Wednesday, April 14, 2010

'विदेह' ५६ म अंक १५ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५६) Part I





'विदेह' ५६ म अंक १५ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५६)NEPAL       INDIA 
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य







३. पद्य







 

 

६. बालानां कृते-. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा


७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ।

मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
http://devanaagarii.net/
http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 

Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ।
 VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव

example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"
विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ।
"मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ।

 १. संपादकीय

मैथिली गजल शास्त्र-२
६ सँ १० टा शेर मोटामोटी एकटा गजलक निर्माण करत। मुदा कोनो ६-७ टा शेरकेँ एकक बाद दोसर लिखि देबै तँ गजल नञि बनि जाएत। 
एहिमे दू-चारि टा गपपर ध्यान देमए पड़त।
जेना वर्ड डोक्युमेन्टमे जस्टीफाइ कएलासँ पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता आबि जाइ छै तहिना यदि शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरमे बिनु जस्टीफाइ केने पाँतिक  आदि आ अन्तमे एकरूपता रहए तँ कहल जाएत जे ओ एकहि बहरमे अछि आ एहि तरहक शेरक समुच्चय एकटा गजलक भाग होएबाक अधिकारी होएत (मैथिलीक सन्दर्भमे वार्णिक छन्दक गणना पद्धति जे भाग-१ मे देल गेल अछि माने

हलंतयुक्त्त अक्षर-0
संयुक्त अक्षर-1
अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक।
, से उपयोगमे कएल जाए आ ओहि आधारपर १९ बहरक बदला छोट-मझोला आ पैघ आकारक पाँतिक उपयोग कएल जाए- नामकरणक कोनो आवश्यकता नहि))  ; संगहि  गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीक अन्त मे आ शेष शेरक दोसर पाँतीक अन्त मे एक वा एकसँ बेशी शब्दक समूह दोहराओल जाएत (रदीफ) सेहो आवश्यक ओना बिनु रदीफक सेहो गजल कहि सकै छी-एक्के भावपर सेहो जजल कहि सकै छी, बिनु मतलाक आ बिनु मकताक  (लोक तँ मकतासँ सेहो गजलक प्रारम्भ करै छथि) सेहो गजल लिखि सकै छी- शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरक बहरमे एकरूपता सेहो नहि राखि सकै छी-  मुदा ई सभ अपवादे स्वरूप, आ अपवाद तँ अपूर्ण रहिते अछि। मतला एकसँ बेशी सेहो भऽ सकैए। गजल कोन शेर हुस्न-ए-गजल (सभसँ नीक शेर) अछि ताहिमे ओहि गजलक  विभिन्न समीक्षकक मध्य मतभिन्नता रहि सकैत अछि। फेर काफिया ओना तँ गजलक सभ शेरमे रहै छै  (रदीफक पहिने) आ शब्द बदलै छै (एकाध बेर पुनः प्रयोग कऽ सकै छी) मुदा ध्यानसँ देखलापर लागत जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै। माने लय रहबाके चाही।

आब आऊ किछु गजल सुनी:
सबसबाइत गप्प छल  तकैत हमरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया हमरापर)
आबैत छलए खौंझाइत  आ सेहो ओकरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया ओकरापर)

होएत हँसारथि  की रहि जाएत चुकड़िऔने ओ मोन मारि (२३ वार्णिक मात्रा )
 बाजत नै मुँह फुलौने, रहत मुदा मोनपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया मोनपर)

ईह कहलकै जे,  मोने-मोन प्रसन्न अछि ओ मारने गबदी (२३ वार्णिक मात्रा )
बुझैए सभ हमहीं बुझै छी, नियारे-भासपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया नियारे-भासपर)

माने  तोहूँ आ तोहर बापो हमर सार सम्बन्ध फरिछा देबौ (२३ वार्णिक मात्रा )
गप्पी छथि !  मुँह घुमेने देखैए कोना मचानपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया मचानपर)

बुझै सभटा छी से नै जे नै बुझै छी मुदा मोना कहैए साइत (२३ वार्णिक मात्रा )
बड़बड़ाइए बाइमे, माने अछि ओ स्वयम् पर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया स्वयम् पर)

"ऐरावत" बुझैत बुझि गेल छी ई जे  सृष्टिक पहिलुके राति (२३ वार्णिक मात्रा )
सभ चरित्र रहल देखैत, एक-दोसरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया एक-दोसरापर)

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ अप्रैल २०१०) ९६ देशक १,२५६ ठामसँ ४१,२६८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३५,३४२ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr  and detailed article and reactions at http://www.videha.co.in/videhablog.html  बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि।
पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...

कतेक उर्फ एहि लेखकक बनत नहि जानि... राजकमल चौधरीक अप्रकाशित पद्य (आब विदेह मैथिली पद्य २००९-१० मे प्रकाशित पृ.३९-४०) बही-खाताक एहि धूर्तता, चोरि कला आ दंद-फंद करैवला पंकज पराशर..उर्फ..उर्फ.. [गौरीनाथ (अनलकान्त)क एहि चोर लेखकक लेल प्रयुक्त शब्द- सम्पादकीय अंतिका अक्टूबर-दिसंबर, 2009- जनवरी-मार्च, 2010- पंकज पराशर प्रसंगमे-] द्वारा हिसाबनामसँ छपबाओल गेल- देखू
राजकमल चौधरी
बही-खाता
एहि खातापर हम घसैत छी
संसारक सभटा हिसाब
...
...
हमर सभटा अपराध, ज्ञान...सँ लीपल पोतल
अछि एक्कर सभटा पाता
ई हम्मर लालबही थिक जीवन-खाता
जीवन-खाता

 पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ राजकमल चौधरी.....उर्फ...
द्वारा एकरा अपना नामसँ एहि तरहेँ चोराओल गेल
हिसाब
हिसाब कहिते देरी ठोर पर
उताहुल भेल रहैत अछि
किताब

जे भरि जिनगी लगबैत छथि
राइ-राइ के हिसाब-
दुनिया-जहान सँ फराक बनल
अंततः बनि कऽ रहि जाइत छथि
हिसाबक किताब।
२००६


गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 

 

२. गद्य










१.अनमोल झा-किछु लघु कथा २.-कामिनी कामायिनी-टूटल तारा

अनमोल झा
                          
रिलेशन-2
- गोर लगै छी पीसा जी। हम सुमन जी बजै छी, सुमन जी।
- दनदनाइत रहू। माँ-पपा, दादी सभ नीके छथि ने?
- सभ ठीक अछि पीसा जी। कहलउ जे हमर कएकटा परीक्षा अचि लखनउमे हप्ताह - दस दिन लगतै, से अपना डेरापर दिक्कत नै ने हैत।
- दिक्कत? कथीक दिक्कत! अबै सँ पहिने फोन कऽ देब; हम गाड़ी पठबा देब टीसनपर। सोझे डेरेपर एबाक अछि। दीदी खेनाइ-पिनाइ बनेने रहतीह..........!!
बढ़ैत चलू

मधुबनी कथा-गोष्ठीमे जाए-अबैक दुनू टिकट कटा लेने रहए ओ। टिकट कटा लेने जाए-अबैक तिथिक निश्चिंतताक संग ऑफिसो समए सँ ज्वाइन कऽ लेब से आस्वस्त आ निश्चिंत भऽ गेल रहए।
      मुदा टिकट कटेलाक बाद हाथपर छः सए रूपैया मात्र रहि गेल छलै। महीना लगैमे एखनो पाँछ-छः दिन तँ छलैहे। दू-तीनटा बाल-बच्चा पत्नी डेराक खर्चा आदि लेल पाँच सए रूपैया डेरामे दऽ चल आएल रहए गोष्ठीमे, एक सए रूपैया हथ खर्चा लेने। ओ बुझैत रहै जे ई छः-सात सए किलोमीटर जाइ आ फेर छः सात सए किलोमीटर अबैक लेल ई सए टका कम अछि एकदम कम। मुदा ओ आर पैंच आ ऋण नै करऽ चाहैत छल। करेंट मंथक आधा दरमाहा पहिले उठि गेल छलै। अगिला महिना कोना चलतै सेहो सोचमे पड़ि जाइत छल कखनो कखनोक।
      मधुबनी जाएत आ गाम नै जाएत सेहो ओकरा खूनमे ई प्रवृत्ति नै छलै। गामो गेल रहए। माए-बाबूक मोन छलैन जे बौआ आएल तँ किछु पाइ-कौड़ी अवश्य दऽ कऽ जाएत। मुदा जखन जाए बेरमे ओ कहलकैन-बाबू दू सए रूपैया अछि तँ दिअ ने!
      माए तरपि उठल रहैए-कमाक धऽ गेल छै एतऽ जे पाइ देबउ। गन्जनक ढ़ेर लगा देने रहै माए। ओ बुझै छै-बेटाक कोनो पाइक कमी नै अछि, सभटा नाटक करैत अछि। रस्तामे बड़ दिक्कत भेल रहै। एक कप चाहो पीबैक मोन होइ तँ नै पीबए, कही बस भाड़ा सह डेरा जाइ कालमे कम नै पड़ि जाए। गाड़ीमे ओ निश्चय केलक-नै आब कतउ नै जाएब गोष्ठीमे। पक्का एकदम पक्का।
ओ बैगसँ कागत - पेन निकालि एकटा लघुकथा लिखऽ लागल। ई ओकर अगिला कथा गोष्ठीक तैयारी रहै।
 दुःख
- रामबाबू अहाँक एक हजारक मनीआडर कएक दिनसँ पड़ल अछि पोस्ट ऑफिसमे। कएक टा समादो देलउ कियै नै लऽ गेलियै।
- के पठेने अछि।
- के पठायत, दिल्लीसँ बड़का बचबा पठेने अछि अहाँक।
- ओ पाइ आपस कऽ दियौ ओकरा। हमरा नै चाही ओकर पाइ।
- आएल लक्ष्मीक कियो ठोकरबैय कका। छोड़ा ने लिअ पाइ।
- नै हौ। जखन हम पन्द्रह दिन तक दरभंगामे डॉ. सी. एम. झा लग भर्त्ती छलउ, तखन ने ओ आएल ने पाइये पठेलक। आ आब जखन हम ठीक छी तखन हम ओकर पाइ छूब, राम......राम......। बेटा जन्माइयोक बुझबै बिन बेटेक छी।
                              
