Sunday, February 13, 2011

'विदेह' ७५ म अंक ०१ फरवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३८ अंक ७५)- PART II


१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री पाँचम भाग २. मि‍थि‍लेश मंडल- कथा- सुदि‍क रूपैआ

 ३.- कपि‍लेश्वर राउत- कथा- थरथरी
 ४.उमेश मंडल- विहनि कथा- दोस्‍ती


विनीत उत्पल- दीर्घकथा- 

घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री पाँचम भाग                                                            आगू बढि से पहिने अहां से एकटा गप करब आवश्यक अछि। जे यहि ठाम छी जतय से शीर्षक गप 'घोड़ि पर चढ़ि लेब हम डिग्री" के गप शुरू भेल। एक ठाम जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग छल जतय आलोक बाबू हिन्दी मे पढ़ैत छल। एतय हिन्दी भाषाक प्रकांड विद्वान सभ हुनका पढाबैक लेल आबैत छल। ओहि काल मे हास्य कवि डॉ. अशोक चक्रधर हिन्दी विभाग के कमान संभालने छल आओर विभाग मे 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" के लेखक असगर वजाहत छल तऽ 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह सेहो ओतय छल। अहांके ते जानतै छियै जे असगर वजाहतक नाटक 'जो लाहौर नहीं देख्या ओ जन्मया नहीं" भारत-पाकिस्तान विभाजन पर आधारित अछि। अपना सब जे नाटक गाम-घर मे देखैत छी, ओहिना अहि नाटक के नहि देखल जाइत अछि। टाऊन मे जखन ई नाटक देखाअल जाइत अछि ते मारि परैत अछि। एतेक नीक नाटक ओहिने नहि लिखल जा सकैत अछि। पाय दैके, टिकस लैके लोक सभ ई या अहिने नाटक लोक देखैत छै। भारते टा मे नहि विदेशो मे अहि नाटक के मंचन भऽ चुकल अछि। यै हाल 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया" उपन्यासक अछि। बनारसक जुलाहा पर लिखल गेल ई उपन्यास कथा के नब आयाम लिखने अछि।
दोसर ठाम छल भारतीय विद्या भवन। जतय ओ अंग्रेजी मे पत्रकारिताक कोर्स करैत छल। अंग्रेजी हुनकर मजबूत नहि छल, मुदा जोश मे आबि के अंग्रेजी मे पत्रकारिता करहि लागल छल। किछु दिन तऽ नीक लागल मुदा भीतरे-भीतर जे हुनका पर बीतैत छल, से वैह ठा जानैत छल। ओना ई गप हम बता दैलहुं तऽ अहां ई नहि बुझियो जे कथाक अंत भऽ गेल। क्याकि जे आलोक बाबू के अंग्रेजी के नाम से सांप सूघि जाइत छल ओ आय आस्ट्रेलिया मे अछि तऽ कोनो नहि कोनो गप तऽ जरूर होयत। क्योकि आस्ट्रेलिया मे बिन अंग्रेजी जानल तऽ काज नहियै होयत। फेर आजुक दिन आलोक बाबू तऽ पैघ पोस्ट पर अछि। दिल्ली, दुबई, हांगकांग, न्यूयार्क मे घुमैत रहैत अछि। फेर हुनका इंटरनेट से जते मन लागैत अछि, ओकरा लेल हम की कहि। जहिना हमर जीमेलक स्टेटस पर हरका बल्ब जलैत देखैत अछि, ओ टिपटिपबै लागैत अछि। 
ओना ई आदत ओ कोनो रायपुर से संगे नहि आनलै छल। बेरसराय मे जखन ओ रहै लगलाह तखन ते एक्के-दूई टा ओतय साइबर कैफे छल मुदा कनिक ठामे मुनिरका मे कतेक साइबर कैफे खुजल छल जकरा अंगुरी मे गिनब आसान नहि अछि। बेरसराय में एक-दूई टा सेहो दोस्त बनि गेल छल। जखन सांझ राति आठ-नौ बजे ओ क्लास से फारिग भऽ कऽ डेरा घुरैत छल तऽ अप्पन दोस्तक संग  मुनिरका के साइबर कैफे मे देर राति धरि चैटिंग करैत छल। ओहिनो ओहि काल मे चैटिंग करब बरका गप छल, क्याकि कम्मे लोक छल जकरा चैटिंग करै लेल आबैत छल। मुदा, आब तऽ लोक अप्पन मोबाइल से चैटिंग करैत अछि। ओहि काल याहू, रेडिफ छल। आओर आर्कुट के तखने अहि दुनिया मे आयल छल। फेसबुक, ट्विटर ओहि काल भविष्यक गर्भ मे छल। लोक याहू मैसेंजर पर घंटों लागत रहैत छल।
आलोक बाबू के लऽ कऽ एकटा गप तऽ छल, जे ओ जतय जाइत छल या बैसैत छल, ओतय तुरंते लोक सभ जानै लागैत छल। मेहनती आ कर्मठ ते रहबे करल। अहि बीच एक सांझ जखन ओ जामिया मिल्लिया इस्लामिया से घुरि के भारतीय विद्या भवनक क्लास मे छल तखने एकटा लड़की हुनकर नाम लऽ कऽ बजौलखिन, 'आलोक अहांके नाम अछि। प्रोफेसर राजेंद्र जोशी हमरा अहांक लग पठौलखिन अछि।" 
'हां, कहूं।", आलोक अनमनने ढंग से ओहि लड़की दिस ताकि के कहलखिन।
'हम तऽ एतय पार्ट टाइम कोर्स कऽ रहल छी।"
'नीक गप।"
'हम संयुक्त राष्ट्र संघक यूएनडीपी मे काज करैत छी आओर हमर नाम करिश्मा सिंह अछि।"
'ते हमरा से कोन गप।", आलोक बाबू कहलखिन।
'क्याकि हमरा आफिस से टाइम नहि भेटैत अछि। ताहि सं हमरा पढ़ै मे दिक्कत होयत अछि। जोशीजी कहलखिन जे जतय हमरा कोनो दिक्कत होय ओतय हमरा अहां सहयोग कऽ देब।"
'हम ते ओना कोनो नियम नहि बनौले छी, जे अहां के हेल्प नहि करब। मुदा, जहिना हम सभ के करैत छी, अहों कऽ हेल्प कऽ देब।"
'ठीक अछि।"
'जी।"
ई कहिके आलोक बाबू एक कात आओर करिश्मा दोसर कात चलि देलक।
आब दिक्कत ई छल जे एक कात हुनका अंग्रेजी भारि लागै तऽ दोसर कात करिश्मा हुनका नीन खराब कऽ के राखि देन छल। उमढ़ हिन्दी मे ओ कतेक रास काज सभ कऽ रहल छल। जामिया मे पढ़ैत काल हुनकर आलेख हिन्दी के सभ पैघ-पैछ अखबार मे छपि लागल छल। करिश्मा जतय हुनका सं अंग्रेजी मे गप करैत छल ओतय हुनका अंग्रेजी मे बाजहि मे सांप सूंघि जाइत छल। आलोक जखन तंग भऽ जाइत छल तखन हुनकर मुंह सं निकलि जाइत छल, 'देखब,जखन हम भारतीय विद्या भवन सं कोर्स भऽ जाइत ते हम घोड़िपर चढ़ि हम लेब डिग्री।"
मुदा, आलोक बाबूक ई गप भारतीय विद्या भवनक कोर्सक बादे खत्म नहि भेल। ई गप कहि-कहि के ओ आओर लोक सभ के अंग्रेजी से डरा दैत छल जे अहि बेर ओ परीक्षा मे फेल जरूर करत आओर कनि-कनि अंग्रेजी मे पढ़ैत-पढ़ैत एहि भाषा के नीक कऽ लेलक। ई गप हमरे टा मालूम छल जे ओ खूब मन सं अंग्रेजी भाषा कऽ लऽ के मेहनत कऽ रहल छल। आगू बढ़हि सं पहिले अहांके ई गप हम कहि दैत छी जे अंिह ठाम आलोक बाबूक ई कथाक अंत नहि भऽ रहल अछि। क्याकि आय जदि ओ अंग्रेजी नहि जानैत अछि ते कोना आस्ट्रेलिया मे अछि। आओर जहिया सं आस्ट्रेलिया गेल अछि तहिया सं फोन-ते-फोन चैटिंगो हमरा सं खूब करैत अछि। हमहूं खूब करैत छी। ओहि दिन हमरा संग खूब चैट करलक। 
आलोक: हाय (अंग्रेजी बला)
हम: मजे मे छी, अहां सुनाबू।
'अहां फोटू देखलहुं की, अहां के एकटा आओर मेल कईने छी"।
'हां, हम तऽ सभटा फोटो देखहि ुचुकल छी"।
'अहां ओकरे मे हुनका चिन्ह सकैत छी"। ई कहिके आलोक बाबू हमरा फेकरा बुझाबै लागल।
'दूनू अलबम देखलहुं अहां"। फेसबुक पर कुछु फोटू लोड केने छी की? हां, पुरैनका आओर नबका दोनो फोटू अछि ओतय"? 
'ओके"
'यार अप्पन किछु ग्रुप फोटू अहांक लग अछि आओर संभव हुए तऽ अहां ओकरा स्कैन कऽ पठाह देब। हमहूं सभटा फोटू पटाह देब। आइये अप्पन लैपटॉप पर सेव कईने छी", आलोक बाबू हमरा कहलखिन।
'हां, हम भागलपुर से सभटा फोटू ले आइने छी"। हम कहलहुं। 
(एकटा गप तऽ बिसुरि गेलहुं जे हम माने गोविंद भागलपुरक छी। तिलकामांझी एकटा मोहल्ला अछि। ओहि ठाम सबौर जाहि बला रोड मे शीतला स्थान रोड अछि जतय हम रहैत रहि आओर आय-काल पापा-मम्मी रहैत अछि।)
'कोनो दिन बैसि कऽ सभटा फोटू स्कैन कऽ लेब, तखन अहां के पठा देब।' हम कहलहुं। एकटा अलबम भेजि रहल छी, चेक कऽ लियौ।" हम कहलहुं।
'ओके" 
'अहि फोटू में अहां नहि छी"।
'कोनो बात नहि"।
'ओह मजा आबि गेल।"
'हमरो मजा आबि गेल।" कतेक पुरनका गप ख्याल आबि गेल आओर हमरा मन मे किछु आओर गप छल। हम जे लिखने छी, अहां पढ़लियै की नहि", आलोक बाबू कहलखिन।
'कोन गप"।
'अहि बीच हम कवि बनि गेल छलौंह"।
'अच्छा, आस्ट्रेलिया मे"।
'तीन-चारि दिन पहीने बहुत दिन बाद किछु लिखने रहि हिन्दी मे, 'लम्हे क्या लम्हे।"
'भेज देब नहि, ओकरा हम पढ़ब"।
'अलबम मे नहि पढ़लौ कि। गुरु ओतय पढ़हि के मजा अछि"।
'ओतय तऽ पढ़लौ, आओर की लिखने छी", हम कहलहुं।
'लम्हे के विस्तार देने छी"।
'हा, हा, मजा आबि गेल"।
'अइयों अहां खराब चौक के ट¬ूब लाइट छी की, केहन लिखने छी, ई गप हम पुछि रहल छी" आलोक बाबू हमरा पर व्यग्य करलखिन।
जारी...
मि‍थि‍लेश मंडल-
कथा
सुदि‍क रूपैआ

गाममे एकटा मास्‍टर छलाह। बारह हजार रूपैआ दरमाहा रहनि‍। हुनका एकटा लड़का रहनि‍ लगभग 15 सालक। तीने परानी परि‍वारमे रहथि‍। बाप-बेटा आ माए। मास्‍टर सहाएब अपने रूपैआ सुइदपर लगबैमे एक नम्‍बर गाममे। समूचा गौआँ जनैत जे मास्‍टर लग बारह बजे दि‍न आकि‍ राति‍मे जाएब तँ रूपैआ भऽ जाएत। मास्‍टरकेँ गाममे सभ ए.टी.एम. बुझैत। जे कखनो जाएब तँ भऽ जाएत। 25 हजार रूपैआ तक राति‍ या दि‍न कखनो लोक लऽ सकैत छल। मुदा 25 हजारसँ बेसी लेल एक दि‍नक समए दि‍अ पड़ैत रहै। बि‍ना समान रखने कि‍नको एक्कोटा छि‍द्दि‍यो ने दैत। से सभकेँ बुझल। यएहटा एकटा शर्त्त रहनि‍ मास्‍टर सहाएबक।
बड़नीक लेन-देन चलैत। लोक सभ बन्हकी लगा-लगा अपन जरूरतकेँ पुरबैत। मास्‍टरो सहाएबकेँ मन लगनि‍। हि‍नको मन आगु बढ़ैत गेल।  संजोगसँ मास्‍टर सहाएबक बेटा ताबत 20 वर्षक भेल। जवान भेल। बेटो ओही फेरामे पड़ल। एककेँ दू कन्ना हएत, मोनमे एलनि‍ जे रूपैआ सुइदपर लगाएब तँ घर बैसले आमदनी हएत। ने हाथ मोलि‍ आ ने पएर मोलि‍। बेटा 500 रूपैआ लोककेँ दैत 1500रूपैआ लोकसँ लैत। सुइदक सुइद जोड़ैत।
मास्‍टर सहाएब एक दि‍न अपन हि‍साब-बारी करैले बैसलाह तँ सुि‍दक रूपैआ 36 हजार कऽ महि‍नामे अबैत रहनि‍। मास्‍टर सहाएबकेँ मन चसकैत। बेटा एक तरफ सोचैत जे हमरा सन महाजन गाममे कि‍यो नै अछि‍।

