Friday, August 13, 2010

'विदेह' ६३ म अंक ०१ अगस्त २०१० (वर्ष ३ मास ३२ अंक ६३)-Part IV


३. पद्य






३.६.१.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता

३.७.१.धी‍रेन्‍द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना  
 श्री कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 . मे भेलनि  पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

!!
करूण गीत !!

सुनि - सुनि कोकिलक करूण गीत,
कुसुमित कानन केॅ देखि रहल अछि,
आइ श्रवित लोचन समीत ।

अछि आवि गेल श्रृंगार सेज पर
ज्वलित मसानक रौद्र रूप
वर दंत दलक हासक विलास मे -
वनल विभत्सक अंधकूप
गेल सुवर्णक शौर्य शिखर पर -
शांति सागरक सुलभ जीत ।।

हमरा भावक सुकुमार पाश मे
आयल प्रेमक रम्य फूल
कयलहॅु जहिना किछु आलिंगन
चुभि गेल अनेको वक्रशुल
उड़ि गेल गगन दुर्लभ सुगंध
झड़ि गेल धरा मकरंद पीत ।।

सौन्दर्यक भूमि मरूभूमि भेल,
रमणीय देवसरि सुखा गेलि
आयलि सुषमा इ छनक लेल
हमरो जीवन केॅ दुखा गेलि
संचित दुःखक रंजित सभटा,
प्रेमकमधु देखू भेल तीत ।।

कटि रहल किए ई कला इन्दु
घटि रहल किए जीवन प्रकाश,
रजनीक रूदन विगालित प्रभात
रहल किए अतिशय उदाश
रहल ज्ञान जन्मक मकान
व्नि रहत मसानक सात वीत ।।
.
१.राजदेव मंडलक किछु कवि‍ता २.इन्द्रभूषण कुमार- सफलता हमर रानी
राजदेव मंडलक किछु कवि‍ता-

 अढ़ाइ हाथक सांगि‍

कतेक दुख भेल हेतै
बाबूकेँ ओहि‍दि‍न
भाइ हम जानि‍ रहल छी
याद पाड़ैत तरे-तर कानि‍ रहल छी
हमर बाबू छोड़ि‍ काम
एहि‍ठामसँ कनेक बाम
एकचारि‍ तरमे रहै ठाढ़ ओहि‍दि‍न
जहि‍या हम दुनू भॉंइ होइत रही भि‍न्‍न
दुखसँ भेल खि‍न्‍न।
बजल रही हम-
एगो बेटा तीत
आ एगो बेटा मीठ
चुप रहू अहॉं बाजि‍ नहि‍ सकैत छी
अपन गोटी भॉंजि‍ नहि‍ सकैत छी
गप्‍पक खेती खूब करै छी
चुप्‍प रहू हरदम बीख बजैत छी
भेलो काजकेँ फेर गि‍जैत छी।
कहने रहथि‍ बाबू-
हेओ बउआ नहि‍ होअ भि‍न्न
नहि‍ भेटतह पलखति‍ राति‍ और दि‍न
कपारपर लादल छह कइएक हजार श्रृण
फुटा कऽ बदला लेतह सभ गि‍न-गि‍न।
देने रही हम जवाब-
एतेक दि‍नसँ कि‍ केलहुँ वि‍कास
सभ चीज-वि‍त्तकेँ केलहुँ नास
बेचि‍ बि‍कैन खेलहुँ सभ चास-बास
देखैत छि‍ऐ लाठीक हूर
कऽ देब अखने पेटमे भूर।
आइ हमरो दुनू बेटा भऽ रहल अछि‍ भि‍न्‍न
बॉंट-बखरा कऽ रहल गि‍न-गि‍न
हम कछमछाइत ठाढ़ छी ओहि‍ना
बरि‍सों पूर्व हमर बाप करैत रहथि‍ तहि‍ना।
बेटा कहैत अछि‍-
शटअप
मंदि‍रमे जा कऽ करू जप
केहेन छी अहाँ गार्जियन
कि‍ कएलहुँ उपार्जन
गप्‍प हँकैत खेलैत रहलहुँ ताश
सभटा पुश्‍तैनी सम्‍पति‍केँ कएलहुँ वि‍नास।
ओना आब बजै छी कम
तइओ नोर पोछैत बजलहुँ हम-
कतेकसँ दुसमनी कतेकसँ मेल
कइएक बेर खेललहुँ हुड़दंग खेल
आगू बढ़बाक लेल कतेक कएलहुँ प्रयास
तइओ रहि‍ गेलहुँ पाछू
आगॉं पड़ाइत रहल वि‍कास
हओ बउआ कतेक हमरापर बान्‍हैत छह झॉंगि‍
सभपर छै अढ़ाइ हाथ सॉंगि‍।


 कानैत अधि‍कार-

अनुशासनक सीमापर
कतेक कालसँ
बैधानि‍क अधि‍कार
रहल अछि‍ कानि‍
झॉंपि‍ रहल अछि‍
सबकुछ जानि‍
स्‍वर दबल सन
देने अछि‍ मानि‍
भीतरसँ वि‍रोधक
चि‍नगी नि‍कलि‍ रहल
फानि‍ फानि‍।