  २.-कामिनी कामायिनी


टूटल तारा
एखन फरिछ हेबा में किछुए विलंब छल ।क्षितिज धाे माॅजि क
अपन रतुका कारीख
साफ करबा में लीन ।चैती बयार गाछ बिरीछक
पात के हल्लुके सॅ छुबैत दुलराबैत
सहलाबैत बहि रहल छल आ
संगहिं बढि रहल छल़ जमुना नदी के पार्श्व वर्ती
बिरीछ प
रैन बसेरा करैत खग विहगक मधुर कलरव गान ।उम्हर रश्मि रथी के
सुआगतक तैयारी चलि रहल छल इम्हर अंतःपुर में रत्नवजडित बङका पलंग प
सूतल
सुल्तानक आॅखि फूजि गेलै़ पार्श्व में सूतल चंपा के खिलल खिलल कली सन
मृग नयनी अपन सुतवा नाक गुलाबक फूल सन लाल लाल ठाेर ललाट प

कमानी सन सजल भाैं सॅ अलाैकिक आभा पसारने ।साैंदर्य के साक्षात प्रतिमूर्ति के
देखि वजीरे आजम़ भाव विभाेर भ
उठला़ ।आे हुनका अपन आगाेश में भरि लेलन्हि ।
सुन्नरी जागि रहल छलीह मुदा लाथ केने पडल़ सुल्तानके बलिष्ठ बाॅहि में
कसमसाति सन पडल नहूॅ नहूॅ मनुहा़रि करैत किछु प्रेमक फकडा दाेहराबैत रहली़
काेन में आतिशदान जरैत रहल छल ।
खिडकी सॅ आकाशक कालिमा छॅटेत देखि रूपसी हडबडा क
उठि बैसली
जहाॅ पनाह अन्नदाता बङ़ विलंब भचुकल अछि आब हमरा यथाशीघ्र प्रस्थान
के आज्ञा देल जाआे ।
समा्रट कआॅखि में पीडा के लहरि स्पष्ट देखार भगेल छलै
मुदा तत्क्षलण हुनक हाथ फराक भ
गेल छलैन्ह आआे एकदम माैन खिडकी के
बाहर नदी में दूर सॅ आबि रहल काेनाे कश्ती के देखबा में लागि गेल छलाह ।
सुन्दरिक
विदाइर् के पछैत आेही रत्नेजडित महलक दराेदिवार जेना एकदम
बेराैनक सून सून सन लागए लगलै़ सुल्तान एतेक उदास भ
गेल छलथि जेना
कियाे हुनक माथ स
ताज छीन नेने हाेयन्हि बङ असहाय हारल जुआङी
सन ।
मस्तिष्कक साेर गुल कम करबा लेल आे पलंग सॅ उतरि अपन पएर में बेस
कीमती नागाेरी जुत्ती पहिर सुन्दर सुवासित बागीचा दिश टहलए जेबा लेल
प्रस्तुत भेला मुदा नहिं जानि माेन में काेन तरंग हिलकाेर मारि रहल छलैन्ह
पएर दीवाने खास क
विपरीत संगमरमरकश्वेत धवल झराेखा दिस बढैत
गेलन्हि जिम्हर जमुना के कारी कचाेर पानि बङ शांत भाव सॅ कश्ती वाला के
मधुर रस सॅ भरल गीत सुनैत बहि रहल छल ।
कनि विलमैत नहूॅ नहूॅ आे वाटिका दिस अग्रसर भेला ।सुन्नर महल
एखनाें आैंधायल अलसाति सन पङल छल ।जाैवन सॅ प्रफुल्लित पुष्पदल प
मॅडराति
भमरा सबहक गुॅजन आ
नदी के धीर गंभीर हहराति स्वर ऊपर अकास में
भाेरक रूहानी़ आध्यात्मिेक ताकत़ चिङै़ चुनमुनी के मधुर ताऩ मुदा सुल्तानक
गमे इश्क प
किछु मरहमक काज नहिं करि सकल ।कत्ताे क्ष्ण मात्र नै बिलमति ।जेना
छरपट्टी लागि गेल हाेयन्हि ।उद्विग्न ह्द य सॅ आे खुदा के इबादत करबा लेल माेती
ंमस्जिद दिस बढि गेल छलाह ।
दूरस्थ मस्जिद सॅ आबैत अजानक स्वर हुनक ह्दयय के छूने बिन दशाे दिशा
में झहैर झहैर क
विलुप्त भेल चलल जाइत छल ।बङ कुमन सॅ कहुना करि
अपन आसन बिछा ठेहुन माेङि नमाज पढलन्हि ।काॅच पाकल अपन नाम नाम दाढी
हाथ फेरैत अतीत में डूबल भसियाएल सन स्नान करबा लेल आे हमाम दिश
मुङि गेलाह ।
चढैत सूरूजक संग दिवसक क्रिया कलाप प्रारंभ करए लेल दीवाने आम
में दरबार सजए लागल ।आब नै आे गुल रहल आ
नहिं आेगुलशऩ सुल्तानक आे
बुलंद साख सेहाे नहिं बाॅचल छल मुदा तैयाे बङका नामक टेग त
लागले छल
लाल किला के संग ।राजकाज सीमिते मुदा छलै त
अवस्स ।
बेसकीमती वस्त्राभूषण आे राजमुकुट पहिर राजसिंहासन प
बैसि राजकीय
माेहर लगबैत प्रशासक़ प्रबंधक आ
न्यायाधीशकभूमिका निभाबैत निभाबैत आे
जेना फेर सॅ नशा में मातल बहकल बहकलसन व्यवहार करए लागल छलाह़ ।
चतुर सुजान मं्रत्रि सबहक नजरि सॅ इर् नहिं बाॅचि सकल छल ।किंकर्त्तव्यविमूढ आे
सब़ ।आखिर करितथि त
की ।लाल़ टरेस़ उन्मत्त आॅखि आनशा के आगाेश
सॅ सुन्न हाेइर्त दिमाग क
तंतु तंतु के सुरा आसुन्नरि अपन हुश्न के

