Saturday, July 31, 2010

'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)-Part I






'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)NEPAL       INDIA                   
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य











 

३. पद्य







३.६.१.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता

३.७.१.धी‍रेन्‍द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना  


४. मिथिला कला-संगीत-श्वेता झा चौधरीक चित्रकला- राधाकृष्ण

 

 

. बालानां कृते- अर्चना कुमर- बेटा- १

 


. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]



 

8. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"
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संपादकीय

मैथिलीक दन्द-फन्द बला सभक प्रवेश अन्तर्जालपर शुरू भऽ गेल अछि। ई लोकनि पहिने पत्र आ एस.एम.एस. द्वारा ब्लैकमेलमे लागल छलाह। आब ई-पत्रक प्रयोग साधारण संगणक ज्ञानबला सेहो कऽ सकै छथि, से एहि प्रवृत्तिमे वृद्धि आएल अछि।
अन्तर्जाल अपराधक प्रकार
गारि आ हतोत्साहित करैबला ई-मेल: एहिसँ नाम बदलि कऽ ई-मेल आ टिप्पणी देल जाइत अछि। एहिसँ अपराधी अपन शिकारकेँ मानसिक रूपसँ कष्ट दैत छै। कतेको बेर शिकार व्यक्ति अन्तर्जाल छोड़ि दैत छथि आ हुनकर दैनिक रचनात्मक क्रिया प्रभावित होइत छन्हि। कतेक गोटे मैथिलीकेँ गुड-बाइ सेहो कहि दै छथि। कखनो काल अहाँ जालवृत्त वा जालस्थलपर पोर्न साइटक लिंक कियो राखि देत, तँ कखनो गारि पढ़ि कऽ भागि जाएत, माने ई-पत्र, ऑनलाइन वार्तालाप, कमेन्ट बॉक्समे। कखनो अहाँक सालक आ मासक मेहनति सेकेन्डमे कॉपी पेस्ट कऽ अपना नामसँ छपा लेत। बहुत गोटे हमरा सालक मेहनति ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध करेबा लेल टोकबो कएलन्हि। मुदा हमरा एहि सम्बन्धमे बिल गेट्सक वक्तव्य मोन पड़ि जाइत अछि। हुनकासँ एक बेर पूछल गेलन्हि जे माइक्रोसॉफ्टक उत्पाद एक्स बॉक्सभारतमे पाइरेसीक डरसँ विलम्बसँ उतारल गेल, तँ ओ कहने छलाह जे माइक्रोसॉफ्ट कहियो पाइरेसीक डरसँ कोनो उत्पाद बजारमे अनबासँ विलम्ब नहि केने अछि। विदेह आर्काइव सेहो दिनानुदिन समृद्ध भेल जा राहल अछि, साइबर अपराधक द्वारे एहिमे कोनो कमी नहि आएल अछि।
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अगिला चरण- वित्तीय हानि: रचनात्मक क्रियाक बन्न भेने भने सद्यः वित्तीय हानि नहि होइत छैक मुदा ब्लैकमेलर अगिला चरणमे अहाँक क्रेडिट कार्ड संख्या, पासवर्ड, बैंक एकाउन्ट नम्बर पुछि सकैए। लागत जेना ओ ई-पत्र इनकम टैक्स रिफन्ड लेल अछि, वा सूडानक कोनो अकाल पीड़ितक आर्द्र पुकार अछि। अहाँ एहि तरहक मेलक जवाब किन्नहुँ नहि दिअ आ ई-पत्रकेँ स्पैममे धऽ दियौ आ किछु प्रति सुरक्षित राखि लिअ। ओहि अपराधीकेँ पकड़बाक सामान्य प्रक्रिया आगाँक बिन्दुमे अछि।
अपराधीकेँ पकड़ब कोना: अपन साइटपर हिट काउन्टर लगाऊ, एहिसँ ई फाएदा होएत जे अहाँक साइटपर टाइम-स्टैम्प आबि जाएत। टिप्पणीक टाइम स्टैम्पसँ एकरा मिलाऊ आ चोरकेँ पकड़ू। कम्प्यूटरकेँ कमान्ड दऽ कऽ ई-मेलक हेडर आ ओहिसँ समय आ स्थानक जनतब लिअ। फेर ओहि फेक व्यक्तिक पता आ फोन नम्बर (एक्स्टेन्शन सहित) एहिसँ ज्ञात भऽ सकैए। एहन कोनो तरहक ई-पत्रकेँ नहि तँ नष्ट करू आ नहिये सम्पादित करू।
अन्तर्जालक उपयोगसँ सम्भावित हानिपर नियन्त्रण: एहि प्रकारक ई-पत्र उपयोगकर्ता लेल संकट उत्पन्न करैत छैक। लोक दुखी रहए लगैत अछि, किछु गोटे इन्टरनेटक कनेक्शन कटबा लै छथि। मुदा अभद्र मेल अएलापर अपनापर नियन्त्रण राखू आ डिप्रेशनमे नहि जाऊ। अन्तर्जालक नीक पक्षक उपयोग करैत रहू। कोनो साइटपर लॉग ऑन केने छी तँ तत्काल लॉग आउट भऽ जाउ।

(
विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०४ देशक १,४४२ ठामसँ ४५,८३० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,५१,६७० बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा ) 

