Wednesday, January 12, 2011

'विदेह' ७३ म अंक ०१ जनवरी २०११ (वर्ष ४ मास ३७ अंक ७३) PART II


२. गद्य











जगदीश प्रसाद मंडल
गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह आ तरेगण- बाल-प्रेरक लघुकथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।


एकटा दीर्घकथा मइटुग्‍गर आ एकटा एकांकी
समझौता

 
दीर्घकथा-
मइटुग्‍गर

जहि‍ना सरयुग नदीमे नहा भक्‍त मंदि‍रमे प्रवेश करि‍ते‍‍ भगवान रामक दर्शन करैत तहि‍ना तपेसर अंगनाक मेहमे आेंगठि‍ समाजकेँ भोज खुअबैक ओरि‍यान देख रहल छथि‍। पोखरि‍क पानि‍ जकाँ शीतल, शान्‍त समतल मन अंगनाक सुगंधमे मस्‍त छन्‍हि‍। तै बीच बेटी घुरनी चमकैत स्‍टीलक छि‍पलीमे पनरह-बीसटा सुखल बरी एकटा बर आ पानि‍ भरल गि‍लास आगूमे रखि‍ कहलकनि‍- कनी चीख कऽ देखि‍यौ जे नीक भेल आकि‍ नै‍?
मुस्‍कुराइत बेटी आ छि‍पलीमे सजल बर-बरी देख तपेसर हेरा गेलाह। मन पड़लनि‍ मइटुग्‍गर। मुदा चुल्हि‍पर चढ़ल लोहि‍या छोड़ि‍ अँटकब उचि‍त नै‍ बुझि‍ घुरनी चुल्हि‍ लग पहुँच गेली। कमलक फड़ सन एकटा बरी मुँहमे लैते मन पड़लनि‍ परि‍वारमे अपन कएल काज।

साओन मास। भोरहरबामे मेघ फटि‍ बरखो भेल आ अधरति‍येसँ जे पूर्वा उठल उठले रहि‍ गेल। कखनो काल झकसि‍यो अबि‍ते रहल। जेना-जेना दि‍न उठैत गेल तेना-तेना पूरबाक लपेट सेहो बढ़ि‍ते गेल। प्रसवक दर्दक आगम सुशीला सासुकेँ कहलनि‍। पुतोहूक बात सुनि‍ सुनयना बेटा तपेसरकेँ पलहनि‍ बजबए कहलखि‍न।

ओसारक ओछाइनपर आेंघराएल सुशीलाक मनमे लड़ाइ पसरि‍ गेलनि‍। एक दि‍स प्रसवक पीड़ा अपन दल-बलक संग अंगक पोर-पोरमे चढ़ाइ करैत तँ दोसर दि‍स जि‍नगीक कठि‍न दुर्गमे फॅॅसल मन खुशीक लहड़ि‍मे झि‍लहोरि‍ खेलाइत। नारी जि‍नगीक श्रेष्‍ठतम काज। जेहने भरि‍गर काज तेहने मुँहमंगा मातृत्‍वक उपहार। पूर्वाक लपेट देख सुनयनाकेँ ठकमूड़ी लगल रहनि‍। आइ धरि‍ प्रसव गठुलामे होइत रहल ऐछ‍। जहि‍ घरक टाट हवाक झोंककेँ नै‍ रोकैत। आश्रमक घर जकाँ टाटमे लेब नै‍ पड़ैत। मुदा बोनक बच्‍चाकेँ कोन घर रक्‍छा करैत ऐछ‍! गठुला छोड़ि‍ मालक घरमे ओछाइन ओछा देलखि‍न। ओछाइन ओछा हि‍यासए लगलीह जे अगि‍यासी भइये गेल, फाट-पुरान लइये अनलौं। मालक घरसँ हुलकी मारि‍ पुतोहू दि‍स देखलनि‍ तँ चैन बुझि‍ पड़लनि‍। मन असथि‍र भेलनि‍।

पहलनि‍ ऐठाम जाइत तपेसरक मनमे अपन काजक भार उठलनि‍। एहेन भारी काजमे पुरूखक काज की ऐछ‍? डेग भरि‍ हटल पलहनि‍क घर ऐछ‍ तेकर बाद? मचकीपर झुलैत झुलनि‍हार जकाँ तपेसर झुलैत पलहनि‍ ऐठाम पहुँच जनतब देलखि‍न। अपन उगैत लछमीकेँ देख मुस्‍की दैत पलहनि‍ कहलकनि‍- अहाँ आगू बढ़ू गाइयक थैर बनौने पीठेपर दौड़ल अबै छी।‍
पाँचो मि‍नट पलहनि‍केँ पहुँचला नै‍ भेल आकि‍ बेटाक जन्‍म भेल। धरतीपर बेटाकेँ पदार्पण करि‍ते‍ बि‍जलोका जकाँ परि‍वारमे खुशी पसरि‍ गेल। देह पोछैत पलहनि‍क मन चालीस तम्‍मा नि‍छौर, तै परसँ नि‍पनौन, लाढ़ि‍-पुरनि‍ कटाइक संग उपहार, पसारी छी तँए मंगवोक अधि‍कार एेछ‍ये जाइकाल एकटा सजमनि‍यो मांगि‍ लेब। सि‍दहा तँ देबे करतीह। हि‍साबमे मन बौआ गेलनि‍। समाजमे भगवान ककरो सनतान दै छथि‍न तैमे सझि‍या कऽ दैत छथि‍ ने। बच्‍चाक जि‍नगी हमरा हाथमे ऐछ‍, तहि‍ना ने अपनो जि‍नगी दोसराक हाथमे ऐछ‍। तरे-तर मन खुशी भऽ गेलनि‍। मुस्‍की दैत सुनयनाकेँ टोनलनि‍- काकी, पहि‍ल पोता छि‍अनि‍, रेशमी पटोर पहीरि‍बनि‍?
धारक बेगमे दहलाइत दादीक मन, मूड़ी डोलबैत बजलीह- एकटाकेँ के कहै सातटा पहि‍रेबह।‍
पलहनि‍- बच्‍चा मुँह, एन-मेन तपेसरे बौआ जकाँ छै।‍
पलहनि‍क बात सुनि‍ ओछाइनपर पड़ल सुशीलाक दर्द भरल देहक मनमे अपन सतीत्‍वक आभास भेल। मुदा अवसरकेँ हाथसँ नै‍ जाए दि‍अए चाहि‍ बुदबुदाएल- केहेन सपरतीभ जकाँ बजै-ए।‍ मुदा पलहनि‍ सुनलक नै‍। जहि‍सँ आगू कि‍छु नै‍ बाजलि‍।

झीलक पानि‍ जकाँ तपेसरक मन असथि‍र। सामान्‍य परि‍स्‍थि‍ति‍ तँए सामान्‍य मनक वि‍चार। जहि‍ना कठि‍नसँ कठि‍न, उकड़ूसँ उकड़ू काजपर लूरि‍ डटल रहैत तहि‍ना जि‍नगी काजपर नजरि‍ दौड़ैत मन डटल। मन कहैत बीस-एक्कैस बर्खक उम्रो छेबे करनि‍, रोगो व्‍याधि‍क छुति‍ देहमे नहि‍ये छन्‍हि‍। बेटापर नजरि‍ पहुँचते पुत्र सन सम्‍पत्ति‍क आगमनसँ मन फुला गेलनि‍। जहि‍ना लगौल गाछमे पहि‍ल फूल वा फड़ लगलापर बेर‍-बेर‍ देखैक इच्‍छा होइत तहि‍ना तपेसरक मनमे उठैत। बर्जित जगह बुझि‍ परहेज केने रहथि‍। मुदा तैयो जहि‍ना डॉट टुटल कमल हवाक संग पोखरि‍मे दहलाइत तहि‍ना खुशीक हि‍लकोरमे तपेसरक मन तड़-ऊपर करैत। मनमे उठलनि‍, पुरूष-नारी बीचक संबंधमे बच्‍चो पैघ शर्त्त छी। परि‍वारमे (संबंधमे) वि‍खंडनक संभावना बनल रहैत ऐछ‍। लगले मन अपनासँ आगू उड़ि‍ माए-बापपर गेलनि‍। हृदए वि‍हुँसि‍ गेलनि‍। जहि‍ना मातृत्‍व प्राप्‍त केलापर नारीक सौन्‍दर्य बढ़ि‍ जाइत तहि‍ना ने पि‍तृत्‍व प्राप्‍त केलापर पुरूषोकेँ होइत। लगले सि‍नेमा रील जकाँ बेटाक जन्‍मसँ अंति‍म समए धरि‍क जि‍नगी नाचि‍ उठलनि‍।
कि‍छुए समए बाद सुशीलाकेँ पुन: दर्द शुरू भेलनि‍। समएक संग दर्दो बढ़ए लगलनि‍। दुखक संग छटपटाएव शुरू भेलनि‍। सुशीलाक छटपटाहटि‍ देख सुनयना पलहनि‍केँ कहलखि‍न- कनि‍याँ, अहाँ देखि‍अनु ता बच्‍चा सम्‍हारि‍ दै छी।‍
पेटपर हाथ दैते पलहनि‍ बुझि‍ गेली जे दोसर बच्‍चा हेतनि‍। बजलीह- काकी, एकटा बच्‍चा आरो हेतनि‍?
पलहनि‍क बात सुि‍न, जहि‍ना मेघ तड़कैत तहि‍ना सुनयनाकेँ भेलनि‍। जोरसँ तपेसरकेँ कहलखि‍न- बौआ, बौआ।‍
अकचका कऽ तपेसर बाजल- हँ, माए।‍
हँ, अंगनेमे रहह।‍
करीब बीस मि‍नट पछाति‍ बेटीक जन्‍म भेलनि‍। अखन धरि‍ जहि‍ना खुशीक सुगंध अंगनामे पसरल छल एकाएक ठमकि‍ गेल। बच्‍चाक जन्‍म होइतहि‍ सुशीलाक देह लर-तांगर भऽ गेलनि‍। पलहनि‍ सुनयनाकेँ कहलनि‍- काकी, पुरबा लपटै छै। अगि‍यासी नीक-नहाँति‍ जगा देथुन ओना तँ सभ भगवानक हाथमे छन्‍हि‍‍ मुदा जहाँ तलि‍क पार लागत से तँ करबे करबनि‍। जानि‍ये कऽ तँ भगवान दुख बढ़ा देलखि‍नहेँ। ऐ (पहि‍ल)‍ बच्‍चापर इ नजि‍र राखथु ऐपर हम रखै छी। कहि‍ बच्‍चाक पोछ-पाछ करए लगली। साँस मन्‍द देख मुँहमे मुँह सटा फूकि‍ साँसक गति‍ ठीक केलनि‍। बच्‍चाक लक्षण देख पलहनि‍क मन बाजि‍ उठल। जरूर दुनू बच्‍चा ठहरबे करत। नजरि‍ पैछला काजपर पड़ल। एहेन की‍ पहि‍ल-पहि‍ल बेर‍ भेल। कतेकोकेँ भेलनि‍। कि‍छु गोटेक दुनू बँचलनि‍, कि‍छु गोटेक एकटा बँचलनि‍ आ कि‍छु गोटे बच्‍चाक संग चलि‍ गेलीह। ओना काज तँ अनि‍श्‍चि‍त ऐछ‍ मुदा अपना भरि‍ तँ ति‍या-पछा करवे करबनि‍। सुशीलाकेँ सुनयना पुछलखि‍न- कनि‍याँ मन केहन लगै-ए?
अर्ध-चेत अवस्‍थामे सुशीला अपन टूटैत जि‍नगी हाथक इशारासँ कहलकनि‍। मुँहक सुरखी कहैत जे नै बँचब। सुशीलाक इशारासँ सुनयना बुझलनि‍ जे तपेसर भारी वि‍पत्ति‍मे पड़ि‍ गेल। भगवानपर खींझ उठलनि‍। बेचारा फट्टो-फनमे पड़ि‍ जाएत। हम बूढ़े भेलौं, जएह कएल हएत सएह ने सम्‍हारि‍ देबै। मुदा वि‍पत्ति‍ तँ ततबेटा नै ने छै। खेती-पथारी, माल-जाल, कुटुम-परि‍वार छै तै परसँ दू-दूटा चि‍ल्‍का भेलइ। कना सम्‍हारि‍ पाओत। ने स्‍त्री बँचतै आ ने एक्कोटा बच्‍चा। हमहूँ कते दि‍न जीब। सभ ि‍कछु बेचाराकेँ हरा जेतै। हे भगवान, तोरा केहन दुरमति‍या चढ़लह जे एहेन गनजन बेचाराकेँ केलहक।

आंगनमे बैसल तपेसरक मनमे उठैत जे जतेटा मोटरी माथपर उठत ततबे ने उठाएब। नमहर मोटरी कते काल क्‍यो माथपर सम्‍हारि‍ कऽ रखि‍ सकैए। मुदा तँए की? जीत्ता जि‍नगी हारि‍यो मानि‍ लेब उचि‍त नै‍। करैत-करैत-लड़ैत-लड़ैत जे हेतै से देखल जेतै।

जहि‍ना रणभूमि‍मे दू दलक बीच लड़ाइ अंति‍म दौड़मे अबि‍ते दुनू दलक मन मानि‍ लैत जे के जीतत के हारत। मुदा हरलोहोक बीच कते रंगक वि‍चार उठैत। कि‍छु गोटे रणभूमि‍सँ भागए चाहैत तँ कि‍छु गोटे अढ़ भजि‍या नुकाए जाहैत। मुदा कि‍छु एहनो होइत जे अपन बलि‍ देख स्‍वेच्‍छासँ अंति‍म समए धरि‍ हथि‍यार उठौने रहैत ऐछ‍। कन्ना नै‍ उठाओत? अपन जि‍नगीक संगी, जे कौआ-कुकुड़क पेट भरि‍ अपन मनोरथ पूरा करत, आ हम गुलाम बनि‍ दुश्‍मनक जहलमे सड़ब।

अपन अंति‍म बात सुशीला पलहनि‍यो, सासुओ आ पति‍योकेँ कहलक- हम नै बँचव। दुनि‍याँक सभसँ पैघ पापी छी जे अपनो रक्‍छा नै कऽ सकलौं। दुनू बच्‍चाकेँ अहाँ सभ देखबै।‍ कहि‍ते आँखि‍ बन्न भऽ गेलनि‍। प्राण तँ बँचल रहनि‍ मुदा चेतन-शुन्‍य भऽ गेलीह।

सुशीलाक बात सुि‍न पलहनि‍ चमकि‍ उठल। बापरे! सभसँ बेसी भार अपने ऊपर आबि‍ गेल। जन्‍मक पालनक भार....। अखन धरि‍ जते ठीन काज केलौं, एहेन काजसँ भेँट कहाँ भेल! बुझल बात कम आ अनभुआर बेसी बजरत। जते अपना दि‍स तकैत जाइत तते चि‍न्‍ता बढ़ल जाइत। बच्‍चाकेँ दूध पि‍आएब जरूरी भऽ गेल। माइक तँ यएह गति‍ छन्‍हि‍। हे भगवान कोनो उपाय धड़ाबह। मन पड़लै अपन बच्‍चा। अपनो तँ दूध होइते ऐछ‍ तखन एते घबड़ेवाक कि‍ जरूरत ऐछ‍। मुदा अपन दूध तँ छह‍ मासक बकेन ऐछ‍। गजुरा तँ नै‍। एत्ते वि‍चार करब तँ बच्‍चे मरि‍ जाएत। हे भगवान जानि‍हह तूँ। मने मन कहि‍ दुनू बच्‍चाकेँ दुनू छाती लगा दूध पि‍अबए लगली। बच्‍चाक चोभ देख पलहनि‍क मन खुशीसँ नाचि‍ उठलनि‍। ठानि‍ लेलनि‍‍ जे बच्‍चाकेँ मरऽ नै‍ देब। आइये बकरी दूधक ओरि‍यान करैले सेहो कहि‍ दैत छि‍अनि‍ आ टेम-कुटेम अपनो चटा देबै। मुदा अपनो बच्‍चा तँ चारि‍ये मासक ऐछ‍। सात माससँ पहि‍ने कना दालि‍क पानि‍ चटेबै। फेर मातृत्‍व जगि‍ते बुदबुदेलीह- ऐसँ पैघ काज ऐ धरतीपर हमरा लि‍ये की ऐछ‍? जँ दुनि‍याँ देखऽ बच्‍चा आएल हएत तँ जरूर देखत।

पुतोहूक बात सुि‍न सुनयना चेतनहीन हुअए लगलीह। कासक फूल जकाँ मन उड़ि‍-उड़ि‍ बौराए लगलनि‍। बच्‍चाक मुँहपर नजरि‍ पड़ि‍ते उपराग दैत भगवानकेँ मने-मन कहलनि‍- ‍कोन जनमक कनारि‍ ऐ बच्‍चासँ असुल रहल छह। ऐ नि‍मू-धनक कोन दोख भेलै। जँ तोरा नै सोहेलह तँ पेटेमे कि‍अए ने कनारि‍ चुका लेलह। एहन बच्‍चाक एहन गंजन तोरे सन बुते हेतह।‍ चहकैत करेजसँ द्रवि‍त भऽ कुहरि‍ उठलीह। एक तँ वेचारीक (पुतोहूक) उपर केहन डाँग पड़ल जे अमूल्‍य कोखि‍ उसरन भऽ गेलै, तै संग बच्‍चा लटुआएल ऐछ‍। मुदा अपनो वंश तँ उसरने भऽ रहल ऐछ‍। थाकल-ठहि‍आएल जकाँ छातीपर पथरो रखि‍ आँखि‍ तकब मुदा तपेसर तँ से नै‍ ऐछ‍। जुआन-जहान ऐछ‍, हो न हो‍ कहीं बौर ने जाए। ककरा के देखत? जहि‍ना धारक बहैत धारामे माथक मोटरी खुललासँ मोटरीक वस्‍तु छि‍ड़ि‍या पानि‍क संग भाँसऽ लगैत जहि‍सँ कि‍छु बि‍छेबो करैत आ कि‍छु भँसि‍यो जाइत तहि‍ना सुनयनाक वि‍चार कि‍छु उड़ि‍आइत कि‍छु ठमकल छाती दहलाइत।

