Monday, September 13, 2010

'विदेह' ६५ म अंक ०१ सितम्बर २०१० (वर्ष ३ मास ३३ अंक ६५) PART II



-गजेन्द्र ठाकुर
यू.पी.एस.सी.-
मैथिलीक उत्पत्ति आ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)
३. अवहट्ठ
अपभ्रंश जखन समापनपर छल तखन मोटामोटी एगारहमसँ चौदहम शताब्दी धरि अवहट्ठ साहित्यिक भाषाक रूपमे उपस्थित रहल। मैथिलीसँ एकर निकटताक कारण एकरा मैथिल अपभ्रंशसेहो कहल गेल आ ई अपभ्रंशक प्रकारक रूपमे सेहो मर्यादित रहल।
विद्यापतिक स्वयं कीर्तिलता आ कीर्तिपताकाक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि मुदा ताहूसँ पूर्व एहि शब्दक प्रयोग भाषाक सन्दर्भमे पहराज केने छथि पाउअकोसमे। अद्दहमाण अपन कृति संदेशरासकमे आ वंशीधर प्राकृत पंगलम् क टीकामे अवहट्ठक भाषाक रूपमे उलीख कएने छथि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ। अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारोपाक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। खास कऽ विद्यापतिक अवहट्ठमे मैथिली वर्तनीक इकार, ओकार, आ अनुनासिकक बदलामे कचटतपवर्गक पाँचम अनुनासिक वर्णक प्रयोग देखबामे अबैत अछि मुदा हुनकर अवहट्ठ भाषामे  कखनो काल बुझाइत अछि जे ई भाषा खाँटी मैथिली अछि तँ कखनो एहिमे प्राकृत, फारसी, गुजराती-सौराष्ट्री अवधी आ कोशली भाषाक शब्दावलीक बेशी प्रयोग भेटैत अछि। आ सैह कारण रहल होएत जे हुनकर अवहट्ठ सर्वदेशीय (राजशेखर कहै छथि विश्व-कुतुहली”) बनि सकल। एकर दूटा देवनागरी पाण्डुलिपि दू ठामसँ- गुजरातक स्तम्भतीर्थमे आ उत्तर प्रदेशक फतेहपुर जिलाक असनी गाममे भेटल आ एकटा मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि नेपालसँ भेटल।  ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठ (अवहट्ठ) केँ मैथिल अपभ्रंशताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक कीर्तिलताअवहट्ठमे अछि, मुदा चर्या गीतवर्ण रत्नाकरकीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि।  दामोदर पंडितक उक्ति व्यक्ति प्रकरण  सेहो कीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती अछि मुदा पुरान अवधी आ पुरान कोशलीक प्रतिमान प्रस्तुत करैत अछि आ अवहट्ठसँ लग अछि। संगे ईहो सत्य जे कीर्तिलता आ कीर्तिपताकामे विद्यापति अवहट्ठक कतेको प्रकारसँ प्रयोग करै छथि। पहिने तँ ई अपभ्रंशक पर्यायक रूपमे प्रयुक्त होइत छल मुदा जेना जेना अपभ्रंशक विशेषताकेँ ई छोड़ैत गेल आ आधुनिक भारतीय भाषाक व्याकरणिक विशेषताक, खास कऽ मैथिलीक व्याकरणिक विशेषताक आधार बनऽ लागल तखन ई अपभ्रंशसँ पृथक् अवहट्ठक रूप लेलक। एकर प्रमुख व्याकरणिक विशेषता अछि- स्वर संयोग, क्षतिपूर्तिक लेल दीर्घीकरण, व्यंजनक अपन खास विशेषता, रूपक विचार ( लिंग-वचन), निर्विभक्तिक प्रयोग, कारक-परसर्ग, कारक विभक्ति, सर्वनाम, विशेषण, सार्वनामिक विशेषण, क्रिया, कृदन्त, आज्ञार्थक, पूर्वकालिक, संयुक्त क्रिया, क्रिया विशेषण, शब्दावलीक विशेषता, पूर्व स्वरपर स्वराघात, स्वर सानुनासिकतामे परिवर्तन, अकारण सानुनासिकताक प्रवृत्ति, एक संग अनेक स्वरक प्रयोग, अक्षर लोप, परसर्गक स्थानपर मूल शब्द, सर्वनामक प्रचुरता, क्रियापदक विकास आ वाक्य रचना।
अवहट्ठ भाषामे जैन धर्मसँ सम्बन्धित रचना ढेर रास अछि आ ओहिमे शौरसेनीक प्रभाव अछि।अवहट्ठक मुख्य क्षेत्र छल मान्यखेत, गुजरात, बंगाल आ मिथिला। जैन धर्मसँ सम्बन्धित लोक मुख्य रूपसँ मान्यखेतमे रहथि। वज्जालग्गश्वेताम्बर मुनि जयवल्लभ द्वारा संकलित सुभाषितक संग्रह छथिजाहिमे अवहट्ठक प्रभाव दृष्टिगोचर होइत अछि।शालिभद्र सूरीक भरतेश्वर बाहुवली रास”, एकटा दोसर शालिभद्र सूरीक पंच पाण्डव चरित”, स्थूलिभद्र रास, जयशेखर सूरीक नेमिनाथ फागु”, सकलकीर्तिक सोलह कारण रासक अतिरिक्त मौखिक काव्य जेना बैद्ध सिद्ध साहित्य, डाक, धर्ममंगल काव्य, शून्यपुराण, माणिकचन्द्र राजार गान, लोरिकाइन जनक मध्य आएल। अवहट्ठक बाद ब्रजबुली द्वारा राय रमानन्द, शंकरदेव आ चैतन्यदव लोकभाषाक माध्यमसँ जन धरि पहुँचलाह। अवहट्ठक प्रभाव ब्रजबुली आ मैथिलीपर पड़ल। द्वारा  बारहम शताब्दीक डाकार्णव नेपालमे रचित अछि जकर लिपि मिथिलाक्षर आ भाषा अवहट्ठ अछि। मिथिलामे कर्णाट आ ओइनवार राजवंशक कालमे अवहट्ठमे रचना कएल गेल।सिद्ध साहित्य, बौद्धक दोहाकोश-चर्यागीत आ ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकरमे अवहट्ठक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल छल। मुनिराम सिंहक पाहुड दोहा आ बौद्ध धर्मक वज्रयानक ग्रन्थमे सेहो अवहट्ठक रूप देखबामे अबैत अछि। दामोदर पंडितक उक्तिव्यक्तिप्रकरण अवहट्ठमे रचित अछि, ई संस्कृत सिखेबाक ग्रन्थ अछि। बारहम शताब्दीक पूर्वार्धमे उद्दहभाण संदेश रासयक रचना कएलन्हि, रचयिता स्वयं एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहै छथि। प्राकृत् पैंगलम् -जे छन्दशास्त्रक संकलन अछि आ जकर संकलनकर्ताक नाम अज्ञात अछि- क टीकाकार सेहो एहि ग्रन्थक भाषाकेँ अवहट्ठ कहि सम्बोधित कएने छथि। विद्यापतिक कीर्तिलता आ कीर्तिपताका सेहो अवहट्ठमे रचित भेल।
अवहट्ठक अपभ्रंशसँ व्याकरणिक भिन्नता आ मैथिलीसँ सन्निकटता: दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ; पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह। संस्कृतक ऐ, औ क्रमसँ अइ, अउ ध्वनि बनि गेल आ ओहिसँ किछु आर स्वर बहार भेल। संस्कृतक बादबला भाषा खास कऽ मध्यकालिक भाषामे लगातार दू वा तीन स्वरक प्रयोगसँ ध्वनि आ लेखन दुनूमे विचित्रता आएल। आधुनिक भाषाक लेल आवश्यक छल जे पुनः व्यंजनक बेशी प्रयोग कऽ, तत्समक बेशी प्रयोग कऽ पूर्वस्थिति आनल जाए, जाहिसँ उच्चारण आ लेखन सरल भऽ सकए। क्रियाक अन्तमे आ आन पदक सभ स्थानमे स्वरकेँ संयुक्त करब प्रारम्भ भेल। एहिमे अवहट्ठक विशेषाता रूपमे परिगणित भेल। जेना टुट्टै=टूटै, गुण्णइ=गुणै, पइ=पै, रहइ=रहै, करउ=करौ, चअउर=चौरा, दुण्णउ=दूणौ, तउ=तौ, आअउ=आऔ।
 ऋ एहि तीन रूपमे ध्वनित होमए लागल। र्+अ, र्+इ , र्+उ आ मध्य रूप माने रि (र्+इ) एहि रूपमे स्थिर होमए लागल। जेना अमृत= अमिअ एहिमे मृ=मि भऽ गेल अछि।
स्वरमे किछु आर परिवर्तन भेल। शब्द प्रारम्भक स्वरक दीर्घ होएब स्वाभाविक लगैत अछि, जेना आँचल=आँचर। स्त्रीलिंगमे अन्तिम आ लुप्त होमए लागल जेना भिक्षा=भीख। स्वरक बहुलताबला शब्दमे सन्धि आ लुप्तीकरण बढ़ल, जेना धरित्री=धरती, उपआस=उपास।
अपभ्रंशक अंधआर=अंधार (संधि) बनि गेल।
कज्ज=काज बनि गेल (दीर्घ)
अंचल=आँचर (अनुनासिक)
व्यंजन ओहिना रहल मुदा ण कम आ ञ बेशी प्रयोगमे आबए लागल आ ड़, ढ़ ई दुनू नव व्यंजन आएल। क्ष=क्+ष बदलि कऽ ष्ख होमए लागल। न आ ल मे सेहो पर्याय बनल जेना नहिअ=लहिअ आइ काल्हि सेहो मैथिलीमे लोर आ नोर दुनू बाजल जाइत अछि।
उ सँ अन्त होमएबला संज्ञा रहल मुदा अ, , , , , ,ओ सेहो संज्ञाक अन्तमे आबए लागल। न्हि अन्तिममे लगा कऽ बहुवचन बनेबाक प्रवृत्ति बढ़ल, जेना युवराजन्हि। द्विवचन खतम भऽ गेल आ तकर बदला बहुवचनक प्रयोग भेल आ ताहि लेल सव्वउं (सभ)क प्रयोग प्रारम्भ भेल।
लिंगसँ विशेषणक रूप परिवर्तन आ लुप्तविभक्ति-निर्विभक्तिक प्रयोग बेशी होमए लागल। विशेषणक रूप परिवर्तित भेल। जेना अइस, एत्ते, कतहु, पहिल, चारु।
कारकक विभक्तिक संग सन, सउं, , माझ, केर, लागि आदिक प्रयोग होमए लागल।
पश्चिमी अवहट्ठमे विभक्तिक प्रयोग घटल मुदा पूर्वी अवहट्ठमे ए, हि विभक्तिसँ ढेर रास काज लेल गेल।
सर्वनाम कर्ता लेल हौ, तोञ, सो आ संबंध लेल मोञ, तुम्ह, तिसु प्रयुक्त होमए लागल।
क्रियामे करउँ, करसि, करथि प्रयुक्त होमए लागल। कृदन्त रूपमे पढ़न्ता, चलु, उपजु, गेल, भेल, कहल, मारल, चलल, करहुं, कहसि, जाहि, पावथि  प्रयुक्त होमए लागल।
संयुक्त काल जेना आवत्त हुअ प्रयुक्त होमए लागल।
भविष्यत् कालक पूर्वी रूपमे व लगैत छल आ पछबरिया रूपमे ह लगैत छल।
क्रियाविशेषणमे जनु, नहु,बिनु अबस प्रयुक्त होमए लागल।
पूर्व स्वरपर स्वराघात, जेना: अक्खर= आखर।
सर्वनामक संख्यामे वृद्धि भेल।
क्रियापदमे विकासक फलस्वरूप कृदन्तक प्रयोग वर्तमानकालमे बेशी होमए लागल।
आब वाक्यमे शब्दक स्थानक निर्धारण आवश्यक भऽ गेल। मोटामोटी कर्ता, कर्म आ आखिरीमे क्रिया राखल जाए लागल।
संयुक्त कालक प्रयोग सेहो आरम्भ भेल।
शब्दक पहिल अक्षरक स्वरक दीर्घ होएबाक प्रवृत्ति अवहट्ठमे बेशी अछि, स्त्रीलिंग शब्दमे शब्दक अन्तिम अक्षरक आ लुप्त होमए लागल। अनुनासिक शब्दक संख्यामे वृद्धि भेल। संज्ञाक लंग आ वचन तँ दुइयेटा रहल मुदा एकवचनक प्रयोग बहुवचनमे होमए लागल।प्रातिपदिक अधिकांशतः स्वरान्त अछि आ अकारान्त सेहो।विभक्तिक बदलामे परसर्गक प्रयोग होमए लागल। अपादान लेल हुंते, सउँ प्रयोगमे आबए लागल आ अधिकरण लेल माँझ, उप्परि आ एहि दुनू (अपादान आ अधिकरण) लेल कखनो काल चन्द्रबिन्दु टासँ काज चलि गेल, हिंविभक्ति सेहो कतेको कारकक लेल प्रयुक्त भेल आ विभक्ति सँ कर्म, करण, अधिकरण सभटाक भान होमए लागल। संज्ञाक एहि तरहक सरलीकरण सर्वनाममे सेहो देखबामे अबैत अछि। क्रियाक निर्माणमे सरलता आएल आ से भेल कृदन्तक बेशी प्रयोगसँ आ संयुक्त क्रियाक बढ़ोत्तरीसँ। भूतकाल लगा कऽ सेहो बनए लागल, आ भविष्यत् काल लगा कऽ सेहो, जेना थाकल, पढ़ब जे बादमे मैथिलीमे सेहो आएल।

