Monday, September 13, 2010

'विदेह' ६५ म अंक ०१ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६५) PART IV


१.उषाकिरण खान- अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया२.अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी- सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘, यू.पी.एस.सी. लेल-चि‍त्राक सनेस
उषाकिरण खान
अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया

जखन पन्ना जी लिखल कथा संग्रह अनुभूतिहमरा हाथमे आएल तखन अतिशय प्रसन्नता भेल। किएक तँ पन्ना जीक संगे हम कएक बेर अस्सीक दशक मे संगहि कथा पाथ कएने छलहुँ। हुनका कथाक मानसिक धरातल आ लेखकीय सावधानी बूझल छल। कथाकारक अनुभूतिक परिचय छल स्थिरचित्तक बुझनुक लेखिका सहजहि श्रोता एवं पाठक सँ सोझा सोझी गप्प करैत छथि। अनुभूतिक वेष्टन मोनक आगाँ पाछाँ रहैत छन्हि, तैं कथाक विकास एकटा सुष्पष्ट विचार यात्रा जकाँ छन्हि। पन्ना जी अनेक परिवेशक कथा लिखैत छथि। ठोस धरातल पर चलय बाली आइ काल्हिक स्त्रीक कथा ओ संवेदना संग नहि पएरक धमक संगे लिखने छथि। जेना सेवानिवृत्ति। सेवानिवृत्तिक पश्चात् संतान आ स्वजन परिजन मुँह बओने रहैत छथि, जीवन चरित कमाई आ बचत के कोना आलसात कए लेल जाए तकर ब्योंत मे लागल रहैत छथि मुदा वृद्ध माता पिताक चिंता नहिये टा करैत छथि। पन्ना झा जीक कथाकार स्वानुभूति केँ सोझाँ धए टा देलन्हि अछि ओकरा विवछओलन्हि अछि नहि। इएह हिनक विशेषता छन्हि। अपन दृढ़ पद चाप छोड़ब। सेवानिवृत्ति कथाक चर्च हम बारंबार करए चाहैत छी, ओ कथा बूँद मे समुद्र तँ थिके, एकटा पइघ संदेश दैत अछि। मनहि ओ स्वयं दुलारपुर सन नगरक कात बला गामक बेटी छथि तरौनी सन बुद्धिजीवी गामक पुतहु परंच मिथिलाक असूर्यम्पश्या ग्राम ललनाक ज्ञान छलन्हि, कलकत्ता जाए आ ओतए शिक्षा प्राप्त कए, ओतुक्का सामाजिक जीवन के अनुभव लए जे किछु अपना क्षेत्रक विकासक कामना कएलन्हि तकर सत्व ओ सेवानिवृत्तिकथामे देने छथिन्ह, एकटा गाम जे आदर्श अछि, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि छैक महाविद्यालय नहि छैक। महिला महाविद्यालय फोलब हाइ-रिस्ककाज छैक, छात्रा जुटतैक कि नहि? मुदा कल्पना शील लेखिका आधुनिक शिक्षाक आवश्यकता बलें महाविद्यालय फोललनि आ सफल भेलीह। कथामे स्वयं कथानायिका श्राद्धा केर विकास क्रमशः भेल छन्हि ओहिना जेना हुनक महिला शिक्षाक प्रयोजनक।
आइ काल्हि शिक्षा सभक जन्मसिद्ध अधिकार छैक तकर कानूनी व्याख्या खूब प्रचारित भऽ रहल छैक। गुल्ली-डंटा खेलए बला बालकसँ लए गइचरवाही मे खैनी ठोकए बला नेन्ना सभ केँ धऽ कऽ स्कूल आनल जाइत छैक। भनहि ओ लोकनि मिड डे लंच लऽ कऽ पड़ा जाइत छथि। लेखिका कमौशा कथामे एकटा निरसय परसनक बालक निरसू केँ अपना संगे आनि गृहकार्यमे लगौलनि आ ओकरा शिक्षा देमए लागलीह। मुदा जखन ओ स्वस्थ सबल बला भऽ गेल। हिनकर सभटा शिक्षा बिसरि पुनः परिवारक अंतहीन जालमे ओझरा। कथामे कचोटक मात्रा स्वल्प छैक आ कमजोर वर्गक दारूण स्थितिक मात्रा अधिक छैक प्रायः सभकेँ बूझल छैक जे व्यक्तिगत आ सामाजिक प्रयाससँ गामे टा नहि घर सेहो खुशहाल आ चिंताहीन हेतैक मुदा से नहि होइत छैक। दूरदृष्टिक अभाव मे ग्रामीण अपन हर्ज करैत अछि, ओकरा अनकर दृष्टि केर लाभ लेबाक क्षमता नहि छैक। क्रमशः आधुनिक होइत समाजक एकटा सटीक कथा अछि-पुनरावृत्तिचारूकात लौह कवार लागल हो कतहुँ सँ हवाक सिहकी नहि प्रवेश करैक, सूर्यदेवक किरण नहि प्रवेश करैक तैं कि भोअ-साँझक अस्तित्व मेटा जाएत? नहि ने? न मिथिला मे प्रकाश आएल। पति सँ अकारणे प्रताड़ित स्त्री पिताक आशीर्वाद सँ स्वाबलम्बी भऽ जाइत छथि। पुत्रीक शिक्षाक प्रति सजग तँ छथि मुदा हुनकर भाग्य अपने सन होएतैन्ह से नहि बिचारने छलीह। मुदा अधिक आगाँ ससरल समय मे बेटी सुधा मान्यता केँचुल उतारि फेकलक आ स्पष्ट विचार संगे आगाँ पएर बढ़ओलक, मनहि ओ परिस्थिति जन्य पुनरावृत्तिक शिकार भेलीह मुदा सिनुर चुड़ी आ मिथ्या संस्कार केँ निषेध कएलन्हि। ओ उहापोहक अन्हारसँ उबरि एकटा सेविका सँ उद्गार व्यक्त करैत छथि जे माथ हल्लुक करक लेल- एक कप चाय बना दे
पन्ना जीक लेखिका मनोविज्ञानविद् छथिन्ह से- असमान्य केँ सनक सामान्य केस हिस्ट्री बला कथा पढ़ि परिलक्षित होइत अछि। अही वजनकेँ कथा छैक सरोकार। पति-पत्नी संगे रहथि, दुनू एके शिक्षा प्राप्त करैथ आ एके जीविका मे संलग्न रहथि तथापि स्त्रीपर परिवार, समाज आ आजीविका तेहराएल बोझ रहैत छैक आ पति निश्चिंत; ई अजुका त्रासदी छैक जकरा सँ प्रत्येक शिक्षिताजूझैत अछि तँ मूल्यांकनकनायिका किएक ने जूझती?
नीति प्रकरणकथामे बिचमाइनकभूमिका महत्वपूर्ण छैक? जकर अप्पन घर बिगड़ल रहैत छैक ओ अनकर सुखी घर उजाड़य पर तुलल रहैत अछि। समय रहितहि यदि पति-पत्नी ई बूझि लेथि तखन कएक टा परिवार विघटित होअऽ सँ बाँचि जाएत। सघन संवेदनाक कथा छैक- बऽर घुरिए गेल। कतेको गीत कवित्त लिखलनि कवि विद्यापति, पं. हरिमोहन झा, यात्रीजी तथापि एकटा आडम्बर पूर्ण समाज नायक अविश्वस्तरीय, तरल प्रकारक वस्तुक अस्तित्व आइयो अछि। मिथ्या अहंकार, घोर लिप्साक प्रतीक मिथिलाक सर्वाध्जिक सोचबा पर विवश करैत छैक।  
पन्ना जीक प्रत्येक कथा किछुने कि अनुभव करबापर विवश करैत छैक आ तैं कथा-संग्रहक नामकरण अनुभूति बहुत नीक। एकटा नयनाभिराम आ बीछल पौथी मैथिली मे आबए से स्वागत योग्य अछि। प्रत्येक छोट कथा जे या तँ आकाशवाणीक लेल लिखल गेल आ कथा गोष्ठी मे पढ़बाक लेल लिखल गेल अछि महत्वपूर्ण। एकदम बूंदमे समुद्र। कथा, कथा सूत्र जकाँ बुझाइत अछि। पन्ना जी केँ हम आग्रह करबनि जे पलखति पाबि आब कथा सूत्रक विस्तार करथु आ पूर्ण कथा लिखथु जाहिसँ पाठकक छाँक पुस्तै।
कथा संग्रह फ्लैपपर वांछित अवांछित शब्द संचयन छैक जाहिसँ बचल जा सकैत छलैक। दू आखरलेखिकाक दृष्टिक निर्विविवाद टिप्पणी अछि आ हुनक स्वयं केर विकासक एकटा संक्षिप्त सूचना। पन्ना झा जी जन नन कन्त्ये वर्सियल व्यक्तित्वक जे अनुभूति सबकम हाथमे अछि से उत्तर आधुनिक मिथिलाक निर्माणक अनुभूति छैक जाहिमे बालक-बालिका युवजन आ वृद्ध-वृद्धा, दादा-दादी सब छथि। अर्थात् उत्तर आधुनिक विचार एसकरूआ नहि अछि, सभाराज बला परिवारक कामना करैत अछि समाज निर्वीथ नहि अछि, मदतिक हाथ चारू भागसँ बढ़ैत अछि।
पन्ना जीक लेल शुभकामना।   

