Wednesday, March 30, 2011

'विदेह' ७८ म अंक १५ मार्च २०११ (वर्ष ४ मास ३९ अंक ७८) PART II



सुजित कुमार झा-


जंगलमे होरी

एखन होरीकेँ मिथिलाञ्चलमे धुम अछि । जतय जाउ ओकरे चर्चा रहैत अछि । वैवाहिक कार्यक्रमसभमे तऽ रंग अविर श्रीपञ्चमीए दिन सँ शुरु भऽ गेल अछि । जे केउ सासुर जाइत छथि वा सम्धियनामे रंग अविर सँ स्वागत हेवे करैत छन्हि ।
साँझ होइते होरैया सभकेँ गीत गवैत लोक गाम गाममे देख सकैत अछि । जनकपुरमे होरीकेँ विशेष कार्यक्रम होइत अछि । मिथिला नाट्यकला परिषद प्रत्येक वर्ष अहि अवसरपर महामूर्ख सम्मेलन आयोजना करैत अछि । परिक्रमामे सहभागीसभ कञ्चनवनमे होरी तऽ एक हप्ता पहिने खेल चुकल अछि ।
कञ्चनवनमे होरी
वनमे वा जंगलमे होरी हैत इ सुनलापर वहुतो लोककेँ आश्चर्य लागल हैत । मुदा सत्य इहे अछि । जनकपुर क्षेत्रक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कञ्चनवनमे फागुन २७ गते होरी सम्पन्न भेल अछि । ओ स्थलपर के बाबाजी के महिला पुरुष सभ होरी नहि हुरदंग तक खेललन्हि अछि । परिक्रमा डोला कञ्चनवनमे पहुँचलापर प्रत्येक वर्ष होरी होइत अछि जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि । ओ होरीमे जनकपुरक अधिकांश मठ मन्दिरक महन्थ, समाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक क्षेत्र सँ आवद्ध व्यक्ति सहभागि होइत अछि ओ जानकारी देलन्हि ।

यतेक रंग अविर होइत अछि जे जंगल सेहो रंगा जाइत अछि । रामनगरवाली नामक महिला कहैत छथि हमसभ कञ्चनेवनमे होरी खेलाइत छी पूर्णिमा दिन पुवा पुरी मात्र खाइत छी ।
कहल जाइत छैक त्रेता युगमे भगवान राम जानकी चारुभाइ आ चारु वहिन संगे कञ्चनवनमे होरी खेलायल छली । ओहिकेँ संस्मरणमे कञ्चनवनमे होरी खेलायल जाइत अछि । जंगलमे होरीकेँ आनन्दे किछ आओर अछि’ , नेपाल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि—‘जनकपुर क्षेत्रमे सही होरी तऽ कञ्चने वनमे होइत अछि । कञ्चनवनक होरीकेँ प्रसिद्धीकेँ देखैत नेपाल सरकारक वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद ओ होरीकेँ अगिला वर्ष सँ विशेष होरी बनावयकेँ निर्णय कएने परिषदक अध्यक्ष दिगम्वर राय जानकारी दैत छथि ।
महामूर्ख सम्मेलनक सेहो धुम
पुवा माउस खायवलासभ वा पूर्णिमा दिन रंग अविर खेलायवलासभ वहुतो स्थानपर होरीकेँ आंगुरपर गनैत हेता । मुदा जनकपुरमे सभ सँ वेसी केकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि तऽ ओ अछि होरी नहि महामुर्ख सम्मेलनकेँ । मैथिली भाषा, साहित्य, कला, सांस्कृतिक उत्थानकलेल काज करयवला नेपालक अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद ओ सम्मेलनकेँ जनकपुरमे प्रत्येक बर्ष आयोजना करैत अछि । ओ सम्मेलनमे विभिन्न विशिष्ठ व्यक्तिकेँ व्यंङ्गयात्मक उपाधि वितरण कएल जाइत अछि । महामूर्खक उपाधि केकरा वितरण कएल जाए अहिकेँ मिनाप विशेष तयारी कऽ रहल मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि ।

इम्हर महामूर्ख बनवाकलेल सेहो भारी प्रतिस्पर्धा देखल जा रहल अछि । अहिवेर साहित्यिक क्षेत्रक, राजनीतिक क्षेत्रक वा समाजिक क्षेत्रक हातमे महामूर्खक उपाधि भेटैत अछि तेकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि । २०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि ।
जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसी, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल ।

महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल
कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत .....
स्वागत वागत मूर्ख महान
महामूर्ख सम्मेलन के अछि
अपनेही पर अभिमान
निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट
अही आयब भेल प्रमाण
छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग
सत्यक नहि पहिचान
ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान
बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत
मूर्ख शिरोमणि शान
पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत
कुकुर सभक राग
कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन
मूर्ख बनय विद्वान
हा कुर्सी हे कुर्सी
कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण
स्वागत वागत मूर्ख महान

 
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्‍डल
उपन्‍यास' आगाँ
हमर टोल
गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि‍ गेल छै। अन्‍हारक कोरामे लहुआएल लाल चि‍ल्हका खेला रहल हो, तहि‍ना सन लगैत अछि‍।
धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सि‍नूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि‍ सपनामे डूबि‍-उगि‍ रहल हो। पहि‍ले कहि‍ देल गेल छलै। मरद सभ एककात आ औरति‍या सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझि‍मे ढुकि‍ कऽ बैसल छै।
दोसरो दि‍स तँ थेथरे सभ अछि‍। मौगि‍याह जकाँ दोगमे ढुकि‍ कनफुसकी कऽ रहल छै।
पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखि‍क भाग देखलासँ केना ि‍चन्‍हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै।
सभ की चलतै। उतरबरि‍या कातसँ औरति‍या सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गि‍यान तँ छौ नै।
आबि‍ गेलौ संुघहा धान।
सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छूबि‍ते हाथमे गड़ि‍ जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू।
फेर कि‍यो सुंघहाघान बाजि‍ नै सकैत अछि‍। देख लि‍औ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि‍ देबै, कि‍यो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्‍प राख।
तेरहे बरखक उचि‍तवक्‍ता छै तइसँ की। ओकरासँ गप्‍पमे के जीतत। उचि‍त बात फट्ट द' बजल- गोहारि‍, गोसांय सब बन्न। सुंघाय बाबा कहि‍ देलक। कि‍यो मुँहसँ बाजि‍ नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब ि‍कछ ै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।‍
भगतकेँ नवसि‍खुआ चेला फनका रपटैत बजल- देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालि‍क सुंघाय छि‍यो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि‍ बाहर दि‍स ठोंठि‍या देबो। बुझि‍ले तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ कपारपर तामस नाचि‍ उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि‍ मूनि‍ देवता-पि‍त्तरकेँ सुमरि‍ रहल अछि‍।
गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपि‍याहा। हमरा छेमा क' दि‍अ।
एहेन गप्‍प कहत।‍ उचि‍तवक्‍ता फोंफि‍या कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल।
सुंघाय मड़र धाँय द' डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल- हौ बाप, मारि‍ देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्‍मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि‍ मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छलै। ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी क' सि‍रजल चीज केहेन हेतै।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ हाथसँ लाठी छि‍ना गेल छै। महुराइत बजल- अपना बेटा दि‍स नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि‍ कोदारि‍सँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि‍ देबै सभटा बात।‍
नै गौ बाबू, कल जोड़ै छि‍यौ। हमरा उठा क' पहुँचा दे।‍
‍अच्‍छा चुप रहू। शान्‍त भ' जाऊ। देखि‍यो ओने गोहारि‍ शुरू भ' रहल छै।‍
पहि‍लुका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ क' अपने आगू चलि‍ गेलै। सभटा देवताक कि‍रपा छै। देव कि‍रपा बि‍नु डोले नै पात।
आपसी फुसुर-फुसुर भ' रहल छै। ओकर पति‍ जागेसर गहवर घर दि‍स टकटकी लगौने।
एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्‍चा नै होइ छै।‍
जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?
‍खेलावन भगत एे काजमे माहि‍र छै। आब देखि‍यो तँ....।‍

