Sunday, February 07, 2010

'विदेह' ५१ म अंक ०१ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५१)-PART I

'विदेह' ५१ म अंक ०१ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५१)

वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ)

२.२.जगदीश प्रसाद मंडल- -दोती विआह- कथा
२.३. अतिश कुमार मिश्र-नेपालक राज्यह पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली

२.४. सुजीत कुमार झा-नेपालमे मिथिला राज्यय की सम्भाव छैक ?
२.५.१. डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. - प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि

२.६. बिपिन झा-जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य
२.७.१.पण्डित ओ हुनक पुत्र- शिवशंकर श्रीनिवास २. -ऋृषि वशिष्ठ-जुआनी जिन्दाबाद
२.८. रामभरोस कापडि भ्रमर- एहि बेर सातम् अन्तवराष्ट्रि य मैथिली सम्मेझलन काठमाण्डूदमे हयत

३. पद्य

३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ

३.२. गंगेश गुंजन:राधा १७म खेप

३.३. शिव कुमार झा-किछु पद्य
३.४.१. रामभरोस कापडि भ्रमर-गीत २. रमण कुमार सिंह- दिल्लीमे...

३.५.१. राजदेव मंडल- सिर बिहून धड़ २. कालीनाथ ठाकुर-एक अभिशाप बापक पाप

३.६.१. सत्यानंद पाठक, गुवाहाटी- आह! जाड चलि गेल! २. दयाकान्त-ई छी मैथिल के पहचान
३.७.१. विनीत उत्पल-पुष्कर २ मनीष झा "बौआभाई"- ऋतुपति बसंत (कविता)-
३.८.१. मो. गुल हसन-सभटा चौपट्ट भऽ गेल २. मनोज कुमार मंडल-बहीन३.कल्पना शरण-मिथिलाक तीला संकराति




४. बालानां कृते-१.. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु लघुकथा २.. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)३.कल्पना शरण-देवीजी
५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
6.1 Dr.Shefalika Verma-SUBLIME LOVE-Translated by poetess herself

6.2.NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr.Shefalika Verma-Translated by Dr.Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi.
7. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)


विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।



गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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३.मिथिलांगन सेहो हॉल नं. 2 मे स्टॉल संख्या 624-626 (फोनः23371275)पर उपलब्ध अछि।
१. संपादकीय
मैथिली समीक्षा (आगाँ)
१२. स्वतंत्रता/ आरक्षण- एहि दूटा पर घमर्थन। स्वतंत्रता सतही छल, मतदान नकली अछि आ आरक्षण भेदभावपर आधारित, ई घमर्थन करैत शोषक वर्ग। स्वतंत्रता मतदानकेँ जन्म देलक आ पाँच सालपर ई सामाजिक परिवर्तनक ढेर रास नव समीकरणकेँ जन्म दैत अछि- से शोषित वर्ग लेल हितकारी। असमान सामाजिक स्तरकेँ समान अधिकार देबाक कोनो मतलब नहि। तँ शोषक वर्ग कहत- ओहू आरक्षित वर्गमे ऊँच नीचक जन्म भऽ रहल अछि। मुदा से जातिक आधारपर तँ नहि भऽ रहल अछि आ पहिनेक तुलनामे कम भऽ रहल अछि। जे शूद्र ऋषि कवष ऐलूष वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, जे महिला अपाला वैदिक ऋचाक द्रष्टा छथि, से करोटमे किएक ठाढ़ रहथि ? पुरातन व्यवस्थाक जातिक भीतरक स्तरीकरण, कर्णकायस्थ आ मैथिल ब्राह्मणक भीतर पञ्जी-प्रथा द्वारा कएल गेल स्तरीकरण, पाइ-पैरवी लऽ दऽ कऽ होइत स्तरीकरणक स्थितिमे नीचाँ ऊपर केनाइ। समाजक बाल-विवाह पक्ष आ विधवा-विवाह विपक्ष आधारित आ पञ्जी आधारित बतहपनीक प्रतीक रूपमे रहैत आइ काल्हिक व्यवस्था सभ। आत्मकेन्द्रित, भाषा-संस्कृति छोड़ैत समाज- कारण एहि सभसँ प्रेम मात्र प्रतीक रूपमे ओ बाल्यकालसँ देखने अछि। पढ़ाइक रूप एखनो असमानतापर आधारित अछिये मुदा पुरनका तुलनामे अकाश पतालक अंतर अछि। कियो पढ़ि-लिखि कऽ अपन समाजमे उच्चसँ उच्चतम स्तर प्राप्त कऽ सकैत अछि आ तखन ने ओकरा पाँजि चाही आ ने किछु आर। फेर ओ ग्राम पंचाएतसँ लऽ कऽ संसद सदस्य धरि पहुँचैत अछि। ठिकेदारी करबासँ लऽ कऽ बस-टेम्पू धरि चला-चलबा सकैत अछि। हम एहि द्वारे नहि पढ़ि सकलहुँ, कलक्टर नहि बनि सकलहुँ कहलापर आब लोक कहैत अछि जे तखन फलनांक बेटा कोना से बनि गेल।
१३. शोषक द्वारा शोषितपर कएल उपकार वा अपराधबोधक अन्तर्गत मरड़पर लिखल जाएबला कथा-कवितामे जे पैघत्वक (जे हीन भावनाक एकटा रूप अछि) भावना होइ छै, तकरा चिन्हित कएल जाए।
१४. मेडियोक्रिटी चिन्हित करू- तकिया कलाम आ चालू ब्रेकिंग न्यूज- आधुनिकताक नामपर। युगक प्रमेयकेँ माटि देबाक विचार एहिमे नहि भेटत, से एहि अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्यक, बुश-सद्दामक आलोचनामे धार ओहि कारणसँ नहि आबि पबैत अछि। कोनो मन्दिर-मस्जिदकेँ जे ओ समर्थन-विरोध करैत छथि वा कोनो नन्दीग्राम-लालगढ़क सेहो तँ ओहिमे सेहो ताहि तरहक धार नहि अबैत अछि। दारू पीबि मँतल मानववाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, वामपंथ आ दक्षिणपंथपर हुनकर विचार लागत ओंघाएल। युगक सभ शब्दावली भरताह आ कविता-कथा तैयार। अमेरिकाक आलोचनामे धार कोना आओत आ वामपंथक पक्षमे सेहो- जखन अपन आजीविका दक्षिणपंथक मदतिसँ चलि रहल अछि। संघर्षक अभाव सृजनात्मकताक स्तरकेँ समए बढ़लासँ बढ़ेबाक बदला घटबैत अछि। युगक अनुरूप सभ चलैए, ओकर विपरीत चलब तखन ने सृजनात्मकताक संग चाही। दोसराकेँ पलायनवादी कहनिहार एहि तरहक सुविधावादी तत्वकेँ चिन्हित करू, गहींर पैसब जिनका लेल संभव नहि। इतिहाससँ जुड़ाव ऐतिहासिक मनोभावनासँ जोड़ि सकत। वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाकेँ माटि देबामे धारक अभाव- हीनभावनाग्रस्त आ अपराध भावसँ भरल लेखकसँ संभव नहि। न्याय वैशेषिक आ सांख्य-योगक वस्तुवाद, बाह्यक यथार्थ आ मायाक विरोध, गृहस्थ जीवन, लोक हित। कला आ साहित्यक कृति, आत्माक भीतरक ज्ञान प्रज्ञापर आधारित होइत अछि जे अखण्ड अछि- गति, स्वतंत्रता, सर्जनात्मक परिवर्तन। इतिहास वा साहित्यक इतिहास हम बदलि नहि सकैत छी आ एतए उच्च आ मध्यवर्गक स्मृति आधारित मिथिलाक स्वर्णयुग। मुदा तकर महत्व दूरदर्शन आ चलचित्र टामे भऽ सकैत अछि। उदारवाद। औद्योगिकरण आ तकर आर्थिक विकासक सफलता-असफलता। सामाजिक रूपमे समाजक पिछड़ल वर्गक विरोधकेँ आरक्षण आ स्वतंत्रता पसारि देलक मुदा संगहि एकर तीव्रता कम केलक से चाहे ओ नक्सलवाद होअए वा माओवाद वा मर्क्सवाद-लेनिनवाद। बुर्जुआ वर्गक लेल ई फाएदा रहल। बुर्जुआ वर्गक राजनैतिक आ सांस्कृतिक संगठन पसरल आ सर्वहारा वर्ग धरि पहुँचए से प्रयास आ महिला लोकनिकेँ एहिमे सम्मिलित करबाक प्रयास। पाइ आ सुविधा अपना संग परम्परागत नैतिकताकेँ तोड़लक। कम्पनी अपन स्वतंत्र अस्तित्व बनेलक आ परिवार आ व्यक्ति एहि तरहक कम्पनीकेँ नौकरीपेशा लोकक संग चलबए लागल। प्रकृतिपर नियन्त्रण आ मानवीय व्यवहारक अवलोकन। काजक लेल अन्न आ काजक बदला पाइ, रोजगार गारन्टी कार्यक्रम, जनवितरण प्रणालीक दोकान। रोजगार लेल देश-विदेश छोट होएब, परिवारक आधारपर आघात। पूँजीवादी विश्व अर्थव्यवस्था, परिवर्तन आपरूपी नहि वरन् संघर्ष आ प्रयाससँ भेटत। स्वतंत्र मानवीय संवेदना जे नीक भविष्यक गारंटी नहि दैत अछि तँ ई अधलाहक सेहो गारंटी नहि दैत अछि। हमरा लग विकल्प अछि आ मैथिली साहित्यक पुनर्जीवनक जे किछु प्रमाण भेटि रहल अछि से कम नहि अछि। विकल्प हमरा सभकेँ तकबाक अछि जे सनसनी पसारी आकि कार्य करी।
१५. भारतमे राजनीतिक क्रान्तिक बाद औद्योगिक आ सामाजिक क्रान्तिक संकल्प कएल गेल, विकसित देशमे औद्योगिक क्रान्तिक पहिने सामाजिक क्रान्ति भेल। ताहि कारणसँ हमरा सभकेँ कठिन परिस्थितिक सोझाँ हेबऽ पड़ल। लोकाचार, चिन्तन क्रम आ दृष्टिकोणक अलाबे पोषण, स्वास्थ्य, सफाइ, चिकित्सा, शिक्षा, आयु-प्रत्याशामे वृद्धि, मृत्युदरमे कमी। आधुनिकीकरण, लोकतंत्रीकरण, राष्ट्र-राज्य संकल्पक कार्यान्वयन, प्रशासनिक-वैधानिक विकास, जन सहभागितामे वृद्धि, स्थायित्व आ क्रमबद्ध परिवर्तनक क्षमता, सत्ताक गतिशीलता, उद्योगीकरण।
१६. समाजक धनाढ्य आ निर्धनमे विभाजन- दुनू वर्गक आकार, स्तर आ बीचक दूरी।
१७. स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद नवीन राज्य राजनैतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक समस्या-परिवर्तन आ एकीकरणक प्रक्रिया, कखनो काल परस्पर विरोधी। मानवशास्त्रीय, जातीय, धार्मिक, भाषिक- प्राथमिक आ लघु निष्ठा- स्थानिक, जातीय, धार्मिक-भाषिक आस्था। सामुदायिकताक विकास, मनोवैज्ञानिक आ शैक्षिक प्रक्रिया।
१८. आदिवासी- सतार, गिदरमारा आदि विविधता आ विकासक स्तरकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि। प्रकृतिसँ लग, प्रकृति-पूजा, सरलता, निश्छलता, कृतज्ञता। दिनकर, सामाजिक-धार्मिक उत्सव, सूर्य-चन्द्र-वृक्ष-पर्वत पूजा, पृथ्वी स्तुति आ जलाशय आ नक्षत्रक प्रति आस्था, जनक माने जन (विश)सँ निकलल, मिथिलावासीमे सेहो ई आस्था।
१९. व्यक्तिक प्रतिष्ठा स्थान-जाति आधारित। किछु प्रतिष्ठा आ विशेषाधिकार प्राप्त जाति। किछुकेँ तिरस्कार आ हुनकर जीवन कठिन। अनुसूचित जाति (११००, पहिल सरकारी सूची) +पिछड़ल जाति ३७४३ (मंडल आयोग)= ४८४३. वर्ण-व्यवस्था धार्मिक नहि सामाजिक प्रथा जकर आब कोनो उपयोग नहि। विघटनकारी तत्वक रूपमे विदेशी मानसिकता आ जड़ मानसिकता द्वारा उपयोग संभव।
२०. महिला आ बाल-विकास- महिलाकेँ अधिकार, शिक्षा-प्रणालीकेँ सक्रिय करब, पाठ्यक्रममे महिला अध्ययन, महिलाक व्यावसायिक आ तकनीकी शिक्षामे प्रतिशत बढ़ाओल जाए। गतिशील प्रबन्धन, विकास-प्रक्रियामे स्थान। स्वतंत्रता आन्दोलन आ पर्यावरण आन्दोलन, दहेज-विरोधी आन्दोलनमे सहभागिता, आर्थिक समानता लेल संघर्ष, महिला श्रमिकक बच्चा लेल बालाश्रय-गृह, बालवाड़ी, आंगनवाड़ी। प्रतिद्वंदिताक कारण कम वेतन, काज करबाक दशा प्रतिकूल, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसँ महत्वहीन स्थान।
२१. स्त्री-स्वातंत्र्यवाद, महिला आन्दोलन।
२२. धर्मनिरपेक्ष- राजनैतिक संस्था संपूर्ण समुदायक आर्थिक आ सामाजिक हितपर आधारित- धर्म-नस्ल-पंथ भेद रहित। धर्म-आस्था वा सामाजिक मूलक आधारपर व्यक्ति वा समूहक बीच विभाजन अस्वीकार। सभ समुदाय शक्तिक उपयोग उत्तरदायित्व आ कर्तव्यक निर्वहन जेकाँ, माने वितरणात्मक न्याय। धर्म-आस्थाक आधारपर कोनो भेद नहि आ राज्य धर्म द्वारा नियंत्रित नहि होएत।
२३. टैगोरक कलात्मकतावाद, गाँधीक नैतिकतावाद, अरविन्द घोषक रहस्यवादी आध्यात्म दर्शन, विवेकानन्दक व्यावहारिक वेदान्तवाद।
२४. विकास आर्थिकसँ पहिने जे शैक्षिक हुअए तँ जनसामान्य ओहि विकासमे साझी भऽ सकैए। एहिसँ सर्जन क्षमता बढ़ैत अछि आ लोकमे उत्तरदायित्वक बोध होइत अछि। सामुदायिक आ राष्ट्रीय जीवन।
२५. विज्ञान आ प्रौद्योगिकी विकसित आ अविकसित राष्ट्रक बीचक अंतरक कारण मानवीय समस्या, बीमारी, अज्ञानता, असुरक्षाक समाधान- आकांक्षा, आशा सुविधाक असीमित विस्तार आ आधार। एहिसँ वैयक्तिक आ राष्ट्रीय शक्तिक अभिवृद्धि होइत अछि।
२६. विधि-व्यवस्थाक निर्धन आ पिछड़ल वर्गकेँ न्याय दिअएबामे प्रयोग होएबाक चाही। न्याय पंचायतकेँ पुनःजीवन।
२७. नागरिक स्वतंत्रता- मानवक लोकतांत्रिक अधिकार, मानवक स्वतंत्र चिन्तन क्षमतापूर्ण समाजक सृष्टि, प्रतिबन्ध आ दबाबसँ मुक्ति। अधिकारक उत्पीड़नसँ बचाव।
२८. प्रेस- शासक आ शासितक ई कड़ी- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक जीवनमे भूमिका, मुदा आब प्रभावशाली विज्ञापन एजेंसी जनमतकेँ प्रभावित कएनिहार। व्यवस्थामे स्थायित्व आ लोकतंत्रक प्रहरी आ संरक्षक। उद्योगपति प्रेसक मालिक आ सरकार शासन संचालक- प्रेसक स्वतंत्रताकेँ खतरा। नेपाल-भारत सन देश लेल ई खतरा आर बेशी।
२९. नव संस्थाक निर्माण वा वर्तमानमे सुधार, सामन्तवादी, जनजातीय, जातीय आ पंथगत निष्ठाक विरुद्ध, लोकतंत्र, उदारवाद, गणतंत्रवाद, संविधानवाद, समाजवाद, समतावाद, सांवैधानिक अधिकारक अस्तित्व, समएबद्ध जनप्रिय चुनाव, जन-संप्रभुता, संघीय शक्ति विभाजन, जनमतक महत्व, लोक-प्रशासनिक प्रक्रिया-अभिक्रम, दलीय हित-समूहीकरण, सर्वोच्च व्यवस्थापिका, उत्तरदायी कार्यपालिका आ स्वतंत्र न्यायपालिका।
३०. जल थल वायु आ आकाश- भौतिक रासायनिक जैविक गुणमे हानिकारक परिवर्तन कए प्रदूषण, प्रकृति असंतुलन।
३१. कला- एहि लेल कोनो सैद्धांतिक प्रयोजन होएबाक चाही ? सामाजिक संवेदनाक आ मानव क्रियाक एकटा रूप अछि कला। जगतक सौन्दर्यीकृत प्रस्तुति अछि कला। सौंदर्यक कला उपयोगिताक संग। कलापूर्णताक कलाक जीवन दर्शन- संप्रदाय संग।
३२. भावनात्मक वातावरण- सत्यक आ कलाक कार्यक सौंदर्यीकृत अवलोकन, सुन्दर-मूर्त, अमूर्त। प्रकृति कलाविशिष्ट प्रभावशाली स्थिति, शोकजनक, हास्य, मानवक सौंदर्यक अनुभव ओकर अनुभव बिना सम्भव नहि। एहिसँ समाजक सौंदर्यीकरणक प्रति दृष्टिकोण सोझाँ अबैत अछि।
३३. मानसिक क्रिया- मनुष्य़ सोचैबला प्राणी, मानसिक आ भौतिक दुनूक अनुभूति करएबला प्राणी। शरीर आ मस्तिष्क, दिनुका काज आ रातुक स्वप्न।
३४. विरोधाभास वा छद्म आभास- अस्पष्टता। सैद्धांतिक लाभ।
३५. काण्टक दर्शन- मछहरमे दू इंचक अवकाश बला जाल फेकब तँ दू इंचसँ कमबला माँछ नहि भेटत, तखन ई निर्णय जे एहि पोखरिमे दू इंचसँ छोट माँछ नहि! समीक्षकक जाल जतेक महीन होअए ततेक नीक।
३६. बाल-किशोर साहित्य- जे बच्चा किशोर पढ़त तँ बादोमे भाषाक प्रति घुरत- नोकरी-चाकरी स्थिर भेलाक बाद। कारण स्कूल-कओलेजमे जकर विषए मैथिली नहि अछि वा मैथिली बाल साहित्य नहि पढ़ने अछि से किएक मैथिलीसँ प्रेम करत- अहाँ ओकरा लेल नहि तकबै तँ ओहो नहि ताकत।
३७. सगर राति दीप जरए आ मैथिली समीक्षा- युद्धक कारण- सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक आ तात्कालिक। मात्र तात्कालिक रटि लिअ आ आर सभमे सभटा खरापे-खराप लिखि दियौ- आर्थिक स्थिति खराप- सामाजिक स्थिति खराप आदि। मुदा जे फ्रांसीसी क्रान्तिमे से लिखि देबै तँ ओहि समए ओतुक्का किसानक आर्थिक दशा इंग्लैंडसँ नीक रहै आ सैह फ्रांसकेँ क्रान्ति लेल सक्षम बनेलकै, प्रतिकार लेल सक्षम बनेलकै। तहिना सगर राति दीप जरएमे समीक्षा होइए- शिल्प नीक कथ्य नीक...।
३८. दलित साहित्य- महेन्द्र नारायण राम, बिलट पासवान विहंगम आदि केँ छोड़ि दियन्हि तँ मैथिलीमे दलित लेखक आ दलित साहित्य शून्य अछि।
३९. खेसारी / माघ / आम आ शरद ऋतु / धूमकेतु मोड़पर / यात्रीक उपन्यासमे आषाढ़क आ दोसर मासक तिथि दुइये पृष्ठक अन्तरपर / मोहन भारद्वाज । कुमार पवन
मोड़पर पृष्ठ १- एक पाँतीसँ ठाढ़ आ कतौ अरड़ा कऽ ओलड़ि गेल धानक सीस- कोसक कोस पसरल हरियर कचोर खेसारीक गद्दा ( माने अंतिम स्थिति)- मुदा खेसारी तँ अगहनक बाद (धानक बाद- गद्दरि तँ आर पहिने होइए) होइत अछि।
यात्री समग्र-पृ.२२० जेठ सुदी चतुर्दशी कऽ रहनि पीसाक वर्षी। पहिले वर्षी..पृ.. २२२- ..कहाँ जे एको दिनक खातिर जाइ, कर्ता बना, अषाढ़ बढ़ि तृतियाक तिथिपर पहिल।
बलचनमाक समीक्षामे मोहन भारद्वाज लिखै छथि- क्यो यात्रीजीकेँ पुछलकन्हि जे बलचनमाक दोसर भाग लिखबा लेल..यात्री कहलखिन्ह जे बलचनमाकेँ तँ आब धोधि भऽ गेल होएतैक। यात्रीकेँ के पुछलकन्हि (काल्पनिक प्रश्नोत्तरी)- फेर जे बलचनमा पढ़ने छथि तिनका बुझल छन्हि जे बलचनमाकेँ मारि कऽ पाड़ि देल गेलै से मृत बलचनमाकेँ धोधि हेतै से यात्रीजी ओहि काल्पनिक प्रश्नकर्ताकेँ किएक कहथिन्ह।
कुमार पवनक पइठ सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथा मुदा अहूमे अन्त दुनू भाइक लड़ाइ आदि..एकर बदला दोसर लक्ष्य होएबाक चाही-जेना शोषण।
पंकज पराशर उर्फ अरुण कमल उर्फ डगलस केलनर उर्फ उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....
डगलस केलनरक नीचाँक आलेखकक पंकज पराशर द्वारा चोरि सिद्ध कएलक जे एक दशक पहिने एहि लेखक द्वारा अरुण कमलक चोरि सँ आइ धरि हुनकामे कोनो तरहक परिवर्तन नहि आएल छन्हि। हँ, आब ओ पटना विश्वविद्यालयक प्रोफेसरक रचना चोरेबासँ आगाँ बढ़ि गेल छथि आ कैलिफोर्निया वि.वि.क प्रोफेसरक रचना चोराबए लागल छथि। एहि सन्दर्भमे हमरा एकटा खिस्सा मोन पड़ैत अछि। २०-२२ बरख पुरान सत्य कथा। दरभंगामे रहैत रही, छतपर हम आ हमर एकटा पिसियौत भाइ साँझमे ठाढ़ रही। सोझाँमे सरवनजीक घरक बाअड़ीमे खूब लताम फड़ल छलन्हि। हमर पिसियौत भाइ हुनका इशारा दऽ कहलखिन्ह जे दस टा लताम आनू। ओ बेचारे दसटा लताम तोड़लन्हि आ आबि रहल छलाह आकि रस्तामे हमसभ देखलहुँ जे एकटा छोट बच्चा संग हुनका किछु गप भेलन्हि आ ओ पाँचटा लताम ओहि बच्चाकेँ दऽ देलखिन्ह। जखन सरवन जी अएलाह तँ कहलन्हि जे ओ बच्चा हुनका भैया कहि सम्बोधित कएलकन्हि आ पाँचटा लताम मँगलकन्हि- से कोना नञि दितियैक- सरवनजीक कहब छलन्हि। आब पंकज पराशर प्रसंगमे की भेल से देखी। प्रदीप बिहारीजीक बेटा प्रणवकेँ पंकज पराशर नोम चोम्स्की आ डगलस केलनरक रचना दैत छथिन्ह आ तकर अनुवाद करबा लेल कहै छथिन्ह। बेचारा जान लगा कऽ अनुवाद कऽ दैत छन्हि, ई सोचि जे जिनका ओ चच्चा कहै छथि- जे क्रान्तिकारी विचारक छथि (मार्क्सवादी!!!) से कोनो नीक पत्रिकामे ई अनुवाद छपबा देथिन्ह। मुदा छह मासक बाद चच्चाजी कहै छथिन्ह जे नोम चोम्स्की बला रचना हेरा गेल आ डगलस केलनर बला रचनाक अनुवाद नञि नीक रहए से रिजेक्ट भऽ गेल। मुदा क्रान्तिकारी कवि (चोरुक्का सेहो विवरण नीचाँमे अछि) दुनू रचना पहल पत्रिकामे पठा दै छथि- पहल-८६ मे डगलस केलनर बला रचना छपितो छन्हि (आ से अनुवादक रूपमे नहि वरन् मूल लेखकक रूपमे) आ ओ बैन सेहो कऽ देल जाइ छथि। हमर सरवन जी एकटा बच्चा द्वारा भैया कहलापर पाँचटा लताम ओकरा दऽ दै छथिन्ह मुदा हमर पराशरजी भातिजोक पाँचटा लताम निर्लज्जतासँ छीनि लैत छथि।
आ हम हुनकर खिजबीन तखन करै छी जखन ओ विदेहंमे आइडेन्टिटी बदलि (उदयकान्त उर्फ ISP 220.227.163.105 , 164.100.8.3 , 220.227.174.243 उर्फ.....) हमरा गारि पढ़ैत छथि- हुनकर रियल आइडेन्टीटी नाङट करै छी। फेर सभसँ गप करै छी आ पाठकक सहयोगसँ आरम्भ, पहल क पुरान अंक भेटि जाइत अछि जतए हिनकर कुकृत्य छन्हि।

नीचाँक लिंकपर नीचाँक सभटा आर्टिकल आ कविता आ तकर पंकज पराशर द्वारा चोरिक रचनाक पी.डी.एफ. फाइल डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि।
http://www.box.net/shared/75xgdy37dr
सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि।

Douglas Kellner
Philosophy of Education Chair
Social Sciences and Comparative Education
University of California-Los Angeles
Box 951521, 3022B Moore Hall
Los Angeles, CA 90095-1521

Fax 310 206 6293
Phone 310 825 0977
http://www.gseis.ucla.edu/faculty/kellner/kellner.html


Intellectuals, the New Public Spheres, and Techno-Politics
The category of the intellectual, like everything else these days, is highly contested and up for grabs. Zygmunt Bauman contrasts intellectuals as legislators who wished to legislate universal values, usually in the service of state institutions, with intellectuals as interpreters, who merely interpret texts, public events, and other artifacts, deploying their specialized knowledge to explain or interpret things for publics (1987; 1992). He thus claims that there is a shift from modern intellectuals as legislators of universal values who legitimated the new modern social order to postmodern intellectuals as interpreters of social meanings, and thus theorizes a depoliticalization of the role of intellectuals in social life. .......


