Sunday, October 03, 2010

'विदेह' ६८ म अंक १५ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६८)- PART I


'विदेह' म अंक १५ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३ अंक ६) NEPAL       INDIA     
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य





 

 

३. पद्य






३..किशन कारीग़र- लिखैत रही।
३.७.गंगेश गुंजन- (ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे)

  

४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-दुर्गापूजा २.ज्योति सुनीत चौधरीश्वेता झा (सिंगापुर)

 

 

5. बालानां कृते-डॉ. शेफालिका  वर्मा- मूर्ख राजा आ  ओकर बेटा  

 

 


6. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"
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१.           संपादकीय

१. संपादकीय

74 वर्षक मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार देल जा रहल अछि।

लोसा पेरूक स्पेनिश भाषाक लेखक छथि। 1963 ई. मे द टाइम ऑफ द हीरो नाम्ना पहिल उपन्यासक लेखक श्री लोसा मूलतः गद्य लेखक छथि आ ओ निबन्ध, उपन्यास लिखै छथि। नोबल समिति कहलक अछि जे शक्तिक केन्द्रक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक चित्रण लेल श्री लोसा केँ ई पुरस्कार देल गेल अछि। ओ तीससँ नाटक, निबन्धक अतिरिक्त 30 सँ बेसी उपन्यास लिखने छथि। 

हुनकर किछु आन रचना छन्हि: द फीस्ट ऑफ द गोट, ऑंट जूलिया एंड द स्क्रीनराइटर, द ग्रीनहाउस, कंवर्सेशन इन द कैथेड्रल, कैपटन पैनटोजा एंड द स्पेसल सर्विस।
बाल-किशोर विशेषांक/ नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल आ लघुकथा अंकक बाद विदेहक 15 नवम्बर 2010 अंक बाल-किशोर विशेषांक, 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल लेखक टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 नवम्बर 2010 धरि बाल-किशोर विशेषांक लेल; 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल 13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल ई-मेलसँ ठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।


(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०६ देशक १
,५४७ ठामसँ ५०,२५३ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,६९,१५९ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)

 

गजेन्द्र ठाकुर

२.              गद्य

 





 

 विनीत उत्पल
की अछि दिल्लीक जी.बी. रोडक कोठाक सत

हिन्दू मिथ कथामे वर्णित नर्क आआ॓र आ॓तुक्का यातनासाकार रूपमे देखबाक इच्छा होअए दिल्लीक जीबी रोडक अगल-बगलके 25 टा बिल्डिंगमे रहैबला पांच हजार सेक्सवर्करकेँ देखि आ हि नर्कस निजात दियाबैक सरकारी प्रयासक काजकेँ लऽ कऽ जहिना एकटा सेक्सवर्कर परवीनस पुछैत छी, आ॓ तमैक कऽ कहैत अछि, ‘एत एतेक किछु भोगलहु अछि जे आ॓ नहि जानैत अछि। कतय के सरकार आआ॓र कोन सरकार?’ सरकार अछि त हम एत टा मांगैत अछि जे आ॓ हमरा जीबैले दिअए
धंधाक नर्कके आ॓ बुझाबैत अछि, ‘देह बेचि कऽ जे टा पैसा मिलैत अछि आ॓करा छह टा हिस्सा होत अछि, कोठा मालकिन, दलाल, पुलिस, राशन कार्ड मालिक, सूदखोर आआ॓र गुंडा।देहमंडीक गणित ई अछि जे सौ टकामे हिनकर हिस्सा मात्र पंद्रह टका आबैत अछि। हि पामे हुनका परिवार चलबै पड़ैत अछि, ग्राहक लेल सजय-संवरै पड़ैत अछि आ ग्राहकक संसर्गस सौगातमे भेटल बीमारीक इलाज सेहो कर ड़ैत अछि। बाकी 85 टका दलाल, कोठाक मालकिन आआ॓र पुलिस सभक हफ्तामे बटि जाइत अछि। ई केकरो मजबूरीपर बेइमानीस फलैत-फूलैत धंधा अछि। सरकारक नजरिमे ई धंधा दिल्लीमे केबल जीबी रोडपर भऽ रहल अछि,  मुदा हयात होटलक इलाका हो वा लक्ष्मीनगर, पटेलनगर आ खानपुर जिस्मफरोशीक अड्डा बनल अछि। जीबी रोडपर दुकानक बीचस गुजरैबला अन्हार सीढ़ीक दरवाजापर लाल रंगसँ लिखल अछि, ‘दलालों और जेबकतरों से सावधान मुदा जिस्मक भूखक आगू ई चेतावनी बेमान लागैत अछि। अहि कोठापर हमर भेंट होत अछि, विमला, नसरीन, बबीता, सीता, परवीन, फरहाना आदिस जे दिनराति घुटैत रहैत अछि आ लड़ैत अछि अप्पन जिनगीस। देह व्यापार गैर कानूनी होएबाक कार ई सभ दिनक उजालामे सामान कीनैलै नहि जाइत अछि। राशन बला मिट्टीक तेलमे मिलावट कऽ कऽ दैत अछि आ नापतौलमे बेमानी करैत अछि। ताहिस ई सभ कमला मार्केट जाइत अछि बाजार रै लेल जाहिस आ॓त कियो हिनका चिन्हि नहि लिअए। स्वीपर हिनकास घूस मांगैत अछि आ नहि देलापर सीढ़ीपर कूड़ा-कचरा फेंकि दैत अछि। एत पांच हजार सेक्स वर्करमे 12 सए वोटर इ-कार्ड तऽ बनि गेल अछि, आब आ॓ वोटर अछि। एकर बादो लाइमलाइमे आबैस डरैत अछि जे समाज हुनका सभकेँ बारि नहि दिअए। एहन सेक्सवर्कर जे मजबूरवश अपना लेल फैसला क कऽ हि धंधामे उतरल अछि आआ॓र हुनकर घरबला एहि धंधासअनजान अछि, आ॓ सेहो अप्पन तस्वीर उजागर होएबासँ डरैत अछि। दूर-दूरस ल लड़की पावनि-त्योहार, शादी-ब्याहक मौकापर घर त जाइत अछि मुदा अप्पन धंधाकेँ लऽ कऽ केकरोसँ गप नहि करैत अछि। फोटो खिचाबैस हि लेल मना करैत अछि। ई सेक्सवर्कर धंधाक पा-पा हिसाब बताबैत अछि जे कॉलगर्लक धंधा पनपैसँ हुनकर धंधाक रौनक कम भऽ गेल अछि। आ॓ पांच हजार टका महीना कमाबैत अछि जाहिमे 1500 टका बच्चापर खर्च भऽ जाइत छै। एक हजार टका कपड़ा आ मेकअपमे खत्म भऽ जाइत छै। संगे एक हजार टका रेंट दिअए ड़ै छै। खा-पीब के जे पैसा बचैत छै आ॓करा घर पठा दैत अछि। एकरामे सभकेँ अप्पन बच्चाक परवरिशक खास ख्याल छै। कियो-कियो अप्पन बच्चाके एम.सी.डी. स्कूलमे नहि भेजि कऽ मंटो रोड लग प्राइवेट स्कूलमे भेजैत अछि आ मास्टरस कहैत अछि जे हुनकर धंधाक गप बच्चा लग नहि करू। कतेक सेक्सवर्कर एहनो अछि जे अप्पन धंधाक भेद बच्चाक लग खुजि नहि जा, एकर डरस अपनास दूर बोर्डिंगमे राखि कऽ बच्चाकेँ पढ़ा-लिखा रहल अछि। देहक बाजार सर्वधर्म समभावपर चलैत अछि। जी.बी. रोडपर हनुमान मंदिर आआ॓र मस्जिद एकहि इलाकामे अछि। एक कमरामे मक्का-मदीनाक फोटो अछि तहि बगमे हिन्दू देवी-देवताक कएक टा फोटो टांगल अछि। बालकनीमे लागल तुलसी आआ॓र मनीप्लांटक गाछ हि गपक गवाह छल जे देहव्यापारक नहि कोनो धर्म होत अछि आआ॓र नहि कोनो जाति होत अछि। एत सभक बस एक्के टा जद्दोजहद अछि, जिनगी गुजारैक।
गजेन्द्र ठाकुर
पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।

लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।

मैथिली-अंग्रेजीअंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।

मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।

उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।

कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।

अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास।
शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका ।
सम्पादन: अन्तर्जालपर  विदेह ई-पत्रिका विदेहई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक  जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)
ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com

मैथिली उपन्यासपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव
उपन्यासक आरम्भ: वाणभट्टक कादम्बरी राजा शूद्रकक विदिशानगरीक वर्णनसँ प्रारम्भ होइत अछि। एकटा चाण्डाल अतीव सुन्दरी कन्या वैशम्पायन नाम्ना ज्ञानी सुग्गाकेँ लेने दरबार अबैत अछि आ प्रारम्भ होइत अछि सुग्गाक खिस्सा। चांडालक बस्ती पक्कणमे कियो भिखमंगा नै, कियो चोर नै, ओतुक्का राजा व्याघ्रदेव स्वयं रस्सी बँटैत छथि। संस्कृतक एहि उपन्यास नामसँ मराठीमे उपन्यासकेँ कादम्बरी कहल जाइत अछि। उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजकडॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ मात्र किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवतीक चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, आ तखन नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। एहि सभक संग जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ तखन एतए दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना करै छथि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि।
अंग्रेजी उपन्यासक वाद: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक डिसकसनवा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल। से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि। साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत।आधुनिक कथा-उपन्यास अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ? कोनो कथा-उपन्यासक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि।जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि।जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि।मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक मसनवीफारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत।कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी।मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत।आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल। प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग। क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि।तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइमसोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत?  जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि। होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि।आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल।पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म।कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट ! पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। बाढ़िमे भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए जाइए। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही? डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था।

