Monday, September 13, 2010

'विदेह' ६५ म अंक ०१ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६५) PART III



जगदीश प्रसाद मंडल-
अतहतह कथा शेषांश-

गाँजा मंचसँ जोड़ि‍रा शुरू भेल- एक दि‍स खेले कृष्‍ण कन्‍हैया, एक दि‍स राधा जोड़ी हो।‍ तँ दोसर ताड़ीक मंचसँ महराइ धुन- कि‍सकी मैया बाधि‍न जनमे जो रूदल पर फेरे हाथ।‍ तेसर मंचसँ बोल डान्‍स (ट्युष्‍टि‍) स्‍टेज मचमचबैत।
  सात बजेक समए। चौकपर गदमि‍शान हुअए लगल। रवि‍शंकर चाह पीबैले अबैत रहथि‍ कि‍ दस लग्‍गी पाछुएसँ चौकक मस्‍ती देखलनि‍। गाछक नि‍च्‍चाँमे ठाढ़ भ? गेलइ जे सौंसे गाम नाचि‍-गाबि‍ रहल अछि‍। मुदा लगले जना पवन सुत ि‍कछु कहि‍ देलकनि‍। मुस्‍की दैत भुटुकि‍ लालक चाहक दोकान सोझे पहुँचलाह। रवि‍शंकर भुटुकि‍ लालकेँ पुछलखि‍न- भुटुकि‍ भाय, बड़ देखै छि‍यह कि‍ बात छि‍ऐ?
  पहि‍ने चाह पीवू ने। गप कतौ पड़ाएल जाइ छै। नि‍चेनसँ चाहो पीवू आ गप्‍पो सुनू।‍
  कनि‍यो तँ‍ इशारोमे कहह।
  एतबे बुझि‍ लि‍अ जे खच्‍चरपुर बलाकेँ मुता-मुता भरेलौं।‍
  भुटुकि‍ लालक बात सुनि‍ रवि‍शंकर अचंभि‍त भऽ गेलाह जे आखि‍र बात कि‍ छि‍ऐ? तहि‍ बीच झामलाल कहए लगलनि‍- भाय, मास दि‍नक कमाइक फल छी। जड़ि‍येसँ कहि‍ दइ छी। तेंइतीसम दि‍नक गप छी। एक लाल रूपैयाक पार्टीक काज कऽ कए आइले रही। बारहसँ उपर दि‍न चढ़ि‍ गेल रहए। कपड़ा खोलि‍ कलपर बाल्‍टी-लोटा रखि‍ लताम गाछक नि‍च्‍चाँ ठाढ़ भऽ उपर ि‍हयासैत रही। तहि‍काल हि‍रदे काका दछि‍नवरि‍या बाधसँ अवैत रहथि‍। नजरि‍ पड़ि‍ते कहलि‍एन- काका, गोड़ लगै छी। बड़ रौद छै कनी ठंढ़ा लि‍अ। जहि‍ना कहलि‍एनि‍ तहि‍ना ओहो लतामेक गाछ लग आबि‍ गेलाह। लताम देखलाहा आँखि‍ हि‍रदे काका मुँहक सुरखी देखि‍ मुँहसँ नि‍कलल- काका, एना हकोपरास कि‍अए छी। सुखल मुँहक मुस्‍की दैत बजलाह- नै बौआ, नै कोनो। रौदमे सँ एलौंहेँ ने।‍
  दूटा लताम खाउ?
  नै बौआ, नै खाएव।‍
  दूटा अंगने नेने जाउ।‍
  अंगनाक नाओ सुनि‍ औटोमेटि‍क बम जकाँ कखन छाती फाँटि‍ गेलनि‍, से नइ बुझलौं। मुदा आँखि‍सँ टघरैत नोर गालपर चमकए लगलनि‍। मन गरमाएले रहए। कहलि‍एनि‍- काका, जहि‍ना परि‍वारमे भैया, काका, बाबा, होइए तहि‍ना ने समाजोमे होइए। वि‍रान कि‍अए बुझै छी। अहाँ सबहक असि‍रवादसँ कमाइयोक आ दस गोटेकेँ चि‍न्‍हैइयोक लुरि‍ भऽ गेल। बाजू अहाँ कि‍अए एते पीड़ि‍त छी जँ उठैबला हएत तँ जरूर....।‍
  नोर पोछैत काका बजलाह- बौआ, देखैइयेटा लेल बुझि‍ पड़ै छि‍अह जे मनुक्‍ख छि‍अह। मुदा से नइ, मुइल मनुक्‍ख छी। अपनो परि‍वारक रक्‍छा करै जोकर नइ छी। तहन तँ देखा-देखी आँखि‍ तकै छी।‍
  ‍खुलि‍ कऽ बाजू, काका?”
  ‍बौआ, अइ जुगमे हमसब महापापी छी, ि‍कएक तँ भगवान पाँचटा बेटी दऽ देलनि‍। चारि‍टाक तँ कोनो धरानी खेत बेचि‍-बेचि‍ पार लगेलौं। सात बीघाक कि‍सान मात्र पनरह कट्ठापर आबि‍ गेल छी। तेहेन हवा-पानि‍ देखै छी जे ओहूसँ पाँचमक पार लागत कि‍ नै।‍
  हृदए काकाक बात सुि‍न अवाक भऽ गेलौं। जना बकार बन्न भऽ गेल। छाती असथि‍र करैत पुछलि‍एनि‍- कक्का कते खर्च हएत?
  ‍बौआ, गरथाह बात कन्ना बाजब। आँखि‍क नोर पौछैत पुन: बजलाह- बौआ, ई पाँचम बेटी तत्ते दुलारू अछि‍ जे हृदएमे सटल अछि‍। एक तँ कोड़ि‍-पच्‍छू बेटी तइपर सँ माइयक तते सि‍नेही जे सुग्‍गा जकाँ कि‍छु बाजत। जेठकीकेँ दादि‍ये पोसलकै। कहि‍यो ओकरा कोरा कऽ नै लेलि‍ऐ। जखन टेल्‍हुक भेल तखनसँ संगे मेला-तेला लऽ जाए लगलि‍ऐ। छोटकी बेटी माइयक तेहेन दुलारू बेटी अछि‍ जे साइयोसँ उपरे नाओ रखने छथि‍न।‍
  कक्का, छोड़ू ई सब। अपन बहीन बुझि‍ वि‍आह पार लगा देब। जेहने जेठकी बेटीक परि‍वार अछि‍ तेहने परि‍वार भजि‍आउ। खर्चक चि‍न्‍ता जुनि‍ करब। ई पहि‍ल दि‍नक गप छी।‍
     ओना तँ गामे-गाम अतहतह होइते अछि‍ मुदा खच्‍चरपुर बलाकेँ तँ कोनो सीमे-नाङरि‍ नै छै। अइ साल पाँचटा ि‍वआहमे अभरल। तते दोस-महीम भऽ गेल अछि‍ जे एकटा वि‍आहक खर्च नौत पुराइमे होइए। तइले नइ कोनो। दस सेरे नइ नि‍तराइ दस सगे नि‍तराइ। पाँचो वि‍आहमे ओकरा सबहक खच्‍चरपनी देखि‍लि‍ऐ से एँड़ि‍सँ टि‍कासन तक लेसि‍ देने अछि‍। मुदा कोनो वि‍आहमे कोनो समाज (बरि‍आती-घरवारी) तँ नइ छलौं तेँ आँत-मसोसि‍ कऽ रहि‍ गेलौं। गर चढ़ा खच्‍चरपुरेमे कथा ठीक केलहुँ। कक्कोकेँ पसि‍न भेलनि‍। लेन-देन तँइ भऽ गेल। समए बना ओहू गामक समाज आ अपनो समाजक बैसार केलौं। बैसारेमे बजलौं- ‍अखन धरि‍क काज दुनू घरबारीक छलनि‍ मुदा, आब समाजक भऽ गेल। चाहै छी जे आन गाम जकाँ थूका-थूकी वि‍याहमे नइ हुअए। तेँ कि‍छु समस्‍या अछि‍ जहि‍पर अखने वि‍चार वि‍मर्श भऽ जाए। (1) वियाह पद्धति‍क अनुकूल हुअए आकि‍ जयमाला कऽ हुअए। (2) पलाउक चलनि‍ भऽ गेल से मखानक खीर खाएव कि‍ पलाउ? (3) खेला-पीला उत्तर लगले वि‍दा भऽ जाएव आकि‍ आराम कऽ कए?”
     प्रश्‍न सुि‍न चुप्‍पी पसरल। जहि‍ना चुल्‍हि‍मे खोरनासँ जारन घुसकाएल जाइ छै तहि‍ना घुसकौलौं- कन्‍यागत समाजक कन्‍हापर भार देने छथि‍न तेँ समाज चाहै छथि‍ जे आन-आन गाम जकाँ बरि‍याती घरवारीकेँ। नि‍च्‍चाँ देखबए चाहैत आ घरवारी बरियातीकेँ। जहि‍सँ जहि‍ना खेतमे कोनो चीजक बीआ छीटल जाइत अछि‍ तहि‍ना हम सभ झगड़ाक बीआ समाजमे छीटि‍ देने छी। जे दुखद बात छी। नै चाहब जे समाजमे एना हुअए। वि‍याह सृष्‍टि‍क सृजनक प्रक्रि‍याक अंग छी तेँ एहि‍ संग छेड़-छाड़ अनुचि‍त। अपने लोकनि‍ जे कहि‍ देब ओहि‍ अनुकूल वि‍याह हएत। घमरथन शुरू भेल। घमरथनक कारण भेल कि‍छु देखौआ काज आ कि‍छु चोरौआ। मुदा सुमति‍ एलनि‍, कहलनि‍, जे लड़का-लड़कीक वि‍आह सामाजि‍क पद्धति‍क अनुकूल हुअए। ई भार अहाँपर रहल। जहि‍ना कोनो काजक प्रक्रि‍या होइ छै तहि‍ना भोजनक प्रक्रि‍याक अंग अरामो छी। जानल बाज अछि‍ जे नि‍यमि‍त भोजनसँ भि‍न्न भोजन बरि‍यातीमे होइ छै, तेँ आराम आरो जरूरी अछि। प्रात: काल नअ बजेमे चाह-पान खा असि‍रवाद दैत आपस हएब। बरि‍याति‍ये जकाँ गाड़ि‍यो सवारीक ओरि‍यान चाही, मुदा मि‍सति‍रि‍आइ बरि‍यातीक रहतनि‍। पलाउ आ खीर खेनि‍हार दुनू रहताह। बाजा-बूजीक बेवसथा घरवारीक। नै चाहब जे रस्‍ता-बातमे अनगौआँ सभसँ झंझट हुअए। मोटा-मोटी यएह बुझू जे सएक धतपत बरि‍याती रहताह। जि‍नका लेल अहाँ दू-ठाम बेबसथा करब। अहुँ सभ बुझि‍ते छि‍ऐ आ हमहुँ सभ बुझि‍ते छि‍ऐ। एक भागक जे बरि‍याती रहताह हुनका लेल जहि‍ना भाेजनक वृहत् बेबस्‍था रहत तहि‍ना अरामोक हेबाक चाही। ई नइ जे मधमन्नी जहल जकाँ मूड़ी-पाएर दुनूक पति‍यानी लगि‍ जाए। पुछलि‍एनि‍- जखन दरबाजापर पहुँचबै तखन कोन रूपे शुरू करबै?’ कहलनि‍- जे सभ भाँग खेनि‍हार छथि‍ ओ सभ घरेपर भाँग खेता आ रस्‍ते-बाटमे कतौ झाड़ा-झपटा करताह। पानि‍ परसबसँ शुरू करब एम्‍हर बरि‍यातीक सनो-मान शुरू हएत आ ओम्‍हर आंगनमे वि‍याहक प्रक्रि‍या शुरू हएत। आठ बजे दरबज्‍जापर पहुँच जाएव। दस बजेमे खुआ-पीआ कऽ आराम करए छोड़ देब। हँसैत सभ नि‍र्णए कऽ लेलनि‍। वि‍दा भेलौं।‍
     रस्‍तामे झगड़ाक जड़ि‍ ताकए लगलौं। एते तँ वि‍सवास रहबे करए जे जहि‍ना चोर फँसबैले सि‍पाही घेराबंदी करैत अछि‍ तहि‍ना जाल तँ लगबै पड़त। मन पड़ल दोसक गप। दोस कहने रहथि‍ जे अपना सभ कारोवारी छी तेँ कोट-कचहरीसँ सदति‍ काल बचैक रहैक चाही। नहि‍ तँ अनेरे ओझरा जाएव कारोवार कारोवारे रहि‍ जाएत। मुदा उखरि‍मे मूड़ी देलौं तँ मुसराक डर केने काज चलत। तहन तँ जहाँ धरि‍ संभव हएत तहाँ धरि‍ बँचब। अखनो समाजमे कहाँ कि‍यो खुलि‍ कऽ ताड़ी-दारू करै छथि‍। चोरनुकबा जरूर करै छथि‍। मुदा कि‍ हुनका सभकेँ अपना आँखि‍मे लाज नहि‍ छन्‍हि‍? जरूर छन्‍हि‍। मुदा जे होउ, जि‍नगी भरि‍ जहलेमे कि‍अए नै रहए पड़ै मुदा खच्‍चरपुर बला सभकेँ सि‍खाएब जरूर। तेहेन कऽ नाङरि‍ सुररबै जे इलाकामे मुँह उठाएब मुसकि‍ल भऽ जेतनि‍। दसटा बदमास बेसीसँ बेसी गाममे हएत पचासटा आनि‍ कऽ रखि‍ देवइ। मुदा सि‍खेबै जरूर।
     आठ बजे गामक सीमामे बरि‍याती प्रवेश कऽ गेल हमहूँ सभ साकांच रही। दरबज्‍जापर पहुँचते स्‍वागतक संग बैसारक कार्यक्रम शुरू भेल। दाय-माय वरकेँ अरि‍आति‍ आंगन लऽ गेलीह। बरि‍यातीक बीच प्‍लेटमे फ्राइ कएल मखान पहुँच गेलनि‍। दुनू समाजक (बरि‍आती-घरवारी) बीच मखानक मि‍ठासक संग गप-सप्‍प शुरू भेल। गाममे कते सार्वजनि‍क स्‍थल...., कोन-कोन शि‍क्षण-संस्‍थान...., अस्‍पतालक की स्‍थि‍ति‍...., गाममे कते कि‍सान परि‍वार....., कते नोकरि‍हारा....., जोतसीम जमीन कत्ते...., बोरि‍ंगक संख्‍या कत्ते....., खेतीसँ अलग कारोवारी परि‍वार कत्ते....., कते  परि‍वार गामसँ पलायन कऽ रहला अछि‍ कते दोखतरीपर आबि‍-आबि‍ बैसि रहला अछि‍....। बड़ी जुमा कऽ महावीर जी लंकासँ आम फेकने रहथि‍ से ने तँ खास भेलि‍ अछि‍। मुदा कि‍छु गोटेक मन लगलनि‍। भाँगक मातल मनमे उठए लगलनि‍ जे मखानोक लाबा पानि‍ये पीवि‍ भेल। ओ तँ अपने जि‍नगी भरि‍ पानि‍येमे रहल अछि‍ तँ तइसँ नीक जे दू घोंट बेसि‍ये कऽ पानि‍ पीवि‍ लेब। बि‍ना मुंगबे मन थोड़े मानत। पेटेटा भरने नै ने होइ छै, मनो ने भरक चाही। मुदा फेरि‍ मनमे उठनि‍ जे अखन कोनो उसरि‍ गेल।
     अंगनाक ओसारपर बैसि‍ हि‍रदय काका आँखि‍ खि‍रा-खि‍रा तकैत तँ देखैत पाँचो बेटीक सि‍नेह। जेठकी बहीन माइयक पीठि‍पर अंगनाक चीज-बौसकेँ घर रखैत तँ घरसँ नि‍कालि‍ आंगनमे रखैत। मझि‍ली तँ चारू बहीनि‍क लेधे-गोधक आइ-पाइमे भि‍नसरसँ अखैन धरि‍ लागल अछि‍। सझि‍लि‍येकेँ की कहबै, बेचारीकेँ अखैन धरि‍ लागल अछि‍। सझि‍लि‍येकेँ की कहबै, बेचारीकेँ लगले हाथमे नीपौन देखै छी तँ लगले सि‍नुर-पि‍ठार। चारि‍मकेँ तँ गीति‍हारि‍येक आगू-पाछू करैत-करैत नाको-दम भेल छै। घुमैत नजरि‍ हि‍रदय कक्काक बेटी-जमाएपर गेलनि‍। ओना देखि‍ये कऽ केने रहथि‍ ते देखैक ओ रूप नहि‍ देखैक रूप रहनि‍ मौलाइल गाछक पोनगल ससारि‍मे खि‍लैत फूल देखि‍। हारल मनुष्‍यक जीत। जे कहि‍यो कन्‍यादानकेँ उच्‍च कोटि‍क श्रेणीमे गनल जाइत छल ओ आइ समाजमे बेटि‍याह वंश बुझि‍ वि‍याहसँ वंचि‍त भऽ रहला अछि‍। वाह रे हमर समाज।
     हम अपना काजक पाछू तबाह। पच्‍चीसो काजकर्तापर मलेटरीक नजरि‍। तीन कदम आगू तँ एक कदम पाछु भऽ सावधान। ओना अगुआएल-पछुआएल बरि‍याती समयेपर प्रवेश कऽ गेल छलाह मुदा, समाज दरबज्‍जापर जहाँ-तहाँ छि‍ड़ि‍आएल। दू-चारि‍ मि‍लि‍-मि‍लि‍ अड्डा जमौने। जहि‍ पाछु एक-एक काजकर्ता लागल। ताड़ी जकाँ तँ इंग्‍लीसक गोष्‍ठी नमहर नहि‍ होइत। रंग-वि‍रंगक पीनि‍हार रंग-वि‍रंगक वस्‍तु।
  साढ़े नअ बजे बरि‍याती भोजन कऽ ओछाइन पकड़ि‍ लेखा-जोखा करए लगलाह। हराएल-बरि‍यातीक खोज शुरू भेल। साढ़े दस बजे घरवारी बरयाती बीच समझौता भेल जे जते समए आगू बढ़ि‍ ओहि‍सँ पैछलाकेँ छोड़ि‍ भोजने हुअए। सएह भेल। मुदा कमाल भऽ गेल। भोजन शुरू भेल पेशाव करैले उठब शुरू भेल। पेशाब खोलैबला दवाइ पानि‍मे मि‍ला टीपि‍-टापि‍ कऽ दस गोटेकेँ पीया देल गेल। एक गोटेकेँ देखि‍ छोड़ि देलौं, दोसरोकेँ छोड़ि‍ देलौं। मुदा जहि‍ना चुट्टीक धारी चलैत तहि‍ना जखन शुरू भेल कि‍ बुढ़हा झामलाल सबहक बीच जा कहलि‍एनि‍ जे अखन धरि‍ घरबैया समाजसँ कोनो ति‍रोट भेल हुअए से कहूँ? एक्के-दुइये पान-सात गोटे उपदेश दैत बजलाह- अखन जे हवा-बि‍हाड़ि‍ उठि‍ गेल अछि‍ तहि‍मे अहाँ लोकनि‍केँ धन्‍यवाद दैत छी। हमहूँ सभ यएह गप करै छलौं गणेश जीक भक्‍त सभने छेनाक मि‍ठाइ खाए मुदा ओ तँ अखने लड़ूए खाइ छथि‍। जुग बढ़ि‍ गेने लोको उधि‍या जाएत। जे सुआद खाजा-मूंगवाक अछि‍ ओ डि‍ब्‍बाबला रसगुल्‍लाक हएत। ओ तँ भाँज पुराएव छी। कहलि‍एनि‍- जाधरि‍ अपने लोकनि‍ ऐठाम छी ताधरि‍क नीक-अधलाहक जबावदेह घरवारी हेताह मुदा, अहाँ सभ जे उकठ करब, तहन.....। की भेल, की भेल? दोसर वरियातीक सबहक छि‍छा-बीछा चलि‍ कऽ देखि‍यनु? वामा करे जे पड़ि‍ जे जाँघ कुड़ि‍यबैत रहथि‍ से उठले ने होइन। मुदा कासपरक दहीक ढकार फुर्ती आनि‍ देलकनि सभ कि‍यो उठि‍ दोसर पंडलमे पहुँचलाह तँ देखलनि‍ जे एना कि‍अए रेलवे स्‍टेशनक टि‍कट खि‍रकी जकाँ दुनू दि‍सक पाँती लागल अछि‍। मुदा से दसे-बारहे गोरेकेँ देखै छी। खेवा-पीबामे जँ कि‍छु गड़वड़ी रहि‍तए तँ होइतै। सेहो ने देखै छी। एक-दोसरसँ आँखि‍ मि‍ला प्रश्‍न पुछैत तँ मूड़ी डोला जबाव भेटनि‍। मुदा कि‍छुओ दोस जाबे ककरो नै अछि‍ ताबे एना भऽ कि‍अए रहल अछि‍। अान ठाम कहाँ भेल। मुदा सोझे माने बि‍ना आधारे कोनो बात मानि‍यो लेब तँ उचि‍त-नहि‍ये। आमपर फेकल गोला जकाँ जे लागि‍यो सकैए आ हुसि‍यो सकैए। इम्‍हर आराम करैले सेहो मन कछमछाइन। दोहरौि‍लएनि‍- जँ अपने लोकनि‍ समाजक सीमा रेखा तोड़ि‍ घि‍नबए चाहब तँ समाजोकेँ ई अधि‍कार बनै छै जे सीमाक सि‍पाही जकाँ अपन मातृ भूमि‍क रक्‍छा करए। कबछुआ जकाँ भकभका कऽ तँ लगलनि‍ मुदा, घि‍नबैक कारण बुझबे ने करथि‍। खि‍सि‍या कऽ एकगोटे बजलाह- कोन-कहाँ बोतल पीवि‍-पीवि‍ बरयाती औताह आ सभ कि‍छु (समाजि‍क गुण)केँ खेने-पीने चलि‍ जेताह। एको क्षण ई सभ जीबै नै देताह। कहि‍ छोटका भाएकेँ कहलखि‍न- बौआ, जि‍नका जे मन फुड़तन से करताह। अपन इज्‍जत-आबरू अपना हाथमे लऽ चलह। एक्के-दुइये ससरि‍-ससरि‍ घरमुँहा हुअए लगलाह।‍‍ 
 १. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) २.दुर्गानन्‍द मंडल-समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-३.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर
१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)(क्रमसँ दोसर खेप)
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। प्रस्तुत अछि पहिल खेप।- सम्पादक
आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)
(क्रमसँ दोसर खेप)
हमरा आब अचरज होइत अछि-ओहि समय दिल्ली स्थायी रूप सँ बसवाक एक रत्ती नहि
तँ आस छल आ नहि तँ सोचने छलौं। किन्तु एखन पंचानन जीकें पढ़ैत छी तँ लगैत अछि शब्द ब्रह्म थीक।पंचानन जीक आग्रह आ विचार सँ एकर प्रकाशनक भार शेखर प्रकाशन पर देल गेल शरदिन्दु चौधरी स्वयं डेरा पर आबि 700 पन्नाक पांडुलिपि ल गेलाह। शरदिन्दुक उत्साह देखि हम बुझलौं जे कोनो काज हेवाक रहैत छैक तँ कोना अनुकूल बसात बह लगैत छैक- कोना विधि दहिन भ जाइत छथि। हमरो उत्साह बढ़ि गेल- तखन पांडुलिपिक संग ई पत्र-
आदरणीया
आत्मकथा पढ़लहुँ। नीके नहि कतहु अत्यन्त मार्मिक हृदयस्पर्शी आ कतहु-कतहु तँ अन्यत्र नहि भेटल शब्दावलीक विलक्षण प्रयोग। बहुत मोन लागल। प्रसंग सभ रोचक एक दोसराक संग जोड़ैत अगाँ अविरल बढ़ैत। मात्र खटकैत अछि भाषा जे अहाँ स्वयं स्वीकार करैत छी जे मैथिली हम बहुत प्रयत्न सँ सिखलहुँ किछु शब्द केँ बदलबाक आवश्यकता छैक आ किछु अशुद्धिकें दूर करबाक छैक। आ कोनो कठिन नहि छैक। हमरासँ कोनो प्रसंग नहि हटाओल गेल। कारण कतहु ई नहि बुझना गेल जे लिखबाक बहन्ने पाठक पर धौंस झाड़ि रहल होइऐक। अहाँक भोगल यथार्थक अभिव्यक्ति कें कपचबाक धृष्टता करबामे असमर्थ पाबि रहल छी से एहि कारणे जे पापाक बतहिया बेटी क असाधारण सम्प्रेषणीयता केँ बाधित-खंडित करबा योग्य हम असाधारण कलमक
पुजारी नहि छी तेँ। ओतँ निवेदन जे जेना ब्रह्मा बनि अपने एकर सृजन कयलिऐक अछि तहिना विश्वकर्मा बनि एकरा सुन्दर बनयबा लेल अपने स्वयं हाथ चलबियौ। हँ शुद्धताक दृष्टिसँ हम एहि पर काज करबा लेल सतत् तत्पर भेटब।
शरदिन्दु चौधरी
शेखर प्रकाशन
एहि पोथीक प्रकाशनक क्रम मे शरदिन्दु हमर परिवारक अभिन्न अंग बनि गेल छलाह। हम दूनू गोटे कखनो काल पारिवारिक दुख सुखक गप करैत रहैत छलौं। विमोचन समारोह मे ओ कतेक स्नेह उत्साह सँ मंच पर हमर परिवारक बखान करैत रहलाह संगे हमरा कहलनि-अहाँ एतेक भीड़ कोनो समारोह मे देखने छलियैक आ ताहि मे विमोचन समारोह मे आब अहाँ उदास नहि रहियौक-हँसैत रहु- हमर उदासी सँ शरदिन्दु उदास भ जाइत छलाह ई अनुभूत हम केने छलौं। जखन नचिकेताक विचार किस्त किस्त पर आयल हम अभिभूत भ उठलौं-सरिपों कोनो रचना कें बुझवा लेल सहसंवेद्य हृदय चाही
माननीया शेफालिका जी
नमस्ते!
तेरी हर चाप से जलते हैं खयालों मे चिराग
जब भी तू आए जागता हुआ जादू छाए
तूझको छू लूँ तो ऐ जाने तमन्ना मुझको
देर तक अपनी बदन से तेरी खूशबू आए-
ई ओहि शायरीक अन्तिम अंश थीक जकर प्रशंसा सँ अहाँ किस्त किस्त जीवन प्रारंभ केने छी। सरिपहुँ अहाँक प्रत्येक कृतिक आहट सँ पाठकगण भाव-विभोर भ जाइत अछि आ जखन ओहि कृतिके पढ़ि लैत अछि तँ बहुत देर धरि ओ चिन्तन मनन करवा लेल बाध्य भ जाइत अछि सत्य-सरल-सुबोध भाषा मे लिखल गेल अपनेक एहि आत्मकथा किस्त किस्त जीवनक इएह विशेषता थीक।
उदय नारायण सिंह नाचिकेता
निदेशक
केंद्रीय भाषा संस्थान भारत सरकार

