Wednesday, July 14, 2010

'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१)-PART IV


३. पद्य





३.६.सत्येन्द्र कुमार झा- पांच लघु-कविता




 श्री कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 . मे भेलनि  पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

!!
उदासी !!

चानक मुख देखु मलान भेल,
गेल आव रक्तभ क्षितिज,
दुरदिन मानक अनुमान भेल ।।

मुस्की मे हाड़क संदर्शन,
आनन पर रूपक भ्रम विशेष,
कहवैत रहल जे गालक तिल,
से सॉपक विल वनि रहल शेष,
ऑखिक तीरक विख पानि नोर वनि,
झहड़ल हृदय झमान भेल ........................ ।।

बुझलहुॅ जकरा हम सुधा कोष,
ओ पानिक फूटल घैल बनल,
कुहरैत अजर केॅ जड़ल देखि,
सभ ज्योति स्वयम् मटमैल वनल,
रवसि रहल मनोरथ स्फुतनिक,
लूना अनेर हैरान भेल........................... ।।

ककरा पर रूपसि करी आश,
ई कल्पो विटप बबूर भेल,
रोपल अमिसिंचित वर प्रवाल,
बढ़ि जेठक ठुट्ठ खजूर भेल,
जकरा छाया मे छलहुॅ आइ ओ -
पुरना चार पलान भेल.......................... ।।


!!
परिचय पात !!

जुनि पुछू परिचय पात सरवे,
वरू रहल संग किछु रातुक विच,
उठि चलव कि हएत परात सरवे ।।

दू क्षणक लेल वट-विटप वास,
जुनि लगबू पथ संपर्क सेज
ओम्हर देखी हासे विलास
एम्हर कॉपय रहि रहि करेज
कानय विषाद लग परवशता
आजुक ई अमानत गात सरवे ।।

हम जएव अपना पतिक गाम,
अछि पएर पड़ल कर्तव्य वंध
ऑखिक आगॉ झलफल अन्हार
पुनि बधिर वनल दुहू कर्ण रन्घ्र
धुरि जाउ अहॉ अनचिन्ह जकॉ,
अछि सजग कहरिया सात सखे ।।

ओम्हर लागल मोनक पियास
एम्हर उमड़ल अछि नयन नोर,
टपनेक तालु ग्रीष्मक अकाश,
पावसक धरातल हमर ठोर
अछि अहॅक दृष्टि मे दाह मुदा ई
लोचन द्वय स्नात सखे ।।

वासना पिशाचक युगल वाहु,
वढ़ि चलल वनाबप्रवल पाश
जएतनि शुचिताक कंठ दवा,
जएत प्रेमक सर्वनाश
व्हि गेली देवसरि विचोवीच
हम दुनू छी दू कात सखे ।।
गंगेश गुंजन:
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