ओसारक खूँटा लगा बैसल तपेसरक मन मानि‍ गेल जे चूक हमरोसँ भेल। आइ धरि‍ जे देखैत एलौं वएह मनमे बैस गेल। की रेडि‍यो-अखबारक समाचार झुठे रहैत ऐछ‍ जे दू-तीन-चारि‍ धरि‍ बच्‍चा मनुष्‍यकेँ होइत छै। जहि‍ना परम्‍परासँ अबैत व्‍यवहारकेँ बि‍नु सोच-वि‍चार केनहुँ सभ लकीरक फकीर बनि‍ लहास ढोइत ऐछ‍ तहि‍ना तँ केलहुँ। मुदा हाथक डोरा टुटने जहि‍ना गुड्डी अकासमे उधि‍या जाइत तहि‍ना ने तँ उधि‍या गेलहुँ। सोचैक, बुझैक बात छल जे एक बच्‍चाक लेल कते सेवाक जरूरत होएत, दू बच्‍चाक लेल कते....। से नै‍ बुझि‍ सकलहुँ। आइ जँ वुझल रहैत तँ एहेन दि‍न देखैक अवसर नै‍ भेटैत। परि‍वार उजड़ि‍ जाएत। वंश वि‍लटि‍ जाएत। मुदा जे चुकि‍ गेलहुँ ओकर उपाइये कि‍? जहि‍ना थाकल अड़ि‍कंचनमे सुन्‍दर सुकोमल पेंपी नि‍कलैत तहि‍ना तपेसरक मनमे आशाक पेंपी उगल। धारक धाराक सि‍क्‍त मनमे उठलनि‍, जहि‍ना एक दि‍स परि‍वार, वंशकेँ उजड़ैत-उपटैत देखै छी तहि‍ना तँ भूत, वर्तमान आ भवि‍ष्‍य सेहो आँखि‍क सोझमे लहलहा रहल ऐछ‍। लहलहाइत परि‍वारकेँ देख तपेसरक हृदय उफनि‍ गेलनि‍। जहि‍ना धारक धारा माने बेगमे टपै काल ओरि‍या कऽ पाएर रखि‍तहुँ थरथराएल पाएर पि‍छड़ैत रहैत तहि‍ना तपेसरक मन सेहो असथि‍र नै‍ भऽ पि‍छड़ए लगलनि‍। मुदा जी-जाँति‍ कऽ माटि‍पर पाएर रोपि‍ते मनमे उठलनि‍, माइयो जीवि‍ते छथि‍, अपनो छी, तैपरसँ दूटा दूधमुहाँ बच्‍चा सेहो एेछ‍ये। तखन परि‍वार कि‍अए उपटत? हँ, ई बात जरूर जे पुरूष-नारीक बीच बच्‍चाक लेल माए भोजनक पहि‍ल बखारी होइ छथि‍। मुदा युग धर्मो तँ कहैत ऐछ‍ जे आजुक बच्‍चाक नसीबसँ माइक्रोसॉफ्ट दूध कटि‍ रहल ऐछ‍। तैयो तँ बच्‍चा जीवि‍ये जाइत ऐछ‍। तखन ई बच्‍चा कि‍एक ने जीति‍?

सोगाएल तपेसरक मुँह देख माए (सुनायना) बोल-भरोस देबा लए घरसँ नि‍कलि‍ आबि‍ बजलीह- बच्‍चा, गाड़ीये पहि‍या जहाँति‍ जीते जि‍नगी सुख-दुख अबैत रहैए। तइले सोगे केने‍ की हेतह? भगवानक लीले अगम छन्‍हि‍। अखनी हम जीवि‍ते छी। हमरा अछैत तोरा कथीक दुख होइ-छह।‍
सि‍मसल आँखि‍ उठा तपेसर माएक मुँहपर देलनि‍। हवामे थरथराइत दीपक बाती जकाँ सुनयनाक छाती डाेलैत। मुदा जहि‍ना हवाक झोंककेँ सहन करैत दीप प्रज्‍वलि‍त रहैत तहि‍ना धैर्यक लौ सुनयनाक बोलसँ टपकल वि‍चार सुनि‍ तपेसरक मनक डोलैत जमीन थीर हुअए लगल। मनमे उठलनि‍, यएह माए पुरूख जानि‍ अपन सहारा बुझैत छथि‍ आ अखन सहारा बनि‍ ठाढ़ छथि‍। कोढ़ीसँ (कलीसँ) फुलाइत फूल जकाँ तपेसरक मन फुलाए लगल‍। तहीकाल पलहनि‍ मुँह उठा कऽ बाजलि‍- काकी, एतै‍ आबथु।‍
पलहनि‍क बात सुि‍न सुनयना तपेसरपर नजरि‍ दौड़ा सोइरीघर दि‍स बढ़लीह। मनमे एलनि‍, ओना अन्‍हारघर साँपे-साँप रहैत मुदा हथोरि‍यो थाहि‍ कऽ तँ लोक अन्‍हारोमे जीवि‍ते ऐछ‍। सभ मि‍लि‍ जँ लगि‍ जाएव तँ बच्‍चा जरूर उठि‍ कऽ ठाढ़ हेबे करत।

तपेसरक मनमे उठल, जाधरि‍ साँस ता धरि‍ आस। अपना सभ बुते काज नै‍ सम्हरत। डॉक्‍टरकेँ बजेबनि‍। मुदा लगमे तँ ओहो नहि‍ये छथि‍। जँ रोगि‍येकेँ लऽ जाए चाहब सेहो भारि‍ये ऐछ‍। एक तँ तेहेन सवारी सुबि‍धा‍ नै‍ दोसर तीन-तीनि‍ गोरेकेँ लए जाएब। ओतबे नै, अपनो सभकेँ जाइये पड़त। एक दि‍स अब-तबक ि‍स्‍थति‍ दोसर दि‍स सवारीक ओरि‍यान आ डाॅक्‍टर ऐठाम पहुँचैत-पहुँचैत बँचती आकि‍ नै‍। जहि‍ना अमती काँट एक दि‍स छोड़बैत-छोड़बैत दोसर दि‍स पकड़ि‍ लैत तहि‍ना तपेसरक मन ओझरा गेल। कोनो सोझ बाट आँखि‍क सोझामे पड़बे नै‍ करैत। बेकल मने उठि‍ कऽ सोइरी घर पहुँच माएकेँ कहलक- माए....।‍ माएक पछाति‍ कोनो शब्‍द मुँहसँ नै‍ नि‍कलल।
तपेसरक बेकल मन देख पलहनि‍ बाजलि‍- बौआ, एना मन छोट नै करू। जे करतूत ऐछ‍ सएह ने अपना सभ करब। ककरो जान ते नै ने दऽ देबै। जखैनसँ दुनू बच्‍चाकेँ छाती चटौलि‍ऐ तखैन से कल‍ परल ऐछ‍। सबसे पहि‍ने दूधक ओरि‍यान करू। अखन महीसि‍-गाइक दूध पचबैवला नै ऐछ‍, कतौसँ बकरी कीन‍ आनू। ताबे ककरो बकरी दुहि‍ कऽ लऽ आनू। एक तँ बकरि‍यो सब तेहन ऐछ‍ जे अपनो बच्‍चा पालैक दूध नै होइ छै, मुदा जकरा एकटा बच्‍चा हेतै ओहन कीन‍ लि‍अ।

सुशीलाक बात सुि‍न पलहनि‍ चमकि‍ उठल। बारे रे, सभसँ बेसी भार अपने ऊपर आबि‍ गेल। जन्‍मक पालनक भार....। अखन धरि‍ जते ठीन काज केलौं, एहेन काजसँ भेँट कहाँ भेल! बुझल बात कम आ अनभुआर बेसी बजरत। जते अपना दि‍स तकैत जाथि‍ तते चि‍न्‍ता बढ़ल जाइत। बच्‍चाकेँ दूध पि‍आएब जरूरी भऽ गेल। माइक तँ यएह गति‍ छन्‍हि‍। हे भगवान कोनो उपाय धड़ावह। मन पड़लै अपन बच्‍चा। अपनो तँ दूध होइते ऐछ‍ तखन एते घबड़ेवाक कि‍ जरूरत ऐछ‍। मुदा अपन दूध तँ चारि‍ मासक बकेन ऐछ‍। गजुरा तँ नै‍। एत्ते वि‍चार करब तँ बच्‍चे दम तोड़ि‍ देत। हे भगवान जानि‍हह तूँ। मने मन कहि‍ दुनू बच्‍चाकेँ दुनू छाती लगा दूध पि‍अबए लगली। बच्‍चाक चोभ देख पलहनि‍क मन खुशीसँ बि‍खैर गेलनि‍। संकल्‍प लेलनि‍ जे बच्‍चाकेँ मरऽ नै‍ देब। आइये बकरी दूधक ओरि‍यान करैले सेहो कहि‍ दैत छि‍अनि‍ आ टेम-कुटेम अपनो चटा देबै। मुदा अपनो बच्‍चा तँ चारि‍ये मासक ऐछ‍। छह माससँ पहि‍ने कना दालि‍क पानि‍ चटेबै। फेर मातृत्‍व जगि‍ते बुदबुदेलीह- ऐसँ पैघ काज ऐ धरतीपर हमरा लि‍ए की ऐछ‍? जँ दुनि‍याँ देखऽ पच्‍चा आएल हएत तँ जरूर देखत।

पुतोहूक बात सुि‍न सुनयना चेतनहीन हुअए लगलीह। कास-कुसक फूल जकाँ मन उड़ि‍-उड़ि‍ बौराए लगलनि‍। बच्‍चाक मुँहपर नजरि‍ पड़ि‍ते उपराग दैत भगवानकेँ मने-मन कहलनि‍- ‍कोन जनमक कनारि‍ ऐ बच्‍चासँ असुल रहल छह। ऐ नि‍मू-धनक कोन दोख भेलै। जँ तोरा नै सोहेलह तँ पेटेमे कि‍अए ने कनारि‍ चुका लेलह। एहन बच्‍चाक एहन गंजन तोरे सन बुते हेतह।‍ चहकैत करेजसँ द्रवि‍त भऽ कुहरि‍ उठलीह। एक तँ वेचारीक (पुतोहूक) उपर केहन डाँग पड़ल जे अमूल्‍य कोखि‍ उसरन भऽ गेलै, तै संग बच्‍चा लटुआएल ऐछ‍। मुदा अपनो वंश तँ उसरने भऽ रहल ऐछ‍। थाकल-ठहि‍आएल छी छातीपर पथरो रखि‍ आँखि‍ तकब मुदा तपेसर तँ से नै‍ ऐछ‍। जुआन-जहान ऐछ‍, हो न हो बताह बनि‍ कहीं बौर ने जाए। ककरा के देखत? जहि‍ना धारक बहैत धारामे माथक मोटरी खुललासँ मोटरीक वस्‍तु छि‍ड़ि‍या पानि‍क संग भाँसऽ लगैत जहि‍सँ कि‍छु बि‍छेबो करैत आ कि‍छु भँसि‍यो जाइत तहि‍ना सुनयनाक वि‍चार कि‍छु उड़ि‍आइत कि‍छु ठमकल छाती दहलाइत।

अशौच दुआरे दुनू जौआँ भाए-बहीनि‍क -धीरज आ घुरनीक- छठि‍यार नै‍ भेल। ने कि‍यो सोइरी सठनि‍हारि‍ आ ने ककरो मन कखनो थीर होइत जे नीक-अधलाक वि‍चार करैत। ओना तीनूक- पलहनि‍, सुनयनया आ तपसीक- मन सदति‍काल बच्‍चेपर रहैत छलनि‍ मुदा कखनो काल नेकरमसँ अकछि‍ मने-मन सोचैत जे दुनूकेँ ऋृण असुलए भगवान पठौलनि‍। जते ओकर ऋृण बाकी छै ओते तँ असुले कऽ जान छोड़त। मुदा लगले मन घुरि‍ जाइत जे वि‍धातो भाग-तकदीरकेँ नै‍ बदलि‍ सकैत छथि‍। जँ दुनू बच्‍चा एहि‍ धरतीक सुख भोगऽ आएल हएत तँ नहि‍यो सेवा-बरदासि‍ करबै तैयो पानि‍क पाथर जकाँ जीवे करत। मुदा बच्‍चाक छोड़ि‍ तीनूक -पलहनि‍, सुनयना आ तपसीक- अपन-अपन जि‍नगी आ दुनि‍याँ सेहो छलनि‍। पलहनि‍ये बेचारी कि‍ करि‍तथि‍? एक तँ दस-दुआरी दोसर अपनो बाल-बच्‍चेदार परि‍वार तै परसँ तड़ि‍पीबा घरबला। धन्‍यवाद बूढ़ी सासुकेँ दि‍आनि‍ जे सुखाएलो-टटाएल हड्डीपर ने कखनो हाथ-पाएर कामै होइत आ ने मुँह सापुट लैत। अखनो वएह रूआव जे कते दि‍न जीवि‍ तेकर कोन ठेकान। हजार कि‍ लाख आ कि‍ नहि‍ये मरब तेकर कोन ठीक। मुदा साँपक मंत्र जकाँ भरि‍ दि‍न सुगि‍या (पलहनि‍) सासुक नीक-अधला बात सुनैत रहैत मुदा कोनो बातक उतारा नै‍ दैत। अपन सभ कि‍छु बुझि‍ सासु -झि‍ंगुरी- मालि‍क जकाँ काजक समीक्षा सदति‍काल करैत रहैत जे कोन-काज केहन उताहुल ऐछ‍। जेहन जे काज उताहुल तै काजकेँ दोसर काज छोड़ि करए लगैत तँए सुगि‍या सासुक बातो कथा सुनि‍ चुप्‍पे रहैत। तँए कि‍ झि‍ंगुरी सदति‍काल पुतोहूपर गरमाइले रहैत छलीह। कन्ना रहि‍तथि‍, जखन सुि‍गया कोनो अंगनाक पवनौट, काेनो तीमन-तरकारी वा सि‍दहा आनि‍ आगूमे दथि‍ वा बैसलोमे टाँग पसारि‍ जँतऽ लगैत तखन वएह सासु ने असि‍रवाद दै छलखि‍न जे हमरो औरूदा भगवान तोरे देथुन। यएह ने परि‍वार छी जे सदति‍काल सुख-दुख, नीक-अधला, हँसैत-कनैत मस्‍तीमे चैनसँ चलैत रहए। झि‍ंगुरि‍योक जि‍नगीमे तहि‍ना भेल। एक्के सन्‍तानक -बेटा- पछाति‍ वि‍धवा भऽ गेलीह। अपना खेत-पथार तँ नै‍ मुदा अधा गाम (भैयारीक हि‍स्‍सा) तँ खानदानी सम्‍पति‍ छलैक। जाहि‍सँ खाइ-पीवैक कोन बात जे दू पाइ बेटोकेँ खाइ-पीबैले दैत रहलीह। भलेहीं बेटा नसेरी कि‍अए ने भऽ गेलनि‍। कि‍ अखनो धरि‍ बेटाकेँ कहि‍यो एकटा खढ़ उसकबै नै‍ कहलनि‍। जँ माए-बाप अछैत बेटा सुख नै केलक तँ माए-बापक मोले की? एहि‍ बातकेँ गीरह बान्‍हि‍ झि‍ंगुरी कहि‍यो बेटाकेँ कोनो भार अखन धरि‍ नै‍ देने। भलहि‍ं बेटा सहलोले कि‍अए ने भऽ जाए मुदा सि‍द्धान्‍तो तँ सि‍द्धान्‍त छी। ओकरो अपन महत्‍व छैक। भलहि‍ं करी वा नै‍ करी। जँ से महत्‍व नै‍ छैक तँ बुद्धि‍यार लोकक बेटा बूड़ि‍बक कन्ना भऽ जाइत छैक।

दसदुआरी रहने सुगि‍याकेँ घरसँ बाहर एते काज करए पड़ैत जे दि‍न-राति‍ रेजानि‍स-रेजानि‍स रहैत छलीह। साँझ-भोर, राति‍-दि‍न काज। कि‍म्‍हरो जँत्ते-पीचैक समए तँ कि‍म्‍हरो बि‍आउ करैक ताक। धन्‍यवाद सुगि‍येकेँ दी जे घि‍रनी जकाँ सदति‍काल नाचि‍ काज सम्‍हारैत। तहूमे मइटुग्‍गर धीरज आ घुरनीक तँ सहजहि‍ माइये छी। दूध पि‍औनाइसँ लऽ कऽ जाँति‍-पीचि‍ देह-हाथ सोझ करऽ पड़ैत। दसदुआरी रहने दस दि‍स सेहो आँखि‍-कान ठाढ़ रखै पड़ैत। जि‍नगीक काज सुगि‍याकेँ एहि‍ रूपे पकड़ि‍ नेने जे दोसर दि‍स तकै नै‍ दैत। मन कहैत जेकरा अपन माए जीवैत छैक ओरत होइक नाते अपन चि‍लकाकेँ अपनो सम्‍हारि‍ सकैए मुदा ऐ दुनू -धीरज आ घुरनी- केँ दुनि‍याँमे के देखि‍नि‍हार छैक? हमरा हाथे जन्‍म भेल छै, जँ पैतपाल नै करवै ते एकर प्रति‍वाए ककरा हेतै। भगवानक घरमे दोखी के हेतै। वेचारी दादी सुनयना छथि‍न मुदा ऐ उमेरमे दूध तँ नै‍ छन्‍हि‍। सोलाहो आना बकरि‍ये दूधपर तँ दूधकट्टू भइये जाएत। जे बच्‍चा दूधकट्टू भऽ जाएत ओकर छाती कहि‍यो सक्कत हेतै। खेने-बि‍नु खेने सुगि‍या भरि‍ दि‍न ओइ‍ जंगली जानवर जकाँ नचैत जे बच्‍चाकेँ दूध पीया, गर लगा सुता चरौर करए जाइत, तहि‍ना।

