽ गेल। नरेन्द्रक कोना सहन करताह तैं व्यंग्यवाण छोड़लनि-चिचियाउ नहिई हमर आपिफस अछि। हमहीं बेवकूपफ छी। कोना एहन महिलाक मुँह लगलहुँ जकरा पाई क अलावा किछ सुझिते नहिछै?’
‘पाईक भूख हमरा? परसल थारी लग बैसल भूखल व्यक्ति केहन जीवन जीयत? पाई-पाई के हिसाब। ई करू ई नहिकरू एक, एक क्षण हुकूमत! हँ गहना छल आंजुर मे अॅटए नहिततेक हीरा। मुदा कतेक सपफाई सॅ अहाँ कहने छलहुँ सभटा मां के नाम छैन्ह एहि मे से किछ संयुक्त परिवारक थाती छै। ई गहना अग्रवाल हाउसक पुतौहु पहिर सकै’छ घर सॅ जाय बाली औरत नहि।’
‘हं, हं अहाँक रंग-ढंग देखिए कऽ हम अहाँक एकाउन्ट सँ सब जेवर निकालि लेने छलहुँ।
‘हमर अनुमति बिना!’
‘नहिसे कोना होइतै हे देखिओई कागज अहॉक हस्ताक्षर!’ एतेक पैद्य विश्वास घात। मने मन सोचलहुॅ हमरा कहियो अविश्वास नहिभेल। जखन जाहि कागज पर कहैत छलाह हस्ताक्षर कऽ दैत छलिऐ। खैर आब ई सोचने विचारने की....।
ई नीक जकॉ बुझि गेलहुँ अइ व्यक्ति सॅ अरारी ठानने परिणाम घातक होएत। पहिनहि बहुत किछ गंवा चुकलहुँ। आब जे समय शेष अछि से एकरा सॅ झगड़ा मे व्यर्थ किएक बीताबी। किछ टका-पाई भेंटत से अपना पेट भरऽ योग अपने अर्जित करैते छी। जखन कोनो सम्बन्ध्े नहिरहल तखन विषध्र सॅ दूर रहनहिं कुशल! तखन सँजुक लेल हृदयक हाहाकार विचलित करैत छल। मुदा हम इ हो जनैत छी जे नरेन्द्रक आतंक सॅ संजु के बकार नहिपफुटैत छै ने पगडंडी पर चलैत हमर लहुलूहान पैर क पाछाँ ओकर कोमल पैर बढ़ि सकैछ ओ तऽ राजमार्ग पर चलबाक अभ्यासी अछि। जँ ओ हमरा संग रहबो करैत तऽ कहिया ने चलि जाइत पिता लग। बिरासत मे मात्रा सम्पत्तिए नहिभेंटैत छै स्वभावो भेंटैत छै। भूआ क बच्चा बिना रोऑ क भऽ सकै’छ?
काल्हि हम भारत घुरि रहल छी। की करू की नहिसे नहिपफुराइत अछि। जूड़ी ट्रे मे गरम मपिफन आ ब्लैक कॉपफी ने ने अयलीह।
‘गुड मार्निग प्रिया!’
