Tuesday, November 09, 2010

'विदेह' ६९ म अंक ०१ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ६९)- PART V


३. पद्य






३.६.१.चन्‍द्रशेखर कामति- दूटा गीत २.राजेश मोहन झा- पद्य ३.किशन कारीग़र- गलचोटका बर
३.७.गंगेश गुंजन- ३ टा गजल-पद्य

  

 सतीश चन्द्र झा

नेन्ना तेतरी


नोकर चाकर गाड़ी बंगला
रोब दाब हाकिम छथि बड़का।
सौ सैकड़ सँ कम नहि सेवक
अछि लागल सेवा मे हिनका।

आप्त सचिव छथि ई मंत्री कें
व्यस्त लोक दिनचर्या भारी।
उच्च पदक अभिमान देह मे
उज्जर देह मोन सँ कारी।

पोछि रहल छल ओत्तहि पक्का
नेन्ना तेतरी रगड़ि-रगड़ि क

व्यस्त छला बाबू लिखबा मे
काल्हिक भाषण किछु गढ़ि-गढ़ि क


मंत्री के भाषण छल काल्हिये
अपन क्षेत्र मे बाल दिवस पर।
शिक्षा भोजन वस्त्र गरीबक
बाल मजूरी -पाप विषय पर।

उड़लै किछु पन्ना बाबू के
भीजल पक्का पर उधियाक

तेतरी के द
दोष क्रोध मे
दौड़ गेला बाबू चिचियाक

पड़लै थापर ओकर पीठ पर
मायक बदला आबि गेल छल।
सीखि रहल छल काज गरीबक
कानि कानि क
लाल भेल छल।

मेटा गेल छल कागत पर सँ
बाल दिवस कें शब्द उखड़िक

जीवि रहल अछि स्नेह भावना
सभ कागत पर मात्र उतरिक
राजदेव मंडलक पाँचटा पद्य
1) दि‍लक बोल

शब्‍द नहि‍ रहल दि‍लक बोल
तेँ नहि‍ रहल ओकर मोल
औनाइत रहल ओ अपनहि‍ खोल
कतबो करब अनधाेल
बजैत रहैत छी अमरीत बोल
भीतर रखने बीखक घोल
नाश भऽ जाएत जीनगी अनमोल
जहि‍या टघरत बीखक घोल
एकदि‍न खुगि‍ जाएत सभटा पोल
मुखमे राम बगलमे छुरी
सभ करत तब थुड़ि‍-थुड़ि‍
दि‍लक बोल अछि‍ शब्‍दक जान
दुनू मि‍लि‍ देत मान सम्‍मान।।

2) अहि‍ंसक वीर

अहाँ कहैत छी- कायर बनबसँ नीक
हि‍ंसक भऽ जाएब से अछि‍ ठीक
लोग कहत- वाह-वाह
कि‍न्‍तु हमरा लगैत अछि‍ ई अधलाह
कायर मारि‍ दैत अछि‍ अपने आपकेँ
दाबि‍ लैत अछि‍ अपन दुख आ तापकेँ
हि‍ंसा कऽ सकैत अछि‍ दुरजन
हि‍ंसक नहि‍ कऽ सकैत अछि‍ सि‍रजन
दुनूमे अछि‍ अपन-अपन अवगुन आ गुन
एहि‍ दुनूसँ ऊपर अहि‍ंसक वीर
     -धीर- गम्‍भीर
दृष्‍टि‍मे हो आमजनक पीड़।


3) मनोवांछि‍त चान

दीर्घ कामनाक भऽ गेल अवसान
लगमे अछि‍ बैसल मनोवांछि‍त चान
दमकैत आ गमकैत कि‍शलय समान
कि‍न्‍तु देि‍ख ओकर मुख म्‍लान
बि‍सरि‍ गेलहुँ हम मि‍लन गान
पसरल नोर आँखि‍ आर मुख
कहि‍ रहल अछि‍ एक-एक दुख
भाग्‍यसँ भऽ गेल बाइर
फेर ने हुसि‍ जाए पाइर-
शंकासँ भरल ओकर मन
नव स्‍पर्शसँ कंपि‍त तन
तेँ राखए चाहैत अछि‍ सम्‍हारि‍
दूइ बून्न आँखि‍सँ नोर झड़ल
हमरो तब बाजय पड़ल
धीरज धरू छोड़ू पुरान आस
नूतन अछि‍ सोझा तहि‍पर करू वि‍श्‍वास
घुरि‍ अएलहुँ अहाँ अपना घर
हमरा रहैत नहि‍ करू कोनो डर
फुलाएल एक एक अंग
बजैत चलल संग-संग
जेकरा छोड़ि‍ अएलहुँ सेहो छल हमरे घर
नहि‍ छी देवता अहूँ छी साधारण नर
शून्‍य बाट अछि‍ ताकि‍ रहल
आगूमे अछि‍ धुँध भरल
तइयो ओहि‍पर चलहि‍ं पड़़ल।

