Wednesday, January 12, 2011

'विदेह' ७३ म अंक ०१ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७३) PART V


३. पद्य



  




३.६.१. अजित मिश्र- नब वर्ष/ सुन्दर मनगर पर्व महान २. डॉ. शेफालिका वर्मा- नव वर्ष ३. सतीश चन्द्र झा- नव वर्ष ४.सुबोध ठाकुर- प्रतीक्षा

३.७.१.किशन कारीग़र- आबि गेल नव वर्ष २.  राम वि‍लास साहु -कवि‍ता- कोइली कूहकै आमक डारि

  



 


१.आरसीप्रसाद सिंह- गुलाबी गजल २. डॉ. नरेश कुमार वि‍कल’- दूटा आर गजल ३.मुन्नाजी- दूटा गजल

आरसीप्रसाद सिंह 1911-1996
जन्म: ग्राम-एरौत, जिला-समस्तीपुर । प्रकाशित कृति: माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी (कविता-संग्रह), मेघदूत (अनुवाद), आरसी, नन्ददास, संजीवनी (हिन्दी काव्य संग्रह)। सूर्यमुखीलेल १९८४ मे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त ।

गुलाबी गजल

अहाँक आइ कोनो आने रंग देखइ छी।
बगए अपूर्व कि‍छु वि‍शेष ढंग देखइ छी।
चमत्‍कार कहू, आइ कोन भेलऽ छि‍ जग मे?
कोनो वि‍लक्षणे ऊर्जा-उमंग देखइ छी।।
बसात लागि‍ कतहु की वसन्‍तक गेलऽ ि‍छ,
फुलल गुलाब जकाँ अंग-अंग देखइ छी।।
फराके आन दि‍नसँ चालि‍ मे अछि‍ मस्‍ती,
मि‍जाजि‍ दंग, की बजैत जेँ मृंदग देखइ छी।।
कमान-तीर चढ़ल, आओर कान धरि‍ तानल,
नजरि‍ पड़ैत ई घायल, वि‍हंग देखइ छी।।
नि‍सा सवार भऽ जाइछ बि‍ना कि‍छु पीने,
अहाँक आँखि‍मे हम रंग भंग देखइ छी।।
मयूर प्राण हमर पाँखि‍ फुला कऽ नाचय,
बनल वि‍ऽजुलता घटाक संग देखइ छी।।
लगैछ रूप केहन लहलह करैत आजुक,
जेना कि‍ फण बढ़ौने भुजंग देखइ छी।
उदार पयर पड़त अहाँक कोना एहि‍ ठाँ?
वि‍शाल भाग्‍य मुदा, धऽरे तंग देखइ छी।।
कतहु ने जाउ, रहू भरि‍ फागुन तेँ सोझे।
अनंग आगि‍ लगो, हम अनंग देखइ छी।।

डॉ. नरेश कुमार वि‍कल

दूटा आर गजल-
गजल-1

तन भि‍ंजा कए मन जराबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न।
वि‍रह-वेदन तान गाबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न।

खेलि‍ कऽ बरसात अप्‍पन वस्‍त्र फेंकल सूर्यपर
चानकेँ सेहो लजाबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न।

मधुर फूही भरल अमृत सँ प्‍लावि‍त ई धरा
पान महारकेँ कराबए आबि‍ गेल साओन केर दि‍न।

ई बसातक बात की हो अनल-कन-रंजि‍त बहए
मोनकेँ पाथर बनाबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न।

खोहमे खोंताक खूजल द्वारि‍पर वि‍धुआएल सन
वि‍रहि‍णीकेँ बस डराबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न।

बाध हरि‍यर, बोन हरि‍यर हरि‍यरे चहुँ दि‍स छै
धूरसँ आङन सुखाबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न।

बांसुरीपर टेरि‍ रहलै के एहन रस-रोग राग
भेल भुम्‍हूरकेँ पजारए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न।