गुड मार्निग स्वीट हार्ट! ब्रेेक पफास्ट उफपर आन क कोन काज छल हम आबि जैतहुँ नीचॉ।
‘तऽ हम दूनू गोटे रजाई मे घुसियाक कोना कॉपफी पीबतहुँ।’
वेश, त हम ब्रश कयने अबैत छी।
‘ओह! तखन तऽ कॉपफी सेरा जेतै। अच्छा पिफलिप के कहैत छिऐन्ह गरम कापफी कनिकाल मे दऽ जयता।’
‘नहि, हम अपने लऽ आयब ओइ बेचारा के परेशान नहिकरऔि।’
ओ. के.।
जूडी हमरा रजाई मे घुसियाकऽ हाथ मे कापफी नेने किछ सोचैत छलीह। ‘हम तुरत अबैत छी।’
हम नित्यक्रिया बिना कयने किछ नहिखा सकै छी। मुदा इ बात कहबै तऽ जूड़ी हमर मानस के अनुकूलन पर भाषण शुरू कऽ देतीह।
‘कॉपफी लऽ ऽ अयलहुँ तऽ देखलिऐ जूडी हमरा नीचाँ सॅ ऊपर घरि निहारि रहल छलीह।’
‘अहॉ तऽ एकदम यंग लगैत छी।’
‘जूडी, हमरा तऽ बुढ़ापा नीक लगैत अछि।’
अइ पागलपन के कोनो जवाब छै। लेकिन सत्य कहैत छी अहॉ एखनहुँ चालीस सॅ ऊपर के नहिलगैत छी।
जूडी हम चालीस सॅ वेशी उम्र क लगैत छी वा नहिताहि सॅ कोनो पफर्क नहि। मुदा आब हमर केश पकैत अछि ठेहुन मे दर्द होइत रहै’छ एतबे नहिआब सैम्पलक भारी बक्सा उठा कऽ एक एयरपोर्ट सॅ दोसर एयरपोर्ट धरि पहुँचऽ मे बहुत थाकि जाइत छी। इमिग्रेशन आ कस्टमक कागज बिना चश्मा लगौने पढ़ि नहिपबैत छी। आब सबसे वेशी नीनाक ऑखि मे हेलैत स्वप्न, काजक प्रति ललक आ आगाँ बढ़बाक संकल्प बेर बेर कहैछ जे भाभी हम बिना अध्कि लागत के माल उत्पादन मे बीस प्रतिशत बढ़ा सकैत छी से सुनि होइछ जे आब हम व्यर्थ दौड़ ध्ूप करैत छी। सरिपहुँ नीना लौह महिला अछि। तैं आब हम विश्राम चाहैत छी। अइ व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर होइबाक इच्छा अछि।
‘व्यापारक दुनियॉ सॅ बाहर भऽ की करऽ चाहैत छी?’
‘किछ नहिमात्रा अपन अनुभव। पचासवर्षक एक महिलाक महिला होएबाक अनुभव।’
‘तखन एकटा किताब लिखू। प्रॉमिस?’
‘प्रॅामिस।’
पतझड़ क मौसम। अक्टूबर मे कलकत्ताक वातावरण सम पर रहैत छैक पाबनि-तिहार शुरू भऽ जाइत छै। हम अपन किताब क भूमिका लिखब शुरू कयलहुँ। सैंतीस वर्षक नीना हापफमैनक बेटा सॅ विवाह कऽ रहल छथि। अपन देश छोड़ि रहल छथि। हमरा पूछलनिः ‘भाभी मां जर्मनी मे नहिरहि सकै’छ?’
‘नीना, छोटी मां पैंसठ वर्षक उम्र मे जर्मनी मे कोना रहतीह?’
भाभी! मां क उदास देखि हमरा अपराबोध् होइत अछि। शायद मां के ई विवाह पसंद नहिछै तऽ हम नहिकरब विवाह।’ हमरा ऑखि मे साकार होइछ छोटी मांक झुर्रि भरल मुँह, कॅपैत हाथ उज्जर साड़ी मे लपटल मझोला कद। पफेर मोन पड़ै’छ बाल गोपाल कें भोग लगबैत छोटी मां क ध्यानमग्न चेहरा।
‘नीना, मन छोट नहिकरू। सभक बेटी सासुर जाइत छै-मां उदास होइतो बेटीक विदाक परम सुख पबैछ।
‘भाभी हम सच कहि रहल छी एंडरू चाहै’छ मां हमरा सभक संग रहए। की ओ मां के बेटा नहिछै’? ‘नीना-अहॉ निश्चिन्त रहू एत हम छी ने।’
‘अहाँ एसगरे व्यवसाय सम्हारि लेबै?’
