Friday, December 31, 2010

'विदेह' ७२ म अंक १५ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७२) Part III


३. पद्य



  



३.६.१. संजय कुमार मंडल- कवि‍ता- मीता हमरा मोन पड़ैए २. राजदेव मंडल-कवि‍ता- नेहाइपर लेखनी

३.७.शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- साहि‍त्‍यक वि‍दूषक रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता 

  

डॉ. नरेश कुमार वि‍कल

दूटा गजल-
(1)
नयन केर नीन्न पड़ाएल की छीनि‍ लेल कोनो
मोन केर बात मोनमे रहि‍ गेल कोनो
      उन्‍हरि‍या राति‍ ई गुज-गुज एना कत्ते दि‍न धरि‍ रहत
      कम्‍बल कएक काजर केर तानि‍ देल कोनो
काँटक झार राखल छै चौकठि‍ केर दुनू दि‍स
तैयो अयाचि‍त डेग नापि‍ देल कोनो
      छाहरि‍ ने झरक लागय हमरा नीम गाछीमे
      बसातक संग बि‍रड़ो फेर आनि‍ देल कोनो
हमर खटक सि‍रमामे करैए नाग सभ सह-सह
काँचक घरमे पाथर राखि‍ देल कोनो
      बि‍हुँसल ठोर ने खुजतै कोनो कामि‍नी आगाँ
      प्रीतक सींथमे भुम्‍हूर राखि‍ देल कोनो

(2)
पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जि‍नगी।
कहू हम लऽ कऽ की करबै एहन उधार सन जि‍नगी।।
पड़ल छै लुल्ह-नाङर सन कोनो मंदि‍र केर चौकठि‍पर।
माँगय भीख जि‍नगी केर हमर लाचार सन जि‍नगी।।
साटल छैक फाटल सन कोनो देवालपर परचा।
केओ पढ़बा लेल चाहय ने हमर बीमार सन जि‍नगी।
बाटक कातमे रोपल जेना छी गाछ असगरूआ।
ने फड़ैए-फुलाबैए हमर बेकार-सन जि‍नगी।।
कतबा ि‍दनसँ हैंगरमे छी कोनो कोट-सन टाँगल।
कुहरैत कोनमे पड़ल ई ति‍रस्‍कार-सन जि‍नगी।।
ई ि‍जनगीकेँ कोनो ि‍जनगी जकाँ हम जि‍नगि‍ये बूझी।
ने जि‍नगी देल जि‍नगीमे जि‍नगी सन हमर जि‍नगी।।
..
पंकज झा,
३टा पद्य
 पिता-श्री महेंद्र मोहन झा, माता-श्रीमती अम्बी देवी झा : माड़र, जितबारपुर, मधुबनी, बिहार ८४७२११
पंकज जी एच.सी.एल.मे सोफ्टवेयर इंजिनीयर छथि।
 
उद्वोधन
कहियो पूर्णिमा सन आलोकित,
मैथिल, मिथिला आ मैथिली,
घोर अन्हरियामे हराओल अ,
किछ दूर
टिमटिमाइत तारा सन,
किछ मिटैल पगडण्डी,
रि-धुरिमे ओझराल अ,
सभ्यातक सूर्य,
कहिया परिचयके
बदलि देलक,
किछ आभासो नै भेल,
मुदा !
जहन-जहन पा
छू तकैत छी,
ह्रदयमे कि
छु उथल-पुथल,
बहरा
लेल व्याकुल अ,
मुदा !
भीतरे-भीतर घु
टि जाइत अ,
स्व
च्छन्दता- स्वतंत्रता नै अ,
अपन अहंग,
सैहबी डोरीमे ब
न्हाए,
जाबी लगौने,
बरद जका
ऑफिसक दाउनमे लागल छी,
अपन सहजता-सरलतास
डेराइ,
जे पाछू नै भ जा,
अपन परिचयस
भगैत,
नव परिचय बना
बैमे लागल छी,
मुदा !
ओ स्वर्णिम गौरव गाथा,
कोना लिखब,
माता-पिता आ
पूर्वजक प्रति श्रद्धा बिनु,
भा
षाक प्रेम सिनेह बिनु,
कोन रंगस
रंगब
अपन कैनवासके
…..
कोन गीतस
सजैब
अपन जीवनके
……
मुदा !
हम सुतल नै
छी,
मरल नै
छी,
जागल
छी,
हमर अल्हड़ता, हमर सहजता,
हमर नम्रता
हमर परिचय अ,
सभ्यातक आलोकस
आलोकित,
आब हम समर्थवान छी,
किक ने अपन समृद्धि,
अपन परिचयके
ँ सींची,
अतीत त
स्वर्णिम छल,
आब आ
आ आबैबला काल्हि,
के
सेहो स्वर्णिम बनाबी,
गोटे मिली कऽ,
एक दोसरके
मैथिलीक रपान कराबी.
रीढ़ विहीन पुरु
पुरूपुरुषार्थ कतय हेरायल अइ,
नइ बुझना जाइत अइ,
दहेजक बैशाखी पकड़ी,
अमरल
त्ती जका,
रीढ़ विहीन,
परिचय.....
सुनैत छ
लौं,
स्त्रीक नोरक समुद्रमे,
पुर
षार्थक नाव हेलैत छैक,
मुदा!
जँ नावमे भूर भ
गेल,
ँ ओ पुरु आ समाज दुनूकेँ डुमा दैत छैक,
मुदा!
रीढ़ विहीन पुर
षार्थक नावे की,
जेकर कोनो पतबारे नै अइ,
दिशा हीन,
र्जा विहीन,
दोसरक धनस
सिंचित भ,
अपन स्वाभिमान बनाब
मे लागल अइ,
बिना सुगंध,
कृत्रिम फूल जका,
सोझे सजाबट लेल.......
सृजनात्मकतास
दूर,
प्रकृतस
बिमुख,
सिनेमाक रील जका
,
अपन जीवन बीतबैत अइ,
हे बिधाता !
अहीं त
रचने छी,
पुरु
पहाड़-पर्वतके छाती चीरि,
स्त्री नदी श्रीजनक सुन्दर संसार रचैत
छथि,
किक ने आ,
दहेजक दाबानलमे,
पुरू
क रीढ़ बिहीन पुरषार्थके जरा क,
ओकर समूल बिनाश क
,
पुनः मेघक घोर गर्जनमे,
शिवक तांडवस
,
पुरू
क पुरषार्थके ठाढ़ करी,
आ झर-झर बुन्नी बसातमे,
नव कोपलक संग,
मधुर गीतक गुंजनमे,
स्वाभिमानी रीढ़युक्त समाजक परिचय बनी.
सहजता
ज्ञान आ विज्ञान,
अनुसंधाने स
ढ़ै  छै
साहित्यक सृजन,
मंथनेस
हो छै
चाहे रूप ग
ढ़ू,
आकि रंग घोरू,
प्रेम करू,
वा नोर बहाऊ,
मोनक उद्वेग,
संयमेस रुकै छै
पीड़ा ह्रदयक,
सहजतेस
कमै छै
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।
सैण्टाक अस्तित्व
 