अंगेजी उपन्यासक आरम्भ आ विकास: अंग्रेजी उपन्यास पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस- लेखक कथाक मुख्यपात्रक यात्राक आ ओहि यात्रा मध्य आओल संघर्ष आ उत्साहक वर्णन करैत छथि।
डेनियल डिफ़ो अपन रॊबिन्सन क्रूसो उपन्यासमे मुख्यपात्रक साहसिक समुद्र यात्राक वर्णन करैत छथि
सैमुअल रिचर्डसनक पेमेला अंग्रेजी उपन्यासकेँ पारिभाषिक स्वरूप देलक।
एफ़्रा बेनक ओरूनोको उपन्यासक नायक कारी रंगक दास अछि तँ हुनक लव लैटर्स बिटवीन ए नोबल मैन एंड हिज सिस्टरमे सामंतक प्रेम कथा सभक वर्णन अछि।
हैनरी फ़िल्डिंग टॉम जोन्समे सामंतवादक आलोचना केने छथि समाजक विकृतिक चित्रण केने छथि।
हेनरी जेम्स द पोट्रेट ऑफ ए लेडीमे कलात्मक प्रस्तुति लेल जिनगीक उपेक्षा करै छथि।
रिचर्डसन कलैरिसमे मनुष्यक मनोविज्ञानक तहमे जाइ छथि।
जोजफ कोनरेडक द शैडोलाइनक पात्र समाज आ जीवनक प्रति दृष्टिकोणक एक्द पक्षीय होएबापर सोचै छथि।  
डी.एच.लॉरेन्स लेडी चैटर्लीज लवरक पात्र विकृति लेल संस्कृति आधारित सभ्यताकेँ दोषी कहै छथि।
रुडयार्ड किपलिंगक उपन्यास किमयूरोपी साम्राज्यवादक लेल एकटा बहन्ना ताकि रहल अछि, यूरोपी सभ्यताकेँ ओ उच्च मानै छथि।
ई.एम.फोर्स्टरक ए पैसेज टू इंडियामुदा शासक आ शासितक सम्बन्धकेँ व्याख्यायित करैत अछि।
मैथिली उपन्यासक आरम्भ आ विकास: हरिमोहन झाक कन्यादान आ द्विरागमन मिथिलाक बहुत रास सामाजिक व्यवस्थाकेँ सोझाँ अनैत अछि, महिला शिक्षा आ अंध-पाश्चात्यकरणक सेहो हास्य रसमे चित्रण आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासक रीतिएँ करैत छथि।
यात्रीक बलचनमा यादव जातिक बलचनमाक आत्मकथ्यक रूपमे अछि। आर्थिक समस्या एकर मूल विषए छैक।  बलचनमा कोना एकटा टहल करैबलासँ आगू जाइत किसानक हक लेल जान दैत अछि ताधरिक कथा। कांग्रेस आदि पार्टीक विरुद्ध कम्यूनिस्ट पार्टीक प्रति स्पष्ट झुकाव यात्रीजीक रहल छन्हि। आ पारो बलचनमाक आर्थिक समस्याक विपरीत सामाजिक लक्ष्य तकैत अछि। किछु दिनुका बाद एहि उपन्यासकेँ लोक असली फिक्शनक रूपमे लेताह कारण अगिला पीढ़ीकेँ विश्वास नै हेतै जे एहनो कोनो क्रूर व्यवस्था सभ मानवजातिक मध्य होइत हेतै। आ तैँ एकर महत्व आर बढ़ि जाइत अछि- ओहि सभ व्यवस्था सभकेँ पेटारमे सुरक्षित रखबाक जिम्मेदारी। मुदा जहिया यात्रीजी ओहि समस्यापर लिखने छलाह तहियासँ ओ समस्या रहै आ ई उपन्यास ओहिमे सार्थक हस्तक्षेप कएने छल।
रमानन्द रेणुक दूध-फूल उपन्यास समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि आ कलात्मक उपस्थापन करैत अछि।
ललितक पृथ्वीपुत्र सेहो समाजक उपेक्षित वर्गकेँ सोझाँमे रखैत अछि। ई उपन्यास कृषक जीवनक आर्थिक समस्यापर सेहो आंगुर धरैत अछि।
लिली रे क पटाक्षेप वामपंथक वर्ग-संघर्षक उत्थान आ फेर ओकर दमनक कथा कहैत अछि आ देशक समस्यासँ साहित्यकार द्वारा स्वयंकेँ तत्काल जोड़बाक मार्ग प्रशस्त करैत अछि।
धूमकेतुक मोड़ पर सेहो वामपंथी विचारक आलोकमे सामाजिक-आर्थिक समस्याक कथा बैकफ्लैशमे कहैत अछि।
साकेतानन्दक सर्वस्वान्त बाढ़िक आ सरकारी नीति आ राहतक कथा अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलक मौलाइल गाछक फूल गामक, गामसँ पलायनक आ गलल व्यवस्थाक पुनर्जीवनक लेल समाधानक उपन्यास अछि।
चतुरानन मिश्रक कला कलादाइक माध्यमेँ गलल सामाजिक व्यवस्थापर प्रहार अछि।
शेफालिका वर्माक नागफाँस अंग्रेजक धरतीपर विचरण करैत अछि। धारा आ सीमांतक मिलन एहि जिनगीमे कहियो हेतै, कोनो जादू हेतै की?

आ अन्तमे : से जौँ गहींर नजरिसँ देखब तँ लागत जे अंग्रेजी उपन्यासकारक कृति ओहि समएक वाद आ दृष्टिकोणकेँ संग लऽ कऽ चलबाक प्रयास अछि। मुदा सिद्धान्तसँ प्रयोगक क्रममे किछु विशेषता स्वयमेव आबि जाइ छै। तहिना मैथिली उपन्यासक सेहो स्थिति अछि। रमानन्द रेणुक उपन्यास होअए वा शेफालिका वर्माक, ई तथ्य शिल्पमे स्पष्ट रूपसँ देखि सकै छी। लिली रे अपन कलमक धारसँ जेना अपन लग-पासक घटनाक, समाजक, राजनीतिक वर्णन करै छथि से अद्भुत तँ अछिये अंग्रेजी उपन्यास सभसँ एक डेग आगाँ जाइत अछि। ललित, यात्री आ धूमकेतु आर्थिक आ सामाजिक समस्याकेँ सोझाँ रखैत छथि, आ ओहि क्रममे कोनो तथ्यकेँ कोनो रूपेँ नुकबैत नै छथि। साकेतानन्द बाढ़िक समस्याकेँ सोझाँ रखै छथि। हरिमोहन झा अपन शैलीमे अंग्रेजी साहित्यक धारकेँ बहबैत छथि आ नायक द्वारा नायिकाकेँ देल पढाइक सिलेबसमे सेहो ई तथ्य सोझाँ अनैत छथि। चतुरानन मिश्र आ जगदीश प्रसाद मंडल कम्यूनिस्ट आन्दोलनसँ जुड़ल छथि, प्रायोगिक रूपमे, पार्टी स्तरपर, मुदा हिनकर दुनू गोटेक उपन्यास देखला उत्तर हमरा ई कहबामे कनेको कष्ट नै होइत अछि जे जाहि रूपमे यात्री आ धूमकेतु मार्क्सवादक बैशाखी लऽ उपन्यासकेँ ठाढ़ करै छथि तकर बेगरता एहि दुनू उपन्यासकारकेँ नै बुझना जाइत छन्हि। मार्क्सवादक असल अर्थ हिनके दुनूक रचनामे भेटत। कतौ पार्टीक नाम वा विचारधाराक चर्च नै मुदा जे असल डायलेक्टिकल मैटेरियलिज्म छैक तकर पहिचान, जिनगीक महत्वपर विश्वास, द्वन्दात्मक पद्धतिक प्रयोग आ ई तखने सम्भव होएत जखन लेखक दास कैपिटल सहित मार्क्सवादक गहन अध्ययन करत।

मैथिली उपन्यासक भविष्य : सभ जीवित भाषामे सभसँ बेसी रचना उपन्यासक होइत छै मुदा मैथिलीमे सभसँ कम उपन्यास लिखल जाइत अछि। जाहि रूपमे अंग्रेजी शिक्षा आ साहित्यक अध्ययन कऽ मैथिली साहित्यमे आओल नव पीढ़ीक संख्या बढ़त, मैथिली साहित्य अपन सामाजिक- आर्थिक- राजनैतिक आ सांस्कृतिक अंतर्दृष्टिक विकास कऽ सकत। वीणा ठाकुरक भारती, आशा मिश्रक उचाट आ केदारनाथ चौधरीक चमेली रानी-माहुर आ करार हमर एहि दृष्टिकोणक पुष्टि करैत अछि। 
सुजीत कुमार झा
अनौपचारिक शिक्षामे मैथिली पढाइकें हिसाब सँ प्रभावकारी भऽ रहल