पूर्व स्वरपर स्वराघातस्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरण अवहट्ठक मुख्य विशेषता अछि। अपभ्रंशक अक्खर, ठक्कुर आ नच्चइ क्रमसँ आखर, ठाकुर आ नाचइ भऽ गेल। स्वरक सानुनासिकतामे परिवर्तन भेल जाहिसँ पुरान निअममे परिवर्तन भेल। पहिने स्पर्श व्यंजनमे अनुस्वारक अभाव छल आ कचटतप क पाँचम वर्ण तकर बदलामे संयुक्त भऽ प्रयुक्त होइत छल। अपवादमे य सँ ह धरिक वर्णक उपस्थितिअहिमे अनुस्वार लगैत छल। पूर्व स्वरपर स्वराघात आ क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त युक्ताक्षरक पूर्वस्वरपर स्वराघातक संग अनुस्वार आबए लागल, जेना- ऊसास/ आंग/ आँकुस/ आँचर/ काँट/ लाँघि/ पाँच/ चाँद/ आँगन/
क्रमसँ
उस्सास/ अंग/ अंकुस/ अंचल/ कण्टक/ लघ्/ पंच/ चन्द्र/ अंगण/ क बदलामे आबि गेल। स्वरक क्षतिपूरक दीर्घीकरणक अतिरिक्त अनुस्वारकेँ ह्रस्व कएल जाए लागल आ आधुनिक मैथिलीक अकारण आनुनासिकताक प्रवृत्तिक आरम्भ भेल, जेना- कज्ज=काँज, कच्चुः=काँच, भग्ग=भाँग, ओष्ठ=ओंदिम।
अक्षर लोप: संकोच वा अक्षर लोपक कारणसँ अन्धकार=अन्हार, देवकुल= देउर, देवगृह=देवहा, कोट्टशीर्ष=कोसीस, उपवास=उपास, उत्तिष्ठ=उँट, सहकार=सहार, स्वर्णकार=सोनार, सुन्नाअर=सुन्नार, सहयार=साहार भऽ गेल।
परसर्गक प्रयोगमे वृद्धि: अपभ्रंशक परसर्गक प्रयोगमे अवहट्ठ कालमे आर वृद्धि भेल। जेना-
कर्ता- एन्ने
करण-सन, सउं
सम्प्रदान-लागि, लग्गि, लागे, प्रति, कारण
अपादान-सओ, हुत, हुते, हुंति, सिउ
संबंध- केर, कर, के, करेउ, कइ,
अधिकरण- माझ, ऊपर, माँझ, भीतर, माहि
सर्वनामक आधिक्य: कीर्तिलतामे जेन्ने, आ आन ठाम मोर, मेरहु, तोरा, तोहार, तोहर, तोरा आदि सर्वनामक प्रयोग प्रारम्भ भेल। संबधवाचक सर्वनाम- जञोन, जेन्ने, जस, जसु, जे; प्रश्न वाचक- केहु, कोए; अनिश्चयवाचक- कोइ, केहु; निजवाचक- अपन, अपनेहु, निअ आदिक प्रयोग होमए लागल।
कृदन्तक प्रयोग क्रियापदक विकसित रूप: आब कृदन्तक प्रयोगमे वृद्धि भेल जेना भूतकालक कृदन्तक प्रयोग वर्तमान जेकाँ होएब आ कखनो काल अपन पूर्ण रूपमे सेहो होएब।
वर्तमान लेल कृन्तक प्रयोग पढ़न्ता, कहन्ता, आवन्ता; भविष्यत् काल लेल करहुं, करिहि आ भूतकाल लेल कृदन्तक प्रयोग जेना चलु, लागु क प्रयोग भेल।
अन्तसँ आधुनिक तानिकलल अछि आ अन्तक प्रयोग बढ़ि गेल। संयुक्त क्रियाक प्रयोग प्रारम्भ भऽ गेल- जेना लेजोड़ि कऽ क्रिया बनाएब खाइले”; सामर्थ्यसूचक पार आ आरम्भसूचक चाह/ लागु क प्रयोग आरम्भ भेल।

४.मैथिली
ऐतिहासिक आधारपर भाषाक पारिवारिक वर्गीकरणमे अवहट्ठकेँ मैथिल अपभ्रंशताहि कारणसँ कहल जाइत अछि आ मागधी प्राकृतसँ सेहो एकर विकास दृष्टिगोचर होइत अछि। अवहट्ठ मैथिलीसँ लग रहितो शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंशसँ सेहो लग अछि, मुदा देशी शब्दक प्रयोगसँ एहिमे अपभ्रंशसँ बहुत रास व्याकरणिक परिवर्तन देखा पड़ैत अछि। विद्यापतिक कीर्तिलताअवहट्ठमे अछि, मुदा चर्या गीतवर्ण रत्नाकरकीर्तिलतासँ पूर्ववर्ती होएबाक बादो पुरान मैथिली अछि आ अवहट्ठसँ सेहो लग अछि। भारोपीय भाषा परिवारमे मैथिलीक स्थान मोटा-मोटी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश आ अवहट्ठक ऐतिहासिक क्रममे अबैत अछि।

ध्वनि: दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोगगड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि), से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
पानि-पाइन-पैन
अछि- अ इ छ  ऐछ
छथि- छ इ थ छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
तखन प्रश्न उठैत अछि जे छथिकेँ छैथ लिखबामे की हर्ज? हर्ज अछि, कारण मिथिलाक बहुतो क्षेत्रमे छथि, छथी, पानि, पानी, पहुँचि, पहुँची सेहो बाजल जाइत अछि। से पानि, रहथि, पहुँचि लिखलासँ सभ क्षेत्रक प्रतिनिधित्व होइत अछि।
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए (उच्चारण सकै-ए)।
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा। पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- (उच्चारण संजोगने)
केँ/ के / कऽ
केर- (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) रामक आ संगे (उच्चारण राम के /  राम कऽ सेहो)
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- (उच्चारण राम सऽ)  रामकेँ- (उच्चारण राम कऽ/ राम के सेहो)।