स्‍त्रीगण दि‍ससँ कने मन्‍द स्‍वर नि‍कलै छै।
भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छि‍नरि‍या....।‍
अइठाम अबि‍ते सभ देवी-देवा चढ़ि‍ जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि‍ जाइ छै।‍
सुनै छि‍ऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दि‍नपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।‍
ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।‍

एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरति‍या सभ एकसंग हँसैत अछि‍।
चुप। सभ मुँह बन्न क' ले। भगतकेँ भाव आबि‍ गेलै।‍
कारणीकेँ एमहर लाबह।‍
भगति‍याक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भ' गेल छै।
जय हौ देव। कनी नीकसँ देखि‍यो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।‍

खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि‍।
मंतर पढ़ि‍ माथ हाथ द' रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गि‍रबैत अछि‍। फेर पेटकेँ हँसोति‍ दै छै‍। पेटपर सँ हाथ ससरि‍ पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सि‍हरि‍ उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक।
चटाक।‍ धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि‍ कंठ पकड़ि‍ धकेल देलक।
आशा नै छलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोगमे हड़कम्‍प भ' गेल। कि‍छु ठाढ़ आ कि‍दु बैसल अछि‍। स्‍त्रीगणक आँखि‍ आश्चर्यमे डूबल।
गे माइ गे माइ। आब की हेतै।‍
आगि‍ बरि‍स जेतै। ठनका गि‍रतै।‍
उचि‍तवक्‍ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल- भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि‍ गेल छै। सभ गुण-मंतर अखन भीतर भ' गेल छै। टाँग केना असमान दि‍स ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टि‍टही होइ।‍
फड़फड़ा क' उठैत अछि‍- भगत। बेंत ल' ' धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि‍।
आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।‍
धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍।
रे खुनि‍याँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽऽ‍।

जगेसरा आगूसँ घेर लै अछि‍। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गि‍रबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि‍। भगत देहसँ गरदा झाड़ि‍ रहल अछि।‍ जगेसरा हाथ जोड़ि‍ थर-थर काँपि‍ रहल छै।
आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपाए लगाऊ। जे कही अहाँ।‍
‍हेतैक सभ उपाए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखि‍या गोहारि‍ हेतै। तू परसू आबि‍ क' भेँट कर। हमरे नाम छि‍ऐ रामखेलावन भगत।
पछुआरक अन्‍हारमे कि‍छु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि‍ क' गहवरमे ढुकि‍ गेल। हवाक झोंक अाएल। कि‍छु दीप मुझा गेल।
लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि‍ रहल अछि‍।
......। क्रमश:
    
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डॉ. रमण झा
फोंका-एक विहगावलोकन

काव्य वैह थिक जे रसिकक हृदयके ँ रसाप्लावित करय
, गृहिणी वैह थिक जे अपन पतिके ँ अपन प्रेमपासमे जकरने रहय, भक्त वैह थिक जे भगवानके ँ अपन वषमे कयने रहय आ षत्रु वैह थिक जे मरितो दमधरि ष्षत्रुता नहि छोड़ए। अरसिक वा गँवारके ँ कविता सुनाके ँ की लाभ ? ते ँ ने संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध विद्वान एवं महाकवि वाणभट्ट कहने छथि-अरसिकस्तेषु काव्य निवेदनं षिरसि मा लिख! मा लिख! मा लिख!!
वस्तुतः बानर नारिकेरक स्वाद की बूझत
? गँवार रत्नक महत्वके ँ की परखत ? तहिना अरसिक किंवा गँवारके ँ जँ कोनो कविता सुनयबैक तँ ओ अरण्यरोदने कहाओत, मुर्दाक शरीरपर उबटने लगायब होयत, स्थलपर कमल रोपबे सदृष कहाओत, ऊसर जमीनपर बेस काल धरि वर्षा करबे तुल्य होयत, कुकुरक नाड
Ûरिके ँ सोझे करब सदृष बुझाओत, बहिरक कानमे जपे करब तुल्य प्रतीत होयत अथवा आन्हरक आगाँमे दर्पणे रखबा सन भान होयत-
अरण्य रुदितं कृतं षवषरीरमुद्वर्तितम्।
स्थलेमारोपितं सुचिरमूसरे वर्षितम्।।
स्वपुच्छमवनावितं वधिरकर्ण जापः कृतो।
धृतोन्धमुखदर्पणः यद्वुधो जनः सेवितः।। (निदर्षनालंकार)
जेना धनंजय नामक पाथरपर घसिकय सोनाक परीक्षा होइत अछि
, रणक्षेत्रमे धनुर्धरक परीक्षा होइत अछि, विपत्तिक समयमे गृहिणीक परीक्षा होइत अछि आ श्रीमद्भागवतक अर्थ लगयबामे पण्डितक परीक्षा होइत अछि-
धनंजये हाटक सम्परीक्षा रणांगनां षस्त्रभृतां परीक्षा।
विपत्तिकाले गृहिणी परीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।।
तहिना काव्यक परीक्षा काव्यषास्त्र रूपी कसौटीपर कयल जाइत अछि। प्रायः तथाकथित नव कविता लिखनिहार कवि लोकनि हमर एहि मतसँ सहमत नहियो होयताह मुदा वनस्पति कतबो शुद्ध रहय ओ शुद्ध घीक समता नहि कए सकैत अछि।
वस्तुतः श्री कमलाकान्त झाजीक फोंका कविता संग्रह पढ़ि हमरा काव्यषास्त्रक अन्तर्गत पढ़ल शब्दषक्तिक भेद- लक्षणा-व्यंजनाक स्मरण कराए दैत अछि। एहि फोंकामे कुल 89 गोट कविता संगृहीत अछि जाहिमे अधिकांष कवितामे समाजक कोनो ने कोनो विरूपतापर प्रहार कयल गेल अछि
, परषासनक कोनो ने कोनो अंगपर निषान साधल गेल अछि आ नेता लोकनिक भ्रष्ट चरित्रके ँ जगजियार कयल गेल अछि-एक शब्दमे जँ कही तऽ चारूकात पसरल भ्रष्टाचारपर व्यंग्यवाणक बौछार कयल गेल अछि। जँ एहि प्रकारक अवघात अभिधामे कयल जाय तँ मारि-पीट, पर-पंचैती, केस-मोकदमा सभ किछु भए जायत मुदा लक्षणा आ व्यंजनाक वाणसँ विद्ध लक्ष्य जालमे फँसल माछ सन छटपटाय लगैत अछि, आहुति युत होमक अग्नि जकाँ धधकि उठैत अछि आ चोटाओल नाग जकाँ फुफकार काटय लगैत अछि मुदा पलटवार नहि कए सकैत अछि। लक्षणा आ व्यंजनाक वाण लोकके ँ कतोक दिन धरि भीतरे भीतर दग्ध करैत रहैत अछि जेना सम्पूर्ण गात्रपर क ड़कल तेल वा घीक पड़ने भेल फोंका लोककें कतोक दिन धरि कुहरबैत रहैत छैक।
कविश्रेष्ठ श्री कमलाकान्त झाजीक कवितामे कोन प्रकारक व्यंग्य निहित अछि से हुनक पंक्तिक अवलोकन विनु कयने अनुभव करब असंभव अछि। हिनक परिचय-नवरत्न शीर्षकमे समाजक प्रसिद्ध नओ पेषाक लोकपर जे व्यंग्य कयल गेल अछि ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य थिक-
डाक्टर-
पैघ डाक्टर वैह थिक चिन्हय सभटा रोग।
अदलि - बदलि औषधि दिअए बाँचि सकए नहि लोग।।
कवि-
असली कवि थिक वैह जे कविता करए अनर्थ।
लाम-काफ बेसी होअए श्रोता बुझए ने अर्थ।।
अफसर-
अफसर बड़का वैह थिक
, जनिक पैध हो पेट।
लेट-सेट कखनो पहुँचि
, काटथि अनकर घे ँट।।
गायक-
असली गायक वैह थिक
, जकर पैध हो तान।
श्रोता सभ उठि हो विदा
, बन्द होअए नहि गान।। फोंका-पृ. 40,41
कवि अपन काव्यमे सभसँ पैध निषान सधने छथि भ्रष्ट नेता लोकनिपर। किछु पंक्तिक उल्लेख करब आवष्यक बुझि पडै़त अछि-
राजनीति हुनका लेल वरदान अछि
प्हिने झोपड़ीमे रहैत छलाह
आइ आलीषान मकान अछि।
पुनष्च-
ओ हस्ताक्षरक बदला
अँउठा लगबैत छथि
राजनेता छथि ते ँ
विद्वान कहबैत छथि। फोंका -पृ. 51
राजनेतापर व्यंग्य करैत श्री झा मंत्रीजीकेँ कुकुर धरि कहि देबामे नहि हिचकैत छथि। हिनकहि शब्दमे द्रष्टव्य थिक-
दिल्लीक अषोक पथपर मंत्रीक डेरासँ
एक कुकुर
नालीमे स्वयं जा खसि पड़ल
हल्ला भेल
लोक दौड़ल
कुकुरके ँ निकालल गेल
साबुन
, तेल आ सेंट लगाओल गेल।
कुकुरके ँ बैसा पुछल गेल
मंत्रीक आवासक सुख त्यागि
नालीमे बेर-बेर किएक
?
कुकुर सहज भावसँ बाजल-
एक बंगलामे एकेटा कुकुर नीक। फोंका पृ.-93
कवि भविष्यद्रष्टा होइत छथि
, समाज सुधारक होइत छथि आ सबसँ बेसी निर्भीक होइत छथि। हिनक निर्भीकताक पराकाष्ठा निम्नांकित पंक्तिमे व्यंजित अछि-
मैडमजी पुछलनि
सरदारजी
अहाँ यू. पी. ए.क अर्थ जनैत छी-
ओहिमे हमर
की हैसियत मानैत छी
?
सरदारजी बजलाह
मैडम
यू. पी. ए.क मतलब साफ छै
एहिमे पी. ए. हम छी
बाँकी सभ यू(अहाँ छी) फोंका-पृ.-6
हिनक एहि कविता संग्रहमे एहि प्रकारक व्यंग्य समाजक प्रत्येक वर्गपर अछि जतय कतहु हिनका व्यभिचार
, अनाचार आ भ्रष्टाचारक अनुभूति होइत छनि।
हिनक कविता संग्रहमे वक्रोक्ति(अलंकार)क माध्यमे सामान्यो गप्पके ँ तेनाने उपस्थापित कयल गेल अछि जे सुनितहि एक क्षणक हेतु अचंभित भए जाएब
, हृदयमे गुदगुदी उठत आ मुहपर स्मितहास अवष्ये टपकि पड़त। अवलोकनीय थिक-
एकटा मित्र पत्नीसँ पुछलथिन
सुनैछी
?
तुलसीदास कहने छथिन
ढ़ोल गँवार शूद्र पषु नारी
ई सभ तारण के अधिकारी

