Monday, November 29, 2010

'विदेह' ७१ म अंक ०१ दिसम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३६ अंक ७१)- PART I


                     ISSN 2229-547X VIDEHA
'विदेह' ७० म अंक १५ नवम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३ अंक ७०)NEPAL       INDIA                                                                               
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य      









 

३. पद्य









३.६.१.सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल २.रामवि‍लास साहु- कवि‍ता-कोशीमे समाएल जि‍नगी


३.७.कालीकान्‍त झा बूच- अंति‍म- कवि‍ता- कहि‍या धरि‍ उदासी

  


४. मिथिला कला-संगीत-.ज्योति सुनीत चौधरीश्वेता झा (सिंगापुर)

 भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ।

मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
http://devanaagarii.net/
http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 

Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ।
 VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव

example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"
विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ।
"मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ।

 

१. संपादकीय

स्वर्गीय जयकान्त मिश्रक सुपुत्र श्री कशिक मिश्र सूचित केलल्हि अछि जे हुनकर पिताजीक समस्त मैथिली पुस्तकालय मैथिली विभाग, ल. ना. मि. वि.वि. दरभंगाकेँ दऽ देल गेल अछि जाहिमे २५०० सँ बेशी पोथी-पत्रिका छै। मैथिलीक विद्यार्थी-शोधार्थी ओकर उपयोग कऽ सकै छथि।

सूचना: अन्तराष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन काठमाण्डौ मे २२ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"क संयोजकत्वमे आयोजित भऽ रहल अछि। श्री कापड़ि नेपाल प्रज्ञा संस्थानमे मैथिलीक प्रतिनिधित्व कऽ रहल छथि आ ई साहित्य क्षेत्रमे नेपालक सभसँ पैघ प्रतिष्ठाबल पद अछि ओहिना जेना भारतमे "साहित्य अकादमीक फेलो" होइत अछि।
२२ दिसम्बर २०१० केँ ई आयोजन नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, कमलादी, काठमाण्डौ आ २३ दिसम्बर २०१० केँ अग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे आयोजित होएत। दुनू दिन आवस आ भोजनक व्यवस्था ग्रवाल सेवा केन्द्र, कमल पोखरी, काठमाण्डौमे रहत।

नाटक-एकांकी विशेषांक/ मैथिली-समीक्षा विशेषांक: विदेहक हाइकू, गजल, लघुकथा बाल-किशोर विशेषांकक बाद विदेहक 15 दिसम्बर 2010 अंक नाटक-एकांकी विशेषांक आ 15 जनवरी 2011 अंक मैथिली-समीक्षा विशेषांक रहत। एहि लेल टंकित रचना, जकर ने कोनो शब्दक बन्धन छै आ ने विषएक, 13 दिसम्बर 2010 धरि नाटक-एकांकी विशेषांक लेल13 जनवरी 2011 धरि मैथिली-समीक्षा विशेषांक लेल लेखक ई-मेलसँ ठा सकै छथि। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।


(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०७ देशक १
,६११ ठामसँ ५२,६४७ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,७७, ९५२ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)

गजेन्द्र ठाकुर

२. गद्य









 श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)- आगाँ
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम.ए., पी.एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका (अवकाशप्राप्त)। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक
.......
सस्नेह- केदारनाथ लाभ, राजेन्द्र कॉलेज, छपरा।
एखन धरि हुनका सँ हमरा भेंट नहि भेल छल। ई पत्र हमरा ओ सहरसाक पतासँ देलनि-हम डुमरा मे छलौं।
प्रिय रजनी
मेरे स्नेह ।
राखी का त्योहार आने के बहुत पहले से तुम्हारी स्नेहिल स्मृतियाँ घनीभूत होने लगती हैं और मैं राखी की  तुम्हारी राखी की प्रतीक्षा करने लगता हँू । और हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी सही समय पर तुम्हारी राखी-तुम्हारी स्नेह-सुगंध से महमहाती - आ गयी । हृदय जुड़ा गया  मन-प्राण आप्यापित हो उठे  आँखे हर्ष-उल्लास से फैल गयी ।
सलोनी पूर्णिमा को वह राखी मेरी कलाई मे बाँधकर मानो दो प्राणों को जोड़ गयी । यह सलोनी पूर्णिमा भी क्या गजब का दिन है। भाई-बहनों को स्नेह-सूत्र मे बाँधकर आनन्द की ज्योत्सना उड़ेल देती है उस दिन की हर घड़ी । राखी के सूखे धागे मे स्नेह का काव्य-रस छलक उठता है छूट उठती है किसी दूर से आनेवाले संगीत की मादक स्वर लहरी  नाच उठता है प्रसन्नता से मन का मयूर और राखी भेजनेवाली बहन को मेरा हृदय अशीषने लगता है। तुम्हारा जीवन सुख शान्ति और समृद्धियों के संगीत से गूँजता रहे, तुम शतायु होकर अपनी साहित्य-साधना से लोक मंगल करती रहो - यही इस भाई की अशेष कामना है।
विश्वास है तुम सबके सब सानन्द हो । वर्मा जी को मेरा स्नेह निवेदित हैं। शुभकामनाओं
सहित।
तुम्हारा भाई
केदार नाथ लाभ
भारत छोड़ो स्वर्ण जयंती
9 अगस्त 93
आदरणीया शेफालिका जी
यथोचित
भाई नीरज से और आपके पत्र से भी  यह विश्वास जगा कि आप जैसी सशक्त लेखिकाओं के मन-मस्तिष्क मे भी निशांत के प्रति किसी न किसी अनुपात मे जगह हैं । बस इसी समर्थन भाव के बल पर ही तो निशांत धारा के प्रतिकूल जूझता हुआ अपने महान उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है। अतः आपलोगों का यह समर्थन हमारे लिए काफी बहुमूल्य है। और इस समर्थन भाव के प्रति आप जैसी महानुभावों का निशांत सदा ऋणी रहेगा ।
पत्र-पत्रिकाओं के जरिये शायद पता चला हो कि पिछले महिने 19 जनवरी 1960 को महान
साहित्यकार व चिन्तक माननीय आनन्द शंकर माधवन जी के संरक्षकत्व तथा श्री रामाधिकारी शर्मा की अध्यक्षता मे लेखकों के हितों की रक्षा एवं उनके मूलभूत उद्देश्यों की पूर्ति के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ को स्थापना की गई है।
राष्ट्रीय स्तर के इस संघ का विभिन्न राज्यों तथा जिलों मे शाखाएँ तेजी से खोली जा रहीं है। बिहार के बतीसो जिलों मे से अधिकांश मे तथा कुछ राज्यों मे यथाशीघ्र इसकी शाखाएँ खोलकर एक जबर्दस्त अधिवेशन आहूत करने की घोषणा है।
आप भी संभवतः इस बात से सहमत हों कि वर्त्तमान समय मे बिना एकजुट हुए लेखक अपने अस्तिव की रक्षा नहीं कर सकते । इन्हीं सब महत्त्वपूर्ण उदेश्यों की पुर्त्ति के लिए
'writers club' की स्थापना की गई है। जिसमे आप जैसे सशक्त और समृद्ध लेखिकाओं का योगदान अपेक्षणीय है। चाहता हँू आप भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के संयोजन का भार स्वीकार कर सहरसा मे इसकी जिला शाखा खोलकर अपना महत्पूर्ण योगदान दें । निश्चय ही आपका ऐसा समर्थन हमारे लिए एक गौरव की बात होगी । आप इस सम्बन्ध् मे वहाँ के अन्य लेखक-लेखिकाओं से संपर्क साध कर हमे सूचित करें । फिर मैं आपको विवरण सहित संयोजक मनोनयन पत्र डाक से भेज दूँगा । कार्यकारिणी गठन के पश्चात आपके सुविधानुसार भा॰आनन्द शंकर माधवन जी के द्वारा इसका उद्घाटन समारोह भी सम्पन्न कराया जा सकता है। जिससे भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के सम्पूर्ण
उद्देश्यों की जानकारी वहाँ के लेखकों तथा बुद्विजीवियों को मिल जायेगी ।
हमलोगों को भी आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी । तत्काल मैं परीक्षा मे व्यस्त हँू  फिर भी
आपको इस सम्बन्ध मे पत्र लिखते हुए रा ले सं  की शाखाएँ खुल चुकी है आशा करता हँू आपका भी हमे भरपूर सहयोग समर्थन प्राप्त होगा।
इन्हीं आशाओं के साथ ।
शुभकामनाओं सहित
विकास पाण्डेय
मंत्री  भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ
भागलपुर 25 7 79
मान्यवर शेफालिका जी
   बिहार विश्वविद्यालय  मुजफ्फरपुर से हम अभयुक्ति मैथिली गीतिकाव्य मे प्रगतिशील चेतना पर शोध क  रहल छी। प्रगतिशील एवं मैथिली गीतक संदर्भ मे हमरा अपने सँ किछु जिज्ञासा अछि। अपने सन प्रसिद्ध साहित्यकार विद्वान आ महान लेखिका हमर जिज्ञासा केँ सिद्ध क सकथि। इएह सोचि किछु प्रश्नावली अपनेक सेवा मे प्रस्तुत क  रहल छी  कृपया पन्द्रह दिनक अनन्तर एकर उत्तर लिखिक कृतार्थ कएल जाए। हमरा आशा नहि पूर्ण विश्वास अछि जे अपने हमर कार्य सिद्धिक श्रेय अवश्य लेब।
अपनेक
पूनम कुमार बर्मा
द्वारा  डा  शान्ति सुमन
मिठनपुरा  मुजफ्फरपुर