२.
अशोक -बनैत कम बिगड़ैत बेसी-सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह
बनैत बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह थिक। पहिल कथा संग्रह घरदेखियाकरीब छब्बीस वर्ष पूर्व आयल रहए। एतेक अंतराल पर आयल संग्रह स्वाभाविक रूपें लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि। से अहू दुआरे जे सुभाष चन्द्र यादव मैथिलीक जानल-मानल कथाकार छथि। मैथिली कथा साहित्यमे सुभाषक अपन विशिष्ट योगदान अछि। आलोचक कुलानन्द मिश्रक कहब छनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक वादे आरम्भ भेल। जे अखनुक नव्यतम कथाकार लोकनिक प्रियतम आस्था आ पवित्रतम विश्वास बनि गेल अछि।
अपन कथा-संग्रह घरदेखियाक शीर्षक कथा घरदेखिया सुभाषकेँ मैथिली कथामे स्थापित कऽ देने छल। ई कथा मिथिला मिहिरक 15सितम्बर1974क अंकमे पहिल बेर छपल रहए। ई कथा 1977मे मैथिली अकादमीक कथा संग्रहमे अपन स्थान बनौलक। कथाक संग देल सम्पादकीय टिप्पणीमे कहल गेल जे बीसम शताब्दीक एहि उन्नत युदमे समाजक एकटा वर्गक यथार्थ सँ ई कथा जे अंतरंग साक्षात्कार करबैत अछि, से एके संग मोनमे अनिवर्चनीय आह्लाद आ भीतर धरि पैसि जाए बला अवसाद सँ भरि दैत अछि। कथामे भाषा कोना फोटोग्राफी करैत चलैत छैक, तकर बड़ सुन्दर उदाहरण ई कथा अछि। वस्तुतः घरदेखियासुभाषक अनेको प्रसिद्ध कथामे सँ एक थिक। ओ कथा अभावग्रस्त लोकक घरक परिस्थिति केँ बहुत सुन्यस्त रूपें देखबाक संवेदित करैत अछि। उपेनक संग पाठक सेहो काकाक आर्थिक अभाव केँ देखि चिंतित भऽ उठैत अछि। आब बेटीक बियाह लेल टाकाक जोगाड़ कोना हेतैक? पाठक सोचबा लेल विवश होइत अछि।
निश्चित रूपसँ सुभाष मैथिली कथाकेँ अपना तरहक किछु उत्तम कथा सभ देलनि अछि। घरदेखियाक संग काठक बनल लोक, फँसरी आ झालि बहुतो पाठक आलोचक द्वारा प्रशंसित भेल अछि। ई कथा सभ सुभाषेक नहि मैथिलीक नीक कथाक रूपमे मानल जाइत अछि। सुभाषक नीक कथा आरो अछि। हम एतऽ किछु आर कथाक नाम लऽ सकैत छी। एकटा दुखांत कथा, उतर मेघ, जासूस कुकुर आ चोर, हीर्थ, परिचय, बेर-बेर, लिफ्ट आ फुकना। ई सभ कथा अपन शिल्प ओ कथ्यक संतुलनसँ अभीष्ट प्रभाव छोड़बामे सफल भेल अछि। कमसँ कम शब्द मे कोनो व्यक्ति, घटना अथवा भावक राजीव ओ भावपूर्ण अंकन एहि कथा सभमे भेल अछि। एकटा कलाकारक रूपमे सुभाष वर्णनसँ बेशी चित्रणमे अपन निपुणता देखबैत रहला अछि। से बिना कोनो ताम-झाम, रंग-रोगन के। तैं सुभाषक कथा सभ कखनो कऽ एकटा देखा-चित्र, शब्द चित्र सन लगैत अछि। साहित्यमे जेकरा रेखाचित्र कहल जाइत अछि, ओहि मे कमसँ कम शब्द मे कलात्मक ढ़ंग सँ कोनो वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यक अंकन कएल जाइत अछि। एहिमे साधन शब्द होइत अचि, रेखा नहि। तैं एकरा शब्दचित्र सेहो कहल जा सकैत अछि। एकर अंग्रेजी नाम स्केच, फोटो नहि थिक। रेखाचित्र मे कथाक गहीरताक अभाव रहैत अछि, परंतु रेखाचित्रमे नहि। ई सभ बातक होइतो कथा आ रेखा चित्रमे बहुधा भेद करब मुश्किल होइत छैक।
सुभाष चन्द्र यादवक घरदेखियासंग्रह मे पैतीसटा कथा रहए। बनैत-बिगड़ैतमे एक्कैसटा कथा अछि। एहि एक्कैसटा कथामे एकटा कथा अछि ओ लड़की। ई कथा असंगतिनाम सँ घरदेखियासंग्रहमे सेहो अछि। दुनू कथामे घटना एक्के थिक। मुदा उपस्थापन आ निस्पत्तिमे अंतर अछि। एहि प्रकारे एक्के घटना सँ निर्मित्त कथाक दूटा पाठ, दू शीर्षकसँ हमरा सभकेँ भेटैत अछि। घटना महानगरक होस्टल लगक थिक। मोटरमे बैसि कऽ एकटा लड़का आ लड़की चाह पीलक। चाह पीबि कऽ दुनू कप लड़की हाथमे रखने रहए। नवीन, जे ओकरासँ अपरिचित रहए, तकरा जाइत देखलक तँ पुछलकै जे की अहाँ ओहि दिस (चाहक दोकान दिस) ज रहल छी? सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि कऽ ओकर हाथक कपपर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओहि दुनूक अइंठ कप लऽ जाएत? लड़कीक नेत बुझिते ओ जबाब देलकै नहि। असंगति मे नवीन अंत धरि तिलमिलाइत रहैये आ सोचैये जे ओ किएक नहि कहि सकलै, ‘हाउ डिड यू डेयर?’ कथा एहि ठाम खतम होइत अछि। मुदा ओ लड़की मे एकरबादो कथाकेँ विस्तार देल गेल छै। नवीनक मानसिक अंतर्द्वन्द्व छैक। ओ सोचैत अछि जे दुनू मे क्यो दोषी रहल हेतै आ दुनू दोषी हेतै आ दुनूमे क्यो नहि। कारण आरो भऽ सकैत छल। अंततः एतबे सत्य रहि गेलै जे लड़की उदास भऽ गेल छलै आ नवीन दुखी। ई सभ बात ओ सोचने चल जा रहल छल। दुनू कथामे घटना कनियेंटा अछि। आर जे किछु अचि से मानसिके स्तर पर अछि। पहिलमे अपमानक बोध अंत धरि बनल छैक। एहि बातक पछताबा छै जे लड़की (असंगतिमे लड़कीक नाम कूकी थिक) के झाड़ि कऽ बदला किएक नहि लेलक? ओकरा औकात किएक नहि देखा सकलै! तोहर ई मजाल जे हमरा अइंठ कप उठा कऽ लऽ जाइ लेल कहबें? मुदा ओ लड़की मे ई अपमान बोध अंततः समझौता मे बदलि जाइत अछि। थोसथाम भऽ जाइत छैक। लड़कियो उदास जे अनेरे कहलकै आ नवीनो दुःखी जे अइंठ कप लऽ जइते तँ की भऽ जइतैक। मुदा ई सभटा मन कथे। मनेक भीतरमे चलैत। पजरैत आ मिझाइत। कथाक एहि दुनू पाठक विस्तारसँ तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक भऽ सकैत अछि।
बनैत बिगड़ैतमे संग्रहीत कथा सभसँ पूर्व कथाकार अपन गप्पमे कहैत छथि जे हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार तत्वकेँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभ सँ प्रेम करए। आ प्रेम बएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत। कथाकारक इच्छा आ कथा सभकेँ जँ देखी तँ लागत जे कथाकार अपन अभीष्ट केँ बहुत अंश धरि प्राप्त कऽ लेने छथि। जतऽ कतहु अभीष्टक प्राप्ति नहि भऽ सकलनि अछि तँ से अभीष्टक अस्पष्टता आ ताहि कारणे उत्पन्न शिल्पक कमजोरी थिक। प्रथम पुरूष कथावाचक वला अर्थात् कथा कहनिहार ओ कथा जननिहार जतऽ एक छथि से एगारह टा कथा अछि। एहि सभ कथा केँ आत्मानुभूतिक निकट मानल कथा अछि। एहन कथा सभ अछि, अपन-अपन दुःख, आतंक, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, कनिया पुतरा, कारबार, कुश्ती, तृष्णा, दृष्टि, बात, रम्भा, हमर गाम। एहि एगारहो कथामे सँ दस टा कथा मे हम सोझे-सोझ पात्रक रूपमे कथामे सम्मिलित छथि। मुदा एकट्य़ा कथा तृष्णामे ओ दोसर पात्र अखिलनक खिस्सा कहैत छथि। एहि कथा सभक माध्यमे देश-कालक प्रति जे प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि से यथार्थ लगैत अछि। से वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थितिमे राग-भावक होइत अभावकेँ देखबैत अछि। सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध-अनुबन्ध बदलि रहल अछि। अनकर दुख तकलीफक प्रति एक मारूक उदासीनता पसरि रहल छैक। कारोबारी सम्बन्ध अश्लीलता हदकेँ छूबि रहल अछि। शासन-व्यवस्था असंवेदनशील आ भ्रष्ट भऽ गेल छैक। लोक कमजोर आ असहायकेँ दबब चाहैत अछि। गाम-घरमे जमीन-जाल, सम्पत्तिक छीना-झपटी बढ़ल छैक। कथा-कार चाहैत छथि जे प्रेम कयनिहारक बीच सम्वादहीनता नहि उपजय। सम्वादहीनता सँ ओ बैचेन होइत छथि (एकटा प्रेम कथा) ओ मानैत छथि जे पति-पत्नीक बीचोमे सभ किछु साझी नहि होइत छैक (अपन-अपन दुख), शासन-व्यवस्थाक अंग भेलापर मित्र-परिचितोक बात-व्यवहार बदलि जाइत छैक। ई बात-व्यवहार आतंकित कऽ सकैत अछि (आतंक)। श्रद्धा आ स्नेह देखाबऽ लेल कर्मकाण्ड जरूरी नहि छैक (एकटा अंत), निश्छल आ निर्विकार यौवनकेँ छली आ विकारग्रस्त मानसिकतासँ बचाएब कठिन भेल जा रहल छैक (कनियाँ पुतरा)। एहि कारोबारी युगमे असहाय आ निर्बलकेँ आर्थिक-शारीरिक शोषणसँ बाँचब मुश्किल भऽ गेलैक अछि। मानवीयताक ह्रास भऽ रहल छैक (कारोबार), जीवनक आपा-धापी लोककेँ जहिना-तहिना रहबापर विवश करैत छैक (कुश्ती), कोनो सुन्दर-दृष्टि-भंगिमावाली स्त्रीक प्रति सहज खिंचाओ आ लगाओ सम्भव छैक। लोकमे ई इच्छा जनमि सकैत छैक जे ओकर संग हर्तदम बनल रहय। संग नहियो भेटतैक तँ स्मृति आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक (तृष्णा), मनुक्खकेँ जीबाक लेल सार्थक ओ व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक छैक (दृष्टि), जीवनमे बहुतो घटना घटैत रहैत छैक। जीवन कथा चलैत रहैत छैक। दुख-सुख भोगैत रहैत अछि लोक। परन्तु बात कखनो-कखनो बनि पबैत छैक (बात), रम्भा सन रूपवती स्त्री ककरो कोनो अवस्थामे विचलित कऽ सकैत अछि। एहि विचलनमे मोनकेँ नुका कऽ राखब सम्भव नहि छैक। मोन पारदर्शी भऽ जाइत छैक। मोनक सुन्दरता आ कुरुपता देखार भऽ सकैत छैक (रम्भा), अनुपस्थित जमीन्दारक लेल गाम आब स्मृतिमे जा रहल छैक। गामक जीवन विकट भऽ गेल छैक। वस्तुतः गाम आब अपन नहि रहि गेलैक अछि (अपन गाम)। एहि सभ कथामे जे भाव-विचार व्यक्त भेल अछि से बहुलांशमे कथामे अनुस्यूत भऽ कऽ आएल अछि। मुदा जतऽ-ततऽ कथामे फूटसँ टिप्पणी, चिन्तन, दर्शन वा मन्तव्यक सोङर सेहो दिअ पड़लनि अछि कथाकारकेँ। कथा-संग्रहमे संगृहीत किछि कथा सभमे ई सोंगर कखनोकेँ कने खीचल-तीरल सेहो लागि सकैत अछि। लागि सकैत अछि ब्जे कथावाचक जेना किछु आगू बढ़ि गेल अछि आ कथा कतहु पाछूए छूटि गेल अछि। हमरा जनैत एकर कारण कथाक रूप-विधान थिक। ले आउट थिक। कथात्मकताक अभाव थिक। जेँकि सुभाष अपन कथा लेल वातावरण आ पृष्ठभूमिक निर्माण नहिएँ जकाँ करैत छथि तैँ हुनका अभीष्ट प्राप्ति लेल कखनहुँ कऽ फूटसँ उपक्रम करऽ पड़ैत छनि।
किछु कथामे कोसीक बाढ़ि आ कोसी कातक गामक चित्रण बहुत प्रामाणिक रूपसँ भेल अछि। किछु कथामे असगर हेबाक कष्ट-भोग दारुण भऽ गेल अछि। एहि कथा सभक चित्रण भयाओन अछि। जाहि कथामे कोसी आ कोसी कातक गाम अछि से कथा केनरी आइलैंडक लारेल, परलय आ हमर गाम थिक। कोसीक बाढ़िसँ तबाही, कोसी कातक गामक रस्ता-पेंड़ाक दुरुहता कहैत अछि जे ई एकटा दोसरे संसार थिक। विकाससँ दूर, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धक बदलैत आयाम आ ओहि भीतरसँ राग-विरागक झिलमिलाइत मनोभाव, बनैत बिगड़ैत जातीय-वर्गीय सम्बन्ध कथा सभकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। परलयहमर गामशीर्षक तँ कथाक अनुकूल लगैत अछि, ओकर संगति छैक मुदा केनरी आइलैंडक लारेलक कोनो संगति कथामे नहि भेटि पबैत अछि। कैनरी आइलैंड स्पेनक आइलैंड थिक, जे मेडीटरेनियन समुद्रमे अछि। एहि आइलैंडपर लारेल नामक गाछ खूब होइत छैक। एहि झमटगर गाछक छोट-छोट पातक उपयोग मुकुट, टोपी बना कऽ लोककेँ सम्मानित करबामे होइत रहल अछि। इन्गलैंडमे राजाक मुकुटमे लारेल लगाओल गेल रहैक। मुदा कथामे ई लारेल के थिक, से स्पष्ट नहि होइत अछि। कथाक संग शीर्षकक संगतिक समस्या किछु आनो कथाक संग अछि।
असुरक्षितएकाकी बाहर आ भीतरसँ असगर भेल लोकक व्यक्तिचित्र थिक। ई दुनू कथा बहिरंग आ अंतरंगक बीच होइत आवाजाहीक कथा थिक। कखनो बहिरंग हावी भऽ जाइत छैक तँ कखनो अंतरंग। ई स्थिति व्यक्तिवादी मानसिकताक देन कहल जा सकैत अछि। एहन लोकमे असुरक्षा-बोध बढ़ि जाइत छैक। ओ अपन वर्तमान वातावरणक संग ताल-मेल नहि बैसा पबैत अछि। दाना, नदी आ कबाछु एहन कथा थिक जेकरामे कोनो पैघ बात कहबाक तागति छैक मुदा अन्ततः से बात उभरि नहि सकल अछि। एक ओझरायल अनुभूति आ संकोच, कहि सकैत छी जे एहि कथा सभकेँ पुष्पित हेबामे बाधक भेलैक अछि। तथापि नदीप्रवहमान धारक रूपमे तँ नहि मुदा रुकैत-चलैत वात्सल्यक अनुभूति जगबैत छैक। दानाएहि कारोबारी समयमे मनुक्खकेँ हरेक दाना लेल चिड़ै-चुनमुनी सन बनैत देखबैत अछि। कबाछुक अनुभूति जुगुप्सा जगबैत छैक जखनि कि एहि कथामे गहींर सत्यक बीज अछि। सत्य ई थिक जे जखन व्यक्तिक वर्ग बदलि जाइत छैक तँ ओकरा अपन पूर्ववर्ती व्यवहार, चालि-चलन, श्रम वा आराम सभक प्रति एक हीनता-बोध, लाज-संकोच उपजि जाइत छैक।
कथा-संग्रहक नाम बनैत बिगड़ैत, एहि नामसँ प्रकाशित कथाक आधारपर राखल गेल अछि। एहि कथामे माय-बाप लगसँ परदेश चल गेल सन्तानक कुशलता लेल व्याकुल अनिष्टक आशंकासँ डेरायल, संतानसँ भेटल अवहेलनाक संताप भोगैत पति-पत्नीक खिस्सा कहल गेल अछि। पत्नीकेँ एहि मानसिकतामे कौआक टाहि आ कुकुरक कानब अशुभ लगैत छै। ओ परेशान होइत अछि। पति विभिन्न तर्कसँ पत्नीक ध्यान एहि अशुभ कल्पनासँ हटाबऽ चाहैत अछि। मुदा पत्नी खिसिया जाइत छै। कटाह बात कहि दैत छै। ओहि कटाह बातसँ पति आर पीड़ित होइत अछि। एहि क्रममे ओ विभिन्न बात सोचैत अछि। कौआक कुचरबाक मादे अशुभ कल्पनाकेँ कौआक विलायल जेबासँ जोड़ि दैत अछि। कौआ संग अपनो (दादाक) विला जेबाक कल्पना करैत अछि।एहि प्रकारेँ जेना सन्तानक विछोहसँ उपजल क्षोभ आ दुखमे अपनाकेँ कौआ सन कुरुप मानि, अशुभ मानि, विला जेबाक, मरि जएबाक, स्मृतिमे चल जेबाक उपालम्भ देल गेल अछि।
सुइभाष चन्द्र यादवक एहि कथा-संग्रहक अनेक कथामे गामक, दादाक, स्नेह-भावक स्मृतिमे चल जेबाक बात कहल गेल अछि। जेना ई सभ आब स्मृतिएटामे जीवित रहत। वस्तुतः वर्तमान समएपर ई सभ कथाकारक प्रतिक्रिया थिक। ई प्रतिक्रिया समयकेँ बनैत कम आ बिगड़ैत बेसी देखि कऽ, पाबि कऽ व्यक्त भेल अछि। जेना ई समय बनि कम रहल अछि, बिगड़ि बेसी रहल अछि। वर्तमान समएपर कथाकारक ई प्रतिक्रिया यथार्थ भले ही हो, मुदा ई यथार्थ उदास आ निष्क्रिय करैत अछि। एहिसँ ने हृदएमे प्रेरणा होइत अछि आ ने आत्मबल भेटैत अछि। तैँ सुभाषजी सँ ई आशा करब अनर्गल नहि होएत जे ओ अगिला समएमे समकालीन यथार्थक एहन पक्ष सेहो प्रस्तुत करता जे प्रेरित आ सक्रिय करत। जाहिसँ आत्मबल भेटत। एहन कथा वस्तुतः कम बिगड़ैत आ बेसी बनैत कथा होएत।