4) परेमक अधि‍कार

आँखि‍क भीजल कोर
गि‍रल दूइ बून्न नोर
जाहि‍मे देखलहुँ अहाँक रूप
ओहि‍ना स्‍मरण अछि‍
दुलहि‍न बनल ओ रूप-अनूप
कनेक तेज साँसक वेग
नहु-नहु उठैत डेग
नैहरसँ सासुर दि‍श
हमरा छातीपर फाड़ैत चीस
आँखि‍ बनल भादोक झहरैत मेह
सँगीसँ टूटैत नेह
नहि‍ देखि‍ कोनो उपाए
नि‍शब्‍द फाटैत हमर हि‍रदय
कतेक अहाँ सहने रही
बि‍नु शब्‍दे कहने रही-
हमरा दाबने अछि‍
माए-बाप आर समाज
तेँ होइत अछि‍ लाज
कि‍न्‍तु अहाँ छी पूरा डेरबुक
पुरूष छी तइयो छाती धुक-धुक
नहि‍ कएलहुँ परेम जेना कएलहुँ चोरि‍
हमरो जीनगीमे देलहुँ जहर घोरि‍
प्रश्‍न उठैत बारम्‍बार
साहस बि‍हीनकेँ छै प्रेम करबाक अधि‍कार‍
बैसल रहि‍ गेलहुँ पछताइत
जीनगी भऽ गेल अन्‍हरि‍या राति‍
चलैत रहल काल
उठैत रहल मनमे अहाँक सवाल
आइ सुनलहुँ दूटा पाँति‍ भोरे-भोर
आँखि‍सँ गि‍रल अन्‍ति‍म दू बून्न नोर
कहलहुँ अहाँ-
बीतल छन केँ आब बि‍सरि‍ जाउ‍
जीनगीकेँ दोसर ढँगे सजाउ।

5) मधुर गीत

अपनहि‍ छातीमे छुरी मारि‍
हम काटै छी बपराहैड़
गि‍र रहल अछि‍ बून-बून
धरतीपर हमर खून
के मारलक एकरा छुरी
ओकरो आइ तोड़ि‍ देबै मुड़ी
लोग सोचैत अछि‍ के छल एहेन मरमी-घाती
कि‍न्‍तु असलमे छी हम स्‍वयं आत्‍मघाती
कतऽ सँ आएत एहेन उक्‍ति‍
जे देत हमरा एहि‍सँ मुक्‍ति‍
कतऽ सँ टूटत एहि‍सँ नाता
स्‍वंय छी हम एकर जन्‍मदाता
केना प्रसन्न भऽ नाचैत अछि‍ लोग
हमरा कोन धऽ लेलक रोग
सभटा भेल अभाेग
समए भेल जाइत अछि‍ गत
हमरो ताकऽ पड़त ओ पथ
जाहि‍सँ छुटए बीख भेटए अमरीत
हमहूँ गाएब मधुर गीत।
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

प्रजातन्त्रक खेल
शुरू भेल फेर प्रजातन्त्रक खेल
तानाशाहीके सबतरि बिगुल बाजल
अहि सऽ नीक अवसर कतय
अशिक्षित के राेजगार लागल
आइ ए एस बनय लेल लाेक
पाेथी रटि रटि नहि थाकल
आेतै देशक प्रशासन हथियाबैमे
अशिक्षित मूर्ख भ रहल पागल
जे आत्‍मविश्वास आ दृढ़ता स
खूब रचि-रचि मिथ्या बाजल
सबके बागडाेर सम्हारै लेल
नेता बनिकऽ अछि जागल
पाॅंच साल धरि सूतत जी भरि
अपन तिजाेरी नीकसऽ सम्हारत
नहिं तऽ बीचेमे चुनाव करा
जनताक काेष फेर सऽ झारत
१.राजेन्द्र चौधरी (१९४०- )- दूटा पद्य
२. राम बि‍लास साहु- चौवनि‍या नेता
श्री राजेन्द्र चौधरी, (बी.ए. आनर्स), ग्रामः- चरैया, पो. मगंलवार चरैया
थानाः- भरगामा, जिलाः- अररिया, (बिहार)      
      