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक?
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै
 अ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मन=मोन, वन=बोन (वर्तुल)
अ कखनो काल आ भऽ जाइत अछि, जेना- फंदा=फान, चन्द्र=चान (स्वराघात)
घर=घऽर (उच्चारण) (स्वराघात)
बुद्ध=बुद्धऽ (उच्चारण) (स्वराघात)
घमसान=घमऽसान (दीर्घक पहिनेक ह्रस्व स्पश्ट उच्चरित- स्वराघात)
क पहिने रहलापर उच्चरित होइत अछि- जेना पानि=पैन, मुदा विभिन्न क्षेत्रमे पानी, पानि बाजल जाइत अछि तेँ वर्तनीमे पानि, आगि लिखब उचिते अछि।
आ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि, जेना काका=कक्का।
इ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना रिवाज=रेबाज।
ऋ कखनो काल इ/ ई/ ऊ भऽ जाइत अछि जेना कृष्ण=किसुन, पृष्ठ=पीठ, वृद्ध=बूढ़।
अन्तमे क बदलामे इ लिखल जाइत अछि।
ऋ कखनो काल अ भऽ जाइत अछि जेना- वृषभ=बसहा, अहृदी=अहदी।
उ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना दुकान=दोकान
ऊ कखनो काल ओ भऽ जाइत अछि जेना मूल्य=मोल।
अए कखनो काल ए भऽ जाइत अछि जेना कएलनि=केलनि।
ऐ कखनो काल अइ/ अए भऽ जाइत अछि जेना भैया=भइया, पैर=पएर।
आ+ओ कखनो काल औ भऽ जाइत अछि जेना गमाओल=गमौल।
क कखनो काल ख/ ग भऽ जाइत अछि जेना पुष्करि=पोखरि, भक्त=भगत।
ष कखनो काल शब्दक प्रारम्भ वा अन्तमे रहलापर ख भऽ जाइत अछि जेना षष्ठी=खष्ठी, भेष-भूषा=भेख-भूखा।
क्ष कखनो काल ख भऽ जाइत अछि जेना क्षीर=खीर।
ज्ञ कखनो काल ग भऽ जाइत अछि जेना यज्ञ=जाग।
ग कखनो काल घ भऽ जाइत अछि जेना गर्ग=घाघ।
त्य कखनो काल च भऽ जाइत अछि जेना सत्य=साँच।
त्स्य कखनो काल छ भऽ जाइत अछि जेना मत्स्य=माँछ।
य कखनो काल शब्दक प्रारम्भमे रहलापर ज भऽ जाइत अछि जेना यम=जम।
द्य कखनो काल ज भऽ जाइत अछि जेना विद्युत=बिजुली।
ध्य कखनो काल झ भऽ जाइत अछि जेना वंध्या=बाँझ।
त कखनो काल ट भऽ जाइत अछि जेना कर्तन=काटब।
न्थ कखनो काल ठ भऽ जाइत अछि जेना ग्रन्थि=गेंठ।
द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दण्ड=डाँट।
त कखनो काल लुप्त भऽ जाइत अछि जेना जाइत=जाइ।
स्त कखनो काल थ भऽ जाइत अछि जेनाप्रस्तर=पाथर।
द कखनो काल ड भऽ जाइत अछि जेना दाह=डाह।
ध कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर दह भऽ जाइत अछि जेना गधा=गदहा।
ल कखनो काल न भऽ जाइत अछि आ न कखनो काल ल भऽ जाइत अछि जेना नोर=लोर।
प कखनो काल फ भऽ जाइत अछि जेना पाश=फाँस।
फ कखनो काल भऽ जाइत अछि जेना बेवकूफ=बेकूफ।
ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना शैबाल=सेमार।
म्भ कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना खम्भा=खमहा।
म्ब कखनो काल म भऽ जाइत अछि जेना कम्बल=कम्मल।
ल कखनो काल र भऽ जाइत अछि जेना हल=हर।
व कखनो काल भ भऽ जाइत अछि जेना वाष्प=भाप।
ह कखनो काल शब्दक अन्तमे रहलापर लुप्त भऽ जाइत अछि जेना गेलाह=गेला।

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि। आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारी (ऽ -संस्कृतमे एकरा अवग्रह आ बांग्लामे जफला कहल जाइत अछि) क बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचायक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एतए सेहो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
मैथिलीक मात्रात्मक आघातमे ह्रस्व स्वरपर आघात पड़लापर ओ दीर्घ भऽ जाइत अछि।शब्दमे जौँ दीर्घ स्वर रहत तँ आघात ओहिपर, दीर्घ नहि रहत तँ उपान्त्य स्वरपर आ जतए दूटा दीर्घ लगातार अछि ओतए सेहो उपान्त्य दीर्घपर आघात पड़ैत अछि।पानि, ओसारा। बलात्मक आघात सेहो गपपर जोर देबा काल प्रयुक्त होइत अछि जेना- अपन=अप्पन। जाहि स्वरपर आघात पड़त तकर पूर्वक सभ स्वर ह्रस्व भऽ जाइत अछि।

मैथिलीक उच्चारण आ लेखनक विशेषता:

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ,,, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओ लोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोक बेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोट सन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽ कऽ पवर्ग धरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽ कऽ ज्ञ धरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण र् हजकाँ होइत अछि। अतः जतऽ र् हक उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आन ठाम खाली ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्द सभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहि सभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु क उच्चारण जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएबला शब्द सभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, यावत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्द सभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारू सहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ क प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क) क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमे सँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़ गेलाह, कऽ लेल, उठपड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख) पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग) स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ) वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ) क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च) क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटि कऽ दोसर ठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु (माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्द सभमे ई निअम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्द सभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि।
११. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाइत अछि- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर
, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन
, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा
, ठिना, ठमा
जेकर
, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ
, अहि, ए।

१२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाइत अछि: भऽ गेल
, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

१३. प्राचीन मैथिलीक
न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाइत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

१४.
तथा ततय लिखल जाइत अछि जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

१५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह
, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

१६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे
के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

१७. स्वतंत्र ह्रस्व
वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाइत अछि, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाइत अछि। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

१८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे
ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाइत अछि। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

१९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव
लिखल जाइत अछि वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

२०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ
, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। कऽ क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

२१. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद
कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

२२. माँग
, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाइत अछि।

२३. अर्द्ध
ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाइत अछि, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

२४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाइत अछि
, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाइत अछि। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

२५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा कऽ लिखल जाइत अछि
, हटा कऽ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाइत अछि, यथा घर परक।

२६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाइत अछि। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

२७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाइत अछि।

२८. समस्त पद सटा कऽ लिखल जाइत अछि
, वा हाइफेनसँ जोड़ि कऽ ,  हटा कऽ नहि।

२९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी -संस्कृतमे एकरा अवग्रह आ बांग्लामे जफला कहल जाइत अछि- (ऽ) नहि लगाओल जाइत अछि।

३०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाइत अछि।

३१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जएबाक चाही। जा ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाइत अछि। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाइत अछि।