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com


२. गद्य












 शम्भु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।सम्‍पादक



कथा निबंध:     भाय-बहिनक व्यथा कथा
कथाकार:          डॉ. शंभु कुमार सिंह

भाय-बहिनक व्यथा कथा
      हुनका दुनूकेँ एकटा थाकल-हारल बटोही मानि सकैत छी। दुनूक चेहरा झमारल। आँखि सूजल। एकदम श्रीविहीन। हुनका दुनूमे की संबंध रहनि वा संबंधक निर्धारण कोना भेल हेतैक से कहब कने कठिन मुदा संबोधन सँ बुझाइत छल जे दुनू गोटे भाय-बहिन जकाँ रहथि। बैसतहि मैथिली बरसँ पूछलथि- कहू भाय की हाल-चाल! एहन बगए किएक बनौने छी?” 
बर:      बीज रूपमे हम कहिया एहि धरतीक गर्भमे पड़लहुँ, कोना हमर अंकुरण भेल से सभ हमरा एकदम स्मरण नहि अछि। हँ, हमरा अपन नेनपनक किछु बात सभ स्मरण अवश्य अछि। ताहि दिन हमर उमिर यैह कोनो छओ मासक लगधक रहल हैत। तखन हम एकदम छोट रही एहि लेल हमरा माल-जालसँ बचएबाक लेल यैह जगरनाथ मिसर (शिव मंदिरक प्रमुख पुजेगरी) चारू दिससँ जाफरीसँ घेर देने छलाह। ताहि दिन मंदिरमे शिव आराधनाक लेल जतेको लोक-बेद अबैत छलाह, लोटाक बाँचल जल हमरा जड़िमे उझलि दैत छलाह। शिव-प्रांगणमे रहबाक परताप बुझू वा हमर अपन भाग्य, किछु महिला लोकनितँ हमरहुँ जड़िमे जल-फूल-अच्छत केर चढौआ चढ़ब लागलीह। देखतहिं-देखतहिं हम अपन पूर्ण यौवनकेँ कहिया प्राप्त क लेलहुँ से हमरो पता नहि चलि सकल। भीमकाय हमर देह। हरियर-हरियर पातसँ आच्छादित दूर-दूर धरि पसरल हमर डारि। जखन मंदिरमे शिव नचारी गाओल जाइक तँ पूरा वातावरण संगीतमय भ जाइक। बसात उन्मत्त भ कए हमरा पात सभकेँ एक्कहि संग झंकृत क दिअए आ ओहिसँ निकसल मेहीं सुर जेना नचारीक सुरसँ मिलिजुलि एकटा मनोहर दृश्य उत्पन्न क दैक। हमरा डारि-पातक छाहरिमे जेठक दुपहरिमे भरि गामक बूढ़-बुजुर्ग ओहि मचान पर बैसि शीतलताक अनुभव करैत छलाह। नेना सभ कतहुँ खो-खो तँ कतहुँ बुढ़िया कबड्डी खेलाइत रहैत छल। हे ओहि कातमे भरि गामक माल-जाल सभक लेल विश्रामस्थल छलैक। सालमे एकबेर बरसाइत (बटसावित्री) दिन हमर नव रूपेँ श्रृंगार कएल जाए। ओहि दिन हमर सौंसे धरे बुझू जे लाल-पीयर जनौ सँ लदि जाइत छल। हम गर्वोन्मत्त रही। हमरा बुझाइत छल जे सभदिन एहिना हमर जिनगी कटि जाएत। (एकटा दीर्घ निःश्वास छोड़ैत) ....मुदा हमरा सुन्दरताकेँ ककरहुँ नजरि लागि गेल। हमरा घमंडकेँ घून लागि गेल।
एकबेर अही गामक लत्तर खाँक छोटका बेटाकेँ सौंसे देह खौजली भगेल रहैक। भरि सहरसाक डागदर-बैदसँ देखेलाक पश्चातो ओकरा कोनो लाभ नहि भेलैक। किओ हुनका कहलकनि जे पाँज भरि अमरलत्तीके जँ तीन-चारि दिन धरि हुनका पयरसँ मोलबा दिऔक तँ खौजली जड़िसँ उपटि जाएत। लत्तर खाँ कतए-कहाँसँ भरि पाँज अमरलत्ती आनलनि आ बेटासँ पयर तरेँ मोलबौलथि। खौजली उपटलनि कि नहि, से नहि जानि मुदा हम ओहि अमरलत्ती सँ अवश्य पाटि गेलहुँ। भेलैक ई जे ओहि अमरलत्तीक एकटा टुकड़ी लत्तर खाँ हमरा गाछक उपर फेकि देलथि। आ ओ अमरलत्ती जे ओहुना परजीवी होइत अछि हमरा सन हरियर गाछ पाबि धन्य भ गेल। आइ तँ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि राज छैक। ओहि आयातित सौंदर्यक नीचाँ हमर नैसर्गिक सौंदर्य फड़फड़ा रहल अछि। हमर तँ दम निकलल जा रहल अछि। बूढ़-बुजुर्ग लोकनि एखनो अबैत छथि, नेना-भुटका सभ एखनहुँ बुढ़िया कबड्डी आ खो-खो खेलाइत अछि मुदा हमर अस्तित्वविहीन भजयबाक परबाहि किनकहुँ नहि छनि। अहाँ त देखितहि छी जे हमर विशालकाय गाछ गामक प्रवेश द्वार पर अछि तैँ भरि गाममे बियाह-द्विरागमन, जनौ, मूड़न सन जतेको आयोजन होएत अछि सभमे लोक एत्तहिसँ तोरणद्वार बना अपन-अपन घर धरि भुकभुकिया बल्ब लगा कए बाट केँ झकझबैत अछि। एहन सभ अवसर पर हमरा कतेक कष्ट होइत अछि से हम नहि कहि सकैत छी। हमरा डारि-पात पर गत्तर-गत्तर भुकभुकिया बल्ब सभ लगा देल जाइत अछि जे भरि राति छिनार छौंड़ा-छौंड़ी जकाँ कनखी मारैत रहैत अछि..भुक...भुक...भुक...भुक। हमर तँ गत्तर-गत्तर झरकि जाइ ऐ।
 एकदिन भोगल पहलमान गामक लोक सभकेँ हमरहि गाछतर बजाकए प्रार्थना केने छलाह जे- एहि बरक गाछ परसँ सभटा अमरलत्तीकेँ उजाड़ि-उपारि देल जाए नहि तँ ओ दिन दूर नहि जखन ई परजीवी एहि बर गाछकेँ नेस्तनाबूद क देतैक मुदा गामक अधिकांश लोकक कहब रहैक जे- ई कि कोनो लतामक गाछ छिऐक जे सूखि जेतैक! बर छिऐक बर.... बर तँ हम सरिपहुँ छी, मुदा जँ एहिना ई अमरलत्ती सभ हमरा डारि-पातक खून चोसैत रहत तखन कतेक दिन धरि हम जीबि सकब से भगवतीए जानथि.....। एतबा कहि बर फेर उदास भ गेलाह।
मैथिली:           हमरो दशा तँ किछु एहने अछि भाय! हमरहुँ जनम कहिया भेल, कहिया हम लोक सभक जीभसँ उच्चरित भेलहुँ से सभ हमरहुँ स्मरण नहि अछि। हमरा तँ अहाँ जकाँ अपन नेनपनो स्मरण नहि अछि। असलमे नेनपन मे हमरा समस्त मैथिल समाजसँ ततेक ने दुलार-मलार भेटैत रहल जे हमर नेनपन अल्हड़पनहिमे बीत गेल। हमरा तँ जे किछु स्मरण अछि से अपन जुआनिएक। जेना अहाँ अपन पूर्णयौवनावस्थामे भीमकाय देह आ अपन विस्तीर्ण डारि-पात पर गर्व करैत छलहुँ तहिना हमहुँ अपन जुआनीमे मिथिलाकेँ के कहए अपन पड़ोसक राज आसाम, बंगाल सँ ल कए नेपाल (विदेश) धरि अपन श्रुतिमाधुर्य गुणक बलेँ पसरल छलहुँ। साहित्यक कोनो एहन विधा नहि जाहिसँ हमर श्रृंगार नहि भेल हो।
ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, उमापति, चन्दा, मनबोध।
हरिमोहन, यात्री, मधुप, ईशनाथ, राजकमल, प्रबोध।।
प्रभृति सहस्त्रों कवि-लेखक लोकनिक द्वारा हमर साहित्य-संसारक श्रृंगार कएल गेल छल। ई संभवतः 19म शताब्दीक उत्तरार्ध रहल हेतैक जखन मिथिलो पर अंग्रेजी शासन आ शिक्षाक प्रभाव पड़य लागलैक। नाम कथी लेल कहब (भसकैछ ताहि दिन ओ हमरा लेल शुभे सोचने हेताह) अंग्रेजी साहित्य सँ प्रतिस्पर्धा करबाक कारणेँ सबसँ पहिने ओ हमर अपन लिपि तिरहुता, जे हमर अस्तित्वक प्रतीक चिह्न छल तकरा उतारि कए फेकि देलथि आ हमरा पर देवनागरी थोपि देल गेल। तहिया के जनैत छलैक जे ई देवनागरी हमरा एकदिन साँस लेब कठिन क देत? आइ हमरा सौंसे देह पर ओकरहि प्रभाव अछि। ओकरा तरमे हम फरफरा रहल छी। एकर एकटा उदाहरण हम अहाँकेँ द सकैत छी-अहाँ भारतक कोनहुँ कोनमे चलि जाउ आ लोकक समक्ष बंगलाक कोनहुँ पाठ्य सामग्री प्रस्तुत ककए पुछियौनि जे ई कोन भाषा थिक? तँ ओ कहता जे बंगला आ जँ से नहि तँ बेसी सँ बेसी कहताह- असमियाँ वा उड़िया, मुदा हुनकहि समक्ष कोनहुँ मैथिलीक पाठ्य सामग्री राखि दिऔक तँ ओ फट्ट द कहता जे हिन्दी। आब अहाँ कल्पना क सकैत छी जे तखन हमर मनोदशा केहन भ जाइत छल होएत। आर तँ आर जखन कखनो हम अपन आन सखी-बहिनपा (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क संग कहियो काल बैसैत छी तँ ओ लोकनि हमरा तेना ने फजीहति करैत छथि से नहि कहि सकै छी। हुनकासभ (बंगला, असमी, उड़िया आदि)क कहब छनि जे- देखू हमर धिया-पुता सभ विश्वक कोनहुँ कोनमे किएक नहि होथि, कोनहुँ भाषाक जानएबला किएक नहि होथि मुदा आपसी संवाद ओ लोकनि अपनहि भाषामे करैत छथि आ एकटा अहाँक धिया-पुता सभ छथि....... साँच पुछू तँ ई सभ उपालम्भ सूनि करेज कटि जाइत अछि। जो रे दैब! जो रे हमर कपार! हमरा (मैथिली) के कहए ओ लोकनि अपन मैथिल संस्कृतिओ केँ तँ तहिना ताक पर रखने जा रहल छथि- धोती, तौनी, पाग, जनौ..., सोहर, समदाउन, बटगमनी, लगनी...., तिलौरी, अदौरी, तिसिऔरी, तिलकोर..., सभटा हेरायल जा रहल अछि...। अपन एहि सभ दुर्दशाक चर्चा जखन कहियो काल आन-आन भाषा लग करैत छी तँ जनैत छी ओ लोकनि हमरा की कहैत अछि? ओ सभ कहैत अछि- तोँ ईष्यालु छेँ, तैँ तोरा आन-आन भाषा सभसँ ईर्ष्या होइत छौक, तोँ आन-आन सभ्यता आ संस्कृतिसँ डाह करैत छैँ, समयक संग जँ नहि चलबेँ तँ एहिना पिछड़ल रहि जेबेँ आदि-आदि। आब अहीं कहू भाय! ई सभ तँ व्यर्थेक दोषारोपण छैक ने? दुनियाँक कोन एहन माए हेतैक जकरा अपन धिया-पुताक सुख नहि सोहाइत हेतैक। अहाँ तँ हमर भाय थिकहुँ, अहाँ सँ हम जे किछु कहब से साँच आ हृदयसँ। हमर धिया-पुता सभ जे आइ विश्वक अनेको कोन मे पसरल छथि, ओ सभ जखन सूट-बूट-टाई पहिरि निकलैत छथि आ फर्र-फर्र अंग्रेजी, जापानी, स्पैनिश, जर्मन, फ्रैंच आदि भाषा बौलैत छथि, फिल्मी गाना गबैत छथि, नीक-नीक होटल मे जा कए काँटा-छूरी सँ खाइत छथि तँ ई सभ देखि सरिपहुँ हमर करेज जुड़ा जाइत अछि। भगवतीसँ गोहारि करैत रहैत छियनि जे हमर धिया-पुता सभ एहिना अखिल विश्वमे कला, संगीत, साहित्य, राजनीति सभ क्षेत्रमे अपन-अपन नाम आ जस करथु। यैह परसूका गप्प थिक, फ्रैंकफर्टमे विज्ञानक क्षेत्रमे कएल गेल कोनो पैघ उपलब्धिक लेल हमरहि एकटा सपूत केँ पुरस्कृत कएल जाइत रहैक, सौंसे दुनियाँक मीडिया वलासभ ओहि समारोहक कवरेज करैत रहैक, अपन सपूतक उपलब्धि पर गर्व करबाक लेल हमहु कोहुना ओत्त पहुँच गेल रही, जहिना-जहिना हुनका सम्मानमे किछुओ बाजल जाइक, तहिना-तहिना हमर करेज गर्वसँ पसरल जा रहल छल, मोन मे होइत छल जे  ओत्तहि मंच पर जा कए हम चिकड़ि-चिकड़ि केँ लोक सभकेँ कहि दिऐक जे- देखू हम ईर्ष्यालू नहि छी, हमरा विश्वक कोनहुँ विषय, भाषा, समुदाय, सभ्यता, संस्कृतिसँ कोनहुँ प्रकारक परहेज नहि......मुदा कार्यक्रमक अंतमे जखन हमर ओहि सपूतसँ पूछल गेलनि जे- अहाँक मातृभाषा की थिक? तँ हुनका मुँहसँ बहरेलनि अंग्रेजी!!! सरिपहुँ कहैत छी भाय! ई सुनितहि हमर करेज...., एतबे नहि घर अयला पर हुनकासँ हुनक पचमा किलासमे पढ़यबला बेटा पुछलकनि- बाबूजी! बाबा तँ कहैत छथि जे हमरा सभक मातृभाषा मैथिली थिक, तखन अहाँ अंग्रेजीक नाम किएक लेलहुँ? जँ अहाँ सन-सन लोक सभ अपन मातृभाषाकेँ एना अछूत बूझैत रहताह तखन तँ मैथिलीक भविष्य.....। बाप कहलकनि- चुप रह बुड़ि, ई कोनो आन भाषा थिकैक? मैथिली थिकैक मैथिली, एकर जड़ि पताल धरि पसरल छैक……आब की कही भाय! हम अपन एहि सपूतक अटूट विश्वास पर विश्वास करी वा हुनक छोट बालक द्वारा कएल गेल हमर भविष्यक चिंताक प्रति आशा...! एतबा कहैत-कहैत मैथिलीक दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसय लागलनि।
बर, मैथिली केँ सांत्वना दैत रहलथि, हुनका मैथिलीसँ आर किछु सुनबाक अपेक्षा रहनि मुदा मैथिलीक मुँहसँ जेना बकारे नहि बहराइत रहनि, ओ कपसि-कपसि कए कानि रहल छलीह....।