 आबद्ध

हमर शरीर
बान्‍हल अछि‍ कड़ीसँ
कनेको हि‍लबैत देरी
झन-झना उठैत अछि‍
ओहि‍ शब्‍दसँ
मन सि‍हरि‍ उठैत अछि‍
केहेन नचार भेल छी-हम
टुकुर-टुकुर तकैत
देखि‍ सकै छी मात्र एकटा सपना
स्‍वतंत्रताकेँ
कतेक अन्‍तर अछि‍
कल्‍पना आ यथार्थमे
लगा रहल छी
जोरपर जोर-तोड़बाक
नहा गेल छी-घामसँ
नि‍:सृत केहेन वि‍चि‍त्र गन्‍ध
नि‍सॉंस लेबामे बुझि‍ पड़ैत अछि‍
कठि‍नाह
वस्‍त्र भऽ गेल अछि‍
गोंत भि‍ज्‍जू जकॉं
असोथकि‍त भऽ
सोचि‍ रहल छी
नि‍र्माणकर्ता एहि‍ कड़ीकेँ
छी हम स्‍वयं
तइओ छी असमर्थ-तोड़बामे
बौआ रहल अछि‍-मन
स्‍मरणक गहन वनमे
सतत् सचेष्‍ट भऽ
ताकि‍ रहल छी
कड़ीक कमजोर भागकेँ।

 हम पुन: उठब एकबेर

हम पड़ल छी
मृत्‍यु शय्यापर
चि‍र रोगाह
छूत व्‍याधि‍सँ ग्रसि‍त
मैल वस्‍त्र फाटल, सड़ल
नीच कुलक
चि‍र उपेक्षि‍त
देखैत छी जे धर्मराजक आज्ञासँ
आबि‍ रहल अछि‍
यम हमरे दि‍श
हमर प्राण नि‍कलि‍केँ
ठाढ़ अछि‍ कातमे
थर-थर कॉंपैत
हम बनि‍ गेलहुँ लहाश
कि‍न्‍तु यम सब ठमकि‍ गेलाह
हुनका मुखमण्‍डलपर
घृणा मि‍श्रि‍त भय छनि‍
डर किएक से नहि‍ जानि‍
नाक मुँह सि‍कोड़ैत
ओ घुरि‍ गेलाह
आ चुपचाप ई खेला
देखि‍ रहल अछि‍
हमर प्राण
नि‍रूपाय भ पुन: ओ ढुकि‍ गेलाह
हमरा शरीरमे
आ हम टन-टना क ठाढ़ भ गेलहुँ
आब पड़ेबाक प्रयत्‍न
रहल अछि‍ सब हमरा डरे
घृणाकेँ पछाड़ि‍ देलक भय
कॉंपि‍ रहल छथि‍
थर-थर डरसँ धर्मराज
बि‍दा भेल छी आब हम
हुनके सिंहासनकेँ
ओंघरेबाक हेतु
कि‍न्‍तु कमजोरी सन
बुझि‍ पड़ैत अछि‍ हमरो
तेँ कि‍छु काल ठाढ़ भेल छी
शक्‍ति‍ संचय करबाक हेतु।

 दरपनक स्‍थि‍ति‍

जर्जर खूँटी
आइ टूटि‍ गेल
ओहि‍पर लटकल शीशा
धॉंहि‍ द खसि‍ पड़ल
गेल छहोछि‍त्त
चि‍त्रि‍त दीवार मध्‍य
कतेक घमण्‍डसँ छल स्‍थि‍त
जाहि‍मे देखि‍ आननकेँ
अपनाकेँ धन्‍य बुझैत छल-रूपधनी
से भ गेल आब उपेक्षि‍त
पाएर बचा क चल पड़त ओहि‍ठाम
कि‍न्‍तु एकरा प्रत्‍येक खण्‍डमे
बनि‍ रहल प्रति‍बि‍म्‍ब
कोनहुँमे मात्र ऑंखि‍
कोनहुमे मात्र कपार
वि‍चि‍त्र वीभत्‍स
ओ कहि‍यो नहि‍ सोचने छल-
एहन अवसान होएत हमर।

 मि‍लन बाध

नील गगनमे भेल मगन
उड़ैत पॉंखि‍ संगहि‍ ऑंखि‍
जोड़ि‍क सँग नव उमंग
मि‍लन हेतु आकुल
जेना पि‍याससँ भेल व्‍याकुल
अछि‍ पूर्ण आस मि‍टत संचि‍त पि‍यास
करैत बात उतरल साथ
बनल घर पल्‍ल्‍व तर
तरूक डारि‍पर
दूइ हृदय मि‍लत नव फूल खि‍लत
कि‍न्‍तु व्‍याधाकेँ कनहा ऑंखि‍
रहल अछि‍ ताकि‍
क्षुधाक पहि‍रि‍ने खोल
नाचैत नेत्र गोल-गोल
रहल तैयार-प्रपंची हथि‍यार
आर चलाएत तेज तीर
देत देहमे पीर
तइसँ ओ नहि‍ डरत
परेम कहि‍यो नहि‍ मरत।