सैण्टाक अस्तित्व आ मिथ्या खिस्सा
सभकेँ सत मानि कऽ पैघ भेल बच्चा
जखन सत्तक तथ्य सामने आयल
नव-जन्मल युवाक मोन भेल घायल
बादमे हतास करैत छल सब लोककेँ
मोन भेल जे खतम करू अहि लोभकेँ
ने कुनो बौआ सैण्टाक आस लगेता
ने पैघ भऽ अहि नाटकीयतापर पछतेता
फेर भेल जे कोना चन्दाकेँ मामा कही
देखि-देखि बच्चामे खाना खाइत रही
फेर बादमे पढ़लहुँ जे ई मात्र उपग्रह थिक
गोल परिक्रमा करैत रहैत अछि पृथ्विक
जहिया बौआ अपने ठेकनगर हेता
खेलौना बॉंटि-बॉंटि स्वयं सैण्टा भय जेता
अपना सब जकॉं नहिं जे पहिने बच्चामे
सुनलहुँ सब खिस्सा भगवानक नामे
जेना-जेना बढ़लहुँ बुद्धिमत्ता दिस
केलहुँ ईश्वर पर शक़ भेलहुँ नास्तिक।
राजेश मोहन झा- कवि‍ता-
उनटा-पुनटा

कोइली काली बगुला गोर

हे भगवान ई केहेन अन्‍होर

ताड़ खजूरक मान बढ़ल छै

पीपर आमक प्राण उड़ल छै।

कलयुग एकरे कहल जाइत छै

उनटा-पुनटा सभ सटल जाइत छै

सोन बनल छै टलहा चानी

प्रजा भुक्‍खल नेता खाथि‍ वि‍रयानी।

छूटल सॉस टूटल आश छै

सभ ठाढ़ि‍पर उल्‍लूक वास छै

फगुआ बनल जेठक दुपहरि‍या

अनाहूत उपेक्षि‍त मधुमास छै।

कंठी माला माथे चानन

अपने आइना अपने आनन

हाथमे पोथी देखि‍ रहल छी

दुहू जेबी भरल ताश छै।

धर्म-अधर्मक अंतर गाएब

जतेक लगाएब ओतेक पाएब

बि‍नु ढौआक फाइल छै रूकल

प्रजातंत्रमे कतेक विश्‍वास छै।
नवीन कुमार आशा (१९८७- )
दूटा पद्य
पिता श्री गंगानाथ झा, माता श्रीमति विनीता झा। गाम- धानेरामपुर, पोस्ट- लोहना रोड, जिला- दरभंगा।
अंतरकलह आ विचार

जुनि पुछू हमर हाल
हम छी भय गेल बेहाल
देखि ई समाजक कुरीति
मन भय जाय आगि
बनैत ई कीड़ाक
खाधि बना कय आचार।

बनल अछि ई चर्चा
छपल अछि जगमे पर्चा
भगलए यौ फेर एकटा बेटी
फेर ककरो संग यौ
एहिमे नहि लियल मजा
ई तँ अछि एकटा सजा
जँ भागल दोसरक बेटी
ओकरो बुझियौ अपन सुता।

बदलू ऐ कुरीतिकेँ
बेटा होथि वा बेटी
दियौन्ह हुनका ज्ञान
जुनि बनु अज्ञान
आइ जँ लेब मजा
फेर बनत ओ सजा।

ई अछि जगक रीति
निक काजमे नहि देत संग
अधला लेल आओत आगु
जखन करब अहाँ किछु अधला
बनि जायत ओ पिछला
फेर नहि देत संग
भय जायत अपनेमे मग्न
बना लेत ओकरा चर्या
कय देत अहाँक पुर्जा-पुर्जा।

कोना बदलत ई समाज
जकर होइ अछि नाश
निक गप्प नहि करए क्यो
अधला लेल सदैव तैयार।

की भेल जाइत छै एहि समाजकेँ
अपन सभ्यता सब क्यो बिसरए
पश्चिमी होए हावी
की होएत भावी समाजकेँ
चिन्तित मन सोचै अछि।

आजुक धिया-पुता नहि बुझए
ओकरा आरो किछु नहि सुझए
नहि सोचए घरक मान
ओकरा बस अछि अपन ध्यान
सजा कए माइ-बापक अर्थी
बनि जाए ओ स्वार्थी
नहि सोचए हुनका बारेमे
जे हुनकर करथि पालन।

देखि समाजक ई कुरीति
मोन भय जाइ अछि पागल
जा धरि नहि मिलत समाज
नहि अछि तावए इलाज।

कोना बदलत ई परिभाषा
कोना बदलत ई समाज
जकर करै नव पीढ़ी नाश
लाबए पड़तै हुनका सड़कपर
कहए पड़तै हुनका बेधड़क
जुनि करू पूर्वजक अपमान
हुनकर तँ राखू मान।


बैसल-बैसल सोची मनमे

बैसल-बैसल सोची मनमे
मुदा नहि लत्ता तनपर
आगि बड़ैत एहि गर्मीमे
बैसल हम उघार आंगनमे
सूर्यक तपिस न झेलल जाय
न अधलाह किछु देखल जाय
जा धरि नहि उठायब डंडा
नहि भेटत मनकेँ ठंढ़ा
आब ओ गेलै जमाना
जाहिमे होइ तराना
सभ दिस अछि दू मुँहा रस्ता
ई जीवन नहि अछि सस्ता
सभ दिस अछि एकटा मोल
जँ अछि पाइ तँ अहाँ अनमोल
बदलल जाए प्रेमक परिभाषा
अछि जँ क्षमता तँ करू आशा
भ्रष्टाचार अछि पयर पसारैत
शिष्टाचार गेलै कहाँदन
आब नहि अछि
बेटा बापक हाथमे
किछु दिन बाद होएत ई
बेटाक आगाँ बाप झुकायत माथ
बेटा बैसत कुर्सीपर
बाप डोलायत पंखा
देखी जे ई फड़ैत विष
सोची मनमे हरदम
कोना होएत ऐ समाजक विकास
कतहु ने एकटा आस
सभ दिस होइक निन्दा
एहिसँ होअय शर्मिन्दा
बैसल बैसल सोची मनमे।
१. संजय कुमार मंडल- कवि‍ता- मीता हमरा मोन पड़ैए २. राजदेव मंडल-कवि‍ता- नेहाइपर लेखनी

संजय कुमार मंडल

कवि‍ता
मीता हमरा मोन पड़ैए

मीता हमरा मोन पड़ैए
जखन नेना रही
माएक कोरामे नुकाइत रही
पापा बाबाकेँ घोड़ा बना
घोरसवारी करैत रही।