अपन-अपन राधा
राधा-२५म खेप
 
पछिला अंक मे अपने पढ़ने रही एते धरि--
... बूझि नहि सकैये जे किएक भ' रहलैक ओकर मोन बेचैन? किएक भ' रहलैक ओकर परिवार मे अशान्ति ? किएक होअ' लगलैये-अपन स्त्री सँ बेशी काल बिवाद आ किएक रह' लगलैये  ओकर जवान होइत धियापुता एतेक असंतुष्ट ? बुझहि मे ने आबि रहल छैक। लोक अबोध अछि।                          ....................................          बयसें परिपक्व परन्तु अज्ञान
आब पढ़ू --  
दोसर दिसि अनेक तरहक परिस्थिति सभक भ' रहल अछि नित्यहु जन्म विकास। धीरे-धीरे घटि रहल अछि मनुष्यक प्रति मनुष्यक विश्वास । बेशी लोक बेशी काल बुझाएत उदास। चुप्प। हँसी ठहक्का गायब। भरि वातावरण मे दिनक कोनो असमय थकनी जकाँ पसरल जाइत।लगभग लुप्त भेल जा रहलए गामकगाम वासीक स्वाभाविक उल्लास। जखनि कि नित्य बड़ले जा रहलए दोकानक संख्या। दोकान मे चीज बस्तु आ गहिँक आबाजाही। हाटक संख्या। खिन्न खिलखिल क' रहलए जेना शान्त लयक बसात मे सन्ध्या कालक यमुना धार ! बाँचल खुचल बूढ़ पुरान कें ठकमूड़ी लागल अछि, अनमन ठुठ्ठ- ठुठ्ठ गाछ जकाँ। युगक मुखाकृति एक तरहें अछि उल्लसितआ कए तरहे बिखिन्न माथक सुख सं ल' तरबा धरिक सुभीताक अनेकानेक वस्तु जात दनादन बनि क' भर' लागल अछि हाट। सब टा तं सुन्दरे। सबटा तं काजेक बुझाइत। तं आवश्यके बुझाइत। यावत् धरि कोनोटा नहि भेटैत छैक लोक के पाइ-कैंचाक उपाय, ताबते धरि बड़ जी जाँति क' एहि नव सुभिताक सुन्दर बस्तु सभक करैये परहेज। जे कि ड्यौढ़ो-अढ़ैयो लगानी पर भेटि जाइ छैक कोनो गुन्जाइश चट सँ दौड़ रहलए बजार। कीन रहलए पसिन्नक बस्तुजात। भ' रहलय तृप्त सपरिवार ।जहिया जेना घुरब' पड़तै ऋण, तहिया देखल जएतैक। एखनि तँ नहि रहल गेलैक। नहियें रोकल गेलै इच्छा । एहन-एहन वस्त्र आ गहना, ...                                     मामूली तनुकाक जनिजाति सौख सँ पहिरय आ हम जे छी चारि बिगहा भूमिक स्वामी से मोन मारि क' अपना धियापुता, स्त्रीक  मनोरथ कें जाँति क' राखी? जोः त्तोरि के । किएक नहि हो हमरो परिवार के ओ से नीक बस्तु  हमरो । जे भ' चुकल रहरहाँ भरि गाँव? एतबे दिन मे कए गोटय कए भाषा मे क' गेलय काकु..।                                                               -कहू तं जकरा धरिया पहिरक लूरि नहि, से औकाति वला लोक से सब क' रहलए एहि सब बस्तुक बेबहार..आ अहाँ अपना के पुरना मनें आ विचार-व्यवहार सँ जँतने छी। की त इच्छा अनन्त होइत छैक, कतेकक पूर्ति कएल जा सकैये ?                                   तें विवेकी लोक नहि दौड़ऽ लगैये तकरा पाछाँ-पाछाँ। कहियो नै दौड़ल। आवश्यकता कें तें कएने रही सीमित। कम सँ कम।सैह कहि गेल छथि बाप-पितामह। तें ओही बाट के धेने छी। भनें से बाट आब चलितो नहि अछि समाजक बेशी लोक।तै बाट पर काँट कुश, जंगल झाड़, भङेरिक बोन जनमि गेलैये। कए ठाम खाधि-खूद...। पड़ल रहैये एकान्त। आब गौआँ सब कनी दूर भने पड़ै छै मुदा आबा-जाही लेल बना लेलकए एकटा दोसरे बाट। आब वैह व्यवहार मे छै। ध्वस्त आ उपेक्षित पड़ल छैक पुरना बाट।                                                            बेशी काल आवागमनक कारणें स्वाभाविके जे जीवन्त रहैत छैक। चहल पहल भरल। तहिना व्यवहार कम भ' गेला पर प्रयोग कम भ' गेला पर, व्यवहार आओर कम होइत गेला पर पुरनना बाट भेल जा रहल छैक सुन्न, एकान्त। बुद्धि ई छैक जे पुरना बाट पर कएटा भ'चुकलैये सर्पदंशक घटना आ राति-बिराति बटोहीक लोटा कम्मलक भ' गेलैये छिना छिनी। चोर उचक्काक आश्रय...। तैं नहि रहि गेलैकए आब ओ पुरना बाट पर चलब कनिको नै निरापद आ सुरक्षित ।
आब तें ई नबका बाट !
एकरो एकटा खिस्सा अछि- अइ नबका बाट चालू हेबाक खिस्सा... । असल मे जखन होअ' लगलैक बजार-हाटक खूब नफा वला प्रसार आ बनिया-व्यवसायी कें अपन माल ऊघि क' एत' सँ ओत' ओत' सँ एत' अनबा- ल' जयबा मे होअ' लगलै पुरना बाट घट्टीक सौदा, माने अनुपयुक्त--उत्पादन केन्द्र कारखाना ल, जएबा-अनबा मे अनुपयुक्त । यातायात मे असुविधा जनक , तें व्यवसायी समुदाय अपन मालक जल्दी आ किफायतीक संगहि सुरक्षित उघाइक इन्तिजाम मे रचलकए नब मार्गक ई व्यवस्था ।                                                       गामक आ किचु लग-पास गामक किछु अबंड-लंठ छौंड़ा सब ठेकनाओल गेल एहि व्यवसायी-संगठन द्वारा । ओकरा सबकें कए तरहक लोभ-लाभ देखाओल गेलैक आ तैयार कएल गेल जे सब पढ़ल-अनपढ़ बेकार युवके सब छल।                                             खेलाइत रहैत छल अपन-अपन रुचिक खेल बयसक मोताबिक। अनसमैया कबडी सँ ल'' शतरंज धरि...।तेहन किछु के दाम द' ' कराओल गेल ओकरा सब सँ एकटा बनोत्री घटना...। जे फलाँ गामक बटोही कें डंसि लेलकै विषधर सर्प। अपना गाम पहुँचैत-पहुँचैत ओकर प्राण छुटि गेलै...।                कोन गामक बटोही रहय, की नाम कोन समय से सबटा अज्ञात। तें जाहि व्यक्ति के सर्पदंश भेलैक से तेहन मूर्ख आ अपना जान सं तेहन बे-परवाह तं नहि रहल हएत जे ताकाहेरी नहि करितय। अपनो एही गाम मे जाहि बाटे जा रहल छल? एक सं एक सिद्ध ओझा-गुनी सं तं भरल अछि ई गाम। प्राण पर पड़ने तं मूर्खो कें फुराय लगैत छैक। आबि जाइ छै बुद्धि। ई एकदम मिथ्या समाचार थिक। एकटा बुढ़ा संदेह करैत कहलखिन। बात मे तर्क तं रहनि। मुदा समक्षे ठाढ़ एक युवक तमसा उठल। बुढ़ा के चेतब' लगलनि-                                            ' जेना कि बीचे गाम द' ' छे ई रस्ता जे बटोही दौड़ि जैतै एम्हरे। औ बुढ़ा अपन मूर्ख ज्ञान नहि झाड़ू। ई बात सत्त छैक, हमहूँ जनैत छियै। हमरा आँखिक सोझाँक घटना थिक।' युवक तैश मे कहलखिन । ताहि पर बुढ़ा आओर संदेह ठाढ़ क' देलखिन ।                                         -‘ तखन तँ आर मोश्किल  बात । कहलखिन- एँ हौ, एहन धोआ-काया रखने छ' आ लज्जा नहि भेल'? तोरा तँ बूझल रह' जे अपना गाम मे कएटा चाटी चलौनहार गुनी अछि। लादि क' कान्ह पर आनि नहि सकैत छलहक?... दोसर जे बटोहीक नामो गाम नहि पूछि भेल'? बिच बाट पर अपटी खेत मे प्राण जयबा लेल छोड़ि क' चल अयलहक?' बुढ़ा फेर तर्क कएलखिन कि युवक तड़ंगि उठलनि -                                                                             -' जाबत धरि ई बुढ़बा सब याबत् काल धरि जीबैत रहत ताबत्काल गामक बिकास नहि होम' देत। सबटा प्रगति छेकने घिनाइत रहत। बाते ने बुझै छैत। बेर-बेर कहि रहल छियै जे हमरा सोझाँक बार छियै,तैयो बिस्वासे करय लेल तैयार नहि। बड़ अक्किल बला छी, जाउ ओम्हरे बाटे मरऽ। हमरा सब तँ ओइ दिनक बाद पकड़लौं कान। नहि हएब गाम सँ बाहर ओइ पुरना बाट द' ' ' बाजल । बजिते-बजिते  युवक ओत' सँ ससरि गेल। मुदा ओहि अभद्र भाखा मे बुढ़ा संगे बजितो गेला पर कोनो गोटे के साहस नहि भेलनि ओकरा टोकबाक।                                   एहि घटनाक सौंसे गाम प्रचार भ' गेलै। जरूरियो रहैक। ई तं रचने सैह छलैक। एवं क्रमे पुरान बाट आ नव बाटक-बूढ़ पुरान नबका खाढ़ी आ बीच मे ई नव व्यवसायी वर्गक संगठनक प्रबन्धन प्रति दिन फुलाय-फर' आ बिकाय लगलै ।                                                  एक सं एक अपरिचित नव रूप-शैली मे गामक जीवन बदल' लगलै। से ई बदलाव आ परिवर्तन तेहन उग्र छलैक जे बहुत जल्दीये लोक, संबंधी आ गामक जे किछु संस्थागत रचना छलैक ताहि सब मे खूब तेजी सं प्रकट होअ' लगलै। एकदम देखार। बेशी लोक तँ जेना विचित्र तरहक कछमछी मे पड़ल देखाइ देब' लागल। पुरना पीढ़ी तँ विशेष चिन्तित आ बेशी बेचैन !                         