अधवयसू सुनयना अपन राजा बेटा तपसीक दुखक बोझ देख दि‍न-राति‍ ओइ‍ बोझकेँ हल्‍लुक बनबैक लेल एकबट्ट करैत रहैछ। जहि‍ना युद्धभूमि‍मे अपन राजापर दुश्‍मनक अबैत तीर देख सेनापति‍ उपयुक्‍त तीर तरकससँ नि‍कालि‍ दुश्‍मनक तीरकेँ रोकैक प्रयास अंति‍म साँस धरि‍ करैत तहि‍ना सुनयना तपसीपर अबैत तीर- भगवान केहन डाँग मारलखि‍न जे जे जाहि‍ काजक लूरि‍ पुरूषक हि‍स्‍सामे देबे ने केलखि‍न ओइ फाँकमे फँसा देलखि‍न। कोशि‍कन्‍हाक खेत जकाँ आि‍ड़-धूर मेटा बालुसँ भरि‍ देलखि‍न। स्‍त्रीगण होइत हमहूँ तँ स्‍त्रीगणक सभ काज (बच्‍चाकेँ दूध पि‍याएब) नहि‍ये सम्‍हारि‍ सकब। जँ एहेन फाँसे लगवैक छलनि‍ तँ आरो नमहर लगा दुनू बच्‍चोकेँ माइये  संगे नेने जइतथि‍। पुरूखक (बेटा) देह तँ खाली रहि‍तै। मन होइतै चि‍ड़ैक खोंता जकाँ परि‍वार बना रहैत नै मन होइतै लौका-तुम्‍मा लऽ दुनि‍याँमे घूमि‍-फीड़ि‍ जीबैत। जाधरि‍ हम जीबै छी ताधरि‍ माएक ममता पकड़ि‍ रखि‍तै। मुदा तहू बीच जँ पत्‍नीक सि‍नेह बेटा-बेटीक सोह जगि‍तै तखनो तँ मन बौरेबे करि‍तै! अनायास सुनायनाक मनमे उठलनि‍ माया-मोहक लत्ती जते दूर धरि‍ चतरै-ए ओते दूर धरि‍ मनुख तँ नै‍ चतरत। मनुखक तँ बाढ़ि‍ छैक। तै बीच हम तपसि‍याक माए भेलि‍ऐ, जते धरि‍ कएल हएत ततबे ने करबै। आकि‍ ओकरा दुखसँ दुखी भऽ अथबल बनि‍ बैस कऽ कानब। माएक काज जते दूर धरि‍ छै ओइमे कलछप्‍पन नै करबै। परि‍वारे ककर छी ककरो नै छी? तखन तँ मनुख रहत घरेमे। खाएत अन्ने, पीति‍ पानि‍ये। जाबे जीबै छी ताबे बुझै छी जे सभ कि‍छु छी आँखि‍ मूनि‍ देबै अन्‍हारमे हरा जाएब। फेर मन घुरलनि‍ हमरा अछैत बेटाक आँखि‍क नोर देखब हाड़-चामक मनुखकेँ सहल जाएत? ओ तँ पाथरक नै‍ छी जे कतौ पड़ल रहत। मनुखकेँ तँ चलै-फि‍रै, सोचै-वि‍चारै, बुझै-सुझैक बखारी छै ओ तँ देखि‍ये-सुनि‍ कऽ चलत। दुनि‍याँ बेइमान भऽ जाएत भऽ जाए मुदा जहि‍ना तपसीक माए छि‍ऐ तहि‍ना तपसी देखत। ओकरा मनमे कहि‍यो ई नै उपकए देबै जे दुनि‍याँक संग माइयो पएर पाछू केलक। ताधरि‍ तपसीक परि‍वारकेँ पकड़ि‍ सम्‍हारने रहबै जाधरि‍ बेकावू नै भऽ जाएत। भगवान केलखि‍न आ दुनू पि‍लुआ उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल तँ जरूर परि‍वार फड़त-फुलाएत। अखन बेकावू कहाँ भेलहेँ? अखन तँ सम्‍हारैबला ऐछ‍। माटि‍क तरमे सजमनि‍ झि‍ंगुनीक बीआ गारि‍ दै छि‍ऐ, समए पावि‍ जहि‍ना ओ जनमि‍ कऽ ऊपर आबि‍ धरतीसँ आसमान धरि‍ लतरि‍ जाइत ऐछ‍ मुदा ई  तँ (दुनू बच्‍चा) माटि‍क ऊपर ऐछ‍। जँ समुचि‍त सेवा भऽ जाए तँ जरूर कलैश कऽ गाछ बनत। आशा-नि‍राशाक बीच सुनयनाक मन वृन्‍दावनक कदमक गाछपर झुलैत राधा-कृष्‍ण जकाँ झुलए लगलनि‍। ने अक चलनि‍ ने बक। आँखि‍ नि‍हारि‍ दुनि‍याँ दि‍शि‍ देखए लगलीह। दू-पत्ती, चारि‍-पत्ती सजमनि‍-झि‍ंगुनीक गाछक, जे लत्तीक आशा अपनाकेँ ठाढ़ रखैत, चारू भाग जहि‍ना छोट-छोट कड़चीक टुकड़ी गारि‍ ओकर रक्षा लगौनि‍हार करैत तहि‍ना सुनयना फुड़फुड़ा कऽ उठि‍ बड़बड़ेलीह- अनेर गाएक धरम रखबार।‍ मुँहसँ अनायास हँसी नि‍कललनि‍।
पि‍तृ-प्रमुख परि‍वारमे पि‍ताक परोछ भेलापर ताधरि‍ मातृ-प्रधान परि‍वार बनल रहैत जाधरि‍ पुत्र पि‍तातुल्‍य नै‍ बनि‍ जाइत। ओहुना कि‍छु काजमे मातृत्‍वे प्रमुख परि‍वार रहैछ। एक तँ ओहि‍ना बच्‍चाक पालन मातृ पक्षक काज वुझल जाइत तहि‍पर सँ अखन धरि‍ तपसी माइयेक आदेशक पालन करैत अबैत, तँए धैन-सन। मुदा तैयो टूटैत परि‍वार आ नव उलझन देख मन ओझराए लगलनि‍। एते दि‍न खेती-पथारी करै छलौं, दि‍न-राति‍ ओहीमे लागल रहै छलौं। आब तँ से नै‍ हएत। एक तँ दि‍नोदि‍न माएक हूबा सेहो घटत दोसर बच्‍चा सभले बकरीसँ गाए धरि‍ पोसए पड़त। ओहि‍ना थोड़े हएत। कहुना करबै तँ खुएनाइ-पीएनाइ, दुहनाइ-गारनाइसँ लऽ कऽ अोगरवाहि‍ धरि‍ करए पड़त। खूँटापर छोड़ि‍ कऽ कतौ जाएबो मसकि‍ल हएत। कुत्ता-बि‍लाइसँ लऽ कऽ साँढ़-बत्तू धरि‍ उपद्रव करत। ओह से नै तँ खेत बटाइ लगा देब। जँ से नै करब तँ नै सम्‍हरत।

छह मासमे छह दि‍न कम। बच्‍चाकेँ जँतै-पीचैक समए होइते पहलनि‍ (सुगि‍या) हाँइ-हाँइ गाएक नाइदमे सानी-कुट्टी लगा वि‍दा भेली। डेढ़ि‍या टपि‍ते वामा भागसँ दहि‍ना भाग बि‍लाइकेँ टपैत देखलनि‍। मनमे सगुन अपसगुन गललनि‍। जँ दहि‍नासँ वामा भाग जाइत तखन ने अपसगुन होइत मुदा से तँ नै वामासँ दहि‍ना टपल। सगुन बुझि‍ते खुशी उपकलनि‍। मुदा लगले फेर तर्कक संग ि‍वर्तक, अति‍तर्क, अति‍वि‍तर्क हुअए लगलनि‍। मन औनाए गेलनि‍। पुरूखक कहब ने छि‍अनि‍ जे वामसँ दहि‍न टपने सगुन होइत मुदा पुरूखक दहि‍न स्‍त्रीगणक वाम होइत आ वाम दहि‍न। प्रश्‍नक उत्तर नै पाबि‍ मन ठमकि‍ गेलनि‍। मुदा लगले सोचलनि‍- अनजान-सुनजान महाकल्‍याण। जे पूत हरबाही गेल, देव-पि‍तर सभसँ गेल। अनेरे कोन ओझरीमे ओझराएल छी। जानि‍ कऽ रोग बेसाहि‍ लेब तँ दोख ककर हएत। मन हल्‍लुक भेलनि‍। मन हल्‍लुक होइतै दुनू बच्‍चा धीरज आ घुरनीपर नजरि‍ बढ़लनि‍। दुनूक जन्‍मक दि‍न गनए लगलीह। वरस्‍पति‍ दि‍न आसीन मास। आंगुरपर गनैत-गनैत पाँच मास चौबीस दि‍न पुरलनि‍। छह मासमे छह दि‍न कम। हि‍साब जोड़ि‍ते मन मधुआ गेलनि‍। अकास-पतालक बीच हृदए नॉचए-गाबए लगलनि‍। एक दि‍न बीतने तँ उनतीस माघ हरा जाइत आ छह मासमे तँ छबे दि‍न कम रहलहेँ। सकताइत-सकताइत बच्‍चा छहमसुआ भऽ गेल। माइयोक पेटमे जे छह माससँ कम रहैए ओकर आँखि‍ नै फुटैत ऐछ मुदा छह मास पुरलापर जे जनमैत ऐछ ओ तँ भगवतीक बेलक आँखि‍ सन आँखि‍ नेनहि‍ अबैत ऐछ। छबे दि‍न ने कम छै आँखि‍क गुणक सि‍रखार तँ आबि‍ये गेल हेतै। कोढ़ी (कली) फूल जकाँ पत्ती सभ जरूर नि‍कलि‍ गेल हेतै। अधखि‍ल्‍लू फूल जकाँ सुगि‍याक मन हर्ष-वि‍षादक बीच पड़ि‍ गेलनि‍। पीपरक पात जकाँ सदति‍काल डोलैबला नै बड़क पात जकाँ भऽ गेलनि‍। ऐ दुनू बच्‍चाक माए तँ हमहीं भेलि‍ऐ कि‍ने। अपन दादी (सुनयना) तँ पकले आम जकाँ छथि‍न। मुदा तैयो धैनवाद हुनके दि‍अनि‍ जे घर-अंगनाक काजक संग दुनू बच्‍चोकेँ सम्‍हारैत छथि‍। ओना भाइयो (तपेसरो) अपन पुरूखपना काज (खेती-पथारी) छोड़ि‍ अंगने-घरक काजमे भरि‍ दि‍न लगल रहै छथि‍। ई तँ ओही बेचारेकेँ धैनवाद दि‍अनि‍ जे एहेन दूधमुहाँ बच्‍चाकेँ पोसि‍-पालि‍ रहल छथि‍। दस दुआरी रहि‍तो की कम करै छि‍अनि‍। मन शान्‍त भऽ गेलनि‍। नजरि‍ भगवान दि‍स बढ़लनि‍। भगवान दि‍स नजरि‍ बढ़ि‍ते तामस लहरए लगलनि‍। कहैले भगवान छथि‍। सभपर एक्के रंग नजरि‍ रखै छथि‍ मुदा वएह कहथु जे ककरो-ककरो तते दै छथि‍न जे तौला-कराही घि‍नाइ छै आ ककरो-ककरो चुट्टि‍याह बँसबाड़ि‍ जकाँ ओधि‍ धरि‍ कोकैन कऽ उपटि‍ जाइ छै। जुगो तेहेन भऽ गेल जे जेहने पुरूखक कि‍रदानी देखै छी तेहने मौगीक। जीबैयोबला बेटा-बेटीकेँ कि‍यो मोड़ीमे फेकैए तँ कि‍यो नून चटबैए। फेर लगले मन अपना परि‍वार दि‍स घुरि‍ नसेरी पति‍पर पड़लनि‍। पति‍पर नजरि‍ पड़ि‍ते सासु-ससुरपर खौंज उठलनि‍। बुदबुदेली- बेटाकेँ बि‍गाड़ैमे जहि‍ना बुढ़ि‍याक (सासु) कि‍रदानी भेलनि‍ तहि‍ना बुढ़वाक। गाजाक गुल सुनगबैत-सुनगबैत बेटो अपने जकाँ गजेरी भऽ गेलनि‍। असकरे की करब? घरसँ लऽ कऽ बहार धरि‍ खटैत-खटैत देह अकड़ि‍ जाइए।
तपेसर ऐठाम पहुँचते सुनयनाकेँ बच्‍चा लग बैसल देखलनि‍। बाटक सभ बात बि‍सरि‍ मुस्‍कुराइत बजली- काकी, छअ मास पुरैमे छबे दि‍न कम छन्‍हि‍। आब दुनू दुनि‍याँ देखबे करतनि‍।‍
पलहनि‍क बात सुनि‍ जहि‍ना सुनयना अपन सभ कि‍छु बि‍सरि‍ बच्‍चाकेँ हृदएमे समा लेलनि‍ तहि‍ना तपेसर रोपल गाछीक फड़ देख वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। मनमे आनन्‍दक हि‍लोर उठि‍ गेलनि‍। दुनूक (सुनयनो आ तपेसरो)‍ मनमे सबुरक गाछ जनमि‍ गेलनि‍।
अखन धरि‍ सुनयना पलहनि‍पर जते ओंगठल छलीह ओइमे कमी करैक एहसास भेलनि‍। छह मसुआ बच्‍चा भऽ गेल। दूधक संग अन्नो चाटत। दालि‍क झोर बना खुआएब। मुदा लगले मनमे उठलनि‍ जे दालि‍यो तँ कते रंगक होइ छै। सभ एक्के रंग थोड़े होइ छै। कोनो गलनमा (सुपाच्‍य) होइ छै तँ कोनो गरि‍ष्‍ट। सबहक अपन-अपन चालि‍-ढालि‍ (गुन-धर्म) होइ छै। मन औना गेलनि‍। औनाइत-औनाइत मन खेरही दालि‍पर गेलनि‍। जेहने आकार तेहने गलनमा। अखन की कोनो रोटीपर लठगर खुआएब। पलहनि‍केँ कहलखि‍न- कनि‍याँ, सभसँ नीक खेरहि‍ये दालि‍ हएत?
हँ।‍ जेना-जेना देह सकताइत जेतै तेना-तेना खोराको बढ़बैत जैहऽथि‍न। आब अपनोसँ ओरि‍या-ओरि‍या जतबो-पि‍चबो करि‍हथि‍न आ तेलौ-कूर दि‍हऽथि‍न।
पलहनि‍क सभ बात सुनायना सुनबो नै केलनि‍ आकि‍ बीचहि‍मे मन उड़ि‍ कऽ तपेसरक जि‍नगीपर चलि‍ गेलनि‍। बेचाराकेँ दुनि‍याँक कोनो सुख नै भेल। पाँचो बर्ख कनि‍याँ संग नै रहल। कोन जनमक पाप बि‍सेलै से नै जानि‍। फेर मन उनटि‍ अपनो दुनू परानीपर गेलनि‍। माइयौ-बापक कएल नीक-अधला काजक फल बेटा-बेटीकेँ पड़ैत छैक। जेना-जेना वि‍चार उठनि‍ तेना-तेना मुँहक सुर्खी क्षीण (उदास) होइत जानि‍। कहीं हमरे सबहक (माए-बापक) कएल पाप ने तँ बेचाराक ऊपर डि‍रि‍आइ छै। फेर मन आगू बढ़ि‍ समाज दि‍स बढ़लनि‍। एहेन बेर-बि‍पति‍ की तपेसरेपर पड़ल ऐछ आ कि‍ आनो-आनकेँ पड़लै।
सोगमे पड़ल तपेसरक मन अपन गि‍रैत परि‍वारपर अँटकल। जते उपजा-बाड़ी होइ छलाए बटाइ लगौने दूधक डारही होइए। एक तँ समयक कोनो ठेकान नै तैपर लोढ़ा-बि‍च्‍छ कऽ सेहो लइये जाइत ऐछ। मगर खरचा तँ बढ़ि‍ये गेल। अपनो काज उद्यम छोड़ि‍ भरि‍ दि‍न अंगने-घरक काजमे लटपटाइत रहै छी। छोड़ि‍यो कन्ना देबै? कोनो कि‍ भेड़ी-बकरीक बच्‍चा छी जे पेटसँ नि‍कलल आ कुदए-फानए लगल। मनुक्‍खक बच्‍चा तँ ताड़क गाछ जकाँ होइत ऐछ। जकर जड़ि‍ये बन्‍हैमे कतेक समए लगैत ऐछ। ई भि‍न्न बात जे बोनमे जइठाम ताड़क गाछ ने दोसरकेँ रोकैत ऐछ तइठाम आ ने अपने रूकैत ऐछ।
भक्क टुटि‍ते सुनयना पहलनि‍केँ पुछलनि‍- कनि‍याँ, की कहलि‍ऐ से नै बुझलौं?
पहलनि‍- यएह कहलि‍एनि‍ जे आब अपनो सभ काज सम्‍हारि‍ सकै छथि‍।‍
सभ काज सुनि‍ सुनयनाक मनकेँ परि‍वार नाचि‍ उठलनि‍। सोचए लगलीह जे जखन परि‍वारमे लोकेक बाढ़ि‍ ठमकि‍ गेल तखन धने-सम्‍पति‍ लऽ कऽ की हएत? पुन: वि‍चार घुरलनि‍। जँ भगवान दुनूक औरूदा देथि‍न तँ धन-सम्‍पति‍ कमा लेत। कमाइक बात मनमे उठि‍ते अपन काज दि‍स नजरि‍ बढ़लनि‍। विसवास जगलनि‍ जे जखन पि‍लुआ सन दुनू छल तखन तँ पालि‍ लेलौं। आब तँ सहजे छअ मसुआ भऽ गेल। हमरा अछैते बेटा (तपेसर) कानै ई केहेन हएत। पुन: मनमे उठलनि‍, अपने पुरना साड़ीक वि‍सटी पोताकेँ बना देब आ पोतीकेँ घघरि‍यो सीब देब। उमेरे बेसी भऽ गेल तँए की। जाबे देहमे हूबा ऐछ ताबे तँ खटबे करब जहन हूबा टुटि‍ जाएत तहन बुझल जेतै। तँए की बेटाकेँ कानए देब। दुनि‍याँमे कि‍यो ओकर नोर पोछैबला नै छै? जँ नै छै तँ सुगि‍ये (पलहनि‍ये) कि‍अए एते करै छै। ओकरा हमरा परि‍वारसँ कोन मतलब छै। मुदा छै। जकरामे प्रेम छै ओकरे दुनि‍याँमे सभ छै।
दुनू बच्‍चाकेँ जाँति‍ पलहनि‍ बाजलि‍- आब जँ बकरीक दूध नहि‍यो हेतनि‍ तँ गाइयोक दूधसँ काज चलि‍ जेतनि‍। आब ओछाइनपर बच्‍चा अपनो उनटै-पुनटैले जोर करतनि‍। आस्‍तेसँ कर घुमा दि‍हऽथि‍न‍ ओना बेर-कुबेर हमहूँ अबि‍ते रहब। भैयाकेँ कहि‍ दथुन जे काल्हि‍ पटोर पहीि‍र अंगनासँ नि‍कलबनि‍।।
चि‍न्‍तामे डूबल तपेसर अपनो सोचै आ दुनू गोटेक (माए आ पलहनि‍) गपो-सप्‍प सुनै। ओना कि‍सानी वुद्धि‍ तपेसरकेँ तँए जत्ते मन काज दि‍स दौड़ैत ओते गप-सप्‍प दि‍स नै। अखन धरि‍क जि‍नगी रहलनि‍ आेइमे एकाएक मोड़ एलनि‍। १०८दानाक तुलसीमालाक जप जकाँ तपेसरक दि‍न-राति‍ अपन घर-गि‍रहस्‍तीक काजक बीच बीत जाइत। ओना जहि‍ना मनक वि‍सवासकेँ आँखि‍ नै झुठला सकैत तहि‍ना तपेसरक हृदएमे माए आ पलहनि‍ चौपड़ि‍ मारि‍ बैसलि‍। तँए चि‍न्‍ता ओते नै जते हेबाक चाहि‍एनि‍।
दुनू बच्‍चाकेँ जाँति‍ पलहनि‍ हाथ-पएर सोझ कऽ टाँग पकड़ि‍ उल्‍टा झुला चानि‍मे काजरक टीक्का लगा मुस्‍की दैत सुनयनाकेँ कहलखि‍न- काकी, भैयाकेँ वि‍आह करा दि‍अनु?
वि‍आह सुनि‍ सुनयना सुख-दुखक (नीक-अधलाक) बीचक सरोवरमे पैसि‍ सोचए लगलीह। हमरे आशा कते दि‍न हेतै। चौथापनमे पहुँच गेल छी, जते दि‍न जीबै छी जीबै छी। मुदा ओकर (तपेसरक) जि‍नगी तँ से नै छै। अखन ओकरा की भेलहेँ। बच्‍चाक कोन ठेकान ऐछ। जुआनो-जहान चलि‍ जाइए। एक तँ मनुक्‍खे माटि‍क काँच बरतन छी तैपर ओ (दुनू बच्‍चा) तँ आरो गि‍लगर माटि‍ जकाँ ऐछ। नीक जकाँ सुखबो ने कएल ऐछ। एक रती कोनो चीजक टोना लगतै टन दे चलि‍ जएत। मुदा परि‍वार तँ पुरूख-नारीक संयोगसँ चलैत ऐछ। जाबे दुनूक संयोग नै हएत ताबे दुनि‍याँ (सृष्‍टि‍) आगू मुँहे कन्ना ससरत? बातकेँ टारैत सुनयना बजलीह- कनि‍याँ, कहलौं तँ नीके बात मुदा साल भरि‍क बीच कन्ना एहेन गप करब।‍
सुगि‍याक बात तपेसरो सुनने। तरे-तर मन बजैले ओढ़ मारैत मुदा बुद्धि‍ रोकैत। कतबो बुद्धि‍ रोकलक तैयो बजा गेलै- कनि‍याँ, अहुँ नीकेले कहलौं, कटै नै छी मुदा जँ दुनू बच्‍चा उठि‍ कऽ ठाढ़ हएत आ दुनि‍याँ दि‍स डेग बढ़ौत तखने, एक तँ ओकरा मइटुग्‍गर बुझि‍ कि‍यो अपन बेटा-बेटीकेँ ऐ घर आबै ने दैत तैपर जँ दोसर वि‍आह कऽ लेब तखन तँ आरो कि‍यो अपना बेटा-बेटीकेँ सतमाए लग आबए नै दि‍अए चाहत।‍
तपेसरक बात सुि‍न पलहनि‍ बजलीह- भैया, हि‍नका सन-सन समाजमे कते पुरूख छथि‍। समाजाे तँ एकरा अधला नै बुझि‍ उठा लेने ऐछ। रास्‍ता बना देने ऐछ तखन कि‍अए एना बजै छथि‍।‍
सुगि‍याक बात सुि‍न जहि‍ना तपेसरक मुँह बन्न भऽ गेलनि‍ तहि‍ना सुनयनाक। मने-मन सुनयना सोचए लगली, कोनो नवकनि‍याँ (जकरा दुि‍नयाँ दारीक थोड़ ज्ञान छै) परि‍वारमे सासु-ससुर, पति‍, भैसुर-दि‍ओर, ननदि‍क बीच अबैत। अोकरा काँच कड़ची जकाँ जै रूपे लीबा कऽ बनौल जाइत ओइ रूपक बनत। कि‍अए लोक सतमाएकेँ दोख लगबैए। ओहो तँ मनुक्‍खे छी। जँ ओकरा मनुक्‍खक रास्‍ता छोड़ा देब तँ ओ मनुक्‍ख बनत कन्ना? मुदा कि‍छु मनुक्‍खो तँ ओहन होइत जे जेरमे रहए नै चाहैत? हँ मुदा ओहन सतमाइये टा तँ नै होइए, आनो-आन होइए।
सुनयनाक मन ओझरा गेलनि‍, तँए चुप भऽ गेली।
तपेसरक मनमे उठलनि‍ जि‍नगी की? जँ जीबैले जि‍नगी तँ जीबैक लेल अनेको तरहक साधनक जरूरत सेहो होइत। परि‍वारि‍क जि‍नगीक लेल पुरूष-नारी दुनूक जरूरत होइत ऐछ। जँ से नै हएत तँ परि‍वार कते दि‍न परि‍वारक रूपमे ठाढ़ रहत। अखन बूढ़ि‍ माइक आशापर दुनू बच्‍चा जीब रहल ऐछ जखनकि‍ हुनको (माइयो) भानस-भात करए, सेवा-टहल करए लेल टहलूक जरूरत छन्‍हि‍। जँ ओहो मरि‍ जेती तखन अपनो-सभकेँ के भानस कऽ खुऔत। अपने खाइक ओरि‍यान करब आकि‍ भानस करब। जँ भानसे नै हएत तँ खाएब कोना? जँ खाएब नै तँ जीब कोना? जँ मनुक्‍खे नै जीवि‍त रहत तँ परि‍वार कोना बनल रहत? मुदा मनुष्‍यो तँ अजीव होइत ऐछ। कि‍यो अपन घरमे लागल आगि‍ मि‍झबै पाछु अपनो जरि‍-पकि‍ जाइत तँ कि‍यो हँसि‍-हँसि‍ घरमे आगि‍ लगबैत ऐछ। मुदा अपना ऐठाम तँ से नै ऐछ। अनजानमे भलहि‍ं जे भऽ गेल हुअए मुदा जानि‍ कऽ तँ कि‍छु नै भेल। पलहनि‍क वि‍चार तँ अधला नहि‍ये छन्‍हि‍। ओहो बेचारी दुनू बच्‍चाक मुँहे देख बजलीह। अपन जानि‍ बजलीह। हुनको मनमे कहाँ छलनि‍ जे दोसर स्‍त्री कुल्‍टे हेतनि‍। सुपात्रो भऽ सकैए। खाएर जे हौ, मुदा परि‍वारमे जरूरत तँ जरूर ऐछ। भलहि‍ं अखन माए सम्‍हारि‍ रहली ऐछ मुदा परोछ भेलापर (मुइलापर) तँ जरूरत हेबे करत। फेर मनमे उठलनि‍ जँ कहीं माइयक सोझेमे बेटी भानस-भास करै जोकर भऽ जाएत तखन......। वि‍आह भेलापर ओहो सासुर जाएत। ताधरि‍ पुातेहूओ तँ हएत।

