Thursday, September 30, 2010

'विदेह' ६७ म अंक ०१ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३४ अंक ६७)- Part I


'विदेह' म अंक ०१ अक्टूबर २०१० (वर्ष ३ मास ३ अंक ६)NEPAL       INDIA
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य






२.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- चारिटा लघुकथा, ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी, दुर्गानन्‍द मंडल- कि‍सना मुट्ठी, कपि‍लेश्‍वर राउत- कलि‍युगक नि‍र्णए, धीरेन्‍द्र कुमार- राम-कथाक समापन, राजदेव मंडल- दूटा लघुकथा, बेचन ठाकुर- दूटा लघुकथा, राम प्रवेश मंडल- बुरबक, भारत भुषण झा- प्रेम, मानेश्वर मनुज- पाँचटा लघुकथा, उमेश मंडलक दूटा लघुकथा, गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी, डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ, प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.,कुमार मनोज कश्यप- पाँचटा लघुकथा, विनीत उत्पल- श्री गुरूवै नम:, डॉ . धनाकर  ठाकुर-हमरा एकर एक बायोडाटा चाही, आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा, सतीश चन्द्र झा-नोकरी, किशन कारीग़र- मूरही-कचरी, गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा



 

 

३. पद्य






३..१. रवि भूषण पाठक- कि भेलए एकरा ? २.इन्द्रभूषण कुमार- सहास


३.७.राजेश मोहन झा-केहेन खेल

  

४. मिथिला कला-संगीत-१.श्वेता झा चौधरी-साधुबाबा २.ज्योति सुनीत चौधरीश्वेता झा (सिंगापुर)

 

. बालानां कृते-डॉ. शेफालिका  वर्मा- साबरमती आश्रम

 

 


. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 

. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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 १. संपादकीय

विदेहक लघुकथा विशेषांक (६७म अंकक मादेँ) ...अतिथि सम्पादक- मुन्नाजी
कतेक दशकक उकस-पाकस एवं स्वतंत्र विधाक उहाफोहक बीच एक बेर फेरसँ “विहनि कथा”- जे लघुकथाक नामे चर्चित अछि- केँ मैथिलीमे स्वतंत्र विधा हेतु समेटि स्थिर करबाक अथक प्रयास कएल जा रहल अछि। अखन धरि भेल काजकेँ सेहो शिरोधार्य करै छी। ओहि डेगकेँ आगाँ बढ़बैत मोकाम धरि पहुँचबाक एकटा ठोस डेग हुअए अही आशामे कुल एक सए दू गोटेसँ दूरभाषिक सम्पर्क साधि विहनि कथाक मादेँ विभिन्न विषए-बौस्तु संकलित कऽ सोझाँ अनबाक एकटा प्रयास अछि।

“विहनि कथा” विहनि अर्थात् बीआ। हम एकरा हिन्दीक “लघुकथा” शब्दसँ फराक मैथिलीक स्वतंत्र नामेँ आगू बढ़ेबाक प्रयास १९९५ ई. मे मैथिली मासिक “विचार” (सहयात्री प्रकाशन, लोहना, मधुबनी) द्वारा केने रही। ई अंग्रेजीक शॉर्ट-स्टोरीसँ इतर एकटा बीज-कथा (विहनि कथा) अछि। जाहिमे कथाक छोट गातमे सम्पूर्णता पाओल जाइत अछि। लघुकथा हिन्दी शब्देँ प्रचलित अछि। गएर हिन्दी भाषाक सभ भाषाक लघुकथाकेँ ओहि भाषा नामेँ स्वतंत्र नाम देल गेल अछि, तँ मैथिलीमे किएक नै? यथा उड़ियामे क्षुद्रकथा (खुद्र कथा), पंजाबीमे “मिन्नी कथा”, बांग्लामे “एक मिनिटेर कथा”, मलयालममे “निमिषा”। तहिना मैथिलीमे “विहनि कथा” नामेँ लघुकथाकेँ आगाँ बढ़ाओल जाए। विहनि कथा मादेँ वरिष्ठ कथा/ लघुकथाकार श्री “राज”क मत छनि- जेना एकटा छोटछीन बीआमे गाछक सम्पूर्णता निहित अछि, तहिना लघुकथा अपने-आपमे कोनो कथाक सम्पूर्णताकेँ समेटने अछि।”

विहनि कथा मादेँ मध्यम पीढ़ी (यानि सातम-आठम दशकमे प्रवेश करऽबला पीढ़ीक) काजे ई बेसी जगजियार भेल। मुदा मोकाम नै पाबि सकल। हमरा जनतबे ई सभ किछु लोकक एकटा समूहमे एकरा बान्हि आगू बढ़ेलनि आ ओतबे धरि समेटि कऽ राखि लेलनि। तँ एकर प्रारम्भिक सद्गतिक पछाति एकर दुर्गतियो ओही पीढ़ीक रचनाकारक मध्य देखाइए। ओ मध्यम पीढ़ी जे कथा साहित्यमे नवसंचार अनलक आब सुस्ता गेल अछि। लगैए ओ सभ आब अपन कएल परिश्रमक पारिश्रमिक यानी पुरस्कार ग्रहण मात्रक सोद्देश्ये सक्रिय भेल बुझाइत अछि। लघुकथाक दुर्गति अए पीढ़ीक द्वारा भेल तकर एकटा सुन्दर उदाहरण छथि श्री अमरनाथजी (सम्प्रति- सदस्य, परामर्शदात्री समिति, साहित्य अकादमी) जे लघुकथा लिखब छठम दशकमे शुरू केलनि आ सातम दशकमे अपन लघुकथा संग्रह- “क्षणिका” (१९७५ई.) लऽ उपस्थिति दर्ज करौलनि, जे हमरा जनतबे मैथिलीक पहिल लघुकथा संग्रह थिक। एखनो दूरभाषिक सम्पर्के ओ ओही दिनक ऊर्जावान रूपेँ विदेहकेँ अपन टटका पाँच गोट लघुकथा उपलब्ध करौलनि जखन कि मध्यम पीढ़ीक मोटा-मोटी अनुपस्थिति ई देखार करैए जे ओ सभ थाकि कऽ आब सुस्ता रहल छथि। तथैव नव-मध्यम-पुरान पीढ़ीक समन्वये ऐ अंकमे ढेर रास नव रचना आएल अछि, तँ पेटारमे किछु पहिनेसँ प्रकाशित रचना साभार देल गेल अछि।
 
विहनि कथा मादेँ प्रारम्भेसँ हमर रुचि एकर विभिन्न क्रिया-कलापे यथा पहिल लघुकथा गोष्ठीक आयोजन (संयोजकद्वय मुन्नाजी आ मलयनाथ मण्डन) १९९५ एवं कएकटा लघुकथा विशेषांक (पत्रिका सभक)मे सहयोगी रहलौं। एहि निमित्त श्री गजेन्द्र ठाकुरजीक सोझाँ प्रस्ताव राखलहुँ- प्रस्तावकेँ ओ सहृदए अनुमोदन तँ करबे केलनि जे हमरोसँ एक डेग आगाँ बढ़ि तन-मनसँ आ अपन विज्ञ मानसिकताकेँ प्रदर्शित करैत अहाँ सभक सोझाँ एहि अंककेँ अनलनि, ताहि हेतु हुनकर हार्दिक आभार। श्री अनमोल झा आ स्त्येन्द्र कुमार झाक सेहो भरपूर सहयोग भेटल, अइ द्वय सहयोगीकेँ हार्दिक धन्यवाद।

ऐ यज्ञमे जे सहयोगी छथि सभसँ हमर आग्रह जे ऐ आहुतिक पछाति सुति नै रहथि। अपन विहनि कथा रचना माध्यमे निरन्तरता बनौने  मैथिली विहनि कथा भंडारमे श्रीवृद्धि करैत रहथि। एहि समस्तस् आयोजनक नीक-बेजाएक प्रतिक्रियाक आशामे...।

विशेष: स्थान-समयाभावक कारण एहि अंकमे सम्मिलित नै भेल लघुकथा सामग्री अगिला अंक (विदेहक ६८म अंक)मे देल जाएत।

अहींक
मुन्नाजी

बाल-किशोर विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल आ लघुकथा अंकक बाद विदेहक १५ नवम्बर २०१० अंक बाल-किशोर विशेषांक रहत। एहि लेल लेखक गद्य-पद्य (टंकित रचना), जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, १३ नवम्बर २०१० धरि ई-मेलसँ ठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

विशेष: विदेह आर्काइवक आधारपर बाल चित्रकथा आ कॉमिक्स महिला वर्गमे विशेष लोकप्रिय भेल अछि। महिलावर्ग द्वारा कीनब ओहि पोथीक बच्चा सभक हाथमे जएबाक सूचक अछि। हमरा सभक सफलता अहीमे अछि जे ई बाल-साहित्य
टारगेट ऑडियेन्सलग पहुँचल अछि। यएह स्थिति आन पोथी सभक संग सेहो अछि।

विदेह आर्काइवक आधारपर प्रकाशित मैथिली पोथी एहि सभ ठाम उपलब्ध अछि:

पटना: १.श्री शिव कुमार ठाकुर: ०९३३४३११४५६

२.श्री शरदिन्दु चौधरी: ०९३३४१०२३०५

राँची: श्री सियाराम झा सरस: ०९९३१३४६३३४

भागलपुर: श्री केष्कर ठाकुर: ०९४३०४५७२०४

जमशेदपुर: १.श्री शिव कुमार झा: ०९२०४०५८४०३

२.श्री अशोक अविचल: ०९००६०५६३२४

कोलकाता: श्री रामलोचन ठाकुर: ०९४३३३०३७१६

सहरसा: श्री आशीष झा: ०९८३५४७८८५८

दरभंगा: श्री भीमनाथ झा: ०९४३०८२७९३६

समस्तीपुर: श्री रमाकान्त राय रमा: ०९४३०४४१७०६

सुपौल:श्री आशीष चमन:०७६५४३४४२२७

झंझारपुर: श्री आनन्द कुमार झा: ०९९३९०४१८८१

निर्मली: श्री उमेश मंडल: ०९९३१६५४७४२

जनकपुर: श्री राजेन्द्र कुशवाहा: ००९७७४१५२१७३७

जयनगर: श्री कमलकान्त झा: ०९९३४०९८८४४

दिल्ली: १.श्री मुकेश कर्ण: ०९०१५४५३६३७

मधुबनी: १.श्री सतीश चन्द्र झा:०९७०८७१५५३०

२.मिश्रा मैगजीन सेन्टर (प्रो. श्री अमरेन्द्र कुमार मिश्र)
, शंकर चौक, मधुबनी ०९७०९४०३१८८

किछु आर स्थल शीघ्र...


(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०५ देशक १
,५३७ ठामसँ ४९,५५२ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,६६,५०४ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)
 

 

 

गजेन्द्र ठाकुर

२. गद्य

२. गद्य






२.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- चारिटा लघुकथा, ज्योति सुनीत चौधरी- नबका पीढ़ी, दुर्गानन्‍द मंडल- कि‍सना मुट्ठी, कपि‍लेश्‍वर राउत- कलि‍युगक नि‍र्णए, धीरेन्‍द्र कुमार- राम-कथाक समापन, राजदेव मंडल- दूटा लघुकथा, बेचन ठाकुर- दूटा लघुकथा, राम प्रवेश मंडल- बुरबक, भारत भुषण झा- प्रेम, मानेश्वर मनुज- पाँचटा लघुकथा, उमेश मंडलक दूटा लघुकथा, गंगेश गुंजन- लाट साहेबक किरानी, डॉ. शेफालिका वर्मा- आनक बड़ाइ, प्रेमचन्द्र पंकज- क्रमश:.,कुमार मनोज कश्यप- पाँचटा लघुकथा, विनीत उत्पल- श्री गुरूवै नम:, डॉ . धनाकर  ठाकुर-हमरा एकर एक बायोडाटा चाही, आशीष अनचिन्हारक दूटा लघुकथा, सतीश चन्द्र झा-नोकरी, किशन कारीग़र- मूरही-कचरी, गजेन्द्र ठाकुरक चारिटा लघुकथा



 