‘जतबा दिन चलतै चलेबै।’
‘भाभी तैं हमरा होइछ जे हम गलत कऽ रहल छी।’ नीना प्लीज! अहॉ अपना कें अपराध्ी जुनि बूझू। जे भऽ रहल छै से नीके भऽ रहल शुभ-शुभ विवाह भऽ जाय।’ ‘नहिभाभी, जे भऽ रहल छै से मां क दृष्टिए नीक नहिभऽ रहल छै हुनकर इच्छा छनि भारतीय लड़का सॅ विवाह होइतै।’
नीना आब ई चर्चा करब व्यर्थ छै।
भाभी हमरा अपराध् बोध् भऽ रहल अछि........।
हम मने-मन सोचलहुँ नीना क स्थान पर जँ छोटी मांक बेटा रहितैन्ह तऽ ओकरा अपराध् बोध् होइतै?
आ जँ से होइतै तऽ अपन जर्मन पत्नी के लऽ कऽ कलकत्ते मे रहैत वा मां के ओतऽ लऽ जाइत जे नीना नहिकऽ पबैत छथि दोसर पुरुष एहनो कऽ सकै’छ जे एकटा पत्नी जर्मन, जर्मनी मे रहितै दोसर भारतीय मां लग। तइओ ओ अपना के अपराधी नहिबुझैत। मन मे होयबो करितै अपराध् बोध् तऽ नीना जकाँ ईमानदारी पूर्वक हमरा लग स्वीकारैत नहि। हमरा तऽ डर होइछ जे एहि अपराध् बोध् सॅ नीना डिप्रेस ने भऽ जाए।
औरत कतऽ नहिकनै’छ? कखन नहिकनै’छ? सड़क पर झाड़ू लगबैत काल, खेत मे काज करैत, एयरपोर्ट पर बाथरूम सापफ करैत, लोकक घर मेचौका बर्तन सापफ करैत वा समस्त ऐश्वर्य सुख-सुविधक रहैत हमरा सासु जकॉ एसगर सूतल करौट बदलैत। हाड़-मासुक बनल महिला-अपना ढंग अपना शर्त पर जीवन व्यतीत करऽ लेल छटपटाइत रहै’छ। हमर तऽ ऑखिक नोरे सूखा गेल। हृदय आ मन मे नून जकॉ जमल जा रहल अछि नूनक पहाड़ जमले जा रहल अछि। बाहर सॅ लोक के बुझाइत छै जे हम बहुत मजबूत छी, हिम्मतबाली। बुझए लोक। आब तऽ के की बुझै’छ तकर कोनो मायने नहि। ओह बड्ड पिआस लागल अछि। निन्न टूटल केहन अजीब-अजीब सपना देखऽ लगलहुँ अछि। सत्ते कंठ सूखि रहल अछि। थर्मस सॅ पानि ढ़ारि पूरा गिलास पीब गेलहुँ। एखन कतऽ छी हम? ओह, हं कलकत्ता मे छोटी मां क बगल मे अपना फ्रलैट मे।
नीना जर्मनी सॅ आयल छलीह। मासदिन एतऽ रहि कऽ घुरलीह। कोर मे दस मासक खूब सुन्दर नेना छैन्ह। जर्मन आ भारतीय मिक्चर गोर रंग भूरा केश आ भूरा ऑखि। छोटी मां के कतहु ने कतहु मन मे कचोट छैन्ह किछ बजैत नहिछथिन मुदा मुँह सँ हरदम बहराइत छैन्ह जे हमर बेटी तऽ प्रिया छथि।
नीना के दुःख होइत छैन्ह। मां एना कियेक बजै’छ?
हम तऽ जेहन चाहत छलहुँ तेहन घर-वर भेंटल! हम बहुत सुखी छी।
‘नीना अहॉ खुश छी से सुनि बहुत प्रसन्नता भेल भाभी अहॉ कें एसगर रहबा मे मन ऊबै’छ नहि?’
