Friday, August 13, 2010

'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)-Part III


 १.शि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू”- कि‍स्‍त-कि‍स्‍त जीवन-शेफालि‍का वर्मा-(समीक्षा)२.डॉ. बचेश्‍वर झा-समीक्षा- (मौलाइल गाछक फूल)
 शि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू”- कि‍स्‍त-कि‍स्‍त जीवन-शेफालि‍का वर्मा-(समीक्षा)


साहि‍त्‍य समाजक दर्पण होइत अछि‍ आ साहि‍त्‍यकार ओहि‍ दर्पणक शि‍ल्‍पी। शि‍ल्‍प जतेक वि‍लक्षण हएत छाया ततेक साफ। कोनो साहि‍त्‍यक अध्‍ययनसँ रचनाकारक मनोवृत्ति‍ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक संग ई वि‍डंवना रहल जे एहि‍मे वाल साहि‍त्‍य, अर्थनीति‍ आ आत्‍मकथाक वि‍रल लेखन भेल। मात्र कि‍छु साहि‍त्‍यकार एहि‍ वि‍धामे अपन लेखनीक प्रयोग कएलनि‍। ओहि‍ वि‍रल साहि‍त्‍यकारक गुच्‍छमे एकटा नाम अछि‍- डॉ. शेफालि‍का वर्मा।
     शेफालि‍का जीक रचना सभमे पारदर्शिता रहल ओ जे हृदएसँ सोचैत छथि‍ ओकरा अपन कृति‍ उतारि‍ दैत छथि‍। हुनक रचनामे अर्न्‍तमनक ध्‍वनि‍ स्‍पष्‍ट सुनल जा सकैत अछि‍। कतहु अर्न्‍तद्वन्‍द्व नहि‍, कतहु पूर्वाग्रह नहि‍। हुनक कि‍छु कृति‍- वि‍प्रलब्‍धा, अर्थयुग स्‍मृति‍ रेखा, यायावरी आ भावांजलि‍ पढ़लाक वाद हुनक जीवनक वास्‍तवि‍क रूपक दर्शन कएल जा सकैत अछि‍। अपन रचना सभकेँ एकसूत्रमे सहेजि‍ कऽ अपन आत्‍मकथा लि‍खलन्‍हि‍ कि‍स्‍त-कि‍स्‍त जीवन‍ अप्रत्‍याशि‍त मुदा, प्रासंगि‍क नाम। जीवनक कतेक रूप होइत अछि‍, बाल, वयस्‍क, प्रौढ़.... सुख-दुख, काम नि‍ष्‍काम यएह थि‍क एहि‍ रचनाक सार। अपन करूणामयी जीवनक बून-बूनकेँ ऑंजुरमे एकत्रि‍त कऽ आत्‍मकथा लि‍खलन्‍हि‍।
     आमुखसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे ओ नि‍त डायरी लि‍खैत छथि‍ तेँ अपन कि‍स्‍त-कि‍स्‍तक अनुभवकेँ वटोरि‍ लेलनि‍। वाल-कालक गणि‍त वि‍षयक समस्‍या हो वा संगीत शि‍क्षक पंडि‍त वाजपेयी जीक व्‍यवहारक मूक वि‍श्‍लेषण सभ वि‍न्‍दुपर पोथि‍क फुजल पन्ना जकॉं स्‍पष्‍ट प्रस्‍तुति‍। युवती वएसमे प्रवेश करैत काल कोनो अनचि‍नहार युवकक नजरि‍ देखि‍ कऽ अपन ब्रह्मास्‍त्रक (थूक फेकवाक) प्रयोग करैत छलीह। ओना एहि‍ अस्‍त्रक शि‍कार वि‍वाहसँ पूर्व ललन बावू सेहो भेल छलाह, जि‍नका संग ओ दाम्‍पत्‍य सूत्रमे बान्‍हल गेलीह। नव प्रकारक रक्षा सूत्रक वि‍षए मे पढ़ि‍ अकचका गेलहुँ, नीक नहि‍ लागल मुदा, एहि‍सँ रचनाक प्रासंगि‍कतापर प्रश्‍नचि‍न्ह नहि‍ लगाओल जा सकैत अछि‍।