शम्भु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।सम्‍पादक



यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन
संकलनकर्ता: डॉ. शंभु कुमार सिंह
         मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराण (5म शताब्दी)क मिथिलामहात्म्य खंड मे वर्णित अछि जकर अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा एहि प्रकारेँ कएने छथि:
गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा
      पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा
      कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा बागमती कृतसारा
      मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यासारा।
         बृहदविष्णुपुराण मे मिथिलाक बारह गोट नामक उल्लेख भेटैत अछि:
मिथिला तीरभुक्तिश्च वैदेहीनैमिकाननम।
ज्ञानशीलं कृपापीठं स्वर्णलांगलपद्धतिः।।
जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मषा।
रामानन्दकरी विश्वभाविनी नित्यमंगला।।
         मिथिलाक आदि शासक विदेहक नामपर मिथिलाक नाम विदेह पड़ल।
        तिरहुत नामक उल्लेख सर्वप्रथम पुरूषोत्तमदेवक त्रिकाण्डकोश (12म शताब्दी) मे भेल अछि।
         विदेह राज्यकुलक मिथिला पर शासनक समय 3000 ई.पू. सँ 600 ई.पू. धरि अनुमानित अछि।
         मिथिलामे पञ्जी व्यवस्थाक सम्पादन कर्णाटवंशीय नरपति हरिसिंहदेवक द्वारा प्रारंभ भेल।
         सप्तरत्नाकरक रचयिता छलाह चण्डेश्वर ठाकुर।
         मिथिलाक प्रथम कर्णाटवंशीय शासक छलाह नान्यदेव (1097 ई.)।
         खण्डवला राजकुलक स्थापना म.म. महेश ठाकुर द्वारा 1557 मे भेल।
         मिथिला पर ओइनवार राज्यवंशक शासन चौदहम शताब्दीक मध्यमे आरंभ भेल।
         मिथिलामे भस्मसँ अंकित त्रिपुण्ड शिवभक्तिक,लम्बाकार श्रीखंडक टीका विष्णुभक्ति एवं सिन्दूरक ठोप शाक्त भावनाक प्रतीक मानल जाइत अछि।
         मिथिलाक्षरक विकास तान्त्रिक यन्त्रसँ मान्य अछि। ई मानल जाइत अछि जे तिरहुताक्षरक आरंभ जाहि मंगल चिह्न आँजीसँ होइत अछि से तान्त्रिक कुण्डलनीक बोधक थिक।
         मिथिलामे  विवाहक अवसर पर गाओल जायबला जोग तन्त्रसँ सम्बद्ध मानल गेल अछि।
         मिथिलाक धार्मिक जीवनक मुख्यधारा शिव ओ शक्तिमूलक थिक।
         मैथिलीय रागरागिनीक प्राचीनतम उल्लेख सिद्ध लोकनिक चर्यापद मे उपलब्ध होइत अछि।
         कर्णाटनरपति म. नान्यदेव (1097 ई.पू.) मिथिलामे अपन राज्य स्थापित करबाक पश्चात् सरस्वती हृदयालंकार नामक संगीतग्रंथ लिखल जाहिमे सर्वप्रथम ओ मैथिलीय रागरागिनीक उल्लेख क्रमबद्ध रीतिएँ कएल।
         मैथिलीय संगीतक सक्रिय गतिविधि ओ विकास-प्रसारक दृष्टिसँ म. हरिसिंहदेव (1296-1326)क राज्यकाल विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि।
        तिरहुति श्रृंगाररसक मधुरगीत थिक, जाहिमे नायक-नायिकाक संयोग-वियोगक रागात्मक वर्णन होइत अछि।
        बटगवनीमे सखी सभक संग समागम-गृहमे पतिसँ अभिसारक हेतु जाइत नायिकाक वर्णन होइत अछि।
        गोआलरीक विषयवस्तु होइत अछि गोपी सभक संग कृष्णक नोंक-झोंक एवं केलिकौतुक।
        रासमे गोपी सभक संग कृष्णक रासलीलाक वर्णन होइत अछि।
         रासक सर्वप्रथम रचयिता छथि साहेबरामदास
         मिथिलाक लोकवाणी हेतु मैथिली शब्दक प्रयोग सर्वप्रथम कोलब्रुक 1801 ई. मे कएल, परन्तु एहि नामकेँ प्रसिद्ध करबाक श्रेय मैथिली भाषासाहित्यक आदि उन्नायक ग्रियर्सन महोदयकेँ छन्हि।
         कालानुसारेँ मूल भारोपीय भाषाक समय 2500 ई.पू. मानल जाइत अछि।
         प्राचीन भारतीय आर्यभाषाक इतिहास 1200 ई.पू. सँ मानल जाइत अछि।
         बौद्धधर्मक सुप्रसिद्ध ग्रंथ ललितविस्तारमे वैदेहीलिपिक उल्लेख अछि जकरा मैथिली लिपिक प्राचीनतम स्वरूप कहल जा सकैत अछि।
         कोनहुँ युगमे शिष्ट ओ परिनिष्ठित साहित्यसँ भिन्न जे रचना होहत अछि से ओहि युगक लोक-साहित्य कहबैत अछि।
         दीर्घ आख्यान पर आधारित गेयात्मक कथा लोकगाथा कहल जाइत अछि।
         मैथिलीक किछु प्रमुख लोकगाथा काव्य थिकलोरिकाइन, सलहेस, अनंगकुसुमा, दुलरादयाल, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, रईया रणपाल आदि।
        वर्णरत्नाकर निर्विवाद रूपसँ मैथिली साहित्यक प्रथम उपलब्ध गद्य ग्रंथ थिक।
         विद्यापतिक पुरूषपरीक्षा’, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि परंपराक संस्कृत नीतिकथा थिक।
         विद्यापतिक कीर्तिलता अवहट्टक गद्यपद्यमय ग्रंथ थिक।
        गोरक्षविजय विद्यापतिक संस्कृत नाटक थिक, जाहिमे मैथिली पद सेहो प्रयुक्त भेल अछि।
        विशुद्ध विद्यापति पदावली विद्यापतिसँ कम सँ कम एक शताब्दीक पश्चातक संकलन थिक।
         1879 ई.मे दरभंगा राज हाई स्कूलक स्थापना भेल छल।
         1966 ई. मे मैथिली भारतक प्रमुख साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत भेल।
         मैथिली अकादमीक स्थापना 1976 ई. मे भेल।
         नाटकमे आंगिक, वाचिक, आहार्य, तथा सात्विक चारू प्रकारक अभिनय आवश्यक होइत छैक।
        अंकियानाटक आदि रचयिता छलाह शंकरदेव (1449-1569)।
         मिथिलामे कीर्तनिञानाचक परिपाटीक आरंभ नवद्वीपक कीर्तनमंडलीक प्रभावसँ भेल 17म शताब्दीक आदिमे।

(स्रोत: मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश’)

१.मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प २. देवशंकर नवीन- लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व ३. पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि

मैथिली लघुकथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प
 
मुन्नाजी:अपनेकेँ सर्वप्रथम बाल साहित्यपर अकादेमी पुरस्कारक लेल बधाइ। अहाँ जहिया लघुकथा लेखन प्रारम्भ केलहुँ मैथिली लघुकथा कतऽ छलै, अहाँक लघुकथा लेखन दिस कोना प्रवृत्ति जागल।
तारानन्द वियोगी:हम जहिया लघुकथा लिखब शुरू केने रही, एक विधाक रूपमे मैथिली लघुकथाक कोनो मोजर नै रहैक। ई बात जरूर छल जे छोट-छोट कथा सभकेँ लघुकथा मानि कऽ “मिथिला मिहिर”क विशेषांक सेहो बहार भ गेल छल। अनियतकालीन पत्रिका सभमे छोट-छोट कथा सभ यदा-कदा प्रकाशित होइत रहैत छल। मुदा एकर सभक औकाति “बोझ परहक आँटी” सँ बेसी किछु नै छल। पत्रिका सभ, “मिथिला मिहिर” सेहो, एहि कोटिक रचनाकेँ खाली बचल जगहकेँ भरबाक लेल “फीलर”क रूपमे उपयोग करै छल।
कथाकेँ अंग्रेजीमे शॉर्ट-स्टोरी कहल जाइ छै। तकर शब्दानुवाद “लघुकथा” मैथिलीक विद्वान लोकनि, आलोचक लोकनिमे प्रचलित छल। आचार्य रमानाथ झा शॉर्ट-स्टोरीकेँ लघुकथा की कहि देलनि जे मैथिलीमे भेड़ियाधसान परिपाटी चलि पड़ल। ओहुनो भारतीय कथा-साहित्यक तुलनामे मैथिली कथाकेँ जँ देखबै तँ पाएब जे आकारक दृष्टिमे मैथिलीक कथा छोट होइत अछि। आचार्य लोकनिक मतेँ यएह भेल लघुकथा। तखन आइ जाहि साहित्यकेँ अहाँ लघुकथा कहैत छिऐक तकरा लेल मैथिली लगमे कोनो स्पेस नै छलै। ने साहित्यमे, ने विद्वान लोकनिक मगजमे।
विभिन्न देशी-विदेशी लघुकथा सभकेँ यत्र-तत्र पढ़ैत-गुनैत हमरा कथा आ लघुकथाक पार्थक्यक अवगति भेल। हम देखलौं जे एहि दुनू रचना विधामे ने मात्र आकारमे, अपितु उत्स, स्वभाव आ प्रभावमे सेहो एक दोसरासँ सर्वथा भिन्न अछि। मैथिलीक भंडार दिस ताकलहुँ तँ देखल जे अनेक वरेण्य साहित्यकार जानैत-अनजानैत एहि क्षेत्रमे किछु सर्जनात्मक काज कऽ गेल छथि। हमरा सभसँ पहिने ई जरूरी लागल जे लघुकथा विधाक संरचना, स्वरूप आ स्वभावपर किछु बात स्पष्ट करी। एहि सन्दर्भमे हम कएकटा लेख लिखलहुँ। स्वयं हम मूलतः एक सृजनात्मक लेखक छी, तेँ अपनहुँ लघुकथा लिखऽ लगलहुँ। ताहि समय (१९८३-८५) मे हम “कोसी-कुसुम” पत्रिकाक संग जुड़ल रही। बातकेँ स्पष्ट आ जगजिआर करबाक लेल हम “कुसुम”क एक विशेषांक लघुकथापर सम्पादित कएल। बादमे “हालचाल”क संग जुड़लहुँ, तँ ई क्रम आर आगू बढ़ल।

मुन्नाजी:लघुकथाक स्वभाव की अछि? ओहि सन्दर्भमे मैथिली लघुकथा कतऽ देखाइए? कथाकार-कवि लोकनि लघुकथा रचना आन्दोलनक प्रारम्भमे जुड़लाह मुदा समयान्तरे हुनकर ऐ सँ दूर होइत गेनाइ की प्रदर्शित करैत अछि?
तारानन्द वियोगी:लघुकथा आत्यन्तिक रूपमे एक “प्रो-एक्टिव” विधा थिक। ओहुनो अहाँ देखबै जे, जे रचना जतेक सरल आ संप्रेषणीय होइत अछि, ओकरा पाछू लेखककेँ ओतबे बेसी परिश्रम करऽ पड़ैत छैक। लघुकथाक तँ एतेक “सेन्सिटिव” मिजाज होइत छैक जे एक वाक्य जँ अहाँ फालतू लिखि गेलहुँ तँ ओ दूरि भऽ जाइत अछि। एतेक परिश्रम के करत, जँ करत तँ ताहिमे निरन्तरता कोना बनौने राखि सकत? एखनो अहाँ देखिते छिऐक जे एक सुव्यवस्थित विधाक रूपमे लघुकथाकेँ मैथिलीमे प्रतिष्ठा नै भेटि सकलैक अछि। फल अछि जे लोक दोसर-दोसर विधामे, जे प्रतिष्ठित अछि आ जाहिसँ ओकरा सहज रूपेँ स्वीकृति भेटि सकैक, ताहिमे कलम अजमबैत छथि। यएह मुख्य कारण भेल जे लेखक लोकनि लघुकथा-लेखनमे निरन्तरता नै बनौने राखि सकलाह। लघुकथापर केन्द्रित एक पत्रिका जँ मैथिलीमे हो तँ एहि स्थितिकेँ पार कएल जा सकैत अछि।
हमर अप्पन स्थिति अछि जे चहुँ दिस हमरा काजे-काज देखा पड़ैत अछि, अपन सक्क भरि तकरा सभकेँ सम्हारबाक, स्थिति स्पष्ट करबाक, जतबा जे प्रतिभा अछि तदनुरूप एक मानदंड गढ़बाक काजमे लागल रहैत छी। अहाँ सभ आगू बढ़ब तँ निश्चिते हमरा संग लागल पाएब। ओहुनो, हमर सोच अछि जे “जो पीछी आ रहे उन्हीं का, मैं आगे का जय-जयकार”।

मुन्नाजी:२०म सदीक अन्तमे अहाँ सभ (प्रदीप बिहारी सेहो) मैथिली लघुकथाक संग्रह आनि अपन निश्सन उपस्थिति दर्ज केलहुँ, मुदा कथा आलोचक द्वारा एकर निङ्गेश बुझि टारि देल गेल, एकर की प्रमुख कारण छल?
तारानन्द वियोगी:देखू मुन्नाजी, हमरा सभक पीढ़ी बहुत संघर्ष कऽ कऽ आगू बढ़ल अछि। पुरातनपंथी लोकनि सेहो हमरा सभक विरुद्ध आ कम्यूनिस्टकेँ सेहो हमरा सभसँ दुश्मनी। साहित्यमे नवाचार दुनूकेँ समान रूपेँ नापसिन्द। एहना स्थितिमे किनकासँ हम मोजर मांगब आ के हमरा मोजर देताह? मैथिली आलोचना बहुतो तरहेँ अनेक सीमासँ घेराएल रहल अछि। एहि कारणेँ बहुतो लोक एकरा अविकसित धरि कहैत छथि। एहि सीमा सभक अतिक्रमण आब शुरू भेल अछि। हमहूँ ठोड़े काज “कर्मधारय”मे आ आनो ठाम केलहुँ अछि। हमरा पीढ़ीमे प्रदीप बिहारी लघुकथा लिखलनि, देवशंकर नवीन, विभूति आनन्द लिखलनि। शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, रमेश लिखलनि। हिनका सभक रचनाकेँ आइ पढ़ब तँ अहाँकेँ आक्रोश हएत जे ताहि दिनमे किएक ने एकरा बूझल-गुनल गेलै? खएर, जे भेल से भेल। आइ आरो सघनता-गम्भीरताक संग काज करबाक बेगरता छैक। अहाँ सभ आब उल्लेखनीय काज करब तँ अवश्ये मोजर हएत। बदलल परिस्थितिक अहसास अहूँ सभकेँ जरूरे होइत हएत।

मुन्नाजी:२१म सदीक प्रारम्भमे मध्यम पीढ़ीक रचनाकार द्वारा ठाढ़ कएल आधारकेँ आगू करैत नव पीढ़ी एकरा जगजियार कऽ रहल छथि। अहाँ एकर वर्तमान दशा आ आगूक दिशा मादे की कहब?
तारानन्द वियोगी:लघुकथाक क्षेत्रमे गम्भीरताक संग काज करएबला लोकक एखनहुँ अभाव छैक, से हमरा प्रतीत होइत अछि। किनकहुँ एक रचना जँ सुन्दर देखैत छियनि तँ लगले दोसर रचना औसतसँ नीचाँक देखा पड़ि जाइत अछि। एना किएक होइत छैक? स्पष्ट अछि जे बोध आ श्रमक मानक ओ लोकनि बनौने नै राखि पाबि रहल छथि। दोसर बात जे हमरा जरूरी लगैत अछि- भने बत्तीसे पेजक किएक ने हो- प्रत्येक रचनाकारक एक संग्रह जरूर एबाक चाही। कोनो उत्साही लोक एहि दिस सचेष्ट होथि तँ लघुकथापर एक लेखन-कार्यशालाक आयोजन कएल जाए। तात्पर्य जे सांस्थानिक उत्साहक संग एहि दिशामे काज करबाक बेगरता छैक।

मुन्नाजी:मैथिलीये लघुकथाक समकालीन पंजाबीक “मिन्नी कथा”, ओड़ियाक “क्षुद्र कथा”, तमिलक “निमिषा”, मलयालमक “क्विन्तेर” राष्ट्रीय स्तरपर स्थापित होइत देखाइए मुदा मैथिली एहि पगपर अन्हराएल सन? एकर पाछाँ की कारण अछि, वा कमी अछि?  
तारानन्द वियोगी:मैथिलीमे मानक काजक अभाव नै छै, आ ने भाषामे वा भाषाकर्मी लोकनिमे क्षमताक अभाव छै। सांस्थानिक रूपसँ थोड़बे दिन काज कऽ कऽ देखियौ ने, भारतीय साहित्यक उपवनमे मैथिली लघुकथाक फूल सेहो तेहने भकरार लागत जेना पंजाबी, उड़िया वा मलयालमक।