क्रमश:
   
 
 कपि‍लेश्वर राउत
कथा

थरथरी

ओता तँ ऋृतु छह टा होइत अि‍छ। गृष्‍म, वर्षा, शरद, हेमन्‍त, शि‍शि‍र आ वसन्‍त। मुदा व्‍यवहारमे लोक तीनटाकेँ मानै छै गर्मी, वर्षा आ जाड़। सभ ऋृतुकेँ अपन ललग-अलग गुण अवगुण होइत छै। मुदा जाड़केँ एकटा अपन अलगे गुण अवगुण अछि‍। कोन भगवान जाड़केँ जन्‍म देलनि‍ से नै कहि‍। अान ऋृतुमे तँ लोक हर्ष-वि‍षम, रंगरभस आ वर्षाक फूहारक आनन्‍द लऽ कऽ ि‍बता दैत छै। मुदा जाड़ तँ कोढ़केँ कँपा दैत छै। गरीबक वास्‍तु मारूख आ धनि‍कक वास्‍तु बि‍लासक ऋृतु होइत छै।

घुटर एक दि‍न एहने समएमे सुरेश बाबूक खेत जे मरखप केने छल पटबैले गेल। समए छलै माघ मासक सुरूआतक। जहि‍ना 2003ई.मे शीतलहरी छलै तहि‍ना अहू बेर भेलै। पछि‍या बहैत जाड़ सुसकारी दैत। सूरूजो भगवान कतए नुका रहला तकर ठेकान नै। कुहेश लागल। पनि‍क बुन्‍द जकाँ वर्फ खसैत। लोक हरदम धुरे लग आगि‍ तपैत। ठि‍ठुरल घास-पात खेलासँ माल-जालकेँ पीठ पाँजर बैस गेलै। आ वि‍मारो पड़ए लागल। तनुक चि‍रै-चुनमुनी सभ जहि‍ंपटार मरए लागल। साँप सभ कोनो बीलमे तँ कोनो आरि‍क कातमे मूइल परल। जीनाइ लोककेँ कठीन भऽ गेलै। एक पनरहि‍यासँ जे शीतलहरी चलल से लधले रहि‍ गेल।

एहने समएमे घुटर मनखप गहूम केने छल। तकरा पटबैक लेल गेल जोखन बोरि‍ंग चलबैक लेल गेल। बोरि‍ंगमे जहन पम्‍पसेटसँ पानि‍ धराबए लागल पानि‍ धऽ लेलके। पलास्‍टि‍क पाइपसँ पानि‍ लऽ गेनाइ छलै से जहाँ कि‍ पाइप पम्‍पसेमे धराबए लागल आकि‍ पानि‍ दोसर दि‍सामे फूच्चूका मारलके आकि‍ घुटर आ जोखन दुनू गोटाकेँ नहा देलके। तथापि‍ कोनो तरहेँ पाइपकेँ बान्‍हि‍ लेलक। जाड़े दुनू गोटे थरथर काँपए लागल। घुटर खेत जा एक कि‍यारीमे पानि‍ खोलि‍ देलके। आ आगि‍क जोगारमे घुटर बगलमे कलमवाग छलै ओतए नार राखल छलै जैमे सँ एक पाँज नार थरथराइते अनलक। आब जखने सलाइसँ आगि‍ धराबऽ लगल आकि‍ तेहेन जाड़ होइत रहै जे सलाइक काठी खड़ड़ले ने होइत होइ। थरथरीसँ सलाइक काठी मुझा जाय। जँ कठीमे आगि‍ धरे तँ नारमे धरबेकाल मि‍झा जाय। खाएर कोनो तरहेँ आगि‍ धरौलक आगि‍ धधका दुनू गोटे आगि‍ तापए लागल। थोड़ेक कालक बाद होश भेलै।
सुरेश बाबू खेत देखक लेल पएर लग तक कोट देने, पएरमे मोजा-जूत्ता लगौने, जाँधमे ट्रोजर देने कानमे मोफलर लगौने तैपर सँ माथमे टोपी देने आँखि‍योमे चश्‍मा छलनि‍। तैयो जाड़े थरथराइत छलाह। जखन बोरि‍ंग लग एला तँ देखलखि‍न जे दुनू गोटे आगि‍ तापि‍ रहल अछि‍। सुरेशो बाबू हाथ महक दस्‍ताना नि‍काि‍ल आगि‍ तापए लगला। आ बजला- घुटरा केहेन समए भऽ गेलै जे केतनो कपड़ा देहमे दैत छि‍ऐ तैयो जाड़ जना जाइते ने अछि‍। तूँ सभ कोना कऽ रहैत छेँ।‍
घुटर बाजल- याै मालि‍क गरीबक जि‍नगी कोनो जि‍नगी छि‍ऐ। एक तँ दैवि‍क मारल छी, दोसर सरकारोक व्‍यवस्‍था तेहेन ने छै जे की कहब। कमाए लंगोटीबला आ खाए धोतीबला।‍ देहमे देखैत छि‍ऐ जेतने कपड़ा अछि‍ तैसँ राति‍क जाड़मे गुजर करैत छी। घरवाली परसौती भेल अछि‍। एकेटा रहैक घर अछि‍। दोसर बकरी आ गाए लेल अछि‍। तहि‍मे एक कोनमे जारैन-काठी रखैत छी। सेहो बकरीबला घरक टाट टूटल अछि।‍
सुरेश बाबू बजला- तब तँ बर दि‍क्कत होइत हेतौ?”
घुटर बाजल- यौ मालि‍क, की कहू। खएर जाए दि‍औ। हमरा सभले तँ एकटा उपरेबला छथि‍। मुदा हे एकटा बात कहैत छी जे केतनो अहाँ सभ कपड़ा लगाएब, बि‍जलीक गर्मीमे रहब मुदा तीन बेर अहूँ सभकेँ जाड़ पछारबे करत।‍
सुरेश बाबू अकचकाइत पुछलाह- कन्ना रौ।‍
घुटर कहए लगल- नै बुझै छि‍ऐ, नहाइ, खाइ आ झारा फि‍रै कालमे।‍
सुरेश बाबू- ठीके कहै छेँ।‍
घुटर- मालि‍क, हमरा सभकेँ कोन अछि‍। खूब मोटगर कऽ लार बीछा दै छि‍ऐ तैपर सँ कुछो बी‍छा दै छि‍ऐ आ चद्दैर ओढ़ि‍ लै छी आ तखनो जँ जाड़ होइए तँ झट्टासँ बनेलहा पटि‍या ओढ़ि‍ लै छी। बगलमे गोरहन्नी आ खड़ड़न-मड़ड़नकेँ ओरि‍या कऽ रखने रहै छी नै भेल तँ ओकरो पजारि‍ दै छि‍ऐ। भरि‍ राति‍ सुनगैत रहल घर गरमाएल रहल। अहाँकेँ तँ बुझलै हएत जे बोरैसक आगि‍ केहेन होइ छै। ठाठसँ सुतै छी।‍
तहन तँ एअर-कण्‍डीशन‍ बना कऽ घरमे रहै छेँ। बड़ नीक एहि‍ना जाड़सँ बँचैक कोशि‍श करि‍हेँ। नै तँ सत्तो डाक्‍टर जकाँ हेताै, बेचारा काल्हि‍खि‍न पैखानासँ अाएल, कलपर कूरूर करि‍ते रहए आकि‍ ठंढ़ा मारि‍ देलकै। टांगि‍-टुंगि‍ कऽ डाक्‍टर लग लऽ गेलै। तँए कहलि‍ओ जे जाड़सँ बचि‍ कऽ रहिहँ। बकरी आ गाएकेँ सेहो झोली ओढ़ा कऽ रखि‍हँ। सुरेश बाबू कहलखि‍न।
मुँड़ी डोलबैत घुटर बाजल- ठीके कहै छी मालि‍क।‍
सुरेश बाबू- रौ घुटर, छि‍यो-पुतोकेँ हाँटि‍-दबाि‍र दि‍हेँ जे ठंढ़ासँ बँि‍च कऽ रहतौ।‍
घुटर- से छौड़ा मानि‍ते नै अछि‍। खन गुल्‍ली डण्‍टा, खन क्रि‍केट तँ खन कबड्डी खेलाइते रहैए। की करबै। हम तँ कहबे ने करबै मालि‍क।‍
सुरेश बाबू- सएह हम कहबो ने।‍
घुटर- हम तँ भरि‍ दि‍न काम धन्‍धामे लागल रहलौं। अहीं सबहक बस बॅसबि‍ट्टीमे बाँसक ओधि‍ उखारि‍ चीर-फार कऽ लै छी। जैसँ देहमे घाम फेकैत रहैए।‍ आ राति‍ कऽ बौरेसबला आगि‍ गरमेने रहैए।
सुरेश बाबू- ठीक करै छेँ। जान छौ तँ जहान छौ।‍ शरीर नै तँ कि‍छु नै। अच्‍छा एकटा कह जे योगासन करै छेँ आकि‍ नै?”
घुटर- यौ मालि‍क, हम मूर्ख आदमी की जानए गेलि‍ऐ‍ योगासन आकि‍ प्रणायाम। हमरा सभले देहे धुनब योगासन आ परनि‍याम होइत छै। खटनि‍यौ सँ ने देह दुहाइत रहैए।
सुरेश बाबू बजलाह- इहो बात ठीके छौ।‍
घुटर बाजल- मालि‍क अगहनमे मारि‍-घुसि‍ क‍ऽ कमेलौं, खूब धान कटलौं जैसँ घरमे एक कोठी धानो अछि‍ आ थोड़ेक चाउरो अछि‍। खेतसँ खेसारी साग, बथुआ साग, सेरसो साग, तोरी साग सबहक तीमन कऽ लै छी। कहि‍यो काल अल्‍लू, कोबी, भट्टा, मुरै सेहो सभक तीमन खा लै छी आ बम-बम करैत रहै छी।
सुरेश बाबू- तहन तँ नीके वस्‍तु सभ खाइ छेँ।‍
घुटर- अहाँ सभ जकाँ की अण्‍डा, मौस-तौस आकि‍ दूध-दही हमरा सभकेँ भेटैत अछि‍। हमरा सबहक देह तँ वैसाख जेठक रौद, भादबक वर्षा आ माघ मासक जाड़सँ ठाेकाएल-ठठाएल अछि‍। अहाँ सभ जकाँ की गैद परहक बाँस जकाँ मोटगर नै ने अछि‍ जे तागत कि‍छु ने। केहनो भीरगर काज देखा दि‍अ कऽ देब।‍ हँ अहाँ सभ जकाँ पोथी-पतरा नै ने पढ़ने छी। थमहू खेत देखने अबै छी।
कहि‍ खेत आबि‍ दोसर कि‍यारीमे पानि‍ खोलि‍ फेर घूर तर चलि‍ आएल आ गप-सप्‍प केलक। बाजल-
यौ मालि‍क, अहाँ सभ जकाँ की हमरा सौ बीघा खेत अछि‍। लऽ दऽ कऽ अपन दस कट्ठा खेत अछि‍। कनीमे तरकारी-फरकारी, कनीमे दलि‍हन-तेलहन, कनीमे साग-पात केने छी। धान-गहूम तँ अहीं सबहक खेतमे मनखप कऽ के गुजर करै छी।‍
सुरेश बाबू- एकटा कहाबत छै जे लड़ा-चड़ा धन पाइये बैठे देगा कौन। हे बड़ जाड़ होइ छै जल्‍दी खेत पटा लै आ घरपर जो। हमहूँ आब अधि‍क घुम फि‍र नै करब घरेपर जाइ छी।‍
घुटर कहलक- जँ गपे-सप्‍प करै छी तँ एकटा गप आओर सुनि‍ लि‍अ। हम तँ पंजाब-भदोही आकि‍ दि‍ल्‍ली-बम्‍बइ नै ने कमाइले गेलौं। देखै छि‍ऐ जे ढबाहि‍ लागल लोक देासर मुलुक जाइत अछि‍। हँ ओतऽ सँ पाइ तँ अनैए मुदा परि‍वारसँ हटल रहैए। जबकि‍ सरकारो खेतीपर वि‍शेष धि‍यान देलकैहेँ। खेत अफर-जात परल अछि‍ केनि‍हारक चलैत। कम उपजा भेने तंगी तँ बढ़बे करत गाममे माए-बाप से हकन कनैत छै। माि‍लक अहीं अपन दशा देखि‍ओ ने, एते खेत अछि‍ आ धि‍या-पूता सभ वि‍देशमे नोकरी करैए। मालकि‍न बूढ़मे कन्ना कऽ भानस भात करैत हेती से वएह जनैत हेती।‍
सुरेश बाबू बजला- से तँ ठीके कहैत छेँ। कखनो कऽ हमरो मनमे होइत अछि‍ जे कथीले एते कमेलौं आ एते जमा केलौं।‍ अच्‍छा छोर ई सभ बात। हम जाइ छि‍औ।‍ कहि‍ सुरेश बाबू घर दि‍स वि‍दा भेला। आ घुटर अंति‍म कि‍यारीमे पानि‍ काटए लगल।
 ४.
उमेश मंडल
विहनि कथा-
दोस्‍ती
एटका गाममे दूटा दोस्‍त छल। एकटाक नाओं आत्‍मा आ दोसराक नाओं शरीर छेलै। दुनूक दोस्‍ती बच्‍चेसँ छल। दुनूक बीच एहेन दोस्‍ती रहै जे आन कि‍यो बुझबे ने करै छल जे दुनू दू छी। कि‍एक तँ सदि‍खन दुनू संगे रहैत। संगे खाइत, संगे सुतैत आ संगे टहलैत-बुलैत। दुनू नि‍श्‍चय केने छल जे जि‍नगी भरि‍ प्रेम आ मि‍त्रता नि‍माहब। एक दोसरकेँ मदति‍ सदति‍ काल करैत रहब। शरीर परदेश जा व्‍यापार करए लगल। खूब धन अर्जित केलक। धन भेने एश-मौजक सभ सुवि‍धा बना लेलक। नमगर-चौड़गर कोठी, एअर कंडीशन गाड़ी, टी.बी. मोवाइल इत्‍यादि‍ सभ कि‍छु कीन लेलक।
आत्‍माकेँ जखन जानकारी भेलै तँ मने-मन खूब खुशी भेलै। एक दि‍न आत्‍मा शरीरसँ भेँट करए वि‍दा भेल। शरीर लग पहुँचते, अत्‍मो शरीरकेँ चि‍न्‍हलक आ शरीरो आत्‍माकेँ। मुदा अनचि‍न्‍हार बनि‍ शरीर आत्‍माकेँ पुछलक- ‍अहाँ के छी, कतए रहै छी, हम नै चि‍न्‍हलहुँ?”
शरीरक बात सुनि‍ आत्‍मा मने-मन सोचए लगल जे भरि‍सक एकरा धनक मद आन्‍हर बना देलकै, तँए एहेन बात बजैए। मन मसोसि‍ आत्‍मा कहलक- दोस, सुनै मे आएल जे अहाँ आन्‍हर भऽ गेलहुँ, तँए जि‍ज्ञासा करए आएल छलहुँ। मुदा ऐठाम आबि‍ प्रत्‍यक्ष भऽ गेल जे अहाँ सचमुच आन्‍हर भऽ गेल छी। आब जाइ छी।‍
 हम पुछैत छी- मुन्नाजीक १.गौरीनाथ आ २.अनमोल झासँ गप्प-सप्प।