महोदया शेफालिका जी
     फगुआ आबि रहल अछि। फगुआ मे तीत मीठक अनुभव लेने होयब। किछु घटना एहनो
भेल होयत जे फगुआ के नामे सुनला सँ मानस पटल पर नाचऽ  लगैत होयत। किछु मनलगगु होयत तँ किछु अनसोहांत आ किछु तँ निठ्ठाहे जोगरक एहने सन किछु अविस्मरणीय घटना मिहिरक पाठककें सुनाबी से आग्रह        
भवदीय
दिलीप कुमार सिंह झा
मिथिला मिहिर 7 2 89
ई पत्र पढ़ि मोन पड़ि जाइत अछि डुमरा बाबू जी संग केओ होली नहि खेलि सकैत छल लेकिन सूकू बाबूजीक मुँह मे अबीर आ देह मे रंग दय खूब थपड़ी पारैत छली। पाछा पाछा पींकी लीली-दादाजी हम्मु-बाबूजी खिलखिलाके हँसैत छलाह। ब्याहक बाद एक बेर फगुआ मे वर्मा जी अपन जिगरी दोस्त कहु वा कि लंगोटिया यार बच्ची बाबूक संग भांगक लोटा लय पहुँचि गेलैथ रंग अबीरक नशा मे मातल - हमरा सँ भांग पीबाक आग्रह केलन्हि। आय धरि कहियो हम वर्मा जी के भांग पीबैत नहि देखने छलौं। भरि दिन सीरा आगुक पूआ पकवान बनवैत  गौआं संग रंग खेलैत हम एकदम थाकि गेल रही! आब अबीर खेलय बलाक टोली देओर ननदि सभ बाँचले छल! चूँकि ब्याहक तीन चारि बरीस बाद होली मे रहबाक अवसर भेटल छल! पढ़ैत छलौं तँ होलीक छुट्टी एक हफ्ताक मात्रा होइत छल-पटना सँ डुमरा काशी जकाँ त्रिशूल पर छल!
साँझ भऽ गेल छल! जल्दी जल्दी गोसाँय कें साँझ देलौं। समस्त वातावरण सिनुरिया भऽ गेल छल! सभ अलमस्त ताहि पर बेर-बेर हिनक आग्रह भाँग पीबाक! तामस बड़जोर छल जकरा पान बीड़ी  सिगरेट  सुपारी  चाह काफी पीबाक हिस्सक नहि छल ओ एकदम सँ सीधे भांग पर उतरि गेल छलाह। अनटोटल कथा सुनिते बिथा- हमरा हिनक जिद बड़ विचित्र लागि रहल छल- पता नहि भांग पीबाक बाद हमर की दुर्गत होयत हम निहोरा करैत बाजलौं- हम सासुर मे छी  पटना मे नहि कोनो उच्छृंखलता भऽ  जाइत तँ अन्हेर भऽ जाइत।
और मुँह फुलाय कोना मे बैसि गेलाह-
सोचैत रही  हमहुँ रूसि सकितहुँ मुदा तुर्रा तँ ई छल गलतीयो वएह करैत छलाह आ मनाब हमरे पड़ैत छल। ओ तँ तामसे कबाब जकाँ जरल जरल रहैत छलाह। नहि जानि ई पति नामधारी जीव किएक अपन पत्नी पर एतेक रोब झाड़ैत छथि जेना हुनक जन्मसिद्ध अधिकार होय-
आ आइ फगुआक राति ई अप्रस्न भऽ जेताह तँ  हमही अपन प्रसन्नता लय की करब, हमर प्रतिष्ठा आब अहाँक हाथ अछि। जँ  बाबूजी जानि जेताह तँ  नहि जानि कोन अनर्थ भऽ जाइत। हम हिनका समक्ष विवश भऽ  गेलौं, एक दिसि बाबूजीक धियान अबैत छल जे अपना जमानाक प्रभुत्व सम्पन्न जमींदार मुखिया आ हिमालय सन व्यक्तित्वक स्वामी छलाह  जिनका सँ बात करबाक अपन बेटा सभकें साहस नहि होयत छल  दोसर दिसि ललित लवंग लतापरिशीलन सन अपन सुन्दर पति देवताक निर्दोष प्रेममय पहिलुक आग्रह-
जीत हुनक भऽ  गेल! हमरा एक गिलास दूध सँ भरल शरबत पीआय  एकटा विजयिनी मुस्कीक संगे यार दोस्तक टोली मे कचहरी पर चलि गेलाह।
सासुर मे पर्दाप्रथा तँ कठोर रूपें लागू छल। हवेली सँ बाहर नहि निकलि सकैत छलौं। दलान पर नहि बैसि सकैत छलौं। गामक इजोरिया  पूर्णिमाक इजोरिया अंगनाक कोन कोन मे पसरि गेल छल मदमस्त भऽ। गामक टोली पर टोली ढोल  झाल  मृदंग  हरमुनिया लऽ  कऽ  फाग गबैत निसाँ मे चूर अबैत छल-जल कैसे रे भरी जमुना गहरी-नामी नामी केसिया भुंइयाँ मे लोटै हे पिया परदेश मोरा दीयरा लुभेलक गीतक समवेत स्वर लहरी पर आसमान झूमि रहल छल  धरती नाचि रहल छल-चान निमिमेष ताकि रहल छल-
अचक्के हमर कान मे स्न-सन्न स्वर अबय लागल! जेना कतेको माईकक स्वर  कतेको घड़ी घंटक स्वर गूँजित भ  रहल होय। हमर माथ घूम  लागल आ अचक्के लागल जे हम एकमद हल्लुक भऽ  गेल छी। हम अपना के जाँचवा लेल उठि के ठाड़ भऽ  गेलौं। एक डेग धरती पर राखलौं कि हम धरती पर छी वा कि हवा मे! फेर दोसर डेग आस्ते सँ राखलौं- डेगा डेगी नपैत हम किछ दूर चलैत रहलौं आ लागल जेना हवा सँ हल्लुक हम भऽ  गेल छी- हम अन्तरिक्ष मे परी जकाँ उड़ि रहल छी। चारू कात निस्तब्धता पसरल छल। रात्रि तीति भीजि अलसाय सूतल छल इजोरियाक कोरमे।
नहि जानि कोन ज्वार उठल  हम एहिना डेगा डेगी दैत  उड़ैत दलान पर पहुँचि गेलौं जे पुतौह सभ लेल वर्जित स्थान छल! हमर आँचर अस्त व्यस्त  दलान एकदम सून्न  इजोरियाक शुभ्र वसन समूचा प्रकृति कें धवल बना देने छल। ओसाराक पाया पकड़ि हम खूब हँसय लागलौं। हमर अचेतन मे ई भाव स्पष्ट छल जे हम अनुचित कऽ  रहल छी मुदा  चेतन मे अपना कें संभारि नहि पबैत रही।
अचानक बाबूजी गाम दिस सँ घूमैत दलान पर आबि गेलाह। हमरा ओहि अवस्था मे देखि निश्चित रूप सँ ओ अचंभित भऽ  गेल हेताह। हमरा लागल जे दूर सँ आँखि फाड़ि-फाड़ि देखि रहल छलाह जे ई कनिये थीकिह ने हम तँ भांगक मस्ती मे छलौं। हुनका देखि आर जोर सँ ठहाका लगबए लगलौं। मुदा  हम जानि रहल छलौं जे हम गलत काज कय रहल छी। तावत बाबूजीक पाछा पाछा ई अपने आबि गेलैथ।
दलान पर हमरा एसगरे देखि  बताहि जकाँ ठहाका लगबैत देखि हिनका बहुत जोर तामस उठि गेलैक ताहि पर बाबूजीकें ठाड़ देखि- अचक्के हिनका अपन करनीक धियान एलैक त  भागि कें अंगना चलि एलैथ- पाछू पाछू बाबूजी धीर गंभीर चालि सँ चलि गेलैथ। राति कछमछी मे हिनकर बीति गेल- अहाँ हमर करनी सभ कें तँ नइ कहि देलीयैक हम आय धरि सोचि रहल छी - बाबूजी
अपना मने की सोचैत हेथीन- किएक ककरो लग एकर जिज्ञासा नहि केलखिन- कहीं बाबूजी सेहो तँ नहि भाँग सँ मातल रहथीन- मुदा  ई सत्य छैक जे हमरा मे एखनो ई घटना एकटा अपराध बोध जगा जाइत अछि-
सेवा मे
चिर सौभाग्यवती श्रीमती शेफालिका जी
अशेष आशीष ।
अहाँक पत्र भेटल । श्री गोपी बाबू अहाँक सम्बन्ध मे वड़ आकुल छथि । स्थिति सँ अवगत भेलहु । अहांक जे व्यवधान से किन्नहु नहि रहत माँ भगवती श्री 108 उग्रतारा माइ अहांक समस्त व्याकुलता के हरण कै लेती । हम दिसम्बर कें वनगामक हेतु चलब आ 3 दिसम्बर के वनगाम पहँुचि जायब । अहाँ कृप्या 2 से 3 दिसम्बर धरि वनगाम हमरा से सम्पर्क करी । 2 कै सम्पर्क करी ते सर्वश्रेष्ठ । हम अहाँ क    उग्रतारा माईक शरण मे जायब संग मे ओकिल साहेब रहथि तै आर नीक । कृपया एकटा श्वेत शंख  एकटा रूद्राक्ष आ नौ टा मूंगाक प्रबन्ध कै के राखव। एकटा
आर अनुरोध। कृप्या कोनो प्रकारक भोजनक आग्रह नहि करव । मात्रा हम चायटा पीयव । अहि प्रक्रिया लेल आवश्यक छैक । त अहाँ गुगल  लौहवान  जटामसी  सड़ड़ चन्दन कर्पूरक मिश्रण से अपना घर मे साँझ भोर धूप देव ।
भगवती अहाँक कल्याण करथि ।
कोनो तरहक चिन्ता नहि करब । माय चिन्तामणि छथि ।
सस्नेह
मणिपद्यम
बहेड़ा 5 11 82
(क्रमशः)
१. विनीत उत्पल- दीर्घकथा- घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री २.रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू'- कथा- बाप ३.नन्‍द वि‍लाश राय- कथा अइना

  विनीत उत्पल
दीर्घकथा

घोड़ीपर चढ़ि लेब हम डिग्री 

विनीत उत्पल 

जे कथाकार नहि हुए ओ कोन केहन कथा लिखत, एकर ठेकान त कियो नहि कऽ सकैत अछि। मुदा युवा पीढ़ीकेँ देखि कऽ कोनो कथा लिखब संभव नहि अछि आजुक कालमे। तकर बादो कियो हुनका  लऽ कऽ लिखैत अछि त कहि सकैत छी जे ओ सभटा फूइस लिखि रहल अछि। एकरा मादे हमर ई तर्क अछि, जे युवा अछि ओ केना बुझता जे ओ सतमे युवा छथि या नहि। जखन एहि भारत मे 80 बरखक बुढ़ जे.पी. युवाक नेतृत्व कऽ सकैत अछि, जीवन आखिर कालमे देशमे संपूर्ण क्रांतिक बिगूलि फूकि सकैत अछि, तखन युवाक उम्रक की सीमा मानैत अछि कियो। 
नेनामे जखन स्कूल जाइत अछि तखन सभ सोचैत अछि जे कॉलेजमे खूब उछल-धक्का करब। कॉलेजमे गेलापर लागैत अछि जे करियर बना लेब तकर बाद त अपन जिनगी अछि आओर जखन करियर बनि गेल, ब्याह भऽ गेल तकरा बाद दुनिया सूझै लागैत अछि। जखन जिनगीक ई परिभाषा अछि तखन युवाक कोन कथा लोक सभकेँ सुनाल जाइत अछि। मां-बापक सपना, भा-बहिनक इच्छाक आगू अप्पन सपना त अधूरे रहि जाइत अछि। यएह हाल त आलोकक छल। हुनकर नजरिस देखियौ  कहियो युवा भेल या नहि स्वयं नहि जानैत अछि। 
एकटा आओर गप, एहि कथाक शीर्षकपर एखन नहि जाऊ। अहा जानतै छी जे ब्याह करहि लेल लड़का घोड़ीपर बैसि क बाराती जाइत अछि। मुदा आब हमरा ई नहि कहबै, ‘आंय हो, हमरामे त लड़का घोड़ीपर बैसि कऽ बराती नहि जाइत अछि। ई कोन गप अहा कऽ रहल छीहि गपमे हम एतेबे टा कहब जे अहाक बिरादरीमे ई विधि नहि होत अछि, एकरामे हम कत्तौ दोषी नहि छीकिए तँ जिनकर जाति, वंशमे जे भेल आयल अछि, आ॓हि विधिके हटायब 21शताब्दीमे बड़ कठिन गप अछि। फेर ईहो गप अहा हमरा नहि कहि सकैत छी जे कत्तौ घोड़ी पर चढ़ि क डिग्री लेल जाइत अछि। त सुनू ई, जे गप छैक, ‘घोड़ी पर चढ़ि लेब हम डिग्री’, ई हमर नहि अछि। ई गप आलोक बाबू हमेशा कहैत छला 

आलोककेँ अहों त नहि जानैत छी। ओ,  आलोक नहि अछि जकर अर्थ रोशनी होत अछि। ओ,  आलोक अछि जे मा, पिता, बहिनक कारण अप्पन सपनाके घूरिमे जरा कऽ आस्ट्रेलियाक ब्रिसबनमे रहैत अछि। पिछला तीन बरखस  अप्पन देश नहि आयल अछि। ओतय तीन शिफ्टमे काज करैत अछि। हुनका नीन नहि होत अछि। लागैत अछि जे हुनका नहि सुतबाक बीमारी भऽ गेल छनि। मुदा आलोक बाबू एकटा जिंदा मशीन अछि जे अप्पन सपनाके मारि क लोकक सपनाकेँ यथार्थमे बदलहि लेल काज करि रहल अछि। हुनकर जिनगीक कथा मझधारक एहन नावक कथा अछि जकरा कोनो दिशा नहि देल जाइत अछि। मां-पिता हुनकर जिनगीक खेवनिहार अछि, जेना ओ चाहता, ओहिना हुनकर दिशा भ जात। 

छत्तीसगढ़क राजधानी अछि रायपुर। ओहि शहरमे एकटा मोहल्ला अछि शंकरनगर। एतय पिता बड़ मनोयोगस एक-एक पा जोड़ि कऽ घर बनौने रहथिन। आलोकक पैतृक घर तभिंड-मुरैना लग रहनि। जतौका जंगलमे कहियो डकैतक राज चलैत रहै। पिता, के.जी.कुशवाह, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया मे काज करैत रहथि। हुनकर ब्याह भोपाल भेल छल। दूटा बच्चा छल। पहिलुक आलोक दोसर बेटी किनू। दुनूढ़ैमे खूब तेज। मुदा रायपुरमे रहैक कारण हिन्दी माध्यममे पढ़ा भेल छलनि। तहिसहुनकर अंग्रेजी कमजोर छल। 