मुन्नाजी:जहिना अहाँ सभकेँ (अहाँ आ बिहाईजी केँ) उपेक्षित रखबाक प्रयास भेल, तहिना आइयो कथालोचक द्वारा नवका पीढ़ीक ऊर्जावान रचनाकार वा लघुकथाक प्रति समर्पित रचनाकारक कोनो नोटिस नै लेल जा रहल अछि। एहिमे कोनो कुटीचालि अछि वा आर किछु?
तारानन्द वियोगी:एहि प्रश्नक उत्तरमे हम दूटा बात कहब। पहिल तँ ई कहब जे के लेत अहाँक नोटिस? ककरा मोजर देने अहाँ मोजरबला लोक हएब? एतेक विवेकी आ क्रान्तिदर्शी लोक अहाँकेँ के देखाइत छथि? हम तँ साँच-साँच कहै छी मुन्नाजी जे हमरा एहन लोक क्यो नै देखाइत छथि। पहिने गुलामीक समय रहै तँ महाराज दरभंगाक मोजर देने राताराती लोक मोजरबला भऽ जाइ छला। आब ई भिन्न बात छै जे एहि भ्रममे महाराजक विवेकसम्पन्नता जिम्मेवार होइ छल आकि कोनो आन स्वार्थ?
साहित्य अपन स्वभावेसँ क्रान्तिकारी होइत अछि। जँ ओ वास्तवमे एक सही साहित्य हो। एहेन साहित्य किछु लेबाक लेल नहि अपितु सदैव देबाक लेल लिखल जाइत अछि।
दोसर बात हम ई कहब जे अहाँ मोजर वा नोटिसक ख्याल केने बिना काज करू। कोनो सार्थक रचना जँ कलमसँ बहराए तकर संतोषकेँ सेलिब्रेट करू जे “जइ धरतीक अन्न-तीमन खेलिऐ तँ ओकरा लेल काजो केलियै”। ओना ईहो कहि दी जे हमरा सभक लेखनारम्भ कालमे जतेक कुहेस आ जाली पसरल रहै, ताहिमे आब बहुत परिवर्तन भेलैए। आलोचनोक परिदृश्य बदललैए आ पाठकक व्याप्ति सेहो बढ़लैए। इन्टरनेटक तँ एहिमे कमाल केने अछि।
 
मुन्नाजी:वर्तमानमे रचनाकार सबहक मैथिली लघुकथाक प्रति रुझानक बादो मैथिलीक विभिन्न समिति-संस्थाक प्रतिनिधि सबहक एकरा प्रति विरोध की दर्शाबैए? मैथिली लघुकथाकेँ आर समृद्ध करबा लेल आर की सभ काज कएल जाए? मैथिली लघुकथाक भविष्य की देखैत छी? एकरा स्थापित करबा लेल कोनो विशेष रुखि?

तारानन्द वियोगी:लघुकथाक भविष्य हम बहुत नीक देखै छी। मैथिली लघुकथाक सेहो। अहाँ पुछब जे तकर कारण? कारण ई नै जे लोक आब बड्ड व्यस्त भऽ गेलैए तेँ छोट रचना बेसी पठनीय साबित भऽ सकत। वास्तविकता तँ ई अछि जे एखनो दुनियाँ भरिमे सभसँ बेसी उपन्यासे विधाक रचना पढ़ल जा रहल अछि।
लघुकथाक भविष्य वस्तुतः एकर स्वभावक कारणेँ उज्जवल छैक। एहिमे निहित व्यंग्य आ मार्मिकता आजुक सन्दर्भमे अति प्रासंगिक अछि। आजुक लोकक संवेदना क्षमता जाहि हिसाबे भोथ भेल अछि, एक सही लघुकथाक ओज ओकर ओंघी उतारि सकैत अछि।
देवशंकर नवीन
लघुकथा लेखनमे अवरोधक तत्व

लघुकथा साहित्य-पदार्थक एहन परमाणु अछि, जाहिमे ओकर सभटा भौतिक रासायनिक गुण उपस्थितहैत छै, परमाण्विक स्थितिमे ओकर रासायनिक प्रभाव तीक्ष्णतर भऽ जाइत छै। लघुकथा जादूक एहन औँठी अछि जे पाठकक मानस-पटलसँ टक्कर लैत देरी ओकर निश्चेष्ट मानसिकताकेँ क्रियाशील कऽ दैत अछि, भोथर सम्वेदनाकेँ सक्रिय बना दैत अछि। लघुकथा चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, कथानक सन पूर्णाहारक बदलामे विटामिनक गोली अछि, जे सम्पूर्ण ऊर्जासँ युक्त होइत अछि।
वास्तविकतामे शब्द स्वयं महत्वपूर्ण नै होइत अछि, महत्वपूर्ण अछि ओकर प्रयोग-प्रक्रिया। प्रयोगक आधारपर शब्द अपन अर्थ-ग्रहण करैत अछि। लघुकथा मूल रूपसँ व्यंग्य ध्वनित करैत अछि। अस्तु एकर वाक्यमे शब्दक प्रतीकात्मक प्रयोग विशिष्ट अस्मिता रखैत अछि। एहि अर्थमे एहिमे शब्द-विधान अहम् भऽ जाइत अछि, मुदा तकर कोनो मानक सीमा नै छै। रचनाकारक शब्द-विधाने एकर मानक सीमा अछि। ताहि द्वारे हम कहि सकै छी जे लघुकथा, कथाक अपेक्षा कवितासँ बेसी लग अछि। आकारमे लघु भेलाक बादो एकर व्यंजना विराट होइत अछि।
गानल-गूथल शब्दमे जीवनक सभटा विद्रूपताक एहन प्रस्तुति लघुकथा अछि जकर रंग शीसापर सेहो जमल बिना नै रहि सकैत अछि। व्याकरण जौँ भाषा आ साहित्यक आचार-संहिता अछि, तँ लघुकथाक आचार-संहिता खाली शब्दअछि। शब्दक सहयोगसँ रचल जीवनक विद्रूपताक प्रतीक चित्र, सएह लघुकथा अछि।
लघुकथामे मूल रूपसँ कथ्यशब्दक बड़ महत्ता होइत अछि। एकर संहितामे भाषा-विधान लेल कोनो विशेष स्थान सुरक्षित नै छै।   
शास्त्र-पुराणादिमे एकर उत्स स्पष्ट देखाइत अछि मुदा तकर बादो लघुकथाक वर्तमान तेवर, विशुद्ध रूपसँ आधुनिक सभ्यता-संस्कृति आ बदलैत साहित्यिक प्रतिमानक प्रतिफल अछि। ओना तँ स्रोत ताकी तँ विष्णु शर्मा विरचित पंचतन्त्र वा फेर गुणाढ्यक बड्डकहा आकि आर पाछू जाइ तँ वेदमे वर्णित उपदेशपरक उपकथामे एकर सूत्र बड्ड सरलतासँ भेटैत अछि। काव्य-विषयक प्राचीनतम विधानमे एकरा लेल अलगसँ कोनो स्थान नै राखल गेल छल। ताहि कारणसँ ओहि सभ पारम्पारिक काव्य निकषपर एकर परीक्षण नै भऽ सकैत अछि, एकरा लेल नव समीक्षा शास्त्रक निर्माण अपेक्षित अछि।
लघुकथा-लेखन एकटा खतरनाक वृत्ति अछि। सतर्कता गेल आ दुर्घटना भेलक फार्मूला एहिपर पूर्णतः लागू होइत अछि। दुर्घटना माने असफलता आकि उत्थरपना। एकर बाद संयोजनमे सेहो पर्याप्त कलात्मकताक आवश्यकता होइत अछि। एहि कलात्मकताक कमजोरीसँ एकर प्रभावोत्पादकता चल जाइत अछि आ फेर लघुकथा अपन मूल उद्देश्यसँ भटकि जाइत अछि।
लघुकथा-लेखनकेँ बहुत रास लोक द्वारा सिनेमामे आओल फैशनक रूपमे अपनाओल गेल अछि। औकाति होअए वा नै, जे ई युगक फैशन भऽ गेल अछि से लोक हास्य-कणिका लिखि कऽ सेहो ओकरा लघुकथा कहि दै छथि। आ से एहि अत्याधुनिक मुदा खतरनापूर्ण विधा लेल बड्ड मोश्किलक गप अछि। एकरासँ बचबाक बड्ड जरूरति अछि। लिखबाक कला नै होअए तँ ई काज नै करबाक चाही। नकलची लेखकसँ लघुकथाकेँ भयंकर नोकसान ई भेल जे ढेर रास लोक आइ हास्य-कणिका आ लुघकथामे अन्तर नै कऽ पबैत छथि। एत्ते धरि जे बहुत रास पाठक सेहो एहने सन मनःस्थिति बना लेने छथि, से लघुकथाक स्वर किछु रूपमे भटकि-सन गेल अछि। तैयो बहुत-रास नीक-नीक लघुकथा आबि रहल अछि। साओनक बेंग सन टर्रा कऽ बिलाइत लोकक संख्या कोनो विधामे कखनो कम नै रहल, से जौँ लघुकथा-लेखनमे सेहो एहने भऽ रहल अछि तँ कोनो आश्चर्य नै। नीक लघुकथाक पाठकीयता आ सम्प्रेषणीयता समएक संग गहींर होइत जाएत।
साहित्यक कोनो अंशक मान्यता आ स्थापना ओकर प्रकाशनसमीक्षापर निर्भर अछि। लघुकथाक प्रकाशन तँ क्रमसँ खूब भऽ रहल अछि, मुदा एहिपर आलोचनाक साहित्यक अत्यन्त अभाव अछि। ओना तँ किछु साहित्यिक ठेकेदार एहिपर आलोचनाक कऽ अत्याचार सेहो केने छथि। एहन आलोचना लघुकथाक विस्तार लेल स्वास्थ्यकर नै अछि।
मिला-जुला कऽ लघुकथाक सम्भावना, स्वरूप आ विस्तारसँ आश्वस्त भेल जा सकैत अछि। ई विधा क्रमसँ जड़ि धेने जा रहल अछि। बेंग सभक आ शौकिया आलोचकक संग एकर उपेक्षा सेहो आस्ते-आस्ते मेटाइत जाएत। निश्चयेन एहिपर नीक-नीक आलोचना सेहो लिखल जाएत। लघुकथा लेखन बीजगणितक हिसाब नै अछि जे हल कएल एकटा उदाहरण देखि कऽ दोसर सवाल बनि जाएत।
पेटार-खलील जिब्रान, राजमोहन झा, सुभाष चन्द्र यादव, लिली रे, रामलोचन ठाकुर, परमेश्वर कापड़ि
खलील जिब्रान
गोल्डन बेल्ट (अनुवाद-मुन्नाजी)
सालमिस नगर दिस जाइत दू गोटेक संग भऽ गेलौं।दुपहरिया धरि ओ धारक कछेरमे पहुँचि गेल जाहिपर कोनो पुल नै छलै। आब ओकरा लग दूटा विकल्प छल- हेलि कऽ धार टपि जाए वा दोसर कोनो रस्ता ताकि लिअए।
हेलिये कऽ पार भऽ जाइ छी।”, ओ एक दोसरासँ कहलक। धारक पेट बेसी चौरगर तँ अछि नै।ओइमे सँ एक गोटे जे नीक तैराक छल बीच धारमे जा भसियाइ लागल। दोसर गोटे जकरा हेलबाक पूर्ण अभ्यास नै छलै, ओ आरामसँ हेलैत दोसर कात पहुँचि गेल। ओतऽ पहुँचलाक पछाति ओ पुनः धारमे कूदि हाथ-पएर चलबैत अपन संगीकेँ पार आनि लेलक।
तोँ तँ कहै छलेँ जे तोरा हेलबाक अभ्यास नै छौ, तहन तोँ एतेक असानीसँ कोना धार पार कऽ गेलँ? ”, पहिल व्यक्ति पुछलक।
मित्र।”, दोसर व्यक्ति बाजल, “हमरा डाँरमे बान्हल ई बेल्ट बान्हल देखै छीही, ई सोनाक बनल छैक, जकरा हम साल भरि मिहनत कऽ अपन कनियाँ आ बच्चा लेल कमेने छलौं। तेँ ई पहिरने असानीसँ धार पार कऽ गेलौं। हेलबा काल अपन पत्नी आ बच्चाकेँ अपना मोनमे याद कऽ रहल छलौं।

राजमोहन झा

चलह
हम दुनू गोटे एके ठामसँ एके गन्तव्य लेल संगहि निकललहुँ। रिक्शापर दुनू गोटेक सामान लदायल आ दुनू गोटे दुनू दिससँ बैसि रहलहुँ। रिक्शावलाकेँ कहलिऐ- चलह।
पानि खूब बरिसल रहै आ एखनो बुन्नाबुन्नी एकदम्मसँ बन्द नहि भेल रहै। आकाश कने फाटल रहै एक दिससँ, मुदा कखन फेर तड़तड़ा देत से कहल नहि जा सकैत छल, कारण जे कारी घटाटोप माथपर कयनहि छल।
सैह भेल। आगाँमे प्लास्टिकक ओहार लगौने, सड़कपर लागल पानिकेँ दूर धरि चिरैत, हिचकोला खाइत रिक्शा बढ़ैत जा रहल छल कि बड़का-बड़का बुन्न पड़ऽ लागल। ता पाछाँसँ भड़भड़ करैत एक टा खाली टेम्पो समानान्तर आयल। ओ ओकरा रोकबौलनि, जल्दीसँ अपन एक-दू टा सामान हाथमे लेलनि; आ शेष अपन सामान रिक्शावलाकेँ आनऽ कहैत टेम्पोमे जा बैसलाह। रिक्शावला हुनक बाकी सामान दऽ अयलनि। ओ हुर्र भऽ गेलाह।
हमर रिक्शावला घुरि कऽ आयल। कहलिऐ- चलह।
सुभाष चन्द्र यादव
पति-पत्नी सम्वाद
(
एहि कथामे पहिल सम्वाद पति आ दोसर पत्नीक अछि।)
(
एहि नाटकमे पहिल पात्र पति आ दोसर पात्र पत्नी अछि।)

यै, सुनै छिऐ?
हमरा कान छै जे सुनबै?

कखैन सँ हाक दाइत रही!
की छिऐ?

चाह बना रहल छी?
बैठल लोग केँ एहिना चाह सुझै छै!

करै की छी?
सुतल छिऐ!

तमसाएल छी की ?
नै, हम किए तमसाएब!

तखन एना किए बजै छी?
अहाँ बहीर छी की?

से किए?
आबाज नै जाइए?

कोन आबाज?
सिल्ला के?

अरे अहाँ किछु पीस रहल छी?
तब ने बैठल-बैठल गीरब?

की पीस रहल छी?
मसल्ला, अओर की पीसब? अपन कप्पार!