धनुषा जिल्लाक ३० टा केन्द्रमे अनौपचारिक शिक्षाक पढाइ मैथिली भाषामे शुरु कएल गेल अछि । यूनेस्कोक सहयोगमे आसमान नेपालद्वारा भऽ रहल ओ पढाइकेँ लेल मैथिली भाषामे
हमर जात्रानामक किताब सेहो निकालल गेल अछि ।

१५ वर्ष सँ ४५ वर्ष धरिकेँ महिलाकेँ शिक्षित करबाक उद्देश्य सँ शुरु कएल गेल आधारभुत साक्षरता कार्यक्रममे गजबकेँ रिस्पोन्स भेट रहल आयोजक पक्षक दावी रहल अछि । आसमान नेपालक सुरैत ठाकुर कहैत छथि
पहिने हम सभ नेपाली किताब लऽ कऽ आधारभुत साक्षरता कार्यक्रम शुरु करैत छलौं मुुदा मैथिली भाषाक किताब लऽ कऽ एखन प्रशिक्षणे पढाइ शुरु भेल अछि , विद्यार्थी सभ नेपाली सँ मैथिलीक किताब बढियाँ जँका बुझि रहल बतबैत अछि ।

हमर जात्राकिताबक लेखक मैथिली भाषाक वरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल , डा. आशा सिन्हा आ सुरैत ठाकुर रहल छथि ।
नारी विकास केन्द्र जनकपुरक साक्षरता कक्षाक सुमित्रा महासेठ कहैत छथि
पढाइकेँ हम पहिने नहि जनैत छलौह मुदा आवत कऽ टऽ पढय लागल छी । एकर एकटा कारण अपन भाषामे पढाइ रहल ओ कहैत छथि ।

आधारभुत साक्षरता कक्षा जनकपुर नगरमे १७
, लक्ष्मीपुर बगेवामे ९ आ घोडघासमे ४ टा केन्द्र परिक्षणक रुपमे शुरु कएल गेल अछि । प्रत्येक केन्द्रपर दैनिक २ घण्टा महिला सभकेँ पढाओल जाइत अछि । आसमान नेपालक केन्द्रीय निर्देशक नवल किशोर यादव कहैत छथि आब क्रमशः अन्य केन्द्र पर सेहो मैथिली भाषक किताब लागु कएल जाएत ।जिल्ला शिक्षा कार्यालय धनुषा इ अनौपचारिक शिक्षाकेँ स्वयं निगरानी कऽ रहल
अछि । विभिन्न केन्द्रक निरीक्षणक बाद धनुषाक शिक्षा अधिकारी सदानन्द झा कहलन्हि
पढाइ बढिया भऽ रहल, ओहुमे मात्रृभाषामे सन्तोषक पर्याप्त जगह अछि ।धनुषामे मात्र अढाइ सय विद्यालय एहन अछि जे अनौपचारिक शिक्षा पढबैत अछि । नेपालक मिथिलाञ्चल क्षेत्रक बात करी तऽ एक हजार सँ बेसी ठाम अनौपचारिक शिक्षाक पढाई होइत अछि । अधिकांशमे नेपाली किताब लऽ कऽ पढावयकेँ परम्परा अछि । ओहिसभमे सेहो मैथिली भाषाक किताब आवि गेलाक बाद आब ओहि भाषामे पढाओल जाए ताहिपर बहस शुरु भऽ गेल अछि ।

सुमित आनन्द
आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झाक भाषणमाला-२०१०


आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक आयोजन मैथिली अकादेमी पटना, द्वारा प्रायः पहिल बेर दरभंगामे भेल। आचार्य रमानाथ झा भाषणमाला २१ सितम्बर २०१० केँ आर प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमाला २२ सितम्बर २०१० केँ चन्द्रधारी संग्रहालयक सभागारमे मनाओल गेल जाहिमे मुख्य वक्ता छलाह क्रमशः डॉ. रमण झा, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा आर डॉ. बीरेन्द्र झा प्राचार्य आ अध्यक्ष, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना। मैथिली अकादेमी, पटनाक अध्यक्ष, श्री कमलाकांत झाजीक द्वारा अध्यक्षीय प्रभार ग्रहण कयलाक पश्चात् ई पहिल आयोजन छल जे सफलतापूर्वक सम्पन्न भेल।
पहिल दिन अर्थात् २१.०९.२०१० केँ आचार्य रमानाथ झा भाषणमालाक आयोजन २:३० बजे दिनसँ प्रारम्भ भेल। एहि कार्यक्रमक उद्घाटनकर्त्ता-सह-मुख्य अतिथि पं. चन्द्रनाथ मिश्र अमरअपन उद्घाटन भाषणमे कहलनि जे महान साहित्यकार लोकनिक जयंती हुनक अंग्रेजी तारीखक अनुसार नहि मनाए पंचांगक तिथिक अनुसार मनाओल जएबाक चाही। ओ कहलनि जे १९६० ई.सँ आचार्य रमानाथ झा मैथिली भाषा आ साहित्यकेँ ध्यानमे राखि रचना कयलनि। एहि अवसरपर विशिष्ट अतिथिक रूपमे विचार व्यक्त करैत विद्यापति सेवा संस्थानक महासचिव डॉ. वैद्यनाथ चौधरी बैजूकहलनि जे आचार्य रमानाथ झा साहित्यकार, रचनाकार, कवि सहित सर्वगुण सम्पन्न छलाह।
मुख्य वक्ता डॉ. रमण झा मैथिली भक्ति-काव्यमे अलङ्कार-विधानपर अपन व्याख्यान देबाक क्रममे कहलनि जे विद्यापतिक अधिकांश श्रृंगार विषयक गीत राधा-कृष्णसँ सम्बन्ध अछि जकरा भक्तिक कोटिमे राखल जा सकैत अछि। नन्दक नन्दन कदम्बक तरू तर धीरे-धीरे मुरली बजावकेर व्याख्या करैत ओ कहलनि जे अलङ्कार (सौन्दर्य) मनुष्ये जकाँ काव्योक हेतु आवश्यक छैक। एहिसँ काव्यमे सरसता बढ़ैत छैक। एहि क्रममे ओ शब्दालङ्कार, अथलिङ्कार, आ उभयालङ्कारक कत्तोक सुन्दर-सुन्दर उदाहरण दैत अपन कथनकेँ प्रमाणित कयलनि। उदाहरणक हेतु ओ विद्यापतिक मधुप, सुमन इत्यादिक रचनासँ सुन्दर-सुन्दर पदक उल्लेख करैत, ओकर अलङ्कारकेँ फड़िछबैत रहलाह।
कविशेखर जीक काव्यमे तऽ एक संग अनेक अलङ्कारक गुंफनकेँ सेहो सोझरबैत रहलाह। श्री ब्रह्मेन्द्र झाक संचालनमे कार्यक्रमक समापन मैथिली अकादेमीक अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजीक भाषणसँ भेल।
दोसर दिन अर्थात् २२.०९.२०१० केँ प्रो. तंत्रनाथ झा भाषणमालाक उद्घाटन प्रसिद्ध हृदयरोग विशेषज्ञ आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद, दरभंगाक महामंत्री डॉ. गणपति मिश्रक द्वारा दीप प्रज्वलित कए कएल गेल।
डॉ. मिश्र तंत्रनाथ झाक प्रसिद्ध मुसरी झाकविताक उल्लेख करैत कहलनि जे ओ अत्यंत लोकप्रिय कवि छलाह। हुनक कथन छलनि जे कीचक वधसन महाकाव्य लिखि ओ एकटा नव परिपाटी जन्म देलनि। यात्रीक सम्बन्धमे, जनिकापर ओहि दिनक व्याख्यान केन्द्रित छल, सेहो ओ कतेक गूढ़ गप्प कहलनि कारण जे बारह वर्ष धरि ओ यात्रीजीक चिकित्सकक रूपमे सेवा कएने छलथिन। हुनक कथन छलनि जे अस्वस्थतोक समएमे ओ सर्जनात्मक कार्यमे तल्लीन रहैत छलाह। विशिष्ट अतिथिक पदसँ बजैत मैथिली पुत्र प्रदीप प्रो. तंत्रनाथ झाक किछु स्मृतिक उल्लेख कयलनि। ओ तंत्रनाथ झाक आदेशपर हुनका गीत सुनबैत छलथिन तकर किछु पाँती श्रोता लोकनिकेँ सस्वर सुनओलथिन।
 