तखन मोन पड़ि गेल ओहि गीतक प्रथमांश-जाहि सँ हम किस्त किस्त प्रारम्भ केने छी-
ज़िन्दगी मे तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।
आ पत्रक हुजूम सँ साहित्यकार शंकर दयाल जीक पत्र मुस्कुरा उठैत अछि-
प्रिय शेफालिका वर्मा जी
आपने जिस प्रेम और अपनापन के साथ वर्ष की शुभकामनाएँ भेजी हैं उनका
जबाब शब्दों मे दे पाना कठिन है। मैं ऐसे कार्डों को संभालकर साल भर अपने सामने रखता हूँ और इसी रूप मे अपनों को याद करता हूँ। आपके साथ मेरा जो अनौपचारिक संबंध है उसका निर्वाह इसी भांति हो यही मेरी कामना है। आपकी कविताओं के दौर से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो अक्षरों के भी हाथ पाँव होते हैं- वे कभी छटपटाते कभी दौड़ते हैं कभी भाग खड़े होते पर पीछा नहीं छोड़ते। आपकी कविताओं से गुजरते मुझे आँसू ग्रंथि तथा मैं नीर भरी दुख की बदरी की याद आ जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य की परिभाषा साधारणीकरण के रूप मे की है यानी पाठक रचना के साथ-साथ
अपने को भी सहभागी बना ले-तब किसी रचना की सफलता होती है। शेफालिका जी आपकी कविताओं को पढ़ते हुए मेरी भी स्थिति कई बार ऐसी ही हुई है। निश्चय ही नया साल आपके लिए नई अनुभूतियाँ और विश्वास लेकर आए-यही मेरी संकल्पना है।
आपका
शंकर दयाल सिंह
एम पी
कामता सदन बोरिंग रोड पटना
दिनांक 17 जुलाई 89
भीम भाईक फोन आयल आँखि नोरा गेल छल। एक समय छल कतेक अंतरंगता हमरा सभमे छल-हम सभ एक दोसर कें हृदय सँ चीन्हैत छलहुँ-आ पत्र केँ पढ़ितहि टेप मे गाओल तरुणाक संग हिनकर गीत मोन पड़ि गेल-
हर पल तुझे मैं याद किया करता हूँ
तुझे भूला कर मैं एक पल कभी जीया तो नहीं।
विमोचनक बाद लगले चन्द्रेशक फोन आयल-हम किस्त किस्त पढ़लौं। एतेक अपूर्व-एतेक भावना एतेक दर्द अहाँ मे कत सँ आयल हमरा अहाँ सँ ईर्ष्या होइत अछि। हम किएक
नहि ओना लिख पबैत छी।बजैत-बजैत भावावेश सँ हुनकर गर बाझि गेल छलैक-आ झट द फोन राखि देलनि-हमरा जेना सौंसे संसारक सम्पदा भेटि गेल-हुनक आँखिक नोर जेना हमर आँखिमे आबि गेल।
एहिना हमर गुरुदेव डॉ अनंत लाल चौधरी अवकाश प्राप्त प्रोफसर पटना वि वि क
फोन आयल- शेफालिका! अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं। कतेक व्यथा अहाँक पाती-पाती मे भरल अछि। विद्यार्थी जीवन मे अहाँ एतवे संवेदनशील छलौं जेना हमरा मोन पड़ैत अछि- अहाँक व्यक्तित्व आ कृतित्व मे हमरा कोनो अन्तर नहि देखा पड़ैत अछि-कतेक एकरूपता! पति पत्नीक प्रेम विश्वास आपसी सामंजस्य एकर अभूतपूर्व चित्राण केने छी। स्त्रीक प्रत्येक रूपक वर्णन-कोनो एकटा लड़की परिस्थितिक अनुसार अपना कें समखपत क दैत छैक कोना सभकें खुश राखवाक प्रयास करैत एहि ऊँचाई पर पहुँचल- आजुक पीढ़ी लेल प्रेरणादायी अछि प्रत्येक परिवार मे रामायण-गीता जकाँ एहि पुस्तक कें राखवाक चाही- जाहि सँ नव पीढ़ी केँ आलोक भेटय-कतेक ठाम हमर आँखि भरि आयल-अहाँकेँ फेर बधाई अनेको आशीर्वाद।
दिल्ली मे मंजर आलमक फोन दरभंगा सँ आयल हम एकदम चिहुँकि उठलौं- विहुँसि
उठलौं- अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं- मैडम एतेक नीक लागल जे रहल नहि गेल। अपने केँ बधाई देवा लेल लगले फोन कय देलौं-
विमोचन उपरांत इंगलैंड जेवा काल दिल्ली मे राजीव लग छलौं कि भीम भाईक पत्र
राजीवक पता सँ आयल। आ दरभंगाक शुभ्रता शुचिता मोन पड़ि गेल-
बान्धवी शेफालिका जी
सोझाँमे किस्त-किस्त जीवन अछि। एहन सुन्दर पोथी लेल हार्दिक बधाइ लिअ।
मुदा शेफालिकाजी किस्त-किस्त जीवन हमरा अहाँक आत्मकथा कहाँ लागल हमरा तँ
अहाँक आत्माक कथा बुझि पड़ल। सोझे आत्मासँ बहरायल उद्गार। आत्मा जेना निर्बन्ध निर्लेप निस्सीम होइछ आ ओकर तार सोझे परमात्मासँ जुड़ल रहैछ तहिना अहाँक ई आत्माक कथा हमरा उन्मुक्त निश्छल निर्मल लागल अछि आ एकरो तार सोझे परमात्मा ललन बाबू सँ जुड़ल लगैत अछि। आत्माक अदृश्य अनुराग-तागसँ जुड़ल अहाँक जीबट भरल जीवनक ई सम्मोहक सतरंगी गुड्डी मैथिली साहित्याकाशमे अगराइत-उधिआइत अपन अपरुप छटा छिड़या रहल अछि छिड़यबैत रहत।
अहाँ भनहिँ अपन जीवनकेँ किस्त-किस्तमे क क तकर विस्तृत फिरिस्त तैयार कयलहुँ
अछि मुदा अहाँक समस्त व्यस्त जीवन हमरा जनैत ओहि अलमस्त प्रशस्त स्वर्गस्थ जीवनधन ललन बाबूक तिल-तिल नूतन पुण्यस्मृतिमे विगलित भेल चल गेल अछि।
भवदीय
भीमनाथ झा
30 05 08