साल लगि‍ गेल। अइबेर अदरा पावनि‍ रीब-रीबेमे रहि‍ गेल। माघमे तेहन मारूख हवा चलल रहै जे एकोटा आमक गाछ मोजरबे ने कएल। धि‍या-पूताक कोन गप जे सि‍यानो सभ आमक मास बुझबे ने केलक। जहि‍ना बि‍ना बरक बरि‍याती नै होइत तहि‍ना बि‍ना आमक आद्रा पावनि‍ये की? पुरूखे रहने ने मौगी गि‍रथानि‍ बनैत, बि‍ना पुरूखे तँ राँड़-मसोमात कहबैत। अंति‍म जेठमे मौनसुनी तँ नै बि‍हड़ि‍या बरखा भेल। बरखा भेने धरतीक रंगे बदलि‍ गेल। आन साल जकाँ ने बेसी गरमी पड़ल आ ने बाध-बोनक रूप बि‍गड़ल। हरि‍यर घाससँ बाध सुग्‍गा पाँखि‍क साड़ी पहि‍रल जकाँ सुन्‍दर लगैत। अगता हाल भेने पूवरि‍या घरक पछुआरक दाबापरक गेनहारी सागक गाछ सुनयनाक जनमि‍ गेलनि‍। बीसे दि‍नमे आंगुर भरि‍-भरि‍क भऽ गेल। कनौजरि‍ छोड़े जोग भऽ गेल। काल्हि‍ये बीरार देख सुनयना वि‍चारि‍ लेलनि‍ जे काल्हि‍ एकरा (सागकेँ) रोपि‍ लेब। अखन रोपलासँ पाँच दि‍न पछुएबे ने करत मुदा कनौजरि‍ तँ ठीक रहत। तहूमे पछबा थोड़े बहैत ऐछ जे रोपलापर एकोटा लटुआएत। दुनू साँझ पानि‍ देबै लगले लगि‍ जाएत। कनी-मनी रौदमे अलि‍साएत तँ सेहो राति‍क ठंढमे उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जाएत। जँ अखन नै रोपि‍ लेब तँ भदवारि‍मे तीमनक दि‍क्कत हएत। फेर मनमे उठलनि‍ भदवारि‍क साग! तत्-मत् करि‍ते रहथि‍ आकि‍ मनमे उठलनि‍ पोरो-पटुआ साग ने भदवारि‍मे कफाह होइ छै सभ साग थोड़े होइ छै। जहि‍ना जाड़मे सेरसो-तोड़ी झँसगर होइए, चैत-बैसाखमे पोरो-पटुआ तहि‍ना ने भदवारि‍मे गेनहारी-ठढ़ि‍या होइए। मनमे खुशी भेलनि‍। मनमे चमकलनि‍ गेनहारीक रूप। हरि‍यर साड़ीसँ सज्‍जि‍त पात, तहि‍क बीच लाल डाॅटक पाढ़ि‍, धरतीपर ओलरि‍ मस्‍तीक आँखि‍सँ दुनि‍याँ दि‍स देखैत। अपन जि‍नगी दोसराक सेवाले अरोपि‍ बेर-बेर मूड़ी कटला बादो पुन: मूड़ी पैदा कऽ सेवाले इशारा करैत।

जहि‍ना मुरगी चूजाक संग खोपसँ नि‍कलि‍ ओचाओन बाड़ी-झाड़ीमे चराओर करैत, बोलि‍यो सीखैत आ दुनि‍याे देखए जाइत तहि‍ना दुनू बच्‍चा धीरज-घुरनीक संग सुनयना लोटामे पानि‍ नेने पछुआर दि‍स वि‍दा भेली। दावा लग पहुँच ठाढ़ भऽ गेनहारीक बीरार देखि‍ते मन पड़लनि‍ भीतमे साटि‍ कऽ राखल गुरमीक बीआ। आँखि‍ उठा कऽ देखलनि‍ तँ चक-चक करैत बीआ। बीआ देख मन पड़लनि‍ जे गुरमि‍यो रोपैक समए आबि‍ गेल। मारे बीआ ऐछ, एते थोड़े अपने रोपब। अनको देबै। गुरमी मनमे रहबे करनि‍ आकि‍ दुनू बच्‍चा दि‍स तकलनि‍। गुरमीक कोमलता मनमे अबि‍ते मुँहसँ अनायास नि‍कललनि‍- बौआ, आइ साग रोपि‍ दै छी काल्हि‍ गुरमि‍यो रोपि‍ देब।
दादीक बात सुि‍न धीरज बाजल- कोन गुलमी?
भीतमे साटल गुरमीक बीआ आंगुरसँ देखबैत सुनयना बजलीह- ओ बीआ गुरमीक छी। जहि‍ना अहाँ दुनू भाए-वहीनि‍ बच्‍चा छी तहि‍ना तहि‍ना ओहो बीआ छी। ओकरा खुरपीसँ माटि‍केँ खुनि‍ रोपि‍ देबै। पाँच-छह दि‍नमे गाछ जनमि‍ जाएत। जहि‍ना अहाँ दुनू गोरे हमरा एतेटा हएब तहि‍ना ओहो बढ़ि‍ कऽ फड़ए लगत।‍
दादीक बात सुि‍न घुरनी ठुनकैत बाजलि‍- गुरमी लेब। गुरमी लेब।‍
घुरनीक ठुनकबपर धि‍यान नै दऽ सुनयना लोटाक पानि‍ सागक गाछपर छीटि‍लनि‍। पानि‍ छीटैत देख घुरनि‍यो चुप भऽ गेल‍। लोटा रखि‍ गाछ नि‍हारि‍ कऽ देखलनि‍ तँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे एक दि‍ससँ उखाड़ैबला सभ गाछ नै एेछ। से नै तँ छोटकाकेँ बराए बड़का उखारब। चारि‍ दि‍नक बाद छोटको रोपाउ भऽ जाएत। फेर मन पड़लनि‍ जे एक डेढ़ धुर करीबमे रोपब। चारि‍-पाँच डेग पूबे-पछि‍मे आ चारि‍-पाँच डेग उत्तरे-दछि‍ने। एक-एक बीतपर रोपब। मने-मन हि‍साब जोड़ि‍ बीआपर नजरि‍ दैते बुझि‍ पड़लनि‍ जे चारि‍ओ हि‍ससँ कम्मे लागत। खाएर, भगवान सभ चीज एहि‍ना देथुन जे अपनो खाए आ दोसरोेकेँ दै।
नि‍हुरि‍ कऽ सागक गाछ उखाड़ए लगली। तै बीच दुनू भाए-वहीन (धीरज-घुरनी) एक्के गाछपर हाथ दऽ उखाड़ए चाहलक। एक-दोसराक हाथ-हटबैक कोशि‍श दुनू करए चाहलक। हाथ पकड़ि‍ दुनू कटाओज करए लगल। दुनूक कटाओज नै छोड़ा सुनयना हाँइ-हाँइ छेँटगरहा गाछ उखाड़ि‍ कहलखि‍न- ‍चलै चलू। भऽ गेल।
आगू-आगू दुनू बच्‍चा आ पाछु-पाछु सुनयना अांगन एली। आंगन आबि‍ बाटीक पानि‍मे गाछक जड़ि‍ धोय आइ बाटि‍येमे रखि‍ देलखि‍न। रोपाउ जगहपर जनमल घासकेँ उखाड़ि‍ कातमे फेक ओसारक चारसँ खुरपी उताड़ि‍ बीत-बीत भरि‍पर छअ मारि‍-मारि‍ दड़ी बनबए लगली। गोर दसेक दड़ी बनैबते दुनू भाए-वहीन हाथसँ खुरपी छीनए लगलनि। काजकेँ बाधि‍क होइत देख सुनयना दुनू बच्‍चाक हाथ छोड़ा, बीच आंगनमे खुरपी फेक देलनि‍। शंका रहनि‍ जे खुरपी ने लागि‍ जाइ। दुनू बच्‍चा खुरपी आनए दौड़ल तै बीच ओ बाटीसँ गाछ नि‍कालि‍ हाँइ-हाँइ रोपए लगली। दुनू बच्‍चा खुरपी पकड़ि‍ फेर छीना-छीनी करए लगल। हाथमे खुरपी लगैक डर फेर भेलनि‍। दसो दड़ी रोपि‍ बाल्‍टी लऽ पानि‍ आनए कल दि‍स वि‍दा भेली। दुनू बच्‍चा खुरपी छोड़ि‍ पाछु-पाछु दौड़लनि‍। पानि‍ आनि‍ लोटासँ रोपलाहा गाछमे पानि‍ दि‍अए लगली। फेर दुनू लोटा छीनए लगलनि‍। हाँइ-हाँइ पटा लोटा दऽ देलखनि‍। फेर दुनू लोटा छीना-छीनी करए लगल। तै बीच खुरपी आनि‍ फेर दड़ी खुनए लगली। दुनू बच्‍चा बौआऽ गेल। खुरपी लऽ दड़ी खुनब कि‍ रोपब आि‍क पटाएब।‍

अढ़ाइ बर्ख बीत गेल। दुनू भाए-वहीन दादि‍यो आ पि‍तोसँ बाजब सीख लेलक। दुनूक बोलो फरि‍छा गेल। सुपुट बोल नि‍कलए लगल। पि‍यास लगलापर पानि‍ आ भूख लगलापर भात-रोटी बजए लगल। बजरूआ बच्‍चा जकाँ मोवाइलसँ गप, छुड़ी, पि‍स्‍तौलक खेलौना, आ छुड़छुड़ी फटाका फोड़ब नै बुझैत मुदा तैयो गमैआ बच्‍चाक जि‍नगी जरूर जीबऽ लगल। गाम-घरमे जे गति‍ वि‍धवाक, नि‍स्‍सहायक होइत से गति‍ मइटुग्‍गर धीरज आ घुरनीक परि‍वारमे नै छलैक। गाम-घरमे गरीब मइटुग्‍गर, बपटुग्‍गरक प्रति‍ सि‍यानोक नजरि‍ वि‍षैला होइत। वि‍धवाकेँ डाइनक संग अशुभ बुझल जाइत तहि‍ना दुखताहसँ घृणा आ मइटुग्‍गर-बपटुग्‍गरसँ सेहो कएल जाइत ऐछ।

