Sunday, February 13, 2011

'विदेह' ७५ म अंक ०१ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७५)- PART III


 शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- समीक्षा- सूर्यमुखी २.बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy- पछिला अंक सऽ आगू-
३. सुजित कुमार झा- कथा- भौजी

शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू

समीक्षा
सूर्यमुखी
                   
मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अंग्रेजी अथवा हि‍न्‍दी भाषा साहि‍त्‍य जकाँ पद्य वि‍धाकेँ कालक आधारपर रेखांकि‍त नै कएल गेल अछि‍। कि‍एक तँ छायावाद, हालावाद, रीति‍, क्रांति‍ आदि‍ वि‍षए मूलक पद्यक रचना हमरा सबहक वयनामे सभ युगक साहि‍त्‍यकार कऽ रहल छथि‍, कोनो वि‍शेष कालकेँ एकवादसँ जोड़ब उचि‍त आ प्रासंगि‍क नै।
एतदर्थ पद्य वि‍धाक आत्‍मा जौं आशु कवि‍ता आ गीतकेँ मानल जाए तँ कि‍छु पद्य संग्रह मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ भारतीय भाषाक प्रवर समूहमे स्‍थापि‍त करैत अछि‍ ओइमे यात्रीजी रचि‍त चि‍त्रा आ पत्रहीन नग्‍न गाछ, चंदा झा रचि‍त गीत सप्‍तसती, सीता राम झा रचि‍त उनटा बसात, भुवन कृत आषाढ़, मधुप कृत शतदल, उपेन्‍द्र ठाकुर मोहन कृत बाजि‍ उठल मुरली, सुरेन्‍द्र झा सुमन कृत पयस्‍वि‍नी, उपेन्‍द्रनाथ झा व्‍यास रचि‍त प्रतीक, अमर कृत गुदगुदी, गोपाल जी झा गोपेश कृत गुम्‍म भेल ठाढ़ छी, चन्‍द्रभानु सि‍ंह रचि‍त के ई गीत अलापि‍ छेँ, सोमदेव कृत कालध्‍वनी, नचि‍केता कृत कवि‍यो: वदन्‍ति‍, रवीन्‍द्र नाथ ठाकुर कृत रवीन्‍द्र पदावली, नवल कृत असमंजस, शेफालि‍का वर्मा रचि‍त मधुगन्‍धी वसात, श्‍यामादेवी रचि‍त कामना, इलारानी सि‍ंह रचि‍त वि‍न्‍दन्‍ती, मार्कण्देय प्रवासी रचि‍त एतदर्थ, कीर्ति नारायण मि‍श्र सि‍ंह कृत सीमान्‍त, सरस रचि‍त आंजुर भरि‍ सि‍ङरहार, कालीकान्‍त झा बूच जीक संकलि‍त पद्य संग्रह कलानि‍धि‍, राजदेव मंडल रचि‍त अम्‍बरा, ज्‍योति‍ चौधरी रचि‍त अर्चिस प्रमुख अछि‍।
यात्री जीक दुनू पद्य संग्रहमे साम्‍यवादक धरातल चि‍क्कन चुनमुन आ उपेक्षि‍तक प्रति‍ वि‍शेष अनुलोम भाव प्रस्‍फुटि‍त भेल छै मुदा समग्र साहि‍त्‍यि‍क वि‍चार धाराकेँ जौं आधार मानल जाए तँ सर्वकालि‍क मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍यि‍क पद्य संग्रहमे सूर्यमुखी केँ सर्वश्रेष्‍ठ मानल जा सकैछ। एकर मुख्‍य कारण जे यात्री जीक रचनामे समाजमे साम्‍यवादकेँ मान्‍यता देबाक प्रयास तँ कएल गेल मुदा यात्रीजी असहज जीवनक मनोवृत्ति‍सँ कतहु-कतहु उद्वेलि‍त भऽ कऽ पलायनवादक पक्षधर भऽ जाइत छथि‍‍ हुनक मनोदशासँ ककरो कोनो द्वेष नै, समग्र मि‍थि‍ला यात्री जीक प्रति‍भाकेँ नमन करैत छन्‍हि‍ परंच रचनाकारकेँ अपन हृएयक व्‍यथाकेँ रचनापर प्रकट नै होमए देलासँ रचनाक स्‍तर कि‍छु बेसी मान्‍य भऽ जाइछ जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण आरसी प्र. सि‍ंह रचि‍त सूर्यमुखी अछि‍। यात्री भुवन, चंदा आ मधुपकेँ छोड़ि‍ कोनो मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारक कवि‍ता आरसीबाबूक सूर्यमुखीक जड़ि‍ धरि‍ नै पहुँच सकल, डाढ़ि‍ आ पातकेँ छूबाक कल्‍पना सेहो असंभव अछि‍।

सन् 1969सँ लऽ कऽ 1981ई. धरि‍क रचनाक संकलनमे 61 गोट पद्यक संग-संग 36 गोट लधुकवि‍ता संकलि‍त अछि‍। सन् 1984ई.मे सूर्यमुखी पद्य लेल आरसी प्र. सि‍ंहकेँ साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल। रचनाक आरंभमे 22 पृष्‍ठक आरसी बाबूक शब्‍दमे लि‍खि‍त प्रवेशि‍का सन्नि‍हि‍त कएल गेल अि‍छ। एे प्रवेशि‍काकेँ आमुख वा भूमि‍का सेहो मानल जाए। कवि‍ताक परि‍भाषाकेँ आन अग्रणी साहि‍त्‍यसँ जोड़ि‍ कऽ जे बि‍म्‍ब तैयार कएल गेल ओकरासँ पाठककेँ काव्‍यधाराक प्रति‍ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ नव आयाम भेटत। आरसी बाबू हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक प्रवीण कवि‍ छथि‍। कवि‍ सरोज भुवनेश्‍वर सि‍ंहक प्रेरणासँ आरसी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पएर रखलनि‍। अपन पहि‍ल कवि‍ता शेफालि‍का'रचना 1936ई.मे कएलनि‍। ओइकाल धरि‍ आरसी बाबूक दृष्‍टि‍कोणमे मैथि‍ली मात्र एकटा बोली छल मुदा भाषाक हृदएमे प्रवेश करि‍ते कृत-कृत्‍य भऽ गेलाह आ हि‍न्‍दी जकाँ अपन तृण-तृणमे देसि‍ल बयनाकेँ समाहि‍त कऽ लेलनि‍। शेफालि‍कामे आरसीकेँ सत्‍यक बोध भेटलनि‍ तँ रजनीगंधामे सौन्‍दर्य बोध। सूर्यमुखीमे साक्षात् मंगल मूर्तिक दर्शनसँ कवि‍ भाव वि‍भोर भेल छथि‍।
सूर्यमुखी ऐ पोथीक पहि‍ल कवि‍ता अछि‍ कोनो एकटा कवि‍ताक शीर्षककेँ कवि‍ताक संग्रहक शीर्षक बनएबाक दृष्‍टि‍कोण कोनो पाठक लेल झाॅपल नै भऽ सकैछ। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ आरसी सूर्यमुखीकेँ अपन प्रखर कवि‍त्‍वक आवरण मानैत छलथि‍। आदि‍त्‍य आ सूर्यमुखीक मध्‍यक संबंध वि‍चारणीय अपन सि‍नेही दि‍स मात्र देखबाक लेल सूर्यमुखी प्रेरणा स्‍त्रोत भऽ सकैछ। रीति‍ वा प्रीति‍क एहेन रूप मूक जीवे टा मे भेट सकैछ। साकार रहि‍तहुँ आरसीक जीवन ि‍नरंकार जकाँ छल। जलमे रहि‍तहुँ पुरनि‍पातक जकाँ परंच पुष्‍पसँ सि‍नेहकेँ सीख श्रंृगारक भान स्‍वाभावि‍क, कि‍एक तँ प्रकृति‍स्‍थ वस्‍तुमे पुष्‍पक सौन्‍दर्यसँ नि‍रंकुशोमे आसक्‍ति‍ पनपि‍ जएवाक संभावना भऽ सकैछ। सूर्यमुखी पद्यमे ऋृतुराजक अवाहान कालमे आन फूलक सौन्‍दर्यसँ सूर्यमुखीक तुलनामे परार्थ प्रेमक अनुभव अनुशासि‍त आ नि‍ष्‍ठासँ कएल गेल। वसंतक माधुर्य बेलामे पारि‍जातकेँ अमरत्‍व भेटल, हरसि‍ंगार ब्रह्मबेाला मे वसुन्‍धराकेँ स्‍पर्श कएलक, रजनीगंधा रैनक मादक मधुगंधी बसातकेँ आलोि‍कत कएलक। अभि‍सार पथक प्रशांत बनि‍ बेला मधुर मि‍लनक स्‍पर्श कएलक, संगहि‍ जूही आ चमेली सखी बहि‍नपा बनि‍ वसंतकेँ उन्‍मादि‍त कएलक। ऐ पावन परि‍णयकालमे उपेक्षि‍त रहि‍ गेली तँ मात्र- सूर्यमुखी। ऐ नवल वि‍म्‍बि‍त सि‍नेहक प्रदर्शन मैथि‍ली की सभटा भारतीय भाषामे वि‍रले देखैमे आबैत अछि‍। सूर्यमुखीकेँ भेटल मात्र तँ दि‍वाकरक प्रति‍ सि‍नेहि‍ल दृष्‍टि‍। जखन धरि‍ रवि‍ वसुन्‍धराकेँ देखैत छथि‍, तखन धरि‍ सूर्यमुखी हुनक परम समर्पिता प्रेमि‍का बनि‍ हुनके दि‍स तकैत छथि‍, रवि‍क, ज्‍योति‍ दुआरि‍ बन्न होइते सूर्यमुखीक नयन पट बन्न। सूर्यमुखी जकाँ जौं आदि‍त्‍यक कोनो आन सि‍नेही तँ ओ पंकज.....।
वि‍रले आत्‍मा कोनो पंकजे सन उठबै छै माथा
जन्‍म पंक मे लैत, सरोवर-सलि‍ल राशि‍ कऽ लंघन
तोहर सन सौभाग्‍य ककर जे परम प्रकाश बनौलक
उद्घाटन ले तोहर आनने अपन चेतना दर्पण