मां-पिताक सपना छल जे हुनकर बेटा खूब पढ़ि-लिखि क बड़का आदमी बनि जाए । इंटर केनहि कालमे मा सोचथिन जे हमर बेटा सी.. बनि कऽ नाम कमाबै। ताहिस हुनकर एडमिशन बी.कॉममे कएबा लेल जिद पकड़ि लेलखिन। एकटा बेटा ओहिनो माके बेसी दुलारु होत अछि। आखिरकार माक जिद मानल गेल आओर आलोक बी.कॉम मे एडमिशन लऽ लेलक। बी.कॉम मे नीक मार्क्स अएलै आओर सी.. क तैयारी लेल आलोक दिल्ली आबि गेलाह.
दिल्लीक पूर्वी इलाका लक्ष्मीनगर सी.. क गढ़ मानल जाइत अछि। एतय कतेक सी.. केँ तैयारी करबैक लेल कोचिंग संस्थान अछि, अंगुरीपर गिनलो नहि जा सकैत अछि। आलोक एकटा नीक कोचिंग संस्थानमे एडमिशन लेलक। कामर्स त नीक लागैत छहुनका मुदा सी.. बनैक कोनो चार्म नहि छल। कोचिंग करैत, एक-दू बेर ओ परीक्षा देलक मुदा ढ़ाकक तीन पात रहल। ओहिनो हर बरख पाच पर्सेंट त सी..क रिजल्ट होत अछि। करीब तीन साल तक दिल्लीमे रहलाक बाद रायपुर घुरि आयल। मायक सपना अपूर्ण रहि गेलनि। सी.. बनैक कोशिश रंग नहि आयल। एकटा आलोक छल जे कखनो मां-पिताक आगू अप्पन सपनाक गप नहि बतैलखिन। जहिना जे गप दुनू प्राणि कहैत छल, तहिना आ॓ मानैत छल। किछु दिन डिप्रेशनमे रहलाह आलोक। मुदा माय त माइये होइत अछि। नया सपना देखैमे कोनो दोषो नहि अछि। 

किछु दिन बीतल त घरमे कलह हुए लागल जे आलोक आबि कऽ की करताह? घरमे अनुशासन एतेक कड़ा जेकर गप कहलो नहि जाय। दुनू भा-बहिनकेँ मा-पिता जे कहतियै, से ओ सभ करै। अहिमे एक दिन मांक मनमे आयल जे बेटा सी.. नहि बनल त की भेल, ओ वकील बनताह। हुनका कियो सुझाव देलनि जे वकील त गांधीजी सेहो छल, जवाहरलाल नेहरू सेहो, जखन ओ प्रधानमंत्री बनि सकैत अछि तखन अहाक बेटा त ओकरोसतेज अछि। आलोकके कहियौ जे ओ  एल.एल.बी. मे एडमिशन करा लेताह आओर शहरमे कॉलेज अछि। खूब मन लगाक पढ़ताह रायपुर राजधानी भऽ गेल अछि, खूब केस-मुकदमा हेबे करत, ताहिस हुनकर वकालतक धंधा खूब चलत। आखिरकार जहिना मा क मन बदलल आलोकक करियरक राह सेहो बदलि गेल। आब ओ  बैरिस्टरीक पढ़ा लेल एडमिशनमे जुटि गेल। हुनकर मेहनत आओर माक आशीर्वाद रंग आनलक। 
कॉलेज तँ कॉलेज। ओहियो मे लॉ कॉलेज। पढ़ाइ की होएत। नहियो गेलाक बाद एटेंडेंस बनि जाइत छल। बस प्रोफेसर के आगा-पाछां करैत रहू, एटेंडेंस बनि जाइत। फार्म भरू, गेस पेपर से पढ़ि लियौ आओर परीक्षा के एकाध हफता पहिलै टीचर सेसजेशनलऽ लियौ। अहियो स नहि संतुषि्ट हुए तँ पिछला पांच सालक क्वैचश्न पेपर देखिकर खास-खास सवाल कऽ रटि जाऊ। ओकरो से नहि हुए तँ जे अहांक रूम मे गार्डिंग कऽ रहल अछि, हुनका सेट कऽ दिओ कि ओ परीक्षा हॉल मे एक कोना धरि के पूरे काल उंघैत रहै। बस फेर की। गेस पेपर छबे करल नहि तँ सरके बनाओल नोट्स कोन दिन काज आयत। ओकरा बिथायर कऽ सभटा सवालक जवाब लिखैत जाऊ। एतबैयो साहस नहि अछि तँ परीक्षा के एक दिन पहिलुका राति मे छोट-छोट पुरजा बना लियै आओर मोजा, कॉलरक पाछां नहि तँ अंगाक आस्तीन मोरि कऽ ओकरा मे नुका लियो ओ पुरजा कऽ। 
जब देसक एहन शिक्षा होएत तखन शिक्षा प्राप्त करहि बला केहन। अनुमान लगा लियौ। आखिर जे सभ शिक्षक बनल अछि ओ की कोनो पूरा कोर्से पढ़िकै बनल अछि। जे हुनि आदर्शक गप करत। चोरी तँ चोरी होएत अछि। चाहे अहां दू टा पाई चोरि करू या फेर परीक्षा मे चीटिंग। यहि कारण छल जे बाप बेटा कऽ कहैत छलाह जे कोर्स खत्म नहि भेल अछि तँ कोना चीटिंग कऽ लिओ। ओहिनो हमर सभक मतलब मैथिल मे दैत छी गप लिओ लपालप चलतै अछि। आओर मारि कम बपराहैट बेसी अहि लेल तँ कहल जाइत छल। पूरा साल तँ उछल-धक्का करै सं फुरसत नहि, मुदा परीक्षा नहि पास करहि सकलहुं तँ माय-बाप सं लऽ कऽ सभ कियो कहैत रहताह, ‘हेयौ जानैत छिये। अहि बेर बड़ कठिन सवाल आयल छल। हमरो टीचर से कहैत छलाह।और तँ और, अपन मौनक जोगर टीचर से कहा लेत, ‘दस टा मे से पांच टा कोश्चन तँ सिलेबस से बाहर के रहैत, तँ कोनो कियो सवालक जवाब लिखतै।आओर कानाफूसी ईहो होएत, ‘अहि बेर खूब टाइट परीक्षा भेल। ओ दरोगा मंडल,जे आयल छल, बड़ बदमास अछि। हिलै तक नहि देलक।ई तँ भेल परीक्षाक गप। जखन परीक्षा भऽ जाइत अछि। तखन कॉपी कतय जचां रहल अछि, ओकर पता लगाबै लेल दिनराति बौआ रहल अछि। 
मिथिला मे ते जानते छी, बेटा-बेटी मे की फर्क होएत अछि। बेटा जे जखन चाहत ओ मिलै ओकरा। मुदा बेटी तँ ऑन घर जाइत। ओकरा खिया-पिया के की होएत। बेटी के पेट तँ नून रोटी खायक भरि जाइत मुदा बेटा कऽ तँ दूध-भात चाहि। बेटा अंग्रेजी मीडियम मे पढ़त, मुदा बेटी ते सरकारी स्कूल मे जाइत अछि, ई की कम अछि। यहि हाल छत्तीसगढ़ के छल। जे कहियो आलोक बाबू के घर आओर जे समाज मे ओ रहैत छल, ओहिने छल। आलोक बाबू लॉ कॉलेज मे एडमिशन लेलाह तँ जरूर मुदा पढ़ैक जरूरत की छल। शुरू मे एकाध दिन कॉलेज गेलाह, जखन दोस्त-मुहिम बनि गेलाह, टीचर चिनहै लगलाह तखन फेर बाते की। घर से रोज टाइमे पर निकलैत छलाह, मुदा लॉ पढ़ैत छलाह या किछु आओर, से आलोक बाबू टा जानैत छल। मुदा सांझ मित्झर भेला पर घर जरूर टाइम से घुरि जाइत छल। घर मे सभ कियो बुझैत छल जे ओ तँ क्लास कऽ कऽ आबि रहल अछि। कहियो हाथ मे दू टा लॉ के किताब झूलाबैत घुरैत छलाह, तँ कहियो कोनो हाथ मे केकरो नोट्स लऽ कऽ। मुदा नीक गप हो या अधलाह, नुकायल तँ नहि रहैत अछि। आलोक बाबूक किरदानी लोकक आगू आबै लागल। 
शहर मे हुनकर नीक दोस्त छल तँ बदमाशो दोस्त ओतबै छल। हुनकर कॉलेज मे 25 साल से एकटा परंपरा छल, जे क्लास के बदमाश लड़का सभ आगूक बैंच पर बैसैत छलाह। मुदा आलोक बाबू जखन एडमिशन लेलक तँ हुनकर दोस्त किछु अहिनो छल। ताहि से ओ अगलका बेंच पर बैसऽ लगलाह। चूंकि हुनकर पिता के शहर मे एकटा इज्जत छल। ताहि सं लोक मानैत छल जे आलोक बाबू नीक होएत। मुदा लोक ई नहि बुझैत छल जे यदि अहांक खानदान नीक अछि, एकर मने ई नहि भेल जे अहों नीक होयब। लेकिन ई गप की बुझैता लोक-बेद कऽ। एखनो देखियो नै, ई जाति, गोत्र, मूल, मूलक ग्राम की होएत अछि। ओहि काल मे जे ऋषि भेल हुनकर हम सभ वंशज अछि। एकर मने ई तँ नहि भेल जे हमहूं ऋषि भऽ गेलहुं। हाथक पांच आंगुर की बराबर अछि। घर मे चारि भाई अछि, सभक अलग-अलग विचार आओर आदत अछि। तखन हम कोना कहि सकैत अछि जे खानदान से लोकक आदत, संस्कारक निर्धारण होएत अछि। की राजेंद्र प्रसाद के खानदान की राष्ट्रपतिये छलाह। ललित नारायण मिश्र कतेक बड़का नेता भेलाह, मुदा खानदान मे कियो क्या नहि भेल। जगन्नाथ मिश्रक नाम चारा घोटाला मे आयल। लालू यादवक खानदान चरवाहा के अछि। मुदा ओ बिहार पर एतेक दिन शासन करलाह जे एखैन धरि कियो नहि करलाह छल आओर आगू के करताह कहल नहि जाई सकैत छी। 