अरुण कमल
Arun lives in Patna where he teaches English at the Science College of Patna University.
नए इलाके में
जहाँ रोज बन रहे नये नये मकान
मैं अक्सर रास्ता भूल जाता हूँ
खोजता हूँ ताकता पीपल का पेड़
खोजता हूँ ढहा हुआ घर
और ज़मीन का खाली टुकड़ा जहाँ से बायें
मुड़ना था मुझे
फिर दो मकान बाद बिना रंग वाले लोहे के फाटक का
घर था इकमंजिला
चल देता हूँ
या दो घर आगे ठकमकाता
रोज कुछ घट रहा है
यहाँ स्मृति का भरोसा नहीं
एक ही दिन में पुरानी पड़ जाती है दुनिया
जैसे वसंत का गया पतझड़ को लौटा हूँ
जैसे वैशाख का गया भादो को लौटा हूँ
और पूछो -
क्या यही है वो घर?
आ चला पानी ढहा आ रहा अकास
शायद पुकार ले कोई पहचाना ऊपर से देख कर

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० जनबरी २०१०) ९३ देशक १,०६८ ठामसँ ३७,७३१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,२३,८२० बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।
सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (http://www.box.net/shared/75xgdy37dr)बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि।

गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in

२. गद्य
२.१. प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ)

२.२.जगदीश प्रसाद मंडल- -दोती विआह- कथा
२.३. अतिश कुमार मिश्र-नेपालक राज्यल पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली

२.४. सुजीत कुमार झा-नेपालमे मिथिला राज्यय की सम्भमव छैक ?
२.५.१. डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. - प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि

२.६. बिपिन झा-जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य
२.७.१.पण्डित ओ हुनक पुत्र- शिवशंकर श्रीनिवास २. -ऋृषि वशिष्ठ-जुआनी जिन्दाबाद
२.८. रामभरोस कापडि भ्रमर- एहि बेर सातम् अन्त राष्ट्रि य मैथिली सम्मेनलन काठमाण्डू मे हयत
प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक
मिथिलाक इतिहास

अध्याय–१३
मिथिलामे अंग्रेजी राजक अमल
(१७६५–१९४६)

१७६४क वक्सरक लड़ाई भारतक हेतु एकटा निर्णायक युद्ध छल कारण एकरा बाद इ स्पष्ट भगेल छल जे उत्तर भारतक कोनो शक्तिकेँ आब अंग्रेजसँ मुकाबिला करबाक क्षमता नहि रहि गेल छलन्हि। १७६५मे अंग्रेजी इस्ट इण्डिया कम्पनीकेँ जखन दिवानी भेटलैक तखनहिसँ भारतमे अंग्रेजी राज्यक स्थापनाक वीजारोपण सेहो भगेलैक। १८म शताब्दी उत्तर भारत आ दक्षिण भारतक महत्वाकाँक्षी नेता लोकनिक स्वार्थ पूर्त्तिक युग छल जखन लोग देशक पैघ स्वार्थकेँ बिसैरि अपन छोट–छोट स्वार्थक पूर्त्तिक हेतु देशक बलिदान करैत जाइत गेलाह। तिरहूत औरंगजेब समय धरि मुर्शिदाबादक नवावक मातहदीमे छल। १७४०सँ बिहार आ तिरहूतक भाग्य मुर्शिदाबादसँ मिलल छल आ ओहिठामक नवाव बिहारमे अपन उपनवाव बहाल करैत छलाह। अलीवर्दी खाँ पहिने बिहारेक उपनवाव छलाह। अलीवर्दीक कृपासँ अंग्रेज व्यापारी लोकनिकेँ थोड़ेक सुविधा प्राप्त भेल रहैन्ह।
१७५६मे अलीवर्दीक मृत्यु भगेलैक आ तकर बाद सिराजुद्दौलाह बंगालक नवाव भेल। अंग्रेज लोकनि अपन कुचक्रसँ पलासीक युद्धमे सिराजकेँ परास्त कए मीरजाफरकेँ १७५७मे नवाव बनौलन्हि। १७६०मीरजाफरकेँ हटाकए मीरकासिमकेँ नवाव बनाओल गेल। मीरकासिम मूंगेरकेँ अपन राजधानी बनौलन्हि। हुनका अंग्रेजसँ पटैत नहि छलन्हि आ बरोबरि खटपट होइत रहन्हि आ अंग्रेज मीरकासिमक चुस्ती चालाकीसँ खार खाइत छलाह। १७६३मे अंग्रेज आर मीरकासिमक बीचक आर सम्बन्ध खराब भगेल आर मीरकासिम दिल्लीक शाह आलम आर अवधक नवाव शुजाउद्दौलाहक सहाय्यसँ अंग्रेजक पटनामे स्थित कम्पनीपर धावा करबाक विचार केलन्हि। एकरे नतीजा भेल १७६४क बक्सरक लड़ाई। एहिमे अंग्रेज लोकनि विजयी भेलाह आ १७६५मे हुनका दिवानी भेटलन्हि। बंगाल, बिहार आ उड़ीसाक ओ अप्रत्यक्ष रूपेँ मालिक भगेलाह। तहियेसँ मिथिलामे अंग्रेजी राज्यक अमल मानल जा सकइयै। १७६५मे राबर्ट बारकर अपन सेनाक संग उत्तरी बिहारमे विदोही जमीन्दारकेँ दबेबाक हेतु ऐलाह। बेतियाक जमीन्दार जे गत दू वर्षसँ अराजक स्थितिसँ लाभ उठाकेँ विद्रोहक झंडा गारि देने छलाह तनिका ई दतेलन्हि। ओ जमीन्दार अपन किलामे नुका रहल छला। बारकरक पहुँचलाक बाद ओ तुरंत हुनकासँ समझौता कऽ लेलन्हि आर सबटा बकिऔता चुका देलन्हि। बारकर बेतियाक सम्बन्धमे बड्ड बढ़िया विवरण देने छथि। १७७२मे जखन बोर्ड आफ रेवन्युक स्थापना भेल तखन तिरहूतक सेहो राजस्वक आधारपर समझौता भेल। १७७४मे तिरहूतकेँ पटनाक अधीन कदेल गेलैक। १७७२मे फ्रांसीस ग्रैण्ड तिरहूतक प्रथम कलक्टर भके एलाह। ग्रैण्ड नीलहा कोठीक संस्थापक सेहो छलाह आर हिनके प्रयासे समस्त तिरहूतमे नीलहा कोठीक जाल बिछा देल गेल छल। १७८७धरि ग्रैण्ड साहेब रहलाह आर एहि बीच ओ समस्त तिरहूतक सर्वेक्षण राजस्वक दृष्टिये केलन्हि। तकर वार्थस्ट एला।
१७६२मे राज प्रताप सिंह भौरसँ हटाकेँ दरभंगामे अपन राजधानी लऽ अनले छलाह। १७७०मे जखन पटनामे रेवेन्यु कौंसिलक स्थापना भेल तखन पुनः प्रताप सिंहकेँ अपन जमीन्दारीक मुकर्ररी कम्पनीसँ भेटलन्हि। केली तिरहूतक राजस्व अधीक्षक भऽ कऽ एलाह। १७७१मे प्रताप सिंह आर केलीमे मतभेद प्रारंभ भेल। राजाक ओतऽ बहुत रास बकिऔता भऽ गेल छलन्हि आर अंग्रेज लोकनि हिनक पुरान स्तित्वकेँ नहि रहए देमए चाहैत चलथिन्ह। माधवसिंहक समयमे फेर नव हिसाबे कम्पनीक संग समझौत भेलन्हि, ओना राज्यारोहणक पूर्वहिं माधवसिंहकेँ धीरज नारायणसँ कैकटा परगन्ना भेटल छलन्हि। सबटा बकिऔता चुकौला पर राज्य पुनः माधवसिंहकेँ वापस भेलन्हि। ताहि दिनमे एक प्रकारक अस्थायित्व छल तैं लगले–लगले परिवर्त्तनो होइत रहैत छल। तथापि १७८१ सँ १७८९ धरि दरभंगा निस्तुकी रूपें माधव सिंहक अधीन रहल। वार्थस्ट्र कलक्टर दरभंगा आवि महाराजसँ भेटकए अनुरोध केलकन्हि जे दमामी बन्दोबस्त मानि लैथ परञ्च माधवसिंह बड़ा चिंतामे पड़ि गेल छलाह आर कोनो निर्णय लेवामे असमर्थ रझलाह। वो गवर्नर जेनरलसँ अनुरोध केलन्हि जे हुनक राज्य घुरा देल जान्हि। जखन ई सब वार्तालाप छल तखन हुनका कराम अलीक स्टेट सेहो प्राप्त भेलैन्ह (१७९५)। एहिमे १५परगन्नामे ३५टा गाम छल। सरकार बहादुर अहिबातकेँ नहि मानि एहि सब दान बला गाँव अपन राज्यमे मिला लेलक। पुनः झंझटक बाद १८००ई.मे इ सम्पत्ति राजकेँ भेटलैक। अतंतोगत्वा दरभंगा राज सेहो दमामीबन्दोबस्तक अधीन भगेल।
महाराज छत्रसिंहक समयमे कम्पनीक संग सम्बन्ध आर बढ़िया भेलैक। कम्पनीकेँ तखन नेपालसँ खटपट होइत छलैक आर लड़ाईक संभावना बढ़ल जाइत छलैक। कम्पनीक प्रतिनिधि महाराजसँ भेंट केलक आर हिनकासँ अनुरोध केलकन्हि जे संभावित गोरखा आक्रमणक विरूद्ध हिनका लोकनिकेँ सतर्क रहबाक चाही। तिरहूतक कलक्टर सीलीकेँ सेहो लिखल गेलैक जे ओ क्षेत्रक सब जमीन्दार सबसँ सेना प्राप्त करबाक प्रयास करे। सीली सेजर बैडशाक नाम जे पत्र लिखने छलाह जनकपुरसँ ताहिसँ ज्ञात होइछ जे दरभंगा महाराजकेँ छोड़ि केओ सक्रिय सहयोग नहि देने छलन्हि। छत्रसिंह करीब ९हजार टाकाक मदति सेहो देने रहथिन्ह। योग्य सैनिकक व्यवस्था सेहो इ कऽ देने छलथिन्ह। हिनक खुफिया सब अंग्रेजकेँ गोरखाक आक्रमणक पूर्व सूचना एवं ओकरा सबहिक बढ़बाक बाटक संकेत सेहो देलकन्हि। नेपालक विरूद्धक संघर्षमे अंग्रेजक मुख्य सहायक (सब तरहें) छत्र सिंह छलाह आर अंग्रेज सेना तखन पुपरी तक पहुँच चुकल। खिसियाकेँ नेपालक राजा अपन सैनिककेँ ई आदेश देलन्हि जे वो तिरहूत जिलाक सब गामकेँ लूट–पाट शुरू करे। जखन नेपालक विरूद्ध अंग्रेजक जीत भेलैक तखन छत्रसिंहकेँ महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। युद्ध समाप्त भेला उत्तरो अंग्रेजक अनुरोधपर छत्रसिंहक सेना मोतिहारीमे बनल रहल। ई लोकनि सतत अंग्रेजक खैरखाह बनल रहल। महेश्वर सिंहक समयमे सिपाही विद्रोह भेल। अंग्रेजकेँ हिन्दुस्तानी जमीन्दारपर सन्देह होइते छलैक आर ताहि पर एकटा कारणो आवि गेलैक। एक अफवाह प्रसारित भेलैक जे बहेड़ाक डिपुटी मजिस्ट्रेट मिस्टर डोवटनपर महाराजक एकटा कर्मचारी बन्दुक उठौलक यद्दपि ई बात किछु दोसर छलैक। महाराज अपन स्वामीभक्ति प्रदर्शित करबाक हेतु अंग्रेजकेँ नाथपुर आर पुर्णियाँक बीच डाक व्यवस्था चालो रखबाक हेतु १६टा घोड़सवार देलथिन्ह। १०० सिपाही सेहो ओ अंग्रेजकेँ पठौलन्हि मुदा ओ लोकनि संशकित रहबाक कारणे ओकरा घुरा देलन्हि। १८५५मे संथाल विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु सेहो महाराज हाथी इत्यादि कम्पनीक सैनिककेँ देने छलथिन्ह। महाराज महेश्वर सिंहक बाद कोर्ट आफ वार्डस भऽ गेलैक। तिरहूतमे सिपाही विद्रोहक प्रभाव कोनो रूपें कम नहि छल।
अंग्रेजक संग बढ़िया सम्बन्ध रखितहुँ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह देशक नब्जकेँ चिन्हलन्हि आर काँग्रेसक प्रारंभिक अवस्थामे जे जानसँ मदति केलन्हि जकर उल्लेख हम पूर्वहिं कऽ चुकल छी। सिपाही विद्रोहक बाद समस्त भारतपर अंग्रेजक एकछत्र राज्य कायम भेल आर तिरहूत कमीश्नरीक एकटा अंग जिलाक रूपमे दरभंगा राजक नामें प्रसिद्ध भेल आर उत्तर बिहारक प्रायः सब जिलामे किछु न किछु हिनका लोकनिकेँ रहबे करैन्ह। रामेश्वर सिंह आर कामेश्वर सिंहक समयमे सेहो ब्रिटिश सरकारक संग सम्बन्ध बढ़िये रहलैन्ह आर १९३५–१९३६मे महाराज कामेश्वर सिंह अपन स्तित्वकेँ आर दृढ़ केलन्हि आर हुनकमे बृद्धि भेलन्हि। नेहि भऽ राज्यक स्थिति प्राप्त करबाक हुनक पैघ अभिलाषा छलैन्ह आर अहि दिशामे ओ बहुत प्रयत्नो केने छलाह। सामान्य प्रतिष्ठाक हिसाबे आन जमीन्दारक अपेक्षा दरभंगा राज्यक विशेष महत्व छलैक आर अंग्रेज लोकनि एकरा अपन एकटा पैघ सम्बन्ध मानैत छलाह। १९३५क कानूनक बाद जे राष्ट्रीयताक एकटा वयार बहल तकरा फलें परिवर्त्तन स्वाभाविक भगेल आर १९४६मे भारतक स्वाधीनताक बाद बिहार पहिल राज्य छल जे जमीन्दारी उन्मूलनक हेतु कानून पास केलक आर बिहारसँ जमीन्दारी प्रथा समाप्त भगेल। बिहारक सब जमीन्दार समाप्त भगेला आर ओहि क्रममे मिथिलाक सबसँ पैघ जमीन्दार जे कहियो मिथिलेशो कहबैत छलाह। सेहो समाप्त भगेला।
II
तिरहूतमे नीलहा कोठीक इतिहासे:- उत्तर बिहार आधुनिक भारतक इतिहासक दृष्टिकोणसँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि कारण नीलक खेती अहिठाम होइत छल आर एकरा हेतु अंतर्राष्ट्रीय बाजार प्राप्त छल। नीलक अपन महत्व होइत छैक आर जखन ई बुझना गेलैक जे उत्तर बिहार एकरा हेतु उपर्युक्त स्थान अछि तखन इस्त इण्डिया कम्पनीक कार्यकर्त्ता लोकनिक ध्यान अहि दिसि जाएब स्वाभाविके। अंग्रेजक आगमनक पूर्वहिंसँ अहिठाम नीलक खेती बढ़िया जकाँ होइत छल। युरोपमे ई रंग ततेक जनप्रिय भगेल छलैक जे एकर माँग बढ़ि गेल छलैक। भारतवर्षमे सेहो एकर खेतीक प्रश्न किछु विवाद उठल हेतैक जकर कारण स्पष्ट नहि अछि मुदा १८३७ई.क लार्ड मैकौलक एकटा मेमोरेण्डम छैक जाहिसँ अहि वस्तुपर प्रकाश पड़इयै आर ई आभास भेटइयै जे तकर बादसँ बंगालमे नीलक खेती कम होमए लागल आर नीलक खेतीपर तिरहूत विशेष ध्यान दिये जाए लागल।
१७८२ग्रैण्ड तिरहूत क कलक्टर भऽ कऽ आएल छलाह आर १७८५मे ओ लिखैत छथि जे ओ अपने तिरहूतमे नीलक खेतीक सूत्रपात युरोपिय पद्धतिपर केलन्हि। ई ओ सबटा अपने खर्चपर केने छलाह। अंग्रेजक सर्वप्रथम फैक्ट्री ओना तिरहूतमे १६५०–१७००क बीच हाजीपूरक समीप सिंधिया अथवा लालगंजमे भेल छल आर तहियासँ अहि क्षेत्रमे अंग्रेजक प्रभाव बढ़ैत गेल आर ग्रैण्ड जखन कलक्टर भऽ कऽ एलाह तखन नीलक खेतीकेँ विशेष प्रोत्साहन भेटल। ग्रैण्ड एकरा एकटा उद्योगक हिसाबे विकसित केलन्हि। १७८८क ४फरबरीक एकटा रिपोर्टमे कहल गेल अछि जे तिरहूत कलक्टरीमे जे बारह–गोटए युरोपियन रहैत छथि ताहिमे १०गोटए नीलक खेती करैत छथि। ई बारहो गोटए कम्पनीक नौकर नहि छलाह। एहिमे सँ ६ गोटएक नाम छल–पीटर डी रेजेरियो, जेम्स जेंटिल, जी. डब्लु. एस. शुभान, जेम्स गेलन, जान मिलर आर फ्रांसिस रोज। जेम्स गेलन रेजेरियोक मनेजर छलाह। फ्रांसीस रोज जबर्दस्ती तिरहूतमे राजवल्लभक जागीरमे अपन नीलक खेती शुरू कऽ देने छलाह। १७९३मे नील फैक्ट्रीक संख्या ९भऽ गेल छल। नील फैक्ट्रीक स्थापना कानूनी व्यवस्था जटिल भऽ गेल आर ओहिपर सरकारकेँ ध्यान देमए पड़ैत छलैक। एकर कारण ई छल कि ई लोकनि तरह–तरहक अन्याय आर जोर जबर्दस्ती करैत जाइत छलाह। १७९३मे तिरहूतक जज नीवकेँ बाध्य भऽ कए डोनबल नामक एक फ्रेंच नागरिक तथा टोमस पार्ककेँ तिरहूत छोड़बाक आदेश देमए पड़ल छलन्हि। टोमस पार्क सरैया आर सिंहियामे बिना कोनो लाइसेंसकेँ कतहु बसब ताहिदिनमे गैरकानूनी छल। ढ़ोलीक जेम्स आर्नल्डकेँ सेहो जज महोदय ताकिद कऽ देने छलाह जो स्थानीय लोकनिक कुलाचारपर ध्यान राखैथि आर ओकरा विरूद्ध कोनो काज नहि करैथ। एहेन आदेश देबाक कारण ई छल जे जेम्स आर्नल्ड एकटा ब्राह्मणकेँ मारि बैसल छलाह। एवं प्रकारे रोज कोनो ने कोनो समस्या उठिते छल आर एकर विस्तृत इतिहास हमरा लोकनिकेँ मिन्डन विलसनक “हिस्ट्री आफ बिहार इंडिगो फैक्ट्रीज”मे भेटैत अछि। ९टा प्रारंभिक नीलक कोठी जे फुगल छल तकर विवरण एवं प्रकारे अछि:-
(i) दाउदपुर -
(ii) सराय - विलियम औखी हण्टर
(iii) ढ़ोली -
(iv) अधर - जेम्स जेंटिल
(v) शाहपुर - रिचार्डसन परविस
(vi) काँटी - अकेजेण्डर नामेल
(vii) मोतीपुर -
(viii) दयोरिया - फिंच
(ix) बनारा - ल्पुयिस किक तथा शुभान
१७९४मे मात्र ७६७ बीघा १४ कट्ठा जमीनपर नीलक खेती होइत छल मुदा थोड़वे दिनमे ओकर एतेक विकास भेलैक जे समस्त उत्तर बिहारक कोन- कोनमे नीलहा साहेब सब पसरि गेल आर बढ़ियासँ बढ़िया जमीनपर अपन अधिकार कऽ लेलक। १८०३मे २५टा नील कोठी छल जाहिमे प्रमुखक नाम अछि भवराहा (भौर), मुहम्मदपुर, बेलसर, पिपराघाट, दलसिंहसराय, जितवारपुर, तिवारा, कमतौल, चितवारा, पुपरी, शाहपुरूण्डी इत्यादि। १८१०मे कलक्टर अहिबातक अनुशंसा केलन्हि जे २५टा नील फैक्ट्रीकेँ खजानासँ कर्ज देल जाइक कारण ई लोकनि अपना क्षेत्र बेकार सबकेँ काज दैत छथि आर एवं प्रकारे बेकारीक समस्याकेँ दूर करैत छथि। १८१०मे लगभग १०,०००मन नील तिरहूतसँ कलकत्ता पठाओल जाइत छल। चम्पारणमे नेपाल युद्ध समाप्त भेलाक बाद कर्नल हीकी नामक एक व्यक्ति १८१३ई. मे नीलक खेती शुरू केलन्हि। हीकी बारामे अपन फैक्ट्री फोललन्हि। ओकर ठीक बाद राजपुर आर तुरकौलियामे मोरन आर नहल अपन अपन नीलक कारखाना खोललन्हि। १८४५मे सिरहामे कैप्टेन टाइलर अपन कारखाना खोललन्हि।
१८१६मे चम्पारणमे नीलक खेतीक उल्लेख नहि भेटइयै मुदा १८३०क रिपोर्टमे एकर वर्णन अछि। चीनीक स्थानपर लोग नील उपजाएब शुरू केलन्हि। नीलक खेती अहि हिसाबसँ बढ़ए लागल कि तिरहूतक कलक्टर घबरा गेला १८२८मे लिखलन्हि जे आब अहिपर रोक लगाना चाही। १८५०मे तिरहूतमे (दरभंगा मुजफ्फरपुर)मे ८६टा नीलक कारखाना भगेल छल। सब गोटए चीनीक कारबार छोड़ि नीलपर उतरि गेल छलाह। नील उद्योगपर युरोपियन लोकनिक एकाधिपत्य छलन्हि। सिपाही विद्रोहक समयमे जे तिरहूतमे वेसी विस्फोट नहि भेल तकर कारण इएह छल जे अहि क्षेत्रमे नीलहा साहेबक बोलबाला आर दबदबा छल आर मजूर सब हिनका सबसँ रोजी रोटी पबैत छल आर तैं दबाबमे रहैत छल। सिपाही विद्रोहक समयमे अहि क्षेत्रमे शांति स्थापनाक भार सरकार हिनके लोकनिपर छोड़ि देने छलन्हि आर ई लोकनि ओकर नीक जकाँ निर्वाह केलन्हि। दलसिंहसराय, तिवारा आर जितवापुरक कारखाना पुरान छल आर ओहि सबहक बड्ड धाक छलैक। १८७४मे तिरहूतक सबसँ पैघ नीलक कारखाना पण्डौलमे छलैक जकर क्षेत्रफल ३०० वर्गमील छलैक।
१८६७–६८मे नीलक खेतीक विरोधमे एकटा जबर्दस्त प्रदर्शन चम्पारणमे भेलैक। रैयतक शोषण चरमोत्कर्षपर छलैक आर ओकर कोनो निदान सेहो नहि बहराइत छलैक। मजदूरकेँ पूरा पारिश्रमिक नहि देल जाइत छलैक। मजदूर लोकनि नीलक खेती करबासँ इंकार करए लागल आर जिउकतिया नामक गाममे अहि विरोधक पहिल उदाहरण भेटैत अछि। आनगामक लोग सब सेहो एकर देखा–देखी शुरू केलक। अहि वस्तुकेँ जल्दी सोझरेवाक हेतु मोतिहारीमे तत्काल कचहरीक स्थापना भेल। रैयतक प्रति थोड़ेक सुविधा सेहो देखाओल गेल। अंग्रेजकेँ शक्क भेलैक जे अहि आन्दोलनकेँ केओ उसका रहल अछि। आर हुनका लोकनि दृष्टि बेतिया राजपर गेल। १८७६मे बेतिया राजमे अंग्रेज मनेजर बहाल भेल आर तकर बाद फेर अंग्रेज लोकनि नीलक खेती दिस ध्यान देलन्हि। १९म शताब्दीक अन्त धरि चम्पारणमे कुल २१ फैक्ट्री आर ४८टा ओकर शाखा छल। चम्पारण, मुजफ्फरपुर, दरभंगाक नीलहा साहेब मिलि कऽ १८०१मे अपना सबहिक हेतु एकटा नियम बनौलन्हि आर १८७७ ओ लोकनि बिहार इण्डिगो प्लांटरस एशोसियेशन नामक संस्था सेहो स्थापित केलन्हि। एकर मुख्यालय मुजफ्फरपुरमे छल आर एकरा सरकारसँ मान्यता छलैक।
मूंगेर, भागलपुर, पूर्णियाँक बिभिन्न भागमे नीलक खेती पसरि गेल आर बेगूसराय, सहरसा, पूर्णियाँ आर कटिहार जिलाक बिभिन्न नीलहा कोठीक ताँता लागि गेल छल। १८९६मे मंझौल, बेगूसराय, भगवानपूर, बेगमसराय, दौलतपुर आदि स्थानमे नीलक कारखाना खुजल छल। ओनासँ १८७७सँ अहि जिलामे नीलक प्रसार भऽ चुकल छल। बेगूसरायक कोठी १८६३मे बनल छल। सहरसामे चपराम, सिंहेश्वर, पथरघट, राघोपुर आदि क्षेत्रमे प्रमुख नीलक कोठी सब छल आर तहिना पुर्णियाँ आर कटिहारमे सेहो। एक्के नीलहा साहेबक कैकटा कोठी होइत छल। प्रतापगंज दिसि सेहो एकटा प्रसिद्ध कोठी छल।
तिरहूत प्लांटरस लोकनि एकटा सैनिक टुकड़ी सेहो बनौने छलाह जकर नाम छल। ‘दऽ बिहार लाइट हार्स’। १८५७–५८क सिपाही विद्रोहक समयमे जखन हिनका लोकनिकेँ तिरहूतमे शांति सुरक्षा रखबाक भार देल गेल छलन्हि तखन ई लोकनि सरकारक समक्ष अहि आशयक एकटा आवेदन हेतु एक प्रकार सैनिक संगठन करबाक अधिकार भेटैन्ह। १८६१–६२ई. अधिकार हिनका लोकनिकेँ भेटलन्हि आर ई लोकनि ‘सूबा बिहार माउंटेड राइफिल्स’ नामक एकटा संस्था बनौलन्हि। १८८६मे ओकर नाम बदलिकेँ ‘बिहार लाइट हार्स’कऽ देल गेल। १९१४–१८क प्रथम विश्वयुद्धमे एहिसँ सरकारकेँ बहुत सहायता भेटल छलैक। १९२०मे एक कानून द्वारा एकरा ‘आक्जिलियरी फोर्स’मे परिवर्त्तित कऽ देल गेलैक।
१९म शताब्दीक अन्तिम चरणमे नीलक खेतीकेँ बड़का धक्का लगलैक। १८९६मे जर्मनीमे एकटा सिंथेटिक सस्त नीलक आविष्कार भेलैक आर संसार भरिमे प्रसिद्ध भऽ गेलैक आर एकर परिणाम ई भेलैक जे अहिठामक नीलक खेती समाप्त होमए लगलैक। नीलक दाम २५०सँ घटिकेँ १५०/- मन भगेलैक। जाहिमे नील उपजैत छलैक ताहिमे लोग तम्बाकु आर कुसियारक खेती शुरू केलक। प्लैंटरस एशोसियेसन सेहो अहि प्रकारक निर्णय लेलक। १९१४मे विश्वयुद्धक कारण जब जर्मनीसँ नील एनाए बन्द भऽ गेलैक तखन फेर साहेब लोकनिक ध्यान अहि दिसि गेलन्हि आर पुनः नीलक खेत शुरू भेल मुदा से बहुत दिन धरि चलल नहि। नीलक खेती समाप्त भेल।
III
स्वातंत्र्य संग्राम आर मिथिला:- प्राचीन मिथिलाक सीमा अंग्रेज अमलमे आबिकेँ नहि रहि गेल। अंग्रेजक आगमन कालहिसँ प्रत्यक्ष एवँ अप्रत्यक्ष रूपेँ ओकर विरोध सबठाँ शुरू भऽ गेल छल कारण हुनका लोकनिक स्वार्थ अपन साम्राज्य विस्तारमे छलन्हि, जनताक कल्याणमे नहि। तथापि शक्तिशाली होयबाक कारणे आर अहिठाम आंतरिक फूट रहबाक कारणे हुनका लोकनिजे सफलता भेटलन्हि तकरा परिणाम स्वरूप ओ लोकनि २००वर्ष धरि अहिठाम शासन केलन्हि आर १९४७मे अहि देशक पिण्ड छोड़िकेँ ओ लोकनि गेला।
मिथिलामे सिपाही विद्रोहक बाद जे विरोधक पहिल आवाज उठल छल से उएह जे चम्पारणमे किसान लोकनि नीलहा कोठीक साहबक विरूद्ध उठौने छलाह आर तिरहूतक हिसाबे ओ एकटा महत्वपूर्ण घटना भेल। ओहि विद्रोहक सूत्रकेँ महात्मा गाँधी १९१७मे चम्पारणमे पकड़लन्हि आर सत्यक संग अपन योग शुरू केलन्हि। अहि दृष्टिकोणसँ ई निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे वास्तविक अर्थमे स्वाधीनता संग्रामक श्रीगणेश गाँधीक युगमे मिथिलहिक आँगनसँ भेल। जँ कहियो महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लाउथर कास्टल कीनिकेँ काँग्रेसक सेसनक हेतु देने छलाह तँ काँग्रेस ओकर प्रतिदान चम्पारणमे गाँधीजीकेँ नियुक्त क देलक आर चम्पारणमे स्वातंत्र्य संग्रामक जे आगि पजरलसँ तातक जड़ैत रहल जातक कि भारत स्वतंत्र नहि भेल। वैशाली विदेहक गणराज्य परम्पराक अनुरूप अशोक द्वारा चिन्हित एवं शेरशाहक सुशाशनसँ पद्मांकित चम्पारणक पवित्र क्षेत्र गाँधीजीक कर्मभूमि बनि महावीरक अहिंसाकेँ साकाररूप प्रदान केलक। १९१७–१९४७धरि गण्डकसँ कोशी आर हिमालयसँ गंगाधरिक क्षेत्रमे एकसँ एक सपूत जन्म लेलन्हि जे स्वतंत्रताक हेतु अपन प्राणक आहूति देने छलाह। कलकत्तासँ आबि प्रफुल्ल चाकी आर खुदीराम बोस सेहो अपनाकेँ अहि भूमिमे अमर केलन्हि। राष्ट्रीय संग्रामक इतिहास लिखब हमर अभीष्ट एतए नहि अछि मात्र एतबे कहबाक अछि जे स्वातंत्र्य संग्राममे मिथिला कोनो प्रांतसँ ककरोसँ पाछु नहि छल। १९१७मे जँ गाँधीजी बाट देखौलन्हि तँ १९४२मे मिथिला सेहो अपन सर्वनिछावर कऽ देलक हुनके आह्वानपर आर उत्तर बिहार १९४२मे सब तरहें क्रांतिकारी लोकनिक गढ़ बनल छल। सब बिचारक भूमिकाक निर्वाह केलन्हि आर हुनके लोकनिक सत्प्रयासे १९४७मे भारतक स्वतंत्रता प्राप्त भेल–ओहिमे मिथिलाक योगदान ओतवे छल जतवा आन कोनो प्रांतक। क्रांतिकारी दलक इतिहासमे सेहो मिथिलाक नाम प्रख्यात छैक।