प्रभात मे पुनीत प्रेमक झलकि‍ अरूणोदय कविता‍ मे भेटैत अछि‍। कोनो अनुभव मात्रक व्‍यथि‍त सि‍नेहसँ कवि‍क मन भीजल छन्‍हि‍ मुदा अदृश्‍य विद्युत धारक अनुभव मात्रसँ अपन सुधि‍-बुधि‍ बि‍सरि‍ गेल छथि‍। उगैत सूर्य केँ प्रणाम पद्यक शीर्षकसँ भान होइछ जे मात्र सकल साध्‍य पूर्णकेँ नमन करबाक चाही मुदा कवि‍ताक बि‍म्‍ब एकदम अलग लागल। प्रभातक लालि‍मासँ पहि‍ने जगबाक उद्घोष कऽ रहल छथि‍- आशुकवि‍। अपन स्‍वदेश भूमि‍केँ वैश्‍वि‍क मानचि‍त्रपर स्‍थापि‍त करवाक लेल ई कवि‍ता जागरण-गान जकाँ छै। चेतना तरंग मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लि‍खल गेल छाया गीत रूपक अनुभव करा रहल अछि‍। प्रकृति‍ सौन्‍दर्य बोधमे महुआक भंगि‍मा मि‍थि‍लाक बहुत रास संस्‍कार परम्‍पराक द्योतक थि‍क, तँए कोइली पपि‍हा आ चैतीकेँ चेतना तरंगसँ जोड़ब प्रासंगि‍क लागल। प्रात:कालमे हरसि‍ङार झड़ि‍ कऽ प्रभातकेँ अनुगामी बनबैत अछि‍, कवि‍क चंचल मन शरत ऋृतुक उषाकाल जकाँ आ प्राण हरसि‍ंगार बनि‍ गेल। रीति‍क नि‍शामे कवि‍ अपन नाआंे आ गाआंे सेहो बि‍सरि‍ गेल छथि‍ ऐ आशुगीतक अनुभव हरसि‍ंगार कवि‍तामे भेल सनातन पुरूष कवि‍तामे द्वैत आर्य संस्‍कृति‍केँ नील नदीक सभ्‍यतासँ जोड़ि‍ कवि‍ सत्‍य, अहि‍ंसा, करूणा, मैत्री आ सि‍नेहक पाठ प्रस्‍तुत करैत छथि‍। कोनो धर्म यथा-हि‍न्‍दू, इस्‍लाम, बौद्ध, इसाइ पंथक ि‍नर्वाह करैबला लोकक आचार ि‍वचार कतवो भि‍न्न हुअए मुदा हृदएक स्‍पन्‍दन आ रक्‍तक प्रवाह सरि‍ता सभमे सम अछि‍। सनातन पुरूष शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ पाथरमे देवत्‍वक प्रवेश करएबाक प्रयास कएलनि‍। वर्षा उल्‍लास शीर्षक कवि‍तामे पावस ऋृतु कालक चराचर जीवनक रंग भावुक लागल। शस्‍य गान कृषि‍ प्रधान भारत भूमि‍क हरि‍यरी भरल वसुधाक वि‍प्‍लव चि‍त्रण करैछ। अखण्‍डता मे एकताक दृष्‍टि‍कोण हम एक छी शीर्षक कवि‍तामे देखएमे आएल परतंत्रताक कलुप अध्‍याय तँ सन् 1947ई.मे समाप्‍त भेल मुदा आर्शिक सामाजि‍क आ वैश्‍वि‍क दृष्‍टि‍सँ हमरा लोकनि‍क देश सन् 1962ई. धरि‍ पाछाँ रहल। चीन युद्धमे पराजयक कलंक लागल मुदा शनै: शनै: राष्‍ट्रीय एकताक रक्षा करैत हम सभ 1965मे एकटा पड़ोसी राष्‍ट्रकेँ धराशायी केलहुँ। तदुपरांत अन्‍तर्राष्‍ट्रीय परि‍दृष्‍यमे भारत भूमि‍क चर्च हुअए लागल।
सन् 1969ई.मे आरसी बाबू ऐ दशापर हमर देश जागल कवि‍ताक रचना कएलनि‍। मुदा संगहि‍-संग कि‍छु व्‍यभि‍चारसँ कवि‍क मोन उद्वि‍ग्‍न छन्‍हि‍-
जमाना क मोफि‍ल, जुआनीक नटुआ
मगन भेल जनता हेरा गेल बटुआ
घरक बेचि‍ कनि‍याँ
लेलक कीनि‍ धनि‍याँ
भगत भेल बनि‍याँ, जगत ज्ञान जागल
हमर भाग जागल हमर देश जागल
सन् 1972-73मे मि‍थि‍ला दर्शन, गोति‍या आ अॅजौर सन् पत्रि‍कामे ई काव्‍यगीत प्रकाशि‍त भेल आ लोकप्रि‍य सेहो भेल। एकर प्रमाण जे आरसी बाबूक कवि‍तासँ प्रेरि‍त भऽ कऽ काव्‍य जगतमे प्रवेश करएबला एकटा कवि‍ काली कान्‍त झा 'बूच', ऐ ऊपरि‍ लि‍खि‍त कवि‍ताकेँ पढ़ि‍ अपन प्रेरणास्‍त्रोतकेँ जागरण गान लि‍ख समर्पित कएलनि‍-
असम बंग पंजाब गुजरात जागल
अहीं टा पड़ल छी उठू औ अभागल।
समाजमे जागृति‍ उत्‍पन्न करबाक लेल हि‍न्‍दी साहि‍त्यमे जे स्‍थान दि‍नकर नेपाली, सुभद्रा कुमारी चौहान आ महादेवी वर्मा सन कवि‍-कवयि‍त्रीकेँ देल गेल अछि‍ ठीक ओहि‍ना आरसी बाबूक कि‍छु कवि‍ता जेना जन-जागरण, राष्‍ट्र गीत, युवाशक्‍ति‍, राग भारू, हाक, नि‍बोधन, ललकारा, क्रांति‍पूत आदि‍केँ पढ़ि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल हि‍नका देल जा सकैछ। मैथि‍ली मन्‍दि‍रमे शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ वैदेहीक संग-संग वि‍देह आ मि‍थि‍लाक वन्‍दनामे मातृत्‍वक सि‍नेह अवि‍रल लागल।
आन भाषा जकाँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक संग ई बि‍डम्‍वना रहल जे कवि‍ता सभमे अधि‍क ठाम रीति‍क आड़ि‍मे आसक्‍ति‍क रूप अवांछि‍त भेटैत अछि‍। सुमि‍त्रा नंदन पंत जकाँ मैथि‍लीमे नगण्‍य रीति‍ कवि‍ छथि‍-
मानस मंदि‍र मे सती, प्रि‍य की प्रति‍मा थाप,
जलती थी प्रि‍य वि‍रह मे बनी आरती आप।
मुदा सूर्यमुखीक कि‍छु पद्य जेना आसंगि‍नी, मनोरथ, मनक बात शीर्षक कवि‍ता सभमे प्रीति‍क आकुलता आ लावण्‍य स्‍त्रोत कवि‍ पंतसँ कनेको कमतर नै।
वि‍चार मूलक कवि‍ताक रचनामे आरसी बाबूक एकटा अलग स्‍थान छन्‍हि‍। सूर्यमुखीमे बहुरूपि‍या, वि‍भावना, आत्‍मज्‍योति‍, सत्‍यआस्‍वप्‍न, अछाह, जगजीवन, वि‍रोधाभास, मि‍थ्‍यापाथर, युगवोधक वि‍पति‍, अस्‍वीकृति‍क आयाम, आनंदक खुजल दुआरि‍ आ जीवन संध्‍या सन बहुआयामी वि‍चारमूलक कवि‍ताकेँ संकलि‍त कऽ पोथीक मर्यादा नि‍श्‍चि‍त रूपेँ बढ़ल। एक वस्‍तुकेँ प्राप्‍त करबाक आशमे कवि‍केँ कतेको बेर प्रयास करए पड़ैत छन्‍हि‍। क्षण भरि‍क तृप्‍ति‍क लेल सम्‍पूर्ण जीवनकेँ समाप्‍त कऽ देलनि‍। जकरा लेल लोक संसारक सुख-दुखकेँ कि‍छु नै बूझैत अछि‍ ओ कतऽ धरि‍ लोकक संग दैत छन्‍हि‍‍।
बहुरूपि‍या शीर्षक कवि‍तामे समाजक द्वैध नीति‍क अनमोल प्रदर्शन कएल गेल। ऐ कवि‍तामे समाजक अन्‍तर्द्वन्‍दक मध्‍य वि‍षम अर्थनीति‍केँ छायावादि‍तासँ झाँपि‍ आरसीबाबू रचनाकेँ अमरत्‍व प्रदान कऽ देलनि‍-
एक मंगल रूप मोहन रूप दोसर घोर
एक ि‍नर्मम बनि‍ कनाओल एक पोछय नोर
के एहन बहुरूपि‍या? के कऽ रहल अछि‍ खेल?
जान ककरो जाए, उत्‍सव खेल ककरो लेल।
वि‍चार मूलक कवि‍तामे दृष्‍टि‍क महत्‍व होइत छै, कि‍ओ एक रूप तँ दोसर आन रूपसँ देख सकैत छथि‍। उपरलि‍खि‍त पद्यकेँ बलि‍ प्रथा वा दोहरि‍ मानसि‍कता कोन रूपमे देखल जाए, एकर दृष्‍टान्‍त तँ आब असंभव......।
साम्‍यवादी वएह भऽ सकैत छथि‍ जि‍नकामे व्‍यथा हुअए, ओ व्‍यथा अभावक हो वा संत्रासक मुदा जे मात्र कलमे टा मे नै, नि‍त्‍य कर्ममे समग्र संसारकेँ आत्‍म सात् करवाक शक्‍ति‍ रखैत होथि‍। आरसी बाबूक जीवन सरल छलनि‍ तँए समाजक ओछ होथि‍ वा उच्‍च सबहक मानसि‍कतामे अभावक दर्शन करैत छलाह। कतहु जीवन जीवाक लेल साधनक अभावक दर्शन होइत छलनि‍ तँ कतहु साधनक प्राप्‍ति‍क लगातार प्रयास करबाक क्रममे असंतोष दर्शन-
डूबै अछि‍ देह मुइल सूर्यक प्रकाशमे,
शीशा केर भीत छेद आबै अछि‍ पासमे
अप्‍पन प्रति‍ वि‍म्‍व सँ अपनहि‍ टकराइ छी
धुआँ जकाँ बन्न घर मे हम औनाइ छी
हमरा सबहक लेल दुर्भाग्‍य अछि‍ जे मि‍थि‍लाक परि‍धि‍ कोशी, कमला, गंडकी, बागमती, बलान, करेह आ कि‍छु गंगा माएक हड़होरि‍सँ साओन मासमे तबाह हुअए प्रारंभ भऽ जाइत अछि‍। ऐ बाढ़ि‍क वि‍नाश लीलासँ मि‍थि‍लाकेँ प्राय: प्रति‍वर्ष भारी कलेषक सामना करए पड़ैत छन्‍हि‍। कवि‍वरक जन्‍म भूमि‍ समस्‍तीपुर जि‍लाक एरौत गाम बागमतीक कि‍छेरमे छन्‍हि‍ तँए ऐ वि‍षएपर लेखनी मूक कोना राखथि‍। बाढ़ि‍क हकरोस, सजल कुशल, वागमतीक धारमे आि‍द शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ जीवनक नाओं कतऽ लागत केर उद्घोष करैत छथि‍। बाढ़ि‍ हकरोसमे जनजीवन परेशान भऽ जाइत अछि‍। मुदा एक अर्थमे बाढ़ि‍ समाजक एकताक प्रतीक सेहो थि‍क-
एहन आपत्‍काल वि‍सरल वैरि‍यो अरि‍-भाव,
साप मूसक मि‍लन देखल रंक भेटल राव।
मात्र सभ जीवे टा एकत्रि‍त रहैत छथि‍, कि‍एक तँ सबहक साधन समाप्‍त भऽ जाइत छन्‍हि‍, प्राणकेँ तनमे रखवाक मात्र आशा तँए ककरोसँ कोनो द्वेष नै। ऐ वि‍षम परि‍स्‍थि‍ति‍मे आरसी बाबू बहुत बेरि‍ घेराएल छलथि‍, तँए राजधर्मसँ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ अवगत भेल हेताह-
खाली शुभकामनाक कोनो ने मानि‍,
उपछऽ मे लागि‍ गेला हाथे सँ पानि‍
तर्पण मे भीड़ल छथि‍, जूटि‍ कऽ कि‍सान
दाहर मे डूबि‍ गेल कुशलक सभ धान।
एक दि‍श प्रलयक भयंकर लीला मुदा दोसर दि‍स हमरा सबहक भौति‍कवादी दृष्‍टि‍कोणक प्रवृति‍मे चार्वाक दर्शनक अनुपालन आवश्‍यक तँए कवि‍ मर्माहि‍त छथि‍ जे भोजनक अभाव मुदा अय्याशीक साधनक लेल लोक सभ उद्यत छथि‍-
सान्‍त्‍वनाक हस्‍तलि‍खि‍त पोथी गलि‍ गेल,
पान एक ढोली ले गोली चलि‍ गेल....।

उछाह शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ दु:खक सागरमे गोता तँ लगा रहल छथि‍ मुदा कॅपैत छन्‍हि‍ आत्‍मा जे संसारमे दु:ख मुदा कतऽ जाएब।
अर्थावलम्‍वी संसारमे सभटा उनटा-पुनटा भऽ रहल अछि‍। वाचक चुप्‍प छथि‍ आ गोंग वाचाल बनवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। जगजीवन शीर्षक कवि‍तामे वि‍म्‍ब आ वि‍वेचन दुनू नीक मुदा ऐ कवि‍तासँ अपन जीवनकेँ नीरस मानएबला लोककेँ कोन प्रकारक चेतना भेटत? आरसीक अर्थ होइत अछि‍-दर्पण मुदा आरसी बाबूक ऐ कवि‍तासँ दार्शनि‍क केँ तँ अवश्‍य दर्शन भेटल मुदा अल्‍पज्ञ समाजकेँ मात्र छोह आ आकुलताक दर्शन भेटतनि‍ तँए ऐ कवि‍ताकेँ आरसी बाबू सन रचनाकारक अति‍साधारण प्रस्‍तुति‍ मानल जाए। वि‍रोधाभास शीर्षक कवि‍ता सेहो देशकालक दशासँ उबल मनुक्‍खक लेल कोनो अर्थमे प्रेरणास्‍त्रोत नै मानल जा सकैत अछि‍-
कतहु चैन नहि‍ पाबइ छै नर,
आशा तृष्‍णा शरसँ बेधल
एक फांस सँऽ जखनहि‍ छूटल,
दोसर मे तखने उद्बेगल।

ज्ञान झाक वि‍योग शीर्षक कवि‍ता कोनो व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेषकेँ ि‍नर्देशि‍त नै कए कऽ सरस्‍वतीक भंगि‍मामे जीवनक तादात्‍म्‍यकेँ झलकाबैत अछि‍। समए कालक दशापर वृति‍ चि‍त्र जकाँ लि‍खल गेल कवि‍तामे भ्रष्‍टाचार आ जाति‍ समाजक कुण्‍ठाक वि‍वरण प्रसंगि‍क मानल जा सकैछ। प्रेमक रूप जौं अनुशासि‍त हुअए तँ प्रेमी-प्रेमि‍काक चरि‍त्र आ वि‍चारकेँ नकारात्‍मक मानव उचि‍त नै। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ऐ वि‍षएपर बहुत रास कवि‍ता लि‍खल गेल अि‍छ मुदा सूर्यमुखीमे सन्नि‍हि‍त रूप-राशि‍ कवि‍ताकेँ कि‍छु आर अनुशासि‍त पद्यक श्रेणीमे राखब उचि‍त। कवि‍क दृष्‍टि‍मे प्रेमि‍काक देह चानन जकाँ, कंठ मुरली सन, करतल कि‍सलय सन, रूप दर्पण सन, आँखि‍ कालि‍न्‍दी सन आ छाँह चुम्‍बक जकाँ लगैत छन्‍हि‍। कवि‍ प्रेमि‍काक गामकेँ वृन्‍दावन जकाँ आ जइठाम प्रेमि‍काक चरण पड़ैछ ओइ भूमि‍केँ गोकुल जकाँ पवि‍त्र मानैत छथि‍। वास्तवि‍क जीवनमे अारसी बाबू पवि‍त्र आचरणक व्‍यक्‍ति‍ छलाह तँए व्‍यक्‍ति‍गत जीवनमे भऽ सकैछ जे अपन अर्द्धांगि‍नीक प्रति‍ समर्पित कवि‍ता लि‍खने होथि‍ वा समाजक लेल प्रेम संदेश सेहो ऐ पद्यकेँ मानल जा सकैछ। राग लय आ गति‍मे महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क पद्य सबहक कोनो तुलना नै भऽ सकैछ मुदा नीक लागल जे आरसी बाबूक दू गोट पद्य वि‍द्यापति‍क पदावलीमे सन्नि‍हि‍त गीत जकाँ सूर्यमुखीमे लि‍खल गेल अछि‍- हरि‍गीति‍का आ अनुराधा दुनू पद्य विद्यापति‍क रचनाक छाँह जकाँ लागल। अनुराधा तँ राग भैरवीमे महाकवि‍क लि‍खल बहुत रास कवि‍तासँ मि‍लैत अछि‍।
मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे गजल नाअों सँ तँ बहुत कवि‍क बहुत रास पद्य लि‍खल गेल अछि‍ मुदा जौं श्रंृगार रसकेँ सरावोरि‍ कऽ गजल वनएबाक चर्च कएल जाए तँ अारसी बाबू रचि‍त गुलाबी गजल केँ एकटा अलग स्‍थान देल जाए। गजलक पाँति‍-पाँति‍मे वि‍म्‍ब अलग-अलग होइत छैक। तँए परि‍धि‍ नि‍श्‍चि‍त नै। गुलाबी गजल पढ़लाक वाद ई भम्र दूर भऽ गेल जे एकटा प्रेमीकेँ अपन प्रेमि‍काकेँ समर्पित कएल गेल अछि‍। चूॅकि‍ कवि‍ अपन सि‍नेहीसँ अलग-अलग दि‍वसक रूप सरि‍ताक चर्च करैत छथि‍ तँए ऐ पद्यकेँ कोनो पति‍केँ अपन पत्नीक प्रति‍ परम सि‍नेह भरल उद्वोधन मानल जा सकैछ। वसंतक नहुँ-नहुँ शीतल वयारसँ प्रेमि‍का मोन आ अंग-अंग फूलल गुलाव जकाँ भऽ गेल अछि‍। वि‍नु ि‍नसा ग्रहन कएने कवि‍ उन्‍मत्त छथि‍, अपन प्रेमि‍का वा वामाक रूप फण बढ़ाएल सर्प जकाँ लहलहाइत देखाइत छन्‍हि‍। वास्‍तवमे फागुनक रंगसँ आरसी रंगा गेल छथि‍। 1981ई.क होली वि‍शेषांक (मि‍थि‍ला मि‍हि‍र) मे ई कवि‍ता छपल छल। कवि‍क मोन कहि‍ओ वृद्ध नै भऽ सकैत छै तँए ने कवि‍ अपन अर्द्धांगि‍नीसँ कहैत छथि‍- कतहु ने जाउ भरि‍ फागुन हमरे लग रहू।‍ वास्‍तवमे आरसी बाबू ककरा मुखसँ कि‍नका प्रति‍ समर्पित ई गजल लि‍खलन्‍हि‍ ई प्रश्‍नवाचक चि‍न्ह रहि‍ गेल। मात्र एतवे मानल जाए जे सामाजि‍क जीवन आ पारि‍वारि‍क मर्यादासँ बान्‍हल आरसी गृहस्‍थ धर्मक कि‍छु रूपकेँ सदि‍खन अपन लेखनीसँ स्‍पर्श करैत रहलाह।
कि‍छु पद्यक वि‍षएमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अखनो मतैक्‍य नै। ओइमे सँ एक- वि‍रहमासा‍ अछि‍। सामान्‍य रचनाकार ऐ प्रकारक पद्यकेँ बारहमासा लि‍खैत छथि‍ आ वर्ख भरि‍क प्रेमि‍काक वि‍रहवेदनाक वर्णन करैत छथि‍। परंच वास्‍तवमे वारहमासा नै भऽ कऽ एहेन पद्य वि‍रहमासा थि‍क। वि‍रहि‍नी जतेक मास धरि‍ पति‍क वि‍योगमे ि‍वलग छथि‍ मात्र ततेक मासक चर्च कएल जाए। कवि‍ मधुपक वि‍रहमासा तँ कतहु पाॅच-छ: मास तँ कतहु वर्ष धरि‍ लि‍खल गेल। सूर्यमुखीमे देल गेल वि‍रहमासा काति‍कसँ लऽ कऽ आसि‍न धरि‍क प्रेमि‍काक वेदना थि‍क। शब्‍द-शब्‍दमे स्‍वत: मर्मस्‍पर्शी झंकार, मुदा एकटा कमजोर पक्ष जे वर्ख भरि‍क वेदनामे कार्ति‍कक पश्‍चात् अगहनक चर्च तँ कएल गेल मुदा तकरा बाद मूस माध लुप्‍त। फागुनक पश्‍चात् सोझे जेठ मासमे कवि‍ प्रवेश कऽ गेलनि‍। अषाढ़क चर्च आरसीक मोनेमे रहि‍ गेलनि‍। वि‍रहक सभसँ हि‍लकोरि‍ भरैबला मास भादवक ऐ पद्यमे कोनो प्रयोग नै कएलनि‍। तँए वि‍रहमासाकेँ पूर्ण नै मानल जा सकैत अछि‍। जौं मात्र छ: मासक चर्च करवाक छलनि‍ तँ लगातार करवाक चाही, सम्‍पूर्ण सालकेँ छ: मासमे समेटब उचि‍त नै लागल।
कवि‍ कोनो राजनेता नै जे गरीवी भगेबाक योजना तैयार करथि‍ मुदा लेखनीसँ प्रगती शीर्षक पद्य लि‍ख गरीबी दूर करवाक कल्‍पना अनुखन लागल। वचनि‍का, उपराग, ि‍दलासा, मुइल सती, परि‍पाटी, ज्‍योति‍वरण, ललि‍त स्‍मृति‍, ऋृतुराज दर्शन, असीम आहवान, अर्थीक अर्थ, संक्रान्‍ति‍ आदि‍ कवि‍ताक माध्‍यमसँ ई ज्ञात होइत अछि‍ जे कवि‍ आरसी कोनो योजना बना कऽ कवि‍ता नै लि‍खैत छलाह, कवि‍त्‍वक संचार हि‍नक कण-कणमे व्‍याप्‍त छलनि‍ यएह कारण जे आधुनि‍क मैथि‍लीक सर्वश्रेष्‍ठ आशुकवि‍क श्रेणीमे आरसीक स्‍थान वि‍लक्षण मानल जाए। आरसी वीसम सदीमे रहि‍तहुँ भूतकालमे प्रवेश कऽ कखनो-कखनो कवि‍ता लि‍खैत छलाह, जकर प्रत्‍यक्ष प्रमाण दोहा दोहन कवि‍ता थि‍क। जइमे 12 गोट दोहा लि‍खल गेल अछि‍। कवीर, रहीम जकाँ समए कालक दोहा सभमे वर्त्तमान कालक कलुषि‍‍त मनोवृत्ति‍क वि‍वि‍ध रूप चि‍त्रण ऐ सभमे भेटैत अछि‍-
पोथी पढ़ि‍ कि‍छु हैत ने, तोड़ऽ चाही रोट,
जोड़ू नोट बकोटि‍ कऽ भोट बटोरू मोट
अस्‍पताल सँ नीक अछि‍ हमरा लगै पताल
कालक ओतऽ अकाल अछि‍ काल एतऽ तत्‍काल।

