Friday, August 13, 2010

'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)-Part II




 शि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू‍
समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्‍दा २.तारानन्द वियोगी- सुभाष चन्द्र यादवक कथासंवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथासंग्रह बनैत बिगड़ैत३.बिपिन झा- हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥
१.
 शि‍व कुमार झा टि‍ल्‍लू‍
समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्‍दा
श्रीमती वि‍भा रानी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक चर्चित लेखि‍का छथि‍। श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त हुनक नाटक द्वय भाग रौ आ बलचन्‍दा पढ़लहुँ। भाग रौ बड़ नीक लागल, परंच बलचन्‍दा पढ़ि‍ते हृदयमे नव वेदना पसरि‍ गेल आ समीक्षा लि‍खवाक दु:साहस कऽ देलहुँ।
      वास्‍तवमे वलचन्‍दा नाट्क नहि‍, छोट पोथीमे मात्र 20 पृष्‍ठक एकांकी थि‍क। सभसँ पैघ गप्‍प जे वि‍भा जी वर्तमान सामाजि‍क जीवनक सभसँ पैघ समस्‍याकेँ अपन लेखनीक वि‍षय बनौलन्‍हि‍। कन्‍या भ्रुण हत्‍या बर्तमान समाजमे वि‍कट रूप लऽ रहल अछि‍। प्राय: नाटकमे पुरूष प्रधान पात्रकेँ नायक कहल जाइत अछि‍ परंच एहि‍ ठॉ रोहि‍तक भूमि‍का खलनायकक अछि‍। वि‍जातीय समाजक एक शि‍क्षि‍तसँ क्षणक आवेगमे प्रेम कएलनि‍। वि‍वाह सेहो भऽ गेल। मुदा ओहि‍ स्‍त्रीकेँ की भेटल? अभि‍यन्‍ताक शि‍क्षा ग्रहण कएलाक पश्‍चात् गृहि‍णी वनि‍ कऽ रहि‍ गेली। पुरूष प्रधान समाज तैयो पाछॉं नहि‍ छोड़लक। प्रथम संतान बालक होएवाक चाही। आश्‍चर्यक गप्‍प ई जे एहि‍ प्रकारक आदेश सासु द्वारा देल गेल। एक नारी द्वारा दोसर नारीसँ आबएबला नारीक नाश करबाक कुटि‍ल आज्ञा एहि‍ एकांकीक मूल वि‍षए-वस्‍तु अछि‍। खलनायक चुप्‍प छथि‍, कि‍एक तँ ओ मातृभक्‍त। तखन दोसर माएकेँ संतति‍ हंता कि‍ए बनाबए चाहैत छथि‍। जीवन भरि‍ संग देवाक शपथकेँ की भेल? जखन नि‍र्वाह करबाक सामर्थ्‍य नहि‍ छल तँ आन जाति‍क कन्‍याकेँ संगि‍नी कि‍ए बनौलन्‍हि‍। रोहि‍तक प्रेम-सि‍नेह नहि‍ वरन् वासना मात्र छल।
      स्‍त्रीकेँ भोग्‍या बना कऽ राखब ओहि‍ परिवारक मूल संकल्‍प। ओहि‍ लोकनि‍केँ सोचवाक चाही जे आव ओ दि‍न बीति‍ गेल, नारी लक्ष्‍मी तँ चंडी सेहो छथि‍। रोहि‍तक स्‍त्री गर्भपातक प्रवल वि‍रोध कएलनि‍। प्रति‍ज्ञा कए लेली जे अबैबला तनयाक पति‍पाल स्‍वयं करब।
      एहि‍ एकांकीक भाषा सरल आ सुन्‍दर अछि‍। वि‍षए-वस्‍तुक सम्‍पादन सुन्‍दर आ आकर्षक। मैथि‍ल संस्‍कृति‍क व्‍यापक प्रदर्शन। जय-जय भैरवि‍सँ प्रारंभ आ समदाओनसँ इति‍ श्री। नारी व्‍यथाक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रणक संग जाति‍ व्‍यवस्‍थापर मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल ई नाट्क नहि‍ एकटा आन्‍दोलन कहल जा सकैत अछि‍। संस्‍कृति‍क रक्षाक लेल आ सामाजि‍क संतुलन हेतु साहि‍त्‍यि‍क आन्‍दोलन वि‍भा जीकेँ नमन........ धन्‍यवाद।

पोथि‍क नाम- भाग रौ आ बलचन्‍दा
लेखि‍का- वि‍भा रानी
दाम- १००रू.
प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली पोथी प्राप्तिक स्थान: Pallavi Distributors मोवाइल- ९५७२४५०४०५Ward no- 6, Nirmali (Supaul)
 २.
तारानन्द वियोगी
सुभाष चन्द्र यादवक कथासंवेदना- - सुभाष चन्द्र यादवक नवका कथासंग्रह बनैत बिगड़ैत