अर्थ बुझै छियै कि बुझाउ
पत्नी बजलथिन
एकर अर्थ तँ एकदम स्पष्ट छै
एहिमे हम छी एक ठाम
आ अहाँ छी चारि ठाम। फोंका-पृ.-44
श्री कमलाकान्त झाजीक कविता संग्रहमे जँ कतहु शृंगारिको वर्णन भेल अछि तऽ ओतहु व्यंग्येक माध्यमसँ। कने एहि अंषपर दृष्टिपात कयल जाय-
क्रुद्ध वॉसक विनती करैत
बजली घिघिया क

पूर्वाह्नमे लेट एैल रही
कम्पन्सेट क
देब
खराब नै मानी तँ
साँझमे लेट क
जैब। फोंका-पृ.-110
हिनक कविता सभमे ठाम-ठाम अलंकारक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। एतय उत्प्रेक्षाक मालाक अवलोकन कयल जाय-
तऽन मल-मल जकाँ
, मोन मखमल जकाँ
मूँह चाने जकाँ
, दाँत मोती जकाँ । फोंका-पृ.-26
विनोक्ति अलंकार द्रष्टव्य थिक-
बिनु चीनी केर चाह नहि
, बिनु जलखइ केर प्लेट।
बिनु सरिसो केर माँछ नहि
, बिना धोधि केर सेठ।। फोंका-पृ.-41
पुनरुक्तिप्रकाष-
एक आँखि स्वप्न-मिलन मेला लगौने
एक आँखि विरही चकोर
एक आँखि अपना लए जागल रहैए
एक आँखि हुनका घर चोर। फोंका -पृ.-38
हिनक एहि संग्रहमे एक दिस जँ किछु मात्रिक छंदमे लिखल गेल कविता सभ अछि तऽ दोसर दिस आधुनिक कविक डेगमे डेग मिलबैत पूर्णतः अतुकान्त कविता सेहो अछि। किछु छन्दोबद्ध कविताक उल्लेख एतय कयल जा रहल अछि-
कुण्डलिया-एहि छन्दमे दोहा एवं रोलाक मिश्रण एकटा शर्तक संग रहैत छैक जे दोहाक अंतिम पाद रोलाक आरम्भक पाद बनि जाइत अछि। एतबे नहि दोहा छन्दक आदि भागमे जे पद रहत से रोलाक अंतमे निष्चय देल जायत। एकर पूर्णतः निर्वाह कवि कयने छथि। कने देखल तऽ जाउ-
खादीमे गुण बहुत छै
, सभ दिन झॉपय अंग।
छै उज्जर तँ की भेलै
, एहिमे सातो रंग।।
एहिमे सातो रंग दाममे सस्ते सस्ता
सभठाँ छै उपलब्ध भेटै भरि बस्ता-बस्ता।
कविगण बाजि उठथि सुनू औ भौतिकवादी
बर्बादीसँ बचू मङा कऽ पहिरू खादी।।
पुचष्च-
खादी केर अछि बढ़ि रहल दिन- दिन दूना रेट।
एकरा अंदरमे दबल भारी भरकम पेट।।
भारी भरकम पेट देषके काला धंधा
भ्रष्टाचारी चोर बजारिक बनल सुगन्धा।
नैयायिक केर न्याय देहपर चढ़िते खादी
सभटा नुका लैछ ई बापू केर खादी।। फोंका-पृ.-108
निष्कर्षतः यैह कहल जा सकैत अछि जे फोंका कविता संग्रह एकटा सफल काव्य संग्रह थिक जकर पाठक किंवा श्रोताके ँ धैर्य आ साहसक संग पारायण व श्रवण करबाक प्रयोजन छनि। फोंका पढ़ि एक बेरि अवष्ये लोकक देह सिहरि उठतैक
, मोन उद्वेलित होयतैक आ कुमार्गके ँ छोड़ि सन्मार्गपर चलबाक प्रेरणा भेटतैक। हम एकर कविसँ आग्रह करबनि जे एहने सरस, सुन्दर आ संग्रहणीय रचनासँ मैथिली साहित्यक उद्यानके ँ सुरभित करैत रहथि। इत्यलम्।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com  पर पठाउ।

 

३. पद्य



  