     प्रवेशि‍का उत्तीर्ण कएलाक पश्‍चात शेफालि‍का जी पढ़ए नहि‍ चाहैत छलीह। ललन बावूक वि‍शेष प्रेरणासँ जहि‍ना- तहि‍ना स्‍नातक धरि‍ शि‍क्षा ग्रहण कएलनि‍। तत्‍पश्‍चात् घर-गृहस्‍थी आ साहि‍त्‍य साधनामे लीन भऽ गेली। साहि‍त्‍यमे वि‍शेष योगदानक लेल दरभंगामे डॉ. दि‍नराजी शाण्‍डि‍ल्‍य द्वारा वि‍द्या वारि‍धी‍ सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कएल गेली। एहि‍ सम्‍मानकेँ पावि‍ भाव-वि‍भोर भऽ मि‍थि‍ला मि‍हि‍रकेँ अपन मनोदशा पठौलन्‍हि‍। मि‍थि‍ला मि‍हि‍र द्वारा हुनक हस्‍त-लि‍पि‍केँ यथावत् प्रकाशि‍त कए देल गेल। मि‍थि‍ला मि‍हि‍रक होली वि‍शेषांक‍मे हि‍नक रचनाक रचनाकारक नाम देल गेल दि‍न राजी डॉ शेफालि‍का वर्मा‍। एहि‍ मजाकसँ शेफालि‍का जी कॉपि‍ गेली आ 18 वर्खक मौनव्रतकेँ तोड़ि‍ पुन: शि‍क्षा ग्रहण करवाक लेल आतुर भऽ गेली। परि‍णाम सोझाँ अछि‍- एम.ए., पी.एच.डी प्राध्‍यापक डॉ. शेफालि‍का वर्मा। अपन सम्‍पूर्ण जीवनमे प्रेमकेँ जीवाक आधार मानि‍ जीवि‍ रहल छथि‍- रजनी जी। आरसी बावूक शेफालि‍का- कोना रजनीसँ शेफाली वनि‍ गेली एहि‍ रचनामे झॉंपल अछि‍। प्रेमक सभ रूपकेँ अर्न्‍तमनसँ स्‍वीकार करव हि‍नक जीवन दर्शन अछि‍। राजनीति‍सँ दूर रहलीह, जखन की कि‍छु प्रसि‍द्ध राजनीतिज्ञ हि‍नका लग नतमस्‍तक रहैत छलाह। डार्विनवार उपार्जित लक्षणक वंशावलि‍‍क आधारपर एना संभव भेल। पि‍ता स्‍व. मल्‍लि‍क साहि‍त्‍कार आ सरल व्‍यक्‍ति‍त्‍व छलाह। हि‍नक पति‍ ललन बावू साहि‍त्‍यकार तँ नहि‍ छलाह परंच शेफालि‍का जीक साहि‍त्‍यक सभसँ पैघ पाठक। अपन पति‍ द्वारा नि‍रंतर पग-पगपर संग देवाक कारण हि‍नका जीवनसँ कोनो शि‍काइत नहि‍ अछि‍। जीवनक डोरि‍ फूजि‍ उड़ल व्‍योममे कातर प्राण मुदा जीवै छी।‍
  आव प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे हुनक आत्‍मकथासँ समाजकेँ की भेटत वा की भेटल? कोनो व्‍यक्‍ति‍ ओ महान हो वा नहि‍ हो ओकर जीवनसँ शि‍क्षा लेल जा सकैत अछि‍। शेफालि‍का जी तँ मर्मज्ञ छथि‍ जीवनक मर्मज्ञ, साहि‍त्‍यक मर्मज्ञ आ सि‍नेहक मर्मज्ञ। पुरूष प्रधान समाजमे नारीक एहेन दृढ़ता देखि‍ वर्तमान कालक बालाकेँ अवश्‍य नव दि‍शा भेटत।
     हुनक जीवन दर्शनकेँ कण-कणमे समा लेलहुँ, भाषा मनोरम आ प्रवाहमयी अछि‍।
     एतेक अवि‍राम कृति‍ रहलाक पश्‍चात् एहि‍मे कि‍छु त्रुटि‍क दर्शन सेहो भेल। शेफालि‍का जी अपन जीवनक कचोटकेँ नुका लेली। ओ फूजल मानसि‍क प्रवृति‍क महि‍ला छथि‍, चरि‍त्र उत्तम मुदा, पारदर्शी। सहज अछि‍ जे एहि‍सँ हुनका कि‍छु सामाजि‍क उपहासक अनुभव अवश्‍य भेल हेतनि‍। साहि‍त्‍यकारक रूपमे उपेक्षाक शि‍कार अवश्‍य भेल हेती तकर मौन व्‍याख्‍या तँ कएल जा सकैत छल मुदा, नहि‍ कएल गेल। भऽ सकैत अछि‍ ओ मैथि‍ल समाजक मध्‍य कोनो अनुत्तरि‍त प्रश्‍न नहि‍ उठवए चाहैत छथि‍। सम्‍पूर्ण सार अछि‍ जे रचना सारगर्भित ओ सोहनगर लागल। शेष.....अशेष.......।