मैथिली व्याकरणक विशेषता: मैथिलीक विकास बौद्ध सिद्ध आचार्य, फेर कर्णाट आ ओइनवार राजवंश, मल्ल राजवंश आ मध्यकालक मैथिली आ आधुनिक मैथिलीक तथाकथित मानक आ पूब, पच्छिम, उत्तर, दक्षिण भिन्नताक अनुसार परिवर्तित होइत रहल अछि आ मैथिली व्याकरण एहि सभ विशेषताकेँ संग लऽ कऽ चलैत अछि।
मैथिलीमे सभ शब्द स्वरांत, अ वृत्ताकार, , , , यै, , औ ई सभ स्पष्ट उच्चरित होइत अछि। सम्बन्ध कारक लेल सँ, , केर (बेशी पद्यमे प्रयुक्त) प्रयुक्त होइत अछि। संज्ञा रूप कम-सरल (एकवचनसँ बहुवचन करबा लेल सभ आदि जोड़ि दियौ) मुदा क्रिया-धातुरूप बेशी होइत अछि। आदर आ अनादरपूर्ण प्रयोगमे क्रियापदमे परिवर्तन होइत अछि। मैथिलीमे क्रियाक रूप कर्ता आ वाक्यक दोसर संज्ञा, सर्वनाम (कर्तासँ सम्बद्ध) द्वारा निर्धारित होइत अछि। मैथिलीमे क्रिया पुरुष-भेदक अनुरूप बदलैत अछि। मैथिलीमे ब द्वारा भविष्यत् कालक अलाबे क्रियार्थी संज्ञा सेहो बनाओल जाइत अछि। ल प्रयुक्त कए कृदन्त कहल, गेल मे परिवर्तन मैथिलीक विशिष्टता अछि।
मैथिलीमे शब्दक भिन्न-भिन्न वर्णपर बलाघात होइत अछि। मैथिलीमे कारक विभक्तिसँ ओना तँ तिर्यक रूप नहि देखबामे अबैत अछि, जेना गामक, मुदा सम्बन्ध कारकमे ई अपवाद अछि, जेना साँझ-साँझुक। क्रियार्थ संज्ञा रूपमे सेहो तिर्यक रूप होइत अछि।  
संज्ञा:कोनो वस्तुक नाममे लघु, गुरु आ गुरुतर ई तीन रूप होइत अछि- मनोज्, मनोज, मनोजबा।
लिंग:लिंगरूप सरल अछि। निर्जीवक लिंग पुल्लिंग भऽ गेल अछि। संज्ञामे लिंगसँ शब्दक रूप परिवर्तन नहि होइत अछि मुदा विशेषण आ क्रियामे होइत अछि।
वचन:संज्ञामे वचनक भिन्नतासँ परिवर्तन नहि होइत अछि। लोकनि, रास आदि शब्द जोड़ि कऽ तकर बोध कराओल जाइत अछि। हमएकवचन अछि आ हमसभबहुवचन।
विभक्ति:करण -- जेना काजे। अधिकरण- आँ-हि- जेना परुकाँ, चोट्टहि ।
कारक: कर्ता- रिक्त, कर्म- केँ, करण- सँ, संप्रदान- लए, अपादान- सँ, संबंध-क, केर(पद्यमे), अधिकरणमे।
सर्वनाम:उत्तम पुरुष- हम, हमे
मध्यम पुरुष- तूँ, तोँ, अहाँ, अपने,
अन्य पुरुष-ताहि, तकरा, तकर, हुनका, हुनि, ओकरा, हुनकर, ओकर, हिनका, एकर, हिनकर, जाहि, जकरा, जकर, के, की, ककरा, अपन, कोन, किछु, केदन, केहनदन, कोनादन, एतबा, कतबा, ततबा, ततेक।
क्रियाविशेषण: एतए, कहाँ, कखन, जखन, जाबे, ताबे, आबे, आब, जहिआ, तहिआ, कहिआ, जेना, तेना, एम्हर, ओम्हर, जेम्हर, तेम्हर, भर(दक्षिणभर)। कालबोधक-आइ, काल्हि, परसू, लगले, परुकाँ; स्थानबोधक- जेना आगाँ, पाछाँ; प्रकारबोधक- जेना भने, कने-मने; संयोजक जेना मुदा, आर; सम्बोधन जेना रौ, हौ; समुच्चयबोधक जेना ईह, छी; बलद्योतक जेना ; नहि, भरिसक आदि विविध क्रियाविशेषण होइत अछि।
उपसर्ग: अ, अन, अध, अब, दु, नि, भरि, कम, , बद, बे, सर।
प्रत्यय: अक्कड़, अंत, इल, आइन, आइ,आउ, आकू, आन, आना, आप, आयत, आर, इन, बाह, आरि, आरी, आहु, औन, इअल, इआ, , गर, ऐत, ओड़, ओला, औटी, औती, ओना, औबिल, , , औत, आइ, बान, , बला, हार, हा, , कार, बाह, आनी, खाना, खोर, गरी, ची, बाज।
विशेषण:एहिमे आदर आ लिंगक अनुसार परिवर्तन होइत अछि।सिलेबी, गोल, चर्की ई गाए-बड़द लेल प्रयुक्त होइत अछि आ विशेषणसँ प्राणिक बोध भऽ जाइत अछि। पढ़ल (पुल्लिंग) आ पढ़लि (स्त्रीलिंग), मझिला छौड़ा-माँझिल भाइ(आदर)।
क्रिया: वचन भेद मैथिली क्रियामे नहि होइत अछि।पुरुषक अनुसार क्रियामे भेद अबैत अछि। आदर प्रदर्शनमे सेहो क्रियारूप बदलैत अछि।तिङन्त मे लिंगभेद नहि होइत अछि मुदा कृदन्तमे लिंगक अनुसार क्रियापद बदलि जाइत अछि। क्रिया कारकक अनुसार बदलैत अछि। एहि प्रकारसँ क्रिया देखि कऽ मात्र ई पता लागत जे कर्ता आदरणीय अछि वा नहि, क्रियाक कर्म कोन पुरुषमे अछि आ आदरणीय अछि वा नहि। क्रियाग चारि रूप जेना स्वयं मरब (मरैत अछि), मारब (मारैत अछि), दोसरासँ मरबाएब (मरबैत अछि) आ कर्मवाचानुसार ककरो कहि कऽ मरबाएब (मरबबैत अछि)- होइत अछि।
धातुरूप- मैथिलीमे लगभग १२२५ धातुरूप दीनबन्धु झा संकलित कएने छथि जे पाणिनीक २००० धातुसँ कनिये कम अछि। आ यैह १२२५ टा धातु मैथिली भाषाक स्वतंत्र अस्तित्वकेँ असगरे बनओने रखबा लेल पर्याप्त अछि। किछु उदाहरण:
छक- अविरोधपूर्वक अन्‍यक्रियासँ दबब अर्थमे- रूपलाल फुल तोड़बामे सोनेलालसँ छकलाह-जीतल गेलाह।
ठक- परतारब, वञ्चना- ठक बुड़िबककेँ ठकैत अछि- ओकर वस्‍तु लए लेबाक हेतु भ्रम उत्‍पन्न करबैत अछि।
डक- अपन उत्‍कट गन्‍धक प्रसारण- हीँगु डकैत अछि-अपन तीव्र गन्धक प्रसार करैत अछि।
ढक- मिथ्‍या अपन अतिप्रशंसा करब- जयलाल ढकैत छथि-अपन मिथ्‍या अति प्रशंसा बजैत छथि।
बक- अश्रव्‍य बहुत बाजब- जयलाल बकैत छथि- नहि सुनबाक योग्‍य कथा बहुत बजैत छथि।
मक- हर्षसँ मालक धावनक्रीड़ा- बाछा मकैत अछि, लीलसँ एम्हर ओम्हर दौगि रहल अछि।
बाल्मीकि द्वारा सुन्दरकाण्डमे मानुषिमिह संस्कृताम्- संस्कृत आ मानुषी दुनू भाषाक ज्ञान हनुमानजीसँ कहबाओल गेल अछि। ज्योतिरीश्वर वर्णरत्नाकरमे लिखै छथि- पुनु कइसन भाट- संस्कृत, पराकृत, अबहठ, पैशाची, सौरसेनी, मागधी छहु भाषाक तत्वज्ञ संगहि ज्योतिरीश्वर द्वारा सात उपभाषक चर्च भेल अछि। प्राकृतक कैकटा प्रकार छल। ओहिमे मागधी प्राकृत मैथिली आ अन्य पूर्वी भारतक भाषाक विकासमे योगदान देलक। अर्धमागधीमे जैन धर्मग्रन्थ आ पालीमे बौद्ध धर्मग्रन्थ लिखल गेल। कालिदासक संस्कृत नाटकमे संस्कृतक अतिरिक्त अपभ्रंशक प्रयोग गएर अभिजात्य वर्गक लेल प्रयुक्त भेल तँ चर्यापदक भाषा सेहो मागधी मिश्रित अपभ्रंश छल। मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा दोसर प्राकृतसँ विकसित भेल सेहो देखि पड़ैत अछि।  अपभ्रंश परवर्ती कालमे पूर्वी भारतमे अवहट्ठक रूप लेलक। मैथिलीक विशेषता जाहिमे एकर सभ शब्दक स्वरांत होएब, क्रियारूपक जटिल होएब (मुदा ताहिमे लैंगिक भेद नहि होएब), सर्वनामक सम्बन्ध कारक रूप आदिक रूपरेखा अवहट्ठमे दृष्टिगोचर होएब शुरू भऽ गेल छल। 

१.धीरेन्‍द्र कुमार- कथा- अहींक लेल २.नन्‍द वि‍लास राय- चौठचन्‍द्रक दही कथाक
३.सतीश चन्द्र झा, हमहूँ कहाँ बुझलियै ४.बचेश्‍वर झा-कथा-संगति‍ ५.जगदीश प्रसाद मंडल-अतहतह कथा शेषांश-

१.
श्री धीरेन्‍द्र कुमार, नि‍र्मली


कथा
अहींक लेल-

  धीरेन्‍द्र जी, अपनेक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍?- रि‍तु बाजि‍ चुकल छलीह। हम सहज भावे मुसकाइत छी। हमरा अहाँक शि‍काइत नीक जकाँ बुझल अछि‍ हम जनैत छी जे अहाँ कहब यएह ने, मि‍ठाइ नै खुऔलहुँ। हम अहाँक ई शि‍काइत बहुत दि‍न पहि‍नेसँ सुनैत आएल छी आ हम इहो जनैत छी जे बतक्कर बेसी छी। यएह एकटा पैघ कारण अछि‍ जहि‍ कारणे हमहुँ बोल्‍ड होइत बजैत छी- शि‍काइत कएक ढकि‍या एक वा चारि‍?
  नै हमरा सभकेँ शि‍काइत अछि‍‍
  शि‍काइत की अछि‍ बाजू?
  एतऽ नहि‍ डेरापर कहब।‍
  एतए कहैमे कोन अचरज अछि‍?
  नै, कोनो ‍खास नै, तैयो डेरेपर कहब। हम स्‍वभावि‍क रूपे एहि‍ पश्‍नकेँ टारैत छी।
  कोर्सेज आॅफ स्‍टडी भेटत।‍
  नै तँ।‍
  हे, यौ अम्‍बि‍का बावू कतए रखने छि‍ऐक कोर्सेज आॅफ स्‍टडी?
  अहींक कोठलीमे तँ रखने छी।‍ अम्‍बि‍का अहाँसँ बाजल छल। हमर प्रश्‍न छल- ‍आइ हम अहींसँ भेँट करए जाइत रही। कतए जा रहल छी अहाँ?”
  झंझारपुर।‍
  कहि‍या अाएव?
  सोम-मंगलकेँ।‍
  ठीके छै बहुत रास गप करबाक अछि‍। आउ अहाँ तखनहि‍ गप होएत।‍ ई गप्‍प बाजि‍ हम वि‍दा भेल रही आ अनि‍ल अहाँ सेगे गप्‍प कए रहल छल। अहाँक ई गप्‍प मोन होएत आ हमर आग्रह अछि‍ जे अहाँ ई गप अबस्‍स मोन राखब।