श्रीकृष्ण भजन

देवकी नन्दन, यशोदाक लाल।
सुदामाक संगी, राधाक प्यार॥
ऋषिक नारायण, व्रजक गोपाल।
उद्धव सखा, गोपि सभक यार॥
राजेन्द्रक मुरली मनोहर, मीराक विशाल।
भक्तक भगवन, दुष्टक काल॥
कोना जाऊ श्याम, तोहर नगरिया,
ओढ़ि कऽ मैल चदरिया।
विकल अछि मन-प्राण,
तोरासँ मिलन लेल श्याम-सांवरिया।
दऽ दिअ हमरा भक्ति अपन,
तूँ पति रधिया। कोना जाऊ श्याम.....।
हे गोविन्द हे गोपाल,
आबि गेल छी तोहर द्वार।
हे गोविन्द हे गोपाल,
लाजक नाव तोरे हाथ,
चाहे करू ओहि पार वा राखू मझधार।
हे गोविन्द हे गोपाल,
राजेन्द करैए पुकार,
हे तारक हमरा तार,
हे गोविन्द हे गोपाल.....।





माँ ताराक भजन

भव सागर करू पार हे तारा
भव सागर करू पार हे तारा
आयल छी हम अहींक शरणमे
हमर करू उद्धार हे तारा
भव सागर करू पार हे तारा
बीच भंवरमे नाव फसल अछि,
हमर करू उद्धार हे तारा
भव सागर करू पार हे तारा.....।

राम बि‍लास साहु
चौवनि‍या नेता

केश फुलकल आँखि‍ चमकल
ढाढ़ी-मोछ कारी रंगसँ रँगल
मुँह सुखल होश ऊड़ल
पातर लकड़ी सन देहपर
बड़का झोलंगा फाटल लटकल
देश-वि‍देशक बात करै छी
चौक-चौराहापर बैसल रहै छी
फाटल गमछा, फाटल अंगा
जेना लगैत अछि‍ लफंगा
घरमे भूजि‍ भांग ने पाबे...
चौकक दाेकानपर भूजा पाबे
गप-सप्‍पसँ भाँट करबैत
गाम-घरमे ठकि‍ कऽ खाबे
जानि‍तो नहि‍ परि‍वारक हाल
कहैत हम मचबैत छी देशमे भूचाल
ठकि‍-ठकि‍ खाइ छी गरीबक माल
गामक लोकनि‍क जि‍नगीकेँ
करै छी फटैहाल
बनलौ काम बि‍गाड़ै छी
अपनाकेँ कहै छी अधि‍कारी
रि‍श्‍वतसँ चलबैत छी जि‍नगीक गाड़ी
मुदा हमरा नहि‍ अछि‍ कोनो सवारी
जइ दलमे देखलौं धन-बल
ओहि‍ दलमे केलौं चहल-पहल
सत्ताक नहि‍ हमरा आस
परायाकेँ के कहे
अपनोकेँ करै छी वि‍नाश
बड़का नेता करैत बड़का घटोला
हम चौवनि‍याँ छी नेता
चारि‍ए अनाक करै छी आशा
हमरा नहि‍ सि‍ंहासनक आशा
गाम घरमे करैत छी राज।

श्री कालीकान्त झा "बूच"
कालीकांत झा "बूच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 . मे भेलनि। पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह।माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चाबिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल। मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि-पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय-समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक विकास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा) मे हास्य कथाकारक सूचीमे डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि। मैथिली अकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल। श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि। डा. दुर्गानाथ झा "श्रीश" संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