पानि‍क बाल्‍टीन नेनहि‍ सुनयना कलपर पि‍छड़ि‍ खसि‍ पड़लीह। ओना देहमे चोट लगलनि‍ मुदा माथ उठले रहि‍ गेलनि‍। ईंटा चोटसँ दहि‍ना गट्टा टुटि‍ गेलनि‍। तत्‍काल चोट तँ तेहन नै बुझि‍ पड़लनि‍ मुदा गट्टा फुलब शुरू भऽ गेलनि‍। तपेसर बाँसक पात आनए गेल रहए। ओसारपर ओछाइन खसा एक्के हाथे सुनयना ओछा पड़ि‍ रहली। ओछाइनेपर दुनू बच्‍चा बगलमे बैसल। पात लऽ कऽ अबि‍ते माएकेँ सुतल देख तपेसर पुछल- माए, सुतल कि‍अए....?
नोर पोछि‍ सुनयना उत्तर देलनि‍- बौआ, कलपर खसि‍ पड़लौं।‍
खसैक नाओं सुनि‍ तपेसर चमकि‍ कऽ बाजल- चोटो-तोटो लगलौ?
ईंटापर कनी चोट लगि‍ गेल।‍
लग आबि‍ तपेसर गट्टाकेँ फुलल देख गुम भऽ गेल। फुलबक हि‍साबसँ भरि‍सक टूटि‍ गेलइ। मन चनकि‍ करेज दरकि‍ गेलनि‍। मनकेँ थीर करैत बाजल- डॉक्‍टरकेँ बजौने अबै छि‍अनि‍। दवाइ देथुन नीक भऽ जेमे।‍ कहि‍ कलपर पहुँच हाथ-पएर धोय, अंगा पहीरि‍ तपेसर वि‍दा भेल। आंगनसँ नि‍कलि‍ते मनमे उठलनि‍ जहाँ धरि‍ पार लागत तहाँ धरि‍ तँ करबे करबनि‍। जखन जि‍नगि‍येक कोनो ठेकान नै ऐछ, कखन कि‍ भऽ जाएत तेकर कोन ठीक। अपने बाँसपर चढ़ै छी जँ ओतैसँ खसि‍ पड़ी तखन कि‍ हएत? चि‍न्‍ता बढ़ए लगलनि‍।
डॉक्‍टर संग आबि‍ तपेसर माएकेँ कहलनि‍- ‍माए, जना जे भेल से सभटा बात डाॅक्‍टर सहाएबकेँ कहुन।
सुनयनाक बात सुनि‍ डॉक्‍टर पलस्‍तर कऽ देलखि‍न। फीस लऽ चलि‍ गेलाह।

गाएकेँ पानि‍ पीआ तपेसर बाँसक पात टोनि‍अबए लगल। मनमे उठलनि‍ काजक बोझ। एक तँ ओहि‍ना दि‍न-राति‍मे एक्को छन नि‍चेन नै होइ छी तैपर माइक गट्टा टूटब तँ आरो काज बढ़ा देलक। छोड़ैबला कोन ऐछ। गाएकेँ खुएनाइ-पीएनाइ, घर-बहार केनाइ छोड़ि‍ देब से नै बनत। एक तँ लछमी दुआरपर कल्‍पती दोसर बच्‍चाक माए तँ वएह छी। अखन की भेल दू-अढ़ाइ बर्खक ऐछ, जँ ओकरा कनि‍यो कऽ दूध नै हेतै तँ सक्कतक छाती कन्ना बनतै। अपने नै हएत तँ नै हएत। माइयो तँ तहि‍ना भऽ गेलि‍। एक तँ बुढ़ारी तैपर जँ पावो भरि‍ दूध नै हेतै तँ बुढ़ारीक हाड़ कन्ना जुटतै। एते दि‍न दुनू बच्‍चेक ताक-हेर करए पड़ैत छल आब माइयोक तँ करए पड़त। उपजा-बाड़ी तँ तेहेन होइए जे पार लागब मोसकि‍ल भऽ गेल ऐछ। रौदी भेने अइबेर आरो संकट बढ़ि‍ गेल। पैछले माससँ बेसाह लगि‍ गेल। पाइ-कौड़ीक कोनो दोसर उपाए नै। हे भगवान कोन जन्‍ममे चूक भेल जे चर्मरोग जकाँ सौंसे देह एकबट्ट भेल ऐछ। मुदा कि‍ चि‍न्‍ता केने दुख भागि‍ जाएत? पत्ता टोनि‍ कुट्टी काटए लगल। मन पड़लनि‍ बाँसक पातक कुट्टी। एक तँ लगहैर गाएकेँ बाँसक पात खुअबै छी। मुदा उपाये की? जँ दू मुट्ठी हरि‍यरी नै हेतै तँ नारक कुट्टी कन्ना खाएत। अपने घास आनए जाएब से ओते पलखैत रहैए। गाइक नादि‍मे कुट्टी लगा माए लग आबि‍ बाजल- माए, चि‍न्‍ता-फि‍कि‍र नै कर। दि‍नक दोख छलै, भेलै। तोरा कोन चीजक कमी छौ। हमरा सन बेटा, दूटा पोता-पोती लगेमे छौ तखन तोरा कथीक दुख।‍
भरभराएल स्‍वरमे सुनयना बाजलि‍- बौआ, आँखि‍क सोझमे तोहर दुख देख छाती छटपटाइए। जेहो कोनो काजमे संग-साथ दै छेलि‍यह सेहो आब हएत।‍
माइक बात सुनि‍ तपेसर अवाक भऽ गेल। बोल बन्न भऽ गेलै। मनमे उठलै रौतुका सि‍दहा। बेर टगि‍ गेल। कोना राति‍ चुल्हि‍ चढ़त। बि‍नु खेने ककरो नीन हेतै। जे कनी-मनी हाथमे छलाए सेहो दवाइये-दारूे चलि‍ गेल। एना भऽ कऽ कहि‍यो हाथ खाली नै भेल छलाए। ने तँ पचासे रूपैरूा दुआरे डाॅक्‍टर सहाएबकेँ एना कहि‍ति‍अनि‍। तरे-तर छाती डोलए लगलनि‍। आगू नाथ ने पाछु पगहा। माएकेँ कहलनि‍- माए, खेत बेचने बि‍ना एक्को दि‍न पार लागब कठि‍न भऽ गेल। से....।‍
बेटाक बात सुनि‍ सुनयना चुपे रहलीह। मनमे उठए लगलनि‍ घर-परि‍वार तँ ओकरे छि‍ऐ। कोना हँ आकि‍ नै कहबै। हमरा बुते कि‍ हेतै। धारक बेग जहि‍ना भौर लैत तहि‍ना सुनयनाक मन भौर लि‍अए लगलनि‍। एक-एक पाइ कम भेने घर खसैत आ एक-एक पाइ जमा भेने उठैत ऐछ। एक-एक कट्ठा जँ बि‍काइत गेल तँ नि‍रभूमि‍ होइमे कते दि‍न लागत। एक दि‍स परि‍वारक खर्च दोसर दि‍स समएक मारि‍ तैपर जते सम्‍पति‍ कमत ओते तँ कमे होइत जाएत। माएकेँ चुप देख तपेसर बाजल- जाइ छी, चौरी खेत बेचैक गप-सप्‍प करए।‍
खेत बेचैक बात करए तपेसर वि‍दा भेल। आंगनसँ नि‍कलि‍ते मनमे उठलनि‍ सुपतोसँ कम दाम देत। जहि‍ना गरामे उत्तरीबलाकेँ कौआसँ खैर लुटाओल जाइत तहि‍ना ने हएत। मुदा लगले मन सकताएल बाजल- तोहर कोन दोख। मन-पेट काटि‍ लोक घर बनबैए आ बि‍हाड़ि‍मे उड़ि‍ जाइ छै तैमे बनौनि‍हारक कोन दोख।‍
सबुर भेलै डेग आगू बढ़ौलक। दुनि‍याँ बड़ीटा छै। जँ भगवान हाथ-पएर दुरूस रखने रहताह तँ कहुना नै कहुना ि‍जनगी गुदस कैये लेब। मुदा आइक जे परि‍स्‍थि‍ति‍ ऐछ ओकरा छोड़ि‍यो कऽ भागव? भागव तँ कायरता हएत। कोन मुँह लोककेँ देखाएब। हमरा सन-सन ढेरो लोक ऐछ। लगले मन उनटि‍ गेलै। जहि‍ना गाममे कतेको वृत्ति‍क लोक होइत ऐछ तहि‍ना गामोक अनेक रूप होइत। एक्के गाम ककरो लेखे वि‍द्वानक होइत तँ ककरो लेखे मुरूखक। ककरो लेखे शराबी-जुआरीक होइत तँ ककरो लेखे बइमान-शैतानक। तँए की‍ आमक गाछमे तेतरि‍ फड़ि‍ जाएत आ तेतरीक गाछमे आम। सभकेँ अपन-अपन गुण-स्‍वभाव आ चलैक रास्‍ता होइ छै। कि‍यो फटेहाल जि‍नगी पाबि‍ जीबैत ऐछ आ कि‍यो सुभि‍तगरसँ जीबैत ऐछ। एकर माने ई नै जे फटेहाल जि‍नगी जीनि‍हार पति‍ते भऽ जाए। हँ, होइतो ऐछ। मुदा जेकर जेहन वि‍चार तड़गर रहैत ऐछ ओ अोहन जि‍नगी बना जीबैमे आनन्‍द प्राप्‍त करैत ऐछ। आनन्‍दे प्राप्‍त करब तँ उद्देश्‍य होइत ऐछ। कि‍यो तत्‍व-चि‍न्‍तनमे समए लगबैत तँ कि‍यो दि‍न-राति‍ लुचपन्नी केने घुरैत। एहनो-एहनो तत्‍व चि‍न्‍तक ऐ धरतीपर भेल छथि‍ जे दोहरा-तेहरा कऽ जि‍नगी मांगि‍ तत्‍व-चि‍न्‍तन करैत रहलाह। ऐ असीमि‍त भूमाकेँ, कठि‍न मेहनतेसँ जानल आ ताकल जा सकैत ऐछ। टोलक अंति‍म छोड़पर पहुँचते तपेसरकेँ कलकत्तासँ आएल खुशीलाल पुछलकनि‍- भाय कत्तऽ जाइ छी?
खुशीलालक बात सुि‍न तपेसर ठमकि‍ गेला। जहि‍ना खुशी मनमे मधुआएल बोल पनपैत तहि‍ना दुखी मनमे सि‍नेहक बोल कनीकाल चि‍कुरि‍आएल ठोर, थरथराइत पि‍पनी रूपमे ठाढ़ भऽ मि‍रमि‍राइत तपेसर कहलक- बौआ, वि‍पत्ति‍मे पड़ल छी। माएक हाड़ टूटि‍ गेलनि‍। पलस्‍तर तँ करा देलएनि‍। मास दि‍नक पछाति‍ पलस्‍तर कटतनि‍। तै बीच पथ-पानि‍क संग-संग दवाइ दारू सेहो चलतनि‍। कते कहबह?
भैया, हमहूँ अही समाजक बेटा छी। जते शक्ति‍ ऐछ ओते मदति‍ करब। साल भरि‍पर चारि‍-पाँच हजार रूपैआ लऽ कऽ कलकत्तासँ आएल छी। अखन जत्ते पाइक काज ऐछ लि‍अ छह मासमे बि‍ना सूदि‍क घुमा देब। अखन अहूँक काज चलि‍ जाएत आ कन्‍ी दि‍के कि‍ सि‍के अपनो चला लेब।‍
बि‍नु सूदि‍क रूपैआ सनि‍ तपेसरक मनमे खुशी आएल। मुदा लगले मनमे भेलनि‍ जे व्‍यथा सुनि‍ ओ औगुता कऽ बाजल। जहि‍ना ओ बाजल तहि‍ना की हमहूँ करब। जहि‍ना देहमे रोग सन्‍हि‍आइते रसे-रसे पसरए लगैत तहि‍ना तँ अखन अपनो ऐछ। छह मासक समए दैए मुदा अोरि‍यान हएत। दि‍न-दि‍न खरचो बढ़बे करत जखनकि‍ आमदनीक कोनो जोगार नै देखै छी। तखन कोना लेब? बाजल- बौआ, दू कट्ठा खेते लऽ लाए।‍
खेतक नाओं सुनि‍ खुशीलाल सहमि‍ गेल। एक तँ बेचारे वि‍पत्ति‍क मारल छथि‍। तैपर सँ खेत लेब। करेज थीर रहतनि‍। जखन करेजे थीर नै रहतनि‍ तखन तँ आरो सोग बढ़तनि‍ की‍ नै। बाजल- भ.... इ..... अ.....।‍
बजैत-बजैत आँखि‍मे नोर आबि‍ गेलै। पुन: बाजल- छह मासक बदला दू-चारि‍ मास पछाइते देब।‍
बि‍नु सूदि‍क रूपैआ तपेसरक मनकेँ तड़का देलकनि‍। मनमे चमकलनि‍ सूदि‍ प्रथा। जैपर दुनि‍याँक बैंक ठाढ़ भऽ नंगटे नचैत धनीकक शासनक (सत्ताक) फुलवाड़ीक शोभा बढ़ौने ऐछ। जैसँ देशक उन्नति‍ (मनुष्‍यक कल्‍याण) मुँहक बोल मात्र रहि‍ गेल ऐछ। तइठाम समाजमे......। जै समाजकेँ सूदि‍ दू भागमे बाँटि‍ देने ऐछ- सूदि‍खौक आ सूदि‍दार। बैंकक सूदि‍ कम होइ छै मुदा छबे मासमे मूल धन बनि‍ सूदि‍ पैदा करए लगैत छै। वि‍याजक बंश दुनि‍याँमे पसरि‍ गेल ऐछ। जखनकि‍ समाजक सूदि‍ एकहरफी चलै छै। भलहि‍ं महाजनक बही गीता-रामायणि‍क थाकमे रहि‍ पारस मणि‍ जकाँ बोहि‍‍यो गीता-रामायण बनि‍ जाए। देल-लेलक सीमा-सरहद तोड़ि‍ गीता-रामायणपर हाथ रखैत खौदुकाक घरारीक रजि‍ष्‍ट्रीक समए बना लैत। लगले मन घुरि‍ अपन समस्‍यापर एलनि‍। छोट भाए जकाँ खुशीलालकेँ कहलकनि‍- बौआ, लोकक लागि‍मे लोक अही दुआरे बसैत ऐछ जे सुख-दुख संग मि‍ल जीबी। टूटल सीढ़ी जकाँ अखन परि‍वारक स्‍थि‍ति‍ बनि‍ गेल ऐछ। कोहुना कऽ एकटा पएर रौपे छी तँ दोसर टूटि‍ जाइए। एक्को डेग ससरब कठि‍न भऽ गेल ऐछ। जना बुझि‍ पड़ैए जे पानि‍-बि‍हाड़ि‍, पाथर, ठनका सभ संगे आबि‍ गेल ऐछ। जि‍नगीक कोनो ठेकान नै देख रहल छी। जहि‍ना पानमे नाव खेबनि‍हारक लग्‍गी थाह नै लैत तहि‍ना भऽ गेल ऐछ।
खुशीलाल- भैया, लोकेक काज लोककेँ होइ छै।‍
तपेसर- बेस कहलह। मुदा लोकोक बीच खाढ़ी बनल ऐछ। तोरासँ सात कछे बेसी सम्‍पति‍ ऐछ। जखन दुखेक जि‍नगी भगवान देलनि‍ तखन ओइसँ कते पड़ाएब। जीता-जि‍नगी आँखि‍ कोना मूनि‍ लेब। मुदा तोड़ा पाबि‍ छाती सूप सन भऽ गेल। जहि‍ना पानि‍मे डूबैत चुट्टीकेँ खढ़क आशा होइत तहि‍ना भेल। एकटा संगी भेटल। मुदा दुखो असान नै ऐछ। समैया नै बरहमसि‍या ऐछ। तोरो कहबह जे जखन एते मि‍हनत‍ कऽ कमाइ छह तँ पाइकेँ राइ-छि‍त्ती नै करि‍हह। अखन जे खेत बेचै छी लऽ लाए। फेर जँ बेचब तँ तोरे देबह। मरि‍यो जाएब तैयो तोहर बेटा-पाेता बाजत जे फल्‍लांबला खेत छी। बेचारा माइयक सेवामे बेचलक।
तपेसरक बात सुनि‍ खुशीलालक हृदए पसीज गेल। चुप-चाप घरसँ एटैची नि‍कालि‍ अनलक। चाभीसँ खोलि‍ पाँचो हजार रूपैया ि‍नकालि‍ तपेसरक आगूमे रखि‍ बाजल- भैया, अखन धरि‍ ने ककरो कोनो चीज ठकलि‍ऐ आ ने चोरा कऽ एकोटा खढ़ उठौलि‍ऐ। दुनू हाथ भगवानसँ कहै छि‍अनि‍ जे जहि‍ना अखन धरि‍ नि‍माहलौं तहि‍ना आगूओ पार लगाएब।‍
गंगाजल जकाँ खुशीलालक वि‍चार सुनि‍ तपेसरक मनक बखारीक मुँह खुजि‍ गेलनि‍। बाजला- बौआ, सभ बुझैत छथि‍ जे जमीन जाल सदृश्‍य होइत। जाल बनाओले जाइत ऐछ फँसबैले। तोहर हृदए सौदा कागज जकाँ छह। ऐपर प्रेमोकथा लि‍खल जा सकैत ऐछ आ आपराधि‍क सेहो। मुदा हम नै चाहब जे तोरा मनमे कनि‍यो गंदा आबह। देखहक जमीनेक चलैत झूठ-फूसि‍सँ लऽ कऽ बेइमानी-शैतानी, मारि‍-पीट, केश-मोकदमा सभ होइत ऐछ। कि‍यो जबुरि‍या लि‍खा बेइमानी करैत ऐछ तँ कि‍यो महदा लि‍खा। कि‍यो दोसरसँ नि‍शान लऽ दोसराक हड़पैत ऐछ तँ कि‍यो बलजोरी अाड़ि‍ तोड़ि‍ अपनामे मि‍ला लैत ऐछ। कते कहबह?
तपेसरक मुँहसँ नव बात सुनि‍, जहि‍ना तैयार खेतमे बाओग कएल फसल अकुि‍र धरतीसँ ऊपर अबैत तहि‍ना खुशीलालक मनमे जि‍नगीक नव-नव अंकुर जनमऽ लगल। नव अंकुर देख जहि‍ना धरतीकेँ अपन नि‍रोग कोखि‍क एहसास होइत तहि‍ना खुशीलालक हृदएमे भेल। वि‍ह्वल होइत बाजल- भैया, दुनि‍याँ कि‍छु हौ आगि‍ लगौ, पाथर खसौ मुदा मनुष्‍य अपने जि‍नगीक जबाबदेह होइत। एक्के गाछक एक डारि‍मे बाॅझी लगलासँ बॅझि‍या जाइत तँ दोसर चुट्टि‍आ जाइत। मुदा एकर माने ई नै ने जे ओकरामे फड़ैक शक्‍ति‍ नै छै। फड़बो करैत ऐछ। कि‍यो कि‍छु करैए करह, जहि‍ना अखन धरि‍, ओना जि‍नगीमे कोनो लेन-देन नै भेल छल, भाए-भैयारी जकाँ रहलौं तहि‍ना जीता जि‍नगी रहब। अहाँ जेठ भाय तुल्‍य छी जे कहब करैले तैयार छी।‍
खुशीलालक बात सुि‍न तपेसरोक हृदय परसाएल आम जकाँ पल-पल करए लगलनि‍। बजला- बौआ, अपना गाममे चारि‍ मेलक जमीन ऐछ। बाड़ी-घरारी, भीठ, मध्‍यम धनहर आ चौर। एक गामक रहि‍तो चारि‍ तरहक दाम छै। कारणो छैक अपजा आ उपयोगक। घरारीक जमीन ऊँचगर होइए जैसँ घर बनबैक काजमे अबैत ऐछ। भीठ सीमापर ऐछ। घरो बनाओल जा सकैत मुदा घर नै बनेन उपजो-बाड़ी होइत आ बागो-बगीचा लगाओल जाइत। मध्‍यम धनहरमे ि‍सर्फ अन्ने उपजैत। जखनकि‍ नीच जमीन भेने चौरीक महत्‍व सभसँ कम होइ छै। कारण छैक जे बेसी बरखा भेने वा बाढ़ि‍ एने दहा-भसि‍या जाइत। ने पानि‍क उपज होइत आ ने उपराड़ि‍क। जँ ओकरा मुँह-कान बना पानि‍क बस्‍तु उपजाओल जाए तँ ओहो ओहने मूल्‍यवान हएत जेहन दोसर होइत। ओना ओहो धरति‍ये छी बनौलापर सभ तरहक बनि‍ सकैए। मुदा कते कहबह? बड़ीखान घरसँ नि‍कललौं, अखन जाइ छी।‍
तपेसरक दुनू बाँहि‍ पकड़ि‍ खुशीलाल बैसबैत कहलक- भैया, अहाँ पाबि‍ बहुत पेलौं। आइ बुझि‍ पड़ैए जे हमहूँ समाजक लोक छी। सोझे गामक सीमानमे धर बान्हि‍ रहने तँ नै होइत होइत तँ तखन जखन सबहक सुख-दुख मि‍ल जाए। जैसँ सभ एकबट्ट भऽ जि‍नगी बि‍ताओत। खाली हाथे कोना जाएब?‍ जँए एत्ते समए बीतल तँए कनी आरो बीतह। अहूँक एकटा काज भेल रहत।
तपेसर- बौआ, खेत कोनो अन्न-पानि‍ छी जे नाि‍प-खोखि‍ मूल्‍य बनत। एकर मूल्‍य आड़ि-पाटि‍क चुगलसँ होइत। सभ तरहक जमीनक लेन-देन समाजमे चलि‍ते रहैत ऐछ। अपना गामक चौरी खेत डेढ़ हजार रूपैये कट्टा वि‍काइत ऐछ दू कट्ठा खेत देबह तीन हजार रूपैआ दाए।‍
तीनू हजार रूपैआ गनि‍ खुशीलाल तपेसरकेँ देलक। रूपैआ नेने वि‍दा भेला। बाटमे हि‍साब बैसबए लगलथि‍ जे सभसँ बेसी जरूरी बुतातक ऐछ। मास भरि‍क बुतात कीन लेब। बाकी जे बचत हाथ-मुट्ठीमे राखब। जखन घरमे आगि‍ लगले ऐछ तखन कोन लुत्ती कि‍महर उठत तेकर कोनो ठीक छै।