पोथीक नाम- कि‍स्‍त-कि‍स्‍त जीबन
रचनाकार- डॉ. शेफालि‍का वर्मा
प्रकाशक- शेखर प्रकाशन, इन्‍द्रपुरी पटना-14
मूल्‍य- 300टाका मात्र
प्रकाशन वर्ष- 2008
कुल पृष्‍ठ- 320
शमीक्षक- शि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू‍
जमशेदपुर


डॉ. बचेश्‍वर झा
जन्‍म- १५ मार्च १९४७ईं
एम.ए.-पी.एच.डी.
पूर्व प्रधानाचार्य,
नि‍र्मली महावि‍द्यालय नि‍र्मली।

समीक्षा
(मौलाइल गाछक फूल)

       मौलाइल गाछक फूलक लेखक श्री जगदीश प्रसाद मंडलकेँ हम साधुवाद दैत छि‍यन्‍हि‍ जे हि‍न्‍दी आ राजनीति‍ शास्‍त्रमे एम.ए.क अर्हता प्राप्‍त होइतहुँ अपन मातृभाषाक प्रति‍ अटूट सि‍नेह राखि‍ मैथि‍लीमे लेखन करबाक भगि‍रथी प्रयास कएल अछि‍। ओना तँ मैथि‍लीमे अनेकानेक साहि‍न्‍यकार लोकनि‍ चेष्‍टा कएल अछि‍। हुनका लोकनि‍क भाषामे फेंट-फॉंट भेटल अछि‍, कि‍न्‍तु मौलाइल गाछक फूलमे सुच्‍चा लोकभाषाक प्रयोग भेटैत अछि‍। प्रान्जल भाषा गमैया भाषाक आगॉं घुटना टेक दैत अछि‍, जन साधारण अल्‍पो शि‍क्षि‍तकेँ गुद-गुदीक संग वि‍षय अन्‍तस्‍थलीकेँ छुवि‍ लैत अछि‍। वैचारि‍क दृढ़ता एवं हार्दिक मृदुलताक अद्भुत समाहार जगदीश जीमे वि‍रल अस्‍ति‍त्‍वक परि‍चए दैछ। उपन्‍यासक प्रत्‍येक लेखपर माने उपकथापर दृष्‍टि‍ दैत छी तँ स्‍पष्‍ट प्रतीत होइछ जे एकर लेखक जेना प्रत्‍यक्षदर्शी भऽ वि‍षयक नि‍रूपण कएल अछि‍।
     ओना तँ शि‍क्षाक सीढ़ीकेँ पार कए लेखक कलाक बलवती इच्‍छा राखि‍ मैथि‍लीक वाटि‍काकेँ पल्‍लवि‍त-पुष्‍पि‍त करक भरपूर प्रयास कएलन्‍हि‍‍ अछि‍। गाम ठामक बि‍लक्षण चि‍त्रण हि‍नक लेखनीक वि‍शेषता एहि‍ पोथीमे देखल जाइछ। हि‍नका भाषानुरागीक संग मातृभाषाक सि‍नेही कही तँ सर्वथा उपयुक्‍त होएत। एहि‍मे सामाजक ओहि‍ वर्गक समीक्षा कएल अछि‍ जकरापर आइधरि‍ केओ सोचबो ने कएने छल। माजल ठेंठ गमैआ बोलीक मैथि‍लीमे समाहि‍त कएने छथि‍।
     हमरा तँ लगैत अछि‍ माए मैथि‍ली लेखकक माथपर चढ़ि‍ कऽ एहन चमत्‍कारी उपन्‍यास लि‍खक हेतु प्रेरि‍त कएल अछि‍। फणि‍श्‍वर नाथ रेणु आ यात्री जीक उपन्‍यासमे सामाजि‍क रहन-सहन वैचारि‍क भि‍न्नता अर्थाभावक कारणे स्‍वाभि‍मानक हनन जौं देववामे अबैत अछि‍ तँ सम्‍प्रति‍ उपन्‍यासमे वर्णित घटना आ घटनासँ पात्रक प्रत्‍यक्ष दि‍ग्‍दर्शन अति‍ मार्मिक अन्‍तर मोनकेँ सोचवाक लेल उत्‍प्रेरि‍त करैछ।
     मधुबनी जि‍लाक बेरमा गाममे जन्‍म नेनि‍हार लेखक एतेक सुन्‍दर, सुवोध आ सुगम्‍य ढंगसँ वि‍षएकेँ नि‍रूपि‍त कए पाठकक जि‍ज्ञासाकेँ अन्‍त धरि‍ बढ़बैत गेल छथि‍ जे चि‍क्कन, चोटगर आ चयन लेल वाध्‍य करैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍याकाशक ई ज्‍योर्तिमान नक्षत्र सदृश उद्भूत भऽ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक भंडारकेँ समृध्‍द्ता अनवामे योगदान कएल अछि‍।
     ओना तँ औपन्‍यासि‍क वि‍चारानुसार एहि‍ उपन्‍यासमे त्रुटि‍ अछि‍। एकरा उपन्‍यास कहल जाए वा सामजि‍क नि‍बंध ताहि‍ परि‍प्रेक्ष्‍यमे वि‍द्वान पाठके नि‍र्णए कऽ सकैत छथि‍। मुदा हमरा तँ लेखकक एहि‍ उपन्‍यासमे कालानुसार घटना आ पात्रक चि‍त्रणमे ताल-मेलक अभाव भेटैत अछि‍ जेना- एकओर अनुप वोनि‍हारक बेटा बौएलाल भूख-पि‍याससँ आकुल अछि‍ इनारक पानि‍ भरवामे डोरी डोलक प्रयोजन छैक तँ दोसर दि‍शि‍ रमाकान्‍त आ हीरालालकेँ आधुनि‍क कालमे शराब चुस्‍कीक चर्चा होइत अछि‍ तेँ उपन्‍यासक वि‍षए-वस्‍तु समए बद्ध नहि‍ रहलासँ औपन्‍यासि‍क दोष लक्षि‍त होइत अछि‍। स्‍वीकार करए पड़ैत अछि‍ जे हि‍नक ई उपन्‍यास वि‍षय-वस्‍तुकेँ ताहि‍ रूपेँ समेटने अछि‍ जेना सि‍तुआमे समुद्र समाएल हो।
     लेखक जगदीश प्रसाद मंडल जीक प्रयास आ आयास दुनू साराहनीय छन्‍हि‍। हम मॉं  मैथि‍लीसँ प्रार्थना करैत छी जे हिनकामे स्‍फूरना बनल रहन्‍हि‍ जाहि‍सँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सम्‍वर्ध्‍दन होइत रहए।
               