३.६.नवीन कुमार आशा- आव मोन करें कमाई

३.७.1.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू 2.गजेन्द्र ठाकुर

1.जीवकान्‍त 2.आनन्द कुमार झा 3. सदरे आलम "गौहर" 4.जितमोहन झा (जितू)-मैथिली होली गीत -
1
जीवकान्‍त'क एकटा कवि‍ता-
एक दि‍न
एक दि‍न छोड़ए पड़ैछ क्षुधा
सम्‍पूर्ण क्षुधा घुरा देबए पड़ैछै वनवासी बाघकेँ
त्‍यागए पड़ैछै पि‍यास अछोर
जे बलुआही परतीकेँ सोंपए पड़ैछै
सन्‍तान-वृद्धि‍क लालसाकेँ एक दि‍न
अरपि‍ देबए पड़ैछै संसार
जेना गाछक टुटलाहा पात
जे आगि‍ पजारबासँ बचि‍ गेल
तँ वि‍लीन होइए माटि‍मे
गाछक ढेग गाछी छोड़ि‍
आबि‍ कए खसैए चूल्हि‍मे
वि‍लीन भेल जाइए बसातमे जरि‍-जरि‍
उड़ि‍आइए ओकर खंड-पखंड

पाँच महादेशमे

सोखि‍ लेल जाइए ओ हरि‍यर-हरि‍यर पातमे

कि‍छु नै छै ठाढ़,

ने सूर्य ने चान

ने माथ महक थकरल केश

ने मुँहमे सैंतल सोगहि‍-सोगहि‍ दाँत

एक दि‍न अबैत छै सबहक लेल

छोड़बाक दि‍न

ओ क्षण भरि‍क दि‍न।


2
आनन्द कुमार झा
1
माँ मैथिलीक चरण मे अर्पित
ओतबे करय छी जननी, जतबे अहाँ कहइ    छी
माँ मैथिली अहाँ के, चरण मे हम परल छी  
ओतबे करय...........................................
अहिं छी माँ जगजननी, अहिं छी माँ जगदम्बा 
सीता सेहो अहिं छी ,अहिं  छी काली अम्बा
हमरा किछु  नै बुझल, सबटा अहिं करय छी
माँ मैथिली ...........................................
हमरा लग नै  किछु  अछि, बस पान र मखान के
पिछरल छी सब ठाम, निश्तेज निष्प्राण भेल
आबो कृपा जे करीतौं, किये ऐना रुसल छी
माँ मैथिली ..............................................
एहन की  हम करम केलों, हमरा अहाँ त्यागी देलौं
हमहूँ  अहिं के पूत छी, हमरे पर किये जुलुम केलौं
कहिया तक हमरा तेजब ,किये ने बजा रहल छी
माँ मैथिली .................................................
जानी  ने कहिया स हम सब  भटकी रहल छी
मिथिला के बात होय कोना, दुनियां के खटकी रहल छी
सुनियौ बिनती आनंदो के किये सता रहल छी
माँ मैथिली ......................................................
आनंद झा
२.
जं बाजी त गलत बजय छी
जं नै बाजी त गर्बर छइ
वाह रे दुनियां गजब के दुनियां
जत देखू बस हर्बर  छइ
जं बाजी .............................
आगू कोना अहाँ बढ़ी जायब
धक्कम धुक्का कोना नै खायब
बाहर भीतर एम्हर ओम्हर
जत देखू सब ओझरल छइ
वाह रे ................................
ककरा पर बिश्वाश करब
ककरा कहबइ  अप्पन छइ
सब स्स्वारथक  मया मे जकरल
बिन मुद्दा के चर्फर छइ ...
वाह रे दुनियां ..........................  
सबहक सुनियो सबहक करियो
जेम्हर कहै ये तेम्हरे चलियोय
आनंदक अभिलाषित मोन मे
सदिखन अतबे हलचल छइ
वाह रे दुनियां गजब के दुनियां
जत देखू बस हर बर छइ
जय मिथिला जय मैथिली
३.
करियोय कने भलाइ  मिथिला के नाम पर

कहिया तक भट्कब आब चलियोय  ने गाम पर
जेना ले ये मैथिल बिना उजरल छइ  गाम घर
करियोय कने ............................
मैथिल जत गेला ओतय भेले बहूत विकाश
ओकरे कान्हा पर लात राखी लोक सब
छुबय लागल आकाश
बलुक इ महल बनाबय मे कोना बिसरल छी
गाम घर
करियोय कने .................................
जं यूथ ऑफ़ मिथिला बढ़तइ   एहिना चा...रू दिश
नवयुबक के इ संगठन बनायत अपने अपन भविष्य

जय मिथिला के उद्घोष के लाबू सब गोटा अपना जुबान पर
करियौ ......................................

3
सदरे आलम "गौहर"
गजल


जैह देखू सैह बाजू हम त यैह पढने छी॰।
राति के दिन कहैले हमरा केना कहै छी॥
चम्चागिरी चाटुकारिता नहिँ केलहुँ हम।
ताहि द्वारे फूसक घर मे हम रहि छीः।।

मिथिला देशक वासी छी हम मैथिली बाजब।
अपन इ पहचान नहि कहियो बिशरै छीः॥
सभ दिन एके रंग नहि होयत छै कान धरु ई।
कहियो नाह पर,कहियो गाङी पर नाह देखै छीः॥
सतयुग कलयुग मे नहि हम मोन के ओझराबी।
दुनिया त ठीके छै जौ हम ठीक रहै छीः॥
हँसऽ मे सभ हँसत कानऽ मे नहि कानत।
कानि के देखु तखन कहब जे ठीक कहै छीः॥
गजल

जहिया जहिया कौआ बाजे टाट पर।
देखै छी हम के अबैए बाट पर॥

झिल्ली मुरही कचरी एखनो भेटैए।
आबि क' देखु अप्पन गामक हाट पर॥

सऊँसे घर मे पाबनि मनबैए सभ क्यो।
बुढा बैसल खोखिँ रहल छथि खाट पर॥

निन्न कहाँ होई छै आब ओहि माएबाप केँ।
बेटी बैसल रहै छै जकरा माथ पर॥

साफ सुत्थर सरकार कतय आई काल्हि भेटत
भोट जतय आब खसबैए लोक जात पर॥

ताकै छी ओ पोखरि झाखङि कत' गेलै।
डुब्बी मारि क' जाई छलौ जाहि जाठ पर॥

ठीक कहए छी मुदा खुट्टा गाङब एहि ठाम।
लातक भूत कतय मानैए बात पर॥

जनता छी तेँनै सभ पार्टि ठकैए।
दुध मलाई खाईए नेता खाट पर॥
4.
जितमोहन झा (जितू)
मैथिली होली गीत -

नव नवेली नवयौवना सँ विवाह रचेलाक बाद पतिदेव रोजगारक तलाश मे परदेश चैल जैत छथिन! ओ अपन अर्धांग्नी सँ वादा के s गेल छथिन, की किछ दिन मे कमा - धमा s ओ वापस गाम ओउता! तकर बाद बड्ड धूम - धाम  सँ हुनकर दुरागमन करोउता! मुदा एहेंन नै भेल! प्रियतमक बाट जोहैत - जोहैत ओय नवयुवतीक व्यथा s हम फगुआ गीतक माध्यम सँ अपने लोकैंन के बिच व्यक्त करे चाहे छी....

लागल अछि फागुन मास यो पिया,
हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां,
अगहन निहारलो, हम पूष निहारलो,
माघ महिनवां मे जिया अकुलाबय,
चरहल फागुनवां रिझाबई यो पिया !
हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !!
लागल अछि फागुन.........

राह देखि - देखि हमर दिनवां बीतल,
जुल्मी सजनवां परदेशिया मे खटल,
'पंडित' s हमर सुधिया नै आबई,
चढ़ल अछि हमरो जवनिया यो पिया !
हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !!
लागल अछि फागुन.........

आमक गाछ पर बाजै कोयलिया,
सुनी - सुनी करेजा मs लागैत अछि गोलिया,
चिट्ठी नै सन्देशवां पठेलो यो पिया !
हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !!
लागल अछि फागुन.........

जल्दी सँ अहाँ टिकटवां कटायब,
एहिबेर बलम हमर गवना करायब,
अहाँ सँ मिल कs जियरा जुरायत,
कचका कोरही सँ फूल फुलायत,
छुटत संगतुरियाकें ताना यो पिया ! 
हमर कहियो नै भेलई सुदिनवां !!
लागल अछि फागुन मास यो पिया.....