मास दि‍न बीतलापर सुनयनाक हाथक पलस्‍तर काटि‍ डॉक्‍टर कहलखि‍न- भारी काज नै करब। ओना बूढ़क हड्डी छी तँए बच्‍चा जकाँ नहि‍ये जुटत मुदा तैयो बचा कऽ रहब तँ नीके रहत।‍
डॉक्‍टरक बात सुनि‍ सुनयनाकेँ भलनि‍ जे जँ भारी काज नै करब तँ जि‍नगी भारी कोना बनत। जि‍नगीमे हल्‍लुक-भारी सभ रंगक काज अबैए। मुदा जीते-जि‍नगी ने दुनि‍याँ देखै छी, आँखि‍ मुनब सभ हरा जाएत। कहुना भेलौं तँ बुढ़े भेलौं मुदा जाबे पोता-पोती अपने जीबै जोकर हएत ताबतो जँ जीब जाएब तैयो नीके हएत।
शरीरसँ शरीरी धरि‍ सुनयनाक सोगसँ सुकुड़ए लगलनि‍। एक दि‍स बेटाक व्‍यथासँ व्‍यथि‍त दोसर दि‍स मइटुग्‍गर पोता-पोतीक जि‍नगी देख झकैत, तँ तेसर दि‍स जि‍नगी भरि‍ पालल-पोसल (छाउर-गोबर) खेतकेँ बोहाइत देखैत तँ चारि‍म दि‍स अपन देहक दुखसँ दुखी। ओना जीबैक आशा मनमे उत्‍साह जगबनि‍ मुदा जेना डि‍बि‍याक इजोतकेँ घनगर अन्‍हार घेरैत-घेरैत छोट (कम प्रकाशि‍त) बना दैत तहि‍ना सुनयनाकेँ भऽ गेलनि‍। अन्‍हार छोड़ि‍ दुनि‍याँमे कि‍छु देखबे ने करैत छलीह। जना खसैत जि‍नगी उठैत जि‍नगीकेँ दाबि‍ सवारी बना लेलकनि‍। जैसँ ओछाइन धऽ लेली। कतबो हूबा उठैक करथि‍ मुदा उठि‍ कऽ बेसी काल बैसल नै होइन। वि‍छानपर पड़ल-पड़ल पहि‍लुक कएल काज भरि‍ दि‍न पढ़ैत रहथि‍। जखन कखनो कि‍म्‍हरोसँ आबि‍ तपेसर पूछनि‍ जे माए, मन केहन लगैए। तँ जहि‍ना कोनो फल वा तरकारीमे गुण तँ रहैत मुदा कोनो रसक सुआद नै रहैत तहि‍ना सुनयनाक मन बेरस हुअए लगलनि‍। बेरस होइत-होइत मरि‍ गेली।

फगुआक तीन दि‍न उत्तर चैती बरखा भेल। ओना कुमासक बरखा भेल मुदा मौसमक रंग ओरो हरि‍या गेल। कनी-मनी जे तापसँ दुपहरमे पसेनाक आगमन हुअए लगल, एकाएक रूकि‍ गेल। घुरक ओरि‍यान जे बन्न हुअए लगल छल फेर दोबरा गेल। घरक राखल कम्‍मल, सीरक, सलगी, फेर नि‍कलि‍ गेल।
पहि‍ल बरखा भेने सबहक घर चुबल। शीतसँ भीजैत आएल चार रौद पड़ने पएरक बेमाए जकाँ चि‍ड़ी-चाेंंत भऽ फटि‍ गेल। जैसँ बरखामे बखूबी चुबल। चुबैक आरो कारण छलैक। चारमे फड़ल गराड़केँ तकैत-तकैत चि‍ड़ै सभ तना-खोदि‍या देने जना चौरी खेतमे धि‍या-पूता अनेरूआ केशौर उखाड़ैमे खुनैत। जैसँ छप्‍पर सभमे खाधि‍ बनि‍ गेल। मुदा पहि‍ल बरखा होइक कारणे ककरो मुँह मलि‍न नै भेल। पहि‍ल बरखामे एहि‍ना होइत आएल ऐछ, जे सभकेँ बुझल। मुदा जहि‍ना चैत माससँ साल शुरू होइत तहि‍ना बरखाक शुरूआत सेहो चैतेसँ भेल। पहि‍ल पानि‍ भेलापर सबहक मनमे उठल जे जखने अँटि‍येलहा नार-खढ़ सुखत आकि‍ घर छड़ा लेब। से भेल कहाँ? पहि‍ल बरखाक दोसरे दि‍न दोहरा गेल। दोहरेबे नै कएल जे दोहरबि‍ते रहि‍ गेल। गोटे ि‍दन दोहरा कऽ, गोटे दि‍न नागा हुअए लगल। पूस-माघ-फागुनमे जे नार वा खढ़ चैत-बैशाख-जेठमे छाड़ैक उद्देश्‍यसँ अँटि‍आएल गेल ओ जाँकेमे भीज-भीज सड़ए लगल। जहि‍ना एक बेर धारक नासी बाढ़ि‍ सभमे बहैत-बहैत सनमुख धार बनि‍ जाइत तहि‍ना चुबैत-चुबैत सबहक घर चुबाठ घर बनि‍ गेल। चारक खढ़ो आ बत्ति‍यो-कोरो सड़ि‍ खसए लगल। तहि‍ना भीतक माटि‍ धोखड़ि‍-धोखड़ि‍ खसए लगल। थाल-कादोक घर बनि‍ गेल। बरखा हुअए लगै आकि‍ कि‍यो छि‍पली-बाटीसँ घरक पानि‍ उपछैत कि‍यो कोदारि‍सँ काटि‍-काटि‍ भीतक खसल माटि‍ हटबैत। खाएल अन्न पचब कठि‍न भऽ गेल।

अपन घरक दशा आ अपना परि‍वारकेँ अवग्रहमे फॅसल देख तपेसर भगवानकेँ समरि‍-सुमरि‍ कहनि हे भगवान अपना देश लऽ चलू। कि‍अए नर्कमे घि‍सि‍यौर कटबै छी। मुदा खाली कहनहि‍टा सँ नै होइत लइयो गेि‍नहार ने चाही। अपन आगूक रास्‍ता बन्न देख तपेसर पाछु घुरि‍ देखैत तँ कनैत मन चि‍कड़ि‍-चकड़ि‍ बजैत जे साल जनमक पाप लोककेँ बि‍साइत छै मुदा पैछलो जनमक पाप मन नै पड़ैत ऐछ। हारि‍-थाकि‍ बेचारा अन्‍हारमे चलैत बटोही जकाँ आँखि‍ मूनि‍ थाहि‍-थाहि‍ आगू डेग बढ़बए लगला। साल बीतल, सबहक जान तँ बचल मुदा रहैकक घर रहैबला नै रहल।

धारक पानि‍ जकाँ समए ससरल। दुनू भाए-वहीन धीरज पाँच बर्खक भऽ गेल। घरक छोट-छोट काजो आ खेतसँ बथुआ सागो तोड़ि‍-तोड़ि‍ दुनू भाए-वहीन आनए लगल। आमक मासमे चटनीले गाछीसँ आमो बीछ-बीछ आनए लगल। जहि‍ना गहूम-बदामक औंकुराकेँ कौआ उखाड़ि‍-उखाड़ि‍ खइत, से डर आब तपेसरकेँ दुनू बच्‍चाक प्रति‍ नै रहलनि‍। गील माटि‍क बनल वर्तन वा मूरती जहि‍ना रौद पाबि‍ सकता जाइत तहि‍ना दुनू भाए-वहीनक सकताइत शरीर देख तपेसरक मनमे खुशी भेलनि‍। नहि‍यो माए छै तैयो दुनू उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। आब तँ ककरो गाइयो-महीस चरा गुजर कऽ सकैए। कहुना जीवि‍ये लेत। दुनि‍याँ देखबे करत। जँ मइटुग्‍गरो कलंक लगल छै तँ की वि‍आह दान नै हेतै। जरूर हेतै। जहि‍ना हमर बेटा-बेटी मइटुग्‍गर ऐछ तहि‍ना कतेकोकेँ हेतै। अपन कमैत भार देख तपेसरक मन दुनूक (बेटा-बेटी) जि‍नगीपर पड़लनि‍ स्‍कूल जाइ जोकर भऽ गेल। जुग-जमाना बदलि‍ रहल ऐछ। तेहन समए आबि‍ रहल ऐछ जे बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोककेँ के पुछत? से नै तँ दुनूक नाओं स्‍कूलमे जरूर लि‍खा देब। स्‍कूल मनमे उठि‍ते लत्ता-कपड़ा, सि‍लेट-पेन्‍सि‍लपर पड़लनि‍। खएर जे होउ बरस्‍पति‍ दि‍न जरूर नाओं लि‍खा देब। आंगुरपर दि‍न गनि‍ते तेसरे दि‍न वृहस्‍पति‍ भेटलनि‍। परसू तँ नाउए लि‍खाएब तै बीच लत्तो-कपड़ा आ सि‍लेटो-पेन्‍सि‍ल कीन देबै।

दोसर दि‍न भोरे तपेसर रोटी सन्ना बनौलनि‍। तीनू गोटे खा बजार वि‍दा भेला। दुइये कोस बजार उठैत-बैसैत साँझ तक घुरि‍ आएब अपना डेगे नै ओकरे सबहक डेगे चलब। कहुना ऐछ तँ धि‍या-पूताक नवका पएर छि‍ऐ कि‍ने, कुदि‍ते-फनि‍ते चलि‍ जाएत। भूख लगतै तँ मूढ़ी कचड़ी कीन देबै। दू फक्का अपनो खा लेब। एकटा काज तँ भऽ जाएत कि‍ने।
बजार पहुँच दुनू भाए-वहीनकेँ एक-एक जोड़ पेन्‍ट, एक-एक गंजी, एक-एक अंगाक संग एक-एक सि‍लेट कीन डि‍ब्‍बो भरि‍ (एक दर्जन) पेन्‍सि‍ल कीन तीनू गोटे घुमि‍ गेला।

सूर्योदयसँ पहि‍नहि‍ तपेसर उठि‍ जलखैक ओरि‍यान केलनि‍। भि‍नसुरका स्‍कूल। बेरू पहर नाओं लि‍खाएब ओते नीक नै। अखन जे नाओं लि‍खा देबै तँ बेरसँ पढ़ैयोले जाए लगत।
टेल्हूक बेटा-बेटी भेने तपेसरक जान हल्‍लुक भेलनि‍। आंगन बहारब, चुल्हि‍ चि‍नमान नीपब, थारी-लोटा घुरनी घुअए लगल। अंगनाक काज पतराइत देखि‍ तपेसर सोचलनि‍ जे खेती आने करब। मुदा समए बदलने खेतीमे नव-नव ओजार आएल। जै‍सँ उपजो-बाड़ी बढ़ल आ हल्‍लुको भेल। जइठाम तीन-तन, चरि‍-चरि‍ गार करीन लगा लोक छह कट्ठा आठ कट्ठा खेत भरि‍ दि‍नमे पटबै छल तइठाम दमकल बोरि‍ंगसँ चारि‍ कट्ठा घंटा भरि‍मे पटैत ऐछ। तहि‍ना ट्रेक्‍टरसँ खेत जोतब, थ्रेशरसँ गहूम-धान दौन करब सेहो असान भऽ जाइत ऐछ।

एक चौथाइसँ बेसी खेत तपेसरक बीक गेल। मुदा जे बँचल ऐछ ओकरे जँ आधुनि‍क ढंगसँ खेती करब तँ पहि‍नेसँ कते गुणा बेसी उपजा हएत। जहि‍ना नव-नव औजार बनल तहि‍ना नव-नव कि‍स्‍मक बीआ सेहो बनल। जे धान आधा मनसँ लऽ कऽ कट्ठा मन उपजैत छल से क्‍वीन्‍अल कट्ठा उपजए लगल। जते आगू दि‍स नजरि‍ तपेसर बढ़वैत छला तते आशाक प्रखर ज्‍योति‍ आँखि‍क सोझमे अबए लगलनि‍। मुदा समस्‍यो तँ झमटगर ऐछ। बाध सभमे छि‍ड़ि‍आएल खेत, नीच-ऊँच साइज माल-जालसँ लऽ कऽ बोनैआ जानवर, चि‍ड़ै-चुनमुनीक संग मूसक उपद्रव, चोरा कऽ जजात कटैसँ लऽ कऽ गाए-महींससँ चोरा कऽ चरबै धरि‍क उपद्रव इत्‍यादि‍। ओझरी देख तपेसरक मन ठमकि‍ गेलनि‍।
जहि‍ना सघन बोनमे लोक हरा जाइत, कि‍म्‍हरो बढ़ैक साहसे ने होइत मुदा बि‍ना नि‍कलने जानो बँचैक संभावना नै रहैत तहि‍ना तपेसरोकेँ भेलनि‍। ओझराएल मन संगी-सहयोगी तकए लगलनि‍। संगी तँ जरूर ऐछ मुदा संगी दू तरहक भेटैत ऐछ। पहि‍ल, ओहन संगी जे जीवनक एक रास्‍ता बुझि‍ अपनो कल्‍याण बुझैत आ दोसर, दोसराक कान्‍हपर बन्‍दूक रखि‍ चलबए चाहैत। सोचैत-वि‍चारैत तपेसरक नजरि‍पर तीनटा संगी पड़लनि‍ पहि‍ल समाजक (गौआँक) सहयोग, दोसर बैंक तेसर सरकारी।
समाजमे जाति‍-समप्रदाय एे रूपे पसरि‍ गेल ऐछ जैमे ककरो कल्‍याण होएब कठि‍न एेछ। सभ अपने ताले बेताल ऐद। ने एक दोसरकेँ सोहाइत आ ने नीक देखए चाहैत। तहि‍ना बैंकोक ऐछ। उचि‍त सूदि‍पर कर्ज लैमे दौड़-बरहा आ खर्च एते पड़ि‍ जाइत ऐछ जैसँ लोकक मन टूटि‍ जाइत ऐछ। सरकारी मदति‍ (अनुदान) मात्र दि‍खाबा ऐछ। जहि‍ना कनैत धि‍या-पूताकेँ माए-बाप रासि‍-रासि‍क लोभ देखा चुप करैत तहि‍ना सरकारि‍यो अनुदानक ऐछ। फेर तपेसर ओझरा गेला। प्रश्‍न उठलनि‍- की कएल जाए? अपनो तँ पूँजी ऐछ। पूँजी दू रंगक पहि‍ल- श्रम दोसर धन। नगद नै ऐछ। मुदा खेत तँ ऐछ। जहि‍ना खेत बेच माइयक सेवा आ दुनू बच्‍चाकेँ पाललौं-पोसलौं तहि‍ना आरो बेच लेब। जँ कि‍छु जमीन कमबो करत तँ ओते उपजो बढ़त गामक स्‍कूलसँ धीरजो आ घुरनि‍यो पास कऽ नि‍कलि‍ गेल। दस बर्खक भेने दुनू घर-अंगनाक काजसँ पि‍तोक काममे हाथ बटबऽ लगल। आगू पढ़ैक आशा ऐ लेल नै रहै जे लोअर प्राइमरी स्‍कूल तँ गाममे रहए मगर मि‍ड्लसँ उपरक स्‍कूल दू कोस गामसँ हटल रहए। सभ दि‍न चारि‍ कोस चलि‍ पढ़ब कठि‍न रहै तँए पढ़ाइ छोड़ि‍ देलक। होस्‍टलक खर्च जुटा नै पबैत।
अखन धरि‍ तपेसर गि‍रहस्‍तीक रूपे-रेखा बदलि‍ लेलनि‍। बाधे-बाध छि‍ड़ि‍आएल खेतक घट्टो लगा-लगा एकठाम कऽ लेलनि‍। खेते बेच कऽ बोरि‍ंग-दमकल बड़द सेहो कीन लेलनि‍। अपना हाथमे पानि‍ एने सालो भरि‍ खेती करए लगला। ओना चारि‍ये मास (बरसात) केँ कि‍सान खेतीक रीढ़ बुझैत। जँ बेसी बरखा भेल, बाढ़ि‍ आएल तँ दहार भेल। नै जँ कम बरखा भेल तँ रौदी भेल।

