Monday, November 29, 2010

'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३५ अंक ७०)- PART III



 ३. पद्य







३.६.राजेश मोहन झा- चुट्टी

३.७.१.रमाकान्‍त राय रमा-बाल कवि‍ता-उल्‍लूक शि‍कारी २.मिथिलेश कुमार झा-बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया ३.महाकान्त ठाकुर- किछु बाल कविता

  
 १.जीवकान्‍त-बबलू बनबय छक्का-सत्ता २.अहाँ आबु
जीवकान्‍त

बाल साहि‍त्‍य/ कवि‍ता

बबलू बनबय छक्का-सत्ता



एक टोलमे बबलू अकलू
दू नेना छल
समतुरि‍या छल
बबलूकेँ छल बन्‍ति‍क खुट्टी
आमक तख्‍ता केर पि‍टना छल
ओहि‍ पि‍टनासँ रबड़ गेनकेँ ओ पि‍टैत छल
रन बनबै छल
अपनहि‍ रनकेँ गनि‍-गनि‍ लै छल
गनि‍ कऽ जोर-जोरसँ बाजय
अकलूकेँ एस्‍कोर सुनाबय
एक गली छल टोल कातमे
ताही ठाम क्रि‍केट चलै छल
...   ...   ...   ...
एक दि‍वस बेरि‍याँमे बबलू
बौल बैट लेने बहराएल
अकलूकेँ ओ ताकि‍ नि‍कालल
जगह देखि‍ कऽ ईंटा रखलक
बल्‍ला लऽ कऽ भेल ठाढ़ ओ
दोसर दि‍स देलक इटकोरी
बौल करह कोर जगह बनौलक
अकलूकेँ ओ मना-मना कऽ
बौल फेकबाक भारा देलक
बबलू पीटय गेन, उड़ाबय
दुग्‍गी-ति‍ग्‍गी रन बनैत छल
बहुत जुमा कऽ गेन उड़ाबय
चौका-छक्काकेँ गनैत छल
    
अकलू बे-परवाह लगै छल
गेन पकड़ि‍ कऽ लऽ अनैत छल
आ फेकैत छल
कते भेल रन से सुनैत छल
सुनि‍-सुनि‍ कऽ ओ दुख ने मानय
अथवा कोनो सुख नहि‍ पाबय

एक शौट तेन्ना कऽ लगलै
गेन सरंग-गोलि‍या भऽ गेलै
उड़ि‍ कऽ ओ अँगना चल गेलै
गेन तकै ले अकलू भागल
अँगना पैसल
ओ अँगना छल, अकलुक अँगना
माय एक दसटकही देलकै, आर कहलकै-
सुन रे अकलू
देखही जे दोकान फुजल छै
ओइ दोकानसँ पत्ती ला गय
चाहक पत्ती बहुत जरूरी
पानि‍ गरम छै
डि‍ब्‍बा पूरा खाली छै, रे!
जल्‍दी चाही, ला दे जल्‍दी...।‍
ओ कहलक जे गेन तकै अछि‍
माए कहलकै-
पछि‍ला बाटेँ तोँ बहरा जेा
सोझे जा दोकानमे ढुलि‍हेँ
पत्ती लीहेँ
दौगल अबि‍हेँ‍।
अकलू भागल
पछि‍ला रस्‍तासँ बहराएल
....   ....   ....   ....
इमहर बबलू दौगि‍ रहल अछि‍
रन गनैत अछि‍
चारि‍ भेलै, तँ छब्‍बो भेलै
से भेलैक, तँ छब्‍बो पुरलै
दौड़य बबलू, रनकेँ जोड़य
लगले उन्‍तीस-तीस पुरौलक
पुरलै लगले एक पचासा
हकमि‍ रहल अछि‍ बबलू भैया
दौड़ि‍ रहल अछि‍ आ बनबै अछि‍
साठि‍ बनै छै ’’’ बनल जाइ छै
घाम-पसेना बहल जाइ छै।