मुख्य वक्ता डॉ. बीरेन्द्र झा यात्री साहित्यमे लोक जीवन ओ राजनीतिक चेतनाविषयपर अपन व्याख्यान दैत हुनका जन कवि कहलनि। डॉ. झा यात्री चित्रासँ अनेक पाँतीक उल्लेख करैत सिद्ध कयलनि जे ओ कमजोर वर्गकेँ उपर उठयबाक हेतु ओकरा समाजक मुख्यधारामे अनबाक हेतु सतत प्रयत्नशील रहलाह। बूढ़वर, विलाप, अंतिम प्रणाम इत्यादिक उदाहरण दए ओ प्रमाणित कयलनि जे यात्री जी वस्तुतः कविताक धारा बदलि देलनि। एहि अवसरपर अध्यक्ष श्री कमलाकांत झाजी अध्यक्षीय भाषणमे घोषणा कयलनि जे ओ अकादेमीक सभ समारोहमे एकटा मैथिली सेवीकेँ पाग तौनी दए सम्मान करताह आ एहि क्रमे ओ बूढ़ा भाइक सम्मान कयलनि।

कार्यक्रमक संचालन ब्रह्मेन्द्र झा कयलनि। एहि कार्यक्रमक अवसरपर अनेक गणमान्य व्यक्ति सभ उपस्थित छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह-

डॉ. पं. शशिनाथ झा, डॉ. भीमनाथ झा, डॉ. श्रीमति वीणा ठाकुर, डॉ. फूलचन्द्र मिश्र रमण’, डॉ. विभूति आनन्द, श्री रवीन्द्र झा, श्रीमति आशा मिश्र, श्री मुरलीधर झा, श्री चन्द्रेश, ई. श्री अशोक ठाकुर प्रभृतिआ समस्त मैथिली अकादेमी पटनाक सदस्यगण उपस्थित छलाह।
श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक
आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)

विश्व हिन्दू परिषदक एहि लेटरपैडमे अध्यक्षक जगह पर पं  जयकांत मिश्र  पटना छल, कोन जयकांत मिश्र छलथि कहियो जिज्ञासा नहि रहल-
आदरणीया बहन
शेफालिका जी
आपको ज्ञात ही है कि बिहार आंदोलन मे आज़ादी के बाद दूसरी बार महिलाओं की व्यापक हिस्सेदारी हुई । सत्याग्रह के कार्यक्रमों की मुख्य शक्ति बनकर वे उभरी । उनका अपूर्व
जागरण हुआ वैसे तो बिहार आन्दोलन ने बहुत कुछ बदला पर महिलाओं के मानस मे उसने बड़ा परिवर्त्तन किया  वह परिवर्त्तन क्या फिर सो जायेगी  यदि हम सो गयी तो कौन महिलाओं को उनकी सही सामाजिक स्थिति तक पहुँचायेगा इसलिये आर्थिक  सामाजिक राजनैतिक  सांस्कृतिक आदि सभी मोर्चोपर हमे अपनी लड़ाई पूरे समाज के संदर्भ मे स्वयं लड़नी होगी और इसी का ध्यान मे रखते हुए 29 जुलाई 78 से 2 अगस्त 78 तक पटना मे एक बिहार प्रान्तीय महिला शिविर-सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है।
बिहार प्रान्तीय महिला शिविर-सम्मेलन का उदेश्य सम्पूर्ण क्रांति की दिशा मे महिलाओं की
भूमिका खोजने  कार्यक्रम बनाने और संगठन खड़ा करने का है  अतः आप से आग्रह है कि आप इसमे भाग लेकर हमे सहयोग करें ।
आपकी सेवा मे शिविर-सम्मेलन संबंध्ी कागजात भेजे जा रहें है आप से प्रार्थना है कि संलग्न आवेदन पत्र भर कर तुरंत भेजें ताकि अन्य जानकारी भी आपको भेजी जा सके ।
समस्त शुभकानाओं के साथ -
सादर -
आपकी बहन
नुतन
बिहार महिला संघर्ष समिति  पटना
18 6 78
प्रिय बहन।
    कटिहार जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन आगामी 5 फरवरी को सम्पन्न करने का निश्चय किया गया है अधिवेशन के अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन के लिए आमंत्रित कर रहा हँू ।
श्री मार्कण्डेय प्रवासी जी द्वारा आप का पता मालूम हुआ। अपनी की ओर से मार्ग व्यय एवं
सम्मान देने की स्थिति मे हँू । इस अवसर पर बिहार के राज्यपाल महासचिव श्री जगन्नाथ कौशल ने उद्घाटन के लिए हमे स्वीकृति दी है।
मैं आशा करता हँू कि आपका सहयोग हमे अवश्यक प्राप्त होगा । कृप्या सेवा के लिए स्वीकृति पत्र भेजने की कृपा की जाय।
स्नेहाध्ीन
रतनकुमार किशोर
सचिव
कटिहार जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन
पो॰ गुरू बाजार  जिला - कटिहार
17 1 78
ओहि काल बीजेपी नेता बादमे मुख्यमंत्राी बिहार भऽ  गेलथि कैलाश जीक पत्र-
शेफालिका जी एवं ललन जी,
आत्मीयता एवं स्नेह भाव से दीपोत्सव के अवसर पर आपकी शुभकामना प्राप्त हुयी। मैं इसे आशीर्वाद समझकर शिरोधार्य कर रहा हूँ। आप लोगों की यह भावना ही जीवन पथ पर चलते रहने की शक्ति प्रदान करती है। निरंतर प्रवास पर रहने के कारण प्राप्ति के पश्चात प्रणाम भेजने मे बिलम्ब हुआ है। सदा स्नेह बना रहे यही आकांक्षा है।
भवदीय
कैलाशपति मिश्र

प्रिय शेफालिका जी
आखरक प्रवेशांक पठा चुकल छी  भेटत होएत। आखर केहेन लागल अपनेक सम्मति अपेक्षित अछि। आखरक अग्रिम अंकक लेल अपनेक रचना आमंत्रित अछि  तैं कमसँ कम समयमे अपन नवीनतम अप्रकाशित रचना पठा देल जाए। एखन धरि हम एहि आश मे छी। अंक देखैत अहाँ अपन सम्मति आ रचना पठा देब। दोसर अहांक सामग्री प्रेसमे चलि जाएत समयपर एम्हर बहुत दिनसँ अपनेक कोनो रचना नहि देखबामे आएल-से की कारण, अहाँक सभ पत्र  रचना  उपराग आओर यदा-कदा विभिन्न व्यक्तिक द्वारा पठाओल गेल समाद भेटैत रहल अछि, महानगरक कर्म-संकुल जीवनक दुर्वह भारकेँ वहन करबामे ततेक ने समय व्यतीत भऽ  जाइत अछि जे ककरो यथासमय पत्रोत्तर दऽ  सकी  तकरो पलखति नहि भेटैत अछि,  एम्हर अग्निपत्रक प्रकाशनमे बेस विलम्ब भेल।  नव अंक बहार भऽ  गेल अछि, जे अपनेक नाम पठा चुकल छी,  आशा जे एहि अंकक विषयमे अपन अभिमत शीघ्र लिखि पठायब। उल्थाक कार्य चलि रहल छैक। अहाँक रचना जा रहल अछि आओर बात अन्य पत्रमे विस्तारसँ लिखब  अपन स्वास्थ्यक विषयमे सूचित करी। प्रसन्नता होएत  आओर कोना की पत्रवाहक हमर अभिन्न छथि।
शेष शुभ
वीरेंद्र मल्लिक
कलकत्ता
13 11 71
मैथिली साहित्यमे नहुनहु पैर राखैत छलौं कनिया बहुरिया जकाँ स्यात् साठिक दशक छल
तखने ई पत्र भेटल छल।
श्रीमती शेफालिका जी
यथोचित
किछु आश्चर्य होएत एक अपरिचितक पत्र पावि। बम्बई मे हम सब कर्ण कायस्थ विकासक हेतु एक कर्ण गोष्ठीक स्थापना केलहुँ ओ अपन सामाजिक  सांस्कृतिक अध्याविधि प्रगतिक क्रमिक विकास एक प्रामाणिक पुस्तिकाक प्रकाशन कए रहल छी जाहि सं अपन संस्कृतिक एक पक्ष सुरक्षित रहत ओ भविष्यमे हम अपनाकें पहचानि सकी जे हम के छी।
सीमित सम्पर्क रहलो उत्तर हम सब अधिकाधिक समाजक गण्यमाण्य व्यक्तिसं सहयोगक लेल हाथ पसारने छी।
पत्रिका की रूप देल जाय एकर आभास संलग्न पत्रसं ज्ञात होएत। विषयक एक सूची कर्ण कायस्थ मे ओकर स्थिति आदि संबंधी एक विवेचना पूर्ण रचनाक आकांक्षी छी। सुविधानुसार शीर्षक या विषय अपने चयन कऽ सकैत छी मुदा रचना पूर्ण कायस्थ समाजक परिधिमे हो।
आशा नहि पूर्ण विश्वास अछि अपनेक सहयोग भेटत।
भवदीय
राम चन्द्र दास
83/2969  तिलक नगर चेम्बर
बम्बइ