एहि वर्गक लोक कें बुझा रहल छलनिहें जे दिन प्रतिदिन आश्रमक सामान्य व्यवस्था मे बड़ बेशी परिवर्तन भ' रहल अछि अप्रिय परिवर्तन। सौदा-सुलुफ कीनब-बेसाहब सँ ल' ' भोजनक विन्यास धरि मे तेहन परिवर्तन जे बुढ़ा लोकनि कें बड़ बेशी अखड़ऽ लगलनि। साफ-साफ आब ई परिस्थिति छल जे आब आश्रम, आमदनी सँ बहुत बेशी खर्चा पर चलि रहलए। से बे-सम्हार रूप मे। आश्रमी खर्च मे मामूली बृद्धि नहि, बहुत अधिक -ड्योढ़ाक लकधक बढ़ि चुकलए।जखन कि आमदनी घटबे कएलय। घटब स्वभाविको। जखन साधने कम हो तँ उपजो-बारी कम हेबे करत। अन्नक उपजा तँ बरखा पर निर्भर। आब नबका ऋतु-प्रकृतिक चलते मौसिमक नियम मे जेना अपने ढील ढाल हिसाब चलिरहल छैक । अधिक काल तँ बर्खा घोर अनिश्चित।                          विस्मय तं ई जे आब ऋतु अपने अहदी भ' गेल जकाँ बुझाइछ तं । नबका छौंड़ा-छौंड़ी सब जकाँ ऋतुओ अगरजित्त भ; गेलय । कथा के सुनय। जकर जे काज आ ताहि पर परिवार-समाज निर्भर, से आब सबटा काज बिसरि कतहु जीवन जगताक नव लहरि पर गपाष्टक क, रहलय। गरजम गरजा क' रहलय। से गाम आ जीवन मे भ' रहल परिवर्तनक पक्ष आ विपक्ष मे कंठ फाड़ि क' शास्त्रार्थ करबा मे भोर सँ दुपहरिया, दुपहरिया सँ साँझ कएल जा रहलए। मुदा बाड़ीक भाँटा आ मिरचाइ गाछ मे  दू लोटा पानि नहि पटाओल जा रहलय, जे कि बेरा बेरी सुखा गेल।   बाड़ीक एतबो तरकारी सँ आश्रमक बड़ मदति भ' जाइत रहय। से आब  लोक के बेकार बुझाइ छै। लोक बाड़ी-झाड़ीक परिचर्या निठ्ठाहे छोड़ि देलक बुझाइए। कि तँ एतबा तरकारी तँ हाटो पर टटका भेटिए जाइए, तुरन्त। बिना कोनो तरद्दुतक। गाछ सँ तोड़ल तरकारी सब । सेहो भाँति भाँतिक। तरकारिक ई सुभीता कहियो देखल ने सुनल। काँचे तरकारी सब देखि क' जीह मे पानि आब' लागय, तेहन देखनुक ! ताहू पर अपना गाम मे?                                          
बनितो केहन सुअदगर-चहटगर छैक। घुरिते फिरते कीनू...आब तँ गाम पर सँ कोनो झोरा-गमछा ल' जयबाक सेहो झंझट नहि । बिसरि गेला पर अगत्या धोतीक ढट्ठा मे तरकारी बान्ह' पड़य, तकरो कोनो समस्या नहि। तरकारिये वला नब-नब रंग-रंगक प्लास्टिकक अत्यन्त हल्लुक-फुल्लुक झोरी मे साँठि क' ' देत। कोनो बिशेख तरकारी कीन क' ' जा रहल छी. जे एखनि ततेक महग जे साधारण लोकक वास्ते सपना, से झोरी मे झक-झक देखाइत जायत भरि बाट, लोको सिहाइत रहत! श्रेष्ठ आ सक्षम होयबाक ई मजा अलगे भेटत ।...एखन कोबी तँ फल्लाँ बाबू कत' सेहो नहि रन्हेलनिहें। आ अहाँ अगुआ गेलौं...। चूल्हि पर चढ़ल ने कि भरि टोल सुगन्धि पसरि क' बाज' लागत- जे लिअ' हम रन्हा रहल छी । कोनो काजो मे व्यस्त रहब तँ जीह चटपटाइत रहत। के करैये सविधि स्नानो-ध्यान ओइ दिन !...अपना बाड़ी सँ त भाँटा-ओल-खम्हारु खाइत-खाइत मुँह टुटि गेल। किछु टा स्वाद जेना लगबे बन्द भ' गेल रहय । शहर वला सबकें त बेश सुभिता तकर। मुदा साधन अछैतो हमरा लोकनि कहाँ सँ जाइ चारि कोस तरकारी कीनऽ? के जाय। तें जीहे सैंतने रही।...आब ई गामक हाट । बाह !                                                                                                                     मुदा बुढ़ा वर्ग मे एहि विषय मे घोर आपत्ति छनि-ई जिह्वा कें बहसा क' राखि देत। भोगवादी प्रवृत्तिक प्रसार हएत समाज मे । जकरा नहि जुड़तै से कर्ज लेत। स्वादक कोनो एत्ता छैक। नियंत्रण राख' पड़ैत छैक ऐ खएबा-पीबाक प्रवृत्ति पर। देखल छैक गौआँ के जे प्रियदर्शन बाबू जीहेक पाछाँ साकिन भ' गेलाह-साकिन । मुदा नै चेतैये...आपत्ति पर बुढ़ा लोकनि कें चुप क' देल जापत छनि । परिवार मे बुढ़ा-बुढ़ी लोकनिक किछु जूति नहि चलैत छनि आब । द्रव्यक इंतिजाम करबाक टा मुदा एखनहुं बुढ़ेक कर्तव्य छनि। जिम्मेदारी । ताहि द्रव्यक कोन उपयोग आ की ब्यबहार  कएल जाय तेकर नियंत्रणक अधिकार नहि हुनका । तैं ओ सब बेशी गोटय क्षुब्ध आ चिन्तित रहैत छथि। ई एहन आमदनी दू पाइ आ खर्चा पाँच पाइक नबका जीवन-शैली सँ बहुत दबाब आ दुःख मे छथि। कहल कोइ मानैत नहि छनि । आ उचितक त्याग कएल नहि होइत छनि । जे बात-ब्यबहार नहि अर्घै छनि, आ तकर आपत्ति करैत छथिन, किछु सुझाव  देबाक चेष्टा करैत छथिन तँ कि तं ठाइं पठाइं जबाब द' दैत छनि बा अनठा क' तेना ससरि जाइत छनि जेना मेघ दिस मुँह क' ' टर्र-टर्र करैत रहू । एहि उपेक्षा सँ बुढ़ाक अंतरर्रात्मा थरथरा जाइत छनि । बेशी सँ बेशी अपन ई दुःख आ चिन्ता, बूढ़ही कें कहथिन। मन हल्लुक करबा लेल। बुढ़ी अपने तटस्थ। उन्टे हुनके बुझब' लगैत छथिन-                       -' जुनि अगुताउ। युगे सैह भ' गेलैये, की करबै? सब घरक तँ एक्के ढाठी देखैत छियै । आनो गाम आ सर-संबंधी द' जे सुनैत छियै तँ दाँती लगैये। मुदा उपाय ? नबकी बहुआसिन नैहरक  खिस्सा तँ सुनितहि आदंक ल' लेत। छिया-छिया । आब तँ हुनका गाम मे भक्ष्य-अभक्ष्यक विचार पर्यन्त नहि बँचलनि । जेकरा जे मन, खाइत अछि । बुझले अछि एकहि ठाम कतेक धनिकक बास अछि ओ गाम । से जे इच्छा भ' गेल से हाटक कृपा सँ लक्ष्मी आ तिनकहि बलें नोकर-चाकरक सेवा सँ, तुरन्त उपस्थित भ' गेल। आब बहुआसिनो त एलीहय ओही संस्कार आ रहन सहनक वातावरण सँ , ने। अपना संगे सैह संस्कार ल' ' । हुनको चाहियनि यैह नबके मर-मसल्ला बला रान्हल अनदेसी तीमन-तरकारी। नहि तँ उठाओल नहि होइ छनि होइत कऽर ।                                                               नब कनियाँ छै, भरि पेट खायको नहि देबैक त... कतेक निन्दा हएत-गाम गाम। तें ध्यान ने दियै। कर' दियौ नेना के जेना जे करैत जाइए आश्रमी इन्तिजाम कनी दिन। आँखि-कान मूनिये लेबा मे सुभीता। नहि सुनै जाइत अछि क्यो कथा बात। उपाय? सौंसे गामे यैह बसात बहि रहल छै। से बसात अपनो परिवार कें तव लगबे करत। तें बुझू जे कोनो अपने टा समस्या आ चिन्ता तँ नहि । भरि समाजेक चिन्ता। होअ' दियौ जे होइ छै ।                                            बुढ़ीक एहि विस्तृत परामर्श सँ बुढ़ा एकटा नवे प्रकारक अनुभव सँ आक्रान्त भ' जाइत छथि। कहू, कहाँ तँ आशा छलनि जे बुढ़ी हुनकर चिन्ताक परवाहि करथिन, कोनो प्रभावकारी समाधान सुझौथिन। मुदा ई तँ उनटे हिनके आजुक युग धर्म बुझाबऽ लगलखिन -जीवनक मर्म आ स्वरूप। ओ तँ हतप्रभ जकाँ भ' गेलाह। यद्यपि कि बुढ़ीक एकहु टा सुझाव अनर्गल बा अनुपयुक्त नहि रहनि। परन्तु बुढ़ा कें कतेक आघात । तमसा गेलखिन । कहलखिन-                                         -' से तँ बड़ दिब । परन्तु हुनका लोकनिक एहि इलबासि लेल बित्त कत' सँ आबय- बित्त ? से के करत ब्यौंत ? हम? भरि जन्म हम ?'  बुढ़ा आइ बड़ विचलित छथि। कोनो युगो तँ अंततः,   भने अनादि-अनन्त मुदा थिक एकटा अँगने !                                                    जेना पुरबा-पछबा बसात तहिना मनुक्खक जीवन-परिस्थिति मे सेहो समय-समय पर परिवर्तन घटित होइतहि आयल अछि। आगाँ सेहो परिवर्तनक ई प्रक्रिया चलिते रहतै। मनुष्य के अपन स्वभाव आ दिनचर्याक अभ्यासक चलते, परिवर्तनक एहन कोनो बसात तुरन्त स्वीकार करबा मे बहुत समस्या होइत छैक-बड़ तारतम्य। नबताक सहज स्वीकार मे असौकर्जे-असौकर्ज बुझाइत छैक। परन्तु बुद्धि आ चित्त पर जीवन मे गतिमान परिवर्तनक निरन्तर प्रभाव पड़ैत रहैत छैक। प्रत्यक्ष बा परोक्ष। मनुष्य तकर अनुभव करओ कि नहि करओ। बड़ मेंही प्रक्रिया मे चेतना मे प्रवेश करैत चल जाइ छैक। परिवर्तनक स्वरूप जतेक देखार रहैत छैक-प्रत्यक्ष, ताहि सँ बहुत बेसी अप्रत्यक्ष अर्थात् अदृशय । तें जेना बाट चलबा काल भूमिका मात्र दुनू पएर आँखिक होइत छैक मुदा थकनी सौंसे शरीर कें ।
कोनो बसात जखन बह' लगैत छै तं खास कोनो एकहि टा घर, आँगन-दलान धरि नहि रहिजाइत छैक। भरि टोल आ गाम भरि पर तकर प्रभाव पड़ैत छैक। कोनो एकहि गोटेक पसेना छूटैत देह के  नहि, ओहन घर-आँगन-दलान मे रहैत सब लोक कें स्पर्श करैत छैक। हँ, बसातक प्रभाव  आ तकर मात्रा मे भेद अबस्स भ' सकैत छैक। जेना बहि रहल पुरुबाक पहिल आ बेसी सघन अनुभव सीमान परक बासडीह के बेशी होइत होइ, संभव। मुदा ई नहि होइत छैक जे बसात ओतहि सँ घुरि क' चलि जाइत होय...।                                                 