तखन आलोक बाबू तँ आलोक बाबू छल। पढ़हि मे नीक छल ताहि से नीक स्टूडेंट हुनका सं दोस्ती करते छलाह, मुदा अधलाहो सोचैत छलाह जे हुनका संग रहि के किछु तँ नीक गप आ पढ़ैक लेल जानकारी भेटत। अहि बीच एक दिन हुनकर मन मे आयल जे अंग्रेजी नीक नहि होएत तँ जिनगी मे किछु नहि कऽ सकब। फेर की छल। ओ पूरा शहर ताकि गेलाह जतय अंग्रेजी बाजै लेल आओर ग्रामर कियो सिखा दिया। मुदा रायपुर तँ रायपुर छल। ओहि काल ओतय एडवांस नहि भेल छल जे अंग्रेजी पढ़ाबैक लेल कियो भेटतियै। ओ निराश भऽ गेल छलाह। मुदा एक दिन हुनका पता चलल जे शहर के बीचोबीच जे होटल निहारअछि ओतय किछु भेट सकैत अछि। 
रायपुर मे जतय कॉलेज अछि ओकरा मे पढै बला नीक सभ छात्र सभ शुक्रवार के आबैत छलाह। शहर के जे छात्र बैंक क्लर्क, पीआ॓, एसएससी, एमबीए के परीक्षाक तैयारी करैत छलाह, ओ ओतय सांझ मे आबैत छल। बैनर छल रोट्रेक्ट क्लब। रोटरी के यूथ विंग। एकर बैनर तल सभ मिलि कए खूब ग्रुप डिस्कशन करैत छल। जेनरल नॉलेज एक-दोसरा से पूछैत छलाह। एक्सटेंपरी मे सेहो भाग लैत छल। लड़का-लड़की मे कोनो भेद नहि होएत छल। एतय लागैत छल जे किछु सार्थक काज भऽ रहल अछि। रायपुरक रोट्रेक्ट क्लबक इतिहास रहल अछि जे ओतेक बेसी सदस्य देशक कोनो परीक्षा हुए सभमे खूब नीक करलक छल। आबि आलोक बाबू के जिनकी बदलि गेल छल। ओ सभ शुक्र कऽ रोज होटल निहार जाय लगलाह। आपस मे अंग्रेजी बाजैत छलाह। शुरू मे दिक्कतो भेल, मुदा धीरे-धीरे बाजहि लगलाह। 
 एकाएक आलोकक बात-व्यवहार सभटा सेहो बदलहि लागल। एक दिन क्लब मे फिल्म कऽ लऽ कऽ गप शुरू भो गेल। आखिरकार गपशप मे ई गप पर जोर देल गेल जे सभ कियो अप्पन-अप्पन वृतांत सुनाओल जाए जे हुनकर फिल्म देखबात आतुरता आओर फिल्म संस्कार कोना भेटल। जतेक गोटा रहैत ओतय, सभ अप्पन-अप्पन गप सुनाबहि लागल। कियो कहलक, पापा के पॉकेट से पैसा चुराकऽ देखलहि रहि फिल्म। कियो कहलक जे माम के साथ गेल रहि तँ किओ कहलक स्कूल से भागि के गेल रहुं फिल्म देखने। आप जखन आलोक बाबू के पारि आयल फेर की छल। हुना संग तँ गपक खजाना आओर अनुभव के विस्तर छल। ओहिनो अहां जानैत हेबै जे मुकि्तबोध कहने छलाह जे जिनका संग जतबे अनुभव हेता हुनकर रचनात्मक क्षमता ततबेक बेसी हेता। ई गप आलोक बाबू पर बेसी बैसल रहै। फेर की छल, शुरू भऽ गेलाह आलोक बाबू। ओहि दिन जे ओ ओतय भाषण देलैन से महीना भरि सभक मुंह पर छल। जे जतय मिलतियै ओ ओतय आलोक बाबूक फिल्म देखहिके किस्सा बाजैत छल। आहि बैठकक गप क्लब के पत्रिका मे सेहो छपल छल। फिल्मक लाऽ कऽ कहने की छल, लोक कऽ आनंद विभोर कऽ देलक। ओ लिखने छलाह, फिल्म, फ़िल्म और फ़िल्म। ,ई शब्द छल कि आओर कुछु। एकरा सं परिचय कोनो भे, क्या भेल, एकर मैन तँ अछि। दिवाल पर चिपकल पोस्टर, अखबार मे छपल फोटो,  गली-मोहल्ला मे लाउडस्पीकर मे बाजैत गाना आओर डायलॉग या रेडियो मे प्रसारित होए बला गाना मन-मस्तिष्क कऽ खटाखटा कऽ राखि दैत छल। शादी-ब्याहक काल माहौल कऽ मदमस्त करैत फिल्मी गाना हुए या जनवरी आ अगस्त मे बजै बला देशभक्तिक तराना, नेना मे अठखेली के संग कौतुहलक विषय छल। ओ एहन काल छल जखन फिल्मी पोस्टर देखहि कऽ मन होएत छल जे हमहूं स्मार्ट बनि जाय आैर ओहिने फैशन करैत रहि। एकटा समय रहिक जखन फिल्म कऽ लऽ कऽ किछु नहि जानैत रहि आओर सभटा हीरोइन एक्के जना लागैत छल। मन ही मन सोचैत रहि जे गाना बजैत कोना अछि, डायलॉग कोना बाजैत अछि, हीरो मैटि से उपर उठि कऽ परदा पर कोना आबैत अछि। की पोस्टर पर जे स्टंट होएत अछि ओ सच्चे मे होएत अछि की नहि।
आगू लिखने छल, 'मां कहैत अछि। कोनो अहिनो काल छल, जखन हम सभ सभटा शनि दिन फिल्म देखैने जाइत छलहुं। अहि दिन घरक सभ लोक फिल्म देखहि लेल जाइत छलहुं। ई ओहि कालक गप अछि, जखन हम जन्म नहि लेलहुं छलहुं। मां के मन मे एखनो घुमरैत रहि अछि ओ दिन।" जखन हम होश संभालनौ तँ घर मे ओ रेडियो कऽ बाजैत देखलहुं जे पापा कऽ शादी मे भेटल छल। घर के जे सभ फुर्सत मे रहताह ओ आकाशवाणी से प्रसारित होहुं बला गाना सुनैत रहैक, एफएम ते ओहि काल मे रहबे नहि करै। जकर एहन घर रहताह, ते नेना से गाना सुनहि के आदत केकरा नहि लागत। ओनो बाबा खूब गाना सुनैत छल आ गाबैतो छल। 
एकटा गप तँ छल। आलोक बाबू के मुंह में सरस्वती बैसेत छलि, क्याकि जखन ओ बाजब शुरू करैत छल, तँ लोक बेद सभ काजि छोड़िकऽ हुनकर गप सुनैहि मे लागि जाइत छल। वैह भेल ओहि दिन। रायपुर के लोक कहैत अछि जे ओ दिन शहर के लिए अलगे दिन छल। भरि राति हुनकर भाषण चलल रहल। क्लब मे जे सभ छल ओ ओहि राति घर नहि गेल छल। तीन बजे भोर धरि फिल्मक संस्कारक गप ओ कैने छलाह। घर मे मां-पापा सभकियो हुनका लेल तंग भऽ गेल छल जे ओ राति मे नहि आयल छल। मुदा सभ कियो जानैत छल जे आलोक बाबू कतो हेता तँ नीके से हेता आओर कोनो काजक कारणे घर नहि आयल छल।
हुनकर संगी नीलेंद्र बाजैत छल जे ओ एक गिलाह पानि पिब के फेर बाजब शुरू करने छल। घर मे रेडियो से जानल छलौंह जे गाना की होएत अछि। लाउडस्पीकर मे बाजैत आ गाम मे होय बला नाटक से जानलौंह जे कोन शहंशाह के डायलॉग अछि आओर कोन गब्बर सिंहक। आहि काल मे टेलीविजनो देखलहुं। इंदिरा गांधी आओर राजीव गांधीक अंतिम संस्कार के टीवी पर देखने रहि। मन चंचल आओर स्वभाव अछि जिद्दी। रविक सांझ मे फीचर फिल्म देखैने दोसरा कतए जाइत रहि। बुध आओर शुक्र के सेहो चित्रहार देखैत रहि। मुदा फिल्म तँ इंटरवले तक देखैत रहि क्याकि ओहि काल साढ़े आठ बजे राति बड़का राति भो जाइत छल। आलोक बाबू कहैत छल जे हम ओ उम्र के ओ पड़ाव से गुजैर रहल रहि जखन हमर संगी-साथी नुका कऽ बीड़ी-सिगरेट पिबैत छलाह, फिल्म देखैले जाइत छल, सेक्स कऽ गप करैत छलाह आओर एतय तक कि मारपीट सेहो। मुदा हमर सोच ओहियो काल आओर आजु उल्टा छल। हमर कहब छल जे सभटा लोक काज करैत अछि ओ काज हम नहि कर। यहि कारण छल जे हमर दोस्तक ग्रुप नहि बनल। दोस्तक देखौंश में सिगरेट के मुंह तँ लगैलो मुदा नुका कऽ काज नहि नीग लागैत छल ताहि से नहि पिबलहुं। शाकाहारी तँ नेने से छी। फिल्म देखैक मन भेल तँ लागल जे तीन घंटा धरि भूखिहि रहै पड़त। घरक लोग फिल्म देखहि लेल नहि जाइत छल तखर हमर अकेले जाइत कोनो सवाल नहि रहैक।
आलोक बाबू तँ पूरे किस्सागो छल। एक-एक शब्द सोचि-समझि आओर कऽ कहैत जा रहल छल। एक-एकटा गप ख्याल पारि कऽ कहैत रहि आओर लोक सुनैत छल। कहैत अछि स्कूल मे गर्मी आैर दशहरा के नब्हर छुट्टी होएत छल। सभकियो गाम जाइत छलौंह। गामक लोक फिल्म देखहि कऽ लऽ कऽ खूब गप करैत छल। सभटा गप हम चुपचुाप सुनैत रहि। गाम मे जिनकर ब्याह होएत छल, ओ अपन कतनया के फिल्म देखाबैक लेल लऽ जाइत छल। हमहुं सोचैत छलहुं जे सच्चे फिल्म देखबाक कतेक रोमांचक होएत हेता। किछु नहि किछु मन लागै बला जरूर देखाबैक अछि जे गामक लोक ब्याह के बाद फिल्म देखहि लेल जाइत अछि। हमूहि मन मे प्लानिंग बनबैत रहि जे ब्याह हैत तँ सबसे पहिलुक काज करब जे कनिया कऽ लऽ कऽ फिल्म देखहि लेल जायब।