देख रहा हूँ इस दुनिया को आपकी मुहब्बत है
आज मेरी दोनों आँखें आपकी इनायत है आपकी इनायत है।
ललन 17 04 92

मोन पड़ि जाइत अछि दिनेश्वर लाल आनन्दक उद्गार-
मिलनक मधुरतम क्षण मे विरह वेदनाक अनुभव करैवाली प्रेमक चरम सफलताक
समय मे असफल प्रेमक भावना मे जीवैवाली अनवरत मिलयामिनीक अनुभूतिमे डुबल विप्रलब्धाक सर्जन करैवाली कवयित्री श्रीमती शेफालिका वर्मा स्वयं अपनहि मे विरोधाभासक प्रतिमूर्ति छथि। हिनक प्रेमी आ पति श्री ललन कुमार वर्मा सहरसाक प्रमुख सुविख्यात अधिवक्ता आ हमरपत्नीक भ्राता। हिनक समस्त काव्यक प्रेरणा श्रोत आ हिनका लेल साक्षात् काव्य स्वरूप छथि। तैं प्रेमक चरम सौभाग्यपूर्ण परिणति विवाहक बाद जखन अधिकांश कविक कवित्व नूल तेल लकड़ीए मे समाप्त भए जाइत अछि ताहिठाम हिनक काव्य सर्जनाक प्रारम्भे चिरइप्सित विवाहक पश्चात भेलन्हि अछि
तैं महाकवि आरसी बाबू कें भनहि आश्चर्य लागैन्ह जे गृहस्थीक जाहि मरूभूमिमे कतेक कवि कवयित्रीक रस स्रोत सूखि गेल ताहि प्रपंच मे हिनक कवि हृदय कोना मात्रा जीविते नहि सरसता एवं वचन विदग्धताक प्रचार प्रसार क रहल अछि । मुदा यथार्थ मे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थीक। ओना सुविख्यात एवं सिद्धहस्त प्रौढ़ लेखक स्व ललितेश्वर मल्लिकक भतीजी एवं विहारक सुप्रसिद्द अधिवक्ता एवं मैथिली तथा हिन्दीक प्रौढ़ लेखक श्री ब्रजेश्वर मल्लिक क पुत्री एहि कवयित्रीकेँ लेखन कला उत्तराधिकारे मे भेटल छन्हि। दैनिक जीवन मे कवयित्री अपना पति संग तन मन प्राणसँ तेहन एकाकार छथि जे हिनक काव्यक मर्म हिनक सफल दाम्पत्य जीवनेमे समाहित छन्हि। भाषाक संबंध मे ई ज्ञापित कए देब आवश्यक जे कवयित्री जानि बुझि कए एहन कतेक शब्दक प्रयोग कएने छथि जे एहि क्षेत्रमे बाजब प्रचलित छैक मुदा मैथिली साहित्य मे जकर प्रयोग आइ धरि नहि होइत छैक जेना यादि हारि प्यार किछ गोटा केँ कठाइन भने लगनि मुदा ई एहि
क्षेत्रक भाषाक अपन रंग थीक।
दिनेश्वर लाल आनंद
साहित्यकार पटना
(क्रमसँ तेसर खेप अगिला अंकमे)

दुर्गानन्‍द मंडल
गोधनपुर (नि‍रमली) , दुर्गानन्‍द मंडलक

समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-


ओना तँ अपन देश सभ दि‍नेसँ पावनि‍ये ति‍हारक देश रहल अछि‍। जतए सभ दि‍न कोनो ने कोनो पावनि‍-ति‍हार मनाओल जाइत अछि‍। आइ होली, तँ काल्‍हि‍ दीवाली, परसू दुर्गापुजा, तँ तरसू कालीपूजा। आइ अनन्‍त चतुरदशी तँ काल्‍हि‍ नरक-नरावन चतुरदशी। आइ भ्रातृ द्वि‍ति‍या तँ काल्‍हि‍ जि‍ति‍या, आइ शनि‍याही घड़ी, तँ काल्‍हि‍ बुधवारि‍ घड़ी। कहि‍यो सि‍र पंचमी, कहि‍यो वसन्‍त पंचमी। तातपर्य सालो भरि‍ सभ दि‍न पावनि‍ए-पावनि‍। जहि‍मे सभ पावनि‍केँ एकटा अलग महत्‍व होइत अछि‍।
     कोनो पावनि‍ रंग-अबीरसँ जुड़ल होइत अछि‍ तँ कोनो अटूट भक्‍ति‍सँ। कोनो पावनि‍ साँए-बेटासँ जुड़ल अछि‍ तँ कोनो भाए-भतीजासँ, ओहि‍ पावनि‍मे अपना देशमे रक्षा बन्‍धनक एकटा खास लौकि‍क तथा अलौकि‍क दुनू तरहक महत्‍व होइत अछि‍। तँ भारतक पावन पावनि‍मे रक्षा बन्‍धन अति‍ पावन मानल गेल अछि‍। जहि‍ पावनि‍मे कलाइपर धागा बान्‍हव भृकूटि‍क बीचमे टीका लगाएव आ मुँह मीठ कराएव देखल जाइत अछि‍। औझके दि‍न बहीन अपन भायक गट्टापर राखीक धागा बान्‍हि‍ अपन रक्षाक दान लैत अछि‍। एकटा समए छलै जे युद्धक समएमे एकटा बहीन मुसलमान भाइक गट्टापर राखी बान्‍हि‍ अपनाकेँ सुरक्षि‍त बुझैत छल। कि‍एक तँ एक भाय अपन बहीनक सतीत्‍वक ओकर मान-मर्यादाक रक्षा जरूर करत।
परन्‍च मनुक्‍ख तँ पूर्ण समर्थ छथि‍ नहि‍। नहि‍ जानि‍ जे एकर बादो कतेको माए-बहीनक लाज लुटल गेल हएत। आ लुटल जाइए।
वास्‍तवमे एहि‍ अपवि‍त्र वृति‍, दृष्‍टि‍ आ कृति‍केँ पवि‍त्र बनाबए पड़त। आर मन, वचन, कर्मसँ पवि‍त्र रहि‍ सभसँ अपन बहीनक समान बर्ताव करए पड़त।
रक्षा बन्‍धनक रहस्‍यकेँ जानए पड़त, मानए पड़त। आजूक तारीखमे एहि‍ बातक खगता अछि‍ जे बहीनो आइक तारीखमे अपन भायसँ कोन प्रकारक रक्षा चाहैत छथि‍? तनक रक्षा, धर्मक रक्षा, सतीत्‍वक रक्षा आदि‍‍ महत्‍वपूर्ण तत्‍व अछि‍।
     आइ एकपेरि‍या धेने, चूप-चाप चलैत एसगरूआ बहीनकेँ एहि‍ बातक सदि‍खन आशंका बनल रहैत छैक जे क्‍यो आसूरी प्रवृति‍बला लोक रावण बनि‍ ओकर लोक-लाजकेँ समाप्‍त ने कऽ दै। एहि‍ लेल सभ बहीनक तरफसँ हम राखीक शुभ अवसरपर सभ भाइसँ दान स्‍वरूप ई लेबए चाहैत छी जे ओ अपन आसूरी प्रवृति‍, क्रोध, लोभ, मोह आदि‍ दान कऽ दथि‍। जाहि‍सँ हम अवला बहीनकेँ ई बुझना जाएत जे हमर पवि‍त्रता, हमर सतीत्‍व, हमर मान-मर्यादा सदि‍खन सुरक्षि‍त अछि‍। आ हमरा एक-आधटा नहि‍ अपि‍तु संसारक सभ पुरूष भाय बनि‍ हमर रक्षकक रूपमे सभठाम ठाढ़ छथि‍।
ओना परम-पि‍ता परमात्‍मा सभ आत्‍माक पि‍ता छथि‍। सबहक रक्षक पालक वएह छथि‍। हुनका समक्ष स्‍त्री-पुरूषक देहकेँ कोनो भेद नहि‍ छै। एहि‍ हेतु हम समस्‍त मैथि‍ल आ मैथि‍ली प्रेमीसँ हमर रक्षा-सि‍नेह रूपी बन्‍धन स्‍वीकार करू। परमात्‍मा अहाँक जीवनमे, शांति‍, शुभभावना, सि‍नेह, सहानुभूति‍, मधुरता पवि‍त्रता आदि‍ गुणसँ भरने रहथि‍। ई हमर शुभभावना अछि‍।
आऊ एहि‍ अमुल्‍य पावनि‍मे आत्‍मीक राखी अपन-अपन गट्टापर बान्‍हि‍, आत्‍म चेतनाक टीका लगा आ मीठ-मीठ बोलक मधुरसँ अपन मन आ आत्‍माकेँ मीठ राखी।
    