३.
चि‍त्राक सनेस

शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।

यू.पी.एस.सी. लेल

चि‍त्राक सनेस


मि‍थि‍लाक भूमि‍ पुरातन कालहि‍ंसँ आर्यावर्तक संस्‍कृति‍क आकर्षण केन्‍द्र रहल अछि‍। सभ दर्शनक संग-संग साहि‍त्‍य सरि‍ताक वैभव-वि‍कासमे मि‍थि‍लाक योगदान अवि‍स्‍मरणीय। एहि‍ भूमि‍क जनभाषामे ज्‍योति‍रीश्‍वरसँ लऽ कऽ अद्यतन काल धरि‍ साहि‍त्‍यकारक भरमारि‍ लागल अछि‍। ओहि‍ साहि‍त्‍यकारक ढेरीमे एकटा एहेन साहि‍त्‍यकार भेल छथि‍, जनि‍क नाम सुनि‍ते हमरा सबहक वास्‍तवि‍क रूप उपटि‍ कऽ आि‍व जाइत अछि‍। ओ छथि‍- बैधनाथ मि‍श्र। तरौनी गामक लाल बैधनाथ मि‍श्र मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे यात्री नामसँ प्रसि‍द्ध भेलाह। बौद्ध दर्शनसँ प्रभावि‍त रहवाक कारण हि‍न्‍दीमे नागार्जुन नामसँ रचना करैत छलाह। प्रांरभि‍क रचना संस्‍कृतमे कएलनि‍, मुदा चौगमा गाम वासी आ मैथि‍लीक चर्चित महाकाव्‍य अम्‍बचरि‍तक सृजनहार पं. सीता राम झाक प्रेरणासँ मैथि‍लीमे सेहो लि‍खए लगलाह। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक हुनक प्रमुख कृति‍ -पारो- मानल जाइत अछि‍, परंच एक छोट मुदा प्रासंगि‍क कवि‍ता संग्रह ि‍चत्रा हुनका कवि‍क रूपेँ हमरा सबहक भाषाक ध्रुवतारा बना देलक।
     चि‍त्राक रचना कोनो योजना बना कऽ नहि‍ कएलन्‍हि‍। सन् १९३१सँ लए कऽ सन् १९४९ई. धरि‍क लि‍खल कि‍छु कवि‍ताक संकलन एहि‍ पोथीमे कएल गेल अछि‍। एक दि‍शि‍ मातृभूमि‍ प्रेम तँ दोसर दि‍शि‍ मैथि‍लीक दशापर क्षोभ। जीवनक समग्र मूल्‍यक तात्‍वि‍क वि‍वेचन। अनि‍योजि‍त रचना सबहक संकलन बड़ कष्‍टदायी होइत अछि‍, मुदा एहि‍मे भाव प्रवाहक अभाव नहि‍ वुझना जाइत अछि‍। माॅ मि‍थि‍ले शीर्षक कवि‍तामे अपन ठाम, अपन गाम, अपन बुद्धि‍ आ अपन दर्शनक सरल रूपमे प्रदर्शन कएल गेल। गौतम यज्ञवल्‍यकसँ लऽ कऽ रमेश्‍वर महाराजक महि‍माक गुनगान। एहि‍ गुनगानक मूल अछि‍- अपन संस्‍कृति‍क वि‍श्‍लेषण। भारती आ मंडन ि‍मश्रक लेल कीर दंपति‍क उदवोधनमे अपन पहि‍चान झलकैत अछि‍। उदयनाचार्य जग्रन्नाथपुरीमे सनातनक पुनरूद्वारक प्रमाणि‍त भेलाह, ई मि‍थि‍लाक वि‍जय थि‍क। वि‍द्यापति‍क कवि‍ता हमर धरोहरि‍ अछि‍। अयाची मि‍श्रक सादा जीवन सेहंति‍त अछि‍, तँ शंकरक वालोहं जगदानंद.... वाल साहि‍त्‍यक आ वाल कौशलक मनोवैज्ञानि‍क वि‍श्‍लेषण।
     एक दि‍शि‍ मॉ मि‍थि‍ले कवि‍तामे अपन माटि‍पर स्‍वाभि‍मानक दर्शन तँ दोसर दि‍शि‍ अंति‍म प्रणाम कवि‍तामे अपन जन्‍म-आ कर्मपर क्षोभ। अर्न्‍तद्वन्‍द्वक एहेना दशा वा वेदना कवि‍मे ि‍कएक उत्‍पन्न भेल? एहि‍ कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ जागरण करवाक लेल पलाएन करए चाहैत छथि‍। अपन संस्‍कारमे नि‍हि‍त वि‍षमतासँ अकच्‍छ कवि‍ झाँपल व्‍यथाकेँ नि‍:शब्‍द उघारए चाहैत छथि‍। जेना अवोध अपन माएसँ घरसँ भागि‍ जएवाक धमकी उपरे‍ मोने दैत अछि‍, ओहि‍ना कवि‍क वेदनामे हृदएगत पलाएन नहि‍ अछि‍। कवि‍क स्‍वप्‍न कवि‍तामे कवि‍ समाजक वि‍गलि‍त अर्थहीन व्‍यक्‍ति‍गणक कचोटक मार्मिक चि‍त्रण कएलन्‍हि‍ अछि‍ मि‍थि‍लाक भूमि‍मे सम्‍यक अर्थनीति‍क अभाव अछि‍ तेँ समाजक परि‍दृश्‍यमे भारी अन्‍तर देखए मे अवैछ। एहि‍ भूमि‍पर एकसँ वढ़ि‍ कऽ एक महामानव भेलाह, परंच साधन आ शि‍क्षाक अभावमे कतेक प्रति‍भा मोनइसँ बाहर नहि‍ नि‍कलि‍ पबैत अछि‍- तानसेन कतेक रवि‍वर्मा कते
     घास छीलथि‍ वाग्‍मतीक कछेड़मे
     कालि‍दास कतेक वि‍द्यापति‍ कते
     छथि‍ हेड़ाएल महि‍म वारक हेड़मे
  जौं पेट-पांजड़ि‍ अन्न जलक त्रासमे आकुल हो तँ शि‍क्षाक कल्‍पना नि‍र्मूल प्रमाणि‍त भऽ जाएत, परंच स्‍वपनोमे आशक दर्शन। कवि‍केँ समाजमे नव जोश उत्‍पन्न करवाक प्रेरणा भेटल तेँ प्रवासकेँ छोड़ि‍ अपन मि‍थि‍ला धुरि‍ अएवाक नि‍श्‍चय कएलन्‍हि‍। एहि‍ कवि‍ताक रचना काशीमे कएलनि‍, मुदा मोन तरौनीमे घुि‍रया रहल छल। नि‍श्‍चय जन्‍मभूमि‍क दशापर वेदनासँ कवि‍क मोन तपि‍ रहल होइतनि‍।
     बूढ़ वर कवि‍ताक दर्शन कएलापर हास्‍यपर व्‍यथाक वि‍जय दर्शित होइत अछि‍। शीर्षकसँ स्‍पस्‍ट होइत अछि‍ जे वि‍वाहमे कनि‍या-वरक वएसमे अन्‍तर अवश्‍य हएत। कवि‍ताक मूलमे जएवाक वाद तँ स्‍पष्‍ट भऽ गेल जे वरकेँ वरांठ वा खोरनांठ कि‍छु कहल जाए अनसोहांत नहि‍ लागत। जीवनक अंति‍म अवस्‍थाक वर काँच-कुमारि‍क वरण कहलन्‍हि‍। वि‍वाहि‍ता नि‍:संतान रहि‍ गेली। माएक वि‍रोध नि‍:सफल भऽ गेल। स्‍त्रीगणक व्‍यथाकेँ के बूझत? वाप कैंचाक लोभमे बेटीकेँ बेचि‍ लेलन्‍हि‍। मि‍थि‍लामे एहि‍ प्रकारक पाप होइत रहल अछि‍। समाजक तथाकथि‍त आगाँक पाँति‍मे बैसल जाति‍क दीन आ कर्तव्‍यहीन जनमे ई व्‍यवस्‍था पलेगक रूप धारण कएने छल। अंतमे वेटी धरती माएसँ फटवाक लेल आग्रह करैत छथि‍।
     वि‍लाप कवि‍ताक वि‍षएमे लि‍खब कठि‍न अछि‍ जे एकरा वाल-वि‍याहक कुकृत्‍य वा वि‍धवाक वि‍लापमे सँ की मानल जाए? वाल कालक वि‍याह संस्‍कारमे आनंदक कोन रूप होइत अछि? दुरागमनमे कनि‍या सि‍खेलासँ कनैत छथि‍, मुदा नोरक अभि‍प्राय नहि‍ बूझैत छथि‍। जखन नोरक अर्थ बुझवाक वएस भऽ गेलनि‍ तँ वज्रपात? वैद्यव्‍य जीवनक मार्मिक छंद......।
  श्रंृगारसँ पहि‍ने नीति‍ आ वैराग्‍य, एहि‍ जीवनक उदेश्‍यपर वि‍चार करवाक आवश्‍यकता अछि‍। वैद्यव्‍य जीवन पति‍क स्‍मृति‍क संग जीबए चाहैत छथि‍। वि‍हंुसलि‍ नायि‍का, मुदा समाजक कुदृष्‍टि‍क डर। एहि‍ कवि‍तामे सेहो उच्‍च जाति‍क व्‍यवस्‍थापर कटाक्ष कएल गेल। वि‍धवा वि‍याह मि‍थि‍ला समाजक सवर्ण वर्गमे पूर्णत: वंचि‍त छल, एखनो आंगुरेपर गनल-गुथल होइत अछि‍। जाहि‍ वर्गक लोक शांति‍सँ दु:खो नहि‍ सहए दैवए चाहैत छथि‍, ओहि‍मे जन्‍मपर कोना गर्व करू? कवि‍केँ कति‍पय व्‍यथा छन्‍हि‍ एि‍ह व्‍यवस्‍थासँ, खि‍न्न छथि‍ उच्‍च जाति‍क अलच्‍द सदृश सोचसँ। पुरूषसूक्‍तमे कर्मक आधारपर जकरा चण्‍डाल आ छुद्र सन संज्ञा देल गेल, हुनक सोच एखन पारदर्शी अछि‍। ओहि‍ वर्गक कांताकेँ ई अधि‍कार छन्‍हि‍ जे कुकर्मी स्‍वामीसँ कखनो जान छोड़ा कऽ आन मनुक्‍खक वरण कऽ सकैत छथि‍ मुदा आगाँक पाँति‍मे बैसल प्रवुद्ध वर्गक वि‍धवा अवला बनि‍ उज्‍जर साड़ीमे दुवकलि‍ छथि‍, मुदा तैयो वागमती कातक बगुला हुनक चरि‍त्र हनन करवाक लेल सदि‍खन उद्धत छथि‍। एहि‍ दशाकेँ देखि‍ कोनो कवि‍क ई उक्‍ति‍ प्रासंगि‍क अछि‍-
     आगि‍ भेल शीतल, पानि‍ अदहन भऽ उधि‍एलै
     काँट बनल कोमल आ फूले गड़ि‍-गड़ि‍ गेलै
     ककरासँ करतै तकरार हम जि‍नगी
     धि‍क-धि‍क जुआनी धि‍क्कार हमर जि‍नगी।
  कौशि‍कीक धार कवि‍तामे कोशी माएक पसारल वि‍नाश लीलासँ भेटल परि‍णामक पीड़ा मड़ोरि‍ दैत अछि‍। मुदा ई थि‍क मि‍थि‍लाक शोक। प्रेयसी कवि‍ता श्रृंगारसँ भरल अछि‍। प्रेमी द्वारा प्रेमि‍काक प्रति‍ समर्पित संवाोधन नीक लागल। एहि‍ सि‍नेहमे प्रेमी प्रेमि‍काकेँ अपन शक्‍ति‍ मानैत छथि‍। सि‍नेहक मूल रूपक वर्णन, कतहु रूपक चर्च नहि‍। प्रेमी अपन प्रेमीकाकेँ तपवति‍ छथि‍ मुदा ओ अपन नि‍र्णएसँ नहि‍ वि‍लग भेली। एहि‍ समर्पणसँ प्रेमी ि‍सनेहक जुआरि‍ पानि‍ फुटि‍ गेल-
     अपन इच्‍छापर तोहर आशाक कैलि‍यहु होम
     तों वनलि‍ रहलि‍ सदए सखि‍ मोम
     फेकनी कवि‍ताक नायि‍का फेकनी कंजूस महि‍ला छथि। कैंचा वचा-वचा कऽ अपन संतति‍क लेल राखव छनि‍ हुनक इच्‍छा। दूध बेचि‍ कऽ टका जमा करैत छथि‍, ओहो दूधमे पानि‍ मि‍ला कऽ तेँ पानि‍ जकाँ दि‍वस वि‍तैत छन्‍हि‍। कोनो धर्म-कर्म नहि‍, कवि‍ एहि‍सँ छुब्‍ध छथि‍। एहि‍ प्रकारक घटना हमरा सबहक गाम-घर होइत अछि‍। पेट काटि‍ कऽ जकरा लेल संयोजन करैत छथि‍, ओ ओहि‍ धनकेँ की करताह? सहज अछि‍-
     पूत कपूत तँ कि‍एक धन जोहव
     पूत सपूत तँ कि‍ए धन जोहव।
  लखि‍मा कवि‍ता मि‍थि‍ला नरेश राजा शि‍व सि‍ंहक अर्द्धागि‍नी लखि‍मा रानीक प्रति‍ समर्पित अछि‍। महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क श्रंृगार रसक सि‍द्धि‍मे लखि‍मा जीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ सुन्‍दरताक पैघ भूमि‍का छल। ओना वि‍द्यापति‍क चरि‍त्रपर संदेह करव कवि‍क ना दृष्‍टि‍कोण नहि‍ अछि‍, मुदा हुनक श्रंृगारक नायि‍का लखि‍मा रानी छलीह। महाकवि‍क रचनासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे लखि‍माक सौन्‍दर्य ततेक वि‍लक्षण छल जे हुनक रचनाकेँ अमरत्‍व प्रदान कऽ देलक। वि‍द्यापति‍क नयनमे लखि‍मा अवश्‍य छलीह, परंच ओ कर्तव्‍यवंधसँ बान्‍हल छलाह। हुनक मनमे वि‍रति‍ छलन्‍हि‍।
     उड़ान शीर्षक कवि‍ता कल्‍पनापर आधारि‍त अछि‍। सहज अछि‍ जे कल्‍पनाशील व्‍यक्‍ति‍केँ कर्मसँ वेसी एहि‍पर वि‍श्‍वास होइत छैक। वास्‍तवि‍क जीवनमे कर्मक जतेक महत्‍व हो मुदा कल्‍पनाक उड़ान वि‍लगि‍त मानवकेँ आनंदक शि‍खरपर पहुँचा दैत अछि‍। कल्‍पना कहि‍यो धोखा नहि‍ दैत अछि‍, एहि‍मे ककरोसँ आश नहि‍ होइत अछि‍। स्‍वप्‍नक भारकेँ केओ नहि‍ डि‍गा सकैत छैक।
     गामक चट्ठी कवि‍ता प्रवासमे रहनि‍हार एकटा गरीवक नाओ लि‍खल हुनक कनि‍या व्‍यथाक कि‍छु पाँती थि‍क।
  गाममे अपन नेनाक संग रहैत दीनक दाराकेँ की-की सहए पड़ैत अछि‍, एकर मार्मि‍क वर्णन कएल गेल अछि‍। जौं हाथमे कि‍छु कैंचा नहि‍ हुअए तैयो गाम अएवाक नि‍वेदन व्‍यथि‍त कनि‍याँक हृदएगत कचोट बुझना गेल। चारू कातसँ समस्‍यासँ घेरल नारी अपन पति‍सँ खाली हाथ गाम धुरि‍ अएवाक लेल कहैत छथि‍। जीवन डोरि‍केँ पकड़ि‍ कऽ राखव कठि‍न भऽ गेलनि‍। सम्‍यक अर्थनीति‍क उद्धोषण यात्री जीक एहि‍ कवि‍तामे देखएमे आएल। अपन सनेशकेँ कखनो उधारि‍, कखनो झाँपि‍ यात्री जी असमान समाजक अस्‍ति‍त्‍वकेँ ललकारि‍ रहल छथि‍। दीनक नेना पि‍तृक दर्शनक लेल आकुल छथि‍, ओ तँ नेना छथि‍ मुदा माए कि‍ए बजावए चाहैत छथि‍ अपन स्‍वामीकेँ। कवि‍क एहि‍ भावकेँ स्‍पष्‍ट करव आजुक लोकसँ संभव नहि‍ बुझना जाइत अछि‍।
     ठीठर मामा कवि‍ता गाममे सभ दि‍न रहएबला ठीठर पाठकक पटना प्रवासक ि‍स्‍थति‍पर लि‍खल गेल अछि‍। भगजोगि‍नीक दर्शन करएबला लोककेँ हजार वोल्‍टक इजोतमे उजगुजाहटक अनुभव होइत एहि‍। एहि‍ कवि‍ताक प्रसंग साधारण अछि‍ आ भाषामे प्रवाहक अभाव बुझना गेल।
     परमि‍टक साड़ी चारि‍ अना वेहरी दऽ कऽ तीन टकामे परमि‍टसँ कनि‍या काकीक लेल आनल साड़ीपर आधारि‍त अछि‍। गाम-घरमे बेहरी दऽ कऽ समान खरीदवाक परम्‍परा प्राचीन अछि‍। एहि‍ कथाकेँ यात्री जी कोन उद्धेश्‍यसँ लि‍खलन्‍हि‍ नहि‍ स्‍पष्‍ट भेल। देश कालक दशापर सामान्‍य प्रस्‍तुति‍। कृति‍का नक्षत्रमे, हि‍मगि‍रि‍क उत्‍संगमे, भए गेल प्रभात आ ताड़क गाछ शीर्षक कवि‍ता सभ प्रकृति‍ वर्णनक छोट छाया प्रस्‍तुति‍ करैत अछि‍। ई चारूटा कवि‍तामे कवि‍क उदेश्‍य हुनक शब्‍दसँ नहि‍ प्रकट भऽ सकल। छंद समायोजन नीक लागल मुदा दोसर, कवि‍ता सभसँ तारतम्‍य नहि‍ बुझना जाइत अछि‍। द्वन्‍द्व कवि‍ताक शब्‍द-शब्‍दमे परि‍ताप दर्शित भेल। कि‍ंकर्तव्‍य वि‍मूढ़ छथि‍ कवि‍, गाममे रहथि‍ की प्रवासमे? गाममे वि‍पन्नता, मुदा सि‍नेहक आवरण अछि‍। मोरंग वा आन ठामक प्रवासमे कैंचा-कौड़ी तँ अछि‍, मुदा परि‍वार समाजक ि‍सनेह नहि‍। पावनि‍ ति‍हारक जे आनंद गाममे भेटैत अछि‍, ओ शहरमे संभव नहि‍। एक ठाँ गामक जीवनसँ कवि‍क मोन गुजगुजा गेलनि‍। गामक छोट लोक (साधन वि‍हि‍न) पलाएन कऽ रहल अछि‍, तेँ सामाजि‍क व्‍यवस्‍थामे अन्‍तर आि‍व गेल। यात्री जीक अर्न्‍तमन समाजक बदलैत स्‍वरूपसँ संतुष्‍ट अछि‍, कि‍एक तँ हुनक साम्‍यवादमे समाजवादक ज्‍योति‍ प्रखर भेल अछि‍।
     ऋृतु संधि‍ शीर्षक प्रकृति‍ वर्णनसँ जोड़ल अछि‍, मुदा एहि‍मे अर्थनीति‍क मर्म झाँपल अछि‍। ग्रीष्‍मक तात्‍पर्य दीन मुदा उद्वेलि‍त दीन, वर्षाक अर्थ नव जीवनक वि‍श्‍वास। दीनमे साधनक अभाव परंच हुनक श्रद्धा उद्वेलि‍त अछि‍। एहि‍ कवि‍तामे महाकवि‍ पंतक छाया वादक झलकि‍ देखएमे अबैत अछि‍।
     जौं यात्री जीक पद्य सागरक सुवासि‍त सरि‍ता चि‍त्राकेँ मानल जाए तँ एहि‍मे सभसँ पैघ योगदान वंदना कवि‍ताक देल जाएत। वंदना कवि‍ताक शीर्षक मात्र माध्‍यम थि‍क हुनक जन जनक व्‍यथाकेँ नग्‍न करवाक लेल। मि‍थि‍लाक समग्र जीवन दर्शनकेँ एहि‍ कवि‍तामे कवि‍ मंचस्‍थ कऽ देलनि‍। नेपथ्‍यमे ि‍कछु नहि‍ रहि‍ गेल। अनुलोम-वि‍लोम, आशक्‍त-घृणा सभटा उपटि‍ कऽ बाहर कऽ देलनि‍। मि‍थि‍ला वर्णनपर बहुत रास कवि‍ताक रचना भेल अछि‍। परंच वेसी कि‍छु वि‍शेष वर्गकेँ महि‍मामंडि‍त कएलक। उपेक्षि‍तकेँ सम्‍मान देवाक ि‍हनक शैली आवएबला वास्‍तवि‍क मैथि‍ल संस्‍कृति‍क रक्षकक लेल कोसक पाथर प्रमाणि‍त हएत। मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍मे रहनि‍हार, संस्‍कृति‍केँ आत्‍पसात केनि‍हार सभटा मैथि‍ल छथि‍। मैथि‍लीमे एतेक सम्‍यक सोच रखएबला कतेक लोक छथि‍? मैथि‍ली भाषीक चर्च होइते मैथि‍ल ब्रह्मण आ मैथि‍ल कर्ण कायस्‍थक नाओ उमरि‍ जाइत अछि‍, मुदा अन्‍य वर्ग की मैथि‍ल नहि‍? जौं दोसर भाषाक लोक उपर्युक्‍त दुनू जाति‍क लेल एहि‍ भाषाक वाचकक प्रयोग करैत छथि‍, तँ दुनू कि‍एक नहि‍ ि‍वरोध करैत छथि‍? ओना एहि‍ वर्गक कि‍छु लोक वि‍स्‍तृत सोचक छथि‍, मुदा ओ सेहो एहि‍ प्रश्‍नपर चुप भऽ जाइत छथि‍न्‍ह? यात्री जीक आत्‍मा नि‍श्‍चि‍त रूपसँ एहि‍ कवि‍ता रचना करए काल काँपि‍ गेल हेतनि‍। एहि‍ सनेशकेँ जौं सभ गोटे आत्‍मसात कऽ ली तँ मैथि‍लीक परि‍दृश्‍य अवश्‍य बदलि‍ जाएत। आर्य, द्रवि‍ड़, आंग्‍ल, इस्‍लाम आ पारसी सभ परि‍वारक सभटा भाषामे मात्र मैथि‍लीपर जाति‍वादी स्‍वरूपक कलंक लागल अछि‍।
     चि‍त्रा संग्रहक वि‍शेष पक्ष अछि‍- एकर सम्‍पूर्णता। आंचलि‍क रचनाकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे प्राथमि‍कता देल गेल अछि‍। एहि‍ भ्रमकेँ यात्री जी गाॅधी शीर्षक कवि‍ता लि‍खि‍ कऽ तोड़ि‍ देलनि‍। गाँधी मात्र एक व्‍यक्‍ति‍क नाअो नहि‍ भारतीय दर्शन थि‍क। एहि‍ दर्शनमे कोनो वि‍भेद नहि‍, सबहक लेल स्‍थान एहि‍ दर्शनक मूल संस्‍कार थि‍क। वि‍डंम्‍बना अछि‍ जे समाजमे ि‍दव्‍य ज्‍योति‍ जगावएबलाक अंत नि‍र्मम होइत छन्‍हि‍। इसा-मसीह आ सुकराते जकाँ गाँधी मर्म स्‍पर्शी रूपेँ वि‍लोकि‍त भेलाह। राजा भर्तृहरि‍क वैराग्‍य शतक जकाँ यात्री जीक रचनामे क्षोभक अवलोकन कएल जा सकैत अछि‍। आसि‍न मासक राति‍ इजोरि‍या कहैमे तँ ज्‍योति‍क प्रतीक थि‍क, मुदा बुढ़वा पीपरक ठुट्ठपर बैसल नील कंठक त्राससँ भरल जीवनमे एहि‍ ज्‍योति‍क कोन अर्थ? फागुनक इजोरि‍या टहाटही हो वा युग धर्म सभ ठाम वि‍गलि‍त असार जीवन रसकेँ छंदसँ यात्री जी पसारि‍ देलनि‍। जेठक दुपहरि‍यामे कालक प्रहारकेँ देखएबाक सार्थक प्रयास कएल गेल।
     देश दशाष्‍टक भ्रष्‍टाचारपर लि‍खल यात्री जीक अश्रुकण थि‍क। यात्री जीक यौवन परतंत्र भारतमे बीतल, मुदा स्‍वतंत्रताक दू बरख वाद एहि‍ कवि‍ताक रचना कएलन्‍हि‍। जे आश अप्‍पन लोकसँ कहल गेल ओहि‍ आशक पूर्णतामे संदेह देखएबाक यात्री जी प्रयास कएलनि‍।
     परम सत्‍यकेँ चि‍त्राक सतोगुण कहल जा सकैत अछि‍। स्‍वामी वि‍वेकानंदक शून्‍यवादी सोच सदृश यात्री जी जहानक अस्‍ति‍त्‍वपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह लगएवाक प्रयास कएलनि‍। प्रारंभमे वैराग्‍यक अनुभूति‍, मुदा शनै: शनै वि‍श्‍वासक सोतीमे डुवकी लगावए लगलनि‍। यएह थि‍क गृहस्‍थ धर्म। मनुष्‍य वि‍पत्ति‍मे संसारकेँ मायागृह बूझैत अछि‍, परंच मोहक तांडवसँ केओ नहि‍ बचि‍ सकैछ। अंतमे वि‍श्‍वासक संग एहि‍ कवि‍ताक दुरागमन कएल गेल।
     अंति‍म पद्य एकटा पाछाँक पछाति‍मे वि‍चरण करएवाली नारीक कर्मगाथा थि‍क- गोट-वि‍छनी। नारी पुनरूत्‍थानपर भाषण खूव देल जाइत अछि‍ मुदा अज्ञ, दीन, साधन वि‍हीन, शोषि‍त आ समाजक धारसँ बाढ़ि‍क खाधि‍ जकाँ कटलि‍ नारीक व्‍यथा लग केओ नहि‍ जा सकल।
     चि‍त्रा कवि‍ता संग्रह चि‍त्रा नक्षत्रक तीत पानि‍ जकाँ चि‍न्‍तन करवाक योग्‍य अछि‍। रचनाकारक जीवन चरि‍त्र जौं सम्‍यक हो तँ रचनाक वि‍षए-वस्‍तु समाजक लेल दर्शन भऽ जाइत अछि‍। समग्र जीवन संघर्षक पांजड़ि‍मे वि‍तएवाक कारण यात्री जी कर्म आ धर्मक हृदएमे घुसि‍ गेल छथि‍। चि‍त्रासँ स्‍पष्‍ट दर्शन भेल जे यात्री जी मानव धर्मी छथि‍। छनहि‍मे कचोट आ क्षणहि‍मे क्रान्‍ति‍क जुआरि‍, आवेग आ अतृप्‍ति‍क छोभ रहि‍तहुँ वि‍हानक वि‍श्‍वास तृण-तृणकेँ ि‍सहरा दैत अछि‍। एहि‍ रचनाकेँ जौं आत्‍मसात कऽ लेल जाए तँ वैदेहीक मि‍थि‍लामे पुर्नस्‍ति‍त्‍व सुधारससँ ओत प्रोत भऽ सकैत अछि‍।
शेष- अशेष............