     एकतीस मार्च उनैस सए सतहत्तरि‍। दि‍नके दस बाजि‍ कऽ बीस मि‍नट भऽ रहल अछि‍। हम अहाँक डेरासँ बहरा कऽ सड़कपर आबि‍ चुकल छी आ अनि‍र्णीत स्‍थि‍तमे अपनामे मर्मान्‍ति‍क टीसकेँ भोगैत सोचैत छी कोम्‍हर जाउ। मन होइछ जे सि‍करेट धूकी, खूब धूकी आ एकांतमे जा कऽ घूमी। हमर सौंसे देह जरि‍ रहल अछि‍। सड़कपर ठाढ़ भेल एहि‍ ठामक सड़कक संगे जुटल आत्‍मीयताकेँ खंडि‍त होइत देखि‍ रहल छी। हमरा मन भऽ अबैत अछि‍ बरखाक ओ राति‍ जहि‍या मास्‍टर सहाएव अपन कोठलीसँ बहरा गेल छलाह आ फाटक बन्न करैत काल हमरासँ अहाँ पूछि‍ रहलि‍ रही- आइ तँ हाथ मारि‍ लेलहुँ? अहाँक प्रश्‍न छल। मन होएत ओहि‍ साँझ नीक अछार भेल रहैक!
  कामन एररमे, प्रीपोजि‍शनमे नहि‍।‍ हम कहने रही आ अहाँसँ वि‍दा लेने रही। ओहो सड़कपर हम ठाढ़ छी। आ ओहि‍ फाटककेँ ताकि‍ रहल छी। ओहि‍ दि‍न पहि‍ल बेर हम अपनाकेँ नहि‍ चि‍न्‍ह सकल रही आ हमरा अपन मूहेँठ टेढ़ लागि‍ रहल छी। लगैत छल, हमरा आगाँ धीरेन्‍द्र नहि‍, क्‍यो आन व्‍यक्‍ति‍ आबि‍ कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि‍। ओहि‍ काल हमरा स्‍थि‍ति‍क आभास भेल छल हमरा दू-चारि‍ व्‍यक्‍ति‍ हमर एहि‍ अन्‍यमनस्‍कतापर कि‍छु सोचि‍ रहल अछि‍ तेँ बि‍ना कि‍छु सोचने टीशन दि‍स वि‍दा भऽ गेल छी।
     हम नहि‍ चाहैत छी जे हमरा एखन क्‍यो टोकए। हमरा अहाँ सभ एकसर जाए दि‍यऽ। आइ हमर आस्‍था खंडि‍त भऽ गेल अछि‍। हम अहाँसँ पूर्ण परि‍चि‍त छी। अहाँकेँ मन होएत जे हम अहाँ संगे तीन मास बि‍ता चुकल छी। अहाँकेँ इहो मन होएत जे समस्‍तीपुरमे एहि‍ तरहक गप उठल छल। अहाँ उद्वि‍ग्‍न रही आ हमहूँ। ओहि‍ दि‍न हम ओतेक संत्रस्‍त नहि‍ रही, जतेक आइ ओहि‍ दि‍न हम आरोपि‍त रही दोसरासँ, मुदा आइ हम अपन भीतर उठैत धाहकेँ शांत करए लेल छोटी सी बात फि‍ल्‍म देखए गेल रही। ओहि‍ आरोपक प्रति‍ आक्रोशमे हम दुनू गोटे संग रही, मुदा आइ हम एकसर छी।
     एक जोड़ा ताड़क गाछ रहैक। एक दि‍न दुनू अपना अपनामे मग्‍न छल। नर ताड़केँ कि‍छु नि‍न्न सन लागि‍ गेल रहैक ओ अपना आँखि‍ क्षपकबैत छल आ मुदा ताड़ रानी सरंगाक गीत गाबि‍ सुनाओ रहलि‍ छलीह। आगाँमे एकटा कनही ताड़ रहैक। अकस्‍मात ओ कनही ताड़ भभा कऽ हँसि‍ पड़लि‍। मादा ताड़केँ नर ताड़पर क्रोध अएलै आ ओ ओकरे आगाँ गरि‍याबए लागलि‍। बेचारा नरताड़ चुपचाप सभ कि‍छु सुनैत रहल। ओकर बोली अँटकि‍ गेल रहैक। ओकरा मुँहेँठपर आन्‍हीसँ पहि‍ने रहएबला तटस्‍थता रहैक। ओहि‍ राति‍ दुनूमे कि‍छु कहा-सुनी नहि‍ भेलैक। ओ नर-ताड़केँ खीस लहरैक जे अपन मादा ताड़क मादे बहुत कि‍छु सनैत आएल छल मुदा आइ आँखि‍ क्ष्‍पकयबाक अर्थ कनखी बूझि‍ क्रोधक पुट देखि‍ ओ भीतरसँ काँपि‍ उठल छल। ओहि‍ दि‍नसँ ओ नर ताड़ सुखए लागल नदीक कातमे रहि‍तो हमहूँ सएह पीड़ा भोगि‍ रहल छी।
     हम जनैत छी, अहाँकेँ ई खि‍स्‍सा मन नहि‍ लागत मुदा अर्थ बुझबैक, कहक तात्‍पर्य अबस्‍स बुझबैक, से हमर वि‍श्‍वास अछि‍ ओना आउ, हम एकटा आर उदाहरण अहाँकेँ दैत छी- ‍राजा अकबरक नाम बुझल होएत। बुझल अि‍छ ने?....
ओ एकटा डाँरि‍ पाड़ि‍ देलखि‍न आ बि‍रवलसँ कहखि‍न- बि‍रवल, इसे छोटा बनाओ? बि‍रवल ओकरे आगाँ एकटा पैघ ओकरासँ डाँरि‍ खींचि‍ देलखि‍न। अकबरक प्रयोजनक पूर्ति भऽ गेलैक। ओ डाँरि‍ अपने छोट भऽ गेलैक। आ, ओहि‍ना अहाँ हमर नजरि‍मे भऽ चुकलि‍ छी आ अहाँमे हम।
     मुदा, ओहि‍ दि‍न अहाँ पैघ भऽ गेल छलहुँ। लोकसँ आरोपि‍त भेनो अहाँ अडि‍ग रही। एकर यएह कारण छल जे हम-अहाँ फ्रेक रही। मुदा आइ की भेल?
     एहि‍ गपमे कोनो कमी नहि‍ जे हम अहाँक आभारी नहि‍ छी। एहि‍ बीच हम अहाँक हाथे कमसँ कम सए गि‍लास चाह पीने हएव। अहीं रही हम ओतेक पढ़ैत रही अन्‍यथा ओ पढ़ाइ हमर बसक बाहरक गप्‍प छल। समस्‍तीपुर रीतू, नीतू, मीतू संगे कएक बेर चाह पीबि‍ चुकल छी। अहाँ जनैत होएव जे एतेक भेलापर की हम कृतघ्‍न भऽ सकैत छी? अहाँ मोने यएह ने भऽ सकैत छी तेँ अहाँ हमरासँ ओ गप्‍प कहलहुँ आ हम पीबि‍ कऽ रहि‍ गेलहुँ। बेस, हम अहाँक गप्‍प मानि‍ गेलहुँ तखैन अहाँ एहि‍ वि‍न्‍दुपर आउ की जँ हम वएह रहि‍तहुँ तँ कि‍ अहाँक ई उत्तर- धीरेन्‍द्र जी, अहाँक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍।‍ हम भेँट करए जैतहुँ? अनि‍लेकेँ शि‍काइत छल तँ ताहि‍खन टीशनपर अहाँ सोझाँ कि‍एक ने ओ बाजल?
     आब जाहि‍ खन हमरा ई सभ बात मन अबैत अछि‍, हम छटपटाए लगैत छी। हमर मोनमे रहि‍-रहि‍ कऽ यएह गप्‍प अबैत जाइत रहैत अछि‍। ई गप्‍प जाए बेर अबैत-जाइत अछि‍ हम अपनाकेँ दर्शकक बीच अखाढ़मे चि‍त्त भेल पहलमान जकाँ लगैत छी। आ, नीतूक मुहेँठ हमरा आगाँ आबि‍ जाइत अछथ्‍। अनि‍ल मुँह जबानी कहनो रहए आ चारि‍ पेजमे पत्रो लि‍खने छल। हम कहने रहि‍ऐक जे हमरासँ हुनाक गप्‍प नहि‍ होइत अछि‍? मीतूसँ कहबनि‍, गप्‍प करए लेल।‍ निीतूक ई वाक्‍य हमर मर्मपर छेनीक चोच करैत अछि‍। जाए बेर चौट करैत अछि‍ ताए बेर हमर रूप वि‍कृत होइ चल जाइत अछि‍।
     ओहि‍ दि‍न टीशन दि‍स अबैत काल अशोकसँ भेँट कएने रही। हमरा अशोकोपर खीस छल। ओकरा कि‍शोररि‍या आ शंकरि‍या आगाँ कहने रहि‍ऐक- सार, तोँ अाइदोकानसँ बहरा! हम तोरा की कहने रहि‍यौ जे तोँ अनि‍लसँ कहने रही? ओ बेचारा हतप्रभ छल। हम अपन टेम्‍परमे अंट-संट बजैत रही। ओ हमरा संगे कि‍रि‍या खएने छल जे अनि‍ल जहि‍या आओत, हम ओकरासँ पुछबैक आ जहि‍या उनटि‍ जाएत ओकरा पि‍टबै धरि‍ अबस्‍स। अहाँकेँ पता होएतजे एम्‍हर की भेलैक। पता अछि‍ ने? आर तँ आर, दस तारि‍ख धरि‍ जँ अनि‍ल भेटि‍ जाएत हम ओकरा पकड़ब आ नहि‍ तँ लोहना जाएब। ओकर घर।
     अाब हम की कहू? हम तँ ताकमे छी। मुदा आगाँ जे होइक हम अपन सफाइ नहि‍ देब। आब आस्‍था-अनास्‍थाक प्रश्‍न अहाँपर पूरा नि‍र्भर अि‍छ। अहाँकेँ जे मोन हुअए से करू। हमरा आन्‍तरि‍क पीड़ा जे भोगक अछि‍, भोगब।
     हँ, पहि‍ने अहाँकेँ हमरा प्रति‍ शि‍काइत छल, मुदा आब हमरा अहाँक प्रति‍ शि‍काइत अछि‍, शि‍काइत अछि‍ यएह जे अहाँ वि‍श्‍वास कोना कएलहुँ। जँ यएह गप होइतैक। हम वएह समस्‍त पुरवला गप्‍प चन्‍दरदेव बाबूक मादे कहि‍तहुँ नहि‍। तैयो अहाँकेँ हमरापर अवि‍श्‍वास भेल तेँ हजार बेर धन्‍यवाद। हम ई अबस्‍स कहब- कानसँ सुनल गप्‍पसँ जखन आस्‍थासँ अहाँ हटए लागू अहाँ अपन भीतर ओही अएनामे ताकू अहाँकेँ फोटो नहि‍ भेटत जे अहाँ आगाँ बनल छल नहि‍ चि‍न्‍हि‍ सकब तँ अहाँक आन्‍दर हृदयक ओहि घावसँ ठेकि‍ जाइत जे तखने फोँका सन उठल होएत अहाँ भरि‍सक कानि‍ उठब एकर उनटा जँ अनास्‍थामे अएनामे ओहि‍ मुँहेँठकेँ ताकब जे बहुत पहि‍नेसँ बनल अछि‍ तखन घृणास्‍पद अबस्‍स बूझि‍ पड़त मुदा आँखि‍मे डोलबैत भावकेँ देखि‍ भीतरक दाह समाप्‍त भऽ जाएत।‍
  अहाँ भले एकरा उपदेश मानी मुदा, तथ्‍य यएह अछि‍। कि‍न्‍तु- ‍अहाँसँ बेसी हम झरकल छी एहि‍ आगि‍मे नीतूक मूहेँठ जखन आएल अछि‍-मूर्त्त भेल अछि‍ जाहखन हम अपन भीतर गुरि‍ल्‍ला-संघर्ष करैत रहैत छी तर्क-वि‍तर्कक घेरामे अपन धाह दैत देहपर मर्यादाक खेल ओढ़ि‍ बीच सड़कपर आएल छी चुप छी ओढ़ने छी अपनेसँ छक्‍कारैत अहाँक नास्‍थाक प्रश्‍नपर अपनाहि‍मे मर्माहत मर्यादाक खोलमे हमर आक्रोशसँ उठल हाथ अर्थहीन-सन नपुंसक सन डोलि‍ गेल एहि‍ अन्‍हार गलीमे जतए जे सोचैत छी जे बजैत छी ओहि‍मे अहाँक अनास्‍थाक प्रति‍घ्‍वनि‍ होइत अछि‍ जे एकटा पैघ भीड़क हल्‍लामे परि‍णत भऽ जाइत अछि‍।
 हमर दाहकेँ अहाँ अहाँ नहि‍ बूझि‍ सकैत छी। ई एकरे पि‍णति‍ अछि‍ जे हम एक बजे राति‍ धरि‍ लीखि‍ रहल छी। हमरा अहाँ सबहक मुहेँठ मोन पड़ैत अछि‍ आ र्नि‍दोष होइतो मोन पड़ैत अछि‍ आ नि‍र्दोष होइतो मन नहि‍ होइत अछि‍ जे अहाँ आगू जाइ। अहाँ की सोचैत होएब? ओ की सोचैत होएतीह एहीमे हम फँसल मर्माहतक पीड़ा भोगि‍ रहल छी। आब हम कन्नहुँ ने अहाँ लग जाएब। अहाँसब हमरा गारि‍ पढ़ू आ भऽ सकए तँ आगाँ पड़ने हमर मुँह नोचू। यएह अहाँ लेल सार्थक होएत। पहि‍ने, एकतीस मार्च उन्नैस सए सतहत्तरि‍सँ पहि‍ने नीतू, मीतू सीतू तों रही, आत्‍मीय स्‍तर छल मुदा आब, कि‍एक तँ अहाँक शि‍काइत हमरा बड़ मोन पड़ैत अछि‍- धीरेन्‍द्र जी, अहाँसँ एक शि‍काइत अछि‍?
  की?
  अहाँ हमरा आ अनि‍ल मादे की कहने रहि‍ऐक अशोकसँ?
  अशोक? कोन अशोक?
  बजारक क्‍यो छैक?
  अशोक साहु, नहि‍ तँ....‍
  हमरा अहाँसँ ई उम्‍मीद नहि‍ छल।‍ अहाँक ई वाक्‍य हमरा मर्माहि‍त कऽ उठल छल, हम व्‍यथि‍त भऽ कहने रही- अशोककेँ बजाबी?
  नहि‍....‍ अहाँक उत्तर छल। हम बूझि‍ चुकल छलहुँ जे कोनो अहाँ सभक अनि‍ल संगे नाजाएज धंधाक गप्‍प छल।
  हम कहने रही- दस धरि‍ जँ अनि‍ल आएल हम अशोक लग अबस्‍स लऽ जाएब‍ आ हम सड़कपर आबि‍ गेल रही।
  हमर अहाँक आत्‍मीय आ पारि‍वारि‍क सम्‍बन्‍ध टूटि‍ गेल। अहाँ वि‍श्‍वास करू वा नहि‍ ई अहींपर नि‍र्भर अछि‍। अहाँ लेल। अहाँकेँ ई कथा भेटल तेँ हम सन्‍तुष्‍ट छी, मुदा कतेक.....?
साभार-
मि‍थि‍ला मि‍हि‍र
वर्ष १७ द्वि‍तीय आषाढ़ कृषणपक्ष १० शाके १८९९, पटना, रवि, १० जुलाइ, १९७७मे प्रकाशि‍त कथा अहींक लेल