दीपक दर्प आ नव पढ़ुआक संग-संग 36 गोट मुक्‍त मुक्‍तावली सभमे कवि‍ताक वि‍वि‍ध धाराक ऑचलमे कवि‍ समाजक लेल कि‍छु नव आ वहुआयामी दृष्‍टि‍कोण उत्‍पन्न करए चाहैत छथि‍। कखनो कवि‍ बाढ़ि‍क पसाहीमे पानि‍सँ तबाह छथि‍ तँ लघुकवि‍ता पानि‍ मे जल-महि‍मा क गुणगान करैत छथि‍-
पानि‍ वि‍ना नहि‍ धानक जीवन,
मोतीक रूप न पानि‍ बि‍ना
पानि‍ वि‍ना नहि‍ चूनक रौनक
शोभि‍त भूप न पानि‍ बि‍ना......।।

एवं प्रकारे आरसीक सूर्यमुखी मात्र सूर्येटा केँ नै दर्शन करैत छन्‍हि‍, अइमे सम्‍पूर्ण मानवताक लेल वि‍वि‍ध वि‍षएक दृष्‍टि‍ समाहि‍त अछि‍। मैथि‍लीक लेल दुर्भाग्‍य जे जनि‍क कवि‍ताक अर्थ कि‍ओ नै बूझए ओ मंचपर ज्ञानक शेखी छॅटैत छथि‍, आ आरसी सन आशुकवि‍केँ अखन धरि‍क कथाकथि‍त ि‍कछु समाज जेना-तेना कवि‍ स्‍वीकार कएलकनि‍। वास्‍तवमे जौं दृष्‍टि‍केँ हृदएसँ जोड़ि‍ सूर्यमुखी पढ़ल जाए तँ स्‍पष्‍ट भऽ सकैत अछि‍ जे ई मैथि‍लीक सर्वश्रेष्‍ठ कवि‍ता संग्रह थि‍क।

पोथीक नाआंे- सूर्यमुखी
प्रकाशक- मैथि‍ली अकादमी पटना
प्रकाशन वर्ष- 1981
रचनाकार- आरसी प्रसाद सि‍ंह

बिपिन झा- यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy
यान्त्रिक अनुवाद आ Polysemy
बिपिन झा
IIT Mumbai,

पछिला अंक सऽ आगू-

पोलीसेमी अर्थात नानार्थी मूलतः निओ  लैटीन पोलीसेमससऽ लेल गेल अछि। पोलीक अर्थ होइत अछि बहुत आ सेमी केर अर्थ होइत अछि चिह्न। एवम्प्रकारें पोलीसेमी नानार्थक शब्द कें द्योतित करैत अछि। उदाहरण हेतु ई वाक्य कें देखू-
आब साँझ भय गेल।
एहि में साँझ पद विभिन्न सन्दर्भ में विभिन्न अर्थ दैत अछि
·         चरवाहा सभ लेल मालजाल के गोशाला लय जेबाक बेर
·         विद्यार्थी हेतु पढबाक समय
·         चोर हेतु चोरी करबाक समय
·         दीपदेनहारि के दीप देबाक समय
एहि तरहे अनेक शब्द एहि तरहक अछि जेकर भिन्न-भिन्न अर्थ होइत छैक।
  नानार्थकता मानवमात्र के अर्थनिर्धारण में परेशानी कय दैत छैक। किन्तु मानवीय ज्ञानसीमा  केर कारण एकर निराकरण भय जाइत छैक। ओतहि संगणक हेतु त ई विशेष परेशानी उत्पन्न करैत छैक। एकर उदाहरण गूगल केर यान्त्रिक अनुवाद क्रम में देखि सकैत छी।
आब प्रश्न अछि जे एकर समाधान की अछि? एहि सन्दर्भ में अनेकानेक प्रयास भेल जाहि में  Bar-Hillel (1964), Katz एवं Fodor (1963) आदि केर प्रयास महनीय रहल। Katz एवं Fodor केर निबन्ध 'A Theory of Semantic interpretation' केर योगदान महत्त्वपूर्ण रहल।  Kelly and Stone (1975) १९७० धरि अपन ३० टा शिष्यक संग ६७१ टा शब्द के चयन कय अलगोरिद्म तैयार कयलथि।

नानार्थी शब्दक झंझट सं मुक्त हेबाक एकटा उपाय ई भय सकैत अछि जे-

नानार्थी शब्दक सूची बनय
ओकर विविध अर्थ देलजाय
एकटा प्रोग्राम बनय जे नानार्थी के चिह्नित कय सकय
संगहि विविध अर्थ देखा सकय
एहेन अल्गोरिद्म बनय जे यथासम्भव ई समस्या दूर कय सकय

आशा अछि जे उक्त प्रक्रिया लाभदायक होयत। यदि पाठकवर्ग के कोनो अन्य विचार हो एहि समस्या केर समाधानक त अवश्य सूचित करथि।

(लेखक एहि विषय पर IIT Bombay मे अनुसंधान कय रहल छथि)