हुकुमत में बंधक बनाैने नचा रहल छल ।
हुस्ऩ जाम आ
इर्श्ककभॅमर में घेरालि ऊबचुभ हाेइर्त माेहित नजरि सॅ आे अपन चारू कात देखल ।सम्पूर्ण दरबाऱ दरबारी़ प्रजा आमंत्रि परिषद हुनका शत्रुसम दृष्टिगाेचर हाेमए लागल छल़ मस्तिष्कक खाेह में तमंडीलक घंटी आमस्जिदक अजान सन एकेटा स्वर प्रतिध्वनित हाेमैत रहल छल इम्तियाज़ इम्तियाज़ इम्तियाज ।
हुनक वश चलितैन्ह त
सम्पूर्ण संसारक मिल्कियत आेकरा नाम लिख आेकरा मल्लिकाए तरन्नुम बना विश्व मानचित्र पअमर बना दैतथि ।
शनैः शनैः बढैत प्रचंड धूप हुनक बेचैनी के अनमनस्कता के आआेर बेलगाम करय लागल छल ।तखने विशाल विशाल कारी चारी टा अश्व अपन वीर जाेद्वा संग आेत
पधारल ।सहायक के घेाङा साैंपि सैनिक सब जहाॅपनाहक खिदमति में अपन आदाब अर्ज करैत बङका बङका डेग भरैत दीवाने खास के दिस मुङि चुकल छल ।
संर्पूण मंत्रिमंडल संग कनिकाल लेल सुल्तान सेहाे चिंता के अथाह सागरि में डूबि गेल छलथि गुप्तलचर सब काेन सनेस ल
एहेन व्यग्र भपहुॅचल अछि ।
आे सब यथाशीघ्र आेहिठामक कार्यवाही समाप्ता करि उठि चुकल छलाह ।
तीन साै बरक सॅ जे साम्राज्य जनमानस में घुसिक
आेकर रग रग में अपन जङि जमा चुकल छल़ जेकर असीम सत्ता आप्रचूर दाैलत साेऩ चानी हीरा जवाहरात लाेकक ह्दुय में भय वा इज्जतक कारण बनल छल जेकर विराट न्यायप्रियता़ वा क्रूरता के शासन प्रबंधक चारूकात पताका फहरा रहल छल़ आेहि विख्या़त साम्राज्यक हाथ सॅ एक के बाद एक करिक रियासत सब निकलल जा रहल छल ।चारूकात विद्राेहक अग्नि प्रज्ज्वलित हाेमए लागल ऊपर सॅ विदेसी आक्रमण घाघ आशातिर खेलाङी इर्स्टइंडिया कंपनी तबङ चालाकी सॅ टामस राे के पठा जहाॅगीरे के शासनकाल में व्यापार करबा के अनुमति लइर्त शनैः शनैः अंगुरि पकैङ कपहुॅचा पकङनाय प्रारंभ करि देने छलै ।
मैत्री के नाम प
एते पैघ छलावा आे पहिल अंगरेज के पछाति कत्तेक रास
राज के अपन भ्रामक महाजाल में फॅसबैत चलल गेल़ ऐतिहासिक दस्तावेज अहि दुर्भाग्य पूर्ण गाथा के पत््ऱायक्ष प्रमाण अछि जे भारत भूमि के अनेकानेक राज रजवाङा के कूप मंडूकता आपसी इर्रखा़ द्वेष आ
अदूरदर्शिता के लाभ उठबैत सबसॅ फराक फराक संध़ि करैत आेकर नाम देलके़ ट्रीट्री फाॅर फ्रेन्डशिप़ ट्रीट्री एडाेप्टे शन चलाकी सॅ कखनाे संधि कखनाे खेल में हार जीतक बहाने हथियाबैत रहल सबटा राज्य ।
उम्हर अंगरेज क सर्तक चुस्त दिमाग इम्हर अभाग्यक प्रतीक़ इर् सुस्त़ सूतल सुल्ताऩ ।लाेक चकाेर सन हिनका दिश ताकि रहल छल़ सल्तनतक पुरान कला़ रण नीति देखाबए लेल मुदा एतए त
नजारे किछु आैऱ ।
दीवाने खास में गुप्तमचर सबसॅ वार्ता करि आपसी विचार विमर्श क
पश्चात दरबार उठि चुकल सुल्तानक कार्य अकुशलता क़र्त्तव्यहीनता़ आविलासिता
सॅ उदास मंत्रिगण माथ झूकाैने अपन अपन घर दिस प्रस्थान त
हाेमए लगला़ मुदा
नाना विध दुश्चिन्ता सॅ आशंका सॅ भरल मस्तिष्क पएर में जेना भारी भारी पाथरि बाॅधि देने छल़ कहुना करि घिसिया घिसिया क
आगाॅ बढैत रहला अकस्मात बङ हिम्मत करि क वृद्व वजीर हाजी मियाॅ अपन भारी भरकम कनि बझल बझल सन स्वर में बाजि उठल छलाह दाैलते आजम विपत्ति के कारी कारी घनगर बादरि आब शाही आकास सॅ बेशी दूर नहिं छैक खुदा माफ करथि मुदा किछुए दिन में इर् लाल सुर्ख इमारत सुसज्जित वैभव पूर्ण किला अंधार श्मशान घाट बनैत कालक तीव्र प्रवाह में नहिं विलुप्ता भजाए ।अपने किछु फरमान जारी करितियै अहि विपत्ति में आखिर कएल की जाए सेना सब के कत्तेकाे मास सॅ दरमाहा नहि भेटलै अेाकराे सबहक माेन में आका्रेशकलुत्ती प्रज्ज्वलित भ रहल छै तइयाे जहाॅपनाहक आदेश पआेकरा सब में नब स्फूर्ति नब ऊर्जा उत्पसन्न कएल जा सकैत अछि ।नहिं जानि काेन गप पसुल्तान एकदम हत्थाव सॅ उखङि गेला खाैंझाइत बाजि उठला खुदा के इबादत करू सब मिल जुल कपाक कुरान शरीफ पढू उपर वला के रहमाेंकरम सॅ सब विपत्ति टैल जेतै अहाॅ सब व्यर्थ भयाक्रांत भकाफिर जकाॅ गप करि रहल छी ।
हाजी मियाॅ के नजरि पहिने सॅ झूकल आब आआेर झुकि गेल छल ।आेहि वृद्व बुद्विमान पुरूख के संग देबए बला कत्तेकाे अमीर उमरा ।
कत्तेक षङयं्रंत्र भ
रहल छलै़ सब तरि ।शाही सेना के जांबाज सेनापत़ि क़त्तेक बेर हाजी साहब दिस सक्षम नेतृत्व् के उम्मेद सॅ तकने रहै़ मुदा पुरान लाेक कृतज्ञता के चासनी में डूबल सुल्तान सॅ बगावत के गप साेचिआे नहि सकैत छल़ राजघराना में काेनाे सक्षम नेतृत्वा दूर दूर धरि नजरि नहिं आबि रहल छल ।
गुप्तन षडयंत्रक
माध्यम सॅ आेहि सुन्नरि के जान सॅ मारब के कत्तेक प्रयास कएल गेल आेहि निशाबद्व सुतली राति में आेकर घर के आगि लगा सुपुर्दे खाक
करि देल गेल रहै़ मुदा किस्मत आेकर आे त
आेहि राति अपन भवन में नै भ हवेली के नर्म नाजुक अलंकृत पलंग पशाेभायमान छल ।अहि अग्नि कांड सॅ सुल्तानक शरीर में अपन पूर्वजक वीर खून प्रवाहित हाेमए लगलै । तामसे मूॅह सॅ झाग फेन बहराए लगलै चाराें कात गुप्त चर सतर्क भेल आखिर इ काेन आदम जातक करिस्तानी अछि ।
कएक दिन धरि आेहाे राज काज ठप्पा रहलै ।चारू कात मचल भयानक ड
र आशंका आ अस्थिरता के बीच फरियादि सब छाती पिटैत कानैत कल्पैत आपस जायत रहलै ।
आआेर विकट माहाैल ।आखिर कूटनीतिक चालि चलि आेही नर्तकी के समझा बूझा क सुल्तान सॅ कहाआेल गेल जे आगि आर कियाे नहिं आेकर अपने असावधानी सॅ जरैत मशाल सॅ लागि गेल छलै हवा तेज रहै खिङकी खुजल ।
इएह सब साेचैत हाजी मियाॅ आसमान में रूहानी ताकत के दिस आस सॅ तकने छलथि ।
सूरूज के भीषण ताप सॅ बचवा लेल त
आेहि संगमरमरक वृहदाकार भवन के जमुना के पानि झींक कभीतरे भीतर शीतल बनेबाक साधन तवर्त्तमाने छलै़ मुदा तैयाे खस़ चाननक लेप आविविध ठंढा सरबत के मध्य आेहि सहस्त्र जीव्हा बला धाह के राेकबा के भरिसक प्रयास कएल जा रहल छल ।
उम्हर प्रचंड भास्कर नहूॅ नहूॅ करिक