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अध्याय–१४
मिथिलाक अन्यान्य राजवंशक विवरण

(i.) गंधवरिया राजवंशक इतिहास:- स्वर्गीय पुलकित लाल दास मधुर अथक परिश्रम कए गन्धवरियाक इतिहास लिखि स्वनाम धन्य श्री भोला लाल दासक ओतए प्रकाशनार्थ पठौने छलाह। कोनो कारणवश ई पाण्डुलिपि जे कि आब जीर्णावस्थामे अछि। प्रकाशित नहि भऽ सकल आर गन्धवरियाक इतिहासक प्रसंग एकदिन जखन हमरा भोला बाबूसँ गप्प भेल तखन ओ एहि पाण्डुलिपि चर्च केलहि आर हमरा आग्रहपर ओ पाण्डुलिपि हमरा पठा देलन्हि। पाण्डुलिपि देखलापर ई बुझबामे आएल जे मधुरजी गन्धवरियाक इतिहास किवदंतीक आधारपर लिखने छथि मुदा ताहु हेतु हुनक परिश्रम स्तुत्य एवं सराहनीय अछि। जखन गन्धवरिया कतहु किछु प्रामाणिक इतिहासक सामग्री नहि एकत्रित भऽ सकल अछि ताहि दृष्टिकोणे मधुरजीक ई सत्प्रयास सर्वथा प्रशंसनीय अछि। सोनबरसा राजकेसमे गन्धवरियाक इतिहास देल गेल अछि मुदा ओहुमे जे गन्धवरिया लोकनि सोनबरसाक विरोधमे गवाही देलन्हि ताहिमे हक एकटा प्रमुख व्यक्ति स्वर्गीय श्री चंचल प्रसाद सिंह मुइलासँ पूर्व हमरा व्यक्तिगत रूपें ई कहने गेला जे हुनक अपन जे वयान ओहि केसमे भेल छन्हि से एकदम उल्टा छन्हि तैं गन्धवरियाक इतिहासक हेतु ओकरा उपयोग करबामे ओकरा ‘रिभर्स’ ककए पढ़ब उचित। ओहु केसमे जे इतिहास बनाओल गेल अछि से बहुत किछु परंपरेपर आधारित अछि मुदा ओहिमे एक बहुत महत्वपूर्ण बात ई भेटल जे गन्धवरियाक द्वारा देल दानपत्र सब बहुत किछु उपस्थित कैल गेल छल जाहिमे किछु चुनल दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादक अंश हम अपन ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिमरूल इन तिरहूत’मे प्रकाशित कैल अछि। सहरसा जिलामे गन्धवरियाक एतेक प्रभुत्व छल तइयो ओकर कोनो उल्लेख पुरनका ‘भागलपुर गजेटियर’मे नहि छल आर जखन सहरसा जिला बनल आर ओकर नव गजेटियर बनल तखन ओहिमे इतिहास लिखबाक भार हमरा भेटल आर ओहिक्रममे हम एक पाराग्राफमे गन्धवरियाक चर्च कैल। एकर अतिरिक्त आर कोनो प्रामाणिक इतिहास गन्धवरियाक नहि बनल अछि आर नेऽ अधावधि एहि दिशामे कोनो प्रयासे भऽ रहल अछि। एहना स्थितिमे मधुरजीक लिखल गन्धवरियाक इतिहासक मूलकेँ हम अहिठाम प्रस्तुत कऽ रहल छी जाहिसँ ओहि मृतात्माकेँ अपन कृतिक स्वीकृति देखि आनन्द होन्हि। अनापेक्षित बातकेँ हटा देल गेल अछि। गन्धवरिया लोकनिक गन्धवारडीह एखनो शकरी आर दरभंगा टीसनक बीचमे अछि आर हुनका लोकनिक ओतए जीवछक पूजा होइत छन्हि। गन्धवरिया लोकनि पँचमहलामे पसरल छथि– वरूआरी, सुखपुर, परशरमा, बरैल आर यदिया मानगंजकेँ मिलाकेँ पँचमहला कहल जाइत छल। जाहिठाम मधुरजीक अंश समाप्त होएत ओतए हम संकेत दऽ देब।
दरभंगा ओ विशेषतः उत्तर भागलपुर (सम्प्रति सहरसा जिला)मे गन्धवरिया वंशज राजपूतक संख्या अत्यधिक अछि। दरभंगा जिलांतर्गत भीठ भगवानपुरक राजा साहेब तथा सहरसा जिलांतर्गत दुर्गापुर भद्दीक राहा साहेब एव वरूआरी, पछगछिया, सुखपुर, बरैल, परसरमा, रजनी, मोहनपुर, सोहा साहपुर, देहद, नोनैती, सहसौल, मंगुआर, धवौली, पामा, पस्तपार, कपसिया, विष्णुपुर एवं पारा इत्यादि ग्राम स्थित बहुसंख्यक छौट पैघ जमीन्दार लोकनि एहि वंशक थिकाह आर सोनबरसाक स्वर्गीय महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह सेहो एहि वंशक छलाह। ई राजवंश बहुत प्राचीन थिक ओ एहि राजवंशक सम्बन्ध मालवाक सुप्रसिद्ध धारानगरीक परमारवंशीय राजा भोज देवक वंशसँ अछि। एहिवंशक नाम “गन्धवरिया” एतै आविकेँ पड़ल। राजा भोज देवक ३५म पीढ़ीक पश्चात् ३६म पीढ़ीक राजा प्रतिराज साह अपन धर्मपत्नी तथा दू ई पत्रक संग ब्रह्मपुत्र स्नानक निमित्त आसाम गेल छलाह। एहि यात्रा जखन ओ लोकनि फिरलाह तँ पुर्णियाँ जिलांतर्गत सुप्रसिद्ध सौरिया ड्योढ़ीक समीप मार्गमे कतहु कोनो संक्रामक रोगसँ राजा–रानीक देहांत भऽ गेलन्हि। सौरिया राजक प्रतिनिधि एखनो दुर्गागंजमे छथि। माता–पिताक देहांत भेलापर दुनू अनाथ बालक भूलल–भटकल सौरिया राजाक ओतए उपस्थित भेलाह आर अपन पूर्ण परिचय देलन्हि। सौरिया राज्य ताहि समयमे बड्ड पैघ आर प्रतिष्ठित छल। ओ दुनू भाइकेँ यथोचित आदर पुरस्कार अपना ओतए आश्रय प्रदान केलन्हि तथा कालांतर उपनयन संस्कारो करा देलन्हि। उपनयनक समय उक्त दुनू भाइक गोत्र अवगत नहि रहबाक कारणे हुनका लोकनिकेँ परासर गोत्र देल गेल जबकि परमारक गोत्र कौण्डिल्य छल। दुहू राजकुमारक नाम लखेशराय आर परवेशराय छलन्हि। ओ लोकनि वीर आर योद्धा छलाह। सौरिया राजक जमीन्दारी दरभंगा राज्यमे सेहो पबै छलन्हि। कोनो कारणे ओहिठाम युद्ध उपस्थित भेलन्हि। राजा साहेब अहि दुनू भाइकेँ सेनानायक बनाए अपन सेना पठौलन्हि। कहल जाइछ जे दुनू भाइ एक राति कतहु निवास कैलन्हि कि निशीय राति भेलापर शिविरक आगाँ किछु दूरपर एक वृद्धा स्त्रीक कानव ओ दुनू गोटए सुनलन्हि। जिज्ञासा केला संता ओ स्त्री बाजलि “जे हम अहाँ घरक गोसाओन भगवती थिकहुँ। हमरा अहाँ लोकनि कतहु स्थान दिअह”। एहिपर ओ दुनू भाइ बजलाह जे हम सब तँ स्वयं पराश्रित छी तैं हमरा वरदान दिअह जे हमरा लोकनि एहि युद्धमे विजय पाबी। ओ स्त्री हुनका लोकनिकेँ एक बहुत उत्तम खड़ग प्रदान कैल जकर दुनू पृष्ट भागपर बहुत सूक्ष्म अक्षरमे समस्त दुर्गा सप्तशती अंकित छल। ई खड़्ग प्रथम दुर्गापुर भद्दीमे छल पश्चात् महाराज हरिवल्लभ नारायण सिंह ओकरा सोनबरसा आनलन्हि। ओहिमे कहियो बीझ नहि लागल छल। ओ खड़्ग एक पनबट्टामे चौचेतल बन्द रहैत छल आर झाड़ि देला संता ओ खड़्गक आकारक भऽ जाइत छल। दुनू भाई युद्धमे विजयी भेला। समस्त रणक्षेत्र मुर्दासँ पाटि गेल आर दुर्गन्ध दूर–दूर धरि व्याप्त भऽ गेल। एहिसँ सौरियाक राजा प्रसन्न भए एहिवंशक नाम ‘गन्धवरिया’ रखलन्हि। ई युद्ध दरभंगा जिलांतर्गत गंधवारि नामक गाममे भेल छल। गंधवारि आर अन्यान्य क्षेत्रक हिनका लोकनिकेँ उपहारस्वरूप भेटलन्हि। लखेशरायक शाखामे दरभंगा जिलांतर्गत (सम्प्रति मधुबनी) भीढ़ भगवानपुरक श्रीमान राजा निर्भय नारायणजी भेल छथि आर परवेशक शाखामे सहरसाक गन्धवरिया जमीन्दार लोकनि छथि। सहरसाक विशेष भूभाग एहि शाखाक अधीन छल। दुर्गापुर भद्दी एकर प्रधान केन्द्र छल।
परिवेशरायकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– लक्ष्मण सिंह, भरत सिंह, गणेश सिंह, वल्लभ सिंह। गणेश सिंह आर वल्लभ सिंह निस्तान भेलाह। भरत सिंहक शाखामे धवौलीक जमीन्दार भेल छथि। लक्ष्मण सिंहकेँ तीन पुत्र भेलन्हि– रामकृष्ण, निशंक आर माधव सिंह। एहिमे माधव सिंह मुसलमान भए गेलाह नौहट्टाक शासक भेलाह। ‘निशंक’क नामपर निशंकपुर कुढ़ा परगन्नाक नामकरण भेल। प्रथम एहि परगन्नाक नाम मात्र ‘कुढ़ा’ छल बादमे ओहिमे निशंकुपर जोड़ल गेल। निशंककेँ चारि पुत्र भेलन्हि– दान शाह, दरियाव शाह, गोपाल शाह आर क्षत्रपति शाह। दरियाव शाहक शाखामे वरूआरी, सुखपुर, बरैल तथा परसरमाक गन्धवरिया लोकनि छथि।
लक्ष्मण सिंहक ज्येष्ठ पुत्र रामकृष्णकेँ चारि पुत्र भेलन्हि– वसंत सिंह, वसुमन सिंह, धर्मागत सिंह, रंजित सिंह। वसुमन सिंहक शाखामे पछगछियाक राज्य भेल। धर्मागत सिंहक शाखामे जदिया मानगंजक जमीन्दार लोकनि भेल छथि। रंजित सिंहक शाखामे सोनबरसा राज्य भेल। एहि वंशक हरिवल्लभ नारायण सिंहकेँ १९०८मे सोनबरसासँ १०–१२मील उत्तर कांप नामक सर्किलमे साढ़े नौ बजे रातिमे शौचक समय मारि देल कैन्ह। हिनक एक कन्याक विवाह जयपुरक स्टेटक संम्बन्धीक संग भेल छलन्हि। आर हिनका एकोटा पुत्र नहि छलन्हि। ओहि कन्याक पुत्र रूद्रप्रताप सिंह सोनबरसाक राजा भेलाह। एहि शाखामे सोहा, साहपुर, सहमौरा, देहद, वेहट, वराटपुर, तथा मंगुआरक गंधवरिया जमीन्दारी भेल छथि। एहिमे साहपुरक राजदरबार सेहो प्रसिद्ध छल–हुनका दरबारमे बिहपुर मिलकीक श्यामसुंदर कवि आर शाह आलमनगरक गोपीनाथ कवि उपस्थित छलाह। स्वर्गीय चंचल प्रसाद सिंह सेहो सोनबरसाक दमाद छलाह।
वंसत सिंहकेँ जहाँगीरसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। राजा वसंत सिंह गंधवारिसँ अपन राजधानी हटाकेँ सहरसा जिलामे वसंतपुर नामक गाम बसौलन्हि आर ओतहि अपन राजधानी बनौलन्हि। मधेपुरासँ १८–२०मील पूब इ गाम अछि। वंसत सिंहकेँ चारि पुत्र छलन्हि– रामशाह, वैरिशाह, कल्याण शाह, गंगाराम शाह। प्रथम पुत्रक शाखा नहि चलल। वैरिशाह राजा भेल। कल्याण शाहक शाखामे रजनीक जमीन्दार लोकनि आर गंगारामक शाखामे वाराक जमीन्दार लोकनि भेलाह। ई अपना नामपर गंगापुर वासुका बसौलन्हि। वैरिशाहकेँ दु रानी छलन्हि– जाहिमे जेठरानीसँ राजा केसरी सिंह आर जोरावर सिंह भेलथिन्ह आर छोट रानीसँ पद्मसिंह। जोरावर सिंहक शाखामे मोहनपुर आर पस्तपारक जमीन्दार लोकनि भेलाह। पद्मसिंहक शाखामे कोड़लाहीक जमीन्दार लोकनि भेल छन्हि। राजा केसरी सिंह प्रतिभाशाली व्यक्ति छलाह। हुनका औरंगजेबसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। केसरी सिंहक पुत्र धीरा सिंह, धीरा सिंहक कीर्ति सिंह, कीर्ति सिंहक राजा जगदत्त सिंह भेलाह जे बड्ड प्रतापी, दयालु आर दानबीर छलाह। गंगापुर, दुर्गापुर आर बेलारी तालुका हिनका अधिकारमे छलन्हि। ई जनश्रुति विशेष प्रख्यात अछि जे ताहि समयमे दरभंगा राजक कोनो महारानी कौशिकी स्नानक निमित्त अवै छलीह। सिंहेश्वरक समीप बेलारीमे हुनक डेरा पड़ल। ई सुनिकेँ जे ई दोसरा गोटाक राज्य थिकाह ओ बजलीह जे हम आन राज्यमे अन्न जल ग्रहण नहि कऽ सकैत छी। जगदत्त सिंह तत्काल बेलारी तालुकामे दानपत्र लिखिकेँ महारानीसँ स्नान भोजनक आग्रह केलन्हि। उक्त बेलारी तालुका हेवनिधार बड़ागोरियाक खड़ौड़य बबुआन लोकनिक अधीन छल आर तत्पश्चात् राज दरभंगाक भेल। जगदत्त सिंहकेँ चारि पुत्र भेलैन्ह– हरिहर सिंह, नल सिंह, त्रिभुवन सिंह, रत्न सिंह। त्रिभुवन सिंह ‘पामा’मे अपन ड्यौढ़ी बनौलन्हि। मधुरजी विवरण संक्षेपमे एतबे अछि।
मधुरजीक विवरणसँ आर आन विवरणसँ किछु तफात देखबामे अवइयै। पंचगछियाक राजवंश अपनाकेँ नान्यदेवक वंशज हरिसिंह देवक पुत्र पतिराज सिंहसँ उत्पत्ति मनैत छथि। पतिराज सिंह ‘गन्धवारपुर’मे अपन वास स्थापित केलन्हि आर तै गन्धवरिया कहौलथि। परञ्च इहो लोकनि अपनाकेँ पतिराज सिंहक पुत्र परवेश रायक वंशज कहैत छथि। रामकृष्ण सिंहक वंशज भेला पछगछिया स्टेट। हिनका लोकनिक वंश वृक्षक अनुसार–
लक्ष्मण सिंहसँ राज्यक बटबारा एवं प्रकारे भेल–
माधव सिंह रामकृष्ण निशंक सिंह
(मुहम्मद खान) (दुर्गापुर, सोनबरसा (पंचमहला)
(नवहट्टा) पछगछिया इत्यादि)
सोनबरसा, पछगछिया तथा बरूआरी प्रसिद्ध स्टेट मानल जाइत छल। पंचमहलामे बरूआरी मुख्य स्टेट छल। निशंक सिंहक पुत्र दरिया सिंहक वंशज भेला बरूआरी स्टेट। अहिवंशमे राजा कोकिल सिंह प्रख्यात भेल छथि जनिका सम्राट शाह आलमसँ ११६५ हिजरीमे शाही फरमान भेटल छलन्हि। राजाक उपाधि हिनका सम्राटसँ भेटल छलन्हि। राजाक उपाधि हिनका सम्राटसँ भेटल छलन्हि। बरूआरी तिरहूत सरकारक अधीन छल आर कोकिल सिंहकेँ अहिक्षेत्रक ननकार हैसियत भेटल छलन्हि। गन्धवरिया लोकनिक कुलदेवी “जीवछ”क प्रतिमा वरूआरी राजदरबारमे छल आर ओकर पूजा नियमित रूपेँ होइत छल। ‘जीवछ’क प्रतिमाकेँ नोहट्टासँ अहिठाम आनल गेल छल।
निशंक सिंह
दानी सिंह दरिया सिंह क्षत्रपति सिंह गोपाल सिंह
(परसरमा) (वरूआरी) (गोबरगढ़ा) (कुमुरखन)
वरूआरी सुन्दर सिंह कृष्ण नारायण सिंह
(सुखपुर) (बरैल)