सि‍मसि‍माहे नूआ-सन झपसीमे लागए सहज-मन
सतलकेँ आओरो सताबए आबि‍ गेल साअोन केर दि‍न।


गजल- 2

शेषांशपर रोदन करू वा गीत उदि‍त भानपर।
कि‍न्‍तु आफत अाबि‍ पहुँचल मान और सम्‍मानपर।
दीप जम्‍बूद्वीप केर नि‍त्त अकम्‍पि‍त भए जरए
यएह सोचब ि‍थक कठि‍न अनीति‍ केर दोकानपर।
भेल वृद्धि‍ ज्ञानमे, वि‍ज्ञानमे, संधानमे
जन्‍म दर केर बात की वृद्धि‍ उत्‍थानपर।
कि‍न्‍तु नैति‍कताक अवनति‍ आचरण, सम भावमे
देश हि‍त केर बात तँ चलि‍ गेल कोठीक कान्‍हपर।
देश गांधी, बुद्ध केर रहि‍ गेल ने सुभाष केर
देश ई नाचए सदति‍ घोटाला सबहक तानपर।
आब वि‍चरण कए रहल नरभक्षी दोसर वेशमे
छैक कनि‍को ने दया एे नेना केर मुसकानपर।


मुन्नाजी
दूटा गजल
परम्परा भऽ गेल अछि अछैत आधुनिकताक फेरमे
पहिने दुसै छल नाङ्गटकेँ जे आब चलै-ए हँजेरमे

बिसरि जाइ अस्तित्व अपन बनि जाइछ पिछलगुआ
उतरि जाइए निचला सीढ़ी धरि ओहो पाइक फेरमे

फूस घरो नै छलै आ तकै-ए पक्का अराम तलबी लेल
मुदा बेरोजगार लोक काटि लै-ए राति बालुओ ढेरमे

कहियो लोक मरय लागल छल पर लोकक डाहिसँ
आइ निजकेँ करैए निजगुत माँझ आनि कऽ कछेरमे

घेरल जिनगीक सीमासँ दूर भऽ कऽ लोक आब चाहैए
जीतऽ चाहै-ए बैसारीमे घीचि कऽ टांग दोसराक बेरमे

अखनो बाँचल छै संवेदना कोनो लोकक बीच कतहु
लोक मूनि लै-ए आँखि दोसराक संग होइत अन्हेरमे

बढ़ि गेलैए भागा-दौड़ी तेँ मनोज कऽ लै-ए चौरी कनेक
तेँ लोक आब मरय लागल अछि उमरक अधेरमे


झूकि जाइत छल पहिने माथ कोनो छोट काजपर
बदलि रुखि नीच काज बिन पाइ उड़ै जहाजपर

विषमता दूर भेल जातिक भऽ जीवै-ए रह-रहाम
चुप अपना बेर टिकै नै छै मोन सर-समाजपर

अपना अपनीकेँ समेट जीबैए आब सभ लोक तेँ
देखै टुकुर मुँह बन्न रखै काज अनसहाजपर

लोक लोककेँ चिन्है छलैए देखवै छल मनुक्खता यौ
बिसरि समाज टिकल रहै मोन केवल व्याजपर

दुनूक खाधिकेँ मनोज पाइक बलेँ पाटऽ जे चाहै-ए
अप्पन हानि सँ दुखी नै आँखि छै दियादक लाभपर
रवि भूषण पाठक
एहि बेर छठि मे

एहि बेर छठि मे
पहिले छठि मे सूर्यदेव उगति छलाह
या तखुटेरी बाबू कगाछी कपाछू
या निसहरा पोखरि कपाछू
कोनो-कोनो बेर शशि बाबू कगाछी कबीच सँ
आ कोनो बेर मझिला कक्का कबँसबीट्टी कपाछू
एहन बात तकहियो नहि भेलए
कि ओ टेलीफोन टावर कपाछू सँ उगथि
या डाक्टर साहेब कदूमहला कपाछू
एहि बेर स्कूल कमोटका हेडमास्टर आश्वस्त छथि
मध्याहन भोजन कपहिल कर भगवान खाइथ छथि
हमरे घर कपाछू किएक ने उगताह ?
मुक्खन के जोतखी जी कहने छथिन्ह
भगवान अहँा के छोड़ि के कतजेताह ?
भुटकुन बाबू आ मुंशी जी डराएल छथि
कि भगवान रस्ता बिसरि जेताह ?
बच्चा बाबू एकटक लगेने छथि
सबसँ पहिले ओ भगवान के देखि के
खूब जोर सँ चिकरताह
देखियौ देखियौ भगवान तएहि बेर मन्दिर कपाछू सँ निकललाह ।
जुआएल कुहेसा आ भपाइत पोखरि मे सब भक- चक छथि
तखने बटोरन बाजल
भगवान तएहि बेर दुसधटोली कपाछू सँ उगि रहल छथि
मुक्खन मुखिया,डाक्टर आ मास्टर साहेब दुसधटोली दिसि देखि रहल छथि
सूर्यदेव उगए वला छथि
दुसधटोली कपाछू आकाश टकाटक लाल छलए...........
१.राजदेव मंडल -झगड़लगौना पि‍शाच/  गाछक बलि‍दान /  हेराएल २.जगदीश प्रसाद मंडल २ टा गीत-
बीतल बर्खक वि‍दाइ/ फनकी