सुजित कुमार झा
कथा
भौजी


सार्वजनिक पुस्तकालयक बोर्डपर नजरि पड़िते राधाक हृदयक गति एना भऽ गेलन्हि, जेना कोनो मशीनक ईन्जिन चलैत होइ ।
ओ डेरायले नजरिसँ भौजीकेँ देखलन्हि । राधाकेँ डर रहन्हि, कहीं हृदयक धकधकी भौजी नहि सूनि लैथ ।
राधा पुरा एक महिनाकेँ बाद आइ पुस्तकालय आयल छली । आईएस्सी परीक्षाक तैयारीमे व्यस्त भेलाक कारण मास दिन पुस्तकालय नहि आबि सकल छली । काल्हि परीक्षा समाप्त भऽ चुकल छल । भौजीकेँ आदेश रहन्हि जाधरि परीक्षा समाप्त नहि हैत ताधरि पढा
Þइक अतिरिक्त किछु नहि । राधा सेहो पढाÞइकेँ प्रति पुरे समर्पित रहयकेँ प्रयत्न कएली । मुदा मन तैयो बेरबेर पुस्कालयकेँ लगपास मडराइत रहैत छलन्हि ।
राधा देखलन्हि, भौजीकेँ चालिमे थोड़ेक गति आएल अछि । मुदा ओ जानि बुझि कऽ ओही गतिमे चलैत रहली, जाहिसँ भौजीसँ थोड़ेक पाछु रही आ मौका भेटिते एक नजरिहुनका देखली, जकरा लेल ओ मास दिनसँ प्रतिक्षा करैत रहल छली । हुनका विश्वास छलन्हि, ओ आइयो ओही गाछ तर नयन बिछौने हुनकर प्रतिक्षामे ठाढ़ हैत । ताहि विश्वासँ मनक सितार झन झना रहल छल ।
मुदा गाछपर नजरि पड़िते हृदयक रोमाञ्च करपूरक गोटी जेकाँ उड़ि गेल आ मनमे कतेको आशंका आ बिचार हिलोरि मारय लगलन्हि । ओ ओतय नहि छल । किए ? भऽ सकैत अछि एक महिनासँ राधाकँे नहि अएलासँ हुनका प्रति निराश भऽ गेल होइक । इहो भऽ सकैत अछि की कही विमार भऽ गेल होइ ।
६ महिना पहिने भौजी एहि पुस्कालयकेँ सदस्यता लेने छली आ तहियेसँ राधा सेहो भौजीसं पुस्तकालयमे आवय लागल छली । एक दिन ओ युवक अहि गाछक निचा ठाढ़ देखाइ देने छल । आ ताहिकँे बाद तऽ दिनचर्या बनि गेल छलै । आकर्षक व्यक्तित्वक धनी ओ पहिले नजरिमे राधाकेँ प्रभावित कएने छल ।
मौन प्रेमक प्रस्ताव राधाकेँ हृदयमे बैस गेल छल ओ युवक ।
राधा आ भौजीकेँ संगेसंगे देखि ओ थोड़े संकुचित भऽ चोर दृष्टिसँ क्रमशः राधा आ भौजीकेँ देखैत रहैत छल जे कखनो राधाक नजरि पड़ि जाइत तऽ ओ युवक अपन दुष्टि दोसर दिश घुमालैत छल । एक महिनासँ ओहि युवककेँ देखबाक कौतुहलता आ ओकरा भेटाबाक विश्वास, मुदा सुनसान ठाढ़ ओहि गाछकेँ देख असहय पीडा
Þ भेल राधाकँे । आइ ओकरा ओतय नहि होएब राधाकेँ लेल कोनो आघात सँ कम नहि छल । हृदयक टीस आँखिमे नोर बनि छलछलाय लागल रहैक मुदा ओहि नोरकेँ पिव कहुना अपना पर काबु कएलन्हि आ अपन बेदनाकँे उजागर नहि होबय देलैथ । सहज होबएकँे कोशिस करैत भौजीकँे पाछुपाछु पुस्तकालयमे प्रवेश कऽ गेली ।
भौजी पुस्तक फिर्ता कऽ अलमारीमेसँ दोसर पुस्तक खोजय लगालथि । राधा सेहो पुस्तक खोजवाक अभिनय करय लगली, मुदा हुनक मनोभाव त.....।
राधा, राजकमल, गोविन्द झा, रामानन्द रेणुकेँ सम्पूर्ण किताब हम पढि चुकलौ आब डा. धीरेन्द्रकेँ पढबाक इच्छा अछिभौजी डा. धीरेन्द्रकेँ कविता संग्रह हैगरमे टांगल कोटकेँ अपन हातमे उलटबैत कहली तऽ राधा चुप भऽ एक मौन स्वीकृति दऽ देली ।
अहाँ डा. धीरेन्द्रकँे पढ़ि रहल छी ?’ अनायसे एक अपरिचित युवककेँ स्वर सुनि राधा आ भौजी एक्कहि संग पाछा घूमि देखलथि तऽ राधाकँे आश्चर्य आ रोमाञ्च एक्कहि सँग झक्झोरि देलकन्हि आ अपलक ओ देखिते रहि गेली ।
हाथमे पुस्तक लेने उएहे युवक ठाढ़ छल । ई लऽ लिअ, डा. धीरेन्द्रकँे उपन्यास छन्हि, ‘भोरुकवाविद्वान सभक कहव छैक एकरा जतेक बेर पढू ततेक नव बात भेटतओ बाजल ।
आगा भौजी ठाड़ रहथि तएँ भौजीए ओ पुस्तक हुनका हाथ सँ लेलन्हि । राधा अपन प्रसन्नता नुकेवाकमे जेना असमर्थ भऽ रहल छली, अपनाकँे सामान्य करबाक हेतु भौजीकँे हाथसँभोरुकवाकितावकँे झपटि लेली आ बहुत तेजीसँ पन्न उल्टाबैत अपन मनोभाव कँे रोकबाक प्रयास करय लगली । तखने हुनक नजरि एक मोडल कागतपर पड़लन्हि जे पुस्तककेँ भितरमे छल ओ नजरि उठा कऽ युवक दिश देखली, मुदा युवक तऽ पुस्तकालयसँ बाहर जाइत छल ।
भौजी पुस्तक राधाकँे हाथसँ लऽ ओकरा अपना नामसँ जारी करबा लेली ।
घर घुरैत काल राधा अपन भितरमे एक प्रकारक घवराहट अनुभव करैत रहली । हुनका विश्वास छलन्हि, पुस्तक भित्तर राखल ओ मोड़ल कागतमे हुनका लेल कोनो संदेश छिपल छल । हुनका भय रहन्हि यदि तेजतर्रार भौजी ओकरा देख लेती तऽ की हैत ?
ओना राधा पर आंच आएबाक कोनो संभावना नहि छल । हुनका विश्वास छलन्हि की ओइ पर हुनका लेल कोनो सम्बोधन नहि हैत कारण ओ युवककेँ राधाक नामो नहि बुझल छन्हि । यदि भौजी ओइ कागजकेँ देखबो करती तऽ सन्देहकेँ तऽ कोनो प्रश्ने नहि अछि ।
राधाक मोन तऽ इएह चाहि रहल छल, की भौजीकेँे हाथसँ पुस्तक ली, मुदा हुनका इहो सोचि भय भऽ रहल छल की यदि भौजीकेँ सन्देह भऽ गेलैन्हि की ? ओ धीरेसँ भौजी दिस देखली, जे पुस्तककँे दहिना हाथमे धएने राधाकँे सोचसँ बेखबर आगा बढि रहल छली ।
घर पहुँचला पर राधा आओर बेसी व्यग्र भऽ गेल छली । सोचि रहल छली जे कोनो तरहे पुस्तक हाथ लागि जाय तऽ पता चलत हुनक सोच सही छैक वा मात्र भ्रम भऽ गेल अछि ।
भौजी कँे प्रकृति कनी गम्भीर छन्हि आ ओ अपन प्रत्येक क्रियाकलापकेँ सीमा तय कऽ कऽ रखने छथि, जेकरा ओ नहि स्वंय उल्लंघन करैत छथि आ नहि केकरो द्वारा कएलगेल सहन करैत छथि । आवश्यकता सँ वेसी हँसी मजाक हुनका कनिको पसिन नहि छन्हि । ओना इ नहि छैक जे हुनकामे इ परिवर्तन भैऐकँे मरलाक बाद एलन्हि अछि । ओ पहिनहि सँ एहने छथि ।
विवाहक २ महिनाकँे बाद भैयाक मोन खराब भेल रहन्हि । भैयाकेँ दिनदिन देह गलल जाए लगलन्हि । धरान लऽ जाए पड़लन्हि, ओतय डाक्टर कहलन्हि, ‘ब्लड क्यान्सर भऽ गेल छैक ।
जाहिया तक भैया जिवित रहलाह भौजी सदैव इएह प्रयास कएलन्हि, की हुनकर जीवनमे कोनो प्रकारक अभाव नहि रहैक । भैयाकँे रेखदेख ओ स्वंय करथि । साँझखन भैयाकेँ घुमाबय लजाथि । पहिनेपहिने तऽ भैया पैदले चलथि, मुदा किछुए दिनक बाद आशक्त भऽ गेलापर भौजी हुनका ब्हील चेयर पर लऽ जायकँे शुरु कऽ देलन्हि । भौजी भैयाकेँ सन्तुष्टीकँे लेल हरेक समय मुस्कुराइत रहैत छली मधुर आ स्नेहिल शब्दकँे वर्षा कऽ हुनकर पीडा
Þकँे हरि लेवाक लेल प्रयास करथि । राधा अपन माय बावुकेँ संगे स्तब्ध भऽ ओ सशक्त महिलाकेँ तकैत रहि जाइथि जे दुःखक अथाह समुद्रकँे सामने पाबि कऽ सेहो भैयाक हेतु मुसकुराइत आगा बढि रहल छली । मुदा भैयाक शरीरसँ प्राण निकलिते भौजी पस्त भऽ गेली ।
दुःखक असीम पीड़ा सँ छटपटाइत भौजीकेँ सम्हारयमे सभ असमर्थ भऽ रहल छल । कनैत कनैत अन्ततः भौजी बेहोस भऽ गेल छली ।
भैयाक मरलाक बाद भौजीकँे बाबु भऽ गेल रहथिन बाबुजी, ससुर नहि । ओ अपन कमजोर कन्हा पर भौजीकेँ जिम्मेवारी उठा लेलन्हि । बड़का भैया आ भौजी जे काठमाण्डूमे रहैछथि, ओ बाबुजीकँे आगा प्रस्ताव राखने रहथिन की ओ, भौजीकँे अपनासंग लऽ जाऽ चाहैत छथि मुदा बाबुजी साफसाफ मना कऽ देने रहथि । हुनका लेल राधा आ पुतौहुमे कोनो अन्तर नहि छल ।
भौजीक वेदना कम करबाक उद्देश्यसँ बाबजुजी भौजीकँे पुस्तकसँ मित्रता करबाक सल्लाह देने रहथिन्ह ।
बेटी पुस्तकसँ बढिया आओर कोनो मित्र नहि भऽ सकैत अछि । ओइमे हरेक समस्याकँे निकास सेहो भेटि सकैत अछि । पुस्तकसँ जतय हमरा संकटसँ जुझयकेँ प्रेरणा मिलैत अछि, ओतहि ओहिमे हरेक समस्याकेँ समाधान सेहो भेटैत अछि । मन उदास अछि तऽ व्यङ्ग रस पढि ली, किछुवे देरमे हँसयकेँ लेल विवस भऽ जायव । यदि पुस्तक सँ प्रेम भऽ जाय तऽ जीवय असान भऽ जाएत ।
बाबुजीक उपदेश भौजीकँे पुस्तक प्रेमी बना देलकन्हि । भौजी सार्वजनिक पुस्तकालयकँे सदस्यता लऽ लेली हुनकेँ संगे रहि कऽ राधामे सेहो पढय
Þकँे शौख जागि गेलन्हि आ ओ सेहो पुस्तकालय जाय लगली ।
भौजी कहियो कोनो पुस्तक पढ़य सँ अकछाइत नहि छली बरु, जे पुस्तक पढय शुरु करैत छली ओकर एके बैसारमे पढ़ि जाइत छली । बाबुजी तऽ किताबी कीडा छलथि । अई दुआरे भौजी बाबुजीसँ ओइ पुस्तकपर विशेष रुपसँ परिचर्चा करैत छली । कहियो ओ लेखककँे दूरदर्शिता पर अचम्भित भऽ कऽ ओकर लेखन शैलीकँे सराहना करैत तऽ कहियो लेखककँे विचारसँ कुंठित भऽ ओकर तीव्र आलोचना करथि ।
घरमे भौजीकँे बेसीसँ बेसी ध्यान राखल जाइक । भौजी स्वयं कहियो अपन साउस, ससुर वा राधाकँे भावनाकँे अपमान नहि कएने छली । घरक पुरा जिम्मेवारी उठा रखने छली । कहियो माँ भौजीकँे कर्तव्यनिष्ठासँ गौरवान्वित होइथि तऽ कहियो हुनकर उज्जर आँचरकेँ देखि चुपचाप नोर बहालैत छली ।
राधाकेँं एतेक साहस नहि छलन्हि की ओ भौजीसँ मजाक कऽ ली अन्यथा ओ अवश्य ओहि पुस्तककेँ छिन लितथि ताकि कोनो तरहे ओइ कागतकेँ पुस्तकमेसँ निकालि एकान्तमे पढि आश्वस्त भऽ सकती । एखन ओना किछु करव सम्भव नहि छल ।
राधा बरन्डामे चलि अएलि । माँ आ बाबुजी बड़का भइयाकेँ ८ वर्षीय पुत्रकँे लेवय काठमाण्डू गेल छलथि । भौजीकँे बच्चासँ बहुत लगाव रहैत छलन्हि । ताहि दुआरे ओ सदैव छुट्टी शुरु होइते माँ बाबुजीसँ आग्रह करैत की ओ काठमाण्डू जाथि आ बड़का भइयाकँे बच्चाकँे लऽ कऽ आबथि अहि सँ बेसी किछु नहि । भौजीकँे इच्छा रखबाक हेतु माँ बाबुजी काठमाण्डू गेल रहथि ।
राधा’, अचानक भौजीकेँ अवाज सुनि कऽ राधा चौक पड़ली । अहि पुस्तककेँ हम पढि लेने छी अहाँ, चाही तऽ पढि सकैत छीभौजी बरन्डामे राखल टेबुलपर पुस्तक रखथि कहलथि, आ तेजीसँ भितर घुमि गेलथि ।
भोरुकवाकँे पुनः अपन समिप पावि राधाकँे हृदयक धडकन कँे गती बढैत चलि गेल । ओ झपटि कऽ पुस्तककँे उठा लेली आ तेजीसँ पन्नाकँे उलटावय शुरु कऽ देली, किताबक बिचमे मोडल राखल कागज ओहिना नजरि आएल ।
राधा ओकरा खोलि पढ़य लगली । हुनकर अनुमान सही छल । ओ प्रेम पत्रे छल आ सम्बोधन सेहो मोहक आ आश्चर्यजनक छल ।
सुनु
हम काल्हि साँझ ६ बजे रंगभूमि मैदानमे अहाँकँे प्रतिक्षा करब । आशा अछि, अहाँ अवश्य आएब ।
राजन ।
राधा क्षणभरिकँे लेल ओइ पत्रकँे अपन छातीसँ लगा लेली । फेर ओइपत्रकँे निचा लिखल नामकेँ चुप्पेसँ चुमलाक बाद मनकेँ कठोर करैत पत्रकेँ टुकरा टुकरा करैत सड़क पर फेक देली ।
ओहि राति भावना आ विचारक बीच उड़ान भरैत रहली राधा, आँखिसँ निन्न पुरा हेरा गेल रहन्हि ।
दोसर दिन साँझ ६ बजे, रंगभूमि मैदान जायब उचित हैत की नहि, जाएब तऽ की कहबै, ओ की कहता । कखनो माँ, बाबुजी आ भौजीकँे की कहवै एहने सोचमे ओ क्षणभरि कँे लेल सेहो नहि सुति सकली ।
यदि गेलौ तऽ भऽ सकैत अछि राजन हुनका एक अवारा लड़की सम्झय लागय जे एकबेर बजविते भागिते चलि अबैत अछि आ यदि नहि गेलौ तऽ सम्झय नहि लगथि जे राधाकँे हुनका कोनो लगावे नहि छन्हि आ ओ अपना लेल कोनो.....।
राजन विना किछु कहने राधाकेँ हृदयमे अपन स्थान बना लेने छल ।
वितल कए महिनासँ राधा अपन अन्तर मनमे राजनकँे लेल एक निश्छल स्नेहकँे अनुभुति कऽ रहल छली । राजन अपन प्रतिक्षा सँ ई सिद्ध कऽ देने छल, की राधा हुनका लेल बहुत महत्व रखैत होइ आ ओहीक परिणाम छल हुनक प्रति सम्वेदनशील रहयबाली राधाकँे हृदय राजनकेँ पक्षमे निर्णय लेलक ।
राजनसँ भेटबाक निर्णय लेलाक बाद राधाकँे किछु शान्ति भेटलन्हि, मुदा रंगभूमि मैदान तक जायकँे लेल भौजीकेँ आदेश आवश्यक छल । पता नहि भौजी मानती वा नहि, फेर कही खिसिया कऽ मना नहि कऽ दैथ ।
माँ काठमाण्डू गेल छली नहि तऽ राधा माँ सँ कोनो ने कोनो तरहे जायकेँ आदेश मांगि लितथि, मुदा की अनुशासन प्रिय आ अपन जिवन शैलीकँे शालिनताक भितर बान्हि कऽ राखयवाली भौजी अहि तरहे हुनका कोनो युवक सँ भेटवाक आदेश देती ?
दुपहरियामे खायकेँ टेबुलपर भौजीकेँ संगै बैसैत राधा ई निर्णय लेली की भौजीकँे निसंकोच अपन मनक बात बतादेती आ यदि भौजी तमसा जेती तऽ तत्काल अपन गल्तीकेँ लेल क्षमा सेहो मांगि लेती । भौजीकेँ बतौने विना जायब संभव नहि छल ।
अतः ओ भौजीसँ आदेश लेवयकेँ लेल उचित शब्द खोजिए कऽ रहल छली की अनायसे भौजी पुछि बैसली राधा, अहाँसँ किछु पुछय चाहैत छी ?’
जी भौजी
अहाँ ओ पुस्तक भितर लिखल पत्रकँे पढ़लियै अछि ?’
जी, राधा ई जान्हि कऽ चौंक गोली की भौजी सेहो पत्रकँे पढि लेने छली ।
जी हँ, ओ डराइते उत्तर देली ।
अहाँकेँ नजरिमे राजन केहन छथि ?’
जी, राधा पुनः चौंक गेली आ थरथराइते स्वरमे मात्र एतवे कहि सकली ठीके छैक ।
फेर तऽ अहाँकेँ नजरिमे कोनो खरावी छैक राधा ?
नइनइ ठिक नहि बहुत निक छैक, कहि राधाकँे मुँहसँ ई शब्द सुनि भौजीकँे चेहरा... आ राधा सेहो... पहिने कहियो भौजी आ राधा एहन विषय पर चर्चा नहि कएने छली, इएह कारण छलैक जे दूनुकँे चेहरापर संकोच आ लज्जाकँे एक्के तरहक भाव छल आ राधाकँे हालत तऽ एहन छलन्हि जे ओ माथ झुका कऽ बैसयकेँ लेल विवश छली । भौजीकेँ चेहराकँे ध्यानसँ देख कऽ, हुनकर मनोभावकेँ सही अन्दाज लगायबमे असमर्थ भऽ रल छली ।
किछु दिन अहाँ पुस्तकलय नहि अएलौ, तखन ओ हमरा सँ गप्पो कएने रहथि । हुनकर गप्पसँ ओ भ्रद आ बुद्धिमान छथि से बुझाएल ।
जी, राधा चुपचाप सुनैत रहली ।
राधा, आइ अहाँ रंगभूमि चलि जाउ ।
जी.., राधाकँे विश्वास नहि भऽ रहल छल, जे भौजी एतेक सहजतापूर्वक जाए देती ।
हँ, राधा, हम अपना हिसाबे हुनका परखि लेने छी मुदा अहाँक राय सेहो बहुत आवश्यक अछि । अहि विषय पर बाबुजीसँ अहीकेँ बात करय परत । ओना अहाँ हुनको सेहे कहबन्हि जे जल्दीबाजी मे निर्णय नहि लैथ । खुब सोचि बिचारि कऽ निर्णय लैथ । अपना घरक लोकसँ सेहो गप्प कऽ लैथ एना नइ होइ जे......।
जीराधा माथ झुकौने भौजीकेँ बात सुनि रहल छली ।
हम जनैत छी राधा की अहिकेँ ई सभ बड़ उटपटांग लगैत हैत । हँ की नहि ? हम स्वाभिमानी, कर्तव्यनिष्ट आ शालिन तऽ छी, मुदा रुढीबादी नहि छी । हमरा लगैत अछि प्रत्येक महिलाकेँ अपन जिवन पर पूरा अधिकार होइत छैक । रुढीवादी परम्पराकेँ चादरि ओढि कुहरैत पुरा जिवन जिवाक की औचित्य ? तएँ अहाँ हुनका परखु आ यदि अहाँकँे ओ बढियाँ लगाथि तऽ विना संकोच विना हिचाकिचाहट अहि विषयपर माँ आ बाबुजीसँ बात करब । सभ बात अहिकेँ करबाक अछि कहि कऽ भौजी अपना रुम दिस चलि गेली ।
राधाकँे मोन खुशी सँ नाचय लागल । भौजी हुनका पसिनक बात कहि हुनकर मनोवलकँे आओर बढा देने रहथि । आब भौजीकँे आदेशानुसार हुनका परखयकँे मात्र छलन्हि ।
साँझ खन राधा निर्धारित समय सँ किछु पहिने तैयार भऽ रंगभूमि पहँुच गेली मुदा ओहु सँ पहिने राजन रंगभूमि मे बेचैनी पूर्वक इम्हर ओम्हर घूमि रहल छल, देख कऽ राधा एकटा गाछक पाछा नुका गेली आ हुनका देखय लगली । कढ़ाहिदार कुर्ता आ पाइजामा पहिरने आन दिनसँ बेसी आकर्षक लागि रहल छल । हुनकर नजरि प्रतिक्षासँ व्यग्र चारुभर ताकि रहल छल । कायबेर घुमितेघुमिते ओ रुकि गेला । झुकि कऽ जमिनसँ एकटा दूभि उपर उखारि लैथ आ ओकरा धीरेसँ कनि दाँतमे दबालथि आ घुमा कऽ हाथमे नचावय लगथि आ फेर वएह प्रतिक्षा..... ।
इ उपक्रमकँे कतेको बेर चलैत देखलाक बाद अपन भावनाकँे संयम रखबाक प्रयास करैत राधा धीरेसँ राजनकेँ सोझा आबि ठाढ भऽ गेली । लाजे मूड़ि गोतने पएरक अंगूठासँ जमिन खोदय लगली । ओ चाहियो कऽ अपन माथ उाठ कऽ हुनका दिस नहि देखि पावि रहल छली । मनमे एकटा उदवेग, समाजक लोक लाज, इहो पहिलबेर.... । अहाँ..... अहाँ एतय कोना ? आश्चर्यसँ भरल हुनक ई प्रश्न सुनि कऽ राधा चकित होइत अपन मुँह उठेलन्हि तऽ राजनकेँ चेहरा पर आश्चर्यक भाव देख ओ स्तव्ध रही गेली । राजन, ‘ओ नहि अएली ? अहाँक भौजी ......।
राधा नहिमे मँुह हिला देली ।
किए ?’
ओ हमरे पठा देलन्हि । ताकि हम हुनका अपन राय दऽ सकियन्हि ।
ओह.....किछु झुंझुलाहट भऽ रहल मुदा शान्त स्वरमे ।
की ५
÷६ भेटघाटक बाद ओ स्वंय कोनो राय नहि बना सकली ? देखु राधाजी अहाँकेँ अएने हमरा कनियो खराव नहि लागल अछि, मुदा पहिलबेर हुनका बजेवाक कारण महत्वपूर्ण बात छल । आइ हुनका सँ एहन बात कहितियन्हि, जाहि सँ हुनका बहुत खुशी होइतन्हि से ओहि खुशी देखय सँ हमरो बञ्चीत होवय परि रहल अछि ।
की ओ बात हमरा नहि बताओल जा सकैत अछि ? राधा जल्दीए हुनकर अटपटाङ्ग व्यवहारकेँ कारण जानि लेवय चाहैत छली ।
किया नहि अवश्य बताओल जा सकैत अछि । बात.... , बात इ अछि की हमर माय बाबु हमर विवाहक हेतु मानि गेलथि । ओना तऽ ओ विधवा विवाहक विरुद्ध कहियो नहि छलथि, मुदा अपने घरमे एकटा विधवा पुतहुकेँ रुपमे स्वीकार करावयमे संकोच भऽ रहल छलन्हि, चुकीं हम मनावयमे सफल भऽ गेलहँु ।
राजन आओर बहुत किछु कहय चाहि रहल छला, मुदा राधा स्तव्ध ठाढ़ छली । मानु हुनकर शरीरकेँ सम्पूर्ण शक्ति बिलिन भऽ गेल होइ आ ओ सुखल पात जकाँ हावामे उधिया रहल होइथि । मस्तिष्क अपन काज करव बन्द कऽ देने होइ, कानमे यतेक हल्ला भऽ रहल छलन्हि की राजन द्वारा ओहि सँ आगा कहल गेल शब्द मे सँ एकहु शब्द कानधरि नहि पहुँच पाएल छल ।
राजन हुनका सँ नहि भौजी सँ.....।
ओ मात्र भौजीकेँ प्रतिक्षा करैत छला इ जानि राधाकेँ अस्तित्व तहस नहस होवयकेँ लेल उद्यत भऽ रहल छल ।
भौजी दुपहरीयामे जे कहने छली ओ राधाकँे लेल नहि अपना आओर राजनकेँ लेल । भौजी बहुत विश्वासक संग राधाकेँ इ जिम्मेवारी सोपने छली की ओ माँ बावु जी सँ अहि विषयपर बात करवाक हेतु ।
राधाक लेल भौजीकँे यैह विश्वासक मान राखव अति आवश्यक भऽ गेल छलन्हि । अहि विचारकँे अविते राधा अपना पर कावु पएवाक प्रयत्न करय लगली आ ओहि परिस्थिति सँ उवरवाक ।
भौजीकेँ सुनसान जिवनमे सतरंगी रंग भरवाक लेल उद्यत ओहि महान युवककेँ आगा कानय सँ हुनकर महानताकेँ अपमान सेहो भऽ जायत जे राधा सोचने छली , ओ युवक कहियो नहि सोचने छल । अहिदुआरे राधाकँे अपन श्रद्धेय पुरुष प्रति हृदयमे उत्पन्न सिनेह भावनाकेँ बहुत निष्ठुरता सँ दवा देवय परलन्हि ।
राधा अपन सपना टुटय सँ बेसी प्रसन्न छली जे हुनक अपन प्रिय भौजीक लेल त्याग करयकेँ अवसर भेटल अछि । ओ कोनो किम्मत पर अहि अवसरकेँ गमावय नहि चाहैत छली । भौजी चाहने छली की ओ राजनकेँ परखि कऽ निर्णय ....।
राजनकेँ परखयकेँ प्रश्ने नहि उठैत छल, हुनकर दृष्टीमे हुनक जे योग्यता बुझाइत छलन्हि ओकरा शब्दमे कहव राधाक लेल मुस्कील छल । अपनाकँे सम्हारि राधा हुनका सँ विदा लऽ आगा रहल रिक्सावालाकँे इसारा कएलन्हि । तखने राजन एकटा प्रश्न पुछलन्हि राधा जी अहाँ कहियो केकरो सँ प्रेम कएने छी ?’
प्रेम.!.. नहि.......
बहुत सफाइ सँ झुट बजैत राधा रिक्सामे बैस रहली । आ राजनकेँ प्रस्तावकँे स्वागत करैत शुभकामना दैत रिक्सावाला सँ रिक्सा बढावयकेँ इसारा कएली । रिक्सा चलि परल ।
 . किशन कारीगर- दाम-दिगर (एकटा हास्य कथा) २.बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान- दृश्‍य सातम ३.लक्ष्मी दास- विहनि कथा- दाढ़ी
 जितेन्द्र झा- के राखत रुमालक इज्जति