इन्द्रभूषण कुमार
सफलता हमर रानी

हम छी मेहनतक राजा
,
होएत सफलता हमर रानी।

कोना होएत
, किऐक होएत, होएत कखन,
पैघ नहि
, अछि बेस छोट ई कहानी।

पहिलुक बेर जखन सुनलौं हम
,
किनको लैत नाम एकर
,
ऐना बुझि परल जेना यएह अछि हमर स्वपनक रानी।

भऽक बेचैन चललौं जौहबाक लेल हुनका
,
पर भैटल नहि कतहु हुनकर निशानी।

सोचैत रही एमहरे कतौ अगल-बगल होएत
,
देब आवाज
, बुझिक हमरा अपन दीवाना,
आइब जाएत हमरा बाँहिमे हमर दीवानी।

मुदा जखन वो भेटल नै कतहुँ
,
गेल हमर उत्साह ओहिना
,
जेना गायब रहैत अछि मरूभुमि सँ पानी।

जँ रहए लगलौं उदास तँ
,
देख कऽ हमर उदासी
,
बड़-बुजूर्ग सभ बुझौलक
,
एतबे टा गपपर अहाँ छी उदास
,
हमरा सभकें होएत अछि हैरानी।

अहाँ केवल चाहलौं हुनका
,
हुनकर चाहतक नहि सोचलौं
,
हौऽ वो हुर तं अछि परिश्रमक दीवानी।

आब की अहाँसँ छुपाउँ
,
किएक नहि एक-एकटा गप बताउँ
,
लगलौं करए हम मेहनत जाहि दिनसँ
,
आबए लगल नजर वो ताहि दिनसँ
,
बाँहिमे नहि अबैत अछि
,
मुदा रहैत अछि अगल-बगल
,
बढ़ाक उत्साह हमर कहैत अछि हमरासँ
,
करैत रहू प्रयास।

जइ दिन अहाँक परिश्रम होएत
,
अहाँक चाहत ओहन
,
दौड़क लगब अहाँक अंक
,
भऽ अहाँक दीवानी।

हम छी मेहनतक राजा
,
होएत सफलता हमर रानी।


१.विवेकानंद झा- नॊर मे अछि बेस संभावना २.
मुन्‍नी वर्माक कवि‍ता

बेटी
विवेकानंद झा
नॊर मे अछि बेस संभावना


ओ हमर जीवनक ठिठकल वर्ष सब छल
जखन समय मुदा कैलेंडरे टा मे बदलैत रहै
बिना उपद्रव बिना हॊ-हल्ला
आ कही कि
कम-सँ-कम हमरा एकर सूचना नहि छल
मुदा एहनॊ नहि रहै जे नेना-भुटका सब
पैघ नहि हॊइत छल
जै केओ आबि गेल छल ओ विकसितॊ हॊइते रहै
चाहे दिशा जे रहल हॊ ओकर
आ चलू ईहॊ मानि लैत छी
कि जे नहि आयल रहथि
हुनका मे आबि जयबाक छटपटाहटि हेतैह्न
फेर एहनॊ नहि छल जे
बेटाक बेरॊजगारी पर
पिता लॊकनि क्रॊध वा खौंझ नहि देखेबाक मॊन बनेने छलथि
राग-विराग ओहिना पूर्ववत चलैत छल
बिना उपद्रव बिना हॊ-हल्ला
नॊर चुपचाप ढबढबा अबैत रहै आँखि सँऽ
हर एकांत ‌क्षण सँऽ गठजॊर करबा लय आतुर

आ ई हमर जीवनक कलकल बहैत वर्ष अछि
आ हमरा चाहला सँऽ की हॊइत छैक वा ककरॊ चाहला सँऽ
समय वा नदीक प्रवाह तऽ नहि थमैत छैक
मुदा चाहना तऽ रहैत अछि जे
एना धड़-धड़ा कऽ जुनि बितौ ई समय
मुदा सुखद क्षणक तीव्र प्रवाह मे
कैलेंडरे फर्र-फर्र उड़ि रहल अछि
आ कही कि
हमरा पहिने नहि बूझल छल
जे ककरॊ जन्मदिन एकहि साल मे कएक बेर आबि जाइत छैक
कम-सँ-कम हमरा तऽ एहिना बुझना जाइत अछि
हम मृत्यु दिश गत्वरता सँऽ धकिओल जा रहल छी
कखनॊ काल एहन लगैत अछि
जखन खूब आसमर्द उठल रहैत छैक कतहु
जेना मेट्रॊ रेल मे ऑफिस सँऽ घर घुमैत काल
मुदा आश्चर्य ! नेना-भुटका सब पहिनहि सन
शनैःशनैः पैघ भऽ रहल अछि
हाँ, बेटिक मादे हम ई नहि कहि पायब
काल्हि भॊर जखन ओ स्कूल जाइत छल
तऽ रहरहाँ गुलजार जीक एकटा पांति
आँखिक नॊर बनि कऽ उतरि गेल
- '
बाजरे के सिक्कॊं जैसे बेटी हॊ जवां'