नहिनीना एकान्त तऽ प्रिय अछि। ओना एकबेर ई एसगर सॅ दोसराइत होइबाक भूल कऽ चुकल छी। बड्ड भयंकर परिणाम भोगलहुँ समझौता कऽ के। आइ हम कहऽ लेल एसगर छी मुदा हमरा आस-पास दू चारिटा एहन लोक अछि जकरा पर हम ऑखि मुनि भरोसकऽ सकै छी। आ ई भरोस, आस्था जीवन लेल अनिवार्य छै।

एहन कोन नायिका हेतै जे अभिमानिनी होइ, स्वतंत्रा विचार वाली होइ तइओ संयमित रहै, सुरूचि होइ, मौलिक चिन्तन वाली होइ आ पुरुषक केहनो दुर्व्यवहार के हँसैत सहन करए ओकरा करेज मे सटल रहए? की एहन क्यो भऽ सकै’छ? हँ, कथा, उपन्यासक नायिका एहन भऽ सकै’छ कियेक तऽ पुरूष रचनाकार एहने नायिकाक कल्पना करै’छ।...... परिस्थितिक दास के नहिहोइछ? मुदा अमानवीय करण केर चरम विन्दु पर अपना के साबुत बचाकऽ राखब सभक वश के बात नहि। हमरा लेल तऽ असंभव। हमरा तऽ जे क्यो आहत कएल तकरा हम कखनहुँ बिसरि नहिपबैत छी। हं, ओइ स्मृति दंश के प्रति आब मन मे उपेक्षा क भाव रहै’छ। आ सत्य कहैत छी पुरूषक कोनो भूमिका क आब जीवन मे महत्व नहिबुझना जाइछ। क्यो की देत? एकरा हमर अहंकार नहिबुझू यर्थाथ कहि रहल छी आइ हम हाथ खोलि खर्च करैत छी मुदा क्यो रोक-टोक कयनिहार नहिने ककरो हिसाब देबऽ पड़ै’छ।....
नीना विवाह कएल......हमर अध्ूरा स्वप्न ओकरे मे पूर्ण होमए। संवेदना, मित्राता, नेह ई सब परस्पर होइत छैक मालिक आ गुलाम बुझतै तऽ स्नेह नहिभऽ सकै छै। नरेन्द्र करोड़पति छल मुदा हमरा सॅ एक-एक पाइक हिसाब लैत छल। पेट भरबा लेल दू टा रोटी चाही ताहि लेल ओतेक अपमान! जे भेल से नीके भेल। जँ नरेन्द्र सॅ मन नहिटूटैत त एतेक प्रगति कऽ सकितहुँ ?
मोम के गुड़िया जकॉ पिघलैत रहितहुँ। घुर, इ हो कोनो जिनगी भेलै? हजारों साल सॅ पुरुषके अपन पत्नी के Úेम’ क कल्पना एकहि बिन्दु पर अटकल छै जे पिजराक सुग्गा जकॉ जे रटबए सेह दोहरबै। आ हमरा सभके देखू आध्ुनिकाक भूमिकाक नित नव-नव भूमिका जुड़ल जा रहल अछि आ सपफलतापूर्वक नित नव प्रतिमान गढ़ि रहल छी। प्रत्येक क्षेत्रा मे पुरुष से बीस साबित भऽ रहल छी उन्नीस नहि। तखन एकटा बात एकदम सही छै जे किछु पाबऽ लेल किछ छोड़ऽ पड़ैत छै। हमरे देखू जे संजु क मन मे होइत हेतै जे हम मां क भूमिका नीक जकॉ नहिनिमाहलहुँ। आब नहिनिमाहि पयलहुँ तऽ की करू? हमर मां हमरा जन्म देलनि की ओ अपन भूमिकाक निर्वाह कयलनि? नहिने। आ ने हुनका तकर कचोट भेलैन्ह।.... सँजू के तइओ हम बारह वर्ष धरि मातृत्वक भूमिकाक निर्वाह कयलहुँ तखन नरेन्द्र लग छोड़लिए। सॅजु उगैत गाछ छल संभावना रहित ठूंठ नहि। कानूनो तऽ नरेन्द्रक पक्ष लितै। आ किएक हम ओइ नादान बच्चाक जीवन बर्बाद करितिऐ? हमरा सॅ वेशी सामर्थयवान नरेन्द्र छल। भऽ सकै’छ नरेन्द्र कें क्यो दोसर औरत खुश राखि सकितै’ मुदा हमरा तऽ ओकरा संग रहब कठिन छल। हम अपन स्वप्न कें अपने हाथे चकनाचूर नहिकऽ सकै छी। तखन ऑखिक नोर! नहिजानि ई नोर क परम्परा कहिया खत्म हेतै? प्रशान्त महासागर क पानि की कम नूनछराह छै जे सागर के सागर बनल रहबाक लेल महिलाक नोर क जरूरत रहै छै?