 
 किशन कारीगर

          दाम-दिगर
                    (एकटा हास्य कथा)

टूनटून राम टनटनाईत बाजल कहू त एहनो कहूॅं दाम दिगर भेलैयए जे दोसर पक्ष वला के तऽ दामे सुनि केॅं चक्करघूमी लागि जाइत छैक। हे बाबा बैजनाथ अहिं कनि नीक मति दियौअ एहेन दाम-दिगर केनिहार सभ केॅं। एतबाक सुनितैह बमकेसर झा बमकैत बजलाह आईं रौ टूनटूनमा हम अपना बेटाक दाम-दिगर कए रहल छी तऽ एहि मे तोहर अत्मा किएक खहरि रहल छौ। ताबैत फेर सॅं टूनटून राम जोर सॅं बाजल अहिं कहू ने अत्मा केना नहि खहरत हम जे अपना बेटा बच्चा राम के संस्कृत सॅं इंटर मे नाम लिखबैत रही तऽ अहॉ कतेक उछन्नर केने रही। मुदा तइयो ओ नीक नम्बर सॅं पास केलक आब हम ओकरा फूलदेवी कॉलेज अंधराठाढ़ी मे संस्कृत सॅं बी.ए मे नाम लिखा देलियैअ। ई सुनि बमकेसर झा तामसे अघोर भ बमकैत बजलाह रौ टूनटूनमा तू साफ साफ कहि दे ने जे हमरा बेटाक दाम-दिगर मे बिना कोनो भंगठी लगौनेह तों नहि मानबेए।
       दूनू गोटे मे एतबाक कहाकही होइते रहै की पिपराघाट सॅं पैरे-पैरे धरफराएल हम अप्पन गाम मंगरौना चलि अबैत रहि। दरभंगा सॅं बड़ी लाइनक टेन पकरि राजनगर उतरल रही। ओतए सॅ बस पकरि कहूना कऽ पिपराघाट अएलहूॅं मुदा ओतए रिक्शावला नहि भेटल तही द्वारे पैरे-पैरे गाम जाइत रही। मुदा जहॉ गनौली गाछी लक अएलहूॅं तऽ टूनटून आ बमकेसर के कहा-कही हैत देखलियैअ उत्सुकता भेल जे दाम-दिगर कोन चिड़ैक नाम छियैक से बूझिए लियैए। मोन भेल जे एखने टूनटून सॅं पूछि लैत छियैक जे कथिक दाम-दिगरक फरिछौट मे अहॉ दूनू गोटे ओझराएल छी मुदा बमकेसर झाक बमकी आ टूनटून के टनटनी देखि तऽ हमर अकिले हेरा गेल आओर  हिम्मत जवाब दए देलक। सोचलहूूॅं जे गाम पर जाइत छी तो ओतए ठक्कन सॅं एहि प्रसंग मे सभटा गप-शप भए जायत।
     गाम पर आबि केॅं सभ सॅं प्रणाम-पाति भेल तेकरा बाद नहा सोना के हम ठक्कन के भॉज मे भगवति स्थान दिस बिदा भेलहॅू। मुदा कियो कहलक जे ठक्कन त सतबिगही पोखरि दिसि भेटत। हुनकर नामे टा ठक्कन रहैन मुदा ओ बड्ड मातृभाषानुरागी रहैथ कहियो गाम जाइ त हुनके सॅं मैथिली मे भरि मोन गप-नाद करी। भिंसुरका पहर रहै हम बान्हे बान्हे गामक हाई स्कूल दिस बिदा भूलहॅू जे कहीं रस्ते मे भेंट भऽ जाइथ। मुदा ठक्कन महराज कतहू नहि भेटलाह त बाधहे बाधहे सतबिगही पोखरि लक अएलहूॅं दूरे सॅं देखलियै जे ठक्कन आ परमानन दूनू गोटे गप करैत चलि अबैत रहैए अवाज़ हम साफ साफ सुनैत। ठक्कन बाजल आईं हौ भैया इ कह तऽ अमीनो सहेब के जे ने से रहैत छन्हि। कहू तऽ ततेक दाम दिगर कहैत छथहिन जे घटक के घटघटी आ घूमरी धए लैत छैक। बेसी दाम भेटबाक लोभ मे पारामेडिकल वला लड़का के एम.बी.बी.एस कहि रहल छथहिन कहअ ई अन्याय नहि तऽ आर की थीक परमानन खैनी चुना के पट पट बाजल रौ ठक्कना तोरो तऽ गजबे हाल छौ अमीन सहेब अपना बेटाक दाम दिगर कए रहल छथि तई सॅं तोरा। ताबैत ठक्कन बाजल हमरा तऽ किछू नहि तोहिं कहअ ने अपना चैनो उरल पर 2लाख रूपैया गना लेलहक आ हमर मोल जोल करबा काल मे तोरा दिल्ली कमाई सॅं फुरसत नहिं रहअ। हौ भैया तेहेन ठकान ठकेलहूॅं से की कहियअ हम विपैत मे रही आ तूं अमीन सहेबक चमचागीरि मे लागल रहअ।
परमानन बाजल आसते बाज रौ ठक्कन जॅं कही अमीन सहेबक बेटाक दाम दिगर भंगठलै त कोनो ठीक नहि ओ हमरा जमीनक दू चारि ज़रीब हेरा-फेरी कए देताह आ तोरो चारि सटकन द देथहून। ठक्कन बाजल हम कोन हुनकर तील धारने छियैन तू धारने छहक तऽ तोरा डर होइत छह हम त नहि मानबैन सोहाइ लाठी हमहू बजाइरे देबैन की। दूनू गोटे एतबाक गप मे ओझराएल रहैए मुदा परमानन हमरा दूरे सॅं अबैत देखलक तऽ बाजल रौ ठक्कन रस्ता पेरा चूपे चाप बाज ने देखैत नहि छिहि जे मीडियावला सेहो एखने धरफराएल अछि तू तेहेन भंगठी वला गप बाजि देल्हि से डरे झारा सेहो सटैक गेल। ताबैत हम लग मे पहुॅंचि क दूनू गोटे केॅं प्रणाम कहलियैन। हमरा देखि ठक्कन अकचकाईत बाजल किशन जी कहू समाचार की आई भोला रामक रिक्शा नहि भेटल जे पैरे पैरे आबि रहल छी। हम बजलहूॅं सेहेए बुझियौ मुदा ई कहू जे अहॉ सभ कथिक दाम-दिगर के फरिछौट मे लागल छलहॅू एतबाक मे परमानन  बजलाह जाउ एखन हम सभ पोखरि दिस सॅ आबि रहल छी जॅं बेसी बुझबाक हुएअ त सॉंझ खिन ठीक पॉच बजे अमीन सहेबक दरबज्जा पर चलि आएब।
                  ठीक समय पर 5बजे हम अमीन सहेबक दरबज्जा दिस बिदा भेलहूॅं। ओतए लोक सभ घूड़ तपैत गप नाद करैत टूनटून सेहो ओतए बैसल। ओ पूछलक कहू अमीन सहेब मोन माफिक दाम भेटल की अहॉं पछुआएले छी एतबाक मे परमानन फनकैत बाजल हौ टूनटून भैया बमकेसर संगे पटरी खेलकअ तऽ आब एहि ठाम दाम दिगर भंगठबैक फेर मे आएल छह की नहि रौ परमानन तो तऽ दोसरे गप बूझि गेलही। ताबैत चौक दिसि सॅ धनसेठ धरफराइल आइल आ बाजल यौ अमीन बाबा हमरो दाम-दिगर करा दियअ ने। ई सुनि अकचकाइत घूरन अमीन ठोर पट पटबैत खिसिआयैत बजलाह मर बहिं तूं के हरबराएल छैं रौ हमरा त अपने बेटाक दाम दिगर भंगठि रहल अछि आ तू हरबरी बियाह कनपटी सेनुर करैए मे लागल छैं। ओ बाजल बाबा हम छी धनसेठ आईए पूनासॅ गाम आबि रहल छी। मर बहिं मूरूब चपाट तोरा कहने रहिय ैजे संस्कृत सॅं मध्यमा कए ले तऽ से नहि केलही। कह तऽ ठक्कना सी.एम साइंस कॉलेज सॅं इंटर केने अछि ओकरा कियो पूछनाहर नहि भेटलै तोरा के पुछतहू रौA
सेठ महासेठ आ धनसेठ खूम गरीबक धीया पूता तहि द्वारे नान्हिटा मे परदेश कमाई लेल चलि गेल रहैए। तीनू भाई मे सभ सॅं छोट धनसेठ कनी पढलो रहैए ओ कनी साहस कए बाजल यौ बाबा हम पूणे मे ओपन सॅ मैटीक पास कए केॅं आब इंटर मे नाम लिखा लेलहूॅं। ई सुनि अमीन सहेबक दिमाग गरम भए गेलैन ओ बजलाह रौ परमानन ई ओपेन-फोपेन की होइत छैक रौ आई तऽ धनसेठो नहिए मानत। ताबैत ठक्कन बाजल कक्का पत्राचार कोर्स के ओपेन कहल जाइत छैक अहूॅं नाम लिखा लियअ ने ई सुनि सभ गोटे भभा भभा हॅसए लागल मुदा अमीन सहेब तामसे अघोर भेल तमसा के बजलाह रौ उकपाति सभ हम देह जरि रहल अछि आओर तू सभ हॅसी ठीठोला मे लागल छैंह। टूनटून बाजल कक्का हम तऽ कहैत छी जे दाम दिगरक परथे हटा दिअउ ने नहि दाम दिगर हेतै ने एतेक सोचबाक काज। ताबैत केम्हरो सॅं बमकेसर झा घूमैत-घूमैत अमीन सहेब एहि ठाम पहुॅचलाह। ओही ठाम टूनटून के देखि बमकैत बजलाह बुझलहॅू की अमीन सहेब टूनटूनमा द्वारे अकक्ष भेल छी। ई सुनि ठक्कन बाजल अपने करतबे ने अकक्ष छी अहॉ कम्पाउण्डर बेटा के प्रैक्टीसनर डागडर कहि लोक के ठकि रहल छियैक तहि द्वारे त घटक सभ घूमी रहल छथि तए एहि मे टूनटून भैयाक कोन दोख।
अमीन सहेब पानक पीक फेकी बजलाह मर तोरी केॅं रौ ठक्कना आबो सुखचेन सॅं गप सुनअ दे ने की भेल औ बमकेसर बाबू अमीन सहेब ईशारा क बजलाह। बमकेसर टूनटून सॅं भेल कहा-कही कहलखिन अमीनो सहेब अपन दुःखरा सुनौलनि। सभटा गप सुनि टूनटून बाजल दाम दिगरक चलेन मे ग़रीब लोक मारल जा रहल अछि ओ कतए सॅ लड़कवला सभ के एतेक फरमाइसी पुराउअत। बेटीक बियाह त सभ गोटेक छैन्हि हमरो अहॅू के समाजक सभ लोक केॅं अहिं दूनू गोटे निसाफ कहू। बमकेसर बजलाह तू ई त सोलहो आना सच्च गप बजलेह। कि औ अमीन सहेब अहॉक की बिचार। अमीन सहेब बजलाह टूनटून ठीके कहि रहल अछि हमरो इहए बिचार जे लेब देब के प्रथा हटा देल जाए तऽ अति उत्तम। जेकरा जे जुड़तै से देतै मुदा कोनो तरहक फरमाईस केनाइ उचित नहि।
      हम ई सभटा गप बान्हे पर सॅ ठाढ़ भेल सुनैत रही लग मे जाके सभ गोटे के प्रणाम कहैत ठक्कन सॅं पूछलहॅू दाम-दिगर की होइत छैक कनि अॅहि बुझहा दियअ ने। एतबाक मे टूनटून मुस्की मारैत बाजल कहू तऽ इहो मीडियावला भ केॅं अनहराएल लोक जेॅका बजैत छैथि अमीन सहेब कनी अहीं बुझहा दियौन हिनका। की सभ गोटे ठहक्का मारि हॅसैए लगलाह। अमीन सहेब हॉ हॉ क खीखीआयैत हॅसैत बजलाह बच्चा एखन अहॉ कॉच कुमार छी तानि ने जहिया अपने बिकायब त अहॅू बुझिए जेबै  जे केकरा कहैत छैक दाम-दिगर।
    
बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान
 दृश्‍य सातम

(स्‍थान- सुरेश कामतक घर। भोरहि‍ भोर दीपक चौधरी मामाश्री ओइठाम पहुँचलाह)

दीपक :      मामा, मामा, यौ मामा, मामा यौ।

सुरेश :       (अन्‍दरसँ) हँ भागि‍न, हइए अएलहुँ। शीघ्र आबि‍ रहलहुँ अछि‍। (कि‍छु बि‍लंब भए जाइत छन्‍हि‍ सुरेशकेँ। तहन दीपक अन्‍दर जा कऽ।

दीपक :      मामी, मामी, अहाँ मामाकेँ जल्‍दी कि‍एक नै छोड़ैत छि‍ऐ? ओतेक कसि‍ कऽ पकड़नाइ होइ छै? आउ मामा, जल्‍दी आउ। हम दलानपर छी।

सुरेश :       चलू बैसू तुरन्‍त अएलहुँ।
(दीपक दलानपर बैसल छथि‍। कि‍छुए काल बाद सुरेशक प्रवेश)
चलू भागि‍न, बड़ बि‍लंब भए गेल।

            (दीपक ओ सुरेश बलवीरक ओइठाम जा रहला अछि‍। कि‍छु देरमे बलवीर चौधरीक ओइठाम दुनू गोटे पहुँचि‍ कऽ दलानपर बैसलाह।)

सुरेश :       घरवारी थि‍कहुँ। यौ घरवारी। घरवारी।

दीपक :      छोड़ि‍ दि‍औन मामाश्री समधि‍केँ। ओ अखन समधीन लग हेथि‍न।

बलवीर :      (अन्‍दरसँ) समधीन लग छेलहुँ ठीके मुदा आब नै छी। एक क्षणमे आबि‍ रहल छी।
            (दूटा लोटामे पानि‍ लऽ कऽ बलवीरक प्रवेश। सभ ि‍कयो आपसमे नमस्‍कार पाती करैत छथि‍। पएर-हाथ धोइ कऽ सुरेश ओ दीपक कुरसीपर बैसैत छथि‍।)

सुरेश :       बलवीर बाबू, हमरा लोकनि‍ कि‍छु उद्देश्‍यसँ आएल छी। ओइ उद्देश्‍यक पूर्ति अहींक हाथमे अछि‍।

बलवीर :      बाजल जाउ, की उद्देश्‍य अछि‍ अपने सभकेँ।

सुरेश :       यएह जे अपन छोटकी बुच्‍चीक वि‍आह दीपक बाबूक छोटका बेटासँ करू। बेचारा समधि‍ अस्‍वस्‍थ रहैत छथि‍। अपन जीता-जि‍नगी ओ छोटका बेटाकेँ सेहो नि‍माहि‍ देमए चाहैत छथि‍। हि‍नका लड़ि‍की नै भेट रहल छन्‍हि‍। हाि‍र कऽ ओ ऐ उद्देश्‍यसँ अपनेक दुआरि‍पर अएलाह अछि‍।

बलवीर :      समधि‍, उद्देश्‍य कि‍नको खराब नै होइत। मुदा संबंधीमे कुटमैती नीक नै होइत अछि‍।

दीपक :      समधि‍, अपनेक ई कथन बि‍ल्‍कुल ठीक अछि‍। मुदा मजबूरीक नाम महात्‍मा गाँधी छि‍ऐक।

बलवीर :      अहाँक मजबूरीसँ हमरा की मतलब अछि‍। तैयो समधि‍ बाजू, बेटाक बि‍आहमे अपने की केना ख्‍रच-बरच करब। आब सेबकाहा जमाना नै रहि‍ गेल अछि‍।

सुरेश :       समधि‍ की खरच करताह? कि‍छु नै। सि‍रि‍फ बेटा देताह, लड़ि‍का देताह। आओर हि‍नका लग कि‍छु छन्‍हि‍ए नै।


बलवीर :      समधि‍, टि‍टकारीसँ दही कोना जनमत?

सुरेश  :      बलवीर बाबू बाजू, अपनेक लड़ि‍की हेतु समधि‍केँ की सेवा करए पड़त?

बलवीर :      समधि‍ छथि‍ तँ की कहबनि‍, जाउ अढ़ाइए लाख नगद दऽ देबनि‍ अलावे लड़ि‍का-लड़ि‍कीक सभ सनोमान।

            (सुनि‍तहि‍ दीपक अचेत भऽ जाइत छथि‍। बलवीर अन्‍दरसँ बेना आनि‍ कऽ सुरेशकेँ दै छथि‍। सुरेश हुनका बेना हौंकैत छन्‍हि‍। दीपक होशमे नै आबैत छथि‍। फेर बलवीर लोटामे पानि‍ आनैत छथि‍। अपनेसँ हुनका बलवीर मुँह पोछि‍ दै छथि‍न्‍ह। दीपक होशमे आबि‍ नीक जकाँ बेसैत छथि‍।)

            समधि‍, एना कि‍एक भए गेल?

दीपक :      से नै कहि‍। ओना ऐ बीचि‍मे अस्‍वस्‍थ रहि‍ रहलहुँ अछि‍। हम अपनेसँ कल जोड़ि‍ आग्रह करै छी जे अपन बेटी हमरा बेटा हेतु दए दि‍अ। हम हर तरहेँ मजबूर छी।

बलवीर :      ओइ बेटीपर मरूकि‍याबला चारि‍ लाख एकावन हजार टका नगद आओर सभ श्रमजान दए गेलाह। मुदा हम पाँच लाखसँ कम नै केलि‍एन्‍हि‍। खाइर हमर समधि‍ थि‍कहुँ आ बड़ मजबूर सेहो थि‍कहुँ। तँए सबा लाख टाका नगद आ लड़ि‍की-लड़ि‍काक वास्‍ते परमावश्‍यक सभ चीज-बौस। तहने ई कुटमैती संभव अछि‍। नै तँ जय रामजी की। ऐसँ कम हम अपना बापोकेँ नै करबनि‍। स्‍वीकार अछि‍ तँ बाजू नै तँ कुटुमक नाते, समधि‍क नाते भोजन साजन करू आ चुपचाप बैस आराम करू।

दीपक :      समधि‍, हमरा स्‍वीकार अछि‍। तहन बाजू, नगद कहि‍या लेब आ कोना लेब।

बलवीर :      समधि‍, अहींक सुवि‍धा।

दीपक :      बरयाती लऽ कऽ आएब, तहने गि‍नि‍ देब।

बलवीर :      बरयाती लऽ कऽ अहाँ आएब? नै नै। हमहीं आएब। तखनहि‍ हमरा नगद गि‍नि‍ देब।

सुरेश :       से कोना होएत? लड़ि‍काबला हम आ बरयाती लऽ कऽ आएब अहाँ? लोक की कहतथि‍?

बलवीर :      लोक की कहतथि‍? समए बलवान होइछ। सभ दि‍न लकीरक फकीर बनलासँ काज नै चलैबला अछि‍। जखन जेहेन हवा बहए तखन ओहने पीठि‍ ओरबाक चाही। समधि‍, ई सुनि‍ लि‍अ जे बरयाती लऽ कऽ हमहीं आएब, हमहीं आएब। नै तँ कुटमैती नै होएत।

सुरेश :       जाउ अपनेक जे वि‍चार।

बलवीर :      हँ हँ, बरयाती साजि‍ कऽ हमहीं आएब। समधि‍, मंजूर अछि‍ वा नै?