राजदेव मंडल

(1) झगड़लगौना पि‍शाच
ई झगड़लगौना पि‍शाच
नै आबए देलक अपनापर आँच
रखने सभसँ मेल
खेलैत रहल झाँपल खेल
जेकरा संगे करै ई कनफुसकी
तेकरा मुखसँ उड़ि‍ जाइत मुसकी
ओ करै छल रगड़ा
ताकऽ लगै छल झगड़ा
एको घर नै छोड़े छल लड़ैया बोखार
एकटा रोकनाइ भऽ गेल छल बेसम्‍हार
फैला रहल छल दोग-दोग
भऽ गेल हो जेना संक्रमक रोग
घर-घर छीटै छल झगड़ाक बीया
झगड़ाक बाद फटै सबहक हीया
नव शक्‍ति‍ नि‍त रोज
करए लागल बेमारीक खोज
धरा गेल सीपपर आइ
भगै केर नै‍ रहल कोनो उपाए
एना नै करि‍ओ छान-बान्‍ह
एतेक नै करि‍ओ अपमान‍
कि‍छ हँसैत कि‍छ रहल कानि‍
मुँह लटकौने पि‍शाच सभकुछ जानि‍
कानि‍-कानि‍ पएर लेलक छानि‍।

(2) गाछक बलि‍दान

गाछसँ घेरल चारूभर
मध्‍यमे छल दूटा घर
चारूभरक गाछ झड़कि‍ गेल
तैयो आगि‍ नै‍ बहरा भेल
ईश्‍वर केहेन रचना रचि‍ गेल
दूटा घर जरल सौंसे गाम बचि‍ गेल
तोरेटा घर भेलह बरबाद
भगवानकेँ दहक धन्‍यवाद
केकर कऽ रहल छी यशोगान
पहि‍ले दि‍औ गाछक मान
तब करब ईश्‍वरक सम्‍मान‍
तँए बचल कतेकोक धन आ जान
गाछ नै भेल पाछ
नै तँ सौंसे गाममे आगि‍ करैत नाँच
यएह गप्‍प छै साँच
हमहूँ नै हएब पाछ
फेर रोपब दू-चारि‍ गाछ।

(3) हेराएल

हे यौ, हम हेरा गेल छी
अन्‍हारमे घेरा गेल छी
कोनो बाट नै भेटैत ऐछ
बौअए गेल छी
औअए गेल छी
ऐ गामक की नाम छि‍ऐ यौ
घुरि‍या रहल छी चारूभर
कोन घर छि‍ऐ हमर
भटकि‍ रहल छी दर-दर
नै भेट रहल ऐछ घर
हे यौ कोन दुआरि‍ ऐछ हमर
सुनै छी फटकार भरल स्‍वर
भीतर काँपि‍ उठल थर-थर
बड्ड बजै छह चर-चर
की नाम छि‍अ तोहर‍
बि‍सरल छलहुँ गाम
आब तँ बि‍सरि‍ गेलहुॅँ नाम
कहए पड़त हम के छी
स्‍वयं जानए पड़त हम जे छी
नै तँ जीनगी भऽ जाएत अकारथ
नै भेटत परमारथ।
जगदीश प्रसाद मंडल