दोसर फगुआ गीत....



फगुआ मे जियरा जुरायब यो पिया,
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब,
गामक मोहल्ला के राह सजैत अछि,
गल्ली गल्ली मे जोगीरा चलैत अछि,
ढोलक के थाप पर बुढबो नाचैत छैथ,
बुढबो गाबैत छैथ जोगीरा यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा.............

तोरी उखैर गेल, गहुमो गहुमो पाइक गेल,
आमक गाछ मे मोजर लैद गेल,
सखी सहेली करैत छली मस्करियां,
दूध भंगा घोटायत अपने दुवरियां,
ननदों  के बहकल बोलीयां यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा.............

देवर जीक मन सन - सन सनकाई,
राह चलैत हुनक खूब मोंन बहकाई,
देखि के जियरा डराबे यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा..............

गामक छौरा सभ बाजैत अछि कुबोली,
कहलक भोउजी खेलब अहिं संग होली,
रंग गुलाल सँ रंगब अहाँक चोली,
भोउजी भोउजी कैह घेरयाबे यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा..............

आस परोसक लोग ताना मारैत छैथ,
बूढियो मई सेहो मुह बिच्काबैत छैथ,
छौरा जुआन सभ मिल खिस्याबैत छैथ,
चलैत अछि करेजा पर बाण यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा.............

अहाँक बिना सेजयो नै सोभई,
रहि रहि जियरा हमर रोबई,
अहाँक कम्मे पर करब कुन गुमानवां,
सबके बलम छैथ आँखक समनवां,
कोरा मे कहिया खेलत लालनमां यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा..............

सैयां "जितू" कोना गेलो भुलाई,
सावन बीतल आब फगुओ बीत जाई,
अहींक संगे रंगायब हम अपन सारी,
कतो रहब जून पियब भाँग तारी,
फगुआ मे जिया नै जराबू यो पिया !
हमर पाउते चिट्ठी चल आयब !!
फगुआ मे जियरा.............
 
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1.ज्योति सुनीत चौधरी-फगुआक खेल 2.जवाहर लाल कश्यप 1981- कौआ आउर बगरा 3  मुन्ना जी- सबला
1
ज्योति सुनीत चौधरी
फगुआके खेल
होलिका दहन के आगि देखैकै
ईच्छा छल जाकऽ बड़का दलानमे
बीचे ठाम रोकि लेलक सब
रस्ता छल बड़ सुनसाने
फेर स्त्री नहिं जायत छल
कहियो ओहि घमासान मे
बड़ी विचित्र नियम छल ई
प््रादूषण बढ़ाबैत समाज आ पर्यावरणमे
कियैक नहिं होलिका दाहक अग्नि
प््राज्जवलित करी अपने आत्मामे
ओहि सब दुर्गुणक नाश करी
सबके अछि जे दूषित केने
ओहि ईष्र्याके जराबी जे शत्रुता बढ़ौने अछि
जे बना दैत अछि स्वार्थी जीती ओहि आसक्तिके
प््राबलताक ईच्छा मारी जे कुटिलता जन्मेने अछि
जे विवेक विहीन करै दमन करी ओहि दम्भके
ओहि घृणाके घृणित करी जे मनुष्यता दुर्बल केलक
प््रोमक ऊष्मा सऽ खेली आबसऽ फगुआके खेल के ।।

2
जवाहर लाल कश्यप 1981-
पिता श्री- हेमनारायण मिश्र , गाम फुलकाही- दरभंगा।
कौआ आउर बगरा


एकटा कौआ होइत अछि
चुस्त - चालाक, चपल आ चतुर,
चौकन्ना भऽ चारूकात ताकत,


खतरा के भापैत फुर्र
... सऽ उड़ि जायत।

एकटा बगरा होइत अछि
निडर-निर्भीक, निरीह आ निस्चछल,
लग मे आयत, चुगि - चुगि दाना खायत

...
भगेला के बादो फुदकि - फुदकि फेर आयत।

एकटा वात नोटिश केलहुं,

दिनानुदिन

बगरा छटल जा रहल अछि

...
कौआ बढल जा रहल अछि।

3  मुन्ना जी
सबला

    

नारी!
सभ दिन, पुरूषक गातमे जीवाक सुअवसर पबै-ए।
आइ पिताक तऽ काल्हि पातिक।
बुढ़ारी बितैत छैक संततिक छत्र छायामे।
आ ओ निश्चिंत भऽ उघै-ए अपन सतीत्व।
नेना-
ओ नेनपन के बितबैया दुलार मलारमे
रहैए खेलाइत पर पुरूषक कोरामे,
उएह ओकर खेलौना सेहो होइत छैक
पिता, कक्का, आओर भइया आदिक संगोरमे
जुआनी-
ओकरा संगी सबहक बीच बितबैए।
आब ओ डेरए लगै-एपुरूषक स्पर्षसँ।
परंज्च अहू ठाम ओकर रक्षक पुरूषे होइत छैक पतिक रूपमे।
मातृत्व-
मातृत्वक रक्षा करै-ए,
संतानके सर्वस्वक अधार मानि।
जीबै-ए भैसूर आ ससूरक बीच।
सभ मिलि सतर्क रहैत छैक,
ओकर मातृत्वक रक्षार्थ।
बुढ़ारी-
जँ भऽ जाइत अछि विधवा,
शोक संतप्त भऽ जीबाक लेल होइ-ए बाध्य,
परञ्च सत्य! कही तऽ-
ओ तऽ एखनो सुरक्षित अछि।
किएक तऽ डेन धऽ
सत्य के भोगबाक सामर्थ्य देबाक लेल तैयार अछि पुत्र।
वास्तवमे अब्बल तऽ ओ भेल-ए पितृहीन भऽ के। 
       


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1.रविभूषण पाठक- 1.हमर मैथिली, 2.होली 3. ई नमवरबा; 2.सुबोध ठाकुर- हम नै खेलब होली
1
रविभूषण पाठक
1.हमर मैथिली
ने बातमे,ने जजात मे
पोखरि सँ धार
फेर धार सँ नदी जँका हमर मैथिली
रूकल
,ठमकल,सुखाएल,कदुआएल मैथिली नइ
हमर मैथिली बहि रहल अछि
बालचंद बिज्जावइ क गाँव सँ
मैला आँचलतक
आ दिनकर क सिमरिया सँ
जनकपुर धाम तक
ओहिना निधोख
ओहिना पवित्र
मात्र नदी क नाम बदलैत छैक
बागमती कखनो कोशी
कखनो गंगा कखनो अधवारा भ