 
नन्‍द वि‍लास राय
 शेषांश
चौठचन्‍द्रक दही कथाक

राति‍ नअ बजे दि‍ल्‍लीसँ मंगलक फोन आएल। घरेक बगलमे एक गोटे मोवाइल रखने अछि‍। ओकरे मोवाइलपर सोमनीकेँ फोन अाएल। सोमनी फोनमे मंगलसँ गप केलक। कुशल-समाचारक वाद मंगलवार कहलक- आइ चौठचन्‍द्र पावनि‍ छी, अहाँसब भरि‍ मोन खीर, पुरी, दही खेने हएब।‍
  सोमनी उदास होइत बजलीह- की भरि‍ मन खएब, दही पौरैले क्‍यो एक्को फुच्‍ची दूध नहि‍ देलक। पोडरक दही लए कऽ पावनि‍ केलौं गऽ मररक खीर रान्‍हैले भजैत एक्के फुच्‍ची दूध देलक। एक फुच्‍ची दूधसँ केहेन खीर हएत।‍
  मंगल कहलक- ‍अहाँ मोन जुनि‍ छोट करू, हम फगुआमे गाम अबै छी तँ एकटा नीक लगहरि‍ गाए कीनि‍ कऽ आनि‍ देव। दूध खेबो करब आ बेचवो करब। दूटा पाइ हएत तँ नूनो-तेल चलत। बेटी सभ घास काटि‍-काटि‍ आनि‍ देत। सोमनीक मन खुश भऽ गेल।
      फगुआमे मंगल गाम आएल तँ सोमनीकेँ गाए कीनि‍ देलक। गाए अधकि‍लौआ बार्ली डि‍ब्‍बासँ छह डि‍ब्‍बा भोर आ चारि‍ डि‍ब्‍बा दुपहर लगैत छल। जाबे धरिमंगल गाम रहल ताबे ओ अपने गाए दुहाए। जखन मंगल दि‍ल्‍ली चलि‍ गेल तँ सोमनीए गाए दुहए लगलीह। भोरका दूध बेचि‍ लै आ दुपहरका दूध परि‍वारेमे खाए। बेटी फुलि‍या आ गुलबीया घास आनि‍-आनि‍ कऽ खुअबै। एक दि‍न फुलि‍या लगमावाली खेतक आरि‍पर कनी घास काटि‍ लेलक। तै लऽ लगमावाली फुलि‍या आ ओकर माए सोमनीकेँ बि‍खनि‍-बि‍खनि‍ कऽ गडि‍़औलक। सोमनी फुलि‍याकेँ मारबो केलक आ लगमावालीसँ गलतीओ मानलक।
      समए बीतैत देरी नै लगैत छै। आइ कुशी अमवश्‍या छी। पाँचम दीन चौठचन्‍द्र पावनि‍ हएत। कल्‍हि‍सँ दही पौरल जाएत। सोमनी दरबज्‍जापर एम्‍की लगहैर गाए चौठीचान्‍द्र महराज देने छथि‍न। सोमनी सोचलक जे एम्‍की सभ बासनमे नीक जहॉंति‍ दही पौरब। ओकरा पौर सालक सभ गप्‍प मन रहए जे क्‍यो एक्‍को ि‍गलास दूध नइ देलक तँ पोडरक दही लए कऽ पावनि‍ केलौं। मने-मन वि‍चारलक जे हमहुँ ककरो दूध नै देबइ।
      आइसँ चौठचन्‍द्रक दही पौरल जाएत। भोरे मुसबा लोटा नेने सोमनी एहि‍ठाम दूध लै लए आएल। राधे कहलक- ‍माए गै, पौर साल अपना क्‍यो एक्‍को गि‍लास दूध नै देने रहौ तँइ ककरो दूध नै दे।
  सोमनी सोचलक जँ सि‍ग्‍हेसर बाबा लगहरि‍ गाए देने छथि‍। तँ पावनि‍ नामपर सभकेँ कि‍छु ने कि‍छु दूध देबे करब। जत्ते गोटे सोमनी एहि‍ठाम दूध ले आएल सोमनी सभकेँ दूध दऽ वि‍दा केलक। ओकर अपन छवोटा वासन लए मात्र दू गि‍लास दूध बँचल। ओहो काल्‍हि‍ पावनि‍ छि‍ऐ तँ आइ दूपहरक। सोमनी ओही दू गि‍लास दूधकेँ छवो वासनमे दही पौरलक।
      आइ चौठचन्‍द्र छी भोरेसँ लोक सभ लोटा लए लए सोमनी एहि‍ठाम दूध ले पहुँचल। लगमावालीक बेटी दूखनी सेहो अएल। फूलि‍या सोमनीकेँ कहलक- माए गै, दूखनीकेँ दूध नै दही। ओकर माए कनि‍ए घासले गि‍रि‍औने रहौ।‍
  सोमनी बाजलि‍- पावनि‍ले सभकेँ दूध देबै। गारि‍ देलक तँ कि‍ भेल एकठाम रहलासँ तँ आहि‍ना लड़ाइ-झगर होइत छै तँ कि‍ ओइ बातकेँ जीनगी भरि‍ रखने रखने रहब ओइसँ कि‍ हएत।‍ अनेरे टेंसन रहत। सेामनी भोरका समूचा दूध लोककेँ दऽ देलक। ओइ दूधक ककरोसँ पाइओ नै लेलक। दुपहरका दूध दूहि‍ कऽ एक गि‍लास दूध भजैत वि‍तबाकेँ आ एक गि‍लास मालि‍क नूनू बाबू ओहि‍ठाम पठौलक एक गि‍लास अपने रखलक। सॉंझमे जखन ममर लए सोमनी खीर रान्‍हैले बैसलीह तखने बेरमावाली आबि‍ गेलि‍। ओ कहऽ लगलीह- यै दाइ, हमरा तँ खीर रान्‍हैले दूधे ने भेल। जि‍तबा अखुन्‍का नाओ कहने रहए। मुदा जखन बेटाकेँ दूधले पठौलि‍ऐ तँ नै देलक। आब कथी लऽ कऽ ममरक खीर रान्‍हब?”
  सोमनी अपनाले जे दूध रखने रहए ओहि‍मेसँ अधा दूध बेरमावालीकेँ देलक। साँझमे सोमनी चौठीचाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलीह- हे चौठीचाँद महराज, हमरा दरबज्‍जापर एहि‍ना देने रहु तँ हम सभकेँ पावनि‍ लए दूध दैत रहब।‍ 
सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर, मधुबनी
हमहूँ कहाँ बुझलियै-