कोनो संग्रहकेँ, चाहे ओ कथासंग्रह हो आ कविता आ निबन्धसंग्रह, एक नीक अथवा अधलाह संग्रह कोन आधारपर मानल जाए? अंग्रेजीसँ लऽ कए मैथिली धरिक संग्रहकेँ देखैत हमर एक सामान्य मान्यता बनल अछि जे जाहिमे पाठककेँ साठि प्रतिशत रचना, अपन पसन्दक, अपन काजक भेटैत हो, तकरा एक नीक संग्रह मानल जेबाक चाही। एहिसँ बेसी प्रतिशतक निर्वाह कठिन छै आ ताहिमे प्रधान कारण अछि पाठकक रूचिभिन्नता। जे से। हम तँ जखन पढ़लहुँ तँ बुझाएल जे कोनो कारण नहि छै जे सुभाषक एहि संग्रहकेँ अधलाह संग्रह मानल जाए।
चालीस बरखसँ ऊपर भेल जे सुभाष मैथिलीमे कथालेखन शुरू केने छलाह। ओ सुरूहेसँ कने दोसर तरहेंलिखै छलाह। तकर तात्विक कारण छलै जे जीवनकेँ आ जगतकेँ कने दोसर तरहें देखै छलाह। दोसर तरहेंमाने मैथिलीमे जाहि तरहें देखबाक रेबाज रहलए, ताहिसँ भिन्न तरहेँ। कोनो लेखक यदि जीनियस हएत आ ओरीजिनल लिखत तँ ई चीज हेबे करतै। से कैक गोटेमे भेलैए। सुभाषोमे भेलनि अछि। तँ हमरा लोकनि देखैत छी जे मैथिलीमे जे गंभीर लोक सभ छलखिन, से सुभाषकेँ बहुत मान देलखिन। सुभाषमे, मैथिली साहित्यकेँ अपना लेल नैतिक समर्थन देखार पड़लैक। प्रख्यात आलोचक कुलानन्द मिश्र कहलनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक बादे आरम्भ भेल।
कुलानन्द कुलानन्दमिश्र बुधिआरकेँ इशारा काफीबला अंदाजमे अपन बात कहलखिन आ एहि बातकेँ नहि साफ केलखिन जे मैथिली एकटा निश्चित सीमाकी छलै आ सुभाष कोन तरहें ओकर अतिक्रमण केलखिन। मुदा, हमारा पुछै छी जे मैथिली साहित्य अंततः थिक की? जीवनजगतकेँ देखबाक एकटा ब्राह्मणदृष्टि। अपना संतोषक लेल हमरा लोकनि कहि सकै छी जे एहि दृष्टिमे बहुत विविधता छैअनेक वाद अछि, अनेक पीढ़ी अछि। आदिआदि। से बड़ बेस।
मुदा तैयो, ई तँ एकर बड़ पैघ सीमा भेलै कि नहि! मानै लेल तँ संसारक अधिकांश लोक आइयो इएह मानैत अछि जे मैथिली साहित्य भाजपाक एकटा सांस्कृतिक उपनिवेश थिक, मुदा ई लोकनि दयनीय छथि कारण मैथिलीक सार्थक लेखनक यथार्थ हिनका लोकनिकेँ नहि बूझल छनि। दोसर दिस हमरा लोकनि देखैत छी जे दृष्टिवान सम्पादक अशोक जखन समकालीन कथापर संधानक विशेषांक प्रकाशित करैत छथि तँ आयासपूर्वक सुभाषक कथासँ आरंभ करैत आगामी विकासक आकलन करैत छथि कुलानन्द मिश्रक मान्यताक सर्वजनीजीकरणक ई एक दृष्टांत थिक।
सुभाष कने दोसर तरहें जीवनकेँ देखैत छथि। कोन तरहें? हुनक एक कथा एकटा अंतमे आएल एकटा चित्रण हमरा एहि ठाम मोन पड़ैत अछि। कथावाचक अपन बीमार ससुरक जिज्ञासामे सासुर गेल अछि। ओतए ससुरक संग ओकर देखादेखीकेँ चित्रण कथाकार करैत छथि–‘जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तँ हुनकर आँखिमे ताकने छलिअनि। ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह। आ हमरा दुनूकेँ बुझाएल रहए जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होएत। देखल जाए। दुनू दुनूक आँखिमे ताकैए। दुनू दुनूक आँखिक भाषा बुझैए। एक दोसरक भावनाक आदानप्रदान बहुत प्रामाणिकताक संग भऽ रहल अछि। अलगसँ एहि दुनूकेँ कोनो भाषाक प्रयोजन नहि छै। कने अखियास कएल जाए जे एहि तरहक कम्यूनिकेशनमे संवेदनशीलताक कोन तल वांछित अछि, जीवनक मर्मक भीतर कतेक गहराई धरि पैसब जरूरी अछि! ई सुभाष छथि! हुनकर सीमा छनि जे कलावादी ओ भऽ नहि सकै छथि, बहुत कलाकारी कऽ नहि सकै छी। ज्ञान छनि दुनिया भरिक। मुदा जखन रचबाक बेर अबै छनि तँ ततेक प्रकृत भऽ जाइत छथि तें प्राइवेशीकेँ सर्वस्वीकृत मानक धरि टुटि जाइत अछि। अहाँ देखि सकै छी जे ई चित्रण मात्र एक चित्रण नहि थिक; सुभाष दुनियाकेँ कोना देखै छथि तकर स्पष्टीकरण थिक। ई अपन पाठकसँ डिमांड सेहो थिक जे हुनका देखू तँ एहि ठामसँ देखू एतबा संवेदनक्षमता राखि कऽ, जीवनमर्ममे एतबा डूबि कऽ। देखबाक प्रचलित रेवाज की अछि? ककरो आ कथूकेँ देखू तँ विचारक संग देखू जे की देखै छी, कते देखै छी, कोन ठामसँ देखै छी! आदिआदि। आ जखन विचारक संग देखबै तँ चयनबुद्धि सक्रिय रहबे करत। देखलमे कांटछांट करब। जे प्रयोजनीय नहीं बुझाएत तकरा छाँटि देबैक। ततबेकेँ राखब जाहिसँ अहाँक अभिप्राय स्फुट भऽ जाए। साहित्यमे आम तौरपर इएह रेवाज छै। परम्परित साहित्यशास्त्र सेहो एकरे कविप्रक्रिया कहैत छै। सुभाष कने दोसर तरहें देखैत छथि। देखबाक संकल्प टा खाली हुनकर होइ छनि, माने जे ककरा आ कथीकेँ देखबाक अछि। तकरा बाद, कोनो चयनबुद्धि नहि, कोनो विश्लेषण नहि, कोनो सिंगारपेटार नहिबस, ओ खाली देखै छथि, जेना हुनकर कथावाचक अपन ससुरक आँखिमे देखने छल।
जीवनकेँ देखबाक दृष्टि आनिवार्य रूपसँ कथाक भाषाकेँ आ शैलीकेँ आ रचनाविधानकेँ नियंत्रित करैत अछि। जेहन अहाँक दृष्टि अछि तदनुरूप अहाँक शिल्प हएत। सुभाषक कथामे हमरा लोकनि देखै छी जे व्यापक पसरल जीवनक कोनो एकटा क्षणसँ कथा शुरू होइ छै। आ जतएसँ शुरू होइ छै, तकर बाद एकएक प्रक्रमक विवरण दैत आगू बढ़ै छै, बस विवरण दैतबिना कोनो विश्लेषणकआ तखन देखै छी जे कथाक ई क्रम आगू बढ़ैतबढ़ैत कोनो एक ठाम आबि कऽ समाप्त भऽ जाइ छै। कोनो पैघ कालखण्ड हुनका कथामे कमोबेस भेटैत अछि। तहिना, घटनावलिक अथवा विचारसरणिक विश्लेषणो हुनका कथामे नहि भेटत, जेना हुनके समकालीन सुकांतक कथामे भेटैत अछि। हम सभ तँ देखै छी जे अपन जाहि कथामे सुभाष अपन प्रकृतिक विरूद्ध विश्लेषण करबाक प्रयास केलनि अछि से कथा हुनकर अधलाह कथाक रूपमे चीन्हल गेल अछि। माने जे जे चीज ओ छथि, सएह बनल रहथु तँ ओ सुन्दर लगैत अछि।
हुनकर एक कथा छनि–‘अपन अपन दुःख। एक परिवारक माने पतिपत्नीक सातआठ घंटा रातुक समय कोना बितलै, तकर विवरण एहि कथामे देल गेल छै। पत्नीक मोन सांझेसँ किछु खराब छै जे कि परिवारक लेल एक रेहलखेहल बात थिक। ओ बिनु भानसभात केने खाटपर सूतलि अछि। पेशंट देरीसँ घर घुरैत अछि। बच्चा सभक सहायतासँ कहुना भानस करैत अछि। खाइ लेल पत्नीकेँ उठबैत अछि। ओ नहि उठैत अछि। ओकर भोजन सुरक्षित राखि देल जाइछ। बाँकी सभ लोक खा कए सूति रहैत अछि। पति कोनो आन कोठलीमे सूतल अछि। रातिमे तीन बेर आबि कऽ पत्नी पतिकेँ उठबैत अछि। पत्नी कर्कशा अछि। ओकरा मुँहसँ कुबोले बहराइत छै। पतिकेँ उठबैत अछि जे एना पाड़ा जकाँ डिकरयनहि। पति ठरर पाड़ैत अछि, मुदा चिंतित अछि जे कण्ठमे कफ फसने ओकरा घरघरी शुरू भऽ गेल छै। भोरमे पता लागैत अछि जे पत्नी रातिमे भोजन नहि केलक। पति जँ उठौलापर उठि गेल रहितय, माने अपन बिछौनासँ बाहर, माने अपन सीमासँ, अपन घेराबंदीसँ तँ पत्नी भोजनो करितय, ओकर मोनो नीक होइतै आ ठरर आ घरघरीक जाहि दुष्चक्रमे ई दुनू पड़ल अछि, सेहो टुटितय। ई सुखाड़केँ कथा थिक। एहि ठाम सभ कथू सूखि गेल छैपतिपत्नीक सम्बन्ध, एकदोसराक लेल राग, एकदोसराक अस्तित्वकेँ स्वीकारबाक लेल एकटा नमनीयता, एकटा स्पेस’–किछुओ बचल नहि देखाइछ। जेहने एकर विषय छै, ठीक तेहने शिल्प आ तेहने कथाभाषाक प्रयोग कएल गेल छै। दाम्पत्यजीवनक जे आधारशिला छिएकप्रेम, से एहि ठाम कतहु नहि अछि। आ, सुभाष एहि संग्रहक भूमिकामे कहैत छथि जे हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभसँ प्रेम करए। ध्यान देल जाए। ओ दुनू पतिपत्नी तँ एकदोसरसँ प्रेम नहीं कऽ पाबैए, कारण प्रेमक लेल एकटा शर्त्त छै, सेहो सुभाष भूमिकेमे कहने छथि तँ प्रेम वएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत। आ, अपन अपन अहंकारक कारण, जकरा सुभाष अपन अपन दुःखकहैत छथि, आ व्यक्तित्वगत आनआन मलिनताक कारण ई दुनू एक दोसरसँ प्रेम नहि कऽ पबैए। मुदा, जाहि तरहें सुभाष एहि विवरणकेँ प्रस्तुत केने छथि, से पाठकमे प्रेमकेँ जरूरत, प्रेम करबाक बेगरताकेँ निशान छोड़ैए।(मोन पड़ैए हिन्दीकवि अज्ञेयक एकटा कवितापंक्ति–‘दुःख सबको मांजता है/और, सबको मुक्त करना वह न जाने/किंतु, जिनको मांजता है/उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रक्खे।) तँ, सएह। एहना स्थितिमे जखन सुभाष कहै छथि जे प्रेम केनिहार मनुक्ख ओ गढ़ऽ चाहै छथिकथामे आ कि पाठकक स्मृतिसंस्कारमे? निश्चिते पाठकक स्मृतिमे, ओकर संस्कारमे। प्रेम हुनक कथाविषय नहि थिक, कथाविषयक प्रतिफलन थिक, से हमरा लगैत अछि।