अस्तगामी हाेबाक फेराक में छलथि
इम्हर सांझ में सुल्तानक मनाेरंजनक लेल रंगमहलके फर्श के झाङ फानूसके राेशनदानके़ दराे दीवार के धाे पाेछिक
चमका चमका कसुसज्जित कएल जा रहल छल ।रंग शालाके देवार में चुनैल बेशकीमती पाथरि हीरा माेती़ पन्ना जवाहरात़ कंदीलक राेशनी में स्वर्गक सुषमा बखानि रहल छल ।जमुना दिस सॅ अबैत शीतल मद्विम बयार इत्र फुलैल केवङा़ रातरानी़ के गंध सॅ मॅह मॅह करैत सुखमय वातावरण़ ।
मशालची़ तबलची़ ढाेलकिया तानपूरा़ सितार सराेद़ पखावाज जलतरंग़ सारंगी़ अपन अपन वाद्य यंत्र नेने विशेषज्ञ सब अपन निर्धारित स्थान ध
नेने रहथि ।हारमाेनियम पराग छेङल जा चुकल छल ।अपन ख्वाेबगाह सॅ निकसि रात्रिपरिधान में सुल्ताऩ बङका भव्य फाैवारा सॅ कनि मध्य राखल गावतकिया पस्थान ग्रहण करि चुकल छलाह कि तखने म्ुानहरि सांझ में संध्या सुन्नरि जकाॅ छम छम पाज्ेाब खनकाबैत़ अवगुंठन सॅ म्ुॅाह झॅपने नर्तकी के प्रवेश़ भेलै ।कनि झुकि कमाेहिनी अदा सॅ सुल्तान के सलाम पेश करैत घाेघ उठा कफेंकलक़ भरिदिन आैंधायल चिन्तातुर मुखमंडल पजेठ में जेना सावनक हरियरि आबि गेलै़ ।आे मुस्कैला महफिल धन्य धन्य भगेल नामी गिरामी मुॅह लगुआ अमीर उमरा़ झराेखा सॅ झकैत़ गुलाम किन्नर दास दासीगण । माैध सॅ सनल स्वर लहरी हवा में तूर जकाॅ दूर दूर धरि छितरै लागल छल़ एै माेहब्बत तेरे अंजाम पे राेना्््््ऽ््ऽऽ््््््््ऽऽऽ््््््् आयाऽ्ऽ््््ऽऽ््।बनल ठनल दू टा सुन्नरि अंगङाउर् र्लइत सुल्तान लगनमगर बङदीव नक्कानसी बला सुराहीदार स्वर्ण पात्र सॅ सुवर्णक गिलास में भरि भरि कशराब पराेसि रहल छल ।गजल़ ठुमरि कजरी नृत्यवगान सॅ भरल माहाैल में जाम पजाम पीबैत सुल्तान आअमीऱ । जखने सुरू कयल आज जानेऽऽऽ्् की जिद नाऽऽ््ऽ्ऽ्ऽ्कराे यूॅ ही पहलू ऽऽऽऽ्ऽ््में बैठे रहाेऽ्ऽ्ऽऽसुल्तान गिलास हाथ में नेने ठाढ भझूमै लगला ।रूपकुवॅरिकके स्वर रंगशाला सॅ उछैल उछेल जमुना के विस्तृत पाट पविलिन हाेमैत रहलै ।
किछु शायर लाेकनि सेहाे अपन शेर सॅ आेहि रंग में आआेर रंग मिलाबैत रहला ।कनि काल में सुन्नरीक साेझाॅ ताेहफा के ढेर लागि गेल रहै ।
भीतर बैसल बाहर सॅ झॅकैत अमला सबहक राेम राेम सिसकि रहल छल महलक बाहर चाराें कात विद्राेह स्वर सुनाइ दैत छलै राजकर्मचारी के पकङि पकङि लाेक मारै़ ।आकुल व्याकुल जनानी सब महल सॅ पङेबाक ब्याेंत में लागल कत्तेकाे नाह़ कश्ती किला के सुरंग में तैयार केहनाे आपद स्थितिमें जमुना बाटे पङेबा लेल ।अन्तःपुर सॅ नित्यकप्रति कन्ना राेहट के आवाज़ आे असहाय स्त्रीगण दास दासी के मुॅह सॅ बाहरक गप सुनि मृत्युंभय सॅ काॅपैत जाेर जाेर सॅ घाना पसारबा आ
इबादत तजि आैर की कसकैत छलीह ।
मनाेरंजऩ खेनाय पिनायके बाद गहराति राति में अपन आराम गाह में पसरल़ रूप सुंदरि के रंग में मातल सुल्तान आय आेकरा अपन घर नहिं जाए द
रहल छल । आब आैर नहिं क्षणभरिक अलगाव हमरा पागल करि दैत अछ़ि कहूॅ तइ लाल किला इर् संपूर्ण सम्पत्ति अहाॅ के नाम लिख कआहि पशाही माेहर लगा दैत छी।
आलमपनाह़ हम अपने संग अहि वैभव विलास में तअपार आनंद आहर्षक संग रहि सकैत छी़ इ तहमर अहाे भाग्य हाेयत मुदा आे दुर्दिनक हमर सखी जे महलक बाहर खरभुजा बेचैत अछ़ि हम आआे दू शरीर एक प्राण आे काेना जीतै़ बिलैट जेतै आे ।सुंनरि के अपन आगाेस में नेने मत्तवाला उन्मत्त प्रेमी सुल्तान आॅखि कनी खाेलने खाेलने बाजल छलाह हम अहाॅ के संगी के अहाॅ के दासी मुर्करर करि रहल छी आब त खुशऽ्ऽ्ऽ्।सुल्तान अपन छाति सॅ आेकर मुॅह उठा कपुछने छल़ कारी कजरारी बङका बङका पिपनी फङफङाबैत आे इत्मी्नान सॅ मुस्कैल छल जेना आेकर बङ पाकल गुरकइलाज भगेल हाेए ।
आरामगाहक काेन में जरैत मशाल सल्तनत के अहि दुर्भाग्य प
फफैक फफैक क कानला के बाद मीझा गेल छलै ।दूर कत्तेकाे नढिया गीदङ कूकूरक कननाय प्रारंभ भचुकल रहै ।
चाराें दिशा भीषण अंधकार में विलिन ऊपर आकास में आय चाॅन सेहाे नै़ भयंकर अंधेरिया़ अपन आधिपत्य कायम करि चुकल छलै़ तखने दच्छिन दिसक आकास सॅ एक गाेट लहकैत टूटल तारा महलक
प्रांगण में खसि पङल छलै ।
१.बिपिन कुमार झा-शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा २.सुजीतकुमार झा-एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर
1
बिपिन कुमार झा
शहीद कऽ चिताकऽ धूँआ क अभिलाषा
     तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्त्ता आ बौद्धिक व्यक्ति नक्सलवाद कऽ विभिन्नरूप मे महिमामण्डित करैत छथिन, हुनक दान्तेवाराकाण्ड कऽ वाद आश्चर्यजनक चुप्पी सँ देश स्तब्ध अछि।
     आतंकधारा नक्सलवाद कँ आर्थिक असमानता कऽ एकमात्र समाधान कहनिआर, स्वघोषित शोषित वर्गकऽ हमदर्द बुद्धिजीवी सभ सदैव नक्सलक्षेत्र मे तैनात सुरक्षा जवान सभ के शोषक, अन्यायी, बलात्कारी रूप मे घृणित एवं झूठ प्रचारित करैत छलकिन्ह मुदा नक्सली सभक पाश्विक अन्यायपूर्ण हिंसा सँ हिनका कोनो आपत्ति नहि छलैन जाहि स आदिवासीवर्ग सबसँ अधिक प्रताड़ित आछि।
     दान्तेवाड़ा मे 76 जवानकऽ आत्मोत्सर्ग इ सभ पतित विचारक सभ लेल कोनो महत्वकऽ घटना नहि छीक मुदा पूरा समाज एहि विषय पर उदासीन रवैया अपनेने अछि जे अत्यन्त दुर्भाग्य कऽ विषय छीक।
     हर रूप मे अभावग्रस्त आ चुनौतीपूर्ण जीवन जीवैत सुरक्षाबल के जवान राष्ट्रकऽ अखण्डता हेतु सदा तत्पर रहैत अछि मुदा इ राष्ट्र ओकरा, उत्साह, सम्मान देबाक के स्थान पर घृणित आरोप लगवैत अछि।
     आशा अछि जे शहीद जवान कऽ चिता सँ उठल धूँआ से कलुषित मानसिकता कऽ बुद्धिजीवी सभक मूँह कारी भ जतैह आ इ राष्ट्र अपन वीर सपूत के सम्मान पर दुबारा कोनो तरहक अपमान जनक टिप्पणी वर्दाश्त नहि करत इ दान्तेवाड़ा मे शहीद सभ कऽ हेतु सभ सँ पैघ श्रद्धाँजलि होयत। आ इहै शहीदकऽ चिताक धुँआ क अभिलाषा सेहो छैक।
2.
सुजीतकुमार झा