एतवा सब किछु होइतहुँ गन्धवरियाक कोनो प्रामाणिक इतिहास नहि बनि पाओल अछि। जे किछु दानपत्रक अंग्रेजी अनुवादमे केसमे भेटल अछि से वेसी भीठ–भगवानपुरक राजा सबहिक। भीठ भगवान गन्धवरियाक पैघ हिस्साक राजधानी छल आर हुनका लोकनिक स्तित्व निश्चित रूपें दृढ़ छलन्हि आर ओ दान पत्र दैत छलाह जकर प्रमाण अछि। दरभंगाक गन्धवरिया लोकनि सेहो अपन इतिहासक रूपरेखा नहि प्रकाशित केने छथि तैं ओहि सम्बन्धमे किछु कहब असंभव। हमरा बुझने ओइनवार वंशक पतनक बाद ‘भौर’ क्षेत्रमे राजपूत लोकनि अपन प्रभुत्व जमा लेने छलाह आर स्वतंत्र राज्य स्थापित केने छलाह। खण्डवलासँ हुनका संघर्षो भेल छलन्हि आर ओहि संघर्षक क्रममे ओ लोकनि भीठ–भगवानपुर होइत सहरसा–पुर्णियाँक सीमा धरि पसरि गेला। “गन्ध” आर “भर” (राजपूत)क शब्दक मिलनसँ गन्धवारि बनल (‘गन्धभर’) आर ओहि गाँवकेँ ओ लोकनि अपन राजधानी बनौलन्हि। कालांतरमे भीठ–भगवानपुर हिनका लोकनि प्रधान केन्द्र बनल। इतिहासक परंपराक पालन करैत इहो लोकनि अपन सम्बन्ध प्राचीन परमार वंशक संग जोड़लन्हि आर ‘नीलदेव’ नामक एक व्यक्तिक अनुसंधान केलन्हि। ओहिमे सँ केओ अपनाकेँ विक्रमादित्यक वंशज कहलैन्हि आर केओ नान्यदेव। भीठ भगवानपुरक वंश तालिका तँ हमरा लग नहि अछि मुदा सहरसाक गंधवरिया लोकनिक वंश तालिका देखलासँ ई स्पष्ट होइछ जे परमार भोज आर नान्यदेवसँ अपनाकेँ जोड़निहार गन्धवरिया लोकनि लखेश आर परवेशक अपन पूर्वज मनैत छथि। पूर्वजक हिसाबे सब श्रोत एकमत अछि। परंपरामे इहो सुरक्षित अछि जे नीलदेव गंधवारिमे आविकेँ बसल छलाह आर ‘जीवछ’ नदीकेँ अपन कुलदेवता बनौने छलाह। कहल जाइत अछि जे नीलदेव राजा गंधकेँ मारिकेँ अपन राज्य बनौलन्हि। सहरसा जिलामे भगवतीक आशीष स्वरूप राज्य भेटबाक जे गप्प अछि ताहुमे कैक प्रकारक कथा आर किवदंती भेटइयै। मात्र एक बातपर सब श्रोत एकमत अछि जे हिनका लोकनिकेँ उपनयनक अवसरपर अपन गोत्र याद नहि रहला संता ‘परासर गोत्र’ देल गेलन्हि। जा धरि कोनो आन वैज्ञानिक साधन उपलब्ध नहि होइछ ताधरि गन्धवरियाक इतिहास अहिना किवदंती आर परम्परापर आधारित रहत।
ii. बनैली राज्यक इतिहास:- प्राचीनताक दृष्टिकोणसँ बनैली इतिहास सेहो अपन महत्व रखैत अछि। १४म शताब्दीमे गदाधर झा नामक एक विद्वान दरभंगा जिलाक वैगनी नवादा नामक गाममे रहैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हिनक विद्वतासँ प्रभावित भए गयासुद्दीन तुगलक हिनका काफी सम्पत्ति दानमे देने छलथिन्ह। हुनकासँ नवम पीढ़ीमे भेला देवनंदन झा जनिका परमानंद झा आर मानिक झा नामक दूटा पुत्र छलथिन्ह। परमानंद झा संस्कृत, फारसी आर अरबीक प्रसिद्ध विद्वान छलाह। शिकारक सेहो हुनका बड्ड शौख छलन्हि। बाघ मारबामे तँ वो सहजहि निपुणते प्राप्त केने छलाह। अपन पूर्वजसँ हिनका पर्याप्त धन सम्पत्ति भेटले छलन्हि आर तैं हिनक निपुणताकेँ देखि अठारहम् शताब्दीमे हिनका फकराबाद परगन्नाक चौधरी बना देल गेलन्हि। दिनानुदिन हिनक ख्याति बढ़ैत गेलन्हि परञ्च ई अपन काज सम्पादन करबामे असावधान होइत गेलाह। फलस्वरूप ई अजीमाबादक कोपभाजन बनला आर दरभंगासँ भागि कमला नदी बाटे फरकिया दिसि प्रस्थान केलन्हि। अजीमाबादक सरकारसँ डर बनले रहैन्ह तैं फरकियाकेँ छोड़ि ओ धरमपुर दिसि बढ़ला आर पुर्णियाँक क्षेत्रमे अमौर दिसि चल गेलाह। ताहि दिनमे नवाव आर अंग्रेजमे खटपट चलि रहल छल। एम्हर हिनका लाल सिंह चौधरी आर दुलार सिंह चौधरी दूटा पुत्र उत्पन्न भेलन्हि। हुनक भाए माणिक चौधरी देहांत भगेलन्हि। माणिक चौधरीक एक पुत्र छलथिन्ह हरीलाल चौधरी। ओहि समयमे आमौरमे भैरव मल्लिक नामक एकटा सम्पन्न कायस्थ सेहो रहैत छलाह जे बड्ड जनप्रिय, निपुण आर उत्साही लोक छलाह आर जिनकर प्रतिष्ठा ओहि क्षेत्रमे अपूर्व छल। ओ पूर्णियाँ आर दिनाजपुर क्षेत्रक कानूनगोय छलाह। इएह अपना ओहिठाम परमानन्द चौधरीकेँ रहबाक प्रश्रय देलन्हि। कृषिकार्य कए अपन पालन पोषण करबाक हेतु परती जमीन सेहो ओ परमानंद चौधरीकेँ देलन्हि।
तकर बादहिसँ परमानंद चौधरीक भाग्य पलटल। पटसाराक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायण राय एक दिन अपन पालकीपर बैसल कतहु जाइत छलाह कि बाटहिमे परमानन्द चौधरी एकटा राहु माछ मारिकेँ हुनका समक्ष उपस्थित केलन्हि। राजा प्रसन्न भए हुनका अपना ओतए तहसीलदार मनेजरमे बहाल कऽ लेलथिन्ह। परमानन्द शक्तिशाली लोक भगेलाह आर ओहि क्षेत्रमे हुनक प्रभाव बढ़ए लागल। एक दिन पुर्णियाँक नवाव शिकारक हेतु एम्हर एला मुदा हुनका एक्कोटा शिकार नहि भेटलन्हि तखन परमानंद चौधरी हुनका देखितहि देखितहि एकटा बाघ मारिकेँ देलथिन्ह। नवाब पसिन्न भए हुनका “हजारी”क उपाधि देलथिन्ह आर वो आब हजारी चौधरीक नामे प्रसिद्ध भऽ गेलाह। हिनक पुत्र दुलार सिंह कृषि आर व्यापारक माध्यमसँ अपन आर्थिक स्थितकेँ सुदृढ़ केलन्हि। घी, इलायची, आर लकड़ीक व्यापार ओ नेपालसँ शुरू केलन्हि आर नवाबसँ मिलिकेँ ओहि सब वस्तुकेँ कलकत्ता धरि पठबे लगलाह। फेर हाथीक व्यापार शुरू केलन्हि जाहिमे बड्ड लाभ भेलन्हि। अहि क्षेत्रमे धनीमानी व्यक्तिमे हुनक गिनती होमए लागल। भैरव मल्लिकक धन बिलहि गेल आर ओ शोकाकुल भए मरि गेल। हुनका स्थानपर दुलार सिंह कानुनगोय नियुक्त भेला। एम्हर ताधरि परमानंद चौधरी असजा आर मोरंग तटक तीरा परगन्नाक अधिकारी सेहो भऽ चुकल छलाह। ओम्हर ताधरि राजा इन्द्रनारायण सिंहक महल कुरसाकाँटाक बन्दोबस्त दमामी बन्दोबस्तक समय ई लऽ लेने छलाह। राजा इन्द्रनारायण हुनक एहि विश्वासघाती कार्यसँ असंतुष्ट भगेल छलथिन्ह। हजारी चौधरीक परोक्ष भेलापर हुनका लोकनिमे आपसी मनमुटाव शुरू भेल। दुलार सिंह हरलालकेँ अमौरक इलाका अपन घरेलु कलहकेँ शांत केलन्हि। हरलालक उत्तराधिकारी अयोग्य बहरेला। दुलारसिंह बनैलीमे अपन निवास स्थान बनौलन्हि। ओतहिसँ हिनक प्रभावमे वृद्धि शुरू भेल। दुलार सिंहक दू पुत्र छलथिन्ह सर्वानन्द आर वेदानन्द– सर्वानन्द निसंतान मरि गेलाह। वेदानंदक कार्यकलापसँ वंशक कीर्ति बढ़ल। दुलार सिंहकेँ दोसर विवाहसँ कतेको संतान भेलैन्ह जाहिमे प्रख्यात भेलाह रूद्रानंद सिंह जे अपन पुत्र श्रीनंदनक नामपर श्रीनगर राज्यक स्थापना केलन्हि। कानूनगोय रहलाक कारणे सरकारक ओतए दुलार सिंहक वेश प्रभाव छल आर अपन प्रभावहिसँ ओ नवहट्टा, धपहर, गोगरी आदि क्षेत्र धरि अपन अधिकारक विस्तार केलन्हि। ओम्हर पुर्णियाँ आर मालदह धरि अपन जमीन्दारी बढ़ौलन्हि। नेपाल युद्धमे सेहो ई कम्पनी सरकारकेँ सहायता देने छलाह। नेपाल विजयक पश्चात् हिनका कम्पनी सरकारसँ राजाबहादुरक उपाधि भेटलन्हि। नेपाल आर अंग्रेजक बीच सीमा निर्णयक समयमे कम्पनी सरकार तीरा परगन्नाक समीप हिनका सातकोस भूमि बन्दोबस्तमे दऽ देलकन्हि।
दुलार सिंहक बाद हुनक पुत्र वेदानंद सिंह राजा भेला आर हुनको कम्पनीसँ राजाक उपाधि भेटल छलन्हि। हुनका समयमे राज्य दू भागमे बटि गेल। वेदानंद अपन पैत्रिक बनैलीमे रहलाह आर रूद्रानन्द सौरा नदी टपिकए श्रीनगरमे बसलाह। वेदानन्द खरगपुर महाल कीनिके अपना राज्यमे मिलौलन्हि आर अपन रज्यक पूर्ण विस्तार केलन्हि। हिनके बनैली राज्यक संस्थापक कहल जा सकइयै। हिनक विवाह मिथिलामे महेश ठाकुरक वंशजमे भेल छलन्हि। ई विधा प्रेमी छलथिन्ह– प्रथम पत्नीसँ पद्मानंद सिंह आर तेसर पत्नीसँ कुमार कलानन्द आर कृत्यानंद सिंह भेलथिन्ह। लीवानंद सिंह अपना समयक मिथिलाक एक प्रमुख व्यक्ति छलाह। हिनक परोक्ष भेला पर राजा पद्मानंद सिंह राजा भेलाह आर हिनका अंग्रेजी राजसँ सरकारक उपाधि सेहो भेटल छलन्हि। हिनकहि समयमे राज्यमे बट्बाराक मामला शुरू भेल जाहिमे हिनका ७आना आत कुमार कलानंद आर कृत्यानंदकेँ ९आना हिस्सा भेटलन्हि। पद्मानंद सिंह अपना बापे जकाँ दानी छलाह। वैद्यनाथ मंदिरक फाटक बनेबामे हिनक पूर्ण योगदान छलन्हि। महादेवक प्रति हिनक निम्नलिखित कविता प्रसिद्ध अछि–
__ ”जो अलका पति की सुख, सम्पत्ति देई मेरो प्रभु भौन भरेंगे।
अङ्कलिये गिरि राज सुता, कर पंकज तेसिर आइ धरेंगे॥
चन्द्र विभूषण भाल धरे, दुख जाल कराल हमार हरेंगे।
पद्मानंद सदा शिवकेँ, हरखाह मखाह निवाह करेंगे॥

करै पवित्र जाको दर्शनदिव्य देवन को,
सेवाते होत जाके, सहजहि सनाथ है।
गायें यश जाको, पावें मंगल मनोरथको,
छाई छिति कीरति कृपाल गुणगाथ है॥
नाथनकेँ नाथको अनाथन के नाथ प्रभु,
देवनकेँ नाथ मेरे बाबा वैद्यनाथ है॥
बनारसमे श्यामा मंदिर आर तारा मंदिरक स्थापना हिनके पत्नी लोकनिक प्रयत्ने भेल छल। हिनक पुत्र लोकनिक अकालमृत्यु भगेलन्हि। हिनक वंशजक रानी चन्द्रावतीक कोठी भागलपुरमे अछि।
कलानंद सिंहकेँ सेहो सरकार बहादुरसँ राजा बहादुरक पदवी भेटलन्हि। हिनक दूटा पुत्र भेलथिन्ह कुमार रामानंद सिंह आर कुमार कृष्णानंद सिंह। कृष्णानंद सिंह। कृष्णानंद सिंह अपन निवास स्थान सुल्तान गंजक श्रीकृष्ण गढ़मे बनौलन्हि। कलानंद सिंहक बाद राजा कृत्यानंद सिंहक प्रभाव बनैली राज्यमे सबसँ विशेष छल। बिहारक जमीन्दारमे ई सर्वप्रथम ग्रैजुएट छलाह आर अंग्रेजी हिन्दी आर संस्कृतक असाधारण विद्वान सेहो। खेलकुद आर शिकारमे ई अद्वितीय छलाह। बंगाल–बिहारक काउंसिलमे सेहो ई सक्रिय भाग लैत छलाह आर पटनासँ बिहारी पत्रिकाक प्रकाशन सेहो करौने छलाह। तेजनारायण जुबिली कालेजक आपत् कालमे ई अपूर्व सहयोग दए ओहि कालेजकेँ जीवित रखलन्हि आर ताहि दिनक हिसाबे ६लाखक दान देने छलाह। हिनके दानक स्वरूप ओहि कालेजक नाम तेजनारायण बनैली कालेज पड़ल अछि। हिनको राजाबहादुरक उपाधि छलन्हि आर सनद देवा काल बिहारक राज्यपाल बेली साहेब तेजनारायण जुबिली कालेजमे देल हिनक सराहणीय दानक उल्लेख केने छलाह। भागलपुरमे आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलनक स्वागताध्यक्ष सेहो छलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीकेँ स्थान दियेबामे हिनक अपूर्व योगदान छल। बिहार प्रांतीय संस्कृत सम्मेलनक सभापति सेहो ई छलाह।
वंशवृक्ष गदाधर झा
११म पीढ़ी–दुलार सिंह चौधरी
(१२) सर्वानंद सिंह वेदानंद सिंह रूद्रानंद सिंह
लीलानंद सिंह (श्रीनगर राज्य शाखा
पद्मानंद सिंह कुमार गंगानन्द सिंह)
कलानंद सिंह
कृत्यानंद सिंह
पद्मानंद सिंह कलानंद सिंह कृत्यानन्द सिंह
चन्द्रानन्द सिंह रामनंद सिंह श्यामानंद सिंह
सूर्यानन्द सिंह कृष्णानन्द सिंह बिमलानंद सिंह
(सुलतान गंज) तारानन्द सिंह
दुर्गानन्द सिंह
जयानन्द सिंह
नुनु जी

iii. शंकरपुर राज्यक इतिहास:-
शंकरपुर मधेपुरासँ उत्तर १२मीलक दूरीपर अछि। एकरा वड़गोड़िया स्टेट सेहो कहल जाइत छल कारण बड़गोड़िया स्टेट सेहो कहल जाइत छल कारण बड़गोरिया नामक एकटा गाम दरभंगामे अछि। जाहि नामपर अहि राज्यक नम करण अभेल छल। शंकरपुरक समीप दूटा प्रसिद्ध प्राचीन गढ़ अछि राय भीर आर बुधिया गढ़ी। एकरे समीपमे बेलारी गाम अछि। बेलारीक सम्बन्धमे किवंदन्ती अछि जे वल्लालसेन अहिगामक संस्थापक छलाह। शंकरपुरक समीप मधेली बजार आर वंसतपुर नामक प्रसिद्ध एतिहासिक स्थान अछि जाहिठाम सीत–वसंतक ध्वंसावशेष देखबामे अवइयै।
बेलारी तालुका पहिने दुर्गापुरक अधीन छल। पाछाँ दरभंगा राज्यक अंतर्गत भेल। खण्डवला कुलक महाराज छत्रसिंहक तेसर पुत्र नेत्रेश्वर सिंहकेँ बबुआनीक हिसाबे शंकरपुर भेटलन्हि। तखनहिसँ शंकरपुर राज्यक स्थापना मानल जा सकइयै। हिनका दूटा पुत्र छलथिन्ह एकरदेश्वर सिंह आर जनेश्वर सिंह। जनेश्वर सिंह लक्ष्मीश्वर सिंहक अभिभावकत्वमे रहलाह। जनेश्वर सिंह प्रख्यात पुरूष भेल छथि। ई विधाप्रेमी छलाह आर मधेपुरामे संस्कृत विद्यालयमे स्थापना केने छलाह। हिनक पुस्तकालय अपूर्व छल जे हिनक परोक्ष भेलापर लक्ष्मीश्वर पुस्तकालय दरभंगामे पठा देल गेल। वैवाहिक दृष्टिकोणे एकरदेश्वर सिंहक सम्बन्ध शौरिया राज्य (संस्थापक राजा सुमेर सिंह चौधरी)सँ सेहो छल। एकरदेश्वर सिंहकेँ तीन पुत्र भेलथिन्ह–
होमेश्वर सिंह, फुलेश्वर सिंह, चितेश्वर सिंह।
वंशवृक्ष
महाराज रूद्र सिंह
नेत्रेश्वर सिंह
एकरदेश्वर सिंह जनेश्वर सिंह
होमेश्वर सिंह
फुलेश्वर सिंह
चितेश्वर सिंह