दीपक :      नै मंजूर कएने कोनो गुंंजाइश नै। मंजूर करहि‍ पड़त।

बलवीर :      से जे बुझी आ जेना बुझी। बरयाती हम परसुए आबि‍ रहल आबि‍ रहल छी। परसु अन्‍ति‍महि‍ लगन अछि‍।

दीपक :      जेना पदाउ समधि‍, मादहि‍ पड़त। खाइर जय रामजी की। आब जेबाक आज्ञा देल जाउ।

बलवीर :      आब जेबाक बेर नै रहि‍ गेल अछि‍। भोजन-साजन करू आ वि‍श्राम करू।

दीपक :      नै समधि‍, बि‍याहक ओरि‍यान केनाइ अछि‍। दि‍न साफे नै अछि‍। हम जाइ छी। जय रामजी की।
           
            (नमस्‍कार-पातीक पश्‍चात् दीपक ओ सुरेश प्रस्‍थान करैत)

पटाक्षेप

दृश्‍य- आठम

क्रमश:
३.
लक्ष्मी दास
विहनि कथा-

दाढ़ी
एहेन समधीन सबहक फेरमे वि‍वेक कक्का कहि‍यो नै पड़ल छलाह जेहेन काल्हि‍ पड़लाह। जहि‍ना-जहि‍ना ऋृतु बदलै छै तहि‍ना-तहि‍ना रीता गेलापर वि‍चारो बदलै छै। मुदा एना कि‍अए होइ छै? क्षुब्‍ध भेल वि‍वेक कक्काक अत्‍मा झहरए लगलनि‍। वि‍चार करए लगलाह जे पहि‍ने दाढ़ी कटा समधि‍यौर अबै छलौं तँ मानो-दान बेसी होइ छलए आ समधि‍न सभ गालपर चुटकि‍यो बजबै छली। एक तँ पाकल दाढ़ी तहूमे आठ-नअ दि‍नक। जहि‍ना पाकल बाँसक बेलैस भऽ जाइ छै। तहि‍ना तँ ने बेलैस भऽ गेलौं। एक तँ दस-बारह दि‍नपर दाढ़ी कटबै छी तैयो कटनि‍हारकेँ घंटा भरि‍ लगै छै, तैपर जँ अखुनका लोक जकाँ सभ दि‍न कटबए लगब तहन तँ आरो गरदनि‍कट्टी करब। गुम्‍म भेल कक्काकेँ मन कहलकनि‍- ‍साल भरि‍क दाढ़ी कटाइ कमाइल एक पसेरी धान होइ छै जे एक दि‍नक बोइन भेल। एक ि‍दनक बोइनमे सालो भरि‍ काज कराएब कते उचि‍त अछि‍।
दोसर मन कहलकनि‍- कि‍यो बत्तू बुझऽ आकि‍ साँढ़ बि‍ना कमाइ बढ़ौने ऐसँ बेसी काज कराएब अन्‍याय छी।‍
 


जितेन्द्र झा
के राखत रुमालक इज्जति

एकटा मैल
, पुरान रुमाल आ गीताक किताब चीरकालधरि सुरक्षित राखऽ चाहैत छथि अरविन्द ठाकुर । कियाकी बलिदानक चिन्हासी आ मित्रताक याद सहजने अछि ई रुमाल । जर्जर रुमाल याद दिअबैत छन्हि हिनका जेल जीवन आ दुर्गानन्दसगे बिताओल समय ।

शहिद दुर्गानन्द झाके फांसी देलाक बाद काठमाण्डूक केन्द्रिय कारागारमे हिनका रुमाल आ गीताक पोथी सोंपल गेलनि । गीताक किताब त नहि मुदा रुमाल एखनधरि सहजने छथि अरविन्द । ओहि गीता किताबक प्रतीकके रुपमे ई एकटा ओहने गीता रखने छथि । प्रजातन्त्रक योद्धा ठाकुर ई रुमालक संरक्षण के करत से खोजि रहल छथि । एहि वास्ते ओ बहुतो नेताके आग्रह कऽ चुकल छथि
, मुदा केओ हिनक आग्रह के औचित्य नहि बुझि सकल । नेपालक संग्रहालयसभ संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गत पडैत अछि । संस्कृतिमन्त्री नेपाली कांग्रेसक मिनेन्द्र रिजाल छथि । ठाकुर कहैत छथि जे मिनेन्द्र रिजालसहित कतेकोसअनुरोध कऽ चुकल छी एकर संरक्षणक लेल मुदा केओ नहि सुनलक । जत्तऽ दुर्गानन्द झाक नामे उपेक्षित अछि, ओत्तऽ हुनक रुमालके के पुछए ? ठाकुरक माग छन्हि जे रुमालके राष्ट्रिय संग्रहालयमे राखल जएबाक चाही ।
दुर्गानन्दके एकटा शहिदक रुपमे नेपाल सरकार सम्मान नहि कऽ सकल अछि एहनमे गीता आ रुमालक खोजी आ संरक्षण के करत
?
वि.स. २०२० माघ १५ गते दुर्गानन्द झाके फांसी देल गेल रहनि । ओहिके तीन दिनबाद जेलर ठाकुरके दुनू वस्तु देने रहथि । आब ४ दशक होबऽ लागल अछि ओहि दिनके
, जहिया तत्कालीन राजापर बम फेकबाक आरोपमे दुर्गानन्द झाके फांसी चढाओल गेल रहनि । २०१८ सालमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे तत्कालीन राजा महेन्द्रपर बम प्रहार भेल छल । जाहिमे महेन्द्र सकुशल बांचि गेल छल । दुर्गानन्द आ अरविन्द बमप्रहारक आरोपमे जेल सजाय काटैत रहथि । नावालिग भेलाक कारणे अरविन्दके फांसी नहि देल गेलनि । जेल जीवनक चरम यातनाके याद करैत अरविन्दक आंखि नोरा जाइत छन्हि ।
अरविन्दक अनुसार दुर्गानन्द झाके तडपा तडपाकऽ मारने रहए तत्कालीन क्रुर शाही शासक । ठाकुर अनुसार एकबेर रस्सीपर लटकाओल गेल फेर कनी काल सांस फेरऽलेल छोडल गेल । तहन फंसरी पर लटकाकऽ यातना देल गेल । आ अन्तमे गोली दागल गेल दुर्गानन्द झापर । एतेक केलाक बादो क्रुुरता जारीए रहलै । दुर्गानन्दके शवधरि हुनक परिवार जनके नहि देल गेल छलैक ।


राज्य शहिदक जीवनीके सेहो उन्टा पुन्टाकऽ राखि देने अछि । कक्षा १० के पाठयपुस्तकमे दुर्गानन्द जीवनी अछि जाहिमे हुनक बलिदानी तिथिए गलत लिखल छैक ।

दूर्गानन्द झाक बलिदानके सम्मान करबाक राज्यके दायित्व छैक । मुदा साम्प्रदायिक मानसिकतासं जकडल नेता
, मन्त्रीसभ एकरा अनदेखी करैत रहल । लगैछ जे दुर्गानन्द झाके शहिदक रुपमे चिन्हाबहोमे राज्यके लज्जाबोध छैक ।

हुनका प्रतिक विभेदसं दुखित छथि अरविन्द । नेपालमे प्रजातन्त्र एलाक बाद वएह सभ कुर्सी पओलक जे दुर्गानन्दसंगे आन्दोलनमे छल । मुदा ओ सभ कहियो दुर्गानन्द आ हुनक माय आ पत्नीके याद नहि कएलक । घरक एक्कहिटा सहारा दुर्गानन्दके फांसीक बाद घर सभदिनक लेल अन्हार अन्हार भऽ गेलै ।

प्रजातन्त्र एलाक बाद सत्तामे सभसं बेशी समय रहल नेपाली कांग्रेस दूर्गानन्द झाके अपन कार्यकर्ता कहैत गर्व करैत अछि मुदा ओकर व्यवहारमे मात्र घृणेटा देखाइ दैत छैक । शहिद झाक माय सुकुमारी देवी आ पत्नी काशी देवीके गुजर बसर करब मुश्किल छलैक । तहिया कोनो कांग्रेसी नेताके याद नहि एलै दुर्गानन्दक शोणित । काशी देवी सिकीमौनी बुनिकऽ संघर्षक पथपर आगु बढैत रहली । वएह काशी देवी आइ संविधान सभाक सदस्य छथि । तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी हुनका समानुपातिक सभासद् बनौने छन्हि ।
नेपाल एखन शहिद सप्ताह मनाबि रहल अछि । शहिदक नामपर नेता लम्बा चौडा भाषण दैत अछि । तालीक गडगडाहटि सेहो सुनाइत छै । मुदा दुर्गानन्द सनके शहिदके पुछनिहार कियो नहि । शहिद परिवारके घरमे चुल्हि जरलै की नहि से के देखत
? नेपालमे बलिदानी देनिहार सभके इएह गति छैक । शहिद परिवारक व्यथा कतबो बखानी कम्मे हएत । वंशवाद र परिवारवादसं रंगल कांग्रेस दुर्गानन्दक उपेक्षासं खिन्न छथि अरविन्द । ओ कहैत छथि हमसभ इएह दिन देखबालेल बलिदान नहि कएने रहौं ।

नेपालमे शहिदक नामसं कतेको प्रतिष्ठान
, अस्पताल, ट्रष्ट संचालित अछि । मुदा दुर्गानन्दक नामसं किछु नहि । हुनक नामक पाछा कोइराला या एहने किछु थर लागल रहैत त बहुत किछु सम्भव छलै ।
दुर्गानन्दके उचित सम्मान करबास
वि.पी. कोइराला, गिरिजाप्रसाद कोइरालासभके के रोकलकै से बुझऽ चाहैत अछि जनता । जकर शोणित पर प्रजातन्त्रक जग निर्माण भेलै तकरे सं सौतिनिञा व्यवहार किया ? कांग्रेस पार्टीए जहन कोनो मतलब नहि रखलक शहिदसं तहन दलीय राजनीतिमें आन पार्टी आ सरकारके देखबाक बाते कोन ?

गिरिजाप्रसादक मगरमच्छक नोर
संविधान सभामे जहन पहिल बेर सभासद् आ तत्कालीन कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला काशी देवीके देखलनि त कोइरालाके आंखि नोरा गेल रहनि । घटनाक प्रत्यक्षदर्शी सभासद् वसन्तीदेवी झा कहैत जे हमही गिरिजाके याद दिऔलियनि जे ई दुर्गानन्द झाक पत्नी छथि । तहन भावविह्वल होइत गिरिजा काशीदेवीके हाथ पकरिक कहनेरहथि हम किछु नहि कऽ सकलौं । जनकपुरक सभा
, सम्मेलनमे गिरिजाप्रसादसं काशीदेवीक भेट होइत छलन्हि ।
दुर्गानन्दके चिन्हाबऽ लेल एउटा शालिक बनाओल गेल अछि धनुषा जिलाक जटहीमे । देशके लेल ओहन बलिदानी देनिहारक लेल सरकारके कोनो आन महत्वपुर्ण जगह नहि भेटलै । की दुर्गानन्दक प्रतिमा लेल राजधानी काठमाण्डू छोट पडि गेल रहै
? जनकपुरक कोनो चौक खाली नहि रहै ? जानकी मन्दिरमे बम काण्ड भेल छलै, मन्दिर परिसरमे शालिक रखलासं मन्दिर अपवित्र भऽ जइतै ?
काठमाण्डूके केन्द्रमे शहिद गेट छैक
, की ओत्त दुर्गानन्दके शालिक रखबाक हैसियत नहि रहै ? संघीय गणतन्त्र नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे एखनो शाहवंशीय राजासभक शालिक आ राणा क्रुर शासक सभहक चिन्हासी शोभाक वस्तु बनल अछि ।
व्यवहारमे दुर्गानन्दसं एत्तेक भेदभाव केनिहार कांग्रेस पार्टी दुर्गानन्दके भजाबऽसं पाछु नहि अछि । दूर्गानन्द झाक नाम बेचिकऽ भोट बटोरबाक काज सेहो चुनावमे होइते अछि । ततबे नहि दूर्गानन्द झाक नाममे संघसंस्थारुपी दोकान सेहो खोलल गेल अछि । जकर काज छैक मात्र दुर्गानन्दक नामपर लोकके सहानुभूति आ पाइ बटोरब ।
१.डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी- उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात २.
रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७

डाँ कैलाश कुमार मिश्र यायावरी
यायावरी
उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात

गाम बद्द याद अबैत अछि दिल्ली में हमरा मुदा गाम अत्बो नजदीक त  नहि अछि जे चट दनी बिदा भ जाएब! ताहि जखन कखनहु दिल्ली स मों औने लागैत अछि त हम ऋषिकेश चलि जीत छी। एक दू दिन गंगाक कट में आनंद स रही फेर दिल्ली में कर्म धुन चैल अबैत छी। हिमालय केर विभिन्न भाग में जेबक आ कार्य करबाक अवसर भेटल अछि- कखनो सिक्किम में जा कन्चंजनघक दर्शन, भूटिया आ लेपचा जनजातिक जीबंक अध्ययन एवं सांस्कृतिक विश्लेषण त कखनहु अरुणाचल प्रदेशक तवांग में जा ओते केर परम्परक अवलोकन। अनुभव हमेश उत्तम। हिमालय दर्शन केर क्रम में काटको बेर हिमाचल प्रदेश, कश्मीर आ उत्तराखंड सेहो गेल छी. अह्ने साल छल 2005 जखन हम उत्तराखंड गेल रही। ओतए स वापस एलक बाद  2005 ई. मे हम नन्‍दा-राजजातपर एकटा लेख हि‍न्‍दीमे अपन मानवशास्‍त्रीय सर्वेक्षण केर आधारपर लीखने रही। ओ लेख इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर वेवसाइटपर प्रकाशि‍त भेलैक। कि‍छु दि‍नक बाद हमरा उतराखण्‍डसँ बहुत लोक सभ लेख लीखबाक हेतु साधुवाद देअए लगलाह। कतेको लोकनि‍ ओइ लेखक लि‍ंककेँ अपन ब्‍लॉगसँ जोड़लनि‍। हालहि‍ंमे एक उतराखण्‍डक नवयुक अपन माटि‍ आ पहाड़सँ सि‍नेह देखबैत एकटा पद्यमय पत्र लि‍खलनि‍। पत्र कि‍छु एना लीखल छल-
‍आँखो के आगे वनश्री के खुलते पट न्‍यारे-न्‍यारे हैं,
छोटे-छोटे खेत और आड़ू सेबों के बगीचे,
देवदार वन, जो नभ तक
 अपनी छवि‍ जाल पसारे हैं।
मुझको तो हि‍म से भड़े
अपने पहाड़ ही प्‍यारे हैं।‍

ऐ कवि‍तामय चि‍ट्ठीकेँ पढ़लाक बाद मोन भेल जे उत्तराखण्‍डक नन्‍दा राजजातके मैथि‍ली पाठक लोकनि‍ केर लेल मैथि‍लीमे सेहो अपन यायावरीक माध्‍यमसँ लीख ली।

नन्‍दाराज-जातक अर्थ भेल नन्‍दादेवीक यात्रा। लोक इति‍हासमे जाइ आ ि‍स्‍थति‍केँ अध्‍ययन करी तँ पता लगैत अछि जे नन्‍दा गढ़वालक राजा लोकनि‍क संग-संग कुँमाऊ केर कत्‍युरी राजवंशक ईस्‍टदेवी छलीह। ईष्‍टदेवी हेबाक कारणें नन्‍दादेवीकेँ राजराजेश्‍वरीकेँ रूपमे सेहो सम्‍बोधि‍त कएल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ लोक ओना पार्वतीक बहि‍न सेहो मानैत छथि‍। समस्‍त उत्तराखण्‍डमे समान रूपें पूजि‍त हेबाक कारणे नन्‍दादेवी समस्‍त प्रदेशमे धार्मिक एकता केर सूत्र सांस्‍कृति‍क रूपसँ मानल जाइत छथि‍। अर्थात हि‍नकासँ समस्‍त प्रदेश एक सूत्रमे जेना बन्‍हा जाइत हो!