पोथि‍क नाम- मौलाइल गाछक फूल
उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल
प्रकाशन- श्रृति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली पोथी-प्राप्तिक स्थान- Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul)
मूल्‍य- २५० टाका
  १.राम प्रवेश मंडलक
लघुकथा-मूल-मंत्र २.कुमार मनोज कंश्यप- फरीछ ३.-जगदीश प्रसाद मंडल-कथा- अर्द्धागि‍नी

राम प्रवेश मंडलक
लघुकथा

मूल-मंत्र

तीन दि‍नसँ ऑफि‍सक चक्कर काटि‍ रहल छी मुदा, एखनो धरि‍ प्रमाण पत्र बनैक आशा नहि‍ बुझना जाइत अछि‍। चाकरी नि‍मि‍त आवेदन करब समए बड़ कम अछि‍। ककरो पूछैत छी काज कोना होएत तँ कहैत अछि‍- कखनो हाकि‍म नहि‍ तँ कखनो कि‍रानी नहि‍।‍ काज कोना होएत?
    तखन बीरू भाय आबि‍ पूछलक- अहॉं कि‍एक उदास भऽ बैसल छी?
  बीरू भायकेँ अपन व्‍यथा कथा कहि‍ सुनौलहुँ। हुनक गंजीपर लि‍खल रहए- होएवाक चाही ई मूलमंत्र भ्रष्‍टाचारक हुअए अंत
    बीरू भाय बाजल- हँ!‍ काज भए जाएत मुदा, चाह-पानक खचर लगत? हाकीम नहि‍ अछि‍ तँ कोनो बात नहि‍। अहॉंक काज भऽ जाएत।
    चाह-पानक खरच कतेक पॉंच नहि‍ दस टका आओर की सोचेत हम बजलहुँ- काज करा दि‍अ। समए बड़ कम अछि‍।‍
    बीरू भाय सभटा कागज लऽ कऽ ऑफि‍स जाइत बजलाह- चाह-पान कऽ कि‍छु कालक वाद अहॉं आपस आवि‍ प्रमाण पत्र लऽ जाउ।‍
  कि‍छु खानक वाद पहुँचलहुँ। बीरू भाय प्रमाण पत्र दैत बाजल- लावह चाह पानक खर्चा?
    एकटा दस टकही सि‍क्‍का नि‍काली बीरू भाय दि‍शि‍ बढ़ेलहुँ। बीरू भायकेँ क्रोध आसमान पड़ चढ़ि‍ गेल ओ बाजल- एक सए चाहक, एक सए पानक दूइ सए टाका नि‍कालह नहि‍ तँ एहि‍ कागजकेँ खण्‍ड-खण्‍ड कऽ फेंक देबह।‍
    कोनो उपाए नहि‍ देखैत लाचार भऽ बीरू भायकेँ दुइ सए टाका दि‍अ पड़ल आ तखन हमरा समझमे आएल की होइत अछि‍ एहि‍ मूलमंत्रक मतलव!
 
कुमार मनोज कंश्यप

फरीछ

'परौलवाली ! किंछु हई घर मे पानि पीबई लै तऽ लाबौ ? भूखे -पियासे आहुर भऽ गेल म' चौंहुँ अबै है । ' असोथकिंत गणेशी लाठी कंात मे रखैत थुस्स सँ ओसारा पर भुँईयें मे बैसि गेल आ कंान्ह पर सँ फाटल गमछा उतारि अपना मुँह पर हावा कंरय लागल ।

'कंाल्हि जे मँगरौनीवाली के राहड़ि फटकिं-झाड़ि देले रहियै से वैह बदला मे खेसारी देले रहई । ओकंरे ऊसना रन्हलियै । आर कुछो कंहाँ हई घर मे । ' - डराईते-डराईते कंहने रहई परौलवाली । ओकंरा बुझल छलै जे गणेशी के खेसारीये के नाम सँ झड़कंी उठैत छई ; ताहु मे ऊसना ! गणेशी के चुप्प देखि कंने साहस बढ़लै - 'कंी कंरतई ? साँस तऽ कंहुना बचबई के हईये । ' गणेशी चुप्पे रहल । ओकंर साहस आओर बढ़लै - ' ई हाथ-मुँह धो आबऊ ईनरा पर सँ ; ताले हम ऊसना कंाढ़ि दैत छियै । ' परौलवाली के बुझा गेल छलै जे गणेशी पेर खालिये हाथ घर घुरि आयल छै ।

गणेशी मुड़ि गारने ऊसना सुड़कंने जा रहल छल । आई बड़ तृप्ति भेट रहल छलै ओकंरा ओहि खेसारी के ऊसना मे । यैह गणेशी छल जे अपन जुआनी मे कंहैत छलै - ' खेसारी सार बेमारीये के घर ! ई मनुक्ख के खाई ले थोड़े हई । ई घोड़ा-दाना हई । ' आई गणेशी थारी के कंान्ह मे लागल झोर के औंठा सँ कंाछि-कंाछि कंऽ ताधरि चटैत रहल जाधरि ओहि मे कंोनो अवशेष बँचल रहलै । ओकंर एना कंऽ थारी चटनाई परौलवाली के नहिं नीकं लगलै - 'पेट नईं भरलै कंी ? हाँड़ी मे आर कंनी हई ; लऽ लौकं । '