नाटक- बेटीक अपमान
नाटककार- बेचन ठाकुरजी
चनौरागंज (मधुबनी)
अंक-2
दृश्‍य- तेसर


(स्‍थान- बलवीर चौधरीक घर। सुरेश चौधरी बि‍आह-दानक संबंधमे गप करए पहुँचि‍ रहल छथि‍। बलवीर दलानपर कुर्सीपर बैसल छथि‍। तखनहि‍ सुरेशक प्रवेश)

सुरेश- नमस्‍कार, बलवीर बावू।
बलवीर- नमस्‍कार, नमस्‍कार। आउ पधारल जाउ।
(सुरेश कुर्सीपर बैसल छथि‍।)
बौआ टुनटुन, बौआ टुनटुन, एक लोटा जल लेने आउ। एकटा अभ्‍यागत पधारलाह अछि‍।
(टुनटुनकेँ एक लोटा जल लए कए प्रवेश)
सुरेश बावू, चरण पखारल जाउ।
सुरेश- आगू-पाछूबला कोन बात करैत छी। मि‍थि‍लाक जे रि‍वाज अछि‍ से नि‍भाबहि‍ पड़त। पहि‍ने चरण पखारू तहन कोनो बातचीत होएत।
सुरेश- बलवीर बावू, यद्यपि‍ हम वर पक्षसँ आएल छी। मुदा कि‍छु बात बनत तहन ने चरण पखारब। हमर बात-ददाक कहब छलनि‍। ओहि‍ परम्‍पराकेँ हम कोनो बि‍सरि‍ सकैत छी? होउ, गप कि‍छु आगू बढ़ाउ।
बलवीर- बाजू तखन, केम्‍हर-केम्‍हर अएलहुँ अछि‍?
सुरेश- कि‍छु दि‍न पूर्व अपने हमरा लग बाजल रही जे हमरा एहि‍ बेर एक गोट कन्‍यादान केनाय अछि‍। ओ कुटमैती अपने कएलहुँ वा नहि‍।
बलवीर- कहाँ कएलहुँ। नहि‍ ओतेक सम्‍पत्ति‍, अछि‍ आ ने कन्‍यादन कए पाबैत छी। घर तँ वर नहि‍, वर तँ घर नहि‍। की अहाँक नजरि‍मे कोनो लड़ि‍का अछ?
सुरेश- हँ अछि‍ हमरे भागि‍न।
बलवीर- केहेन घर-वर अछि‍?
सुरेश- अपना चशमासँ अपने देखब, से बि‍ल्‍कुल ठीक होएत। ओना हमरा समक्षसँ, नहि‍ बढ़ि‍या तँ खरावो कि‍यो नहि‍ कहि‍ सकैत छथि‍।
बलवीर- अहाँक वि‍चारसँ ई कुटमैती करैबला अछि‍?
सुरेश- हमरा वि‍चारसँ ई कुटमैती आँखि‍ मुनि‍ कऽ कए लि‍अ। लड़ि‍का-लड़ि‍की एकदम जोगम-जोग अछि‍।
बलवीर- सुरेश बावू, जदि‍ हम ई कुटमैतीमे ठकेलहुँ तहन हमर गृहणी कोरमे जीवन भरि‍ चटक करैत रहतीह। से यादि‍ राखि‍ लि‍अ।
     सुरेश बावू, हम हुनकामे सकबैन की नहि‍।
सुरेश- नहि‍ सकबैन तँ हम सकए देब। हम छी ने। आदर्श कुटमैती होएत।
बलवीर- जहन अपने ई डि‍ट्टो पावर लगाबैत छी, तहन हम नहि‍ देखब-तेखब। एक्के बेर काल्‍हि‍ छेके कए लेब। ई कुटुमैती पक्के बुझु। आबहु चरण पखारब की नहि‍?
सुरेश- आब चरणहि‍टा पखारब! जे नहि‍ से करब। पान, बीड़ी, सुपारी, सीगरेट, नश्‍ता, भोजन सबटा करब। पाछू काल कने समधीनो लग जाएव, फुसुर-फुसुर बति‍याएब। तहन गाम वापस जाएब। (पाएर धोलनि‍)
बलवीर- बौआ टुनटुन, अन्‍दरसँ नश्‍ता पानि‍ लाउ।
(टुनटुन अन्‍दरसँ नश्‍ता। पान, बीड़ी, सलाइ, सुपारी आनैत छथि‍। सुरेश ओ बलवीर नश्‍ता कए पान, सुपारी, बीड़ीक उपयोग करैत छथि‍।)
सुरेश बाबू, हम ठहरलहुँ एकटा साधारण वा गरीब लोक। हम की नश्‍ता कराएब, की व्‍यवस्‍था करब?
सुरेश- बाप रे बा..., एहेन नश्‍ता तँ हम बापो जनम नहि‍ खेने रही। मोन तँ गदगद भए गेल।
     आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। कने भागि‍नो एहि‍ठाम जेबाक अछि‍ एखनहि‍। तहन ने काल्‍हि‍ ओ सभ छेका-छुकीक व्‍यवस्‍था करताह। बेस, जाय राम जी की।
बलवीर- जय राम जी की। कहल सुनल माफ करबैक सरकार।
(सुरेशक प्रस्‍थान)
पटाक्षेप