-गजेन्द्र ठाकुर
यू.पी.एस.सी.-२
मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)

मैथिली वा कोनो भाषाक उत्पत्तिक मूलमे मनुक्खक मुँहसँ बहराएल ध्वनि आ ओहि ध्वनिक अर्थ कोनो वस्तु, व्यक्ति वा विचारसँ होएब सिद्ध होएत। ध्वनि तँ चिड़ै, चुनमुनी, माल-जाल आ बौक व्यक्ति द्वार सेहो उत्पन्न होइत अछि मुदा से अर्थपूर्ण नहि भऽ पबैए आ भाषाक निर्माण नहि कऽ पबैए।
१८६६ ई. मे पेरिसमे ला सोसिएते द लिंग्विस्टीकनाम्ना संस्था भाषाक उत्पत्ति आ विश्वक भाषा सभक निर्माणएहि विषयकेँ अपन कार्यकारिणीसँ हटा देलक कारण एहि विषयक विवेचन अनुमानपर अधारित होएबाक कारणसँ वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ दूर रहैत अछि।
वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत आ ओहिसँ पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिलीक क्रम ताकल जा सकैत अछि। मुदा वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ ओ भाषा अस्तित्वमे रहल होएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल होएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल गाथिन”, “गातुविद्गाथपतिऋगवेदमे प्रयुक्त भेल। वैदिक संस्कृतक उत्पत्ति दैवी रूपमे भेल वा आंगिक-वाक संकेतक संप्रेषणीयता बढ़ेबाक लेल से मात्र अनुमानेक विषय भऽ सकैत अछि। भाषामे ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य आ अर्थक परिवर्तन भेलासँ वैदिकसँ लौकिक संस्कृत बहराएल आ फेर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट आ मैथिली। पाणिनी द्वारा भारतक विभिन्न क्षेत्रसँ लेल शब्दावली लौकिक संस्कृतकेँ ततेक समृद्ध कएलक जे ओहिसँ आन सभ भाषाक कतेको तरहक रूप बहार भेल। कतेक तरहक क्षेत्रीय प्राकृत आ अपभ्रंश ओहि भौगोलिक क्षेत्रक विस्तारकेँ लैत बहार भेल आ ओहिसँ आजुक आधुनिक भारतीय आर्य भाषा सभक उत्पत्ति भेल।
मैथिली भारोपीय भाषा परिवारसँ सम्बन्धित अछि। भारोपीय भाषा परिवारक भीतर विश्वक लगभग चालीस प्रतिशत जनसंख्या अबैत अछि। ई सभसँ पैघ भाषा परिवार अछि, सभसँ समृद्ध सेहो। मोटा-मोटी एकर दू विभाग छैक, पहिल यूरोपक आर्य भाषा आ दोसर भारत-ईरानी शाखा। भारत-ईरानी आर्यभाषाक भीतर ईरानी, दरद आ भारतीय आर्यभाषा अबैत अछि। दरद भाषामे कश्मीरी आ पामीर पठारक पूर्व दक्षिणक भाषा सभ अछि। मैथिली भाषाक उद्गम आ विकास भारतीय आर्यभाषाक भीतर ताकल जाइत अछि।
भाषाक उद्गम तँ अनुमानक विषय थिक। भाषाक उद्गमक आ तकर प्रयोगक कतेक वर्षक पश्चात् ओहिमे साहित्य रचना होइत अछि। तखन जा कऽ ओकर रूप स्थिर होइत अछि। वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेद, लौककिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण, पालि भाषाक प्राचीनतम ग्रन्थ बुद्ध त्रिपिटक, प्राकृतक प्राचीनतम ग्रन्थ विमल सूरिक पउमचरिउ, अपभ्रंशक प्राचीनतम ग्रन्थ यूगीन्द्रक परमात्म प्रकाश अछि। आदि मैथिलीक प्राचीन साहित्य सिद्ध साहित्य, बौद्धगान आ ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर अछि। सिद्ध सरहपाद 700-780 सरहपाद-सिद्धिरत्थु मइ पढ़मे पढ़िअउ ,मण्ड पिबन्तोँ बिसरउ एमइउ।मिथिलामे अक्षरारम्भ सिद्धिरस्तु (गणेशजीक अंकुश आँजी) सँ होइत अछि। मिथिलामे ई धारणा अछि जे माँड़ पीलासँ स्मरण शक्ति क्षीण होइत अछि। दोसर उदाहरण- बलद बियायल गबैया बाँझे- बड़द बिया गेल आ गाए बाँझे अछि।
मध्यकालीन मैथिलीक ग्रन्थ विद्यापतिक मैथिली साहित्य आ तकर बाद चतुर चतुर्भुज, शंकरदेव, विभिन्न मल्ल नरेश द्वारा रचित साहित्य, कीर्तनिया आ अंकिया नाटसँ मनबोध धरि अबैत अछि। आधुनिक मैथिली साहित्य चन्दा झासँ प्रारम्भ होइत अछि।
प्राचीन भारतक आर्यभाषाक क्षेत्र वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदमे वर्णित धार सभक आधारपर निर्धारित कएल जा सकैत अछि आ एकर प्रसार कोना आन क्षेत्रमे भेल सेहो एहिसँ निर्धारित होइत अछि। ऋगवैदिक आर्य सप्त सन्धवमाने सात धारक क्षेत्रमे रहैत छलाह- ई सात धार छल वितस्ता, अश्किनी, परुष्णी, शतुद्रु, विपाशा, क्रुमु आ गोमती। एहिमे पहिल पाँचटा धार पंजाबक आ शेष दूटा अफगानिस्तानमे बहैत छल। ई सातो धार ऋगवेद कालक सभसँ उपयोगी धार सिन्धुक सहायक छल। ऋगवेदमे सरस्वती धारक वर्णन धार सभ मायक रूपमे भेल अछि। ऋगवेदमे यमुनाक दू बेर आ गंगाक एक बेर वर्णन अछि। ऋगवेदक दसम मण्डलमे धारक स्तुतिमे सिन्धु आ सप्तसैन्धवक स्तुति भेल अछि। ओहि कालमे पुरु, अनु, द्रुह्य, यदु आ तुर्वस नाम्ना पंचजन बसैत छलाह। क्रिवि, त्रित्सु, सेहो ओहि कालमे छलाह। पुरु आ सभसँ शक्तिवान भरत कबीला मिलि बादमे कुरु कबीला बनल। भरत कबीला दाशराज्ञ युद्धमे पाँच आर्य आ पाँच अनार्य कबीलाक संगठनकेँ हरेलक, जाहिमे भरतक पुरहित वशिष्ठ रहथि आ पाँच आर्य आ पाँच अनार्य (दस्यु) कबीलाक संगठनक पुरहित रहथि विश्वामित्र। बोगजकोई एशिया माइनरमे हित्ती शासकक १४म शती ई.पू.क उत्कीर्णित अभिलेखमे इन्द्र, दशरथ, अर्त्ततम आदि राजाक, इन्द्र, वरुण, नासत्य, आदि देवताक उल्लेख अछि। यजुर्वेदक प्रचलित संहिता वाजसनेयी आ सामवेदक संहिता कौथुम, सामवेदक आरण्यक आ उपनिषद छान्दोग्यक आधारपर मिथिलामे ब्राह्मणक वाजसनेयी आ छान्दोग्यमे उर्ध्वाधर विभाजन एखन धरि अछि। यजुर्वेदमे विदेहक वर्णन अछि तँ ऋगवेदमे वैदिक जनकक (सीताक पिता सीरध्वज जनक पछाति भेलाह।)
'वैदेह राजा' ऋगवेदिक कालक नमी सप्याक नामसँ छलाह, यज्ञ करैत सदेह स्वर्ग गेलाह, ऋगवेदमे वर्णन अछि। ओ इन्द्रक संग देलन्हि असुर नमुचीक विरुद्ध आ ताहिमे इन्द्र हुनका बचओलन्हि।शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। निमि गौतमक आश्रमक लग जयन्त आ मिथि -जिनका मिथिला नामसँ सेहो सोर कएल जाइत छन्हि, मिथिला नगरक निर्माण कएलन्हि। निमीक जयन्तपुर वर्तमान जनकपुरमे छल, मिथीक मिथिलानगरीक स्थान एखन धरि निर्धारित नहि भए सकल अछि, अनुमानित अछि जनकपुरक लग ।सीरध्वज जनकसीताक पिता छथि आ एतयसँ मिथिलाक राजाक सुदृढ़ परम्परा देखबामे अबैत अछि।कृति जनकसीरध्वजक बादक 18म पुस्तमे भेल छलाह। कृति हिरण्यनाभक पुत्र छलाह आ जनक बहुलाश्वक पुत्र छलाह। याज्ञवलक्य हिरण्याभक शिष्य छलाह, हुनकासँ योगक शिक्षा लेने छलाह। कराल जनक द्वारा एकटा ब्राह्मण युवतीक शील-अपहरणक प्रयास भेल आ जनक राजवंश समाप्त भए गेल (संदर्भ अश्वघोष-बुद्धचरित आ कौटिल्य-अर्थशास्त्र)।अर्थशास्त्रमे(.६ विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायः इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः) कराल जनकक पतनक सेहो चर्चा अछि। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मण कन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रो विननाश करालश्च वैदेहः,...
वैदिक संस्कृतक कालमे आर्य सप्तसन्धवसँ विदेह धरि आबि गेल छलाह। अनार्य (दस्यु)सँ ओही कालमे हुनकर सम्पर्क भऽ गेल छल आ शाब्दिक आदान-प्रदान सेहो भऽ गेल छल। यजुर्वेदमे बादमे अथर्ववेदमे ई आदान-प्रदान दृष्टिगोचर होइत अछि। अनार्य (दस्यु) आ व्रात्य (अनार्यसँ आर्य बनल जाति) दुनुक भाषा सप्तसैन्धव आर्यक भाषासँ मिलि गेल आ पुबरिया आ आन क्षेत्रीय बसात लगलासँ वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल। निरुक्तक समयमे सेहो वैदिक शब्दावली कठिन भऽ गेल छल, ओकर उत्पत्तिपर विवेचन शुरू भऽ गेल छल। पाणिनीक भाषा पुबरिया, दछिनबरिया, पछबरिया आ उत्तरबरिया सभ क्षेत्रक दस्यु आ व्रात्य भाषाक शब्दावलीकेँ समाहित कऽ बनल छल। ई संस्कारित भाषा बादक लोक मध्य संस्कृतक रूपमे विख्यात भेल। पाणिनी लौकिक संस्कृतकेँ जेना भाषाकहलन्हि, तहिना यास्क आ पाणिनी वैदिक संस्कृतकेँ छन्दस्। यैह छन्दस् अवेस्ता भाषाक भाष्य लेल जेन्द (छन्द) कहल गेल।

संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली
१. संस्कृत
देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तर भारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणक (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, , , ह क वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्चारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) क प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ क बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार क बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि।
जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि।
वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि।
स्वरक वर्णन एहि प्रकारेँ अछि- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर।
स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजैमे एक मात्राक समय लागए से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।

मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह।
दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह।
लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि।
अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कऽ १२ वर्ण भेल। लृ क ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३), तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।

एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि।
नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित।
स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ।
दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तटपर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ दात्तआद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलोपर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह।
स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्र स्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि।
आब व्यञ्जन पर आऊ।
व्यञ्जन ४२ टा अछि।
क् ख् ग् घ् ङ्
च् छ् ज् झ् ञ्
ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्
य् र् ल् व्
श् ष् स्
ह्
य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो।
एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग।
ई दुनूटा, स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि।
विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् क विकार अछि। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व।
अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि।
उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि।
कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति)
पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल।
यम सेहो अयोगवाह होइत अछि।
अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय क उच्चारण कण्ठमे होइत अछि।
इ ई चवर्ग य श क उच्चारण तालुमे होइत अछि।
ऋ ॠ टवर्ग र ष क उच्चारण मूर्धामे होइत अछि।
लृ तवर्ग ल स क उच्चारण दाँतसँ होइत अछि।
उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय क उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि।
व क उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठक सहायतासँ होइत अछि।
ए ऐ क उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि।
ओ औ क उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि।
य र ल व अन्य व्यञ्जन जकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि।
क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कऽ छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल।
सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि।
अनुस्वार आ यम क उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् क उच्चारण नहि होएबाक चाही।
जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भऽ पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्।
श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल घोषवान्। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि अल्पप्राणआ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेलमहाप्राण
कचटतप क पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप क पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः।
आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व '' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि।

छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द ।
वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि ।
वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त अक्षर-०
२. संयुक्त अक्षर-१
३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७
आब दोसर उदाहरण देखू

पश्चात्=२
आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२
आब चारिम उदाहरण देखू
स्क्रिप्ट=२
मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना-
वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः
गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी।
ए = अ + इ
ओ = अ + उ
ऐ = अ/आ + ए
औ = अ/आ + ओ

छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त गुरुलघुछंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,,,,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,,,,ए.ऐ,,, ई आठ दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ गुणिताक्षरबनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक अक्षरकहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना अवाक्शब्दमे दू टा अक्षर अछि, , वा ।

१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर लघुमानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर गुरुमानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।
३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।
५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना
स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)।
१. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि।

१. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण कउत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ।
उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल।
हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद

ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल।
ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९
सात टा स्वर सा,रे,,,,,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान।
ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि विशेषण-विपर्यय।
वेदपाठ-
१. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ।
अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्।
२. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि।
३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि।
४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, , आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि।
साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे यति। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा हाउ’ ‘राइजोड़ैत छथि। राणानीय शाखा हावु’, ‘रायिजोड़ैत छथि।
मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि।
१. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर।
२. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद।
३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद।
४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद।
५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि।
६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद।
७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ।
यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि।
(अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः।
(आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि।
ए= अ + इ
ओ= अ + उ
ऐ= अ/आ + ए
औ= अ/आ + ओ
अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि।
यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)।
ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।
वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि।

वैदिक (छन्दस् ) आ लौकिक संस्कृत (भाषा) क व्याकरण :
वैदिक आ लौकिक दुनू संस्कृतमे संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग, तीन वचन- एक, दू आ बहुवचन रहल, पुल्लिंग, स्त्रीलिंग आ नपुंसक लिंग लिंगक द्योतक नहि अछि, दारा- पुल्लिंग, कलत्र- नपुंसक लिंग आ भार्या- स्त्रीलिंग; मुदा तीनू पत्नीक पर्यायवाची अछि। तहिना ईश्वरः (पुल्लिंग), ब्रह्म (नपुंसक लिंग) आ चितिः (स्त्री लिंग) होइत अछि। संज्ञा, सर्वनाम आ विशेषणक आठटा कारक (विभक्ति) सेहो होइत अछि। दस गणक धातुक रूप  परस्मैपदी (फल दोसराकेँ), आत्मनेपदी (फल अपनाकेँ) आ उभयपदी ई तीन तरहक होइत अछि। कर्तृ, कर्म आ भव ई तीन वाच्य आ बारह लकार (लट्, लिट्, लङ्, लुङ्, लुट्, लृट्, लोट्, विधिलिंङ्, आर्शीलिंङ्, लृङ्, लेट् आ लेङ् ) होइत अछि। लेट् आ लेङ् लकार लौकिक संस्कृत (भाषा) मे नहि होइत अछि।
संस्कृतमे तीनटा पुरुष- प्रथम (आन भाषाक अन्य पुरुष) , मध्यम आ उत्तम होइत अछि।उद्देश्य आ विधेय; कर्ता आ क्रिया; विशेष्य आ विशेषण आ संज्ञा आ सर्वनामक परस्पर गुण-समानता रहैत छै।
वैदिक संस्कृतमे गीतात्मक आ बलात्मक स्वराघात रहए मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली बलात्मक स्वराघात रहि गेल। वैदिक उच्चारण उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (संगीतशास्त्रक आरोह, अवरोह आ सम सँ तुलना द्रष्टव्य) लौकिक उच्चारणमे खतम भऽ गेल।
वैदिक छन्दमे एक चरण, जकरा पाद कहैत छिऐ ओहि पादमे वर्णक गनती होइत अछि। छन्दमे गति (लय) आ यति (विराम) सेहो होइत अछि। ह्रस्व स्वर लघु होइत अछि, ह्रस्वक बाद संयुक्त वर्ण अएलासँ लघु स्वर गुरु स्वर भऽ जाइत अछि।
उपसर्ग: लौकिक संस्कृतमे उपसर्ग क्रियासँ पहिने अबैत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे पहिने, बादमे, अलगसँ आ कतहु अन्तरालक बाद सेहो अबैत अछि। संगहि वैदिक संस्कृतमे जे एक बेर उपसर्ग क्रियाक संग आबि गेल तँ तकरा बाद ओहि मंत्रमे मात्र उपसर्गक प्रयोग होएत आ वैह उपसर्गयुक्त क्रियाक द्योतक होएत।
समास: वैदिक संस्कृतमे समासमे सेहो कखनो काल भिन्नता छै, जेना अष्टक बाद कोनो शब्द होइ तँ ओ अष्टा भऽ जाइ छै- अष्टापदी। पितृ आ मातृक द्वन्द्व समास भेलापर दुनूमे आ लगै छै आ गुण होइ छै- पितरामातरा।
लेट लकार: लौकिक संस्कृतमे लेट लकारक प्रयोग नहि होइत अछि मुदा वैदिक संस्कृतमे होइत अछि जेना भवाति, पताति लौकिकमे मात्र भवति, पततिसँ निदृष्ट होइत अछि।
वैदिक आ लौकिक संस्कृत कोनो दू भाषा नहि अछि वरन् लौकिक संस्कृत, वैदिक संस्कृतिक सरल रूप अछि। वैदिक संस्कृतमे लौकिक संस्कृतसँ सभ किछु बेशी अछि (अपवाद- लुट् आ लृट् लकारक वैदिक संस्कृतमे कम उपयोग।)
संहिता, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक आ उपनिषदक भाषा वैदिक संस्कृत कहल जाइत अछि आ तकर बादक संस्कृत लौकिक संस्कृत कहल जाइत अछि।
दुनू संस्कृतमे धातु, शब्द आ अर्थ प्रायः एक्के अछि।
दुनूमे तीन लिंग, तीन वचन आ तीन पुरुष होइत अछि।
दुनूमे सभ शब्द प्रायः धातु अछि; रूढ़ शब्द बड्ड कम अछि।
समास दुनूमे अछि, हँ लौकिक संस्कृतमे एकर बेशी प्रयोग देखबामे अबैत अछि।
छन्द सेहो दुनूमे मोटा-मोटी एक्के रङक भेटत।
धातुक गण मध्य विभाजन सेहो दुनूमे एक्के रङ भेटत।
णिच्, सन् प्रत्यय दुनूमे एक्के रङ भेटत।
पदक निर्माण दुनूमे एक्के तरीकासँ होइत अछि।
सुप्-तिङ-कृत्-तद्धित दुनूमे एक्के रङ भेटत।
दुनूमे शब्दक क्रम आगाँ पाछाँ भेने अर्थक परिवर्तन नहि होइत अछि। दुनूमे सन्धि, कारक आ विभक्ति होइत अछि।
मुदा:-
लौकिक संस्कृतमे उपध्मानीय आ जिह्वामूलीय ध्वनिक प्रयोग नहि होइत अछि आ तकर स्थानमे विसर्गसँ काज चलैत अछि।
वैदिक संस्कृतमे ळ, ळह होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे दू स्वर मध्य ळ भऽ जाइत अछि आ ळह भऽ जाइत अछि। लौकिक संस्कृतमे से नहि अछि।
ग्वाङ (ह्रस्व आ दीर्घ) लौकिक संस्कृतमे नहि अछि। यजुर्वेदमे ह, , , , र एहि सभसँ पूर्व अनुस्वार ग्वाङ भऽ जाइत अछि।
उदात्त, अनुदात्त आ स्वरितक उच्चारण लौकिक संस्कृतमे स्पष्ट रूपसँ नहि होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे लेट् लकारक प्रयोग होइत अछि, लौकिक संस्कृतमे नहि।
वैदिक संस्कृतमे उपसर्ग धातुसँ पृथक् मुदा लौकिक संस्कृतमे संगमे प्रयोग होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे कृत् प्रत्ययक तुमुन् से, सेन्, असे, अध्यै इत्यादि १५ टा प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे खाली तुम्प्रत्ययक प्रयोग होइत अछि।
वैदिक संस्कृतक सन्धि निअम शिथिल होइत अछि मुदा लौकिक संस्कृतक दृढ़ होइत अछि।
वैदिक कतेको शब्दक अर्थ लौकिक संस्कृतमे बदलि गेल अछि। जेना असुर वैदिक संस्कृतमे शक्तिवानकेँ कहल जाइत छल मुदा लौकिक संस्कृतमे राक्षसकेँ कहल जाइत अछि।
धातुरूप सेहो वैदिक संस्कृतमे भिन्न अछि, अन्तिम स्वर दीर्घ सेहो होइत अछि। जेना चक्र- चक्रा: द्वित्वक अभाव होइत अछि जेना ददातिक स्थानमे दाति”; कखनो काल परस्मैपदिक स्थानमे आत्म्नेपद आ आत्मनेपदिक स्थानमे परस्मैपद धातुक प्रयोग होइत अछि; शप् स्थानपर कखनो काल दोसर गणक विकरणक प्रयोग होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे शब्द रूप, धातु रूप, प्रत्ययक विविधता बेशी अछि।
वैदिक संस्कृतक काल-पुरुष-वचन-लिंगक ऐच्छिक परिवर्तन लौकिक संस्कृतमे मोटामोटी खतम भऽ गेल अछि।
वैदिक संस्कृतक अच्, अम्, जिन्व्, पिन्व् आदि धातु लौकिक संस्कृतमेप्रयोग नहि होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे तर-तम प्रत्यय संज्ञा शब्द सन आ लौकिक संस्कृतमे विशेषण सन प्रयुक्त होइत अछि।
छन्दक हिसाबसँ वैदिक संस्कृतमे स्वर्-सुवर् आ दर्शत, दरशत लिखि लेल जाइत अछि। मुदा लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि।
वैदिक संस्कृतमे आन्पदक अन्तमे रहलापर आ तकर बाद अ, , उ स्वर अएलापर न् लुप्त भऽ जाइत अछि आ आकारक बाद अनुस्वार भऽ जाइत अछि। जेना महान् इन्द्रः= महा इन्द्रः। लौकिक संस्कृतमे से नहि होइत अछि।