'तों किं भुखले रहबैं ? पेट भरई के कंी ! ई तऽ अकंादारण हई । '

'जनी-जाति के कंोन हई, एकं लोटा पानियो पी कंऽ टेम कंाटि लेत । मरद के तऽ पूरा खोराकं चाही । '

'नईं-नईं भुख सबके बरोबरे होई हई --मरद होई कंी जनी-जाति । अन्न बेरबाद नईं होई, तैं चाटि लेलियै । पेट तऽ भरि गेल । ' - बामा हाथ सँ पेट के हँसोथति बलो सँ ढ़क़ंडैत बाजल गणेशी ।

गणेशी कंतबो कंहउ, परौलवाली के बुझा गेल छलै जे ओ अधपेटे रहि गेलै । जुआनि मौगति नीकं, अधपेटा भोजन नहिं नीकं । मुदा ओकंरा बुझल छैकं जे ओ कंतबो कंहतै , गणेशी सभटा खा लई ई कंहियो नहिं भेलैयै । परौलवाली के मोन पड़लै जे गणेशी शुरुहे सँ कंतेकं मानैत छलै ओकंरा । ओ जखन साँझ कंऽ बोनिहारी कंऽ कंऽ घुमै तऽ ओम्हर सँ रजबा दोकंान सँ किंछु ने किंछु ओकंरा लेल लेनहिं अबैै फाँढ़ मे नुकंा कंऽ - कंहियो कंचड़ी, कंहियो झिल्ली, कंहियो गुलगुल्ला तऽ कंहियो जिलेबी । ताड़ी पी कंऽ बेमत्त रहितो सभ सँ चोरा कंऽ अपने हाथे खुअबैत छलैकं ओकंरा । लाजे मुँह लाल भऽ गेलै परौलवाली के । झट सँ ओ आँचर सँ अपन मुँह झाँपि लेलकं । सिनेमा जकंाँ ओकंरा आगू मे नाचऽ  लगलै ओ बितलाहा दिन --- गणेशी ओकंरा कंहियो तामसे मे सही, दुरभाखा कंहने होई , से नहिं मोन छई । कंतेकं मानैत छई ओकंरा ? रंग-विरंगकं साया-साड़ी, टुकंली-चोटी आनि-आनि कंऽ दैत छलै । कंहै छोटकंा के बहु हई तई सऽ कंी, पहीरना-ओढ़ना मे कंोनो धनीकंहा के बहु  सँ कंी कंम्म हई ? बुढ़िया सासु तऽ एक्के ताले नाचै जे ई मौगीयाा हमर बेटा के नून पढ़ा कंऽ खुआ देने आछ । कंहबो कंोना ने कंरितै ? गणेशी सभ लाज-धाख उठा कंऽ हरदम परौलवाली-परौलवाली के रटनी जे लगेने रहैत छलै । कंनिके परौलवाली आँखिकं ओट भेल कंी बेचैन भऽ जाईत छलै ओ । कंतबो लोकं कंहैत रहलै जे एहन कंमासुत छैं  दू-दू जऽन के कंाज एकंसरे कंरैत छैं  देह मे बुत्ता छौ  निकंलि जो कंतहु देश-विदेश़़क़ंमा कंऽ बुर्ज कंऽ लेबैं । गामकं दू सेर बोनि मे आब कंी राखल छै ? मुदा गणेशी कंहिया अनकंर बात मानलकै जे आई मानितै । लगलै सभ दिन एहने दिन-दुनियाँ रहतै ।

से रहलै कंहाँ ? विपत्तिकं जखन पहाड़ खसैत छैकं तऽ केयो माथ पर हाथ देब' बला नहिं रहैत छैकं । कंहैलै तऽ भेलै पाँच टा धिया -पुता , मुदा जीलै कंहाँ एकंोटा । बच्चा भेला के दसे दिन के बाद परौलवाली के छातिये सुखा जाई़़ निमुह बच्चा पोसैतै कंथि पर ? से जहिना बच्चा होईत गेलै तहिना मुईलो गेलै । लोकंकं कंहला पर कंी कंी ने केलकै़क़ंतेकं कंबुला-पाति केलकं, कंतेकं ओझा बजेलकं, कंतेकं भगता खेलबेलकं, कंतेकं डाली उठेलकंमुदा, ओहि सभ सँ किंछु नहिं भेलै?


बुढ़ारीकं संग समाँगो खसैत गेलैकं । उपर सँ दम्मा से परेशान कंरऽ लगलै । बातरस तऽ छलैहे । जखन देह मे सक्के नहिं रहलै तखन ज'न लेल के अढ़बितै ? कंोनो चारा नहिं देखि लोकंकं खुसामद कंऽ कंऽ आधयो बोनि पर कंाज कंरै लेल तैयार भेलै । मुदा तैयो केयो अढ़ेबा लेल तैयार नहिं भेलई । नरेगा मे कंाज लेल मुखिया के पैर-दाढ़ि पक़ंडलकंई , मुदा केयो सुननाहर नहिं । साँझकं-साँझ बीतय लगलै । पैंचो-उधार कंी आब कंकंरो कंोई दैत छै ? पेर ओ सधेतई कंतऽ सँ ? एक्कंो बीत खेतो नहिं छलैकं जे जैह किंछु फसिल भऽ जयतैकं प््रााण रक्षा लेल । जयकंता तऽ कंहैत छै जे गणेशीकं बाप  घरारियो ओकंरा बापकं हाथे भरना राखि चुकंल छै । सबुत मे कंागतो देखबैत छै ओ ।