शरीर एहि प्रक्रिया मे मात्र संग रहैत छैक। चलैत तँ छैक पएरे दुनूटा तहिना देखैत छैक आँखि। अइ दुनू अवयब पर देह तँ गाड़ीक कठकी जकाँ ! से ई परिवर्तन सेहो युगक बह' लागल एकदम नवे बसात । से अपना-अपना बुद्धियें जन जीवन के प्रभावित क' रहल छैक। एकर सबसँ उग्र बा देखार प्रवृत्ति बा लक्षण बुझाइत छैक से छैक जे अकस्माते समजक बेसी लोक बित्तक संकट मे पड़ि गेलय। अपना स्वभावक गति व्यवस्था मे केहन दिब चलि रहल परिवार देखिते देखिते ढनमना रहलय। लोक बेसी  मानसिक दबाब मे पड़ि गेलय। पहिने जतबा धन सँ गुजर क' लैत छल, ततबे मे आब इन्तजाम नहि भ' पबैत छैक जतबा मे घर चलि जाइत रहै से आब नहि भ' पबैत छैक। अर्थात् भनसा घर जतेक काल खुजल रहैत छलैक से ताहि सँ बहुत बेसी- बेसी काल ब्यबहार मे खुजल रहैत छैक। माने जे भोजनक विन्यास बे हिसाब बढ़ऽ लगलैये। लोकक जीह बेसी पातर भ' गेलैये जेना। जाड़नि बेसी जर' लगलैये। धुआँ बेसी उठ' लगलैये । सभ आँगन सँ। सीसी बोतलसँ भनसा घरक ताख कए क्षण टूटि क' खस'  लगलैये आब। बस्तु भूमि पर बेसी हेराय लगलैये। जियान होम' लगलैये। भूमि पर खसला सँ ब्यर्थ होअ' लगलैये। तेल-घीउक टाड़ीक स्थान बेदखल भ' रहलैये। साधारण व्यबहारक मटकूड़ीक स्थान कनिक बेसी तिलिया-फुलिया वला मटकूड़ी ल' रहलैये। कुम्हार लोकनि बिनम्र बोली मे गृहस्थ कें चेता रहलनिहें-                     -‘अगिला अगहन मे बेसी खोरिस देब'  पड़त गिरहत। सब बस्तुक दाम अकास ठेकि रहलैये । सब टा  परिवारी सौदा जान  सँ बेसी महग भेट' लागलए । सबहक दाम रोजे बढ़ि जाइ मने। जखन कि नब काटक बर्तन बनयबा मे बस्तु, समय आ माथा सबकिछु बेसी लगब' पड़ैये हमरा यौर के। से अगहन मे एकबैक नहि भ' जाइ जाएब अस्तव्यस्त- देबा मे बढ़ा क' सलियाना खोरिस। तें पहिनहीं कहि देब जरूरी बुझाएल । कहि देली।
अपना जीविकाक हेतु कुम्हारक ई सावधानी बहुत आवस्यक छैक। नबका-नबका फरमाइश सब तँ ओकरे ने पूरा कर' पड़ैत छैक। से दीपावलीक अवसरक शहरी काटक आकाशदीपक ढबक आपूर्ति हो बा विवाहक पुरहर-पातिल। ओहो दबाब मे अछि। दिन-राति चाक पर बैसल रहैये तैयो नहि भ' पाबि रहल छैक-नबका नबका फरमाइस सब ।                                                परन्तु जेना कि संसारक विचित्रता अछि परिवर्तनक एही दबाब मे कुम्हार-कर्म मे सेहो प्रवेश क' रहल छैक नब नब ढब केर माटिक कारीगरी। पुरना तं एक आधे टा, बेसी नबका पीढ़ीक कुम्हार कर' लागलय काज। गृहस्थ कें नीक लगनिहें ओ फरमाइश पर फरमाइश क' रहल छथिन-ओकरे, अनमन ओही काटक मटकूर बना देबा लेल जाहि मे गृहस्थक समधिआओन भार पठौताह । लोको तंबुझतैक जे बौआ सासुरक कुम्हार केहन सुन्दर बर्तन-बासन बना रहलए ।
दोसर स्तर पर गाम मे आयलि नब कनियाँ सब मे कएटा अछि जे अपना नैहरक बसात । रुचि, बस्तु आ ब्यबहारक बसात। एत' सासुर मे सेहो प्रयोग क' रहल अछि। कउखन तँ सुझाव दैत,मुदा बेसी काल सासुरक आलोचना करैत जे- एखनहुँ ई गाम कतेक पिछड़ल छैक! हमर गामक रहन-सहन कत' पहुँचि गेल, आ अइ गामक चलनि तँ वैह दू सए साल पुरना...।कोनो नबकी भौजी अपना नैहरक गौरव गान करतीह। देओर-ननदि अपना गामक निन्दा पर आपत्ति करतनि-' सर तँ ठीक भौजी !बड़ धनिक आ कुशल कलाकर कुम्हार-कमारक गाम अछि अहाँक गाम। परन्तु एकहुटा नामी पण्डित-विद्वानक नाम भेटत ? एकहुटा नाम जकरा गामक बाहरो चीन्हल जाइत हो? दस-बीस तँ छोड़ू, दुइयो टा तेहन प्रतिष्ठित लोक?'                                         -'जाउ-जाउ, बड़ विद्वान अहाँक गाम। एहन विद्वान गाम भइए क' कोन काजक? दरिद्र छिम्मड़ि तँ अछि सब ।आ स्वयं पण्डित विद्वान। एहेन विद्याक कोन मतलबक? जे बित्त नइ बना सकय, जीवनकें सुख सुभीता नहि उपलब्ध कराबय? पंडिताइ कि लोक धो-धो क' चाटत ? स्वाभाविक जे अल्पबयसी ननदि-दरओर, भाउजिक एहि धिक्कार सँ चुप रहि गेलैक। मुदा ऐकटा नब कनियाँ कहैत रहथिन जखन समयक अपन ई उच्च विचार, सुनि गेलखिन बुढ़ीसासु। एँड़ी सँ मुड़ी धरि लेसि देलकनि हुनका ई बात। कि चोट्टहि ललकि क' बाज' लगलखिन-                                             -'एं ऐ कनियाँ,की बजलौं ? की बजलौं अहाँ? एको मिसिया तकर बोध अछि? अहाँक बुद्धियें तँ, अहाँक ससुरक पण्डित हएब बेकुफिए भेल? धिक्कार ! केहन कुसंnस्कार ल' ' आयलि छी। केहन अछि अहाँक परिवार आ केहन संस्कार द' ' माय-बाप सासुर बिदा कएलनिहें , कहू त। हम तँ पुछबनि बौआ कें-केहन ठाम बेटा बियाहलौं ? मना करैत रहिअनि बेटा मे रुपैया नहि गनाउ। नीक कुलशील मे ई बड़ निषिद्ध बात बूझल जाइए एखनो। आब भोगू भरि जन्म। ससुरे के मूर्ख कहि रहलय, एकहु रती विचार नहि जे ककरा कहि रहल छियैक आ की? कहू तँ, जाहि कनियाँक भरफोड़ी पर्यन्त ने भेलय तकर बुद्धि आ भाखा एहन? दुर्गा दुर्गा।'                         नबकनियाँ कें एकर आशा नहि छलनि। जहबो करितनि ओ बजबे करितथिन अपन ई विचार तथापि।तखन तँ ओ एक रती माथ पर साड़ी राखि लेलनि, बैसलि रहली। बुढ़ी कहिते रहलखिन ठाढ़ि भ', बेग मे-' तथापि हमरा लोकनि तं विचारि क केने रही अपन सोन सन बौआक ई कथा जे परिवार जे आन तरहेंनहियों मुदा प्रतिष्टित- व्यवस्थित परिवार आ संस्कार वला घर छैक। से ताहि घरक बेटीक ई चर्या ? बिद्याक बिषय एहन बुद्धि? बौआ त हमर पढ़ुआ विद्वान छथि। एही बयस मे जेहन यश-प्रतिष्ठा अर्जित क' लेलनिहें ताहि पर नीक-नीक लोक के ईर्ष्या होइत छैक। जाहि विद्ये बलें एहि कुलक अदौ सँ जगत मे प्रतिष्ठा-मर्यादा, तकरे अहाँ क' रहल छी ई इज्जति ? एना खिधांस? एताबता जे अपनो स्वामी अहाँक मूर्ख ? धिक्कार कनियाँ, धिक्कार !
एहि घटना कें मामूली नहि बूझल-मानल गेल। बहुत दूर धरि उठलैक एकर ज्वारि...।बड़ी दूर तक पसरलै- पहुँचलै एकर समाद जे समाज मे  विद्या कें आब डेगे डेग पर कएल जा रहलए बेदखल वृत्त।
विद्वान भ' रहल छथि आब अस्तित्व मलिन। धनिकक बढ़ि रहलए प्रचण्ड रूपें प्रतिष्ठा प्रति दिन। ताहि अनुरूप अंकुरा रहल अछि, नबे एकटा फसिल। मनुष्य-मनक खेत मे उपज' लागल अछि एकटा नवे वनस्पति-लत्ती जे कि बेसि समाजक लेल छैक अपरिचित। परन्तु देखाउँस मे भ' रहल अछि बेश लोकप्रिय। एहिसं होइत नहि अछि उपज कोनो खास किछु, मुदा संवर्धित कएल जा रहल अछि, अपना अपनी । गतप्राय खढ़ी कें अनसोहाँत अप्रिय असह्य लगैत छैक, परन्तु करहि पड़ि रहल छैक सहन आ स्वीकार। एहि बेशी पुरान आ उग्र नवताक रुचि विचार प्रायः मुँहाँ ठुठी सँ आगाँ संघर्ष धरि पहुँचि चुकल छैक। बेशी परिवार भ' रहल अछि बेचैन आ क्रमेण स्वभाव सँ आक्रामक । काँट आब फराको सँ सौंदर्यबोधक, सुन्दर हतः स्पृहणीय आ काम्य भ' रहल।तें दलान- ड्राइंग रूमे नहि,आँगन-असोरो पर समवर्धित सुशोभित कएल जा रहल अछि। जाहि कैक्टस कोटि बनस्पति मे संवेदनशीन त्वचा मे गड़ि, बिसबिसयबा, कष्ट देबाक छोड़ि आओर किछु टा गुण नहि,से भ' गेल मनुक्खक नबका सौन्दर्य बोधक आग्रह-अनुराग। से समय आ विचार निठ्ठाहे बदलि रहलए जाहि मे सेहो काँट छल स्वीकृत जेना गुलाब सन फूल, फूलसंग काँटक प्राकृतिक देन- काँट गड़ब अपन धर्म संगे छल लोक कें स्वीकार, गुलाब सुन्दरताक रक्षार्थ सुन्दर, सुन्दर श्रेष्ठ नीकक रक्षा करबाक अपना कर्म गुणकारी स्वभावक कारणें छल काँट स्वीकार। कउखन नेना-सियान, ककरो देह-पएर मे पैघ फोंका घाव पाकि गेला पर असह पीड़ा यन्त्रणा द, रहल शरीर, अंगक फोंका बहा देबा मे छल लोकोपयोगी। तखनहुँ कएल जाइत छल स्मरण से गुलाबक काँट! घाव बहा क' करैत छल मनुक्ख कें कष्टमुक्त, पहुँचबैत छल आराम। मुदा ई नबका-नबका थोका वला सब विशाल विशाल काँट ? जेना काँटेक फूल ।अपन काँटक अपने बनल मालिक। गुण, गन्धहीन घमंडी !