पोथीक नाओ- चि‍त्रा
रचनाकार- श्री यात्री
प्रकाशक- अखि‍ल भारतीय मैथि‍ली साहि‍त्‍य परि‍षद प्रयाग
रचना वर्ष- १९४९

१.-राज नाथ मिश्र- कथा- मस्ती
.कुमार मनोज कश्यप- कथा-नोरक दू ठोप



राज नाथ मिश्र

 कथा- मस्ती 
रातिक पहिल पहर बीत गेल छल। अलसाएल मदमातलि राजकुमारी रौशनआरा मसनद पर लुढ़कलि पड़ल छलि।  चिन्ताग्रस्त प्रतीत होइत छलि। मुदा कामोत्तेजित  वासनाक तीब्र चमकसँ ओकर आँखिमे एक विशिष्ट रंगत स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल छल। उत्तेजनाक पराकाष्ठाक कारणे ओकर गौर-वर्णीय चेहरा असाधारण ढंग सँ रक्ताभ भऽ उठल  छल । केराक बीर सनक धानी रंगक मलमलक पोषाकमे ओकर मांसलता झिलमिला रहल छल, जना कि शीषाक स्वच्छ आ पारदर्शी बोतलमे मदिरा देखि पड़ैछ । ई पोशाक ओकर यौवनक मनोरम छटाकेँ बहुगुणित कए किछु अधिके कमनीय बना रहल छल । कामसुन्दरि रौशनआरा अप्रतीम यौवनक मलकानि छलि । ओकर रूपसागरमे किछु एहन माधुर्य छल जे देखए बलाक मन अनायासे उन्मत्त भऽ उठैत छल । अंग-प्रत्यंग साँचमे ढलल-कोमलताक पराकाष्ठा  कमनीयताक   उत्तुंगता। मुख-माधुर्य  विलाससँ परिपूर्ण कारी कारी केश, मदमातलि रतनार नयन। गौरवर्ण चेहराक रंग जना दूधमे सिन्दूर घोरल । ठोर लालटेस, डाँर पातरि, उन्नत उरोज, पुष्ट नितम्ब, कामाग्नि दहकाबएबला । ओकर सुषमा ओ लावण्य ककरहु मुर्छित करबा हेतुए पर्याप्त ।    धानी वस्त्र पर सोनहुला जरी बड्ड फबि रहल छल ।  केश-पाश बड़ सुरूचिपूर्ण रूपेँ गाँथल छल, जाहिमे सँ निकलैत फुलेलक मधुर सुगंधि वातावरणकेँ मादक बना रहल छल आ ताहिमे चोटीमे गाँथल सुविकसित बेला फूलक माला सँ निकलैत सुवास ताहि मादकताकेँ अभिवृद्धि कए रहल छल । माथ पर कनेक लापरवाहीसँ राखल फिरोजी रंगक जरीयुक्त मलमलक ओढ़नी । गरामे लालरंगक मणिमालाक संगहि श्वेत मोतीमाल आपसमे ओझराकक उन्नत उरोजसं टकरा-टकराकक खेल कए रहल छल । दुहू कानमे बेस भरिगर सोनाक कर्णफूल आ ताहिमे जड़ल हरित पन्ना । छाती पर चित्रमय विचित्र हार ताहिमे अनेक हीरा जड़ल छल । नीलम जड़ल पहुँची हाथक शोभा बढ़ा रहल छल । अँगुठा छोड़ि सभ आँगुरमे  अँगुठी जाहिमे  रंग-बिरंगा जवाहरात चमकि रहल छल । डाँरामे तीन आँगुर चाकर सोनाक डरकस । कोमल पएरमे चानीक पाजेब जाहिमे लटकल छोट-छोट घुंघरूक संग श्वेत मोतीक लड़ी । संपूर्ण पोषाक अतरसँ सराबोर ।
सल्तनते मुगलियाक शाही मुगल खानदानक दू गोट विशेषता खानदानक स्त्रीगणक दृष्टिएँ अति विशिष्ट रहल अछि । प्रथम ई जे शाही खानदानक स्त्रीगण लोकनि परदाक अभ्यन्तर रहैत छलि । मुदा सात परदाक तरमे रहितो राजनीति ओ कूटनीति सतरंजक माहिर खेलाड़िन सभ छलि । आ एहि खेलमे पूर्ण दक्षता ओ चातुरीसँ हिस्सा लैत छलि । आ द्वितीयतः मुगल राजकुमारी--शाहजादी--- लोकनिक विवाह नहि होइत छल । यद्यपि शाहजादी लोकनिक  अभिसार आ अनुचित गुप्त प्रेम प्रसंगक कथा कतेको बेर चर्चित होइत रहल छल मुदा मुगल बादशाह कहियेा ककरहु अपन जमाए नहि बनबथि । ई नियम शहंसाह अकबर बनौलनि आ एकर अनुपालन सभ केओ परवर्ती मुगल बादशाह लोकनि कएलनि ।
...
कामवासनामे दहकैत रौशनआरा किछुकाल मसनद पर ओङठल   रहलि । फेर थपड़ी बजाए नौरिनिकेँ बजौलनि । राजकुमारीक इशारा पाबि नौड़िनि मदिराक सुराही ओ स्वर्ण प्याली प्रस्तुत कएलक । कामरसक पांच-सात प्याली जखन कंठक नीचा उतरबाक छल कि राजकुमारी मदमस्त भए उठलि आ नौड़िनिकेँ गीत गौनिहारि के बजएबाक आदेश देलनि । किछुए कालक पछाति स्वर लहरीक पंचम चतुर्दिक अपन साम्राज्य पसारि लेलक । मुदा मनक अशान्ति बढ़ैत गेल । उष्ण होइत शरीरकेँ शीतलता प्रदान करबामे मदिराक मादकता ओ संगीतक सरगम दुहू निष्फल रहल ।  उनटे उद्दीपन ओ उताप्ततामे आओरो जुआरि आबि गेल । कामाग्निक बाढ़ि जखन हदक बान्ह तोड़बा हेतु आतुर भ गेल तखन ओ हाथक इशारासँ  गीतगाइन लोकनिकें  जएबाक आदेश देलनि । कामत्तेजनासँ मुखाकृति आओरो अधिक रक्ताभ भए उठल छल । श्वास-प्रश्वास तीब्र सँ तीब्रतर होइत होइत बिड़ड़ो जना आबि गेल रहय ।

खासमखास नौड़िनि नसीमबानूक बजौहटि भेल । ओ उपस्थित भए चुपचाप मूड़ी झुकौने आदर भावें ठाढ़ि छलि ।

                -------बादशाह सलामत अखन की कऽ रहल छथि।
                --------हुजूर  !  अखन ओ दरबार-ए-खासमे आबि गेल छथि।
                --------की वाकयानबीस अपन रोजनामचा  सुना देलक।
                ---------अखन नहि । अखन बादशाह सलामत बड़ी बेगम साहिबाक संग किछु अंतरंग बिचार-विमर्शमे लागल छथि।
                --------सुन तों जो । आ सुनने अबै । वाकयानवीस किछु नब  खबरि सुनबैत छथि कि नहि।
                --------बेस  सरकार, जे हुकुम।

खास नौड़िनि नसीमाबानूक गेलाक उपरान्त राजकुमारी अपनहि हाथें मदिरा ढारि ओहिमे गुलाबजल फेंटि पीबए लागलि । किछु क्षण टकटकी लगौने जरैत मोमबत्ती देखलनि आ फेर नौड़िनि बजएबाक हेतुए थपड़ी बजौलनि । पहरेदारिन नौड़िनि उपस्थित भेल ।

                --------रज़िया कतए अछि।
                -------सरकारक आज्ञाक प्रतीक्षामे बैसल छथि ।
                 ------ओकरा पठा दही आ देख एहि बीचमे केओ भीतर नहि आबए।
                -------- आदेश।

माथ झुकबैत पहरेदारिन बाहर भेल। रज़िया  आबि सलामी देलक। अलसाएल नजरिए ओकरा दिस तकैत राजकुमारी पूछलनि-
                ---------काज भेलौ ।
                ---------जी सरकार ।
        ---------ज्योतिषीजी भेटलखुन।
                -------जी, जी हं।
                --------सभ बात हुनका नीक जकां बुझा देलहुन।
       -------जी सरकार, आज्ञाक अपुरूपें सभ ठीक ठाक भऽ गेल।
       ----------तोरा बुझेलाक अनुरूपें  दारा शिकोह कें भ्रमित करबामे की ओ सफल रहलाह।
        ---------जी सरकार। सोलहो आना  राजकुमारीजीक इच्छानुसारें सभ किछु रहल ।

राजकुमारी देह परसँ ओढ़नी उतारि फेकैत पुनः मसनद पर ओलरि गेलि । किछु क्षण सोचलनि । पुनः मदिराक प्याली उठबैत चुस्की लेलनि ।

      ----------आ दोसर काजक की भेलौ।
     -----------ओ हो भऽ गेल सरकार।
     ----------सुभीता सँ।
     ----------जी हुजूर।
    ----------के छौ।
     -----------एकटा अफीमची अछि हुजूर । बहुत   दिनस जनैत छियैक ओकरा।
    ----------काज संवेदनशील छौक से बुझै छही।
    -----------सरकार हुजूर अपने बेफिकिर रहियौ ने। सभटा नीक जकां हेतै ।
        ---------बेस त ठीक छौ। बनो एक प्याली ।
आज्ञा पाबि रज़िया प्यालामे मदिरा ढारलक ताहिमे गुलाबजल फेंटलक आ सेवामे प्रस्तुत कएलक । मातलि राजकुमारी किछु विहुंसैत
    --------- बेस आ तेसर काज।
    --------सेहो भऽगेल हुजूर।
         ------कतए छौक।
    ----------सरकारक खास कोठरीमे ।

मुगल शाहजादी राजकुमारी रौशनआरा अपन गरास मोतीमाल उतारि रज़िया पर फेंकलनि । आ मुस्कीदैत मदिरा दिस इशारा कएलनि । रज़िया देमए लागलि ।

ताबतहि नसीमबानू उपस्थित भेलि । झुकि-झुकि कोर्निस करैत आदाब बजौलनि । राजकुमारी आँखिक इशारासँ रज़ियाके बाहर जएबाक आदेश देलनि । मातलि रौशनआरा नसीमा दिस तकलनि ।

        ---------बादशाह सलामत ख्वाबगाह गेलाह।
        --------जी नहि सरकार। अखन धरि त नहि ।
        --------खबरनबीस रोजनामचा सुनौलनि।
        --------जी हुजूर ।
        --------कोनो खास विन्दु ।
        --------जी राजकुमार दारा शिकोह ओहि चालीस कैदीक हाथ कटबा देलनि अछि जे शहजादा शुज़ाक संग लड़ाईमे बन्दी बनाओल गेल छल ।
        --------आओर।
        --------पछाति सरकारे औलिया आ शाहजादा दारा मे  खूब थुक्कम फजीहत भेल ।
        --------कोन बात पर।
        --------बादशाह सलामतक कथनी छलनि जे तुरत सुलेमानके आपस बजबालेबाक चाही मुदा दारा एहि बात पर अड़ल रहथि जे सुलेमान  शहजादा शुजा के बंगाल धरि खिहारथि ।
रौशनआरा बिहुंसि उठलि --------दिव्य, बड़ सुन्दर। नसीमा तों बादशाह सलामतकेँ ख्वाबगाह जेबाकाल धरि ओतहि उपस्थित रहि सब देख सुन ।
        --------बड़ बेस सरकार ।
कहैत नसीमबानू चलि गेलि । थपड़ी पड़ल, रज़िया आएलि ।
        -------अच्छा त तों ई बतो जे ज्योतषी शाहजादा दाराकेँ की कहलकैक।
        --------सरकार, शाहजादा दाराकेँ ज्योतिषी नीक जकाँ बुझा देलनि अछि जे सुलेमान शिकोह एहि अभियानमे विजयी भए लौटताह । अखनुक ग्रह-गोचर स्थिति पूर्णतया अनुकूल अछि ।तहि अखनहि बंगाल, बिहार, उड़ीसा पर दखल क लेल जाए ।
        --------वाह, वाह बेजोड़।
        -------जी सरकार। सभ त हुजूरेक उर्वरा मस्तिष्कक उपजा थिक।
        --------रज़िया ।
        -------सरकार ।
        --------तों कहलें जे ओ बहुत मनभावन अछि ।
        --------जी सरकार, खनदानी थिक हुजूर ।
        --------अच्छा एक प्याली पिओ ।
रज़िया प्याली भरलक । शाहजादी रौशनआरा ओकरा एकहि साँसमे गटकि गेलि । प्याली ओंघरा देलनि । उठलि । ऊपरसँ नीचा धरि ऐंचैत, देह तोडै़त उठलि । बाजलि-- श्चल लऽ चल खास कोठरीमे, देखी आजुक रातिक शिकार केहन चुनलंे अछि ।