धुर, अहूँ कथी-कथीमे लागल रहै छी। चाह बनाएब से नै?
अहीं कोन उनटन करै छी! हरदम कहब; चाह बनबै छी? चाह बनबै छी? हम एहिसँ अकच्छ भऽ गेल छी।

तखन छोड़ू।
छोड़ू किए? बना दै छी। लेकिन पीसल होएत तब ने!
बेस, जे अहाँक इच्छा!
लिली रे

वी.आइ.पी.
वृक्ष संरक्षण पुरस्कारलेल मनीकुमारक नाम लिखल गेलै तँ ककरो आपत्ति नै भेलै। एतेक देरीसँ मान्यता भेटलै, तकरे खेद छलै सभकेँ।
नीकुमारक माए वन विभागमे अस्थाइ कर्मी छलि। मनीकुमार नेन्नेसँ निराइ-रोपाइमे माएक हाथ बँटबैत छल- निःशुल्क। माए अनेक गाछ-लत्तीसँ ओकरा भाए बहिनक सम्बन्ध जोड़ि दै।
नियम-कानून बदललै तँ माएकेँ स्थाइ नोकरी देबाक प्रस्ताव भेलै। माए नोकरी नै लेलकै। बदलामे अपन बेटाकेँ नोकरी देबाक सिफारिश केलकै। सिफारिश मंजूर भऽ गेलै।

काज नहियो रहै तँ माए जंगलमे आबि बेटाक हाथ बँटबै- निःशुल्क। बेटा अपन रोपल गाछ-लत्तीसँ पोता-पोतीक सम्बन्ध जोड़ि दै। लोककेँ बड़का अनमना होइ।

वार्षिक समारोहमे पुरस्कार भेटबाक छलै। प्रतिवर्ष ई समारोह खूब धूमधामसँ मनाओल जाइ। नृत्य-संगीत-नाटक, जलपानसँ समारोह सम्पन्न होइ। बाहरसँ विशिष्ट व्यक्तिलोकनि आबथि। गाछ-पात चित्रित निमन्त्रण-पत्र पाबिकऽ।

मनीकुमार इतः स्तुतः करैत साहेबक आफिसमे पहुँचल। नमस्कार कऽ विनम्र स्वरमे बाजल- सर! एकटा कार्ड हमहूँ पठा सकैत छी? ”
अहाँ तँ विभागक लोक छी। अहाँक पूरा परिवार आएत। खाएत-पीएत। अहाँकेँ तँ बुझले अछि।
हुजूर! मुदा हम एकटा वी.आइ.पी. कार्ड चाहैत छी।
ककरालए? ”
एकटा किशोरकेँ वी.आइ.पी. कुर्सीपर बैसाकऽ देखबऽ चाहैत छी। नाम छिऐ- जीवन तामाङ्ग। गांधी स्कूलमे आठमी क्लासमे पढ़ैत अछि। ओकर बाप संतोष तामाङ्ग, पानदाङ्ग चाह-बगानमे काज करैत अछि। ”
की नाम कहलुं? ”
जीवन तामाङ्ग। क्लास एइट, गांधी स्कूल।
निश्चय, कोनो खास कारण अछि? ”
हुजूर! ई बच्चा आन्हर छल। पाँच कि छओ वर्षक छल जखन हमर माए मुइलि। माएक आँखि जीवनकेँ भेटलै।


रामलोचन ठाकुर
गिरगिट
बैशाखक ठहाठही दुपहरियामे अपन आ अपन गर्भवती स्त्रीक आहारक जोगार कए जखन श्रीमान गिरगिट अपन डेरा घुरलाह तँ देखैत छथि जे पत्नी घोघना लटकओने बैसल छथिन। बेर-बेर एकर कारण पुछला उत्तर पत्नीक मओन भंग नहि भेलनि तँ ओ खिसिया कऽ बजलाह- एहिना घोघना फुलओने रहब तँ लोक कि अगरजानी जनैए जे अहाँक मनक बात बूझि लेत।
पत्नी ओहिना विधुआएल भनभनेलीह- लोक बुझिए कऽ की करत? जँ सरिपहुँ लोककेँ हमर कचोटक चिन्ता छै तँ सत्त करओ।
-एक सत्त, दोसर सत्त, तेसर सत्त, अहाँक कहल जे नहि करए से असी कुंड नर्कमे पड़ए। आबो तँ बाजब? गिरगिट आत्मसमर्पण कऽ देलनि।
पत्नी खखास करैत बजलथिन- चलू हमरा लोकनि अइखन एइ देशसँ चलि चली।
गिरगिट छगुन्तामे पड़ि गेलाह। “आखिर कून एहन बात भेलैक जे हमरा लोकनिकेँ अपन जन्मभूमि छोड़ि चलि जेबाक चाही?
पत्नीक पारा गर्म भऽ गेलनि। “कनियो जे ज्ञानक छूति रहैत तँ ई पूछए नहि पड़ैत। आखिर कुनू जाति जन्तुक अपन परिचय रहैत छैक, विशेषता रहैत छैक। जँ सैह ने बचतै तँ लोककेँ लाजे मरि नहि जा हेतैक?
-अहाँक कहबाक अर्थ हमरा नहि बुझैमे आएल। हमरा लोकनि अपन रंग बदलाक लेल विख्यात छी। परिवेशक अनुसार रंग बदलबाक पटुता हमरा लोकनिमे जन्मजात होइए...
-मुदा ताहूमे हम सभ पाछू पड़ि गेलहुँ...पत्नी बीचेसँ लोकि लेलथिन।
-अहाँ कि नेता लोकनिक बात कऽ रहल छी?- गिरगिटक प्रश्न भेल।
-तँ आर ककर? आइ-कालिक नेता लोकनिक बराबरी करबाक दक्षता कि हमरा लोकनिमे रहि गेलए?
गिरगिटकेँ बड़ जोरसँ हँसी लागि गेलनि। ओ ठहाका दैत बजलाह- तेँ ने कहैत छैक स्त्रीगणक बुद्धि। हमरा लोकनिकेँ तँ एहिमे प्रसन्नता हेबाक चाही। कहबीयो छैक जे दस टके नहि नितराइ, दस समाङे नितराइ।

भारत रत्न
शासय्यापर पड़ल-पड़ल भीष्म पितामह सोचि रहल छलाह जे अन्यायी कौरवक संग दय ओ नीक नहि केलनि। आगामी इतिहास हुनका कहियो क्षमा नहि करत। अन्तमे ओ फेर हथियार उठेबाक आ पाण्डव दिससँ लड़बाक घोषणा केलनि। ई गप्प जखन दुर्योधनक कान तक गेलै तँ पहिने तँ ओ घबड़ाएल किन्तु पश्चात् शकुनीक संग परामर्श कए दोसर दिन हस्तिनापुरमे विराट सभाक आयोजन केलक। एहि सभामे ओ भीष्म पितामहकेँ एगो पैघ प्रशस्तिक संग “भारत रत्न”क उपाधिसँ अलंकृत केलक। कहल जाइछ जे तकर बाद जे भीष्म पितामह मओन व्रत धारण केलनि से जा जीलाह मुँह नहि खोललनि।

परमेश्वर कापड़ि
सतबरती
आभा आ मनुक प्रेम जगजाहिर छल। दहेज दुनुक विवाहमे भदवा बनि गेल। आभाक बाबू ओकर विवाह सुमनसँ कऽ निफिकिर भऽ गेलाह।
-अनकोसँ प्रेम चलै छल तैयो सतवरतीए छी आभा?
-तँ की। प्रेम लोक मनसँ करैछ। हम कोनो देह समर्पण केलिऐ।
-आब जँ मौका भेटौ?
आभा मौला जाइछ- धुर छोड़ बिसरल राग।...कहाँ के बात कहाँ बिला गेल।
-तँ ठीके बिसरि गेलही?
-ईस्स! शूल कहु बिसरइ।...ओहो हियाक कीयामे बन्द।
अमरनाथ- पाँचटा लघुकथा, चण्डेश्वर खाँ- चारिटा लघुकथा, रघुनाथ मुखिया-पाँचटा लघुकथा, ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा, शिव कुमार झा “टिल्लू”- फूसि नै बाजू, मिथिलेश कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, सत्येन्द्र कुमार झा- पाँचटा लघुकथा, नवनीत कुमार झा-गाम आबह,कौशल- कुमार- तीनटा लघुकथा, अनमोल झा-पाँचटा लघुकथा, मुन्नाजी-चारिटा लघुकथा

अमरनाथ
(अमरनाथजीक लघुकथा संग्रह “क्षणिका” नामसँ १९७५ ई.मे प्रकाशित छन्हि।)
पाँचटा लघुकथा
देह
साँझक लुकझुकमे लाल भौजीकेँ घामसँ नहाएल धरफड़ाएल चल अबैत देखलियनि। रुकलहुँ। पुछलियनि- “भौजी अहाँ? ”
की पुछैत छी! मंगल छै से हनुमानजी मन्दिर गेल रही। बुझलिऐ नै, साँझ भऽ गेलै।
हुनका डेराएल देखि कऽ कहलियनि- से ठीके! सुनसान सड़कपर लुटपाट बढ़ि गेल छै।
अपन शरीर दिस देखैत कहलनि- से कोन गहना पहिरने छी? ..कोन रुपैय्या रहैए?... ”
तखन? ”
तखन? अहाँ की बुझबैक!...मौगीक लेल देहे जंजाल छै!

पियास

हे, कने एक ग्लास पानि दिअ।

“घैलामे पानि ठरि गेल हेतै। चुपचाप सुति रहू। देखू तँ, पएर उघारे अछि। कम्बल ओढ़ा दैत छी। बाहरमे पाला खसै छै। मन मारिकऽ सुति रहू।
पचासी वर्षक भेलहुँ। अहाँ एना कहियो उपदेश देने छलहुँ! वयस बढ़ल तँ पत्नीक धर्म बिसरि गेलहुँ।
आब लिअ, निशाभाग रातिमे धर्म बुझबऽ लगलाह। उकासी होइये। ठरल पानि पीयब तँ हफनी बढ़ि जाएत। सुति रहू।... कहू तँ, जाड़मे कतहु लोककेँ एते पियास लगलैए।
आब हिनका के बुझौतनि! एकटा पियासे तँ छै जे नै मेटाइ छै।

स्वीच ऑफ

मोबाइलमे इजोत भेलै। कने पहिने घनघनेलै। अथवा दुनू एके संगे भेलै। देखलनि तँ पत्नीक एस.एम.एस. छलनि-
मोबाइलक अदला-बदली भऽ गेल। अहाँक मोबाइल हमरा लगमे अछि। ओहिमे रंग-बिरंगी महिला सभक फोटो अछि।...अहाँ हमरा एते दिन अन्हारमे रखने छलहुँ। ओहिमे स्वीटी अग्रवालक सेहो फोटो छै, जकर आँखि नचैत रहै छै। हम बैसल रहैवाली महिला नै छी जे नेप चुबबैत सहि लेब। से बूझि लिअ!
पहिने नस तनेलनि। क्रोधमे हिनकर नाक फड़कऽ लगलनि। मोबाइलक बटनकेँ दबलनि। जवाब टाइप करऽ लगलाह-
अहाँ तँ छोटसन बातपर धरती-आसमान एक कऽ देलिऐ। एहन सन क्रम जे अहाँक सिउँथमे सिनुर देलहुँ तँ सौंसे अहींक इच्छासँ ली।... जे जे मौगी नीक लगैत गेल, फोटो लैत गेलिऐ। तकर कैफियत की? ”..पठा देलथिन एस.एम.एस.।
तत्काले पत्नीक जवाब अएलनि, “अहाँ तँ तिलकेँ ताड़ बना देलिऐक। मन सुगबुगएल तँ पुछबि नै करू। ओना वएह लड़ैए जकर पएरमे ताकति रहैत छै! से हमरामे जहिया होएत, जवाब देब।
एस.एम.एस. दू बेर पढ़लनि आ मोबाइलक स्वीच ऑफ कऽ लेलनि।

गिरगिट
एसकरे रहथि। बाजार जाइले बरामदापर अएलाह तँ जेना लगलनि जे भटआबाज भेलैक। पहिने बाँहिपर गिरगिट खसलनि आ फेर नीचाँमे खसि पड़लैक। मरि गेलैक? नै, संचार भेलैक। ससरि कऽ देबालपर चल गेलैक। कटलकनि तँ ने! फेर भेलनि जे कटने रहितनि तँ बिसबिसाइत रहितनि। तथापि गिरगिट खसै छै तँ किछु होइ छै!...किछु होइ छैक? मरबाक पूर्व सूचना सेहो भऽ सकै छै। मन पाड़ऽ लगलाह, पंडित बाबा रटौने रहथिन- पतति यदि पल्ली...पतति यदि पल्ली...आगाँ मोन नै पड़लनि।...ओह, ई सभ पुरना बात भेलै। पएरपर कि कतहि खसै छै तँ धनक क्षति होइ छै। पीठपर कि माथपर तँ लोक मरि जाइये...ओह, फेर वएह पुरना बात! मोन पड़लनि गिरगिट खसै छलै तँ लोक गंगाजल छिटैत छल। आब लिअ, ई गंगाजल कतऽ सँ अनताह? देबालपर एक-दूटा गिरगिट रहै। ई चिन्हबाक प्रयास करऽ लगलाह जे कोन गिरगिट खसल रहनि। गिरगिटकेँ देखैत-देखैत लगलनि जे हिनकर मनमे गिरगिट ससरि रहल छनि।

फोंफ

 गै धोछिया खोल केबाड़ी! ...खोल, खोलै छैँ कि तोड़ि दियौ केबाड़ी।”, कहैत-कहैत लुढ़कि गेल। उठल। केबाड़ी खुजलैक। एकर मुँह भभकैत रहै। बाजल- ला जे देबेँ दू मुट्ठी अन्न, से दे!...जल्दी कर, नै तँ ठोंठी दाबि देबै।
कतेक झाड़-फूक भेलैक, टोना-टोटका करौलकैक मुदा एकर पीनाइ नै छुटलै। घरवालीक मन अपरतिभ भऽ गेलै। कहलकैक- जे कमाइ छैँ से उड़ा लै छैँ! रोटी कतऽ सँ जुटतैक? ”
गौ छुछनरिया, ला जएह छौह सएह ला। एक धारी माटिये ला, सएह भकसि लेबै।
भीतर गेलि। दालि गरम कएलक। छिपलीमे रोटी आ बाटीमे दालि लऽ कऽ आएलि। बाजलि- जा, आब की करबै? मरदबा भुइयेँमे पड़ले-पड़ल फोंफ काटऽ लागल।