1.राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता
2.मनोज कुमार मंडलक चारि‍टा कवि‍ता
1.
राजदेव मंडलक पॉंचटा कबिता-
रूसल धीया-
कथीले एलौं सासुरसँ रूसि‍
भऽ गेलौं हल्‍लुक, गप्‍प छलै फूि‍स
सासुर बास जीनगीक बास
नैहरक बास चासे मास
असगरे एलौं आब की रहल बॉंकी‍
ऑंखि‍ उनटबैत बजली लालकाकी-
नहि‍ बाजू ढाकीक ढाकी
नहि‍ सोहाइत अछि‍ चुप रहू काकी
फाटि‍ गेल आब हि‍या
कनैत बजली धीया
टूटलाहा घर आ तोतराहा बर
थप्‍पर चलबैमे सभ तुर चरफर
सासु चलाबै ठुनका पति‍ भॉंजैत अछि‍ डॉंग
केकरा कहबै मोनक बात ससुर पीबैत अछि‍ भॉंग
पहि‍ने बचत जान
तबने राखब कुलक मान
कतबो नीकसँ करैत छी काज
तइयो वएह उलहन-उपराग
ई नहि‍ छी हमरा भागक खेल
जानि‍ बुझि‍ पठेलहुँ ओहि‍ जेल
राखि‍ लेलहुँ छातीपर पथ्‍थल
नहि‍ रखने छी डर
चाहे कि‍छो बि‍तइ
आब नहि‍ जाएब ओहि‍ घर।
बसातक धुजि‍नी
सदैव ई मकड़ा सभ
बढ़बैते रहैत अछि‍ जालकेँ
आ फँसबैते रहैत अछि‍
कीड़ा-फति‍ंगाकेँ
तैयो, भि‍न-भि‍नाइते रहैत अछि‍
नि‍डर भऽ कऽ दू-चारि‍ गोट
आ तेँ फँसैते रहैत अछि‍
छद्म-चालि‍मे
ओना ई आवृत रहैत अछि‍ नि‍र्बल
कि‍न्‍तु, नहि‍ कएलक कहि‍यो
तोड़बाक प्रयास ओ डेरबुक सभ
परन्‍तु- आइ उठल अछि‍
पुरबा बसात
आ जोरगर मेघो अछि‍ ओहि‍ कात
आबि‍ रहल गड़-गड़ाइत तोड़ैत ताल
टूटि‍ जाएत आब ई प्रपंची जाल।
अदृश्‍य आगि‍-
एहि‍ भीतरि‍या धधरामे
जरि‍ रहल अछि‍
हमर ओ आकांक्षाक गाछ
कतेक पैघ भऽ गेल छल
एकर डारि‍-पात
कतेक झमटगर आ वि‍स्‍तृत
बुझि‍ पड़ैत छल एकर शीर्ष
भऽ गेल हो गगनचुम्‍बी
असंख्‍य लोग बि‍श्राम पौने हेता
एकरा छॉंहमे
कि‍न्‍तु ई अदृश्‍य आगि‍क धधरा
केहेन नि‍र्मम अछि‍
जे भष्‍म कएने जा रहल अछि‍
सौंसे गाछकेँ
नहि‍ अछि‍ अग्‍नि‍शामक यंत्र
हमरा लगमे
आ जँ रहबो करैत
तैओ नहि‍ मि‍झा सकि‍तहुँ
जँ मि‍झायो जाएत
तँ कि‍ भेटैत छाउरक अि‍तरि‍क्‍त।