फेर एम्हर जे केओ आबि गेल छै
से विकसित भऽ नहि रहल छै
कएल जा रहल छै
तेँ सबहिक दिशा एकहि छैक
सब बजार लेल आ बजार दिश धकिऔल जा रहल छथि
आ ईहॊ सत्य कि जे नहि आयल छथि
हुनका मे आबि जयबाक छटपटाहटि सँऽ बेसी
डॉक्टर केँ माइक गर्भ परीक्षण करबाक वा
ओकरा चीर देबाक धड़फड़ी छैन्हि
सुयॊग समय मे बच्चा जनबाक कामना मे
जननी सेहॊ कैक बेर सहमतिए मे रहैत छथि
बेटाक कुपात्र हॊयबाक भय माता सब मे बढ़ल अछि
फेर एहनॊ नहि जे
बेटाक बेरॊजगारी पर
पिता लॊकनि क्रॊध वा खौंझ नहि देखेबाक मॊन बनेनै छथि
आब हुनका मे पहिने सन सामर्थ नहि छॊड़लह्नि बेटा सब
राग-विराग ओहिना चलि रहल छै पूर्ववत
हाँ आब विज्ञापन सेहॊ जरूरी भऽ गेल छै
तेँ हँसी आ नॊर समय देख के निकालब
लॊक सीखि रहल छथि
तेजी सँऽ बदलि रहल छै समय
मुदा एखनॊ
चुपचाप ढबढबा अबैत अछि आँखि सँऽ नॊर
प्रत्येक एकांत ‌क्षण से गठजॊर करबा लय आतुर
एक गॊट बेस संभावना बनि कऽ !
मुन्‍नी वर्माक कवि‍ता

बेटी

जनम भेल तँ कहलक दाइ
भेल दू हाथ धरती तर
कोइ नहि‍ सोचलक हमहुँ जान छी
कहलक दही नून तरे-तर।
बावू कपार पीटलनि‍
माय भेल बेहोश
जँ हम जनि‍तौं तँ
नहि‍ अबि‍तौं एहि‍ लोक
ऑंखि‍ अखन खुलल नहि‍
कान अखन सुनलक नहि‍
आ बना देलक हमरा आन
कहलक कोनो अट्ठारह बरख रखबि‍हि‍ एकर मान
ने केकरो कि‍छु लेलौं हम
ने केकरो कि‍छु देलौं हम
जे माय हमरा जनम देलक
ओकरो मुँह नहि‍ देखि‍ पबलौं हम
अजब दुनि‍यॉं अछि‍ ई
अछि‍ गजबक लोक
कि‍एक करैत अछि‍ एना
कि‍एक भेजैत अछि‍ बेटीकेँ परलोक
अबैत एहि‍ धरतीपर
इजोतसँ पहि‍ल भेल अन्‍हार
हमहुँ डुबि‍ गेलौं
आ डुबि‍ गेल संसार
समाज बनल हत्‍यारा
बाप बनल जल्‍लाद
बसैसँ पहि‍ने उजारि‍ देलनि‍
बेटीक संसार।

डॉ. बचेश्‍वर झा, जन्‍म- १५ मार्च १९४७ईं
एम.ए.-पी.एच.डी.
पूर्व प्रधानाचार्य,
नि‍र्मली महावि‍द्यालय नि‍र्मली। 

डॉ. बचेश्‍वर झाक दूटा कवि‍ता-

1 भेँट

की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट,
उम्र सि‍यानी मधुरी वाणी,
ति‍नकर थि‍क ई कि‍रदानी,
लारि‍ चुगली काटि‍ रहल छथि‍,
सबहक घेंट
की कहू केहन लोकसँ भेल भेंट।
कार्य कलापसँ पकि‍या नारद,
अपन हि‍त छन्‍हि‍ अनका मारब,
उजर केश, दया-धर्मक नहि‍ लेश,
छथि‍ कंजूश व्‍यवहारमे ठेंढ़ाश
की कहू केहन लोकसँ भेल भेंट।
वि‍द्या बल नहि‍ प्रखड़,
तरक भरकमे छथि‍ अग्रसर
रंग वि‍रंगी परि‍धान वान भए
रखने छथि‍ ई समएक टेक
पीवि‍ उम्रकेँ बनल युवक छथि‍,
गामक पीपरहुँसँ जेठ
की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट।
अपन प्रशंसा अपने करबामे
नहि‍ छथि‍ ककरोसँ झूस
आदर पएवा लए बजैत सदि‍खन सूच्‍चा झूठ
की कहू केहन लोकसँ भेल भेँट।
भगवान ने करथि‍ एहन लोकसँ हो पुन: भेँट।