वैदिक संस्कृत:-धातुरूप:-
लट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन परस्मैपदि धातु थ, , थन, तन ई चारू प्रत्यय लगैत अछि। जेना वद्- वदथ, वदथन, वदत, वदतन।
लट् लकार उत्तमपुरुष-बहुवचन परस्मैपदि धातु मस् (मः), मसि ई दूटा प्रत्यय प्रयोग होइत अछि। जेना नाशयामः- नाशयामसि। इमः इमसि। स्मः- स्मसि।
लोट् लकारक मध्यमपुरुष एकवचन परस्मैपदि धातुमे हि, धि ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना श्रुणुहि, श्रुणुधि।
लोट् लकार मध्यमपुरुष बहुवचन आत्मनेपद धातुमे ध्वम् आ ध्वात् ई दूटा प्रत्यय होइत अछि। जेना वारयध्वम्, वारयध्वात्।
(छन्दसि लुङ् लङ् लिटः):- वैदिक संस्कृतमे लुङ्, लङ् आ लिट् लकारक प्रयोग लोट्, लट् लकारक अर्थमे प्रयोग होइत अछि। जेना आगमत् (वैदिक लुङ्)= आगच्छतु (लोट)। अवृणीत (वैदिक लङ्)= वृणीते (लट्)। ममार (वैदिक लिट्)= म्रियते (लट्)।
वैदिक संस्कृत:-शब्दरूप:-
[संस्कृत (सं= स्+म- ई ठीक अछि; एकर उच्चारण सं= स्+न गलत अछि।)]
वैदिक संस्कृतमे शब्दरूपक भिन्नता लौकिकसँ बेशी होइत अछि। जेना अकारान्त पुल्लिंग देवः प्रथमा-स्वितीया-सम्बोधन-द्विवचन वैदिकमे देवा, देवौ दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवौ होइत अछि। प्रथमा-सम्बोधन-बहुवचन वैदिकमे देवासः, देवाः मुदा लौकिकमे मात्र देवाः होइत अछि। तृतीया-एकवचन वैदिकमे देवा, देवेन दुनू होइत अछि मुदा लौकिकमे मात्र देवेन होइत अछि। तृतीया-बहुवचन वैदिकमे देवेभिः, देवैः मुदा लौकिकमे देवैः होइत अछि।
तहिना वैदिक संस्कृतमे ऋकारान्त शब्दक रूप पुल्लिंग-स्त्रीलिंगमे लौकिक संस्कृत जेकाँ होइत अछि, खाली प्रथमा-द्वितीया-सम्बोधन-द्विवचनमे दू रूप होइत अछि। जेना दातृ- दातारा, दातारौ। पितृ- पितरा, पितरौ। मातृ- मातरा, मातरौ।
अस्मद्:- प्रथमा-द्विवचन वैदिक- वाम्, आवम्; लौकिक आवाम्। चतुर्थी-एकवच वैदिक- मह्य, मह्यम्; लौकिक- मह्यम्। पञ्चमी-द्विवचन वैदिक आवत्, आवाभ्याम्; लौकिक- आवाभ्याम्। सप्तमी-बहुवचन वैदिक-अस्मे, अस्मासु; लौकिक- अस्मासु।
छन्द:-
पिङ्गल मुनिक छन्द शास्त्रक आठमे सँ पहिल चारिम अध्यायक सातम सूत्र धरि वैदिक छन्दक आ तकरा बाद लौकिक छन्दक वर्णन अछि।
वैदिक छन्दमे अक्षरक गणना होइत अछि। ओतए लघु आ गुरुक विचार नहि होइत अछि। ऋगवेदमे सभसँ बेशी त्रिष्टुप्, फेर गायत्री आ तखन जगती छन्दक प्रयोग भेल अछि।
त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर- ११ अक्षरक ४ पाद;
गायत्री- २४ अक्षरक (ई २,,,५ पदक होइत अछि), सभसँ बेशी लोकप्रिय ८ अक्षरक तीन पादक गायत्री जाहिमे दोसर पादक बाद विराम होइत अछि। २३ अक्षरक गायत्री निचृद् गायत्री, २२ अक्षरक गायत्री विराड् गायत्री, २५ अक्षरक गायत्री भुरिग् गायत्री, २६ अक्षरक गायत्री स्वराड् गायत्री कहल जाइत अछि। सभ पादमे एक अक्षर कम भेलासँ पादनिचृद् गायत्रीकहल जाइत अछि।
जगती- ४८ अक्षर- १२ अक्षरक चारि पाद।
पाठ:-
वैदिक संस्कृतकेँ स्मरण रखबाक कएकटा विधि अछि।
संहिता पाठ- मूलमंत्र सन्धि सहित सस्वर पढ़ल जाइत अछि।
पदपाठ- मन्त्रक पदक पृथक पाठ होइत अछि।
क्रमपाठ- क्रमसँ दू पदक पाठ होइत अछि।
जटापाठ- अनुलोम १-२, विलोम २-१, अनुलोम १-२
शिखापाठ- जटापाठमे परिवर्तित उत्तरपदक योगसँ शिखापाठ होइत अछि।
घनपाठ- शिखामुक्त विपर्यक पदक पुनः पाठ होइत अछि।

वैदिक संस्कृतमे यज्ञ आ अध्यात्मिक विषयक चर्च होइत अछि। लौकिक संस्कृतमे इहलौकिक विषयवस्तु सेहो अबैत अछि।