हिन्दी-मैथिली साहित्यक सेतु सदृश बहुआयामी व्यक्तित्वक धनिक युवा रचनाकार श्री गौरीनाथसँ युवा विहनि कथाकार मुन्नाजी द्वारा भेल गप्प-सप्पक प्रमुख अंश राखल जा रहल अछि:-

मुन्नाजी: गौरीनाथजी नमस्कार। सर्वप्रथम भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक सम्मानक लेल बधाइ। अहाँक साहित्यिक क्रियाकलापक मोटामोटी दू दशक बीति रहल अछि, अपन प्रारम्भिक रचनात्मक सक्रियताक पूर्ण जनतब दी।
गौरीनाथ: अहांक एहि हार्दिकताक लेल धन्‍यवाद। अपन लेखनक मूल्यांकन अपने नै कऽ सकै छी।
मुन्नाजी: अहाँक सृजनरथ कथायात्रासँ प्रारम्भ भेल छल, प्रारम्भसँ एखन धरि अपन कथायात्राकेँ कोन दृष्टिये देखै छी। ऐ बीच कथा आ कथानकमे कोन बदलाव देखबामे आएल?
गौरीनाथ: अपन कथायात्राक बारे मे हम पहिनहि कहलहुँ जे स्‍वयं किछु नै कहब। एकर सही मूल्‍यांकन दोसर लेखक, पाठक वा आलोचक कऽ सकै छथि। ओना मैथिली मे आलोचक तँ छथिये नै तहन सहृदय पाठक आ दोसर लेखक एकर निर्णायक भऽ सकै छथि। ओना मैथिली कथामे बदलावक गप्प कहबै तँ समएक जे दवाब छै से तँ अबै छै मुदा जतेक एबाक चाही से हमरा मैथिली साहित्यमे नै देखबा मे अबैए।

मुन्नाजी: अहाँ अपनाकेँ साम्यवादी रूपेँ स्थापित करबाक प्रयास केलौं। सातम-आठम दशकमे उठल साम्यवादी विचारधाराक हो-हल्लाक बाद एहेन कोनो विचारधारा मैथिली मध्य बनि सकल?
गौरीनाथ: नै हमरा ई गलत लगैए जे सातम आकि आठम दशकमे हो हल्ला भेल। बाबा नागार्जुन जखन रचनात्मक शुरुआत केलनि आजादीक पूर्वे, ओइ समयक जे हुनकर लेख देखबनि ओ जे राजघरानाक विरुद्ध प्रश्‍न उठेलनि, से की छल ? ओ किसान आन्दोलन, कम्यूनिस्ट आन्दोलनक समर्थक ताहि जमाना सं छलाह। जहिया मार्क्सवादी विचार नै छलै तहिया न्‍यायक प्रश्‍न नै छलै की ? हँ, सातम-आठम दशकमे नक्सलबाड़ी आन्दोलनक बाद मैथिलीमे अग्नि पीढ़ी आगू भऽ एलै आ तहिया  जे सामाजिक दवाब छलै- ओइमे रामलोचन ठाकुर, अग्निपुष्प, कुणाल, नरेन्‍द्र आदि हस्‍तक्षेप कयलनि। हँ ओ एहेन दवाब छलै जाइमे जे ओइ धाराक समर्थक नहियो रहयवला अनेक दृष्टिसंपन्‍न लेखक एहि पीढि़क संग समानधर्मे टा नै, सहमना रूप मे सेहो सोझा अयलाह। आइ ओहि धारा मे कुमार पवन, सारंग कुमार, विद्यानंद झा, कामिनी आदि सन अनेक युवा रचनाकार भेटताह।

मुन्नाजी: अहाँ मैथिली-हिन्दी मध्य समान रूपेँ सक्रिय छी, दुनू मध्य की समानता-भिन्नता अनुभव करै छी?
गौरीनाथ: एकटा हमर मातृभाषा छी, दोसर हमर रोजी-रोटीक भाषा। हमरा दुनू मे कोनो द्वैध नै बुझाइ अछि।

मुन्नाजी: अहाँ प्रकाशकीय गतिविधि (प्रकाशन आ वितरण)मे सेहो सक्रिय छी। तँ कहू मैथिलीमे श्रेष्ठ रचनाक की स्थिति अछि, पाठकक भेल वृद्धि कते महत्व रखैत अछि?
गौरीनाथ: पाठकक मैथिलीमे अभाव भेलैए। १९९९-२००० मे जतेक पत्रिका-किताब बिका जाइत छलै आब से स्थिति नै छै।

मुन्नाजी: अहाँ अपना जनतब कहू जे मैथिली पत्रकारिता वा प्रकाशन कतऽ अछि, ई आर्थिक लाभमे जा सकैए?
गौरीनाथ: निश्चित रूपसँ आर्थिक लाभ भऽ सकै छै, ओइ लेल आवश्यक छै पैघ प्रकाशन संस्थाक, जतऽ पर्याप्‍त पूजी संग व्‍यावसायिक सूझ-बूझ सेहो होइ। हमरा सभकेँ ओते संसाधन नै अछि। हमरा सभकेँ आर्थिक लाभ नै भेल, मुदा घाटामे सेहो नै रहलौं। ओइ रूप मे हम बजारकेँ गलत नै कहै छिऐ। आब हम एक बेर कतौसँ विज्ञापन आनि लेलौं तँ हमरा लाभ भऽ गेल, मुदा तकरा एहि व्‍यवसायक स्‍थायी भाव तं नै कहबै ? हमसभ किछु खास नै केलहुं, एकदम छोट प्रयास अछि हमरासभक...

मुन्नाजी: अहाँ अंतिकासँ किछु रचनाकारकेँ बेरा कऽ रखैत रहलौंहेँ, तकर की कारण, विचारधाराक अभाव की रचनाक स्तरक अभाव?
गौरीनाथ: हमरा नै कोनो नाम मोन पड़ैत अछि, जिनका हमसभ बेराकऽ रखने होइ। अंतिका मे हमरासभ जते लोककेँ छपने छी तकर नाम नुकायल नै छै। तकर अलाबे के बारल छथि तकर नाम अहीं कहि सकैत छी...

मुन्नाजी: अपन समतुरिया रचनाकारकेँ कतऽ राखऽ चाहब, ओइ भीड़ मध्य अपनाकेँ कतऽ पबै छी?
गौरीनाथ: हम अपन समकक्ष सभ रचनाकार केँ अपना सँ आगू मानै छी। ओइ भीड़ मे हम सब सं पाछू छी।
मुन्नाजी: मैथिली साहित्य बभनौटी (ब्राह्मणवादक) शिकार रहल अछि। मुदा नव सदीमे सक्रिय गएर ब्राह्मण रचनाकारक प्रवेशकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छिऐ?
गौरीनाथ: ब्राह्मणेत्तर जे छथि, हुनका लग भोगल पीड़ा छनि तें हुनके स्‍वर सभसँ विश्‍वसनीय हैत।
मुन्नाजी: अपन अमूल्य समए दऽ उतारा देबा लेल बहुत-बहुत धन्यवाद।

गौरीनाथ: अहूँ के धन्‍यवाद।



राग द्वेष, भेदभाव, मैथिलीक उठापटकसँ दूर एकान्त भऽ अपन प्रारम्भिक रचना समएसँ आइ धरि अनवरत विहनि कथा लेखनमे लीन श्री अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप:

मुन्नाजी: भाइ नमस्कार। सामान्यतः रचनाकार सभ कथा-कवितासँ लिखब शुरू करैत छथि मुदा अहाँ विहनि कथासँ रचना लिखब प्रारम्भ कऽ विहनि कथेकेँ प्रमुखतासँ लिखैत रहलौंहेँ। एकरा प्रति रुचि वा आदर कोना जागल?
अनमोल झा: नमस्कार भाइ। बहुत-बहुत नमस्कार। शुरू तँ हम केने रही- बाबा कहथिन महरानीकथासँ जे हमर पहिल रचना छल। मुदा तकरा बादेसँ हम विहनि कथा लिखऽ लगलौं। जहाँ धरि रुचि आ आदरक प्रश्न अछि भाइ, से निश्चित रूपसँ हम कहब जे ऐ लेल हम सगर राति दीप जरय” (कथा गोष्ठी) सँ बहुत उपकृत होइत रहलौंहेँ। हम दोसर कथागोष्ठी जे २९.०४.१९९० ई. मे श्री जीवकान्तअ जीक संयोजनमे भोला उच्च विद्यालय, डेओढ़मे भेल रहए, तहियासँ जुड़ल छी। आ ओइसँ लुरि-भास सभ सिखैत रहलौंहेँ।
ओना कथा गोष्ठीमे कथाक प्रधानता रहैत अछि। एम्हर आबि कऽ थोड़-थोड़ विहनि कथा सभ सेहो पढ़ल जाइत अछि, जकर हमरा आतुरताक संग प्रतीक्षा रहैत अछि।
अन्य भाषामे विहनि कथा चिन्हार भऽ स्थापित भऽ गेल अछि। मैथिलीयोमे कथाक संगे-संग भारतक सभ भाषा लग ई ठाढ़ हो, स्थापित हो, तँए हम विहनि कथेकेँ प्रमुखता दऽ रहलौं अछि।

मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त कथो लिखलौं आ से छपबो कएल। दुनूक मध्य की समानता आ भिन्नता अछि? दुनूमे सँ जे एकटा पसिन्न करए लेल कहल जाए तँ ककरा पसिन्न करब आ किएक?
अनमोल झा: हमर एखन धरि १६० टा लघुकथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका आ संकलनमे प्रकाशित अछि, जकर सभ पत्र-पत्रिका आ संकलन हमरा लग उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त आरो कतौ छपल अछि आ से हमरा सूचना नै अछि से सभ छोड़ि कऽ। आ तहिना सतरहटा कथा सेहो प्रकाशित अछि।
कथा आ विहनि कथाक मध्य समानता आ भिन्नताक बात पुछैत छी से हमरा जनैत उपन्यास आ कथामे जे समानता वा भिन्नता अछि सएह कथा आ विहनि कथामे अछि।
दुनूमे सँ निश्चित रूपे हम विहनि कथाकेँ पसिन्न करब। कारण ऐमे जे मारक क्षमता होइत अछि से आन कोनोमे नै। आ सफल विहनि कथाक ईएह गुण अछि जे ओ पाठककेँ बिना मर्माहत केने नै छोड़ि सकैत अछि।

मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त बाल कथा सेहो लिखैत रहलौं अछि, आर की की लिखैत छी? सभ तरहक लेखनक की उद्देश्य?
अनमोल झा: बाल रचना लिखैत हमरा नीक लगैत अछि तैं लिखैत छी। जखन हम ई लिखैत छी तँ अपना-आपकेँ बालपनमे अनुभव करैत छी जे नीक लगैत अछि।
एकर अतिरिक्त कथा, कविता, रिपोर्ताज लिखैत रही आ एखनो हल्का-फल्लक लिख लैत छी। एकर सबहक पाछाँ कोनो तेहेन उद्देश्य नै अछि। मुदा विहनि कथा हमर प्राण छी आ तैं एकरे सभटा समर्पित अछि।

मुन्नाजी: मैथिलीमे विहनि कथाक कोनो मोजर वा पुछारि नै छै। विहनि कथाकारक तँ कोनो नामे निशान नै बुझल जाइछ। एहन स्थितिमे जगजियार हेबासँ बेसी हेरा जएबाक सम्भावना अछि। ऐ स्थितिमे अपनाकेँ कोना पबै छी?
अनमोल झा: हम जतऽ छी ठीक छी। मैथिलीमे ओनाहो बड़ पेंच-पाँच छैक। बिना पैरबी, पाइ वा पदक किछु नै होइत छैक आ से हमरा लग नै अछि तैं हेरा जाएब वा जगजियार होएब ई बिना माथामे रखने विहनि कथा लिखैत छी आ लिखैत रहब।
मुन्नाजी आब मैथिलीमे विहनि कथाक मोजर वा पुछारि नै छैक से नै कहियौ। यदि अहाँ सन समर्पित लोक आर थोड़बो भेटि जाइ मैथिलीकेँ तँ अपने ने मोजर भऽ जेतै एकर।

मुन्नाजी: अहाँ एखन धरि ढेर रास विहनि कथा लिखि गेल छी। संख्यात्मक बलेँ बड्ड मजगूत छी। मुदा किछु रचना कमजोर बनि सोझाँ आएल अछि। तँ अहाँकेँ नै लगैछ जे बेसी लिखबासँ बेसी आवश्यक अछि जे कम्मे आबए मुदा ठोस रचना आबए?
अनमोल झा: अहाँक कहब यथार्थ अछि भाइ। ओना धान कुटलापर चाउरमे खुद्दी हएब स्वाभाविक अछि। खुद्दीमे चाउर नहि ने देखाइ अछि अहाँकेँ।
ओना अहाँक सुझावक स्वागत अछि। हम एकर ध्यान राखब।

मुन्नाजी: अहाँकेँ डेढ़ दशकक अपन विहनि कथा यात्रामे की अनुभव रहल। तहियासँ आइक स्थितिमे की अन्तर छै।
अनमोल झा: डेढ़े दशक किएक कहैत छी मुन्नाजी। दू दशक ने कहियै। हमर पहिल प्रकाशित रचना २ टा विहनि कथा घृणा-स्नेह आ विवश चेतना समितिक स्मारिका विद्यापति स्मृति पर्व १९९१ ई. मे छपल अछि। खएर छोड़ू, काजक गप करी।
विहनि कथा यात्राक मादे की कहू भाइ, हमरे सन थेथर लोक अछि जे १९, २० बरख सँ एकरा पकड़ि कऽ लेखन करैत रहल। बड़ दुरूह रस्ता छल तखन (एखन नै) आ तैं बहुत गोटा ऐ विधामे आबि कऽ फेर अपन कथा-कविता दिस चल गेलाह। देखलन्हि जे नाम ने जस तँ की करब एतऽ। ऊपरसँ उपहासे। ओना आब पुछबनि तँ कहता ओ सभ एकर जन्मदाते हम छी तँ हम छी।
मुदा हमरा ऐ विधामे मोन लगैत अछि आ ऐ बले लोक चिन्हतो अछि हमरा। एखन पहिलुका सन स्थिति नै रहलै। विहनि कथा मैथिलीमे अपन स्थान बना लेने अछि, जकर प्रमाण पत्र-पत्रिकाक लघुकथा विशेषांक आ सभ पत्र-पत्रिकामे विहनि कथाक रहब अछि। एकर भविष्य नीक अछि। लोककेँ कथा-उपन्यासकेँ पढ़बाक पलखति नै छैक एखन। एहन स्थितिमे ओ सभ बात विहनि कथामे कनिये कालमे भेटि जाइत छै। तैँ एकर पाठको वर्ग तैयार भऽ गेल अछि। दिनानुदिन विहनि कथाकारो सभ उभरि कऽ आबि रहलाहेँ आ से सतति रचनाशील छथि। आजुक परिप्रेक्ष्यमे विहनि कथाक तुलनात्मक स्थिति नीक अछि, बहुत नीक जे रचनाकार सभ थोड़े लिख कऽ पड़ा नै जाइत छथि आन विधा दिस।

मुन्नाजी: अहाँ अपन सर्वस्व ऊर्जा विहनि कथामे लगा रहल छी। ऐ यात्रामे आर के सभ सहभागी छथि आ हुनकर सभक की रुखि छनि।
अनमोल झा: हमर ऐ यात्रामे श्री सत्येन्द्र कुमार झा, श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री मुन्नाजी, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री रघुनाथ मुखियाक संग आर कतेको नव लोक हमरा संग आ सहभागी छथि। आ हिनका सभसँ मैथिली विहनि कथा बहुत आशा रखैत अछि।
हिनका सभक रुखि नीक छनि। ऐमे श्री सत्येन्द्र कुमार जीक तँ एकटा विहनि कथाक संग्रह प्रकाशितो छनि आ दोसर प्रकाशनार्थ ओरियाओल छनि।

मुन्नाजी: अन्यान्य कथा साहित्य मध्य मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइछ आ एकर की भविष्य छै?
अनमोल झा: अन्यान्य कथा साहित्य लग मैथिली विहनि कथाक पहुँच प्रायः एखन धरि नै भेल अछि। कारण अछि एकरा घरेमे आ अपने लोक मोजर दैक लेल तैयार नै छथि। जे शुरू-शुरूमे सभ भाषामे लघुकथा अपन जगह पाबै लेल झेलने आ भोगने छल यएह बात एकरो संग भऽ रहल अछि।
मुदा एकर भविष्य उज्जवल अछि। दिनपर दिन नीक-नीक विहनि कथा सभ सामने अबैत अछि जे अपन मजगूतीक बात कहैत अछि।

मुन्नाजी: अहाँक विहनि कथा संख्याक बलेँ मजगूत होइतो एकर कोनो संगोर सोझाँ नै आएल अछि, आगामी योजना की अछि?
अनमोल झा: हमर धरि कोनो संग्रह नै निकलल अछि तकर प्रमुख कारण अछि अर्थ। हम एकटा प्राइभेट कम्पनीमे काज करैत छी। ततएसँ नून-तेलसँ बेसी नै किछु होइछ जे ई सभ किछु करब।
कोनो संस्था, प्रकाशक वा व्यक्ति ओकरे पोथी प्रकाशित करैत छथिन जे अपने सम्पन्न हो वा जकर पहिलेसँ पोथी प्रकाशित होनि। हम तहूमे छटा जाइत छी।
ओना हमर तीनटा विहनि कथाक पाण्डुलिपि तैयार अछि, तीनटा फाइल कऽके। पहिल विहनि कथाक संग्रहक पाण्डुलिपि जे तीन साल पहिने डॉ. विद्यानाथ झा विदितजीकेँ देने रहियनि। ओ कहलनि जे चालीस बर्खसँ कम उमेरक साहित्यकारकेँ साहित्य अकादेमीमे पोथी छापैक प्रावधान छैक, तइमे छपि जाएत।
दू सालक बाद कहलनि प्रेसमे अछि। तकरो आब एक सालक करीब भऽ गेलै। कत्तौ पता नै, कोनो सूचना नै।
दोसर संग्रहक प्रकाशन लेल श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ निवेदन कएल जे श्रुति प्रकाशन बहुत मैथिली पोथी छपैत अछि। एकटा हमरो विहनि कथाक संग्रह छपवा दिअ। ओहो स्पष्ट रूपे नै तँ नै कहलनि, हँ भऽ जेतै आश्वासन देने रहथि। ओकरो कतेक दिन भऽ गेलै। कोनो बात फेर आगाँ नै बढ़ल।
तेसर विहनि कथा संग्रहक प्रकाशन लेल कोलकाताक मिथिला सांस्कृतिक परिषदलग पाण्डुलिपि जमा कएल अछि। देखियौ की होइत अछि। जखने कतौसँ छपत तखने बुझवै जे छ्पल।
आगामी योजनाक मादे पुछैत छी से योजना की रहत भाइ। हमरा सन साधारण लोक लेल कोन योजना आ कथीक योजना? हँ एकटा योजना धरि अवश्य अछि जे विहनि कथा लिखैत रहब, से सदति लिखैत रहब। छपय तँ सेहो नीक, नै छपय तँ सेहो नीक। संग्रह आबए तँ सेहो नीक, नै आबए तँ सेहो नीक। धरि लिखैत रहब विहनि कथा अवश्ये हम।

मुन्नाजी: दू दशकक विहनि कथा यात्रामे अपनासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम पीढ़ी)क केहेन सहयोग/ विरोधक आभास भेल, हुनकर सभक योगदानक विषयमे की कहबै?
अनमोल झा: हमरासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम) पीढ़ीक साहित्यकार सभक सहयोग सदति भेटैत रहल अछि। बीच-बीचमे उठा-पटक सेहो ओ सभ खूब करथि। हमर विहनि कथा लऽ कऽ मुँहो-कान खूब घोकचाबथि। हमरा मोन अछि जे विराटनगर कथा-गोष्ठी (१४.०४.१९९२ ई.) मे हमर विहनि कथाकेँ सभ लोकि कऽ हवामे उड़ा देलनि। तकरा बाद सभकेँ खारिज करैत गुरुवर पं. श्री गोविन्द झा हमर ओइ विहनि कथाक प्रशंसा केलनि। हमरा बल भेटल आ हम विहनि कथा लिखिते रहलौं।
ओना निश्चय रूपेँ कहए पड़त जे ऐ ठोक-ठाक उठा-पटकमे हमरा हतोत्साह नै, एक प्रकारक बले भेटैत रहल, जे एना नै एना लिखलासँ नीक विहनि कथा बनत।
आर एखन वएह लोक सभ पटना कथा-गोष्ठी (२१.०२.२००९) मे हमर विहनि कथा टेक्नोलोजी आ युद्ध क प्रशंसे नै केलनि, भरि रातिमे कएक बेर ओकर बड़ नीक हेबाक चर्चा करैत रहलाह।
हमरा ऐ विधामे श्री प्रदीप बिहारी, श्री तारानन्द वियोगीक सहयोग आ योगदान निश्चय रूपसँ भेटल। आ हम हुनका सभसँ आ हुनक विहनि कथा संग्रह सभसँ बहुत किछु सिखलौंहेँ।
अस्तु, धन्यवाद भाइ।
 १.जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- जगदीश प्रसाद मंडल- कथा- पड़ाइन २.ज्योति सुनीत चौधरी- अदृश्य बन्धन :
जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-
जगदीश प्रसाद मंडल
कथा-

पड़ाइन

पछुलका बाढ़ि‍मे खेतक फसल तँ धुआइये गेल जे मालो-चाल गामसँ उपैट गेल। अपनो दुनू बड़दो आ महीसो मरि‍ गेल। जहि‍ना जंगलक जानवरकेँ मेघसँ खसैत पाथरक चोट छटपटबैत तहि‍ना ऐ साल आन-आन कि‍सानक संग अपनो भेल। बाधसँ लऽ कऽ घर धरि‍क दशा सहाज करै जोकर नै रहल। बाढ़ि‍ अबि‍ते खेतक धान डूबि‍ गेल। मोटाइत-मोटाइत पानि‍ अंगना-घरमे सलाढ़ लगि‍ गेल। नारक टाल पानि‍क बेगमे भसि‍ गेल। भुसकाँर खसि‍ पड़ल जइसँ गहूमक भूसी भसि‍या गेल। आश्रमक घरक संग-संग मालो घरमे पानि‍ पहुँच गेल। जहि‍ना लाठीपर लाठी खाइत दशा होइत तहि‍ना भेल।