अखिल मिथिला मैथिली प्रचारक संघसँ पत्र आयल छल जकर शाखा संपूर्ण भारत नेपालमे छल।
जमशेदपुर
04 01 1969
पत्रांक - 81/69
स्नेही शेफालिका जी
जय मैथिली
विश्वास अछि  टटका अंक संग-संग पत्र सब सेहो भेटि गेल होयत। टटकाक विचारधारा संपूर्ण देशक विचार धारा अछि। अपनेसँ आग्रह जे सह-सम्पादनक भार अपनेकें देल जा रहल अछि। स्वीकार करू। सह सम्पादकक रूपे अपनेसँ सम्पूर्ण प्रचारक बन्धु निवेदन कय रहल छथि जे अपनेकेँ कोनो झंझट नहि होइत। अपने गंगजले रहब तथा प्रत्येक अंकक लेल अपन सम्पादकीय पठा देल करब।
आधा पत्रक अक्षर सभ उड़ि गेल अछि-
आगाँ अगिला अंकमे....
विपिन झा*
समसामयिक सन्दर्भ मे गाँधीविचारक महत्ता
काल्हि मृत्यु कें प्राप्त होयब एहि चिन्तनक संग जीबाक चाही आ हम अमर छी एहि अवधारणाक संग ज्ञानार्जन करबाक चाही” {M.K.Gandhi}
गाँधीओहि देदीप्यमान नक्षत्रक नाम अछि जेकर आभा सँऽ भारतवर्ष सतत आलोकित होइत रहल अछि। भारतीय स्वाततन्त्र्य संघर्ष मे हुनक योगदान सर्वविदित अछि।  सत्य आ सहिष्णुताक अनुपालनक जे अप्रतिम उदाहरण ओ प्रस्तुत कयलथि कदाचित हुनक आलोचको ओहि समक्ष नतमस्तक रहल। ओ नहिं तऽ राजनीतिक आ नहिं तऽ कोनो अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत कयलथि प्रत्युत हुनकर व्यवहार सिद्धान्तक रूप लेलक।
जहाँ धरि गाँधीक सिद्धान्तक गप्प अछि; महात्मा गाँधी कोनो नवीन सिद्धान्तक प्रतिपादन नहि कयलथि सनातनधर्म सँ स्वीकृत सिद्धान्त केर अपन जीवन मे प्रयोग कय शिक्षा देलथि जे ई मात्र सैद्धान्तिक नहिं अपितु एकर व्यावहारिक महत्त्व सेहो छैक।
स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व गाँधीजीक ई व्यावहारिक प्रयोग जतय स्वराज्यप्राप्ति हेतु प्रयत्न के गति देलक ओतहि स्वाधीन भारत मे नीतिनिर्धारण मे आधारभूमि केर कार्य केलक। ध्यातव्य अछि जे परिकल्पना परिपुष्ट भय सिद्धान्तक रूप लैत अछि आ सिद्धान्त परिपुष्ट भय नियम बनैत अछि। गाँधीजीक स्वाराज्य ग्राम परिकल्पना कालान्तर मे सिद्धान्तक रूप लेलक जाहि हेतु हुनक समस्त गतिविधि दृष्टिगत भेल।
गाँधीजीक प्रमुख सिद्धन्त कें अनुशासन, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सादगी आ विश्वास केर गिनती कयल जा सकैत अछि। आब प्रश्न ई उठैत अछि जे ई सिद्धान्त प्रायोगिक रूप मे कतेक अनुगम्य अछि? कोनो सिद्धान्त करबाक चाहीएकर निर्देश दैत अछि न कि करैत छी। प्रत्येक सिद्धान्त एहि धरातल पर सर्वथा प्रायोगिक रूप सऽ अनुगम्य अछि।
अनुशासन एहेन आदर्श अछि जे व्यक्तिमात्र के पशु सँऽ पृथक करैत अछि। अनुशासनक महत्त्व  सेना क सन्दर्भ मे नजदीक सँऽ देखल जा सकैत अछि। सत्य केर अनुपालन सर्वथा असत्य बजनिहार सेहो करय चाहैत अछि। अहिंसा सऽ आशय मात्र हत्या सँऽ नहिं लय कायिक वाचिक सेहो लेल जाय त एकर उपादेयता सहजतया बुझल जा सकत। ब्रह्मचर्य व्यक्ति उच्छ्रिंखल नहिं बनय दैत अछि। सादगी बाह्याडम्बर के रोकबा मे महत्त्वपूर्ण भूमिका रखैत अछि।
आब सहज प्रश्न उठत जे यदि ई एतेक महत्वपूर्ण अछि तऽ लोक एकर अनुपालन कियाक नै करैत अछि? उत्तर सहज अछि आन्तरिक शत्रु के आधीनता स्वीकरबाक कारणे।
पुनश्च एकटा प्रश्न उठैत अछि जे गान्धीजीक विचारक झलक आई कतहु देखबा मे अबैत अछि आ कि बस सैद्धान्तिके अछि? निश्च्य व्यवहार मे देखाई दैत अछि। स्वतन्त्रता सँऽ पूर्व  स्वराज्य हेतु पृष्ठबूमिक रूप मे, स्वातन्त्रोत्तर  भारतक संविधान क प्रस्तावना, अनुच्छेद 19b, नीतिनिर्देशक तत्त्व, पंचायती राज किछु अप्रतिम उदाहरण अछि।
एतबा नहि नेल्सन मंडेला, भारतीय विदेश नीति एहि विचारधारा सँ अप्रभावित नहिं अछि। अस्तु समस्त पाठकवृन्द सँऽ आग्रह जे गाँधी जयन्ती के मात्र एकटा अवकाशदिवस नहि मानि एहि विचारधारा के यथासम्भव अनुसरण कय भारत के सत्यं शिवं सुन्दरं मार्ग मे अवाध गति दी।
*लेखक विपिन झा, IIT Bombay मे शोधछात्र छथि।
१.भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा (लघुकथा)
२.ज्योति सुनीत चौधरी- विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता
भवनाथ झा- दूटा विहनि कथा (लघुकथा)
I.ऊँचका डीह
    राम बाबूक पुरखा बड कलामी रहथिन। नदी कातक वास रहनि तें खूब ऊँच के डीह भरने रहथि। ततेक माँटि देल गेल रहै जे पूबमे पोखरि आ दच्छिन मे डबरा खुना गेल रहनि। ओही डीह पर चौसाल घर, खरिहान, बाडी, झाडी सभटा ले' जगह रहै।
    परुकाँ साल बाढि आएल रहए तँ चूडा आ चीनीक पैकेट हवाइ जहाज सँ खसाओल गेल। हिनका अपन डीह पर खूब फबि गेल रहए। जाबत आन केओ पानिमे हेलैत हिनकर डीह पर आएल ता धरि इच्छाभरि कोठीमे ढाडि नेने रहथि। आ मनहि मन अपन पुरखाकें प्रणाम कएने रहथि।
    एहि बेर सेहो बाढि आएल। मुदा एहि बेर राहत-सामग्री नाव सँ घरे घरे बँटबाक व्यवस्था भेल रहै। रामबाबू बाढि सँ प्रभावित नै रहथि तें हिनका केओ किएक देतनि!
    रामबाबू मसोसिक' रहि गेलाह हरलनि ने फुरलनि-पुरखा कें उकटैत अपनहि ऊँचका डीह पर बनल घरके डेङबए लगलाह।
II.हेराफेरी
    दुर्गापूजाक तैयारी दुनू गाममे चलि रहल छल। खूब चंदा भेल रहए तें सभक इच्छा छलनि जे हमर गामक पूजा बेसी नीक होअए। पहिल चर्चा उठल जे 'एहि बेर अपन गामक जे पंडितजी छथि हुनका बदलल जाए। आ जँ 'हुनका' गामके पंडितजी आबि जैतथि तँ बड नीक होइते। अपन पंडितजी तँ बकलेल छथि!'
    दुनू गामक दुर्गापूजा समितिमे एके चर्चा छल। दुनू दिससँ लोक सभ पंडितजीकें पोल्हबै ले' आबए-जाए लगलाह। दुनू गामक पंडितजी मसियौते रहथि तेँ बेसी दिक्कत नै भेलनि। एक दोसराक घरमे पहुनाई करैत पूजामे लागल लगलाह मुदा ओते दिन हुनका दुनूक अपन-अपन गोसाउनिसीर पर दीप नै जरलनि!!


ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

विहनि कथा (लघुकथा)- घर दिसका रस्ता

कतेक नीकसँ ऑंखि लागल छल, अतेक हरानी भेल छल गामपर। फेर गामसँ पटनाक यात्रा,  पटनाक बादो तँ डोमेस्टिक एयरलान्स अन्तः राष्ट्रीय हवाईसेवा छल । तुरन्त अन्तर बुझा जाइत छै अहि दुनुमे, किन्तु एकबेर गामपर ई बात बजा गेल तँ संगी सब कहलक जे बड पाइ अछि तँ चार्टर्ड प्लेन कऽ लिअ। आब लैण्डिंगमे मात्र बीस मिनट छल से एयरहोस्टेस- विमान सेविका- सब खिड़की खोलि देलक आ सब बत्ती जड़ा देलक। बुझु तँ दूइए मिनिटमे अन्हरिया रातिसँ दुपहरिया भऽ गेल। नास्ता चाय संगे इमिग्रेसन फॉर्म, आप्रवासन प्रपत्र सेहो बॉंटल गेल। यन्त्रवत सभ तैयारी कऽ लेलहुँ कारण कोनो पहिल बेर तऽ छल नहि। आब तँ तेहेन आदत भऽ गेल अछि जे कतौ नाम लीखक आवश्यकता हएत तँ नाम संगे पता. जन्मतिथि. व्यवसाय. पासपोर्ट नम्बर आदि सभ लिखा जाएत। व्यवसाय लेल तँ सालमे कएक बेर हवाइ जहाजक पाला पड़ैत अछि आ चारू साल सऽ जहियासँ विदेश एलहुँ एक बेर गाम तँ जाइते छी।
पत्नीमे समय आ परिस्थिति संगे हिलमिल जाइक ततेक नीक गुण छनि जे दोसरे बेरसँ गाम नहि जएबाक शपथ लेली। जखनसँ स्वावलम्बनक आत्मविश्वास भेलनि हुनकर दुरदर्शिता कहलकनि जे गामक प्रगति कहियो नहि होएत । ओहि ठाम जाइ आबऽमे जे खर्चा करैत छी ताहिमे पूरा दुनिया घुमनाइ भऽ जाएत। हमरा अपन जन्मस्थानसँ तेहेन आसक्ति अछि जे सभ बेर परेशान होइत छी मुदा गेनाइ नहि छोड़ैत छी। एकबेर पूरा चौहद्दी्क चक्कर जरूर काटै छी। सभ दिस ताकैत रहै छी जे कनी प्रगति देखा जाए। वैह अपन छोट भायकेँ कोरा लेने बचिया. महिस पर सवार बच्चा. समाजक विकृतिक मटमैल उज्जर रंगमे टंगने विधवा युवती. नाटक नौटंकीक तैयारीमे अपन बेरोजगारीक दुःख नुकाबैत नवयुवक़ घरपर खायक किल्लत मुदा जमाय लेल तिलकोड़ा तरैत बेटीक माय. पुतहुपर कटाक्ष करैत बुढ़िया. टूटल आरिपर चलैत मोक्षक मार्गपर शास्त्रार्थ करैत बुजुर्गवर्ग ई सब हमर पत्नीक बुद्धिमत्ताक गवाही दैत अछि।
जखन माटिक टीला केँ ढ़ाहिकऽ उच्चविद्यालय बनैत देखलिऐ तँ अपन छुटपनक दिन सभ भाइ-बहिन. संगी सभ संगे लुकाछिपी खेलायक याद. मिटाइक कनिको दुःख नहिं भेल।खुशी भेल जे आब जाड़क भोरमे वा गरमीक तपनमे वा बरसातक पिच्छड़मे बच्चासबकेँ सायकिल सऽ पॉंर्च पॉंच किलोमीटर नहिं जाए पड़तै। हम सभ तँ पैरे जाइ छलहुँ फेर बाबूजी अठमासँ छात्रावासमे दऽ देलथि। तखन सँ जे घर छूटल से छुटले रहल। कॉलेज लेल दरभंगा. फेर तकनीकी शिक्षा लेल मुजफ्फरपुर आ नौकरी लागल अन्तरराष्ट्रीय कम्पर्नी ई सब घर परिवार छोड़ाइए देलक। । बाबूजीकेँ सपना पूरा भेलनि हमरा अभियन्ता बनैत देखिकऽ। फलक चिन्ता केने बिना कर्म करैक पाठजे गीतामे कहल गेल अछि ताहिपर हमर माता-पिता पूर्णतः अनुसरन करैत छथि। बस स्वयंकेँ विदेशमे रहैबला अभियंताकेँ अभिभावक कहि कऽ खुश भऽ जाइत छथि। अपन ऊपजाबाड़ी. दियाद आ समाजकेँ छोड़िकऽ कतहु नहिं जाइ लेल प्रतिबद्ध छथि। बस तू आनन्दसँ रह सएह चाहै छी”. यैह जवाब भेटैत अछि जखन अपना संगे जाइ लेल कहैत छियनि।
 
गाम भरिमे विख्यात अछि जे हमर समानमे कपड़ा कम आ पानिक बोतल बेसी रहैत अछि। सभ पटनामे भरि कऽ लऽ लैत छी। गामपर लोककेँ खूब हँसी आबैत छै। सभ डेराबैत रहैत अछि जे डुप्लीकेट होइत अछि। गामक लोकक ज्ञान अहि सभमे बहुत विलक्षण होइत छै । अपने फटेहाल रहत मुदा कोट पैण्ट बलाकेँ तेहेन-तेहेन बात कहत जे ओ तुरन्त ड्राइवास बला लग भागत। जाबे पढ़ैत रही ताबे नौकरीक दुर्गमतापर ई लोकनि बड्ड चिन्तित रहैत छलथि. आब जखन नौकरीमे छी तँ हमर व्यस्ततापर सहानुभूति छनि। गामसँ विदा होइत छी तँ सभ आबै छथि अपन आशिष दै लेल। हिनकर सबहक यएह स्नेह हमरा फेरसँ आबैक निमंत्रण दैत अछि।

पैघ कतार छल प्रवासनक पूछताछ लेल,  ताहिपर सँ स्त्री. बच्चा आ बुजुर्गक जे विशिष्ट सुविधा छै ताहि सँ आर देर हेबाक आशंका छल मुदा सब जल्दिये भऽ गेल। कनिक समय कस्टमसँ निकासीक बाद समान आबैमे लागि रहल छल। कन्वेयर बेल्ट चलनाइ शुरू भऽ गेल छलै आ समानो आबऽ लागल छल। मोबाइलक बीपक संग अपन ध्यान टूटल तँ देखलहुँ जे हमर समान सेहो आबि गेल छल। पिछला किछ देरमे हम प्रत्येक मिनटमे एक सालक यात्रा कऽ लेने रही। समान लऽ कऽ विदा भेलहुँ आगॉं। मोबाइलपर समाद छल जे पत्नी अराइवल गेट आगमन द्वारपर हमर प्रतीक्षा कऽ रहल छथि। फोनसँ यथार्थमे आनि देने छली आ जखन भेंट हेती तखनसँ भविष्यक सैयोटा योजना सुनेती। फेर कहियो फुरसतमे रहब तँ अतीतक ओहि भागक यात्रा करब जे अखन छूटि गेल. फिलहाल तँ हम घर दिस विदा भेलहुँ।
बीनू भाइ