iv. हरावत स्टेटक इतिहास:- ई राज्य सहरसा आर पूर्णियाँक सीमा रेखापर छल। हरावत परगन्नामे रहलाक कारणे अहि राज्यक नाम हरावत राज्य पड़ल। अहि राज्यक संस्थापक अग्निवंशीय चौहान छलाह परञ्च बादमे ई लोकनि जैन धर्ममे दीक्षा लेलन्हि। सम्राट शाहजहाँक समयमे हिनका लोकनिकेँ राजाक उपाधिसँ विभूषित कैल गेलन्हि आर राजस्थानसँ ई लोकनि मुर्शिदाबाद पहुँचलाह। हरावत परगन्नामे स्टेट संस्थापक रूपमे प्रतापसिंहक नाम अवइयै। हिनक व्यक्तित्वसँ प्रभावित भए दिल्ली सम्राट आर बंगालक नवाबसँ हिनका खिल्लत भेटल छलन्हि। हरावतक प्रसिद्ध राजा इन्द्रनारायणक पत्नी इन्द्रावतीक कर्त्तापुत्र विजयगोविन्द सिंह प्रताप सिंहसँ महाजनी कारबार शुरू केलन्हि। इन्द्रनारायणक जमीन्दारी शौरिया राजक नामे प्रख्यात छल। जे हिनक पूर्वज सूमेरसिंह चौधरीकेँ मुसलमान सम्राटसँ भेटल छलन्हि। विजय गोविन्दसँ प्रताप सिंहकेँ झगड़ा भेलन्हि आर १८५०मे सम्पूर्ण हरावत परगन्नाक जमीन्दारीपर प्रतापक अधिपत्य भगेलैन्ह। एव प्रकारे शौरिया राज्यक एक महत्वपूर्ण भाग समाप्त भऽ गेल। हुनके नामपर प्रतापगंज बाजार बसल अछि। प्रतापगंज अहिवंशक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति भेलाह। अपना मृत्युसँ पूर्वहि ओ अपन सम्पत्ति अपन दुनू पुत्र लक्ष्मीपति सिंह आर धनपति सिंहमे बटबा देलन्हि। ई दुनु भाई सार्वजनिक काममे सक्रिय रूपसँ भाग लेलन्हि। धनपति सिंह सेहो काफी प्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि। हिनका तीनटा पुत्र छलथिन्ह– गनपत, नरपत, बहादुर। गनपत सिंह अपना नामपर गनपत गंज बजार बसौलन्हि। नरपत सिंह कैसरे हिन्द कहबैत छलाह। हिनक पुत्रमे शूरपत सिंह प्रसिद्ध भेल छथि। ओ महाजनी भाषाक अतिरिक्त आरो कैक भाषाक जानकार छथि। हिन्दीसँ हुनका विशेष प्रेम छलन्हि आर जैन धर्म ग्रंथक हिन्दीमे अनुवाद सेहो करौने छलाह। प्राचीनकालमे हरावत जंगल छल आर आइनी–अकबरीमे एकर राजस्वक उल्लेख अछि। नाथपुरक चलते हरावत्क बड्ड नाम छल मुदा कोशीक पेटमे सब जाके नष्ट भऽ गेल।
वंशवृक्ष
राजा सोमचंद
४८म प्रताप सिंह
लक्ष्मीपत
छत्रपत
धनपत
गनपत
नरपत
शूरपत
महिपत
भूपत
बहादुर
v. चक्रवारक इतिहास:- मिथिलाक पाँजि आर अंग्रेजक इस्ट इण्डिया कम्पनीक कागज देखलासँ ज्ञात होइत अछि जे मुगलकालक अंतिम दिनमे बेगूसराय इलाकामे एकटा छोट–छीन चक्रवार ब्राह्मण लोकनि बनौने छलाह जे सम्प्रति चक्रवार भूमिहारक नामे प्रसिद्ध छथि। शुद्ध भूमिहारक दृष्टिकोणसँ लिखल गेल स्वामी सहजानंदक ‘ब्रह्मर्षिवंश विस्तार’मे चक्रवारकेँ भूमिहारमे नहि गिनल गेल छैक आर बहुतो दिनधरि ओ लोकनि मैथिल कहबैत छलाह। चक्रवारक मूल छन्हि ‘बेलौंचे सुदई’।
स्थानीय परम्पराक आधारपर ज्ञात होइछ जे चिरायुमिश्र नामक एक व्यक्ति बेलौंचे डीहसँ उपटिकेँ बेगूसराय जिलाक साम्हो ग्राममे आविकेँ बसि गेल छलाह। मुल्ला तकियाक वयाजसँ ई ज्ञात होइछ जे ओ हाजी इलियास तिरहूत राज्यकेँ दू भागमे बहने छल आर गंडकक दक्षिणी भागपर अपन अधिपत्य स्थापित कए बेगूसराय क्षेत्र धरि अपन प्रभाव बढ़ालेने छल। फिरोज तुगलक पुनः तिरहूतक सम्पूर्ण राज्य भोगीश्वर केंटस्तांतरितक देने छलाह। मिथिलाक ब्राह्मण शासक, ओइनवार वंशक लोग, आंतरिक मामलामे स्वतंत्र छलाह परञ्च दिल्लीक प्रभुताक मनैत छलाह। ओहि कालमे जे एक प्रकारक अस्त व्यस्तता छल तकरा चलते बहुत रास मैथिल ब्राह्मण अपन जीविकोपार्जनक हेतु चारोकात बहराइत गेलाह। तेरहम–चौदहम शताब्दीमे चिरायुँ मिश्र सेहो गंगा स्नान करबाक दृष्टिये साम्हो दिसि पहुँचलाह आर ओतुका प्राकृतिक छटा देखि आकृष्ट भए गेलाह आर ओतुके लोकक आग्रहपर ओतए बसि गेलाह। चक्रवार परम्परामे तँ ई कथा सुरक्षित अछि जे तहियेसँ हुनका लोकनि राज्य ओतए बनि गेलन्हि आर चक्रवारक प्रभाव पूर्णियाँसँ बक्सर धरि गंगाक दुनूकात पसरि गेल। तुगलक कालीन मलिक वायासँ संघर्ष हेबाक कथा सेहो चक्र्वार परम्परामे सुरक्षित अछि। (अहि प्रसंगमे देखु–हमरे लिखल–‘चक्रवारस आफ बेगूसराय’)
अठारहम शताब्दीक पूर्वार्द्धमे मुगल साम्राज्यक विघटन प्रारंभ भऽ गेल छल। प्रांतीय राज्यपाल लोकनि अपन स्वतंत्रता घोषित करें लागल छलाह। एहना स्थितिमे चक्रवार लोकनि सेहो अपना बेगूसराय क्षेत्रमे स्वतंत्र घोषित कए देलन्हि। हुनक स्वतंत्र राज्य होएबाक सबसँ पैघ प्रमाण ई अछि जे चक्रवार राज्यक विभिन्न व्यक्ति अपन हस्ताक्षर आर मुदासँ युक्त अनेको दानपत्र देने छथि। चक्रवार राजा बख्तावर सिंहक एक भूमिदान पत्रसँ ई प्रतीत होइछ जे हुनक अधिपत्य दलसिंहसराय धरि छल “महाराज बख्तावर सिंह देवदेवानम्”–क उपाधिसँ सेहो ई सूचित होइछ जे ओ मात्र एक सामंतेटा नहीं अपितु अपना प्रदेशक एक स्वतंत्र शासक सेहो। कम्पनीक कागजातमे बख्तावर सिंहक उल्लेख चक्रवारक राजाक रूपेँ भेल अछि। राजा शिवदत्त सिंह चक्रवारक एकटा दानक मान्यता अलीवर्दी स्वीकृत केने छल आर ओहि दानकेँ ओ यथावत् रहए देने छल। इहो कहल जाइछ जे राजा वख्तावर सिंहक पिरव्य रूको सिंह फरकिया परगन्नाकेँ लूटने छलाह जे तखन राजा कुंजल सिंहक अधीनमे छल। रूको सिंह १७३०मे कुंजलासिंहक हत्या कऽ देलन्हि।
कम्पनीक लेखसँ बुझि पड़इयै जे १७१९धरि चक्रवार लोकनि बेगूसरायमे प्रभुता संपन्न राज्यक रूपमे स्वीकृत भऽ चुकल छलाह। ओ लोकनि सरकारकेँ लगान देव बन्द कऽ देने छलाह आर मूंगेरसँ पटना धरि गंगा नदीक मार्गपर नियंत्रण सेहो कऽ लेने छलाह। ओहि मार्गसँ जाइबला सब नावकेँ रोकिकेँ ओ लोकनि कर वसूल करैत छलाह आर ओकरा लूटितो छलाह। अंग्रेज कम्पनीकेँ अपन नावक संग सेना सेहो पठवे पड़इत छलैक। कोन्ना आर अन्य स्थानमे चक्रवार लोकनि अंग्रेज सबल पड़इत छलाह। चक्रवार लोकनि अंग्रेजक नावपर आक्रमणो करैत छलाह आर अंग्रेज आर चक्रवारक बीच बरोबरि युद्ध होइत छल। अंग्रेज लोकनि 1721मे वख्तावर सिंहकेँ चक्रवारक राजा मानि लेलाह। अलीवर्दी चक्रवारकेँ पराजित करबामे सफल भेलाह। कहल जाइत अछि जे 1730मे विश्वासघात ककए अलीवर्दीक आदमी चक्रवार राजाकेँ मारि देलक। हालवेल अपन पोथीमे अहि विश्वासघातक वर्णन केने अछि। ओ चक्रवार राजा कोन छल तकर नाम नहि भेटैत अछि कारण वख्तावर सिंह अलीवर्दीसँ नीक सम्बन्ध स्थापित कऽ लेने छलाह आर बादमे अलीवर्दीक अभियानमे हुनक मदति सेहो केलथिन्ह। चक्रवारवंशक दलेल सिंह टेकारी राज्यक एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी छलाह आर राजा मित्रजित सिंहक प्राण बचेबामे सहायक भेल छलाह। 1793मे दमामी बन्दोबस्त चक्रवार दिग्विजय नारायणक संग कऽ देलक। अखनो धरि बेगूसराय जिलाक बारह गाम चक्रवार लोकनि पसरल छथि आर अपन प्राचीन इतिहासक अध्ययनसँ गौरवांवित होइत छथि। चक्रवार कालमे बेगूसरायक महत्व काफी बढ़ि गेल छल आर एकर प्रमाण हमरा कम्पनी रेकार्डससँ भेटैत अछि।
vi. नरहनक द्रोणवार वंश :- द्रोणवार लोकनिकेँ छथि, कहाँसँ एलाह आर कोना अहिठाम अपन राज्यक स्थापना केलन्हि अथक परिश्रमक बाबजूदो हमारा कोनो ठोस सामग्री जुटेबामे समर्थ नहि भेलहुँ अछि। ईलोकनि पश्चिमसँ एलाह आर एक परम्पराक अनुसार कन्नौजसँ। जँ अहि परम्परामे विश्वास कैल जाइक तखन तँ हमरा बुझि पड़इयै जे कोलाञ्चसँ ब्राह्मण लोकनिकेँ बजाकेँ जे दान देल जाइत छल ताहिकालक ओहिमहक कोनो शाखा द्रोणवारक पूर्वज रहल हेथिन्ह। पंचोभ ताम्रपत्र अभिलेखसँ स्पष्ट अछि जे 13म शताब्दी धरि कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ आमंत्रित कए दान देल जाइत छलन्हि। द्रोणवार परम्परामे कहल जाइत अछि जे कन्नौज से जे द्रोणवारक शाखा तिरहूत अवइत छल ताहिमे सँ किछु गोटए बाटहिमे गाजीपुरमे रूकि गेलाह। कहल जाइत अछि जे तिरहूतमे ‘द्रोणवार’ लोकनि ‘द्रोणडीह’सँ आएल छथि। दोसर परम्पराक अनुसार हिमालयक तलहट्टीमे द्रोणसागर नामक कोनो ताल अछि जकर चारूकात बहुत रास ब्राह्मण बसैत छलाह आर तैं ई लोकनि द्रोणवार कहौलन्हि। रेलवे बोर्ड द्वारा प्रकाशित ‘तीर्थाटन – प्रदीपिका’ नामक पोथीमे काशीपुर द्रोणसागरक वर्णन अछि। पाण्डव लोकनि अपन गुरू द्रोणाचार्यक हेतु ‘द्रोणसागर’क निर्माण केने छलाह।
सरैसा परगन्नाक द्रोणवारक ओतए जे मैथिल पंडितक लिखल हस्तलेख सब अछि ताहिमे ओ लोकनि द्रोणवारक हेतु ‘द्रोणवंशोद्भव’ शब्दक व्यवहार कएने छथि। द्रोणवार लोकनि अपनाकेँ द्रोणक वंशज कहैत छथि आर पश्चिमक वासी सेहो। मुसलमानी उपद्रव बढ़लाक बाद ई लोकनि अपन मूलस्थानसँ भगलाह आर ओहि क्रममे एक शाखा तिरहूतमे आबिकेँ बसलाह। विद्यापति अपन लिखनावलीमे द्रोणवार पुरादित्यक उल्लेख केने छथि जिनक राज्य नेपालक तराईमे छल आर जाहिठाम विद्यापति लखिमाकेँ लऽ कए प्रश्रय लेने छलाह। परमेश्वर झाक अनुसार शिवसिंह रानिपासक सब स्त्रीवर्गकेँ विद्यापति ठाकुरक संग कए नेपालक तराईमे रजा बनौली गाम सप्तरी परगन्नाक अधिपति निजमित्र पुरादित्य नामक द्रोनवंशीय द्रोणवार राजाक शरणमे पठौलन्हि। पुरादित्य द्रोणवार हुनका सबहिक सम्मानपूर्वक रक्षा केलन्हि। एहिसँ स्पष्ट अछि जे ओइनवार वंशक शिवसिंह आर द्रोणवार वंशक पुरादित्यक मध्य घनिष्ट मित्रता छल। अहिठाम विद्यापति लिखनावली लिखलैन्ह आर भागवतक प्रतिलिपि सेहो तैयार केलन्हि।
द्रोणवारक बस्ती देवकुलीक सम्बन्धमे परमेश्वर झा लिखैत छथि जे तेसर देवकुली मुजफ्फरपुर जिलामे शिवहर राजधानीसँ एक कोस पूर्व सीतामढ़ी सड़कसँ दक्षिण भागमे अछि, ताहिमे एक बहुत खाधिमे एक शिवलिंग भुवनेश्वर नामक छथि आर एहि गामक विषयमे बहुत रास पुरान कर्थापकथन अछि जाहिमे कौरव पाण्डवक उल्लेख सेहो अबैछ। संभवजे ई देवकुली द्रोणवारक मूल स्थान रहल हो आर एतहिसँ ओ लोकनि चारूकात पसरल होथि। द्रोणवारक संघर्ष बौद्ध लोकनिसँ तिरहूतक सीमामे भेल छलन्हि से हमरा लोकनिकेँ विद्यापतिसँ ज्ञात होइछ। एहिसँ इहो सिद्ध होइछ जे द्रोणवार लोकनि सेहो मिथिलाक उत्तरांचलमे प्रबल शक्तिक रूपमे विराजमान छलाह आर मैथिल ब्राह्मणहि जकाँ बौद्ध विरोधी सेहो छलाह। आन द्रोणवार वंशक एहेन प्रमाण आर कहाँ भेटैत अछि। द्रोणवार लोकनि मूलरूपेण तिरहूतक अंशमे प्राचीन कालमे रहल हेताह आर नेपालक तराई धरि अपन राज्यक विस्तार केने होथिसे संभव।
द्रोणवार परम्परा एकटा कथा इहो अछि जे बुद्धक देहावसान भेलापर जखन हुनक अस्थि वितरण होइत छल तखन मिथिलामे द्रोण ब्राह्मण लोकनि हुनक अस्थि अनने छलाह। जँ ताहिकाल ‘द्रोणवार’ लोकनि मिथिलामे उपस्थित छलाह तखन तँ हमर तँ ई मत आरो पुष्ट होइछ जे द्रोणवार अहिठामक थिकाह आर मिथिलाक आन ब्राह्मण जकाँ हिनको उत्पत्ति तिरहूतेमे भेल छलन्हि। मात्र अस्थि संचय करबा लेल ओ द्रोण लोकनि ओतए दूरसँ एतए नहि आएल होएताह। काल क्रमेण ब्राह्मण कौलिक कार्यसँ अपनाकेँ फराक कऽ लेलापर ई लोकनि भूमिहार कऽ कोटिमे राखल गेल होथि से संभव।
एक दोसर परम्पराक अनुसार नेपाल दरबारसँ द्रोणवार लोकनिकेँ राजाक उपाधि भेटलन्हि आर हिनक शौर्यकेँ देखैत मकमानी जिलाक भार हिनका लोकनिकेँ देल गेल छलन्हि। द्रोणवार राजा अभिमान राय प्रसिद्ध भेला आर मकमानीमे हिनक अधिपत्य छलन्हि आर ई लोकनि ‘पाण्डेय’ कहबैत छलाह। अभिमानक मृत्युक पश्चात् हुनक कर्मचारी लोकनि महारानीकेँ लऽ कए मिथिला प्रांतक दक्षिणी सीमापर स्थित बेलौंचे सुदई मूलक चक्रवार ब्राह्मणक राज्यमे पहुँचा देलन्हि। अभिमान रायक पुत्र छलाह गंग़ाराम। गंगाराम अहिवंशक सर्वप्रसिद्ध व्यक्ति भेल छथि आर हिनका सम्बन्धमे बहुत रास किवंदती अछि। चक्रवार राजा अपन कन्यासँ गंगारामक विवाह करौलन्हि। सार–बहनोईमे सामान्य बाताबाती भेलापर ओ राज्य छोड़ि देलन्हि आर अपन पत्नीकेँ संग लऽ कए ओतएसँ चलि देलन्हि। ससूरसँ सेनाक साहाय्य भेटलन्हि आर ओ सरैसा परगन्नामे अपन राज्यक स्थापना केलन्हि। सरैसा परगन्नाक “पुनाश” गाममे हिनक पूर्वज पहिने रहैत छलथिन्ह तैं सरैसा परगन्नामे राज्य स्थापनाक निर्णय ई केलन्हि। ताहि दिनमे ओहि सब क्षेत्रपर मुसलमानक आधिपत्य छल। ताजखाँ (ताजपुरक संस्थापक) आर सुल्तानखाँ (सुल्तानपुरक संस्थापक)केँ मारि ई मोरवामे अपन राजधानी बनौलन्हि। सरैसा परगन्ना नरहनसँ जन्दाहा धरि करीब ४०मील नाम अछि आर पो खरैरासँ सुल्तानपुर घाट धरि करीब २०मील चाकर अछि। हिनक एक विवाह मैथिल ब्राह्मण परिवारमे सेहो छलन्हि। पहिल पत्नीक नाम भागरानी आर दोसराक नाम मुक्तारानी छलन्हि। हिनक दुनुरानी मोरवा गढ़मे सती भेलथिन्ह।
भागरानीसँ उत्पन्न पुत्र भेला राय बड्ड प्रतापी भेलाह। भेला राय मोरवा सुल्तानपुरमे रहलाह आर मालाराय ‘वीरसिंह पुर–पोखरैरा’मे भेला रायक वंशज नरहनक पूर्वज भेलाह। अहिवंशक लोग बनारसक गद्दीपर छथि। भेला रायक पुत्र विक्रमादित्य रायकेँ सरैसा परगन्नाक ‘चौधराई’ भेटलन्हि। विक्रमादित्य राय बड़ा पराक्रमी छलाह। ई अपना नामपर ‘विक्रमपुर’ गाम बसौलन्हि। हिनक पुत्र हरेकृष्ण राय नरहनमे अपन दोसर राजधानी बनौलन्हि।– प्रधान राजधानी मोरवा आर दोसर नरहन। वंशवृक्षक अनुसार इतिहास एवं प्रकारे अछि–
द्रोणवार हरगोविन्द राय–
चौधरी केशवनारायण राय (सरैसा, भूषारी, नैपुर परगन्ना)
फतेह नारायण
अजीत नारायण
चित्र नारायण (इमाहपुर परगन्नाकेँ मिलौलन्हि)
अजीतन नारायण–सम्राटसँ हमका, सुरौली, लोमा, विझरौली, ननकार, लाखिराजक रूपमे हिनका भेटलन्हि
वैवाहिक सम्बन्ध टेकारीसँ छलन्हि
हिनक जेठपुत्र दिग्विजय नारायण बनारसक राजा बलबंत सिंहक बेटीसँ विवाह केलन्हि -
वारेन हेस्टिङ्गक मदतिसँ बलबंत सिंहक बाद चेतसिंह बनारसक गद्दीपर बैसलाह। जखन चेतसिंह वारेन हेस्टिङ्गसँ पराजित भेलाह आर बनारसक राजगद्दी खाली भेल तखन नरहनक अजीत नारायणक पौत्र आर दिग्विजय नारायणक पुत्र वारेन हेस्टिङ्गक अनुमतिसँ बनारसक गद्दीपर बैसलाह। हुनक नाम छलन्हि राजा महीप सिह आर ई सालाना ३८ लाख टाका वारेन हेस्टिङ्गकेँ देबाक वचन देलथिन्ह। तहियासँ बनारसक गद्दीपर हिनके वंशज शासन कै रहल अछि।
महीप सिंह
उदित सिंह
ईश्वरी प्रसाद सिंह
प्रभुनारायण सिंह
आदित्य नारायण सिंह
दिग्विजयक भ्राता अरहन स्टेटक मालिक भेला। महाराज दरभंगाक जे नवाबक संग कन्दर्पी घाटक लड़ाई भेल छल ताहिमे सर्वजीत सिंह नरेन्द्र सिंहक दिस छलाह। हुनक भाए उमराव सिंह नरहनक सैनिकक नेतृत्व करैत छलाह आर एकर विवरण हमरा लाल कविसँ भेटैत अछि। नरेन्द्र सिंह प्रसन्न भए हिनका दुनु भाईकेँ पुरस्कृत करए चाहैत छलथिन्ह मुदा ओ लोकनि पुरस्कार लेबासँ नकारि गेलाह तथापि फरकिया परगन्नामे हिनका लोकनिकेँ किछु गाँव भेटलन्हि। दरभंगा राज परिवारमे एहि हेतु नरहन राज परिवारक बड्ड सम्मान छलैक। हिनका लोकनिमे एतेक नीक सम्बन्ध छल जे महाराज प्रताप सिंहक समयमे जखन नवाबक दबाब बढ़ल तँ प्रताप सिंह अपन परिवारकेँ नरहन पठा देलन्हि आर अपने बेतिया च गेलाह। रामेश्वर सिंह धरि ई सम्बन्ध ओहिना बनल छल।
सर्वजीत
रणजीत
रूपनारायण
परमेश्वरी प्रसाद सिंह
नरहन दरबारमे चित्रधर मिश्र आर चंदा झा सन प्रसिद्ध विद्वानकेँ प्रश्रय भेटल छलन्हि आर महामहोपाध्याय गंगानाथ झासँ सेहो हिनका लोकनिक बढ़िया सम्बन्ध छल। रामनारायणक सम्बन्ध नेपालक जंगबहादुर शाहसँ सेहो छल कारण दुनु गोटएकेँ सोनपुर मेलामे नेट भेल छलन्हि। रामनारायण नेपालो गेल छलाह।
vii. बेतिया राज्यक इतिहास :- सोलहम शताब्दीक उतरार्द्धमे स्थापना भेल। गज सिंहकेँ शाहजहाँसँ राजाक पदवी भेटल छलन्हि। ई मिथिलाक राजा महिनाथ ठाकुरक समकालीन छलाह आर हुनका समयमे दुनुक बीच मनमुटाव आर खटपट सेहो भेल छल। मुगल साम्राज्यक कमजोर भेलापर उत्तर बिहारक सबटा राज्य स्वतंत्र हेबाक प्रयासमे लागि गेल छल आर बेतिया राज एकर कोनो अपवाद नहि कहल जा सकइयै। १७२९मे अलीवर्दी बेतिया राज्यपर आक्रमण कए ओकरा अपना अधीन केने छलाह। १७४८मे बेतियाक राजा लोकनि दरभंगा अफगानक संग मित्रता केलन्हि। दरभंगा अफगान अलीवर्दीक सेना द्वारा पराजित भेला। दरभंगा अफगानकेँ बेतियाक राजा सब बरोबरि मदति करैत रहैथ। अलीवर्दीक बाद पुनः बेतिया अपन स्वतंत्रता घोषित कए लेलक आर अंग्रेजी सत्ताक विरूद्ध ताधरि बनल रहल जाधरि कि १७५९मे अंग्रेजी सेनाक आक्रमण बेतियापर भेल। मीरजाफरक पुत्र मीरन अंग्रेजी सेनाक संग १७६०मे बेतियापर धावा मारलक आर बेतियाक स्वतंत्रता पुनः समाप्त भऽ गेल। १९६२मे मीरकासीम बेतियाक विरूद्ध सेना पठौलन्हि आर बेतियापर अपन अधिकार जमौलन्हि।
१७६६मे राबर्ट बेकरक प्रयाससँ बेतियामे अंग्रेजी सत्ताक स्थापना संभव भऽ सकल। १७६२मे ओहिठाम जुगल केश्वर सिंह राजा छलाह। हुनका पुनः इस्ट इण्डिया कम्पनीसँ झंझट भेलन्हि कारण बहुतो दिनसँ बेतियापर करक बकिऔता खसल छलैक। करदेबाक बजाय बेतियाक राजा अंग्रेजी सेनासँ युद्ध करब उचित आर सम्मानीय बुझलैथ आर युद्धमे परास्त भेला उत्तर ओ भागिकेँ बुन्देलखंड चल गेला आर कम्पनी हुनक राज्यकेँ अपना अधीन कऽ लेलक। बादमे जखन राज्यक स्थिति अंग्रेजक बुते नहि सुधरलैक तखन अंग्रेज पुनः जुगलकेश्वर सिंहसँ वार्त्ता शुरू केलक आर हुनका घुरबाक लेल अनुरोध केलक। अंग्रेज जुगलकेश्वर सिंहकेँ मझवा आर सिमरौन परगन्ना सेहो देलक आर बाँकि क्षेत्रकेँ गजसिंहक पौत्र आर पितिऔत श्री किशुन सिंह आर अवधुत सिंहमे बाँटि देलक। उएह लोकनि बादमे क्रमशः शिवहर (मुजफ्फरपुर) आर मधुबन (चम्पारण) राज्यक संस्थापक होइत गेलाह।
१७९१ जुगलकेश्वर सिंहक पुत्र वीरकेश्वर सिंहक संग कम्पनीक समझौता भेल आर वीरकेश्वरक नेतृत्वमे बेतिया राज्यक स्थिति सुदृढ़ भेल। कम्पनी आर नेपालक बीच जे युद्ध भेल ताहिमे वीरकेश्वर सिंह सक्रिय भाग लेलन्हि। १८१६मे आनन्दकेश्वर सिंह रजा भेला आर लार्ड विलियम बेरन्हिङ्गसँ हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। एकर कारण ई छल जे ओ अंग्रेजकेँ बड्ड मदति केने छलाह। हुनका बाद नवलकेश्वर सिंह राजा भेलाह आर १८५५मे राजेन्द्र केश्वर सिंह। सिपाही विद्रोहक अवसरपर ई अंग्रेजक अपूर्व सहायता केने छलाह। हुनका आर हुनक पुत्र हरेन्द्र केश्वरकेँ महाराज बहादुरक पदवी अंग्रेजसँ भेटल छलन्हि। १८९३मे हरेन्द्रकेश्वरकेँ के.सी.आई.ईक पदवी सेहो भेटलन्हि।
बेतियाक शासक लोकनि भूमिहार ब्राह्मण छलाह। ई लोकनि अपना राज्यकालमे नीक अस्पताल आर पुस्तकालय बनौने छलाह। ई लोकनि साहित्य प्रेमी सेहो छलाह। हिनका लोकनिक दरबारमे कवि आर कलाकारक बड्ड आदर छल। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आर राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्दकेँ हिनका लोकनिक ओतएसँ बरोबरि सहायता भेटैत छलन्हि। ओना तँ बेतिया राज बड्ड प्राचीन मानल गेल अछि मुदा एकरा सम्बन्धमे अखन सब बात स्पष्ट नहि भसकल अछि। बेतिया राजक वंशावली एवं प्रकारे अछि।
बेतिया राजक वंशावली
गंगेश्वर देव
मकेश्वर देव
राजा देव
घानोराज
उदय करण राज, जदुराज
उग्रसेन
गज सिंह (राज सिंह ?)
दिलीप सिंह
पृथ्वी सिंह
सत्रजित सिंह
ध्रुवसिंह (बड्ड पैघ किला बनौने छलाह)
अपन बेटीक बेटा जुगल केश्वरकेँ कोरामे लेलन्हि। कारण हिनका पुत्र नहि छलन्हि।
शिवनाथ सिंह
जुगलकेश्वर सिंह
वीरकेश्वर सिंह
वीरकेश्वर सिंह
नवलकेश्वर सिंह
महेन्द्र केश्वर सिंह
आनन्दकेश्वर सिंह
राजेन्द्र केश्वर सिंह
हरेन्द्र केश्वर सिंह
(महारानी शिवरतन–महारानी जानकी कुवँर)
= भूमिहार ब्राह्मणक ईवंश अपनाकेँ बड्ड प्राचीन मनैत छथि। हिनका लोकनिक वैवाहिक सम्बन्ध बनारस राज्यसँ सेहो अछि। कामेश्वर वंश जकाँ इहो लोकनि अपनाकेँ सुगौनासँ जोड़ैत छथि मुदा एतिहासिक तत्वक अभावमे अखन किछु कहब असंभव। बेतियाक वर्णन १७८६मे वर्णन १७८६मे प्रकाशित गजेटियरमे भेटैत अछि। १७८६मे अहिठाम ईशाई मिशनक एकटा शाखा छल।
* छोट छिन्ह राज्य सभहिक विवरण :- शिवहरक स्थापना बेतिया राज्यक शाखासँ भेल छल। सुरसंड राज्य सेहो भूमिहार ब्राह्मण वंशक राज्य जकर स्थापना महाराज प्रताप सिंह (दरभंगा)क समयमे भेल। एहिमे सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यक्ति चन्द्रेश्वर प्रसाद नारायण सिंह भेल छथि जे नेपाल क्रांति (१९५०)क समयमे भारतक राजदूत रहल छलाह। बनैली राज्यक शाखाक रूपमे श्रीनगर राज्य श्रीनगरक स्थापना भेल अछि। रूद्रानंद सिंह अपन पुत्र श्रीनन्दन सिंहक नामपर श्रीनगरक स्थापना केने छलाह श्रीनन्दन सिंहक तीन पुत्र नित्यानंद सिंह, कमलानंद सिंह आर कालिकानंद सिंह भेला। कमलानंद सिंह साहित्य सेवी छलाह आर हिन्दीक प्रगतिक हेतु लाखो टाका खर्च केने छलाह। ‘साहित्य सरोज’, ‘अभिनव भोज’, ‘कलियुगी हरिश्चन्द्र’, ‘कलिकर्ण’ आदि उपाधिसँ ई विभूषित छलाह। हिनके पुत्र भेल थिन्ह कुमार गंगानन्द सिंह जे मैथिली हिन्दी अंग्रेजी आर प्राचीन भारतीय इतिहासक प्रकाण्ड पण्डित छलाह। कालिकानंद सिंह आर गंगानंदक पुस्तकालय दर्शनीय छल। पुर्णियाँमे राजा पृथ्वी चन्द लालक राज्य सेहो प्रख्यात छल। छोट–मोट मुसलमान राज्यक संख्या सेहो ओतए बड्ड अछि। पुर्णियाँमे क्षत्रिय लोकनिक रजबारा सेहो छल जाहिमे सौरिया राज्यक इतिहास प्रसिद्ध अछि। मुसलमानी राज्यमे खगड़ाक मुसलमानी राज्य प्रसिद्ध छल।
जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
कथा
कथा-