जारी

रामकृष्‍ण मंडल 'छोटू'

कथा-
बाप

हबलदार गोरचंदक ऐठाम आइ फेर गुमशुमक माहौल बनल छै। आइ हुनकर एकलौता बेटा बलदेवक इंटरक रि‍जल्‍ट नि‍कलैबला अछि‍।
कनीदेरक बाद बलदेव मुँह लटकेने हाथमे रि‍जल्‍ट लऽ कऽ प्रवेश केलक। बलदेवकेँ एते हि‍म्‍मत नहि‍ जे बाबू जीसँ आँखि‍मे आँखि‍ मि‍लाबैत। एकठाम बलदेब मुँह लटकेने ठाढ़ अछि‍। जेना कोनो पत्‍थरक मुरूत। आ एनहर गोरचंदक आँखि‍ लाल-लाल जेना बुझाइत दुगो आइगक गोला ओकरा चेहरापर अछि‍।
बलदेवक माए श्‍यामबती, स्‍थि‍ति‍केँ भाि‍प पति‍क गुस्‍सा याद करैत सि‍हरि‍ उठै छथि‍। उ तुरन्‍ते बलदेव लग जा बलदेव हाथसँ रि‍जल्‍ट लऽ चहैक उठल, आैर पति‍ दि‍शन ताकि‍ बाजलि‍- यौ-यौ देखि‍ओ, अपन बलदेव सकेण्‍ड कि‍लाससँ पास भेल।‍
गोरचंद रि‍जल्‍ट छि‍न बाजल- हम जानै छी, ई आवारा, बकलेल हम्‍मर नाक कटौत, हम्‍मर सभ अरमानपर पानि‍ फेर देत। हम सोचने रहौं ई हम्‍मर नाम रौशन करत। तब हमहुँ गर्वसँ सीना फुलाए कहि‍ति‍ऐ कि‍ हमरो बेटा दोसरक बेटा जना इंजि‍नि‍यर, डॉक्‍टर, दरौगा अछि‍। मगर-मगर ई कहाँ.... नसीब हमरा।‍ कहैत-कहैत कानए लगल गोरचंद।
जेना-तेना बलदेवक एडमि‍शन शहरक एगो कॉलेजमे भेल। उ कॉलेजमे बी.ए. इति‍हाससँ पढ़ाइ करए लगल। हँसैत, हँसैत साल बि‍त गेलै। मगर बलदेवमे कोनो परि‍वर्त्तन नइ भेल। उ ओनाहि‍ऐ रहल। मुदा पढ़ाइक समए बीत गेल। पार्ट-वनक परीक्षा भेल। ऐबेर जेना-तेना परि‍क्षामे देकसी मारैत पास तँ भऽ गेल। घरपर बापक डाॅट-फटकारसँ ओकरा कानपर तँ जूऔ ने टि‍कै। समए फेर बीतैत गेल। आब बलदेव पार्ट-टूक वि‍द्याथी भेल। ऐबेर कॉलेजक कुछ वि‍द्याथी आगरा ताज महल देखै वास्‍ते जाइके प्रोग्राम बनेलक। जैमे बलदेव अपनो नाम लि‍खौलक। सभ वि‍द्याथीकेँ एक-एक हजार रूपैआ जमा करए पड़त।
बलदेव अपन बाबुजीकेँ कहलक मुदा उ साफे मना कैर देलखि‍न। माएकेँ बहुते कहि‍ बलदेव अपन बाबूजीकेँ मनेलक।
उ दि‍न आबि‍ गेल। आइ दुबजि‍या गड़ि‍सँ यात्रा कएल जेतै। एमहर गोरचंद अपन बलदेवसँ कहलक कि‍ उ बारह बजे ओकरा एक हजार रूपैआ कतौसँ, केनाहि‍ओ व्‍यवस्‍था कैर कऽ दऽ देतै। पर ई कि‍ बारह बजि‍ गेलै, अखैन तक गोरचंद थानासँ आपस नइ आएल। घरपर बलदेव गुस्‍सासँ अपन बापक बहुत भला-बुरा कहए लगल। माए श्‍यामबती जवान बेटाक मुँहसँ, अपन भगवान जकाँ दुल्‍हाक बारेमे जली-कुट्टी सुनि‍ आँखि‍सँ मोती जकाँ नोर गि‍रबए लगलि‍।
तखने बलदेवक जोरदार अवाज- माए-माए, देखलि‍ही बाबूक करतुत हम्‍मर बेइज्‍जत करा देलक, पुरे कॉलेजमे। आव... आव हम कोना कॉलेजमे..... ?
गुस्‍सामे बलदेव अपन साइकिल नि‍काइल चलि‍ पड़ल थाना तरफ। थाना पहुँचैत बलदेव देखै छै। ओकर बाबूजी एगो दरोगाक गोर दाबैत छै। तखनि‍ बलदेवक बाबू कहलक- हुजुर-हुजुर भऽ सकै तँ पानसौ रूपैआ पैंचा द ि‍दअ। आ हुजुर आइ हमरा कनी जलदीए घर जेबाक अछि‍। हम्‍मर बेटा आइ दुबजि‍या गरि‍सँ आगरा जयछै।
दरोगा गोरखनाथ अपन रौब झाड़ैत- चुप सार, बढ़ि‍यासँ जातैले आबै नै छौ आ बेटाकेँ आगरा घुमैले भेजै छेँ। आ ई की जखैन देखू तखैन बेटाले पैसा मांगे लगै छी। कहि‍यो ओकर एडमि‍शनले तँ कहि‍यो कपड़ाले कहि‍यो साइकिलले ई- ई कि‍ छि‍औ। एत्त तोहर बापक खजाना नै छौ बड़ा मेहनतसँ और बड़ा रि‍क्‍सपर घूसक पैसा आबै छै, हराममे नाइ। चल सि‍करेट जड़ा।‍
गोरचंद फफैक-फफैक कानए लगल- हुजुर एक्के घंटा बचल छै हम्‍मर बेटा....।‍
  चुप चल सि‍करेट जड़ा। भाड़मे जाउ तोहर बेटा। हूं, बड़ा भाएल आगरा घुमैबला। चल-चल जांत आ सुन, ई ले एकसौ रूपैआ। जौ बाजारसँ कुछेक सब्‍जी कि‍न हम्‍मरा घर पहुँचा आ और कनि‍ हम्‍मर‍ बेटा गोलुआकेँ स्‍कूलसँ लाइब लि‍हैं।
कनि‍ देर रूकि‍ कऽ फेर बाजल- तब देखबै सांझमे कुछ पैसा बेबस्‍था करबौ। जो-जो भाग....।‍
एते सुनि‍ बलदेवक भोँह फरैक उठल ओकर सभ बाप परक गुस्‍सा, दरोगापर आबि‍ गेल। मन मानि‍ होइ ओकरा बगलक बंदूक उठाए धाँइ-धाँइ गोली दरोगाक भेजामे उतारि‍ देत। पर बेचारा कि‍ करि‍ सकैत। चुपचाप घरक ओर वि‍दा भेल आ कसम खा लेलक। आइसँ पढ़ब आ सि‍र्फ पढ़ब। अपन बापकेँ ई अपमानक बदला हम कलक्‍टर बनि‍ कऽ लेब। आब ने जानि‍ बलदेवमे कोन शक्‍ति‍ आबि‍ गेलै, सबकुछ छोड़ि‍ सभसँ नाता तोड़ि‍ सि‍र्फ कि‍ताबसँ नाता जोड़ि‍ लेलक।


नन्‍द वि‍लाश राय
कथा
अइना


हम अपन सारक बेटाक वि‍आहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनि‍यर अछि‍। ओ अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालसँ इंजीनि‍यरि‍ंगक डि‍ग्री लेने अछि‍। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्‍नर अछि‍। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्‍नर अछि‍ तेहने ओ पढ़ैओ-लि‍खैयोमे तेज छल।
     ललनक वि‍आह पॉंच लाख टाकामे बेरमा गामक वुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्‍चन ठाकुर मध्‍य वि‍द्यालकमे शि‍क्षक छथि‍न्‍ह। अपना बेटीकेँ इन्‍टर पास करौएने छथि‍न्‍ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्‍द भेल आ ओ ललनक वि‍आह बुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ पक्‍का कए लेलक। बुच्‍चन ठाकुरक चारि‍ लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि‍ गेल। बुच्‍चन ठाकुर कहलखि‍न- जेतेक टाका वॉंकी अछि‍ वि‍आहक दू दि‍न पहि‍ने भेट जाएत मुदा, वि‍आह दि‍न जखन टका नहि‍ पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि‍- पाहुन टका तँ बुच्‍चन बावू अखन तक नहि‍ भेजलक हेँ। कि‍ कएल जाए?”
  हम कहलअनि‍- आइ वि‍याह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि‍। वि‍आह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि‍ जे बुच्‍चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि‍। चलू शुभ-शुभ कऽ वि‍आह करेवाक लेल।
     हमसब दुल्‍हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्‍चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्‍न्‍ा भेलाह।
     बुच्‍चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखि‍न- हम समएपर टका नहि‍ भेज सकलहुँ ताहि‍ लेल अपने सभ लग लज्‍जि‍त छी। मुदा वादा करैत छी, कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने अहॉंक टका दऽ देव।
  हमर सार कि‍छु नहि‍ बजलाह। हम कहलयनि‍- ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ वि‍दागरीसँ पहि‍ने टका महेश बावूकेँ दए देवनि‍।
  बुच्‍चन बावू बजलाह- अवश्‍य-अवश्‍य।
 अवश्‍य-अवश्‍य बजैत ओ आंगन चलि‍ गेलाह आ हमसब वासा पर आवि‍ बैसलौं। जलखै-नाश्‍ता, चाह-पान आदि‍ सभ चलए लगल। संगहि‍ ति‍लकक ओरि‍ओन हुअए लगलैक।
     बरातीक स्‍वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि‍ भेल। शुभ-शुभ कऽ वि‍आहो सम्‍पन्‍न भेल। मुदा बुच्‍चन बावू अपन वादाक मुतावि‍क कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने वकि‍यौताबला एक लाख नहि‍ दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ कि‍छु नहि‍ मुदा अबैतखान समधी मि‍लन नहि‍ केलक। हमरा ई गप्‍प नहि‍ पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्‍प नहि‍ मानि‍ फटफटि‍यापर बैसि‍ कऽ चल गेलाह। हम कनि‍यॉंकेँ वि‍दागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्‍जापर जाइते अपन संतुलन नहि‍ राखि‍ सकलौं आ महेशकेँ देखि‍ते कहलि‍यै- ......
जे अहाँकेँ कनि‍यो मानवता नहि‍ अछि‍। अहाँ अव्‍यवहारि‍क लोक छी। एके लाख टकाले अपन परि‍चए दए देलि‍ऐ। कि‍ कहैत अछि‍ बेरमा गामक लोक आ बुच्‍चन ठाकुरक सर-कुटुम सेहो सोचलि‍ऐ? जखन वि‍आह भए गेल तखन समधी मि‍लन नहि‍ केलासँ कि‍ फेदा भेल। आरो बहुत कि‍छु कहि‍ देलि‍एनि‍। महेश कहलाह- यौ पाहुन सभ एक-दोसरकेँ उपदेश दैत छैक। अपन मुँह कनेक्शन ऐनामे तँ देखौ।
हम नि‍रूत्तर भऽ गेलौं।‍ आ हमरा सामने हमर बेटा गणेशक वि‍आहक दृश्‍य नाचऽ लागल। हमर बेटा गणेश मैट्रि‍कमे दू-बेर फेल कएने छल। तेसर बेरमे मैट्रि‍क पास कएलक। कॉलेजमे पढ़वाक लेल कहलि‍ऐ तँ दि‍ल्‍ली भागि‍ गेल। दि‍ल्‍लीसँ तीन वर्षक वाद गाम अाएल। पता चलल जे सेल्‍समैनक काज करैैत अछि‍। तीन वर्षक वाद एलाक उपरान्‍तो एकोटा टाका हमरा आ अपना माएकेँ नहि‍ देलक। हमर पत्नी कहलक- गणेशक कतौ नीक लड़की देख कऽ वि‍आह कए दि‍यौक। भऽ सकैत अछि‍ वि‍आहक बाद सुधैर जाए।‍
तैपर हम कहलि‍एनि‍- एहेन अवण्‍ड लड़कासँ के अपना बेटीक वि‍आह करत। करबो करत तँ कि‍छु नहि‍ देत।‍
गणेशक माए बाजलि‍- कि‍छु देत नहि‍ देत तँ‍ कि‍ होएतै हमरा गणेशक वि‍आह करवाक अछि‍। हमरा पुतोहू आनि‍ दि‍अऽ।
हम गणेशक कथा लेल दू-चारि‍ गोटेक लग चर्चा केलौं तँ हमर सार महेशक प्रयाससँ कैथि‍नि‍याँ गाममे टुनटुन बाबूक बेटी संग दू लाख टाकामे कथा पक्का भेल। टुनटुन बाबू साधारण गृहस्‍थ छथि‍। ओ एक लाख टाका वि‍आहक पन्‍द्रह दि‍न पहि‍ने दए गेलथि‍। मुदा एक लाख टका वि‍आहक तीन दि‍न पहि‍ने भेज देवाक लेल वादा केलनि‍। मुदा वि‍आहक तीन दि‍न पहि‍ने जखन टाका नहि‍ भेजलाह तखन हम मोवाइलसँ सुचि‍त कऽ देलि‍एनि‍। जे काल्हि‍ वारह बजे दि‍न धरि‍ हमरा टाका नहि‍ पहुँचत तँ हम बराती लऽ कऽ नहि‍ अाएब। भोरे टुनटुन बाबू आ हुनकर मि‍त्र अएलाह आ पच्‍चास हजार टाका हमरा गि‍नलाह। हम कहलि‍एनि‍- वाकी पचास हजार कखन देव।
टुनटुन बाबू बजलाह- बड्ड परि‍यासे ई टाकाक प्रबन्‍ध कएलौंहेँ। आब जे वाकी रहल ओ द्वि‍रागमनमे देव।‍
हम स्‍पष्‍ट कहलि‍एनि‍- वि‍आहसँ पहि‍ने हमरा टाका नहि‍ देब तँ वि‍आह नहि‍ होएत। काल्हि‍ भि‍नसरे आठ बजे तक बकि‍यौता टाका नहि‍ दऽ जाएब तँ बरात लऽ कऽ नहि‍ आएब।‍
टुनटुन बाबू आ हुनक मि‍त्र लाख नि‍होरा करैत रहलाह मुदा हम नहि‍ मानलएनि‍। अन्‍तमे टुनटुन बाबूक मि‍त्र कहलखि‍न ठीक अछि‍ अहाँकेँ काल्हि‍ भाेर आठ बजे पचास हजार टाका पठा देब अहाँ वि‍आहक तैयारी करू।
एक बीघा खेत भरना राखि‍ टुनटुन बाबू पचास हजार टाका हमरा भेजलक तखन हम गणेशक बराती लऽ कऽ कैथि‍नि‍याँ पहुँचलौं। आइ हमरा आँखि‍क आगाँ सभ पुरनका दृश्‍य नाचि‍ रहल अछि‍। हमरा अपने-आपपर ग्‍लानि‍ होइत अछि‍।