मुदा, औपचारिक रूपसँ जकरा प्रेमक बारेमे लिखब कहल जाइ, ताहू तरहक कथा सुभाष लिखलनि अछि आ हमरा खुशी अछि ई कहैत जे एहन कथा मैथिली कथाक्षेत्रक सीमाक सुनिश्चित अतिक्रमण करैत अछि। हुनक एक कथा थिक–‘एकटा प्रेम कथा। एहि कथामे एकटा लड़की छै जे एकटा लड़काकेँ बरोबरि फोन करैत अछि। फोनक मालिक कथावाचक थिकाह, जकरा लड़की अंकलकहैत छैक। आ, लड़का, जे कि कथावाचकक पड़ोसी थिक, के तँ ओ अंकलछथिहे। एहि त्रिकोणक तेसर कोणअंकलकनजरियासँ एहि कथाक रचना भेल छैक। किछु पाँती सभ देखी।-आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सभ तरहक गप करैत हएत। भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो। आ, इहो देखी–‘फोन राखि देलाक बादो हमारा ओत्तहि ठाढ़ रही गेल रही, जेना किछु आर कहबाक हो, किछु आर कहबाक हो, किछु आर सुनबाक हो। हमरा छगुंता भेल, ओहि लड़की लेल हमारा किए उदास भऽ रहल छी’? , एकटा परिस्थिति एहि तरहक–‘साझकेँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि। पहिने ओत्तहि देखबै। नहि भेटल तँ ओकर घर जाए पड़त। मुदा घरपर तँ ओकर माएबाप छै। माएबापकेँ लड़कीक फोन दिअ कहब ठीक नहीं हेतै। आ अंततः निष्पत्ति किछु एहि तरहक–‘अपन छांहे जकाँ ओ लड़की हमर संगसंग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत। आब कहल जाऊँ जे एहि तरहक सम्बन्धकेँ कोन सम्बन्ध कहल जेतै? सुभाष कहै छथि–‘प्रेम कथा’–मानो ई अंकल महाशय सेहो प्रेममे पड़ल छथि। एहि प्रेममे जे ई दुनू लड़कालड़की खूब जतनसँ एक दोसरसँ प्रेम करए, तकरा निमाहए। प्रेमजँ ई थिक तँ कहए पड़त जे भौतिक प्रेमकेँ सब्लिमेशन (उदात्रीकरण) थिक। सोचि कऽ देखी तँ ई कथा, मात्र एकटा कथा नहि थिक, मिथिलाक सामाजिक परिवेशमे आ मैथिली कथामे एकटा नवीन पीढ़ीक आगमनक कथा थिकएहन पीढ़ीक जे मानैत अछि जे धियापुतामे एकदोसरसँ प्रेम करबाक चाही, तकरा निमाहबाक जतन करबाक चाही कारण ई दुनिया निर्बाध रहए ताहि लेल प्रेम जरूरी छै आ जीवन अपन लयमे आगू बढ़य, ताहि लेल प्रेम जरूरी छै। ई कथा तखन किछु आर पैघ देखार पड़त जँ हमरा लोकनि मैथिलीक सम्बन्धकथा सभक परिप्रेक्ष्यमे एकरा देखी। हमरा तँ मोन पड़ैत अछिदू दशक पहिने मान्य साहित्यकार लोकनिक बीच मिथिलामिहिरमे भेल तुमुल सम्मतिविमतिजाहिमे बात आएल रहै जे मैथिली कथाकेँ सन्दर्भ लैत बात करी तँ मिथिलाक लोक प्रेम कैए नहीं सकैत अछि, जे ओ कऽ सकैए से थिक छिनरपन। जकरा प्रेमकथा कहल जाइछ से वस्तुतः छिनरपनक कथा थिक। प्रश्न अछि जे सुभाषक एहि कथाकेँ कोन छिनरपनक कोन कोटिमे राखल जाए।
अस्तु, हमारा सुभाष चन्द्र यादवक कथाक स्वभावपर बात करैत रही। हुनकर कथाक स्वभाव एहन छैक जे केन्द्र बिन्दुकेँ थाह पेबामे अक्सरहा मतांतरकेँ गुंजाइश भऽ सकै छै। एक मोड़पर सँ कथा आरंभ भेल आ अगिला मोड़ अबैतअबैत समाप्त भऽ गेल। आब पाठक निर्णय करथु जे एतबा दूरक विवरणक निरंतरतामे केन्द्र बिन्दु कोन छल? एहिमे पाठकक लेल बुढ़ारीक लाठीबनै छैसुभाषक देल शीर्षक। हुनकर कथा, एहि प्रकारक कथा सभ थिक जाहिमे शीर्षकक निर्णायक महत्व होइत छैक। आ, शीर्षक अंततः भेल की? केन्द्र बिन्दुक ठीकठीक संकेत नहि दऽ सकल आ संकेत अति दुरूह भऽ गेल (केनरी आइलैण्ड)क (नारेल जकाँ) तँ सम्यक सम्प्रेषण कठिन भऽ जाइ छै। एकटा दृष्टांत ली। कथाक शीर्षक थिक–‘एकटा अंत। एहि कथामे एकटा बुद्धिवादी जुवक अछि जे कर्मकाण्डक विरोधमे ठाढ़ भेल अछि। अपन पक्षक स्थापनाक लेल ओ बहुत संघर्ष करैत अछि, मुदा ओकर बहुत दुर्गंजन होइत छैक आ ओ अपनहुकेँ अपना विचलित आ थाकल अनुभव करैत अछि। तकर डिटेल्स कथामे आएल छै। शीर्षक देल गेल छै–‘एकटा अंतप्रश्न अछिकथीक अंत? जँ उत्तर हएतकर्मकाण्डक अंत, तँ मानऽ पड़त जे ई कथा नितांत अधलाह आ असफल कथा थिक, कारण कथ्यक निर्वाह ने कथाविवरण कए पाएल अछि आ ने कथा समय। मुदा, जँ एकर उत्तर होइक–‘कर्मकाण्डक विरोध परम्पराक अंततँ लगले देखब जे ई कथा खूब सुन्दर कथाक रूपमे मोन राखऽ जोग देखार पड़त, जे बहुत करूणासँ भरल अछि आ एकटा संकल्प (संकल्प ई जे एहि जुबककेँ संरक्षण भेटबाक चाही) केँ संग समाप्त होइत अछि। फेर वएह बात। संकल्प कथामे कथित नहीं भेल छैक, ओ कथाक प्रतिफलनक रूपमे पाठकक मोनमे उचरैत छैक।
ओना, गौर कएल जाए तँ सुभाषक कथामे एकटा आर समस्या देखार पड़त। एकरा संतुलनकेँ चूक कहल जा सकैए। जेना अहाँ कोनो फिल्म देखैत होइ आ पाबी जे कोनो एकटा दृश्यकेँ जरूरतसँ बेसी काल धरि देखाएल जा रहल हो, जकर कि डिमांड कथाकेँ नहि छै। कहब आवश्यक नहिजे एना एहि दुआरे होइ छै जे दर्शक (आ पाठक)क डिमांड आ फिल्मकार (आ कथाकार)क डिमांड भिन्नभिन्न भऽ जाइत छैक। से, हमरा लोकनि कैक कथामे देखै छी जे विवरणक अनुपात औचित्य टुटलैक अछि आ किछु एहनो बात आबि गेल छैक जकर आवश्यकता कथामे नहि छैक। एक हद धरि सुभाष कथाक शीर्षक चयन सेहो, जे कि एक खास फ्रेममे राखि कऽ कथाकेँ देखबाक आग्रह रखैत छैक मुदा स्वयं कथे एहि आग्रहक रक्षा नहि कऽ पबैत अछि। किछु ठाम तँ एहनो देखैत छी ज्र विवरण देबाक लेल जाहि शब्दावलीक प्रयोग सुभाष केलनि अछि से उकड़ू बुझा पड़ैत छैक आ सम्पूर्ण कथाक तानाबानामे पीयन जकाँ देखाइत छैक। हुनकर एक बहुत सुन्दर कथा छनि–‘हमर गाम। कोसीपरिसरमे बसल लोकक जीवनसंघर्षकेँ ई अप्रतिम दस्तावेज थिक। एहि कथामे बस एकठाम, सेहो प्रसंगात्, एकटा स्त्री परमिलिया अबैत छै। एहि कथामे पुरूखक जीवनसंघर्षकेँ ओ बहुत जीवंत आ प्रामाणिकिअ विवरण देलनि अछि, ताहिमे कतहु पुरूखदेहक अलगसँ कोनो वर्णन नहि भेल छै। मुदा, जखन स्त्री अबैत अछि, आ सेहो श्रम करैत स्त्री, गहूमक बोझ उठाउठा कऽ थ्रेसर लग पहुँचाबैत स्त्री, तँ कथाकारक नजरि ओकर श्रमपर नहि, ओकर देहपर पड़ैत छनि आ हुनकर शब्दावली देखी–‘कर जोबनक उभार पुरूषसम्पर्कक साक्षी छै। लगेगी हाथ ओ इहो बता जाइत छथि जे ई परमिलिया सूर्यास्तक बाद घास छीलए जाइत अछि कारण सन्ध्याअभिसारकेँ ओकरा खगता छै। किए? एतेक सेंसेनलओ किएक होइत छथि जखन कि कथाकेँ एहन कोनो मांग नहि छैक, उनटे कथाक समेकित प्रभावकेँ ओ खंडित करैत छैक। कनिया पुतराकथामे नेबो सन कोनो कड़गर चीजकथावाचकक बाहिसँ टकराइत छैक जे कि लड़कीक छातीछिएक जकरा कथाकार फुटैत जोबनकहलनि अछि। हमारा नोटिस केलहुँ अछि जे कथाकारक सुभाषक शब्दावलीमे आएल ई नवीन प्रभाव थिकियनि। आनोआन अनेक शब्द, मोहावरा, कथनभंगिमा नव तरहें हुनका कथामे आएल अछि। से सभ अधिकतर प्रामाणिक प्रभाव छोड़ैत अछि। मुदा गौरतलब थिक जे ओ भिजुअलाइजेशनमे हायपर सेंसेबल भेलाह अछि।
एहि सभ बातक अछैत, कैक कारणसँ सुभाषक ई कथासंग्रह सदैव स्मरन कएल जाएत। एक तँ एहि कारणेँ जे मैथिलीक ई अप्रतिम कथाकार बीस बरख धरि लगातार चुप्प रहलाक बाद फेर कलम पकड़लक आ तकर परिणाम एहि संग्रहमे संगृहित भेल अछि। एहि बीचक अवधिमे मैथिली कथासाहित्यक परिदृश्यमे बहुत बदला आबि गेल अछि। कथा आइ ठीक ओत्तहि नहि अछि जतए सुभाषक युगमे छल। बहुतो नवनव चीज कथामे आएल अछि। एक संवेदनशील सर्जकक रूपमे सुभाष एहि सभ कथूक प्रति ग्रहणशील सेहो छथि। ओ स्वयं कहने छथि जे हुनक एहि दोसर दौरकेँ कथा सभमे अपेक्षाकृत बेसी सावधानी आ सजगता छनि। हमारा पबैत छी जे नितांत सजग रूपसँ सुभाषक साहित्य किछु एहन तथ्य लऽ कए आएल अछि जे अक्सरहाँ समकालीन लेखनमे अनुपस्थित पाओल गेल अछि। जेना, एक यथार्थवादी कथाभाषाक वितान, जकर मास्टर सुभाष छथि। जेना, कथामे जीवनकेँ देखबाक एक दार्शनिक दृष्टिकोण, जाहिमे ततबा गहराई छै जे देखल जाए वला वस्तुकेँ अधिकिअ पारदर्शी बना दैत छैक। आ सभसँ जबरदस्त मोन राखल जाए वला चीज तँ छैकोशीप्रांगणक जीवनसंघर्षपर केन्द्रित हुनकर तीनटा कथा एहि संग्रहमे संगृहित छनि।
सुभाष कहियो कहने छला–‘जीवनक लेल जे नीक आ सुन्दर अछि, हमर कथा तकरे आग्रही अछि। हमर कथाक प्रेरणा जीवनप्रेम अछि। जे कोनो चीज जीवनविरोधी अछि, हमर कथा तकरा प्रति वितृष्णा उत्पन्न करैत अछि
से ठीके। कम करए, बेसी करए; भाषामे करए आ प्रतिफलनमे करए, सुभाषक कथा काज तँ जरूर सएह करैत अछि।