दृश्‍य चारि‍म-
(स्‍थान- दीपक चौधरीक घर। मोहनक छेकाक पूर्ण तैयारी। दलानपर एकटा डोलमे पानि‍ ओ लोटा राखल अछि‍। कुर्सीपर बैसि‍ कऽ प्रदीप कुमार ठाकुर पेपर पढ़ि‍ रहल छथि‍। कि‍छुए देर पश्‍चात सुरेश कामत, बलवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्‍देश्‍वर चौधरी ओ हरे राम सि‍ंहक छेकाक सामग्रीक संग प्रवेश। गंगाराम आ चन्‍देश्‍वर बलवीरक क्रमश: छोट भाए आ पैघ भाए छथि‍न्‍ह। हरे राम सि‍ंह बलवीरक बुजुर्ग पड़ोसी छथि‍। गंगा रामक हाथमे छेकाक श्रमजान अछि‍। दुआरि‍पर दस गोट कुर्सी लागल अछि‍।)
प्रदीप- (ठाढ़ भऽ कऽ) नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भए होइत।)
    आउ, आउ, पधारल जाउ, पधारल जाउ। पहि‍ने सभ कि‍यो चरण पखारू।
(सभ कि‍यो चरण पखारि‍ रहल छथि‍। आ बारी-बारीसँ कुर्सीपर बैसैत छथि‍।)
    सुरेश बावू, कने हम अन्‍दरसँ आि‍ब रहल छी।
सुरेश- बेस जाउ।
(प्रदीप अन्‍दर जा कऽ दीपकक संग आबैत छथि‍।)
दीपक- नमस्‍कार समधि‍, नमस्‍कार कुटुम, प्रणाम मामाश्री। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भेलनि‍।)
कहु समधि‍, अपने सभ कि‍यो आबि‍ गेलि‍ऐक।
बलवीर- हँ, हँ, हमरा लोकनि‍ सभ ि‍कयो आबि‍ गेलहुँ।
दीपक- धन्‍यवाद। बौआ, गोपाल, गोपाल।
(अन्‍दरसँ गोपाल कहलनि‍- जी बाबूजी)
कने एम्‍हरौ धि‍यान देब बौआ।
(गोपाल नश्‍ता लऽ कए प्रवेश ट्रे मे संगमे सोहन सेहो छथि‍। सोहन सभकेँ नश्‍ता दैत छथि‍। सभ कि‍यो नश्‍ता कए हाथ मुँह धोइ कऽ बैसैत छथि‍।)
प्रदीप- गोपाल बौआ, कने चाह-पान, बीड़ी-सुपारी, सि‍करेट-सलाइ सेहो देखहक।
गोपाल- जी चच्‍चा, जाइत छी।
(गोपाल अन्‍दर जा कए ट्रे मे सभ कि‍छु आनैत छथि‍। सोहन सभकेँ पहि‍ने चाह दैत छथि‍ पीवलाक पश्‍चात पान-बीड़ी-सि‍करेट दैत छथि‍। जनि‍का जे मोन होएत छनि‍ से लैत छथि‍। नश्‍ता-पानि‍सँ सभ नि‍वृत छथि‍। सोहन ओ गोपाल ठाढ़ छथि‍।)
सुरेश- भागि‍न, बौआकेँ बजाउ। गामपर कि‍यो नहि‍ छथि‍ भैंस हमरे हाथपर लगैत अछि‍।
दीपक- हँ, हँ, आबि‍ रहल छथि‍। तैयार भए रहल छथि‍।
प्रदीप- सुरेश बाबू, अहाँक भैंस अहीं हाथपर लगैत अछि‍। भैंस बड़ दुलारि‍ छथि‍। सुरेश बाबू छेका-छुकी तँ होइबहि‍ करत। पहि‍ने दस आदमीक बीचमे लेन-देन फाइनल भऽ जाए। बादमे तू-तू-मै-मै कइलासँ प्रति‍ष्‍ठे जाइत अछि‍।
हरेराम- सुरेश बाबू, प्रदीप बाबूक गप्‍प हमरा बड्ड नीक लागल। हदमद्दीसँ नीक उल्‍टीए। बाजू, प्रदीप बाबू अहीं, कोना की लेन-देन?
प्रदीप- हम नहि‍ बाजब। बजताह सुरेश बाबू। कुटुमकेँ वएह आनलथि‍। कोना की गप करथि‍न्‍ह, से तँ वएह ने कहताह।
हरेराम- बाजू सुरेश बाबू, केना की गप्‍प?
सुरेश- कोनो गप्‍प-सप्‍प नहि‍। हम बलवीर बाबूकेँ यएह कहलि‍यन्‍हि‍ जे ई कुटमैती करैबला अछि‍ आ ओ भऽ कऽ रहत। एहि‍मे हम पड़ल छी।
गंगाराम- तहन छेकामे वि‍लंब ि‍कएक सुरेश बाबू? एत्ते टाइल गुल्‍ली खेलाबाक कोन प्रयोजन? एत्ते कि‍यो छि‍रहारा खेलए।
चन्‍देश्‍वर- यौ सुरेश बाबू, सभटा अहींक चक्कर चालि‍ छी। कहलहुँ आदर्श कुटमैती आ देखि‍ रहल छी बटुआ भरू कुटमैती अऍं यौ, एखुनका युग माने अल्‍ट्रासाउडक युगमे लड़ि‍कोक अभाव अछि‍। ओहि‍ हि‍साबे लड़ि‍कीएक बड़ अभाव अछि‍। हमरा ई कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍।
हरेराम- हरबराउ नहि‍ बौआ। नवका कुटमैतीमे एहि‍ना तोड़-जोर हेाइत अछि‍। अहाँ शांत रहु। देखि‍यौक की होइत छैक? मॉं सरस्‍वतीक कि‍रपा हेतैन तँ भऽ जाएत। कोनो काज हरबराए कऽ नहि‍ करी।
प्रदीप- हरेराम बाबू, चन्‍देश्‍वर बाबू एतेक गैसमे कि‍एक आबि‍ गेलाह। कोनो कुटमैती कएने छथि‍ की नहि‍।
गंगाराम- हँ, हँ, अहींटा कुटमैती कएने छी। आ देखने छी। हमरा एहेन दलालबला कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍। लड़ि‍काक लेल दुनि‍या, बड़ीटा अछि‍।
प्रदीप- गंगाराम बाबू, अहूँ बड़ भासि‍ रहल छी। कने होशमे बात करू।
हरेराम- ओम शांति‍, ओम शांति‍, ओम शांति‍। कृपया सभ कि‍यो शान्‍त होउ। हल्‍ला गुल्‍ला नहि‍ होएवाक चाही। प्रदीप बाबू, कने दीपक बाबूसँ एक बेर अंदर जा कऽ वि‍चार करि‍औक। ओना आधुनि‍क युगमे बेटीक बड़ अभाव अछि‍ आओर बेटा भरमार अछि‍।
प्रदीप- ठीक कहलहुँ हरेराम बाबू, कने हम आ दीपक बाबू अंदरसँ आबि‍ रहल छी।
(दीपक ओ प्रदीप अन्‍दर गेलाह। कुटुम लोकनि‍ दुआरि‍पर बैसल छथि‍। फेर सुरेश सेहो अन्‍दर जाइत छथि‍। तीनू अंदरमे गप्‍प करैत छथि‍।)
सुरेश- भागि‍न प्रदीप, हमर प्रति‍ष्‍ठा बचाउ। हम हि‍नका सभकेँ कहि‍ देने छि‍यन्‍हि‍ जे बि‍आह आदर्श होएत।
दीपक- से बि‍ना बुझने अहाँ कि‍एक कहि‍ देलि‍ऐक।
सुरेश- से हम बड़ पैघ गलती कएलहुँ।
दीपक- अहाँकेँ कम-सँ-कम पाँचो लाख टाका नगद आ अलावे सब समान कहबाक चाही की ने। बुढ़ पुरान भऽ कऽ भसि‍या जाइत छी मामा।
सुरेश- तोहर जे मोन छह, ताहि‍पर कुटमैती नहि‍ हेतह भागि‍न। जाह, दोसरे कए लि‍ह। हमरा एतेक मोलाइमे सम्‍हारल नहि‍ होएत।
(अन्‍दरसँ खि‍सि‍या कऽ आबि‍ दुआरि‍पर बैसैत छथि‍।)
प्रदीप- आब ई कुटमैती लागि‍ रहल अछि‍ जे नहि‍ सम्‍हरत। दीपक बाबू, छोड़ू लोभ-लालच। कहबी अछि‍- लोभ: पापस्‍य कारणम्। अहाँ मामाश्रीकेँ कसि‍ कऽ पकड़ू। कुटमैती तँ केनाइ अछि‍। आदर्शे रहए दि‍यौक। अन्‍यथा अहुँक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत आओर ममोक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत। दुआरि‍पर सँ एहेन सम्‍हरल कुटुमकेँ नहि‍ घुमैबाक चाही।
दीपक- तहन की कएल जाए, सर?
प्रदीप- कने मामाश्रीकेँ बजाबि‍औन आ हुनकेपर सभटा छोड़ि‍ दियौन्‍ह।
दीपक- बेस सर, मामाश्रीकेँ बजाबैत छि‍यन्‍हि‍।
(बाहर आबि‍ मामाश्रीकेँ कहैत छथि‍। मामाश्री, यौ मामाश्री, मामाश्री यौ)
सुरेश- कने प्रदीप बाबू भीतर बजाबैत छथि‍।
(सुरेश अन्‍दर जाइत छथि‍। प्रदीप दीपक ओ सुरेश अन्‍दरमे गप-सप्‍प करैत छथि‍।)
प्रदीप- अहीं जे-जेना करबै सुरेश बाबू, सएह होएत। एतय प्रति‍ष्‍ठाक सवाल अछि‍। खाली एना करबाक प्रयास करबैन जाहि‍सँ साँपो मरि‍ जाए आ लाठीयो नहि‍ टूटए।
सुरेश- चलै‍-चहल दुआरि‍पर। कुटुम्‍बो की कहैत होएताह। की नहि‍। हम एक्के बेर बाजबह। ओहि‍मे गुंजाइश होएतह तँ करि‍हह, नहि‍ तँ तोहूँ घर, उहो घर।
(सभ दुआरि‍पर आबैत छथि‍।)
बलवीर- हरेराम बाबू, कने पुछि‍यौन्‍ह, की केना वि‍चार भेलन्‍हि‍?
हरेराम- सुरेश बाबू, की केना वि‍चार भेल? हमरा सभकेँ जल्‍दी कहु। बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍।
सुरेश- हम ि‍हनका सभकेँ कहलि‍एनि‍ जे बलवीर बाबू नवका टीचर छथि‍। ई बेचारा गरीबे छथि‍। ई आदर्श वि‍आह करताह। ताहुमे ओ कोनो अन्न-छेरू नहि‍ छथि‍, मुर्ख-गमार नहि‍ छथि‍ जे ठकि‍ लेताह। बेचार लड़ि‍कीबला अपना मुँहसँ कहलाह जे हम जे कि‍छु देबैन से अपन बेटी-जमाएकेँ देबैन ने, कि‍नको आनकेँ देबैन फेर ओ बजलन्‍हि‍ जे हम ओतेक जरूर देबैन जाहि‍सँ कोनहुँ पक्षकेँ प्रति‍ष्‍ठापर नहि‍ पड़ए।
प्रदीप- बस करू। लेन-देनक गप्‍प खतम करू आओर छेका-छुकीक कार्यक्रम शुरू करू। की यौ दीपक बाबू, गप्‍प मंजूर अछि‍ की नहि‍?
दीपक- जाउ, अपने सभ जे जेना करि‍औक। मंजूर अछि‍।
हरेराम- तहन दीपक बाबू, पुरहि‍तकेँ खबर कएने छी?
दीपक- आइ भि‍नसरे खबर केलि‍एन्‍हि‍। ओ अएलो छथि‍। कखनो देखने रहि‍यन्‍हि‍। कोनाे जजमान ओहि‍ठाम गेल होएताह।
हरेराम- कने जल्‍दी, पुरहि‍तोकेँ देखि‍यौन्‍ह आ लड़ि‍कोकेँ बजाउ।
प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू
(सोहन अंदर जाइत अछि‍)
प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू।
(सोहन अंदर जाइत अछि‍।)
बौआ गाेपाल, भैयाकेँ बजाउ।
(गोपाल सेहो अंदर जाइत अछि‍। पहि‍ने पुरहि‍तक संग सेाहनक प्रवेश। पुरहि‍तकेँ सभ कि‍यो साग्रह बैसाबैत छथि‍। तहन गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ पएर छुबि‍ प्रणाम करैत छथि‍ आ सभ कि‍यो आशीर्वाद दैत छथि‍न्‍ह।)
हरेराम- बैसु बौआ। (मोहन बैसि‍ जाइत छथि‍)
की नाम छी?
मोहन- मोहन कुमार चौधरी। (ठाढ़ भऽ कऽ)
हरेराम- पि‍ता जीक की नाम छी?
मोहन- श्री प्रदीप चौधरी।
हरेराम- परदादाक नाम की छी।
मोहन- (असमंजशमे पड़ि‍) नहि‍ बुझल अछि‍।
हरेराम- खाइर छोड़ू, कोनो बात नहि‍। अहाँ करैत की छी?
मोहन- दि‍ल्‍लीमे एक्‍स-पोर्ट छी।
हरेराम- अच्‍छा, बैस जाउ। (मोहन बैस जाइत)
पुरहि‍त, आब अपन कार्यक्रम शुरू कएल जाए। बड़ वि‍लंब भए गेल।
बौआ- हँ हँ, हमहुँ दुपहरि‍यामे अएलहुँ। एम्‍हर-ओम्‍हर घुमि‍ रहल छलहुँ वि‍लंब देखि‍। आउ बौआ पीढ़ि‍या बैसू। (मोहन पीढ़ि‍यापर आ पुरहि‍त कंबलपर बैसैत छि‍थि‍ कलशमे पानि‍ छन्‍हि‍। बौआ झा दीपकसँ कुश मंगबैत छथि‍।)
सुनू कुटुम सभ, हम वि‍धेटा पुराएव। कारण छेकाकेँ बड़ लेट भए रहल अछि‍। समए सेहो ठंढ़ी अछि‍।
सुरेश- पंडीजी, अहाँकेँ जे नीक लगए से करू।
बौआ- पढ़ु बौआ, ओम श्री गणेशाय नम: -5
मोहन- ओम, श्री गणेशय नम: -5 
बौआ- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5
मोहन- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5
बौआ- ओम, श्री बराय नम: -5
मोहन- ओम, श्री बराय नम: -5
बौआ- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5
माेहन- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5
बौआ- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5
मोहन- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5
(अन्‍दरमे छेकाक गीत भए रहल अछि‍ छेकाक डाली मोहनक दुनू हाथमे गंगाराम देलखि‍न।)
बौआ- बौआ जाउ, डाली गोसाइ लग राखि‍ आउ।
(मोहन सभकेँ पाएर छुबि‍ गोर लगैत छथि‍ कुटुम सभ हुनका गोर लगाइ दैत छथि‍।)
दीपक बाबू, हमरा दक्षि‍णा दि‍अ। हमरा बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍।
दीपक- भोजन-साजन कए लि‍अ आ राति‍मे एतै वि‍श्राम करू।
बौआ- भोजन-साजन कए लेब, से संभव अछि‍। मुदा रात्रि‍ वि‍श्राम असंभव अछि‍। यौ बाबू हमर कन्‍या बड़ डरबुक छथि‍। बि‍ना हमरा रहने हुनका नीने नहि‍ होइत छनि‍।
प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँ वि‍आह कहि‍या करए चाहैत छी?
बलवीर- अहाँ जहि‍या करू।
प्रदीप- पंडीजी, कने बि‍आहक दि‍न देखि‍यौक।
(पंडि‍जी पतरा देखैत छथि‍।)
बौआ- काल्‍हुक दि‍न अछि‍। परसुओक दि‍न अछि‍।
चारम-पाँचम-छठम दि‍न नहि‍ अछि‍। फेर सातम दि‍न अछि‍। (एक सए टका लऽ कऽ प्रस्‍थान)
प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँकेँ कोन दि‍न पसीन अछि‍?
बलवीर- हम बेटीबला छी। हमरा बड ओरि‍यान करए पड़त। हम सातम दि‍नका वि‍आहक दि‍न मंजूर करैत छी।
प्रदीप- बेस, बि‍आहक दि‍न फैनल भए गेल, सातम दि‍नका। गोपाल कने भोजनक जुगार देखहक।
गोपाल- (गोपाल अन्‍दर जा कऽ आबि‍) चाचा भोजन तँ तैयार अछि‍। भोजन सराए रहल अछि‍।
प्रदीप- हरेराम बाबू, चलै-चलू भोजन करए।
सोहन बौआ, लोटा आ बाल्‍टीनमे पानि‍ नेने आउ। (सोहन अन्‍दरसँ बाल्‍टीनमे पानि‍ आनैत छथि‍।)
कुर्रा- उर्रा करै जाइ-जाउ सरकार।
(सभ कि‍यो कुर्रा कए तैयार छथि‍।)
चलै चलू भोजनमे।
(सबहक प्रस्‍थान) पटाक्षेप

दृश्‍य पाँचम क्रमस: आगाँ-

१.प्रो. वीणा ठाकुर-महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍ २.
किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी ३.कपि‍लेश्‍वर राउत-मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा

प्रो. वीणा ठाकुर
अध्‍यक्ष, मैथि‍ली वि‍भाग,
ल.ना.मि‍. वि‍श्‍व ि‍वद्यालय, दरभंगा

महाकवि‍ मार्कण्‍डेय प्रवासी श्रद्धांजलि‍-

राजसी स्‍वभाव, सौम्‍य मुख-मुद्रा, शि‍ष्‍ट व्‍यवहार शालीनताक प्रति‍मूर्ति प्रवासी जीक जीवन सन् संवतसँ बान्‍हल समए नहि‍ थि‍क, अपि‍तु ओहि‍ रचनाकार कलाकारक जीवन थि‍क जे वर वृक्ष सदृश्‍य होइत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी कवि‍-महाकवि‍, नि‍वंधकार, पत्रकार, साहि‍त्‍यकार-उपन्‍यासकार, कथाकार-व्‍यंग्‍यकार छलाह। जखन हम प्रवासी जीक वि‍षएमे कल्‍पना करैत छी तँ मोनमे एकहि‍टा बात अबैत अछि‍ जे प्रवासी जी काव्‍यक स्‍तरपर, साहि‍त्‍यक स्‍तरपर वि‍चार आैर जीवनक स्‍तरपर समस्‍त संकीर्णताकेँ तोड़ैत आधुनि‍क सांस्‍कृति‍ चेतनाक संवाहक छलाह। प्रवासी जी समएक तालकेँ चि‍न्‍हलनि‍, समस्‍त प्रभावकेँ ग्रहन केलनि‍, और अव्‍यानात कएलनि‍ और ताहि‍ करण्‍ो हि‍नक जीवनक समएक सीमा -सीमा हीन- भऽ गेल अछि‍।
     प्रवासी जीकेँ बुझवा लेल दू स्‍तरपर वि‍चार करव आवश्‍यक भऽ जाइत अछि‍- पत्रकारक रूपमे तथ्‍यात्‍मक समएक प्रतीति‍ और सृजनशील रचनाकारक रूपमे हुनक शाश्‍वत काल बोध। पत्रकारक समए ठोस तथ्‍यक समए होइत अछि‍ और जाहि‍ ठाम सामयि‍क घटना ओकर चेतनाकेँ नि‍रन्‍तर मथैत रहैत अछि‍। तात्‍कालीन समस्‍त वि‍भत्‍स घटनासँ हि‍नका प्रत्‍यक्षीकरण भेल और समयक एहि‍ धारकेँ हि‍नक पत्रकार उजागर कएलक, और ई प्रगट भेल आर्यावर्तक सम्‍पादकक रूपमे अक्षर जगतक सम्‍पादक रूपमे मि‍थि‍ला मि‍हि‍रमे झामलालक झामा, माटि‍-पानि‍मे कहलनि‍। गोनू झा व्‍यग्‍य-स्‍तम्‍भ रूपमे प्रवासी जीक पत्रकारक और समयक वि‍षम प्ररि‍स्‍थि‍ति‍ ओकरा सामाजि‍क चेतनासँ युक्‍त नव यर्थाथ परक दृष्‍टि‍ प्रदान कएलक और जाहि‍मे हि‍नक पत्रकार देशक राजनीति‍क आर्थिक एवं सामाजि‍क वि‍संगति‍सँ उत्‍पन्न संकटसँ समंजनक प्रयास कएलक।
     दोसर दि‍श हि‍नक रचनाकार शाश्‍वत समयक धारासँ जुड़ल रहल। शाश्‍वत समयसँ जुड़वाक भाव हि‍नका अन्‍तर्दृष्‍टि‍ प्रदान कएलक और कवि‍ प्रवासी जी आत्‍योलष्‍जि‍क प्रक्रि‍यासँ स्‍थापि‍त भऽ शाश्‍वत मूल्‍यक प्रति‍ष्‍ठा करए लगलाह, संगहि‍ अपन रचना द्वारा ओहि‍ मूल्‍यकेँ सार्थकता प्रदान करए लगलाह। प्रवासी जी मानव वघटनक ओहि‍ कालमे मानव जि‍जीवि‍षाकेँ स्‍थापि‍त करए लगलाह।
     प्रवासी जी आइ हमरा लोकनि‍क बीच नहि‍ छथि‍, आव एकटा दूरी बना कऽ हुनक रचना और जीवनकेँ देखल जा सकैत अछि‍। तथापि‍ एतेक धरि‍ सत्‍य जे ओ काव्‍यसँ मात्र प्रेमेटा नहि‍ करैत छलाह अपि‍तु जीवनसँ थाकि‍ कऽ काव्‍येमे शांति‍ प्राप्‍त करैत छलाह। काव्‍यहुँमे गीत काव्‍यसँ प्रेम हि‍नक सभठाम उजागर होइत रहल। कि‍एक तँ आदि‍म मानव-मनक आदि‍म उद्गार थि‍क गीत काव्‍य। आदि‍म आर्यन्‍मक प्रथम चेतना, सौर्न्‍दय बोधक प्रथम उन्‍मेष तथा आदि‍म हृदयक प्रथम स्‍पन्‍दन थि‍क गीत काव्‍य, और ई सुरक्षि‍त अछि‍ उषा गीतक रूपमे, उर्वशी-पुस्‍रंबाक सम्‍वेदना-सम्‍वादमे तथा इन्‍द्र-वरूरणक वन्‍दना-अर्चनामे और एहि‍ प्राचीन परम्‍पराक प्रथम लि‍िप-बन्‍धन थि‍क वेद, वि‍शेषत: सामवेद। काव्‍य जौं गीतकेँ भि‍न्न अस्‍ति‍त्‍व प्रदान कएनि‍हार प्रधान तत्‍व थि‍क स्‍वानुभूति‍, जाहि‍सँ ई वि‍षयी प्रधान (subjective) भऽ जाइत अछि‍ और एकरहि‍ अभावमे काव्‍य वि‍षय (objective) भऽ जाइत अछि‍। तथापि‍ गीत काव्‍य लेल स्‍वानुभूति‍योसँ महत्‍वपूर्ण भऽ जाइत अछि‍ रागात्‍मक वृति‍। रागक संबध रति‍सँ अछि‍ और रति‍ स्‍थायी भाव थि‍क, जे भक्ति‍ एवं श्रृंगार दुनूमे पाओल जाइत अछि‍। यएह कारण थि‍क जे आदि‍म उषागीत आधुनि‍क काल धरि‍क गीत काव्‍यक वि‍षय श्रृंगारि‍क रहल आएल अथवा भक्ति‍। दुनू प्रकारक भाव वोधमे प्रधान भऽ जाइत अछि‍ स्‍वानुभूि‍त। उषाक चि‍त्रणमे वैदि‍क ऋृषि‍क एहने स्‍वानुभूति‍ अछि‍ एवं ऋृग्‍वैदि‍क वरूणक स्‍तुति‍मे एकान्‍त तन्‍मयता। वस्‍तुत: रागात्‍मक भावाधारि‍त (रति‍भाव) चाहे श्रृंगारि‍क भावना हो अथवा भक्‍ति‍ भावना दुनूमे द्रष्‍टाक स्‍वानुभूति‍क अहम भूि‍मका रहैत अछि‍। और यएह स्‍वानुभूति‍ भेटैत अछि‍ प्रवासी जीक गीतमे।
     हुनकासँ भेल वार्ताकेँ जौं स्‍मरण कएल जाए तँ यएह स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे गीतक प्रतीक्षा हुनका राग वि‍लक्षण छल। इहो सत्‍य अछि‍ जे अपन काव्‍यपर चर्चासँ ओ सदैव अपनाकेँ बचबैत रहलाह। एकटा संवादमे संकोचक संग कहने छलाह- अपन काजक मर्यादाक भीतर और ओहि‍मे उपलब्‍ध अवकाशक कारण, हमरा कि‍छु कहवाक अवसर जौं अन्‍यत्र नहि‍ भेटैत अछि‍ तँ आपद धर्म कारण काव्‍ये, वि‍शेष कऽ गीते हमरा माध्‍यम भेटैत अछि‍, जतय हम अपन बात वि‍ना कोनहुँ लाग-लपेटक कहि‍ सकैत छी। कहि‍ सकैत छी जे काव्‍ये हमरा लेल सभसँ नीक माध्‍यम रहल अछि‍।‍
     एहि‍ छोट-छीन आलेखमे प्रवासी जी रचि‍त समस्‍त रचनाक मूल्‍यांकन असंभव, तेँ हम मात्र ि‍हनक काव्‍य संकल्‍न हे हम भेटवक आधारपर, हि‍नक सान्नि‍ध्‍यकेँ पुन: पुन: स्‍मरण करैत, हि‍नक व्‍यक्‍ति‍त्‍व मूल्‍यांकन जे हमरा लेल असंभव थि‍क, अपन व्‍यक्‍ति‍गत अनुभवकेँ पाठकक संग वाँटए चाहैत छी। यद्यपि‍ सान्नि‍ध्‍यक व्‍यक्‍ति‍गत सुखकेँ शब्‍द द्वारा व्‍यक्‍त करब असंभव होइत अछि‍, शब्‍दक सार्मथ्‍यक एकटा सीमा होइत अछि‍। तथापि‍ कि‍छु शब्‍दमे व्‍यक्‍त करवाक संभवत: प्रयास तँ कएले जा सकैत अछि‍।
     प्रवासी जीक प्रथम कवि‍ता हम भेटव भवि‍ष्‍यक संकेत मात्र नहि‍ थि‍क अपि‍तु अपन सहज और वि‍वेकशील भाषाक माध्‍यमसँ प्रवासी जी ई प्रमाणि‍त कऽ देलनि‍ जे एहि‍ स्‍वान्‍त: सुखाय वि‍धाक माध्‍यमसँ नहि‍ मात्र अपन अर्न्‍तपरि‍ष्‍करण सम्‍भव अछि‍ अपि‍तु प्रकारान्‍तरसँ मानवीय दायि‍त्‍वक नि‍र्वाहण सेहो। हम भेटव काव्‍य संग्रहक बेशी कवि‍ता छोट-छोट अछि‍ जाहि‍मे छोट-छोट मुद्दा सजीव और मार्मिक क्षणकेँ संयोगी कऽ राखल गेल अछि‍। एतए कवि‍क नि‍जी इच्‍छा अछि‍, समयक दवाब अछि‍, भाषाक गम्‍भीरता अछि‍, आस्‍था अछि‍ और नव बाट ताकवाक बेचैनी सेहो अि‍छ। कहवाक तात्‍पर्य जे एहि‍ छोट-छोट काव्‍यसँ प्रवासी जी काव्‍यस्‍वादक एकटा वि‍शाल परि‍धि‍क नि‍र्माण कएने छथि‍। अपन सामाजि‍क सरोकार और प्रकारान्‍तरसँ अपन मानवीय दायि‍त्‍वपर भरोसा करैत प्रवासी जी कहि‍ उठैत छथि‍- जहि‍या-जहि‍या दृदएहीनता खटकत मोनक वाटपर। हम भेटव-इति‍हास-नदीक चि‍क्‍कन चुनमुन धाटपर। जहि‍या-जहि‍या मैथि‍लत्‍व हारल थकि‍याएल सन लागत। हम भेटव-ति‍लकोर जकाँ-चतरल साहि‍त्‍यक वाटपर। कवि‍ कर्मक यएह दायि‍त्‍व प्रवासी जी लेल भवि‍ष्‍यक महात्‍वाकांक्षा थि‍क। तखनहि‍ तँ शब्‍दक खि‍लाड़ी शब्‍दक शक्‍ति‍ और सीमाक पड़ताल करैत कहैत छथि‍- ‍आइ अर्थ वि‍हीन भाषाण मात्र कवि‍ता अछि‍। आइ मोनक बात कहवामे असुवि‍धा अछि‍। मुदा कवि‍ नि‍राश नहि‍ छथि‍, कहैत छथि‍- प्रवासी केर गजलमे कनैए मि‍थि‍लाचलक महि‍मा। सुवासि‍त साधना अछि‍ नष्‍ट भऽ रहले, तुरन्‍त सम्‍हारू। जीवनक समस्‍त वि‍डम्‍बनाकेँ चि‍त्रि‍त करैत प्रवासी जी कहि‍ उठैत छथि‍- अपने घरमे आव प्रवासक- अछि‍ वि‍डम्‍बना प्रवासी अपने दाँत अपन अघरक मुद्रि‍त कि‍ताबकेँ कुतरैए।‍ पुन: कवि‍ आशावादी होइत कामना करैत छथि‍- चलह प्रवासी: अषाढ़क आह्वान करी, शीतल जलक कामना मनमे शेष अछि‍।‍
     काव्‍यक क्राफ्टक अपेक्षा कथ्‍यक गम्‍भीरता और सादगीपर हि‍नक वि‍शेष ध्‍यान छन्‍हि‍, तखनहि‍ तँ शब्‍दक चयनमे तत्‍सम, तदभव अथवा अन्‍य देशज शब्‍दक प्रयोग कवि‍ सायास नहि‍ करैत छथि‍ अपि‍तु कथ्‍यकेँ यांत्रि‍क होएवाक आयास पाठककेँ नहि‍ होमए दैत छथि‍। जखन कवि‍ कहैत छथि‍- ई मैथि‍लीक नमस्‍कार छथि‍ : प्रवासी, ई एन-मेन लगै छथि‍। तत्‍सम प्रणाम- सन। अथवा सुशब्‍दमे, सुगंधमे, सुवुद्धि‍मे बसह प्रवासी, सत्‍यपर शि‍व जकाँ ढरि‍ जाइछ सुन्‍दरता। वस्‍तुत: हि‍नक प्रत्‍येक शब्‍द प्रत्‍येक पंक्‍ति‍, प्रत्‍येक रचना पाठकक स्‍मृति‍मे संयोगि‍ कऽ राखल कवि‍ता थि‍क।
     हि‍नक राजनैति‍क, सामाजि‍क एवं सांस्‍कृतिक सोच स्‍पष्‍ट अछि‍, मुदा हि‍नक काव्‍य राजनैति‍क सामाजि‍क दस्‍तावेज नहि‍ थि‍क। अपन अर्जित सत्‍य हि‍नक प्रत्‍येक काव्‍यमे मुखर भेल अछि‍। अनन्‍त रूपात्‍मक, अनन्‍त भावात्‍मक संसारक सूक्ष्‍म मुदा ठोस पहचान हि‍नक काव्‍यमे चि‍त्रि‍त अछि‍। समए मनुष्‍यक अनुभूति‍केँ जाहि‍ मूलवर्ती सम्‍वन्‍धसँ दूर कऽ देने अछि‍ हि‍नक काव्‍य तकरा जोड़वाक उपक्रम करैत पाठककेँ अपनहि‍ जि‍ज्ञासा मध्‍य ठाढ़ कऽ दैत अछि‍। प्रवासी जी अपन काव्‍यक बीज तत्‍व समाजक ओहि‍ वर्गसँ लऽ कऽ आएल छथि‍, जकरा प्रति‍ हि‍नक प्रति‍बद्धता छन्‍हि‍। हि‍नक प्रत्‍येक कवि‍ता एहि‍ वैवि‍ध्‍यमय जीवन जगतक भि‍न्‍न-भि‍न्‍न धरातल-आएल आशय- उदेश्‍यक अनुगूँज लेने अछि‍ तथा पाठककेँ अपन समए-संसारमे जोड़वामे सक्षम अछि‍। पाठक अपन सुख-दुख, त्रास-ताप, ओकर खालीपन भरल हवाइ अनुभूति‍ हि‍नक काव्‍य मध्‍य आकि‍ लैत अछि‍।
     हि‍नक काव्‍यमे नि‍हि‍त व्‍यंग्‍य हि‍नक सम्‍प्रेषण क्षमताकेँ सहज बना दैत अछि‍। और यएह व्‍यंग्‍य हि‍नक काव्‍यमे, हि‍नक हृदएमे सुलगैत आि‍गकेँ अभि‍व्‍यक्‍त कऽ दैत अछि‍। प्रवासी जी कोनो वादक कवि‍ नहि‍ छथि‍ तथापि‍ एकटा मौन क्रान्‍ति‍, एकटा शालीन असहमति‍, एकटा दृढ़ अस्‍वीकार भाव हि‍नक रचनामे सर्वत्र दृष्‍टि‍गोचर होइ अछि‍। उपरसँ चुप मुदा भीतरसँ क्रन्‍दन हि‍नक रचनामे नुकाएल रहैत अछि‍। यद्यपि‍ उपरका मौन हि‍नक कमजोरी नहि‍ छन्‍हि‍, अपि‍तु यस्‍वक नि‍षेध करैत स्‍वाभावि‍कताक नि‍कट आबि‍ जाइत अछि‍। दोसर शब्‍दमे मानवताकेँ बचाएब और भवि‍ष्‍यक नि‍र्माणक बेचैनी, तड़प और संघर्षक अछि‍। वस्‍तुत: हि‍नक संघर्ष दू धरातलपर मुखर होइत अछि‍- एक दि‍श जौं जीवन एवं मानवताकेँ बचाएवा लेल अछि‍ तँ दोसर दि‍श रचनात्‍मकताक संघर्ष सेहो दृष्‍टि‍गोचर होइत अछि‍। प्रवासी जीक रचना जौं एकहि‍ संग जटि‍ल और कठि‍न अछि‍ तँ दोसर दि‍श सहज और सरल। एहि‍ दू वैपरि‍त्‍यक मध्‍य ई अपनाकेँ साधि‍ लेने छथि‍। जेना मानवताकेँ अपन शब्‍द-वाहन दऽ हम जगवै छी कोनो सत्‍यक पहि‍ल कल्‍पना- कऽ हम कवि‍ कहवै छी। वर्तमानकेँ जे भवि‍ष्‍यदर्पणमे देखि‍ रहल छी। तेँ अनन्‍त दि‍श काव्‍याध्‍यात्‍मि‍क स्‍वरकेँ साधि‍ बढ़ल छी।
     प्रवासी जीक काव्‍यमे अनुभव जगत अत्‍यन्‍त व्‍यापक अछि‍। साहि‍त्‍यक प्रत्‍येक दि‍व्‍यामे हि‍नक रूचि‍ अन्‍त धरि‍ बनल रहलनि‍। संस्‍कृति‍, वेद-पुराणसँ लऽ कऽ संस्‍कृति‍ कलासि‍क्‍स अछि‍ कतेको वेद अछि‍ जाहि‍मे प्रवासी जी डुवल रहैत छलाह। ताहि‍ कारणें हि‍नक रचना संसार वैवि‍ध्‍यपूर्ण सम्‍पन्नतासँ परि‍पूर्ण अछि‍। एहि‍ दृष्‍टि‍ए प्रवासी जीकेँ स्‍मरण करैत छी तँ जे कवि‍ता आँखि‍क सोझा आबि‍ जाइत अछि‍ ओ थि‍क- आब चुप रहने चलत नहि‍ काज, लाचार युद्धि‍ष्‍ठि‍र छी, बाजू अछि‍ जनतन्‍त्र कतए। हमरे पि‍रवेशक रंगीन झूठ, कहवामे असुवि‍धा अछि‍, परशुराम चाही, मोनक वैशालीमे इत्‍यादि‍।
     समयक शाश्‍वतमे प्रवासी जी मृत्‍युकेँ जीवनक वि‍कास मानलनि‍, मृत्‍यु बोध हि‍नका जीवनक प्रति‍ आशावादी बनौने रहलनि‍, मृत्‍युकेँ सृष्‍टि‍मे जीवनक सतत् प्रक्रि‍या और ओकर क्रमगत वि‍कासक रूपमे स्‍वीकार करैत, शाश्‍वत सत्‍यक उद्धाटन करैत कहलनि‍- हमर कैलास हमरेसँ पुछैए जे हम के छी, हमर जि‍हवका शय्याकपर- हमर शब्‍दो सुतैए नहि‍। प्रवासी गीत बन्‍हकी राखि‍ कऽ ई गजल अनने छी, परीक्षा अछथ्‍ की एकरो- क्‍यो पढ़ैए वा सुनैए नहि‍। मुदा हि‍नक मृत्‍यु वोध जीवनक प्रेरक वोध थि‍क, जीवन और समयक शाश्‍वत श्रृंखलासँ एक होएवाक वि‍जय उद्घोष थि‍क।
     अत्‍यन्‍त समृद्ध शि‍ल्‍पक स्‍वामी प्रवासी जीक भाषा साधल और तापसँ युक्‍त छन्‍हि‍। ओ भाषाकेँ बहुत सचेत होइत सहज मुदा अनुभव-गम्‍यएटा प्रदान कएने छथि‍। भाषाक उपमान एतेक टटका और प्रभावी छन्‍हि‍ जे पाठककेँ सहजहि‍ बान्‍हि‍ लैत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी बोल-चालमे भाषाक श्‍लेषात्‍मक शक्‍ति‍क प्रयोग करैत भाषाक सर्वथा एकटा नव मि‍जाज देलनि‍ अछि‍ और शि‍ल्‍पमे हि‍नक प्राकृति‍क वातावरणकेँ पूर्त करवाक वि‍शि‍ष्‍टता सर्वथा अनुपम छन्‍हि‍।
     वस्‍तुत: एकटा इमानदार रचनाकारक नि‍यति‍ यएह होइत अछि‍ जे ओ सम्‍पूर्ण वि‍श्‍वक काल-कट वि‍ष अपन हृदएमे धारण करैत, जीवन मंथनसँ नि‍कलल अमृत रचनाक माध्‍यमसँ समाजकेँ प्रदान करैत अछि‍। यएह रचनाकारक आत्‍मदान होइत अछि‍। वस्‍तुत: कलाकार नि‍रन्‍तर अपन व्‍यक्‍ति‍गत मोनकेँ एक महानतर मोनमे, और अपन क्षणि‍क अस्‍ति‍त्‍वकेँ एक वि‍शालतर अस्‍ति‍त्‍वक उपर ि‍नछावर करैत रहैत अछि‍। अपन नि‍जी व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ एक वृहत्तर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक नि‍र्माण मि‍टवैत रहैत अछि‍। यएह मि‍टनाइ साहि‍त्‍यक अमरताक मूलाधार होइत अछि‍, कि‍एक तँ भवि‍ष्‍यक उज्‍ज्‍वल वाट एतहि‍सँ नि‍कलैत अछि‍। मानव मूल्‍यक नि‍र्माण एतहि होइत अछि‍। सपनाक नीव सेहो अछि‍ धरातलपर राखल जाइत अछि‍। वस्‍तुत: प्रवासी जी अपन सम्‍पूर्ण रचनामे एहने मानवीय आस्‍था और जि‍जीवि‍षाक इवारत रचि‍ अमर भऽ गेल छथि‍।
 २.
किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी

चलनमे जे आबि जाए वैह परम्परा बनि जाइ छै। आ लोक द्वारा ओतैसँ ओकरा उघबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। आ आगू पीढ़ी दर पीढ़ी ओ स्वयं हस्तान्तरित होइत आगाँ बढ़ल चलि जाइत अछि। मुदा जे अपन परम्परा ठाढ़ करबा लेल पुरना परम्पराकेँ तोड़ि वा धकेल कऽ अपन अलग रस्ता बनबैत अछि ओकर सर्वग्राही हएब कठिनाहे नै वरन् असम्भव होइत छैक। एहिना मैथिली लघुकथा मैथिलीक आने विधा जकाँ हिन्दी वा अन्यान्य भाषाक देखाउँसे लिखाए तँ लागल मुदा लगभग तीन दशकक स्वतंत्र यात्राक पछातियो अपन स्वतंत्र विधा वास्ते अपने दुरापर अछोप नहाइत ठाढ़ बुझना जाइत अछि।
अपन शैशवावस्थामे सभ भाषाक लघुकथा कथाक छेँट वा आकार मात्रे लघु भऽ सोझाँ आएल। जेना मैथिलियोमे सैह भेल। प्रारम्भिक अवस्थामे कियो लघुकथाक प्रकृति बुझबासँ बेसी एकरा लिखि अपन नामकेँ एकटा आर विधासँ जोड़बाक लौल केलनि। लौल शब्दक प्रयोह ऐ द्वारे जे ओइ विधाक रचनासँ तारतम्यता वा नियमितता नै राखि अपन पारम्परिक विधाक संग सटल रहि गेला। जँ ओ सभ प्रारम्भेसँ ऐ पर ध्यान देने रहितथि तँ शाइत इहो मोकाम पौने रहैत। मैथिलीयो लघुकथा आन भाषाक लघुकथासँ नव नै अछि। मुदा आइ हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीयो भाषाक लघुकथा अपन मोकाम बना लेवामे सक्षम भऽ गेल अछि। यथा ओड़िया, असमिया, मलयालम। मुदा मैथिली लघुकथा आइयो देहरिये-दुरुखे अछोप नहाँइत बौआइत देखाइत अछि।
प्रारम्भमे कथाकार आ कवि सबहक समवेत उद्वेगक परिणामे जनमल मैथिली लघुकथाकेँ अपन शैशव कालक सुखद परिणाम कहल जा सकैछ जे लघुकथाक बीया मैथिलीयोमे बागि देल गेल।
समयान्तरे ई जेना-जेना आन विधासँ विलगल गेल तेना-तेना ऐ रचना प्रक्रियाक घनिष्ठता गद्य रचनाकार संग भेल गेल। मुदा ओहि समयक स्थापित सभ कथाकारक ई उत्कंठा नै छलनि आ नै रहलनि जे कथे जेकाँ लघुकथोपर अपन छाप रखितथि। ओना ई सत्य अछि जे कथाकार जँ लघुकथाक स्वरूप (प्रकृति) वा शिल्प नै पकड़ि सकलाह तँ ओ नीक कथाकार भलहिं होथु मुदा नीक लघु कथाकार किन्नहुँ नै भऽ सकैत छलाह। प्रायः तहू डरे शुरुआतीमे लघु कथा लेखनक पछाति ओ सभ एहि विधासँ अपन हाथ पएर समेटिये लै मे अपन कबिलताइ बुझलनि, जे मैथिली लघुकथाक लेल अशुभ संकेत दैए।
कथाकारक उदासीनताक कारणे सेहो एकरा अछोप सन रहबाक लेल ग्रसित केलकै। पूर्वार्द्धमे जे कथाकार सभ एकरा लिखलनि ओहिमे सँ किछु गीनल, बीछल कथाकार एकरा लिखैत रहि गेलाह जाहिमे शैलेन्द्र आनन्द, तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन, परमेश्वर कापड़ि, सुस्मिता पाठक, चण्डेश्वर खाँ, नवीनचन्द्र कर्ण सदृश कथाकारक नाम उल्लेखनीय अछि। समयान्तरे उपरोक्त अधिकांश रचनाकार ऐ सँ विमुख होइत गेलाह। सम्प्रति तीन गोट रचनाकार यथा तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी आ चण्डेश्वर खाँ अपन निरन्तरता बनौने छथि, जाहिमे वियोगीजीक ऐ विधाक प्रति कएल काज ऐतिहासिक वा अविस्मरणीय कहल जा सकैत अछि। ऐ पीढ़ीक सशक्त कथाकार श्री विभूति आनन्दक ठाम ठीम लघुकथा देखबा-पढ़बामे आएल। हुनकर लघुकथाक प्रति उदासीनता वा कथाक प्रति आदर्शता की कहि सकैत छी? एकर प्रामाणिकता हुनकासँ भेल दूरभाषिक सामान्य वार्तालापेँ एना सोझाँ आएल। ओ कहलनि- शुरुआतमे किछु लघुकथा लिखलौं, मुदा बादमे जे लघुकथा सभ लिखै छी ओ जहाँ चारि-पाँच गोट लघुकथा होइत छैक तँ एकटा कथा बनि जाइत अछि। एकदम अनसोहाँत लागल। हमरा विचलित केलक हुनक ई वाक्य। मुदा अगिले क्षण ध्यान ओतऽ टिकल- ओ कथा विधाक निस्सन हस्ताक्षर छथि। हुनक सोच कथाक प्रति गम्भीर छनि। तेँ हुनक कोनो छोट-पैघ सोच कथाक प्रतिरूप होइछ।
कारण जे किछु रहौ, हुनका सनक आनो कथाकारक एहि सोचसँ लघुकथाक प्रति उदासीनता स्पष्ट झलकैए। हम बड्ड आह्लादित भेलौं विदेह ई-पाक्षिकक अंक ६१मे अग्रणी पीढ़ीक कथाकारक रूपेँ फराक अस्तित्व राखऽवाली शेफालिका वर्मा जीक लघुकथा देखि। जे शिल्पक आ कथानकक दुनू दृष्टियेँ आ संपूर्ण रूपेँ प्रतिनिधि लघुकथाक श्रेणीमे राखऽबला छल।
मैथिली रचनाकार द्वारा प्रारम्भमे एकरा नव चीज बुझि लघुकथा लेखनमे अपन उपस्थिति तँ दर्ज कराओल गेल मुदा समयान्तरे हुनका सभकेँ एहि विधाक रचनाक संग उत्सुकता वा जुड़ाव नै बनल रहबाक प्रमुख कारण रहल जे हुनका सभकेँ एहि विधा मादेँ आगाँ कोनो आर्थिक वा साहित्यिक लाभ दूर-दूर धरि नै देखा पड़ल हेतैन। तकरो ऐ सँ विमुखताक प्रमुख बिन्दु मानि सकैत छी। आर्थिक लाभसँ तात्पर्य जे लघुकथाक माध्यमेँ ओ कोनो मंचपर नै बजाओल जा सकैत छलाह, कारण जे सरकारी तँ दूर निजी रूपेँ सेहो एकर कोनो मंच आइ धरि स्थापित नै भेल अछि। जेना आन विधामे किछु तथाकथित रचनाकार वरु अस्तित्व नै बना पाओल होथु, मुदा कतौ सरकारी वा गएर सरकारी लाभक बेर अबै यथा रचना प्रकाशन वा रचना पाठ्ज- जतऽ पारिश्रमिक वा किराया भत्ता भेटौ तँ ओतऽ धरि भाइ-भैयारिये वा जी हुजुरिये, पछिलगुआ संस्कृतिक संचरण करैत स्थापितो रचनाकारकेँ धकिया, कात कऽ अपन खुट्टा गारि लैत छथि। ओहोन कोनो प्रकारक लाभक आशा हुनका सभकेँ दूर-दूर धरि दृष्टिगोचर नै भेलनि वा नै भेल हेतैन तेँ अपनाकेँ ऐ विधासँ कात केने रहलाह। ऐ विधासँ साहित्यिक लाभ सेहो भेटैबला नहि। साहित्यिक लाभक अर्थ जे- जे किछु रचनाकार ऐ विधामे निःस्वार्थ भावे लिखैत रहि गेलाह, तिनकर एखन धरि लघुकथाकारक रूपेँ पहिचानक कोनो आशा नै आ ने मैथिली लघुकथा विधाक फराक कोनो जग्गह भेटि सकल।
हँ, दू गोट रचनाकार अप्पन करनीये मैथिली लघुकथाकारक रूपमे देखार तँ भेलाह। श्री तारानन्द वियोगी, जिनकर शिलालेख लघुकथा संग्रह आ कर्मधारय लघुकथाक समीक्षात्मक पोथी एवं प्रदीप बिहारी जिनक खण्ड-खण्ड जिनगी लघुकथाक संग्रह प्रकाशित अछि। मुदा मैथिलीक मठाधीश सभ द्वारा नै उठलौ तँ भारी तँ लगलौबला कहावतकेँ चरितार्थ करैत कहल गेल- दुनू गोटे पाइबला लोक छथि तँ अपन संकलन प्रकाशित कऽ लैत छथि तै सँ की लघुकथाकार कहेता? मुदा हिनक श्रमक महत्व वा संग्रहक महत्वकेँ बुझबाक प्रयास नै कएल गेल। महत्व नै देबाक ऐतिहासिक कारण रहल। उपरोक्त दुनू व्यक्तिक गएर ब्राह्मण हेबाक। मैथिलीमे बभनौटी (बाभनवाद) अदौसँ चलि आबि रहल अछि। जखनकि प्रारम्भ सँ ई लिखतममे पूर्णतः कायस्थक द्वारा संचालित भाषा छल (जकरा कि बाभान आकि रार ककरोसँ कोनो रागद्वेष नै छलै)। भाभनक भाषा तँ संस्कृत छल (बोली-चालीमे सभ कियो मैथिलीये बजै छल) जकरा ओ पंडिताइक माध्यमे भजबैत छलाह। मुदा जखन मैथिली स्थापित होमऽ लगलै, जखन ऐ मे कमाइक जोगार देखेलै तखन सभ ठाम कुण्डली मारि बैसि गेला ब्राह्मण बभनौटी देखाबऽ लगला। ओइमे ठठल रहल एकमात्र कर्ण कायस्थ। रारकेँ ई सभ ऐ तरहक कोनो गतिविधिमे टपऽ नै देबाक संकल्प लेलनि आ जकर मूल वैचारिक भाषा मैथिली छलै ओएह सभ ऐ सँ दूर कऽ देल गेलाह (रमानन्द रेणु, मिथिलांगन, अप्रैल-जून २०१०)- सएह दुराग्रह। पक्षपात मैथिली लघुकथाक संग सेहो भेल। ओना आब ई मिथक टूटि गेल अछि।
मैथिलीक भाषा सहित्यिक विकासक मादेँ बहुत रास सरकारी, गएर सरकारी संस्थान काज कऽ रहल अछि। यथा- साहित्य अकादेमी, दिल्ली; मैथिली अकादमी, पटना; भोजपुरी-मैथिली अकादमी, दिल्ली; पूर्व क्षेत्रीय भाषा केन्द्र, भुवनेश्वर; भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)मैसूरक अतिरिक्त किछु निजी संस्था सभ जे प्रकाशन सेहो करैत अछि। एकर जेकियो प्रतिनिधि बनाओल गेलाह ओ सभपारम्परिक विधा यानी कविता, कथा किछु हद तक निबन्धक वास्ते विभिन्न तरहक कार्य/ गोष्ठी केलनि। हँ ठाम-ठीम नाटकक वास्ते सेहो काज भेल। मुदा लघुकथा मादेँ हिनका सबहक स्वतंत्र सोचब तँ दूर कथा संग्रह प्रकाशनक समय कथा संग्रहमे सतौत या पितियौत भाय नहाँइत संग लगा सकैत छलाह। आ ओहि माध्यमे ई थोड़े आओर जगजियार होइत।जेना कि तमिष वा मलयालम साहित्यिक संस्थाक प्रतिनिधि सभ कऽ रहल छथि आ ई दुनू भाषाक लघुकथा अपना बलेँ देखार भेल अछि। मैथिलीमे तँ दूर-दूर धरि एहेन सोच या काज देखार भऽ सोझाँ नै आबि सकल अछि। ताहिमे प्रमुख दूटा कारण हमरा जनतबेँ प्रमुख अछि- पहिल ओहि प्रतिनिधि सभक लघुकथाक प्रति अज्ञानता, दोसर ओइ प्रतिनिधि सबहक नजरीये लघुकथाक उसराहा खेत।
मध्यम पीढ़ीक रचनाकार सभमे सँ किछु लोक अप्पन सर्जनात्मक ऊर्जा स्रोतेँ ऐ विधाक अलग जमीन तैयार करबाक अथक प्रयास केलनि। सत्य कही तँ वैह सभ ऊसर खेतकेँ कोड़ि-पटा कऽ एकर आधार रखबामे सक्षम भेलाह। हँ, ओ आधारकेँ मजगुत करैत एहि जमीनकेँ तीन फसिला सन बनेबाक वा हरल-भरल बनेबाक पूर्ण श्रेय नवका पीढ़ीकेँ जाइत अछि। सत्य! नवका पीढ़ीक किछु रचनाकार सक्रिय आ स्वतंत्र रूपेँ लघुकथाकेँ मोकाम धरि लऽ जेबाक लेल अपन रचना स्रोतक सर्वस्व ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि, जाहिमे सभसँ ऊपर नाम अबैत अछि श्री अनमोल झा जीक, जे लगभग डेढ़ दशक पहिने (११९४-९५ क करीब) अपन लघुकथा लेखन, कथा गोष्ठीक माध्यमे शुरू कऽ लघुकथा माध्यमे अप्पन पहिचान बना पौलाह अछि। ओ एखन धरि लगभग तीन सए लघुकथा रचना कऽ गेल छथि, जाहिमे सँ सए सँ ऊपर लघुकथा विभिन्न पत्र-पत्रिका/ स्मारिकामे बहार भऽ देखार भेल अछि। ओना एखन धरि कोनो संकलन नै बहार भऽ पौलनि अछि। तकर पछाति नवका पीढ़ीक ऊर्जावान आ प्रयोगवादी रचनाकार अहीं केँ कहै छी संग्रह लऽ जोरदार उपस्थिति दर्ज करौलनि अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झाजी, जे मूलतः लघुकथाक धुरझार लेखन करैत अपन दोसर लघुकथा संग्रहक शीघ्र प्रकाशनक प्रतीक्षारत छथि। अही पीढ़ीक तेजस्वी पत्रकार बहुविधानुरागी श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन बहुविधाक संगोर- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनकमे किछु बीछल लघुकथा लऽ जोरगर उपस्थिति देखौलनि अछि।एहने प्रमुख रचनाकारमे नाम अबैछ मुन्नाजीक जे वर्ष १९९४ मे कथागोष्ठीक माध्यमे अपन पहिल रचना नामरदजाहिपर सहयात्री मंच, लोहना (मधुबनी) द्वारा बहसक आयोजन कएल गेल छल, आ पहिल प्रकाशित रचना लघुकथा- काँद भारती मण्डनक माध्यमे शुरू कऽ एखन धरि मूलतः अही विधाक रचना आ आलेखमे ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि। एकर अतिरिक्त मधुकर भारद्वाज, रघुनाथ मुखिया जीक सेहो रचनात्मक रूपेँ समृद्ध रचना सभ देखएल। गोटा-गोटी कऽ ठाम ठीम आर कतेको गोटे आब अय विधामे सहयोगी छथि।
उपरोक्त नामसँ अलग एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्री चण्डेश्वर खाँ जीक जे मध्यम पीढ़ीसँ नवका पीढ़ीक बीच लघुकथा रचनाक निरन्तरताक बलेँ एकटा सेतु (पुल)क काज कऽ रहल छथि। ई सत्य अछि जे किछु गीनल वा बीछल रचनाकारक समूहे एकर स्वतंत्र विधामे स्थापित हेबामे अखन किछु भांगठ बुझना जाइत अछि। कोनो एहेन विधा जकर गोटेक दर्जन सक्रिय रचनाकार नै हुअए तँ ओकर स्वतंत्रता आन्दोलन भारतक स्वतंत्रता आन्दोलन १९४२ आ १९४७ क नै वरन् १८५७ क संग्राम सन भऽ कऽ रहि जाएत।
नवका पीढ़ीकेँ एकरा छटपटाहटसँ तँ बाहर आनि लेलक अछि आ आब एकर उग्रास होइत बुझैए। मुदा ऐ नवका पीढ़ीक एहेन रचनाकार सबहक कथालोचक वा समीक्षक द्वारा कोनो नोटिस नै लेल गेल अछि। ओना ई पीढ़ी पक्षपात/ गुटबाजी वा राग-द्वएषसँ दूर निःस्वार्थ भावेँ परिश्रम करैत सीढ़ी दर सीढ़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। मुदा कखनो कऽ ई सभ उपरका पीढ़ीक असहयोगक चलते वा कुटिलचालिये निरुत्साहित (मुदा अनाथ नै) सन अनुभव करैत अछि। एकर अतिरिक्त किछु लोक (रचनाकार) जे मैथिली भाषासँ इतर (यथा हिन्दी, बांग्ला एवं असमिया इत्यादि) पत्र-पत्रिकामे मैथिली कथा साहित्यक मादेँ लिखलनि, ओहो सभ ऐ मे लघुकथाक चर्चासँ अपनाकेँ एगदम दूर रखलनि। एकर दूटा प्रमुख कारण सोझाँ अबैत अछि-१.जे ओहि लेखक/ रचनाकारकेँ लघुकथाक ज्ञाने नहि हेतैन २.लघुकथाकेँ अखन अस्तित्वहीन मानि कऽ अछोप सन विलगा कऽ रखबाक साजिश भऽ सकैए।
कपि‍लेश्‍वर राउत