सुजीतकुमार झा
संस्‍मरण-चुनचुन मिश्र
हमर तऽ ओ मैथिली विटक समाचारदाता छलाह

फेसबुकमे किछदिन पूर्व एकटा समाचार पढलौ ओहिमे लिखल छल चुनचुन मिश्र नहि रहला । इ खबर पढिते शरीरमे करेन्‍ट जँका लागल कनिकाल लेल तऽ बुझाएल हमरो शरीर सँ प्राण निकलि गेल ।
चुनचुन बाबुसँ बड घनिष्‍टता छल से नहि मुदा ओ मैथिलीकेँ बहुत बडका आन्‍दोलनी भेलाक कारण हमरा हुनकाप्रति बहुत श्रद्धा छल । हम हुनकर नाम कोनो समाचारमे देखैत छलौह की पुरान समाचार किया नहि हुए अपन रेडियोमे बजा दैत छलौ ।

कएँ दिन तऽ रेडियो मिथिलामे अपन नाम समाचारमे सुनलाक बाद ओ रहिका सँ टेलिफोन कऽकऽ धन्‍यबाद दैत छलाह । बिहारक मात्र नहि भारतक कतेको स्‍थानपर मैथिली सँ जुडल कोनो कार्यक्रम होइत छल तऽ ओ अपने समाचार टिपा दैत छलाह । एक बेर तऽ एहन भेल रहैक जे नेपालक राजविराजमे विद्यापति पर्व समारोह भेल छल हमर रेडियो सँ ओकर समाचार कोनो कारण बस नहि बाजल । ओ हमर मोबाइलमे टेलिफोन कऽ उपराग देलन्‍हि ।
जखन की चुनचुन बाबु ओ कार्यक्रममे गेलो नहि छलाह । हमर रेडियोक लेल ओ अपन पैसा लगा कऽ काज करैत रहथि ।
मधुवनी, वासोपट्टी, जयनगर, बेनीपट्टी, सहितक स्‍थानपर हमर सभक समाचारदाता भेलाकबादो मैथिली विटक समाचार प्राय ओहे करैत छलथि । हमर सभक समाचारदाताकेँ बुझल छल जे मैथिलीक समाचार चुनचुने बाबु कइए दैत छथि तएँ ओ सभ सेहो चुनचुने बाबुकेँ लेल मैथिली समाचार छोडि दैत छलथि । हुनकासभकेँ बढिया जँका बुझल छलन्‍हि मैथिली विटक समाचारदाता तऽ चुनचुन बाबु छथि । हुनका समाचार पठाबयमे बहुत खर्च होइत छन्‍हि हमरा लगैत छल कए दिन कहि दैत छलियन्‍हि कथिलाय एतेक सहयोग करैत छी । चुनचुन बाबु हमरा बेर बेर कहथि हम तोरा थोरहे सहयोग करैत छियह मिथिला मैथिलीकेँ लेल काज करैत छी । अहिमे जतेक सन्‍तुष्‍टि भेटैत अछि ओतेक दोसरमे नहि ।
मिथिला मैथिलीक लेल निस्‍वार्थ भाव सँ काज करयवला चुनचुन बाबु बाहेक हम अपन जीवनमे दोसर किनको नहि देखने छी । चुनचुन बाबु सँ हमरा जीवनमे दू बेर मात्र प्रत्‍यक्ष भेट भेल अछि ।
मुदा पहिल भेटमे जे हुनकाप्रति छाप बनल से अखनो कायमे अछि ।
नेपालक राष्‍ट्रिय अखबार स्‍पेशटाइम दैनिकमे हम काज करैत छलौ ओ पत्रिका सौराठ सभापर विशेष रिपोर्टिङ्गक लेल सौराठ जायकेँ लेल हमरा अढौने छल । ९ वर्ष पहिने ओतय पहुँचलौह तऽ सभ सँ पहिल भेट चुनचुन बाबु सँ भेल छल ।
चुनचुन बाबु संगे सौराठ सभापर बेस चर्चा परिचर्चा कएलौह फेर हुनकेँ संगे सौराठ गाम घुमलौह । पञ्‍जिकार जी सहित बिभिन्‍न विद्वानसभ संग बात कएलौह । ओहि दिन पानि पडल रहैक, कनी कनी थालो भऽगेल रहैक एकर बाबजुद ओ हमरा संगे घण्‍टो घुमलाह । हुनकर व्‍यवहार हमरा भितरतक प्रभावित कएलक । कनिके कालक भेट हमरासभकेँ बहुत निकटता आनि देलक 
चुनचुन बाबुक मूल परिचय हमरा मैथिलीक अष्‍टम अनुसूचिक लेल भारतमे भेल आन्‍दोनक समाचार सँ भेल । ताहि दिन जनकपुर क्षेत्रमे कान्‍तिपुर एफएमक हेल्‍लो मिथिला विशेष रुपस्‍ाँ सुनल जाइत छलैक ओहिमे आदरणीय धीरेन्‍द्र प्रेमर्षि प्रत्‍येक हप्‍ता बैजु बाबु आ चुनचुन बाबुक विशेष चर्चा करैत छलथि । बैजु बाबु मैथिलीक लेल ई कएला चुनचुन बाबु ओ कएला समाचार सुनैत छलौह । एकरबाद पता चलल हमरा सौराठमे भेटल रहथि ओ महाशय एतेक बडका लोक छथि ।
चुनचुन बाबु संगेक दोसर भेट जनकपुरमे एफ एम रेडियो खुजलाक बाद भेल छल । हम रेडियो मिथिलाक समाचार प्रमूख भेलौह तऽ ओ ओना बधाई देबय जनकपुर आएल रहथि मुदा ओ जे कहलथि ताहि सँ लागल बधाई कम मिथिला आ मैथिलीक लेल हमर की दायित्‍व अछि तेकरा मन्‍त्र देबय बेसी । ओ जाइत जाइत कहलथि मिथिला आ मैथिलीक लेल प्रतिष्‍ठा नहि देखय लगीह अपना बुते जे लागय से करीह । हम रेडियो मिथिलामे हुनकर किछ महत्‍वपूर्ण इन्‍टरभ्‍यू सेहो लेलौ ।
आई हमरासभ लग चुनचुन बाबु नहि छथि कतेको गोटे बातचितक क्रममे कहलन्‍हि चुनचुन बाबु गेला सँ अभिभावक बिहिन भऽगेलौ मुदा हमरा तऽ ओ दोसरे बिहिन बनाकऽ चलि गेल छथि ।
हमरा तऽ चिन्‍ता लागल अछि रेडियो मिथिला आ मिथिला डटकमक मिथिला विटक समाचारदाता केँ बनत । एतेक निस्‍वार्थ भाब दोसरमे कतय सँ भऽसकैत अछि । सहीमे चुनचुन बाबु महान छलाह ।  
१.जगदीश प्रसाद मंडल- विहनि कथा-
कौआक मैनजन २. अनमोल झा- चारिटा विहनि कथा ३.ज्योति- एकटा विहनि कथा-ध्वनि-प्रतिध्वनि
जगदीश प्रसाद मंडल
विहनि कथा

कौआक मैनजन

जहि‍ना अखन आरक्षणक माध्‍यमसँ बेसि‍यो उम्रबला शि‍क्षक बनि‍ गेला तहि‍ना राजशाहीमे मैनजन सबहक बहाली भेल छलनि‍। कुरसी पबि‍ते जहि‍ना पावर नचए लगैत तहि‍ना कौओ-मेना, हरि‍णो-सुगर आ कुकुड़ो बि‍लाइक मैनजनकेँ पावर टि‍कपर चढ़ि‍ गेल। गाम महराजकेँ बाँटि‍ करए बखो हुअए लगल। मैनजनीक पावर पाबि‍ बि‍‍लाइ गोरस पट टक-धि‍यान लगबए लगल। जेहन उक नहि‍ तेहन फूक भारी। जे ने बड़द जकाँ हर बहि‍ सकैए आ ने खस्‍सी-बकरी जकाँ खाएल जा सकैए मुदा नजरि‍ सदति‍ काल दूधे-छालहीपर। जहि‍ना अपन बेरादरीमे हरि‍ण-सुगर, कुकुड़-बि‍लाइ करैत तहि‍ना कौओ उक फेड़ए लगल। दोसराक जुआन कनि‍याँ देखि‍ उनट-फेरी कऽ अपना घर अनए लगल। मन मसोसि‍ सभ बरदास करैत।
     अपन कनि‍याँकेँ बलजोरी घरसँ लए जाइत देखि‍ बदलू कौआक हृदए दहकि‍ गेलै। कि‍छु बजैक आ करैक (प्रति‍रोध) साहसे ने होय। मुदा मन दलमलि‍त हुअए लगलै। सोचैत-ि‍वचारैत अपन दुखनामा कानि‍-कानि‍ सभकेँ कहलक। बेरादरीमे बेसी ओहन जे परोछमे उचि‍त बजैत मुदा सोझामे (मैनजनक) सरस्‍वतीये हरा जाइत। बदलू  चालाकी केलक। मन दहकले रहै, बुढ़वा सभकेँ छोड़ि‍ समरथका (कौआ) सबहक जेर बना कहलक- भाय, जेहन दशा (गति‍) हमर भेल तेहने तँ सभकेँ हेतह?
काँव-काँव करैत सभ बाजल- एहेन अन्‍याय सभकेँ जाबे रोकब नहि‍ ताबे एका-एकी सभकेँ हएत।‍
जेरक संग बदलू मैनजन ऐठाम वि‍दा भेल। जेर देख मैनजन डोलि‍ गेल, घवड़ा गेल। तहि‍ काल जइ कौआकेँ छीनि‍ लऽ गेल रहै ओ अंगनेमे मैनजनक वि‍औहती कनि‍याँकेँ झोंट पकड़ि‍ लि‍ड़ी-बि‍ड़ी करए लगल। मैनजन भगैक ओरि‍यान करए लगल। तहि‍ बीच गट्टा पकड़ि‍ बदलू पुछलक- कतऽ पड़ाइक ओरि‍यान करै छेँ?
थरथर कपैत मैनजन बाजल- भैया, अपन कनि‍याँ नेने जा। पएर पकड़ै छि‍अह जे जान छोड़ि‍ दाय।‍
कलपैत मैनजनक बात सुनि‍ बदलूक मन ठमकि‍ गेल। जहि‍ना धधकैत आगि‍मे पानि‍ पड़लासँ मि‍झा जाइत मुदा गरमी (ताव) रहवे करैत तहि‍ना बदलूओकेँ भेल। रसे-रसे गरमी कमि‍ते रहै कि‍ तहि‍ बीच अपन कनि‍याँ मुस्‍की दैत दरबज्‍जापर आएल। बदलू मैनजनकेँ पुछलक- एहेन काज फेर ने ते करबह?
  ‍नइँ।
बदलूक पत्‍नी बाजलि‍- ‍जहि‍ना सीता महरानी लंकामे रहि‍तो पवि‍त्र रहली तहि‍ना हमहूँ छी।
दोसर कौआ बदलूकेँ कहलक- दि‍न भरि‍क हराएल जँ साॅझू पहर घुरि‍ कऽ घर आबि‍ जाए तँ ओ हराएल नहि‍ बुझल जाइत। तहि‍ना....।‍


अनमोल झा

चारिटा विहनि कथा

तंग

सम्पर्कक बैसारमे जाइत-जाइत हमरा देरी भऽ गेल छलए। संध्या पाँच बजे सम्पर्कमे रचना पाठ आ ओहिपर आलोचना-समालोचना शुरू भऽ जाइत छलै।

दरअसल हमरा डेरेसँ निकलैमे थोड़े देरी भऽ गेल छल। ठीक निकलै कालमे एकटा आप्त लोक डेरापर आबि गेल रहथि आ हुनका संग गप्प-सप्प करैत, चाह-पान होइत थोड़े समय लागि गेल छल। आ छुट्टी दिन रहलासँ बसो सभ कम रहैत छैक। जे से जाहि द्वारे हो, हमरा देरी भऽ गेल छल ओतए पहुँचैमे।

हम बससँ उतरि चोट्टहि सम्पर्क जतए होइत छलै तेम्हर नम्हर-नम्हर डेग दैत झटकारि कऽ चल जाइत रही। ठीक हमर उनटा दिससँ तीन-चारि गोटा गप्प करैत आबि रहल छला। गप्प प्रायः ओकरा सभक पहिनेसँ होइत आबि रहल छलै। दुनू गोटा जखन थोड़े लगमे एलौं तँ ओ सभ जे अपनामे बात करै छलै ताहिमे कहलकै जे हम आब तबाह भऽ गेल छी।

ओकर ई बात सुनि हमर डेग जे तुफान एक्सप्रेस सन छल से पसिन्जर ट्रेन भऽ गेल आ हम बिसरि गेलौं सम्पर्कक बैसार तखन। हमरा बुझा गेल जे एकरा निश्चय भाए-भैयारीबला झंझट छैक आ ओ ताहिसँ तंग भऽ गेल अछि। मुदा कियो पुछलकै जे ककरासँ तंग भऽ गेलौं से ओकरा मुँहे जबाब सुनि हम अवाक् भऽ गेलौं। ओ कहलकै- हम जमाइसँ तंग भऽ गेल छी। हमरा मोनमे भेल जे निश्चय ऐ ससुर जमाइक तंगीक कारण ई महानगर छी, जतए कोनो रिलेशन नै थीर रहि पबैत छैक। सभ अपन-अपन ड्यूटी आ पाइमे लागल रहैत अछि आ फेर डेग झटकारि कऽ चल गेल रही सम्पर्कमे हम...!