 २ टा गीत-
बीतल बर्खक वि‍दाइ

अंति‍म सत्‍कार सुनू शि‍कारी
अंति‍म दि‍न कहै छी
अंति‍म बात सुना-सुना
अंति‍म सत्‍कार करै छी

हँसैत रहू सदति‍ अहाँ
हमरो तँ जीबए दि‍अ
सभ कि‍छु तँ लैइये लेलौं
एतबो तँ बाजए ि‍दअ

नोर पीब हृदए अहाँक
शीतल सदति‍ रहैए
मनक ताप झहड़ि‍-झहड़ि‍
सगतरि‍ तँ कहैए।

कवि‍ता-
फनकी

फनकी बना फसा शि‍कारी
फसौलक सौंसे जंगलकेँ
बगरा-बुगरीक चर्चे कते
नथलक बाघ, गेंड़ा- घोड़ाकेँ
खढ़-पातक बना-बना
बुनलक सक्कत जाल
घुमा फेकैत भीड़ो कहाँ
बनि‍ गेल तऽरे तऽर महजाल
खढ़क फनकी लगल बगड़ाकेँ
तैंइतमे फसि‍ गेल सि‍यार
डोराक फनकी लगल साँपकेँ
भ्रमक फनकी फसल बुद्धि‍यार।।
राजेश मोहन झा- कवि‍ता-
 राजेश मोहन झा 'गुंजन'
कवि‍ता
      सुगर फ्री

सुगर फ्री सभ सुगर फ्री
आब चीनी सेहो सुगर फ्री
संवतक पूआ गेल पनि‍आएल
गनि‍ कऽ हूरथि‍ श्रीमती आ श्री।
आॅखि‍ ऑखि‍पर गि‍लास गार्ड छै,
भरि‍ गेल मधुमेह वार्ड छै
चूड़ा-दही संग टेबलेटक डि‍ब्‍बा
खाइत रहू वन-टू-थ्री
'ि‍नरामया' भेल जीवनक मील
मुँहक चक्कीमे टीश उठल छै
जमैन सोंफ संग देखू पान-बीड़ी
देहक पलंगमे उड़ीया भरल छै
जोड़क झटका धीरे लगथि‍
लस्‍सी पुष्‍प रससँ नेना सभ भागथि‍
बर्गर-चि‍प्‍सक एलै जमाना
बढ़ि‍ रहल चाउमीनक बि‍क्री
गाम धरमे डॉ. भरल
नाली बन्‍द पाॅलीथीन सभ पड़ल
दूधमे सोतीक पानि‍ लबालब
सोमरस मदि‍रा सभ टेक्‍स फ्री
आंग्‍ल वाणी श्रृंगार बनल छै
मातृभूमि‍केँ बि‍सरि‍ रहल छै
अपन मैथि‍ली अछि‍ मधुराएल
ई नहि‍ बूझब सुगर फ्री

  १.नवीन कुमार "आशा"- हमरा भेटल २.शंभु नाथ झा वत्सउग्रवादी बनि जाए।
      

       
नवीन कुमार "आशा" (१९८७- )
पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा।
हमरा भेटल

हमरा भेटल एकटा विषय
ओइ लेल भेटल किछु समए
कहल गेल हमरासँ मीत
लिखू युवा वर्ग लेल गीत
फेर माँगल किछु समए
आ युवा मंचमे पैसल हम
देखि हुनकर स्फूर्ति
मन भऽ जाय प्रसन्न
ई देखि कही मनसँ
ई छथि देशक भविष्य
ऐ सँ नै कियो अनजान
एतए सोचि बढ़ल मन
फेर आएल दममे दम
फेर कलम आगू बढ़ल
आब केलक किछु लिखैक मोन
युवाक मन हम जानी
हुनकर दुख-दर्दकेँ जानी
कि होए हुनकर अभिलाषा
जँ युवा आगू बढ़ता
तँ समाजक सम्मान बढ़त
फेर राज आओत युवा वर्गक
ऐ मे नै संदेह रहत

हमरा भेटल...।

शंभु नाथ झा वत्स
उग्रवादी बनि जाए।


की कहब यौ लल्लू बाबू,
देश-गाम केर हाल।
कतओ बाढ़ि कतओ अछि सूखल,
मजूर गृहस्थ बेहाल॥