चान! चान! हे यै चान ! सुतले रहब। केबार खोलू ने । हम कुसुम छी। हर्ष खुशी मे डूबल स्वर कान मे पड़िते निन्न खुजि गेल। भोरक किछु हेरायल सपना फेर सँ हेरा गेल..आ हम उठि कबैसि गेलहुँ। आँखि मलि कदुनू हाथ कें जोरि दर्शन करिते केवार खोलय दौड़ि गेलहुँ। की बात छौ ? एते भोरे ..? प्रश्न पूरा नहि भेल मुदा ओ बाजल दीदी ..आइ हमर वियाह अछि।राति मे बाबू कतौ सँ ठीक कएने अयलै। पाँचमा पास छैक आ दिल्ली मे कोनो काज सेहो करैत छैक। आँहा अवश्य आयब। नहि जानि ओ की की बाजि रहल छल,मुदा हम त ओकर पहिल शब्द वियाहसुनि ततेक ओझरा गेलहुँ जे किछु आओर नहि पूछि सकलियै आ ओ दौड़ल चलि गेल। .. हँसैत ..एकटा अबोध हँसी . निर्विकार चेहरा ..। मुदा हम! हमर चेहरा तनावपूर्ण। लागल जेना हृदय मे किछु गरम चीज सन्हिया गेल हो आ हमर संपूर्ण रक्त मे एकटा अपरिचित झुनझुन्नी बनि कदौड़ि रहल हो .सरपट.. अति तिव्र गति सँ। अचानक शरीरक बोझ उठाबय मे पैर असमर्थ भगेल आ हम धम्म सँ धरती पर बैसि गेल रही।. सुन्न भेल.. मुदा भीतर लट्टू जेकाँ किछु नचैत रहल .. नचैत रहल .. अविराम । नहि जानि कखनो कएकटा आश्चर्य एतेक भयभीत कियै कदैत छैक .एकर उतर ने तहिया भेटल ने आइ धरि बुझबा मे आयल। मोनक किछु बात कें अभिव्यक्तिक माध्यम एखनो नहि छैक। शब्द तकिन्नहँु नहि। हँ आँखिक नोर कखनो कहृदय मे चुभैत कोनो भावना कें बुझि जाइत छैक।
गाम घरक जीवन। छल-प्रपंच सँ बंचित समतल धरती जेंकाँ समटल आचरण जतय छोट-छोट सपना देखि ओकरे परिपूर्ण करबा लेल छटपटाइत आत्मा। ओही श्वच्छ परिवेश मे हम आ हमर कुसुम संगी बनि कएखन धरि रहैत छलहुँ। ओ हमर हरबाहक बेटी छल। छोट लोकक बेटी, मुदा तखन ई बात नहि बुझलियै जखन पहिल बेर ओकरा अपन आँगन मे देखि हाथ पकड़ने दौड़ि गेल छलहुँ दलान पर। नेनपन कहाँ बुझि पबै छै जाति पाति आ उच्च निचक बात। ई तउमर बढ़ला सँ समाजक व्यवस्था आ मोनक अहं मे लोक भसिया जाइत अछि। मुदा दोस्ती तमोनक एक्टा मिठ्ठ संबंध छै एकरा समाज आ परिवार सँ की मतलब। एक बएस के कतौ दू टा अबोध एक दोसर के अँाखि के पढ़ि लेलक आ बन्हि गेल एकटा शब्दहीन संबंध मे।
आई फेर नहि जानि कियैक जीवन कें बीतल संपूर्ण हवा बसात मोन मे प्रचंड बिरर्रो उठा देने छल आ हम ओइ मे एकटा छोट फतिंगा जेकाँ उड़ियाइत अपन अस्तित्व कें बचावय मे संघर्षरत छी। यैह तजीवन छै- सतत संघर्ष आ अपन अस्तित्वक रक्षा। मुदा कहाँ भेल अस्तित्वक रक्षा। आलोक सँ वियाह भेलाक बाद लागल जेना जीवनक संपूर्ण सपना मुर्त रूप ललेत। स्नेहक संबंध प्राण मे एकटा नव स्फूर्तिक संचार करैत छैक। विचारक धरातल पर पति-पत्नी एक दोसर के सम्मान दैत छैक। मुदा वियाहक दू मासक बादे सभकिछु उल्टा लागय लागल। प्रेमक निर्वाध गति सँ बहैत शीतल जल मे दुर्गंध आबि गेलैक। आलोकक अहं मे अपन अस्तित्व कतहेरायल जे एखनो धरि नहि भेटल। पिताक एक मात्र संतान छलहुँ हम। स्नेहक कतौ कमी नहि अनुभव भेल।शिक्षाक मर्यादा सदैव जीवन कें बान्हि करखलक। घरक संस्कार जाति समाज के कठोर बंधन कहियो स्वतंत्रता नहि दसकल जे अपन पती सँ विद्रोह कसकी आ अपन जीवनक ठमकल दुर्गंधित पानि कें समुद्र मे बहा कनिर्मल कली। आइ बुझाइत अछि जे शिक्षा आरो कमजोरे करैत छैक। लोक की कहत? सम्मान कें क्षा कोना हैत? समाज मे लोक की की बाजत? सभटा बिचार मोन मे उठिते हम अपना कें बहुत कमजोर अनुभव करय लगैत छी और अपन संपूर्ण व्यथा कें सहर्ष स्वीकार करैत आकाश मे नुकायल देवता सँ मृत्युक वरदान मंगैत प्रतिदिन अपन बान्हल दिनचर्या मे लागि जाइत छी। कमजोर नारिक कमजोर विचार। शिक्षित नारी आ एते कमजोर आत्मविश्वास। जखन कई विचार अबैत अछि तमोनक कारी वेदना स्वेत मुखमंडल पर ततेक ने अपन रेखा चित्र खिंचि दैत अछि जे ओकरा भरब असंभव भजाइत अछि।
मोनक आँखि सँ फेर किछु देखैत छी तलगैत अछि जे  हमर कुशुम कहाँ कमजोर छल। दशमी मे पढ़ैत-पढ़ैत वियाह भेल रहैक। वियाहक बाद एक दू बेर सासुर सेहो गेल। ओकर घरवाला दारू पीबि कओकरा संग बहुत मारि पीट करैत छलैक। एक दिन ओकर सूतल स्वाभिमान जागि गेलैक आ ओकरा छोड़ि देलक। ओ अपन विगत के संपूर्ण पसरल स्याही पर उज्जर पिठार सँ फेर कोबर लीखि लेलक। जीवनक निर्णय लेबा मे ओ कतौ कमजोर  नहि पड़ल। फेर सँ ओ अपन दोसर पतिक संग प्रेम करैत दुनियाँक टेढ़ मेढ़ बाट पर चलि पड़ल। एक दिन हमरो कहलक दीदी अहाँ एतेक कष्ट उठा ककोना अपन पतिक संग निर्वाह कलैत छी। ओना तअहाँ हमरा सँ बेसी पढ़ल लीखल छी। नीक संस्कार अछि। स्वयं कमा कखा सकैत छी। तखन कियै?’’ तू नहि बुझबिही’’! ओ चुप भ गेल। मुदा हमहूँ कहाँ बुझलियै ? ओ त कम पढ़ल छल। छोट जाति .. ताहू पर गरीब ..। मुदा हम त पढ़ल लिखल उच्च जाति ..पैघ लोक ..नीक संस्कार! लेकिन कहाँ बुझि सकलियै एकर कारण ? की एकर कारण संस्कार छैक? अथवा सुशिक्षा? पता नहि कोना बुझबै एकर रहस्य ।
हम एम00 पास कनौकरी करबा लेल पिता जी सँ अनुमति चाहैत छलहुँ लेकिन ओ कहलथि जे हम अहाँक विवाह लेल चिन्तित छी। एकटा पिता के सबसँ पैघ बोझ पुत्रीक कन्यादान होइत छैक तैं ओ एहि सँ मुक्त होयबा लेल जतय ततय प्रयत्नशील रहैथ। हमर सहमति तएकटा मात्र हुनका लेल स्नेहक अभिव्यक्ति छल जाहि मे कर्तव्यक एकटा निर्वहन सेहो छलैक। हम अपन सहमति स्नेहक प्रतिदान स्वरूप द देलियन्हि। गाम सँ किछु दूर एकटा धनाढ्य पढ़ल लिख परिवारक एकलौता पुत्र आलोक संग हमर वियाह भ गेल। दान दहेजक मांग नहि सुनि हमर पिता कें लगलन्हि जे आजुक युग मे निश्चय ओ लोकनि भगवान छथि मुदा किछु दिनक बाद ज्ञात भेल जे ओहि भगवानक संपूर्ण आत्मा कलुषित छल। धनाढ्य आ सुशिक्षित नींव मे सौसे दिबार लागि गेल छल आ ओही दिबारक मजबूती लेल हमरा वलिदान देबाक छल। आलोक कें एकटा आओर वियाह भचुकल छलन्हि। संभवतः पाच छः साल पूर्वहिं मुदा संतान नहि होयबाक कारणे अपन वंश आ अहंकारक गाछ के आगाँ बढ़ाबय लेल एकटा सुशिला कन्याक खोज रहन्हि। तखन हमरे संग प्रपंच भेल। जीवनक एक एकटा नुका कपौती मे राखल हमर सुन्दर कल्पना हेरा गेल। आ हेरा गेल हमर संपूर्ण अस्तित्व जकर रक्षा करब हमर बसक बात नहि रहल। एकटा हारल मनुक्ख। मात्र बच्चा पैदा करबा लेल आनल गेन छल । इच्छा वा अनिच्छा  किछु कतौ नहि । अपन घर नहि । अपन किछु सपना नहि। विद्रोह करबा लेल हिम्मति नहि एकदम कमजोर ..हम ..चान। मुदा हमर संगी कुसुम .. अपन जीवनक उतार चढ़ाव मे अपन अस्तित्व एखनो धरि बचौने ..खुब होसगर आ ठोस कुशुम।
बचेश्‍वर झा- नि‍र्मली, सुपौल।