संस्कृति  वर्मा , क्लास ४था  , क्विन मेरी स्कूल , मॉडल टाउन , दिल्ली 
 अहाँ आबु
नेहरु चाचा , अहाँ कतऽ चलि गेलौं.
देख लिअ अहाँ  नेना सभकेँ की कऽ गेलौं..
हमर पीठपर भारी बस्ता 
ओहिमे किताब कोपीक ठेलम ठेल देखू 
हमर उमिर मात्र आठ  बरिस 
हमर पीठ आ कान्हक हाल देखू.
चाचा, केओ नै देखऽवाला हमरा सभकेँ 
केओ नै बुझऽवाला हमरा सभकेँ 
दुर्दिन आबि गेल हमर सबहक 
अपन राजक हाल देखू.
कतेक पढ़ब कतेक लिखब 
सभ विषय एखने पढ़ि लेब तँ
इंजीनियर डाक्टर एखने बनाबू..
कखनो खेलक नै हिसाब देखू 
अहाँ गुल्ली-डंडा, कबड्डीक गप कहलौं
हम क्रिकेटले बेहाल ,  देखू. 
एक बेर अहाँ फेरो आबू, अपन नौनिहालकेँ
अहाँ बचाबू. 
हम नीक नागरिक बनब 
देशक नाम ऊँच करब
एहि बोझसँ मुक्ति अहाँ दियाबू...
चाचा नेहरु अहाँ आबू ..............
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।

प्रयास वा पलायन

अपन साक्षात्कारक प्रयत्न केलहुँ
स्वयं आत्म निरीक्षण करैत
बीतल समय के समीक्षा लेल।।
कायरताके विद्वता बुझलहुँ
सत्यक कटुता सऽ नुकाइत
जतय सऽ मोन पलायित भेल।।
स्वयंके दागहीन रखलहुँ
नितदिन नब सिद्धान्त रचैत
आदर्श बहुत सम्मानित भेल।।
प्रिस्थितिक जोर जैने चिन्हलहुँ
भुक्तभोगीके हालत बुझैत
गहन आत्मग्लानि भेल।।
जतय रूकिकय संघर्ष केलहुँ
जय पराजय तुच्छ बनैत
अपन योग्यता परिलक्षित भेल।।

किशन कारीग़र   
परिचय:-जन्म- 19830 कलकता मे मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दूमाताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी मे किशन नादान आओर मैथिली मे किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली मे लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान मे आकशवाणी दिल्ली मे संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।
एकटा तऽ ओ छलीह।
कनैत छलहुँ माए गे माए-बाप रौ बाप
हे रौ नंगट छौंरा रह ने चुपचाप
नूनू बाबू कऽ ओ हमरा चुप करा दैत छलीह
एकटा तऽ ओ छलीह।

बापे-पूते के कनैत छलहुँ कखनो तऽ
ओ हमरा दूध-भात खुआ दैत छलीह
बौआक मूहॅं मे घुटूर-घुटूर कहि ओ
अपन ऑंखिक नोर पोछि हमरा हॅसबैत छलीह।

खूम कनैत-कनैत केखनो हम बजैत छलहुँ
माए गे हम कोइली बनि जेबउ
नहि रे बौआ निक मनुक्ख बनि जो ने
आओर कोइली सन बोल सभ के सुनो ने।

केखनो किछू फुरायत छल केखनो किछू
नाटक मे जोकर बनि बजैत छलहुँ बुरहिया फूसि
मुदा तइयो ओ हॅंसि कऽ बजैत छलीह
किछू नव सीखबाक प्रयास आओर बेसी करी।

रूसि कऽ मुहॅं फुला लैत छलहुँ
तऽ ओ हमरा नेहोरा कऽ मनबैत छलीह
कतो रही रे बाबू मुदा मातृभाषा मे बजैत रही
अपना कोरा मे बैसा ओ एतबाक तऽ सीखबैथि छलीह।