रूसैत रही, फुलैत रही
टॉफी वि‍स्‍कुट नहि‍ भेटलापर
भूइयाँमे ओंघराइत रही।

जखन पहि‍ल बेर स्‍कूल गेलौं
खूब उछल-कूद धूम मचेलौं
टि‍फि‍नक वेलामे ति‍तली केर पांछाँ
दौड़ पड़लहुँ
जन्‍म दि‍वसक हर अवसरपर
ढेर सारा उपहार हम पएलहुँ।

ओहो दि‍न मोन पड़ैए जखन
मैट्रीक परीक्षामे फेल केलापर
भागि‍ पड़ा हम ि‍दल्‍ली गेलहुँ
फैक्‍ट्रीमे मजदूर सबहक संग
ओवरटाइम कऽ खूब कमेलहुँ।

गाम एलापर वि‍आह कएलहुँ
साले भरि‍मे बाप बनि‍ गेलहुँ
आब कनि‍याँ नोन तेल लैले
सदि‍खन हमरा गाड़ि‍ पढ़ैए
मीता हमरा मोन मड़ैए।

बपटुअर रहबे करी, माए सेहो मि‍र गेलि‍
जाहि‍ बेटा लेल खूब कमेलहुँ
जमीन खरीद मकान बना देल
सोचने रही बुढ़पा केर सहारा बनत
सेवा सुश्रुषा करत
ओहो बाप-माएकेँ छोड़ि‍ दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल।

प्‍लास्‍टि‍क फैक्‍ट्रीमे खटैत-खटैत
हमरा टी.बी. बेमारी भए गेल
हम मजबूर भऽ नोकरी छोड़ि‍ देल
पथो-पानि‍ले हमरा करजा करए पड़ैए
छौड़ा दि‍ल्‍लीमे दारू मुर्गा कचरैए
मीता हमरा मोन पड़ैए।

तीन माससँ वि‍छौन धेने छी
एक घोंट पानियोले दोसराक मुँह तकै छी
रोटी-भात के पुछैए, आब दवाइयो नहि‍ए घोटाइए
मीता हमरा मोन पड़ैए।

तकलीफ खूब होइए-प्राणो नहि‍ नि‍कलैए
दुर्भाषा कोना कहि‍ये- सोचैत छी
आखि‍र तँ बेटे छी।

ओहो दि‍न यादि‍ अबैए
हम पत्‍नीक इंतजारमे छी
ओ हमर माएक पएर जतैए
हमर बेटा-पुतोहू, सांझे
बि‍लैया ठोकि‍ समदाउन गबैए
मीता हमरा मोन पड़ैए।

जीवन भरि‍ बाहरे बि‍तेलौं
सर-समाजसँ दूर रहलौं
आइ वएह समाज उठा-बैसा दैए
हमर दुर्दसापर दुखी होइए।

एक दि‍न प्राण छुटि‍ गेल
सौंसे टोल जमा भऽ गेल
अर्थीपर हमरा सुता देल गेल
समाजक चारि‍ गोट कान्‍हा देल

बरि‍याती सभ राम-नाम सत् बजैए
बेटा कोहामे आगि‍ लए आगू चलैए
भने बुढ़बा मरि‍ गेल सोचि‍ रहल अछि‍
झुठे-फुसे घड़याली नोर बहबैए

नि‍पुत्रो समाजे बीच रहैए
हँसी-खुशी सभ बांटि‍ जीबैए
दु:ख-सुखमे एक दोसराकेँ काज अबैए
बेकार मनुक्‍ख अपना-अपनीले
बाप-बाप करैए
मीता हमरा मोन पड़ैए।

आब ई एहसास करै छी
जीवन कर्तव्‍य केर पथ छी
जि‍म्‍मेवारीक रथ छी
नि‍रन्‍तरताक सड़क छी।

जौं फेर मनुक्‍ख जीवन पाएव
समाजक उपकार जरूर चुकाएब
सोझहेमे हमर चि‍ता जरैए
मीता हमरा मोन पड़ैए
मीता हमरा मोन पड़ैए।।
 
राजदेव मंडल
कवि‍ता
नेहाइपर लेखनी

कान्हपर अॅगोछा लए
ठमकल छी कजरी लागल
एहि‍ चबूतरा घाटपर
सम्‍मुख अछि‍ पीड़ा जल प्रसार।
सहरि‍-सहरि‍ जोंक जाहि‍मे
कऽ रहल अछि‍
अन्‍मुक्‍त जल बि‍हार।
एहि‍ पीड़ा जलसँ
नहि‍ जानि‍ कहि‍या भेटत मुक्‍ति‍
कहि‍या धुआएत
गातक तहि‍याएल मलीनता
जाधरि‍ ई रहत जमल
गन्‍हाइत पीड़ा-जल
खण्‍डि‍त नहि‍ भऽ सकत
जोंकक जल बि‍हार
छी डेराएल
अंग-अंगपर
जोंक दंश अनुभव कए
परन्‍च ई तँ अछि‍
भीरूपन
आत्‍मघाती जड़ता।
तोड़ए पड़त आब
भूतहा कूल ओ मोहारकेँ
कोड़ए पड़त आब
जल नि‍कास
बहाबऽ पड़त एहि‍
गन्‍हाइत जलकेँ
भरए लेल पोखरि‍केँ
नव वर्षाक जीवनसँ
जोंक वि‍हीन अमृतसँ
तखैने भऽ सकत-पुण्‍य-स्‍नान
ताहि‍ कारणे आइ
हम लेखनीकेँ राखि‍ देलहुँ
ि‍नर्मम नेहाइपर
बनाबऽ लेल
असि‍, तीक्ष्‍ण कोदारि‍
काटऽ लेल
भूतहा मोहारकेँ
करऽ लेल स्‍वर्गिक स्‍नान।
शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू- कवि‍ता- साहि‍त्‍यक वि‍दूषक रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'- हम छी आजुक नेता

शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू
कवि‍ता

साहि‍त्‍यक वि‍दूषक

कि‍ए हमरा कहै छी वि‍दूषक।
की हम केलहुँ अहाँसँ खटपट।।
शैशव अप्‍पन गाममे बि‍तएलहुँ
सभ ठाम देसि‍ल गीत सुनएलहुँ
मूड़न हो वा महुअक।
मात्र वि‍देहसँ रखलहुँ आशा
सभ दि‍न पढ़लहुँ मैथि‍ली भाषा
व्‍यारव्‍याता बनि‍ भेलहुँ चकमक।
श्रृंगार पहरमे कवि‍ता लि‍खै छी,
छी गृहस्‍थ मुदा बैराग सि‍खै छी
हमर जीवन दरससँ ओ भेलि‍ भक्।
कहि‍या धरि‍ बॉटव जागरणक परचा
कतहुँ नहि‍ देखलहुँ अप्‍पन चरचा
दक्षि‍ण नयन भेल फकफक।
दि‍नचार्य लि‍खि‍ कवि‍ बनि‍ गेला
आन्‍हर गुरू संग बताह चेला
उल्‍लू लग कोकि‍ल ठकमक।
कतेक दि‍न भरत वि‍लाप सुनाएव
फोका डबडब परि‍चय प्रसूनक।
आउ-आउ दीर्घ सूत्री भेद मेटा दि‍अ
हमहूँ मैथि‍ल गऽर लगा लि‍अ
बनाउ मि‍थि‍लाकेँ सम्‍यक।



रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'-
हम छी आजुक नेता
रूपेश कुमार झा, पिता : श्री नवकांत झा
पितामह : स्व हरेकृष्ण झा, साहित्यिक नाम : रूपेश कुमार झा 'त्योंथ' (मैथिली कविता) ओ नवकृष्ण ऐहिक (आलेख/व्यंग्य)
साहित्यिक प्रकाशन : मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका मे दर्जनो कविता ओ मैथिली दैनिक मिथिला समाद मे 'खुरचन भाइक कछ्मच्छी' स्तम्भ केर अंतर्गत, तीन सय सं बेसी व्यंग्य लेखन-प्रकाशन शिक्षा : स्नातक (कंप्यूटर अप्लिकेशन) कार्य : पूर्व मे विभिन्न दैनिक पत्र मे कार्य-अनुभव, मैथिली साप्ताहिक झलक मिथिला केर संपादन,वर्त्तमान मे कोलकाताक एक प्रतिष्ठित उच्च शैक्षणिक प्रकाशनक शोध ओ संपादन विभाग मे कार्यरत स्थायी पता: ग्राम+पत्रालय : त्योंथागढ़ , भाया : खिरहर, जिला: मधुबनी (मिथिला)
हम छी आजुक नेता

हम छी आजुक नेता, नहि नीक हमर नेत
फूसिक खाद प्रपंचक पानि सं, हरियाइछ हमर खेत
बेचि रहल छी निज आदर्श, लग जोर केs लेत
निःशब्द भेल लोक ताकि रहल, छी चला रहल हम बेंत 

शोणित पियासल शेर हम, s फिरै छी मुंह मे घास 
नव-नव खुराफातिक तिकड़म, अछि हमरा लग बहुते रास
निज स्वार्थक लेल सदा अनेरे, खसा सकै छी लाश 
चाही हमरा सत्ता मात्र, खाहे दशक भs जाय नाश

करिखा सन कारी मोन हमर, पहिरै छी अंगा उजरा
भांति-भांति केर सुविधा संग, चाही व्यंजन, दारू ओ मुजरा
छी ठानि लेने नहि मानब हम, मारब जन-जन कें हुकरा
मुदा बोल बजै छी मिठगर, जेना जिलेबिक टुकड़ा

चालि चलय मे माहिर हम, जं खेल हो पोलिटिक्स 
कनखी-मटकी संग देखा कs करतब, जीत करै छी फिक्स
भजै छी बल्ला आंखि मुनि, होइए नो बाल पर सिक्स 
मजा अबइए जखन विरोधियो, हमरा संग होइए मिक्स 

दूध-माछ दुनू खयबा मे, नहि अछि हमरा हर्ज़
भाषण टा देब हम जनै छी, से थिक हमर मर्ज 
तूर-तेल धs कान मे, सुतब अछि हमर फ़र्ज़ 
गरियाबय क्यो वा गाबय फकरा, लगा कs कोनो तर्ज़

देखि अहांक भरल पेटी, अफरैछ हमर पेट
कहू कतय कखन ककर, कत्बक अछि घेंट 
चाभी हमरा हाथ मे, बन्न पडल विकासक गेट
जखन चाही हमरा कीनी, लगा उचित रेट

दान करू मत केर अहाँ सभ, थिक लोकक ई अधिकार 
सत्ता लेल सौदा करब हमर, s गेल अछि व्यापार
घपला केर मुंगरी सं एहिना, फोदैत रहब देशक कप्पार
आंखि चीर कs देखू फेरो, हमहीं पहिरब पुष्प-हार

हमर शैतानी चालि सं, डूबि जाओ लोकतंत्रक नैया 
हाहाकार आ क्रंदन सुनि, नाचब हम ता-ता-थैया
भ्रम भेल होयत अहाँ कें किन्तु, हम नहि छी खेवैया
कहब ने हमरा जखन अहाँ, करब दैब रौ-दैया

नहि कोनो हमरा फिकिर, हिलि जाओ देशक चौहद्दी
आगि लगौ खसौ बज्जर, मुदा हिलय ने हमर गद्दी
आब तs बुझि गेल होयब अहाँ, छी हम कतेक अहद्दी
हमर किरदानिक पोथा नहि, छल तs मात्र रद्दी
गंगेश गुंजन

राधा- २७ म खेप
"फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि भोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर।"
दऽकऽ ....(एत' धरि अपने पढ़ि चुकल छी) .आब आगाँ ---

मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' ' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।'
नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' ' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर !
बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट दतोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक।
-' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह...
निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा ।
मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत
जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल
' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर
ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे
लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला
कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर
प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा...
एखन कत' छथि कृष्ण ? समय स्वयं सिरमा मे रखने जलक खाली बासन, अछि पियास सँ बिकल मुदा सबटा इनार आ पोखरि कोना जानि ने बिसरि गेल अछि तकर प्रयोग आ रक्षा प्रकृत जन्म भेल इच्छाक नहि क' रहलए लोक निबाह अचि समुद्र मे माछ जकाँ पर तृप्त ने छैक पियास केहन परिस्थिति केहन बुद्धि केर की बनलछि बिडंबना केकरो बुझबा मे नहि आबय ई नव युग केर रचना कि सब कोना कोन कोन विधियें पसरि रहलए घर-घर सलिलक स्वतः धार बहइत जे छल बहैत सब जीवन ठमकल ठमकल दुःक्ख मे भारी डेग-डेग पर क्षण-क्षण बिनु थकनीयें बैसि जाइत अछि सोच मे पड़ जाइत अछि बिलकुल्ले पसरल जाइत ई नबका मोनक रंग ढंग बिना युद्ध केर प्रतिदिन प्रति घर भ' रहलए जे हताहत घोर अशान्ति भरल बेशी मन चिन्तें अछि उद्विग्न-उन्मन कारण तेहन नुकाएल गोपन बूझि ने पाबि रहल लोक अधबयसे मे युगक ताल देखि भोगि नचारी गबइत लोक समय बनल जाइत अछि दिन-दिन स्वयं मूर्त्ति लाचारीक सभ शरीर सँ प्राण जेना सूखल जाइत अछि पल-पल अधिक लोक जेना बनि चुकलए बौक, कतोक बहीर शेष जीवनक नब ढर्रा सँ आतंकित आ अधीर आब परस्पर गौआँ-गौआँक रहि ने गेल आप्तता सब जेना सब सँ नुकाएल ताकय बचबा केर रस्ता तें अनेर मे आओर अकारण पसरि रहल अछि दूरी ककरो पर ककरो ने जेना बाँचल अछि आब विश्वास बहुत लोक गुम्म, बेशी दुखिया आरो बहुत उदास ई कोन युगक प्रवेश भेल अछि ओहन शान्त जीवन मे कर्मतृप्त मनुखक समाज मे केहन अशुभ से होएब
बेशी हाथ कपार धेने चिन्तित बड़ ब्याकुल-ब्याकुल प्रत्यक्षें तँ शान्त जेना किछु भेले नहि हो किछुओ किन्तु लोक जीवनक अंतः उद्वेलित आगि जरैत'छि सब सहिये रहलए लेकिन व्यथा अपन ने कहैत'छि
देह मोन आ प्राणक मध्य मे की अछि जीवन केर सू्त्र अछि दर्शन,आस्था बा युग सँ कहल-सुनल अनुबन्ध नहि बूझल होइछ बेशी क्षण एखन उठाएब प्रश्न देह विकलता मे अपना द' अनमन अपने सन मारि ठहक्का हँसय प्राण चकित चुपायल मोन सभ अछि सबमे तैयो अपना अज्ञाने लाचार जुड़य सभक अस्तित्व एकहि मे एक तंत्र संचार बोधक भिन्न स्थिति रहितहुँ अछि एक बिन्दु पर सम पूर्व गान केर हेतु जेना स्वर-शब्द लयक हो नियम बिना प्रयासे स्वतस्फूर्तित ओना होइछ सब क्रिया किन्तु आइ काल्हि ताहू मे होअय लागल व्यतिक्रम देह-मन आ प्राणक मध्य घटि रहल जेना हो समन्वय पहिने छल सब क्रिया बोध आ निष्पादनक सहजता आइ जेना टुटि गेल सूत्र हो आपसक तत्परता एक देह-मन-प्राणक सृष्टिक सुन्दर एहन महल मे आब जेना क' रहल वास हो तीनू एकसर एकसर तीनू ताकि लेने हो जेना अप्पन निष्क्रिय एकान्त तीनू मे बाजा भूकी नहि तीनू निपट अशान्त।