ओ तऽ परौलेवाली कंहुना कुटाउन-पिसाउन कंऽ कंऽ दुनू परानी के जान बचेने छै अखन धरि । अपना जुआनि के दिन मे तऽ गणेशी परौलवाली के पयरो ने कंकंरो देखऽ देने  हेतई ; कंाज कंरेबाकं तऽ बाते नहिं । समय जे ने कंराबय ! कुटाउनो-पिसाउनो कंी रोज भेटैत छै ? ताहु पर नीकं जकंाँ ओकंरा आब सुझितो तऽ ने छई । गामे मे स्वूल पर शिविर मे परूकंाँ साल देखेने रहै तऽ डाक्टर साहेब कंहने रहथिन - 'मोतियाबिंद है , ऑपरेशन कंरबाना पड़ेगा । ' ऑपरेशनो कंोना कंराबओ़़एकंटा समाँग तऽ चाही संग मे़से के भेटतै ओकंरा ? गणेशी बुते कंोना पार लगतै ? ओ तऽ अपने असक्कं भेल आछ । 'निट्‌ठाह आन्हर भऽ जैब तऽ कंहियो जहर-माहुर खा कंऽ परान हति लेब । '- निराश भऽ गेल छल परौलवाली ।

गणेशी के केयो कंहलकंई - 'गरीबी रेखा मे नाम हेतौ तऽ सरकंार दिस सँ चाऊर-गहुँम आ रहलै लै घरो भेटि जेतौ । गाम-गाम मे लोकं के सरकंार पक्कंा मोकंाम बना कंऽ दऽ रहल छै , राशन-पानी दऽ रहल छै, बीरधा-पेलसुम (वृद्धावस्था पेंशन) दऽ रहल छै । तोरा सन निपुतर लोकं के सरकंारी मदति नहिं भेटतै तऽ कंकंरा भेटतै ? ' गणेशी के मिझायल आँखि मे पेर सँ जेना आशा के एकंटा किंरण जगलै । गामकं मुखिया-सरपंच के पैर-दाढ़ी पक़ंडैत-पक़ंडैत आ दौड़-बड़हा कंरैत-कंरैत तऽ आब कैकं मास बीति गेलै। आश बन्हने कंहुना कंऽ उठ-बैस कंरैत ब्लौकंो के कैकं चक्कंर लगेलकं । ब्लौके सँ घुमल छल आई जेठकं क़ंडक़ंडौआ रौदा मे़भुखे-पियासे बेहाल ।

उसना खा कंऽ कंारी भेल पचकंलहा टिनही लोटा सँ एकं लोटा पानि पीबि गेल मुदा त्रास लगले रहलै। कंतेकं पानि पीयत़़आब तऽ पेटे फाटि जेतै । एकंटा जोर के ढ़ेकंार लेलकं ओ आ तमाकुल चुनबैत देबाल सँ ओगठि कंऽ पैर पसारि कंऽ बैसि गेल । परौलवाली लऽग मे ठाढ़ भऽ कंऽ पढ़िया नुआँकं   आँचर सँ भीजल हाथ पोछैत पुछलकै - 'आईयो कंाज भेलै किं ओनाहिते घुरि आयल?'

'परौलवाली ! अपन गामकं गरीब लोकं मे भुबनबाबू, जग्गू पांड़े, सोभन जादो सन बड़कंा-बड़कंा  कंोठी-कंोठा बला सभ के नाम एलै यै । सरकंारकं खाता मे तऽ अपना आऊर धनीकं छी । बड़कंा-बड़कंा धोईधे  बला सब के सरकंारी सहायता लेबऽ दही़अपना आऊर भुखलो पेट छी तऽ अमीर छी ।' गर्व सँ सीना तानि लेने छल गणेशी ।

परौलवाली ठकुआयल ठाढ़े रहि गेल छल ।
****


 ३.


 
जगदीश प्रसाद मंडल 1947-
गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
कथा