2  भावान्‍जली

चि‍र प्रती‍क्षि‍त मैथि‍लक छल सतत् मांग,
जकरा हेतु कतेको गमओलक जान।
राजनेता सभ मि‍थि‍लाक नहि‍ देलनि‍ घि‍यान,
माय मैथि‍लीक ऑचल सतत् रहल म्‍लान।
नि‍ज मातृभाषाक सभ तरहेँ भेल अपमान,
तथापि‍ मैथि‍लीक स्‍ति‍त्‍वक नहि‍ भेल अवसान।
धन्‍य! धन्‍य! वाजपेयी जे मैथि‍लीक कएल सम्‍मान,
आइ मैथि‍ली पओलक अष्‍टम् सूचीमे स्‍थान।
समए तुलाइल अछि‍ सभ मि‍लि‍ करू मैथि‍लीक उत्‍थान,
कवि‍, लेखक ओ साहि‍त्‍यकार वन्‍धु करू योगदान
कोटि मैथि‍ल नि‍ज मातृभाषाक बढ़ाउ सान!
सबहक जि‍ह्वापर बसथि‍ मैथि‍ली ई हो अरमान,
पूब-पछि‍म बँटल मि‍थि‍लाक जोड़ल नीति‍श देल अवदान,
तेँ वि‍कास पुरूष कहबैत ओ छथि‍ महान्
हुनक अमर कीर्ति सतत् रहए दुनू एहि‍ठाम
पुलकि‍त कहल धरा धाम जय मि‍थि‍ला!
जय मैथि‍ल! स्‍वीकार करी
बचेश्‍वरक‍ सत्-सत् प्रणाम।

 १.चन्द्रशेखर कामति- दुनू परानी फूकि-फूकि पी २.कृष्ण कुमार राय किशन-कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष- हमरो जीबऽ दिअ

चन्द्रशेखर कामति
दुनू परानी फूकि-फूकि पी
सारि नाम लड्डू सरहोजि नाम घी
सासु ससुरकेँ कहबनि की
बकरीक दूधमे चाहो बनैत छैक
दुनू परानी फूकि-फूकि पी॥
सूति उठि लिअ श्रीमतीजीक नाम
छोड़ू कहनाइ बाबिइ जय सियाराम
छुच्छे फुटानी इजोरियामे टॉर्च
सठि गेल अन्हरियामे सभ बैटरी॥
मोट-मोट रोटी खेसारीक दालि
जलखैमे तोड़ै छलहुँ मकइक बालि
घिवही कचौड़ीपर चोटे करै छी
मौगीक बड़द बेकार बनै छी॥
भऽ गेल दुरागमन की ठेही भेल दूर
देखू गृहस्थी आ फाँकू चनाचूर
राति दिन तेरहो तरेगन गनै छी
कनै अछि मौगी मेटाएलि सिनूर
देखू ने चेहरापर तेरह बजै अय
रोटीपर नीमक अचार गनै छी॥

कृष्ण कुमार राय किशन

परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं।
जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार।
  कन्या भू्रण हत्या पर एकटा विशेष।

हमरो जीबऽ दिअ

कोइखे मे छटपटा रहल छी हम
ई दुनियॉं हमरो देखऽ दिअ
बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नही
बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ।

डाक्टरक आला कहि रहल अछि
नहि बचतहु आब तोहर प्राण
अल्ट्रªासाउण्डक रिपोट, किछूएक काल मे
आब लए लेतहु तोहर जान।

करेलहुॅं अल्ट्रªासाउण्ड यौ बाबू
मुहॅ भेल अहॉक मलीन
डाक्टर संगे केलहुॅ ई प्लान
कोइखे में एहि बेटी के, कए दिहक क्लीन।

हम बूझैत छी, हमरा जनमलाक बाद
नहि बॉंटब अहॉं जिलेबी बुनियॉं
दुखित भेल अछि मोन अहॉक, नहि आनब
हमरा माए लेल, नाक केर नथुनियॉं।

जॅ होइतहॅंू हम बेटा
करितहुॅं अहॉ सगरे अनघोल
अरोसी-पड़ोसी शुभकामना दितैथि
रसगुल्ला बॅटितहुॅ अहॉ टोले-टोल।

बेटीक जनम भेला पर,एहेन बेईमानी किएक?
आई किछू हमरो कहऽ दिअ
बेटी भऽ के जनम लेनहि कोनो अपराध नहि
बाबू यौ, ई जिनगी हमरो जिबऽ दिअ।

 

.मृदुला प्रधान- ओहि दिन ......... २.मुन्नाजी- दूटा कविता

१.
 
मृदुला प्रधान
ओहि दिन .........
ओहि दिन ..
सभा सँ अबैत काल 
ओझा भेटलाह,
कहऽ लगलाह -
मैथिली बजैत छी तँ
मैथिलीमे किये ने
लिखैत छी ?
एतवा सुनितहि
कलम जे सुगबुगाएल से
रुकबाक
नामे नञि लैत अछि, किन्तु
बचपनमे सुनल,
दू -चारिटा
शब्दक प्रयोगसँ
की कविता लिखल
संभव थिक ?
सैह भाव
जुटाबऽ लगलौं
डायरीमे ,
नाना प्रकारक बात ,
कुसियारक खेत
इजोरिया राति ,
भानस-घर तँ 
भगजोगनीक बात ।
नेना -भुटकाक 
धम -गज्जड़मे 
कोइलीक बोली 
सुनै लगलौं ,
भिनसरे  उठि कऽ
एम्हर -ओम्हर
टहलय लगलौं .
बटुआमे राखि कऽ
सरोता -सुपारी ,
हातामे बैसि कऽ
तकैत छी फुलबारी।
सेनुरिया आमक रंग
सतपुतिया बैगनक बारी,
चिनिया
केरा
घौड़
गोबरक पथारी।