२.प्राकृत
संस्कृतसँ पहिने प्राकृत रहए वा बादमे ई विवादक विषय भऽ सकैत अछि कारण ऋगवेदक शिथिर, दूलभ, इन्दर आदि शब्द जनभाषाक साहित्यीकरणक प्रमाण अछि। ओना एकर प्रारम्भिक प्रयोग अशोकक अभिलेखसँ तेरहम शताब्दी ई. धरि भेटि जाएत मुदा पारिभाषिक रूपमे जाहि प्राकृतक एतए चर्चा भऽ रहल अछि ओ पहिल ई.सँ छठम ई. धरि साहित्यक भाषा दू अर्थे रहल। पहिल संस्कृत साहित्यक नाटकमे जन सामान्य आ स्त्री पात्र लेल शौरसेनी, महाराष्ट्री आ मागधीक (वररुचि चारिम प्राकृतमे पैशाचीक नाम जोड़ै छथि) प्रयोग सेहो भेल (कालिदासक अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, शूद्रकक मृच्छकटिकम्, श्रीहर्षक रत्नावली, भवभूतिक उत्तररामचरित, विशाखादत्तक मुद्राराक्षस) आ दोसर जे फेर एहि प्राकृत सभमे साहित्यक निर्माण स्वतंत्र रूपेँ होमए लागल। फेर एहि प्राकृत भाषाकेँ सेहो व्याकरणमे बान्हल गेल आ तखन ई भाषा अलंकृत होमए लागल आ अपभ्रंश आ अवहट्ठक प्रयोग लोक करए लगलाह, ओना अपभ्रंश प्राकृतक संग प्रयोग होइत रहए तकर प्रमाण सेहो उपलब्ध अछि।
अशोकक अभिलेखमे शाहबाजगढ़ी आ मानसेराक अभिलेख उत्तर-पच्छिम, कलसी, मध्य, धौली, जौगड़ पूर्व आ गिरनार दक्षिण पच्छिमक जनभाषाक क्षेत्रीय प्रकारक दर्शन करबैत अछि। राजशेखर प्राकृतकेँ मिट्ठ आ संस्कृतकेँ कठोर कहै छथि (विद्यापति पछाति कहै छथि देसिल बयना सभ जन मिट्ठा)।
प्राचीन प्राकृत पालीकेँ कहल जाइत अछि जाहिमे अशोकक अभिलेख, महवंश आ जातक लिखल गेल। मध्य प्राकृतमे साहित्यिक प्राकृत अबैत अछि। बादक प्राकृतमे अपभ्रंश आ अवहट्ठ अबैत अछि।
मोटा-मोटी गद्य लेल शौरसेनी, पद्य लेल महाराष्ट्री आ धार्मिक साहित्य लेल मागधी-अर्धमागधीक प्रयोग भेल। नाटकमे स्त्री-विदूषक बजैत रहथि शौरसेनीमे मुदा पद्य कहथि महाराष्ट्रीमे, नाटकक तथाकथित निम्न श्रेणीक लोक मागधी बजैत छलाह।
प्राकृतमे सुप् तिङ् धातुक संग मिज्झर भऽ जाइत अछि।
प्राकृतमे धातुरूप १-२ प्रकारक (भ्वादिगण जेकाँ) आ शब्दरूप ३-४ (अकारान्त जेकाँ) प्रकारक रहि गेल, माने दुनू रूप कम भऽ गेल। मुदा एहिसँ अर्थमे अस्पष्टता आएल जकर निवारण कारकक चेन्ह कएलक।
चतुर्थी, द्विवचन, लङ् लिट् लुङ् आत्म्नेपद आदिक अभाव भऽ गेल प्रथमा आ द्वितीयाक बहुवचन एक भऽ गेल। ध्वनि परिवर्तन भेल। ऋ, , , , , ष आ विसर्गक अभाव भेल (अपवाद मागधीमे य आ श अछि मुदा स नहि)।
अन्तमे आएल व्यंजन लुप्त भेल (ह्रस्व स्वरक बाद दू आ दीर्घ स्वरक बाद एकसँ बेशी व्यंजन नहि रहि सकैत अछि।)

 (शेष अगिला अंकमे)