 ३.
बिपिन झा
श्रीः
॥ हे हृदयेश्वरी: एक कटाक्षालोचन ॥


गतांक सँऽ आगू...


जहिना उरस्थ हृदय के दू भाग होइत अछि-
·        लघुमस्तिष्क
·        महामस्तिष्क।
लघुमस्तिष्क शरीर सन्तुलन-गतिनियन्त्रण आदि कार्य करैत अछि ओतहि महामस्तिष्क मन, बुद्धि, चित्त आदि रूप में प्रथित होइत अछि।
चरकसंहिता उक्त तथ्यक पुष्टि करैत अछि[1]
अस्तु हृदयेश्वरी पद में विद्यमान हृदयस्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ स्वीकार करब उचित कियाक तऽ शिरस्थ हृदय आत्मा के आश्रयस्थान, चेतना क केन्द्र, पंचेन्द्रिय के आधार, बुद्धि के संग्रहस्थान, स्मृति केर संचालय, चित्तक आधार, जीवात्माक आश्रयभूमि, स्नायु केर  केन्द्र होइत अछि। चिन्तन  प्रेरणा आदि शिरस्थ हृदये सँऽ संभव छैक[2]। एहि बातक प्रमाण सुश्रुत सेहो दैत अछि[3]
एहि शिरस्थ हृदय के स्वाशयानुकूल प्रेरित करबाक सामर्थ्य हृदय केर ईश्वरी अर्थात कान्तामात्र कय सकैत अछि। कदाचित एहि आशय के ध्यान में रखैत कहल गेल अछि काव्यप्रकाश[4] में जे काव्य अर्थात  साहित्य केर बात कान्ता द्वारा  कहल गेल वचनतुल्य  होइत अछि जेकरा कखनहुँ उपेक्षित नहि कयल जा सकैत अछि। कियाक तऽ कान्ता में शिरस्थ हृदय के स्वामिगतगुण विद्यमान रहैत अछि जे प्रकृतिप्रदत्त अछि।
एतय समीक्षात्मक रूप सँऽ एतेकमात्र कहल जा सकैत अछि जे यदि  ओ हृदयेश्वरी प्रकृति प्रदत्त स्वामिगतगुण क प्रयोग स्वाशयानुकूल करबाक अपेक्षा श्रेय-प्रेय एवं योग-क्षेम कें ध्यान में यदि रखैत करैत छथि तऽ ओ हृदय धन्य होयत। अस्तु प्रकारान्तरें हृदयेश्वरी पद आत्मसमर्पणतुल्य अछि जे पूर्णतः शिरस्थ हृदय सँ सम्बद्ध अछि नकि उरोभागस्थ हृदय सँऽ।
{लेख सन्दर्भित टिप्पणी kumarvipin.jha@gmail.com पर सादर आमन्त्रित अछि।}


लेखक केर सामान्य परिचय-
बिपिन कुमार झा
(स्नातक- ECC. Allahabad University, परास्नातक- Jawaharlal Nehru University, दर्शननिष्णात- Jawaharlal Nehru University, सम्प्रति Cell for Indian Science & Technology in Sanskrit, HSS, IIT Bombay में शोधरत। विस्तृत विवरण bipinjha.webs.com पर सुलभ।)


 

[1]  षडंगमंगं विज्ञानमिन्द्रियाण्यार्थपंचकम।
आत्मा च सगुणश्चेतः चिन्त्यं च हृदिस्थितम॥ सूत्रस्थान ३०.४५
[2] चिन्तादि जुष्टं हृदयं प्रदूष्य....। चरक० चिकित्सास्थान उन्मादाध्याय
[3] हृदयं चेतना स्थानं...। सुश्रुत० शरीरस्थान ४.३४
[4] काव्यं यशसे अर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परिनिवर्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे। काव्यप्रकाश, प्रथमोल्लास

१.राम भरोस कापडि भ्रमर’-जटजटिन
२. बेचन ठाकुर- नाटक बेटीक अपमान-(दृश्‍य छठम)

 
राम भरोस कापडि भ्रमर
जटजटिन
लोकनाट्य
रुपान्तर - राम भरोस कापडि भ्रमर

मंच पर प्रकाशक एउटा गोल घेरा डांरमे नगाडा बन्हने नट पर पडैत छैक । ओ नगाडा के सुरताल मे बजबैत रहैत अछि । दोसर प्रकाशक घेरा दहिन कात प्रवेश करैत नटी पर पडैत अछि । ओकरा संग घेरा नट लग धरि अवैत अछि । आव दुनू के उपर प्रकाशक धेरा छै ।
नट— (नटी के देखि प्रशन्न होइत)
अहा,केहन सयंोग अछि ई,प्रिय अहांके देखल,
नटिन—(नृत्याभिमूख मुद्रा प्रदर्शित करैत)
जट जटाधर व्यग्र बनल हो, पार्वती कोना बैसल ।
नटधन्य प्रिय अहां संग पुरै छी सदिखन हमर छी अंग
नटिनजनमजनम धरि एहिना प्रियतम छोडब अहां के ने संग ।

नगाडा पर फेरस चोट पाडैत नटक हाथ चलैत अछि । रुकलाक वाद ।

नटिनरंगमंच पर किए उपस्थित मनमे की फुरल अछि,
आइ ककर उद्घाटन करबै, दर्शक खूब जूटल अछि ।
नटमध्यकाल के प्रेमी युगल के खिस्सा कहब महान ।
जकरा नामे पानि बरसै इन्द्रहुक झुकै कमान ।
।नटिन—(आश्चर्यक भाव व्यक्त करैत)
नाम की थिक प्रेमी युगल के जनिक कीत्र्ति एहन अपार,
नटजटा जटिनकेर गाथा स प्रिय होइछ जगत उद्धार ।
नटिनई त महिला मात्र करै छै,नाचि नाचिकऽबेंग कुटै छै,
नंगटिनी आंगन घैल फैकै छै,गारि सुनै छै,पानि मगै छै ।
नटएह,अहां त ज्ञानी छीहे, साज बाज ओरिआउ नटिन,
कुटु बेंग उखरि मे ध,आ शुभारंभ करु जट जटिन ।

उखरिमे बेंग कुटबाक उपक्रम ।तकराबाद महिलासभ दू दलमे बंटि जाइछ ।जट बला समूहक महिला सभ माथमे आ डांरमे गमछा बन्हने रहैछ ।दुनू दल परम्परगत शैलीमे एक दोसरके गरामे बांहि धएने आगा पाछा झुकैत चलैत गीतक पहिल मुखरा गबैत अछि । तकराबाद नव शैलीमे जाइत अछि ।

गीत १ महिला समूह

हालीहाली बरिसू इन्नर देवता ।
पानी बिनू पडल अकाल हो राम ।
चौर सुखले, चांचर सुखलै
खेती बारी झारी सुखलै
सूखि गेलै बाबाके जिराते हो राम ।
सूखि गेलै भइया के जिराते हो राम ।।

धोबियाके अंगनामे छापर छुपर पनियाँ
चमराके आंगनमे छापरछुपर पनियाँ
ओहिमे नहाइ पुजारी बभने हो राम ।
धोतियो ने भीजलै जनौओ ने भीजलै
रचि रचि तिलक लगावै हो राम
भीजले तीतले हवेलिया ढुकलै
बहुअ‍ो लेलक लुलुआइये हो राम
रांडी मौगिया हरवा जोतै छै
पानी विनू पड़लै अकाले हो राम

दयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक
मयो नहि लगइ छ हो इन्नर लोक
पानी विनू पड़ल अकाले हो राम ।

हालीहाली बरिसू इन्नर देवता
पानी विनु पडल अकाले हो राम
निरसू के धीयापूता मांड ले कनइ छै
खुद्दी ले कनइ छै, अन्न ले कनइ छै
पानी बिनू पड़ल अकाले हो राम ।

गीत १ समाप्त भेलाक बाद मंच पर अन्हार । प्रकाश अएला पर महिला सभ समूह मे नचैत गबैत

गीत २ महिला समूह

एगो छलै जट, एगो जटिनियाँ।
दुनूमे हो गेलइ परेमे हो राम ।
दुनूके विआह केना रचैवै बसेबै
हो गेलै माइ बापके विरोधे हो राम ।

नगाडा बजबैत एक दिशसं नटक प्रवेश । दोसर दिशस नचैत नटिनक प्रवेश । वीच मे आबि ठमकि जाइछ । नगाडा पर जोरस लकडी बजारि नट गबैत अछि ।
नटएक्कै देश, एक्कै परगन्ना जट आ जटिन,
जट गामक सुधुआ मनसा दोसर तेहने नटीन ।
नटी— (नृत्य रोकैत)
की बजलहुं अहां फेरसं बाजु चुगली परोक्षे पीठ,
अहां पुरुष के इएह ऐब अछि सदिखन नारी पर दीठ ।
रुसि जएबाक अभिनय
नट—(मनबैत) जटक हयत विआह, प्रशन्न छी, हमर ने अहित मनसाय,
आयल वरियाती साज वाज देखि जटिनक माय पछताय ।


गीत ३ समूह


जटक पक्ष हम अनलियै आजनबाजन, आब करु वियाह, –
सांवरि गेरुली, कऽ दियौ जटाके बियाह

जटिन पक्ष आगि लागो आजनबाजन, नहि करबौ वियाह, –
साँवरि गेरुली, मोर गौरी रहि जइती कुमारि