मातृभाषाक प्रति अपार स्नेह गाम आबि
नान्हि टा मे हुनके सॅं हम सिखलहुँ
गाम छोड़ि परदेश मे बसि गेलहुँ
मुदा मैथिलीक मिठगर गप नहि बिसरलहुँ।

अवस्था भेलाक बाद ओ तऽ चलि गेलीह ओतए
जतए सॅं कहियो ओ घूमि कऽ नहि औतीह
मुदा माएक फोटो देखि बाप-बाप कनैत छी
मोन मे एकटा आस लगेने जे कहियो तऽ बुरहिया औतीह।

समाजक लोक बुझौलनि नहि नोर बहाउ औ बौआ
बुरहिया छेबे नहि करैथि एहि दुनियॉं मे
तऽ कि आब ओ अपना नैहर सॅं घूरि कऽ औतीह
मरैयो बेर मे बुरहिया अहॉं कें मनुक्ख बना दए गेलीह।

बुरहियाक मूइलाक बाद आब मइटूगर भए गेल किशन
ओई बुरहिया के हम करैत छी नमन
अपन विपैत केकरा सॅं कहू औ बौआ
कियो आन नहि ओ बुरहिया तऽ हमर माए छलीह।

 
अनमोल झा 1970-
दूटा बाल कविता
गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।

अपन गाम
बौआ जेतै अपन गाम
ओतऽ सँ अनतै बहुते आम
एकटा आम दीदीकेँ देतै
एकटा आम अपने खेतै
एकटा आम काँचे
बौआक मामी नाचै।

बौआक पापा छै बड़ कसाइ
मारलकहेँ बौआक गाल फोड़ि आइ
अबै छै बाबूजी देतै घरसँ बैलाइ
बाबूक राखि लेब कैडवरी खुआइ।

बौआक माइ सेहो कसाइ
मारलक हे बौआक पीठ फोड़ि आइ
बजबै छी रिक्शा, देब नैहरा बैलाइ
बाबूक पोसि लेब दूध-भत्ता खोआइ।

मास्टरबो टटीबा सब छै बड़ कसाइ
फोड़ि देलक बौआक गत्र-गत्र आइ
फिरथु जनपीटा देबनि रस्ता भुलाइ
पढ़ौनी ने लिखौनी शिक्षा मित्रक कमाइ।

बुच्चीक पपा छै बड़ कसाइ
मारलक बुच्चीकेँ लोल फोड़ि आइ
अबै छै बबा, काइत पापाक धोलाइ
पढ़ि-लिखि बुच्ची भऽ जेतइ बुधियारि।

बुच्चीक माइ छै बड़ कसाइ
मारलक हे बुच्चीकेँ झोंट तीर आइ
अबै छै फल्लमा, देतै नैहरा बैलाइ
बुच्ची रानीकेँ राखि लेब छाती लगाइ।

मामा गाम

बौआ जेतै मामा गाम
ओतऽ सँ अनतै पाकल लताम
एकटा लताम काँचे
बौआक नानी नाचै।

बौआक मामा गाममे श्यामजी भाइ
जेतै बिदेसर अनतै लाइ
खेतै सब मिल लाइ-मिठाइ
बाँटि-खुटि खाइ राजा घर जाइ
असगर खाइ डोमा घर जाइ।

बुच्चीक मामा गाममे बंटी दाइ
जेतै मेला, लेतै पाइ
किनतै गुड़िया, नचतै आइ
खेतै जिलेबी, अनतै लाइ
मैयाँ तै ले बीतल जाइ।

मामा गाममे पूजा दाइ
दू बहिन आ असगर भाइ
सब मिल खेलय-पढ़ितो जाइ
एलै परीक्षा गद्-गद् भाइ
पढ़ै-लिखै मे सभक भलाइ।

बौआक मामा गाममे
ओम भाइजी आ आस्था दाइ
रहै जाइ छै दिल्लीमे, एतै आइ
मामा-मामीक गाड़ी पर
घुरतै आइ, खेतै मिठाइ।