चारिटा पद्य
1) दुर्गा वंदना

सर्वेश्‍वरि‍ दुर्गे, सुवुद्ध दहक सभकेँ तोँ
हरहक सबहक अज्ञान,
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।1।।
पहि‍ने तोँ मेँटि‍ दहक, मोनक वि‍भेद बुद्धि‍
भऽ जाइक तदुपरान्‍त सहजेमे आत्‍म-शुद्धि‍
कपट-दंभ-अहंकार-स्‍वार्थ-दैत्‍यकेँ सँहारि‍-
करहक जगक उत्‍थान।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।2।।
शि‍वक तेज आनन, चतुराननसँ चरण भेल
वि‍ष्‍णु बाँहि‍, सोमस्‍तन, इन्‍द्र तेज डांड़ देल
यम-सुकेश, वरूण जाँघ, पृथ्‍वी नि‍तम्‍ब भेलि‍
वसुगणार्क अंगुलि‍ नि‍र्माण।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।3।।
नासि‍का धनाधि‍पसँ, प्रजापति‍क दंत स्‍वेत
अग्‍णि‍सँ त्रि‍नेत्र, साँझ भौँह वक्रता समेत
वायुदेव कान देल-एहि‍ तरहेँ प्रगट भेल-
नारि‍ एक सूरूज समान।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।4।।
हरखि‍त भऽ शंकर नि‍ज शूलसँ त्रि‍शूल देल
वि‍ष्‍णुक सुदर्शनसँ चक्र एक जनमि‍ गेल
धर्मराज दंड, वरूण पाश, प्रजापति‍ देलनि‍-
स्‍फटि‍कक माला महान।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।5।।
सलि‍लदेव शंख, काल ढाल-करवाल देल
ब्रह्मा कमंडलु, हुत्ताशनसँ शक्‍ति‍ लेल
वायु धनषवाण, सूर्यतेज, इन्‍द्र कऽ देलनि‍-
घंटा आ बज्रक प्रदान।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।6।।
क्षीरोदधि‍दि‍व्‍यवश्‍त्र, चूड़ामणि‍, स्‍वेतहार
कुंडल-केयूर आर नूपुर सङ सभ ि‍सङार
वि‍शकर्मा फरसा, अनेक अश्‍त्र शस्‍त्र एक-
कमल-माल देल अमलांन।।
माइ हे, तोरे मे सभ भगवान।।7।।
नागराज मणि‍ मंडि‍त उरगहार दि‍व्‍य देल
धनपति‍सँ पूर्ण मधुक मानपात्र प्राप्‍त भेल
हि‍मवानक देल सि‍ंह वाहनपर शोभि‍त तोँ-
तोरा सनि‍ कत्तऽ के आन?
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।8।।
कऽ रहली, व्‍योमवीच रहि‍ रहि‍ कऽ अट्टहास
गर्जनाक गुंजनसँ फाटि‍ रहल छै, अकाश
डोलल पहाड़, काँपि‍ उठलै, समुद्र सकल-
उठि‍ गेलैक भारी तूफान।।
माइ हे, तोरे सभ भगवान।।9।।
डेगेमे धरती, आ पाँजेमे छह त्रि‍लोक
सि‍ंहवाहि‍नी भवानि‍, हरहक संतति‍क शोक
जय हे मां दुर्गे तोँ सर्वलोक शक्‍ति‍पूंज,
करहक सबहक समाधान।।
माइ हे, तोरेमे सभ भगवान।।10।।
           

2) काली वंदना

करू कृपा, करूणामयी मां,
हे सुभद्रे, कालि‍के!
भू चतुर्दश जननि‍, वृद्धे,
हे धरि‍त्री- वालि‍के?

त्रि‍पुर-सुन्‍दरि‍, चि‍रयुवति‍ मां,
योगमाया जालि‍के? वि‍ह्वले, अनुतापि‍ते हे,
हासमय मुख माि‍लके!

जय दि‍गम्‍वरि‍, व्‍योम व्‍यापि‍नि‍,
खंग-खप्‍पड़ चालि‍के?
रूप-रम्‍ये, गौरि‍ सौम्‍ये,
वत्‍सले, जनपालि‍के?

भाल रवि‍-शशि‍, पद पताले
हे अनंतक तालि‍के?
देवि‍, अहँकेर ओर नहि‍,
छी अहीं छोरक घालि‍के?
करू कृपा करूणामयी मां,
हे युभद्रे कालि‍के?

3) रौद्र गायि‍के

स्‍वरावद्ध रव रौद्र गायि‍के
छूम छनन छम-ताल नि‍रत पद-
नर्त्तित गति‍ गति‍, बह्ममाण्‍ड नायि‍के।।
स्‍वरा वद्ध रव रौद्र गायि‍के।।

अखि‍ल भुवन धहधह मसान बनि‍,
आबि‍ बसल गगनक गंगातट
सहज सुवासि‍त-चि‍ता-ज्‍योति‍सँ
मोहक-मादक-रोचक मरूघट

कालगालगत वकल भूतकेँ
वर्त्तमान-वि‍श्राम दायि‍के।।
स्‍वरावद्ध रव रौद्र गायि‍के?

भस्‍मीभूत क्षेत्र सौन्‍दर्यक,
पदतल परसि‍ बनल नंदनवन
सुरदुर्लभ भवि‍ष्‍य करतलगत
जागल नरकंकाल मुदि‍तमन

सुधाकलशपर चपल चरण दुहु
द्रवु द्रवु मां, हय, महाकालि‍के!
स्‍वरा वद्ध रव रौद्र गायि‍के?