राजदवे मंडलक दूटा कवि‍ता-

तीन मि‍त्रक गपशप

बहुत दि‍नक बाद मि‍त्र मि‍लल
तीनूकेँ मनक फूल खि‍लल
पहि‍ल पूछलक दोसरसँ-
कहू मि‍त्र सुखी छी वा दुखी
उत्तर देलक भऽ कऽ दुखी-
सभ कुछसँ छी भरल-पूरल
सुरा-सुन्‍नरी रहैत अछि‍ बगलमे पड़ल
तइयो नहि‍ छी सुखी
हरक्षण रहैत छी दुखी
उत्तरदाता प्रश्‍नकर्ताकेँ दैत गारि
खाली गि‍लासमे दारू देलक ढारि‍
हेओ मि‍त्ता हमरेटा नहि‍ सताउ
कि‍छ अहूँ बताउ-
जीनगीक टूटलाहा नाहमे
हरदम रहै छी अभावमे
तैं ने माथ अछि‍ झुकल
ठोर अछि‍ सुखल
दुनू तेसरपर ऑंखि‍ गड़ा देलक
हाथमे लाल बोतल धरा देलक-
अहूँ कि‍छ बाेलू
दि‍लक बात खोलू-
हम छी मस्‍त फकीर
नहि‍ अछि‍ कोनो फि‍कि‍र
देह आ माेनसँ छी स्‍वतंत्र
नहि‍ करै छी केकरो बनगी
जी रहल छी अपन जीनगी
नहि‍ छी दुखी
मनसँ छी पूर्ण सुखी
दुनू भेल चकि‍त
मुँहसँ नि‍कलल वाणी-
अहॉं नहि‍ छी सॉंच
या बजैमे करै छी बेमानी
पशु छी या देव नहि‍ तँ दानव
एहि‍ धरती परक नहि‍ छी मानव।

नव बि‍हार-

बनाएव हम नव ि‍बहार
छूबि‍ लेब सफलताक दुआर
प्राचीण ध्‍वंसावशेषपर
पूर्व मि‍लल संदेशपर
रचबाक अछि‍ मजगूत ि‍दवार
सचेत भऽ रखबाक छै ईंटा बारम्‍बार
कर्मरत हो बाल-अबाल
उन्नत होएत सबहक भाल
सफलता कए रहल पुकार
बनाएव हम नव ि‍बहार
बि‍च्‍छि‍न्न गेहमे तम छि‍पल अछि‍
सभकेँ दि‍लमे गम छि‍पल अछि‍
एकरा नि‍कालबाक हेतु भऽ जाउ तैयार
बनाएव हम नव बि‍हार
पुरान रंग आर संग
सजेबाक अछि‍ हरि‍ति‍माक रंग
नव सृजि‍त सज्‍जि‍त महल भऽ जाएत तैयार
बनाएव हम नव बि‍हार
सुवि‍चार जन-जन करू
आइ अपना सभ प्रण करू
मि‍लि‍‍ कऽ कदम बढ़ेबाक लेल भऽ जाउ तैयार
बनाएव हम नव बि‍हार।

2
मनोज कुमार मंडलक चारि‍टा कवि‍ता-
(1) अखन बि‍हार-

समए बदलल
बि‍हारक वि‍कासक
गति‍ कि‍छु
सम्‍भरल कि‍छु
आगू बढ़ल
संगे
शि‍क्षक-शि‍क्षि‍का
बढ़ल,
बि‍हारक स्‍थि‍ति‍
बदलए लागल
भारतक अर्थनीति‍ बदलल
बि‍हारक
असपतालमे डाक्‍टर बढ़ल
शनै-शनै
रोगी बढ़ल
ई अलग जे
रोग-व्‍याधि‍
सेहो बढ़ल
जेना
वि‍कास होमए लागल
सड़कक नामपर
बुढ़ि‍या-फूइस
अखरल
गि‍ट्टी गड्ढा छल
गड्ढ़ा भरए लागल
सड़कपर रोड़ा-पथ्‍थल
गि‍रए लागल
लोकक नजरि‍
सड़कपर पड़ल
बि‍हार आब बदलए लागल
एतबामे
सरकारक मन डोलल
एन.एच.57
केँ घोसना भेल
सड़कक नाप-जोख
होमए लागल
घरमे चेन्‍ह-चाक
लागए लागल
पेराकातक घर
रहने लोक आब
पछताए लागल
जमीनक टाका भेटए लागल
चमचा आर चौबनि‍यॉं नेता
जि‍लाक दफ्तर दौड़ए लागल
दफ्तर भ्रष्‍टाचारीक मंदीर
बनल आर चोर उचक्‍का
पूजारी बनए लागल
झोड़े-झोरा टाका
भेटए लागल
घर-द्वार लटकौने रहल
जेना मोन जे आब नइ टूटल
एकाएक
बुलडोजर आबए लागल
लोकक भीड़ होमए लागल
लोकसँ बेसी पुलि‍श भरल
सबहक घर
टूटल लागल
लोक बेघर हुअए लागल
बाटपर माटि‍ पड़ए लागल
चौड़गर बाट बनए लागल
बि‍हारक दशा बएलए लागल।

(2) वि‍श्‍वास-
वि‍श्‍वाससँ चलत जि‍नगी
ककरापर ि‍वश्‍वास करी
अप्‍पन लगाओल गाछ पतझड़ लेलक
बेरानक गाछतर छॉंह पावि‍
कोन कसौटीपर परखब
वि‍श्‍वासेसँ वि‍श्‍वासी पाएव
शोनि‍तक संबंधकेँ सभ मानैत
की ओ वेरान नइ अछि‍ बनैत
दोसर वंश गलत भऽ सकैत
अपनेपर कोना वि‍श्‍वास करी
कुल कोनो बापेक होइत
माएक वंश तँ दोसरे होइत
कोन पैमानापर नापी
मधुर मि‍लन तँ संयोगे होइत।

(3) बेटी
बेटी धनक सि‍ंगार अछि‍
मान, प्रति‍ष्‍ठा, इज्‍जत, आवरू
सजल सरक ताज अछि‍
भेटल मि‍थि‍लाक मैथि‍ली
बेटी रूप मुस्‍कान अछि‍।
 कतबो सताबैत बेटीक
सुध गाए बनि‍ सुनैत रहैत
सुख-दुखमे सम बनि‍
माए-बापक मान रखैत अछि‍
बुझि‍तो पराया बनब
अप्‍पन बनल रहैत अछि‍।
 पुरखक समाज अवला कहलन्‍हि‍
बनि‍ अवला ओ रहैत अछि‍
गुलाबक पंखुरी जकॉं
टन-दि‍न भखरैत अछि‍
स्‍वाभि‍मान, इज्‍जतक प्रश्‍नपर
नागीन बनि‍ उभरैत अछि‍।
 बेटा-बेटीक अंतर रहि‍तो
अपन अधि‍कार समटैत अछि‍
माए-बाप मनक बुझि‍तो
भायसँ प्रेम करैत अछि‍
बापोक ठोह फाटए लगैत
जखन हृदएसँ टुकड़ा अलग होइत अछि‍।