एकटा लाजवाव कलाकार मदन ठाकुर
बुध दिन भोरमे पूजाक  लेल घरे लग रहल कल पर सँ मदन ठाकुर पानि आइन रहल छलथि की पाछु सँ तीन चारि गोटे पुलिस हिनका सँ पुछि बैसलनि अहि तऽ मदन ठाकुर नहि छियैक । पाछु घुमि कऽ ओ हँ हु मे किछ उत्तर दितैथ ओहि सँ पूर्वे ओ सभ कहय लगलन्‍हि अपने तऽ बेजोड अभिनय करैत छी ।
मिथिलाञ्‍चलक सुपर स्‍टार मदन संग दर्जनो एहन घटना भेल अछि जे हुनका बिना कहने लोक चिन्‍ह गेल छलन्‍हि । आ एक दम आदर सम्‍मान करैन । एक बेर तऽ सीमाबर्ती मधुवनी जिल्‍लामे मदनक प्रसंशकसभ जबरदस्‍ती हुनका घेर कऽ जलपान सेहो करौने रहैन ।
शिक्षा सँ एसएलसी सेहो नहि कएने मदनक प्रसंशक मे बहुत पढल लिखल विद्वानसभक लम्‍बा सुची अछि । मिथिला नाट्य कला परिषदक पूर्व अध्‍यक्ष सुनिल मिश्र कहैत छथि –‘विद्यालयीय शिक्षामे भलेहि मदन कम हुए मुदा अपना क्षेत्रमे केहन केहन मास्‍टर डिग्री बलाकेँ हराबयकेँ क्षमता रखैत छथि ।
एक बेर बरिष्‍ठ नाटक कार महेन्‍द्र मलंगिया सँ पुछल गेल छल मिथिलाञ्‍चलक सफल कलाकार के सभ छथि ताहि पर ओ बाजल रहथि –‘ सफलकेँ मापदण्‍ड की अछि हमरा नहि बुझल अछि , मुदा जनकपुरक पाँच टा कलाकार एहन छथि जिनकर प्रतिभाक जबाब नहि अछि ।पाँच टा कलाकारक नाम जोडाबय काल सभ सँ पहिने ओ कोनो कलाकारक नाम लेने रहथि तऽ ओ छलथि मदन ठाकुर ।
मदन सहीमे लाजवाव कलाकार छथि । सहकर्मी सभक अनुसार जखन ओ अभिनय करय लगैत छथि ओ ओहिमे डुबि जाइत छथि । यैह हुनक प्रमुख विशेषता अछि । २०३३ साल सँ अभिनय सुरु कएने मदन एखनो निरन्‍तर अहि क्षेत्रमे लागल छथि । जखन मञ्‍च पर चढैत छथि तऽ १६/१७ वर्षक कलाकार सभ सँ कम चमक हुनकामे नहि रहैत छन्‍हि । फेर अभिनयकेँ तऽ ओ बादशाहे
छथि । मिनापक संस्‍थापक योगेन्‍द्र साह नेपालीक प्रेरणा सँ अभिनय क्षेत्रमे आएल मदन मैथिलीक अतिरिक्त नेपाली सिनेमामे सेहो अभिनय कएने छथि । नेपाली सिनेमा सीता , सिमाना आ  बीर गणेशमान मे हुनक कम दृश्‍य अछि मुदा अपन अभिनयकेँ बल पर दर्शक पर अलग छाप छोडय सफल भेल छथि । ओना मैथिली टेलि सिरियल काठक लोक , हंसा चलल परदेश , मिथिलाक व्‍यथा, कनियाँ, चमेली, परिणाम सहितमे तऽ बहुत महत्‍वपूर्ण पात्रमे छथि । रंङ्ग मञ्‍चमे तऽ ओ ककरो सँ पछे नहि छथि ।  फेर मिथिलाञ्‍चलक मात्र नहि नेपाल भारतक बहुत रास रङ्ग मञ्‍च पर अभिनय सेहो कएने छथि । मुदा जे मज्‍जा काठक लोकक कम्‍पनीक रोलमे आएल ओतेक कहियो नहि । ओ कहैत छथि –‘ मलंगिया सर सम्‍भवतः कम्‍पनीक रोल हमरे लेल लिखने रहथि की ?’ 
दर्जनो पुरस्‍कार अपन नाम कऽ चुकल मदन कहैत छथि–‘ओहिना अभिनय करी आ उद्देश्‍य लऽ कऽ कएनाइमे सम्‍मान अलग होइत छैक ।   कला क्षेत्रक स्‍थिति सेहो आब बढिया भऽ रहल ओ स्‍वीकारैत छथि । अपने घर सँ आटा गील करय पडैत छल मुदा आव से स्‍थिति नहि अछि हुनक कथन छन्‍हि । ओना जनकपुरमे एकटा नाट्य शाला भऽ जाइक तऽ आओर किछ होइतै एकरा विषयमे सभक चिन्‍तन अपरिहार्य अछि ओ आगा कहैत
छथि ।
कहियो काल देखा सिकीमे कविताक सेहो रचना करएबला मदन कहियो काल मञ्‍च पर गीत सेहो गबैत छथि । साथी कलाकार राम नारायण ठाकुर संग मरुआक रोटी खेसारीक दालि ..... गाएल गीत एक समयमे एतेक लोकप्रिय भेल छल की गाम गाममे नटुवा सभ सेहो मञ्‍च पर , राम नारायण आ मदन अपनाकेँ बना कऽ हिनकर गीत गाबय लागल छल । जनकपुरक शिव चौक पर चर्चित कलाकार राम अशिष ठाकुर संग मदन हेयर ड्रेसर सञ्‍चालन करैत आएल मदनकेँ हजामी पेशामे सेहो जवाव नहि
अछि ।
एक बेर मदन संग केश आ दाढी मोछ जे कियो बना लेलन्‍हि दोबारा ओ व्‍यक्ति दोसर ठाम बनाबयकेँ सोचयो नहि सकैत छथि  । अन्‍य क्षेत्रक सुपर स्‍टारकेँ चौक चौराहापर नहि देखल जा सकैत अछि मुदा मिथिलाञ्‍चलक सुपर स्‍टार एखनो अपन  परम्‍परागत पेशा नहि छोडने छथि ।
जखन नाटक नहि रहल तखन शिव चौक पर लोक सँ हमरा भेट भऽ जाइत अछि मदन कहैत छथि ।      
 जगदीश प्रसाद मंडल
कथा-प्रेमी
फगुआक दिन। मुरगाक बाङ सुनितहि ओछाइन छोड़ि पक्षधर बाबा परिवारक सभकेँ उठबैत टोलक रास्ता धेने गौँआकेँ हकार दिअए विदा भेलाह। मनो गद्गद्। भीतरसँ खुशी समुद्रक लहरि जेकाँ उफनैत रहनि। गौँवाकेँ फगुआक भाँग पीवैक हकार दए दरबज्जाक ओसारपर बैसि गर अटबए लगलथि जे दस किलो चीनी, मसल्ला आ भाँगक पत्तीक ओरियान तँ कइये नेने छी। आब खाली बाजा-गाजा संग लोककेँ अवैक अछि। एते बात मनमे अवितहि उठि कऽ भाँगक पत्ती आ मसल्ला -मरीच, सोंफ, सनतोलाक खोंइचा, गुलाव फूलक पत्ती, काबुलि बदाम- लऽ आँगन जाए पुतोहूँकेँ कहलखिन- ‘‘कनियाँ, बुरहीकेँ पुआ-मलपुआक ओरियान करए दिअनु आ अहाँ भाँग पीसू। खूब अमैनियासँ पत्ती धुअब। तीनि सलिया पत्ती छी, जल्ला-तल्ला लगल अछि।’’ कहि ओसारपर सभ सामान सूपमे रखि दरबज्जा दिशि घुरि गेलाह। हँ-हूँ केने बिना गांधारी मसल्लाक पुड़िया निच्चाँमे रखि पत्तीकेँ सूपमे पसारि आँखि गड़ा-गड़ा जल्ला तकए लगलीह। मनमे उठलनि जे आइ बूढ़ा सनकि-तनकि तँ ने गेलाहेँ। एत्ते भाँग लऽ कऽ की करताह। मुदा किछु बजलीह नहि। आँखि उठा कऽ देखि विहुँसि नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। ओना मिथिलाक नारी आँखिमे गांधारी जेकाँ पट्टी बान्हि घरती सदृश्य सभ किछु सहैत ऐलीह। दरबज्जापर बैसि पक्षधर सोचए लगलाह- जिनगीक एकटा दुर्गम स्थान दुर्गा टपा देलनि। मने-मन दुनू हाथ जोड़ि हृदयसँ सटा गोड़ लगलनि। अपना विचारसँ सुकन्या जिनगीक प्रेमी चुनलक। कोना नहि आनन्दसँ जीवैक असिरवाद दितिऐक। जहि फुलवारीकेँ लगबैमे अस्सी सालक श्रम लागल अछि ओहि श्रमकेँ, जहिना छोट-छोट बेदरा-बुदरी टिकुली पकड़ि पुनः उड़ा दैत अछि तहिना हमहूँ उड़ा देव। कथमपि नहि।
रुपनगर हाइ स्कूलक बोर्ड परीक्षाक सेन्टर प्रेमनगरक हाइ स्कूल भेल। देहाती स्कूल रहितहुँ परीक्षार्थीकेँ डेराक कोनो चिन्ता मनमे नहि। सभक मनमे एते खुशी जे डेरापर धियाने ने जाइत। सभ निश्चििन्त जे गाम-घरमे अखनो विद्याकेँ देवी स्वरुप बुझि सभ मदति करए चाहैत छथि। जँ मधुबनी सेन्टर होइतै तहन ने डर होइतए जे मेहता लौजमे सभ सामान चोरिये भऽ जाएत, तेँ असुरक्षित अछि आ प्रोफेसर कोलनीक भड़े तते अछि जे ओतेमे तँ विद्यार्थी परीक्षाक सभ खर्च पुरा लेत। ओना प्रेमनगरक सइयोसँ उपर कुटुमैती रुपनगरमे अछि, तेँ किऐक ककरो मनमे रहैक चिन्ता हएत। तहूमे प्रेमनगर हाइ स्कूलक हेड मास्टर तेहन छथि जे स्कूलक समएमे स्कूलक काज करै छथि बाकी बारह बजे राति धरि विद्यार्थीक खोज-पुछाड़िमे लगल रहैत छथि जे ककरो कोनो तरहक असुविधा तँ ने भऽ रहल छैक। तहूमे तेहन दरबज्जा अनन्दी बाबाक छन्हि जे इलाकाक लोक अपन रहैक ठौर बुझैत अछि। घर्मशल्ले जेकाँ। धन्यवाद यशोदिया दादीकेँ दिअनि जे बुढ़ाढ़ियोमे अभ्यागत सबहक ऐँठ-काँठ बारह बजे राति धरि उठबितहि रहै छथि।