मि‍थि‍लाक वि‍कास बाधा-

मुख्‍य रूपसँ मि‍थि‍लाक जे क्षेत्र अछि‍ से उत्तरमे नेपाल, दक्षि‍णमे गंगा, पूवमे बंगाल, पश्‍चि‍ममे उत्तर प्रदेश। जकर जीबक पूख्‍य आधार कृर्षि अछि‍। मुदा अपना अहि‍ठाम जाति‍ व्‍यवस्‍था, धर्म व्‍यवस्‍था, लि‍ंग व्‍यवस्‍था तेना ने समाजकेँ जकरने अछि‍ जे एहि‍ क्षेत्रक वि‍काशमे मूख्‍य रूपसँ बाधक अछि‍। एतेक परि‍वर्तन भेलाक वादो समाजमे रूठि‍वादि‍ता, सामंतसोच हर व्‍यक्‍ति‍केँ जकरने अछि‍। सराध, वि‍याह, उपनएनमे जरूरतसँ बेसी खर्च कऽ देव कि‍एक तँ अपन रूआवकेँ प्रर्दशि‍त करबाक लेल। हर काजकेँ धर्म आधारि‍त मानव, ई सोलकन अछि‍, हम उच्‍च वर्ग छी, स्‍वर्ग, नरकक फेरा इत्‍यादि‍ समाजकेँ जकरने अछि‍। मन गढ़ंत राजा-रजवारक खि‍स्‍सा-पि‍हानी कहि‍ समाजकेँ बरगलेने रहब ई सभ मि‍थि‍ला वि‍कास आ मि‍थि‍लावासीक लेल अभि‍शाप भऽ गेल अछि‍।
     जावत धरि‍ एहि‍ सभसँ उपर उठि‍ सभकेँ अप्‍पन भाय-बन्‍धु बूझि‍ उन्‍नत वैज्ञानि‍क आधारि‍त कृर्षि, बाढ़ि‍ रोदीसँ नि‍जातक लेल व्‍यवस्‍था, जाति‍ व्‍यवस्‍थाक लोप, दान-दहेजक समाप्‍ति‍, सामन्‍ति‍ सोचकेँ नइ बदलव तावत धरि‍ मि‍थि‍ला वासीकेँ ि‍वकासक कल्‍पना केनाइये बेकार अछि‍। मि‍थि‍ला क्षेत्रक माटि‍ तँ एहेन अछि‍ जे सौंसे संसारमे एहन माटि‍ कतो नै छै। अपना अहि‍ठाम तँ जे फसल, जे तरकारी, जे फल उपजबए चाहब से उपजत आइ जे मि‍थि‍लाक मजदूर पंजाव-हरि‍याना पलायन कए रहल अछि‍ से तुरन्‍त रूकि‍ जएत। कि‍सानकेँ जे आइ मजदूर नै भेटि‍ रहल छन्‍हि‍ आ दोसर दि‍स एहि‍ठामसँ मजदूर दोसर राज्‍यमे काम करैले जाइत अछि‍ से रूकि‍ जेतै। समाजमे समरसता एते। सबहक दूख अपन दूख, सबहक सूखकेँ अपन सुख बुझए लागत तँ समाज स्‍वत: बदलि‍ जेतै। एखन जे गौर मौगी गौरबे आन्‍हर बनल छी। से स्‍वत: मेटा जएत। जहि‍ना अपना एहि‍ठाम राजा जनक कृषि‍केँ अपनाए कऽ राज चलौलनि‍ आ अष्‍ट्रावककेँ गुरूवार बनौलनि‍ तहि‍ना हमरो सभकेँ करए पड़त। हार-चामक फेरासँ उपर उठए परत। आ तखने सर्वे भवन्‍ति‍ सुखि‍ना सर्वे सन्‍तु नि‍रामया भऽ सकैत अछि‍। अपन मि‍थि‍ला कोनो राज्‍यसँ वि‍कसि‍त बनि‍ सकैत अछि‍।
     एकटा भाखरानांगल डेमसँ जँ पंजाब-हरि‍याणा भारतक सि‍रताज भऽ सकैत अछि‍ तँ हमर मि‍थि‍ला कि‍सान ने भऽ सकैत अछि‍। कोशीमे ब्राहक्षेत्र आ कमलामे शीशा पानी आ वागमतीमे नूनथरमे डेम बना देलासँ मि‍थि‍ला तँ स्‍वर्ग बनि‍ए टा जाएत आ हम सभ आनो-आनो राज्‍यकेँ वि‍जली दऽ सकैत छी। जहि‍सँ आनो राज्‍य वि‍कसि‍त हएत। हर खेतकेँ पानि‍ आ हर हाथकेँ काज भेट जएत। तँ जँ मूइलाक वाद जे स्‍वर्ग जाइत छी से जि‍वतेमे स्‍वर्गक भोग करए लागव। एकटा कल्‍पना सुनैत छि‍ऐ जे मि‍थि‍लाकेँ मण्‍डन मि‍श्रक सुग्‍गा आ पानि‍ भरनि‍यो संस्‍कृतेमे गप्‍प करैत छल से आइ मि‍थि‍लामे ८० प्रति‍शत मूर्ख कोना भऽ गेल। जखनि‍ कि‍ आओर आगाँ मुहेँ हेबाक चाही। हमरा समझमे एकटा मूल बात अबैत अछि‍ जे कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेषमे अहंगक भावना। जहि‍ना संस्‍कृत भाषा कि‍छु व्‍यक्‍ति‍ वि‍शेष अपन खानगी बूझि‍ कोठी कन्‍हेपर राखल रहि‍ गेल आ आम जनतामे प्रचार-प्रसार नहि‍ भऽ सकल तहि‍ना मि‍ि‍थलाक मैथि‍लीयो भाषाकेँ ई रूप नै देखए परए।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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