दि‍गम्‍वरी, केशाच्‍छादि‍त कटि‍
रंजि‍त नयन, वि‍कट तन कारी
चकमक खंग, धहाधह खप्‍पड़
मुण्‍डक माल भयावह भारी
होउ, होउ समधान महेश्‍वरि‍
सहज वत्‍सले, प्रणत पालि‍के।।
स्‍वरावद्ध ख रौद्र गायि‍के।।

4)  श्री राम वंदना

अनुग्रह करू श्री सीता राम
हम प्‍यासल, भटकल मरूवासी
अहँ लटकल घनश्‍याम।।1।।
सहज कृपालु, सभक हि‍तकारी,
श्रमि‍तक पूर्ण वि‍राम
प्रेम वि‍भोर अधि‍क गद्गद् हम-
गुनि‍ अहाँक गुणग्राम।।2।।
अनुग्रह करू श्री सीताराम।।

अग्‍णि‍-परीक्षि‍त कंचन सन तँ
अछि‍ए चरि‍त ललाम
संग-संग चानन सम गमगम-
कोमन चि‍त नि‍ष्‍काम।।3।।
अनुग्रह करू श्री सीताराम
तपोमूर्ति सौन्‍दर्य-पि‍ण्‍डपर-
पल भरि‍ पद-वि‍श्राम
मुदा हृदयकेँ भक्‍ति‍-भीलनी
कीनि‍ लेलनि‍ वि‍नु दाम।।4।।
अनुग्रह करू श्री सीताराम

साकेतोसँ अधि‍क चमनगर,
दि‍व्‍य अयोध्‍याधाम
कर्मयोग लग राज भोगकेँ
त्‍यागल ठामेठाम।।5।।
अनुग्रह करू श्री सीताराम

वि‍गलि‍त नयन, धैर्य धऽ मन,
वन चललहुँ त्‍यागि‍ तमाम।
वि‍कल वि‍वश जन जनक अधरपर
राखि‍ अपन प्रि‍य नाम।।6।।
अनुग्रह करू श्री सीताराम।।
१.चन्‍द्रशेखर कामति- दूटा गीत २.राजेश मोहन झा-  पद्य ३.किशन कारीग़र- गलचोटका बर

चन्‍द्रशेखर कामति
           
गीत
आइ काल्हुक छौँड़ा सभ-

बाप रौ बाप, एहि‍ दुनि‍यामे अन्‍हार भ‍ऽ गेलै
नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै
गरम भ्रष्‍टाचारक बजार भऽ गेलय-2
पढ़ल-लि‍खल बैसल-बैसल माछी मारै छै,
जानय घोड़ा-घास ने से अंग्रेजी झारै छै
वाज-धंधा छोंड़ि‍-छोड़ि‍ कऽ छौंड़ा टल्‍ली मारै छै
लि‍ख लोड़हापर पत्‍थर बेटा दि‍ल्‍ली मारय छै
घरमे भुज्‍जी भांग नहि‍ सरकार भऽ गेलै,
नवका-नवका छौंडा सभ बेकार भऽ गेलै
गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलैए-2
पढ़ल-लि‍खल बैसल-बैसल माछी मारै छै
जे ने पढ़ल-लि‍खल से फुटानी झाड़ै छै
दुइऐ दि‍नमे ई बेटा होशि‍यार भऽ गेलै
शूर-बूट लगौने दि‍लीप कुमार भऽ गेलय
गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलै-2
बापक जेबी काटै छै सलि‍या देखै छै
माइक्रोसॉफ्ट गहना बेचै छै माेहब्‍बत करै छै
ढक्का-ढनमन लगबै छै फुटानी करै छै
गुपचुप-गुपचुप ई छौंड़ा पि‍हानी करै छै
घरसँ ताला तोड़ि‍ कऽ फरार भऽ गेलै
नयका-नयका छौंड़ा सभ बेकार भऽ गेलै
गरम भ्रष्‍टाचारक बाजार भऽ गेलै-2



2) लोक गीत

चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम
टीशनपर कीन देबौ थुर्री लताम
बाटो ताकैत हेतौ मामा बेकल भऽ
मौसी फोड़ैत हेतौ चि‍नि‍याँ बदाम
चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम
टीशनपर कीन.......

मामी जौं देखतह तँ मुँह बि‍जकेतौ
कानबें तँ हारि‍-मारि‍ कऽ मामो उठेतौ
मौसी छुलाछनि‍ कहर बड़पेतौ
मामी तँ कऽ देतौ जीअब हराम
च चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम

तहि‍येसँ मामाक सुधि‍-बुधि‍ हेरेलौ
जहि‍यासँ मामी हुनक घर एलौ
नानी-आ नानाकेँ हाथ-मुँह बन्‍हेलौ
बेटाक बि‍आह कऽ गि‍रला धड़ाम
चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम

रहतनि‍ ने सभ दि‍न हुनको जुआनी
एक दि‍न बदलि‍ जेतै सभटा कहानी
टि‍कलय सदरि‍ नहि‍ केकरो अरानी
उड़लय सुगनमा जय सि‍याराम
चऽल-चऽल- चऽल बौआ नानी गाम।
२.
राजेश मोहन झा
कवि‍ता-

 थेथर नेता
गुड्डी फॅसलै, गुड्डी फॅसलै
देखही बौआ, नेता खसलै।
जोर लगावह उठावह हि‍नका
साहि‍ दहुन डूबैत केर ति‍नका।।
मोन कनैए, आँखि‍ भरैए,
हि‍नका कारणे प्रजा मरैए।
भारी भरकम मंत्री संत्री गण,
पेट भूखल आ गहूम सड़ैए।।
आइ सी.सी आ एफसी आइ,
कतेको आइ मे यू नि‍मत्ता।
एक मासमे बनौता दि‍ल्‍ली,
तोड़ि‍ जोड़ि‍ मचोड़ि‍ केर सत्ता।।
हऽर घऽर आ बेट खरि‍हार,
मंत्री रहि‍तो ज्‍येाति‍ष केर जान।
कुटि‍ल मुस्‍कान लए सदन चलावथि‍,
भोजन पानि‍ वि‍नु गंगा स्‍नान।।
हमर सनेश ई सभ जनता केर,
मंहगी बढ़त सम्‍हारू धोती।
लोकक गरदनि‍मे फॉस लगौलनि‍,
पहि‍रथि‍ अपने माला मोती।।
कहथि‍ सुदामा सुनू मुरारी,
एहन थेथर नेता नहि‍ भारी।
बुद्धि‍ हरण भेल भूखे मरै छी,
दौड़ू लाऊ संग सस्‍ता थारी।।

किशन कारीग़र   
परिचय:-जन्म- 19830 कलकता मे मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दूमाताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी मे किशन नादान आओर मैथिली मे किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली मे लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान मे आकशवाणी दिल्ली मे संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।
          

 गलचोटका बर।

(एकटा हास्य कविता)

देखू.देखू हे दाए.माए
केहेन सुनर छथि गलचोटका बर।
तिलकक रूपैया छनि जे बॉंकि
सासुर मे खाए नहि रहल छथि एक्को कर।

अनेरे अपसियॉंत रहैत छथि
अल्लूक तरूआ छनि हुनका गारा मे अटकल।
खाइत छथि एक सेर तीन पसेरी
मुदा देह सुखाएल छनि सनठी जॅंका छथि सटकल।

केने छथि पत्रकारिताक लिखाई.पढ़ाई
दहेजक मोह मे छथि भटकल।
ऑंखि पर लागल छनि बड़का.बड़का चश्मा
मुहॅं कान निक तऽ चैन छनि आधा उरल।

ओ पढ़हल छथि तऽ खूम बड़ाई करू ने
मुदा हमरा पढ़नाईक कोनो मोजर ने।
बाबू जी के कतेक कहलियैन जे हमरो पसीन देखू
मुदा डॉक्टर इंजीनियर जमाए करबाक मोह हुनका छूटल ने।

जेना डॉक्टर इंजीनियरे टा मनुख होइत छथि
लेखक समाजसेवीक एको पाई मोजर ने।
सोच.सोच के फर्क अछि मुदा केकरा समझाउ
दूल्हाक बज़ार अछि सजल खूम रूपैया लूटाउ ने।




एहि बज़ार मे अपसियंॉत छथि लड़की के बाप
इंजीनियर जमाए कए छोड़ैत छथि अपन सामाजिक छाप।
एहि लेल तऽ अपसियॉंत छथि एतबाक तऽ ओ करताह
बेटीक निक जिनगी लेल ओ किछू नहि सोचताह।

अहॉं बेटी केॅ निक जॅंका राखब दहेज लैत काल
हमरा बाबू के ओ तऽ बड़का सपना देखौलनि।
ई तऽ बाद मे बूझना गेल जे किछूएक दिनक बाद
दहेजक रूपैया सॅं ओ पानक दोकान खोललैनि।

नहि यौ बाबू हम नहि पसिन करब एहेन सुनर बर
एतबाक सोचिए के हमरा लगैत अछि डर।
भले रहि जाएब हम कुमारी मुदा
कहियो ने पसिन करबए एहेन दहेज लोभी गलचोटका बर।
 गंगेश गुंजन- ३ टा गजल-पद्य