 
जगदीश प्रसाद मंडल 1947-
गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।

कथा
ठकहरबा

भोरहरबेमे दादीक नीन उचटि‍ गेलनि‍। लाख कोशि‍श केलनि‍ मुदा दोहरा कऽ नीन नहि‍ घुरलनि‍। ओना भोरूका समए बसन्‍ते जकॉं मधुआइल रहैत मुदा, ओहो कि‍ सबहक लेल एक्के रंग थोड़े रहैए। दि‍न-राति‍ काजक पाछु नचनि‍हारकेँ थोड़े बसन्‍त आ ग्रीष्‍मक भेद बुझि‍ पड़ैत। दादीक मनमे एलनि‍ जे अखने ललि‍तक ऐठाम जा कऽ कहि‍ऐ जे अखुनके माने भि‍नसुरके उखड़ाहामे चि‍मनीपरसँ पजेबा आ बेरूका उखड़ाहामे बजारसँ एस्‍वेस्‍टस आनि‍ दि‍हह। भोरूका अन्‍हारक दुआरे रति‍गर बुझि‍ पड़लनि‍। मनमे एलनि‍ जे जँ कहीं बि‍छानपर जाय आ नि‍न्न आबि‍ जाए तहन तँ पहपटि‍ हएत। मुदा एत्ती राति‍केँ जेबो कतऽ करब? गुन-धुन करैत सोचलनि‍ जे से नइ तँ घरसँ ओछाइन नि‍कालि‍ अंगनेमे बि‍छा कऽ पड़ब नहि‍, बैसि‍ कऽ काजक गर लगाएब। सएह केलनि‍। काजपर नजरि‍ दइते पजेबापर मन गेलनि‍। एक नम्‍बर रॉंट ईंटा तँ तते महग अछि‍ जे कीनब थोड़े पाड़ लागत। मन मन्‍हुआ गेलनि‍। जहि‍ना दू-बट्टी, तीन-बट्टीपर पहुँचते यात्री अपन अगि‍ला बाट हि‍याबए लगैत अछि‍ तहि‍ना दादि‍यो हि‍याबए लगलीह। कते दि‍न जीबे करब जे एक नम्‍बर ईंटाक जरूरत अछि‍। लऽ दऽ कऽ बीस-पच्‍चीस बर्ख आरो जीबि‍ तइले तँ तीनि‍यो नम्‍बर ईंटा नीके हएत। फेरि‍ मनमे एलनि‍ जे कि‍यो कि‍ अपने टा लए घर बनबैए आकि‍ बालो-बच्‍चाले बनबैए। मन ठमकि‍ गेलनि‍। कि‍छु फुड़बे ने करनि‍। फेरि‍ मनमे उठलनि‍ जे लोक कॉंच-ईंटाक घर कोना बनबैए। ओहो तँ तीस-चालीस बर्ख चलि‍ये जाइ छै। ओइसँ नीक ने तीन नम्‍बर। कमसँ कम पकलो तँ रहैए। जतबे नुआ रहए ततबे टॉंग पसारी। तीनि‍यो नम्‍बर तँ ईंटे छी कीने? हँ, हँ, तीनि‍ये नम्‍बर ईंटा लेब। मन आगू बढ़ि‍ चदरापर माने एस्‍वेस्‍टसपर गेलनि‍। चदरापर नजरि‍ पड़ि‍ते मन झुझुआ गेलनि‍। सि‍मटीक तेहन चदरा बनए लगल अछि‍ जे सालो भरि‍ चलत कि‍ नहि‍? जँ कहीं गोलगर पाथर खसल तँ चूरम-चूर भऽ जाएत। पहि‍ने केहेन बढ़ि‍या टीनक चदरा अबै छलै जे एक बेरि‍ घरपर दए दि‍औ कत्ते दि‍न ओहि‍ना रहत। मुदा ओहो बैशाख-जेठक रौदमे रहै-बला नइ होइए। ओना जँ गतगर कऽ खरही छाड़क उपरमे दऽ दि‍यौ तँ कोठे जकॉं भऽ जाइए। मुदा तेहेन-तेहेन ठकहरबा बनि‍यॉं सभ भऽ गेल अछि‍ जे लेबालकेँ जे होउ अपन धड़ि‍ ति‍जोड़ी भरै। खएर जे होउ, जे सबहक गति‍ से हमरो हएत। तइले कते मगज चटाएब।
      पौहु फटि‍ते सूर्यक लाली देखि‍ दादी ओछाइन समेटि‍ घरमे रखि‍ ललि‍तक ऐठाम बि‍दा भेलीह। मन पड़लनि‍, आठमे दि‍न अदरा नक्षत्र चढ़त। आठे दि‍नक पेसतर घर बनबैक अछि‍। जँ से नइ भेलि‍ तँ गि‍लेबापर जोड़ल देवाल ढहत-ढनमनाएत कि‍ की हएत? सेहो ने कहि‍। जे घर अखन अछि‍ ओहो उजड़ि‍ये जाएत। तइ बीच जँ बरखा झहड़ल तँ जानो बँचब कठि‍न भऽ जाएत।
      ललि‍तकेँ दरबज्‍जा नहि‍। भनसे घरमे सुतबो करैत। ठोकले दादी आंगन पहुँच ओलती लगसँ कहलखि‍न- गोसाइ उगैपर भेलखि‍न आ तों सुतले छह? दादीक अवाज सुनि‍ ललि‍तक पत्‍नी सुपती उठि‍ केबाड़क अधा पट्टा खोलि‍ चुपचाप बाड़ी दि‍स वि‍दा भेलि‍। ओसार टपि‍ केबाड़क दुनू पट्टा खोलि‍ ललि‍तक देह डोलबैत दादी कहलखि‍न- ललि‍त, ललि‍त। उठह, कते सुतै छह?
  सुतले-सुतल अँाखि मुननहि‍ ललि‍त बाजल- की कहै छी?
  अखैन धरि‍ सुतले कि‍अए छह?
  ओछाइनपर सँ उठि‍ दादीकेँ बैसबैत अपनो बैसि‍ बाजल- बड़ी राति‍मे पुलि‍सक गाड़ी खोइर-बन्‍हामे लसैक गेलै। भरि‍ गाड़ी पुलि‍स रहए। कतबो बाप-बाप केलक मुदा, गाड़ी नइ नि‍कललै। जना जानि‍ कऽ अनठा देलकै।‍
      बि‍नु दॉंतक चौड़गर मुँह, गालक मसुहरि‍पर दूटा इंच-इंच भरि‍क पाकल केश, सोन सन उज्‍जर धप-धप केश, गरदनि‍क चमड़ा घोकचल दादीक। ठहाका मारि‍ बजलीह- तोरा सन-सन आदमी से कि‍ बेसी बुत्ता ओकरा सबकेँ होइ छै। गांजा पीबि‍-पीबि‍ छाती फोंक कऽ नेने रहैए।‍
  मुँह चटपटबैत ललि‍त- बड़ मोटगर-सोटगर सभ रहए?
  धु: बतहा कहीं कऽ एतबो नइ बुझै छहक जे तखैन थालमे से जीप कि‍अए ने उखड़लै।‍
  मुँह डेढ़बड़ा कऽ ललि‍त बाजल- उ सभ हाकि‍म रहै कि‍ ने।‍
  अच्‍छा, ई सब छोड़ह। पाइ कते देलकह?”
  पहि‍ने वएह पुछलकै जे कते दि‍अ?‍ ओना हमहूँ सभ सात-आठ गोरे रही मुदा, हमरा छोड़ि‍ सबकेँ होइ जे कहुना जान छोड़ए। सबकेँ सुक-पाक करैत देखि‍ऐ। एक गोरे बाजि‍ देलकै जे हुजूर सरकारि‍ये पाइ छि‍यै कि‍ ने? एतबे सुनैत मातर तड़ंगि कऽ एक गोटे बाजल रौ बहिं, तुम पहचानता नहीं है।‍  कहि‍ पाइ आगूमे फेकि‍ वि‍दा भऽ गेल।‍
  ‍सुआइत तोरा ओंघी दबने छह। हमहूँ काजे एलौंहेँ। अखन ते तू भकुआइल छह। मुँह-हाथ धुअह। काजक गप छी तेँ कने असथि‍र से वि‍चार करब। ओना अपनो मुँह-कानमे पानि‍ नहि‍ये नेने छी।
  ऍंह, ते कि‍ हेतइ दादी। एक दि‍न टुटलहो-फटलाहा घरक चाह पीबि‍ कऽ देखि‍औ।‍
      सुपतीकेँ कानमे फुसफुसा दादी चौमास दि‍शि‍ वि‍दा भेलीह। जाबे दादी मुँह-कान धोए तैयार होथि‍ तहि‍सँ पहि‍ने ललि‍त सुपतीकेँ चाह बनबैले कहि‍ ओसारक बीचला खूँटा लग पीढ़ी रखि‍ दादीक बाट देखए लगल। अबि‍ते दादी बजलीह- कलक पानि‍ बड़ सुन्नर छह।‍ कहि‍ खूँटामे ओंगठि‍ पीढ़ीपर बैसि‍ गेलीह। सुपती चाह नेने आगूमे रखि‍ देलकनि‍। चाहक रंग देखि‍ दादीक मन खुशी भऽ गेलनि‍। एक घोंट पीबि‍ बजलीह- तेहेन चाह छह जे एक्के उपे जलखै बेरि‍ तक रहब।‍
  ललि‍त- आइ काज अनठि‍या दि‍औ दादी।‍
  मुस्‍की दैत दादी- कि‍अए, घरमे सि‍दहाक ओरि‍यान छेबे करह...। (मुदा लगले बात बदलि‍) कोन ऐहन हलतलबी काज आगूमे छह जे आइ मनाही करै छह?
  मुँह दाबि‍ सुपती बाजलि‍- हि‍नका नै बुझल छनि‍ जे आइ इलेसन (इलेक्‍शन) छि‍ऐ।‍
  सुपतीक बात जना दादीक अँतरीमे छुबि‍ देलकनि‍। जहि‍ना आम तोड़ि‍नि‍हार सरं-गोलि‍या गोला आमपर फेकैत तहि‍ना दादी फेकब शुरू केलनि‍- कोन फेरि‍मे पड़ए चाहै छह, अपन दुख धंधामे लागल रहह। सभटा ठकहरबा छी। एते दि‍न अपनो सएह बुझै छलौं, मुदा आब बुझै छी जे ठकाइत-ठकाइत जि‍नगि‍ये ठका गेल। (मूड़ी नि‍च्‍चा कऽ) जहि‍या समाज खादी साड़ी पहि‍रा माए जी कहलक‍ तहि‍या बुझि‍ पड़ल जे समाज की छी। स्‍वर्गोसँ उपर। मुदा तेहेन-तेहेन ठकहरबा सभ भऽ गेल अछि‍ जे बाजत ढेरी करत कि‍छु नहि‍।
  ललि‍त- अहॉंकेँ कि‍अए समाज खादी पहि‍रौलनि‍ दादी?
  ललि‍तक प्रश्‍न सुनि‍ दादी वि‍स्‍मि‍त भऽ गेलीह। जहि‍ना बोनमे जानबरक छोट-छोट बच्‍चा बौआ कऽ हरा जाइत तहि‍ना आजादी समयक बोनमे दादी हरा गेली। दादीकेँ वि‍स्‍मि‍त देखि‍ ललि‍तकेँ बुझि‍-पड़लै जे दादी फेरि‍ कतौ औना गेलीह। तेँ दोहरा कऽ नहि‍ पुछि‍ जबाबक प्रतीक्षा ओहि‍ रूपे करए लगल जहि‍ रूपे माए बच्‍चाकेँ वि‍द्यालयसँ अबैक पति‍क्षा करैत रहैत छथि‍। चौअन्‍नि‍या मुस्‍की दैत दादी बजए लगलीह- दुरागमन कए कऽ आइले रही। बूढ़ा-बूढी माने सासु-ससुर जीबि‍ते रहथि‍। बेटा मात्रि‍क गेलनि‍। ओइ ठीनक लोक सभ झंडा उठा खूब हूड़-बरेड़ा करैत रहए। अपनहुँ (पति‍) हुनके सभ संगे बौउर गेलाह। तीनि‍ मास बीता कऽ गाम एलाह।‍
  ललि‍त- बाबा बि‍गड़बो केलखि‍न?
  दादी- (अपसोच करैत) ‍ओ सभ स्‍वर्ग गेला हम नर्कमे छी। आगि‍ नइ उठेबनि‍। हँ, ई भेलै जे बुढ़हो जोगारी रहथि‍न। तरे-तर सरहोजि‍सँ सभ भॉंज लगा लेने रहथि‍। जाबे गाम घुरि‍ कऽ एलाह ताबे ते इम्‍हरो लोक झंडा उठा हड़बि‍रड़ो करए लगल रहए।‍ आजादीक कि‍छुए दि‍नक पछाति‍ गाममे मलेरि‍या आएल। चारि‍ अन्नासँ बेसि‍ये लोक मरल। अपनो घरहंज भऽ गेल। तीनू गोटे (सासु-ससुर आ पति‍) मरि‍ गेलाह। मात्र अपने आ छह मासक बच्‍चा बचलौं। ओही बेटाकेँ पोसि‍-पालि‍ जुआन बनाएब अपन देशसेवा बुझलि‍यै। खादी साड़ी पहि‍रैक यएह कारण रहए।
  मुस्‍की दैत सुपती पुछलकनि‍- नेता सभ जकॉं भाषणो करथि‍न?
  बेसी ते नइ बाजल हुअए मुदा, मंचपर दुनू हाथ जोड़ि‍ एत्ते जरूर कहि‍यै जे हे ब्रह्मबाबा गामक रक्‍छा करि‍हह। मुदा सभ झूठ भऽ गेल। ने ब्रह्मबाबा सुनलनि‍ आ ने ककरो रक्‍छा भेलइ।‍
  सुपती- खादीबला सभ भरि‍ दि‍न झूठे बजैए?