चढ़ि‍ते काति‍क आगि‍ला खेतीक लेल सभ सुर-सार करए लगल। मुदा खेतीक तँ प्रमुख अंग बड़द छी। बि‍ना बड़दे खेत जोताएत कोना? अपने टा गामक दशा नै, परोपट्टाक एक्के रंग दशा। एक्के रंग समस्‍या कि‍सानक बीच पसरि‍ गेल। जइसँ बचल-खुचल माल-जालक दाममे आगि‍ लगि‍ गेल। दोबर-तेबर दाम बड़दक भऽ गेल। एक तँ भेटैबला नै दोसर पैकार सभ जे बाहरसँ आनि‍-आनि‍ बेचए ओकरो वएह हवा।
अपन इलाका छोड़ि‍ दोसर इलाकासँ बड़द कीन अनैक वि‍चार भेल। मुदा असगर-दुसगर आननाइयो भारी बुझि‍ पड़ल। गाममे गप्‍प चलेलौं। एक्के-दुइये आठ-नअ गोटेक वि‍चार भेल। जोड़ा कीनि‍नि‍हार तीन गोटे भेलौं। बाकी छबो गोटे पल्‍ले-पल्‍ला कीनि‍नि‍हार। हुनका सबहक वि‍चार जे एकटा बड़दसँ हर नै जोतल जाएत मुदा जोड़ा लगा लेलासँ भजैती नीक रहत। बेजोड़ बड़द रहने एकटाकेँ बेसी भीर होइ छै आ एकटाकेँ कम। जइसँ साले भरि‍मे बड़द टूटि‍ दाम बुरा दै छै।
तेसर दि‍न नवो गोटे लौकहावाली गाड़ी झंझारपुर हाॅल्‍टपर पकड़लौं। साढ़े बारह बजे लौकहा स्‍टेशन उतड़ि‍ मेन रोड छोड़ि‍ धनबदहेक उत्तर मुहेँ रस्‍ता पकड़लौं। कखन सीमा टपलौं से वुझबे ने केलि‍ऐ। एक्के रंग बाध आ बाधक उपजा। नमहर-नमहर बाध, खेतमे लहलाहइत धान। दुधाएल धानक सीस जइसँ जहि‍ना धानक गाछक रंग तहि‍ना सीसोक। ऊँचगर-चौड़गर खेतक आड़ि‍, जइपर फुलाइतो आ छीमि‍यो भेल राहरि‍। टाट जकाँ राहरि‍क गाछ खेतक सबहक परि‍चए करबैत। अपन सभ जकाँ चनकी राहरि‍क गाछ जेना नै, मझोलका गाछ। खेसारी छि‍टैत एक गोरेकेँ पुछलि‍ऐ ते कहलक जे ऐ दि‍गारमे बेसी पये (पाया) राहरि‍ होइ छै। धानोक संग-संग अगहनेमे कटाइ छै। सोहरी लागल घुरछा-घुरछे फड़ल। छीमि‍यो नमहर। कोला-कोली गि‍रहस्‍त खेसारी, मौसरी छि‍टैत। आड़ि‍ सभपर जेरक-जेर ढेरबासँ सि‍यान धरि‍ घसवाहि‍नी घास छि‍लैत। उपजा देख माटि‍ नि‍हारलौं तँ सोलहन्नी खसि‍आइ माटि‍ (कारी माटि‍) बुझि‍ पड़ल। माटि‍ देख मन गदगद भऽ गेल। मुदा अपन इलाका मन पड़ि‍ते मन तीता गेल। कमला-कोसीपर खाैंझ उठल। दुनू तेहेन हेहर अछि‍ जे इलाकाक माटि‍केँ बि‍गाड़ी देलक। बालु भरि‍ खेतकेँ बलुआह बना देलक। रस्‍ताक पछबारि‍ भाग एकटा नमगर-चौड़गर परतीपर पचासो महीस चरैत देख मन खुशी भऽ गेल। चरवाह सभ महीसकेँ अनेर चरैले छोड़ि‍ अपने सभ खेलाइत। खेलो अजगुत ठेंगा ठेंगा। कनी अटँकि‍ देखए लगलौं। एकटा सीमा -चेन्‍ह- देने। ओइ सीमापर सँ रागक तर देने उनटि‍ कऽ दुनू हाथे ठेंगा फेकैत। जेकर ठेंगा जते दूर जाए ओ ओते सुरक्षि‍त। जेकर लग रहै ओ हारै। जे हारै ओकरा घुघुआ -पीठ- पर चढ़ि‍ ठेंगा लग तक जाए। फेर दोहरा कऽ खेल शुरू होइ। गोबर बि‍छनी सेहो बैस कऽ खेल देखैत। कोनो धड़फड़ी रहबे ने करै। तीि‍नये चारि‍ गोरे रहै, कते पथि‍यामे अँटतै। जहि‍ना एकाधि‍कार पूँजीपति‍क कारोवार नि‍चेनसँ चलैत, कोनो प्रति‍योगि‍ता रहबे ने करैत तहि‍ना पचास महीसक गोबरक बीच तीनू-चारू गोबर बि‍छनी। मुदा एकटा देखलि‍ऐ जे एक बेर एकटा महीस धानक खेत दि‍स बढ़ए लगलै तँ एक गोरे माने एकटा ढेरबा गोबर बि‍छनी उठि‍ कऽ महीस घुमा देलक।
कोसक अन्‍दाज आगू बढ़लौं तँ हाट लगल देखलि‍ऐ। समएओ चाइरि‍क करीब भऽ गेल। मनमे भेल जे कोनो ठेकानल जगहपर थोड़े जाइ कऽ अछि‍ जे अबेर हएत। जखन एलौं तँ देखैत-सुनैत जाएब। हाट देखए बढ़लौं। गमैया हाट। कट्ठा डेढ़ेह परतीपर लगल। तीन-चारि‍ पल्‍लाबला दू-तीनटा अन्न-पानि‍क दोकानदार, दस-बारहटा तीनम-तरकारीक, एक-एकटा माछ-मासुक दूटा झि‍ल्‍ली-कचड़ी, मुरहीवाली एकटा मनि‍हारा, एकटा माटि‍क वर्त्तन, एकटा छि‍ट्टा-पथि‍याक एकटा चाहक दोकान आ एकटा पान-बीड़ीक। मुदा खरीदारी बढ़ि‍या होइत। अन्‍दाज केलौं तँ बुझि‍ पड़ल जे जते कीनि‍ि‍नहार अछि‍ ओतबे समानो आ बेचि‍नि‍हारो। चाहक दोकानपर बैस चाह दइले दोकानदारकेँ कहलि‍ऐ। चुल्हि‍क छाउर झाड़ि‍, डोमौआ बीअनि‍सँ हौंकि‍, चुल्हि‍पर केटली चढ़ौलक। दोकानदारसँ पुछलि‍ऐ- हाट सभ दि‍न लगैए?
दोकानदार उत्तर देलक- ऐ पचकोसीमे चारि‍टा हाट लगै छै। सोम आ शुक्रकेँ ई हाट लगैए। रवि‍ आ बुधकेँ वि‍स्‍टौल लगै छै, मंगलवार आ वरसपति‍केँ चि‍कना आ शनि‍-मंगलकेँ परसा।‍
चाह बनल। सभ ि‍कयो पीब दोकानदारकेँ पाइ दऽ वि‍दा भेलौं। अपने गाम जकाँ गामो, अपना सबहक तँ पोखरि‍-इनार या तँ बालुमे भथा गेल वा मरने भऽ गेल अछि‍, ओइ सभमे अखनो अछि‍ये। गोटि‍-पङरा ईंटाक घर। रस्‍ता-पेरा कच्‍चि‍ये। उत्तरे-दछि‍ने गाम सभ। जइसँ आगि‍-छाइसँ सुरक्षि‍त। जँ कतौ पुरबा-पछबामे आगि‍ लगबो कएल तँ कम घर जरल। जहि‍ना गाम उत्तरे-दछि‍ने तहि‍ना अंगनो सभ। अपने सभ जकाँ लोकोक बगए-बानि आ बोलि‍यो। जइसँ अनभुआर जकाँ बुझि‍ऐ ने पड़ै। गोसाँइ लुक-झुका गेल। जहि‍ना पछबा सबेर-सकाल अपन बोरा-बि‍स्‍तर समेटि‍ लैत तहि‍ना ने परदेशि‍योकेँ सबेर-सकाल ठढ़ पकड़ि‍ लेबाक चाही। मनमे उठि‍ते अँटकैक गर लगबए लगलौं। एक गोटेसँ पुछलि‍ऐ- कोन गाम छी?
रोहि‍तपुर।‍
मुदा कोनो नि‍श्‍चि‍त गाम तँ जेबाके ने छल जे दोहरा कऽ पुछि‍ति‍ऐ। तै काल एक गोरेकेँ दोसर गोरे सोर पाड़लक- मधेपुरबला हौ, हौ मधेपुरबला। कनी एम्‍हर आबह।‍
मधेपुर सुनि‍ मन चौंकल। मुदा लगले असथि‍र भऽ गेल। नाम-गामक कोनो ठेकान अछि‍। एक-एक नामक कतेक लोको आ कतेक गामो हाइए। मुदा मनमे तैयो घुरि‍आइते रहि‍ गेल। मधेपुरबलाक घर पूवारि‍ भाग रस्‍ताकातेमे। घास झाड़ि‍ते मधेपुरबला उत्तर देलक- हाथ लागल अछि‍, लगले अबै छी।‍ कहि‍ घास झारब छोड़ि‍ मधेपुरबला उत्तर मुहेँ वि‍दा भेल। लगमे अबि‍ते पुछलि‍ऐ- कोन मधेपुर रहै छी?
गामक नाआें सुनि‍ बाजल- अहाँ सभ कतऽ रहै छी?
कहलि‍ऐ- हमहूँ मधेपुरे रहै छी। तँए पुछलौं।‍
मधेपुर सुनि‍ ओ चौंक‍ गेल। जना कि‍छु भेट गेल होइ तहि‍ना। मुस्‍कुराइत बाजल- झंझारपुरसँ पूव-दछि‍नक जे मधेपुर छै, ओही मधेपुर रहै छी।‍
अपन मधेपुर सुनि‍ हमहूँ हँसैत बजलौं- हमरो सबहक घर तँ ओही मधेपुर अछि‍।‍
हमरा सबहकेँ दरबज्‍जापर बैसबैत बाजल- लगले अबै छी। ओइ बेचारा ऐठाम पाहुन सभ आओत डेढ़ि‍या परक टाट लगाओत आकरे गर धरौने अबै छी। हमर भाग जे गौआँ-घरूआ सभ ऐलाह।‍
अपन भेटैत ठढ़ देख कहलि‍एनि‍- हँ, हँ भेल आउ। समाजमे सबहक काज सभकेँ होइ छै।‍