कथा- उत्ताप
·      


सभटा मिथ्या थिक!
क्यो कत्तहु नहि देखाइत अछि। क्यो तुरंते एलीह एवं देखिते चोटहि भागि गेलीह। चिन्हियो नहि सकलियनि। अकार चिन्हारे सन छलनि। माथपर नुआक संग अधा कपार तक घोघ छलनि। बिदीर्ण मोने उल्टे डेग बाहरे पड़ेलीह। तखन्हि दु गोटा दौड़लि एलीह। पयर छूबि छगुंतैल चट घुरि गेलीह। एक गोटा हाक देलथिन। समर्थ सन क्यो दौड़ले एलाह। देखलनि। घोकरी सँ मोबाइल लगौलनि। बिष्णुकेँ। कहलथिन्ह स्कूटरसँ तुरंते जाइ लेल। विनयानन्द नहि होथि तँ सनटिटहा पैरघाट वला केँ संगहि नेने अबै लेल। विनयानन्दे एलाह। छूबिकेँ देखलनि। तर्जनी-औंठासँ दुनू पलक सटा देलनि। मुँह बीजका चल गेलाह। आशाहीन कि निरस्त मोने। तथापि देखाइ पड़िये रहल छल जेना एतीकालसँ श्रवण काज करैत छल मुदा बुझियैक नहि जे केऽ की बाजि रहल छथि कारण ध्यान कत्तहु छल। दृष्टि पर केन्द्रित। ध्यान अंतः रहला सँ समक्ष आँखि कान नाक खुजलहु रहला संता कार्य नहि करैत छिअक अर्थात श्वाँस तक ठमकल रहैत छैक। ध्यान मे।
घरक किछु-किछुजुटि चुकल छलक। विष्णु एवं सागर जुमि चुकल छलाह। हँय-हँय समान ऊठौलनि। धयँ सँ वस्तु बाहर लऽ गेलाहजाहि सँ क्यो ई नहि बुझय जे घरे मे..। सबहक बओल मुँहसँ बुझाइत छल जे सभ क्यो रोदन कऽ अहल अछि। चारि गोटा जहाँ रोदन करैत छैक तँ शेष के स्वतः कना जाइते छैक भलहि डाहे माखे रहउ तथापि। तहिना चारि गोटा के प्रशन्न भेलासँ खुशीक प्रभावो सम्पर्क लोकपर रक्षण होइत छैक। सुगुन छल जे ओऽ नहि छलीह। कत्तहु नहि छलीह। नहि तँ मुर्छा पर मुर्छाक दृश्य होइत। परम पहपटि भऽ जइतेनि सबकेँ। भन्नहि नहि छथि! कत्तहु! कोनहुँ समान दू गोटासँ घरसँ बाहर कि बाहर सँ घर होइत छैक तँ भरिगर बुझाइते छैक। निष्प्राण वस्तु तँ विशेष। मुदा एहन समान घरसँ बाहर करैत काल चिंतन रहैत छैक जे एखन प्राण छैक। प्रान, बाहरमे जेबाक चाही तें धीयो-पुता कि जनी कै तो हल्लुक जकाँ उठा लैत छथि हूबापर। बीतँ अल्पहारी भऽ गेलीह साठिक पश्चाते जे बच्चासबकें भारी नहि लगथिन।
बाहर होइत भांतर नेमटेम प्रारम्भ। हरबासल, जितिया, एकादशी, गंगाजल, गोदान। कतेक लोक तँ सामान भऽ चुकल रहैत छथि। वस्तु देखै हेतु लोक गोलिया जाइत अछि छनाक सँ। बानर बनरी नाच सन। मदारी निपत्ता मुदा एकटा मे सभ आनन्दित तँ दोसर मे हाक्रोश करैत।
परम सत्य एकेटा! से आइ विश्वास भऽ रहल अछि। पहिनहुँ कदाच से अभरय मुदा मरीचिका सन मृगतृष्णा जेकाँ। कड़गर कि उत्कंठा सँ नहि। ताहि एक गोट परम सत्य जँ पहिने पक्का पक्की बूझि जेतियैक तँ कमसे कम घरहट सन जंजाल काज कदापि नहि ठनितहुँ।पजेबा सीमेंटॅ सुर्खी छड़ कोजैक टाइल्स माखुल आ बाँस कोड़ो बत्ती करची खाम्ह घनि बा फ्लैटक कर्ज लऽ सूदपर सूद चुकता करैमे डँण तोरी। राजो महराजोक अट्टालिका हक्कन कनैत रहि जाइत छनि। एहिसँ नीक वृक्षा-रोपण। बेसी पूंजीपगहोक हाहे बेरबा नहि। एकोटा गाछ रोपि के पोसि लेलहुँ। संतानो सँ नीक बुझैत। अपनहुँ फल खा सुख करू आनहुँ युग युग तक सुख करताह। फल पात जाड़नि सँ। नहि किछु ब्तँ छायासँ। चाया जें बड़ प्रिय होइत छैक तेँ जीनगी भरि संग नहि छोड़ैत छैक। सबहक। कोनहुँ भेदभाव नहि। मनुष्य़ छी कि वनस्पति! सूर्यहु केँ संगनहि छोड़ैत छथि। हुनकहि संग निपत्ता। हुनकहु वैह छथिन्ह। सहचरणीय। ऋषि मुनि सबकेँ कुटी पसीन छलनि, बोन-झाँखुर जंगलमे। ज्ञानी छलाह तेँ। राजो महराज नींघुरैत छलथिन कुटी प्रवेश काल।
सबसँ उकठ्ठी जीव मनुष। यमराजोक तस्वीरो घीच लेलक। अत्यंत विकराल भयावह। जखन कि कत्तहु किछु नहि। सामान जकाँ पड़ल रहू। गाछक ढ़ेंग सन। सेहो नहि। ढ़ेंग सड़ैत छैक तँ पहिने कोकनैत छैक तथापि विकट दुर्गन्ध नहि। तहि भभक दुआरे जड़ा देल जाइत छैक आ खूब गहीर मे गोड़ि देल जाइत छैक तेल फुलेल चानन लगाकेँ। समान केँ। एहन समान केँ। जे सड़ला सँ बोकरऽ लागत केहनो तन्दरूस्त लोक। समाज डराइत छैक एहन एकटा समानसँ।
तखन ऐंठी। क्यो अवंच नहि।  सवदिक भऽ देल अछि। भगवानो भगवतीक खिस्सासँ। कथो पिहानी मे सब प्रेम तकै छैक। ओऽ प्रेम नहि। सीनेमावला प्रेम। दैहिक संभोग वला, बियाह भऽ जाइ वला। बियाह संस्थाकेँ थकुचय वला। ई की भेलइ! पहिने वरदान फेर वध करै लेल अपस्याँत। एके खेड़हा मात्र! सब भगवानक। हुँह! मुदा ई क्यो नहि बुझि पबैत छैक तथापि जे अहंकार-वध बेर-बेर देखौल जाइत छैक जे सबके बेर-बेर मोन पड़ैक अपनहुँ अहंकार! जेकर मर्दन करी। तमसेबाक बदला जँ सेऽ साधि लितहुँ तखन तँ बुधियार एवं ब्रह्मज्ञानी भऽ गेल रहितहुँ याज्ञवल्क्य लोकनि सदृश। कतबहु देखलहुँ खिस्सा-टीली-सीनेमा आ वध; से कहाँ बुझलियै।
आब बुझाइये। से गूढ़ विषय। एकटा सत्य! सबटा हुसि गेलाक पश्चात्। एकटा सत्य! अठारहो पुरान छोड़ू। व्यासक दुनू वचन भारी बुझाइत अछि तँ एकेटा मानू। एकेटा सँ गति भेट जाएत। परोपकार टा करू। ताहू मे जँ बड़ शोणित सोखैत बुझाइये तँ तहू सँ हल्लुक एकेटा बात अवधारि लियऽ जे किनकहु अधलाह नहि करब संज्ञान। बैसल ठाम बिनु मेहनति के तप। एकपर विश्वाससँ सिद्धि भेटत। ई एक सबसँ शीर्ष थिक जतय पहुँचय आरम्भ मे दू, तीन, चारि, पाँच....। अर्थात् ..... पाँच, चारि, तीन, दू तत्पश्चात् एक। सब आ लगभग सब, दूए मे लेपटैल बीति जाइत छथि। जँ दू सँ एकक अनुभूति भऽ गेल तँ लक्ष्य भेटि गेल। इएह प्रेम छी। दोसर शब्द मे, , प्रेमक अतिरिक्तहु सब किछु छी। तेँ सब किछु, प्रेमे छी। एकानन, चतुरानन, पंचानन; ....।
पता चलैत अछि बाँसक फठ्ठीक बिछान पर पाड़ि टांग हाथ ममोड़ि जौड़सँ सक्कत सँ बान्हि जेना भागि ने जाए कहीं, तखन। कुमारिल भट्ट तँ जीविते अग्निक तापकेँ शीतल सिद्ध केलनि। शेष ओहिना नियति सँ स्थान विशेष पर जड़ैत छी, दुर्वाशाक श्रापे नहि। भोजघारा कि दैनिक चुल्हा पजड़ैत नहि रहत। मुदा ई समान काँचे बीजू आमक फेंण संगे स्वतः एना धधकैत अछि कि स्वयं धृत, धूमन, सरड़ रहय। भरि जीवन जे तेल घी चपने रहैत अछि। जतबे-ततबे, मुदा सएह धू-धू धधकैत अछि।
मुदा कोनहुँ तापबोध नहि। सेतँ मनुक्खक ललाट पर लिखल अहैत छैक किंवा धस्सल। जे चेतना वस्था मे अछि। आतंकवादी कि खूनिञा चेतनावस्था मे नहि होइत अछि। ओ नींशा मे होइत अछि। वा, हुनक रक्त दुषित होइत छनि जाहि रक्तक ग्रूप पता लगेबाक ज्ञान एखन तक किनकहु नहि। यैह कहि सकैत छी जे एहन कुलंगार आंतरिक रूपें सामाजिक प्राणी नहि होइत अछि तेँ समाज मे अछैत ओ अपराध करैत अछि जानि बूझि के अपहरण, हत्या, गर्दनि रेतनय करैत अछि।भारद्वाज सन त्रिकाल दर्शी वैज्ञानिक एहन केँ देखिये के बारि दितथि।
अग्नि सन पवित्र! शीतल! लहलह करैत एवं धधराक संग। पुनः छाउर। फेर माटि। आ चुट्टीक भोजन भऽ पुनः क्षारित भऽ माटि। एकहि बात भेल। तथापि अस्तित्व रहिते छैक। माटि भऽ जाइत अछि पाथर। पाथर सँ मूर्त्ति। जीवंत मूर्त्ति। मुक्ति कहाँ! आ माटिक संग अनंत सूक्ष्म जीव बनि जाइत अछि। एकटा बड़का जीव अंततः अमीबा सँ। माटियो मे उर्वरा शक्तिक उर्जा समाहित रहैत छैक।