महँगीक मारि-हारि जीवनसँ,
कृषक तजै अछि प्राण।
तेओ नारा बुलंद करै छी,
हम्मर देश महान॥

जेकर वोट सँ राज करै अछि,
तेकर फाटल लत्ता।
सांसद सदन मे छोड़ि समस्या,
बढ़बए वेतन भत्ता॥

जेकर श्रम सँ देश पालित अछि,
तेकर जियब अछि धनि सन।
अपराधी जँ सदन पहुँचि गेल,
तेकर आजीवन पेंशन॥

नेता सभ केर करनी देखि कए,

किछु नहि फुरए उपाय।

मोन होइये जे कलम छोड़ि केँ,

उग्रवादी बनि जाए॥
१. अजित मिश्र- नब वर्ष/ सुन्दर मनगर पर्व महान २. डॉ. शेफालिका वर्मा- नव वर्ष ३. सतीश चन्द्र झा- नव वर्ष ४.सुबोध ठाकुर- प्रतीक्षा

अजित मिश्र
नब वर्ष
शुभ-शुभकेँ नब वर्ष तुलाएल
गवति वन्दन दृष्टि समाएल
         होएत चहु दिस नीक धमाल
बता रुपमे करब कमाल
नि जाएब सभ मालोमाल
         वर्ष एगारहकेँ मणिमाल
म्हर-ओम्हर सभ खुशहाल
गाएब मन भरि मचे धमाल
हब ने केओ कतहु पमाल
मर मनोरथ पूरए ई साल।।
 सुन्दर मनगर पर्व महान
     सुन्दर मनगर पर्व महान
     खाजा मुंगबा भरे जहान
     l
     सुनगल उकक करे भसान
     कण-कणमे जत नब उठान
     राजा- रंकसभ एक समान
     तीत-मीठ आ बिसरि गुमान
     l
     दिआबाती पर्व महान
     आन-अपन, एक जुटान
     बाटए चहु, ई मुसकान
     तीरथ सुख भरे- जहान


       डॉ. शेफालिका वर्मा 
नव वर्ष 

अंक कें बदलि गेनाय 
बरिस कें बदलि गेनाय 
नव वर्ष थीक की ?
एकटा कैलेण्डर हँटेत  अछि दोसर 
लैग जायत अछि आ 
बरस बदलि जायत अछि ..........
मोन क तह में डूबल 
शब्द क रस में तितल 
राति वैह ,दिन वैह
कैक्टस में खिलल फूल जकां
बरस बदलि जायत  अछि ...............
चारु दिस  भीड़ भरल , सब किछ  ऐन्ठायल 
चेहरा पर चेहरा ओढने 
लोग कोना जिवैत अछि
की
 
मोन नहि हुनक कचोटैत अछि ?
सब टा खाली खाली लगैत अछि 
बरस बदलि जायत अछि .....................
दिन पर दिन बीती रहल नहि बीती रहल 
छी हम 
बाट भागी रहल ,नहि भागि 
पवैत छी हम 
कखनो बाट हमर  ,कखनो बाट हमही 
बनि जायत छी 
ख़त्म नहि होयत साँस हमर 
बाट ख़तम भ जायत अछि 
बरस बदलि जायत अछि ....................
नहि कोनो कामना नहि कल्पना 
एकटा बस 'एहसास 'अछि 
छौर  जकां ठोर स लागल
एकटा आर साल उदास  अछि
कांट में बिहुँसल जेना  गुलाब अछि ..... ...
सतीश चन्द्र झा
नव वर्ष
आयल नव वर्षक नव प्रभात
आँगन -आँगन उतरल उमंग।
सभकें शुभ मंगल करथु देव
नहि उतरय दुख के अशुभ रंग।

बीतल जीवन के बिसरि करब
आगत के स्वागत आइ फेर।
नव नव आशा विश्वास संग
जीवन किछु आगाँ चलत फेर।

जीवन के बीतल दुख विपदा
मदमस्त पवन ल
उड़ि जायत।
मोनक कागत के अमिट शब्द
नव समय संग किछु बहि जायत।