पाकल छै कटहर,
सोहिजन जुआएल छै ,
अड़हुल -कनैल बीच
नेबो गमगमाएल छै।
कविताक बीचमे 
एहि सभक की 
प्रयोजन ?
अनर्गल बातसँ
ओझा बिगड़ियो जैताह,
थोड़-बहुत जे
इज्जत अछि,
सेहो उतारि देताह .
गाय, गोरु, कुकुर, बिलाड़ 
सभक  बोलियोक  बारेमे
लिखल  जा सकैत छै किन्तु
से सभ,
पढ़यबला चाही,
सौराठक मेलाक
प्रसंग लिखू तँ
बुझयबला चाही।
कखनो हरिमोहन झाक
'बुच्ची दाइ' 'खट्टर कका'  
बारेमे सोचैत  छी तँ
कखनों
'प्रणम्य-देवता' क चारू
'विकट-पाहुन' केँ 
ठाढ़ पबै छी।
कखनों लहेरियासरायक
दोकानमे ,
ससुर -जमाय-सारक बीच
कोट लऽ कऽ
तकरार ,
तँ कखनों होलीक
तरंगमे ,
'अंगरेजिया बाबु'
सिंगार।
सभटा दृश्य ,
आंखिक सोझाँ
एखन पर्यन्त
नाचि रहल अछि।
'कन्यादान 'सँ लऽ कऽ 
'द्विरागमन' तक,
 खोजैत चलै छी
कविताक सामग्री,
अंगना, ओसारा, इंडा,
पोखरी
चुनैत चलै छी,
कविताक सामग्री .
शनैः शनैः 
शब्दक पेटारी,
नापि-तोली कऽ
भरि रहल छी,
जोड़ैत-जोड़ैत 
एहिठाम -ओहिठाम ,
हेर -फेर 
करि रहल छी .
जाहि दिन ,
अहाँ लोकनिक समक्ष,
परसै जकाँ किछु 
फुइज जाएत ,
इंजुरीमे लऽ कऽ ,
उपस्थित भऽ जाएब ,
यदि कोनो भांगठ रहि जाए तँ
हे मैथिल कवि-गण,
पहिनहि 
छमा दऽ दै जाएब। 
 
मुन्ना जी
मुन्नाजी (उपनाम, एहि नामे मैथिलीमे लेखन), मूलनाम मनोज कुमार कर्ण, जन्म27 जनवरी 1971 (हटाढ़ रूपौली, मधुबनी), शिक्षास्नातक प्रतिष्ठा, मैथिली साहित्य। वृतअभिकर्त्ता, भारतीय जीवन बीमा निगम। पहिल लघुकथा–‘काँटभारती मण्डनमे 1995 पकाशित। पहिल कथाकुकुर आ हम, ‘भरि रात भोरमे 1997मे प्रकाशित। एखन धरि दर्जनो लघुकथा, कथा, क्षणिका आ लघुकथा सम्बन्धी किछु आलेख प्रकाशित। विशेषः- मुख्यतः मैथिली लघुकथाकेँ स्वतंत्र विधा रूपेँ स्थापित करवाक दिशामे संघर्षरत।

बोनिहार
चेन्नैयोमे आब जखन आओत यौवना,
मानू इहो दिल्लीये जकाँ खास भऽ जेतै।

सभ भइया जहिया घुरि जएत स्वराज्य,
बुझू लुधियाना, मुम्बइ मसोमात भऽ जेतै।

राजक राज कहिया धरि टिकतै मराठामे,
श्रमशक्तिमे पुरे हमर धाख भऽ जेतै।

हम बनि कऽ राजा रहब, राजस्थानक,
श्रमशक्तिमे जखन ठाठ भऽ जेतै।

उल्फाक सुल्फा हेतै भीतर,
असमोकेँ हमरा हटने पक्षाघात भऽ जेतै।

सगरो घुमि-घुमि देखल, छै ओतै के रीति, मुदा
सौँसे देशमे कहियो मिथिलेक रेवाज भऽ जेतै॥


माटिक ललकार
रहै खुटेसल, जेना छलैहेँ
नहि तँ जाबीसँ मुँह जाबि देबौ।

सभ मिलि कानि रहल छेँ भोरेसँ,
तँ मिथिला राज्यक झुनझुना आनि देबौ।

मुदा तोँ तँ छेँ नै खढ़-पातक बीछबला,
बाढ़िक प्रकोप छौ शनि जेकाँ ठाढ़।

तिलक-चानन लगा, पिछलगुआ जुटबै दु-चारि,
जन्तर-मन्तरपर माइकक बोले,
छौ नै कोनो फरक पड़ैबला॥

जोर-जोर तोँ माटिक लोककेँ।
तखन निजगुत हेतौ स्वर।

माँग-विकास, माध्यम मैथिली, शिक्षाक
बढ़ा धरैती संसाधन, दहीं एतै सभकेँ रोजगार

तखने बुझिजेँ जे।
राज्यक माँग भऽ सकतौ स्वीकार।

१.धी‍रेन्‍द्र कुमार- हमर गाम २.राजेश मोहन झा- चाहक महिमा ३.सुबोध कुमार ठाकुर- विडम्बना
धी‍रेन्‍द्र कुमार,  वार्ड न: 08 , नि‍र्मली, सुपौल।