काजक बोझसँ अपनाकेँ लदल देख चेथरू रस्‍तेपर सँ सोर पाड़ि‍ पत्नीकेँ कहलक- लगले अबै छी।‍ ताबे अहाँ एक बाल्‍टीन पानि‍ आ एकटा लोटा आनि‍ पाएर धोयले दि‍अनु। कहि‍ चथरू आगू बढ़ल। भरि‍ बाल्‍टीन पानि‍ आ एकटा लोटा नेने चमेली दरबज्‍जापर आबि‍ पुछलखि‍न- बौआ अहाँ सबहक घर कतऽ अछि‍?
कहलि‍एनि‍- मधेपुर।‍
जहि‍ना अनचोकमे देहपर खढ़ो गि‍रते लोक चौंक जाइत तहि‍ना मधेपुर सुनि‍ चमेली चौंक गेलीह। अधा मुँह झपैत बजलीह- ‍‍ऑक्‍सी महादेव मंदि‍रसँ थोड़बे हटि‍ क‍ऽ हमरो नैहर अछि‍।
चमेलीक बात सुि‍न दूबीक मुँहसँ छोड़ैत नव पत्ती (पात) जकाँ हृदएमे भेल। अपन तीस बर्ख पहि‍लुका जि‍नगीमे ओ -चमेली- डूबि‍ गेलीह। मुँह शि‍थि‍ल भ‍ऽ गेलनि‍, जइसँ कि‍छु आगूक बकार नै नि‍कललनि‍। मुदा दरबज्‍जापर आएल अति‍थि‍क लेल घरवारीक रहब अनि‍वार्य बुझि‍ खूँटा जकाँ ठाढ़ रहली। बेरा-बेरी हमहूँ सभ पाएर धोय-धोय चौकीपर बैसए लगलौं। जहि‍ना देवालयमे दर्शकक नजरि‍ एकोएकी मुरती सभपर पड़ैत तहि‍ना चमेलीक आँखि‍ हमरा सभपर नचए लगलनि‍।
घुमि‍ क‍ऽ अबि‍ते चेथरू पत्नीकेँ कहलखि‍न- जलखै नेने आउ। रस्‍ताक झमाड़ल सभ छथि‍ भूख लगल हेतनि‍।‍
हमहूँ सभ बेराबेरी कुर्रा क‍ऽ बैसलौं। चंगेरा भरि‍ मुरही, नोन-मि‍रचाइ आंगनसँ आनि‍ चमेली बीचमे रखि‍ देलनि‍। जलखै देख चेथरू बजलाह- अहाँ सभ जाबे जलखै करब ताबे छि‍ड़ि‍ऐलहा काज सभ समेटि‍ लै छी।‍ कहि‍ एकटा छि‍ट्टा आ हँसुआ नेने बाड़ी दि‍स चेथरू आ आंगन दि‍स चमेली बढ़लीह। काति‍क मास रंग-वि‍रंगक तरकारीसँ सजल चौमास। बि‍ना तजबीज केनहि‍ चेथरू आठो-नवो रंगक तरकारीक छि‍ट्टा आंगनमे रखि‍, लगमे आबि‍ बैसलाह। बैसि‍ते कहलि‍एनि‍- ‍अपन इलाकाक जेहने खेती-पथारी उपटि‍ गेल तहि‍ना मोलो-जाल। मुदा बि‍ना बड़दे खेती कोना करि‍तौं। तँए एलौं। सुनै छी जे ऐ इला इलाकाक लोक अपना इलाकाबलाकेँ कहै छथि‍ जे अपन कमाएल रूपैआ ल‍ऽ क‍ऽ एलौं आकि‍ बाप-दादाक‍, से ठीके छि‍ऐ‍?
हमर बात सुनि‍ चेथरू तरे-तर हँसए लगलाह। मुदा अपनाकेँ दुनू ठामक पाबि‍ कनी काल गुम रहि‍ बजलाह- ‍खि‍स्‍सा-पि‍हानी एहि‍ना लोक जोड़ती-जोड़ि‍ बना लइए। एहनो-एहनो बात हुअए। कोनो धरती कर्मभूमि‍सँ धर्मभूमि‍ बनैत अछि‍। देखै छी जे गामोमे दि‍ल्‍ली-बम्‍वईसँ घुमि‍ क‍ऽ आएल कनि‍याँ सभ अति‍थि‍-अभ्‍यागतकेँ ओतुक्के चालि‍-ढालि‍सँ सुआगत करैत छथि‍ तँ ऐहनो सभ छथि‍ जे केरल-मद्रासमे रहि‍तो गाम-घर जकाँ सुआगत करैत छथि‍। हम अहाँ भैयारी भेलौं। तँए भैयारी जकाँ दुख-धंधाक गप-सप्‍प करू।‍
चेथरूक वि‍चारसँ मन खनहन भ‍ऽ गेल। हृदए बाजि‍ उठल जे सहारा भेटल। अखन तँ धान फुटबे कएल, जखन पाकत तँ बीओ-बाि‍ल ल‍ऽ जाएब। ऐठामक बड़दो अपना ऐठामक बड़दसँ सक्कतो होइ छै आ बेसी दि‍न जीबो करै छै। अपना ऐठामक माल गदि‍याह भ‍ऽ गेल। ऐठाम ठनक जमीनक माल नि‍रोग अछि‍। चुप्‍पा-चुप्‍पी देख पुछलि‍एनि‍- अहाँ कना ऐठाम आबि‍ गेलौं‍?
हमर बात सुि‍न चेथरूक मन पसि‍ज गेलनि‍। गपकेँ आगू नै बढ़ा बजलाह- ‍भानसो भ‍ऽ गेल हएत। अहँू सभ थाकल छी। जखन बड़द कीनै एलौं तँ हेबे करतै। कोनो की अनतै। कोनो की अनत‍ऽ एलौं। अपन घर छी। पाँच दि‍नमे इलक्को घुमा क‍ऽ देखा देब। मन मोतावि‍क बड़दो कीन देब।‍
चेथरूक बात सुनि‍ हूँहकारी भरैत बजलौं- हँ, हँ, से तँ ठीके। देस-कोस ने बदलैए। मनुक्‍ख तँ मनुक्‍खे रहैए कि‍ने।‍
खेला-पीला वाद संगी सभ नीनसँ सुति‍ रहलाह। मुदा अपना नीने ने हुअए। अधा घंटा बाद चेथरू खा-पी, मालक घरक घुर सरि‍या, खाइले द‍ऽ बड़का बाटीमे शुद्ध तोड़ीक तेल नेने आबि‍ बजलाह- ‍सुति‍ रहलौं।‍
आरो गोटेक साँसे कहैत जे सुतल छी। बजलौं- ‍नै, जगले छी।‍
हमरा लग आबि‍ चेथरू तेलक बाटी बढ़बैत कहलनि‍- थाकल-ठहि‍आएल छी पाएरमे तेल औंस लि‍अ।‍
दहि‍ना हाथ तेलमे डूबा बजलौं- ‍भ‍ऽ गेल। ऐकरे मि‍ला लै छी। रखि‍ दि‍औ।‍
एकेठाम बैस दुनू गोरे गप-सप्‍प शुरू केलौं। पुछलि‍एनि‍- ‍ऐठाम ऐना कते दि‍न भेल‍?
कनी काल चुप रहि‍ चेथरू बजलाह- ‍जहि‍ना बि‍नु पढ़ल-लि‍खल परि‍वारक (टि‍प्‍पणि‍ दुआरे) बेरा-बेटी जनमोक ठेकान रहैत तहि‍ना हमहूँ छी। अंदाज पच्‍चीस बर्खसँ उपरे भेल हएत‍?
ऐठाम बेसी नीक लगैए आकि‍ ओइठीन (मधेपुर)?
प्रश्‍न सुनि‍ चुप भ‍ऽ गेला। जहि‍ना दू बट्टी तीन बट्टीपर पहुँच अपन रस्‍ता लोक हि‍याब‍ऽ लगैत तहि‍ना चेथरूओ हि‍यबए लगला। उठि‍ क‍ऽ तमाकू थुकड़ि‍ आबि‍ बैस बजए लगलाह- ‍जत‍ऽ बसी वएह सुन्‍दर। भने अखन दुइये भाँइ जागल छी। अपन गाम मन पड़ैए तँ छाती दहलि‍ जाइए। बाबाक रोपल गाछी भुताहि‍ भ‍ऽ गेल। बाबाक कहल सभ बात तँ मन नै अछि‍ मुदा गोटे-गोटे मन अछि‍। कहने छलाह जे कोना अपन गाम बसल आ अखन धरि‍ कोना परि‍वार चलैत रहल। दैवी चक्र ऐहेन चलल जे बि‍गड़ैत-बि‍गड़ैत एते बि‍गड़ि‍ गेल जे वास होइ जोकर नै रहल।‍
कहैत-कहैत हुचकी उठए लगलनि‍। गरा -कंठ- बझए लगलनि‍। चुप होइत देख पुछलि‍एनि‍- ‍से की‍? से की‍?
आंगुरसँ अपन मौसा घर दि‍स देखबैत बजलाह- हमरा अबैसँ पहि‍ने ऐठाम मौसा ऐला।‍
मौसाक नाओं सुनि‍ पुछलि‍एनि‍- ‍ओ कि‍अए ऐला‍?
चेथरू- ‍आब तँ अपने नै छथि‍ बेटा छन्‍हि‍। वएह ऐठामक गाम-परधान छी। ओकरे दुआरपर पाँचटा धरम बखारी (धान रखैबला) छै। सौंसे गौआँ बेर-बेगरताले धान जमा केलक। साले-साले बढ़बैत गेल। अखन तते जमा भ‍ऽ गेल अछि‍ जे जेकरा (गामक लोककेँ) जते बेगरता होइ छै ओ ओते लइए आ पीठक-पीठ आपस करैए।‍
मुँहसँ नि‍कलि‍ गेल- ‍वाह‍! अच्‍छा, ओ कि‍अए ऐला‍?
चेथरू- ‍मौसाकेँ अनटेटल गप आ अन्‍ट-सन्‍ट काज पसि‍न्न नै छलनि‍। सोभावे ओहने छलनि‍। जहि‍क चलैत चारि‍-पाँच बेर गौआँ सभ मारलकनि‍। अंति‍म माि‍रमे बेसी चोट लगलनि‍। मन टूटि‍ गेलनि‍। जहि‍ना एक धटनासँ कि‍यो बेरागी बनि‍ जाइत तँ कि‍यो अपराधी, कि‍यो नि‍रमोही बनि‍ घर-परि‍वार छोड़ि‍ दैत तँ कि‍यो सि‍ंह सदृश्‍य गर्जन करैत। तहि‍ना गामक मोह छोड़ि‍ खेत-पथार बेचि‍ चलि‍ ऐला।‍
‍अहाँकेँ की भेल?”
‍कोनो एक्के गाम ओहन अछि‍। हमर गाम तँ ओरो बेसी बि‍गड़ि‍ गेल। एक दि‍स महाजनक अति‍याचार तँ दोसर दि‍स खेत-पथारक बेइमानी-शैतानी। बलजोरी अपन नमहर खेतमे छोटका खेतक आड़ि‍ तोड़ि‍ जोइत लैत। तहि‍ना चोराइयो आ देखाइयो क‍ऽ खेतक जजात गाए-महीससँ चरा लैत। आम तोड़ि‍ लैत, दोसराक माए-बहीनि‍क इज्‍जत-आवरूपर हाथ बढ़बैत तँ आगि‍-पानि‍ ढाठि‍ भगैक लेल उड़ी-बि‍ड़ी लगबैत। सि‍न्‍ह काटि‍-काटि‍ घरक वस्‍तु-जात ल‍ऽ भगैत तँ बि‍ना कि‍छु बजनहुँ दसटा बात-कता कहि‍ दैत।‍
चेथरूक बात सुनि‍, जहि‍ना भूमहूर आगि‍क धुआँ नि‍कलैत तहि‍ना लहड़ल हृदएक गर्म सांस नि‍कलल। पुछलि‍एनि‍- ‍शुरूमे (ऐलापर) तँ बड़ दि‍क्कत भेल हएत‍?
नै। अपना तीन कट्ठा खेत रहए। दू साए रूपैये कट्ठा बेच लेलौं। घरो बेच लेलौं। खाली अपन देहक कपड़ा आ रूपैया ल‍ऽ क‍ऽ मौसे ऐठाम एलौं। वएह दस कट्ठा खेतो कीन देलनि‍ एकटा घरो बना देलनि‍ आ कहलनि‍ जे जै चीजक बेगरता हुअ, से लि‍हह। घरक बीचला खूँटा जकाँ ठाढ़ भ‍ऽ गेला। आब तँ अपने सभ कि‍छु भ‍ऽ गेल। जाबे सासु-ससुर जीबै छलाह ताबे सासुर जाइ छलौं, मामा-मामी धरि‍ मात्रि‍क। बहीन-बहि‍नोइ ऐठाम जाइते छी। ओहो सभ अबि‍ते अछि‍।‍
चेथरूक बात सुनि‍ मन औनाए लगल। कछ-मछी आबि‍ गेल। कहलि‍एनि‍- ‍नीनसँ देह भसि‍आइ-ए बड़ राि‍त भ‍ऽ गेल। अहुँ सुतैले जाउ।‍
एतै ने हमहूँ सुतब।‍