अर्द्धागि‍नी

आने दि‍न जकॉं लालकाकी घर-आंगन बहाड़ि‍ बाढ़नि‍केँ कलपर धोए पछवरि‍या ओसार लगा ठाढ़ केलनि‍। हाथ-पएर धोअल बुझि‍ नजरि‍ फूल तोड़ैपर गेलनि‍। ओना ऐहन नि‍यमि‍त लालकाकी छलीह जे जहि‍ना खर लगा पेटीमे कपड़ा लगौने छथि‍ तहि‍ना दि‍न भरि‍क काजोक छन्‍हि‍। मुदा मन पाड़ैक जरूरत एहि‍ लेल रहि‍ जाइत छन्‍हि‍ जे पढ़ुआ काका (पति‍) गाममे छथि‍ आकि‍ नहि‍? गाममे रहने कि‍छु काज बढ़ि‍ जाइत छन्‍हि‍ आ नहि‍ रहने कमि‍ जाइ छनि‍। गामेमे रहने फूल तोड़ब बुझलनि‍। ओसारक खुट्टीसँ फुलडाली उताड़ि‍ कल दि‍स बढ़लीह। कलक बगलेमे रंजनी गंधापर हाथ दइते छलीह कि‍ नजरि‍ अपराजि‍त दि‍स बढ़लनि‍। मेल-पॉंच करैक वि‍चार सोचैत रजनीगंधासँ अपराजि‍त दि‍स बढ़लीह। अपराजि‍त तोड़ि‍ चम्‍पापर हाथ बढ़ौलनि‍। ऑंखि‍ पड़लनि‍ फुलडालीक फूलपर। फुलडालीक फूल देखि‍ वि‍चारलनि‍ जे पॉंचटा बेलामे सँ नि‍कालि‍ लेब। चम्‍पासँ आगू बढ़ते छलीह कि‍ नजरि‍ पति‍पर गेलनि‍। पति‍पर नजरि‍ पड़ि‍तहि‍ मन दुखाए लगलनि‍। ककरा नइ इच्‍छा होइ छै जे पति‍क संग एयर कंडीशन गाड़ीमे बैसि‍ सराफा बाजार जाए हीरा-मोतीसॅं सजल सेनाक हाड़ गरदनि‍मे लटकवि‍तहुँ। मुदा तेहेन भेलाह जे जखन सरकारी दरमाहा भेटए लगलनि‍ आ कहलि‍एनि‍ जे साइकिल कीनि‍ लि‍अ। सुभि‍तगर हएत तँ कहलनि‍ जे चालीस-पैंइतालि‍सक भऽ गेलौं, हड्डी जुआ गेल जँ खसि‍-तसि‍ पड़ब आ टूटत तँ केतबो पलस्‍तर करब तइओ ने जुटत। तइसँ नीक पएरे। कहलनि‍ एक मानेमे नीक। मुदा तइओ ढोढ़क बीख जकॉं हड़हड़ा कऽ बीख नइ उतड़लनि‍। मन गेलनि‍ दोसर दि‍स। सभटा कि‍ताब बरखामे भीजि‍-भीजि‍ सड़ि‍ गेलनि‍, जखन घर चुबै छलनि‍ तखन जँ सड़ि‍ये गेलनि‍ तँ अइमे अपन साध नइ। मुदा जखन घर बनौलनि‍ तखन कि‍अए ने फेड़ि‍ कीनि‍लनि‍। जइ घरमे कि‍ताब नइ रहत ओ घर केहेन हेतइ। क्रोध कमलनि‍। क्रोध कमैक कारण भेलनि‍ अपन काज मन पड़लनि‍। पॉंच बजे भोरसँ ओछाइनपर जाइ काल धरि‍ ककराले करै छी, परि‍वारे लए ने। फेड़ि‍ तामस मुड़ि‍ गेलनि‍ कहैले आठ घंटा डयूटी करै छथि‍ चारि‍ घंटा बाटेमे लगै छनि‍, अधा काज जे सम्‍हारि‍ कऽ नइ रखबनि‍ तँ पारो ने लगतनि‍। एहेन पुरूखे की जे अपन जि‍नगी अपनो हाथमे रखि‍ नै चलैत? फुलडाली रखि‍तहि‍ मनमे एलनि‍, एक वि‍हीत काज भऽ गेल। चुल्‍हि‍ लग बइसैमे अखनो बहुत बाकी अछि‍। हड़वड़ा कऽ घर-नि‍प्‍पा उठा ओसारपर पूजा ठॉंउ कए चुल्‍हि‍-चि‍नमार दि‍शि‍ बढ़लीह। घर-नि‍प्‍पा राखि‍ अर्घा-सरायसँ लऽ कऽ थारी-लोटा लेने कलपर पहुँचली। कलपर सँ आबि‍ लालकाकी घड़ी दि‍स देखलनि‍। अखन तक समए आ काजमे तल-वि‍तल नहि‍ देखि‍ मनमे खुशी भेलनि‍। नजरि‍ पति‍पर गेलनि‍। कीड़ी ऑंखि‍मे पड़ने जहि‍ना कड़ुआ जाइत तहि‍ना मन कड़ुआ गेलनि‍। बुदबुदेलीह- एकटा काजपर तवक्‍कल रहने घर आगू मुँहे ससरत?” फेरि‍ मनमे एलनि‍ आन दि‍न जकॉं जारन सुखाएल नहि‍ अछि‍ भानसमे देरी लागत, से नइ तँ पानि‍ चढ़ा चुल्‍हि‍ पजारि‍ लइ छी। चुल्‍हि‍ पजड़ल रहत तँ कनी देरि‍यो लगने समएपर भऽ जाएत। बाड़ी पहुँच पतरका जरना सभ बीछि‍ कऽ चुल्‍हि‍ लग रखलनि‍। चुल्‍हि‍ पजारि‍ बरतन चढ़ा तरकारीक मुजेला आ कत्ता नेने चुल्‍हि‍ लग आवि‍ काटि‍‍-काटि‍ थारीमे रखए लगलीह। साढ़े आठ बजे सॉंस छोड़लनि‍। आगि‍मे सेकल देहो हल्‍लुक बुझि‍ पड़लनि‍। मनमे एलनि‍- एहि‍सँ बेसी सेवा की भऽ सकै छै। फेरि‍ मन पति‍पर गेलनि‍। उमकि‍ कऽ मन कहलकनि‍- आरो जे हुअए मुदा भगवान जि‍द्दीयाह पुरूखक संग जोड़ा लगौलनि‍। हृदए वि‍हुँसि‍ गेलनि‍। जइ मर्दकेँ आनि‍ नै आ जइ बड़दकेँ पानि‍ नै ‍ओ अनेरे गाम धि‍नबै लए कि‍अए जीबैए। मन पड़लनि‍ दुरगमि‍नया पीढ़ी। जहि‍ना बाबू सत्पुरनि‍ खोधाएल कटहरक पीढ़ी देलनि‍ आइ धरि‍ ओहि‍पर बैसि‍ भोजन करै छथि‍। थारी साठि‍ लाल-काकी पंखा नेने छोटकी पीढ़ीपर बैसि‍ बनौल वि‍न्‍यासक सुआद बुझैक लेल पढ़ुआ काका दि‍शि‍ देखए लगलीह। मगन भऽ पढ़ुआ काका भोजन करए लगलाह। शरीरांगक (देहांगक) सि‍रखार देखि‍ लालकाकी सि‍कुड़ गेली। मुदा भोजन काल जे बजवे ने करताह हुनका कहलो की जाए। चुप्‍पे रहलीह।
     कपड़ा पहीरि‍ पढ़ुआ काका घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ रहथि‍ कि‍ आंगनमे पनबट्टी नेने पत्‍नीकेँ ठाढ़ देखलनि‍। पत्‍नीक काज देखि‍ मन मानि‍ गेलनि‍ जे सि‍पाही जकॉं छथि‍। मनमे खुशी एलनि‍। पान खा आगू-आगू पढ़ुआ काका आ पाछु-पाछु लालकाकी आंगनसँ नि‍कलि‍ डेढ़ि‍यासँ आगू सड़क धरि‍ एली। सड़कपर आबि‍ पढ़ुआ काका पत्‍नीकेँ पुछलखि‍न- कि‍छु कहवो अछि‍?
  लालकाकी- अपन तनदेही राखू।‍
     दुनू गोटे दुनू दि‍शि‍ वि‍दा भेला। मुसकुराइत पढ़ुआ काका एक डेग आगू बढ़ि‍ पाछु घुरि‍ कऽ देखि‍ डेग तेज करैत आगू बढ़लाह। मुदा तनमे सुरसुरी लगलनि‍। भेलनि‍ जे छीक्‍का हएत। मुदा वामा हाथसँ नाककेँ सहलबए लगलाह। मुदा सुरसुरि‍यो अपन चालि‍ छोड़ैले तैयार नहि‍। हाथ नि‍च्‍चॉं करि‍तहि धि‍यान‍ पत्‍नीक शब्‍द तनदेहीपर गेलनि‍। पत्‍नीक मुँहसँ नि‍कलल शब्‍द वि‍शारद पास पढ़ुआ काका फेरि‍ घुरि‍ पत्‍नी दि‍स तकलनि‍ तँ देखलनि‍ जे सड़कसँ आंगनक घुमौर भौकपर पहुँच गेल छलीह तेँ पढ़ुआ काकाक ऑंखि‍सँ अढ़ भऽ गेल छलीह। कोकि‍लक कंठसँ नि‍कलल शब्‍दक तरंग पढ़ुआ काकाकेँ ठेलने-ठेलने, तन आ देहीपर लऽ गेलनि‍। तन-देह। शरीर आ शरीरी। देह आ देही। मुदा एहेन चंदन जकॉं झलकैत शब्‍द हुनका एलनि‍ कतएसँ। हम तँ कहि‍यो अपन सीमाक अल्‍लंघन नहि‍ केलहुँ। अपन ज्ञान घरक सीमासँ बाहर बँटलहुँ। हुनका अखन धरि‍ कि‍छु देलि‍एनि‍ कहॉं। मुदा शब्‍द तँ शब्‍द जकॉं अछि‍। कि‍अए ने बजनि‍हारि‍येसँ पूछि‍ लि‍अनि‍। ओहो तँ आन नहि‍ अर्द्धागि‍नी। घरसँ बहार धरि‍ बनैक लेल दुनू सहयोग तँ बराबरे अछि‍। एक सीमाक भीतर ओ एक सीमाक भीतर अपने। हम तँ कमा कऽ वि‍नु गनले रूपैआ हाथमे दऽ दइ छि‍अनि‍। मुदा ओहि‍ रूपैआकेँ नचबै तँ वएह छथि‍। पि‍ताक देल पॉंचो बीघा जमीनकेँ तँ सेहो वएह नचबै छथि‍। मुदा जते दुनू गोटेक भीतर‍ झकैत छलाह तते हटल-हटल बुझि‍ पड़नि‍। मन बौआ गेलनि‍ जे पति‍-पत्‍नीक, पुरूष-नारी आ स्‍त्री-स्‍वामीक बीच केहन बंधन होएवाक चाही। मुदा वि‍चारमे समझौता भऽ गेलनि‍। कि‍अए ने दुनू गोटे वि‍चारि‍ कऽ परि‍वारकेँ ससारी। मनमे खुशी एलनि‍। गामक सीमो टपि‍ गेलाह। वि‍द्यालयाक मुरेड़ापर नजरि‍ गेलनि‍। सबुर भेलनि‍ जे पहुँच गेलौं। तीस-पैंइतीस सालक अभ्‍याससँ तँ थकान नहि‍ बुझि‍ पड़नि‍ मुदा.......।   

क्रमश:।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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