ई अनुभव कि खसल एकाएक कोनो मेघ सँ पानि जकाँ ई अनुभव कि जीवन मे आएल नोतल कोनो नोथारी ई अनुभव कि आयल कोनो बनि समधियान केर भार मे ई अनुभव कि आबि रहलए कीनि क' हाट-बजार सँ ई अपनहि देह-मन-प्राण मे एतेक समाद हीनता सोझाँक सहज प्राप्त सुख पर्यन्त बनल जाइत अछि दुर्लभ कारण किछु प्रत्यक्ष कहाँ अछि कहाँ साफ किछु लक्षण मात्र अदृश्य संदेहक छाया सँ असुरक्षित आँगन दूरी बढ़ल जाइत अपना मे, बिन बातहिक परस्पर टूटल संबंधक स्थिति सम आँगन मे घर घर चौंकलि राधा, दुब्बरि गता उठलि चललि डगमग डग ई अनुभव आएल अवश्ये.बड़ बुधियारी बाटे। हँ बुझबा मे अबैत अछि आब ई आ'ल हाटे- हाटे इ आएल हाटे- हाटे। हाट बनल नब बाट जेना जीबाक सब तरहे।
सभ बाट पर आब जनमि रहलए बन-झाँखुर। लोक लाचार । असमंजस मे - की करी, की नहि, कोन बाट चली एहि दुःख-दुविधा मे जे एक तँ ओहनहुँ छलैक कहाँ किछु विशेष हाथ आब तँ जेहो छलैक अपन अधीन, अपना योग्य, सभ भेल जा रहल छैक बेहाथ। किछु तं अपनहि घरक नवताक अन्हर-बिहाड़ि मे आ किछु भरि समाजक बदलि रहल दृष्टि आ व्यवहारो मे। यद्यपि कि सभक दुःख-दुविधा छैक रंग-रूप एक्के। मुदा से नहि बूझि पबैये लोक एकरा एना भ' 'एहि रंग मे जे भ' रहलए सब किछु अंग-भंग। जीवन यापनक पारंपरिक बाट पर चलैत, सहैत जाइत सबटा नबका-नबका आघात जे प्रत्यक्ष मे तं छैक बड़ गंहीर स्नेहक स्पर्श, मुदा प्राण के थकुचि रहल छैक एक एक पल। कत' सँ ई कोन रोगाह वायु बहैत आयल छैक सभक बुद्धि बौआयल सभक हृदय घायल छैक। ताहू मे बेशी तं बनल छैक विडंबना ई, एहि सबक जड़ि छैक आन नहि, अपनहि सब ई यथा-पुत्र,पुत्रबधू, आ संगी-साथी सब। बहि रहल एहि बसात संग बेश गदगद अछि, बिनु बुझने एकर असरि। काल्हुक भविष्य पर अधिसंख्य नब लोक अपन-अपन फूकि रहलए घर। के बुझबय ? बूझक सेतु पुरना लोक सबकें राखल जा रहल अछि कतिया क'। नबके लोक सम्हारि रहल अछि नब युगक रासि। बढ़ा रहल गाड़ी के हाँकि क' एहि तरहें जेना कोनो दुपहियाक गाड़ी नहि, समस्त पृथ्वीये होथि गुड़का रहल, अपना सामर्थ्ये,अपनहि बुद्धि-ब्योंत सँ-आगाँ। समाज, बयसक पुरान ठकमूड़ी लगौने बैसल छथि चुपचाप, सबटा देखैत!
तँ कि ई प्राण जे थकुचल जाइत बुझाइत अछि दिन राति से नहि थिक एकमात्र हमर?लोकोक बहुत छैक आन अपन। तँ कि छैक व्याकुल हमरा सँ पृथक किछु लोक, तँ कि ई संसार, समाज बनल छैक ओतहु आन? छोड़ि सर-संबन्धी कि ओतहु कएने छै असकर अपनहि दुःखक ज्वाला मे कि जरैत अछि आनो घर एहन विपत्ति नव प्रकारक आ पहिले पहिल स्वभावक, तँ कि अछि प्रारंभ ई अनुभव केर नबका आवक-जावक? चीन्हि ने पाबी हम यद्यपि एकरा कोनो आँखिक विचार सँ द्विविधे दुविधा अछि प्रति पल प्रश्न सोझ सन्सार सँ अछि एही मे शुरू मनुक्खक कोमल संवेदन सब मौलाएब, टूटि खसब गाछ सँ पात जेना सुखायल क्रमशः पातक संगहि डारि, 'र आ पूरा गाछ, सुन्न कएल जाइत जीवन रस सँ धराशायी भजाइछ गाछ तँ तथापि मरि-सुखा क' रहि जाइत अछि उपयोगी जाड़नि बनि जरि चूल्हि बनाबय, आबाल बृद्धक भोजन, जड़काला- हाड़कंपौआ ऋतु मे धधकि क' दिअय जीवनक ताप, मुदा मनुख-जीवन, ई देह- समस्त बिलक्षण, प्रकृतिक अनुपम सृष्टि पृथ्वी पर अनुपम जीवित सेहो एहन निरर्थक बनल अकार्यक देहक जीवन हो अंत तखन पर्यन्त लिअय फेरो समाज,परिवार,प्रकृति सँ काँच-सुखायल गाछ जे होइछ काठ, देह कें अंतिम परिणति धरि पहुँचाबय मे,शरीर-मृत मनुक्ख शरीर डाहै मे करबा लैत अछि खर्च जाइतो-जाइतो।
-'हम-हम नहि राधा, तों..की सब सोचैत छें ...पुछैत राधा, कहैत राधा,सुनैत राधा..एखनहि केहन छल आत्म मुखर सक्रिय स्पन्दित ! मिझा गेल डिबिया जकाँ रहलए केना धुँआइत, प्रश्नक कोनो टा उत्तर नहि, कोनो टा ने बात-संवाद मात्र दीर्घ निश्वास-दीर्घ निश्वास-'कोना छी अहाँ कृष्ण, कहाँ छी, किएक छी ? एहन समय हमरे जीवन मे किएक एतेक रास जेहो नहि लेने ऋण तकरो भरि रहल छी सूदि, मूर धएल जसक तस अदृश्य कोनो बणिकक हमर पल, दिन, मास बर्ख चुकबैत अपन एक-एक साँस । एहन स्थान किएक बनि गेलय इएह हमर ई मन? भरि संसारक बस्तु, व्यक्ति, व्यक्तिक सब कार्यकलाप, क्रीड़ा आ सब कर्मक बनि गेल अछि सुलभ आँगन। जेकरा जखन सुभीता आबय क' लिअय व्यवहार। हमही आँगन हम मुदा ठकमूड़ी लेने ठाढ़ । कहि ने सकी केकरो निजताक बोझ, एकर संताप, बुझा सकी ने अपन एहि वर्तमानक कुटिल यथार्थ , हमर अर्थ छिड़ियाएल जेना कृषकक बीयाक छितनी-पथिया हो, बागु कर' खेत जाइत काल बाटे मे गेल हो हेराय, जतबा जे बिछि-समेटि सकलौं, हँसोथि-हँसोथि, खिन्न मन कर्माहत देहें यथोपलब्ध बीया कयलौं बागु ! घुरल हो ओहि प्रचण्ड रौद कें दैत ललकार घर आ बनल तथापि जीवन क्रम मे गाम मे स्थिर आशान्वित, फसिलक भावी उपलब्धिक दिस आश्वस्त, मुदा पुनि जतबो बीया छीटल गेल हो, घामे-पसेने खेत जोति तैयार कएल गेल मे तकरो सब कें चुनि क' ' चल गेल हो चिड़ैक महा हेंज, एम्हर एक दिस निश्चिन्तता मे गबैत मनक भवितव्य, ओम्हर दोसर दिस सुन्न कएल बनि गेल हो खेतक गर्भ ! एम्हर निरन्तर बीया मे अंकुरयबाक , माटि के फोड़ि जन्मबाक-बढ़बाक, बढ़ि क' फसिलक गाछ विकसवाक अहो दिवस मर्मांतक प्रतीक्षा...ओम्हर जन्म सँ पहिनहि कोखि कें रिक्त करैत काल-गति, ई एहन हमरे टा किएक कर्माहत हमरे टा किएक वर्तमान ! आकि बोगि रहलए एहने आ यैह व्यथा आनो आन ?' सोचैत राधा छोड़लनि नमहर श्वाँस..। जानि ने कखन-कोना लागि गेल रहनि राधा कें आँखि। नहि जानि कखन बैसले बैसलि ओंघड़ा गेलीह ओ पटिया पर। मुदा ई भेलनि बोध जेना देह भ' गेल डेंगी नाव! पटिया बनि क' यमुना मे हुनका कराब' लगलनि-झिलहरि बड़ी काल...एकसरि झिलहरि खेलाय मे रहली मस्त- बड़ी काल ! तखन होअ' लगलनि अगिले क्षण मोन विरक्त । आखिर यत्न क' नाव के घाट लगौलनि , भेलीह-संतुष्ट जे पहिल बेर नहि लेब' पड़ल श्रीकृष्णक सहयोग, आ खेपि सकलहुँ नाव, उतरि गेलौं पार ! अपन सुख लेल किएक करी केकरो नेहोरा ? भने कृष्णे किएक नहि होथि। एकहि मोन मे तुरन्त उपस्थित भ गेलनि-ग्लानि, छिया, कृष्ण पर निर्भरता तँ हमर नियति आ प्रारब्ध। कोना आयल मोन मे एहन बात ? धिक्कार मोन -धिक्कार... मुदा ई की ? घाट पर साक्षात् कृष्ण महराज ठाढ़ ! वैह खौंझबै वला बिहुँसैत, बढ़ा चुकल नाव सँ गमग उतरि रहलि राधा दिस अपन दहिना हाथ। सस्नेह, सार्द्र दैत अपन हाथ राधा भेलीह बिकल । मिला नहि सकलीह हुनका सँ आँखि । -' भरिसक मन मे हमरा बिनु यमुना मे नाव चला लेबाक छौक मन पर भार । अपन सुखक अपनहि कर्म-निर्भरताक सेहो छौक आत्म दीप्त विश्वास...राधा, तों केहन लागि रहल छें एहि अलौकिक क्षण , तोरो ने बूझल छौक। हमरो तँ थिक जीवनक ई प्रथमहि दुर्लभ दृश्य ! हम केना योगा क' राखी ई आनन्द राधा, कोन बिधि, तोंही देखा दे उपाय।' -' जाउ-जाउ, एत्तहु खौंझबैये लए हमरा आएल छी अहाँ । हम कएलए स्त्रीगन भ' ' अगरजितपना आ छी ताही मोने बेचैन, अहाँ के सुझैए विनोद एखन ।' राधा किन्चित स्नेह-क्रोधित भ' कहलखिन तँ कृष्ण भेलाह गंभीर। -' नहि राधा, हम तँ छी परम हर्षित-संतुष्ट। यैह त हमर कामना छल, तों बनि जायं-स्वयं आत्म निर्भर । नहि रह' पड़ौ तोरा हमरा पर निर्भर । तों कएलेंहें हमरे काज। हम तँ तें छी प्रसन्न।' -'किएक नहि, आब आओर रहब निश्चिन्त, मरओ राधा कि जीबओ, नहि राख' पड़त फिकिर ।'