दस बजेक समए। चारि‍टा मकैक बालि‍ खेतसँ नेने तपेसर डेढ़ि‍यापर सँ बेटीकेँ सोर पाड़ि‍ कहलखि‍न- बुच्‍ची, चारू बालि‍ ओराहि‍ दूटा अहूँ दुनू भाए-वहीन लऽ लेब आ दूटा दलानपर नेने आउ।‍
हँसैत घुरनी धीरजकेँ कहलक- भाय, देखि‍यो केहन मकै ऐछ।‍ ऐहने मकैक मि‍ठाइयो बनैए।
मकैक बालि‍ घुरनीकेँ दए तपेसर दरबज्‍जाक ओसारक खूटा लगा ओङठि‍ कऽ बैस अपन जि‍नगीक संबंधमे सोचए लगला। पेटक उपाए भऽ गेल। मुदा पेटे जकाँ घरो ऐछ। ओना अखन परि‍वारो नमहर नहि‍ये ऐछ। मुदा तैयो रहैले तँ घरे चाही। तहूमे ि‍गरहस्‍तक परि‍वार छी। बोरि‍ंग ने खेतमे गारल ऐछ मुदा दमकल रखैले तँ घरे चाही। जँ से नै करब तँ बरसातमे बीझा जाएत। जैसँ कते पार्ट-पुरजा बि‍गड़ि‍ जाएत। संगे बाहरमे रखने चोरो चोरा लेत। आब कि‍ कोनो पहि‍लुका चोर रहल जे ऊखरि‍-समाठ चोराओत। आब तँ यएह सभ- दमकल, ट्रेक्‍टर, थ्रेशर इत्‍यादि‍- चोराओत। तहि‍ना बड़दोले घर चाही। बेटो-बेटी ढेरबा भेल। काज केनि‍हार घरमे बढ़ने काजो बढ़बए पड़त। खेतसँ जोड़ल जे-जे काज ऐछ। वएह बढ़ाएब ने नीक हएत। अखन दुइयेटा गाए कीनब। पहि‍लुका तँ बूढ़ भऽ गेल। आब ओ थोड़े पाल खाएत। अन्नेक खेती नै तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक खेती करब। कोन चीज सस्‍ता ऐछ। जि‍ति‍यामे पचास रूपैये मड़ुआ चि‍क्कस आ नरक नि‍वारण चतुर्दशी दि‍न चालीस रूपैये अल्हुआ-सुथनी बि‍कैत ऐछ। बोरि‍ंग लग सेहो इंजनबला पानि‍ खसैत ऐछ से जैसँ कट्ठा भरि‍मे कोनो उपजा नै होइए। ओना जँ मोथी रोपि‍ दि‍अए तँ सेहो हएत मुदा आब की लोक मोथीक बि‍छानपर सुतैए। आब तँ पलास्‍टि‍क जि‍नगी ओहन प्रेमी बनि‍ गेल ऐछ जे दि‍न-राति‍ संगे रहैए। तैसँ नीक जे कट्ठो भरि‍ खुनि‍ माछे पोसब। नै बेचै जोकर हएत, खाइयो जोकर तँ हेबे करत। जखन एते मि‍हनत करै छी तँ नीक खेनाइ आ नीक घर बना नै रहब तँ धने लऽ कऽ की करब। आँखि‍ मुनि‍ तपेसर अपन अगि‍ला जि‍नगीक संग पाछु दि‍स सोचए लगलाह। तखने घुरनी दुनू ओराहल मकैक बालि‍ नेने आबि‍ कहलकनि‍- बाबू, बाबू.....।‍
चौंकेत आँखि‍ खोलि‍ तपेसर बजलाह- हँ।‍
मकैक बालि‍ हाथमे देख बजला- ‍नोन-तेल औंस देने छहक ि‍कने?”
हँ।‍ तहीकाल उत्तरसँ दछि‍न मुँहेँ जाइत चेतनाथ दरबज्‍जा सेझे आबि‍ ठाढ़ भऽ गेला। हाथमे बालि‍ लऽ नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ तपेसर देखते रहथि‍ आकि‍ आँखि‍ बढ़ि‍ चेतानाथपर गेलनि‍। चेतनाथकेँ ठाढ़ देख कहलखि‍न- कि‍अए ठाढ़ छी। कि‍नकासँ काज ऐछ?
तपेसरक बात सुनि‍ चेतनाथ बजलाह कि‍छु नै, ससरि दरबज्‍जा दि‍स बढ़लाह। लग अबैत देख तपेसर दुनू बालि‍ हाथमे नेनहि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत वामा हाथक आंगुरसँ आँखि‍ पोछि‍ देखि‍ते सि‍हरि‍ गेला। माथक सोन-सन केश दाढ़ी मोंछ झबड़ल। देहक हड्डी झक-झक करैत, दाँत वि‍हीन मुँह, मैलसँ कारी खट-खट देहक वस्‍त्र।
अनायास तपेसरक मुँहसँ नि‍कललनि‍- कने एक घोंट पानि‍ पीवि‍ लि‍अ?
पानि‍ सुनि‍ चेतनाथक मनमे उठलनि‍। जि‍नगी भरि‍ परमात्‍माक सेवा केलौं, अंति‍म अवस्‍थामे बि‍नु सेवाक फल कोना खाएब-पीब? भूखसँ जरैत वायु (पेटक) हुमरि‍-हुमरि‍ शान्‍त करैले कहनि‍। मुदा जि‍नगी भरि‍क तपल मन मानैले तैयार नै होनि‍। चेतनाथ बजलाह- पि‍रवारमे के सभ छथि?
चेतनाथक प्रश्‍न सुनि‍ तपेसरक मन ठमकि‍ गेलनि‍। ठमकल देख चेतनाथ दोहरबैत कहलखि‍न- चुप कि‍अए भेलौं?”
जहि‍ना पतझारक समए गाछमे कोनो-कोनो कलशक मूड़ी जहि‍ना सुख-दुखक बीच अपन अस्‍ति‍त्‍व जीवि‍त रखए चाहैत तहि‍ना तपेसरक मनमे भेलनि‍ मि‍र‍मि‍रा कऽ बजलाह- ‍माइयो-बाप आ पत्नि‍यो मरि‍ गेली। अपने छी आ दूटा बच्‍चा ऐछ।
घुरनी लगेमे ठाढ़ रहनि‍। धीरज आंगनमे मकै खाइत रहए। चेतनाथ- दुनू बच्‍चाकेँ सोर पाड़ि‍ओ?
घुरनीकेँ देखबैत तपेसर कहलखि‍न- एकटा यएह छी दोसर अांगनमे ऐछ। कहि‍ धीरजकेँ सोर पाड़लखि‍न।‍ दुनू बच्‍चाकेँ देख चेतनाथ कहलखि‍न- एक शर्त्तपर पानि‍ पीब सकै छी?
की?
जँ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़बैक (संगीत कला) काज दी।
जि‍नगी भरि‍ कमा कऽ खेलौं मरैकाल एहेन अधर्म नै करब। अपन मनक वि‍चार पाबि‍ तपेसर खुशी भेला। अह्लादसँ हृदए ओलड़ि‍ गेलनि‍। पेटमे गुद-गुदी लगए लगलनि‍। ठहाका मारि‍ हँसैत कहलखि‍न- अपनेक शर्त्त सहर्ष स्‍वीकार ऐछ। पहि‍ने पानि‍ पीब लेल जाउ।‍
अपन झड़ैत जि‍नगीमे आशाक कि‍रि‍ण उगैत देख मुस्‍की दैत चेतनाथ बजलाह- हँ, आब पानि‍ये नै भोजनो करब।‍
दुनू गोटे एक-एक मकैक ओरहा खा पानि‍ पीब, गप-सप्‍प करए लगलाह।
चेतनाथ- आइयेसँ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़ाएब शुरू करब।‍
तपेसर- आइ छोड़ि‍ दि‍औ दसम बर्खक अंति‍म दि‍न आइ छी। काल्हि‍ एगारहम चढ़त। एगारहम जन्‍म दि‍नक अवसरपर दसटा समाजोकेँ भोजन करेबनि‍ आ दुनू बच्‍चाकेँ पढ़ाइयो शुरू करब।‍ तै बीच अपने अपन जि‍नगीक कि‍छु बात कहि‍औक।
तपेसरक बात सुनि‍ चेतनाथ वि‍स्‍मि‍त भऽ गेला। आइ धरि‍ जे प्रश्‍न कि‍यो ने पूछने छलाह ओइ प्रश्‍नक उत्तर दि‍अए पड़त। एक क्षण चुप भऽ सौंसे जि‍नगी देख बजए लगलाह- माता-पि‍ता बहुत पहि‍ने मरि‍ गेलाह। पत्नि‍यो मरि‍ गेली सखा-सन्‍तान नै भेल। असकरे छी। पाँच बर्ख पूर्व धरि‍ कहि‍यो असकरूआ नै बुझि‍ पड़ल। मुदा पाँच बर्खक बीत जे गति‍ भेल ओ बजै जोकर नै ऐछ।‍
तपेसर- से, की?
चेतनाथ- जहि‍यासँ होश भेल तै दि‍नसँ कहै छी- चारि‍ भाए-वहीनक बीच सभसँ छोट छलौं। माएक बड़ दुलारू। आठे-नअ बर्खक रही तहि‍येसँ नाच-तमाशा, कीर्तन भजन दि‍स मन लगए लगल। गाममे नाचो पार्टी रहै आ भजनि‍यो पार्टी। सभ मंगल दि‍नकेँ महाबीरजी स्‍थानमे साँझू पहरमे कीर्तन होय। अपना गामक संग-संग आनो गाममे अष्‍टजामो आ नाचो करए पार्टी जाए। भाँज लगा-लगा हमहूँ जाय। ओतैसँ गोटे-गोटे पाँति‍ सीखने आबी। जेकरा भरि‍ दि‍न गाबी। खजुरी बनबैक फुरल। फुटल घैलक कान हाँसूसँ काटि‍ बेलक लस्‍सा लगा कागज साटि‍ खजुरी बनेलाैं।
हँसैत धीरज पुछलकनि‍- कागजक खजुरी फुटबो करए?
धीरजक बात सुनि‍ चेतनाथकेँ क्रोध नै उठलनि‍। वात्‍सल्‍यक बाढ़ि‍मे बहए लगलाह। बजलाह- खूब फुटे। मुदा काजो बड़ भारी नहि‍ये रहए जहि‍ना अनेरूआ बेल भेटए तहि‍ना दोकानक पुड़ि‍याँक कागज। लगले फेर बना ली। गबैत-बजबैत साजपर हाथो बैस गेल आ बोलि‍यो सर्रास भेल। गाममे रामलीला आएल। आंगनमे खाऽ ली आ भरि‍ दि‍न-राति‍ ओकरे सभ लग रही। जखन जाए लगल हमहूँ संग पकड़ि‍ लेलौं। साजो बजाएब सीख लेलौं आ पार्टो खेलए लगलौं। जेहने आवाज सुरि‍ला रहए तेहने हरि‍मुनि‍याँपर हाथ। एक दि‍न ठीका दास देखलनि‍। ओ राजक गबैया छलाह। संगे लऽ गेला। हमहूँ राजक गबैया भऽ गेलौं जखन राजशाही टूटलै तखन उनटि‍ कऽ गाम चलि‍ एलौं। कि‍छु दि‍न गामे-गाम उत्‍सव सभमे जाए लगलौं। ओहो कमि‍ गेल। तै दि‍नसँ दि‍नो-दि‍न दशा बि‍ग‍ड़ि‍ते गेल।‍


२.
एकांकी
समझौता

            पात्र परि‍चए
            श्‍याम (इंजीनि‍यर)
सुकान्‍त (इंजीनि‍यर)
            फुलेसर (मध्‍यम कि‍सान)
कुसेसर
मुनेसर
रौदी
अनुप
झोली (पाँचो- बटेदार)
            रूपन (कुसेसरक पत्नी)
रेखा (श्‍यामक पत्नी)

पहि‍ल दृश्‍य-
(कुसेसरक आंगन)

रूपीनी        : कोन लोभमे लटकल छी। गाममे देखै छी जे जेकरो ने कि‍छु छलै ओहो सभ पजेबा घर बना लेलक। कल गड़ा लेलक। नीक-नि‍कुत खाइए। चि‍क्कन-चि‍क्कन कपड़ा पहि‍रैए। अहाँ गाम-गामक रट लगौने छी।

कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा गामक लूरि‍ छोड़ि‍ लूरि‍ कोन अिछ जे शहर बजार जा करब। ने गाड़ी चलबैक लूरि‍ अछि‍ आ ने करखानाक काजक। तखन जा कऽ की करब। खर्चा कऽ कऽ जएव आ बूलि‍-टहैल कऽ चलि‍ आएव। तखन तँ आरो कर्जा लदा जएत।

रूपनी        : लूरि‍ कि‍ कोनो लोक पेटेसँ सीखि‍ कऽ अबैए। काज करैत-करैत लूरि‍ होइ छै। सुखदेवाकेँ कोन लूरि‍ छलै। ढहलेल-बकलेल जकाँ गाममे रहै छलै। मति‍ बदललै, ममि‍औत भाए सेने कलकत्ता गेल।

कुसेसर       : सुनै छी जे आब कलकत्तामे नइँ रहैए। गाम ऐवो कएल तँ भेँटे ने भेल।

रूपनी        : अहाँकेँ ने नइँ भेँट भेल। हम तँ भेँट केलि‍ऐ। अंगनामे कुरसीपर चाह पीबैत रहए। जखने देखलक कि‍ कुरसि‍येपर चाहक कप रखि‍ आबि‍ कऽ दुनू हाथे पकड़ि‍ दोसर कुरसीपर बैइसैले कहलक।

कुसेसर       : (मुस्‍की दैत) तब तँ अहाँ बड़का लोक भऽ गेलौं?

रूपनी        : से कि‍ कुरसीपर बैसलौं। ओसारपर शतरंजी ओछाएल रहै ओइपर बैसलौं। मुदा धैनवाद ओकरा दुनू परानीक वि‍चारकेँ दिऐ। अपने लगमे बैस चाहो-पीबै आ रूदपुरवालीकेँ चाह-वि‍स्‍कुट नेने अबैले कहलक।

कुसेसर       :  की सभ गप भेल?

रूपनी        : कोनो कि‍ एकेटा गप भेल। अपने खि‍स्‍सा सभ कहए लगल।

कुसेसर       : अखैन कते कमाइए?

रूपनी        : तेकर ठेकान छै। कहलक जे मालि‍क तते वि‍सवास करैए। करखानाक मनेजरी दऽ देने अछि‍। ओइठीनक एक रूपैया अपना सबहक सत्तरि‍ रूपैया होइ छै। मि‍हनतो करैए ते सुखो होइ छै। अपना सभ जकाँ थोड़े अछि‍ जे पेट साधि‍ खटू आ सुखक बेरमे टुटरूम-टुम।

कुसेसर       : की करबै। ओकरा भागमे वएह लि‍खल छै अपना सबहक भागमे यएह लि‍खल अछि‍।

रूपनी        : ककरो भाग-तकदीरमे कि‍छु लि‍खल रहै छै। जँ से रहि‍तै तँ धन ठेरी रहै छै आ बेटा हेबे ने करै छै। जँ लि‍खल रहि‍तै तँ सभ कुछ ओकरे होइतै।

कुसेसर       : तब की करब?

रूपनी        : इंजीनि‍यर (श्‍याम) सहाएवकेँ समाद दऽ दि‍अनु जे हम खेत-तेत नइँ करब। हुनकर ि‍क कोनो खेत दहा जाइ छनि‍ आकि‍ रौदीमे जरि‍ जाइ छनि‍। जजात जरैए आ दहाइए बटेदारक। ऋृण पैंच लऽ कऽ खेती करू आ उपजाक कोन बात जे लगतो चलि‍ जाइए।

कुसेसर       : कहलौं तँ ठीके मुदा......।

रूपनी        : मुदा-तुदा कि‍छु ने। नइँ समाद पठेवनि‍ तँ नइँ पठबि‍अनु। मुदा खेतक आड़ि‍पर जएव छोड़ि‍ दि‍औ। जोत-कोड़ छोड़ि‍ दि‍औ। जखन गाम औता आ पुछता ते कहि‍ देवनि‍।

कुसेसर       : आशा तँ वएह खेत अछि‍?