नौड़िन रज़िया सहारा दैत उठौलक शाहजादी रौशनआरा डगमगाइत खास कोठरीमे
चलि गेलि...............
कुमार मनोज कश्यप

कथा-नोरक दू ठोप

कोट के उतारि कऽ सोफा पर पेक जकाँ देलियै आ पैर टेबुल पर राखि कऽ हम आँखि बन्न कऽ लेने रही । थाकल-ठेहियायल कतहु सँ आबि कऽ टेबुल पर पैर राखि कऽ बैसनाई हमर प््रिाय आदति रहल अछि शुरूहे सँ । एहन उमस मे दिन भरिक भाग-दौड़़़क़ंोर्टक एहि रूम-सँ-ओहि रूम, कखनो पुस्तकालय तऽ कखनो मुवक्किंल सभ सँ किंछु बुझैत वा ओकरा सभ कें किंछु बुझबैत़़ भरि दिन यैह करैत-करैत मोन असोथकिंत भऽ जाईत अछि आ शरीर बेजान । एहने मे कखन आँखि लागि गेल से बुझबो ने केलियै। कनियाँ जगओलनि - 'जा निन्न पड़ि गेलियै ! चाह सेरा रहल अछि । ' हम हड़बड़ा कऽ उठलहुँ आ जल्दी-जल्दी चाह सुड़किं गेलहुँ । गरम-गरम चाह पीयब हमरा नीक लगैत अछि  जतबा काल केयो एक-दू घोंट चाह पिबैत अछि ततबा काल हमर कप खाली भऽ कऽ नीचा रखा गेल रहैत अछि ।

हम प्रेश भऽ लॉन मे आबि गेल रही। कनियाँ पहिनहिं सँ ओतऽ हमर बाट जोहि रहल छलीह । एम्हर-ओम्हरक गप्पक बाद बात केस-मोकदमा के एलै । 'भने मोन पाड़लहुँआई एकटा बुढ़ी आहाँक ठेकान पुछैत-पुछैत आयल छल़़ बड़ अभागलि अछि ओ ! अपने जनमाओल बेटा  अपडेर देने छै बेचारी के ! हे हम नेहोरा करैत छी़ओकर केस लड़ियौ आहाँ देखला सँ तऽ ओ बड़ निर्धन बुझायल हमरा । फीस तऽ साईत नहियें दऽ सकत़़मुदा एकटा सामाजिक सरोकार बुझि मदति कऽ दियौ बेचारी के़। ' कनियाँ नेहोरा-पर-नेहोरा केने जा रहल छलीह ।

'मुदा केस की छै से तऽ पहिने बुझियै? '

'केस की छै, एकटा भावनात्मक अत्याचार छै ओहि अबला मसोम्माति पर । हे हमरा सद्यः विश्वास अछि आहाँ ई केस जीतबे करब ! खाली आहाँ  'हँ ' कहि दियौ़ज़ीवन भरि ओ आशीर्वाद दैत रहत बाल-बच्चा के । '

'पहिने केस तऽ बताऊ़़ओहिना बुझौआल बुझेने जा रहल छी । ' हमर स्वर मे कनेक खौंझाहटि आबि गेल छल ।

'केस तऽ मामूलिये छै़ओहि बुढ़ी के एक्के टा बेटा छै़ओकर बेटा जखन दूईये साल के रहै तखने ओकर घरवला मरि गेलै । कहुना-कहुना कऽ बुढ़ी ओहि बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ समर्थ बनेलकै़एखन बेटा बैंक मे कोनो नीक पद पर काज कऽ रहल छै । बेटा पुतोहु के कहल मे आबि कऽ बुढ़ माय के अपना संगे नहिं राखय चाहि रहल छै । बुढ़ी के कहब छै जे जाहि बेटा के लेल हम अपन सभ किंछु गमा लेलहुँ ओहि करेजा के टुक़ंडा सऽ हम मरबा काल कोना दूर रहि सकैत छी । ओना ओकर बेटा ओकरा अपना सँ दूर घर दऽ नीक-सँ-नीक  सुख-सुविधा देबाक हेतु तैयार छै । मुदा बुढ़ी अपन बेटा सँ दूर नहिं रहऽ चाहि रहल छै । '

'केस मनलग्गू छैक भावनात्मक  छैक  ओकर 'मास अपील' छैक ओकर निर्णय के दूरगामी प््राभाव समाज पर पड़ि सकैत छैक  ' हम मामला मे अपना के विभोर केने जाईत रही । कनियाँ हमरा सोच मे पड़ल देखि कहलनि -' काल्हि रविये छै, भोरके पहर मे ओकरा बजेने छियै । अपने सभटा पुछि लेबै। बेचारी के आँखिक नोर नहिं सुखाईत छलै । झाँट धरू एहन बेटा के जे माय ओकरा परवरिस कऽ कऽ एतेक टा बनेलकै़मनुक्ख बनेलकै़ओ अपन माय के नहिं डेब सकलै। हे हम पैर पक़ंडैत छी़आहाँ नामी ओकील छी़बुढ़ी के न्याय दिया दियौ । ' कनियाँ पेर अनुनय-विनय पर उतरि गेल छलीह।

केस हमरो रोचक लागल रहै । दोसर, कतेको मामला मे कोर्टक निर्णय आयल छै जे संतानक दायित्व बनैत छै जे ओ अपन माय-बाप के परवरिस करय, तैं केस साधारने छलै । साँच पुछी तऽ कोनो बुड़िबको ओकिंल ई केस जीत सकैत छल ।

छुट्‌टी के दिन हम अपन निन्नक सभटा बैकलॉग कोटा पूरा करैत छी । दिन माथक उपर आबि गेल छलैक । कनियाँ सिरमा मे बैसि कऽ हमर केस मे अपन आँगुर पेरैत हमरा जगौलनि - 'ओ बुढ़ी आबि कऽ कखन सँ ने बैसलि अछि । आब उठि जाऊ । पेर दिन मे सुति रहब । एहि प््राचंड रौद मे बुढ़ी के पैरे दू कोस गाम जाई के छै । '

चाय के चुस्कंी संग हम ओहि बुढ़ी के सभटा बात ध्यान सँ सुनैत रहलहुँ । अपन जुनियर सिन्हा के कहलियै - 'ड्रापत्ट अप्लीकेशन बना कऽ लऽ आऊ। काल्हि केस फाईल कऽ देबै । ' कनियाँ बुढ़ी के किंछु पानि पीबय देने रहथिन । हम आन केस सभ मे व्यस्त भऽ गेल रही ।

केस मे उम्मीद सँ बेसी जीरह चलि रहल छै । हमर कहब रहय जे एकमात्र संतान हेबाक कारणे बुढ़ीक बेटा के पूरा-पूरा जिम्मेदारी छै जे ओ अपन बुढ़ माय के देखभाल करय । हम अपन बात पर जोर दैत बजलहुँ - ' मी लॉर्ड ! मेंटीनेंस एंड वेलपेयर ऑफ पीरेंट्‌स एंड सिनियर सीटीजन एक्ट, २००७ के पारित भेला सँ संतान अपन बुढ़ माय-बाप के पालन-पोषण के जिम्मेदारी सँ भागि नहिं सकैत अछि । एहि सम्बंध मे कतेको  न्यायाधिकरण आ न्यायालय के रूलिंग उपलब्ध अछि ।  हमर मुवक्किंल के ओकर एकमात्र बेटा जे ओकर जायदाद के एकमात्र वारिस सेहो छैक, के पूर्ण जिम्मेदारी बनैत छैक जे अपन बूढ़ माय के उचित देखभाल करय । अहू सभ सँ पैघ बात 'मी लॉर्ड' जे जे माय कोना-कोना अपन पेट काटि बेटा के पालि-पोसि आई लायक बनेलकै, ओहि माय के जँ बेटा पेट नहिं भरि सकय, ओकरा दू हाथ वस्त्र नहिं दऽ सकय, ओकर दवाई-विरो नहिं करा सकय तऽ ओ बेटा  बेटा कहेबाक कथमपि योग्य नहिं । '

'ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड ! ई आरोप सरासर फुसि अछि जे हमर मुव्वकील  बुढ़ माय के परवरिश नहिं कऽ रहलाह अछि । सत्य तऽ ई अछि माई लॉर्ड जे ई अपन माय के नीक-सँ-नीक सुख-सुविधा दऽ रहल छथि आ भविष्यो मे दैत रहबाक वचन दैत छथि । हुनका कोनो तरहक असुविधा वा कष्ट नहिं होनि ताहि लेल एकटा फुल टाईम नोकरनी राखि देल गेल छनि़नियमित डॉक्टरी जँाच आ दवाई-विरो के व्यवस्था कयल गेल छनि़घर मे सभ सुख-सुविधा उपलब्ध कराओल गेल छनि । केवल हमर मुवक्कंील अपन माय के अपना संगे नहिं राखि रहल छथि तकर कारण छैक सासु-पुतोहु मे दिन-राति झगड़ा़दुनू सासु-पुतोहु एक दोसरा के फुटलियो आँखि नहिं देखऽ चाहैत छथि । एना मे घर के नर्क बनेबा सँ तऽ नीक जे बुढ़ी अलग रहथि । एहि सँ ओहो शाँति सँ रहतीह आ हुनकर बेटा - माने हमर मुवक्कंील सेहो । '

'मी लॉर्ड ! जे माय बेटा के नान्ही टा सर्दी-बोखार भेला पर भरि-भरि राति जागि कऽ बीता देने होई, जाहि माय के लेल दुनियाँ के सभ सँ प््रिाय वस्तु ओकर करेजा के टुक़ंडा होई , जे माय अपन बेटा के खातिर अपन सर्वस्व लुटा देने होई, आई मरन-काल मे ओहि माय के कहल जाय जे ओ अपन बेटा सँ दूर रहय तऽ ई एकटा मायक ममता पर सरासर कुठाराघात नहिं तऽ आर की भऽ सकैत छैक ? तैं हमर ई हाथ जोड़ि कऽ निवेदन अछि जज साहेब जे हमर मुवक्कंील के मरन काल मे अपन बेटा के संग रहबाक अंतिम ईच्छा के पूरा कऽ दियौ । हमर क्लाईंट के सुख-सुविधा, नोकर-चाकर किंछु नहिं चाहियै़बस एकेटा अंतिम ईच्छा जे अपन करेजा के टुक़ंडा के देखैत प््रााण त्याग करी़। ' बजैत-बजैत हमर गला भरि गेल छल, आँखि मे नोर डबडबा गेल छल । चश्मा निकालि कऽ रूमाल सँ हम अपन आँखि पोछि पेर सँ चश्मा पहिरी लैत छी । कोर्टक महौल भारी भऽ गेल छलैक ।

दुनू पक्ष-विपक्ष सँ तर्कक वाण चलैत रहलै़ज़ज साहेब किंछु-किंछु नोट करैत रहलाह़़लोक सभक ज़िग्याशा बढ़ले जाईत रहलै। आब पैसला के घड़ी आबि गेल छलै़सभ साँस रोकने सुनि रहल छल । जज साहेब खखसि कऽ गला साफ केलनि आ पैसला सुना देलनि -'घोड़ा के पानि पियेबाक लेल घाट पर तऽ लऽ कऽ जायल जा सकैत छैक, मुदा ओकरा पानि पीबाक लेल बाध्य नहिं कयल जा सकैत छै । तहिना यदि हम प््रातिवादी के आदेश कईयो दियै जे ओ वादी के अपने संगे अपने घर मे राखै तऽ परिणाम भऽ सकैछ जे वादी-प््रातिवादी दुनूक जीवन अशांत भऽ जाय । एहि स्थिति सँ नीक जे प््रातिवादी स्वयं निर्णय लेथि । तैं हम प््रातिवादीये पर ई मामला छोड़ैत छियनि़ज़न्म देनिहारि माय तऽ आखिर हिनके छियनि । ' कहि कऽ जज साहेब फुर्ती सँ अपन कुर्सी सँ उठि कऽ चलि गेलाह । कोर्ट-रूम मे लोकक बीच घोल-फचक्कंा शुरू भऽ गेलै़ज़तेक मुँह तते तरहक बात । ओ बुढ़ी हमरा निरिह आँखिये ताकैत कोर्ट-रूम सँ बहरा रहल छलीह । हमरा लागल़़हमर ओकालति के ई सभ सँ पैघ हारि अछि । हम झट्‌ट सँ बाहर निकलि कऽ कऽल जोड़ि कऽ बुढ़ी के आगू मे ठाढ़ भऽ गेलहुँ  -'माताजी ! आहाँ चिंता जुनि करू । हम काल्हिये केस फाईल बना कऽ हाई-कोर्ट मे अपील करैत छी़हमर जीत निश्िचते होयत़़। ' ओ बुढ़ी बामा हाथ सँ हमरा कात करैत बिना किंछु बजने आगू बढ़ि गेलीह । ओ अपन रस्ता पर जा रहल छलीह । हम अबाक भेल हुनकर रस्ता दिस तकैत रहि गेल छी़अपलक माटिक मूर्ति जकाँ स्थिर । नोरक दू ठोप टघरि कऽ गाल पर आबि गेल अछि ।



१.अरविन्द ठाकुर १. लोकदेव भीम केवट २.लोकदेव लोरिक २. बिपिन कुमार झा- विषवेलक सिञ्चन

१.लोकदेव भीम केवट- अरविन्द ठाकुर

आठम सदीक मध्य धरि गुप्त-वंशक शासन नरभराइत-नरभराइत चलल। हर्षवर्धनक बाद सम्पूर्ण शासन-क्षेत्रमे अराजकता आ अव्यवस्था पसरि गेल। मत्स्य-न्यायसँ त्रस्त प्रजा अपन रक्षाक लेल सर्वसम्मतिसँ शस्त्र, शास्त्र आ कृषिमे निष्णात अयाचक-ब्राह्मण गोपालकेँ अपन राजा चुनलक। हुनकेसँ पाल वंशक प्रारम्भ भेल। गोपाल बिहार आ बंगालकेँ एकसूत्रमे बान्हि जनसहयोगसँ शासनकेँ सुव्यवस्थित केलनि। गोपाल परम लोकप्रिय राजा भेलाह आ हुनकासँ प्रारम्भ पाल शासन कालमे शिक्षा-संस्कृतिक चतुर्दिक विकास भेल।
एगारहम शताब्दी आएल। तखन पालवंशी राजा विग्रहपाल तृतीयक शासन छल। ओहो अपन पूर्वज सभ जकाँ प्रजापालक आ न्यायपरायण छलाह। मुदा हुनक ज्येष्ठ पुत्र महिपाल-द्वितीय सत्तालोलुप छल। पिताक मृत्युक उपरान्त ओ अपन दुनू छोट भाए शूरपाल आ रामपालकेँ बन्दी बनाए कारागारमे ढाठि देलक आ शासनक मनमाना संचालन करए लागल।
गुप्तकालमे पूर्वी मिथिला आ पश्चिमी बंगालकेँ मिलाकए एकटा राज्य बनाओल गेल छल- पौन्ड्रवर्धन। एहि क्षेत्रान्तर्गत छल भेरियारीगढ़। ई अजुका अररिया जिला मुख्यालयसँ प्रायः १६ किलोमीटर दूर नेपाल सीमापर अवस्थित अछि। एहि भेरियारीगढ़मे दिब्बोक नामक पालशासकक एकटा प्रभावशाली सामन्त अपन भातिज भीम केवटक संग रहै छलाह। ओ अपन प्रजाक कल्याण लेल तँ तत्पर रहिते छलाह, हुनका अनेक सिद्धि सेहो प्राप्त छलनि। ओ भेरियारीगढ़सँ शासन आ पनार नदीक मनोरम तीरपर भागनगर गामस्थित एक गुफामे योग साधना करैत छलाह। मोरंगक राजा भीमदेवक संग हुनक प्रगाढ़ मैत्री छल।
महिपाल द्वारा अपन भाए सभक संग कएल कुकृत्य आ अराजक  शासन पद्धतिसँ सामन्त दिब्बोक क्षुब्ध भए गेलाह। ओ अपन राजाक निन्दनीय कृत्यक विरोध करए लगलाह। ओ केवट सभक २२ (बाइस) उपजातिकेँ संगठित केलनि आ तकर नेतृत्व लेल अपन भातिज भीम केवटकेँ नियुक्त केलनि। संघर्षक योजना बनए लागल। क्षेत्रक अन्य अनेक छोट-बड़ सामन्त सभ भीम केवटक झंडाक नीचाँ एकजुट होबए लागल।