दोती विआह।

पचास वर्षीए प्रोफेसर उमाकान्तँ दोहरा कए विआह कइये लेलनि। कोना नहि करितथि? संयमी रहने पचास बर्खक चेहरा पेंइतीस-चालीससँ उपर नहि बुझि पड़ैत छनि। पत्नीक कऽ मुइने घर सुनसान लगए लगलनि। ढन-ढन चौघारा कोठरी सभ करैत रहनि। अपना छोड़ि ने दोसर भैयारी आ ने कियो आन परिवारमे रहनि। दुइयेटा सन्ताननो! जेठ बेटी प्रोफेसर पतिक संग बनारसेमे रहैत छथिन। दुरागमनक पछाति मात्र आइ धरि मात्र तीनि बेरि माए-बापसँ भेटि करए ऐलीह। बेटो तहिना। डॉक्टनरीक अंतिम साल, बंगलोर मेडिकल कओलेजमे पढ़ैत छथिन। सालक दुर्गापूजाटा मे गाम अबैत छथि।


किरिण फुटितहि तीनू बकरी घरसँ निकालि बाहरक खुट्टीमे बान्हिह, कटहरक पात आगूमे दऽ बगलमे बैसि अपने फुड़ने असकरे बैसल बैहरी बजए लगलीह- ‘‘घोर कलयुग! घोर कलयुग आबि गेल। जते दिन ई दुनियाँ चलैए, चलैए, नै तँ धरती फाटत सभ ओहिमे चलि जाएत। सुआइत लोक कहै छै जे मनुक्ख। तते पपियाह भऽ गेल अछि जे खिआइत-खिआइत चुट्टी-पीपरी जेँका भऽ गेल। हमरा सभकेँ भगवान पाड़ लगौलनि जे एतेटा मनुक्खछ भेलहुँ। आबक लोक थोड़े एते-एते हएत। तेहेन हएत जे लग्गीा लगा-लगा भट्टा तोड़त।''
ओना विआहसँ दू दिन पहिनहिसँ स्त्री गणक बीच गुन-गुनी शुरु भऽ गेल छलैक मुदा कियो खुलि कऽ नहि बजैत छलीह। मुदा आइ सभक मुँह खुजि गेलनि। टोलक बीच सरकारीक तीनियेटा चापाकल अछि वाकी पाँचो अपन-अपन अंगनेमे गरौने छथि। जहिपर आन-आन नहि जाइत। तीनूमे सँ एकटाक हेडे खोलि तड़िपीबा सभ बेचि कऽ ताड़ी पीबि गेल। दोसराक फील्ट।रे फुटि गेल छैक। जहिमे पानिसँ बेसी गादिये अबैत अछि। मुदा चौराहा परहक कल बँचल अछि। मुदा ओहो कोन जनमक पाप केने अछि जे भरि दिनमे कखनो आराम नहि भेटैत छैक। चारु दिशिसँ पनिभरनी वाल्टीम-घैल लऽ आबि-आबि चारु दिशिसँ घेरि बेरा-बेरा पानि भरैत। तेँ गप-सप करैक नीक अवसरो आ जगहो फइल।
चिक्का री मारैत मझौरावाली सोनरेवाली दिशि देखि कऽ बजलीह- ‘‘साओनक लगनक गीति अबै छनि, दीदी?''
मुस्की दैत सोनरेवाली उत्तर देलखिन- ‘‘जहिना एक्‍के लोरहीसँ सिलौटपर मिरचाइयो पीसल जाइत अछि आ मिसरिओ, तहिना ने डहकनो फागुनोक लगनमे गाओल जाइत अछि आ साओनोमे गाओल जाइत।''
दुनू गोटेक चिकारीमे गप्पा सुनि बेलौंचावाली बजलीह- ‘‘अपना भैंसुरकेँ नहि देखै छहुन जे काठपर जाइ बिना दुइर भेलि जाइ छथुन आ तहिपर पुट्ठा खलीफा घर लऽ अनलखुन। से बड़वढ़िया। बड़ चिक्कान। आ प्रोफेसर भैयाकेँ अखन की भेलनिहेँ। मारे दरमहो कमाइ छथि आ उमेरे कते हेतनि। तीस-पेंतीस बर्खसँ बेसी थोड़े भेलि हेतनि।''
मझौरावालीक पछ लइत मुँह चमकबैत मोहनावाली बाजलि- ‘‘जानिये कऽ तँ पुरुख छुद्दर होइए। तहिमे उमाकान्तेा जे छुद्दरपना केलनि तँ कोन जुलूम भऽ गेलइ।''
मोहनावालीक कड़ुआइल गप सुनि बेलौंचावालीक मन जरए लगलनि। तुरुछि कऽ बजलीह- ‘‘सभ पुरुख तँ छुद्दरे होइए मुदा मौगी तँ सभटा गिरथाइने होइए। सैह ने। सत-सतटा मुनसा देखैए मौगी आ छुद्दर होइए पुरुख। हिनकेँ पुछै छिअनि जे प्रोफेसर भैयासँ नीक अपन घरबला छन्हिु?''
घरबलाक नाओ सुनि मोहनावाली काँख तरक घैल निच्चानमे रखि आगू बढ़ए लगलीह। मुदा तहि बीच साठि वर्षीए झबरी दादी जोरसँ बजलीह- ‘‘मरदक कमाएल खाइ जाइ छह आ गरमी चढ़ै छह तँ कलपर झाड़ैले अबै छह। एक्को दिन कोइ उमा बौआ कऽ भानसो कऽ दइ छहुन आ कि एक लोटा पानियो भरि कऽ दए अबै छहुन। मुदा उल्लूँ जेँका मुँह दुसल सभकेँ होइ छह। वेचारा नोकरीपर सँ अबै छथि अपने हाथे बरतन-वासन धोए, पानि भरि भानस करए छथि से बड़बढ़ियाँ! मुदा विआह कऽ लेलनि से बड़ अधलाह।''
झबरी दादीक गप ओते मोहनावाली नहि सुनथि जते तरे-तर बेलौंचावाली जरैत रहथि।
छह मास पूर्व प्रोफेसर उमाकान्तरक पत्नीि स्वँर्गवास भऽ गेलनि। जाधरि जीवैत छलथिन ताधरि घरक कोनो भार प्रोफेसर सहाएवकेँ नहि बुझि पड़ैत छलनि। जहिना कोसीक धार अनवरत बहैत रहैत अछि तहिना उमाकान्तोपक परिवार अपना गतिसँ छह मास पछाति धरि चलैत छलनि। ओना दस बर्ख पछाति धरि माए-पिताक नजरिमे उमाकान्तर बच्चे आ पत्नीा कनियेँ छलथिन। घरक भार दुनूमे सँ किनकोपर नहि छलनि। सोलहो आना माइये-बाबू सम्हाेरैत छलखिन। पढ़नाइ-पढ़ौनाइ उमाकान्तूक आ दुनू साँझ भानस केनाइ पत्नीोक काज छलनि।
पत्नीा मुइलाक उपरान्ति उमाकान्तछकेँ घर-आंगन सून-मशान बुझि पड़ए लगलनि। चौघारा घरक आंगन, नमहर दरवज्जा तहि बीच असकरे उमाकान्ता रहैत छथि। परिवारकेँ डूबैत देखि उमाकान्तसक मनमे बेचैनी बढ़ए लगलनि। जहिना भूमकमक समए धरतीक संग-संग उपरक सभ किछु कँपए लगैत तहिना मनक संग-संग उमाकान्तजक बुधि-विवेक डोलए लगलनि। हृदय चहकए मन मसकए लगलनि। मसकैत-मसकैत ऐहेन चिरक्काक भऽ गेलनि जे उपयोग करै जोकर नहि रहलनि। अनायास धैर्यक सीमा बालुक मेड़ि जेँका ढ़हए लगलनि। ढहैत-ढहैत सहीट भऽ गेलनि। सहीट होइतहि बरखा पानि जेँका रास्ताल बनबए लगलनि। जहिसँ नव-नव विचार जनमए लगलनि। नव-नव विचारकेँ जनमितहि आँखि उठा आगू तकलनि तँ मेला-जेँका दुनियाँ बुझि पड़लनि। सभ रंगक देखिनिहार। सभ तरहक वस्तुवक दोकानपर एका-एकी एवो करैत आ जेवो करैत। अपन-अपन धुनिमे सभ बेहाल। दोसर दिशि देखैक ककरो समए नहि। अपने ताले सभ बेताल। जहिसँ ककरो-ककरो आँखिसँ नोरो खसैत आ कियो-कियो ठहक्कोह मारैत। अनका दिशिसँ नजरि हटा उमाकान्तक अपना दिशि मोड़लनि तँ जिनगीक लेल संगीक जरुरत पड़लनि। मन पड़लनि पत्नीमक मृत्युि। मृत्युकक उपरान्तप सोग परगट करैले तँ बहुतो अएलाह, मुदा कि सबहक नोरमे एक्के् रंग वेदना रहनि? एक घटना रहितहुँ एक रंगक विचार आ वेदना कहाँ छलनि? भरिसक सभ भाँज पुरबैले आइल छलाह। मुदा प्रोफेसर हरिनारायणक नोर किछु आरो बजैत छलनि। कि हुनकर नोर पत्नीभक प्रति छलनि वा पढ़ैत बच्चा क प्रति छलनि आ कि हमर विधुर जिनगीक प्रति छलनि। मनपर भार पड़लनि। भारक तर मन दबेलनि। जहिसँ सोचै-विचारैक रास्तो अवरुद्ध हुअए लगलनि। मुदा तरमे दबल मन कहलकनि- ‘‘समाजक लोक की कहत?'' फेरि मनमे उठलनि, की कहत समाजक लोक! जते लोक तते विचार। जहिना ताड़ीक गंधसँ ककरो उलटी होइत तँ कियो सुगंध वुझि आत्मक-तुष्टिल करैत अछि। बूढ़-बुढ़ानुस परम्पकरानुसार कहताह ओ यैह कहताह जे संयुक्त परिवारमे व्य क्तिल-विश्‍ोषक वेदना परिवारक बीच हराए, फुलाएल फूल जेँका हँसैत अछि। जहिसँ अभाव कोनो वस्तुग नहि रहि जाइत अछि। फेरि मनमे एलनि जे जहि कओलेजमे शिक्षक रुपमे छी, बेटा तुल्यक विद्‌यार्थीकेँ जिनगीक बाट देखवै छी ओ कि कहत? मुदा कोनो घटनो तँ अनिवार्य नहि होइत आकस्मिोको होइत। जे सबहक संग घटबे करत? घटियो सकैत अछि नहियो घटि सकैत अछि। मन ओझड़ेलनि। किछु कालक वादमे एलनि जे जे मनुष्यक एहि धरतीपर जन्मि लइत ओ मृत्यु पर्यन्त हँसैत जीवए जाहैत अछि। से कहाँ भऽ रहल छैक। पहिलुका जेँका परिवारो नहि रहल। असकर जीवो कठिन अछि। दोसराक जरुरत सदति काल पड़ैत अछि। भलेहीं जिनगीक क्रिया निमाहि लेब मुदा मनक व्यिथा के सुनत। सभ ठाम ने तँ लोक कानि सकैत अछि आ ने हँसि सकैत अछि। परिवार तँ हँसै-कनैक जगहे छी। जँ से नहि भेटए तँ गुर-घाव जेँका तरे-तर सड़ैन करैत रहत। जते सड़ैन करत तते शरीरसँ गंध निकलवे करत। जाहिसँ कष्टोग होएत आ औरुदो घटैत। जखने औरुदा घटत तखने जिनगी सिकुड़त। जते जिनगी सिकुड़त तते मृत्युट करीब आओत। फेरि मन ओझरा गेलनि। मन ओझराइते नजरि घुमौलनि तँ कओलेजक इतिहास विभागक प्रोफेसर हरिनारायणपर पड़लनि। हरिनारायणे बाबूटा ऐहन जिज्ञासु रहथि जनिका आँखिसँ हृदयक वेदना, पहाड़पर सँ खसैत झरनाक पानि जेँका अनघोल करैत रहनि जे ‘बाप रे, अन्यालय भऽ गेल।' उमाकान्त, ठूठ गाछ सदृश्यझ भऽ गेलाह। जाहिमे फूल-फड़क संग छाहरियो अलोपित भऽ जएतनि। अपने जानटा लए कऽ पत्नी नहि गेलखिन। असीम वेदनाक पहाड़ सेहो माथापर पटकि रहल छथिन। सभ किछु छिड़िया जेतनि। कोना समेटि पओताह उमा भाय! की एकरे जिनगी कहबै?''
जेतना शून्यट उमाकान्तभ दुनियाँक बजारमे हेरा गेलाह। चारु दिशक बाट बन्नु बुझि पड़ए लगलनि। किमहर जाएब? रस्तेा नहि। कि ओ खरहोरिक ओहन गाड़ल कड़चीक सदृश्यक भऽ गेलाह जाहिसँ कोनो क्रिया नहि भेनहुँ आन ओगरवाह बुझैत अछि। अनायास मनमे जगलनि जे दुनियाँमे कियो अप्पेन नहि। जाधरि आँखि तकै छी ताधरि दुनियों अछि नहि तँ ओहो नहि अछि। अपनहि करनीसँ कियो दुनियाँकेँ सुन्दहर बनबैत अछि आ कियो अधलाह। आगू जीवैक लेल संगीक जरुरत सभकेँ होइत छैक। आनक अपेक्षा हरिनारायण बाबू लग बुझि पड़ै छथि। अखने हुनका ऐठाम जाए अपन मनक बात कहबनि।
उमाकान्तिकेँ देखितहि दुनू हाथसँ दुनू बाँहि पकड़ि हरिनारायण अरिआति कऽ अपन कोठरीमे वैसाए पत्नीलकेँ पानि नेने अबए कहलखिन। वामा हाथमे लोटा दहिना हाथमे पानिसँ भरल चमकैत स्टीठलक गिलास उमाकान्त‍ दिशि बढ़ौलखिन। पत्नी। विहीन उमाकान्त नजरि निच्चाभ केने शोभाक -हरिनारायणक पत्नी - हाथसँ गिलास लऽ पानि पीबए लगलाह। मुदा दू घोंटक बाद पानि कंठसँ निच्चा धसबे ने करनि। दोसर गिलास भरैक लेल शोभा बामा हाथक लोटा दहिना हाथमे लइत उमाकान्त पर नजरि गारने। ने उमाकान्त मुँहसँ गिलास हटबैत आ ने पानि पीबैत। उमाकान्तटक व्यलथा हरिनारायण बुझि गेलखिन। शोभा हाथक लोटा अपना हाथमे लइत कहलखिन- ‘‘अहाँ चाह बनौने आउ। भायकेँ हम पानि पीया दइत छिअनि।'' चाह बनबैले शोभा कीचेनरुम चलि गेलीह।
मुँहमे गिलास सटल उमाकान्ताक मनमे अबए लगलनि। जँ कहयो हरिबाबू हमरा ऐठाम जएताह तँ किनका चाह बनबैले कहबनि। उमाकान्तम कऽ विचारमे डूबल देखि हरिनारायण कहलखिन- ‘‘भाय, अपनेसँ हम छोट छी मुदा एकरा धृष्टउता नहि बुझि दिलक धड़कन बुझू। अपने बेसी दुनियाँ देखलिऐक मुदा.......।''
चौंकि कऽ उमाकान्तत पुछलखिन- ‘‘मुदा की?''
आइसँ पहिने मनुष्यह जते असुरक्षित जिनगी बितबैत छल ओहिमे बहुत कमी आएल अछि। सोलहन्नी, सुरक्षित तँ नहि मुदा पहिलुका अपेक्षा सुरक्षित भेलि अछि। ओना खतरा पहिनेसँ अधिक भऽ गेल अछि मुदा बदलल रुपमे। पहिलुका रुपमे सुरक्षित भेलि अछि। जहिसँ जिनगीक नमती सेहो बढ़ि रहल अछि। ओना पूर्वज शतायु कऽ सही औरुदा बुझै छथिन। मुदा इहो बुझिनिहार तँ छथि जे चालीस कऽ घपचालीस बुझैत छथि। ओहो ओहिना नहि बुझैत छथि। अखनो चालीस वर्खसँ उपर कते गोटे छथि जे पूर्ण स्वचस्थ छथि। मुदा किछु वर्ख पूर्व धरि अस्सीो वर्खसँ उपर गोटि-पङरा पहुँचैत छलाह ओ आब अधासँ बेसी पहुँचए लगलथि अछि। तेँ, मोटा-मोटी नब्बेउ कऽ अधार बना हरिनारायण उमाकान्तबकेँ पुछलखिन- ‘‘अपनेक आयु कतेक अछि?''
आयु सुनि उमाकान्तर बिस्मिमत भऽ गेलाह। हृदय बमकैत रहनि मुदा मुँहसँ बोली निकलबे नहि करनि। किछु काल बिलमि कहलखिन- ‘‘पचास बर्ख।''
पचास बर्ख सुनि हरिनारायण उछलि कऽ बजलाह- ‘‘अधासँ किछु अधिक भेलि अछि मुदा अधा तँ बाकिये अछि। अधाक लेल.......।''
नमहर साँस छोड़ि, उमाकान्तम आँखि उठा कखनो हरिनारायणपर दथि तँ लगले नजरि निच्चाक कऽ धरती देखए लगथि। मुस्कुछराइत हरिनारायण कहलखिन- ‘‘अपने दोसर विआह कए लेल जाउ। जरुरी नहि जे सभ औरत कुल्टेल होइत अछि। ऐहनो औरतक कमी नहि जनिकामे मानवीय संवेदना गंगाक धार जेँका सदिखन उमड़ैत रहैत छन्हिे। नारीक पहिल गुण मातृत्वक थिक। जेकरा प्रबल बनेवाक लेल पुरुषक सहयोग जरुरी अछि। जखने अनुकूल परिस्थि ति नारीक प्रति बनत तखने दुनियाँक रंग-रुप बदलल-बदलल बुझि पड़त।''
चाह पीबि, विदा होइत उमाकान्तन कहलखिन- ‘‘अहाँक विचारसँ सहमत छी मुदा काजक भार अहाँपर।''
दुनू गोटे -उमाकान्तत आ हरिनारायण- दू गामक। मुदा कोसे भरिक दूरी दुनूक बीच छन्हिह।
अपने गामक पच्ची स बरखक यशोदियाक संतप्ता जिनगी हरिनारायणक सोझमे छन्हिक। सोलह बर्खक देहरिपर जखन यशोदिया पहुँचलि अट्ठारह बर्खक गुणेश्व र फूलक सुगंध कऽ भौरा जेँका झपटि लेलक। जिनगीक हरियर-हरियर प्रलोभन देवाक संकल्पश करैत, लोक-लाजसँ बँचैक लेल, गाम छोड़ि दिल्लीह चल गेल। मुदा दिल्ली-क सड़कपर जखन दिन-राति गुजारैत तखन यशोदिया कऽ छोड़ि गुणेश्वैर निपत्ता भऽ गेल असकर यशोदिया वौआए लगलीह। हारि-थाकि यशोदिया एकटा कोठीक शरणमे गेलि। आठ वर्खक पशुवत जिनगी यशोदियाकेँ बदलैक लेल बाध्य- केलक। नव बाट ताकए लागलि। अपना कऽ मृत्युव बुझि एक राति सभ किछु छोड़ि पड़ा कऽ गाम आबि गेलि। गाम आबि हरिनारायणक पाएर पकड़ि ताधरि कनैत रहलि जाधरि ओ बाँहि पकड़ि मनुक्खआक जिनगी जीवैक भरोस नहि देलखिन।
हरिनारायण परिवारमे यशोदिया रहए लगलीह। यशोदियाक मनमे तँ चैन आबि गेल मुदा हरिनारायणक बेचैनी बढ़ए लगलनि। समए पाबि, विलटैत दू जिनगीकेँ जोड़ि एक परिवारकेँ लहलहाइत देखलनि। मनमे खुशी एलनि।
अखन धरि उमाकान्तम यशोदियाकेँ प्रोफेसर हरिनारायणक बहीन बुझैत छलाह। यशोदियाक असली परिचए नहि छलनि तेँ मनमे खुशी रहनि जे सभ्यद परिवारक लड़की घरमे औतीह। जहिसँ पहिलुके जेँका फेरि परिवार अपन पटरीपर आबि आगू मुँहे ससरए लगत।
दिन -लग्नग- बेरागन छोड़ि हरिनारायण उमाकान्त केँ पुछलखिन- ‘‘अखन तँ विआहक समए नहि अछि तखन.....।''
‘‘एक दिन पहाड़ लगि रहल अछि। विआहक जे कोनो बंधन अछि ओ काँच सूतसँ बान्हहल जाइत अछि। जहिसँ सदिखन टूट-फाट होइत रहैत अछि। तेँ दुनूक -पुरुष-नारी- हृदयक योगसँ हेवाक चाही?''
हरिनारायणक प्रश्नासँ उमाकान्ति गुम्मन भऽ कहलखिन- ‘‘समए आ परिस्थिीतिकेँ देखैत.....।''
उमा अतिश कुमार मिश्र
नेपालक राज्यउ पुनर्संरचना मे मिथिला आ मैथिली
नेपाल अखन संघीय संरचनाके अन्तिचम चरणमे अछि । संविधान सभा अन्तमर्गतक राज्य पुनर्संरचना तथा राज्य क बाँड फाँड समिति देशके मिथिला भोजपुरा कोच मधेश सहित १४ टा राज्य क आवधारणा सहितक प्रतिवेदन संविधान सभामे प्रस्तुथत कएलक अछि ।
नेपालक पूर्व झापा जिल्ला सँ पश्चि ममे पर्सा आ दक्षिण मे भारतक सीमा धरिक पूर्वि मधेशक समथल भू भाग प्रस्ताववित मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्यम अछि ।
ई राज्यस राजनीतिक, समाजिक, सांस्कृ तिक, जनसंख्याध आ अन्यप आवश्य क पुर्वाधारक रुपमे नेपालक सभ सँ समृद्ध राज्य‍ हएत अहिमे कोनो दू–मत नहि अछि ।