  सुपतीक बातसँ दादीकेँ दुख नहि‍ भेलनि‍। मुस्‍की दैत कहलखि‍न- ओहि‍ना कनी कऽ मन अछि‍। शुरूक तीनि‍ भोटमे बहरबैया नेता सभ संग कऽ कऽ गाम घुरलथि‍। जते काल संगमे रहि‍एनि‍ तते काल गामेक गप-सप्‍प करथि‍। गाममे ने नीक सड़क अछि‍ आ ने बच्‍चा सभकेँ पढ़ैले स्‍कूल। ने पानि‍ पीवैक समुचि‍त बेवस्‍था अछि‍ आ ने दवाइ-दारूक। गाड़ी-सवारीक नाओपर बैलगाड़ी अछि‍। एहेन समस्‍या‍ सि‍र्फ अपने गाम टाक नहि‍ इलक्केक अछि‍। सरकारक अपने बेवस्‍था लटपटाएल अछि‍। हरि‍तक्रान्‍ति‍क पूर्व धरि‍ पेटक दुआरे आन-आन देश से जनेर-गहूम मंगबए पड़ैत छलए। (कने चुप भऽ मन पाड़ि‍) तही बीच भूदानी आन्‍दोलन जगल। नारा देलक- जमीनक छबम हि‍स्‍सा दान दि‍अ जहि‍सँ गरीब लोककेँ बासक संग जोतो जमीन भेटि‍तै। गामक-गाम दान हुअए लगल। मुदा अखन कि‍ देखै छहक जे जोतक कोन बात जे घरारि‍यो सभकेँ नइ छै। (ठहाका मारि‍) सबटा मदारी नाच केलक।
  पटरीपर सँ दादीक बातकेँ उतड़ैत देखि‍ ललि‍त पत्‍नीकेँ कहलक- बूढ़ि‍ दादी छथि‍न थकबो करै छथि‍न कि‍ ने। शि‍खरक पुड़ि‍या खोलि‍यापर से नेने आउ?
  शि‍खरक नाओ सुनि‍ दादीक मनमे भेलनि‍ जे शि‍खर केहेन होइ छै। आइ धरि‍ नामो नइ सुनने छलि‍यै। मुदा बजलीह नहि‍। चकोना होइत ललि‍त बुझि‍ गेल जे भरि‍सक दादी शि‍खर नहि‍ खेने छथि‍। मुस्‍कुराइत कहलकनि‍- जहि‍ना चाह पीलापर देहमे फुनफुनी आबि‍ जाइ छै तहि‍ना दादी शि‍खरो खेने होइ छै। इस्‍कुलि‍या विद्यार्थी सभ ते भरि‍-भरि‍ जेबी रखने रहैए।‍
      सुपती हाथसँ एकटा पुड़ि‍या लए ललि‍त दादी दि‍शि‍ बढ़ौलक। जहि‍ना खच्‍चा-खुच्‍चीमे पानि‍ देखि‍ बकरी पाछु हटैत रहैत अछि‍ तहि‍ना शि‍खरक पुड़ि‍या देखि‍ दादीक मन पाछु हटलनि‍। मुदा नव चीज रहने सेहन्‍तो भेलनि‍। एक चुटकी मुँहमे दइते बुझि‍ पड़लनि‍ जे सरसरा कऽ नि‍च्‍चा उतड़ल जाइए।
  तखने ललि‍त पुछलक- अपनो गामक लोक जमीन दान केलक?
  ललि‍तक बात सुनि‍ खौंझा कऽ दादी बजलीह- कहबे ते केलि‍यह जे सबटा बानरक नाच केलक। एक गोटे समस्‍तीपुर दि‍सक भूदानी नेता खोज करैत अपने ऐठाम एलाह। (मने-मन मुस्‍कुराइत) कि‍ कहि‍हह हुनकर हाल। सॉंझू पहर जखन गप-सप्‍प करए लगथि‍ तँ बुझि‍ पड़ए जे जहि‍ना त्रेता युगमे रामराज रहै तहि‍ना फेरि‍ कलयुगोमे भऽ जाएत। ने ककरो पेटक चि‍न्‍ता रहतै आ ने रोग-व्‍याधि‍क। मुदा, ले सुथनी, भि‍नसर से दुपहर धरि‍ ओकरा सावुन रगड़ि‍-रगड़ि‍ नहाइये आ कपड़े साफ करैमे लगि‍ जाय। बेरू पहर सभ कपड़ा सुखा, पहीरि‍ कऽ दि‍न लहसैन नि‍कले आ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ भाषण करै। एक पनरहि‍या से बेसि‍ये रहल। तहि‍ बीच अकच्‍छ-अकच्‍छ भऽ गेलौं। खादी भंडारक मंगनी कपड़ा पबै, सदति‍काल बगुला जकॉं उज्‍जर धप-धप चेहरा बनौने रहए।‍
  ललि‍त- खादी भंडरमे मंगनि‍ये कपड़ा बटबारा होय?
  मंगनी कतौ होइ। गाम-गामक उद्योगकेँ उला-पका कऽ खा-पी कऽ चौपट कऽ देलक। गामक गाम लोकक रोजगार मरि‍ गेल। एक तँ कोसी-कमलाक उपद्रव तइपर सँ जेहो छोट-छीन रोजगार गाममे चलैत छल सभ चलि‍ गेल। जखन लोककेँ गाममे पेटे ने भरत तखन कते दि‍न पेटमे जुन्ना बान्‍हि‍ कऽ रहत। गामक-गामकेँ पड़ाइन लगि‍ गेल। ने बच्‍चा सभकेँ पढ़ैक स्‍कूल अछि‍ आ ने रोग-व्‍याधि‍क लेल डखाना (अस्‍पताल)।‍ बजैत-बजैत दादी वि‍स्‍मि‍त भऽ गेलीह। अँाखि बन्न भऽ गेलनि‍।
      गुम-सुम देखि‍ ललि‍त पुछलकनि‍- पहि‍लुका बात तँ छुट्टि‍ये गेल?
  ललि‍तक प्रश्‍न सुनि‍ दादी मन पाड़ि‍ बजलीह- चारि‍म भोट अबै से कि‍छु पि‍हने मारि‍ते-रास पाटी फड़ि‍ गेल। कखनो कोनो रंगक झंडा लऽ कऽ जुलूसो नि‍कले आ सभो होय तँ कखनो कोनो रंगक। जहि‍ना आखि‍री लगनमे छुटल-बढ़ल, बूढ़-पुरान, लुल्‍ह-नांगर सभ पालकीपर चढ़ि‍ लैत तहि‍ना भदबरि‍या बेंग जकॉं गामे-गाम नेता फड़ि‍ गेल। ओना हम लि‍खा-पढ़ी कऽ कऽ कोनो पाटीक मेम्‍बर नइ भेल रही मुदा लोको बुझे आ अपनो मानैत रही। तेँ मनमे अरोपने रही जे जेकरा जे मन फुड़ौ से करह मुदा जहि‍ना शुरू से रहलौं तहि‍ना रहब। भोट होइ से पहि‍नहि‍ कताक गाममे मारि‍ भेल। अपना गाममे भोट दि‍न तक ते मारि‍ नहि‍ भेल मुदा भोट दि‍न एहन मारि‍ भेल जे लोककेँ पड़ाइन लगि‍ गेलै।‍
  सुपती- हि‍नको कि‍यो मारलकनि‍?”
  ‍नइ कनि‍याँ, हाथ तँ नइ उठौलक। मुदा भोट खसबै नहि‍ दि‍अए। हमर भोट केदैन खसा नेने रहए। कते कहा-सुनी भेलापर अनके नामपर भोट खसेलौं। भोट खसा कऽ जखन घुरलौं ते मनमे आएल जे आब भोट खसबै लए नइ आएब।
  ललि‍त- पाटीबला सबकेँ नइ कहलि‍ऐ?
  दादी- कि‍ कहि‍ति‍यै। संयोगो नीके बुझहक। अगि‍ला भोटमे पार्टीक उम्‍मीदवारे ने ठाढ़ भेल। जान हल्‍लुक भेल। आन पाटी ते मारि‍ते रहै मुदा ककरा भोट दीति‍ऐ आ ककरा नइ दीति‍ऐ। तइ से नीक जे बूथपर जाएबे छोड़ देलि‍ऐ।‍
  ललि‍त- ककरो नफ्फा-नोकसान होउ, अहॉं ते बचलौं कि‍ ने?
  ललि‍तक बात सुनि‍ दादीक अँाखि‍ नोरा गेलनि‍। मुँहसँ बकारे नहि‍ फुटनि‍। थोड़े-खान चुप रहि‍ बजलीह- बौआ, पटना दि‍ल्‍ली ते कहि‍यो मनोमे ने आएल मुदा गामोमे जहुना छलौं तहुना नइ रहलौं। जइ समाजक लोक माए जी कहैत छलए आेइ समाजमे लोक ड़ाॅड़ी कहए लगल। अइ बातक दुख सदि‍खन मनकेँ व्‍यथि‍त केने रहैए।‍ कहि‍ अँाखि बन्न कऽ सोचमे डुबि‍ गेलीह। कि‍छु समए गुम्‍म रहि‍ पुन: बजए लगलीह- गामे-गाम तेहेन अगराही लगि‍ गेल छै जे शान्‍त हएव कठि‍न अछि‍। पूबारि‍ गाममे खेतक झगड़ामे मारि‍ भेल। से खूब मारि‍ भेल। दुनू दि‍स कते गोटेकेँ कान-कपार झड़लै। एकटा खूनो भेलै। मुदा अचरज ई भेलि‍ जे एहेन सना-सनी रहि‍तौ गौऑंमे सुबुद्धि‍ जगलै। कि‍यो कोट-कचहरी नहि‍ गेल। गामेमे फड़ि‍या गेल। अखन जँ ओना होइत तँ गाम उजरि‍ जाएत। तेहेन-तेहेन मनुक्‍ख सभ बनि‍ गेल अछि‍ जे सदति‍काल फोसरि‍ये तकने घुरैए।‍
  ललि‍त- भोटो दि‍न छी दादी। भोटो खसबैक अछि‍। मुदा जखन अहॉं आबि‍ गेलौं तखन पहि‍ने अहॉंक काज सम्‍हारि‍ देब।‍
  दादी- भोट खसबैले थोड़े मनाही करबह। भि‍नसर से सॉंझ धरि‍ भोट खसैए। पॉंच बजेमे भोट खसा लि‍हह।‍
  ताबे तक भोट बचले रहत?
  जे लड़ैए, ओकरा एतबो बुत्ता नइ छै जे बूथ सम्‍हारि‍ कऽ राखत। ओना भोटे खसौने कि‍ हेतह। देखते छहक जे कि‍यो बक्‍से हेरा-फेरी कऽ लैत अछि‍ तँ कि‍यो रि‍जल्‍टे बदलि‍ लैत अछि‍।‍
  बेस कहलौं दादी। काका (दादीक बेटा) कतऽ रहै छथि‍?
  बेटाक नाओ सुनते दादीक मनमे खुशी एलनि‍। मुस्‍की दैत बजलीह- बौआ, पनरह-बीस बर्ख से बौआइते-ढहनाइते छलए। पहि‍ने दि‍ल्‍ली गेल। ओइठीन काज नै भेलै तब बमै गेल। ओतौ नोकरी नै भेलै। तखन हाड़ि‍-थाकि‍ कऽ‍ पॉंच बर्ख पहि‍ने कलकत्ता गेल। मुदा जहि‍ना बमै पाइ बलाक छी तहि‍ना कलकत्ता गरीब लोकक छी। ओइठीन एकटा साइकिल मि‍स्‍त्रीक दोकानमे नोकरी भऽ गेलै। दरमाहा ते बेसी नइ दइ मुदा साइकिल बनबैक सभ लूरि‍ भऽ गेलै। अपने दि‍गारि‍क मि‍स्‍त्री छी। अपने बहीनि‍ से वि‍आहो कऽ देलकै। सुनै छी जे पुतोहूओ मि‍सति‍रि‍आइ करैए। दुनू बेकती एते कमा लइए जे अपनो गुजर करैए आ घर बनबैले रूपैइयो पठा देलकहेँ। सएह रूपैआ छी।
  असकर लए तँ अहॉंकेँ एक्‍कोटा घर से काज चलि‍ जाएत?
  हँ, से ते चलि‍ जाएत। मुदा पुरजीमे लि‍खने अछि‍ जे आब गामेमे रहब। पुरना जते मि‍सति‍री अछि‍ ओ सभ मोटर साइकिलक मि‍सति‍री भऽ गेल। जहन कि‍ गामे-गाम साइकिलक पथार लगि‍ गेल हेन। तहूमे तेहेन साइकिल अछि‍ जे छह मासक उपरान्‍ते मि‍सति‍रीक काज पड़तै।‍
  ललि‍त पत्‍नीकेँ कहलक- एक बेरि‍ आरो चाह बनाउ। दादीक संगे जाएब।‍
  सुपती- घरमे दूध कहॉं अछि‍। नेबोओ सबटा चोराइये के तोड़ि‍ लइ गेल।‍
  दादी- कनि‍यॉं अहॉंकेँ नहि‍ बुझल हएत, नइ‍ नेबो अछि‍ ते नेबोक दूटा पाते दऽ दि‍औ।
      चाह बनल। एक घोट चाह पीबि‍ ललि‍त दादीकेँ पुछलक- दादी केहेन घर बनेबै?
  बौआ, गि‍लेबापर जोड़ि‍ तीन नंबर ईंटाक देवालपर सँ एसवेस्‍टसक छत देबै। कहुना-कहुना ते बीस-पच्‍चीस बर्ख चलबे करत।‍
  से ते बेसि‍ओ चलि‍ सकैए आ सालो भरि‍ नइ चलि‍ सकैए।‍
  से की?
  तेहेन सि‍मटीक घटि‍या एसवेस्‍टस बनैए जे पाथरक चोट बरदास करत।‍
  मूड़ी डोलबैत दादी- हँ, से ते ठीके कहलक।‍ कहि‍ गुम्‍म भऽ गेलीह। दादीकेँ गुम्‍म देखि‍ ललि‍त बाजल- दादी, जेँ अस्‍सी तेँ नि‍नानबे। चदरा तरमे खूब गतगर कऽ खरहीक छॉंड़ दऽ देबइ। जँ पथरो खसत ते चदरे ने फुटत, जान तँ बँचत कि‍ ने। बेसी से बेसी देहपर पानि‍ चुबत। सएह ने।‍ 

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...