चण्डेश्वर खाँ
चारिटा लघुकथा
कोटा
राजेशजी! अहाँ तँ दलित कोटामे अबैत छी, तेँ अहाँक सीट सुरक्षित अछि। मोहनजी, अहाँ तँ महादलितमे सँ अबैत छी तेँ अहाँक सीट महासुरक्षित अछि। अहाँकेँ के रोकत। विभाजी, पचास प्रतिशतमे अहाँ बाजी मारिए लेब मुदा हमर प्रथम श्रेणीबला डिगरीक की हेतैक? हम तँ ने डोनेशनमे सकबै आ ने रिजर्वेशनमे अएबै।

चेकिङ
बजार दिससँ आबि थाना चौक होइत, ट्रेजरी दिस जाइत रही। थाना चौकपर भीड़ देखि किछु कालक लेल हहमूँ ठमकि गेलहुँ।

ओना थाना चौकपर बरोबरि भीड़ होइत रहैत छैक, कहियो काल कऽ किछु अपराधी पकड़ि कऽ आनल जाइत अछि तँ किछु कालक लेल भीड़ होइत अछि। कहियो काल कऽ हड़तालीक गिरफ्तारीक लेल भीड़ होइत अछि।

मुदा आइ से सभ नै छल। बहुत रास मोटर साइकिल थाना परिसरमे पकड़ा कऽ राखल छलैक आ जकर सभ कागच-पता ठीक-ठाक तकरा छोड़ि देल जाइत रहैक।

थानाक गेटपर दर्जनसँ बेसी सैपक जवान आ किछु बिहार पुलिस। ओहि बाट धऽ कऽ  जतेक मोटर साइकिल चलैत छल, सभकेँ रोकैत छल आ कागच-पता देखल जाइत रहैक। कागज-पता देखबा लेल फराकसँ पुलिस हाकिम सभ छलाह।

ओना किछु लोककेँ कागच-पता ठीक-ठाक रहला बादो किछु कालक लेल बिलमा लैत रहैक, बादमे ओकरा सभकेँ कोना छोड़ल जाइत रहैक से नै कहब।

एकटा बीस-बाइस वर्षक जुआन छौँड़ाक मोटरसाइकिलक चेकिङ गेटपर भऽ गेल रहैक, ओकर सभ कागच-पत्तर ठीक-ठाक रहैक, तैयो ओकरा भीतर लऽ गेलैक। ओ छौँड़ा गरजऽ लागल, जखन हमर सभ कागच-पत्तर ठीक अछि तखन ई किएक। ओकरा जोरसँ बजलापर ओहिमेसँ एकटा हाकिम तरा-तरि पाँच थापर लगा देलकैक आ थानाक हाजतमे ठेलि देलकैक। ओ जहाँ-तहाँ फोन कएलक।

ता हम ट्रेजरी दिस बिदा भऽ गेल रही। आधा घंटाक बाद घुरलापर देखल जे थाना चौकपर साफ सुन्न-साम भऽ गेल छल।

कछमछी

कर्मचारी सभक महासंघक आह्वानपर आइ पचास दिनसँ हड़ताल चलि रहल छल।

समझौता होएबाक कोनो नामे नै रहैक। सभ दिन धरना-प्रदर्शन चलैत रहैक।

बेसी दिन हड़ताल रहलासँ कर्मचारी सभ दुबरा गेल छल। बनिया-बेकाल मास दिन धरि तँ कहुना कऽ कऽ उधारी दऽ कऽ सम्हारने रहैक। मुदा आब ओहो सभ थस लऽ लेने रहैक।

कर्मचारी सभ, सभ दिन अखबार आ रेडियो समाचार देखैत आ सुनैत अछि।

मुदा कोनो नीक समाचार नै देखि कछमछा जाइत छल।

मुदा की करत? जँ कियो बीचमे हड़ताल तोड़ि काजपर घुमत तँ ओ कर्मचारी, कर्मचारीक नजरिमे बेइमान कहाओत। मुदा ताहिसँ की, बइमानो कहओलापर तँ दरमाहा नै ने भेटतैक।

से छोटका कर्मचारी सभ कछमछीमे पड़ल अछि। भोलाक पत्नी बेसी दिनसँ दुखिताहि छैक। दवाइ दोकानसँ दवाइ उठौना लैत अछि। मुदा दोकानदारक तीन मासक उधारीक चुकता नै कएने छल। तेँ टाकाक व्यवस्था कऽ कऽ दवाइ अनबा लेल गेल छल।

दोकानदारकेँ पुरजा दऽ दवाइ देबा लेल कहलक। दोकानदार पुरजा उनटा-पुनटा कऽ देखि कहि देलकै- ई दवाइ सभ हमरा दोकानमे नै अछि।
भोला बाजल- एखन हम नगदी लेब।
ई सूनि दोकानदारकेँ कछमछी लागि गेलैक।

बिसवास
हमर पत्नी तीन बरखसँ दुखिताहि छथि, गैस्टीकक रोग छनि। एकपर एक डागदरक इलाज चलल अछि मुदा ठीक नै भऽ रहल छनि।

मुदा एहि बेर एकटा पैघ डागदरसँ देखा रहल छियनि। जाँचे-पड़तालमे हजारसँ बेसी लागि गेल अछि। डागदरकेँ सभ बात पत्नी कानि-कानि कऽ कहने रहथि। डागदर साहेब कहलनि- एहि बेर निरकटेल भऽ कऽ ठीक भऽ जाएत। जेना-जेना हम कहलहुँ तहिना करब।

डागदर साहेबक कहब रहनि- दिनमे कमसँ कम चारि-पाँच बेर थोर-थोर भोजन करब। दवाइ कहियो नै छोड़ब।
डागदरक मोताबिक सभ बात चलि रहल छैक।

मुदा काल्हि रवि छैक। से पत्नी रविक तैयारीमे लागल छलीह।

हम पत्नीकेँ बुझबैत कहलियनि- डागदर साहेबक बात मोन अछि ने, ओ कहलनि- हँ हँ, डागदर साहेबक सभ बात मोने अछि, मुदा रवि कोना छोड़ि दी। बाल बच्चा आ अहाँ छी। डागदर तँ डागदरे होइत छैक। ओ कोनो भगवान नै छथि।


रघुनाथ मुखिया
पाँचटा लघुकथा

इण्डियन
ई अछि नेपालक जनकपुरधाम। विवाह मंडपक फुलवाड़ीमे युक्लिप्टसक गाछ देखि ऋषि वशिष्ठ बजलाह- ई तेजपातक गाछ अछि की?
हम नजरि पड़िते चिन्ह गेलौं आ बजलहुँ- नै-नै भाय, ई तेजपात नै, युक्लिप्टस अछि। एकर पातकेँ मीरकेँ सुंघलासँ विक्स जकाँ गमकैत अछि।
वशिष्ठजी पात तोड़बाक लेल अपन डेग उठौलनि कि नजरि पड़ि गेलनि विष्ठाक चोतपर आ बजलाह- “लगैए एत्तौ इण्डियन आबै छै। नै?

जुलुम

लोकसभा चुनावक प्रचार-प्रसार शुरू भऽ गेल रहै। स्पीकरक गर्दमिशान करैत अबाज “छौंड़ीकेँ देलकौ धक्का मारि”क अबाज सुनिते काजक सूरि टुटि गेलै। गेनमा आ चुल्हाय सदाक कोदारि रुकि गेलै।
गेनमा आड़िपर जा कऽ डाँर सीधा करऽ लागल। चुल्हाय गमछासँ पसेना पोछि तमाकू चुनबैत पुछलकै- अँय रौ गेनमा! जीतै लऽ जौं एक्के थारीमे गाए आ सुगरक मासु खाए पड़ि जाए तँ ओ के सभ खेतै रौ?

गेनमा तमाकूक लेल हाथ पसारैत बाजल- हौ कका! एत्तेटाक दुनियाँमे एहेन एक्केटा जाति होइ छै- “नेताजी।” आ ताहिमे जँ हिसाब करबहक जे ई नेता खेतै की ओ नेता, से तँ जुलुमे ने करबहक।

नियति
कॉमरेड गनेसर कामति भोरे-भोर बलहा बाजारपर एलाह। हुनका संगमे सिंहजी रहनि। दुनू गोटऽ बनारसी पासीक घर धरिक कएक फेरी लगेलक। फेर मन्दिरक आगाँमे ठाढ़ भेल।

आब एकटा करिया चश्माबला भीमकाय कायाधारी मिसरजीकेँ इशारा करैत बाजए लागल- घरो तोरे, पिनसिलो तोरे, लौनो तोरे, बीपैलो तोरे। बढ़मोत्तर तोरे, शिवोत्तर तोरे। आएल-गेल सेहो सभटा तोरे। तब अहीं कहियौ ने। हम गरिबाहा सभ की लेबै- “बापक हुरिया”।

मिसरजी अपन जीहकेँ दाँतसँ कुचैत मुसकिएलाह। अपन डाँड़सँ एकटा कागचक पुड़िया आ आंगुर भरिकऽ चीलम निकालि कॉमरेडक हाथमे थम्हा देलक।

मुँहलगुआ

अँय रौ गणेश! ई हड्डी भरि राति चौबट्टीपर एहिना राखल रहि गेलै। नढ़ियो-कुकुर नै छुलकै। ई कोना भेलै रौ। लागैए जे ई हड्डी कोनो शेरक ठमाएल छै। डरे नढ़िया-कुकूर नै छुलकै, नै?

गणेश मौन भंग करैत बाजल- नै, नै। शेरक ऐंठाएल हड्डी-गुड्डी तँ सभ दिनेसँ नढ़िया-कुकूर चोभैत अइलैए, भाइ साहेब। हमरा बुझने इहो हड्डी कोनो ने कोनो नढ़ियेक राखल छिऐ। तेँ एखन धरि डरे किओ सुंघबो धरि नै केलकैए। कारण जे आब तँ साहेबसँ बेसी मुँहलगुएक डर होइ छै नै।

ग्रानहाउसमे कुकूर

दिसम्बरक अन्त। आइ ४८ डिग्री तापमान होएबाक सम्भावना अछि। कृपया अपन माथपर बरफ लपेटि लेल जाउ। किएक तँ भुस्सामे शीघ्रहि आगि पकड़बाक सम्भावना रहैत छैक। जेना माटिकेँ माटि खाइत अछि, लोहाकेँ लोहा कटैत अछि। माहुरकेँ माहुर, हीराकेँ हीरा आ सोनाकेँ सोना कटैत अछि। तेँ अहाँकेँ कुकूर कटैत अछि।

ऋषि वशिष्ठ- दूटा लघुकथा
प्रमाण-पत्र
बड्ड भारी समारोहक आयोजन कएल गेलै। जिलाक बड़का-बड़का पदाधिकारीक जुटान गाममे भेल छलै। जिलाधिकारी तँ जिलाक नेतागण। भाषण-भूषण खतम भेलै तँ जिला शिक्षा अधीक्षक गामक मुखिया दिस एकटा कागज बढ़बैत बजलाह-“ मुखियाजी अपने एहिपर दस्तखत कऽ दिऔ, अहाँक पंचायत पूर्ण साक्षर भऽ गेल, तकरा लेल ई प्रमाणपत्र अछि।”
मुखियाजी सकुचाइत बजलाह- “मुदा हम तँ औंठा छाप देब, हमरा तँदस्तखत करऽ नहि अबैए?
अधीक्षक एम्हर-ओम्हर तकलनि आ बाजि उठलाह- हौउ, औंठो चलतै! कनेक जल्दी करू।”
मुखियाजी कजरौटामे औंठा रगड़ि कऽ निशान लगौलनि। ओ औंठाकेँ माथक केशमे पोछैत बजलाह- “अहोभाग्य हमर आ हमरा पंचायतक।”
अधीक्षक मंचपर गरजैत घोषणा केलनि-“गर्वक संग घोषित कऽ रहल छी जे अहाँक पंचायत संपूर्ण साक्षर भऽ गेल।”
मुखियाजी खन ओहि प्रमाणपत्र दिस तकैत छथि खन अपन करियाओल औंठा दिस।

मनमौजी
महादेव मंदिरक आगाँ कनैल फूलक गाछतर गँजेरी, भंगेरी आ तरिपिब्बा आपसमे बहस करैत छल।
गँजेरीक कहब छलै जे- “शेर अंडा दैत छैक।”
तरिपिब्बाक कहब छलै जे- “शेर बच्चा दैत छैक।”
बात बढ़ैत गेलै आ बातसँ बतंगर भऽ गेलै। विवाद बढ़िकऽ हाथापाहीक नौबत आबि गेलै।
जखन भंगेरीकेँ दुनूक कटाउझ असहाज भऽ गेलै तँ ओ बाजि उठल- “तोँ दुनू अनेरे लड़ै छह।..हौ एतबो नै बुझै छहक जे शेर जंगलक राजा होइछै, ओकरा लेल कोन छै? जखन मोन हेतै तँ अंडा देतै आ जखन मोन हेतै तँ बच्चा देतै। जखन मोन हेतै तँ शाकाहारी बनतै आ जखन मोन हेतै तँ काँचे माउस चिबेतै।”
तरिपिब्बाकेँ जेना भक्क टुटलैक। ओ बाजि उठल- “जा, से कोना हेतै हौ! बच्चा तँ देतै शेरनी। शेर कोना बच्चा देतै?
भंगेरी बुहुँसैत बाजल- “धुर बतहा, एतबो नै बुझै छही जे ओ भेलै सरकार! आ सरकार कोन!..ओकर अपन मनमौजी छै, जे चाहतै से करतै।”

शिव कुमार झा “टिल्लू”
फूसि नै बाजू
आंगनमे राखल चौकीपर शंकर शान्त बैसल छल। माए आबि कऽ पुछलनु- “की भेल, किए उदास छी”? शंकर कानए लागल- “कृष्णचन्द्र भैया जखन देखैत छथि तँ कहैत छथि जे फूसि नै बाजू”। एना किए कहै छथि? शंकर कथा सुनबए लागल। टोलक किछु नेना क्रिकेट खेलबाक लेल गाछी गेल छल। विकेट नै रहए तेँ कैलाश कक्काक राहड़िक खेतसँ रंजीत किछु राहड़िक मोटगर गाछकेँ उखाड़ि विकेट बनौलक। क्षणहिमे कैलाश कक्का गाछी दऽ कऽ जाइत छलाह। अपन खेतक दशा देखि सभसँ पुछलनि जे राहड़िकेँ के उखाड़लक? केओ नै बाजल। ओहि दिन साँझमे पंचैती बैसाओल गेल। रंजीतकेँ पता छल जे मास्टर साहेब मात्र हमरेटासँ पुछताह। तेँ हमरा धमकी देलक जौँ हमर नाओं कहबेँ तँ मारबौ, ललवाकेँ फँसा दही। हमहूँ डरक मारे ललवाक नाओँ बकि देलहुँ। ओकर बड़का भाए कृष्णचन्द्र भैया ओकरा बड़ मारि मारलनि। जखन ओ सत्यकेँ बुझलन्हि, तखनसँ खिसिआएल रहथि। शंकरक व्यथा सुनि माए अवाक् रहि गेलीह अहाँ बड़ पैघ गलती कएलहुँ। लाला अहाँक प्रिय मित्र छथि, जाउ आ हुनकासँ माफी माँगि लिअ। भविष्यमे एहेन गलती नै करब। जाहि व्यक्तिसँ डर होइत अछि ओकरा संग मित्रता किए करै छी? निर्दिषक आत्मापर चोट नै पहुँचेबाक चाही। प्रण करू जे सदिखन सत्य बाजब, जौँ कतहु समस्या हुअए तँ चुप्प रहि जाएब मुदा झूठ नै बाजब।
माएक प्रेरणासँ शंकर सत्य हरिश्चन्द्र तँ नै भऽ सकल मुदा ओहेन झूठ नै बजैत अछि जाहिसँ ककरो आत्माकेँ दुःख पहुँचए वा सत्य कलंकित हुअए।