महिपालकेँ एकर भनक लागल तँ ओ एक भाए शूरपालकेँ मुक्त कए शासनमे हिस्सेदार बला लेलक। मुदा एहिसँ स्थिति नञि सम्हरलै। जनाक्रोश अप्[अन चरमपर आबि गेल छलै। भीम केवटक नेतृत्वबला जन-सेना आक्रामक भए गेल। राजा महिपाल शक्तिशाली सेनाक संग-संग ग्राम्य रक्षादल वाहिनीसँ सम्पन्न छल मुदा प्रजाक विश्वास ओकरा संग नञि छलै। भयंकर युद्ध भेलै जाहिमे महिपाल हारि गेल आ क्रुद्ध प्रजा ओकर वध कए देलकै। शूरपाल आ रामपाल मुक्त कए देल गेलाह आ दुनू भाए बंगाल दिस चलि गेलाह। विजयोपरान्त दिब्बोकेँ राजा बनाएल गेल। हुनका कोनो पुत्र नञि छलनि तेँ हुनक मृत्युक उपरान्त भीम केवट राजा भेलाह।
एक बेर मोरंग राजा भीमदेवक बहिन तिरफूल सुन्नरि एक सए नाहमे सनेस आ दहेजक  संग अपन सासुर जाइ छलीह। सिरीपुर चौरमे किराँत डकैत सभ सइयो नाह लूटि लेलक आ तिरफूल सुन्नरिक हरण कए व्पतालक एहिठाम राखि देलक। हाहाकार मचि गेलै। राजा भीमदेव अपन मित्र भीम केवटसँ गोहार कए मदति माँगलनि। भीम केवट भागनगर गुफामे भगवतीक ध्यान लगौलनि। भगवती परगट भए हुनका तिरफूल सुन्नरिक पता देलथिन। भीम केवट अपन बलशाली हाथमे अढ़ाय मोनक खण्डा लेने बनहौटा घोड़ापर सवार भए किरांत सभक उन्मूलन लेल अग्रसर भेलाह। किरांत सभक सभटा मंतरकेँ अपन साधनाक बलपर काटैत भीम केवट पताल-लोक धरि पहुँचि गेलाह। अपन खंडासँ किरात डकैत सभक वध कए ओ तिरफूल सुन्नरिकेँ मुक्त करैलनि।
ताहि काल धरि बौद्ध धर्म कलुषित होअए लागल छल। वज्रयानी सभ विकृत गुह्य साधनामे लागि गेल छल। भीम केवट अपन शासन क्षेत्रमे एहि दुराचारकेँ प्रतिबन्धित केलनि। वज्रयानी बौद्ध मठ सभकेँ उजाड़ि ओकरा शिव मन्दिरक रूप देल गेल।
अत्यन्त लोकोपकारी काज सभ करैत भीम केवट अपन शासनकालमे जननायक बनल रहलाह। आइयो भीम केवट लोकदेव रूपमे स्मरण कएल जाइत छथि आ हुनक वीर गाथा लोकगीत बनि लोक कंठमे बसल अछि।

२.लोकदेव लोरिक-अरविन्द ठाकुर

सौँसे इलाकामे उघरा पंवारक आतंक पसरल छल। ओ परम अत्याचारी आ दिश्चरित्र छल। ककतो धन-सम्पत्ति लूटि लेब आ मनपसिन्न युवतीक अपहरण कए लेब ओकर दिनचर्या बनल छल। उघरा गामक अपन गढ़सँ कज्जलगिरि हाथीपर चढ़ि एकसँ एक अड़िजंग पट्ठा आ पहलमान सभक संग जखन उघरा पंवार बहराबै तँ लोककेँ अदंक धए लए। युवती लोकनि पतनुकान लए लिअए आ संपन्नसँ संपन्न आ प्रभावशाली लोक ओकरा आगाँ नतमस्तक रहै।
कमला नदीक कछेरपर गोठ गौरा गाम। एहि गामक मांजरि परम सुन्दरी छलीह। उघरा पंवार मांजरिकेँ अपन अंकशायिनी बनबय छाहैत छल। मांजरि हाबी पत्तनक भगवती मंदिरमे प्रतिदिन पूजा करथि आ अपन सतीत्व रक्षा लेल गोहारि करथि। मांजरिक पिता महरकेँ एक लाख गाय छलनि आ पत्नीक नाम छलनि पद्मा मौहरि। दुनू प्राणीकेँ उघरा पंवारक मोनक बात बूझल रहनि तेँ दुनू चिन्तामग्न भए मांजरिक माम सेवाचनकेँ बजयलनि। मांजरिक लेल निर्भीक आ प्रचण्ड योद्धा वर खोजबाक भार सेवाचनकेँ देल गेलनि।
एहि क्रममे अगौरा गामक सिलहट अखाड़ाक ख्याति सेवाचनक कानमे सेहो पड़लनि। एहि अखाड़ाक प्रधान मल्ल छलाह लोरिक। लोरिक अपन अस्सी मोनक विशाल भारी खण्डाक प्रबल वेगसँ संचालन करथि तँ बिजली चमकै। हुनक छोट भाय सावर तेहने मस्त पहलमान। ओहि अखाड़ामे लोरिकक अन्य मल्ल-संगी छल- राजल धोबी, बारू दुसाध आ बंठा चमार।
सेवाचन अगौरा एलाह तँ हुनका अगौराक राजा सहदेवक शतखंडा महल देखि पड़लनि। ओतए गेलाह तँ हुनक खूब आवभगत भेल आ ओ राजकुमार महादेवकेँ देखलनि। एहन सुकोमल युवक हुनका मांजरि लेल नञि जँचलनि। ओ महलसँ निराश भए घुरैत छलाह तँ डगरपर राजल धोबीक पत्नी फुलिया हुनका लोरिकक मादे बतैलकनि। सेवाचन कुब्बेक दलानपर एलाह। लोरिकक आ सावरक पिता कुब्बे राजा सहदेवक हरबाह छलाह आ हुनक पत्नीक नाम छलनि- खुलैन। सेवाचन खुब्बेक विपन्नतासँ व्यथित तँ भेलाह, मुदा सिलहट अखाड़ापर लोरिकक पौरुष देखि हुनका लगलनि जेना साक्षात भैरव वीर-वेशमे ठाढ़ छथि। हुनका भरोस भए गेलनि जे इएह तरुण अपन वीरतासँ मांजरिक सतीत्व-रक्षा कए सकैत अछि। ओ कुब्बेक एहिठाम भोजन कयलनि आ विवाह तय भए गेल।
उघरा पंवारक प्रचण्ड शक्तिसँ आतंकित साअमान्य जनकेँ बरियात जयबाक साहस नञि भेलनि। बरियातमे मात्र निर्भीक परिजन आ चुनौटा वीर सभ चलल। रस्तामे एकटा नदीक कातमे सात सय धोबी कोनो राजाक कपड़ा धोइत रहए। राजल ओहि धोबी सभसँ आग्रह केलकनि जे सभ बरियातीकेँ कपड़ा दिअओ जे फिरती काल घुराए देल जाएत। धोबी प्रधान प्रत्युत्तरमे राजलक अपमान कए देलकनि। फेर की छल। बरियाती सभ सभटा वस्त्र लूटि लेलक आ पहिरिकेँ आगाँ बढ़ल। दोसर दिन ओ सभ बगड़ा-बजार पहुँचल। भुखायल बरियातीकेँ बजारबला सभ भोजन देब अस्वीकार कए देलक। बस पहर भरिमे बरियाती बगड़ा-बजारकेँ लूटि लेलक आ खा-पी कए आगाँ बढ़ल।
गौरा गामक एकटा फैलगर गाछीमे बरियातीक डेरा खसलै। महर दिससँ भोजन सामग्रीक अमार लागि गेल। कुब्बे असगरे सत्ताइस मोन दूध पीबि गेलाह, सात सए तोला दही चाटि गेलाह, सत्तरि माठ सकरौरी चाभि देलथिन आ विशेष आग्रहपर सए हाँड़ी छाल्ही सेहो उदरस्थ कए गेलाह। आनो-आन बरियाती तहिना कएलक।
उघरा पंवार विवाहकेँ बाधित करए लेल पहलमान सभकेँ स्त्री-वेशमे पठयलक। बूढ़ कुब्बे अपन ताड़क छौंकीसँ सभकेँ झँटिआबय लगलाह। बहुत मरल, बहुत पड़ायल। फेर पंवार अपन कज्जलगिरि हाथीकेँ पठैलक। सभ बरियाती मिलि ओकरो बेहाल कए देलकै। ओहो पड़ायल।
कन्या पक्ष दिससँ एक गोटय पद्मा मौहरिक समाद लए कए आएल जे जाधरि किरण-छबि-मौर, माने चौकक आकाश-तारा-पटोर आ बिजुवनक माणिक चोली नञि देल जेतैक ताधरि कन्यादान संभव नञि। ई सभ अनबाक भार लैत राजल धोबी बाजल- एतएसँ पचीसे कोसपर बिजुवन छै। ओहिठामक बड़का भारी योगिन कोसा मालिन ई तीनू चीज एक्के संग बेचैत अछि। ओकरासँ ई सभ उधार लए लेबै आ नञि देत तँ घरसुरक मैल छोड़ाए देबै।सावर सेहो ओकर संग भेल। ओ सभ बाटमे किछु लताम तोड़ि कए आ किछु पोठी माछ पकड़ि कए राखि लेलक। गोंगा बानरकेँ लताममे आ कनही बिलाइकेँ पोठी माछमे ओझरा कए ओ दुनू कोसा मालिन लग पहुँचल जे मंडपमे बैसलि बारह बरषसँ खीर रान्हि रहल छलि। ओकर विभिन्न प्रलोभनसँ बचैत आ धमकीक संग ओकर वस्तुजातक मोल दए देबाक वचन दैत दुनू गोटय सभ वस्तु लए आनल। तखन जाकए सिनुरदान भेल।
वर-वधु कोहबर प्रवेश कएलनि। रातिमे पंवारक पठाओल प्रसिद्ध चोर-मल्ल सोनिका आ मनिका चार अलगाकए तरुआरि लेने कोहबरमे घुसि गेल। लोरिक अपन खंडासँ दुनूक मूड़ी छोपि लेलनि।
मांजरि तीनटा अनाथक पालन कएने छलीह। प्रथम छल बाजिल कौआ। दोसर छलीह परम बलशालिनी आ महाकाय लुरकी। तेसर छल नांगर छौड़ा नन्हुआँ, जे गाय सभक चरबाही करैत छल।
सोनिका आ मनिका मारले गेल छल कि नन्हुआँ चिकरल- पाहुन, दौगू। उघरा पंवार खरिका बथानक गोथरसँ महरक सभटा गाय हाँकने जाए रहल अछि।एहि हाकपर लोरिक अपन हाथमे खंडा लेने कोहबरसँ निकलि दौगि गेलाह। ओम्हर खरिका बथान लग पंवार अपन सैनिक सभक संग तैयार छल। लोरिकपर अगिनियाँ बाण चलए लगलैक। ओहिसँ बचए लेल लोरिक धारक कछेरपर एकटा फाटमे धसिकए बैसि गेल। पंवार अपन कज्जलगिरी हाथीपर चढ़ल ओकरा दिस बढ़ल। ओ लग अलए कि लोरिक लपकि कए अपन खंडासँ हाथीक सूँढ़ छोपटि लेलक। हथी अरराकए खसल आ पंवार ओहिपरसँ कुदकिकए एक दिस भागल। लोरिक फाटसँ बहराएल आ सैनिक सभक मूड़ी छोपए लागल। पंवारलग एकटा तीर च्बचल छलै। ओ भूमिपर सूतिकए लोरिकक जांघमे तीर मारलक। जाँघसँ शोणित फुहार देबए लगलैक मुदा लोरिक कहाँ थम्हयबला। ओकर खंडा चलिते रहल आ सैनिक सभ मुंडविहीन होइत गेल। अंततः उघरा पंवार अपन बचल सैनिक संग भागि गेल। लोरिक घुरिकए कोहबर एलाह।
बरियाती विदाइ बेर पंवार अपन बचल योद्धा सभक संग फेर जुमि गेल। भीषण युद्ध भेल। लुरकी अपन व्रज-समाठ लेने पंवारेसँ भीड़ि गेल। ओ समाठसँ पंवारक माथपर चोट करैत छलीह, मुदा पंवार अपन रत्न-जड़ित अभेद किरीटक कारणेँबचि-बचि जाइ। एहिपर लोरिकक दृष्टि पड़ल। ओ अपन खंडाक नोकसँ किरीटकेँ नीचाँ खसाए देलक। पंवार प्राण लए कए अपन गढ़ दिस भागल। खसल किरीट उठाकए लुरकी ओकरा लोरिकक माथपर राखि देलकै। किरीट पहिरने लोरिक पंवारक पछोर धेलनि। गढ़क फाटक तक अबैत-अबैत लोरिक पंवारक मूड़ी छोपि लेलनि। गढ़मे हाहाकार मचि गेल। गढ़मे घूसि लोरिक बाल-बच्चा आ रानीकेँ अभय-दान देलनि। रनिवासक काराक फाटक खोलबाए ओहिमे ढ़ाठलि सात तूर सुन्नरिकेँ कारामुक्त कए देल गेल। जन-जनमे जय-जयकार भए उठल। महा-अत्याचारी उघरा पंवारसँ लोककेँ मुक्ति भेटल।
लोरिक सभ गोटयसँ विदा लेलनि आ बरियाती संग आगाँ बढ़लाह। आगू-आगू रक्तरंजित वज्र-समाठ लेने लुरकी, ओकर कन्हापर बैसल विशाल कौआ बाजिल आ तकरा पाछू छलै रतन ओहारबला पालकीमे मांजरि। तकरा पाछू चलैत छलाह हाथमे अस्सी मोनक खंडा लेने सिंह जकाँ झुमैत वीर लोरिक। हुनक खंडासँ तखनो पंवारक रक्त चुबिए रहल छल।
बिपिन कुमार झा

विषवेलक सिञ्चन
कखनहुँ- कखनहुँ ई निराशाजनक अनुभूति होइत अछि जे भारत 28 राज्य के नहिं अपितु 6000 जातिक संघमात्र अछि। अपन सभक पहचान भारतीयता नहिं बल्कि जाति विशेषमात्र अछि। भारत में दुर्भाग्यक शाश्वत-कालरात्रि के आननिहार ई जातिप्रथा आई अपन वैधानिक स्वरूप सँऽ उपद्रवी भूमिका निभेबाक उद्योग कय रहल अछि। जाति जनगणना ओ विष-बेल अछि जकर जहर आगामी पीढी कें रग-रग में प्रवाहित भय राष्ट्रजीवन कें विषाक्त करत।
      आखिर स्वाधीनता केर 64 वर्ष बाद, जखनि एकमात्र पहचान राष्ट्रीयता हेबाक चाही , जखनि राष्ट्रजीवन सँ जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रजनित पहचान गौण भय जेबाक चाही, जखनि ई घृणित जातिगत विरासत समाप्त भय जेबाक चाही तखनि हम सब ई विनाशकारी संस्था (जातिगत पहचान) सँ नबका आशाक किरण ताकि रहल छी। इतिहास केर ई मोड पर सरकार द्वारा जाति जनगणना क लेल गेल ई निर्णय वर्तमान नेतृत्व कें कहियो भविष्य में जबाब देबाक हेतु बाध्य करतन्हि जे ई रक्तबीज केर पोषण कियाक कयल गेल छल।
      अतीत में जातिप्रथा कें कोनो उपयोग भेल हो अथवा वर्तमान में ई  एकटा वास्तविकता छी तथापि ई तर्क जातिप्रथा कें सम्पोषण कें न्यायसंगत नहिं ठहरा सकैत छियैक। यदि एक शब्द में कहल जाय त ई भारतवर्ष कें विद्यमान अनेंक दुष्प्रवृत्ति केर जनक छी। वोट बैंक केर भूखल नेतागण द्वारा जातिगणना कऽ अनेंकानेक लाभदायक पहलू व्यक्त कयल जा रहल छैक। सामाजिक न्याय केर पूर्तिक हेतु एकरा एकटा प्रमुख माध्य सिद्ध कयल जा रहल छै। वास्तविकता त ई अछि जे ई सब व्यक्ति समाज में जाति जनित संघर्ष उत्पन्न कय जनभावना कें उभारि पोलीटीकल इंश्योरेंश प्राप्त करय चाहि रहल छथि। एहि कारण देश में नितनूतन आरकक्षण केर मांग, अव्यवस्थाजनक आन्दोलन एवं सामाजिक कटुता जे उत्पन्न होयत ओकर नियन्त्रण अपन शासनतन्त्र सँऽ कदाचत् संभव नहि होयत
ई स्वार्थी नेतागण द्वारा अपन मानस पिता अंग्रेजक विभाजनकारी ढर्रा अपनेनाई देश कें बड्ड महग पडत।
      ई समयक मांग आ युग के आह्वान अछि जे जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रविषयक पहचान स ऊपर एकात्मकता क आत्मसात कय जाय। आश्चर्य होइत अछि जे बुद्धजीवी आ युवा समाज केहि तरहक विभाजनकारी क्रिया कलाप पर प्रतिक्रिया शून्य च्थि एहि वर्गक चेतना हीनता केर मूल्य राष्ट्र के भविष्य में अवश्य चुकबय पडत।
       ई दायित्त्व अपन प्रबुद्ध समाज पर अछि जे ओ ई विनाशक जाति-प्रथा कें  पोषित करय  बला कोनों प्रयास पर अपन प्रभावी विरोध प्रकट करथि। अन्यथा भविष्यक भीषण दुष्परिणाम के प्रतीक्षा करथि।
जय हिन्द                            जय भारत
बिपिन कुमार झा