ओहिना बहि रहल अछि
उपर सँ नीचा
अहिगर सँ पातर दिश
हमर मैथिली मे किताबक फूल कम
आ यज्ञाश्व क हिनहिनाहट त एकदम नदारदे बूझू
संध्या -धूपदीप क गंध नहि
मजूरक पसीना भेटत
आ ओहि पसीना मे
पंजाबी
,बंगाली,संथाली
कखनहु पड़ोसी भोजपुरी
,मगही,नेपालीक शब्द
ओहिना मिलत
जहिना गहुम क कूड़ी मे
कखनो कखनो तोरी आ तीसी
हयओ सरकार !
हमरा मैथिली मे की संस्कार खोजब
?
हम छी दछिनबरिया मोटपसम राड़
हमर कटाह बोली क लेल पुरान
उपमा भ गेलए कंसार क लावा
अहाँ खोजू हमर दुष्ट
,धृष्ट,निकृष्ट मैथिलीरूप क लेल
संज्ञा
,विशेषण आ विस्मयाधिबोधक शब्द आ चिह्न !!
आ हम लिखइ छी
फेर एकटा कविता
ओएह कटहा मैथिली मे
आ अहाँ बनबू
कोमल कान्त पदावली क दुर्ग
हम निछन्द
,भदेस,भठियार मैथिली क संग
बढि रहल आगू
हमर संग अछि
कोटि कोटि जनक दुखदर्द उत्साह आ आशा
आहूँ बढ़ू जाति आ दिशा क संग संग
हमरा संग भुवन भास्कर छथि
आ उदयनाचार्य
ओएह जे नास्तिके नइ
भगवानो सँ लड़लथि
एक ढ़ुहि
हे !!कुलगोत्रक सोइत तमाशा
हमरा संग मे अछिए की
?
डीह क उस्सर खपटैल खेत
आ बागमती करेहक रक्तिम नेत्र
आँखि खुजिते डूबि जाइछ
खेत-पथार
,मंदिर,पोखरि सहित
जिला जवार आ परोपट्टा
साँप कीड़ा क दया
मोटका खोरा चाउर
आ बी बी सी रेडियो पर जीवैत
अपन गामघर आ देवता के
हम उघार नइ करब ।
जहिना बात मे
तहिना जजात मे
कोनो लैस नइ
ताहि दुआरे
लीची सठि जाइछ
पाँच कोस पहिने
आ मखान क गंध
तीन कोस बादे मिलत
अछि केवल
मकइ क ठोस शिष्टाचार
आ तमाकू क पूरजोर
लट्टमपट
कट्ठा दसमोन अल्हुआक
मीठ आ गुबगुब भाग्य
कत
पाएब कविवर?
द्विविधा नइ चौपाड़ि पर छी फँसल
सुमन
,आरसी कोस भरि पर
आ यात्री दस कोस उत्तर
विद्यापति सेहो पन्द्रह कोस पर
दिनकर बीस कोस दक्षिण
आ पचास कोस पुरब छथि रेणु
कखनो कखनो बागमती क धार संग
तिरमुहानी मे गंगा सेहो देखैत छी
ते निराला प्रसाद सेहो
अबूझ नइ
ओना गंगा दस कोस पहिले
विसूखि
भरमाबइ छथि हिंदी आ मैथिली के बीच
छोड़ू ई बात
यदि कविता मे हो
प्रश्न पूछबाक गुंजाइश
तखन कहू
जे दिनकर आ रेणु के
मैथिली मे नइ लिखबा क दोषी के
?
ओ स्वयं वा अहाँ
हे मैथिलीपारिजात के
सुमन
,किण,अमर ।
आ तमाम कविगण
जनिका कविता मे
बान्हल रूप आ छन्द मे
थक्का लिखबा क बीमारी छन्हि
नबका बात
,हवापानि के
जे एंटीबायटिक खा के रोकैत छथि
आ राजकमल
,यात्री के
पानि पीबि के गरियाबइ छथि ।
अपन असभ्यता के साथ
हम पुनःपुनःउपस्थित छी
उदयनाचार्य क गौंवा
आ राजकमल चौधरी क दियाद ।
गाँव क एक पलटन लोक तैयार छथि
दिल्ली
,पंजाब,कलकत्ता क लेल
रेलक अनारक्षित डिब्बा क
भीड़
,गंध,पसीना,टीटी,कुली सँ बचैत
रेलक छत
,इंजन,शौचालय,
डिब्बा क ज्वांइट पर बैसल
तमाकुए नइ बोली
,टोनक मर्दन करैत
ई जनसमुद्र बढ़ि रहल अछि
लालकिला दिस ।
मैथिलीपुत्र घूमि रहल छथि भारत
आनि रहल छथि
किछु नबका शब्द
,गंध,चित्र ,बात
उजरल धरती
हुलसि रहल अछि
कविता आ सपना सँ आगू
किछु ठोस आश्वासनक साथ ।

2.होली
आएल छतीसा
क्षण बीतल
खन बारहमासा
अहिना तहिना
गएल पचीसा
फूजल भक नहि
खुलल गाल नहि
नेाचउँ केश
देखबउँ बतीसा
किछु कविता
अधलिखल कहानी
बिनु किछ कएने
बीतल जवानी
बीतल पैंतीस
आएल छतीसा
धवल केश
भभकए चालीसा
ग्रंथ छपल नहि
पुरः कार नहि
बिन गुट गुरू के
लगत पार नहि
हे अकादमी
यूनिवर सिटी
ज्ञानपीठ के
ध्यान धरै छी
नमहर गुरू
नमहर सम्माना
लिखब लघु गुरू
ऐ विधि नाना ।
3.ई नामवरबा
(हिंदी आलोचकक व्यथा)
ई नामवरबा बहुत सताबइ
कखनो टीवी कबहुँ रेडियो
ब्लॉग
, न्यूज पर आबइ ।
तुरते मम्मट तुरत लोंजाइनस
मुक्तिबोध बताबइ
की कविता नाटक वृतांत पर
अजबे गजब सुनाबइ
नागार्जुन अपभ्रंश हजारी
सबहक सत्व दिखाबइ ।
लिख मारलक दू चारि किताब बस
बाजि बाजि घोलटाबइ ।
आब रमत नहि
लिखत पढ़त मे
बात से बात निकालइ ।
बाज बाज बौआ दिन तोहर
शणियो सुघड़ मंगलबो गाबइ
ई नामवरबा बहुत सताबइ ।
की खाइ छें
कोन पानि पीबए छें
घाट घाट के
बानि बजए छें
हमरो दे किछ
जंतर मंतर
बाजी कम
गुण अधिक सुनाबइ
ई नामवरबा बहुत सताबइ !
ई नामवरबा बहुत सताबइ !
2
सुबोध ठाकुर
हम नै खेलब होली
जुनि सुना घुलल घमल बोली
हे गे करिक्की कोइली
हम नै खेलब होली
प्रियतम बसै दूर देश छै
हृदएमे उठए कलेश छै
एनामे के भिजायत मोर चोली
हम नै खेलब होली

अछि वसंत उन्माद नेने
परंच हमरा मनमे विषाद देने
नै सोहायत हमरा ई बसंतक रंगोली
हम नै खेलब होली

पिया देने ई आस छल
फगुआमे पटोर आनब, कहने ई बात छल
मुदा आब लगैत केने छलाह ओ ठिठोली
नै-नै हम नै खेलब होली

नै कुनु उमंग अछि
नै कुनु तरंग अछि
केकरा लग हम अपन वेदनाक गीरह फोली
नै खेलब हम होली

बेर-बेर्अ पुरवा आबि अँचरा उड़ाबए
फगुआ बयार आबि विरहकेँ जगाबए
महकि उठए मन जेना फूल चमेली
मुदा नै हम खेलब होली
       
कहै सुबोध धनी जुनि हीया हारू
गाबि विरह पियाकेँ कहा पठाबू
काँचे उमेरियाक सप्पत दियाबू
देखू पिया आबि करताह बरजोड़ी
तखन अहूँ खेलब होरी


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1.राजेश मोहन झा 'गुंजन'- होलीक तरंग 2.किशन कारीगर- कक्का हमर उचक्का
1
राजेश मोहन झा 'गुंजन'