ई अटल विश्वास जे समान बनै सँ पूर्व ताहि सँ किछु निअसन होइत छैक; नि:सृत। प्राण कि आत्मा आ जे किछु। से मात्र कल्पना अद्यावधि। कोनहुँ प्रमाण नहि। जेऽ नि:सृत भऽ ब्रह्म मे विलीन भऽ जाइत छैक। वशिष्ट नितीज्ञ कहैत छथि। अदृश्य सत्ताक तँ ढ़ेर अस्तित्व आ प्रमाण अछि। विद्युत, चुम्बकत्व, ध्वनि, प्राणवाच, प्रभृत्ति अदृश्य सत्ताक रूप छी। देखबा मे ऐह अबैत छैक जे समान मँहक अंतर्निहित क्रिया रूकि गेलैक अछि। जेना कोनहुँ चलैत मशीन बन्द भऽ जाइत छिअक तँ मशीन सँ किछु भगैत नहि छैक। मुदा मशीन पुनः चलौल जाइत छैक कारण ओकर रहस्य मनुष्य केँ माने वैज्ञानिक मनुष्य केँ मनुक्खक अपन रहस्य अद्यावधि सोलहन्नी ज्ञात नहि। जेतिक ज्ञात करैत अछि ततबे व्याधि सँ आर ओझराएल जा रहल अछि। सकरी, लोहर, हायाघाट समस्तीपुर कि सिन्दरीक मशीन तँ जं-लोहा सँ माटि भइये गेल सन लगैत अछि। चिकित्सा विज्ञान सँ आब पुनः भोग विज्ञान। चहुँ दिस रहस्य जानए वपहिं बपहिं। ग्रह पर तक। सृष्टि कोना बनल। केहन विस्फोट भेल छलैक ओ?
एनऽ संतोष लेल चारि पाँच तरहक गाछ रोपण। तें भीष्म पितामह वला गाछ थोड़े भेटत। कते रास इंटा-तीटा पकिला कारबार बूझि करैत छथि। फेर वएह बात! जखन राजा महराजाक अट्टालिकाओ धूल धुसरित भऽ जाइत अछि तखन ई.....। केहन-केहन मन्दिर गिरिजाघर मस्जिद काल कलवित भऽ जाइछ। आब की जमीन्दार! ठाकुर! महराज पर अठ्ठाववज्जर करैत छी उद्योग पतिक बदला। जनिक मोटका-मोटका गगनचुम्बी स्तंभ कलांतरे पताल लोक आ नङ्टे अकाश मुँहे ठार रहि जाइत अछि। कालचक्र! सागरमे पहाड़ डूबा दैछ कि समुद्र पर पहाड़ ठार कऽ दैछ।
ई की भेलै? अकाश ठेकल मन्दिर मे एक बीतक मूर्त्ति। मस्जिद मे तँ सेहो नदारत। छुच्छे ढ़ं ढ़ं। एहि सँ नीक स्कूल। अंग्रेजी वला नहि। ताहि मे तँ पाइ वला धनीकहाक बच्चा महान बनैत अछि। मनुक्ख बनबै वला पाठशाला। वोर्डहु लागि गेलै। बीनू भाइ बाल मन्दिर। कालांतरे चपा गेल। अंग्रेजी स्कूलक उत्कर्ष सँ। सब अंग्रेजीक गुलाम। बड़का गौरव वला बात। बोकबा अझरूद्दीनहुँ ककऽ केँ बाजए लगलाह। विश्वस्तरीयो ख्याति फीका बिनु अंग्रेजी बजने। गुलामीक। द्विभाषक केँ रोजी भेटि जेतैक ने! श्री संत पर्यंत! एहि बीर्ड़ो मे बोर्डहु उड़ि के कत्तऽ गेल पता नहि। स्कूलोक पता नहि। मात्र लेखामे। दू गोटा मुदा दरमाहा उठबैत चुपेचाप जाकेँ पूर्णियाँ। आब ककरो अनका पतो नहि जे बीनू भाइ नामे स्कूल चलैत छैक। कहुखन केँ लागत जे परशुरामक सिद्ध मन-गतिञे कलियुगमे सब किछु विपरीत चलैत छैक।
जखन मनुष्य वस्तु भऽ जाइत! ताहि मे एकटा मे जीवनहि रहैछ एवं नष्ट भऽ जाइछ मुदा दोसर जीवंत समान। बुढ़ारी मे जखन छलहुँ तँ सामाने छलहुँ मुदा प्राण कि हुकहुकी रहए। एसगर बगुला सन टकटक तकैत। क्यो पूछनिहार नहि नहि, फुरसतिक अभावें। दया आबए मुदा वएह उल्टे दयाक पात्र बूझय। अहाहा! झुनकूट भऽ गेलथिन। सत्तरि टपि गेलनि। की दवाइ दौरी मे! बेकार के! एहिसँ नीक जे आब ...। वर्षी मे, पाँच वर्षी तक जाइत जाइत अकच्छ! तिथि, पतरा, महापात्र, गाम गेनए, छुट्टी लेनए। धुत्! अंग्रेजी गुलाम लेल एहिसँ सुनीनगर नीक फस्ट जनवरी, मारिज डे, बथ्थ डे, भेलेन टॉइ डे। हरिबाशल कि जितिया व्रत! बाप रे बाप! बथ्थ डे, मारीज डे सब मे आइ अपन काल्हि बौहुक परस्क बेटा बेटीक ....। बारहो महिना! जतेक मोन हुये! धुर छी: गुलाम! तिथि बुझिते नहि छथिन डेट पर जेता! छोछनए छोड़ि के पोछनए। लोक आब करोड़ मे महवारी पबैत अछि! ई एतनी मे फुच्छ! खबाशी मे!
अहिना एक दिन जाके सोलहनी गुलाम भऽ जाइत अछि लेलिन मार्क्स लोकनिक चोला लगा वेद वाक्य सर्वे भवंतु सुखिनः, वसुधैव कुटुम्बकम्, ...नारी पूज्यंते रमंते... देवता... सार्वभौमिक वैश्वीकरणक सनातनी मत सबके हरकुचि थकुचि। दोसर महात्मा गान्धी जन्मताह! से, बाट तकिते तकिते दाँत खिशोटि देब। से गीठ्ठ बान्हि लियऽ। ओना बाबा रामदेव अवतरित भेलाह अछि घोघिवलाक घोघि फोड़इ लेल, खेलहा के बोकरबइ हेतु। तहिया तँ भूलचूक सँ आँखि मे अमेरिकन लेंस एवं हृदयमे अमेरिकन स्टेंट लगबावय पड़ल। कपालभाथी सँ बाहर ने फेका जाएत तकर भय छले। मुदा हुनका कोन जे पोलीस्टर चाउर, लेमिनेटेड भट्ठा कि दस दिन मे जन्मौल एक हाथक गेन्हारी कि सूइया देलहा सजमनि कदीमा अनरनेब खाइ छी। फुलकोबीक नामे सुनि गैस कि भरोड़ दियऽ लगैत अछि!
सबटा देखि रहल छी। बुझि रहल छी! अकानियो रहल छी। टॉंट, जाड़नि सन पजड़ैत। तथापि ने कुहड़नए आने उत्ताप। एक मिशिया चिनगी उड़ि पड़ला सँ लोक केँ लहरऽ लगैत छैक। काँच जाड़नियो कानि के नोर बहबऽ लगैत अछि। धू धू धुधुऐतो शीतलताक बोध भऽ रहल अछि हमरा! कारण जीवन मे एहि सँ उत्कट ताप छलैक डाह मारब, इर्ष्या, पश्चाताप, क्रोध, अहं मे समावेशी नीति आरक्षण सँ भिन्ने अपमान बोध। प्रोन्नतियो मे। आब बबा वले फौदारी नहि। अपने मे लड़ि कटि मरि जाउ। पाटलीपुत्रो अपने कहाँ ठठला! आर्यावर्त्त के डूबबैत अपनहुँ स्वाहा। गर्त्तमे कर्त्ता।
मैथिलीयों के साठि वर्षे दयाक भीख! संत महात्मा ब्रह्मचारी कालमे। बाबा वले होइते तँ कहिया ने भेटल रहिते ई। पुनः एकटंगा देने रहूआ अपने मोने गज्जैत रहू। चारि गोटा। चानन ठोपवला। फोल्डिंग शिष सूत्र वला। मिथिला सासुर वला 108 श्री श्री भगवान राम माँ मैथिली के ततेक सधलथिन जे विष्ठो देखि मिथिलावासी कहए लगलाह राम राम! आब कहए पड़त-त्यज गोविन्दम् त्यज गोविन्दम्। मात्र माँ शक्तिक शरणम् मैथिली शरणम्।
मनुज प्रेम सूत्र सँ बीनल मात्र केँ कथा कहैत छथि। महाकवि लोकनि तहिया जँ रति क्रीड़ाक श्रम जलक बदला जँ श्रमिकक श्रमजल जँ परखने रहि तथि तँ आइ श्रम जल धारी पीछड़लाहा श्रमजीवी मैथिली सँ दूरस्थ नहि भऽ सबसँ बेसी संख्या मे समाजक आगाँ रहितथि। भगवान रामकेँ सीता माँ सँ प्रेम आकि काट? से रामकथा कहैत अछि। वएहकाट कि विधान-निर्णय प्रेमक प्रतीक, प्रेमक परिभाषा। राधा विरहक नोर प्रेमक प्रथम दृष्टांत। तें एहन विषाद सँ पृथक संसारो, निस्सन प्रेम थिक। जे पढ़ल हुये। जे पढ़े मे नीक लागए। जे एकोरत्ती उत्तम संदेश हो। प्रज्वलित शिखो मध्य हार्दिकता सँ अर्पित हो। सब तँ छाया सहित भस्म होइतहि छथि। सबहक छाया भास्कर संग साँझ होइत-होइत भरि राति लेल निपत्ता भऽ जाइछ तथापि हम यथावत छी। लहकैतहु भस्म नहि भेलहुँ अछि। भगवतीक दया माया सँ हमर छाया सेहो अद्यावधि अहर्निश सङ छथि जे गीता सेहो थिकीह एवं प्रेमवश गीतू अर्थात् एहि प्रेम कथाक राधा!
जाउ सभ अपन-अपन नीन्न गबै लेल! शेष अगिला जनम मे! शुभ कलियुग!

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...