कथा
संगति‍

प्राय: जीवनक आरंभसँ आइ धरि‍ अनेक प्रकारक लोकक संगति‍ पाप्‍त भेल अछि‍। संगति‍क कारणे कटु-मुधु दुनू तरहक अनुभव भेल, मुदा एहनो अनुभव भेल जे जीवन पर्यन्‍त मोन रहत।
     हम जाहि‍ मोहल्‍लामे रहैत छलहुँ ओहि‍ बगलमे कोशीक सरकारी काँलोनी छल। सरकारी सेवक लोकनि‍ ओहि‍मे रहैत छलाह। पड़ोसि‍याक कारणे हेम-क्षेम नीके छल। खास कऽ अमीन सहाएवसँ वेशी आपकता रहए कि‍एक तँ ओ एकान्‍तवासी जीवन वि‍तौनि‍हार रहथि‍। आन्‍तरि‍क खीचाव बुझू अमीन सहाएबक संगति‍ सायं प्रात: लागू छल। अमीन सहाएव कंजूशक शि‍रोमणि‍ रहथि‍। सोलह आना दरमाहा बचएबाक चेष्‍टा करथि‍। एक साँझ कि‍छु बना एक पाबि‍ लथि‍ अन्‍यथा अधि‍कांश राति‍ चूड़-फक्की करथि‍ कहबाक तात्‍पर्य एक-आध मुट्ठी चूड़ा फाँकि‍ कए रहि‍ जाथि‍। ई रहस्‍य बड़ थोड़ लोक जनैत छलन्‍हि‍। अपन एहि‍ कमजोरीकेँ ओ गप्‍पक आवरणसँ अनभि‍ज्ञ लोककेँ लखे नहि‍ देथि‍। यएह कारण छल जे सम्‍पूर्ण क्वाटरमे एकसरे रहैत छलाह दोसरकेँ संग राखव वा रहए देब मान्‍य नहि‍ छलन्‍हि‍।
     कार्यरतलोक अमीन सहाएवसँ फराक रहबाक प्रयास करथि‍ कि‍एक तँ केहनो अगुताएल लोक अमीन सहाएवक गपौढ़ामे लटपटा जाइत छलाह। हमहूँ जखन उदास आ कार्य रहि‍त अपनाकेँ पबैत छलहुँ तखने हुनका अह्लादपूर्ण आबाजमे टोकैत रहि‍यन्‍हि‍ आ ओहो भाव बूझि‍ मनलग्‍गू गप कहए लागथि‍। टेंसगर चाह हुनके मुँहसँ सूनल अछि‍। सायं-प्रात: चाह एक कप हुनका पि‍आयब आ चाह चलि‍साक पाठ हमरा सभकेँ अभ्‍यास बनि‍ गेल छल।
     संयोगवश! एक मास्‍टर सहाएव कतहुसँ ओहि‍ मोहल्लामे एलाह। हुनका डेराक प्रयोजन भेलन्‍हि‍। बगएवानि‍ तँ खटाशे सन रहनि‍, मुदा वि‍द्या वि‍भूषण रहथि‍। मोहल्‍लाक लोक नेनाक हेतु उपयुक्‍त बूझि‍ मास्‍टर सहाएव हेतु डेराक ताकमे घुमथि‍। मास्‍टरो सहाएव एकसरे रहथि‍ तेँ आपकताक आकर्षक तँ नहि‍, मुदा वि‍वशताक बन्‍धनमे आवि‍ संग रहए पड़लनि‍।
     कि‍छु दि‍नक पश्‍चात् एक दोसरकेँ रूमेट कहए लगलाह। जखन दुनूमे सहबासक सि‍नेह बढ़लनि‍ तँ मास्‍टर सहाएव स्‍वयं पाकी होएबाक प्रस्‍ताव रखलनि‍। अमीन सहाएव भवि‍ष्‍यक लाभ सोचि‍ कऽ तैयार भऽ गेलाह। शुरूमे तँ पाक काज दुनू मि‍लि‍ कऽ करथि‍। बादमे मास्‍टर सहाएव भानस बनाएब अमीने सहाएवपर छोड़ देलखि‍न। मास्‍टर सहाएव ठीक भानसक समए पूजाक आसन पकड़ि‍ लथि‍। एहि‍ बीच ज्‍याै अमीन सहाएव कि‍छु पूछथि‍ तँ मास्‍टर सहाबक हूँ!, हूँक शब्‍द अमीन सहाएबक लेल अंकूशक काज करनि‍। मोने मोन गुम्‍हरि‍ कऽ अमीन सहाएव रहि‍ जाथि‍। एहि‍ बीचमे जौं केओ अपरि‍चि‍त लोक आबि‍ जाथि‍ तँ मास्‍टर सहाएवक पूजका अवधि‍ बढ़ि‍ जाइत रहनि‍ संगहि‍ मन्‍त्रोचार जोड़-जोड़सँ करए लागथि‍। आगाँक परसल अन्न गर्गट भऽ जाइन्‍ह अमीन सहाएवकेँ पि‍त्त लहरि‍ जाइन। तखन ओ अर्दर बाजए लागथि‍। आडम्‍वरी पूजाक अन्‍त कऽ मास्‍टर सहाएव हे! हे! मे अमीन सहाएवक क्रोधकेँ पीवि‍ जाथि‍। मास्‍टर सहाएवमे अमोध सहन शक्‍ति‍ सेहो छलनि‍। अमीन सहाएवक गन्जन आ मोहल्लाक लोकक वाककेँ अँगेज नेने छलाह।
     मास्‍टर सहाएवमे और तँ जे गुण दोष रहनि‍, मुदा कि‍छु एहनो गुण छलनि‍ जे पैध दुगुर्ण कहल जा सकैछ। मास्‍टर सहाएव डेरामे दि‍नो कऽ अर्ध्‍द दि‍गम्‍वर रहैत छलाह आ राति‍ कऽ पूर्ण दि‍गम्‍वरे। नवमे तँ अमीन सहाएव सकोच करथि‍न, जखन ई गति‍ वि‍धि‍ मास्‍टर सहाएवक नहि‍ बदललनि‍ तँ अमीन सहाएव रूमेट ई ठीक नहि‍ कहि‍ चेतबैत रहथि‍न। अमीन सहाएव चूल्‍हि‍ फूकैत आ भानस करैत अपन स्‍वछन्‍द जीवनमे परतंत्रक अनुभव करए लगलाह। आब ओहो पाक काजसँ उचहि‍ गेलाह। रूमेटक आलोचना-प्रत्‍यालोचना हुनक मुख्‍य वि‍षए भऽ गेलनि‍। मोहल्‍ला लोकक प्रति‍ आक्रोश रहबे करनि‍। एक दि‍न वि‍क्षि‍प्‍त मुद्रा देखि‍ हम हुनकासँ सि‍नेह पूर्वक कहलि‍एनि‍- हम एकसरे रहैत छलहुँ सएह ठीक, संगति‍क प्रभावसँ संतप्‍त भऽ गेल छी।‍
     एक दि‍न मास्‍टर सहाएव देह उजागर करबाक हेतु टाँनि‍क अनलनि‍ जाहि‍मे चारि‍ अना अलकोहल लि‍खल छलैक। हम कहलि‍एनि‍ अमीन एहि‍मे सँ आध कप जौं मास्‍टर दि‍तथि‍ तँ मोन बुलन्‍द भऽ जाइत। कहैत-कहैत हम शीशीसँ चारि‍ चम्‍मच करीब ढारि‍ मुँहमे दऽ देलि‍एनि‍, एहि‍पर मास्‍टर सहाएव गि‍द्ध जकाँ झपट्टा मारि‍ टाँनि‍कक शीशी लऽ क्रोधाभि‍भूत भऽ गेलाह। दू बर्षक अन्‍तरालमे प्रथम बेर एहन तामस देखल। मास्‍टर सहाएव सम्‍पूर्ण शीशी पीवि‍ गेलाह। मध्‍य राति‍मे जखन खौंत फेकि‍ दलकनि‍ तखन ओ चेतना हीन भऽ फर्शपर ओंघरनि‍या देमए लगलाह। अमीन सहाएव पूर्ण चि‍न्‍ति‍त भऽ हमरा लग दौड़ल एलाह। हमहूँ ओतए गेलहुँ। नतीजा भेल जे चारि‍ बजे भोरमे जाऽ कए मास्‍टरकेँ चैन भेलनि‍ तखने हमरो लोकनि‍ चैन भेलहुँ। बादमे मास्‍टरकेँ पूछलोत्तर जबाब भेटल जे अपने सभ चखैत-चखैत पीबि‍ लि‍तहुँ तेँ हम सभटा एके बेरमे पीवि‍ लेल। अस्‍तु! आगाँ पूछबाक साहस नहि‍ भेल।
     एक दि‍न मास्‍टर सहाएवक दि‍गम्‍बर अवस्‍थाक नि‍वार्णाथ हम हुनका पलंगक तरमे जाऽ कऽ बैसि‍ गेलहुँ। अमीन सहाएव हमर सहयोगी रहथि‍। लालटेमक प्रकाश मन्‍द कऽ जखन मास्‍टर सहाएव ओछाइनपर लम्‍वायमान भेलाह। नि‍न्‍न आएले छलनि‍ तखन हम पलंगक भीतरसँ खट्-खट् अावाज कएल आ ममीन सहाएव कागज सभकेँ फर-फरा देलथि‍न। हम सभ चूपे रही कि‍ मास्‍टर सहाएव चोर-चोर बजलाह। हमहूँ सभ संग दऽ देलि‍एनि‍। ओ फानि‍ कऽ बाहर भेलाह जोर-जोरसँ चारक हल्‍ला कएलनि‍, मोहल्‍लाक नर नारी चाेर शब्‍द सुि‍न अमीन सहाएवक डेरा दि‍शि‍ दौड़ गेल। मास्‍टर सहाएव ताबत कालधरि‍ वेसुधि‍ये रहथि‍ जखन अनेको हथबत्तीक इजोत हुनाकपर एक संग पड़ल तखन मास्‍टर सहाएव संकोचसँ गर्हित भऽ बैसि‍ गेलाह। सभ हुनका लू-लू थू-थू करए लगलनि‍। अन्‍तमे अपन तोलि‍या फेकि‍ हुनका दि‍गम्‍बर रूपकेँ श्‍वेताम्‍वरमे परि‍णत कएल।
     ओहि‍ राति‍क घटनाक बाद मास्‍टर सहाएव पुन: नहि‍ मोहल्‍लाक भीतर देखल गेलाह। मुदा हुनक चर्चा सबतरि‍ अनेको दि‍न तक होइत रहल। अमीन सहाएव एहि‍ संगति‍सँ मुक्‍त भऽ फेर पुरना बाटक बटोही भऽ गेलाह। हमरा प्रति‍ हुनक नि‍ष्‍ठा भऽ गेलनि‍ कि‍एक तँ हम आश्‍वासनकेँ पूरा कऽ देलि‍एनि‍। संगति‍क संकटसँ मुक्त भऽ गेलाह।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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