(ग़ज़ल जेकाँ किछु:मैथिली मे)
हम तं लाचार घेराएल रही
अहां तं अपने रही की केलौं
आन तं पहिनहि से छले आन
मुदा अहां केहन अप्पन भेलौं
सभ
दिस ताकि कबोआ-बौआ
अहींक पता भरि जनम तकलौं
जाइत तं सब अछि कोनो कारण
अहां मुदा ने जाइत किछु कहलौं
अहाँक अनुरोध बड़े मोन पड़य
हम सतत भावना मे बहलौं
ओहन समाज मे हम करितौं की
बाट नहि
धरितौं ई तं कतजैतौं
सब समाचार छल समाप्त वला
हम तैयो कोना जहर खैतौं
हमर तं प्राण छल एहिना जएबाक
ओहि मरणों मे हम कोना मरितौं
जे कहियो बूझल नहि मानल नहि
कोना एकरा अपन प्रार
ब्ध बुझितौं
हम एहि बाट पर अहां ओम्हर
एक संग दू दिशा मे चलि गेलौं
 
2
कोनो एक क्षण कोना कखन इतिहास बनैत छै
बूझल भेलय आब जीवनक एहि पहर मे

सौंसे दुनिया अपन अपन आकांक्षाक अन्हड़
रहलए निर्यात सोहनगर वस्तु घर घर मे

लोकगुणक, बो
धक विवेक सबहक परिभाषा
गढ़ल जा रहल नव संस्कृति म
धु मिलि जहर मे

आब गाम सन गामो बनल
धर्मक हिंसागृह
सम्प्रदाय-दंगा-
धर्मक छल जे बसल शहर मे

निष्ठा-प्रेम-प्रसंग भेल गेलय राजनीतिक चर्या
भोरे पहरक कैल प्रतिज्ञा बिसरल बेरु पहर मे

सम्वेदना सड़ल अचार फूटल बोइयाम मे राखल
सब स्वाद-रस-आस्वादन आश्रय लेलक अवसर मे

कूटनीति आ राजनीति विश्वनैतिक तेहन प्रबं
धन
अफसर भेटत राजनीति मे नेता सब अफसर मे

ओ छथि कतहु प्रवासी कोनो यू के-यू एसए मे
जनिक भूमि ई से निष्क्रिय छपकल अपना घर मे

बुद्धि काज ने
रनि गुंजन के लागल ठकमूड़ी
एहि षड्यंत्रक मोशकिल काटब जाल असकर मे
 
3
स्वतंत्रता-दिवस २०१०

गुदरी-चेथरी सीबैये
बड़ दिब जनता जीबैये
जेहने ई पवित्र पावनि
तेहन अछिन्जल पीबैये

नब मलिकाना ढब पसरल
घोड़ी-घास छीलैये
कखनो राजा आ महराज
एखन अंगरेज सँ मीलैये

जखन चलय परिवर्तन चक्र
सब
 सं अवसर छीनैये
अपन बिलासी बजटक भार
जनताक
 कान्ह पर धरैये

सुनैत छी आब अपनो देश
मंगल ग्रह पर चढ़ैये
भरि संसारक यूरो-युद्ध
लोकक
    भूखें   लड़ैये

दाना-दानाक लोक बेहाल
गहुम गोदाम मे सड़ैये
फुटपाथी दोकान मे ठाढ़
पुरने बस्त्र
  मौलबैये

देशक नायक सभा समेत
ध्वजा ऊँच फहरबैये
लोकगीत-नादक नामे
रॉक एन रॉल करबैये

गाम भरिक अनेक घर मे
दीपो कहाँ आब आब जरैये
सब जेना मिझाएल मुरझल
दिल्ली जगमग करैये

संभव छैक पटनो हो इजोत
गाम बिहारक कानैये
ई महान राष्ट्रक त्योहार
धरती रौद सं जरैये

लोक कर्ज़ मे डूबल अछि
किसान लोक सब मरैये
अमेरिका मे जे डॉलर
फ्राँस मे यूरो फरैये

हमरा गामक बाध समस्त
धहधह जेना कि
  धधकैये
ओत' उमेद आ आश्वासन
बाट देखैत लोक मरैये

जानि ने कहियाक चलल
रिलीफ हमरो बस्ती पहुँचैये
छीन लेलक से बड़ सुभ्यस्त
ठाढ़ रहल भीख माँगैये

शहरक सब लाल बत्ती
भीखक हाथ पसारैये
आजुक दिनक खोराकीक खोज
साधारण जन लड़ैये

देश शीर्ष पर होइत परेड
चैनल सब दरसबैये
एक-एक पल डेगक झाँकी
दुनिया के झलकबैये

ई नहि अपने देखय ओ
जे किछु सबटा करैये
केहन विकट द्वन्द्व आगाँ
जीअय लोक ने मरैये

सोझाँक शक्ति विरुद्ध अछैत
तैयो किएक ने लड़ैये
भरिसक नैतिक दुबिधा-द्वन्द्व
सब संबंधीए लागैये