घुमि रहल समय छै गोल-गोल
विश्राम कतौ नहि कतौ अंत।
प्रारंभ-अंत
,निर्माण-नाश
चलि रहल चक्र भव मे अनंत।



संकल्प लिअ एहि वरख फेर
सभ चलब
, कहत जे शुभ विवेक।
हम देब संग नहि अन्यायक
सत्कर्मक शुभ छै फल अनेक।



सुबोध ठाकुर
गाम- हैंठी बाली, मधुबने सुबोध जी चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट छथि।


प्रतीक्षा
भेल जखन-जखन किछु इच्छा
करए पड़ल तखन-तखन प्रतीक्षा

जिनगीक बाटमे सगरे भेटल चौबटिया
जाएब केम्हर किछु फुराइत नहि
छी एकसरे नहि संग सह-बटोहिया

काटल कतेक राति गुज-गुज अन्हरिया सनक
जे आएत किछु दिन उपरान्त खिल-खिलाएत, राति इजोरिया सनक
जुनि पूछू हाल अखनो धरि देमए पड़य अछि परीक्षा
कए रहलहुँ अछि अखनो धरि ओहि क्षणक प्रतीक्षा

उठए बेर-बेर सवाल मनमे
फँसै छी सदिखन अही अन्तर्द्वन्द्वमे
जे केहेन निःशोख आ निर्लज्ज होइ छै इच्छा
जे करए पड़ै छै जेकरा लेल प्रतीक्षा

जे जोगी बनए वा बनए संत
नहि छोड़ए ओकरो अही प्रतीक्षाक फन्द
रहए ओकरो परम धाम पाबैक इच्छा
करए पड़ै अहि लेल तप आ प्रतीक्षा

जन्म बालक जे लए तँ ओकरा माइक दूधक इच्छा
जे किशोर भेल ओकरा खेल आ उमंगक इच्छा
जे जवान भेल ओकरा सुन्दर रमणीक इच्छा
तँए कहए सुबोध दैत ई शिक्षा
जँ चाह अनन्त आ अद्वितीय इच्छा
तँ करए पड़त निश्चय प्रतीक्षा
किएकि जिनगीक माने छिऐ प्रतीक्षा
१.किशन कारीग़र- आबि गेल नव वर्ष २.  राम वि‍लास साहु -कवि‍ता-
कोइली कूहकै आमक डारि‍

किशन कारीग़र
आबि गेल नव वर्ष।

प्रणाम-प्रणाम औ भाई कि भेल औ भाई
हृदयक स्नेह पठा रहल छी औ भाई।
आबि गेल नव वर्ष मंगलमय संसार हुए
विश्व शांति लेल मंगल कामना करैत छी औ भाई।।

नव वर्षऽक नएका-नएका बसंती उमंग
सभ मिली बनभोज करब दोस महीमक संग।
हम बजाएब ढ़म ढ़म ढ़ोल अहॉ गाउ गीत
कक्का खुशी सॅं बजा रहल छथि मृदंग।।

कक्का बजलाह कहू की हाल-चाल
काकी बजलीह आबि गेल नवका साल।
आई सभ मिली एक संगे खशी मनाएब
हृदयक स्नेह हम सभ केॅं पठाएब।।

नवका आंगी नवका नुऑं
नवकी कनियॉं पुरी पकाबैए।
बुढ़बा बाबा बड़-बड़ बाजैए
धिया-पूता खूम उधम मचाबैए।।

पठबैत छी किछू नव-नव सनेश
ई सनेश अहॉं सहज स्वीकार करू।
नव वर्षऽक अछि सादर शुभकामना
सदखनि अहॉं हॅसैत मुस्कुराइत रहू।।

जहिना चमकै छै चकमक चॉंद
ओहिना अहॉं चमकैत रहू।
एतबाक करैत छी हम कामना अपना माटि-पानि लेल
किछू सार्थक काज करैत रहू।।
 