परीक्षासँ एकदिन पहिने लोचन सभ समान शुटकेशमे लए साइकिलसँ प्रेमनगर पहुँचल। लोचनक परिवारकेँ पक्षधरक परिवारसँ साठियो बर्ख उपरसँ दोस्ती अवैत रहनि। आजादीक हुड़-बड़ेड़ाक समए रहै। जहिना गामक धियापूता गुल्ली-डंटासँ क्रिकेटक मनोरंजन करैत तँ शहरक धिया-पूता जगहक अभावमे खेलक स्कूलमे नाओ लिखा मनोरंजन करैत अछि। तहिना पक्षधरो आ ज्ञानचन्दो आजादीक लड़ाइमे पढ़ाइ छोड़ि समाजक बीच आवि हुड़-बरेड़ामे शामिल भऽ गेला। समाजक काजमे हाथ बँटबए लगलाह। समाजमे ककरो ऐठाम बेटीक विआह होइत आ बरिआती अबैत तँ अपन बहीनि बुझि, बिनु कहनहुँ पाँच दिन निश्चित समए दिअए लगलखिन। तहिना आरो-आरो काज सभमे हाथ बँटबए लगलाह। मुदा अस्सी बर्खक उपरान्तो पक्षधर पक्षधरे आ ज्ञानचन्द ज्ञानचन्दे रहि गेलाह। कहियो कियो नेता नहि कहलकनि। हँ एत्ते जरुर भेलनि जे भाय-भैयारी भेने गाममे तते भौजाइ भऽ गेलनि जे बसन्त छोड़ि ग्रीष्मक रस्ते घेरि देलकनि। आब तँ सहजहि बुढ़ाढ़ीमे धियापूताक संग रंगो-रंग खेलै छथि आ जोगिड़ो गबै छथि। गाम स्वर्ग जेकाँ लागि रहलनि अछि। किऐक नहि मन लगतनि जहि गाममे कालीदास सन विद्वान, जे जही डारिपर बैसब ओहि डारिकेँ काटब, मुदा ने कुड़हरिक धमक लागत, ने डारि डोलत, ने दुनू हाथे कुड़हड़ि भाँजब तँ देह डोलत आ ने दुनू पाएरक वैलेंस गड़बड़ाएत। निश्चििन्तसँ जखन डारि खसए लगतै तखन ओहिपर बैसिले-बैसल धरतीपर चलि आएव, ऐहन विद्वान् सभसँ तँ गामे भरल अछि। एते दिन, अपराधीक कम संख्या रहने नजरि निच्चाँ रहैत छलैक मुदा आब ककरा कहबै अपनो घरवाली धमकी देती जे माए-बाप आ भाइ-भौजाइक पाछू लगल रहै छी आ अपना धिया-पूता लऽ किछु करबे ने करै छी। एहि जिनगीसँ जहर-माहूर खाए मरब नीक। हौ बाबू, हमरा ऐहन भ्रममे नहि दाए। एहि दुनियाँमे ने कियो अप्पन छी आ ने बिरान। सीता जेकाँ लक्ष्मणक रेखाक भीतर रहह। नहि तँ रावण औतह आ लऽ कऽ चलि जेतह। अपन-अपन पाएरपर ठाढ़ भऽ गंगोत्रीसँ निकलैत गंगाक पानि जेकाँ, जे साथीक संग उपर-निच्चाँ होइत प्रसांत महासागरमे मिलैत अछि तहिना समएक संग चलैत रहह।
देखले पक्षधर बाबाक घर-दुआर लोचनकेँ। ककरो पूछैक जरुरते किऐक होइतैक। साइकिल हड़हड़ौने दरबज्जापर पहुँच साइकिलसँ उतड़ि घरक देवालक पँजरामे साइकिल ठाढ़ कए दुनू हाथे बाबाक पाएर छूबि गोड़ लगलकनि। बाबाकेँ बुझले रहनि, कहलखिन- ‘‘भने अखने चलि ऐलह। सभ सामान सरिया सेन्टरपर जा कऽ देखि-सुनि अविहह।’’ कहि पोती सुकन्याकेँ सोर पाड़लखिन। मुदा लोचनो तँ अंगना-घर जाइते अबैत रहए। सुकन्याकेँ लोचन आंगनसँ बजा अनलक। भाए-बहीनि जेकाँ दुनूकेँ देखि पक्षधर सुकन्याक कहैक बात विसरि दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, आब तँ हम चलचलौ भेलियह। तोरे सबहक पार एहि दुनियाँमे ऐहलहेँ। दुनियाँमे जते मनुष्य अछि ओ अपना समएक जिम्मा लऽ जीबैत अछि। अखन तू सभ सुकुमार कोमल किसलय सदृश्य छह। मनुष्य बनि जिनगी जीविहह। हम दुनू संगी -पक्षधर आ ज्ञानचन्द- दू जातिक रहितहुँ संगे-संग जिनगी बितेलहुँ। जे समाजोक लोक बुझैत छथि। मुदा हुनको धन्यवाद दैत छिअनि जे संगीक महत्व अदौसँ बुझैत आएल छथि। जेकरे फल छी जाति-कुटुम्बसँ कनियो कम दोस्तीकेँ नहि बुझल जाइत अछि। संगे-संग जहलो कटलौं आ एक ओछाइनपर सुतबो करैत छी। मिथिलांचलक कोनो राजनीतिक वा सामाजिक संगठनक बात होइ, मुदा कि एहि संस्कृतिकेँ आँखिक सोझमे नष्ट होइत देखियैक।’’ मन पड़लनि गाड़ीक ओ दिन जहि दिन जहल जाइत काल दुनू गोटेकेँ पैखाना लागल। हाथमे हथकड़ी। ट्रेनक पैखाना-कोठरीमे पानि नहि। की कएल जाए? जेबीसँ रुमाल निकालि दू टुकड़ी फाड़ि दुनू गोटे शुद्ध भेलहुँ। आँखि ढबढ़बा गेलनि। भरल आँखिसँ पोतीकेँ कहलखिन- ‘‘बुच्ची, दरबज्जापर रहने बौआकेँ पढ़ि नहि हेतइ। एक तँ पढ़वह कि खाक। बहुत लीलसा छल जे परिवारमे इंजीनियर डॉक्टर देखियैक मुदा हमरा सन-सन परिवारक लेल सपना नहि तँ आरो की अछि। एक दिशि पनरह-बीस लाखक पढ़ाइ आ दोसर दुइयो हजार महिनाक आमदनीक परिवार नहि। मुदा अखन बच्चा छह, आशासँ जीवैक उत्साह मनमे जगबैक छह।’’
जहिना जनकजीक फुलवारीमे राम आ सीताक प्रथम मिलन भेलनि तहिना सुकन्या आ लोचनक बदलल रुपक बीच भेल। अखन धरि जे बच्चा खेलौना सदृश्य परिवारमे छल ओकरा कानमे एकाएक जिनगीक बात पड़लै। जिनगीक लेल प्रेम भरल संगीक जरुरत होइत अछि। जिनगीक बात सुनि दुनूक देह सिहरि गेलइ। सिहरैत देह देखि पक्षधर कहलखिन- ‘‘बुच्ची, लोचन तोहर पाहुन भेलखुन। अंगनेक ओसारक कोठरी दऽ दहुन। सभ देखभाल तोरे उपर। कोनो तरहक असुविधा पढ़ैमे नहि होइन।’’
पक्षधरक बात सुनि सुकन्या शुटकेस माथपर उठा लोचनक पाछू-पाछू विदा भेल। कोठरी खुजले रहै अँटकैक कतौ जरुरते नहि पड़लैक। एक जनिया चौकी, कपड़ाक लेल अलगनी, एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी। कुरसीपर शुटकेश खोलि लोचन कपड़ा निकालि चौकीपर रखलक। चौकीपर रखितहि सुकन्या ओहि अलगनीपर रखलक जहिपर पहिनेसँ ओकर कपड़ा छलैक। साओनक झूला जेकाँ दुनूक कपड़ा झुलए लगल। किताब, काँपी, कलम निकालि टेबुलपर रखलक। एक्के कोर्सक किताव दुनूक। लोचन मैट्रिकक सेन-टप केंडीडेट आ सुकन्या मैट्रिकक विद्यार्थी। टेबुलक बगलमे लोचन लग ठाढ़ि भऽ सुकन्या किताव फुटा कऽ नहि राखि, सभकेँ जोड़ा लगा-लगा रखलक। दुनूक नजरि दुनू किताब-कापी-पेनक जोड़ापर अँटकि गेल। पहिनेसँ दोबर कितावक थाक भऽ गेल। अएना जेकाँ एक दोसरक हृदयमे अपन-अपन रुप देखए लगल। किताबक लिखावट प्रेसक होइत। तहूमे एक्के प्रेसक किताव। मुदा काँपी तँ अपन-अपन हाथक लिखल होइत। एक दोसराक काँपी उलटा-उलटा देखए लगल। देवनागरी लिखावट लोचनक सुन्दर मुदा अंग्रेजी लिखावट सुकन्याक सुन्दर। ऐना किअए भेल? एक्के हाथक लिखावट दब-तेज कोना भऽ गेल। मुदा उत्तर ककरो मनमे नहि अबैत। अनायास सुकन्याक मन नाँचल। एते काल भऽ गेल अखन धरि पानियो नहि अनलौं। धड़फड़ा कऽ कोठरीसँ निकलि छिपलीमे जलखै आ लोटामे पानि नेने आबि चौकीपर छिपली रखि हाथ शुद्ध करै लऽ लोटा बढ़ा, चौकीक गोड़थारी दिशि पलथा मारि बाबाक पाहुनकेँ खुआवए बैसि गेली। खेबाकाल पुरुख चुप रहैत, नोन-अनोनक प्रश्न किअए उठतै। समदर्शी मिथिला छियै कि ने?
एक बजेसँ लऽ कऽ चारि बजे धरि परीक्षाक कार्यक्रम रहैक। पहिल दिन लोचनो दुर्ग टपै लऽ जाएत तेँ सुकन्याक मन मृगा जेकाँ नचैत। भिनसरेसँ सुकन्या लोचनपर नजरि अटकौने....... समएपर अपन काज पुरबैक अछि। हमरा चलैत जँ शुभ काजमे बाधा होयत तँ भगवानक ऐठाम दोखी हएब। मास्टर साहेबक सिखौल बात सुकन्याकेँ मन पड़ल। काजक भार तँ लोचनक उपरमे छन्हि हम तँ हुनकर मदतिगार मात्र छिअनि। तेँ नीक हएत जे हुनकेसँ पूछि लिअनि। चंचल मनमे उठलै-पूजाक तैयारीमे सभ किछु फुलडालीमे सजबैत होएत बीचमे बाधा देब उचित नहि। हो न हो फूल-पत्तीक जगहे बदलि जाइन। अनायास मनमे उठल-हाय रे बा घड़ी तँ देखबे ने केलहुँ। अगर बारह बजि गेल हेतइ तँ खुअबैक दोखी के हएत? मन व्याकुल, अव्यवस्थित वस्त्र, केश छिड़िआएल, कर्मक भारसँ भादबक अन्हरिया जेकाँ अन्हार आँखिक आगू सुकन्याकेँ पसरि गेल। कतऽ जाउ ककरा पुछियै। गाछो-बिरीछ नहि अछि जे पुछि लैतियै। अस्त-व्यस्त अवस्थामे सुकन्या माए लग पहुँच बाजलि- ‘‘भानस भेलौ?’’
‘‘
अखने। अखन तँ आठो नै बाजल हएत।
‘‘
जलखै भेलौ?’’
‘‘
बच्चा कहलक एक्के बेर खा कऽ सबेरे जाएब।’’
जहिना केचुआ छोड़ैत समए साँपकेँ होइत, भले ही नव जीवन किऐक ने प्राप्त करै मुदा दर्द तँ हेबे करैत छैक। मीरा जेकाँ सुकन्या राजस्थानक तँ नहि। मिथिलाक वाला। परिवार आ समाजक सुकन्या अदौसँ समर्पित। बम्बईक धुन (गीतक धुन) बहुत मधुर होइत अछि तँ समवेत स्वरमे माए-वहिनक चैतावर, बारहमासा आ समदाउनक तँ मधु सदृश्य अछि। जहिना मधुमाछी उड़ि-उड़ि कखनो आमक गाछपर चढ़ि सोझे अपन प्रेमी मंजर लग पहुँच जाइत तँ लगले माटिपर ओंघराएल चमेलीक रसकेँ आमक रसमे महा मिश्रणक घोल बनबैत, तहिना ने छी।