नाव सँ उतरि क' दरबनिया द' ' पड़यबाक छलनि विचार, मुदा ई तँ सर्वथा नवे परिस्थिति कएने छथि कृष्णजी ठाढ़ ! जानि ने एतबा काल एहि बीच की हएत आँगनक हाल। जे हो ... आब एहि क्षण तँ माधव-मायाजाल मे छी बाझलि हमहूँ । आगाँ देखी कोन नाटकक केहन दृश्य प्रस्तुत करय वला छथि-नटवर नागर...सकल गुण आगर !
बूलि क' राधा आँगन अयलीह तं आश्चर्ये ठकमूड़ी लागि गेलनि। बीच आँगन मे कृष्ण ठाढ़, सद्यः। हुनकर स.बोधनक कोनो टा ने जबाब दैत चलि गेलीह भीतर अपना कोठली दिस। धीरे-धीरे कृष्ण सेहो लागि क' पाछाँ राधाक पीठे पर पहुँचलखिन। एतनी काल मे पहुँचि जएथिन कृष्ण तकर नहि छलनि कनियों अनुमान। सरियाइयो कहाँ सकलीह आँचर पर्यन्त ...दुष्ट केहन जे पैसि गेलाक बाद कोठली मे खखसलनि कर्तव्य, कएलनि-राधा के साकांक्ष । अप्रत्याशित एहि कृष्ण-कृत्य पर भ' गेलीह क्रोधित । जेना तेना सरियबैत आँचर, तथापि घुरलीह पाछाँ दिस फेरलनि मुँह..कुटिल शृंगारोदीप्त भुवन मोहिनी बिहुँसी पसारने ठाढ़-श्रीकृष्ण । लग आबि क' खौंझाएल पोसुआ बिलाड़ि जकाँ राधा ! छड़पैत सन क्रमे ल'ग पहुँचि कृष्णक पीताम्बरी झीकैत’ 'हरण कर' लगलखिन.. . –‘'ई की, ई की करैत छें राधा । हमरा किएक करैत छें एना उघार ? देखत लोक हमर की रहत इज्जतिक हाल ! आखिर पुरुखोक होइत छैक इज्जति, मर्यादा लज्जा, पुरुखोक चीर हरण होइत छैक यदि नहि रहै पुरुषत्व...।' किन्तु हँसी-ठठा सँ राधा कनियों ने ठंढयलीह। कृष्णो बूझि ने सकलाह, राधा बजलीह किछु बा कनलीह..। स्नेहांक मे बन्हबाक हुनक मृदु प्रयास कें ताग जकाँ खुट दतोड़लनि। खौंझायलि ओ एतबा जे कृष्णक केश के पकड़ि घीच' लगलीह। ओ रहथि नहि प्रस्तुत, राधाक हेतनि एहेन स्नेहाघात। केश तिराइत मन छटपटबैत कननमुँह भ' गेलाह। मुदा राधा तँ जेना छलीह बताहि भेलि अपन तामस सँ। बूझल कृष्ण धैर्य सँ । सक्कत-बाँहि स्नेह सँ बन्हैत बुझब' लगलाह- -‘'भेलौ कि तोरा, की बात, की भेलौए बाज त किछुओ, हमरे सप्पत तोरा, भेलौए की से तँ कहै बताहि !... हमरो मन धधकैये कतेक दिन, मास-बरख सँ, कहाँ भेटैए शीतल स्नेहक छाहरि हमरो । तइ पर सँ तोरो यदि होउ एहिना हाल तँ हमर जीवन कोना चलत, कहिया धरि, कतबा दूर से तोंही क'ह कने ।...आखिर की भेलनिहें हमर बुधियारि राधिका जी कें , बुझियै त। से दोख जे भेलय हमरे बुते ? कोना-की। हिचुकैत राधिका कें करेज सँ साटि बड़ी काल कृष्ण अपनहुँ हिचकैत रहलाह निरन्तर ओतबा काल । दुहुक हिचुकब क्रमशः एकमेक बनल चलि गेलनि । राधा कें ई की भेलनि आ कृष्णहु कें ? दुनूक भाव आवेग एकात्म भ' चुपचाप बहिते गेल...जानि नहि एहि करुण चुप्पी मे जीवनक कतेक युग बीति गेल ! स्थिति मे एक ध्यान प्राण सेहो एक।
-' निन्न भ' गेलौ राधा, सूति गेलें तों की ? ' कृ्ष्णक एहि पुछैत स्वर पर चिहुँकि उठलीह राधा । उठितहि भान भेलनि जेना होथि ओ श्रीकृष्णक आलिंगन मे माँझ आँगन मे ठाढ़ि । चारू कात सँ देखैत लोक, सर-संबन्धिक- सखि बहिनपा...। आकि लाज सँ व्याकुल एकहि बेर मे श्रीकृष्णक बाँहि सँ झकझोरि छोड़बैत स्वयं कें चिकरि उठलीह, पड़यलीह- लत्त॓-फत्त॓, निछोह...
निन्न एतहि टुटि गेलनि । साँस फुलैत भेलीह बेसम्हार। जेना लोहारक भाँथी हो, ओहिना ताप जरैत उसाँसक भाँथी हो ई देह। आब भग्न स्वप्नक कर' बैसलीह भाग्यदशा विश्लेषण। पछताइत-पछताइत मन भेलनि अस्तम्व्यस्त । केहन दुर्लभ सुन्दर स्वप्नक क' देलियैक अपने दुर्दशा। कि अछि एतबो नहि लिखल , केहन भाग्य से कहि नहि, स्वप्नो जेना सुड़ाह होइत अछि, सोचथि राधा ।
मुदा ने जानि जखनि अबैत अछि किएक आधा , सौंस स्वप्न केहन दुर्लभ यदि हो मनोरथक । ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सन असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत
जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल
' ली दम । साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे संज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा,हाथ-पैर
ओना तँ विकट भयावह स्वप्नक अंत नहि, व्यर्थक भरि- भरि राति बौआइत बन-झाँखुर मे बाधे बोने भरि संसार विकल भयभीत एकसर अनन्त मे
लोक जेना पाछाँ सँ खेहारले जाइत कोनो राक्षसी सँ असकर अब्बल नारीक पाछाँ लेने बर्छी-भाला
कोनो डेग पर गाँथि सकैत अछि पीठहि दिस सँ त्रस्त जिजीविषा ग्रस्त प्राण छटपट दौड़ैत अनवरत जानि ने चल जाइत अछि कतोक योजन कतबा आगाँ आ कि ओही अपस्यांत दशा मे जत' धरैत अछि सुस्तयबा लेल एकटा डेग किंचित निश्चिन्त जे राक्षसी पाछाँ बहुत पाछहि छुटि गेलए, हम पहुचल छी आबि सुरक्षित अपन गामेक इलाका तें एक पल ल' ली दम साँस करी स्थिर आश्वस्त, आकि जेना अवतार जेकाँ आगाँ मे आबि क' ठाढ़ कोनो भ' जाय विचित्र बिकराल भयावह हिंसक पशु मात्र एकटा ओकरा काया मे समाएल हो जेना कतोक बाघ-सिंह-हाथी-ऊँट आदि, सभ एकहि ठाम एक संग मुँह बाबि क' ठाढ़ जेना हो बड़का महलक सिंहद्वार केर फाटक जाहि मे एक संग पैसैत अछि सहस्रो सैनिक, अपन घोड़ा-हाथी रथ समेत से खुंखार जानवर सब केहन हँसैत लगैत अछि, जेना कि ओ गीड़य नहि, अहंक अएला पर अति प्रसन्न स्वागत करैत अछि केहन लगैत अछि एहन विशाल जानवर ई कोन थिक, ई जीव, जानि ने पहिले पहिल देखै छी- आगाँ एकटा डेग बढ़ौलक तँ सोझाँक धरती डोलैत बुझाएल, दोसर डेग पर देह-प्राण सौंसे सज्ञा जेना हेरायल, कोनो नहि बाँचल विकल्प कतहु पड़यबाक, सब दिशा मे हो जेना ओकरे पसरल पंजा, हाथ-पैर
प्राण जेना चीत्कार क' उठय भय सँ आर्त्त अपन रक्षार्थ जोर ठहक्का पड़ल जेना ब्रह्माण्डे बिजलौका सं एक संग कड़कल चमकल आ सृष्टि भरिक मेघक समूह एकबेर गरजल, डरे भेल पसेना सं तरबतर थरथराइत सर्वांग बुझा रहलए जे जाइत होइ जेना ओहि जन्तुक बड़का फाटक सन खुजल कल्ला बाटे ओकर पोखरि सन पेटक सत्ते तखने उठल कंठ मोकल घिरघिरी भरल, आर्त्त पुकार मुदा के सुनय, सुनय के ? सुननहारक अपने भय-व्याकुल असकर ई वर्त्तमान स्वयं अपने ई प्रिय एकान्त, केहन असुरक्षित आ अशांत ! कोन जीव थिक आखिर एहन बिकराल आओर खुंखार सपनहुँ देखल तँ होयतै अवश्य अस्तित्व एकर पुछबनि हुनके, जँ भेटता तँ, कोन थीक ई जीव ? आइधरि देखल आ ने सुनल छल, माधव ! कोनो गतिमान पहाड़ कि सत्ये कोनो जीवे छल हुनका तँ हेबे टा करतनि एकरो बूझल परिचय। की नहि अछि हुनका एहि सृष्टिक जे किछु कोनो विषय अछि जानि ने कत्तेक ज्ञान कोना एतबहि बयसें पौने छथि सबटा ओ बूझैत छथि हुनका सबकिछुए सुझै छनि घ'न अन्हरिया मे पर्यन्त सबकिछु देखाइत छनि... कोना हमर खसि पड़ल कनपासा यमुना कातक घासक बन मे ओहन अन्हरिया राति मे से ओ ताकल एक्कहि क्षण मे कोन आँखि छनि केहन ताहि मे ज्योति विराजित दिव्य जत' जत' पड़ि जाइछ स्वतः भ' जाइछ ओत' इजोत ! हुनका सोझाँ तें अतिशय सम्हार' पड़इछ आँचर से सब सखि केर अनुभव वस्तुक भीतर वस्तु देखि लेबक अद्भुत कौशल छनि बिनु देखनहुँ श्रीमान जानि ने की की देखि ल' जाइत छथि सोचि स्मरण करैत लजयली एकान्तहु मे राधा...
एखन कत' छथि कृष्ण ?
 