डेरायल
हम एम.ए. फाइनलक परीक्षा दऽ रहल छलौं। मैथिली आ हिन्दी दुनू विभागक छात्र-छात्राक एकहिटा विशाल घरमे एक बेन्चपर एकटा कऽ विद्यार्थी बैसा कऽ परीक्षा लेल जाइत छलै। परीक्षा खुब कड़ासँ लेल जा रहल छलै।
हमरा सभ लिखैमे व्यस्त रही, पूब-पश्चिम की होइत छैक से नै बुझाइत रहए किछु। विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कएल गेल गाइडक अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी सभ बीच-बीचमे आबि कऽ पूरा घरे-घर बौआ कऽ देखैत रहै। एकर अलाबा लाल बत्ती लागल गाड़ीसँ प्रशासनिक पदाधिकारी सेहो सभ आबि सभकेँ चेक करै आ कएक गोटाक पकड़ेलापर एक्सपेल कऽ दैत छलै।

पहिले दिनक परीक्षाक दू घंटाक बाद एकटा सर्कुलर एलै आ सभ घरे-घर पढ़ि कऽ सुनाएल गेलै जे काल्हि जे परीक्षा देमए अबै जाए से एडमिट कार्डक लेमिनेशन कएल रहक चाही। कारण पता केलापर बुझलिऐ जे कोनो विद्यार्थी पेन्सिलसँ ओहिपर चिट कऽ कए अनने रहए लिख कऽ। दोसर दिन सभक एडमिट कार्ड लेमिनेशन भऽ गेल रहै।

छः-सात पेपर जखन परीक्षा भऽ गेलै तँ एक दिन गार्ड कहलकै जे आब बाथरूममे केमरा लगबा देबै। छौंड़ा सभ बेसी काल कहै बाथरूम जाएब, ताहिपर ओ ई बात कहलकै। कहक समएमे ओ ध्यान नै देने रहै जे परीक्षार्थीमे छात्रा सेहो बहुत गोटा छैक। ओकरा जखन ओ बात ध्यानमे एलै तँ कहै छैक जे लड़काबला बाथरूममे।


ई सुनैत देरी हम जे उत्तर लिख रहल छलहुँ ताहि दिससँ ध्यान हटि ओहि गार्ड दिस चल गेल रहए। आ लागल रहए जे परीक्षार्थीये जकाँ डेरायल छल, जे ई की बजा गेल। मुदा सभ छात्र-छात्रा लिखैमे व्यस्त छल। आ मोने मोन कहै छल, लगाबऽ ने कैमरा जतऽ लगेबाक छह। जखन अपने कन्फीडेन्ट भऽ परीक्षा दैत छी तखन डर कथीक?


पिछड़ल राज्य

बी.ए.मे फस्ट क्लास आ साढ़े पैंसठि प्रतिशत मार्कसँ पास भेल रहए ओ। किछु आगाँ पढ़क जोगारसँ ओ गामसँ महानगरमे आएल रहए।

नाइट कॉलेजमे नाम लिखा, एकटा प्राइभेट फार्ममे नोकरीक जोगारमे गेल रहए। डायरेक्टरक आमना-सामनी बैसल रहए ओ। डायरेक्टर ओकर बायोडाटा देख रहल छलै। आब मार्कसीट देखलकै। जन्म कुण्डली सन नाम चाकर मार्कसीट आ तकर नीचाँमे लिखल मूल्य बीस रुपये।

डायरेक्टर कहलकै आपके विश्वविद्यालय में यह बीस रुपया में मिलता है क्या?
ओकर मोन छोट भऽ गेल अहै आ अपन यू.जी.सी. एफेलिएटेड विश्वविद्यालयक मादे सोचए लागल रहए, सुआइत हमरा सभक राज्यकेँ लोक पिछड़ल राज्य कहैत अछि....!

एटेचमेन्ट

विवाहक कएक बर्ख बादो तक एना नै होइत रहै। माने जामे तक दरमाहा उठा कऽ पूरा लिफाफ बाबूक हाथमे धरा दैत छलै, अपना जे दू-चारि सए लगैत छलै से फेर माँगि कऽ माए-बाबूसँ लैत रहै, तावत् तक सभ ठीक- एकदम ठीक।

परिवार संगमे रहब, बाल-बच्चाक पढ़ब-लिखब खर्चे-खर्चा। से जहियासँ लिफाफ देब बन्द भऽ गेलै तहियासँ माए-बाप, बहिन-बहिनोइ, भाइ-भाउज सभक बैरी भऽ गेल रहए ई सभ। नाक-दम कऽ देल गेल रहै एकरा सभक। गाम कहियो जाए तँ अलग खाइले टा कहलकै। ने चुल्हा, ने बर्तन, ने भनसा घर आ चाउर दालिकेँ के पूछै, किछु ने देलकै। ऊपरसँ गारि-फज्झति सुनए आ ऊपरसँ दोसर बेटाकेँ सभटा लिख देबै सभ सम्पति घर-घरारी, तकर धमकीपर धमकी। बापक पी.एफ.क आ रिटायामेन्टक पाइ सेहो भाइक खातापर ट्रान्सफर कऽ देने रहै बाबू। कोनहुना समए बितल जाइत रहै। स्थिति तेहन भेल जाइत रहै जे होइ कोनो दिन आत्महत्या कऽ ली। झमेला समाप्त। मुदा पत्नी आ बच्चा सभक मूह देखि गम खा जाए जे हमरा रहैत एते करै छैक, पाछाँ की करै जेतै ओ सभ...।

आइ रातिमे एकटा सपना देखलक जे एकटा बबाजी, अघोरी बबा एकरा लग एलैहेँ। आ एकटा मुण्ड छापल लॉकेट एकरा देलकैहेँ आ कहलकै जे ई लॉकेट माए-बाप लग जा कऽ एकटा सरबामे कनी पाइन लऽ कऽ ओहिमे भिजा कऽ तीन बेर अपन कपारमे भिरबैत मंत्र पढ़ै लेल जे माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ, माए-बाबू चलि जाउ। ई करिते माए-बाबू गामसँ पड़ा जेतौ आ मरिये जेतौ। तोरा सभक झमेला समाप्त। रस्ता साफ।

ओ लॉकेट लऽ माए-बाबू लग सरबामे पानि राखि तीन बेर कपारमे भिरेलक। मुदा ओ मंत्र जे कहने रहै पढ़य- माए-बाबू चलि जाउ से नै पढ़ि सकल ओ...! आब खूनक टान हो बा कोनो एटेचमेण्ट से नै बुझि सकल रहए!    
 ३.
ज्योति
ध्वनि-प्रतिध्वनि
      ध्वनि आ प्रतिध्वनि नामक दू टा जुड़वाँ बहिन छली जे कि पहाड़ी इलाकामे रहै छली। ध्वनि स्वभाव सऽ बड्ड शान्त आ निर्मल छलैथ जखन कि प्रतिध्वनि हुनकर विपरीत बहुत चञ्चल आ उपद्रवी छलैथ।ध्वनि हमेशा घरमे अपन माय के काज मे मददि करै छलैथ।प्रतिध्वनि पहाड़ीमे एम्हर उम्हर भागैत रहैत छलैथ।एकदिन प्रतिध्वनि बाहर घुमैत छली तऽ हुन्का एकटा राजकुमार देखेलैन। आे राजकुमार हुन्का बड्ड नीक लगलैन।प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ खूब दाेस्ती केली आ आेकरा घुमाबऽ फिराबऽ लगली कारण आे राजकुमार आेहिठाम ककराे अतिथि बनि कऽ आयल छला।राजकुमार हुन्का सऽ बड्ड प्रसन्न छलाह।           
      दिन बीतल आ प्रतिध्वनि आेहि राजकुमार सऽ विवाहक माेन बनाबय लगली मुदा एकदिन जखन आे घर गेली तऽ देखली जे आे राजकुमार हुनकर बहिन के विवाहक प्रयाेजन सऽ देख लेल आयल छलैन।राजकुमार हुनकर बहिन ध्वनिके पसन्द कय विवाह कऽ लेला।प्रतिध्वनि के बहुत पैघ आघात पहुॅंचल छलैन।हुन्का बहुत क्षाेभ भेलैन जे लाेक हुनकर दुःख नहिं बुझलकैन।आे पहाड़ी सऽ कूदि कऽ अपन प्राण त्‍यागि देली।मुदा हुनकर आत्‍माके मुक्‍ति नहिं भेटलैन।हुनकर आत्‍मा पहाड़क खाइर् में अखनाे भटकैत रहै छैन।अखनाे जॅं कियाे पहाड़क खाइर्मे किछु जाेर सऽ बाजैत अछि तऽ प्रतिध्वनि आेहि आवाज के बेर्रबेर बाजै छैथ।
बिपिन कुमार झा

प्रदेश केर विकास : एक चिन्तन
(बिहार-विकास सन्दर्भ मे आलोचनात्मक अभिव्यक्ति)