(4) नारी चरि‍त्र

शक्‍ति‍क प्रति‍क नारी रहल
धनसँ भड़ल बखारी
वि‍द्याक सागर बनल
दुर्गा, सरस्‍वती, लक्ष्‍मी
कहाइत पूजा होएत रहल।
 माए-बहीन, भौजाइ-ननदि‍
काकी, दादी, नानी, बनल
बेटी बनि‍ माए-बापक हृदए
जुराबति‍ रहल आर
जगमे ओ पूजाइत रहल।
 श्रद्धाक प्रतीक इज्‍जतक
मान रखने रहल
नारीक कर्मसँ
पुरूष सदासँ अपन
मूछ फरकबैत रहल
अपन छाती तनने रहल।
 पुरूखक भीड़मे नि‍त
अवला-अबला सुनैत रहल
लता बनि‍ हरदम
अबलम्‍ब खोजैत रहल
ऑंखि‍ अपन सि‍कुरैत रहल।
 जैधी मौसी, मामी
एक्‍के नारी सास बनल
केकरो चरण छुएलक
केकरो गारि‍ सुनैत रहल
केकरो लेल देवी बनल
केकरो जॉंघतर पड़ल रहल।
 सजल सँबरल बनैत मरूत
रूप-अलंकारसँ देवी नाम पड़ल
दया, ममता, सि‍नेह, प्‍यारक
जीवन भरि‍ सुमन ि‍बखैरति‍ रहल।
 धि‍रज हेरा डुबाबति‍ अधर
पुरूखक मन ललचाबए लगल
खुट्टा तोड़ि‍ जखन बौराएल
देवीसँ कुल्‍टा बनल
समाज नीचताक प्रकाष्‍ठापर
अपन टॉंग गरौने रहल।
 धन जीवन अनि‍वार्य
टाका नइ जीवन बनत
जहि‍ टाकासँ मान रहत
टक्‍के लेल मान घटबैत रहल।
 कुल स्‍वाभि‍मानी बनैत
पुरूखक ओ पाग बनैत
कोन दुरकाल मनमे उठल
जे कुल कलंकक भार बनल
नारी ममताकेँ सागर
ओ कोना नर काल बनल।
चन्द्रशेखर कामति
पिता श्री योगेन्द्र कामति, ग्राम+पो.-करियन, जिला- समस्तीपुर, जन्म-तिथि-०३-०१-१९५९, शिक्षा- एम.ए.
गीत
टिकली करय चमचम मुँह छै महिसक चाम सन
देखि क‍ऽ पड़ेलौं कनियाँ लागय कारी झाम सन
कारी-कारी मुँह
बड़-बड़ आँखि टुकुर-टुकुर
अन्हरियाक कीड़ी जकाँ
बड़य भुकुर-भुकुर
ठोरो लागय जरल-जरल
चिनिया बदाम सन...॥
नीपल-पोतल नाक
तैपर खुट्टा सन-सन बुट्टा
हब्बर-हब्बर बाजब
मुँहमे पानक गुलुट्ठा
पेटोक कटनि लागय
टिनही डराम सन...॥
मधमोंगर सन देह लगैए
डम्फा सन-सन डाँर
नाकोसँ चुबैए जेना
पसबय केओ माँड़
हाथो पएर लगै छनि जेना
टिटहीक टांग सन...॥
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम : शिव कुमार झा,पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि : 11-12-1973,शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न


!!
कोना कअंतिम नमन करव !!
(
कन्या भ्रूण हत्या पर एक छोट रचना)

कोना कअंतिम नमन करव,
ऑचर केॅ अहॉ कलंकित कएलहुॅ
पुत्र जन्म सेहंतित सपना मे
करूणाधारिणी निर्दयी भेलहुॅ ।।
नहि देखलहुॅ आदित्य नहि शशिक शिखा,
नहि नभ देखलहुॅ नहि देखलहुॅ वसुधा
नहि भेटल छोह नहि मृदुल क्षेम,
नहि मोती माणिक्य रजत हेम,
पॉच मास अहॅक गर्भ मे रहलहुॅ
जनपरिजनक तिरस्कार सहलहुॅ
अपैत बूझि कएलहुॅ अहॉ गर्भपात
भेल अपूर्ण नेना पर वज्रपात
अछि कोन ओ शक्ति मनुसुत मे
जे बेटी मे नहि दर्शित भेल
मणिकर्णिका क शंखनाद सुनिते
वृद्ध कुंवरक यौवन झट धुरि गेल
दुःख एक्के वातक तातप्रिया
सृष्टि देलनि संतति केॅ गरल पिया
पावन आर्यभूमिक सुनयना
वैदेही केॅ देलीह माटि मिला
भववंधनक ई केहेन दर्शन
नीर क्षीर विनु वीतल जीवन
तजि गेल प्राण तअनल अर्पण
अमिय मधु सॅ पुत्र कएलनि तर्पण
एक वेरि हमरो जौ कहितहुॅ अहॉ
जीवन मे सुधा वोरि देतहुॅ मॉ
देतहुॅ सतरंगी परिधान
पुत्र सॅ वढ़ि ककरितहुॅ सम्मान
दिअ आशीष हमर जननी
फेरि वेटी वनि नहि आवी अवनी
नहि सूखय पुनि नव किसलय दल
नहि जल सॅ पहिने भेटय अनल
सत्येन्द्र कुमार झा
पांच लघु-कविता
1.
अकासमे मेघ
पसरल जा रहल छै धरा धरि कारी-कारी मेघक परछांहि
एखने बरसतै मूसलाधार बरखा
बाहर पसारल गोट-गोट कपड़ा समेट अयलहूं,
दलान पर सूतल बाबूटा मात्र छूटि गेला ।

2.
केस बढ़ल, कटा लेलहूं
नह बढ़ल, काटि लेलहूं
कतौ देहमे भरि रहल छै
एकटा विषकुम्भ, अमाषयक नीचां
सभ कहैछ- जुनि हटाबएहि कुम्भके
प्राणो जा सकैछ
अदौकालसं जीबिये रहल छै
मनुक्ख-
एहि विषकंुम्भक संग ।
3.

छोटका लत्तीमे
भरिपोख जल ढारैत छी
लत्ती क्रमषः बढ़ल जा रहल छै ।
एकटा बांसक फट्ठी लगा देने छियै
लत्ती ओहिमे लपटा रहल छै ।
बगलमे ठाढ़ एकटा पुरान पीपरक गाछ
समयसं पहिने
उपेक्षित भेल ठाढ़अछि ।
4.

कविता स्नेह अछि, भूख अछि
सत्कार अछि, व्यवहार अछि ।
मुदा- नहि अछि कविता
रोटी, कपड़ा, मकान आ
नचैत/नचबैत बजार ।

5.
भूख सभके लगैछै
भूख सबहक लेल छै
भूख सबहक मेटाइत छै
मुदा मायक भूख-
नहि खत्म होइत छै कखनो
बेटाक थारीमे
अपन हाथक बनल
तिलकोरक तरूआ दैत
बेटाक भूख
माइयेमे सन्हिया जाइ छै ।
१.ज्योति सुनीत चौधरी  -दूबिक भाग २.सुमन झा "सृजन"-बलि‍ ३. मनीष झा "बौआभाई"-फहराइयै पताका

ज्योति सुनीत चौधरी
दूबिक भाग
घासक फुन्गी पर बैसल
दूबि सोचैत अपन भाग
केहेन गति हैत की जानि
अन्त लीखल ककर हाथ
जँ पुजारी के हाथ लागत
खोंटत सब सम्हारि कऽ
श्रद्धा सऽ अर्पित करत
पूजामे ईश्वरक नाम लऽ
दुर्गति नहिं कोनो आन एहन
पड़त लोकक बाटमे जॅ
पिसाएत अन्त हैत तखन
बाट बटोहिक पैर सऽ
चरवाहा के ध्यान पड़लापर
लऽ जायत घर उखाड़िकऽ
नहिं तऽ अपन माल जाल
चरायत ओतय आनिकऽ।
सुमन झा "सृजन", कोसी कॉलनी, नि‍र्मली, सुपौल।