होलीक तरंग-
बुढ़वोक तनपर आएल जुआनी
दाँत झड़ल छन्‍हि‍ करकर मोँछ
ऐ भेटकेँ अपने की बूझब
हम देखै छी हमहीं बूझै छी
औ बाबू ई कि‍छु आर नै थि‍क
होरीक बसातपर जागल पि‍रीत
सटकू बाबूक एलखि‍न सारि‍
होलि‍क रंगमे रंगल दुआरि‍
कुरता फाड़ि‍ कऽ फगुआ गाबथि‍
छोटका बाबा ढोल बजाबथि‍
देख तमाशा बाबी भेलि‍ सन्न
आब ने देब पानि‍ ने अन्न
जुनि‍ रूसु हमर पुरनी रानी
होली देख छॅटेलौं कानी
बूढ़ भेलौं मुदा मोन तँ बच्‍चे
पुनि‍ आएल जुआनी बात ई सत्ते
चारि‍ कहार संग हरि‍यर डोली
मोन पड़ए जुअनकी होली
आरो लोक हमरोसँ बीस छथि‍
सटल सारि‍ संग जेना उड़ीस छथि‍
भांङ संग मरसटका खीर
पूस खाटे कटलनि‍- होरीक वीर
ऐ बरख पार केलनि‍ अस्‍सी
होलीमे अंग्रेजी संग खस्‍सी
बदनाम भेली मुन्नी संग शीला
देख ल‍अ बूढ़बाक लीला
बैस संगमे गि‍लासक गि‍लास
पोता सबहक संग बाबो पास
ई कथा थि‍क ऐ होरी केर
राजा भेला राजमोहन बदनाम
पि‍याजक नोरमे होरी भीजल
पटना जुआन आ दि‍ल्‍ली पुरान।
2. किशन कारीगर
    कक्का हमर उचक्का ।
                     होली पर हास्य कविता


ओंघराइत पोंघराइत हरबड़ाइत धड़फराइत धांई दिस
बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का
होरी मे बरजोरी देखी मुस्की मारैत
काकी मारलखिन दू-चारि मुक्का।।

धिया-पूता हरियर पीयर रंग सॅं भिजौलकनि
बड़की काकी हॅसी क घिची देलखिन धोतीक ढे़का
पिचकारी मे रंग भरने दौगलाह हमर कक्का
अछैर पिछैर के बान्हे पर खसलाह कक्का हमर उचक्का।।

होरी खेलबाक नएका ई बसंती उमंग
ततेक गोटे रंग लगौलकनि मुॅंह भेलैन बदरंग
काकी के देखैत मातर कक्का बजलाह
आई होरी खेलाएब हम अहींक संग।।

कक्का के देखैत मातर काकी निछोहे परेलीह आ बजलीह
होरी ने खेलाएब हम कोनो अनठीयाक संग
जल्दी बाजू के छी अहॉं नहि त मुॅंह छछारि देब
घोरने छी आई हम करिक्का रंग।।

भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर
होरी खेला भेल छी हम लाल पिअर
आई त भैयओ नहि किछू बजताह जल्दी होरी खेलाउ
एहेन मजा फेर भेटत नेक्सट ईअर।।

सुहर्दे मुॅंहे मानि जाउ यै भाउजी
नहि त करब हम कनि बरजोरी
होरी मे त अहॉ जबान बुझाइत छी
लगैत छी सोलह सालक छाउंड़ी।।

आस्ते बाजू अहॉक भैया सुनि लेताह
कहता किशन भए गेल केहेन उच्का
केम्हरो सॅ हरबड़ाएल धड़फराएल औताह
छिनी क फेक देताह हमर पिनी हुक्का।।

आई ने मानब हम यै भाउजी
फुॅसियाहिक नहि करू एक्को टा बहन्ना
आई दिउर के भाउजी लगैत अछि कुमारि छांउड़ी
रंग अबीर लगा भिजा देब हम अहॉक नएका चोली।।

ठीक छै रंग लगाउ होरी मे करू बरजोरी
आई बुरहबो लगैत छथि दुलरूआ दिअर
ई सुनि पुतहू के भाउजी बुझि होरी खेलाई लेल
बान्हे पर दौगल अएलाह कक्का हमर उचक्का।।

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1राम वि‍लास साहु- पागलप्रेमी 2.पंकज झा

अईंखक दोख आ कि हृदयक…. / आऊ चलु


1
राम वि‍लास साहु
कवि‍ता-
पागलप्रेमी
बसंतक मास मधुराएल अछि‍
भौरा मंजरपर गुंजन करैत अछि‍
महुआक फूूलसँ रस टपकैत अछि‍
फागक मन्‍द हवा मन ललचाबैत अछि‍
चहु ओर चहकैत चि‍ड़ै चुनमुन
फूलक सेजसँ धरती सजल अछि‍
ओसक कण मोती बनल अछि‍
मुदा हमरासँ हम साजन बि‍गरल अछि‍
चि‍ड़ि‍या चुनमुन हमरा जगाबैत अछि‍
चन्‍दाक चाँदनी बादलसँ मि‍लैत अछि‍
साजन बि‍नु हमर सुहाग उजड़ल अछि‍
जेना शराबी शराब पी क' पड़ल अछि‍
राति‍-दि‍न हमर मन घबराएल रहैत अछि‍
आशा हमर नि‍राशामे बदलल अछि‍
साजन बि‍नु हमर मन पागल बनल अछि‍
पागल प्रेमी नालायक बनल अछि‍।
2.
पंकज झा

अईंखक दोख आ कि हृदयक….

अईंखक कोन दोख,
जे अहाँक सुन्दरता नई देखलक,
 त देखै टा मात्र छै,
बुझै नई छै,
बिम्ब  प्रतिबिम्बक,
बिच फंसल मात्र एकटा पराबर्तक  छै,
दोस त ह्रदय के छै,
जे भावना शुन्य  छै,
तैं अहाँक सुन्दरताक झीलों मे,
मरुभुमिक दग्धातक देखै छै,
ओना जे आन्हरो छैथ,
से कल्पनाक ब्रश ,
सुन्दरताक सृजन हृदयक भाव स करैत छैथ,
मुदा !
जे भाव विहीन छैथ,
अईंख रहितो,
बिम्ब-प्रतिबिम्ब मे ओझराइल रहैत छैथ,
अई मे हुनको कोनो दोख नई,
जे भाव विहीन छैथ,
यन्त्र बनी बरद  जँका,
जीवनक दाउन मे लागल छैथ,
हुनका त आभासों नई छैन,
कि अहू स बिशेष किछ छैई,
मुद्रा-मतलबक डोरी मे बन्हैल,
सुखैल बासि खैक आदि,
स्वक्षताक रस स दूर,
जीवनक मकरजाल मे,
फंसल छैथ, हेराइल छैथ,  

आऊ चलु
 आऊ चलु,
हाथ पकरु,
मोन मिलाउ,
विश्वाष बढाऊ,
सत्यक सोझ दिशा मे,
चलैत चलि चलैत चलि,
प्रयाश करी,
एक दोसर के गीत सुनी,
एक दोसर के मीत बनी,
अहँ जरा,
ओकर भस्म लगा,
प्रेमक रश मे स्नान करी,
रँग रुप,
कोनो ऊँच नीच ने,
सहज भाव स,
झुमि ऊठी,
आँग-समाँग,
ज्ञाण-विज्ञान,
कला-श्रीजन के ध्यान करी,
जिवनक रौद-बसात के,
मोनक सब मलाल के,
भरीभरीक पिचकारी मे,
रंग स सराबोर करी,
जीवन पथ पर सँगे-सँगे,
चलैत रही...चलैत रही |
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नवीन कुमार आशा
आव मोन करें कमाई

कि कहू यो टूना भाई

आव मोन करें कमाई
दोस लोकनि सेहो धेलथि बाट
एखन धरि हम पकड़ने दी खाट।
माई बाप नहि कहथि किछु
नहि ताकथि हमरा पिछु
नहि वो कहथि त हम नहि सोचि
इ तय अछि हुनक अपमान।
जखन-जखन दुविधा मय आबी
दथि वो हमर संग
बच्चा सँ पकर लथि वो हाथ
आब बने अछि हम दि साथ।
जखन-जखन तड़ते इ मोन
नहि किछु करि पाबि वो छन
हर दम घुटि-घुटि के जीबी
हर दुख के विस जकाँ पिबी
आँखिक नोर बहावि कोना
ओकर तोड़ पाबि कोना
उपर सँ रहि हम खुष
आ भीतरे भीतर काने मोन
कालि रातिक बात कहिओं
रातिक में कानेक भेल मोन
नहि भेटल ककरों संग
फेर भेटल निर्जिव क संग
टोकरे पकरि कलों अलाव।
लेक आब कहे यो भाई
भय गेले छौड़ा बढ अलोकिक
नछि हम अलोकिक आ लगे लोकक लाज
बुझी हम ओकर इलाज।
माई बाप नहि बुझी पावथि
तखन कोढ फाटे यो।
कि करथिन ओलोकइन
छियनी तय हुनक आस।
कखनो-कखनो मोन करइ अछि
द दि हम अपन परान।
जखन आवे इ बिचार
तखन होई माई बापक बिचार
फेर हुनका सोची रूक जाय माने
जो आई हम फसरी लगेवे
कि नहि घटथि हुनक मान
फेर खाई एकटा कसम
जखन धड़ी रहत पड़ान
नहि छोड़ब हुनक ध्यान
कि