स्‍थानीय दंतकथा तँ ई कहैत अछि‍ जे नन्‍दादेवी दक्ष प्रजापति‍ केर सात कन्‍यामे सँ एक छलीह। एहेन मानल जाइत अछि‍ जे हि‍नकर वि‍आह भगवान महादेवसँ भेल रहनि‍। भगवान महादेवक संग ऊँच आ हि‍मसँ आच्‍छादि‍त पहाड़पर नन्‍दा देवी रहैत छथि‍। पति‍सँ एहेन सि‍नेह जकर वर्णन असंभव! पति‍ जखन संग रहैत छथि‍न तँ सुखक बदलामे धोरसँ धोर कष्‍टकेँ नन्‍दा दाइ सहि‍ लैत छथि‍। कुनो-कुनोठाम तँ नन्‍दादेवीकेँ पार्वतीक साक्षात् रूप मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ बहुत नामसँ जानल जाइत छन्‍हि‍- शि‍वा, सुनन्‍दा, शुभानन्‍दा, नन्‍दि‍नी इत्‍यादि‍।

उतराखण्‍डमे देवी-देवताक स्‍तुति‍ या स्‍मरणमे दि‍न-राति‍ जागि‍ कऽ गाबैबला गीत अथवा कीर्तनकेँ जागर कहल जाइत छै। तहि‍ना जेना अपना मि‍थि‍लामे अष्‍टयाम होइत अछि‍। नन्‍दा देवीक बारेमे अनेक जागरक अनुसार भांति‍-भाति‍क दन्‍तकथा भेटैत छै। एहने एक कथामे नन्‍दा दाइकेँ नन्‍द महराजक बेटी मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍द महराजक ई बेटी भगवान श्री कृष्‍णक जन्‍मसँ पहि‍ने कंसक हाथसँ छहरि‍ कऽ आकाशमे उड़ैत नागाधि‍राज हि‍मवंतक पत्नी मैनाक कोरामे पहुँच गेलीह।

एक दोसर जागरमे नन्‍दा दाइकेँ चान्‍दपुर गढ़केँ राजा भानुप्रतापक पुत्री कहल जाइत छन्‍हि‍। एक जागरमे लोक सभसँ पता चलल जे नन्‍दा देवीक जन्‍म ऋृषि‍ हि‍मवंत आओर हुनकर पत्नी मैनाक घरपर भेल छलनि‍।

मुदा तमाम तरहक अलग-अलग धारणा भेलाक बादो पर्वतीय अंचलमे रहनि‍हार लोकनि‍ नन्‍दादेवीकेँ लोक मानस केर एक दृढ़ आस्‍थाक प्रतीक मानैत छन्‍हि‍। संगहि‍ नन्‍दा राजजातकेँ परम्‍परा केर अभि‍न्न हि‍स्‍सा मानैत प्रत्‍येक बारह बर्षमे राजजातक भव्‍य आयोजन करैत छथि‍।

राजजात किंवा नन्‍दाजातक अर्थ भेल राज राजेश्‍वरी नन्‍दादेवीक यात्रा। गढ़वाल क्षेत्रमे देवी-देवताक जात अथवा यात्रा खूब धूमधामसँ मनाएल जाइत छै। अर्थात एतऽ ऐ क्षेत्रक लोकक दृष्‍टि‍मे जातक अर्थ भेल देवयात्रा।

लोक वि‍श्‍वास इहो छै जे नन्‍दा देवी भादवक अन्‍हरि‍या पक्षमे अपन नैहर अबैत छथि‍। कि‍छु दि‍नक बाद अष्‍टमी दि‍न हुनका नैहरसँ सासुर वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। राजजात या नन्‍दाजात नन्‍दा दाइकेँ अपन नैहरसँ एक बनल-ठनल, वस्‍त्र आ गहनासँ सुसज्‍जि‍त नव व्‍याहि‍ता कनि‍याँ जकाँ सासुर जेबाक यात्रा छन्‍हि‍। सासुर के स्‍थानीय भाषामे सौरास कहल जाइत छै। ऐ अवसर पर नन्‍दादेवीकेँ सजा कऽ बना ठना कऽ महफामे बैसा तथा वस्‍त्र, आभूषण, खाद्यान्न, पैसा, मि‍ठाइ इत्‍यादि‍ सनेस दऽ गढ़वालक परम्‍पराक अनुसारे वि‍दा कराएल जाइत छन्‍हि‍।

ओना तँ हरेक साल नन्‍दाजात आयोजन करबाक प्रथा छै परन्‍तु बारह वर्षमे भव्‍य आओर मनोरंजक राजजातक आयोजन कएल जाइत छै। आयोजन एहेन जकरा शब्‍दमे नै कहल जा सकैत अछि‍। केबल अनुभव कएल जा सकैत अछि‍। नन्‍दाजात प्रति‍ वर्ष इजोरि‍या पक्षक अष्‍ठमीक दि‍न मनाएल जाइत अि‍छ। तही दि‍न नन्‍दा दाइकेँ महफामे बैसा कऽ वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍।

नैनीताल, बैजानाथ आ अल्‍मोड़ामे वि‍शेष धूमधामसँ ऐ महापावनि‍केँ मनाएल जाइत अछि‍।

नैनीतालमे प्रति‍वर्ष नन्‍दा-सुनन्‍दा मेलाक आयोजन कएल जाइत छै। ऐ अवसरपर नन्‍दा आओर सुनन्‍दा दुनू बहि‍नकेँ वि‍शि‍ष्‍ट रूपेँ केराक गाछसँ बनल मूर्तिकेँ महफामे बैसा चारू तरफ घुमाएल जाइत छन्‍हि‍। केराक एहेन आकर्षक मूर्ति कुमाऊँकेँ अति‍रि‍क्‍त अन्‍यत्र नै बनाएल जाइत छै। आ सभसँ अन्‍तमे मूर्तिक वि‍सर्जन नैनी झीलमे कऽ देल जाइत छै।

कुमाऊँ क्षेत्रक बात भऽ रहल अछि‍ तँ एक बात आरो स्‍पष्‍ट कऽ दी। कुमाऊँमे नन्‍दाक एक वि‍शेष बात ई छन्‍हि‍ जे गरूड़केँ कोट भ्रामरी मन्‍दि‍रमे नन्‍दादेवीक अवतार एक पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍ जखन कि‍ उतराखण्‍डक अन्‍य क्षेत्रमे देवीक अवतार स्‍त्रीक शरीरमे आ देवता लोकनि‍क अवतार पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍।

प्रसि‍द्ध इति‍हासकार एटकि‍ंसन महोदय हि‍मालयन गजेटि‍यरमे प्रत्‍येक बारह बर्षपर नन्‍दा राजजात मनेबाक वि‍स्‍तृत वर्णन करैत छथि‍। ऐ यात्रामे करीब 250 कि‍लोमीटर दूरी- नौटीसँ होमकुण्‍ड धरि‍ पैदल करए पड़ैत छै। ऐ यात्राक मध्‍य धनधोर जंगल, दुर्गम चोटी आ बर्फसँ झाँपल पहाड़केँ पार करए पड़ैत छै। यात्राक कठि‍नता आ दुरूहताक कल्‍पना अहाँ ऐ बातसँ लागालीय बाण गांवसँ आगाँ रि‍णकीधारसँ यात्री सभकेँ पएरे- बि‍ना जूत्ता-चप्‍पलकेँ ज्‍यूगरालीदार देसी करीब 18000 फीटक ऊँचाइ पार करए पड़ैत छै। यात्रा जखन रि‍णकीधारसँ आगाँ बढ़ैत छै तँ नाना तरहक प्रति‍बन्‍धक पालन केनाइ अनि‍वार्य भऽ जाइत छै जेना स्‍त्रीगण, बच्‍चा, अभक्ष्‍य ग्रहण करैबला जाति‍क लोक चामक बनल वस्‍तु- गाजा बाजा इत्‍यादि‍ नि‍षि‍द्ध भऽ जाइत छै।

सम्‍भवत: ई यात्रा संसारक सभसँ पैघ, दुर्गम आ कठि‍न धर्मयात्रा थीक। ऐ यात्राकेँ केबल समर्पित तथा नि‍ष्‍ठावान भक्‍त लोकनि‍केँ सकैत छथि‍। हजारोक संख्‍यामे श्रद्धालु लोकनि‍, धर्म तथा परम्‍परामे वि‍श्‍वास करैबला आइयो केर धोर कलि‍युगमे ऐ यात्राकेँ श्रद्धापूर्वक पूरा करैत छथि‍।
 
रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"
अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन ः २०६७

सम्मानक एकटा नव अध्याय प्रारंभ भेल अछि
अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनः २०६७ हाले काठमाण्डूमे सम्पन्न भेल अछि । एहि सम्मेलनक आन बहुतो विशिष्टतामे एकटा रहल सम्मानित व्यक्तित्वक औपचारिक छनौट आ तकरा सम्मानपूर्वक प्रदान करबाक व्यवहार । एहिसं पूर्व भारतमे भेल अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सभमे एकटा पूर्वमे छपा राखल सम्मानपत्रमे अनुहार देखि भरैत
मिथिलारत्नदेबाक परमपराकें सर्वथा तोडैत व्यक्तिक गरिमाकें सेहो ध्यानमे राखि ताम्रपत्रमे विशिष्ट प्रकारक फ्रेम लागल सम्मान पत्र, पाग आ दोसल्ला ओढ़ा सम्मान कएल गेल । ओहो नेपालक पहिल राष्ट्रपति डा. रामवरण यादवक हाथें अपनामे ई प्रतिष्ठा स्वयं अभूतपूर्व छल ।

मिथिलारत्नसं सम्मानित भेलाह प्रसिद्ध भाषाविद् डा. योगेन्द्र प्र. यादव । तहिना नेपालक एकमात्र मैथिल पुरातत्वविद् श्री तारानन्द मिश्र । सभ केओ एहि सम्मानसं आहलादित देखल गेलाह ।

सम्मानक क्रममे सभसं विशिष्ट रहल नेपाली माटि पानिक अपन छाप रखने
मिथिलाश्रीसम्मान, जे अपनअपन क्षेत्रमे विशिष्ट योगदान देनिहार मैथिल, अमैथिलकें सेहो देल गेल । एहिमे डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन रहलाह, जनिका प्रथम नेपालीय मैथिली साहित्यक इतिहासकार आ संस्कृतिविद्कें रुपमे सम्मानित कएल गेलन्हि । तहिना संस्कृतिविद् आ नेवारी भाषी सत्यमोहन जोशीजी सम्मानित कएल गेलाह । संस्कृतिविद् डा. जगमान गुरुङ्ग, भाषा वैज्ञानिक डा. नोवल किशोर राइ, भाषाविद्, अवद्यी साहित्यकार विश्वनाथ पाठक, हिन्दीक साहित्यकार डा. सूर्याथ गोप सेहो मिथिलाश्रीसं सम्मानित भेल छलाह । अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलनमे एहि तरहें आन भाषा भाषी विद्वान सभकें सम्मान करबाक ई शुभारंभमसं आनो भाषाभाषी विच एकटा नीक संदेश गेलैए भाषा साहित्यक क्षेत्रमे सहकार्य आ समन्वयसं अन्तर सम्वन्धमे वृद्धि होइछ ।

मैथिली क्षेत्रमे सम्मान एवं पुरस्कारक कमिकें देखैत एहि तरहक प्रारंभसं अगामी दिनमे लोकक हृदय आर विशाल हयतैक आ ई सम्मान देवाक क्रम आगां एहिना जारी रहत से विश्वास उपस्थित सहभागी लोकनि व्यक्त करैत जाइत देखल गेल छलाह ।
















अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न



जनकपुरधाम । अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन पुस ७
,८ गते काठमाण्डूमे भव्यताक संग सम्पन्न भेल अछि । नेपालभारतक डेढ सयसं उपर प्रतिनिधि सभक सहभागितामे सम्पन्न भेल । उक्त सम्मेलन १७ वुंदे काठमाण्डू घोषणापत्रक संग सम्पन्न भेल हयबाक जानकारी आयोजन पक्ष देलनि अछि ।

प्रथम दिन पुष ७ गते काठमाण्डूक बसन्तपुरसं मिथिला पहिरन आ पागमे सजल सैयों मैथिल सभक आकर्षक जुलुश विभिन्न नारा लगबैत प्रज्ञा प्रतिष्ठान धरि आयल छल । नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक भव्य सभाहलमे राष्ट्रपति डा. रामवरण यादव सम्मेलनक उद्घाटन कएलनि । उद्घाटन समारोहमे डा. रामवरण यादवक अतिरिक्त उप प्रधान मंत्री विजय कुमार गच्छेदार
, संस्कृति मंत्री मृनेन्द्र रिजाल, भारतीय प्रतिनिधि डा. बैद्यनाथ चौधरी बैजू अपनअपन विचार व्यक्त कएने छलाह । तहिना समारोहमे सम्मेलनक संयोजक राम भरोस कापडि भ्रमरस्वागत मन्तव्य आ कार्य सम्पादन समितिक सदस्य जीवछ मिश्र धन्यवाद ज्ञापन कएने रहथि ।

सम्मेलनमे ताहि अवसर पर निकलल
स्मारिकाआ राम भरोस कापडि भ्रमरक टटका नाटक पुस्तक भैया, अएलै अपन सोराजक लोकार्पण राष्ट्रपति डा. राम वरण यादव कएलनि । तकरावाद मिथिलारत्नसं दू गोटे आ मिथिलाश्रीसं ६ गोटे राष्ट्रपति हाथें सम्मानित भेलाह । सम्मेलनमे राष्ट्रपतिकें संयोजक भ्रमर शाल आ पागसं सम्मानित कएलनि ।

प्रारंभमे राम भरोस कापडि
भ्रमररचित थीम सौंगक गायन स्वागत गानक रुपमे गायक रामा मंडल लगायतक साथी सभ प्रस्तुत कएने छलाह । सम्मेलन समाप्तिक वादो राष्ट्रपति जी सांस्कृतिक कार्यक्रम देखलनि जाहिमे कुंज विहारी मिश्रक विद्यापति संगीत छल । तकराबाद साँझ ६ बजे धरि भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरु भेल जाहिमे जनकपुरक रामानन्द युवा क्लव द्वारा भ्रमरलिखित जटजटिनलोक नाट्यक सफल प्रदर्शन कएल गेल । नव शिल्प ओ शैलीक कारणें दर्शक सभ द्वारा खूब सराहल गेल । तखन मिथिलाक प्रसिद्ध नृत्यांगना डा. नलिनी चौधरीक कत्थक नृत्य सभा कक्षकें मंत्रमुग्ध कऽ देने छल ।

दोसर दिन भिनसरे ९ बजेसं महाकवि विद्यापतिमे समर्पित विचार गाष्ठीक आयोजन कएल गेल
, जकर प्रायोजन नेपाल पज्ञा प्रतिष्ठान, संस्कृति विभाग कएने छल । डा. योगेन्द्र प्र. यादव, श्री तारानन्द मिश्रक कार्य पत्र प्रस्तुत भऽ सकल । तहिना डा. धीरेन्द्रकें समर्पित भव्यकवि गोष्ठीक आयोजन सेहो कएल गेल ।
समापन समारोहक मुख्य अतिथि उपराष्ट्रपति छलाह जे लगभग चारि घंटा कार्यक्रममे समय दऽ सहभागि सभकें आहलादित कएलखिन्ह ।ओ अपन भाषणमे आयोजनके ऐतिहासिक बतौलनि । दोसर राति मिनापक प्रस्तुती
डोम कक्षसभके प्रभावित कैलकैक । सांस्कृतिक कार्यक्रमक दुनू दिन रश्मि रानीक गीत सं श्रोता मस्तीक अनुभूति करैत रहल ।
 
 
 


 


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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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