हमर गाम

हमर गामक बीचोबीच
अछि‍- एकटा इनार
ओहि‍मे
शोभायमान अछि‍ वि‍राजमान अछि‍
गामक परंपरा आ विधानसँ
पदासीन छथि‍-
कांकोड़, पेटफुल्‍ला माछ
चौबटि‍ मारने-अजगर, करकरैत, गेहुअन
जे कि‍ओ खसबैत अछि‍
डोल
चूबि‍ जाइत अछि‍-पानि‍
हाथ लग अबैत-अबैत
जकर जरूरति‍ अछि‍ गामकेँ
गाममे बसए बला लोककेँ
चूबि‍‍ जाइत अछि‍ पानि‍
हाथ लऽग अबैत-अबैत
जकर जरूरति‍ अछि‍ गामकेँ
गाममे बसए बला लोककेँ
चूबि‍ जाइत अछि‍ पानि‍
हाथ लऽग अबैत-अबैत
ठोरसँ नै सटैत अछि‍ पानि‍
ऑंजुर रहि‍ जाइत अछि‍ छुछै
पानि‍क उपरि‍ आनक प्रयास
भऽ जाइत अछि‍- व्‍यर्थ
गाममे अन्‍हार
ककरो कि‍छु नै सुझैत छैक
सभटा अछि‍ नपुंसक
तखन करैत अछि‍ प्रयास- बेरि‍, बेरि‍
घोषणा होइत अछि‍ बेरि‍-बेरि‍
सभकेँ रोटी सभकेँ काज‍
गाम सुनैत अछि‍,
अकास सुनैत अछि‍
आ सुनैत अछि‍ चौबटी परक पीपर
आ हंसि‍ पड़ैत अछि‍- गामक घूरना
आ नाचए लगैत अछि‍- कठघोरबानाच
गाबए लगैत अछि‍-
सभकेँ रोटी सभकेँ काज‍
इनारमे होइत अछि‍-ब्रेक डांस
जश्‍न, कैबेर
खुशहाल आ बेफि‍क्र
प्रतीक अछि‍ हमर गामक।
कि‍- हमर गाम अछि‍-
एहने मस्‍त आ खुशहाल
राखल अछि‍ इनारपर
खलि‍या डोल
आ ठोर अछि‍- सुखाएल।
२.
राजेश मोहन झा

!! चाहक महिमा!!

जखन चाह कंठ तर गेल
सरस तामरस हृदय उर भेल
फुलायलि वनलता गमकल उपवन
केना कहू
कते प्रफ्फुलित मन
सॉझ - विहनसर चाहे चाही
नहि भेटत त
काटव काही
चीनक अम्यागत भारतक श्रृंगार
अछि अंगरेजिया अवरूप उपहार
वौकू वावू अरू जुगेसर
राधाजी संग निकालथि आह
वड़का कक्का काटैत सुपारी
चाहक महिमा सुनैत छलाह
वएस जखन होऊ चालीस पार
चाह करथि वड़ तन उपकार
एकरा छोडव नहि सोचू वाबू
हएत जीवनक पैघ गुनाह
अपन गरिमा सुनि चाह भफाय
राखल - राखल गेल सेराय
वेश त
ठंढो चाह केॅ पीयव
दौड़व नहि वरू किछु त
जीयव
           
 सुबोध कुमार ठाकुर, गाम- हंठी-बाली, जिला मधुबनी। पेशा- सी.ए.।

विडम्बना

के सुनत विचार मोनक, केकरा कहबै उद्गार मनक
सभ जेना बनल करकरैत छै, सभ आपसे दंशमे अचेत छै,

मनमे चलैत छै रस्सा-कस्सी, छोड़ि जाउ आब हम कोन बस्ती,
सगरे एकै रंगक रेगिस्तान आर बहैत रेत छै, सभ जेना बनल करकरैत छै

                                   
कतए गेल वसुन्धराक हरियरी, जतए होइत छल प्रकृतिक विवाह बिन विधकरी
नहि जानि किएक नहि भेटए आब रसिक सावनक सनेस छै, सगरे एके रंगक रेगिस्तान आर रेत छै

जीबैक आब धंग बदलि गेल, जीबैक आब रंग बदलि गेल,
उद्देश्य आर उमंग बदलि गेल,
नहि जानि कंटिरबा आ कंटिरबीमे एखनो किएक भेद छै
सभ बनल जेना अचेत छै

नहि भेटै अछि केकरो आब शान्ति मनक, जीबि रहल सभ कलाहन्त मनसँ,
कैंचा लेल सभकेँ लागल रहैत सदिखन उद्वेग छै
सभ अपनेमे अचेत छै।


महगाइक सत्ता अछि, गरीबक पेट निपत्ता अछि
चाउरमे आँकर की आँकरमे चाउर नहि जानि केना फेटम फेट छै
तैयो केहन विडम्बना छै सरकार बनल करकरैत छै,


सुनू हे शिष्टिक सृजनहार, कवि सुबोधक हृदयक चीत्कार
करू अनुकम्पा एहेन जाहिसँ सभ लोक जाइ चेत छै

जे बनबै कुनू देशकेँ श्रेष्ठ छै...