मिथिलाक इतिहास
मिथिला राज्याक इतिहास अति प्रचिन अछि । त्रेता युग सँ शुरु भेल मिथिलाक इतिहाँस राज्यंक रुपमे भलेही नहि हुए मुदा भाषिक समृद्धताक कारण नेपाल आ भारतक सीमामे बटायल मिथिला क्षेत्र अपन अस्ति त्वा जिविते रखने अछि ।
प्राचिन मिथिला पूर्वमे कोशी, पश्चि ममे गण्डटकी, उत्तरमे हिमालय सँ दक्षिणमे गंगा धरि छल । जे बृहदविष्णुथपुराणक मिथिला खण्डेमे अहि प्रकारे उल्लेलख अछि ।

गंगा हिमवर्तो मध्येु नदी पञ्चड देशान्त्रे ।
तैरभूक्तिरिति ख्याेतो देशः परम पावन ः ।।
कौशिकीन्तुि समारभ्यत गण्डअकीमधिगम्यरबै ।
योजगनामि चतुर्विशत् ब्या्यामः परिकीर्तित ः ।।
अहि सँ स्पतष्टब होइत अछि जे प्रचिन मिथिलाक भूमि वर्तमान नेपालक मोरङ जिल्ला सँ पर्सा धरि तथा भारतक दरभंगा सँ पूर्णियाधरि छल ।
नेपालक मध्याकालिन इतिहासमे त्रिशक्तीके स्ा्क ापना भेल छल जाहिमे मिथिला राज्य्क स्थातन प्रमुख रहल पाओल जाइत अछि ।
दक्षिण भारतक कर्णाट वंसीय नान्यादेव सन १०९७ (११५४ वि.स.)मे बारा जिल्लािक सिमरौन गढ़के राजधानी बना सम्पूरर्ण मिथिलाके समेटि कऽ तिरहुत राज्य१क स्था४पना कएलन्हिज ।
कर्णाट बंशक शासन १३२४ धरि चलल ।
ओहिके वाद अहि राज्य् पर भारतक मुगल सम्राट गयासुद्धिन तुगलक अनिषर आ ब्राहमण वंशक औनियार आ तकर बाद फेर सँ मुगल सभक अधिपत्यर रहल छल ।
इम्हबर मल्ल कालिन नेपालक इतिहास मे यक्ष मल्ल दक्षिण क्षेत्रक विजय अभियानक समयमे मिथिला छिन्ना भिन्ना भेल छल ।
ओहि समयमे पश्चिममक मगरात सभ बीच एकटा नयाँ शक्तिक उदयभेल जकर नेतृत्वष मुकुन्दय सेन कएलन्हिल । ओ पाल्पापकेँ राजधानी बना कऽ अपन राज्यँ विस्तालरक क्रममे पाल्पान सँ मोरङ्गधरि राज्यि स्थाभपित कएलन्हि् ।
मुकुन्द् सेनक मृत्यु क बाद हुनक बेटासभ बीच राज्‍यक बटबारा भेल जाहिमे पुर्वि भाग मकवानपुर छोटका बेटा लोहाङ्गसेनक हिस्सासमे पड़लन्हिु ।
ओ तराइक दक्षिण आ पुर्वी भाग विस्ता्र कएलन्हिट ।
जाहि अनुसार पूर्वमे टिस्टाग नहि सँ काठमाण्डूट उपत्य काक दक्षिणी भू भाग, भारतक चम्पाटरण, सारज, मुजफ्फनरपुर आ दरभंगाधरि कायम कएने पाओल जाइत अछि ।
सेन वंशक अन्तिपम राजा दिग्ब न्धपन सेनक समयमे अर्थात सन् १७७१ मे ई रान्य््पा तत्काजलिन नेपालमे समाहित भऽ गेल ।
सन् १८१४ सँ १९१६ धरि चलल नेपाल आ अंग्रेज बीचक लडाई मे मिथिलाक मोरङ्ग छोडि सम्पूुर्ण भू भागपर अंग्रेज कब्जा कऽ लेने छल ।
सन् १८१६कें सुगौली सन्धीनक बाद मिथिलाक किछ भाग पून ः नेपालमे आएल जे वर्तमान नेपालक, मोरङ, सुनसरी , सप्तलरी, सिरहा, धनुषा, महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, वारा आ पर्सा अछि ।

राज्यी पुनर्सरचना मे मिथिलाक अवस्थाक
संविधान सभाक राज्य् पुनर्संरचना एवं राज्य क शक्ति बाँडफाँड समिति झापा सँ पर्सा धरि मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्याक अवधारणा प्रस्तुएत कएलक अछि ।
प्रस्तुशत अवधारणा अनुसार अहि राज्य‍मे झापा, मोरङ्ग, सुनसरी, सप्तपरी, सिरहा, धनुषा महोत्तरी, सर्लाही, रौतहट, बारा आ पर्साके समावेश कएल गेल अछि ।
प्राचिन मिथिलाक नेपाल स्थि त भू–भागके केन्द्र् बना कऽ बनाओल गेल अहि राज्यमक राजधानीमे जनकपुरकेँ प्रस्ता व कएल गेल अछि ।
प्रमुख राजनीतिक दल एकीकृत नेकपा माओवादी आ एमालेक सहमतिमे समितिक वहुमत सँ अवधारणा पास भेल अछि ।
प्राचिन मिथिला सहित विभिन्ने काल खण्डेक इतिहासकेँ देखल जाय तऽ पूर्वके झापा छोडि अन्यम जिल्लान मिथिला क्षेत्रमे रहल प्रमाणित होइत अछि ।
अखुनक कोशी पारक मोरङ, सुनसरी मैथिली भाषी क्षेत्र अछि । बिगतकेँ देखल जाय तऽ एतिहासिक, साहित्यिशक आ साँस्कृ तिक आधारसभ भेटैत अछि । मैथिली भाषा साहित्ययक लेल स्वअर्ण युग मानल गेल १३ अम शताब्दी केँ मध्य्मे जखन मैथिली भाषा अपन स्था न बना चुकल छल ।
ओहि समयमे विद्यापतिक समकालिन कविक रुपमे मोरङक लक्ष्मीप नारायण, गोपीनाथ, वीरनारायण, धिरेश्वमर, भिस्मम कवि, गंगाधर आदी कविक स्था्न अबैत अछि ।
अहि सँ ई प्रमाणित होइत अछि जे ओहि समयमे वर्तमानक सुनसरी आ मोरङ्ग सेहो मिथिला क्षेत्रमे छल । अर्थात अखुनक कोशी नदि मोरङ सँ पुर्व छलैक हएत आ बादमे कोशी अपन स्थागन परिवर्तन कएने हेतैक ।
राज्यत पुनर्संरचना समिति प्राचिन मिथिलाक इतिहासकेँ अपन आधार मानि मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक राज्यर आवधारणा प्रस्तुुत कएने अछि आ राजधानी सेहो जनकपुरकेँ बनौने अछि ।

प्रस्ता वित राज्यनमे मैथिलीक अवस्थाे
सांस्कृ तिक आ एतिहासिक दृष्टी कोण सँ समृद्ध मैथिली भाषाक इतिहास उल्लेजख करब आवश्ययक नहि बुझाइत अछि । ई.स. ८०० सय सँ शुरु भेल मैथिली भाषाक १२ सय वर्ष सँ वेशीक इतिहास अछि ।
मैथिलीक विकाश अहि गति मे भेल जे मिथिलाक अतिरिक्त अन्यथ क्षेत्रमे सेहो विस्ता रित होइत गेल ।
१३ अम शताब्दीगक उतारार्धमे मैथिली भाषा तत्का‍लिन नेपाल (काठमाण्डू उपत्य का पर) अपन अधिपत्या जमा चुकल छल ।
मुसलमान सभक आक्रमण सँ पराजित भऽ नेपाल पहुँचल हरिसिंहक रानी अपन नैहर भादगावमे शासन स्थामपना कएलन्हिज । हुनका संगे बहुत रास मैथिल विद्वानसभ कवि सभ सेहो उपत्याका प्रवेश कएने छल । ओही समय सिँ उपत्य कामे मैथिली भाषाक विकाश भेल पाओल जाइत अछि ।
ओतवे नहि मल्लप शासन कालमे अर्थात १३ अम शताब्दी क उतरार्ध सँ लऽ कऽ आधुनीक नेपाल एकीकरणक समय (१७६८ ई.) धरि नेपालक राज काजक भाषा सेहो मैथिली रहल ।
आ वर्तमान अवस्था मे सेहो मैथिली भाषा नेपालीक बाद दोसर स्थाीन पर अछि ।
२०५८ सालक जनगणना अनुसार नेपालक १२.३० प्रतिशत जनता मैथिली भाषा बजैत अछि ।
जे कुल जनसंख्याग २ करोड़ ३१ लाख ५१ हजार ४२३ क १२.३० प्रतिशत अर्थात २८ लाख ४७ हजार ६२५ अछि । मैथिली भाषिक सम्पूकर्ण क्षेत्रके समेटिक वनाओल गेल मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक कुल जनसंख्याअ ६७ लाख ६१ हजार ६७५ अछि । अर्थात प्रस्ताुवित अहि राज्यकमे मैथिली भाषाक प्रमुख स्थातन अछि ।
२०५८ सालक जनगणना सर्लाही आ रौतहट जिल्ला केँ बज्जीवका भाषाक सूचिमे रखने छथि जे कुल जनसंख्यासक १.५ प्रतिशत अर्थात २ लाख ३१ हजार ५ सय १४ होइत अछि । जकरा मैथिली भाषाक विद्वानसभ विभेदकारी नेपालक राजनीतिकेँ परिणाम मानि रहल छथि । हुनका सभक तर्क छन्हिू जे बज्जीुका भाषा मैथिली भाषक सहबोली अछि । तहिना नेपाली आ भोजपुरी बाहेक अहि क्षेत्रमे बाजलजाय बला , थारु, दोनवार, अंगिका सहितक भाषासभ सेहो मैथिलीएक सहबोली रहल हुनकासभक दावी छन्हि‍ ।
जँ मैथिलीक संग सहबोली भाषाकेँ सेहो मिला देल जाय तऽ अहि राज्योक करिव आधा जनसंख्या‍ मैथिली भाषीक हैत । बाकी आधामे अन्यी भाषा । प्रस्ता वित अहि राज्यलमे भोजपुरी भाषाक सहो महत्वलपूर्ण स्थािन अछि एकरा नकारल नहि जा सकैया ।
नेपालक कुल जनसंखयाके ५.८५प्रतिशत अर्थात १३ लाख ५६ हजार ६ सय ७३ भोजपुरी भाषी अछि ।
जनसंख्याुक आधारमानि कऽ प्रस्ताकवित अहि राज्ययक मुख्य५ भाषा मैथिली हैत से लगभग पक्काभ अछि ।

प्रस्ताावित राज्यर सँ मैथिलीक अपेक्षा
कोनो भाषाके दिर्घकालिन बनएबाक लेल ओहि भाषाके जनजनसँ जोडव आवश्य क होइत अछि । आ जनमुुखि बनएबाक लेल रोजिरोटी सँ जोरब, राज्यजक अधिकारीक अर्थात कामकाजी भाषा बनाएब अछि । बोलीचालीक भाषामे मात्र सिमित होइत गेल मैथिली भाषा जँ अहि राज्यअक मुख्या भाषा बनैत अछि तऽ मैथिली भाषाक लेल नव स्व र्णिम युगक शुरुवात हैत ।
मुदा अखनो विघ्न बाधासभ आवि सकैत अछि ।
मधेशवादी दलसभ अहि पुनर्संरचनाके स्वी।कार नहि कऽ रहल अछि । तऽ किछ आन दल सभ सेहो एकर विरोधमे अछि ।
अपना भाषाके स्थािपित करएबाक लेल समिति सँ प्रस्त वित संरचना यथावत संविधानसभा सँ स्वीरकृत होइक तहि लेल सम्पूार्ण मैथिली भाषीकेँ एक जुट भऽ आगा आएव आवश्ययक अछि ।
मिथिला राज्य स्थापपना संघर्ष समिति सहित मैथिली भाषाक क्षेत्रमे कार्यरत संघ संस्था्क प्रमुख दायित्वा बनैत अछि जे अहिके लेल आगा आवय,
प्रस्ताअवित राज्यय मे अन्यरभाषी सभ सेहो छथि । तएँ हुनक भाषाके संरक्षणक विश्वाीस दियबैत मैथिली भाषाके स्था्पित करायब आवश्य क अछि । मुदा काज कठीन अछि । एहि चुनौतीकेँ स्वी कार करहि परत।

कान्तत यशोदियाक बीच साओने मासमे विआह भऽ गेल।

सुजीतकुमार झा
नेपालमे मिथिला राज्य
की सम्भ व छैक ?