 ३. पद्य





३..१.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता

३.७.१.इन्द्र भूषण २. राजेश मोहन झा
  
 श्री कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 . मे भेलनि  पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चाबिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |


गै खुशबू !!
(बाल साहि‍त्‍य)

बाबा मालबावू नाना छौ कमाल बाबू गै
पप्‍पा रोकड़ि‍या लग नानी मारौ टाल बावू गै।
बाबा खाति‍र चाहक गि‍लास
लबलब लबनी नाना पास
नानी चुक्‍का ढारौ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ रूमाल बाबू गै।
बावा लेलनि‍ मॉछे कीन,
नाना खेलनि‍ मुरगा तीन
नानी भनसा घरमे लगा रहल छौ ताल बावू गै।
बाबा वॉचथि‍ वेद पुरान
नाना पढ़थि‍ नेवाज कुरान
नानी मुल्‍ला जीसँ पूछि‍ रहल छौ हाल बावू गै।
नाना भोरे भगला बाहर
नानी सॉझे पहुँचलि‍ ठाहर
ई सभ कहए आएल वि‍द्याधर आ लाल बावू गै।
                       

वंदना
(बाल साहि‍त्‍य)    
अम्‍ब, अहाँक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी?
समुचि‍त शब्‍द ने आबि‍ रहल अछि‍, सप्‍तक स्‍वरालाप नहि‍ पाबी।।१।।
तोरेमे स्‍ति‍त्‍व बनल, तोँ रखलह जठरक उमड़ल सरमे
रहल एहब हम कमल बनल, नि‍ष्‍चय रसभरल सुशील घरमे।।
जन्‍मए काल नाल लागल छल-तकर प्रणाम जनौलनि‍ बाबी।।
अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुर गीत कोना हम वालक गाबी।।२।।
टूटल गँट, पॉंक छूटल, दल गमकि‍ गेल महमह गहवरमे
सुनल देवि‍, ताेँ सूँधि‍ लेलह, संतुष्‍ट भेलहुँ, छल हास अधरमे
आइ अहॉंक नि‍रमाल बनल छी खसल, हमर चलि‍ गल नवावी।
अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम वालक गाबी? ।।३।।
दुर्दिन बनि‍ बटबीज खसल, जनमल, बढ़ि‍ गेल, वि‍शाल बनल अछि‍
आलि‍ंगन-अपवर्ग, अंकक स्‍वर्ग, मर्त्‍यपद छोड़ा चलल अछि‍
कहह कहह देवि‍, कि‍ए, एहि‍ कुलकुठारसँ छह वेदावी?
अम्‍व, अहॉंक महि‍माक मधुर वर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।४।।
नव-मासक अवि‍राम भारकेँ, कएलह वहन मधुर मुस्‍कीसँ
हमरा ठोरक तरल मैल लगलह प्रि‍यतर चाहक चुश्‍कीसँ
फाड़ि‍ दैह वरू आइ जननि‍, हम तोरे देहक पत्र जवावी?
अम्‍ब, अहॉंक महि‍माक मधुरवर गीत कोना हम बालक गाबी? ।।५।।

१.राजदेव मंडलक ४टा कविता२. विद्यानन्द झा (विदू)- हमर मिथिला

राजदेव मंडलक चारि‍टा कवि‍ता-


1)बघनखा

कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा
जतए देखू ततए बघनखा
पत्‍नीक आँखि‍मे नोर भरल
ताहि‍मे सँ खसल बघनखा
कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा
रोटी तोड़ि‍ मुँहमे लेलहुँ
पड़ल दाँत तर बघनखा
कतउ कि‍छु बचल सुच्‍चा
वस्‍त्र झाड़ि‍ कऽ पहि‍रैत काल
भट्ट दऽ खसल बघनखा
कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा
सुतल छलहुँ घरमे
आकि‍ चारसँ चमकैत
झनाक दऽ खसल बघनखा
कतउ नहि‍ कि‍छो बचल सुच्‍चा
मि‍त्रक बड़का कुरतामे
बटनक बदला बघनखा
कतउ नहि‍ कि‍छु बचल सुच्‍चा
वएह देखि‍ रहल छी सर्वत्र
कि‍ हमर आँखि‍ए
बनि‍ गेल बघनखा?

2)  रँगक खोज-

फाटल वस्‍त्रकेँ सीबैत
चौन्‍हि‍या गेल चक्षु
धड़फड़ीमे गड़ि‍ जाइत अछि‍
सुइया
अपनहि‍ हाथमे
आ चाटि‍ लैत छी
स्‍व रक्‍तकेँ
जाहि‍सँ लगबैत छी- अनुमान
दोसर शोणि‍तक स्‍वादकेँ
बि‍सरि‍ ओहि‍ पीड़ाकेँ
पुन: लगबैत छी चेफड़ीपर चेफड़ी
बदलि‍ गेल वस्‍त्रक रँग
भऽ गेल अनचि‍न्‍हार
लगैत अछि‍ जेना
कतेको रँगक झंडा
टाँगल हो एकेठाम
तइओ चला रहल छी काज
मुदा भऽ जाइत अछि‍ लाज
कहि‍योकाल- कतेको जोड़ी आँखि‍क
व्‍यंग्‍यात्‍मक तीरसँ
भऽ जाइत बि‍द्ध
तैं घरे मध्‍य नुकाएल रहब
हमरा लगैत अछि‍ नीक
कि‍न्‍तु पेटक आगि‍
नहि‍ रहए दैत अछि‍- नि‍चेन
अवश भऽ कऽ नि‍कलि‍ गेल छी
लाल रँगक खोजमे
जाहि‍मे रँगे देलासँ
चि‍तकबरा खण्‍ड सभ
भऽ जाइत एक्के रँग
तबे टूटत
हमर हीन भावनाक जाल।

3) कंटकमय नवनीत

हमरा सम्‍पूर्ण शरीरमे
जनमि‍ गेल अछि‍
पैघ-पैघ बि‍खाह काँट
लोक सभ पड़ा जाइत अछि‍
हमरा देखतहि‍
कि‍नको नहि‍ छूबि‍ सकैत छी- सि‍नेहसँ
स्‍पर्श करैत छी- जि‍नका एकोबेर
ओ बोमि‍या उठैत अछि‍
प्रेमभाव बनि‍ जाइत अछि‍- बैरीभाव
अपनहुँ एक अंग दोसरसँ
होइत अछि‍ स्‍पर्श तँ
मन सि‍हरि‍ उठैत अछि‍
कऽ लएतहुँ- आत्‍मघात
कि‍न्‍तु सेहो नहि‍ कऽ पाबैत छी
जि‍नगीक जहर
घोरि‍-घोरि‍ पीबि‍ रहल छी
बचल अछि‍ एक अंग
नि‍ष्‍कंटक नवनीत सन
धुकधुककाइत छातीमे
तकरहि‍ देखैत जीवि‍ रहल छी
आसहि‍पर।


4) लाज


नि‍रलजकेँ ने लाज पेट भरलासँ काज
देखि‍ रहल छी मि‍ताकेँ कि‍रदानी
बदलि‍ गेल ओकर चालि‍ आर-वाणी
बरदाइससँ बाहर कऽ रहल- मनमानी
लगौलक एहेन फानी
जे लड़ि‍ रहल छी दुनू परानी
परेमक गाछ सुखा गेल
मन पुरा दुखा गेल-
अपन लाभ अनकर हानि‍
की करए चाहै छल से नहि‍ जानि‍
तइयो इमानदारीक पहि‍रने खोल
बजैत अछि‍ नीक नीक बोल
आइ हम एकर खोलि‍ देबै पोल
दसगोटेमे कोना ठाढ़ अछि‍ लफंगा
कऽ देबै एखने नंगा
खि‍सि‍या कऽ बढ़लहुँ ओकरा दि‍श
कऽ देबै नॉंगट- ऍंड़ीसँ देबै पीस
हाय रौ तोरी ई कोन बात
सभ भऽ गेलाह एके साथ
ठि‍ठि‍या कऽ सभ हँसि‍ रहल अछि‍
हमरेपर व्‍यंग्‍य कसि‍ रहल अछि‍
सभ बुझौलक तब असली बातकेँ जानि‍
सोचि‍ वि‍चारि‍ लेलहुँ मानि‍
नहि‍ होइत अछि‍ नीक बेसी रि‍श
सोचैत देखलहुँ अपना देह दि‍श
गुदरी लटकल बनल छी भि‍खमंगा
हम तँ अपनहि‍ छी पूरा नंगा
भीतरसँ सभटा गप्‍प जानि‍
लाजे भऽ गेलहुँ पानि‍-पानि‍।
 २.
विद्यानन्द झा (विदू)
पिताक नाम- स्व. रामशंकर झा, जन्म तिथि-20/01/1966, शैक्षणिक योग्यता-एम. ए
ग्राम-केवटा, पो.-शुभंकर पुर, जिला-मधुबनी(बिहार)
हमर मिथिला
उत्तरमे हिमराज विराजथि, दक्षिण सुरसरि गंगा
पश्चिममे बहि-बहि गंडकी, पूर्व कौशिकी-बंगा
बीच वसल छथि सुन्दर मिथिला, आउ हिनक गुणगाण करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥
घर-घरमे छथि एतए गोसाओन, तुलसी हर आँगनमे
देवालय शिवालय अछि, हर गामक प्रांगनमे
छथि धन्य हमर ई मातृभूमि, लय रज-कण हिनक प्रणाम करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझ, मैथिलक सम्मान करी॥

सीता उपजलि जाहि भूमिसँ, जनक जनिक सम्राट भेलाह
शिव-धनु राखल जाहि भूमिपर, परशुराम प्रहरी भेलाह
स्वर्गसँ सुन्दर मिथिला धाम, आउ हिनक हम मान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥

रचल स्वयंवर जाहि भूमिपर, विश्वामित्र संग शिष्य एलाह
टूटल धनु टंकार जतय भेल, परशुराम लहड़ैत एलाह
किन्तु सुनि मृदुलवाणी जंह मुनिवर, क्रोध त्यागि शीतल भेलाह
रामवरण कएलन्हि जंह सीता, आउ तिनक हम ध्यान धरी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥

विद्यापति के गाम ई मिथिला, शिव उगना बनि चाकर भेलाह
जंह भगवतीक अनुकम्पा सँ कालिदास विद्वान भेलाह
अछि मधुर प्रेम के सागर मिथिला, आउ एकर रस पान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥

अछि विविध विधा के गहवर मिथिला, किंतु उपेक्षित भए रहल
अछि चूक अपन या शासन के, उत्थानक मार्ग अवरूद्ध रहल
आउ एहि पर मनन करी आओर हिनकर उत्थान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी मैथिलीक सम्मान करी॥

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित।
पोखरिक कमल
सरकारी कर्मचारी कियैक निठल्लू
जखन कखनो ई प्रश्न उठल
 एक व्यक्‍ति की करत नीक भऽ
जतऽ सब भ्रष्ट अछि भरल
सुनैत सुनैत अहि जवाब केँ
रहैत छलहुँ मोने मोन कुहरल
दलदल सन दूषित पानिमे
कीट पतंग सँ मचल हलचल
शीतल कोमल पल्लव समेटने
मोना मुस्काइत अछि कमल
ओ गुणे की जे अपन महत्ता
सबमे प्रमाणित नहि कऽ सकल
 मोजर नहि ओहि सिद्धान्तक जे
परीक्षाकाल नहि अविचलित रहल
 १.जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता २.डॉ. शेफालिका वर्मा- विधाता
जगदीश प्रसाद मंडलक दूटा कवि‍ता-

1) फुसि‍

एहनो फुसि‍ बजै छी
जइ ढेरीपर बैसल छी
ओ कहै छी, कि‍छु ने अछि‍
अकर्म-वि‍कर्मक बात ि‍बनु
मुँह उघारि‍ बजै छी
एहनो फुसि‍ बजै छी
लेश मात्र जे अछि‍ नहि‍
तेकरा ढेरि‍ बुझै छी
ब्रह्मलोक, शूरलोक, देवलोकक
सदति‍ बात बजै छी
एहनो फुसि‍ बजै छी।

2) कमलाधार

कमल-नयनसँ उगैत अश्रुकण
संग मि‍लि‍ धार बनल छी
समरस भऽ रंग-रूप बि‍सरि‍
नयन-कमल बनल छी
काटि‍-खोंटि‍ एकबट्ट केनि‍हारि‍
करत उकठपन काम
सभ मि‍लि‍ सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ
जपलौं कमला नाम।
 २.
    डॉ. शेफालिका वर्मा
 विधाता
हम नारी छी , ई अपराध हमर ते नहि
हँ हम नारी छी.
अहांक लेखनी हमरा संस्कृतिक
उत्कर्ष पर  पहुंचा देलक धरतीक प्राणी नहि
देवी धरि बना देलक
किन्तु, अहाँ बनाय देलों
पातालक छाती विदीर्ण करय वाली
एकटा चीत्कार
प्रकृति-पटी पर उमढ़ैत कोसीक हाहाकार !
ठोर पर अबैत ऐछ कखनो
शरद-प्रात, कखनो
पूसक सर्द राति ;
दर्पण में जखन जखन अपन चेहरा देखैत छी
अचक्के सीताक व्यथित परछाही
पलकक कोर पर थरथरा जैत अछि
हमर आँचर चान तारा से नहि
राहु-केतु से भरी जायत अछि.
मुदा,
आब नै , आब हवा छुवी नारी के मैल
नै करत
हाड मांसक एही देह में किछ नै
जकरा से अहाँ बनल छी , हम बनल छी  
प्रकृति कुसुमार बनल अछि
तखन दोषी हमही किएक ?
अहाँ निक हमहू निक
आब जमाना बदलि गेल , नारीक अंतर में
उतरि गेल एकटा तीव्र ,प्रखर रौद पसरी गेल.
घर-बाहर के जगमग करैत
आकाश छुवाक परिकल्पना से सिहरैत
परंपरा-अपरम्पारा के ध्वस्त करैत
नव निर्माणक अकास में नवल सूर्योदयक
रंग भरैत
नारी आगू बैढ़ रहल अछि
'अहम् ब्रह्मास्मिक' भाव स ग्रसित हमर
समर्पण अहाँ देखि नै पबैत छी
सब किछ  सहैत जनम अहीं के देत छी .
सृजन हम  करैत छी 
विधाता अहाँ बनैत छी , तैं आय 
पुरुष-विमर्श छोडि, नारी-विमर्श क गप करैत छी .... 