तहियाक समय छलय दोसर
बूझल
 बिदेशी 'लैये
आइ तं ई नबका अंग्रेज़
सोदर-मसियौत लगैये

तें एहनो महान ई दिन
आत्मा मे नै उतरैये
हो जिनकर ई देश रहओ
हमरा तं नै अरघैये

आब लागय गुंजन सब युग
मुँह देखि मुँगबा परसैये
( १५ अगस्त, २०१० ई.)
डॉ राजीव कुमार वर्मा आ डॉ जया वर्मा- हमर  गाम
 
डॉ. राजीव कुमार वर्मा 1963- , डुमरा, सहरसा। जन्म २१.०७.१९६३, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। कतेको अनुवाद खास कऽ श्रीमति शेफालिका वर्माकबोल्डनेसक लहासकोर्प्स ऑफ बोल्डनेस”-स्पैरो, मुम्बै द्वारा प्रकाशित आ श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यासनागफाँसक अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)।
डॉ. जया वर्मा 1964-
जन्म १६.०२.१९६४. एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। महाकाव्य आ पुराणमे नारीजेन्डर स्टडीजपर विशेष अध्ययन। श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यास नागफाँसक अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)।

हमर  गाम


हमर नाम की
हमर गाम की
पुच्छ्लौं अपना सँ
हमर पहचान की

चान देखलौं, सूरज देखलौं
तारागण सेहो देखलौं
लागल गामक
मुदा एतेक कोलाहल
एतेक गाड़ी , एतेक प्रदुषण
नहि नहि इ हमर गाम नहि छी

बड़का मैनक मखान
पोखरक कवई माछ
भुट्टा आ छिमीक बीच मचान
ओरहा आ पियौज आ अचारक संगे चौरक रोटी
सभ छुटि गेल

बरमक थानक देवता
भगवान शंकरक मंदिर
कनैलक फूल
इनार सँ डोले डोल पानि
सभ छुटि गेल

कोसी बाँधक सांझ
चौठ्चानक दही
सामा चकेवा
उजरिया रातिक नाव पर झज्झैर
सभ छुटि गेल

मंगला कुजराक केरा
घूरक पकायल अल्हुआ
ताशक बाजी
चाह पर चाह
सभ छुटि गेल

अब ते देखै छी
नहरक छैठ
ड्राइंगरुमक मधुबनी पेंटिंग
सिनेमा हौलक  पोपकोर्न
बिन रंगक होली
सोसाइटीक बेस्वाद दिवाली

केकरा सँ  मैथिली बाजू
अब ते विदेह सँ आस अछि
विदेहक रचनामे गामक तलाश अछि
गाम मिळत तं अपन पहिचान पाबि लेब
१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी ३.श्वेता झा (सिंगापुर)

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 
काली माँ


२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

३.श्वेता झा (सिंगापुर)


बालानां कृते
राजेश मोहन झा
कवि‍ता-

मूड़नक भोज

रसगुल्‍लामे बि‍च्‍ची, जि‍लेबी काँच,
गरम तरकारीपर बैसला पूरी पाँच
मूड़नक भोज कएलनि‍ इंजि‍नि‍यर,
हाथे लोटा बि‍गड़ल इंटीरि‍यर।।
जेठक दुपहरि‍यामे भागम भाग,
धांगलौं मूंग आ पालाॅकी साग।
पेटमे मीठका टीस उठैए
जहि‍ना मकइया सीस झड़ैए।।
हेल्‍थ वि‍भाग लगौलनि‍ अनुमान,
गरजक संग बौछार समान।
बाजू मोनसँ केहन लगैए,
सूइया पहाड़पर कंकड़ गड़ैए।।
बि‍रेन्‍द्र बचावू, मुन्‍ना बचावू,
आब एहन नहि‍ भोज देखाउ।
इंजि‍नि‍यर मास्‍टर केर कुचक्रमे,
अन्‍हारे हाथे लोटा धेलहुँ।।
आव एहन नहि‍ खाएब जि‍लेवी,
हजम चूर्ण आ जमैनक सेवी।
भगवान अहाँक आमद बढ़ावथु,
आगाँ बढ़ि‍याॅ भोज खुआबथु।।
सि‍द्ध अन्न खाएब अहाँ घर जहि‍या
उकरि‍न हएब भोज दोससँ तहि‍या।
सुनू औ कतवो वेतन बढ़तनि‍,
मुदा नहि‍ खानदानी स्‍वभाव बदलतनि‍।।
 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...