पटना बाली मामी बड़ होसिआरि
बौआ मामाकेँ बना देतनि फेहम गे दाइ
सोनू दीदी गाम जखन एतै गै माइ
बौआ सब मामा गाम जेतै गै दाइ
खेलेतै खूब, खेतै मिठाइ।

बौआक बड़का मामा-मामी केहन कसाइ
अपने खाइ छै रस मलाइ
खाइते रहै छै कखनो ने अघाइ
नाना-नानीकेँ दै छै नून-मरचाइ
नाना-नानी चाहै छै तइयो भलाइ।

सब एक दिन बुढ़ हेमे गे दाइ
बुढ़बा-बुढ़ियाक कष्ट हुअए ने भाइ
सब दिन एक समय रहय ने दाइ
समयसँ जे पढ़त से बड़ होसिआरि
नै पढ़ने कोना हैब बुधिआरि?

राजेश मोहन झा 1981-
उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि।

बाल वि‍शेषांक लेल
राजेश मोहन झा
कवि‍ता

चुट्टी

दाइ गे दाइ तोँ बड़ हरजाइ
भागेँ ओहि‍ दि‍शि‍ देखेँ जत्ताहि
ढेपा गुड़क गुड़कल जाए
तोहर चालि‍पर नेना सभ जानथि‍
माय रखलथि‍न कतऽ मि‍ठाइ
काया छोट काज छौ मोट
बास बनौलेँ केवाड़क ओट
जौं काटें बपलहरि‍ छोड़ाबें
जहि‍ना मुँहमे पड़ल मि‍रचाइ
गणेशक लड़डू महादेवक भंग
सि‍नेह तोरा छौ सबहक संग
ितल संक्रांति‍ तोरे लेल बनलौ
नाचि‍-नाचि‍ कऽ खा लै छेँ लाइ
पॉति‍सॅ जाइ छैं पाति‍मे आबेँ
नि‍यम गणनाक खूब बुझावे
होइछ हल्‍ला उद्यम पटका
जौं कोनो नेना एकरा देथि‍ वि‍सराइ।
 १.रमाकान्‍त राय रमा-बाल कवि‍ता-उल्‍लूक शि‍कारी २.मिथिलेश कुमार झा-बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया ३.महाकान्त ठाकुर- किछु बाल कविता


                 
रमाकान्‍त राय रमा

बाल कवि‍ता
उल्‍लूक शि‍कारी

नन्‍हेँ भाय खेलए चललनि‍
हाथ लेने बन्‍दूक
लगलनि‍ दनदन फायर करऽ
ओ पक्षी देखि‍ उलूक
नव लोक, नव चालि‍-चलन
नवे-नव बन्‍दूक
जानथि‍ नहि‍ ओ गोली दागब
गेलनि‍ लक्ष्‍यसँ चूकि‍
उड़ि‍ गेल पक्षी, नन्‍हेँ भाय तँ
मुँह लटकौने अएलाह
लल्‍लूक पक्षीक शि‍कारी जे
उल्‍लूए बनि‍ घुरि‍ अएलाह।
                             
मिथिलेश कुमार झा 1970-
पिता- श्री विश्वनाथ झा, जन्म-12-01-1970 केँ मनपौर(मातृक) मे पैतृक-ग्राम-जगति, पो*-बेनीपट्टी,जिला-मधुबनी, मिथिला, पिन*- 847223 शिक्षा :प्राथमिक धरि- गामहिक विद्यालय मे। मध्य विद्यालय धरि- मध्य विद्यालय, बेनीपट्टी सँ। माध्यमिक धरि- श्री लीलाधर उच्च विद्यालय,बेनीपट्टीसँ इतिहास-प्रतिष्ठाक संग स्नातक-कालिदास विद्यापति साइंस काँलेज उच्चैठ सँ, पत्रकारिता मे डिप्लोमा-पत्रकारिता महाविद्यालय(पत्राचार माध्यम) दिल्ली सँ, कम्प्युटर मे डी.टी.पी ओ बेसिक ज्ञान। रचना: हिन्दी ओ मैथिली मे कविता, गजल, बाल कविता, बाल कथा,साहित्यिक ओ गैर-साहित्यिक निबंध, ललित निबंध, साक्षात्कार, रिपोर्ताज, फीचर आदि।