रूपनी        : की अछि‍? ओते महगक खाद कीनै छी, बीआ कीनै छी, खटै छी। तैपर अधा बॉटि‍ दैत छि‍अनि‍। की लाभ होइए। दूध महक डारही होइए। खटनी कम लगै छै। ओते जे बोइनपर खटब तँ ओइसँ वेसी हएत।

कुसेसर       : एकठाम दस सेर भऽ जाइए। वोइनो करब से सभ दि‍न काजो थोड़े लगैए?

रूपनी        : अपनो काज ठाढ़ कऽ लेब। जइ दि‍न बोइन नै लागत तै दि‍न अपने काज करब।

कुसेसर       : से कना हएत। जँ माले पोसब तँ सभ दि‍न ने ओकरा चरबए-बझबए पड़त। घास-भूसा करए पड़त। जै दि‍न काज करए जएव तै दि‍न अपन काज कना चलत।

रूपनी        : तँ की गोला-बड़दक सेबनेसँ, जीवि‍?
           
            (मुनेसरक प्रवेश)

मुनेसर        : कुसेसर, हौ कुसेसर।

कुसेसर       : हँ, हँ भैया, अबै छी।

मुनेसर        : सोहराइवाली कि‍अए रँगल छथुन्‍ह?

            (कुसेसर छुप्‍पे रहैत)

रूपनी        : भैया, हम की कोनो अधला बात बजै छी?
कुसेसर       : हँ भैया, अपनो मन कखनो-कखनो मानि‍ लइए।

मुनेसर        : से की?

कुसेसर       : सोहराइयेवालीक सुइत (हँसुली) बन्‍हकी लगा कऽ खेती केने छलौं। देखते छहक जे अपना बड़दो नइँ अछि‍। हरो जनेपर लइ छी। तैपर सँ खटवो करै छी आ पूँजि‍यो लगैए। रौदी भऽ गेल। एक्को कनमाक आशा रहल।

रूपनी        : (तरंगि‍ कऽ) हि‍नका जे कहबनि‍ भैया से की हि‍नका नइँ होइ छनि‍। जेहने बटेदार हम तेहने तँ इहो छथि‍।

मुनेसर        : कहलौं तँ एक-लाखक बात मुदा की उपाए?

रूपनी        : छै उपाए भैया?

मुनेसर        : की?

रूपनी        : इंजीनि‍यर सहाएबक खेत छि‍अनि‍। दहाउ कि‍ रौदि‍आउ हुनकर खेत थोड़े चलि‍ जेतनि‍। मुदा हमरा सबहक तँ लगता चलि‍ जाइए।

मुनेसर        : कनि‍याँ, दू सेरक अशो तँ अछि‍।

रूपनी        : एहेन आशाकेँ मुँह मारौथ। अना जे चुपेचाप खेत छोड़ि‍ देथि‍न तँ दोखी हेता। हुनका गाम बजा कऽ सभ बात कहबनि‍। कहाँदन बड़का हाकि‍म छथीन। बुझता तँ बड़बढ़ि‍या नइँ तँ हम सभ बि‍ना पूँजि‍ये काहि‍ काटब ओ अछैते पूँजि‍ये काहि‍ कटताह।

मुनेसर        : कुसेसर, कनि‍याँक वि‍चार हमरो जँचैए। दुनू गोटे बुथपर चल। मि‍लि‍ये कऽ कहबनि‍।

(दोसर दृश्‍य)
(श्‍याम इंजीनि‍यरक डेरा)

श्‍याम         : (चाह पीबैत) कौल्हुके टि‍कट अछि‍। दस बजे गाड़ी अछि‍। तँए सभ कुछ सम्हारि‍ लीअ।

रेखा         : (तमसाइत) की सम्‍हारब आ की नइँ सम्‍हारब। हजारो दि‍न कहलौं जे गामक खेत बेच ि‍लअ, तँ जी गारल अछि‍।

श्‍याम         : कोनो की खगैए जे बेच कऽ गुजर करब। बाप-पुरखाक अरजल छि‍अनि‍, जाधरि‍ रहतनि‍ ताधरि‍ ने लोक नाम लेतनि‍ जे फल्‍लांक छि‍अनि‍। ततवे नइँ अपन लगि‍ते कि‍ अछि‍ मुदा साल भरि‍क बुतात (चाउर-दालि‍) तँ चलि‍ते अछि‍।

रेखा         : भरि‍ दि‍न तँ हि‍सावे जोड़ै छी कने जोड़ि‍ कऽ देखलि‍ऐ जे कते पूँजीसँ कते आमदनी होइए।

श्‍याम         : सभठाम हि‍सावे जोड़ने थोड़े काज होइए। इलाकाक-इलाकामे रौदी भऽ जाइ छै, दहार भऽ जाइ छै। अरबो-खरबोक पूँजीसँ एको-पाइ आमदनी नहि‍ होइ छै, से लोक बरदास करि‍ते छथि‍ आ हम......।

रेखा         : जि‍नका दोसर रास्‍ता नहि‍ छन्‍हि‍ ओकि‍ करताह। मुदा अपना तँ अछि‍।

श्‍याम         : मि‍थि‍लाकेँ दि‍नयाँ देवलोक बुझैए। तइठाम हम छोड़ि‍ कऽ पड़ा जाउँ।

रेखा         : हमर बात कहि‍या सुनलौं जे आइ सुनब।

श्‍याम         : कहि‍या नहि‍ सुनलौं?

रेखा         : कहि‍या सुनलौं?

श्‍याम         : जँ नहि‍ सुनलौं तँ आन दि‍न कहाँ कहि‍यो ई बात कहलौं।

            (सुकान्‍तक प्रवेश)

सुकान्‍त       : भजार छी यौ?

श्‍याम         : हँ, हँ भजार, आउ-आउ। बहुत दि‍न अहाँ जीवि‍?
सुकान्‍त       : वि‍चारे कऽ रहल छलौं जे अहाँसँ भेँट करी। काल्हि‍ गाम जएव।

सुकान्‍त       : कि‍अए?

श्‍याम         : बटेदार सभ अबैले कहलक अछि‍।

रेखा         : कहै छि‍अनि‍ जे कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। गामक सभ खेत बेच कऽ अहीठाम मकान बना लि‍अ। पूँजी ने पूँजी बनवैत अछि‍। जते सम्‍पति‍ गाममे अछि‍ ओ जँ ऐठाम आनि‍ चलाएव तँ ओहि‍सँ कते बर आमदनी हएत।
           
            (रेखाक बात सुि‍न सुकान्‍त मूड़ी डोलबैत। मुदा कि‍छु बजैत नहि‍।)

श्‍याम         : भजार, गुम्‍म कि‍अए छी?

सुकान्‍त       : ई प्रश्‍न अपनो संग उठल अछि‍। मुदा.....?

श्‍याम         : मुदा की?

सुकान्‍त       : जे बात कहि‍ रहल छथि‍ ओ अपनो छल। मुदा रूकि‍ गेलौं।

श्‍याम         : रूकि‍ कि‍अए गेलौं?

सुकान्‍त       : ठीके कहब छैक जे जते लोक तते वि‍चार। मुदा नीक अधलाक वि‍चार तँ करै पड़त।

श्‍याम         : समाजक पढ़ल-लि‍खल (वुद्धि‍जीवी वर्ग) लोक तँ अपने सभ छी, अगर अपने सभ आँखि‍ मूनि‍ काज करब तँ जे कम पढ़ल-लि‍खल वा नहि‍ पढ़ल अछि‍ ओ कि‍ करत? तँए ने अहाँसँ पूछैक प्रयोजन।

सुकान्‍त       : की करब अहाँ से तँ हमरा कहने नइँ करब। मुदा अपन कएल काज कहै छी।

श्‍याम         : हँ, सएह कहू।

सुकान्‍त       : पत्नी लग बजलौं जे गामक खेत बेच एतै आनि‍ खेत कीनि‍ घर बना भाड़ापर लगा देब। कोनो कारोवार जे करए जाहब से तँ नइँ भऽ सकैए। नोकरि‍योक ड्यूटी एहेन अछि‍ जे चूर-चूर भऽ जाइ छी।

श्‍याम         : की केलौं?

सुकान्‍त       : पत्नी कहलनि‍ जे खेत-पथार अहाँक कीनल तँ नहि‍ छी तखन बेचब कि‍अए। स्‍त्रीगणक स्‍वभाव हम बुझै छी। अखन भलेहीं बेच कऽ लऽ आनू मुदा जे स्‍त्रीगणक गाममे अाब औती ओ कि‍ बजती?

रेखा         : की बाजत? ककरो बजने कि‍ हेतइ?

श्‍याम         : की बजती?

सुकान्‍त       : अपने नइँ बुझै छलौं मदुा पत्नी कहलनि‍ जे कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ घरारी घरारि‍ये रहत से बात नहि‍। बाड़ी-चौमास भऽ जाएत। जे कीनत ओ भट्टा उपजाओत कि‍ परती बनाएत तेकर कोनो ठीन छै।

श्‍याम         : हँ, से तँ नहि‍ये छै।

सुकान्‍त       : ककरो कि‍यो मुँहमे ताला लगौत। बाजत जे कुकर्मीक घरारी छि‍ऐ तँए नढ़ि‍यो भुकै छै वा भट्टा उपजाओल जाइ छै।

श्‍याम         : (नमहर साँस छोड़ैत) फेर की केलि‍ऐ?

सुकान्‍त       : मन औना गेल। पुछलि‍एनि‍ तँ कहलनि‍ जे पनरहो बीघा जमीन गौआँक बीत दए दि‍अनु। ओ सभ अदलि‍-बदलि‍ एकठाम कऽ हाइ स्‍कूल बना लेता। अहाँ तँ नोकरी करि‍ते छी। जाधरि‍ जीवि‍ ताधरि‍ भार तँ सरकार नेनहि‍ अछि‍।

श्‍याम         : अहाँक काज हमरो जँचैए।

रेखा         : कौआसँ खैर लुटाएब कोन कवि‍लती भेल?

सुकान्‍त       : एक्के काजकेँ लोक, अपन-अपन वि‍चारे कते रंगक बुझैए। अपन कएल काज कहलौं। अहाँकेँ मीठ लगए वा तीत ई तँ अहाँक जि‍ह्वा कहत।

रेखा         : जि‍ह्वा तँ सबहक एक्के रंग होइ छै?

सुकान्‍त       : देखैमे भलेहीं एक रंग होइ मुदा सुआद फुट-फुट होइ छै। जँ से नइँ होइतै तँ सभकेँ सभ जीज एक्के रंग लगि‍तै।

            (तृतीय दृश्‍य)

            (गाम। कुसेसर, मुनेसर, फुलेदेब, श्‍याम आ तीन-चारि‍टा आरो बटेदार)

फुलदेव       : श्‍याम भाय, गाममे हमरा सभकेँ जीवि‍ कठि‍न भऽ गेल अछि‍। हरीयरी अहाँ सभकेँ अछि‍।

श्‍याम         : नोकरीमे कि‍ कोनो लज्‍जति‍ रहल। समए छल जखन लोक हकि‍मानी करैत छल आ अपना जकाँ खाइत छल। आब तँ नि‍च्‍चाँ-ऊपर मालि‍के-मालि‍क।

फुलदेव       : (हँसैत) एहेन उटपटाँग बात ि‍कअए कहलौं?

श्‍याम         : ि‍सर्फ दरमाहापर आश्रि‍त छी। ओना दरमेहे तते अछि‍ जे नहि‍ कि‍छु बुझि‍ पड़ैए। लोन लऽ कऽ घर बनेलौं।

फुलदेव       : कते लोन अछि‍?

श्‍याम         : पैछला मास सठि‍ गेल। ऐल-फैल घर अछि‍ चारि‍टा कोठरी भड़ो लगौने छी। जहि‍सँ परि‍वारक खर्च नि‍कलि‍ जाइए।

फुलदेव       : तब तँ दरमाहा बँचवे करत।

श्‍याम         : हँ।

फुलदेव       : भगवान करथि‍ कतौ रही चैनसँ रही।

श्‍याम         : बच्‍चा सभकेँ पढ़बैमे बड़ खर्च होइए।

फुलदेव       : खर्च करै छी कि‍ अपन भार उतारै छी। आब गप आगू बढ़ाउ, कुसेसर।

कुसेसर       : फुलदेव भाय, अहूँ कि‍सान छी। दस बीघा खेत जोतै छी। खेतीक सभ भाँज बुझै छी। कते लगता खेतीमे लगै छै से अहाँसँ छि‍पल अछि‍।

फुलदेव       : झाँपि‍-तोपि‍ कऽ नइँ बाजू। खोलि‍ कऽ साफ-साफ बाजू।

मुनेसर        : फुलदेव बौआ, कुसेसर बजैमे धकाइए। हम कहै छी। इंजीनि‍यर सहाएव पाँचटा बटेदार छी। अखैन धरि‍ अधा-अधी उपजा बँटैत एलि‍एनि‍। मुदा बेर-बेर रौदी दाही होइए। हि‍नकर (श्‍यामक) तँ कि‍छु नहि‍। बि‍गड़ैत छनि‍। उपजा नइँ होइ छनि‍। खेत तँ बँचले रहै छनि‍। मुदा हमरा सबहक तँ सभ कुछ चलि‍ जाइए।

श्‍याम         : अहाँ सभ अधा बाँटि‍ कऽ की हमरेटा दै छी। आकि‍ सभकेँ-सभ दैत छै। जे अदौसँ अछि‍।

फुलदेव       : जे समए बीति‍ गेल ओ तँ बीति‍ गेल। पुन: घुरत नहि‍। मुदा आँखि‍यो मुनि‍ कऽ जीवि‍ उचि‍त नहि‍।

मुनेसर        : ओते चि‍क्कारीमे गप करैक कोन जरूरी अछि‍। सोझ-साझ बात सुनू। सभ दि‍नसँ बटाइ करैत एलौं। जे नीक की अधला भेल, भेल। बि‍ना कहने छोड़ि‍ दैति‍एनि‍ से नीक नइँ होइत तँए सोझामे कहै छि‍यनि‍ जे हम सभ बटाइ नइँ करब।

फुलदेव       : एना औगुता कऽ कि‍अए बजै छी। कोनाे रोग दवाइ केने छुटैए। हँ, समाजमे ई रोग भारी अछि‍। भने सभ बैसले छी कि‍अए ने वि‍चारि‍ कऽ रास्‍ता नि‍कालि‍ लेब। गामक जमीन गामेक लोक उपजाओत।

श्‍याम         : फुलदेव, पत्नीक वि‍चार छनि‍ जे बेच लि‍अ। मुदा एकटा दोस्‍त छथि‍ ओ कहलनि‍ जे अपन जमीन समाजकेँ सुमझा देलि‍एनि‍। बातो सत्‍य जे जे गाममे रहताह गाम हुनकर छि‍यनि‍। तँए खेतीक बात बुझै नहि‍ छी अहाँ सभ उि‍चत रास्‍ता नि‍कालि‍ कहू, मानि‍ लेब।

फुलदेव       : कते गोटे स्‍कूल बनवैत छथि‍, कते गोटे अस्‍पताल। समाजमे एकरो जरूरत अछि‍। मुदा सभसँ प्रमुख जरूरी अछि‍ जे गामक सम्‍पति‍ (जमीन) केँ समुचि‍त उपाए कए उपजा बढ़ाओल जाए।

श्‍याम         : उपजा कोना बढ़त?

फुलदेव       : बारह मासक सालमे ि‍सर्फ वर्षे मौसम एहेन अछि‍ जे सालो भरि‍केँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। खूब बरखा भेल दहार भेल। नइँ बरखा भेल रौदी भेल। सालो भरि‍ खेति‍हर त्राहि‍-कृष्‍ण करैत रहह।

मुनेसर        : फुलदेव बौआ, अहाँ देखते छी जे दूटा हाथ-पएर छोड़ि‍ कि‍छु अछि‍ नइँ। तँए कि‍ हमसब ऐ गामक नइँ कहाएव से बात तँ नइँ अछि‍। इंजीनियर सहाएव, सभ तरहेँ सम्‍पन्न छथि‍ मुदा छि‍आह तँ अही गामक। तँए......।

श्‍याम         : तँए कि‍?

फुलदेव       : श्‍याम बावू, अहाँ ि‍सर्फ माटि‍ बटेदारकेँ देने छि‍ऐ। मुदा माि‍टसँ उपजा कोना हएत? ऐ बातपर वि‍चार करए पड़त।

श्‍याम         : जहाँ धरि‍ संभव हएत, करैले तैयार छी।

फुलदेव       : बीस बीघा जमीन अछि‍। दूटा बोंरि‍ग आ एकटा दमकल कीनि‍ बटेदारकेँ दए दि‍औक। जखन पानि‍ हाथमे आबि‍ जएत तखन बाढ़ि‍-रौदीक संकट कमि‍ जाएत। आठ मासक वि‍सवासू खेती आ चारि‍ मास अधा भऽ जएत। दहार नहि‍ रोकि‍ सकब तँ रौदीसँ बचाओल जा सकैत अछि‍।

श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ।

बटेदार        : एतवेटा सँ नहि‍ हएत। मोटा-मोटी यएह बुझू जे अहाँ सबहक (बटेदार सबहक) शरीर आ इंजीनियर सहाएवक पूँजी रहतनि‍। तँए आरो कि‍छु पूँजी लगबैक जरूरत छनि‍।

श्‍याम         : से की?

फुलदेव       : खेत जोतैले बड़द, नीक बीआ आ खादक ओरि‍यान सेहो कऽ दि‍यौ।

श्‍याम         : बड़बढ़ि‍याँ। मुदा हमरा वापसी कि‍ हएत?

फुलदेव       : खेतसँ लऽ कऽ दमकल-बोरि‍ंग, बरद, खाद-बीआ लगा सभ पूँजी भेल। बैंकक जे सूद छै ओकरा धि‍यानमे राखि‍ वावसी हएत।

मुनेसर        : कि‍ इंजीनियर सहाएव, मंजूर अछि‍?

श्‍याम         : अहाँ सभ कहू।

कुसेसर       : ए-मस्‍त।

फुलेसर       : जँ स्‍वीकार भेल तँ सभ थोपड़ी बजा....।

            (सभ थोपड़ी बजा ि‍नर्णएकेँ स्‍वीकार केलनि‍।)

                  (समाप्‍त)

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