जटक पक्ष बज्जर खसौ हाथी घोडा, बज्जर खसौ बाजार
सांवरी गेरुली नहि करवौ जटिनसँ वियाह
सांवरी गेरुली रहि जयतौ गौरी कुमारि ।

जटिनक पक्ष कहाँ रे पयबै, कहाँ रे पयबै, डलवाके साज
सांवरी गेरुली मोर जटिन रहतै कुमारि

अन्हारक वाद प्रकाश । प्रकाशक धेरा नट पर ।
नटभेल विआह जटिन सासुर चललीह,सभ कें आंखि नोरायल,
बाबा देहरीक शान ने भेटलै लगले जटिन अकुलायल ।

गीत ४

जट लबिकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे ।
जइसे लबे काँच करचिया वइसे लविकऽ चलिहेँ गे ।।

जटिन नहिये लबबौ रे जटा, नहिये लबवौ रे ।
हम तऽ बाबाके दुलारि धिया ऐंठिके चलबौ रे ।

जट लविकऽ चलिहें गे जटिन लविकऽ चलिहें गे ।
जइसे लबइ बेंतके छड़िया, वइसे लविकऽ चलिहें गे ।।

जटिन ऐंठिकेँ चलबै रे जटा एंठिक चलबौ रे ।
हम त बाबाके दुलारि धीया, तनिकऽ चलबौ रे ।।

जट डइनियाँ देखतौ, गुनमा फेकतौ, मारिये देतौ गे ।
आगे बाबाके समपतिया जटिन, के भोगतौ गे ।।

अन्हार÷प्रकाश । खाट पर जट जटिन सुतल ।

गीत ५

रामा रहे लागलै जटवाजटिनियाँ हो ना ।
रामा कहियो काल होबे खन खनियाँ हो ना ।।
रामा एक दिन भोरुका कहनियाँ हो ना ।
रामा लड़इ लगलै जटवाजटिनियाँ हो ना ।।

पुनः अहार । प्रकाश । खाट पर जट सुतल । जटिन उठल
मुदा आंचर जटवाक हाथ मे ।
गीत ५ (दोसर भाग)

जटिन भोर भेलइ रे जटा भिनसरवा भेलइ रे
कोइली बोललै रे जटा कोइली बोललै रे
जटवा छाड़ि देही अंचरवा
हम त अँगना बहारबै रे ।।

जट मैया वहारतै गे जटिनियाँ, बहिनियाँ बोहारतै गे ।
जटिनी आजुके रोहिनियाँ हम तऽ पलंगवे गमैबे गे ।।......
जट हमे तोरा पुछियौ गे जटिनीक
दिल से गे, जटिन परेम से गे ।
झुमका कहाँ हेरइले गे ?

जटिन सारी राति रे जटवा, तोहरे बिछौनमा रे
जटवा तोहरे लगीचवा रे !
जटवा भिनुसरवामे तोहरे मैया चौरौलकौ रे ।.....

जटिन टिकवा जबजब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।।
अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।।
जट टिकवा जबजब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे ।
तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।।
जटिन हँसुली जबजब मंगलियौ रे जटा, हँसुली काहे ने लौलें रे ।
हमर वाली समैया रे जटबा, हँसुली काहे न लौले रे ।
जट हँसुली जबजब अनलियौ गे जटिन, तक्खापरकऽ धएले गे
तोहर वाली समैया गे जटिन, हँसुली काहे न पेन्हले गे ।

अन्हार । प्रकाश नट पर ।
नट जट जटिन के वीच मे भैया खटपट बझल बेजोड
बाबा के दुलारी धीआ, मनबय जट पुरजोड ।


गीत ६

जटिन धनमा कुटइते जटवा, मारलक मुसरवेके मार ।
सेहो विरोगवे रामा जाइ छियै नैहरवा
जट निम्मननिम्मन टिकवा जे लैलिये जटिन ले
सेहो जटिनिया छोड़ि नैहरबा तों जाइ छे ।
जट चीनमा छिटलियौ गे जटिनियां चीनमा छिटलियौ ।
तू जाइ छै नैहरवा चीनमा के कटतै गे ?
जटिन मैयो कटतौ रे जटवा बहिनियां कटतौ रे ।
अबरी रे समइया हम त नैहरे गमैबै रे ।।
जट घिउरा फड़लौ गे जटिन, झिगुनी फड़लौ गे,
तू चल जेबही नैहरवा, घिउरा के बेचतौ गे ?
जटिन मैयो बेचतौ रे जटवा, बहिनियां बेचतौ रे ।
अबरी रे समइया सखी संग झूमर खेलबै रे ।।

अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत ।

नटलाख मनौलक जिद्दी जटिन, नैहर डेग बढौलक,
नदीक धारमे पारक चिन्ता मलहवा के गोहरौलक ।


गीत ७

जटिन भैया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार
थारी देबै एवाखेवा लोटा देबौ इनाम
भैया मलहवा रे उतारि दही झिमनापुरके घाट
मलाह नहि हम लेबौ एवाखेवा, नहि लेबौ इनाम ।
बहिनी बटोहिनी गे, खोजिले गे दोसर घटवार ।

जटिन खसी देबौ एवाखेवा, पाठी देबौ इनाम ।
भइया मलहवा रे, उतारि दही झिमनापुरके घाट ।

मलाह नहि लेबौ हम एवाखेवा, नहि लेबौ इनाम ।
बहिनी बटोहनी गे, खोजि लेही दोसर घटवार ।

जटिन बड़ दुखछल छी, नैहरा जाइ छी
जटा से खाइके मार
कल जोडैÞछी, गोर पडैÞछी, हमरा करि दिए पार ।
भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार ।

मलाह तोरा देखि कऽ माया लगै,
जिया फाटइ हमार ।
जे कइलें से नकि नइ कइलें,
चलें करि दियौ पार ।
जटिन भइया मलहवा रे, नइया लगादे नदियाके पार ।
बहिनी बटोहनी गे, चलें करि दियौ पार ।

अन्हार । पुनःप्रकाश नट पर पडैत ।

नटनटिन वियोगे छटपट जटवा, सभ किछु सुन्न लगैछै,
अपने घर छै काट छुटल, पल पल मन पडै छै ।

गीत ८

जटहाथी पर के हौदा बिकाय गेल गे जटिन, तोरे विनु
तोरे बिनु हमहुँ वेकल भेलौं गे जटिन, तोरे बिनु
तोरे बिनु महल उदास भेल गे जटिन, तोरे बिनु
तोरे बिनु अंगना मे दुभिया जनमि गेल, गे जटिन,
सेजिया पर मकड़ा बिआय गेल गे जटिन, तोरे बिनु

अन्हार÷पुनः प्रकाश । नट पर पडैत ।

नटरुसि क भागलि जटिन प्रिय,जट वेकल बहुरायल,
एम्हर खोजए, ओम्हर खोजए, नाना भेष बनाएल ।
नटीइहे होइछै मनसाके बानी,अपने करम पछताबे ।
घरबाली पर हुकुम चलाबे,लक्ष्मीके ठोकराबे ।
नटठीक कहै छी नटी हमर,अहां सदृश कत्त पाएब,
जटबा छै अबोध प्रिय,अहां घर छोडि नै जाएब ।


गीत ९

जट सुन मोर जोगिया, सुन मोर भाइ
इहो नगरमे जटिन मोर आइल ?
सुनमोर भइया, सुन गे दाइ,
यही नगरमे जटिन मोर आइल ?

मोसाफिर सुनमोर जटवा, सुन मोर भाइ,
इहे नगरमे जटिन नहि आइल ।

अन्हार । प्रकाश


गीत १०

जट दही लेब ? दही लेब ? मिठगर दही लेब ?

गामक स्त्री तोर केकर औंटल दूधवा ?
तोर केकर पौरल दहिया,
तोहर सड़ल गन्हाय छौ दहिया
तोहर खट्टा महकौ दहिया ।

जट सासससुरकें औंटल दूधवा
माय, सांची दूधके दहिया
माय, बड मीठ लागै दहिया,

ग्रामीण स्त्री अगे नहि लेबौ, नहि लेबौ
तोहर कोय ने पुछै छौ दहिया ।
सिपाही हमहूँ त छियै गुवालिन, मालिकके सिपाही
मारि डण्टा, फोड़ि के कोहा, खाय लेव दहिदूधवा ।
जट इहो मत जानिहे सिपाही असगर गुवालिन
मारि कोहा तोड़व थुथना,
राति रहौं कुंजवन, दिन बेचौं दहिया,
घेघा सिपाहीके नइ देब दहिया
कोय ले गे गहिकी बेची दहिया ।

अन्हार प्रकाश


गीत ११

जट ससुरे भैसुरे मोर जाल बुनै ना
अकसर बलमुआ मोरा माछ मरैना ।
माछ ले हे, माछ ले हे, गहिकी बेटी,
माछ ले हे, माछ ले हे ।।

ग्रामीण स्त्री आहे कौने मछरिया केर गोढिन हे ?
जट आहे रेहुआ मछरिया केर गोढिन हे ।
ग्रामीण स्त्री आहे गहुम के कै खूटे माछ देवय हे ?
जट आहे, गेहुमा के तीन खूटे माछ देवय हे ।
ग्रामीण स्त्री तोर मछरी बनबै नइ जानियौ
धुए नइ जानियौ,
खबैयाके खियावै नइ जानियौ
धियापुता परबौधै नइ जानियौ
गोढिनियां गे ।

अन्हार । पुनः प्रकाश नटपर ।

नटखोजि खोजिकऽ थाकल जटवा जटिन विनु मुरझायल,
तखने नजरि पर अएलै जटिनिया, असली रुप मे आयल ।
नटीकी बुझलिएै जटिन ओकरा हपसि क धरतै ना ।
मनमे गरल दरद छै नटबा, दुर दुर करतै ना ।