बाबाक रोपल गाछ सिनुरिया
पातसँ बेसी लुधकय आम।
देखैत हियसगर खूब सुअदगर
रसगर गुदगर मिठगर आम।
आमिल, अमोट, अँचार-कसौँझी
हुअय साल भरिक ओरियान।
बहुते दूरमे चतरल-पसरल
रखने पुरना गाछिक मान।
परसथि बाबी टोला-पड़ोसा
भार चङेरा आनहु गाम।
जन-बोनिहार उमठि जाइत अछि
खा-खा हमर सिनुरिया आम।
बाट-बटोही अघा जाइत अछि
कोनो साल जाइ ने बाम।
सौँसे गाछिक राजा अछि ई
बाबा वला सिनुरिया आम।
महाकान्त ठाकुर
किछु बाल कविता
स्नेहक सरगम
प्रेमक भाषा प्रेमक आशा सभ करैए
प्रेम करब नहि सोझ बोझ बनि लोक रहैए,
चाहि रहल सभ पड़ले भेटओ लुब्धल-लुब्धल
हमरे भेटओ हमरे भेटओ सभ तकैए।

नीक मनुख सुख सभ लय ताकय सदिखन आगू
अपन आन संग स्नेहक सरगम खूब बंटैए।

अपना सँ पैघक आदर मे सदिखन तत्पर,
छोटको भाइ बहीनक सदिखन ध्यान रखैए।

खगता भगतसिंहक

पढ़ि-पढ़ि बनिहें एहन सिपाही
सभतरि लोक करौ वाहवाही
एहन संतानक अलगे धाही
खगता छैक भगतसिंह चाही।

आजादी नहि लोक देखलकै
अधिकारक नहि स्वाद चिखलकै
पसरल देश मे भ्रष्टाचारी
खगता छैक भगतसिंह चाही।

पहिने छलै विदेशीक शासन
आबक शासक झाड़ै भाषण
साँढ़े जकाँ लगाबै ढाही
खगता छैक भगत सिंह चाही।

अपन भूमि

आम गाम मे गाछी छल, दूध दुहैक छै बाछी चल
शहरक जिनगी भागम-भाग, गाम अपन लऽ लाठी चल
थाल पानि संग लीची जामुन, पान-मखान लऽ माटी चल
जन्म भूमि स्वगो सँ सुन्दर, कहलनि बाबा खाँटी चल।

भरि पोख

कोइली मिठ-मिठ गीत गबैए
कौआक देखसी कहाँ काइए।

बौआक ठोर बँटैए सभटा,
हँसि-हँसि सभ सँ मेल करैए।

खन रूसय खन बात बनाबय,
झूला-झूलक भाँज पुरैए

सोचैछ चाँद तरेगन पकड़ब
बाजैछ माँ गै भूख लगैए।

भेद-भाव नहि अन्तर जानय,
स्नेह दुलारक भाव बँटैए।

कोरा कन्हा चढ़ि-चढ़ि घूमय
काका-बाबाक पीठ चढ़ैए।

स्नेहक भाषा सबहक आदर,
लेब-देब भरपूर करैए।

ज्ञान दीप

विद्यालय मे ज्ञान भेटै छै बौआ-बुच्ची पढ़ि-पढ़ि आउ,
की की सिखलौं, की की पढ़लौं, माँ बाबू के रोज सुनाउ।

आँखि सँ देखल चीज सँ आगू ज्ञान सँ देखब ब्योंत धराउ,
मोनमे गुड़कय बहुतो लड्डू बुद्धि-विवेक संग खाउ खेलाउ।

जे चमकैछ सभ सोना नहि अछि, ठोकि बजा कऽ निकहा लाउ,
हीरा-मोती सभ नहि चिन्हैछ, विद्याधन लऽ आगू आउ।