पाँचम दि‍न मेजमानी केलौं। छठम दि‍न बड़द नेने गामक रस्‍ता धेलौं।
२.
ज्योति सुनीत चौधरी
अदृश्य बन्धन :
स्वतंत्र विचारक स्वामिनी माया अपन पेशा के प््राति अत्यधिक समर्पित एक बाल्य मनोविज्ञान के विशेषज्ञा छली।अहि विषय मे हुन्का बच्चे सऽ लगाव छलैन आ अपन परिवार सेहो बड्ड आधुनिक विचारक छलैन।मार्तापिता क दिस सऽ कहियो कुनो जोर नहिं छलैन. ने व्यवसाय के चयन बेर मे आ ने ब्याहक निर्णयमे।ओना मायाके एक बड्ड नीक पुरूष मित्र छलखिन जे ने मात्र हुन्कर वरन हुन्कर परिवारक सेहो बहुत स्नेही छलैथ।मुदा ई मायाक अपन व्यवसायक प््राति अनुराग व अपन निजी महत्वाकांक्षाक उन्माद छलैन जे ओ अपन एहेन पुरान व घनिष्ठ मित्र द्वारा आयल विवाहक प््रास्तावके अस्वीकार कय एक क्रेश. छोट बच्चा सबके दिन मे देखभाल करय वला संस्था. मे नौकरी पकड़ली।
विषयविशेषमे पारंगत मायाके कार्यमे अपन निपुणता के प््रामाणित करयमे कनियो देरी नहिं लगलैन।ओ अपन क्रेशके सब बच्चा के व्यक्तिगत व्यवहार पर विशेष ध्यान राखै छलैथ आ आवश्यक परामर्श अभिभावक सबके दैत छलैथ। बच्चा सबके अभिभावक के कोनो समस्या नहिं छल जकर उपाय हिन्का लग नहिं छलैन। अहि तरहे बहुत शीघ्र हुन्का अपन कार्यक्षेत्रमे प््रासिद्धि आ प््राशंसा भेट गेलैन।धीर्रेधीरे अपन कार्य में अभ्यस्त भेला पर माया के अपन निजी जीवन के विषयमे सोचैके समय सेहो भेटय लगलैन।
एक मनोवैज्ञानिक के रूपमे तऽ ओ अपन अस्तित्व बना लेने रहैथ मुदा जखन कखनो ओ बच्चा सब सऽ आन्तरिक प््रोम स्थापित करय के प््रायास करैत छली हुन्का आन हुअ के आभास आवि जायत छलैन। दिन भरि बच्चा क भोजनक पौष्टिकता. रहर्नसहन के शुद्धता. आ खेल मे मस्तिष्कक विकासक समावेश क ध्यान राखैमे माया कतेक श्रम करैत छथि।मुदा जखन बच्चा सबके ओकर अभिभावक लेब आबय छल तखन बच्चा सबमे एक अद्रभुत खुशी बुझायत छल।अभिभावको के कहब छल जे अपन बच्चा के पाबि सबटा थकान दूर भय जायत अछि।बच्चा सबके मुँहपरक ओ खुशी जे ओकरा सबमे अपन मार्तापिताके देखला पर आबैत छल से खुशी देबाक सेहन्ता माया मे जागि गेल रहैन। बहुत सोच विचारक बाद ओ निर्णय केली जे अपन मार्तापिता सऽ अपन मित्रक जानकारी ली।ज्ञात भेलैन जे ओकर कुनो खोज खबरि नहिं अछि।माया के विचार एलैन जे एक बच्चा के गोद ली।मुदा सब कहलकैन जे एना मे बच्चा के पिताक सुख नहिं भेटतैन।तखन माया अपन मार्तापिता सऽ अपन विवाहलेल एहेन वरक चयन करय कहलखिन जे एक बच्चा के गोद लेबय सऽ मना नहिं करैन।अन्यथा ओ ओहिना बच्चा के गोद लेती कारण दुनिया मे कतेको बच्चा बिना मार्तापिता के सेहो रहैत अछि।
मार्तापिता अपन कार्य मे लागि गेला। किछु दिन बाद वेलेन्टाइन्सदिवस पर माया के अभिभावक हुन्का अपना लग बजेलखिन।माया अपन कार्य सऽ कमे दिनक छुट्टी लय अपन घर गेली।ओतय हुन्कर अभिभावक घर पर पार्टी रखने रहथिन जाहि मे हुन्का एक टा बढ़िया आश्चर्यजनक उपहार भेटलैन। माया के पुरान मित्र ओहि पार्टी मे आयल छलैन जे अखनो माया सऽ विवाह लेल तैयार छलैन। अतबय नहिं ओ मायाक जे अनाथ बच्चा के गोद लय अपन बनाबक विचार रहैन ताहु सऽ सहमत छलैन।सब बेर माया अपन मार्तापिता के वेलेन्टाइन्स डे पर किछु उपहार दैत छलखिन मुदा अहि बेर हुन्का अपन मार्तापिता सऽ अमूल्य उपहार भेटल रहैन।अपन कार्य हेतु समर्पित माया कखन गृहस्थि के अदृश्य बन्धन मे बँधि गेली से हुन्को नहिं बुझेलैन।

१.रवि भूषण पाठक
- एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू
२.कृपा नन्द झा मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र

रवि भूषण पाठक-

एक टा अभिशप्त कवि : बूच बाबू
आलेखक आरंभ सर्वप्रथम गाम करियनमे कविक छविसँ करैत छी। गाममे ई कविजीक रूपमे ख्यात रहलाह मुदा हिनकर उपेक्षाक कथा सेहो गामेसँ प्रारम्भ होइत अछि। प्रख्यात दार्शनिक उदयनाचार्यक भूमिमे जनमल ई कवि ने गाममे न्याय पओलक ने बाहर। गंभीर लेखनकेँ मान्यता नै भेटैत देखि कवि गामक व्याहमे अभिनंदन पत्र लेखनमे सेहो रूचि लिअ लागलाह। एहि काजसँ ने हुनका
गाममे केओ रोकलक ने बाहर केओ ।सौभाग्य ई जे एहि हीन साहित्यिक वृत्तिमे रमलाक बादो कवि मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ स्वागतगान लिखलन्हि। प्रत्यक्षदर्शी कहैत छथि जे गाम वैद्यनाथपुरमे ऐ गानक समए कतेको मंचस्थ माननीय तिलमिला उठलाह। ई गान मिथिला सहित मैथिलीक दुर्दशाक व्यथागीत बनि गेल-

उल्लासक गीत कतऽ सगरो करूणा क्रन्दन
उपटि रहल विपटि रहल मैथिलीक नन्दन वन
भ्रमरझुण्ड प्यासल छथि
, वृहगवृन्द बड़ भूखल
मुरूझल छथि आम-मऽहू
, रऽसक सरिता सूखल
बबुरे वन कवि कोकिल
, लाजे मरै छी
आउ आउ आउ सब के स्वागत करै छी

 
कवि दोसर अनुच्छेदमे मैथिली मानुसक उत्सवप्रियतापर व्यंग्य करै छथि। हम सभ विद्यापति समारोह, हिन्दी दिवस, स्वतंत्रता दिवस, गांधी जयन्तीकेँ सत्यनारायण भगवानक कथाबला रीतिनिष्ठासँ मना लैत छिऐ आ समारोहक उच्च उद्देश्य ओहिना उपेक्षित रहि जाइत अछि ।

 
मात्र ई समारोही गोष्ठीसँ की हेतै?
स्थिति जहिना तहिना
, संवत एतै जेतै
मुरदा जगाउ लाउ पैर पकड़ै अछि
आउ आउ सब के स्वागत करै छी

 
ई गान साहित्यक उद्देश्यपर सेहो विचार करैत अछि। कोनो खंडन मंडनक गुंजाइश नै छोड़ैत, ई स्पष्ट कहैत अछि-

काव्यपाठ करू मुदा कान्ह पर लिअ लाठी
एक हाथ रसक श्रोत
, दोसरमे खोरनाठी
पुरना किछु त्यागि त्यागि
, पकड़ू किछु नऽव ढ़ंग
मोंछो पिजाउ बाउ श्रृंगारक संग संग
अहाँ गीत गाउ मुदा हम हहरै छी

 
रसश्रोतक संगे खोरनाठी लऽ कऽ चलएबला ई कविता साधारण नै अछि। पाश्चात्य काव्यशास्त्र ई मानैत अछि जे महान साहित्य कोनो एक भाव लऽ कऽ नै चलैत अछि। ई साहित्यमे विविध आ कखनो कखनो परस्पर विरोधी भावक संश्लेष करैत अछि। बूच बाबूक कवितामे विरूद्धक ई सामंजस्य हमरा चकित करैत अछि।

हिंदी आलोचक राम चन्द्र शुक्ल विरूद्धक सामंजस्यकेँ एकटा बड़का काव्योपकरण मानैत छथिन्ह। बूच बाबूक एकटा आर कवितामे एकर दर्शन होइत अछि।
सोनदाय कविताकेँ ध्यानसँ पढ़ू।सर्वप्रथम एकरामे श्रृंगारिक लक्षण बुझाइत अछि।

 
रहतौ ने हास बहि जेतौ विलास गय
दुइ दिवसक जिनगीसँ हेवे निराश गय
भरमक तरंग बीच मृगतृष्णा जागल छौ
मोहक उमंग बीच प्राण किएक पागल छौ
चलि जेतौ सुनें कंठ लागल पियास गय
दुइ........

 
कवितामे दू टा भाव स्पष्ट अछि। प्रथम प्रेम निवेदन आ दोसर विरागक स्वीकृति। आ दूनू मिलि कऽ विषादक विराट रूपकेँ जन्म दैत छैक। जे ऐ कवितामे कोनो एकटा भाव रहितै, तखन ई कोनो विलक्षण कविता नै बनि सकैत छल।

एहि वैशिष्ट्यकेँ बूच बाबू कवितामे कोना आनैत छथि
, ई बात बेस रूचिगर अछि। कवितामे विद्वान लक्षणा आ व्यंजनाकेँ पैघ बूझैत छथिन्ह मुदा कवि बूच अभिधापर निर्भर छथि। हुनकर कवितामे अलंकारक सेहो कतहु विशेष उपयोग नै अछि। तखन ऐ वैशिष्ट्यक श्रोत की अछि? एकर श्रोत अछि हुनकर विराट जीवनानुभव। अपन समृद्ध अनुभवक आधारपर ओ शब्दक नव जाल बूनैत छथि आ अपन रचनात्मक शक्तिकेँ यादि करैत ओकरा दृढ़ आ सुरेबगर बनबैत छथि।

एकटा अध्यापकक घरमे जन्म लेनिहार ई कवि सौन्दर्यक विविध रूपक साक्षात्कार कएलक। कखनहु जेठक उद्धत नदी करेह एकर मोनकेँ मोहैत अछि-

ई इन्होर पानि चमकै छौ
मोर मोरपर भौरी दै छौ
काटि काटि डीहक करेजकें
तऽरे तऽरे समाइ छौ

 
इएह कवि नागार्जुनक कविता एक फांक आंखजकाँ नायिकाक ठोरक रस्तासँ अभिनव सौंदर्य देखैत अछि-

कि जहिना कुरकुर पानक ठोर
कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर
लगौलह बातक पाथर चून
सजौलह कऽथ कपोलक खून
कि रहलह एक्के बातक चूक
कतऽ छह प्रेमक पुंगी हूक
?

 
ई कवि भारतक ग्राम्य सुषमाक अनन्य प्रेमी अछि। महानगरीय कृत्रिमताक स्थानपर ई सहज सौंदर्यकेँ वरेण्य मानैत अछि-

ईडेन गार्डेन सँ सुन्नर अछि
कोशी कातक बोन गय

 
इएह प्रेम एकटा प्रेमिकाक ह्रदयसँ निकलैत अछि-

 
प्रियतम चलि आबू पटनासँ गाम

 
ऐ प्रेमक ठोस आधार अछि। कवि नगरीय जीवन, शहरीकरण आ प्रशासनिक
भ्रष्टाचारकेँ निशाना बनबैत अछि-

घूसखोर मच्छर उड़ीस जकाँ जीवै छै
शोनित तँ ओ अवशिष्ट पीवै छै
हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी
खगले केर तीरै छै चाम

 
कुत्ता जहिना हड्डी सँ मांस,खून आ रस खींचैत अछि, तहिना सरकारी अधिकारी वर्ग सेहो आम जनताक संग करैत अछि। कवि स्वयं बिहार सरकारक राज्य कर्मचारी छलाह, ताइ दुआरे ऐ अनुभवसँ ओ नित्य प्रति गुजरैत हेताह।

मैथिली कवितामे हिंदी कविताक तुलनामे बेटीक ब्याह
, दहेज आदिक बेशी चिंता रहलैक अछि। यद्यपि ई चिंता सीता, पार्वतीक ब्याहक रूपमे धार्मिक आयाम लैत अछि, तथापि एकर मूलाधार सामाजिक अछि। अन्य मैथिल कविक संगे हुनको गौरी आ सीताकेँ कुमारी रहबाक दर्द छन्हि-

चामक सेज
, कुगामक वासी
खन कैलाश
, खनेखन काशी
लागथि बुत्त भुताह हे
, गौरी रहथु कुमारी !