बलि‍-

चुपचाप ठाढ़ भऽ देखने छल ओ
जखन ओकरा शहरमे भेल छल पहि‍लुक बेरि‍
दू जाति‍क बीच तकरार।
खामोश छल ओ तखनहुँ
जखन अाबि‍ गेल छल हाथमे तलवार
रूकले रहल ओ तखनहुँ
भोरे-भोर आ सभ भि‍नसर
हत्‍याक खबरि‍सँ
सजए लगल छल अखवार।


मनीष झा "बौआभाई"
फहराइयै पताका
 
देखू मिथिला नगर के फहराइयै पताका
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
 
जतक नारी जानकी श्रीराम केर भामिनी
जतक सभ्य संस्कृति के गाबै छथि रागिनी
ई नगरी अपन छोट नगरी जुनि बुझू
अछि सगरो जगत में मचौने धमाका
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
 
हल्ली-मदन-वाचस्पति के ख्याति छन्हि
विद्यापतिक गीत सब गुनगुनाइत छन्हि
परमज्ञानी सत्यदेव ज्योतिष के ज्ञाता
मिथिला कहल जाईछ संपन्न गुणवाला
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
 
कोइली कुहुकि स्वर पंचम में गाबय
झमझम बरसि मेघ कजरी सुनाबय
भोरे पराती गाबैइयै सुग्गा
परवा स' सजय रोज मंदिर-शिवाला
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
नीपल जाईछ पीढ़ी गोसाऊनिक  नित रोजे
पूजा के शंखनाद कोश-कोश गूजे
घर-घर में शालिग्राम, तुलसी के चौरा
घोघ तर में नारी लागय सीता आ राधा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
 
तुलसिक पनिसल्ला में  कूश आ डाबा
नाग पूजल जाइछ ल' ' दूध संग लाबा
पातैर में भोग लागय आम-खीर-पूरी
जगदम्बाक कृपा स' हटल रहय विघ्न बाधा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
 
यश-कीर्ति-वैभव स'  परिपूर्ण  मिथिलांचल
जनक जीक  न्याय के देवतो सब मानल
"
मनीषक" अछि कामना जे बढ़ू सब आँगाँ
मैथिलक विचार उच्च, जीवन होइछ सादा
जत' बाँचल अछि एखनहु धरि मान ओ मर्यादा
१.शि‍वकुमार ि‍मश्र २.
२.राजेश मोहन झा- गरम जमाना ३.कृष्ण कुमार राय किशन’-दहेज, देशऽक चिन्ता

 
शि‍वकुमार ि‍मश्र
बेरमा, तमुरि‍या, मधुबनी] बि‍हार

कवि‍ता-


भलमानुस समाज-

व्‍यवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक
मरनोपरान्‍त ओकर नाअो लैत छैक
सोनमा हमरा गामक सबहक काज करैत छैक
तकरेपर सभ खुब गड़जैत छैक
व्‍यवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक
कॉमरशि‍यल लोककेँ घाटा सुझैत छैक
सामाजि‍क लोक घाटा नै बुझैत छैक
समाज आओर सामाजि‍कताक परि‍भाषा लोक दैत छैक
मुदा, ओ लोक कि‍एक नै समाजसँ जुडै़त छैक
व्‍यवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक
शि‍वजी अपन भावनापर नोर पोछैत छैक
ककरो कि‍एक नै अपन बुझैत छैक
जाति‍-पाति‍क ढि‍ढ़ोरा सेहो पि‍टैत छैक
तेकरा सरकारमे कि‍एक स्‍थान दैत छैक
व्‍यवहारि‍क लोककेँ घाटा होइत छैक।

राजेश मोहन झा
राजेश मोहन झा ''गुंजन'', पिताः- स्व० काली कान्त झा ''बूच'', माता :- स्व० चन्द्रकला देवी, जन्म तिथिः- ०५/०९/१९८१ जन्म स्थानः- ग्राम० - करियन जिला - समस्तीपुर पिन - ८४८११७ सम्प्रतिः-   स्टेशन मास्टर, दक्षिण पूर्व रेलवे, खड़गपुर मंडल


!!
गरम जमाना !!

औ बाबू ई गरम जमाना ।
नगर सिनेमा आर चौवाट,
अधिकारक झंडा नेने हाथ,
ठोकथि ताल नेत्री गण मिलिक
पुरूष जाति सभ बनल बेगाना ।।
प्रतिशत तैंतीस जल्दी चाही
नेना भूखे वरू काटथि काही,
खसावथि वज्र लगावथि अॅगराही,
अप्पन जन भगेल बेगाना ।।
ममता रखैत छथि कोठीक कान्ह पर,
सम्मेलन करतीपुनमा वान्ह पर
सगर नियोजन हिनके चाही,
मर्द वनल फाटल पैजामा ।।
साड़ी मे नहि हिनका देखवै,
वेलपड़त सोहारी तखने बुझवै
जौ वैसलहुॅ वेदी वर कहियो,
जीवन भरि भरवै हर्जाना ।।

 

कृष्ण कुमार राय किशन

परिचय:- वर्तमानमे आकाशवाणी दिल्लीमे संवाददाता सह समाचार वाचक रूपमे कार्यरत छी। हिंदी आ मैथिलीमे लेखन। शिक्षा- एम. फिल पत्रकारिता व जनसंचार कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्रसॅं।
जन्म:- कलकतामे । मूल निवासी:-ग्राम -मंगरौना, भाया -अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार।
दहेज
दहेजक नाम सुनि कऽ
कांइपि उठैत अछि ,माए-बापऽक करेज
कतबो छटपटायब तऽ
लड़कवला कम नहि करताह अपन दहेज।
ओ कहताह, जे बियाह करबाक अछि
तऽ हमरा देबैह परत दहेज
पाई नहि अछि तऽ
बेच लिय अपना जमीनऽक दस्तावेज।
दहेज बिना कोना कऽ करब
हम अपना बेटाक मैरेज
दहेज नहि लेला सऽंॅ खराब होयत
समाज में हमर इमेज।
एहि मॉडर्न जुग मे तऽ
एहेन होइत अछि मैरेज
आयल बरियाति घूरीकऽ जाइत छथि
जऽंॅ कनियो कम होइत अछि दहेज।
मादा-भूर्ण आओर नव कनियाक
जान लऽ लैत अछि इ दहेज
ई सभ देखि सूनि कऽ
काइपि उठैत अछि किशनके करेज।
समाज के बरबाद केने
जा रहल अछि ई दहेज
बचेबाक अछि समाज के तऽ
हटा दियौ ई मुद्रारूपी दहेज।
खाउ एखने सपत ,करू प्रतिज्ञा
जे आब नहि मॅंागब दहेज
बिन दहेजक हेतै आब सभ ठाम
सभहक बेटीक मैरेज।
 देशऽक चिन्ता

किनको छनि स्वार्थक चिन्ता
किनको छनि घूस लेबाक चिन्ता
नेता सभ के अछि कुर्सीक चिन्ता
मुदा किनको नहि अछि, देशऽक चिन्ता।
चुनाव जीतलाक बाद, कुर्सी भेटलैन्ह नेताजी के
भऽ गेलाह निःफिकीर
मुदा भाषणेटा मे खिचैत छथि
आर्थिक विकासऽक लकीर ।
भूखे मरैत अछि गरीब जनता
एहि बातक हुनका नहि छनि कोनो चिन्ता
शहीद होइत छथि देशऽक सीमा पर जुआन
कानब तऽ दूरक गप, श्रद्धांजलियो दैए लेल नहिं औता।
नेता सभ मंत्रालय लेल छथि परेशान
कियो स्वार्थसिद्धिक लेल अछि हरान
कियो भूखे मरि जाए, कियो दहा जाएय बाढ़ि मे
मुदा हुनका नहि, जेतैन मरल लोक पर धियान।
घूस खाईत-खाईत भऽ गेलाह भ्रष्ट
मुदा खादिक अंगा पहिर, अपना के बुझैेत छथि श्रेष्ट
कोना कऽ हेतै आर्थिक विकास
नहिं सोचैत छथि, नहि छनि चिन्ता।
सभ पार्टी के तऽ अछि कुर्सीक चिन्ता
मुदा किनको नहिं अछि देशऽक चिन्ता।

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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...