नेपालक संविधानसभाक राज्य‍ पूनर्संरचना तथा राज्य।क शक्ति बाँटबखरा समिति अपन प्रतिबेदनमे मिथिला भोजपुर कोच मधेश नामक राज्य रखलाक बाद मिथिला नाम सँ राज्य। बनत तकर सम्भा वना बढल अछि । नेपालमे १४ टा राज्य‍क आवश्यमक्ता रहल ओ प्रतिवेदनमे उल्ले ख अछि ।
राज्यम पूनर्संरचना तथा राज्यखक शक्ति बाटबखरा समितिक सदस्यम राम चन्द्र झा कहैत छथि –‘नयाँ संविधान निर्माणक लेल समितिक प्रतिवेदनकेँ आधिकारिकता महत्व्पूर्ण रहल तएँ नेपालमे मिथिला राज्य हैत, अहि गप्पमकेँ नजर अन्दाेज नहि कएल जा सकैत अछि ।’
मिथिला राज्यप संघर्ष समिति सेहो आव मिथिला राज्य हैत ताहिमे कोनो भाँगठ नहि रहल कहैत अछि । संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्व र कापड़ि कहैत छथि–‘नेपालमे राज्य क लेल जे तत्वछसभ चाही से मिथिला लग मात्र छल तएँ ई तऽ होबहेके छल । तखन मिथिला संग आओर नाम जोडि देल गेल अछि , ताहि पर हमरा सभकेँ आपत्ति अछि ।’ (नीचाँक नक्शाकेँ पैघ रूपमे देखबा लेल क्लिक करू)
‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्था नपर मिथिला मात्र रहैत तऽ बेशी प्रशन्नकता होइत’ कापडि आगा कहलन्हिस । ओना राज्यभ पूनर्संरचना तथा राज्याक बाँटबखरा समितिक सदस्यी एवं पूर्व मन्त्रीि राम चन्द्रह झा कहैत छथि –‘नाममे सेहो मिथिला अछि फेर एकर राजधानी सेहो जनकपुर तखन अओर सँ की लेना देना ।’ ओना विश्लेरषक सभ राज्य पूनर्संरचना तथा राज्युक शक्ति बाँटबखरा समिति देशक प्रमुख आधिकारिक शक्ति होइतो एकर रिपोर्ट पर बहुत रास अभ्याूस करबाक बाँकी रहल कहैत छथि । तएँ बहुत उत्सातहित होएबाक आवश्य क्ता नहि अछि ।
मिथिला राज्ययक स्था पनामे बाधा
एक दिस राज्यय पूनर्संरचना तथा राज्य क शक्ति बाँटबखरा समितिक प्रतिवेदन मे मिथिला राज्यि स्थातपनाक बात अएलाक बाद जहाँ किछ मैथिल संघ संस्थात सभ उत्सा हित अछि ओतहि एकर प्रतिवेदन अबिते नेपालमे विवाद ठाढ भऽ गेल अछि । नेपालक मधेशवादी दलसभ मधेश राज्यामे मिथिला उपराज्य क बात कऽ रहल अछि । नेपालक प्रमुख मधेशवादी दल मधेशी जनअधिकार फोरमकेँ केन्द्री य अध्यतक्ष उपेन्द्रे यादव कहैत छथि –‘हम स्वमयं मैथिल छी मुदा मिथिला क्षेत्रकेँ तखने विकास हैत जखन मधेश राज्यउक स्थाकपना हैत आ ओहिमे मिथिला रहत ।’
ओ एक मधेश स्वाहयत्त प्रदेश बाहेककेँ बात बर्दास्तष नहि कएल जा सकैत अछि कहलन्हिद । मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल, मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतान्त्रि क, तराई मधेश लोकतान्त्रि क पार्टी आ सदभावना पार्टी संयुक्त रुपमे एक मधेश प्रदेशकेँ लऽ कऽ आन्दो्लन कऽ रहल अछि ।
मधेशी दलसभक विरोध मिथिला राज्यक स्थाशपनामे सभ सँ बेसी बाधक बनि रहल अछि ।
मैथिल सभकेँ आपत्ति कतय
बहुतो मैथिलकेँ नाम पर आपत्ति छन्हिे । ओ सभ कहैत छथि ‘मिथिला भोजपुरा कोच मधेशक स्थातन पर मात्र मिथिला रहबाक चाही । मिथिला लग राज्यि बनबाक सभ सँ बेसी आधार अछि ।’ आधारकेँ प्रष्ट करैत रामानन्दर युवा क्ललब जनकपुरक अध्‍यक्ष दिपेन्द्रि ठाकुर कहैत छथि– ‘मिथिला संगे इतिहास भुगोल मात्र नहि वर्तमान मे सेहो सभ चीज अछि ।’
एखन मिथिला भोजपुरा कोच मधेश राज्यलक सीमा जे निर्धारण कएल गेल छैक से नेपालक झापा जिल्लात सँ पर्सा जिल्लाो धरि अछि । जाहिमे करिव ४६ प्रतिशत मैथिली भाषी छथि । ५४ प्रतिशतकेँ नजर अन्दााज नहि कएल जा सकैत अछि । जँ सभ भाषाकेँ राज्यक भाषाक रुपमे स्थालन देल गेलै तऽ मैथिली भाषाकेँ बेसी क्षति हैत । जानकार सभक अनुसार मैथिली बाहेककेँ भाषा सेहो राज्य क भाषा भऽ सकैत अछि । ताहि सँ मैथिली भाषाकेँ जे अलग रुप सँ फाइदा होइतै से नहि हैत ।
ज्ञातहुए नेपालमे नेपाली भाषाक बाद सभ सँ बेसी बाजल जाय बला भाषा मैथिली अछि ।

मिथिला राज्या स्थाषपनाक आन्दो लन कतय
मिथिला राज्या स्थाषपनाक आन्दो लन जाहि रुपमे बढबाक चाही से नहि बढि रहल अछि । खास कऽ डकुमेन्टेजशनकेँ विषयमे जेना किछो नहि भऽ रहल अछि । एमाले नेता शितल झा, साहित्य कार डा. सुरेन्द्रा लाभ, डा. विजय कुमार सिंह, पूर्व मन्त्री राम चन्द्रह झा वरिष्ठु राजनीतिक विश्लेुषक सीके लाल, माओवादी नेता राम रिझन यादव ,डा. विरेन्द्र पाण्डेे, साहित्य कार धीरेन्द्री प्रेमर्षि सहितक व्याक्ति सभक किछ कार्यपत्र आएल अछि मुदा ओहो संग्रहित नहि अछि । मिथिला राज्यन स्थारपनाक माँग केँ लऽ कऽ मिथिला राज्य संघर्ष समिति गठन तऽ भेल अछि मुदा एक वर्ष भितर आन्दो्लनकेँ नाम पर सडकपर कवि गोष्ठीक बाहेक तेहन उल्लेतखनीय काज किछ नहि भेल अछि । ओना संघर्ष समितिक सचिव रमेश रञ्जकन झा संघर्ष समिति खासे काज नहि कएलक अहि बातकेँ मानयकेँ लेल तैयार नहि छथि । ओ कहैत छथि ‘संघर्ष समिति मिथिला राज्य क लेल लविङ्गकेँ काज करैत आएल अछि ।’
ओना मिथिला नाट्यकला परिषद जनकपुर, रामानन्दि युवा क्लेबक अभियानकेँ सेहो नजर अन्दाषज नहि कएल जा सकैत अछि । मुदा महिना दू महिना पर एकटा दू टा कार्यक्रम कऽ देलौं ताहि सँ ठोस उपलब्धिन नहि भऽ रहल अछि ।

इतिहासमे मिथिला
मिथिलाक परम्पलरागत सीमा बृहदविष्णुापुराणक मिथिला महात्मद खण्डँमे वर्णित अछि । जाहिकेँ आधार मानि कवीश्वकर चन्दाप झा मिथिलाक सीमा सम्वुन्धममे अहि प्रकार वर्णन कएने छथि –

गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि, पूर्व कौशिक धारा
पश्चिबम बहथि गण्डिकी उत्तर हिमबत बल विस्तामरा
कमला त्रियुगाअमृतृता धेमुड़ा वागमति कृतसारा
मध्य बहथि लक्ष्मडणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा
अहि भूभागक विस्तािर अहि प्रकार पूर्व पश्चििम करिव २९० किलो मिटर , उत्तर दक्षिण करिव १९३ किलो मिटर होइत अछि । जाहि अनुसार एकर कुल क्षेत्रफल ५५ हजार ९७० बर्ग किलो मिटर रहल अछि । ई क्षेत्र एखन नेपाल आ भारतमेँ बटि गेल अछि ।
जहाँ धरि मिथिलाक स्था पनाक बात अछि विदेध माधव सरस्व ती तीर सँ आबि मिथिलामे आर्य सभ्‍यताक विस्तारर कएलन्हिा । आ विदेह वा जनक राज्य वंशक आधारशीला राखल गेल । अहि वंशमे जनक द्वितीय नाम सँ चर्चित शिर ध्वहज भेल छलाह । जिनक पुत्री भगवती सीता रहथि । विदेह राज्यल कुलक मिथिला पर शासनक समय ३००० ईश्वीज पूर्व सँ ६०० ईश्वीर पूर्व धरि अनुमानित अछि ।
नेपालमे मिथिला राज्य किया
मिथिलाकेँ स्वार्णिम इतिहास अछि । मात्र नेपालेके लेल जाए तऽ कहियो मैथिली भाषाके प्रसार राज्य। सभाधरि छल । राजधानी काठमाण्डूिक मूल भाषा मैथिली छल । मुदा अखन मैथिली जनबोली धरि सिमित भऽ गेल अछि । एकर कला परम्प्राक विकास होबय नहि सकि रहल अछि । भारतक मधुवनी पेन्टििङ्ग जतय विश्वि बजारमे तहलका मचौने अछि ओतहि विश्व प्रसिद्ध मिथिला पेन्टिेङ्गक एकटा सीमित बजार अछि । ओहु पर मैथिल सभक पहुँच नहि अछि । वरिष्ठओ राजनीतिक विश्लेसषक सीके लाल कहैत छथि ‘मिथिला राज्य क आवश्यहकता आँगुर पर नहि गनाओल जा सकैया’ । ओ समग्र मिथिलाक विकासक लेल मिथिला राज्य क आवश्यहकता रहल बतौलन्हि । हुनक अनुसार मिथिलाक गुमल पहिचान पुनः प्राप्तीेक लेल मिथिला राज्य क आवश्यहकता अछि ।
१. डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. - प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि


डा.रमानन्द झा ‘रमण’

तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी
‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा
राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक
सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि।
सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’,
गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’,
दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि।
डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा
प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय
हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान
तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन।
तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त
अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना
तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक
मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब-
1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि।
‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य।
2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प
व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि:
मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ।
व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4
3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी
तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि -
‘अबला, भीरु,
की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म,
अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए,
अबला भीरु कहाए मरब’6।
एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ
अभिभूत भए गुम्हरैत अछि -
अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म।
तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7
डा. सुुभद्र झा
सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित
साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि -
1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक
कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत?
एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि।
2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान
छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा,
3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि।
एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि।
सुुभद्र झाक कृृति:
संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल
तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10
सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि
कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of
Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना
विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि
विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल।
सुुभद्र झाक महत्व:
1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह।
मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल।
2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम
अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल।
3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ।
4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल
गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत।
5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन
‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15
6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक
प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि।
अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि
मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय
अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह।

1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84
2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’
3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When
our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies
made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we
turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of
Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2
.............................
४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५
5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5
6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68,
7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936
9. भारती,अप्रैल, 1937.
10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958
11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which
is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the
Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath
Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in
between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural
form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern
Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net
12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi

14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by
M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I
& II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha -
K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue
of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc.
@5

15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो
नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ।
हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक
चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम
ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान
नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी।
16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of
intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a
casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives,
a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm
and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000.


- प्रकाश चन्द्र
‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि



मैथिली नाट्य जगत मे ‘प्रयोग’ एकटा सशक्त एकांकी अछि, जाहि मे मात्र तीनटा पात्र नवीन मिसर, अमृत आ श्रुति छथि । ई तीनू गोटे कोनो नाट्य संस्थाक नाट्यकार / निर्देशक / अभिनेता / अभिनेत्री कोनो नाटक करबाक युक्ति मे लागल छथि । नाटककार या निर्देशक (जे कहि लियनु) नवीन अपन एहि दुनू पात्र के प्रेमक मादे किछु प्रयोग करबाक लेल कहैत छथि । तीनू पात्र प्रेमक विभिन्न आयमक कतेको प्रयोग करैत छथि । अंतत: ई प्रेम हिनका सबहक नाटकीय जीवन स’ निकलि व्यक्तिगत जीवन स’ नीक जेना ओझरा जाइत छथि । किछु ओहिना जेना विजय तेंडुलकरक चर्चित नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ मे घटैत अछि जे सभपात्र ग्रीन रूम मे किछु ओहिना अदालतक स्वांग रचैत छथि आ ओ धीरे धीरे ततेक ने बढ़ि जाइत अछि जे सभ पात्रक व्यक्तिगत जीवन सामने आबि जाइत छै । खैर !

एहि एकांकी मे नाटककार नचिकेता जी सेहो नवीनक माध्यमे स्वयं बजैत बुझाइत छथि । एक ठाम नावीनक संवाद छनि : “आइ-काल्हि जेहन नाटक होइत अछि ओ लोक घर जाक’ सपनेक संग बहा दैत अछि । एकर कोनो प्रक्रिया मोन नहि रहैत छैक । तेँ कोनो स्थायी वस्तु नहि द’ पबैत अछि आजुक नाटक । नाट्यकार लोकनि किछु टाइपमे बन्हा गेल छथि । अपन-अपन शिविरक । मुदा, ओ बात कहबाक लेल लिखैत छथि । केओ लाल छथि तँ केओ पीयर, केओ पूर्वी हावाक शौखीन छथि तँ केओ पश्चिमि हावाक । मुदा नवीन प्रयोग हुनका लोकनिक नाटकमे किन्नहुँ नहि भेटत ।” नवीन नामक एहि पात्रक कथन के आगू बढ़बैत लेखक कहैत छथिन “हमरा मोनमे भेल जे एकटा ओहन नाटक लिखी जाहि सँ नाटकक व्याकरणक सूते कटि जाए ।” – आ से एहि ‘प्रयोग’ मे भेबे कयल अछि । ‘प्रयोग’ नामक ई एकांकी ओहिना भ’ गेल जेना उड़ैत गुड्डीक तागा टुटि गेल हो । ओ क’ त’ जाएत से कोनो थाहे नै रहैत छै । ‘प्रयोग’ एकांकी स’ की भेलै, एकर कथ्य स्थापित भेलै, अभिनेता-अभिनेत्री स्थापित भेलाह, प्रकाश संयोजन स्थापित भेल, मंच व्यवस्था स्थापित भेल वा कि नै भेल से देखब जरूरी अछि ।

ओना आइ-काल्हि एहन प्रथा खूब चलल अछि जे कोनो एकटा शव्द वा परिस्थिति के पकड़िक सभ अभिनेता मंच पर अपन परिकल्पना स’ कथा के आगू बढ़्बैत छथि । तय मात्र एतबे रहैत अछि जे ई क्रिया कतबा समय तक होयत, आधा घंटा, एक घंटा वा जतेक हो । मुदा, एकरा सम्पूर्ण नाटकक संज्ञा नहि देल जा सकैत अछि । हँ, ई क्रिया कोनो अभिनेता अभिनेत्रीक प्रशिक्षणक रचना प्रक्रियाक लेल उत्तम भ’ सकैत अछि । एहि स’ हुनक निर्णयक क्षमता बढ़तनि, हुनका भीतर अपना आप मे विश्वास जगतनि, ओ अपन सहकर्मीक लेल कोना सहायक भ’ सकताह से अनुभव हेतनि, एकटा कथा के दोसर कथा सँ कोना जोड़ताह आदि आदि ।

‘प्रयोग’ मे तीनटा दृश्य राखल गेल अछि । पहिल दृश्यक अंत तक पात्र नवीन यैहटा कहि पबैत छथि जे ओ एहि प्रयोग मे की करताह । तय होएत अछि जे नाटक विषय वस्तु भेल – प्रेम आ कथाक रूप रेखा मे पहिने मिलन ओकर बाद विरह आ अंत मे फेरो मिलन । एहि स’ इहो एही दृश्य मे दर्शक के जानकारी द’ देल जाइत छनि जे नाटक सुखांत अछि । एहि स’ इहो अनुमान लगाओल जा सकै छै जे दर्शक वाकि प्रेक्षक केँ जे कोनो उत्सुक्ता हेतनि एहि प्रयोग के ल’ क’ ओ निश्चित आधा भ’ गेल हेतनि । आब ओ मात्र उपर्युक्त रूप रेखाक प्रक्रिया देखबा लेल रहताह । मुदा एहन कोनो स्थिति नहि अबैत छै । अंत एकटा प्रेमिकाक हत्या स’ होइत अछि ।

नाटकक दोसर दृश्यमे अमृत आ श्रुतिक बीच प्रेम के केन्द्र मे राखि संवाद शुरु होएत छनि । मुदा पहिने तय कयल गेल रूप रेखाक क्रम बाधित होइत अछि आ अकस्मात निर्देशक नवीन प्रवेश करैत छथि । एहि तरहे दोसर दृश्यक अंत तक निर्देशक नवीन मिसरक अनुसार नाटक शुरू भेले नहि रहैत अछि । ओ फेर स’ प्रयोग आरम्भ करबाक आदेश दैत छथि ।

आब नाटकक तेसर यानी अंतिम दृश्य शुरू होइत अछि । एहि दृश्यमे तीनू पात्र पर हुनकर सभहक व्यक्तिगत जीवन बेसी प्रभाव मे आबि जाइत छनि । श्रुति अत्यधिक आवेशित भ’ जाइत छथि । अमृत सेहो अपना आ श्रुतिक बीच नवीन के बाधा रूप मे बूझैत छथि आ हुनका पर अन्हार मे हमला क’ दैत छथि । एक बेर फेर श्रुति अमृत पर आवेशित होइत छथि । अमृत पर कतेको तरहक आरोप लगबैत छथि । अमृत स’ सहन नहि होइत छनि आ ओ श्रुतिक गरदनि दबाक’ हत्या क’ दैत छथि । आब शुरू मे निर्देशक नवीन जीक संवाद कतेक कारगर भेलन्हि आ ओ प्रेक्षक पर कतेक प्रभावी भेल, नाटक देखला बाद दर्शक ‘प्रयोग’ के आने नाटक जेना सपना मे बहा देलन्हि , एकर कोनो प्रक्रिया मोन रखलाह कि नै रखलाह से अंवेषणक विषय थिक ।

एकांकी मे पात्रक संख्या सेहो तदनुसारे अछि ; ने बेसी आ ने कम, तीनटा । गम्भीरता स’ देखल जाय त’ नाटकक पात्र नवीन मिसर दू तरहे मंच पर अबैत छथि – पहिल त’ निर्देशक रूप मे (जिनकर सोच अछि प्रेम ल’ क’ किछु प्रयोग करबाक) आ दोसर प्रेम के ल’ क’ चलि रहल प्रयोग मे एकटा पात्रक रूप मे सेहो । पहिल दृश्य मे जे स्थापना निर्देशक नवीन मिसर करैत छथि ओ अंत मे जाक’ कोनो निष्कर्ष पर नहि ल’ जा पबैत छथि, ने प्रेक्षक के आ ने अपना आप के । पात्र अमृत हरदम अपने मे छथि । ओ पूरा नाटक मे अपन व्यक्तिगत जीवन जिबैत छथि । अंतिम दृश्यक परिणिति सेहो हुनक व्यक्तिगते होइत अछि तेँ ई पात्र नीक जेना स्थापित होएत छथि । श्रुति नामक महिला पात्र मंच पर निर्देशक नवीन मिसरक निर्देशानुसार चलैत छथि मुदा अपन पिछला आ वर्तमान व्यक्तिगत जीवन दुनू के मंच पर अनैत छथि । ओ ‘कि करू... कि नै करू’ के स्थिति मे किछु निर्णय नै ल’ पबैत छथि । लेखक श्रुति केँ एकटा अस्थिर पात्र गढ़ने छथि । परिणाम होइत अछि जे एकांकीक अंत तक जाइत जाइत हिनकर हत्या भ’ जाइत छन्हि । एहि तरहेँ ‘प्रयोग’ मे तीनटा पात्र छथि जाहि मे नवीन मिसर छोड़ि दुनू पात्र नीक जेना स्थापित होइत छथि ।

नाटक मे मंच परिकल्पना संग प्रकाश प्ररिकल्पना सेहो लेखक अपना हिसाबे केने छथि । जाहि मे मंच के तीन हिस्सा मे बाँटल गेल अछि आ समयानुसार ओकर प्रयोग सेहो कयल गेल छै । एक कात एकटा कुर्सी अछि आ एकटा काठक बक्सा सेहो उनटल छै , बीच मे सीढ़ीक तीनटा चरण आ एकटा काठक फ्रेम आ दोसर कात मे फूल-पात युक्त एकटा ठाढ़ि लटकल अछि । एहिना प्रकाशक सेहो तीन का क्षेत्र बनाओल गेल छैक एकटा मे कुर्सी+बक्सा+सीढ़ी अछि । दोसर मे सीढ़ी आ मंचक सामनेक हिस्सा । तेसर मे सीढ़ी आ ठाढ़ि अछि । एहि तरहक प्रयोग मैथिली नाटकक लेल पहिल नै अछि तखन एहि एकांकीक मंचनक सन्दर्भ मे ई अति महत्वपूर्ण सुझाव अछि कोनो निर्देशक लेल । एहि मे कोनो शक नहि जे नाटककार नचिकेताजी नाटकक लगभग सभ विधा मे नीक हस्तक्षेप रखैत छथि ।

एहि तरहेँ निष्कर्ष यैह जे ई ‘प्रयोग’ एकांकी मात्र एकटा विचार बनि क’ रहि लेल अछि मैथिली रंगमंचक लेल । ओना नाटक मे द्वन्दक प्रयोग खूब नीक जेना बनल रहैत अछि । नाटक अपन ग्राफ के शुरू स’ बरकरार रखैत अछि । रंगमंचीय दृष्टि स’ ‘प्रयोग’ एकांकीक कथ्य स’ बेसी ओकर मंच परिकल्पना आ प्रकाश परिकल्पना बेसी महत्वपूर्ण अछि । ओना ‘प्रयोग’क मादे हमर ई विचार मात्र एकर एकटा पाठक रूपे राखल जाय । हँ ! एकर प्रस्तुति देखला वा मंचित केला बाद किछु आरो सार्थक तथ्य निकलि सकैत अछि । तखन ई निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य मे ई अपना तरहक पहिल कृति मानल जयबाक चही, जे रंगमंच स’ जूड़ल प्राय: सभ रंगकर्मी केँ किछु सोचबाक लेल प्रेरित करैत अछि ।
बिपिन झा
जनमानस हेतु प्रत्यभिज्ञादर्शनक वैशिष्ट्य
जा धरि भारतीय ज्ञान परम्पराक चर्चा नहि कयल जाइत अछि ता धरि ’ज्ञान’ पदक विवरण सम्पूर्ण नहिं होइत अछि। पुनश्च यदि भारतीय ज्ञानपरम्पराक चर्चा करी तऽ काश्मीर शैवदर्शनक चर्चाक बिना ई अधूरा रहत। तेरहम शताब्दीक बाद एकर परिगणना विद्वान सभ भारतीय दर्शन के अन्तर्गत केनाई बन्द कय देलथि कियाक तऽ सभक दृष्टि संकुचित भय मात्र छ टा दर्शन के आस्तीक आ तीन टा दर्शन के नास्तीक के रूप में प्रतिष्ठित करवा में व्यस्त भय गेलन्हि। वस्तुतः काश्मीर शैवदर्शन (एकरे अपरनाम प्रत्यभिज्ञादर्शन अछि) कऽ परम्परा एतेक समृद्ध अछि जे अभिनवगुप्त पाणिनि सदृश विद्वान के प्रतिष्ठित कयलक अछि।
काश्मीर शैवदर्शनक विकास आठम सदी सँऽ बारहम सदी केर मध्य भेल। ई दर्श पूर्णतः व्यावहारिक पक्षपर बल दैत रहल अछि। एहि दर्शन में मूल तत्त्व के रूप में परमशिव कें स्वीकार कयल गेल अछि। सम्पूर्ण चराचरजगत शिवरूप अछि ई एहि दर्शनक मूल धारणा छैक। कुल ३२ तत्त्व के स्वीकृत भेटल अछि-
• शिव
• शक्ति
• सद्विद्या
• ईश्वर
• मायाè कला, विद्या, राग, काल, नियति
• पुरुष
• प्रकृति è ( पंच तन्मात्रा, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच कर्मेन्द्रिय, मन, पंच महाभूत)
एहिठाम प्रश्न उठनाई स्वाभाविक छैक जे सम्पूर्ण चराचर जगत शिवरूप केना भय सकैत छैक जखनि कि व्यवहार में पार्थक्य स्पष्टतः दृष्टिगत होइत अछि। एकर समाधान एहि दर्शनक तत्त्वमीमांसा करैत अछि जे ई स्पष्ट करैत अछि जे जतेक मात्रा में वस्तु वा व्यक्ति मलाच्छादित होइछ तावत मात्रा में ओ न्यूनरूप में प्रकाशित होइछ। एहि क्रमक विवेचन हेतु विशद रूप सँ प्रकाश-विमर्श आ आणव कार्म तथा मायीय मल केर चर्चा कयल गेल अछि जे एहि दर्शनक अनुपम ग्रन्थ ’श्रीतन्त्रालोक’ में सुलभ अछि।
एतय पुनः प्रश्न अछि जे जन सामान्य हेतु एहि दर्शनक की उपादेयता? एहि प्रश्नक समाधान करैत ई दर्शन कहैत अछि जे सर्वप्रथम तऽ आत्मविश्वास राखी जे हम स्वयं ओ परम सत्ता छी हमरा सँ कोनो कार्य असम्भव नहिं। अस्तु निराशा क कतहु स्थान नहि। अही संग दोसर संदेश ई छैक जे विभिन्न मल के दूर करवाक यत्न करी जाहि सँ शिवोऽहं केर भाव आवि सकय।
अस्तु एहि तरहें ई कहल जा सकैत अछि जे ई दर्शन अपन दार्शनिक मर्यादा रखितो जनमानस केर व्यावहारिक समस्या दिस विशेष ध्यान दैत अछि।
बिपिन कुमार झा
Cell for Indian Science and Technology in Sanskrit,
HSS, IIT, Bombay
http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...