ई मिथिला अंचल मे व्याप्त दहेज आ समएसँ बेटीक व्याह नै हेबाक चिंता अछि। कवि सेहो ऐ चिंतासँ जूझैत अछि आ बेटीक लेल एकटा अद्भुत रूपक खोजैत अछि।
फूलडालीक रूपमे बेटीक कल्पना करैत कवि बेटीमे तमाम पवित्रता आ दैवत्वकेँ रूपांतरित करैत अछि-
फूलडाली सन बेटी बनलै
माथे परक पहाड़

 
एक कवितामे कवि कोनो बेटाक बापकेँ चारिटा बेटी होएबाक व्यंग्यात्मक कल्पना करैत अछि-

तोरेा कुमारि चारि दाय हो
मोन पड़ि जयतह नानी

 
एक अन्य कवितामे वरक खानदानकेँ व्यापारी देखाओल गेल अछि-

बबा दलाल बाप बड़दक व्यापारी
,
बेटा बछौड़ बीकि गेलै हजारी

 
कविक ख्याति हास्य आ भक्ति कविक रूपमे रहल मुदा कविक फूलडालीमे सभ तरहक फूल छलए। फूल नाममात्रक नै काव्य उपवनक सभसँ मधुर, सुगंधित आ पवित्र फूल। कवि अपन दैन्य आ निराशाकेँे भक्ति गीतमे व्यक्त कएलक, ई गीत बहुत बेसी मात्रामे अछि मुदा मात्र एक गीतक चर्चा हम करैत छी, लागैत अछि जेेना विद्यापति पदावलीक कोनो पद होअए-

 
जननि हय, जीवन हमर कठोर
अध्यावधि सुख-शांति न भेटल
पयलहँू विपति अघोर
जननि हय जीवन हमर कठोर

 
बूच बाबू अपन जिनगी आ कवितामे काव्यशास्त्रीय रूढ़िक पालन नै केलाह ने ओ कोनो काव्यात्मक आंदोलनसँ जुड़ि कुकुरमुतिया काव्यक रचना केलाह। ओ ह्रदएसँ कविता करैत छलाह, ताइ दुआरे हुनकर आलोचना सेहो ह्रदएसँ हेबाक चाही। बिझिआइल हाँसूसँ भरिगर गाछ नै कटत। बूच बाबूक काव्यक आलोचना सोचि समझि कऽ होएबाक चाही। यद्यपि ओ कोनो तत्कालीन आंदोलनमे रूचि नै लेलाह, परन्तु हुनकर कविता भाव आ शिल्प दुनू दृष्टिसँ रचनात्मक अछि। रचनात्मकता आ मौलिकताक औजारसँ हुनका परखल जाए तँ ओ मैथिली कविताक इतिहासमे किछु शीर्ष कविमे गणनीय छथि। मुदा हुनकर कविताक विषयमे बहुत भ्रांति अछि। कखनहु छपलाक दृष्टिसँ तँ कखनहु पुरस्कारक दृष्टिसँ हुनकर अवहेलना होइत चलि जाइत अछि। केओ आलोचक कविताक संख्याक दृष्टिसँ सेहो आपत्ति कऽ सकैत छथि! किएक तँ ई अभिनवगुप्त आ मम्मटक देश नै अछि। ई शतक आ सहस्रकम लिखएबलाक देश अछि! विडम्बना ई अछि जे कविक सुपुत्र श्री शिव कुमार झा सेहो मैथिली आलोचनासँ जुड़ल छथि आ अपन आलोचनामे ककरो निराला आ ककरो प्रसाद बनाबैत छथिन्ह मुदा मर्यादावश वा जे कारण हो पिताक रचनात्मकतापर ओ श्रद्धा तँ व्यक्त करैत छथिन्ह मुदा खुलि कऽ सोझाँ नै आबैत छथिन्ह। हम ऐठाम इएह कहब जे ओ निराला आ प्रसाद नै, ओ बूच छलाह, मैथिलीक बूच। हुनका मात्र ऐ रूपमे सम्मान दऽ हम मैथिली आलोचनाक तर्पण कऽ सकैत छी ।

 
कविक रचनात्मकताक दूटा संदर्भ आर अछि। कविक रचना अकालसंभवतः नागार्जुनक हिंदी कविता अकाल और उसके बादक बाद भेलए। मुदा दुनूक दू संदर्भ आ दृश्य। नागार्जुन जाइ ठाम पशु पक्षी आ मानवक स्थितिक चित्र दऽ रहल छथि, ओइ ठाम बूच बाबूू गुजराती उपन्यासकार पन्नालाल पटेलक रचना मानभीनी भवाईजकाँ काल देवताक याद करैत छथि।

 
ई अकाल नहि महाकाल अछि
भूखक उक बान्हि नांगरिसँ
चारेपर ठोकैत ताल अछि।
..............................................
बीसहूँ आँखि ओनारि दसानन
घुटुकि घुटुकि हिलबैत भाल अछि

 
बूच बाबू अपन एक अन्य कविता राम प्रवासीमे रामकेँ वनवासीक बदला प्रवासी कहैत छथि। मात्र ऐ शब्दक द्वारे ई कविता अपन पौराणिक केंचुलकेँ त्यागि आधुनिकता दिस संक्रमित होइत अछि।

धिक धिक जीवन दीन अहाँ बिनु
बीतल बरख मुदा जीवै छी
जीर्ण-शीर्ण मोनक गुदड़ीकें
स्वार्थक सुइ भोंकि सीबै छी
निष्ठुर पिता पड़ल छथि घर मे
कोमल पुत्र विकल वनवासी
आउ हमर हे राम प्रवासी

 
जीता जी हुनकर कोनो किताब नै छपल। मरलाक बाद हुनकर ९८ टा कविताक संग्रह श्रुति प्रकाशनसँ आबि रहल अछि। निन्नानबेक फेरमे हमरा जनैत कवि कहियो नै पड़लाह। जिनगीक ऐश्वर्य आ प्रेमकेँ कवि खूब नीक जकाँ भोगलाह। परन्तु ई सभ मृगतृष्णा बनि कविक जिनगीमे आबैत जाइत रहल-

कयलहुँ जहिना किछु आलिंगन
चुभि गेल अनेको वक्रशूल
उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध
झड़ि गेल धरा मकरंद प्रीत
सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल
रमणीय देवसरि सुखा गेल

 
कवि जिनगीकेँ ऊँच-नीचक कविता जकाँ देखलखिन्ह अर्थात विभिन्न भाव आ रससँ परिपूर्ण। कोनो एक रस आ भावमे रमनाइ ओ नै सिखलन्हि। संभवतः काल देवता स्वयं हुनकर कीर्तिक सोझाँ आबि गेलाह अन्यथा हुनकासँ कम सामर्थ्यक कविगण बेशी यश, पुरस्कार आ सम्मानक भागीदार बनलाह। ई अभिशाप कविक कम आ मैथिली आ भारतीय साहित्य आ आलोचनाक बेसी अछि।

कृपा नन्द झा
महासचिव, भारत
अंतरराष्ट्रिय मैथिली परिषद

मैथिलक जन नायक चुनचुन मिश्र (25/10/194216/11/2010)
चुनचुन मिश्र ओ मुखियाजी  जीक 25/10/1942  केँ भारतक आजादीक सन्घर्षक गर्भसँ जन्म भेलनि। हुनकर जन्मक वर्ष हुनकर सम्पूर्ण जिनगीमे झलकैत रहल। ओ आजन्म मिथिला ओ मैथिलीक लेल संघर्षरत रहलाह। अपन जीवनक अन्तिम क्षण धरि ओ मिथिला राज्यक लेल संघर्ष करैत रहलाह। 16-11-2010 केँ 2 बजे प्रात: काल मिथिला  राज्यक सपना लेने  चुनचुन बाबू एहि दुनियाकेँ छोड़ि चलि गेलाह।
चुनचुन बाबूक जन्म रहिका गाम, तहिया दरिभंगा जिला आ आब मधुबनी जिलामे भेलनि। हुनकर प्रारम्भिक शिक्षा रहिका एवं वाटशन स्कूल, मधुबनीमे भेलनि। ओ 1960 ई  वाटशन स्कूल, मधुबनीसँ मेट्रिक पास केलनि। ओकरा बाद आर. के. कॉलेजसँ 1966 मे स्नातक कएलनि।
चुनचुन बाबूक विवाह 1960 ई मे श्रीमति प्रेमलता मिश्रक संग भेलनि। हुनका 4 पुत्र आ 3 पुत्री छथिन। सब पुत्र आ पुत्रीक विवाह दान भय गेल छनि। भरिघर नैत, नातिन, पोता आ पोती सब छैनि। निवर्तमान हुनक पत्नी रहिका मे परिवरक सन्ग रहिरहल छथि। 

समाजिक ओ राजननीतिक जीवन
1966 मे मिथिलाक महन सोसलीष्ट नेता बाबू सूर्य नरायण सिन्ह के सम्पर्क मे आबि सोसलीष्ट पर्टी के समर्पित कर्यकर्ता भय गेल छलाह्।

1978 ई मे ओ रहिका पन्चायत के मुखिया चुनल गेलाह्। पुन: ओकरा बाद 2001 में  मुखियाक चुनाव भेल जाहि में पुन: ओ मुखिया चुनल गेलाह्।

1980 ई में जखन मैथिली के दरकिनार करैत बिहार मे उर्दु के बढावा देल गेल त चुनचुन बबू मैथिली अन्दोलन में कुदि गेलाह्।

1992 मे जहन श्री लालू प्रसाद मैथिली के बी पी एस सी स निकालि देलखिन तखन मैथिली सेवी सब उग्र अन्दोलन कैलनि। ओहि में चुनचुन बाबू दिल्ली में आमरण अनसन पर बैसि गेलाह्।

2000 में मधुबनी में मैथिली के अष्टम शूची मे सामिल करवाक लेल आमरण अनशन पर पर 12  दिन तक रहलाह्।

1994 मे मिथिला राज्य सन्घर्ष समिति के उपाध्यक्ष मनोनीत भेलाह जकर अध्यक्ष डा जय कन्त मिश्र छलाह्। एहि संस्थाक संस्थापक सेहो डा जय कन्त मिश्र के नेत्रित्व मे अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक अन्तर्गत भेल छल्। जय कन्त बाबुक निधन के बाद राज्य सन्घर्ष समिति के अध्यक्षक भार चुनचुन मिश्र के फ़रवरी 2010 में देल गेलनि। हुनकर नेत्रृत्व में  मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर, समसतीपुर, पटना आदि कतेको जगह मिथिला रज्यक निर्माणक लेल धरना प्रदर्शन भेल्।

एकरा अलावा ओ नेपालक मैथिल मे सेहो क्रियासील रहलाह्। चुनचुन बबू जनकपुर, सिरहा, राजविराज, आदि मे सेहो मैथिली अन्दोलनकारी के मर्गदर्शक छलाह्। नेपाल मे हुनकर लोकप्रीयताक पता तखन चलल जखन हमरा ईमेल पर नेपालक 4-5 टा मुख्या अखबार मे छपल श्रद्दान्जलीक कटिंग आयल्।

विचारधारा
चुनचुन बबू के जीवन, सन्घर्ष करवाक तरिका ओ जुझारूपन में सोसलीज्म झलकैत रहल। एकटा आधा बाहि वाला कुर्ता, दू टा कपरा वाल गन्जी, एकटा गमछा आ एकटा धोती बस, सबटा एकटा झोरा मे। कोनो लाम काफ नहि। कोनो रिजर्वेशन के चिन्ता नहि। जेबी में पाई अछि की नहि तकरो चिन्ता नहि। कहब छलनि जहन समाजक काज कारैत छी त समाजे ने पूरा कर्तैक सबटा! ककरो डर नहिं। मधुबनी, दरिभंगा, मुजफ़्फ़रपुर बेगूसराय, भागलपुर, देवघर, जनकपुर, सिरहा, सुरसरि, कानपुर, बम्बई, दिल्ली, हैदराबाद आ कतय नहि, चुनचुन बाबू सबठाम्।

आन्दोलन मैथिली के अष्ट्म सुचीक लेल हो, मिथिला राज्य के लेल हो, या सैराठ सभाक उत्थान के लेल चुनचुन बाबू के अगुआ बिना एखन धरि कोनो कार्य सम्भव नहि भेल छल्। दिल्ली मे हुनका देखितहि Intelligence ओ दिल्ली पुलीस सब कहनि, आ गये मिथिला राज्य वाले। 22-12-2009 क जन्त्तर मन्तर पर एकटा पुलीस कहलकनि बाबा आप चौरहे से पीछे जा कर धरना पर बैठिये, यहाँ जाम लग जयेगा चुनचुन बाबू कहल्थिन कोनो हम पहुनाई करय आयल छियैक, हम त धरना पर आयल छियौक, बैसबौ त एहिठाम, हिम्मत छौ त पकरि क हमरा जहल में दय दे। ओहि समय मात्र 15-20 आदमी जमा भेल छलाह्।

चुनचुन बाबू के 27/11/2010 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषद मैथिलक जन नायक के उपाधि स सम्मानित केलक्।

हमर परिचय
चुनचुन बाबू स हमर पहिल भेंट 2005 के अन्तरराष्ट्रि मैथिली परिषदक, जयपुर सम्मेलन में भेल छल्। तहिया स ओ हमरा लेल ओ आदर्नीय आ अनुकर्नीय मैथिली सेवी रहलाह्। आब ओ किछु दिन स अस्वस्थ रहैत छलाह्। 16-10-2010 क बेनीपट्टी क्षेत्र जयबा काल हुनकर अन्तिम दर्शण भेल आ तखनहु ओ स्वस्थ नहि छलाह मुदा कहलनि जे 2012 मे मिथिला राज्यक लेल पूरा दरभंगा मधुबनी जाम कय देबैक। ओ कहलनि जे दिसम्बर मे जन्त्तर मन्त्तर पर धरना पर बैसवाक लेल आबि रहल छी। पुन: भेंट होयत।

हमरा नहि बूझल छल जे चुनचुन बाबू स पुन: भेंट नहि होयत। परन्तु एहि मैथिलीक सपूत के हम आजन्म नमन करैत रहब आ हुनकर मिथिला रज्याक सपना पुरा करब। माँ मैथिली अहाँके शान्ति दैथि चुनचुन बाबू।

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...