कोठरीसँ निकलितहि लोचनक आँखि सुकन्यापर पड़ल। हजारो रश्मि रुपी तीर दुनूक बीच टकराए लगल। मुदा दू रंग। जहिना लड़ाइक मैदानमे वीर असीम विसवासक संग मरै लऽ नहि बलिदान होइ लऽ बढ़ैत अछि, तहिना लोचनोक हृदयमे होइत। कलीक खिलैत फूल जेकाँ मुँह। मुदा सुकन्या मने-मन भगवानसँ आराधना करैत जे ‘‘कुरुक्षेत्रसँ लोचन हँसैत आबए।’’
उचंगल मन फेरि उचङि गेल। ओसारसँ निच्चाँ उतड़ितहि सुकन्याक हृदय लोचनकेँ पाछूसँ ठेलए लगल। जहिना बच्चा सभ माटिक पहीया, कड़चीक गाड़ी बना धनखेतीक माटि उघि-उघि अंगनाक ओलतीमे दऽ खुशी होइत जे हमर अंगना चिक्कन भऽ गेल, तहिना आगू-बढ़ैत लोचनकेँ देखि सुकन्याकेँ खुशी होएत। मुदा खुशी अंटकल नहि। लगले चारि बाजि गेल। मनमे उठलै भुखल भायकेँ जलखै कहाँ खुएलहुँ। जहिना किसानक खेत दहा गेलासँ व्यापारमे मंदी आबि गेलासँ, बेरोजगार भेलासँ कि भीख मंगोकेँ कियो भीख देनिहार नहि रहत तहिना जे धरती करोड़ो पतिव्रता नारी पैदा केलक वहए धरती पतिहत्यारा भऽ जहल कटबैत अछि।
साढ़े चारि बजे बेरि-बेरि देखलोपरान्त सुकन्याक नजरि मौकनी हाथीपर चढ़ल गणेश जी जेकाँ लोचनकेँ अबैत देखि लोटामे पानि-थारीमे जलखै परोसि आंगनक ओलतीमे ठाढ़ भऽ देखय लगल। अखन धरिक लोचनक साइयो मनोहर रुप मनमे नाचए लगलै। कोठरी आबि लोचन गरमाएल देहक कपड़ा बदलि जलखै करए लगल। विस्मित भेल सुकन्याक मुँह बाजि उठल- ‘‘केहन परीछा भेल भाय?’’
‘‘
बहुत बढ़ियाँ। जरुर पास करब।’’
जरुर पास सुनि सुकन्याक हृदय हनुमानक राम जेकाँ देखलक। मनमे आशाक सिहकी उठलैक। संगिये तँ जिनगीक जीत दिअबैत अछि। अपन सुखद जिनगीक मनोहर रुप लोचनमे देखि सुकन्या मोहित होइत बाजलि- ‘‘औझुका पेपर तँ नीक भेल मुदा आन दिनक जँ अधला हुअए, तहन?’’
‘‘
ओ ओहि दिनक मेहनतपर निर्भर अछि। ऐकर जबाव हँ-नहिमे नहि देल जा सकैत अछि।’’
सातम दिन परीक्षाक अंत भेल। स्कूलसँ आबि पक्षधरकेँ गोड़ लागि लोचन बाजल- ‘‘बाबा परीछा समाप्त भऽ गेल। गाम जाइ छी।’’
असिरवाद दइसँ पहिनहि बाबाक मनमे उठलनि, जहन एहिठाम काज सम्पन्न भऽ गेलैक तहन रोकब उचित नहि। सबेर-अबेर भेनहुँ अपन घर तँ पहुँच जाएत। बात बदलैत बाबा पुछलखिन- ‘‘केहन परीछा भेलह?’’
मुस्की दैत लोचन- ‘‘पास करब बाबा।’’
लोचनक मुस्की पक्षधरक हृदयकेँ, सलाइक काठी जेकाँ, आनन्दक कोठरीकेँ रगड़ि देलकनि। मन पड़लनि जनकपुरक धनुष यज्ञ। ठहाका मारि कहलखिन- ‘‘भाग्य ककरो लिखल नहि होइ छैक, बनाओल जाइ छै बौआ।’’
आंगनक ओलती लग ठाढ़ि सुकन्याक मन मृगा जेकाँ व्याकुल भऽ नचैत। जहिना अपने नाभिक सुगंधसँ मृगा नचैत तहिना सुकन्याक मन परीक्षाक समाचार सुनै लऽ नचैत। मुदा दरबज्जो तँ दोसराक नहिये छी, सोचि आगू बढ़ल।
दुनू गोटेकेँ माने सुकन्या आ लोचनकेँ देखि पक्षधर बाबा कहलखिन- ‘‘आइ तोँ विद्याध्ययनसँ गृहस्ताश्रममे प्रवेश कऽ रहल छह। तेँ बाबाक लगाओल फुलवारीक सुखल-मौलाएल डारिकेँ कमठौन कऽ खाद-पानिसँ सेवा करिहह। ओहिमे नव-नव कलश चलतै। जहिसँ हँसैत-खेलाइत जिनगी चलतह।’’
मूड़ी गोंतने लोचन आंगन आबि पानि पीबि किताव सरियवैक विचार केलक। कितावपर किताब गेटल देखि हाथ काँपए लगलै। सुकन्याक मन कानि उठल। जहिना कोनो धारक दुनू मोहारपर बैसल यात्रीकेँ होइत अछि तहिना सुकन्याक मनमे उठए लगल। लोचन सफलताक जिनगीमे पहुँच गेल आ हम? आशा-निराशाक क्षितिजपर लसकि गेल सुकन्या।
सीमाधरि लोचनकेँ अरिआतए सुकन्या विदा भेलि। गामक सीमा बिला गेल। ने लोचन सीमा देखैत जे घुमैक आग्रह करितैक आ ने सुकन्या देखैत जे अंतिम विदाइ दइतैक। अजीव गामोक सीमा अछि। एक्को परिवारकेँ गाम मानल जाइत अछि -जेना भोजमे- तहिना दसोगाम माला बनि गाम बनि जाइत (दस गम्मा जाति) अछि। अरिआतने-अरिआतने सुकन्या लोचनक घर धरि पहुँच गेली।
पनरह दिन बीतैत-बीतैत अनेको मौगिआही कचहरीमे फैसला लिखा गेल जे सुकन्या पक्षधरक घरसँ निकलि अजाति भऽ गेलि।कचहरीक फैसला सुनि-सुनि दुनू गोटेक सुकन्याक माए-बापक करेज दड़कए लगलैक गेलइ। कनैत मन बाजए लगलैक, मनो ने अछि जे कहियासँ दुनू परिवारमे दोस्ती अछि। सभ तुर हमहूूँ जाइ छी आ ओहो सभ आबि रहैत छथि। मुदा आइ की देखि रहल छी। जाधरि पिता जीबैत छथि ता धरि एहि परिवारक हम सभ के होइ छी? समाजक लोकक जबाव ओ देथिन। पिताकेँ गामक लोकक बात कहलखिन। बेटा-पुतोहूक बात सुनि गरजि कऽ पक्षधर कहलखिन- ‘‘जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महीसि, खेत-पथार जेकाँ होइए कि ओहि समाजकेँ पँच तत्वक बनल मनुष्य कहल जा सकैत अछि। जँ से नहि त हमर कियो मालिक नहि छी। कियो ओंगरी देखाओत त ओकर ओंगरी काटि लेबइ। आइये दोस्तक ऐठाम जाइ छी आ देखि-सुनि अबै छी।
जहन भाँग पानिमे अलगि गेल तहन पुतोहू बुझलनि जे भाँग पीसा गेल। पोछि-पाछि सिलौटकेँ धोय बाटीमे रखलनि। दरबज्जापर बैसल पक्षधरक मनमे उठलनि जे नअ बाजि गेल, अखन धरि किअए ने कियो आएल। फेरि मन उनटि कऽ भाँगपर गेलनि। भाँगपर नजरि पहुँचतहि मनमे उठलनि जे बिनु भाँग पीनहि तँ ने सभ निसा गेल अछि। तहन भाँगक जरुरते की? किछु दिन पहिने धरि सभ गाममे एकदिना फगुआ होइत छलै, मुदा आब तीन दिना भऽ गेल। ओना तीनि रंगक पतरो आबि गेल अछि। मुदा अपना गाममे तँ एकदिने अखनो धरि होइत आएल अछि आ जाधरि जीबि ताधरि होइत रहत।
कीर्तन मंडलीक संग-संग आनो-आन पक्षधर ऐठाम पहुँचलाह। अनगिनित थोपरी बजौनिहार आ अनगिनत गबैयाक समारोह। चीनीमे धोड़ल भाँग। सभसँ उमरदार रहितहुँ पक्षधर भाँग परसिनिहारकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने नवतुरिया सभकेँ पिआबह। वहए सभ ने बेसी काल गेबो करतह आ नचवो करतह।’’ मुदा एक्कोटा नवतुरिया बाबाक बात नहि सुनलक। सबहक यएह कहब रहै जे बाबा सभसँ श्रेष्ठ गाममे छथि, अनुभवी सेहो छथि। तेँ जँ ओ गोबर खत्तेमे खसताह तइओ हम सभ नहि छोड़बनि। नवतुरियाक बात सुनि पक्षधरक मनमे उठलनि अखन आंगनमे कहाँ छी दरबज्जापर छी। दस गोटेक बीच छी। तहन के छोट के पैघ कोना हएत? सभ तँ ब्रह्मेक अंश छी। तहूमे एते टुकड़ी एकठाम एकत्रित छी। दू गिलास भाँग पीबि पक्षधर उठि कऽ ठाढ़ होइत फगुआ शुरु केलनि- ‘‘सदा आनन्द रहे एहि दुआरे, मोहन खेले होरी हो।’’ ढोलक, झालि, कठझालि, हरिमुनिया, मजीरा, खजुरी, डम्फा, गुमगुमाक संग सइयो जोड़ थोपड़ीक महामिश्रणक धुनक संग कोइली सन मधुर अवाजसँ लऽ कऽ टिटहीक टाँहि धरिक बोल अकासमे पसरि गेल। ओना जमीनो खाली नहि रहल। इंगलिश डान्ससँ लऽ कऽ जानी धरिक नाच आ मेल-फीमेलक जोगीड़ा जोर पकड़िनहि रहै। बजनियो सभ अपन-अपन बाजो बजबैत आ कुदि-कुदि नचबो करैत। गोसाँइ डूबै बेरि फेरि पक्षधर भाँग बनबौलनि। अपन शक्तिकेँ कमजोर होइत देखि दोबरा-दोबरा सभ पीलक। उत्साहो दोबरेलै। पुरनिमाक राति। हँसैत चान। फागुन मास रहने अकासमे कतौ बादल नहि। मुदा तरेगण मलिन भऽ अपन जान लऽ झखैत। किऐक नहि तरेगण अपना जान लऽ झखत? आखिर बसन्त-बसन्तीक समागमक दिन छी की ने।
गामक दछिनवरिया सीमापर समन जरए लगल। समनक धधड़ाकेँ पक्षधर उत्तरसँ दछिन मुँहे कुदलाह। बाबाकेँ देखितहि सभ एका-एकी कूदए लगल।
धधड़ा मिझा गेल। मुदा जरनाक आगि चकचक करितहि रहल। समदाउन गबैत सभ घरमुँहा भेलाह।
 