नीना चलि गेलीह। हमरा काज मे ओ सहारा दैत छलीह। तथापि अहू उम्र मे हमरा ऑखि मे सपना शेष अछि टटका पफूलक रस मे डूबल मध्ुसन मीठ, ओस मे भीजल गुलाब क सुगंध् मे साराबोर गमकैत, भोर का आकाश सन स्वच्छ। ई हमर जिनगीक सपना हमर अपन अछि एकदम निजि अपन। मात्रा रोमान्सेक सपना नहिसंयोगै’छ नयन आ ने स्नेहक जुनून सॅ जिनगीक सब कोन भरि जाइत छै। इम्हर दू वर्ष सॅ हम स्वयं गाड़ी चलबैत छी आ मोन होइए जेएसगरे सम्पूर्ण भारतक भ्रमण करि। मन होइछ कोनो आदिम शहरक एसगरे यात्रा करि। आदिम शहरक गुपफा मे अंकित महिलाक मूर्ति सॅ पूछिऐ की अहूँ ओ व्यथा सहलहुँ अछि जे हम भोगलहुँ? हृदयक जड़ता कम भेल अछि। कुंठाक बपर्फ पिघलल आब ई जिनगी बहुत सुन्दर लगै’छ ऐनमेन कविता सन।
हं, आब हम जीवंत जीवन जीबैत छी। बेर-बेर प्रसन्नता क पुलक सॅ रोऑ-रोऑ आनन्दित रहै’छ। एतेक हल्लुक पारदर्शी जीवन व्यतीत करबाक बहुतो तरीका छैक। हम ओ तरीका अपनाएबाक प्रयास कयलहुँ मुदा कतहु समझौता नहिकयलहुँ। समझौता नहिकऽ सकलहुँ बस! ई जरूरी छै जे लोक अपन प्रत्येक असमर्थताक विश्लेषण करए? तर्क दऽ अपन औचित्य स्थापित कऽ अनका गलत साबित करए? ई सभ बिना कहने सुनने पृथ्वी अपन धुरी पर घूमैत रहत। सूर्य क उदय अस्त होएत। चन्द्रमाक बढ़ैत-बढ़ैत पूर्णिमाक इजोरिया राति हेतै आ घटैत-घटैत अमावस्याक अन्हरिया राति। मौसम बदलैते रहतै, नदी बहैत रहतै ककरो हमर विश्लेषणक अपेक्षा ने छै ने रहतै। तखन एकटा बात महत्वपूर्ण्ण छै जे हम आइ धरि ई नहिबुझि। पयलहुँ जे हम के छी? की चाहैत छी? हँ, शिकायत रहल जे ई प्राप्त नहिभेल ओ प्राप्त नहिभेल। अन्तःकरण सॅ सदति इएह आवाज अबैत रहल। क्षण मे प्रसन्न क्षणे मे व्यथित। की इ सब एहिना चलैत रहऽ दिऐ सहज गति सॅ? हम छी एहने एखन कोनो आदर्श लऽ डेग उठा कऽ बढ़ब पफेर कखनौ निराश भऽ पाछु घुरब।
हम समस्त अतीत बिसरी गेलहुँ अछि। पाछु सॅ कोनो शोर पाड़ैत स्वर सुनि कान मुनि लैत छी। जिनगीक संघर्ष मे सक्रिय छी। भऽ सकै’छ एहने मे कहियो चुपचाप मृत्यु आबि हमर के बार खटखटाबए। तखन हम तुरत ओकर आहट पर प्रस्तुत हेबै। आ अपन छोट छीन जिनगीक विषय मे ओकरा संग बतियाब।

- इति समाप्त -
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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