 .सतीश चन्द्र झा-चुनाव/ भाषा आ राजनीति २. नन्‍द वि‍लास राय-अकाल


सतीश चन्द्र झा
राम जानकी नगर
मधुबनी

 
चुनाव

छल केहन हवा आयल उदंड।
तृष्णाक आगि पसरल प्रचंड।
सभ जाति धर्म केँ फेर बाँटि
देलक समाजक खंड- खंड।

सत्ता सुख,धन बल मान लेल।
निज स्वार्थ धर्म सम्मान लेल।
विष घृणा द्वेष सगरो द
सभ भोट समटि क ससरि गेल।

उन्मादक तेज हवा उठलै।
उधियाकककरा की भेटलै ?
छुच्छे बातक जल बृष्टि छलै
पोखरि इनार सौसे भरलै।

बड़का कें कहि कमधुर बोल।
छोटका लोकक जड़ि गेल टोल।
अछि कतेक तुच्छ मानव एखनहुँ
जीवन कें नहि छै कतौ मोल।

कहियौ ओकरा की हेतै लाज।
नहि भेल गाम मे कतौ काज।
अछि बाट ताकि कथाकि गेल
बासठि बरखक जीवित समाज।

अछि राजनीति मे के सुयोग्य।
अस्सी प्रतिशत एखनहुँ अयोग्य।
ओ कोना हमर उद्धार करत
ओकरा लए छै ई देश भोग्य।




जड़ि गेल झड़कि ककतेक देह।
मरि गेल हृदस सँ प्रेम स्नेह।
देलक की हमरा प्रजातंत्रा ?
दुख विपदा अछि ओहिना सदेह।

जनमत अधिकारक मोल भाव।
घर घर छिड़ियायल बैर भाव।
सभ बेर कतेक बलिदान लेत
अछि रक्त पिपासू ई चुनाव।
 
भाषा आ राजनीति

अछि घातक आतंकबाद सँ
बढ़ि कई भाषा के झगड़ा।
कखन कतय ई आगि लगायत
कोना एकर पहिचानब चेहरा।

अछि रहस्यमय राजनीति के
क्रिया कलाप कर्म मन वाणी।
छापि रहल अछि पत्र पत्रिका
प्रतिदिन एकरे एक कहानी।

कखनो बाँटत जाति जाति कें
कखनो सीमा शरहद भारी।
कखनो बात धर्म के कहि क
लगा देत सौंसे चिनगारी।

कतेक होइत दै चेहरा एकरो
जानि सकल नहि कियो एखन धरि।
सपथ लैत अछि सेवा धर्मक
समटि लेत धन आँजुर भरि भरि।

स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे
कते आओर लज्जित क्षण आयत।
हिन्दी पर लागल कलंक जे
कोना एकर इतिहास मेटायत।

सीखि लेथु सभ भूखल जन- जन
अलग अलग सभ प्रांतक भाषा।
तखने भरतनि पेट आब नहि
रहलै हिन्दी देशक भाषा।



सत्ता पक्ष विपक्ष कान मे
कोना तूर छथि धसूतल।
सीखि रहल अछि आइ मराठी
टैक्सी चालक भय सँ कलबल।

जतय देश मे छै एखनो धरि
लाखो लोकक रोटी सपना।
सड़क कात छतहीन जिन्दगी
कंकर पाथर घास बिझौना।

की मतलब छै ओकरा की छै ?
भाषा,भेष कतय की बान्हल।
बिना परिश्रम सँ औतै नहि
भात दालि थारी मे सानल।

जनहित के कल्याण आब नहि
राजनीति सँ रहलै आशा।
छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ
सत्ता सुख सबकें अभिलाषा।

भले लेथु ई शपथ मंच पर
विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे।
नहि बदलत तकदीर देश कें
जन जन ठाढ़ रहत आशा मे।
............
नन्‍द वि‍लास राय-

अकाल

पानि‍ वि‍ना घास-पात
सभ जरि‍ गेल
धानक वीया सभ पीयर,
भऽ भऽ मरि‍ गेल।

गाछी-वि‍रछीक सबहक
पात झरि‍ गेल
बाजारमे जि‍नि‍स सबहक
दाम चढ़ि‍ गेल।

छोट-पैघ कि‍सान सभ
पि‍टैत अछि‍ कपार
ओकरा उपर टूटल
दुखक पहाड़
लोक सभमे मचि‍ गेल
बड़का हाहाकार।

खेत सभमे फाटल
नम्‍हर-नम्‍हर दरारि‍
धरतीकेँ रूपकेँ
देलक वि‍गाड़ि‍।

ताल-तलैया सुखले
रहि‍ गेल,
गोरहो खेत सभ
परते पड़ि‍ गेल।

गाममे नै इज्‍जत ककरो
बचत आब,
झुण्‍डक झुण्‍ड लोक सभ
वि‍दा भेल दि‍ल्‍ली-पंजाव।

बर्खा नहि‍ भेल
समए भेल वि‍कराल
सभ बजैत अछि‍
रवि‍-राइ बुनैले
खेतमे नै अछि‍ हाल
मालोजाल भऽ जएत
जीक जंजाल
पड़ि‍ गेल अकाल।।


१.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता

मृदुला प्रधान
कविता
मिथिलाक माटीमे,
मधु -श्रावानिक,
हास- परिहास एवं मिठास,
घोरैत- घोरैत,
कखन एही भाषा मे 
लिखै लगलों,
बूझिये नईं पड़ल,
बूझिये नईं पड़ल......
घर-गृहस्थिक मथ-भुक्की मे
दही- चुड़ा-बैगनक भार सँ
प्रभावित ,
जमबैत,कुटैत,तौलैत,
कोन बेर 
कागज़-कलम,
माथ पर सवार
भऽ गेल .
समदाउनिक गीत 
सुनि कऽ ,
विद्यापतिक कविता 
पढि कऽ,
खवासक अनुपस्थिति मे 
चुल्हा पजाड़ी कऽ,
अदौड़ी,तिलौडी,दनौड़ी,
पाड़ि कऽ,
कखन कविता पाड़य लगलों,
बूझिए  नईं पड़ल.........
सावन-भादोक
झींसी सँ नुका कऽ,
नेना- भुटका के कोर मे,
बैसा कऽ,
गोनू झाक गप्प सँ
सभकेँ हंसा कऽ,
पितारिया कजरौटा मे काजर,
सेका कऽ ,
कखन कविता सेकय लगलों,
बूझिए नईं पड़ल............
भिनसरहे भानस-भात
पसाइ कऽ,
तीमन-तरकारिक कठौती ,
सजाइ कऽ,
अंगना-ओसारा-चबूतरा,
बहारि कऽ,
गमगम घीउ मे,
सोहारी छानि कऽ,
कखन कविता छानए लगलों,
बूझिए नईं पड़ल..........
मूल बात ई
जे एही भाषाक,
विदुषि त नहिंए छी
किन्तु
घोर-मठ्ठा करैत-करैत,
अनचोक्के,
'ई-विदेह' सँ परिचय,
भऽ गेल,
लोकक उद्गार
चमत्कारिक साबित भेल,
आ देखिते-देखिते,
मिथिलाक पैघ समाजक
कोन मे,
हमरो
प्रविष्टि भऽ गेल


उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता-

बाधा-

वि‍दा भेल मंगला पूभर
कान्‍हमे टँगने अछि‍ साइकि‍ल बाउलपर
कहुना कऽ लगि‍चेलक
लटपटाइत पहुँचल
धारक कछेरमे

बि‍नु पानि‍क अछि‍ धार
चक-चक करैत अछि‍ बाउल चारूकात
नाउ नहि‍ बाउल देखि‍ भेलै
मंगलाकेँ थोड़े होश एलै
अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै
आब टपैमे कोनो नइ हएत बाधा
पहुँचबे करब सरायगढ़क ओइपार
मुदा,
मंगला लटकि‍ गेल घाटपर
नजरि‍ दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर

अपन जेबीमे देने हाथ
तकैए चारू कात
आब की करबै हौ बाप
ई तँ लेबे करतै घाटी
जेना लगैए एकरा उठल छै आँति‍
सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ
नै देबै तँ देत ई रबारि‍

सएह भेल मंगला घुरि‍ गेल
पछि‍मे मुड़ि‍ गेल।

भोगी
नाँच करए बानर
चाउर खाए बबाजी
बीचमे तैं अछि‍ सरोकारी
वि‍कासक नाओपर भऽ रहल अछि‍ नाँच
मानसि‍कता, मानसि‍कता, मानसि‍कता
पसरल अछि‍ चारूकात

नीक बात
कि‍एक नै हुअए वि‍कास
बि‍क रहल अछि‍ चारूकात
ब्‍लड प्रेशर आ डायबि‍टीजक गोली
संगे-संग
तैयो बबे बनल छथि‍ ति‍यागी
भरि‍ जीवन भोजन केलनि‍ बैसारी
ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि‍ बेपारी
भोग करैत-करैत भेल छथि‍ अघोर
तइपरसँ रटना लगेने छथि‍ ताबड़तोर
स्‍वर्ग जाए चाहैत छथि‍ सोरफोर
हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा
हम सबदि‍न रहलौं मधुशाला
बनलै तँ अछि‍ वि‍चारशाला
जइमे लटकल अछि‍ बड़का ताला।

कवि‍ता

हम नइ बि‍सरब
अपन सनातनकेँ
नहि‍ बि‍सरक चाही अहुँकेँ
दोस बनब आि‍क दि‍याद
आि‍क करब खाली हाल-चाल
सबाल भए गेल अछि‍ तैयार
     अहाँ नै बुझै छि‍ऐ
     बनि‍ जाउ दि‍याद
     पाँति‍ राखू चारि‍ याद
     नै यौ दि‍याद अहाँ करू कि‍छु रि‍याज
     यौ दोस आहाँ आनू अपन होश
     कए लि‍अ स्‍वीकार
     हे यौ दि‍याद
हि‍या जूडि़ पड़ल
दि‍याद सुनि‍ पड़ल
फाँट बीचमे आबि‍ टूटि‍ पड़ल
हट, हट, हट नै तँ घसक
     फाँट करए कि‍लोल
     दुनू अपन ठाम बेहोश
     मुदा,
     तैयार भेल दुनू सोर-फोर
     कल्‍याण-ले नहि‍
     अपन-अपन फाँट-लए
१.इन्द्र भूषण २.राजेश मोहन झा
इन्द्र भूषण
 
१.हमर नगरक दास्तान

चहुँ ओर खामोशी छल
,
पसरल रहै विराना।
ताल-तलैया लागे ओछाउन सन
,
रहै कोसीक धार सिरहाना।
सब राति होए बदमाश सबहक आगमन
,
गलि-कुची लागै बिया-बान सन।
होरी खेलए पड़ए कादोमे
,
लागै दीवालियोक राति अन्हार सन।

मुदा हिम्मत नहि हारलक नगरक लोगसब
,
भरोसा रहए सबक अपन-अपन बाँहि पर।
गमक बरियाति लऽ चलल खुशीक विवाह
,
किएक तँ रहै ओकरा सभक उजड़ल चमन बसाएब।

चारूकात तटबंध बनल
,
सलिका सँ शहर बसल
,
विद्यालय
, महाविद्यालय,
कारागार
, न्यायालय,
भंडारगृह
, चिकित्सालय,
संचार केन्द्र व चित्रालय
सब निर्मित भेल।

ई शेष भारते नहि पुरा विश्व सँ जुटल
,
आब एतऽ भेटैत अछि सुख-सुविधाक हर समान
,
एकर अछि एक अपन पहचान।

जे क्यो राखत भरोसा अपना पर
,
जी-तोड़ करत मेहनत
,
कठिनाई सँ नहि डरत
,
भरत सफलताक पैघ उड़ान
,
बस यैह कहैत अछि
, हमर नगरक दास्तान-
२.एना किएक होइत अछि?”

जखन करऽ चाहै छी काज कोनो ओहन
जकरा उपमा भेटै
आकाश सँ तारा तोरनाइ जैसन
एक-एक टा डेग उठाबै छी सम्हारि कऽ
उपर चढ़ि जाएत छी कतेको पायदान तक
तखन आबैए एकटा झौंका बिहाड़िक
उड़ा लऽ जाए नींव हमर अरमानक
बाँचल अछि जे किछु आशाक तिनका
सेहो बिखड़ले सन लगैत अछि
एना किएक होइत अछि
?

कतेको बरख बित गेल
हम सपना देखनाइ छोड़ि देलउँ
जँ देखबो करब तँ
, कथुक?
हमर जिनगीमे
एहन कोन हसीन पल बीतल
मुदा तैयो जँ भूलोसँ
कौखन कोनो ख्वाब आबी तँ
ख्वाब शुरू भेल नहि कि
नेत्र खुजि जाइत अछि
एना किएक होइत अछि
??
सौचैत छी
नव दिनक शुरूआत
नव उत्साह सँ करब
सदिखन नव आशाक संग चलब
मुदा पुरनके दिनमे
एक गोट नव निराशा
सोझामे आबि जाइत अछि
एना किएक होइत अछि
???


२.

राजेश मोहन झा

 
पलायन

प्रश्‍न- औ बावू अहाँ कतए रहैत छी?
उत्तर- भरैए पोख जतए ओतए रहैत छी।
प्रश्‍न- ओ कोन ठाम अछि‍, कोन देश अछि‍
      की भाषा अछि‍ की भेष अछि‍?
उत्तर- ने कोनो परि‍चए नहि‍ कि‍छु पहि‍चान
     आन देश थि‍क भाषा आन
     देशक नाम सौराष्‍ट्र जुनि‍ बूझव सौराठ
     कतेक राज लाठी नेने
     करैत छथि‍ अपन मोनक राज
     लोकक व्‍यथासँ हुनका नहि‍ मतलव
     मानवतासँ नहि‍ कि‍छु काज
प्रश्‍न- कि‍ए गेलहुँ परदेशी भेलहुँ
     छोड़ि‍ कऽ अपन माटि‍- ई मि‍थि‍ला
उत्तर- नहि‍ काज भेटैए नहि‍ पेट भरैए
     मि‍थि‍ला आव बनि‍ गेली शि‍थि‍ला
प्रश्‍न- शस्‍य श्‍यामला धटा अछि‍ अपन
     खूब मेहनति‍ करू खूब उपजा
उत्तर- सभटा सुन्न कए देलनि‍ अछि‍ कोशी
     ककर सेवा करू की उपजा?
     बेश तँ जाइत जा छोड़ कऽ गाम
नि‍र्णए- मुदा! नहि‍ वि‍सरव अपन भाखा
     अपन ठाम आ अपन गाम।।।
                  
                  

 १.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘-कक्का औ २.किशन कारीग़र- किडनी चोर

शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।

 
कक्का औ (बाल साहित्य)-शिव कुमार झा टिल्लू
सिबू मरसएब बड़ मरखाह छथि
छक्का छोड़ौलनि कक्का औ
दाँत कीचि दुनू भौं सिकुड़ाबथि
हाथमे नरकटिक सटक्का औ...
भूगोलक पहरि संस्कृत वचै छथि
क्षणे-क्षण नोंइस लऽ हाँफी छिकै छथि
पंचतंत्र पर करथि टिटम्भा
विष्णुशर्मा सँ नमछर खम्भा
बरहर गाछ तर गदहा बना कऽ
पाँछासँ मारथि धक्का औ...
जखन कोनो छन्दक अर्थ पुछै छी
कहै छथि कुकुर पर लेख लिखें रौ
कहू तँ कोना हम एक्के पहरिमे
रंग-बिरंगक बयना सीखू
हाथ मचोरि पीआठ पर देलनि
बज्जर सन दू मुक्का औ...
मुरुखे रहब आ महिस चराएब
कहियो नहि ओहि इसकुल जाएब
एहन राकस सँ जान छोड़ाउ
भरि जिनगी अहँक गुण गाएब
बजै छी किछु जौं नजरि झुका कऽ
खिसियाबथि कहि भूतक्का औ...
 
२.

किशन कारीग़र


परिचय:- जन्म- 1983ई0 कलकता में
,मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’ , माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी-ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक, आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं लघु कथा,कविता,राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी।शिक्षाः-एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।




किडनी चोर।


देखू-देखू केहेन जमाना आबि गेल
मनुखक हृदय भऽ गेल केहेन कठोर
सभ सॅं मुॅंह नुकौने
, चुपेचाप
भागि रहल अछि एकटा किडनी चोर।

डॉक्टर भऽ के करैत अछि डकैति
कोनो ग़रीबक बेच लैत अछि किडनी
पुलिस तकैत अछि ओकरा इंडिया मे
मुदा ओ परा जाइत अछि सिडनी।

कोनो ग़रीबक किडनी बेचि कऽ
संपति अरजबाक
, केहेन ई अमानवीय भूख
केकरो मजबूरीक फायदा उठा कऽ
डॉक्टर तकैत अछि
, खाली अपने सूख।

केकरो जिनगी बॅंचौनिहार डॉक्टर
, रूपयाक लोभ में
बनि गेल आब किडनी चोर
छटपटा रहल अछि एकटा गरीबक करेजा
कनैत-कनैत सूखा गेलै
, ओकर ऑंखिक नोर।

मनुख आब केहेन लोभी भऽ गेल
आब ओ किडनी बेचब सेहो सीख गेल
राता-राति अमीर बनबाक सपना देखैत अछि
रूपया खातीर ओ किछू कऽ सकैत अछि।

मनुख भऽ के मनुखक घेंट काटब
कोन नगर में सिखलहुॅं अहॉं
आबो तऽ
, बंद करू किडनी बेचबाक धंधा
मानवताक नाम सगरे घिनेलहुॅं अहॉं।

कोनो गरीबक किडनी बेचि कऽ
महल अटारी बनाएब उचित नहीं थीक
एहेन डॉक्टरीक पेशा सॅं
, कतहू
मजूरी बोनिहारी करब बड्ड नीक।

हम अहिं के कहैत छी
, यौ किडनी चोर
एक बेर अपने करेजा पर
, छूरी चला कऽ देखू
कतेक छटपटाइत छैक करेजा
एक बेर अपन किडनी बेचि कऽ तऽ देखू।
 

 विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१.श्वेता झा चौधरी २.ज्योति सुनीत चौधरी

श्वेता झा चौधरी
गाम सरिसव-पाही, ललित कला आ गृहविज्ञानमे स्नातक। मिथिला चित्रकलामे सर्टिफिकेट कोर्स।
कला प्रदर्शिनी: एक्स.एल.आर.आइ., जमशेदपुरक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ग्राम-श्री मेला जमशेदपुर, कला मन्दिर जमशेदपुर ( एक्जीवीशन आ वर्कशॉप)।
कला सम्बन्धी कार्य: एन.आइ.टी. जमशेदपुरमे कला प्रतियोगितामे निर्णायकक रूपमे सहभागिता, २००२-०७ धरि बसेरा, जमशेदपुरमे कला-शिक्षक (मिथिला चित्रकला), वूमेन कॉलेज पुस्तकालय आ हॉटेल बूलेवार्ड लेल वाल-पेंटिंग।
प्रतिष्ठित स्पॉन्सर: कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स, टिस्को; टी.एस.आर.डी.एस, टिस्को; ए.आइ.ए.डी.ए., स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, जमशेदपुर; विभिन्न व्यक्ति, हॉटेल, संगठन आ व्यक्तिगत कला संग्राहक।
हॉबी: मिथिला चित्रकला, ललित कला, संगीत आ भानस-भात।
 
डोली कहार
सासुर जाइत काल नव कनियाँक मोनक दुविधा- नैहरक छुटैक दुख आ नव जीवनक उत्साह। ई सभसँ अनजान कहार सभ उमंगपूर्वक कनियाँकेँ सासुर पहुँचाबैत...

२.

ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह अर्चिस्प्रकाशित

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...