मिथिलेश कुमार झा
पाँचटा लघुकथा

कानून
चौबटियाक सिंगल पीअरसँ लाल होइत-होइत एकटा फटफटियाबला जोरसँ बिरेक मारलक आ थम्हैत-थम्हैत ओ रुकबाक निर्धारित उरजा चेन्हकेँ पार कऽ गेल। तखने एक गोट सिपाही अएलै आ जुरमानाक रसीदबला जिल्द बहार करैत ओकरासँ लाइसेंस मँगलकै। फटफटियाबला क्षमा याचना करैत कहलकै जे ओकर गाड़ी बड्ड तीव्र गतिमे छलै आ तैँ जोरसँ बिरेक मारलाक बादो चेन्हसँ आगाँ घुसुकि आयल। ओ फटफटियाकेँ चेन्हक पाछाँ घीचि अनलक। एम्हर ई सिपहिया ओकरासँ जुरमाना लेबऽपर बिर्त। कि ताबतेमे एकटा पुलिसक जीप सेहो ओहि चेन्हकेँ पार कऽ सिंगलपर अटकलै। आ एहि सिपाहीपर फटफटियाबलाक अनुनयक कोनो प्रभाव नै। एकाएक ओ फटफटियाबला ताओमे आबि गेल, बाजल जे पहिने एहि पुलिस-गाड़ीसँ जुरमाना असूलह, तखने हमहूँ देबह। कानून सभक लेल एक्के छै। एतबा सुनितहि ओहि सिपहियाक मूह अपने सनक भऽ गेल छलै।
दर्शन
देवकान्त बाबू दस बर्खपर गाम आयल छलाह बेटाक उपनयन करबाक लेल। ढोल-पिपही, आजन-बाजन आ आर्केस्ट्रा आदिसँ गाम गनगनाइत रहल। तीनू दिन बरबरना भोज, छेना-रसगुल्ला बहि गेल। एहन डील-डलसँ गाँ भरिमे केओ नै कएने छल उपनयन। वाह रे देवकान्त बाबू!
रातिमक परात फूदन बाबा देवकान्त बाबूक प्रशंसा करैत कहलखिन-

“हओ देबू! तोँ तँ सभक कीर्तिकेँ तोपि देलहुन। ...आब हे, कनी अपन भैयापर नजरि दितहुन। बेचारे बड़ लचरि गेल छथि। आखिर सहोदर छहुन।”
“बाबा, हुनका आर कष्ट काटऽ दिअनु। कष्ट हेतनि तखने धियापुता उन्नति करतनि। होबऽ दिअनु कष्ट।”
फूदन बाबा अवाक्, हुनका ई दर्शन कहाँ बुझल छलनि!
झीक
“अँए गे माए, पोखरिभीरावालीक मूह आइ भोरेसँ लटकल देखै छिऐ। की भेलैए?
“गइ हेतै की! आइ कए दिनसँ साँएक फोन नै एलैए ने, तैँ।...गइ हम सुन्दरकान्तक माए छिऐ से किच्छु नै आ एकरा माइले फटै छै। ओ एकोरत्ती गुदानै छै नहिए।...एकटा बेटी भेला छः साल भऽ गेलै आ तकरा बाद जेना कोखिए जरि गेलै। कथीपर गुदान्ता करौ! गइ ओकर तँ वंशे बुरऽपर लागल छै।”
माए बेटीक फदका कनिञा सुनलनि तँ कोंढ़ फाटि गेलनि। घरसँ बहरा सासु-ननदिक मूहमे झीक दैत बजली-
“हे, एम्हर केओ बाँझ नै छै। बेटाकेँ थितगर नोकरी नै छनि तैँ भेल जे एकेटाकेँ यदि मनुक्ख बना सकी तँ सएह बहुत। आ वंश बुरऽक बात करै छथि, यदि मनुक्ख नै भेल तँ बेटोसँ वंश बुरि जाइ छै आ बेटी लछ्मी हुअय तँ आनो गाँमे वंशक ना चलै छै, बुझलखिन! ”

कन्यादानक चिन्ता
-गोड़ लगै छी पीसा!
-खूब नीके रहऽ। की हालचाल छै हौ?
-अहाँ सबहक आशीर्वादसँ सभ ठीक-ठाक छै पीसा।
-धिया-पुता नीके छऽ ने?
-हँ-हँ, सभ दन-दना रहल छै।
-अँए हौ, तोरा चारिटा बेटी छऽ ने?
-हँ पीसा।
-ओह! एकटा कन्यादानमे तँ लोक नमरि जाइ अए आ चारि-चारिटा कन्यादान...! बड़का चिन्ताक विषय छह।
-नै पीसा, हमरा एक्को रत्ती चिन्ता नै ऐ।
-से किएक हौ? छह धयल-उसारल की?
-नै, से तँ नै ऐ।
-तखन चिन्ता कोना नै छह?
-पीसा, चिन्ता तँ करए ओ जे अपना जानसँ फाजिल कथाक इच्छा रखैए। हमरा तँ जतबे ओकाइत अछि ताही हिसाबसँ लड़िका अनबै आ हाथ धरेने जेबै।

महानगर-संस्कृति
स्टेट बैंकक हाकिम राम सरूप यादवक बदली एकटा छोटका नगरसँ एहि महानगरमे भेल छलनि। यादवजी छोटका नगरमे रहि उबिया गेल छलाह- ने मनोरंजनक कोनो तेहन साधन, ने आबाजाहीक सुभितगर व्यवस्था, ने बिजलीक भरोसा, ने बच्चा सभक कैरियर बनेबाक कोनो तेहन सन बाट आदि। आ तैँ एहि महानगरमे बदली होइते यादवजी खूब प्रफुल्लित भेल छलाह। ऐ ठाम सस्तासँ महग धरि एक-पर-एक ततेक मनोरंजक स्थल जे सभटा देखएमे बरख बीत जाए, कत्तौ जेबाक हो तँ बससँ टैक्सी धरिक तेहन सुभितगर साधन जे पाँचो मिनट ठाढ़ नहि होबऽ पड़त, बिजली जेबाक तँ नामे नै, बच्चा सभक कैरियरक मारिते रास विकल्प...। यादवजी गदगद छलाह- महानगर आखिर महानगरे होइ छै!
से, यादवजी एकटा नीक एरियामे आधुनिक सरंजामसँ युक्त अपार्टमेंटक एकटा बेस खुसफैल फ्लैट चारिम महलापर लेलनि किरायापर। तीनिये दिन पहिने डेरा-डंटा लऽ कऽ आएल छलाह। आइ शेष बाँचल वस्ति-जातकेँ घरमे सरिया-सरिया कऽ रखैत छलाह कि कॉलबेल गनगना उठलै। यादवजी अपनहि जा केबाड़ फोललनि तँ दूटा सिपाही ठाढ़। ओइमे सँ एक गोटे हिनकर परिचय पुछलकनि आ आगाँ पुछारीक क्रममे जखन बुझबामे अएलै जे ई तीनिये दिन पहिने एलाहेँ तँ ओ सभ हिनका मुहथरिपरसँ हँटि बगलबला फ्लैटक कॉलबेल टिपलक। यादवजीकेँ सिपाही सभक एबाक प्रयोजन बुझा गेल छलनि। से जिज्ञासावश ओहो ठाढ़े रहलाह। बगलक फ्लैटसँ केबाड़ फोलि एकटा अधवयसू पुरुष आ जनाना बहरेलै। सिपाहीक पुछला उत्तर ओ पुरुष अपन नाँ पी.जायसवाल कहलकै। सिपाही अपन क्रमकेँ आगू बढ़बैत पुछलकै- “...सामनेबला फ्लैटमे चारि दिन पहिने एकटा स्त्रीकेँ डाहि कऽ मारि देल गेल अछि। ताहि मादेँ अहाँ की जनै छी? की झगड़ा-दान होइ छलै? ” जायसवालजी किछु मोन पाड़ैत उतारा देलखिन- “अच्छा! हँऽऽऽ! ककरो जोरसँ चिचिएबाक स्वर तँ अकानने रहिऐ, मुदा हमरा सभकेँ भेल जे केबलपर कोनो हॉरर फिल्म भऽ रहल छै। ओकरा आगिमे डाहल जा रहल छलै!! ”
सिपाही जायसवालसँ आर किछु पुछऽ लगलै आ यादवजी दुख ओ आश्चर्यक मुद्रा लेने अपन फ्लैटमे ढुकि गेलाह। महानगरक करिया रूप सोझाँमे नाचि उठल छलनि। झमान भेल सोफापर थस्स दऽ बैसि गेलाह। माथ जेना घुरऽ लगलनि...की महानगरक असली रूप एहने छै!...ऐ ठामक मनुक्खकेँ खाली अपनेटा सँ मतलब होइ छै!...एकटा पड़ोसीक घरमे एहन जघन्य घटना आ दोसरकेँ जन्तबो नै! ...की समाज आ टोल-पड़ोसक मतलब ऐ ठाँ बदलि जाइ छै! ...की इएह छै महानगरक संस्कृति!!!


सत्येन्द्र कुमार झा
पाँचटा लघुकथा

लेटेस्ट

एकटा इलेक्ट्रॉनिकक नव दोकान। मध्य आय वर्गक एकटा व्यक्ति दोकानमे प्रवेश करैत अछि। कतेक दिनसँ कनी-कनी पाइ जमा कऽ मोबाइल किनबाक हेतु आएल अछि। दोकानदारसँ सभसँ “लेटेस्ट” मोबाइल किनलक। पाइ दऽ कऽ मोबाइल लेने अति उत्साहक संग बिदा भइये रहल छल कि एकटा दोसर ग्राहक दोकानमे प्रवेश करैत अछि। ओ सेहो दोकानदारसँ “लेटेस्ट” मोबाइल देखएबाक फरमाइश करैत अछि। दोकानदार कार्टूनमे सँ एकटा मोबाइल निकालि सोझाँ राखि दैत अछि। पहिल व्यक्ति देखैत अछि- “ई तँ हमरबला मोबाइल नै अछि।” ओ दोकानदारसँ जिज्ञासा करैत अछि। दोकानदार कहैत अछि- “ई सेट एखनहि उतरल अछि...अहाँक किनलाक बाद...। ”
ओ अपन मोबाइल दिस तकैत अछि। ओकरा अपन मोबाइल पुरान सन लगैत छैक। कोनमे राखल “लैण्ड फोन”क चोंगा भभाकऽ हँसऽ लागल छल।

हिस्सक

महानगरमे दू कोठरीक मकान। एकटा कम्पनीमे छोट पदपर कार्यरत। अल्प वेतन।
पति-पत्नीक साझी विचार जे एकटा पेइंग गेस्ट राखि ली तँ आमदनी किछु बढ़त। एकटा महानगरीय बहुरुपियाक, जे अपनाकेँ मल्टीनेशनल कम्पनीक इंजीनियर कहए, पेइंग गेस्ट बनि रहए लागल। आस्ते-आस्ते पति-पत्नी अपन भावी जमाएक रूपमे ओहि बहुरुपियाकेँ देखए लगलाह।
हुनक बेटी ओकर कोठरीमे आबए-जाए लगलीह।
ईकदिन ओ बहुरुपिया कतौ बिला गेल। संगमे ओकर बेटीक सभ गहना-गुड़िया लऽ गेल आ छोड़ि देलक अपन मोचरल बासि ओछाओन।
क्रोध, चिन्ता आ दुःखसँ झमारल पति-पत्नी किछु दिन धरि व्याकुल रहली, फेर अपनाकेँ संयमित करैत अपन नव बसल कॉलोनीमे घोषणा केलन्हि- “हम अपन बेटीक बियाह कोनो इन्जीनियरसँ करब।”

भैयारी
नेताजी केँ भरि पाँज पकड़लक।
“भाइजी...भाइजी...। ”
“हट...के भाइजी?
“अहाँ भाइजी...हमर भाइजी...आर के?  
“हइ...तोरा डर नै होइ छौ हम्मर?
“नै...भाइयोसँ कहूँ भाइ डेराइत छै?
“हम तोहर भाइ?...कहिया के?
“कोनो एक कोखिसँ जन्म नेनहे लोक भाइ बनै छै? एक्के धन्धा कएनिहार सेहो आपसमे भाइये होइ छै...। ”
“चुप...। ”
नेताजीक समक्ष एकटा भिखमंगा ठाढ़ छल।

स्थानान्तरित दोष

नौकरीमे अएलाक बाद विभागीय परीक्षाक तैयारीमे जुटल छला। मुदा परिणाम नीक नै भेलनि। असफल भऽ गेला। घरक सभ सदस्य असफलताक मादे जिज्ञासा कएल तँ कहलनि- “एम.डी.क खास छलै...ओकरा नै होइतै तँ ककरा होइतै?
पुत्रक परीक्षा चलि रहल छल। प्रथम स्थान प्राप्त करबाक मारामारी। मुदा पिता जेना पुत्रोकेँ निराशे हस्तगत भेल- “प्रिन्सिपलक बेटा छै ओ...प्रथम स्थान तँ  सुरक्षिते छै...। ”
बाप-बेटा दुनू गेन्दकेँ दोसरक आंगनमे फेक  निश्चिन्त भऽ गेल छला।
गुण कतौ पछुआरमे ठाढ़ छल।