1.खड़ानन्‍द यादव-गहूमक बोरा, 2.-उमेश मंडल-जेहन मन तेहन जि‍नगी

खड़ानन्‍द यादव
 ग्राम- बेलही (कचनवा)
लोकही
जि‍ला- मधुबनी

गहूमक बोरा

चारि‍ इस्‍वीक बाढ़ि‍क वि‍भीषि‍का। कोसी-कमलाक बीचक एगारहो धारक पानि‍ एकबट भऽ संगे-संग समुद्र बना दछि‍न मुँहे दौड़ैत। लोकसँ लऽ कऽ मालो जालक जान अवग्रहमे पड़ि‍ गेल। जरल पेट एकत्रि‍त भऽ सरकारीक गहूमक गोदाम अपन बुझि‍ लुटि‍ लेलक। अन्‍नागांहि‍स मुद्दालहक नामसँ केस भऽ गेल। जे पकड़ाएत सएह मुद्दालह। भलेहीं ओ लुटने हुअए वा नहि‍। लुटनि‍हार बाढ़ि‍क कबचक उपयोग कऽ लेलनि‍। मुदा, जे नहि‍ गेल रहथि‍ ओ नि‍चेन जे हमरा ि‍क हएत?
     सरकारी गोदाम लूटि‍। जहि‍ठाम कुरसीपर बैसि‍ करोड़ाे लुटैत अो थोड़े पकराइत। आि‍क ओकरा चरि‍त्रमे थोड़े कोनो दोष लगतै जे घुस लैत पकड़ा जहलो जाइत आ घुस दऽ कोर्टसँ ि‍नर्दोषो साबि‍त होइत।
  ई तँ युगक धरम छी। ओहनो तँ युग होइत जहि‍मे घुसो एक तरहक कारोबार छी।
     लोहाक टोपी माने हेलमेट बला सि‍पाहीकेँ दौड़ शुरू भेल। सभ अपन गर धऽ लेलक। थाना-पुलि‍सक काज ढोलबा बुझैत नहि‍। बम्‍बइयोमे कोठि‍ऐक काज करैत रहै। संयोगसँ गाम आएल रहै। लोकक सुन-गुन पाबि‍ ढोलबाक घर घेरि‍ लेलक। ओ बुझि‍ गेल जे पकड़ा जाएब। ि‍कएक तँ ऐहन-ऐहन घटना बम्‍बईमे संगी-साथीक मुँहे सुनने रहए। पत्‍नीकेँ कहलक- ‘‘हम बोरामे पैसि‍ जाइ छी अहॉं बोराक मुँह बाहरसँ बान्‍हि‍ देबइ।’’
  सएह केलक। ऑंखि‍क सोझे देखै दुआरे बोरामे कने भूर कऽ देलक। एकटा सि‍पाही घरक बोरा देखि‍ ढोलबाक पत्‍नीकेँ पुछलक- ‘‘इसमे क्‍या है?’’
-    ‘‘गहूम।’’
लोकक संग-संग गहूमो पकड़ैक रहैक। गहूम सुनि‍ संगीकेँ सोर पाड़ि‍ सि‍पाही बाजल- ‘‘पकड़ मे आ गया। जल्‍दी आओ?’’
  तीनि‍-चारि‍टा सि‍पाही दौड़ कऽ पहुँच गेल। बीचे घरमे बोरा देखि‍ अपन सफलताक ऐहसास भेलै। बोराक भीतर ढोलबा संच-मच भेलि‍ पड़ल सभ ि‍कछु देखैत-सुनैत रहै। दूटा सि‍पाही बोराक एक भागक दुनू कोन पकड़ि‍ आ तेसर बोरा मुँहक बान्‍ह पकड़लक। बान्‍ह ढील रहै उठैबतहि‍ ससरि‍ गेल। डोरीकेँ ससरि‍तहि‍ ढोलबाक दुनू पाएर नि‍कलि‍ गेल। बोरा नि‍कालि‍, ढोलबाकेँ पकड़ि‍, जीपमे चढ़ा सि‍पाही ि‍वदा भऽ गेल।
उमेश मंडल

जेहन मन तेहन जि‍नगी

सभ दि‍नेक समयानुसार एकटा साधु सबेरे स्‍नान करए लेल नदीक पानि‍मे पैसलाह। डॉंड़ भरि‍ पानि‍मे पहुँच पूब मुँहे सूर्य दि‍स तकलनि‍। जहि‍ना माटि‍क तरक बीजक अंकुर बीजसँ नि‍कलि‍ धरतीक उपर अबैत रहैत तहि‍ना सूर्यो अन्‍हारक गर्भसँ नि‍कलि‍ अकास दि‍शि‍ चढ़ैत रहथि‍। जहि‍ना धरतीक उपरका परत अंकुरक पाग सदृश्‍य बनि‍ जाइत तहि‍ना सूर्यक ि‍करि‍ण अन्‍हारक पाग पहीि‍र लेलक। तहि‍ काल ओ साधु एकटा मुसरी माने चुहि‍याकेँ पानि‍क बेगमे भसैत अबैत देखलनि‍। अवग्रहमे पड़ल मुसरीकेँ साधु हाथसँ उठा उपर आि‍ब राखि‍ पुन: स्‍नान करए पानि‍मे पैसलाह। स्‍नानक उपरान्‍त ओकरा अपना संगे कुट्टीमे अनलनि‍। कुट्टीमे मुसरी रहए लागलि‍।
     साधुक क्रि‍या-कलाप देखैत ि‍कछु मासक उपरान्‍त मुसरी नमहर भेलि‍। ओकरो साधुक बरदान पबैक मन भेलइ। अबसर पाबि‍ मुसरी साधुकेँ कहलकनि‍- ‘‘आब हम जुआन भेलौं। जुआनक पछाति‍ बूढ़ि‍ हएब। बूढ़ि‍ भऽ मरि‍ जाएब। मुइलाक पछाति‍ तँ वंश समाप्‍त भऽ जाएत। तेँ वि‍आह करा दि‍अ?’’
  सूर्यकेँ देखबैत साधु कहलखि‍न- ‘‘एकरासँ ि‍वआह करब?’’
  आि‍ग जेकॉं धधकैत सूर्यकेँ देखि‍ मुसरी बाजलि‍- ‘‘ओ तँ आि‍गक गोला छयैक। हमरा शान्‍त स्‍वभावक चाही।’’
  बादलकेँ देखबैत साधु कहलखि‍न- ‘‘ओ तँ ठंढ़ो अछि‍ आ सूर्यसँ नम्‍हरो अछि‍। देखैते छहक जे सूर्योकेँ झॉंपि‍ दैत छन्‍हि‍?’’
मुसरीक मनमे नहि‍ जँचल ि‍कऐक तँ ओहूसँ नम्‍हर पति‍ जाचैत छलि‍। बाजलि‍- ‘‘नहि‍, ओहूसँ नमहरसँ करा दि‍अ।’’
  पवनकेँ देखबैत साधु कहलखि‍न- ‘‘ओ तँ बादलोसँ नमहर अछि‍। ि‍कएक तँ बादलोकेँ ऐम्‍हरसँ ओम्‍हर उड़बैत अछि‍।’’
  मुसरीकेँ ओहो पसि‍न्‍न नहि‍ भेल। अपन नापसन्‍दगी साधुकेँ जनौलक। तखन मुस्‍कुराइत साधु पहारकेँ देखबैत कहलखि‍न- ‘‘ओ तँ पवनोकेँ रोकि‍ दैत अछि‍।’’
  फेरि‍ अपन नापसन्‍दगी मुसरी व्‍यक्‍त केलक। तखन पहाड़मे ि‍बल खुनैत मूसकेँ देखबैत साधु पुछलखि‍न।
  मुसरीकेँ पसि‍न्‍न भऽ गेल। चौवन्‍नि‍यॉं मुस्‍की दैत बाजलि‍- ‘‘वि‍ल्‍कुल पसि‍न्‍न अछि‍। कदो एकरंगाहे अछि‍। छोट कद रहि‍तहुँ। पहाड़केँ खुनि‍ खोखला बनाओत। जखने पहाड़ खोखला बनत तखने जेमहर गुड़कबैक मन हेतइ तेमहर गुड़कौत।’’
     मूसकेँ बजा मुसरीसँ वि‍आह करबैत बरि‍आती सभकेँ साधु कहलखि‍न- ‘‘जि‍नगीमे सभकेँ एहि‍ना रंग-वि‍रंगक अवसर अबैत अछि‍। मुदा, ओ अपन मनेक अनुरूप अपन पति‍ चुनि‍ जि‍नगी िवतबैत अछि‍।’’

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...