 राम वि‍लास साहु
कवि‍ता-

कोइली कूहकै आमक डारि‍

कोइली कूहकै आमक डारि‍
सुनि‍ हमर मनुआ घबराए
पि‍या हमर रहि‍ताए तँ
धीरज दैताए बन्‍हाइ
अन्‍हरि‍या राति‍ हम
बाट देखैत दुनू आँखि‍ नि‍हारि‍
इजोरि‍या राति‍ हम चान देखैत
चकवा-चकोर बनि‍ जाइत
चन्‍दा बादल लुक-छुप खेले
पि‍या रहि‍ताए तँ हमहुँ
संगे खेलतौं वहि‍ने
कोइली बोलीसँ हमरा
दि‍लमे लगैए गोली
पि‍या रहि‍ताए तँ कि‍छु कहबो कैरतौं
अनका कोना कि‍छु कहबै
पि‍या परदेशि‍या बर नि‍रमोहि‍या
कहि‍या बनत हमर रखबैया
कोइली बोली सुनि‍ हमर
देह भए जाइए बहि‍र
ककरा कहबै ई दूखक बात
कोइली कूहकै आमक डारि‍।।
गंगेश गुंजन

राधा- २८ म खेप

पछिला खेप अपने पढ़ि चुकल छी--
 हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर
से सब सखि केर अनुभव
वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि
बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि
सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा...एखन कत' छथि कृष्ण ?”
 
आब आगाँ पढ़ू-
स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपन गामक नाम
स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम अपनो जन्मस्थान
स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम प्रायः सबकिछु सब बात
स्वयं जेना छी बिसरि गेल हम स्वयं अपन अस्तित्व
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी आँगन सँ यमुनाक बाट
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय जमुना स्नान
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सखि-बहिनपाक नाम
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनहि मथुरा धाम
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी कदमक वनक छाया
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा जीवन कर्म
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी लोकक दुःखक मर्म
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अपनो प्रतियें माया
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी देह दशा कें देखब
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवित प्राणें रहब
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्नक जलक स्वाद
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी ककरो किछुओ कह'
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अक्षरक अभ्यास
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी मोसि-कलम, लीखब
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी प्रिय सँ प्रिय सम्बोधन
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा गीतक भास
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जीवन केर मधुमास
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबटा हास-हुलास
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी संगी संग विलास
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी दशो दिशा केर ज्ञान
 

स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी, के अप्पन अछि आन
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी सबकिछु के अस्तित्व
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी की थिक छोट महान
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी अन्हरिया आ इजोरिया
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी भेद सूर्य आ चन्द्रक
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी स्नेहसिक्त स्मृति-संयोग
स्वयं जेना हम बिसरि गेल छी जे सब किछु बिसरल छी
किन्तु स्वयं यदि छी बिसरल सब तँ किएक बेचैन अछि प्राण ?
पूछथि राधा विकल हृदय कियेक अबैत अछि कृष्णक ध्यान?
झर झर झर झर अश्रुपात भदबारि जकाँ भ' जाइछ आरम्भ ।
 

सबटा ई मिथ्या अनुभूतिक छद्मजाल थिक सबटा ई मन कें पतिअयबाक करब प्रबोधन चित्त कहाँ स्थिर चिन्ता सँ कहाँ मुक्त अछि
ई जे मोन महासंकटक ब्यूह-रचना सन
कए तँ देल प्रवेश मुदा अज्ञात दिशा बीच
बूझल नहि आरंभ अर्थात प्रवेश आ तहिना
करी कोना क निकास द्वार सबटा बंदे बन्द
एहन मनोभावक उद्दाम ज्वारि मे ई इच्छामृग डूबि-डूबि रहलय समुद्र मे जेना छोटछिन नाव
एकहि क्षण मे ब्यूह मध्य जे प्राण हमर ई
ऊँचे ऊँच समुद्र ज्वारि मे पड़ि जाइछ असहाय ककरा पारओ सोर होय के एहि स्थिति मे जे आबय
जे सहाय संभव छथि से छथि अपने मे ध्यानस्थ
हुनका कोन फिकिर ककरो, कथूक प्रकारक अपना मोनक महाशान्ति मे किएक हेतनि आन्दोलन
भने स्नेह आक्रान्त बन्धु पर्यन्त मरैत हो व्याकुल
 
किएक कोनो चिन्ता, जिज्ञासा किछुओ करब पुछारी
भरिसक एहिना ,एही प्रकारे हमहूँ आब मरब जानब अपने हे माधव जानब, हम नहि आब सहब
केहनो मोहिनी स्वर्गीय मधुरी वाणी अहाँ जे कहब
 
नः अइ संसार मे आब हम नहियें टा र'हब
किएक रहब,एतेकटा जीवन ऊघि-ऊघि कतबा दिन आरो ?
बाजू आ किएक ककरा लेल ककर हित, मित्र ! कथी लए...?
 
बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें कारागृह बना दैये
बहुत प्रतिष्ठा बना दैछ जीवन कें अवग्रह
बहुत प्रतिष्ठा कुल-संबंध- समाज छोड़ा दैये
बहुत प्रतिष्ठा जीवन कें संसार छोड़ा दैये
बहुत प्रतिष्ठा कउखन तेहेन प्रतिष्ठित क' दैये बहुत प्रतिष्ठा भ'लो कें अ-लोक बना दैये
बहुत प्रतिष्ठा बना राखि दय भथल इनार
 
       
....जारी

विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर)

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 


२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

३.श्वेता झा (सिंगापुर)



बालानां कृते

१. गजेन्द्र ठाकुर- बड़द करैए दाउन ने यौ २. नवीन कुमार आशा- याद अबैए बाबाक लावा

गजेन्द्र ठाकुर
बड़द करैए दाउन ने यौ
हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि
हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि
ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर
लिह लिह बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ

अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी
कैटी पिसू-पिसू आएत की?
चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल,
भागी छोड़ि बाट हम ताकी
अर्र बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ


ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू
साँढ़ आओत खरिहानमे यौ
आव ठामे रे हे, हौरे हौ
बड़द करैए दाउन ने यौ
नवीन कुमार आशा (१९८७- )
पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा।

याद अबैए बाबाक लावा
(अपन बाबा स्व. सोमनाथ झाकेँ समर्पित)

मालिक मालिक मालिक
भोरे ओ आवाज लगाबथि
हमराले ओ आनथि सनेस
चाहे रहनि कोनो भेष

एक दिन ऐला बाबा
हाथमे छलनि हुनका लाठी
छलनि किछु मन सुस्त
मुदा ओ छलथि एखनो मस्त
हम पूछल हुनकासँ मीत
की भेल अहाँकेँ बाबा
कतए अछि हमर लाबा

कहलथि हमरासँ बाबा
नै अनलियौ तोरा लेल लाबा
मन भेल हमर फुस
नै बुझल जे कहलथि ओ फुसि
फेर लगला बाबा हँसए
आ देलथि ओ सनेस
कहलथि ओ हमरासँ
बौआ जाधरि अछि प्राण
ताबे रहत तोहर ध्यान
तूँ छह मालिक तूँ छह नेना
नै रहू अए तूँ जेना तेना

नै बुझि पाओल हुनकर कष्ट
की कहला ओ स्पष्ट
ओहि दिन जे गेला बाबा
नै फेर अनला लाबा
दोसर दिन जखन उठल
नै पाओल हुनकर आवाज
हाथमे लेने कटोरा
पहुँचि हुनकर डेरा
पाओल हुनका टघरल
फेर कहल हम हुनकासँ
सुनू यौ बाबा, सुनू यौ बाबा
कतए अछि आजुक लावा

नै कहला हमरासँ किछु
नै बुझि सकलौं हम ई
नै रहला ओ जगमे

किछु कालमे भेल सभ इकट्ठा
फेर केलक हुनका बाहर
नै बुझि पाओल हम तखनहुँ
नै भेटत हुनकर फेर दुलार
जैमे छल नै कोनो भेद

याद जखन ओ आबथि अखनो
कानी हम फफखि फफखि
जहिया पाबी हम अपनाकें अकेला
जाइ हुनकर सारापर
फेर करी किछु गप
नै करी मन हप
कहियनि हुनकासँ मीत
बाबा याद आबैए अहाँक लावा
याद आबैए अहाँक दुलार



जे नै घुरि आएत फेर
करथि आशा अर्पित ई रचना
अपन परम पूज्य दादाजीकेँ
जिनकर अछि कमी आशाक जीवनमे
जखन देखथि कतहु लावा
याद आबथि हुनका बाबा


 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...