गीत १२

जटिन दूर दूर रे जटा । दूर रहिहें रे जटा
सड़ल चाउर रे जटा ।
राख छाउर रे जटा ।
सड़ल तीमन रे जटा ।
दूर रहिहें रे जटा । दूर रहिहें रे जटा ।

जटदूर दूर गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन ।
सड़ल चाउर गे जटिन ।
राख छाउर गे जटिन ।
बसिया रोटी गे जटिन ।
सड़ल तीमन गे जटिन । दूर रहिहें गे जटिन ।
चोटिया गुहइते चलि अबिहें गे जटिन ।
सेजिया सजैबते चलि अबिहें गे जटिन

जटिन जुलफी सम्हारैत चल अविहें रे जटा ।
धोतिया पेन्हैत चल अबिहें रे जटा ।

अन्हार । पुनः प्रकाश नट नटी पर
नगाडाक धुन पर कनेक काल दुनू नचैत
नटकहैछै जे एहिना होइछै सांइ बौह के झगडा
बीच मे पडि कऽ गामक लोक अनेरे बनैए लवडा ।
नटीअपनो घर त सएह हाल अछि,अनका कोन उपदेश
जटिनके दुलरुवा जटबा,आब चलल परदेश ।


गीत १३

जट मोरंग मोरंग सुनियै गे जटिन,
मोरंग हमरा जाये दही गे जटिन ।
मोरंग से हँसुली लऽ अयवौ गे जटिन
तोहरे पहिराए हम देखब गे जटिन ।

जटिन मोरंग मोरंग सुनियौ हो जटा
मोरंग देस जनु जाहु हो जटा
मोरंग के पनियां कुपनियां छै हो जटा
लागि जयतौ कोढ करेज हो जटा ।
उलटियो ने आवे देतौ हो जटा
पलटियो ने आबे देतौ हो जटा
रहि जाही रे जटा नैना के हजूर ।

जटतोहरे ले लेवौ जटिन मोरंग से टिकवा
ओही मे झमकाइ तोरा देखव से जटिन
मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन ।
मोरंग हमरा जाय दही गे जटिन ।

जटिन अते जे कमैले जटा की भेलौ ना
सुनु मोर जटवा,
जटिनके मंगवा उदास लागे ना

जट टिकवा जब जब लौलियौ गे जटिन
टिकवा काहे ने पेन्हले गे
जटनी गे सभामे ललचौले गे
टिकवा विनु ।

जटिन जाहो ते जाहो रे जटवा, देस रे विदेस,
मोरंग क टिकवा लेने आवहु हो रा

अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर ।
नटमान मनौबल कऽ कऽ जटवा गेलै मोरंग कमाय,
एम्हर बेटा भेलै वेमार,जटिनियां वैद्यसं पुछए उपाय ।

गीत १४

जटिन रघुदासके अँगाटोपी, रघुदासकेँ अंगाटोपी
तोहरे देवौ रे बैदा, तोहरे देवौ रे वैदा
रघुदास के दियौ न जिआय ।

वैद रघुदासके अंगाटोपी, रघुदासके अंगाटोपी
हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया
रघुदास तँ सडले गेन्हाय ।

जटिन रघुदास के हाथके बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया
तोहरे देवौ रे वैदा, तोहरे देवौ रे वैदा
रघुदास के दियौ ने जिआय ।

वैद रघुदास के हाथ के बलिया, रघुदासके हाथ के बलिया,
हमे की करबै गे दिदिया, हमे की करबै गे दिदिया
रघुदास त सड़ले गेन्हाय ।

अन्हार । पुनः प्रकाश नट पर ।
नटबेटवा भेलै चंगा, मनमे जटवा बसलै ना,
जटवा के वियोगे जटिनियां अहुरिया काटै ना ।
नटीचललै पिया उदेश जटिनियां,दर दर भटकै ना,हो रामा,दर.....
कोने पापे पिअबा बिछुडलै कि दुनियां बिजुबन लागै ना,हो रामा,दर....।
गीत १४ क( थपल गेल)
जटिन हे रे सोनरबा भाय, कही दही जटबाके उदेश
जहिया से गेलै निरदैया, नै कोनो संदेश
पल पल काटे राति अन्हरिया,दिनो लगे भयाओन
नै चाही मंगटीका कंगना,पिअबा अपन सोहाओन ।
हे रे..........।
सोनार हे गे जटिनियां दाय,छोड जटके आस,
गरबा जोखि जोखि हंसुली पेन्हैबौ,चल हमरे साथ ।
जटिन हे रे सोनरबा भाय,रे अगिया लगैबौ तोरे हंसुलिया
बजर खसैबौ तोरे साथ ।
रे मोर पटा पुरबे नोकरिया
रहबै पटे के आस ।
बरह बरस हम आंचर बान्हि रहबै
रहबै जटे के आस ।
रे तोरास सुन्नर हमरो जटबा
ब्टिया चलैत लचि जाय
रे तोरास सुन्नर हमरो बलमुआ
चन सुरुज छपि जाए ।


थाकि हारि क जटिन अपन घर आबि जाइत अछि ।ओसारा पर ओगठि जटक स्मरण करैत हिंचुकि हिंचुकि कानए लगैछ ।



गीत १५

जटिन जाहि बाटे पियवा गेलै, दुभिया जनमि गेलै
बटिया जोहइते वीजूवन लागल रे की । आहे मइया ।
पियवा मोरंग गेलै, हमरा से कही गेलै, आहे दिदिया ।
फूल लागल कंगना लेने अइथिन हो राम ।
मांगे के टिकबा लेने अइथिन हो राम ।
रचि रचि जटिनके पेन्हयथिन हो राम ।
जट बिनु लागे दुनियाँ अन्हारे हो राम

बेटा सेहो घरस बाहर आबि माय संगे हिंचुक लगैछ । तखने दहिन कातस माथपर मोटरी लेने जटक प्रबेश । लगमे आबि घरबाली आ बेटाके एकटक देख लगैछ ।प्रकाशक घेरा दुनू पर फूट फूट पडैत छैक ।दुनू चरित्र स्थीर भ जाइछ । प्रकाशक घेराक संग नट नटिनक प्रबेश ।

(
नट नगाडा के सुर तालमे बजबैछ । नटिन सुरताल पर नाच लगैछ । नट के चारु कात गोल घेरामे नटिनक नृत्य )।
नटी वारह बरिस पर पिअबा अएलै दुअरिया हे
जटिन के खातिर ।
त्यागी देलकै मोंरंग नगरिया हे ।
जटिन के खातिर ।
नट चलियौ ने आब नटिन अपन एकचरिया हे ।
जटिन के खातिर ।
चमक दियौ मिलन के इजोरिया हे
जटिन के खातिर ।
दुनु नचैत नचैत मंचस बाहर चलि जाइछ ।आब स्थीर चरित्र चलायमान भ उठैछ । ओम्हर प्रकाशक घेरामे जटिन अकानैत जटक लग अबैछ । खुशी सं आंखि छल छला जाइछ । पयर पर झूकि प्रणाम करैछ । माथ परक मोटरी, छाता लऽ घर दिश बढि जाइछ । जट बेटा के छातीस सटा लैछ । जटिन पानि लऽ अवैत अछि, जट पयर पखारैछ । दुनू एक दोसराके आगां ठाढ भऽ नोरायल आंखिए एक दोसराके देखैत अछि ।
गीत नं.५ क एक टुकडीक पुनरावृति होइछ ।


गीत ५के पुनरावृति

जटिन टिकवा जबजब मंगलियौ रे जटा, टिकवा काहे ने लौले रे ।।
अरे वाली उमरिया रे जटबा, टिकवा काहे ने लौले रे ।।
जट टिकवा जबजब अनलियौ गे जटिन, पौतीमेकऽ धएले गे ।
तोहर वाली उमरिया गे जटिन, टिकवा काहे न पेन्हले गे ।।

जट जेवीसं लाल डिव्वा निकालैत अछि । ओकरा खोलि मंगटिका बहार कऽ जटिन कें पहिरा दैछ । दुनू नृत्य मुद्रा मे आवि जाइछ ।



गीत १६

आरे बाली उमेरिया रे जटबा
टिकबा हम पहिरलौं रे
टिकबा हम पहिरलौं रे रे जटबा
टिकबा हम पहिरलौं रे
आरे बाली उमेरिया रे जटबा
टिकबा हम पहिरलौं रे

नचैत नचैत जटिन,जटक बांहिमे आबि जाइत अछि । दुनू प्रिज भऽ जाइछ ।
अन्हार


बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान
बेचन ठाकुर

नाटक बेटीक अपमान-
(दृश्‍य छठम)

      (स्‍थान- हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरीक घर। हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरी एकटा गरीब कि‍सान छथि‍। हुनक पत्‍नी राधा देवी छथि‍। हुनका दर-दुनि‍यामे एक्‍के गोट बेटी शालि‍नी अछि‍। हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरी नि‍पुत्र छथि।)