Ph. D , IIT Mumbai
बिहार विधान सभा चुनाव सम्पन्न भेल। नितीश सरकार हाथलालटेन कें अपन कर्मक समुचित फल हेतु पाछू छोरैत पुनः एक बेर अपन अस्तित्व मे आयल। कलियुग कर्मयुग छैक। ओ अतीतक गप्प करी अथवा वर्तमानक, भारत सनहक गणतन्त्र राष्ट्र मे कर्मक फल जनता द्वारा जनता कें अवश्य भेटैत रहल अछि।
आब प्रश्न ई उठैत अछि जे बिहार केर विकास निरन्तर हो एहि हेतु ई केकर उत्तरदायित्त्व अछि? निश्चित रूप सँ उत्तर होयत नितीश सरकारक। जहाँ तक हमर मन्तव्य अछि ई उत्तर एकांगी अछिकियाक त { 92,257.51 sq. Kms ग्रामीण क्षेत्र, 095.49 sq. Kms शहरी क्षेत्र, (कुल 94,163.00 sq. Km), कुल जिला-38, कुल आवादी- 8,28,78,796 अधिकतम साक्षरता पटना- 63.82%, कुल विश्वविद्याल- 13, इंजीनियरिंग कालेज-08, प्रबन्धन संस्थान 06, मेडीकल कालेज 08, शोध संस्थान 06, ला कालेज 10, आयुर्वेद महाविद्यालय 05, वेटनरी कालेज- 02, कृषि महाविद्यालय 04, फाइन आर्ट्स महाविद्यालय 02, शोधकेन्द्र 04, अन्य शैक्षिक संस्थान 14)} एहि वृहत क्षेत्र बला राज्य केर विकास क उत्तरदायित्त्व मात्र अस्थायी प्रशासक के ऊपर छोडि पल्ला झाडनाई कतय तक समुचित अछि ई अपन विवेक सँ तय कयल जाय। विकास केर उत्तरदायित्त्व एहि प्रकार सँ निर्धारित कयल जा सकैत अछि।
·         प्रशासक (विकासकर्ता कहब विशेष उचित)
o   स्थायी
§  सिविल सेवारत पदाधिकारीगण
§  अन्य सहयोगी पदाधिकारीगण
§  जनता स्वयं
·         निवासी
·         प्रवासी
o   अस्थायी
§  चुनाव मे जीतल जनताक प्रतिनिधि
एतय विभाजन किछु विशेष दृष्टि सँ कयल गेल अछि जाहि सँ बिहार अथवा कोनो प्रान्तक विकास केर गप्प केनाई समुचित होयत।
सिविल सेवारत पदाधिकारी केर आचरण यद्यपि निर्दुष्ट मानल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान समय मे ई बात कदाचित अप्रासंगिक भय गेल अस्तु एहि तरहक पदाधिकारी सँ एतबा कहब उचित जे राष्ट्र अस्मिता, एकता एवं उत्कर्ष समुचित नीतिनिर्माण सँ संभव छैक जेकर कर्णधार सिविलसेवके होइत छथि, आ यदि ओ अपन उत्तरदायित्व प्रलोभन अथवा भयवश बिसरि जेता तऽ भविष्य की होयत ई सहज बुझल जा सकैत अछि।
      जहाँ तक अन्य सहयोगी पदाधिकारी तथा पुलिस प्रशासनक गप्प अछि, यदि अनुचित नहिं मानल जाय तऽ ई कहब अनुचित नहि होयत जे सबहक कर्ता आ हर्ता ई होइत छथि। यदि पुलिस प्रशासन आ कर्मचारी वर्ग ठानि लथि तऽ भ्रष्टाचार 90% धरि समाप्त भय सकत, शिक्षा तथा अन्य सेवा पंगु नै रहत, यात्री पटना स्टेशन सँऽ बस स्टेशन राति मे जायब अनुचित नै बुझत। एकटा उचित काज हेतु हरियर पत्ती नै देखबय पडत, बिना लाइसेंस अथवा कागज के हजारो गाडी सडक पर नै दौडत, डी० एम० सी० एच० मे चिकित्सा मे लापरवाही नै होयत, लोक के अन्यत्र भटकय नै पडत काज लेल। बहुतो एहेन गप्प छैक जेकरा ई पुलिस, कर्मचारी, चिकित्सक सदृश अधिकारी दूर कय सकति छथि।
      आब जनता जे मूल निवासी छथि हिनक गप्प। हम नहिं सुधरब ई शपथ खा के कदाचित बैसल छथि। ई अपन हाल नीक जँका बुझैत छथि तैय्यो प्रमाद, प्रलोभन अथवा भयवश अपन कर्तव्य नहिं करता बस अधिकारक गप्प लिअ। दोसर कें चुटकी लेब, टाँग खीचब, ईर्ष्या करब आहा हा परमानन्द दैत छन्हि। आई कोनो तरहें बीत जाय काल्हुक के देखलक? ई हिनकर सोच छन्हि। विकास आ देशक गप्प नै करू ओ त सरकारक काज छियै न!! कतहु क्रिकेट भेल तऽ कान पथता, अपने कोनो खेल मे आगू एता अथवा अपन बच्चा के कोनो क्षेत्र विशेष मे आगू अनता ई तऽ... की कहू एहेन राज मे हम छी न किछु सम्भव नै अछि। हँ, ध्यान आयल पढि लिखि के की हेतै? कोनो नौकरी भेटतै?” ई हिनक सोच छन्हि। गामक चौक पर गाजा आ भांग खायत से बड्ड नीक। कतेक गप्प कहू। हिनको स बस एतबा आग्रह जे अपन कर्तव्य जे छन्हि यथासम्भव ओकर पालन करथु।
      हमरा सदृश प्रवासी नागरिक तऽ बेचारे पटना धरि गाम जेबाक जोश रखैत छथि ओकर बाद बिहार नहिं सुधरी वाक्य बजैत छथि। की ई उचित अछि? अपना लेल उत्तर देब सदा मुश्किल होइत अछि। किन्तु ई किछु हिनकर कर्तव्य सेहो छन्हि न? गाम जेबा मे होयब समस्या देखाइत छन्हि मुदा घर मे बच्चा के मूँह सँ  मैथिली सुनबा मे बज्रपात होइत छन्हि!! बिहार किं वा मिथिला लेल अहाँ की कयल? अपन पेट तऽ कुकुरो पोसैत अछि। आय NBT मे एकटा समाचार देखल नोएडा केर कम्पनी ल्यूना इरगोनोमिक्स केर मुख्य कार्यकारी अधिकारी मेजर अभिजीत भट्टाचार्य पाणिनिनामक साफ्टवेयर केर जानकारी देलथि जाहि द्वारा 11 भाषा मे SMS  पठा सकैत छी। ई न्यूज एहि दृष्टि सँ महत्त्वपूर्ण जे अपन धरोहर केर रक्षण करबाक सोच जुडल अछि। एहि तरहें गजेन्द्र जी सदृश कतिपय व्यक्ति सराहनीय कार्य कय रहल छथि जे प्रवासी होइतो मिथिला/बिहार केर विकास मे योगदान स्वरूप अछि।
आब बात नितीश सरकारक...। एहि मे कोनो सन्देह नहिं जे नितीश सरकार लालटेन के मडियल रोशनी सँऽ बिहार के जेनरेटर युग मे अनलक (एकर चर्चा आगू करब)। बिहारक विकास गाथा बिहार सरकार केर साइट पर देखल जा सकैत अछि। RTI Doc.  जे ओहि साइट पर अछि, जानकारी के बुझबा मे सहायक होयत। 5 वर्षक भीतर 47000 सँ अधिक अपराधी के सजा भेटब, केन्द्रीय योजना क अतिरिक्त ४० से अधिक योजना केर कार्यान्वयन होयब, सडक केर जाल प्रस्तुत होयब, पलायनक दर कम होयब, बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम-2009, 2008-09  मे वार्षिक विकास दर प्रचलित मूल्य पर 24.33%  होयब, राज्यक कर राजस्व 2004-05 केर तुलना मे 2009-10  मे 3347 करोड सँ 8130 करोड होयब आदि किछु शुभसंकेत अछि। टीका-टिप्पणी तऽ चलबे करत मुदा एहि बातक प्रतिषेध करब की बिहार विकासक पथ पर अछि, आत्मघाती होयत।
लेकिन...! नितीश सरकार अखनहुँ किछु बात लय कें आलोचना के पात्र अछि जेकरा बिन्दुबार तऽ नहि कयल जा सकैत अछि मुदा सुधार हेतु किछु गप्प जरूर कयल जा सकैत अछि। त आगू सुनू-
अखनहुँ बिहार जे समस्या सँ त्रस्त अछि ओकर समाधान हेतु निम्न बिन्दुगत क्षेत्रक समाधान अपेक्षित अछि-
·         शिक्षा- अखनहुँ गुणवत्ता क दृष्टि सँऽ शिक्षा सन्तोषजनक नहि अछि। सुधार अवश्य भेल मुदा अखनहु जरूरत अछि जे शिक्षा मे व्यापक सुधार हो। ताकि विद्यार्थी के अन्य प्रदेश हेतु रुख नहिं करय पडय। शिक्षा मे पारदर्शिता के अभाव अछि। गुणवत्ता के स्थिति एहि बात सँ लगा सकैत छी जे डाक्टरेट के डिग्री ओतय सहजता सँ प्राप्त कय सकैत छी। संस्कृत विश्वविद्यालय सँ स्वर्णपदक प्राप्त व्यक्ति एक पंक्ति संकृत नहिं बाजि सकैत छथि। संस्कृत विद्यालय जाहि हेतु सरकार करोडो खर्च कय रहल अछि ओकर भवन मात्र अछि बाकी सब कागज पर। हरिजन छात्रावास अछि सौ स अधिक कमरा के किन्तु एकहु टा हरिजन आई धरि ओतय नहिं देखल गेल। बहुत रास उदाहरण अछि सबटा नहिं देल जा सकैत अछि।
·         सुरक्षा- एहि क्षेत्र मे नितीश सरकारक कदम सराहनीय अछि मुदा अखनि धरि अन्य क्षेत्रक गप्प छोडू राजधानी सुरक्षित नहिं अनुभव कयल जाइत अछि। एहि पर विशेष ध्यानक आवश्यकता अछि।
·         संसाधन
o   विद्युत हम सभ लालटेन युग सँ निवृत्ति लय जेनरेटर युग मे त आबि गेलहु किन्तु बिजली हेतु आइयो दुनिया अन्हार अछि। भगजोगनी आ अतिथि रूपी बिजली रानी के विकास मार्ग मे बाधा हेतु सबसँ पैघ कारक कहल जा सकैत अछि। बिजली केर दुखद स्थितिक उदाहरण हम एना दय सकैत छी- हम अपन प्रथ त्रैमासिक संकृत ई जर्नल जाह्नवी (jahnavisanskritejournal.com) केर तृतीय अंकक लोकार्पण मिथिला मे प्रख्यात साहित्य्क विद्वान प्रो० रामजी ठाकुर सं करायब निश्चित कयल। अस्तु लैप टाप आ इण्टर्नेट सेवा हेतु अपन मोबाइल गाम लय गेलहुं। ओतय बिजली रानी हमरो सँ पैघ अतिथि छली। अन्ततः एक व्यक्ति कें आग्रह कय जेनरेटर पर कोनो तरहें चार्ज कयलहुं आ कार्य सम्पन्न करायल। यदि बिजली व्यवस्था सम्यक हो तऽ गाम आ शहर के चक्कर नहिं रहत। रोजगारक सृजन सेहो होयत।
o   यातायात- यातायात केर समस्या अखनो धरि अछि। वाहन संचालक केर अनियमितता ओ भाडा, समय, यात्री क सं बदसलूकी, गाडीक कागज अथवा लाइसेंस लय के हो, प्रशासन अधिकांश समय मौने नहि रहैत अछि अपितु हरियर पती गनबा मे व्यस्त रहैत अछि।
o   रोजगार- रोजगार एकटा एहेन बिन्दु अछि जे लोक कें परदेश जेबाक हेतु विवश कयदैत अछि। समाजिकता के नष्ट कय रहल अछि। व्यक्ति अपन भावना मात्र सं सरोकार रखबाक हेतु विवश अछि। अस्तु रोजगार सृजन अत्यावश्यक अछि। आवश्यकता अछि जे टेण्डर आदि केर दलाल सँ दूर स्वच्छ वातावरण मे रोजगारक अवसर जनता के देल जाय। जनता सतत नीक के संग दैत छैक अन्तःकरण सँ मुदा रोजी क चक्कर मे अनुचित काज सेहो करबाक हेतु विवश होइत अछि।
o   जागरुकता- अन्त मे नितीश सरकार सँ अपेक्षा जे जनता मे जागरुकता के संचार हो एकर प्रयास कयल जाय। बहुत किछु जनता नहिं बुझबाक कारण अनुचित करैत अछि। किन्तु यदि जागरुकता बढायल जाय तऽ जनता भ्रष्टाचार के संग नहि देत, विविध कार्यक्रम विशेष रूप सँ सफल होयत।
अन्त मे निष्कर्षतः हमर वक्तव्य होयत जे बिहारक उत्कर्ष समग्र सहयोग सँऽ संभव अछि नकि केकरहु पर दोषारोपण सँऽ मानवमात्र मे कमी आ गुण दुनू छैक। अस्तु गुणक आलम्बन कय अपन संविधान एवं संस्कृतिक अनुकूल कर्तव्य कय प्रत्येक व्यक्ति आ संस्था समग्ररूप सँऽ राष्ट्रक उत्कर्ष मे योगदान दी ई सादर निवेदन।
(लेखक IIT मुम्बई कें शोधछात्र छथि। लेख मे निष्पक्ष लेखिनी केर प्रयोग कयल गेल अछि। कोई कोनो आशय के वैयक्तिक तौर पर नहिं ली। प्रस्तुत कतिपय आँकडा बिहार राज्यक साइट सँऽ लेल गेल अछि। लेख सन्दर्भित टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर आमन्त्रित अछि)

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...