अप्रासंगिक
आंगनमे दू गोट बालक खेला रहल छल। दुनू माय-बाबू, ओतहि एक कोनमे कुर्सीपर बैसल चाह पीबि रहल छला। एक बालकक हाथमे खिलौनाक पेस्तौल छल।
ओ दोसर बालकपर पेस्तौल तानैत अछि-“तोरा लग जे किछु छौ हमरा दऽ दे, नै तँ पेस्तौलक एक गोलीसँ तोहर खोपड़ि उड़ा देबौ।”
दोसर बालक सहमि जाइत अछि। हड़बड़ाइत उठैछ- “तोरा की चाहियौ? हमरा लग तीन मोबाइल, एक लैपटॉप, एक कम्प्युटर, एक एल.सी.डी. टीवी, फ्रिज, बैंक लॉकरमे बहुते रास सोन आ रुपैआ अछि...आर हँ, हमरा लग हमर डैडी आ मम्मी सेहो अछि।”
पहिल बालक एक्शन दैत पेस्तौल दोसर बालकक कनपट्टीमे सटा दैत अछि आ फेर जोरसँ बजैत अछि- “शटअप...तूँ अपन मम्मी-डैडीकेँ छोड़ि बांकी सभ किछु हम्मर हवाले कऽ दे, नै तँ...। ”
कातमे बैसल पहिल बालकक माए-बाबूक मुखपर भएक रेख स्पष्ट होमए लगैत अछि। हुनका लगैत छन्हि जे ओ बेटाक नजरिमे अखनहिसँ अप्रासंगिक भऽ गेल छथि।


नवनीत कुमार झा
गाम आबह

प्रमोद कोनो जरूरी काजमे लागल छलाह। मूड़ी गोतने लीखि रहल छलाह। भीतरसँ कनियाँ कहलखिन- सुनै छी, गामसँ बाबू फोन केने छलाह।
कागज-पत्रकेँ समेटि ओहिपर पेपरवेट राखि देलनि आ कनियाँसँ पुछलनि- की सभ कहि रहल छलाह।
कनियाँ ठोड़े नाक-भौंह चमकबैत कहलखिन- कहता की, कहलनि जे कनियाँ, बौआकेँ कने गाम एबाक लेल कहबनि।
प्रमोद कने तमसाएल जकाँ होइत भनभनाए लगलाह- ईह, एकटा हमहीं भेटै छियनि बूढ़ाकेँ, चारि बेटामे आर ककरो किछु नै कहथिन। आब एखन तँ हमरा फुर्सति नै अछि जे हम गाम जाएब।
कनियाँ प्रमोदकेँ तमसाएल देखि प्रसंग बदलि देबाक लेल पुछलखिन- अच्छा छोड़ू एहि प्रकरणकेँ, कॉफी पीब, बनाउ की?
कनियाँ बड़ होशियारि छथिन। प्रमोदक उत्तर देबासँ पहिने ओ भनसाघर चलि गेलि आ कॉफी बनाबऽमे लागि गेलि। कॉफीकेँ चुस्कियबैत प्रमोदक केशमे आंगुर चलबैत कनियाँ कहै छथिन- एकटा बात कहू, नै होइए तँ चलि ने जाउ गाम। जहियासँ ई छौंड़ी काज छोड़ि देलकए तहियासँ असगरे सभटा काज करैत-करैत हम अपस्याँत भेल रहै छी। घुरनी जँ तैयार भऽ जाए अएबाक लेल तँ ओकरो लऽ आनब आ नवका मूँग भेल हेतै, सभटा खेती-बाड़ी बाबू देखै छथिन, तखन हमरा सभकेँ चुटकी भरि किछुओ नै भेटैत अछि आ सझिला बौआ- छोटका बौआ सभटा अपने बाँटि-चुटि लै जाइ छथि।
-ऐखन अप्पन बच्चा सबहक कैरियर देखू कि हम ई दियादी-पटेदारी फरियबैत रहू।
प्रमोद ई कहि पुनः अपन काजमे व्यस्त भऽ गेलाह।
प्रमोद गाम नै गेलाह। दू-तीन सप्ताह बीति गेलै। अचानके मंगल दिन साँझमे जटाशंकर भाइ फोन केलखिन-
-प्रमोद, तोहर बाबू नै रहलखुन!
-ऐं! की भेलै, ऐना केना भेलै, अखन तँ थेहगरे छलाह।
-तोरा किछु नै बूझल छउ, विनोद आ कामोद दुनू गोटे पन्द्रह-पन्द्रह दिनक पार बाँटि देने छलखिन। कक्का दुनू बेटा कोतऽ पन्द्रह-पन्द्रह दिन भोजन करै छलखिन। रवि दिन जखन ओ नहा कऽ एलखिन तँ हुनका ई मोन नै रहलनि जे आइ कामोद कोतऽ पार छन्हि। दुआरिपर बैसल कक्काकेँ विनोदक स्त्री कहलखिन जे बाबू आइ हिनकर पार कामोद बौआ ओहिठाम छन्हि, ओतहि जाथु। कक्का के की भेलन्हि की नै ओ कामोदक ओहिठाम नै गेलाह, माहुर खा कऽ हमेशाक लेल सूति रहला। खएर जे भेलै से भेलै, आब तोँ जल्दी गाम आबह, जेठ बेटा छहुन।
कौशल कुमार
तीनटा लघुकथा

दूमुँहा

आइ मिथिलाक लोकक छाती गर्वसँ चौड़ा भऽ रहल छल आ सिया बाबूक चर्चा सुनि कऽ आओर हुनका ऊपर विमर्श करैत अह्लादित छल लोकक हृदए। सिया बाबू चर्चित समाज सेवक आ लोकसेवक छथि, आइसँ दस बरख पहिने हुनका लग किछु नै रहनि मुदा आइ अपना जिला मुख्यालयक अनाबा पटना आ दिल्लीमे अपन कोठी छनि आ बेस जन समर्थन आओर राजनीतिक रुतबा सेहो।
परसू रातिमे एकटा स्थानीय कागतक ठोंगा, झोरा आओर लिफाफ बनबऽबला इकाइसँ ओ सत्रहटा बन्धुआ बाल मजदूरकेँ मुक्त करौलनि, तै लेल मीडिया हुनकर डंका दू दिनसँ पीट रहल अछि। हमहूँ , हुनका अपन समाजसेवाक क्षेत्रमे आदर्श मानि कऽ काज करऽबला, एकटा समाजसेवी छी आओर नारी उत्थानपर एकटा कार्यक्रमक आयोजन कऽ रहल छी। कार्यक्रमक प्रधान अतिथि के बनता एकर विचार संगठनमे कऽकए सिया बाबूकेँ प्रधान अतिथि बनबाक हेतु हुनका कोठीपर आग्रह कऽ आएल छी।
झक्क-झक्क झलकैत कोठीकेँ सुनियोजित सलीकासँ सजाओल अतिथि कक्षमे गहींर नक्काशीदार मूर्ति सभ जकर प्रत्येक गह-गह झलकैत सियाबाबूक धवल व्यक्तित्व जेना प्रदर्शन कऽ रहल हो। हमरा पता लागल, सिया बाबू घरक सफाइ अपने हाथे करै छथि। अइ सभमे हम ओझराएल रही कि सियाबाबू श्वेत दन्तराशिक मधुर मुखरित मुस्कानक संग पधारलनि। हम अपन कार्यक्रमक रूपरेखा बतबैत रहलियनि आ ओ शालीनतासँ सुनैत रहला।
अही मध्य एकटा बच्चा जूसक दूटा गिलासक संग एकटा नक्काशीदार शीसाक जगमे पानि आ एकटा खाली गिलास सेहो एकटा ट्रेमे लऽ कऽ आएल। ओ हमरा सभकेँ जूस लै लेल कहलनि आ अपने पानि ढारि कऽ पीलनि। हम सभ गप्प करिते रही तावत फेर कने कालक बाद वएह बच्चा चुपचाप आएल आ सभ खाली गिलास आ जग ट्रेमे लऽ कऽ चलि गेल। कने कालक बाद झनाक दऽ एकटा अबाज भीतरसँ आओल, लागल जेना किछु शीसाक खसलै। सियाबाबू हमरा सभकेँ आश्वासन दऽ कऽ कने हड़बड़ीमे भीतर चलि गेला। हमहूँ अपना सेक्रेटरीकेँ, जे नेता चिपकू लोक छला, हुनका चलबाक लेल उद्यत केलौं। तावत एकटा जोरक चित्कार कानमे पड़ल जेना ककरो जिब्बह कएल जाइत हो। हमरा रहल नै गेल, बाहर जा कऽ जुत्ता पहिरैक बदला कने भीतर दिस हुल्की देलिऐ तँ सिया बाबूकेँ देखलौं जे ओही बच्चाक दुनू कान पकरने हवामे लटकौने जेना उखाड़ि लेथिन आओर आँखिमे बहशीपन जेना ओ हुनक सभसँ पैघ दुश्मन हो। ई दृश्य हमरा लेल असह्य छल, हम पाछाँ मुड़ि कऽ जल्दीसँ जुत्ता पहीर अतिथि कक्षक बाहर आबि किंकर्तव्यविमूढ़ ठाढ़ रही तावत सियाबाबू अपन ओही मुखरित मुस्कानक संग हाथमे स्मारिकाक लेल अपन पत्र लेने प्रकट भेला। हम सभ बिदा लऽ बिदा भेलहुँ। कोठीसँ बाहर निकलबाक समए वएह बच्चाकेँ देखलौं जे हाथमे झोड़ा लेने सम्भवतः बजार जा रहल छल। चुँकि हमर चालि तीव्र छल तेँ हम सभ ओकरासँ आगाँ  निकलि गेलौं मुदा ओकरा दिस देखलौं तँ ओकरा गालपर छल पाँचो आंगुरक छाप आ गालपर नीपल नोर संगहि कान दुनू लगै छल जेना रक्तरंजित हो, ततेक लाल। हम क्षुब्ध रही, की ईएह दुमुँहा व्यक्तित्व हमर आदर्श अछि?

प्रार्थना आ आस्था

भगवतीक वंदनाचरण भऽ रहल छलनि, लोक सभ पूर्ण उत्साहसँ गाबि रहल छलथि, जिनका श्लोक मोन नै रहनि ओ गाबैक भाभट करैत मुँह चलबैत आ ठोर पटपटाबैत रहथि। अही भीड़मे एकटा चारि-पाँच वर्षक बच्चा सेहो आगाँमे ठाढ़ भेल कल जोड़ने पता नै कखन आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। जखन त्वमेव माता च पिता... हेबऽ लगलै तँ ओहो खूब जोर-जोरसँ संग देलकै फेर ओकर बाद बेचाराकेँ चुप भऽ जाए पड़लै। सभ गबैत वा गाबैक ढोंग करैत मुदा ओ सबहक मुँह तकैत ठाढ़ रहल। कने कालमे वन्दना खत्म भेलै तँ ओ आरती लऽ कऽ आ प्रसाद लऽ कऽ हाथमे रखने रहल आ जखन भीड़ कम होमऽ लगलै तँ भगवतीक मूर्तिक आओर लगमे जा कऽ अ आ सँ लऽ कऽ य र ल व  ज्ञ धरि पढ़ि देलकै आ हाथ महक प्रसाद प्रणाम कऽ कऽ कने खा लेलक आ कने मुट्ठीमे रखने बिदा भेल। ई सभ देखि पूजा-आयोजक-परिवारकेँ एक गोट जे बढ़ि-चढ़ि कऽ स्तोत्र पाठ कऽ रहल छला, बच्चा सँ व्यंग्ये पुछलखिन- ऐं रौ, भुटका त्वमेव माता च पिता...तँ तोँ बड्ड टहंकारमे कहलहीं आ ओकर बाद एसगरमे ई अ आ किए भगवतीकेँ पढ़बऽ लगलहुन?
बच्चा कने डेराइत तोतराइत बाजल- हमरा इस्कूलमे त्वमेव माता...पढ़बै छथिन मास्साब...आ अ आ किए पढ़लही? सज्जन फेर चुटकी लेलखिन। तावत छटैत भीड़ फेरसँ उत्सुकतामे संगठित होमऽ लागल।


ओ तँ अइ लेल जे बच्चा साँस भरैत बाजल- भगवती अपने छ सभसँ नीक कविता बना लेतिन...

लोक ठठा कऽ हँसल मुदा पुछनाहार झेप गेला आ ई प्रसाद ककरा लेल लऽ जाइ छहक?- सज्जनकेँ एखनो उत्सुकता छलनि!
-ओ हमल पिल्लाक माय मलि गेलैए, ओकला खुआ देबै तँ ओ जीब जेतै।- बच्चा बाजल आ ओम्हर दौड़ गेल जेम्हर ओकर पिल्लाक माय पड़ल छलै।
सभ अवाक् ओकरा देखैत रहल।

अप्पन इज्जति

भरल देहक पन्द्रह वर्षक नवयौवना कहियौ वा बच्चा? नवयौवना नीक लगै छै कहैयोमे आ सुनैयोमे, गाड़ी काकरघाटी स्टेशनपर रुकलै तँ हमरा बगलमे सीट खाली भेलै तँ रेलमपेल बोगीमे बैस गेल। जाड़क मास रहै मुदा शीतलहरीमे जैकेट-टोपीक बादो ठण्डा लगैत छल तेँ हाथ छातीपर बन्हने गुड़मुड़ायल बैसल रही। एकटा सीटपर सातगोटे बैसल रही तैयो कोनो असुविधा नै बुझा रहल छल कारण हाथ-पएर पसारैमे भले असुविधा रहै मुदा कने जाड़ तँ कम लगै छल।
जखन ओ श्यामवर्ण नवयौवना गाँती बन्हने बगलमे बैसल तँ जेना करेँट लागल आ देहमे गर्मीक एकटा लहरि दौड़ि गेल। हम जे हाथ छातीपर बन्हने रही से ओकर कठीन  उभारसँ सटि गेल। कने काल हम पूर्ववत रहलौं मुदा जखन लागल ओकरा कोनो आपत्ति नै छै तँ हम्मर हिम्मति बढ़ि गेल आ हम गाँतिक अढ़मे अपन हाथ ओकरा छातीपर फेरऽ लगलौं, तैयो ओ किछु नै बाजल आ पूर्ववत रहल तँ अप्पन हाथ ओकर ब्लाउजमे सन्हिया देलिऐ। समएक संगे हम्मर मोन आ हिम्मति बढ़ैत गेल मुदा अइसँ बेसी किछु सम्भव नै छल तेँ एतबे अति कऽ रहल छलौं तावत गाड़ी उगना हाल्टपर पहुँचि गेलै।
एकटा प्रौढ़ जकाँ व्यक्ति तावत ओइ नवयौवनाक हाथ पकड़ि कऽ उठबऽ लगलखिन तँ ओ उठि गेल, तँ दोसर व्यक्ति जे शाइत कने हुनकर परिचित रहथिन, पुछलखिन- इहे बच्चा छिऐ लछुआक?
ओ प्रौढ़ हँ मे मूड़ी डोला देलखिन आ गेट दिस नवयौवनाकेँ लऽ कऽ ससरऽ लगला भीड़मे। दोसर व्यक्ति रिक्त स्थानपर बैसैत हमरा चिन्हैत टोकलनि- की मास्टर साहेब? कतऽ सँ आबै छी?
आब हमहुँ हुनका चिन्हलौं, ओ पण्डौलक रमेसर रहथि। उमेरक प्रभाव कने जल्दी हुनका लिबा देने रहनि।
हम पुछलियनि- के रहै ओ बच्चा?
आशय छल कहियो फेर मौका भेट सकए तँ!
एखन हम पूर्ण आन्हर भेल छलौं। हमर पोस्टिंग लगेमे सलेमपुर स्कूलमे छल। ओ लक्ष्मणक बेटी छलै, अहींक नानी गामक पुरहितक पोती। ओकरा स्कूलक नवका मास्टर ओकरा संगे कोना ने कोना फुसला कऽ जबर्दस्ती केलकै। तहियासँ मथसुन्न आ बौक छै। किछु नै बुझै छै आ ने बाजै छै। अहाँ सभ सन लोक खानदानी आनक बेटी-पुतहु आ बच्चाकेँ अप्पन इज्जति बुझऽबला लोक आब थोड़े रहलै माटसाब...रमेसर बजैत रहल मुदा हम्मर दिमाग सुन्न भेल जा रहल छल...। एक्केटा शब्द अहाँ सभ आनक बेटी-पुतहुकेँ अप्पन इज्जति बुझै छिऐ...दिमागमे फेर-फेर घुमि रहल छल।