       
....जारी
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर)

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 


२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

३.श्वेता झा (सिंगापुर)




बालानां कृते

पंकज झा, पिता-श्री महेंद्र मोहन झा, माता-श्रीमती अम्बी देवी झा : माड़र, जितबारपुर, मधुबनी, बिहार ८४७२११
पंकज जी एच.सी.एल.मे सोफ्टवेयर इंजिनीयर छथि।

(बाल कविता)
माँ गई माँ
माँ गै माँ,
घरक ऊपर,
चारक तर,
बगरा बनेलकऊ,
एकटा घर

माँ गै माँ,
घरक पाछू,
बारीक बिच,
सुगा अनलकऊ,
एकटा फर

माँ गै माँ,
गामक भीतर,
टोलाक बिच,
नटुआ नचलऊ,
एकटा नाच

माँ गै माँ,
गामक बाहर,
पोखरिक बिच,
पुरैनिक पातपर,
झिलमिल जल

माँ गै माँ,
आँगन कात,
ढेकी लग,
बिहरिमे छौ,
गहुमन साँप

माँ गै माँ,
बस्तुनिया लय,
हम कहलियौ,
सब हाल-चाल,
जल्दीसँ दऽ दहीं,
बस्तुनिया हमर,
हम चललियऊ,
खेलय लेल,
नै देबहीं,
बस्तुनिया हमर

माँ गई माँ,
चिकरैत रहबौ, 
माँ गै माँ,
चिकरैत रहबौ।


 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
Original Poem in Maithili by Kalikant Jha "Buch" Translated into English by Jyoti Jha Chaudhary


Kalikant Jha "Buch" 1934-2009, Birth place- village Karian, District- Samastipur (Karian is birth place of famous Indian Nyaiyyayik philosopher Udayanacharya), Father Late Pt. Rajkishor Jha was first headmaster of village middle school. Mother Late Kala Devi was housewife. After completing Intermediate education started job block office of Govt. of Bihar.published in Mithila Mihir, Mati-pani, Bhakha, and Maithili Akademi magazine.
Jyoti Jha Chaudhary, Date of Birth: December 30 1978,Place of Birth- Belhvar (Madhubani District), Education: Swami Vivekananda Middle School, Tisco Sakchi Girls High School, Mrs KMPM Inter College, IGNOU, ICWAI (COST ACCOUNTANCY); Residence- LONDON, UK; Father- Sh. Shubhankar Jha, Jamshedpur; Mother- Smt. Sudha Jha- Shivipatti. Jyoti received editor's choice award from www.poetry.comand her poems were featured in front page of www.poetrysoup.com for some period.She learnt Mithila Painting under Ms. Shveta Jha, Basera Institute, Jamshedpur and Fine Arts from Toolika, Sakchi, Jamshedpur (India). Her Mithila Paintings have been displayed by Ealing Art Group at Ealing Broadway, London.
Result Of Dowry
Is the money of dowry going to last long!
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow

Your son and wife wouldn’t help you
Angry daughter-in-laws would take revenge
You would have to drink tea with chilli
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow

When you would be unable to get up from bed
Your grand sons would scold you actively
They would give you soil in place of Lai
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow

You would be offered pebbles being considered as an orphan dog
 You would not be given even oil at bottom and salt at top
Oh brother, you would be begging till you die
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow

Your sons are sold, who will give you pind
And if they would do that, you would not get that
You would be wandering as a bad spirit
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow

Only your youngest son is left, wake up now
You will loose your both worlds otherwise
Have loving relation with son’s in-laws
Varnish your status for now
You also have four girls
You will learn lesson somehow


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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...