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1.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू 2.गजेन्द्र ठाकुर
 1.
शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू
कवि‍ता
मुदा जीबै छी

जीवनक डोरि‍ फुजि‍ उड़ल व्‍योममे
कातर प्राण मुदा जीबै छी
सड़ल वसन पजड़ल अछि‍ आंगुर
गलल ताग गुदरी सीबै छी....
ककरो बाड़ी बेली फुलाएल
ककरो पोखरि‍ भैंटक लावा
हमरा घरक परथनो गि‍ल्‍ल भेल
ऑचक बि‍ना सुन्न अछि‍ तावा
कागत-मुद्राकेँ बीड़ी बना कऽ
कोंढ़सँ लेसि‍-लेसि‍ पीबै छी.....
लाल रंग शोणि‍त सन टपकय
पीत कुटि‍ल पि‍लहा बनि‍ धधकय
कुपि‍त होलि‍का छाॅह देखाबथि‍
बड़ीपर काक-भुसुण्‍डी हबकय
अग्‍नि‍देवक हथ्‍थ डाॅङसँ
सुधाकेँ खोड़ि‍-खोड़ि‍ जड़बै छी....
कटाह वसंत कहि‍यो नै आबथि‍
राखथु अपने संग वि‍धाता
कुसुमि‍त रहै सबहक आङन घर
हॅसि‍-हॅसि‍ कौड़ी खेलथि‍ पुनीता
अपन संत्रासकेँ हि‍यामे नुका कऽ
सबहक सुखक कामना करै छी.....।।
2
गजेन्द्र ठाकुर
गजल
की कहबै जे लुझतै ओ, कोना कहने बुझतै ओ
आँखिक नोर खसतै रूसतै आ फेर बजै ओ

दाबी देखेतै जखन से देखबै नुका अँचरासँ
बहरा ाइ छी हम मुदा घबरा कऽ, नै ताकै ओ

कोन बातपर तमसाइत अछि नै बुझलिऐ यौ
असोथकित आँखि लेने ओङठल पियासल ओ

सर्वज्ञानी बनल हम जाइ ऐ देशकेँ छोड़ने
छोड़ल गेल नै हएत बनल पाथर-मूर्ति ओ

उड़ै अछि अनेरे ई चिड़ै नील अकाशक बिच
हमर मोनो उड़ैए देखैए नै किअए अछि ओ

चम्मन फूल भमरा गुम्म जब्बर छी सोझाँ ठाढ़
जलबाह सोझाँ  माँछ बनल हमरा देखैए ओ

बनि माँछ आकुल छी बाझब ऐ जालमे कखन
फँसि त्राण पाएब आ आँखि बओने  देखत की ओ

धानी रंगक ई आगि देखल हम पियासल छी
धाना ठाढ़ अछि शान्त निश्छल मुखाकृति लेने ओ

देशक धान अछि खखरी बनल, आगि धानी भेल
कखन जाइ ओइ देश जे पियासल, देखै नै ओ

धानी रंगक आगि आ पानि बनल ओकर संगी
धौरबी बनल हम आइ रूसत बुझत नै ओ

धुधुनमुहाँ बनल छी धोधराह गाछक सोझाँ
आगि जरबैत बनेलक फाहा बूझि देखल ओ

मिरदङियाक ध्वनि तरंग धारमे भँसियाइ
ओइ मोनिमे घुरमैत अकुलाइत देखै नै ओ

ऐ आँखिमे जे नोर एतै आ खसेतै आबि ओ सोझाँ
कहिया देखि हकासल हमरा जे दबाड़त ओ

देखितिऐ अँचरासँ आ बहरा जाइ दुअरासँ
चिड़ै उड़तै तँ उड़तै मोनसँ बेसी कोनो की ओ

सगुन बान्हसँ बान्हल ऐ मोनक उछाही बिच
सगुनियाँ छी बनल ठाढ़ कहिया देखत ई ओ

हरसट्ठे स्वयंसँ अपन चेन्हासी मेटा लेलक
माटिक मूरुत हम हरपटाहि बनेलक ओ

छरछर बहल धार मोनक कतऽ अछि गेल
बहि धेलक बाट आ उधोरनि बनल अछि ओ

 
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१. जगदीश प्रसाद मण्‍डल- श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित- गीत २. उमेश मण्‍डल- संकलन, मूड़न गीत
१. 
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
श्री शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू'जीकेँ समर्पित-

गीत
ओढ़ि‍ दुपट्टा नम-गम केर
बति‍ वसंती बौड़ाइ छै
खटमीठ रस चूसि‍-चूसि‍
ति‍रपि‍त भए औनाइ छै
सुरभि‍ सुगंध पीब सि‍हरि‍
कू-कू कए कुकूआइ छै
चेत मन मधु स्‍वर तानि‍
बि‍लति‍-बि‍लति‍ बि‍लबि‍लाइ छै
दसो दुआरि‍ दृष्‍टि‍ दौगाए
चनकि‍ चैत चुनचूनाइ छै।




उमेश मण्‍डल

संकलन, मूड़न गीत
गोसाउनि‍ नोतक गीत

बट्टा भरि‍ चानन रगड़ल पाने पत्र लि‍खल हे।
ताहि‍ पान नोतब गोसाउनि‍ जे नि‍त पूजि‍ थि‍कि‍ हे।
ताहि‍ पान नोतब पि‍तर लोक जे नि‍ज आशि‍ष देथि‍ हे
ताहि‍ पान नोतब ऐहब लोक जाहि‍ स मंगल हैत हे।

मूड़न बेरक-

कौने बाबा दि‍नमा गुनाय जग ठानल हे।
कौने बाबी पड़ि‍छथि‍ केश ि‍क होड़ि‍या के मूड़न हे।
लाल पीयर चीर पहि‍रब केश परीछब हे
बाँस पुरैन लेल खोंइछ कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे
देबउ हजमा बड़ इनाम कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।
शुभ-शुभ काट हजमा केश कि‍ होड़ि‍लाक मूड़न हे।

लावा भुजै कालक

लाव भूजय बैसली बहि‍नि‍या
      चुलहा दहि‍नि‍या हे।
हे सुन्‍दरि‍ मंगल आगि‍ पजारल हे
सात्री पत्र मे राखल
      लावा पुनि‍ भूजल हे।
दुलहि‍न गृह मे बैसि‍ जे ब्‍याहल हे।
कहय हे सखि‍ सभ आनन्‍द मनावि‍य
      प्रभु गोहरावि‍य हे।
जुगे-जुगे बढ़ू अहि‍बात
      कि‍ अइहब गाबि‍य हे।


महेशवाणी

दुर-दुर छीया ए छीया,
एहन बौराहा बर संग जयती कोना धीया
पाँच मुख बीच शोभनि‍ तीन अंखि‍या
सह-सह नचै छनि‍ सांप सखि‍या
            दुर-दुर.....।
काँख तर झोरी शोभनि‍, धथूर के बीया
दि‍गम्‍बर के रूप देखि‍ साले मैना के हीया
            दुर-दुर.....।
जँ धि‍या के वि‍ष देथि‍न पि‍आ
कोहबर मे मरती धीया
भनहि‍ वि‍द्यापति‍ सुनू धीया के माय
बैसले ठाम गौरी के गुजरि‍या
            दुर-दुर......।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...