अनमोल झा
पाँचटा लघुकथा

प्रश्न
-सद्दाम हुसैनकेँ किअए मारि देलकै पापा। ओ तँ राष्ट्रपति छलै ने। लोक राष्ट्रपतियोकेँ मारि दै छै?
-नै बेटा, लोक बाघकेँ मारि दै छै, गिद्दरकेँ नै। बाघसँ लोक डेराइये ने, तैँ।

चेतना

-गिरहत पाँच सए रुपैय्याक पाँच सए सूदि कोना भेलै।
-रौ बहिं! जे तोरा बाप-पुरखाकऽ कहियो साहस नै भेलै पुछैक से तूँ पूछै छेँ?
-ओ दिन बिसरि जइयौ गिरहत! छह मासमे एतेक सूदि नै होइत छै। अबै छै दलुआ हम्मर स्कूलसँ तँ करत हिसाब!

पाप
साधु बाबा लग लोकक भीड़ लागल छलै। सभ अपन नम्बरक हिसाबे जे जकरा बाद आएल ताहि क्रममे हुनका सामने जाइत छल। बाद बाकी लोक कातमे बैसल रहैत छल।
जकरा जे दिक्कत, दुःख तकलीफ रहैत छलै से हुनका कहैत छलनि। ओ ककरो फूल, बिभूत, ककरो पढ़ल जल, ककरो यंत्र आदि दैत छलखिन। जकरा हबा-बसात वा तेहेन बात नै रहै छलै आ रोग रहैत छलै तकरा डॉक्टरसँ देखबैक सलाह दऽ बिदा करैत छलखिन। कोनो ठकै-फुसियबैबला बात नै। जकरा हाथ उठा जे दऽ देलखिन ओकर काज होइते टा छलै। खूब जस छलनि साधु बाबाक। जे कियो पूजा लेल फूल, मिठाइ वा सवा रुप्पैय्या, पाँच-दस देलकनि सेहो ठीक नै तँ नै देलकनि सेहो ठीक। कोनो जोर-जबरदस्ती नै छलै ओतए आ तैँ सभ तरहक लोक अपन काजसँ अबैत छल।
ओहि दिन ओहि भीड़ लागल महिला वर्गमे सँ एकटा अपूर्व सुन्दरी महिला बाबाक आगाँमे आबि कल जोड़ि प्रणाम केलक आ कहलकनि- बाबा हमर धन्धा कम चलैए, से किछु कऽ दिअ। ओ वेश्या छलै। ओकरा फूल बिभूत दऽ बाबा कहलखिन- जो आब नीकसँ चलतौ। ओ चल गेल रहए हँसैत-हँसैत। ओकरा बादक जे लोक बाबा लग आएल से अपन बात कहैसँ पहिने बाबाकेँ पुछलक- बाबा। अहाँ ओकर पाप कार्यक लेल आशीर्वाद आ फूल-बिभूत देलिऐ। भगवती अहाँक तमसा नै जेती। बाबा कहने रहथिन- नै। कोनो पाप काज नै छलै ओ। ओकर व्यवसाये ओ छैक। ओहिसँ ओकर पेट चलैत छैक। तैँ ओ पाप नै भेलै। पाप ओ भेलै जे घा-संसारी भऽ अपन पति रहैत एहन काज करैत अछि...!

माता न कुमाता भवति
जखन ओ गाम गेल रहए तँ माए-बाबू नै टोकने रहथिन। ई लग जा कऽ गोर लगलकै। बाबू कहने रहथिन- नीके रहऽ। बस एतबे आर किछु नै। माए तँ पएरे छीपि लेलकै, तैयो ई आगाँ बढ़ि गोर लगलक। माए आशीर्वादक बदलामे मूह घुमा लेने रहै।
दुइये दिन रहल ई गाममे। ऑफिसेक काजसँ कतौ पटना-दरभंगा आएल रहै तँ गाम चल आएल। परिवार बच्चा सभ बाहरे छलै। अपना दुःख भेल रहै। जे माय एक रत्ती इसकुलसँ ओकरा अबैमे देरी होइत छलै तँ अंगने-अंगने सभकेँ पूछि जाइ जे तोहर बौआ एलौ की नै। हमर बौआ एखन तक नै एलैहेँ बड़की दाइ आदि-आदि। हरदम मूहे देह निंहारैत रहै छलै, सट्ठका लगमे राखिक खुआबै छलै। नै खेने ओकरा भकौआ धराबै छलै। से माय आइ मूड़ी धुरा लेलकै। जरूर दुःख छैक मायकेँ अपन बेटासँ। निश्चय ओ एकर आशाक अनुरूप नै चललै। निश्चय जे माय-बाबू कहैत छैक से नै करैत छैक ओ। निश्चय ओ अपन बाल-बच्चा लऽ कऽ बाहरे रहैत अछि। सभटा सत्य आ सभटा ठीक। मुदा पुत्रो कुपुत्रो जायताम्, माता न कुमाता भवति...आब नै होइ छै की...!!

आँखिक पानि
डेरा पहुँचि चश्मा उतारैत देरी पाँच सालक हमर बुच्ची कहैत अछि, पापा अहाँ कनैत किए छी?, अहाँ आँखिमे नोर अछि।, ऑफिसमे मास्टर मारलकहेँ की?, आदि-आदि एके संगे कएकटा प्रश्न ओ कऽ देने रहए तखन। ओ बुझैत अछि जेना हम सभ इसकूल जाइत छी पढ़ए ओहिना पापा सेहो ऑफिस पढ़ए जाइत छथि।
नै बेटा हम कनै कहाँ छी। ओ ओहिना नोरा गेल अछि आँखि। ओ कहैत अछि- नै पापा अहाँ झूठ बजै छी, निश्चय अहाँ टास्क नै बना कऽ लऽ गेल हेबै तैँ मारने हएत मैडम। हम तँ अपन टास्क बना लेलहुँ। अहूँ बना लिअ पपा ने।
हम तखन सोचऽ लागल रही जे हमरा आँखिमे कनी नोरक रेख देखि एतेक चिन्तित भऽ गेल अछि बुच्ची। आ वएह हमरा सभ छी जे एतेकटा भइयो कऽ माय आ बाबूक झहरैत नोरक धार दिस नै जाइत अछि नजरि कहियो...!!

मुन्नाजी
चारिटा लघुकथा

दरेग
कारक पट्टा खुजिते चिल्काकेँ ओकर दादीमाँ आह्लादित होइत कोरामे लेलनि। अहा! देखियौ तँ कते फकसियारि काटि रहल अछि नेना। एगदमसँ लहालोट भऽ गेल अछि।
ऐँ यै कनियाँ, बौआकेँ दूध लगा लेबै से नै? ”
-माँ, दुध कहाँ होइ छै, ओ तँ कहिया ने सुखा गेलै।
-तँ डॉक्टरसँ नै पुछलिऐ दुध हेबाक उपाए?
-ओ तँ बतौलक, मुदा...! जखन बजरुआ दुधसँ पलाइये जाएत तँ चिन्ता कोन?
-ऐँ यै, कतेक निसोख छी अहाँ, कहू तँ अप्पन दुध कोना छोड़ा देलिऐ?
-माँ, ई नै बुझथिन ने, दुध पियेलासँ फिगर खराब भऽ जाइत छै।
-हँ यै, हम अंग्रेजिया शब्द तँ ठीके नै बुझबै। मुदा एतेक जरूर बुझबामे अबैए जे दुध नै सुखेलैए। ओ तँ कोनो ने कोनो रूपेँ सभ ठाम भेटिये जाइ छै।...जँ सुखा गेलैए तँ माएक ममता।

भूख

सतबरतीक मोहर अपनापर लगेबाक लेल नै जानि कतेको साउस आ माएकेँ आरोपित कएलक। एतेक धरि जे कोनो कनियाँ-बहुरियाकेँ सेहो नै छोड़लक।
ओकरापर संदेह तँ भरि गौँआ करए मुदा ओकर छुटल मुँहक सोझाँ सभ अप्पन-अप्पन मुँह बन्न राखैमे बुधियारी बुझए।
असलमे ओकर घरबलाक सेनाक नोकरीसँ छुट्टीक अभाव आ ओकर सुन्नरता गामे भरि नै, अनगौंओं छओँड़ा सबहक आकर्षणक केन्द्र बनि गेल छल।

एक दिन गाम भरिक बुजुर्ग आ काबिल लोक सभ बैसारमे बजा ओकरा खुब ज्ञान देलक।
ओ निश्चय कएलक जे हम अइ नरकसँ मुक्ति हेतु अइ गामकेँ छोड़ि देब। मुदा अपन कर्कश शब्दवाण छोड़ैत गौँआ सभकेँ सुनौलक- एँ, ऐ गामक कोन घरक बेटी, पुतौह हाट-बजार आकि मेला जा कऽ नै घुमि अबैए। मुदा हम तँ आइ धरि अपन घरसँ दुरापर तक नै अबै छी। कहू तँ कियो पाहुन-परक वा भेंट केनिहार अबैए तँ कि ओकरा अपन घरसँ भगा दिऐ?

-यै, ककरो घर अएबासँ नै रोकबै, मुदा ओकरा संग अपन रंग-रभसकेँ तँ रोकि सकैत छी। मुखियैन दबले जीहे मुँह खोलने छलीह। फेर हँ, सबहक बेटी,पुतौह अपन साउस माएक संग कतौ जा घुमैए आ फेर घरमे इज्जतिक संग वास करैए। ककरो किछु नै भेलैए आइ धरि।
-अहाँ तँ घरे भरिमे रहि पेट कऽ लेलौं। छीः छी, नै जानि जे कोन जाति धर्मक बीआ बागल हएत। अहाँक घरबला पछिला साल दियाबातीक छुट्टीमे आएल छल आ फेर अगिला मास दियेबातीमे आओत। की अहाँ ओकरा सोगाइतमे देबाक लेल रखने छी ई अनजनुआ चिल्का।
-बुझा देथुन ने ईएह सभ। हम तँ तार पठा, फोन कऽ थाकि गेलौं जे नोकरी तँ बुढ़ारी धरि हेतै मुदा जुआनी फेर घुमि कऽ किन्नौ नै एतै। हम पेट तँ मेटा लेब मुदा जखन देहक भूख लगतै तँ ओ फेर छोड़ि चल जेतै नोकरीपर। हमरा के सम्हारत?

विजातीय

पुरे पहाड़ीपर शुन्यता पसरि गेल छल। ऊपर मेघमे स्याहपन, हवाक साँए-साँए स्वर्त, जोड़ीकेँ आओर मजेदार समएक अनुभूति करा रहल छल।
-यौ ठीके कहै छलिऐ, हम तँ एतेक दूर धरि कल्पनो नै करै छलौं जे पहाड़ आ जंगल जिनगीकेँ खुशनुमा बना सकैए।
-आह! कतेक मजेदार क्षण।
बिआह जिनगीकेँ नवदर्शन दैछ आ तकर पछातिक दिन-राति प्रकृतिक कोरामे जीवनक सम्पूर्णताक सुन्दर अनुभूति करा रहल अछि।
-यै, अहाँकेँ ई बुझल अछि जे चोरा कऽ कएल प्रेम बिआह आनन्दक पछाति स्वर्गक रस्ता सेहो खोलि छोड़ैए।
-हँ यौ, तँ किएक ने ऐ समाजक डांगसँ अपनाकेँ बचा, ऐ क्षणकेँ जीवनक अन्तिम क्षण बना ली। सोहाग तँ अचल रहत।

राष्ट्रभक्ति

सीमाक मानवीय कटु सम्बन्ध ओकरा आलोचनाक पात्र बना देने रहै। एकसर आ स्वतंत्र मुदा मस्त जीवन जीबामे प्रसन्न रहै छल।

बिआहक पछाति एक बेर फेर ओ सामाजिक आलोचनाक शिकार भऽ गेल। किएक तँ ऐ नव दम्पतिक घर खुजैत सभ नै देखि पबै।
आइ पतिक जेबाक छट्ठम मास बीति रहल छलै कि ओ सुन्दर पुत्रक जन्मसँ प्रसन्न भऽ पतिकेँ सूचनार्थ पत्र लिखैत मोनमे सोचि रहल छल- ऐ चिट्ठीकेँ डाकघर धरि पहुँचाओत के?

किएक तँ ओकर एकाकी जीवन पति मात्रपर केन्द्रित हेबाक कारणे सभ ओकरा समाजक सुन्दर कार्टुन मात्र बुझै।

“डाकिया...” शब्द सुनि ओ दुन्ना डेगे सोइरी घरसँ बहराएल।
डाकियाक पत्र देबाक लेल बढ़ल हाथ ठमकिते ओ बिजलीक करेन्टक गतिये पत्र लऽ फाड़लक-
“खेद अछि- अहाँक पतिक रणक्षेत्रमे शहीद भऽ गेलासँ हम सभ एकटा वीरपुत्र हेरा लेलौं अछि।”
बाप रे! करुण चित्कार...!घरबैया, सर-समाजक सांत्वनाक बीच मीडियाकर्मीक प्रश्न...प्रतिक्रिया जनबाक लेल।
पत्रकार सबहक प्रश्नक उतारा दैत-
“नै, भारत माँ अपन रक्षार्थ एकटा आओर सैनिक ठाढ़ कऽ लेलक अछि।”  

'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...