 १.ज्योति- कविता-भ्रष्टाचार २.नन्‍द वि‍लास राय- कवि‍ता-जनसंख्‍या ३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘- पावस
ज्योति
www.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आऽ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि।
मिथिला पेंटिंगक शिक्षा सुश्री श्वेता झासँ बसेरा इंस्टीट्यूट, जमशेदपुर आऽ ललितकला तूलिका, साकची, जमशेदपुरसँ। नेशनल एशोसिएशन फॉर ब्लाइन्ड, जमशेदपुरमे अवैतनिक रूपेँ पूर्वमे अध्यापन।
ज्योति झा चौधरी, जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मि‌डिल स्कूल़टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी  ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी।    --सम्‍पादक

भ्रष्टाचार

भ््राष्टाचार पर आरोपक ईच्छा छल
लेखनी पकड़लहुँ ताहि कारणे
कतय सऽ प््राारम्भ करू से समस्या
अकर समावेश लागल सब क्षेत्रमे
खेती बारी सऽ जोगाकऽ अपन पेट काटिकऽ
एक गरीब किसानक पूँजी निपटल बेटाक पढ़ाईमे
ने प््रायासमे कमी आ ने बुद्धी कम विलक्षण
पैघ लोलक पैरवी चाही महाविद्यालयमे नामांकन में
पढ़ाई तक कहुना पार लागल तऽ
अतिरिक्त मुद्रा आवश्यक नौकरी के बहालीमे
अतेक तरहदूतक बाद जऽ नौकरी लागल
माता पिता भिड़ला नगद वसूलीमे
एक संस्कारी पुतहु के प््रातीक्षा करैत
बस हेराफेरी संस्काारक परिभाषामे
एहेन संस्कारजे घर बदलि दियै
सब प््रागति रूकल दहेजक आशामे

नन्‍द वि‍लास राय
कवि‍ता-

जनसंख्‍या

बढ़ल जनसंख्‍यासँ
स्‍थि‍ति‍ भेल वि‍कराल,
सभ क्षेत्रमे पड़ि‍ गेल
भयंकर आकाल
पैघ-पैघ घर सबहक
हाल भेल बेहाल
जे खाइत छलाह तीनसला चाउर
आब लगैत छन्‍हि‍ नै
पूरा साल।
लोक बढ़ैत गेल
जोत कमैत गेल
जे छल गोरहा खेत
उ भेल घरारी
जे करैत छलाह लगानी, भि‍रानी
आ खाइत छथि‍ बेसाह उधारी
बढ़ल जनसंख्‍यासँ बढ़ि‍ गेल बेकारी।
तेँ परि‍वार नि‍योजनक साधन अपनाउ
आ परि‍वारकेँ छोट बनाउ
महि‍ला बन्‍ध्‍याकरण
आ पुरूष नसवदी कराउ
से नै करब तँ
पुरूष नि‍रोध अपनाउ
आ महि‍ला कॉंपर टी लगाउ।
छोट परि‍वार सुखक आधार
नहि‍ खाएव बेसाह
नै लेव उधार।
परि‍वारकेँ छोट बनाउ
धि‍या-पुताकेँ पढ़ाउ-लि‍खाउ
आ स्‍वच्‍छ नागरि‍क बनाउ
समाजकेँ बचाउ
देशकेँ बढाउ।


शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।

!!
पावस !!

लगिते आतप अनल ज्वाल सॅ,
पसरल सगरो हाहाकार
तरूण - वरूणक अग्निवेश सॅ
जीव - अजीव मे अशंातिक ज्वार
मोन विरंजित हृदय सशंकित
वनल सरोवर कलुष मसान
सूखल किसलयक कोमल कांति
धधकि रहल नव लता वितान
नष्ट करब एहि प्रलय भयंकर
प्रकट भेलन्हि अपने देवेश
घन घन घटाक संग आगमन
शीतल पावस बूनक वेश
नव रंग नव धुन नव मुस्कान
घुरल सृष्टि मे नवल जान
पुष्प खिायलि कांचन उपवन
फूरल भ्रमर केॅ मधुर गान
मंातलि सरोवर कलकल सरिता
नूतन नीरक खहखह धारा
आयल कृषक मे दिव्य चेतना
भागल वेदनाक पुरा अॅधियारा
पंकज प्रस्फुटित भेल सरोवर
वकः काक चित शांत सोहनगर
भरल घटा मे मोर मजूरक
नाच मधुर वड़ लागय रूचिगर
गोधूलिक पवन वेग मे
चहकि उठल भगजोगिनी
वयः ताप मे उमड़ि गेलि
मिलनक वियोग मे तरूणी
उन्मत्त घटा संग मधुर प्रेम मे
नर-नारी भगेल विभोर
दुई मासक ई रूचिगर पावस
उमड़ाओल नव सृष्टिक जोर

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...