हरि‍श्‍चन्‍द्र-    यै शालि‍नी माए, हमरा लोकनि‍ भगवानकेँ की बि‍गारलि‍यन्‍हि‍ जे ओ अपना सभकेँ          एगो आ सि‍रीफ एगो बेटीएटा दए भाभट समटि‍ लेलनि‍।
राधा-        एहि‍ बातक हमरो बड़ छगुन्‍ता लागि‍ रहल अछि‍। भगवानक महि‍मा अगम अथाह                 अछि‍। केकरो बोरे-बोरे नून, केकरो रोटि‍योपर नहि‍ नून।
हरि‍श्‍चन्‍द्र-    खाइर छोड़ू, माथा पेच्‍चीबला गप-सप्‍प। भगवान जएह देलनि‍ सएह बहुत। ओनो                  हम बड़ गरीब सेहो छी। जदि‍ भगवान हमरा बेसी धि‍या-पुता दइतथि‍ तँ हमरा                ओकर पति‍पाल नहि‍ कएल होएतए। मात्र तीनि‍ परानीक पेट तँ पहाड़ बुझाइत                रहैत अछि‍।
राधा-        यै शालि‍नी बाप, जे भगवान मुँह चीरैत छथि‍न्‍ह ओ आहारक जुगार अवस्‍स करैत          छथि‍न्‍ह। शालि‍नीकेँ पनरह सोलह बरख भए गेल। मुदा दोसर संतानक कोनो               उम्‍मीद नहि‍ देखए पड़ैत अछि‍। जबकि‍  कतेकोकेँ देखैत आ सुनैत छी जे                 अल्‍ट्रासाउण्‍डसँ जॉंच करए बेटीकेँ गि‍रबौलनि‍, सुइया-दवाइसँ गर्भ नाश करौलनि‍                इत्‍यादि‍। मुदा हमरा भगवान।
हरि‍श्‍चंद्र-     यै शालि‍नी माए, गर्भपात बड घि‍नौना काज थि‍क, बड पैघ पापीक काज थि‍क।                  ओहि‍ जनानीकेँ धौजनि‍-धौजनि‍ भए जाइत अछि‍ कोनो करम बॉंकी नहि‍ रहैत                   अछि‍ जे गर्भ नाश कराबेत अछि‍। कतेको जनानी एहि‍ बेत्‍थे सुरधामो चलि‍ जाइत           अछि‍।
राधा-        रामक नाम लि‍अ, छोड़ू ई कुकर्मक गप-सप्‍प यौ, अपन शालि‍नीकेँ गरीबीक कारणे          पढ़एल-लि‍खाएल तँ नहि‍ होएत। मुदा घर-गृहस्‍थी तँ जरूर सीखए देबैक।
हरि‍श्‍चंद्र-     यै शालि‍नी माए, अहॉं बुच्‍चीकेँ पढ़ाबए लेल हि‍म्‍मत कि‍एक हारैत छी? कोशि‍श                  नहि‍ छोड़ू शालि‍नी दाइक पढ़ाइ बास्‍ते हम यथासंभव पूर्ण कोशि‍श करब। आगू                 सरस्‍वती माताक कि‍रपा। अपन करम करी फलक चि‍न्‍ता जुनि‍ करी।

पटाक्षेप


दृश्‍य सातम-

      (स्‍थान- दीपक चौधरीक घर। वार्ड सदस्‍य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीक घर घुमैत-    घुमैत पहुँचैत छथि‍। दुआरि‍पर कि‍यो नहि‍ छथि‍न्‍ह।)

प्रदीप-       दीपक बाबू! दीपक बाबू! दीपक बाबू।
दीपक-             (अन्‍दरहि‍सँ) हँ हँ के थि‍कहुँ? आबि‍ रहल छी। कने बैसु श्रीमान् भात परसाबैत                   छी। हइए शीघ्र आबि‍ रहल छी।
दीपक-             परणाम सर।
प्रदीप-       परणाम् परणाम। कहु दीपक बाबू की हाल चाल?
दीपक-             सर, हाल-चाल करीब-करीब ठीके जकॉं अछि‍ मुदा।
प्रदीप-       मुदा की।
दीपक-             बड़का बेटाक बि‍आह कने जल्‍दीए क लि‍अ सुनलहुँ, अहॉंक बड़का बेटा दि‍ल्‍लीसँ                 बढ़ि‍या पाइ-कौड़ी पठाबैत छथि‍।
प्रदीप-       दीपक बाबू, अहॉंक परि‍स्‍थि‍ति‍ देखि‍ हम सलाह दैत छी जे अहॉं बड़का बेटाक                   बि‍आह कए लि‍अ। दीपक बाबू! ई चानन फटक्‍का कहि‍यासँ यौ। ई तँ हम ध्‍याने                 नहि‍ देने रही।
दीपक-             सर, यएह हालहि‍सँ। पत्‍नीक मृत्‍युक पश्‍चात् हमर मोन बदलि‍ गेल। पि‍योर               बाबाजी तँ नहि‍, गृहस्‍थौआ बाबजी बनि‍ जेबाक नि‍र्णए कएलहुँ, की अहॉंकेँ खराबो          लागि‍ रहल अछि‍?
प्रदीप-       नहि‍ यौ। हमरा तँ बड नीक लागि‍ रहल अछि‍ बाबाजी बननाइ कोनो खराब बात                  अछि‍, बड़ नीक बात अछि‍। सि‍रि‍फ एकटा हमर वि‍नती अछि‍ जे बाबाजी धर्मक                 पूर्ण पालन करब आओर मरि‍तहु दम धरि‍ भ्रष्‍ट नहि‍ होएब।
दीपक-             सर, अपने बड अनुभवी व्‍यक्‍ति‍ थि‍कहुँ। एहेन अनुभवी व्‍यक्‍ति‍ ओ वार्ड सदस्‍य                  आइ काल्‍हि‍ भेटब कठि‍न। सर, हम अपनेक प्रत्‍येक सलाहकेँ पूर्ण करबाक हार्दिक          प्रयास करब।
प्रदीप-       दीपक बाबू, आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। जय राम जी की। (उठि‍ कऽ प्रस्‍थान)
दीपक-             जय राम जी की। (उठि‍ कऽ) हम चाहैत छी जे शुरूए लगनमे मोहनक बि‍आह                   कऽ ली। कने कम्‍मो सम्‍मो दहेज भेटत तँ कोनो बात नहि‍। मुदा कुल कन्‍या             नीक होएबाक चाही।

पटाक्षेप-


अंक दोसर
दृश्‍य पहि‍ल अगि‍ला अंकमे देल जाएत- सम्‍पादक

१.धीरेन्‍द्र कुमार- जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- गामक जि‍नगीपर धीरेन्‍द्र कुमारक दू शब्‍द‍ .अनमोल झा- ४ टा लघुकथा


धीरेन्‍द्र कुमार
जगदीश प्रसाद मंडलक कथा-संग्रह- गामक जि‍नगीपर धीरेन्‍द्र कुमारक दू शब्‍द‍-