दुःखक मोटरी माथ दुखाबय, सुख चाही शिक्षित संग पाउ,
जत्तहि छैक अविद्या पसरल, ज्ञानक दीपक बार कऽ आउ।

डॉ जया वर्मा 1964-
जन्म १६.०२.१९६४. एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास, दिल्ली वि.वि.। महाकाव्य आ पुराणमे नारीजेन्डर स्टडीजपर विशेष अध्ययन। श्रीमति शेफालिका वर्माक उपन्यास नागफाँसक अंग्रेजी अनुवाद (विदेह ई-पत्रिकामे धारावाहिक रूपे)।



                   बेटी

नेहरु कोनो व्यक्ति नहि
एकटा भाव छथि
स्वतंत्रता मानता शक्तिक
संभार छथि

चाचा नेहरुक कोट लागल गुलाब
नेनाक प्रतीक अछि
ऊपर सँ कोमल सुगंधि पसारैत
मुदा भीतर सँ जे
निर्भय आ निडर अछि

नेहरुक नेना इंदिरा प्रियदर्शिनी सन
देशक शान अछि बेटी
बेटी कें दुलार करू
दुतकारू नहि
बेटी अर्चना अछि
पूजा करू

जाड़क रौद सन बेटी
गरमीक  छाहरि  सन बेटी
जीवनक गीत संगीत बसैत अछि
ओहिमे
नहि रसहीन अछि जिनगी

फूल मे मुस्का
सावनक बरसात सन बेटी
झरना सन चंचल आ गतिशील
थाकल मोनक
चैन अछि बेटी

बाड़ीक लहलहावैत
हरिरी अछि बेटी
मौन सागरक लहरि मे बजैत
संगीत सन बेटी

ईश्वर ओकर रक्षा करू
केकरो नजर नहि लागैक
माएक प्यार दुलार अछि बेटी

जग के आलोकित करवा लेल
दीयाक लौ सन चमकैत बेटी
अकास मे सूरज सन दीप्त बेटी

बेटी शक्ति दुर्गा सन
क्षमा सीताक श्रद्धा राधा सन
लक्ष्मीबाक शौर्य सँ भरल
बेटी

बेटी बेड़ी नहि स्वच्छंद
बयार अछि 
नहि बान्हु कोनो सीमा मे
अनंत आकासक सीमा
स्वयं बनाओत  बेटी

ठि पोखरिक  गीत
पा पुत्तर अन्न - धन लक्ष्मी
धियवा मंगबो जरुर

नेहरुक बाल दिवसक सन्देश
बेटा बेटी सभ बराबर
सभ एके श्वरक संतान
फेर किएक करैत अछि
फर्क नादान इंसान


 मिथिला कला संगीत

१.श्वेता झा चौधरी २.श्वेता झा (सिंगापुर)

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 
पनिभरनी
 २.श्वेता झा (सिंगापुर)





बालानां कृते
तुनिशा प्रियम, माँक नाम- स्व. निभा रानी, पिता- डॉ. रमेश कुमार राय, नाना- प्रो. शिवनाथ मंडार, विभागाध्यक्ष भूगोल, बलिराम भगत कॉलेज, समस्तीपुर। नानी- श्रीमति निरुपमा पटेल, प्रधानाध्यापिका, म.वि.गाँधीपार्क, समस्तीपुर। जन्मतिथि- २०-१०-१९९८ पैतृक गाम- मँझौलिया, प्रखण्ड- बोचहा, जिला मुजफ्फरपुर, मातृक- ग्राम-धोबियाही, पोस्ट- बहेड़ी, जिला-समस्तीपुर। छात्रा- कक्षा- सप्तम ”, डी.ए.वी. स्कूल, समस्तेपुर। आदर्श- नानाजी। आवास, आशियाना भवन, रोड नं.०२, आदर्शनगर, समस्तीपुर।
किछु चित्र


 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।


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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...