     गामक जि‍नगी संपूर्ण रूपसँ गामक समस्‍यापर आधारि‍त आ ओकर समाधानक दि‍शापर रचि‍त जगदीश प्रसाद मंडल जीक कथा संग्रह अछि‍।
     समस्‍त कथा संग्रहमे उन्नैसटा कथा अछि‍। वर्तमान कथा प्रवाहसँ भि‍न्न कथा-प्रवाह अछि‍। वर्तमानमे समस्‍याक प्रवाह अछि‍। कथाकार समस्‍याकेँ सोझा राखि‍ पाठक माने समाजकेँ बोध करबैत अछि‍। समाधान ताकक दायि‍त्‍व पाठकपर होइत अछि‍। यर्थाथक नाङटि‍ चि‍त्रण मानवीय कुरूपता, असंवेदनशीलता आ साहि‍त्‍यक नामपर अश्‍लीलता पसरल जाइत अछि‍ ओतहि‍ प्रस्‍तुत कथा संग्रह गाममे पसरल छोट-छोट वस्‍तुक उपयोगि‍तासँ समाजक समस्‍याक समाधान प्रस्‍तुत करैत अछि‍- भैँटक लावा, वि‍सॉंढ़, पीरारक फड़। हि‍नकर कथा मोनमे कचोट नहिं वरन् उन्‍मुक्त आ आशात्‍मक सनेस दैत अछि‍। आजुक कथा जकॉं दमघोटू वातावरण तैयारि‍ नहिं करैत अछि‍ वरन् भोरूका स्‍वच्‍छ हवा प्रदान करैत अछि‍- बोनि‍हारि‍न मरनी, ठेलाबला, रि‍क्‍शाबला, घरदेखि‍या।
     वर्णनात्‍मक शैलीमे समस्‍त कथा अछि‍। कथाकार समस्‍याकेँ पकड़ब, उठाएव आ समाधान दि‍श लऽ जेवामे सि‍द्धस्‍त छथि‍। कथामे अवि‍छि‍न्न प्रवाह अछि‍ कतहुँ कथा संयोजन ठमकल नै भेटत। कथाक उद्गम होइत अछि‍ ओ बढ़ि‍ जाइत अछि‍।
     कथाक आवश्‍यक तत्‍वमे जे आवश्‍यक तत्‍व होइत अछि‍ से अवस्‍से भेटत। शीर्षक कतहुँ असम्‍बद्ध नहि‍ भेटत।
     उल्‍लेखनीय कथा अछि‍- घरदेखि‍या। लुखि‍याक जि‍ज्ञासा आ भलमनसाहत प्रसंसनीय अछि‍ कथाक प्रवाह अवि‍चल अछि‍ आओर संपूर्ण कथामे आगॉं की हेतै से सदि‍खन लागल रहैत अछि‍। कथामे एहि‍ तत्‍वक आवश्‍यकता मानल जाइत अछि‍। घरक एक-एकटा ओरि‍आओन, घरक हालति‍ आ लुखि‍याक प्रयास सहज अछि‍। कतहुँ नाटकीयता नहिं झलकैत अछि‍। मि‍थि‍लाक हसी-मजाक कथाकेँ मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ सम्‍वद्ध कऽ दैत अछि‍।
     लुखि‍या समैधसँ पाइ लऽ कनि‍यॉं आनक पक्षमे नहिं अछि‍ तेँ ओ बजैत अछि‍- ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब‍। नागेसर अइ पक्षमे नहि‍ छथि‍ मुदा भौजीक कहल काटब ओकरासँ संभव नहि‍ अछि‍। कथाक समापन अहि‍ उक्‍ति‍सँ अछि‍। समापन नागेसरकेँ झकझोड़ि‍ दैत अछि‍। कथाकार ई स्‍पष्‍ट करैत अछि‍ जे नागेसर की करताह? मुदा लुखि‍याक कथन आजुक समाजक लेल सोचनीय उक्‍ति‍क रूपमे प्रश्‍नवाचक अछि‍। कथाक ई उत्‍कर्ष अछि‍ आ पाठककेँ आकर्षणमे बान्‍हि‍ लैत अछि‍।
     कथाकार ग्राम्‍य जि‍नगीक चि‍त्रणमे माहि‍र छथि‍‍ आ हुनका ग्राम्‍य-जीवनक अनुभवक बखाड़ी छन्‍हि‍। कुम्‍हारक सामग्रीक वि‍वेचन देखल जाए- कूड़, हाथी, ढकना, कोशि‍या, दीप, पांडव, गणेश, लछमी, मटकूर, छांछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहि‍वात, कोहा, फुच्‍ची, सीसी, सरबा, सीसी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पात्ति‍ल, तौला, मलसी....। ओहि‍ना बावी कथा मि‍थि‍लाक पर्व त्‍योहारक वि‍स्‍तृत आख्‍यान अछि‍। कखन कोन पर्व होएत ओकर वि‍धि‍-वि‍धान बावीक माध्‍यमसँ व्‍यक्त होइत अछि‍। सभसँ आश्‍चर्यक गप्‍प जे सजीव चि‍त्रण कथाकार केने छथि‍। कथाक अंतमे ई नै बुझना जाइए जे हम छठि‍ पावनि‍क घाटपर उपस्‍थि‍त नहि‍ छी। छठि‍क मर्यादा आ शुद्धतापर सभसँ बेसी धि‍यान देल जाइत छैक तेँ ओहु घटनाकेँ कथाकार पकड़ि‍ नेने छथि‍।- बाबी देखथुन जे ई छौँड़ा तेहन अगि‍लह अछि‍ जे हाथीकेँ पटकि‍ देलकै। ई तँ गुण भेल जे एकेटा टांग टुटलै नै तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जाइत।‍
     प्रस्‍तुत कथा संग्रहमे सभ कथा अपन-अपन वि‍शेषता रखैत अछि‍ आ सभ कथाक समस्‍या भि‍न्न अछि‍। सबहक समाधान अछि‍। कथ्‍य भि‍न्न आ वस्‍तु वि‍शेष नव-नव।
     कथाक शीर्षक कथासँ संबंधि‍त आ भाषा जन- जनभाषा अछि‍। अधि‍संख्‍य लोक जे भाषा बजैत अछि‍ टीसनपर, हाटपर, यात्रामे, गाममे आ घरमे, से भाषाक प्रयोग अछि‍। वि‍षय-बस्‍तु आ भाषा बीचक संबंध ई स्‍पष्‍ट करैत अछि‍ जे कथाकार जमीनी हकीकतकेँ उपस्‍थि‍त केलनि‍हेँ। मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेल ई एकटा सौभाग्‍यक बात थि‍क।
     हँ बूझि‍ पड़ैत अछि‍ जे कथाकारकेँ पुस्‍तक प्रकाशनक धड़फड़ी रहै वा प्रुफरीडरक हड़बड़ी जाहि‍ कारणे कि‍छु शब्‍द अनगढ़ अछि‍। कथामे सूक्रि‍ वाक्‍य, सैद्धांति‍क वाक्‍यक संरचनासँ प्रेमचंद अवस्‍य स्‍मरण होइत अछि‍ मुदा, मुहावरा आ लोकोक्ति‍क अभाव सेहो भेटैत अछि‍।
     कथामे वर्णनात्‍मक शैली रहि‍तहुँ कतओ कतओ कथाकार कथोपकथनक प्रयोग सेहो केने छथि‍। कथाक वि‍श्‍वसनीयता आ साधारणीकरण प्रक्रि‍यामे आवश्‍यक तत्व एकटा एकरो अहमि‍यत होइत अछि‍ मुदा कथाकारकेँ हम सचेष्‍ट करए चाहब जे पात्रक भाषा पात्रक शैक्षि‍क स्‍तरसँ सम्‍बद्ध रहने, ओकर मानसि‍कता, परि‍वेशसँ मेल खाइत होमक चाही।
     कथाकारकेँ हम धन्‍यवाद देवनि‍ जे हि‍नकर कथा राति‍क बाद अकासमे चमकैत भोरूकबा अछि‍। जयशंकर प्रसादक शब्‍दमे- तुमुल कोलाहल कलह मे, मैं मलय की बात रे मन।‍ अछि‍।
अनमोल झा
४ टा लघुकथा

समाज
                                         
ओ अपने बेचारा गृहस्थ आदमी छला। बेटा सभ बाहर कमाइत छलनि मुदा तेहन स्थिति ठीक नहि छलनि। तथापि भगवानक दयासँ सभटा ठीकेठाक चलि जाइत छलनि।
कखन ककर कोन गति हैत से भगवाने जनैत छथि। आ से बेचारा जाहियासँ पुतहु फाँसी लगा मरि गेलनि, आ बेटी बला हिनका सभो गोटापर केश ठोकि देलक, तहियासँ कोट; कचहरी आ दरभंगापटना करैतकरैत पायरक एँड़ीक सङ हाथक स्थिति सेहो खराप भऽ गेलनि।
समाज बड़ पैघ होइत छैक, हम सभ पढ़नेहो छी जे मनुष्य एक सामाजिक प्राणी थिक, ओकरा यदि जंगलमे सभ सुख सुविधा दऽ देतै आ समाज सँ सम्पर्क नहि रहए देतै तँ ओ नहि टीक सकत। तै समाजक एकटा अपन अलग महत्व आ मर्यादा छैक। बेरकुबेर सभमे समाजेसमाजक काज दैत छैक। आ से हिनको हठात किछु पाइक काज पड़लनि। अपन डॉड़ मुट्ठी तँ पहिने खाली भऽ गेल छलनि। गेलाह घरक सटले, दूचारि घरक बाद इंजिनियर साहेब ओतए। दस हजारक याचना केलनि आ ओ कहलखिन हमरा हाथपर नहि अछि, बहुत दिन रहि गेलउ गामपर, हमारा काल्हि जाइत छी काजपर ओतएसँ पठा दैत छी। आ ओ गेलापर ठीके पाइ आएल रहै इंजिनियर साहेबक बाबू नामे।
जखन ई आनए गेलाह तँ हुनकर बाबू गाछ तरक खेतक कागत बना ओहिपर औठा देमए कहलखिन! बेचारा ओ कजरौटी आ सादा कागत देखि आर एकटा चिंतामे फँसि गेल छलाह..........!!

रिटर्न

-          कहलउ ने बाबू, एहिसँ बेसी पाइ हमरा बुते नञि देल पार लागत। बाहरक खर्चा, धीया-पुताक पढ़ाइ-लिखाइ आ ताहिपर ई महंगी, कतएसँ आनब हम।
-          महंगीयेक द्वारे कहैत छियौ ने जे तू जे पठबै छै पाइ ताहिमे गामपर घर नञि चलै छउ।
-          चलत किए नञि। कोनो की गामपर धीया-पुता पढ़ै बला अछि जे ओहोमे खर्चा लागत। हमरा तँ सेहो नञि करए पड़ैत अछि।
-          जे तोरा आइ करए पड़ैत छउ से हमरा बहुत पहिने करए पड़ल रहए तोरा पढ़ाबैमे। ओ पाइ जे हमारा तखन राखि देने रहितउ तँ निश्चय तोरा सँ नीक रिटर्न भेटितै हमरा। हँ तखन ई जरूर होइतै जे तू मनुक्ख नञि बनितै......!


फर्ज

-          आब तँ ईमनीआडर सँ तुरंते पाइ फुँचि जाए छैक। एकेआध दिनमे।
-          हँ, से की।
-          से बाबू कहाँ फोन-तोन केलनि जे पाइ पहुँचलनि की नहि।
-          से की करताह ओ फोन, हुनका तँ पाइसँ मतलब छलनि से भेटि गेलनि, बात खतम।
-          मुदा हुनका सूचना तँ देमक चाही जे समयसँ पाइ देलकनि डाकपीन की नहि! अहीँ फोन कके पुछि ने लिऔन।
-          नहि, एकदम नहि। ई दायित्व हमर नहि छी। हमर दायित्व छल पाइ पठेबाक से हम पठा देलियनि। आब हुनकर दायित्व छनि हमरा सूचना देमक जे पहुँचल की नहि।
-          हे, बाप संगे लोक एना अरारि नहि करए अछि।
-          अरारि कहाँ, ई तँ हुनकर फर्जक बोध ने करा रहल छियनि। आबो नहि सिखतातँ कहिया सिखता........!


तेल

ओकरा बॉसक बाँहिपर एकटा छोट सन सादा स्पॉटछलै। ओ अपन असिस्टेंटक फाँक समयमे बजेलक आ कहलकैदेखहिन तँ ई की छियै।
असिस्टेन्ट ओकर हाथ पकड़ि कऽ घुमाकफिराक, छू कऽ आदिआदि भावे देखलक। आ कहलकै किछु नहीं सर, ई ओहिना किछु छी, दूचारि दिनमे ठीक भऽ जाएत।
बॉस जोरसँ कहलकैहम एकरा दस सालसँ एहिना देखि रहलियैहे आ तू कहै छै जे दूचारि दिनमे ठीक भऽ जाएत?
असिस्टेन्ट आर विश्वाससँ कहलकतखन सर किछु नहि छी, ओहिना किछु भऽ गेल अछि। कोनो चिंताक बात नहि। से सभ रहितए तँ एखन पसरि ने गेल रहितए ई। बॉसकेँ लगलै जे असिस्टेन्ट तेल लगा कए चलि गेल ........!

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...